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मंगलवार, 21 जून 2016

माकपावालो बंगाल लाइन भ्रष्ट लाइन

       माकपा का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा।समूची पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय कमेटी भ्रष्ट बंगाल माकपा यूनिट को बचाने में लगी है।जिस बंगाल लाइन को लेकर हंगामा मचा है उसके लिए मेनीपुलेशन और इस्तेमाल का आधार तो विगत सीसी और पीबी ने ही तैयार किया था।संध्याभाषा में बंगाल में मोर्चा बनाने का जो आह्वान किया गया उसके ही गर्भ से बंगाल लाइन निकली है।मीडिया की मानें तो इसके निर्माता हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य,सूर्यकांत मिश्रा,गौतमदेव,मोहम्मद सलीम।इन चार नेताओं ने गंभीरता के साथ बंगाल लाइन को लागू किया,इसके अलावा इसे लागू करने में पश्चिम बंगाल के सभी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति सदस्य अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में यह विरल घटना है कि पार्टी ने किसी दल के साथ समझौता किया या मोर्चा बनाया या सीटों पर समझौता किया लेकिन उसके बारे में पोलिट ब्यूरो,केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी किसी ने भी आधिकारिक तौर पर कोई लिखित बयान जारी नहीं किया,हमने इस संदर्भ में फेसबुक पर लिखा भी था। लिखिततौर पर बयान जारी न करके दलीय समझौता करके चुनाव लड़ना स्वयं में अनैतिक ,नीतिहीन और भ्रष्ट आचरण है।

सवाल यह है बंगाल लाइन आई कहां से और क्यों आई ॽ बंगाल लाइन का स्रोत है पार्टी का भ्रष्टतंत्र।मैंने करीब से इस भ्रष्टतंत्र को देखा है ।माकपा में भ्रष्ट दलतंत्र का जन्म ज्योति बाबू के शासनकाल में ही हुआ।इसकी उस जमाने में विनयकृष्ण चौधुरी और नृपेन चक्रवर्ती जैसे धाकड़ नेताओं ने जमकर आलोचना की,अफसोस की बात है कि उनकी आलोचना की ओर किसी ने द्यान नहीं दिया और पार्टी ने सामूहिकतौर पर अनुशासनभंग करने के नाम पर इन दोनों नेताओं को आम जनता में अपमानित किया और अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी।

34साल तक शासन के बाद माकपा में यह भावना और आदत गहरे जड़ जमा चुकी है कि वे तो सरकार के लिए बने हैं और उनको हर हालत में सरकार में ही होना चाहिए। यहां तक कि पार्टी मेम्बरों में भी यही भावना बनी कि वे सरकार के लिए बने हैं।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से माकपा मेम्बरों का चरित्र गठन हुआ।संयोग से ममता ने 2011 में वाम मोर्चे को हराकर विधानसभा कब्जे में कर ली,यह स्थिति माकपा के सदस्य झेलने को तैयार नहीं थे,देखते ही देखते रातों-रात बगैर किसी विवाद के हजारों माकपा सदस्यों और हमदर्दों ने ममता का दामन धाम लिया,ममता का दामन थामने का यह सिलसिला अभी भी जारी है।इसका प्रधान कारण है माकपा का विचारधाराहीन पार्टी में रूपान्तरण,34साल के शासन के दौरान माकपा ने सचेत रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा का त्याग किया और सत्ता की विचारधारा को अपने सदस्यों में प्रचारित किया,इसके कारण माकपा एक कम्युनिस्ट दल की बजाय सत्ताधारी दल के रूप में परिवर्तित हो गयी,यह स्थिति लगातार बद-बदतर अवस्था की ओर ले गयी।माकपा यह भूल गयी कि वह कम्युनिस्ट दल है,संघर्ष के लिए बनी पार्टी है,उसने सचेत रूप से सत्ता के संस्थान के रूप में यहां पर अपना विकास किया और यही वह बृहत्तर प्रक्रिया है जिसने माकपा को नीतिहीन दल के रूप में परिणत करके रख दिया।नंदीग्राम आंदोलन के समय और उसके पहले भी मैंने निजी तौर पर इस पहलू पर बहुत लिखा था जिसके कारण मेरी तीखी आलोचना हुई और माकपाईयों ने मेरा बड़े पैमाने पर अपमान किया,सामाजिक बहिष्कार किया और सारी प्रशासनिक मशीनरी का दुरूपयोग मेरे खिलाफ किया।



मैं निजी तौर पर मार्क्सवाद को पसंद करता हूं जिसके कारण मुझे वाम अच्छा लगता है लेकिन इसका कतई मतलब नहीं है कि मैं माकपा के बारे में अपनी दो-टूक राय व्यक्त न करूँ,मैंने जबभी उचित समझा जमकर माकपा की खुली आलोचना की और उसकी कीमत भी दी,दुखद बात यह है कि माकपा जैसे सुंदर दल को लीडरशिप ने सचेत रूप से नष्ट किया है।आज स्थिति यह है कि बंगाल में माकपा की कोई साख नहीं है।ममता के महान भ्रष्टाचार,हिंसाचार आदि के बावजूद आम जनता माकपा पर विश्वास नहीं करती।कायदे से बंगाल लाइन के नाम पर जो घोटाला हुआ है उसके लिए पश्चिम बंगाल की पूरी पार्टी को भंग किया जाना चाहिए और निचले स्तर से लेकर राज्य स्तर तक नए सिरे से पार्टी का निर्माण किया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 20 मई 2016

वाम- कांग्रेस गठजोड़ पराजय के सबक-


        पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय काफी महत्व रखती है।जिन लोगों की वाम के प्रति सहानुभूति है वे वाम को पश्चिम बंगाल के सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में बहुत कम जानते हैं,जो वाम इस राज्य में है वह विचारधारा के नशे और ३४साल सत्ता में रहने के कारण यथार्थ से एकदम कटा हुआ है।लोकल से लेकर नेशनल स्तर के वामनेता,खासकर माकपानेता जमीनी यथार्थ को देखने से भागते रहे हैं।सच्चाई यह है कि वाम के पराभव का सिलसिला थमा नहीं है ऊपर से राजनीतिक अवसरवाद ने वाम को घेर लिया है।आयरनी यह है कि माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य पी.विजयन( केरल) से प्रणव राय से हाल ही में केरल कवरेज के दौरान पूछा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से वाम ने जो गठबंधन किया है उस पर क्या कहना है ? विजयन ने कहा मैं नहीं जानता।आश्चर्य है वाम-कांग्रेस का यहां गठबंधन था सारे मीडिया में खबर है पूरी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन पोलिट ब्यूरो सदस्य कह रहा है,मैं नहीं जानता! चुनावी सभाओं में पोलिट ब्यूरो सदस्य गठबंधन कह रहे हैं,लेकिन एक दूसरे पोलिट ब्यूरो सदस्य विमान बसु ने कहा गठबंधन कहां है ? यह राजनीतिक दोगलापन यदि माकपा नेताओं के मन में है तो जनता कैसे उन पर विश्वास करती !माकपा ने दो टूक ढंग से कभी खुलकर नहीं बताया कि वाम- कांग्रेस गठबंधन है या चुनावी तालमेल है ?इस तालमेल को किन तर्कों को लेकर किया गया उसकी कोई लिखित रूप में चर्चा नजर नहीं आई! कोई विश्वास करेगा कि केरल के माकपा नेताओं को मालूम नहीं है कि बंगाल में क्या हो रहा है!
माकपा की जिन मुद्दों को लेकर आलोचना हमने की उन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।इससे भी बड़ी बात यह कि जब संगठन कमजोर है और हमले हो रहे हैं ,माकपानेता अपने लोगों को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं,पोलिंग एजेंट तक देने में असमर्थ हैं,तब फिर चुनाव लड़ने क्यों गए ? क्या संगठन के बिना चुनाव लड़ना चाहिए? बंगाल में कई बार चुनाव होते हैं और माकपा चुनाव में लड़ने लायक अवस्था में नहीं है।ऐसी स्थिति में माकपा को पश्चिम बंगाल में कुछ वर्षों के लिए चुनावी राजनीति से विरत रहकर संगठन निर्माण के काम पर ध्यान देना चाहिए,इस समय माकपा अधेड़ और बूढ़ों का दल मात्र होकर रह गया है।युवाओं का संगठन में अभाव है ,और सही नीतियों का भी अभाव है।
माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक संरचनाओं ,नियमों और नीतियों को नागरिक समाज की परिकल्पना और नीतियों की संगति में नए सिरे से बनाए,यदि वह ऐसा करता है तो भविष्य में संभावनाएं हैं।वरना लोकतंत्र में हाशिए पर रहने के लिए तैयार रहे।



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ममता की जीत को यहां से देखो-


     पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार जिस तरह खत्म हो रहा है वह बताता है कि माकपा ने 34साल की वामशासन की गलतियों से कोई सबक हासिल नहीं किया ।मसलन् इसबार के चुनाव में माकपा को मात्र 19.7फीसदी वोट मिले हैं जबकि टीएमसी को 44.9फीसदी वोट मिले हैं।यानी टीएमसी अकेले अपने दम पर समाज के बृहत्तर तबकों के बीचमें अपनी स्वीकृति अर्जित करने में सफल रही है।खासकर अल्पसंख्यकों,एससी,एसटी और ग्रामीणों में उसे व्यापक जन समर्थन तो मिला है, इसके अलावा शहरीजनों में भी वह जनाधार का विस्तार करने में सफल रही है।इसबार के चुनाव से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि टीवी चैनलों का जनता पर कोई असर नहीं होता।आज भी निजी जनसंपर्क और परंपरागत संगठन के जरिए किया गया प्रचार कार्य प्रभावी होता है।जो लोग सोचते हैं कि टीवी और सोशलमीडिया से चुनाव जीता जाता है,वे गलतफहमी में हैं।
पश्चिम बंगाल में अधिकांश टीवी चैनलों ने अहर्निश ममता के खिलाफ प्रचार किया,लेकिन आम जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ।इसका प्रधान कारण है ममता का कैडर आधारित संगठन।दूसरी बात यह कि ममता सरकार ने विकासमूलक योजनाओं को नीचे तक लागू करके,स्वयं निरीक्षण और निर्देशन का काम किया,हर जिले में बार-बार दौरा किया,इससे सारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करने में वह सफल रही। तीसरा प्रधान कारण है वाम और भाजपा का साखविहीन प्रचार।इन तीन कारणों ने मिलकर ममता की जीत को संभव बनाया।उल्लेखनीय है ममता सरकार के खिलाफ अपराधीकरण, घूसखोरी, पुलिस मशीनरी के दुरूपयोग आदि के सभी आरोप सच हैं,लेकिन आम जनता ने अपनेहित के सामान्य विकासमूलक कार्यों को केन्द्र में रखकर ममता को वोट दिया।वाम की इस मामले में 34 साल की नाकामियां आज भी सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हैं।एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं।मैं जिस मुहल्ला-गली में रहता हूँ,उसके आसपास कोई पानी की प्याऊ वाम जमाने में नहीं थी,लेकिन ममता के आने के बाद ठंड़े पानी की चार प्याऊ विभिन्न नुक्कड़ों पर इस बीच में बनायी गयीं।इससे नागरिकों को मदद मिली।सफाई के मामले में भी वाम को ममता ने मात दी है,कोलकाता पहले की तुलना में ज्यादा साफ रहता है,सड़कों और गलियों में बहुत रोशनी रहती है।यही रोशनी वाम शासन में कम नजर आती थी।यह स्थिति सारे राज्य की है।इसी तरह कन्याश्री योजना के तहत हर लड़की के बैंक खाते में 25हजार रूपये सरकार ने जमा कराए हैं,गरीबों को 50हजार रूपये तक की घर बनाने के लिए धनराशि गांवों में घर-घर जाकर बांटी है।हर लड़की को साइकिल मिली है,इन सब कार्यों के कारण राज्य का नक्शा बदला है।शिक्षा के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है।जो कि वाम शासन में नहीं हुआ था। इन सभी पहलुओं पर मैं फेसबुक पर पहले भी लिख चुका हूँ।कहने का तात्पर्य है कि ममता को वोट सकारात्मक कारणों की वजह से मिला है और इसके कारण ममता की गड़बड़ियों को जनता ने नजरअंदाज किया है।

बुधवार, 30 मार्च 2016

वे वाम का साथ छोड़कर क्यों चले गए ॽ



     पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी के खिलाफ दो साल पहले किए गए नारद वीडियो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किसी भयानक राजनीतिक उथल-पुथल की कुछ लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।हमारा अनुमान है ऐसा कुछ भी नहीं होगा।पश्चिम बंगाल के लोग,खासकर मध्यवर्ग के अंदर इस वीडियो के आने के बाद कोई आक्रोश नजर नहीं आ रहा,यहां के लोग करप्शन से बेखबर हैं,करप्शन देखते हैं,झेलते हैं,सामंजस्य बिठाते हैं और जी रहे हैं,करप्शन को लेकर सारे देश में यही दशा है।जनचेतना की  भयावह स्थिति है कि सारधा चिटफंड कांड में टीएमसी के अधिकांश बड़े नेताओं के लिप्त होने के बावजूद वाममोर्चा कोई विशाल जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ रहा,हां,उसने निरंतर प्रतिवाद जरूर किया,लेकिन जिस स्केल पर लोग चिटफंड घोटाले से लोग प्रभावित हुए हैं उसकी तुलना में दशांश को भी जुलूसों में खींच नहीं पाया,यहां तक कि विधानसभा उपचुनावों में टीएमसी को हराने सफल नहीं हुआ।नगरपालिका चुनावों  में हरा नहीं पाया।ऐसी स्थिति में नारद वीडियो स्टिंग कोई जादू कर देगा हमें नहीं लगता।
     सवाल यह है वाम के साथ जो सामाजिक शक्तियां थीं,जो सामाजिक संतुलन था,वह आज क्यों नहीं है चुनावों की सारी लड़ाई सामाजिक संतुलन को पक्ष में करने की लड़ाई है।ममता ऐन-केन-प्रकारेण सामाजिक संतुलन को अपनी ओर झुकाने में सफल रही है और यही उनके नेतृत्व की सफलता है।

सवाल यह है जो सामाजिक शक्तियां वाम के साथ थीं वे किन कारणों से वाम को छोड़कर चली गयीं मसलन्,शरणार्थी बंगालियों के पुनर्वास में वाम ने सक्रिय भूमिका निभायी और उनकी आर्थिक-सामाजिक शक्ति के विकास में हर संभव मदद की,एक जमाना था ये लोग बेहद गरीब थे,लेकिन वाम जमाने में इनके आर्थिक हालात बदले,इनमें मध्यवर्ग पैदा हुआ,संपत्ति पैदा हुई,लेकिन वामचेतना का विकास न हो सका।वे सिर्फ वोटबैंक बने रहे।लेकिन ज्योंही वाम के खिलाफ सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के कारण हवा बहने लगी,ये लोग वाम को छोड़कर चले गए।यही हाल शिक्षकों का है। शिक्षकों एक बड़ा वर्ग वाम के साथ था।लेकिन आज वे लोग भी साथ नहीं हैं। जबकि शिक्षकों पर कोई जुल्म नहीं हुआ,इसके बावजूद वे वाम को छोड़कर क्यों चले गए सरकारी कर्मचारियों के संगठन में भी यही हाल है।यह वह वर्ग है जो सचेतन कहलाता है,आर्थिक रूप से सुरक्षित है,इसको कोई खतरा न तो वाम के जमाने में था और न ममता के जमाने में था,फिर यह वर्ग वाम को क्यों छोड़कर चला गया वाम ने कभी सार्वजनिकतौर इन वर्गों के वाम-विमुख हो जाने की समीक्षा नहीं की,क्यों नहीं की ॽक्या बंगलादेशी शरणार्थियों में आई समृद्धि का वाम के नजरिए से कोई अंतर्विरोध है ॽक्या शिक्षकवर्ग के वाम-विमुख होने का वाम के नव्य-आर्थिक उदारीकरण के विरोध और केन्द्र के समान छठे वेतन आयोग के अनुसार नए वेतनमान में केन्द्र के समान महंगाई भत्ता न देने के वाम सरकार के फैसले के साथ कोई संबंध है ॽ जी हां,गहरा संबंध है।इस तरह के फैसलों ने वाम के जनाधार को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है और वाम ने अपनी आज तक आत्मालोचना नहीं की है। समस्या को जानकर भी उसके बारे में चुप रहना वाम की विशेषता है,जबकि आम जनता उत्तर चाहती है।समस्या के समाधान सुझाए बगैर वाम को आम जनता दोबारा आसानी से सत्ता पर पहुँचने नहीं देगी।वाम अपना स्टैंड साफ करे कि उसने केन्द्र के बराबर राज्य कर्मचारियों को महंगाई भत्ता क्यों नहीं दिया ॽ भविष्य में देगा या नहीं ॽ आज राज्य में कॉलेज-वि वि लेक्चरर केन्द्र की तुलना में 25हजार रूपये कम पाता है, प्रोफेसर 60रूपये कम पाता है,यह सीधे वामशासन में लागू की गयी वेतननीति का भयानक परिणाम है।यह साधारण बात नहीं है जिसे दरकिनार किया जाए।माकपा के लोग देस में अन्यत्र जितना वेतन पाते हैं पश्चिम बंगाल में माकपा के और अन्य शिक्षक उनसे काफी कम वेतन पाते हैं।यह माकपा के द्वारा किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।  

लोकतंत्र ,जुल्म और बंगाल


        पश्चिम बंगाल विधानसभा के 2016 के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं,इस चुनाव का भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर हो सकता है।इसबार के चुनाव में कई नई चीजें नजर आ रही हैं जो पहले कभी नहीं देखी गयीं।पहलीबार वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच में चुनाव गठबंधन हुआ है,इस तरह का गठबंधन पहले कभी नजर नहीं आया।जमीनी स्तर पर इस मोर्चे ने मिल-जुलकर काम करने की कोशिश की है,इसे आम भाषा मे सिलीगुड़ी लाइन कहते हैं। सबसे पहले सिलीगुडी नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस-वाम ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उसके परिणाम बेहतर रहे।वाम को वहां विजय मिली।सिलीगुडी लाइन से प्रेरित होकर काफी पहले वाम-कांग्रेस गठबंधन का मन बना चुके थे।

यह पहलीबार हुआ कि राजनीतिक सिद्धांतों को इस मोर्चे के निर्माण में सिलीगुड़ी में आड़े नहीं आने दिया गया,बाद में यही चीज समूचे राज्य में नजर आ रही है।लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी है सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ।लेकिन इसबार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सफलता हासिल करना इतना जरूरी हो गया है कि माकपा जैसा सिद्धांतनिष्ठ दल खुलकर इस गठजोड़ के प्रति सैद्धांतिक ढ़ांचा प्रस्तावित नहीं कर पाया,यह माकपा की सबसे बड़ी कमजोरी है।कायदे से संध्याभाषा में पश्चिम बंगाल पर बातें करने से माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व को बचने की जरूरत थी और खुलकर यह बताने की जरूरत थी कि उनको कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ना क्यों जरूरी है ॽ लेकिन माकपा ने ऐसा नहीं किया। इससे माकपा जैसे सिद्धांतनिष्ठ दल की कमजोरी ही सामने आई है,जबकि पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस से कमजोर दल आज भी नहीं है।

सवाल यह है कि क्या राजनीति में सैद्धांतिक पारदर्शिता जरूरी है ॽ यदि हां तो उसका आधार कहां है ॽइस बात को कहने का यह आशय नहीं है कि वाम को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।यह माकपा-कांग्रेस तय करें लेकिन कागज पर सैद्धातिकतौर पर परिभाषित तो करें कि वे क्यों और किन परिस्थितियों में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं ॽ जनता की मांग है,जनता चाहती है,इसलिए वाम-कांग्रेस गठबंधन या सीट समझौता हुआ है,यह सब कहकर सिद्धांतहीनता का प्रदर्शन न करें।कांग्रेस एक सिद्धांतहीन दल है,लेकिन माकपा से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते ! भविष्य में कम्युनिस्ट आंदोलन का जो लोग मूल्यांकन करेंगे उनके लिए यह मुश्किल रहेगी कि वे माकपा-कांग्रेस इस गठजोड़ के सैद्धांतिक राजनीतिक दस्तावेज कहीं पर भी नहीं देख पाएंगे। राजनैतिक व्यवहारवाद को इस गठजोड़ का मूलाधार बना दिया गया है।

कांग्रेस-वाम की पश्चिम बंगाल में राजनीतिक एकता का एक धागा जिस तरह सिलीगुड़ी लाइन से जुड़ा है उसी तरह उसका दूसरा धागा हाल के पूना-हैदराबाद-जेएनयू के छात्र आंदोलन से भी जुड़ा है। तीसरा धागा मोदी सरकार की अ-लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी नीतियों के खिलाफ संसद में वाम-कांग्रेस की संयुक्त कार्रवाईयों से भी जुड़ा है। इन तीनों ही धागों से मिलकर वाम-कांग्रेस का पश्चिम बंगाल में जमीनी राजनीतिक समझौता हो पाया है।

पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई यह है कि ममता सरकार ने हर मोर्चे पर निकम्मेपन और अपराधीकरण का प्रदर्शन किया है।अपराधियों ने राजनीति को बंधक बना लिया है।खासकर ममता सरकार आने के बाद हर क्षेत्र में अपराधीकरण बढ़ा है,अपराधियों के हमले बढ़े हैं।पुलिस और प्रशासन का दुरूपयोग बढ़ा है।ममता सरकार खुलेआम अपराधियों को संरक्षण देती रही है,औरतों पर अत्याचार बढ़े हैं,बुद्धिजीवियों में सत्ताभक्ति बढ़ी है,गांवों से लेकर शहर तक खुलेआम गुण्डों का दबदबा बढ़ा है।शिक्षित बंगाली मध्यवर्ग ,खासकर लेखकों,बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ भय के कारण बोलना बंद कर दिया है।त्रासद पक्ष यह है कि बुद्धिजीवी अपराधियों के संरक्षण में जीने को अभिशप्त हैं।अपराधी किस्म के लोग हर स्तर पर प्रशासन में काम करने वालों को निर्देश दे रहे हैं कि वे क्या करें और क्या न करें।बौद्धिकों का इस तरह का पतन पहले कभी नहीं देखा गया।इससे बंगाल की सांस्कृतिक-बौद्धिक इमेज क्षतिग्रस्त हुई है।समाज में दब्बूपन बढ़ा है।यह वही दब्बूपन है जिसको अपने अंतिम वर्षों में वामशासन में अपराधियों ने पैदा किया था।अपराधियों का सामाजिक क्षितिज पर निर्णायक बन जाना असल में वामयुगीन फिनोमिना है,जो अपराधी एक जमाने में वाम के साथ थे, वाम के चुनाव हारते ही ममता की छत्रछाया में चले गए,इन अपराधियों के कारण वाम को चुनावों में हारना पड़ा,यही अपराधी इसबार ममता के गले की हड्डी बन गए हैं।

सवाल यह है अपराधियों के खिलाफ वाम-कांग्रेस गठबंधन क्या कड़ा रूख अपनाएगा ॽ क्या वे यह वायदा करेंगे कि अपराधियों को संरक्षण नहीं देंगे ॽ पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई है अपराधी गिरोह विभिन्न इलाकों में सक्रिय हैं और वोट बैंक नियंत्रित करते हैं।वोट बैंक का नियंत्रण इस तरह देश में अन्यत्र नजर नहीं आता। इस अपराधीकरण पर तकरीबन सभी दल चुप हैं,जबकि सभी मसलों पर थोड़ी बहुत बातें हो रही हैं।यहां तक कि मीडिया कवरेज से भी अपराधी गिरोह गायब हैं। कम से कम मीडिया में विभिन्न इलाकों में सक्रिय अपराधी गिरोहों के काले कारनामों को प्रकाशित करने का काम होना चाहिए।लोकतंत्र को भय मुक्त करने का सबसे आसान पहला कदम है अपराधी गिरोहों की नामों के साथ पहचान को मीडिया में उदघाटित किया जाए।बिना अपराधियों को एक्सपोज किए बंगाल में लोकतंत्र नहीं बचा सकते।तकरीबन 86हजार वारंट कटे हुए लोग राज्य में खुलेआम घूम रहे थे,इनमें से रीयलसेंस में अभी भी 38हजार बाहर हैं,कहा जा रहा है बाकी को चुनाव आयोग के दबाव में पकड़कर बंद कर दिया गया ,लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अपराधी खुलेआम बाहर घूम रहे हैं,जिनके एक साल से ज्यादा समय से वारंट कटे हुए थे उनमें से अधिकांश बाहर हैं और सरेआम जनता को धमकाने का काम कर रहे हैं।ऐसी अवस्था में विधानसभा चुनाव में हिंसा का होना,गांवों,मुहल्लों में आतंक का होना स्वाभाविक है। अनेक इलाकों में टीएमसी के नेतागण गांव वालों के मतदादा पहचान पत्र घरों से जबर्दस्ती छीनकर ले गए हैं,अफसरों को कहा गया है कि सत्तारूढ़ टीएमसी के पक्ष में काम करो,मतदान कराओ। जिन इलाकों में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं वहां पर पुलिस निष्क्रिय दर्शक बनी हुई है।केन्द्रीय पर्यवेक्षक और केन्द्रीयबलों के आने के बावजूद हिंसक हमले बंद नहीं हुए हैं। आतंक-भय कम नहीं हुआ है। खासकर वाम-कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर अनेक इलाकों में दीवारलेखन से लेकर मीटिंग न करने देने के लिए टीएमसी के लोगों ने हमले किए हैं। निचले स्तर टीएमसी के छद्म संगठनों द्वारा झुग्गी-बस्ती इलाकों में भजन-कीर्तन के आयोजन किए जा रहे हैं,यह हिन्दूवोटरों को जोड़ने की साम्प्रदायिक कोशिश है। इलाके के लोगों में सामूहिक भोज कराए जा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों का कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा।



इसबार के चुनाव में कांग्रेस-वाम के पास कैडर या कार्यकर्ताओं का अभाव सहज ही देखा जा सकता है। बड़े पैमाने पर माकपा के कैडरों ने टीएमसी में शामिल होकर माकपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक जमाना था माकपा के पास इफरात में कैडर हुआ करते थे,आज टीएमसी के पास कैडर है।सांगठिक हथियारबंद लोग हैं जो एक ही इशारे पर कहीं पर भी जाकर एक्शन कर सकते हैं।यह वह टीम है जो नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के दौरान बनायी गयी थी।इस टीम में तकरीबन 10हजार लोगों के होने का अनुमान है।इसके अलावा दलालों,बिल्डरों,ठेकेदारों,चिटफंड एजेंट, पुलिस अफसरों के एक अंश का ममता को खुला सहयोग हासिल है।इसने निचले स्तर पर वाम-कांग्रेस के प्रचार को बाधित किया हुआ है।अब देखना यह है कि वाम-कांग्रेस गठजोड़ किस तरह इस नाकेबंदी को तोड़ता है।एक तथ्य साफ है यदि शांतिपूर्ण मतदान होता है तो ममता नहीं जीतेगी।

सोमवार, 14 मार्च 2016

ममता पर संकट के बादल छाए

      मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इस बात का श्रेय जाता है उन्होंने पश्चिम बंगाल से हमेशा के लिए समाजवाद और उससे जुड़े राजनीतिक स्टीरियोटाइप को बड़े कौशल के साथ विदा कर दिया है।आगामी विधानसभा चुनाव में    वामफ्रंट की यह सबसे बड़ी चुनौती है कि आम जनता को किस तरह राजनीतिक विमर्श में शामिल किया जाए। सबसे सचेत राज्य के रूप में चिर-परिचित इस राज्य की आज सबसे बड़ी त्रासदी है आम जनता का राजनीतिकतौर पर तटस्थ या अन्यमनस्क हो जाना ।एक जमाना था जब हर विषय पर पश्चिम बंगाल के नागरिक में तेज प्रतिक्रिया व्यक्त होती थी,लेकिन विगत पांच साल में सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि आम जनता के अंदर राजनीतिक सचेतनता का माहौल पूरी तरह नष्ट हो गया है। पहले विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले से ही राजनीतिक गहमागहमी शुरू हो जाती थी,लेकिन इन दिनों राजनीतिक सन्नाटा पसरा हुआ है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पांच साल पहले ´अंध-वाम विरोध´ के आधार पर बड़े पैमाने पर वोट मिला था,इसका विगत पांच सालों में ममता ने सुनियोजित ढ़ंग से लाभ उठाया है।उसने बड़े ही कौशल के साथ वामदलों के सांगठनिक ढ़ांचे को तोड़ा,स्थानीय वाम इकाईयों को अप्रभावी बनाया,इसके लिए वाम कार्यकर्ताओं पर शारीरिक हमले से लेकर बहलाने फुसलाने तक सभी तरकीबें इस्तेमाल कीं,शहर से लेकर गांवों तक तृणमूल कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे को विस्तार दिया,खासकर मध्यवर्ग के विभिन्न पेशेवर तबकों में कार्यरत विभिन्न वाम मजदूर संगठनों को निष्प्रभावी बनाया,संघर्ष की राजनीति की बजाय सुविधावाद और अवसरवाद की राजनीति को प्रमुखता दी। फलतःपश्चिम बंगाल के माहौल में वाम राजनीतिक गंध एकसिरे से गायब है ,इस काम में सबसे पहले ममता ने शिक्षकों को निशाना बनाया। ममता ने बिना किसी दवाब के शिक्षकों को वाम राजनीतिक संगठनों से विमुख कर दिया।उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में शिक्षक समुदाय सबसे प्रभावशाली सचेतन राजनीतिक समुदाय है,विगत पांच सालों में प्राइमरी से लेकर कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर तक अधिकांश शिक्षकों को वाम विचारधारा के संगठनों से बाहर निकालने में तृणमूल कांग्रेस सफल रही है। दूसरी ओर ममता ने सत्ता में आने के बाद वामविरोध को छोड़ दिया। उलटे यह कहा कि उनके दल में वाम विचारधारा के लोगों का स्वागत है,इससे वाम की वैचारिक नाकेबंदी का समूचा तंत्र पूरी तरह टूट गया।इसके अलावा आम जनता को अ-राजनीतिक बनाने में समूचे राज्य में फैले क्लबतंत्र की बड़ी भूमिका है।ममता बनर्जी ने सत्ता संभालने के बाद से राजकोष से क्लबों को सालाना एकमुश्त राशि के भुगतान की व्यवस्था करके स्थानीय आक्रोश को नियंत्रित करने में कौशलपूर्ण ढ़ंग से सफलता हासिल कर ली।उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल के हर मुहल्ले में क्लब हैं जिनमें स्थानीय लोगों का आना-जाना रहता है, संपर्क -संबंध रहता है।स्थानीय लोग छोटी-मोटी समस्याओं के समाधान हेतु क्लब सदस्यों की मदद लेते हैं और ये क्लब स्थानीय स्तर पर ममता सरकार के स्थानीय एजेंट की तरह काम कर रहे हैं।इसने स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाले असंतोष को नियंत्रित और नियमित करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है।

यह एक खुला सच है कि ममता सरकार राज्य में औद्योगिकीकरण की दिशा में कोई प्रभावशाली काम नहीं कर पायी है।इवेंट,मेला,मनोरंजन और स्थानीय स्तर पर सुविधाओं के विस्तार के काम को ममता सरकार ने प्राथमिकता दी, गांवों में विद्यार्थियों को साइकिल वितरण,गांवों के क्लबों को टीवी सैट और सालाना धनराशि का आवंटन,गरीबों के लिए मकान बनाने के लिए धन का आवंटन,मस्जिदों और मौलवियों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज आदि जनप्रिय कार्यों के जरिए ममता ने अपने सांगठनिक तंत्र का विस्तार किया,इस काम को करते हुए सचेत ढ़ंग से कांग्रेस ,माकपा और वामदलों के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं और नेताओं को साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति के आधार पर तोड़ा गया,यही वजह है कि विभिन्न जिलों के ग्रामीण इलाकों में वाम और कांग्रेस का सांगठनिक ढ़ांचा एकसिरे से गायब है।इसके अलावा आम गरीबों में सस्ते खाद्य वितरण की योजना को लागू करके फिलहाल आम जनता के आक्रोश को ठंड़ा रखने में ममता सरकार सफल रही है।यही वह परिदृश्य है जिसमें ममता बनर्जी दोबारा वोट हासिल करना चाहती हैं।

दूसरी ओर वामफ्रंट पूरी शक्ति लगाकर तृणमूल कांग्रेस को हराने की कोशिश में है इसके लिए उसने कांग्रेस के साथ अनौपचारिक तौर पर सीटों का समझौता भी कर लिया,वामफ्रंट का मुख्यजोर राज्य में नए सिरे से औद्योगिकीकरण पर है ,वह उन योजनाओं को नए सिरे शुरू कराने का वायदा लेकर जनता में जा रहा है जो औद्योगिक योजनाएं ममता सरकार के आने के बाद बंद हो गयीं या फिर उनके काम को ममता सरकार आगे नहीं बढ़ा पायी।खासकर सिंगूर में नैनो कार के कारखाने को पुनःशुरू करने की अभिलाषा लेकर वाममोर्चा आम जनता में जाएगा। वाममोर्चा और कांग्रेस दोनों ही राज्य की खस्ताहाल कानून और व्यवस्था , कॉलेज-वि.वि. स्तर पर बढ़ी हुई हिंसा ,सारधा आदि चिटफंड़ घोटाला कांड से जुड़े सवालों पर वोट मांगने का मन बना चुका है। इसके अलावा औरतों की सुरक्षा का सवाल भी प्रमुख है। देखना होगा तृणमूल कांग्रेस और वाम का सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों पर क्या रूख रहता है। क्योंकि तकरीबन साढ़े 6लाख कर्मचारियों का भविष्य इससे जुड़ा है,फिलहाल राज्य कर्मचारियों को केद्र सरकार के कर्मचारियों की तुलना में64 प्रतिशत कम डीए मिलता है और इसे लेकर कर्मचारियों में व्यापक असंतोष है,देखना होगा यह असंतोष मतदान के दिन क्या रूख अख्तियार करता है।इसके अलावा कर्मचारियों का तकरीबन 55फीसदी धन छठे वेतन आयोग का बकाया है। यदि वाम-कांग्रेस ने इस मसले को हवा देने में सफलता हासिल कर ली तो तृणमूल कांग्रेस के दोबारा चुने जाने के मार्ग में समस्याएं खड़ी हो सकती हैं,क्योंकि राज्य कर्मचारियों के भरोसे ही चुनाव मशीनरी चलती है।



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