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प्रेमचंद और ईश्वर

हमारे कई फेसबुक मित्रों ने कहा है कि प्रेमचंद तो ईश्वर को मानते थे। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि वे ईश्वर या ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति मानने को तैयार नहीं थे जिसे देखा न हो।यह भी सवाल उठा है प्रेमचंद ने इस्लाम धर्म की आलोचना कहां की है ॽ हम इन दोनों सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे। हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव का विस्तार से जिक्र करने के बाद प्रेमचंद ने ´मनुष्यता का अकाल´(जमाना, फरवरी 1924) निबंध में लिखा , ´इतिहास में उत्तराधिकार में मिली हुई अदावतें मुश्किल से मरती हैं,लेकिन मरती हैं,अमर नहीं होतीं।´

उपरोक्त निष्कर्ष निकालने के पहले प्रेमचंद ने ´मनुष्यता का अकाल´ में ही लिखा, ´हमको यह मानने में संकोच नहीं है कि इन दोनों सम्प्रदायों में कशमकश और सन्देह की जड़ें इतिहास में हैं। मुसलमान विजेता थे,हिन्दू विजित।मुसलमानों की तरफ से हिन्दुओं पर अकसर ज्यादतियाँ हुईं और यद्यपि हिन्दुओं ने मौका हाथ आ जाने पर उनका जवाब देने में कोई कसर नहीं रखी,लेकिन कुल मिलाकर यह कहना ही होगा कि मुसलमान बादशाहों ने सख्त से सख्त जुल्म किये। हम यह भी मानते हैं कि मौजूदा हालात में अज़ान और कु…

साम्प्रदायिकता अंधविश्वास और प्रेमचंद

प्रेमचंद की महानता इस बात में है कि वे साम्प्रदायिकता के जहर को अच्छी तरह पहचानते थे। उन्होंने उस धारणा का खण्डन किया जिसके तहत अच्छी और बुरी साम्प्रदायिकता का वर्गीकरण करके अनेक लोग काम चलाते हैं। दुर्भाग्य यह है भारत में अनेक लोगों को साम्प्रदायिक दल में अपने हित,समाज के हित भी सुरक्षित नजर आने लगे हैं। इस तरह के लोगों को ध्यान में रखकर प्रेमचंद ने लिखा-

"इंडियन सोशल रिफ़ार्मर अंग्रेजी का समाज सुधारक पत्र है और अपने विचारों की उदारता के लिए मशहूर है। डाक्टर आलम के ऐंटी - कम्युनल लीग की आलोचना करते हुए, उसने कहा है कि साम्प्रदायिकता अच्छी भी है बुरी भी । बुरी साम्प्रदायिकता को उखाड़ फेंकना चाहिए।मगर अच्छी साम्प्रदायिकता वह है ,जो अपने क्षेत्र में बड़ा उपयोगी काम कर सकती है,उनकी क्यों अवहेलना की जाय। अगर साम्प्रदायिकता अच्छी हो सकती है,तो पराधीनता भी अच्छी हो सकती है,मक्कारी भी अच्छी हो सकती है,झूठ भी अच्छा हो सकता है,क्योंकि पराधीनता में जिम्मेदारी से बचत होती है,मक्कारी से अपना उल्लू सीधा किया जाता है और झूठ से दुनिया को ठगा जाता है। हम तो साम्प्रदायिकता को समाज का कोढ़ समझते…

प्रेमचंद और भाषा समस्या

एक है मीडिया की भाषा और दूसरी जनता की भाषा,मीडिया की भाषा और जनता की भाषा के संप्रेषण को एकमेक करने से बचना चाहिए।

प्रेमचंद ने भाषा के प्रसंग में एक बहुत ही रोचक उपमा देकर भाषा को समझाने की कोशिश की है, उन्होंने लिखा है ´यदि कोई बंगाली तोता पालता है तो उसकी राष्ट्रभाषा बँगला होती है।उसी तोते की सन्तान किसी हिन्दी बोलनेवाले के यहाँ पलकर हिन्दी को ही अपनी मादरी-जबान बना लेता है।बाज़ तोते तो अपनी असली भाषा यहाँ तक भूल जाते हैं कि ´´ टें-टें´´ भी कभी नहीं कहते।ठीक इसी प्रकार कुछ नये रंग के भारतीय हिन्दी इतनी भूल जाते हैं कि अपने माँ-बाप को भी वे अँग्रेजी में खत लिखा करते हैं। विलायत से लौटकर ´´तुम´´को ´´टुम´´कहना मामूली बात है।हम भारतीय भाषा के विचार में भी अंग्रेजों के इतने दास हो गए हैं कि अन्य अति धनी तथा सुन्दर भाषाओं का भी हमें कभी ध्यान नहीं आता।´

प्रेमचन्द ने ´´शान्ति तथा व्यवस्था´´की भाषा के प्रसंग में अंग्रेजी मीडिया के अखबारों पर जो बात कही है वह आज के बहुत सारे अंग्रेजी मीडिया पर शत-प्रतिशत लागू होती है।प्रेमचंद ने लिखा है ´विलायती समाचार-पत्र डेली टेलीग्राफ या डेली मि…

भारत को प्रेमचंद के नजरिए से देखो-

"हमारे नबी का हुक्म है कि शादी-ब्याह में अमीर-गरीब का विचार न होना चाहिए, पर उनके हुक्म को कौन मानता है नाम के मुसलमान, नाम के हिन्दू रह गए हैं। न कहीं सच्चा मुसलमान नजर आता है, न सच्चा हिन्दू।"

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"हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फीस का दाखिला होना अनिवार्य है। या तो फीस दीजिए, या नाम कटवाइए, या जब तक फीस न दाखिल हो, रोज कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं-कहीं ऐसा भी नियम है कि उसी दिन फीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख को दुगुनी फीस न दी तो नाम कट जाता है। काशी के क्वीन्स कॉलेज में यही नियम था। सातवीं तारीख को फीस न दो, तो इक्कीसवीं तारीख को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएं- वही हृदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रियायत नहीं करता। चाहे जहां से लाओ, कर्ज लो, गहने गिरवी रखो, लोटा-था…

प्रेमचंद महान क्यों हैं ॽ

कुछ लोग हैं जिनको प्रेमचंद की जन्मदिन पर याद आती है और फिर भूल जाते हैं,लेकिन इस तरह के लेखक-पाठक भी हैं जो हमेशा याद करते हैं। प्रेमचंद हिन्दी के सदाबहार लेखक हैं,उनको सारा देश ही नहीं सारी दुनिया जानती है,वे किसी सरकार के प्रमोशन के जरिए,विश्वविद्यालय में प्रोफेसरी के जरिए,चेलों की जमात के जरिए महान नहीं बने,बल्कि कलम के बलबूते पर जनप्रिय बने। सवाल यह प्रेमचंद को कौन सी चीज है जो महान बनाती है ॽ प्रेमचंद को महान बनाया उनकी भारतीय समाज की गहरी समझ और यथार्थ चित्रण के प्रति गहरी आस्था ने।

हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो चित्रण करना जानते हैं लेकिन समाज की गहरी समझ का अभाव है इसके कारण उनके चित्रण में वह गहराई नहीं दिखती जो प्रेमचंद के यहां दिखती है। प्रेमचंद की महानता का दूसरा बड़ा कारण है उनका गरीबों,किसानों और धर्मनिरपेक्ष समाज के प्रति गहरा लगाव।वे साहित्य के जरिए प्रचार करने से डरते नहीं थे। उन्होंने लिखा ´सभी लेखक कोई न कोई प्रोपेगेंडा करते हैं- सामाजिक, नैतिक या बौद्धिक।अगर प्रोपेगेंडा न हो तो संसार में साहित्य की जरूरत न रहे,जो प्रोपेगेंडा नहीं कर सकता वह विचारशून्य है और …

नामवरजी का संघियों से संवाद

नामवरजी दल बदलें,मंच बदलें,विचारधारा बदलें,हमें इससे कोई परेशानी नहीं है,उनको संवैधानिक हक है,लेकिन संविधान में प्रतिक्रियावाद की गोद में जाने का प्रावधान नहीं है।संविधान धर्मनिरपेक्षता की रक्षा का वायदा करता है,लेकिन नामवरजी आप यह सब भूल गए।इसे कहते हैं रामजी के चरणामृत का असर!

कल से फेसबुक पर मित्रलोग हल्ला कर रहे हैं नामवरजी ने 28जुलाई 2016 को राजनाथ सिंह की मौजूदगी में जो बोला वह कमाल का बोला!हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं,नामवरजी ने वहां जो कुछ सुना और उसकी अनसुनी की,मंत्रियों की संघी विचारधारात्मक धारणाओं के सामने जिस तरह समर्पण किया उसने प्रेमचंद को उलटा कर दिया,उनके आचरण ने गिरीश्वर मिश्र के बयान को उलटा कर दिया। कम से कम गिरीश्वर मिश्र ने तो संतुलित कहा,लेकिन नामवरजी आपने तो हद कर दी !

नामवरजी के भाषण की जो मुख्य बातें हैं उन पर थोड़ा गंभीरता से विचार करें,यह विचार करना इसलिए जरूरी है क्योंकि नामवरजी अपने भाषण से लेखकों के लिए फासिस्ट मोदीमार्ग का निर्माण करके गए हैं। मोदीमार्ग पर चलने का पहले कु-फल यह हुआ कि नामवरजी लिखकर लाए और विचारधाराहीन भाव से उन्हों…

"नामवरजी मार्क्सवादी थे"- राजनाथ सिंह

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के द्वारा "नामवर सिंह की दूसरी परम्परा " के नाम से आयोजित कार्यक्रम ( 28जुलाई 2016)में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संस्कृति को सीधे धर्म से जोड़ा. सवाल यह है क्या नामवरजी भी यही मानते हैं? नामवरजी ने धर्म को संस्कृति से जोड़ने वाले संघी नजरिए का प्रतिपाद न करके,मौन रहकर,उसे सम्मति प्रदान करके हजारी प्रसाद द्विवेदीजी की संस्कृति संबंधी दृष्टि पर अपनी आँखों के सामने राजनाथ सिंह के हमले को नतमस्तक होकर स्वीकार किया।यह है नामवरजी का कायान्तरण!

नामवरजी के सामने राजनाथ सिंह ने कहा धर्म वैज्ञानिक होने का प्रयास नहीं कर रहा,बल्कि धर्म तो वैज्ञानिक है ही।यानी इस तरह उन्होंने गिरीश्वर मिश्र की धारणा का विरोध किया। मजेदार बात यह थी दोनों मंत्री महेश शर्मा-राजनाथ सिंह ने अलिखित भाषण दिया,लेकिन नामवरजी ने लिखित भाषण पढ़ा।राजनाथ सिंह ने सीधे कहा "नामवरजी जब मार्क्सवादी थे।" सवाल यह है क्या नामवरजी अब मार्क्सवादी नहीं रहे ? क्या मोदी सरकार के वरिष्ठमंत्री की इस शानदार घोषणा के लिए इस कार्यक्रम को रखा गया था ?

संस्कृति मंत्री महेश शर्मा का बया…

नीत्शे के घर मार्क्स पधारे आनंद है ! आनंद है!

आज जब नामवरजी संघ आयोजित कार्यक्रम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र जाएंगे तो सचमें इतिहास रचेंगे !आज वे नीत्शे से मिलेंगे! यह उनके द्वारा स्थापित नीत्शे परंपरा का महान पर्व का दिन है ! इसके बाद वे हमेशा के लिए अशांति और उन्माद के हवाले हो जाएंगे।मार्क्स की कसम खाने वाले आज गोगुंडों के संरक्षकों के सामने गऊ दिखेंगे ! उनकी´नैतिकता´ एकदम मरियल आवारा गाय की तरह होगी।जो इधर-उधर मुँह मारकर अपना जीवन-यापन करती है और अंत में कसाई के हाथों मोक्ष प्राप्त करती है।

जिनके खिलाफ अनेक किस्म की हत्याओं,कलाओं,कलाकारों,सांस्कृतिक रूपों,संविधान के अपमान आदि के असंख्य ठोस पुख्ता सबूत हों,उस संगठन के लोगों के बीच जन्मदिन मनाते हुए बस एक ही नारा गूंजेगा ´तुम महान जयश्रीराम´! सब कुछ ´उल्लासमय´ होगा !एकदम नए किस्म की ऑडिएंस होगी ! यह दृश्य एकदम फिल्मी होगा ! वर्चुअल होगा!

वर्चुअल में नीत्शे के घर मार्क्स पकवान खाने आए हैं ! नीत्शे के पकवान मार्क्स खाएं,एंगेल्स, प्लेखानोव,ब्रेख्त,एडोर्नो सब तालियां बजाएं और कहें मार्क्स तुम एक और लो !श्रोता कहें अद्भुत क्षण है!नीत्शे के हलवाई पूछें …

नरेन्द्र मोदी जब नामवरजी से मिले !

यह सच है नरेन्द्र मोदी से नामवरजी मिल चुके हैं। एक-दूसरे को आंखों में तोल चुके हैं! इनकी ज्ञाननीठ पुरस्कार समारोह में मुलाकात हो चुकी है।यही वह मुलाकात थी जिसे नामवरजी को प्रगतिशील परंपरा से भिन्न आरएसएस की परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की! वे दोनों जब मिले तो विलक्षण दृश्य था एक तरफ जनप्रसिद्धि के नायक मोदी थे तो दूसरी ओर साहित्येच्छा के नायक नामवरजी थे।यह असल में ´जनप्रियता´ और ´इच्छा´का मिलन था।यह मिलन का सबसे निचला धरातल है। कलाहीन मोदी ,नामवरजी की प्रशंसा कर रहे थे !

कलाहीन नायक जब किसी लेखक की प्रशंसा करे तो कैसा लगेगा ॽ मोदीजी जब प्रशंसा कर रहे थे तो वे जानते थे कि नामवरजी भी साहित्य में वैसे ही ´जनप्रिय´हैं जैसे वे राजनीति में ´जनप्रिय´हैं,दोनों की ´जनप्रियता´की ऊँचाई बनाए रखने के लिए पेशेवर प्रचारक अहर्निश काम करते रहते हैं। इन दोनों का पेशेवर प्रचारकों के बिना कोई भविष्य नहीं है। दोनों को नियोजित और निर्मित प्रचार कला का हीरो माना जाता है। दोनों के पास अपने-अपने प्रशंसकों के समूह हैं।दोनों से लोग डरते हैं, महसूस करते हैं पता नहीं कब और कहां से पत्ता कटवा …

नामवरजी अब खेलो ´अंत´का साहित्यखेल!

नामवरजी के व्यक्तित्व के वैसे ही अनंत पहलू हैं जैसे किसी सामान्य व्यक्ति के होते हैं। अनंत पहलुओं में से व्यक्ति किसी भी दिशा में अपना विकास कर सकता है।नामवरजी का साहित्येतिहास और आलोचना में योगदान रहा है।वे कम से कम यह तो बता ही सकते हैं कि हिन्दी में आरएसएस और मोदीयुग का क्या योगदान है जिसके कारण उनके साथ जुड़ने की जरूरत आन पड़ी ॽ हम समझ सकते हैं हिन्दीसाहित्येतिहास में कांग्रेस,कम्युनिस्ट,समाजवादी,उदारतावाद,फोर्ड फाउंडेशन,नव्य़ आर्थिक उदारीकरण आदि विचारधाराओं का योगदान रहा है,इन विचारधाराओं ने किसी न किसी रूप में हिन्दी साहित्य और लेखकों को प्रभावित किया है, लेकिन आरएसएस का क्या योगदान है ॽ ऐसी कौनसी विपत्ति आन पड़ी कि दूसरी परंपरा को आरएसएस की मालाओं की जरूरत पड़ी! क्या दूसरी परंपरा का हिन्दुत्व से कोई संबंध बनता है ॽ यदि हां,तो कम से कम कुछ तो आपकी साहित्यिक टीम कल के आयोजन में रोशनी डालेगी !

नामवरजी आपको लेकर मुझे एक पुराना दार्शनिक रूपक याद आ रहा है।जंगल में जब पेड़ गिरता है तो वह शब्द जरूर करता है लेकिन उसके गिरने की ध्वनि को कोई नहीं सुनता।उसके गिरने की ध्वनि क…

नामवरजी की इतिहास से शत्रुता

आम्बेडकर की जयन्ती मोदी सरकार मना रही है, मोदी-मोहन भागवतजी आम्बेडकर पर सुंदर बातें कह रहे हैं।लेकिन आचरण एकदम दलितविरोधी कर रहे हैं।राजनीति में आचरण प्रमुख है, विचार गौण होते हैं। 90वें जन्मदिन के नाम पर 28जुलाई 2016 को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में नामवरजी क्या बोलते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है,महत्वपूर्ण है आरएसएस के लोगों का इस संग्रहालय की आड़ में जन्मदिन मनाना।उसमें नामवरजी का जाना महत्वपूर्ण है।इस आयोजन को नामवरजी द्वारा दी गयी स्वीकृति महत्वपूर्ण है।सवाल यह है आचरण की बातों पर नामवरजी के भक्तगण ध्यान क्यों नहीं दे रहे ? सवाल यह है नामवरजी के निर्माण में किनका खून-पसीना-विचारधारा और पैसा लगा है ?

नामवरजी सार्वजनिक बौद्धिक संपदा का अंग हैं ।वे पूजा की नहीं आलोचना की मूर्ति हैं ! जब उनकी आलोचना हो रही है तो भक्तों को परेशानी क्यों हो रही है ? हम इसलिए परेशान हैं क्योंकि नामवरजी सीधे आरएसएस के साथ गलबहियां देकर घूम रहे हैं।यह जनता और प्रगतिशील साहित्य के खिलाफ सबसे घिनौना कदम है।

यह कोई नामवर पुराण नहीं है।नामवरजी लेखक हैं,वे गल्पपुरूष नहीं हैं,उनके कर्म के मूल्यांकन…

लेखकों में पतित बनने की होड़

इस समय हिन्दी के सत्ताधारी प्रगतिशील-कलावादी लेखक बड़े कष्ट में हैं।इन लेखकों की मुश्किल यह है कि वे वगैर राजनेता के संरक्षण के साहित्य-सेवा नहीं कर सकते।नामवर सिंह अपनी साहित्य टीम लेकर मोदीजी के पाले में चले गए हैं ।जबकि प्रगतिशीलों की दूसरी टीम जिसके मुखिया अशोक बाजपेयी हुआ करते हैं, वे नीतीश कुमार से मिले हैं, उनके सान्निध्य में साहित्य-रक्षा की कसमें ली गयी हैं, उनके साथ मंगलेश डबराल,अपूर्वानंद,विष्णुनागर,सीमा मुस्तफा,प्रिय दर्शन आदि मिले हैं, ये लोग राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प सुझाएंगे।

कायदे से लेखकों को इस तरह के राजनीतिक संरक्षण से बचना चाहिए।हम जानना चाहते हैं कि क्या जर्मनी के किसी लेखक ने हिटलर से लड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण मांगा थाॽ यह कौन सी राजनीति हो रही है कि लेखक को समाज में काम करने के लिए राजनीतिक संरक्षण चाहिए ! राजनीतिक संरक्षण वस्तुतः लेखक की गुलामी है । कम से कम नीतीश कुमार के बारे में यह साफ रहना चाहिए कि उनका कला-साहित्य-संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है।यदि वे साहित्य-कलाओं के प्रति इतने ही गंभीर होते तो बिहार की दुर्दशाग्रस्त अवस्था न होती। लेख…

नामवरसिंह राजनाथ सिंह की जुगलबंदी और नामवरराग -

कल तक कुछ लोग कह रहे थे कि नामवरजी तो इंदिरा गांधी कला केन्द्र सिर्फ भाषण देने जा रहे हैं,हमने कहा था नहीं वे मोदी की गोदी में जा रहे हैं।नामवरजी अकेले ही मोदी की गोदी में नहीं गए अपनी पूरी साहित्य टीम को लेकर गए हैं।यह वही साहित्य टीम है जो कल तक आरएसएस को लेकर सवाल कर रही थी लेकिन अब सारे सवाल गंगा के हवाले कर दिए गए हैं,अब एक ही नारा है नामवरजी महान हैं ! इस एक नारे में समूचा देश सिमट गया है। यह प्रगतिशील साहित्य की उस परंपरा का पतन है जो कल तक साम्प्रदायिकता को गाली देते नहीं थकती थी।
नामवरसिंह और उनकी मंडली के लेखकों का साम्प्रदायिकता विरोध से कोई लेना-देना नहीं था,साम्प्रदायिकता विरोध छलावा मात्र था।मोदीजी को इसका श्रेय जाता है कि उन्होंने चंद लाख रूपये खर्च करके नामवरसिंह और उनकी साहित्य टीम के साम्प्रदायिकता विरोध के छद्म को नंगा कर दिया।
नामवरजी पर आरएसएसएस वाले जो कार्यक्रम करने जा रहे हैं,उसमें आरएसएस के दो बड़े नेता अतिथि हैं,केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह,मुख्य अतिथि होंगे, एक अन्य केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा विशिष्ट अतिथि होंगे। इस सत्र का विषय है –नामवर सिंह की …

नामवर का कुँआ

हम जानते हैं नामवरजी ने क्या लिखा है,हम यह भी जानते हैं उन्होंने जेएनयू में कितने ´महान´ कार्य किए थे। कोर्स बनाना ,पढ़ाना महान् कार्य नहीं है,यह रूटिन काम है, यह नौकरी के काम हैं। मौजूदा समय उनके अतीत को खंगालने का नहीं है।मेरी चिन्ता यह है कि नामवरजी के आरएसएस के साथ जाने को कैसे देखा जाय ॽउनके व्यक्तित्व को कैसे देखा जाय ॽ नामवरजी की खूबी है वे अपने को कभी आंतरिक गुणों की रोशनी में पेश नहीं करते।वे आंतरिक गुणों का प्रदर्शन नहीं करते।दिलचस्प बात यह भी यदि वे आंतरिक गुणों पर जोर देते तो उसकी पुष्टि करना असंभव है।

नामवरजी हमेशा ´लोकप्रियता के भावबोध´में रहते हैं।हर चीज ´लोकप्रियता´ को दिमाग में रखकर तय करते हैं।सरकारों के साथ जुड़े रहने का यही बड़ा कारण है,फलतः मीडिया से लेकर सरकारी संस्थानों तक उनके लिए सहज ही ´महान हो महान हो´की लोकप्रिय ध्वनियां गूंजने लगती हैं। इसका दूसरा आयाम यह है कि नामवरजी के कर्म पर कम उनकी लोकप्रियता पर ज्यादा बातें हैं।उनके कर्म में ´सारवान´तत्व नहीं होते,वे मात्र ´लोकप्रियता´ के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। उनके कर्म में सारवान तत्व …

नामवरजी ऐसा न करें-

नामवरजी ने इधर राजनीति बदली है,वे लेखक बिरादरी के साथ सबसे बड़ा धोखा करने जा रहे हैं।इंदिरा गांधी कला संग्रहालय द्वारा उनका जन्मदिन नहीं मनाया जा रहा,यह संग्रहालय तो पहले से है,कभी उनका जन्मदिन वहां नहीं मनायागया।रामबहादुर राय भी दिल्ली में पहले से हैं उनको कभी नामवरजी के जन्मदिन की याद नहीं आई,आरएसएस भी पहले से है लेकिन आरएसएस वालों ने कभी उनका जन्मदिन नहीं मनाया,लेकिन 90साल में पहलीबार नामवरजी का जन्मदिन आरएसएस मना रहा है , आड़ है इंदिरा गांधी कला संग्रहालय।यह सामान्य घटना नहीं है।

यहां से नामवर सिंह के साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन का अंत होता है।फासिस्ट विचारकों के द्वारा जब उनका जन्मदिन उनकी मौजूदगी में ,उनकी स्वीकृति के बाद मनाया जाएगा,तो नामवरजी के साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन की प्रासंगिकता खत्म हो जाती है।कोई यदि यह सोचता है कि लेखक आचरण कुछ भी करे लेकिन उसके लिखे शब्दों में शक्ति रहती है तो गलतफहमी है,लेखक के शब्दों में तब तक जान रहती है जब तक लेखक अपने शब्दों के प्रति वफादार रहता है,नामवरजी ने अपने साम्प्रदायिकता विरोधी लेखन को अपने ही हाथों ध्वस्त करके अपने ही हाथों अ…

नामवरजी का नायकीय व्यक्तिवाद

नामवरजी के पढ़ाए और सताए सैंकड़ों छात्र हैं,इससे ज्यादा उनके प्रशंसक और भक्त छात्र हैं।वे जब तक भारतीय भाषा केन्द्र ,भाषा संस्थान,जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते रहे उनके व्यक्तित्व के सामने विभाग के अन्य किसी शिक्षक का व्यक्तित्व निखरकर सामने नहीं आ पाया,वे सभी के व्यक्तित्व पर छाए रहे।वे 90साल के हो गए हैं।स्वस्थ हैं और सक्रिय हैं,हम सबके लिए यह सुखद बात है।हम सब यही चाहेंगे कि और भी अधिक लंबी उम्र तक जिंदा रहें।

नामवरजी के अंदर एक चीज है जिसे ´नायकीय व्यक्तिवाद´ कहते हैं। वे जहां रहे,नायक की तरह रहे,नायक की तरह काम किया,अच्छा या बुरा जो भी काम किया नायक की तरह काम किया।उनके संदर्भ में ´नायकीय व्यक्तिवाद´ का अर्थ क्या है ॽ यदि वे साहित्य पर बोल रहे हैं तो उनके शब्द साहित्य की पहचान और व्याख्या को प्रभावित करते हैं।वे जब बोलते हैं तो लगता है नामवर प्रमुख हैं साहित्य गौण है।श्रोतागण धार्मिक कर्मकांड की तरह उनको सुनते हैं। धार्मिक आस्था के साथ बैठे रहते हैं। वे जब किसी कार्यक्रम में रहते हैं तो अपनी मौजूदगी को वैध ठहराते हैं।लगता है नामवरजी को बुला लिया,कार्यक्रम सफल…

आरएसएस वाले नामवरजी का जन्मदिन क्यों मना रहे हैं ॽ

आप जब नामवरजी से बातें करेंगे,मिलेंगे,तो मन होगा,इस आदमी से बार-बार मिलना चाहिए।बहुत ही सुंदर भाषा,उदात्त भाव और उदात्त जीवन तरंगों के कारण नामवरजी सहज ही आकर्षित करने लगते हैं। यही उदात्तता उनकी जनप्रियता का मूलाधार है।इसके कारम ही वे सबको अच्छे लगते हैं।

सवाल यह है जनप्रिय न होते तो क्या आरएसएस के लोग उनको बुलाते ॽ क्या कोई सत्ताधारी उनको बुलाता ॽ

किसी भी लेखक के अंदर एक आंतरिक मन होता है और दूसरा उसका बाह्य मुखमंडल होता है। इनमें साम्य हो सकता है, वैषम्य भी हो सकता है।यह भी कह सकते हैं लेखक की एक होती है आत्मा और दूसरा होता है मन।सवाल यह है लेखक को कहां खोजें ॽ मन में खोजें या आत्मा में ॽ

प्लेटो ने मन और आत्मा की एकता पर जोर दिया,लेकिन नामवरजी के मन और आत्मा में गहरा द्वंद्व है,अन्तर्विरोध है।जिस तरह हम प्लेटो के किसी मूल्यविशेष को खारिज कर सकते हैं,लेकिन प्लेटो के योगदान को खारिज नहीं कर सकते।यही दशा नामवरजी की है उनके किसी मसले पर नजरिए को खारिज कर सकते हैं,लेकिन उनके हिन्दी साहित्य में योगदान को खारिज नहीं कर सकते।उनकी बेहतरीन मेधा को अस्वीकार नहीं कर सकते…

आदिविद्रोही ,लाशें और विकास

´आदिविद्रोही’ उपन्यास पढ़ते हुए आप एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं जो देखने में प्राचीन है लेकिन सचमुच में एकदम सामयिक है।आज हम जिन सुंदर और भव्य राजमार्गों से गुजरते हैं उनके पीछे लटके मुर्दों को नहीं देखते।हमें राजमार्ग आकर्षित करते हैं,लेकिन उनके पीछे लटके मुर्दे नजर नहीं आते। राजमार्ग बनने का अर्थ है समृद्धि का आना ! यही बात पिछली सरकार समझा रही थी और यही बात मोदी सरकार समझा रही है ! लेकिन समृद्धि आकर नहीं दी !!

आम लोगों की जिन्दगी में पामाली बढ़ी है। आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं,अपराध बढ़े हैं।विकास कहीं पर भी नजर नहीं आ रहा। ´आदिविद्रोही´ उपन्यास का रोम से कापुआ जाने वाला राजमार्ग और जगह-जगह सलीब पर लटकी गुलामों की लाशें याद करें।उनमें से ही एक लाश स्पार्टकस की भी थी।वह गुलामों का नायक था।ये गुलाम रोम की समृद्धि के सर्जक थे,लेकिन वंचित,पीड़ित और गुलाम थे।

रूपक के रूप में यह कापुआ जैसे शहर और राजमार्ग आज भी हमारे बीच में मौजूद हैं। रोम से कापुआ जाने वाले मार्ग को ऐपियन मार्ग कहते थे,इस पर छःहजार चार सौ बहत्तर लाशें टिकटियों पर झूल रही थीं। इन लाशों का जिक्र करने…

नामवरजी का शैताननायक प्रेम

नामवरजी का शैताननायक प्रेम नई बात नहीं है।राजनीति में वे आपातकाल के दौरान आपातकाल का समर्थन करके इस प्रेम का प्रदर्शन कर चुके हैं,इसबार वे नरेन्द्र मोदी के साथ हैं। सवाल यह है लेखक के नाते आपातकाल का समर्थन करना और लेखक के ही नाते नरेन्द्र मोदी का समर्थन करना आखिर किस तरह की राजनीतिक नैतिकता की अभिव्यक्ति है ॽ क्या इस राजनीतिक नैतिकता को लोकतांत्रिक कहेंगे ॽ

हिन्दी में शैतान नायक के प्रति प्रेम की परंपरा को बनाए रखना बड़ा दुर्लभ काम है। लेकिन वे यह काम कर रहे हैं। इस समय देश में लेखकों की अभिव्यक्ति के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं,तीन लेखकों को हिन्दुत्ववादी हत्यारों ने मौत के घाट उतार दिया ,लेकिन नामवरजी ने उस पर कोई गंभीर प्रतिवाद नहीं किया, न तो कोई लेख लिखा और न ´आलोचना´पत्रिका में कोई संपादकीय लिखा।ठीक यही स्थिति आपातकाल के समय भी थी,अभी वे बूढ़े हैं ,उस समय वे यौवन से भरे थे,लेकिन आपातकाल के खिलाफ ´आलोचना´ पत्रिका में उन्होंने एक वाक्य नहीं लिखा।वे प्रतिवाद में संपादकीय पन्ना खाली छोड़ सकते थे ,वह भी नहीं किया,उलटे आपातकाल का समर्थन किया।आजकल वे कहते हैं उन्होंने आपा…

नामवरजी के आने-जाने की विचारधारा और भोले भक्त

नामवरजी का आना-जाना कोई सीधा -सरल मामला नहीं है।वह कोई विचारधाराहीन काम नहीं है।वे असाधारण लेखक हैं।वे कहीं जब बुलाए जाते हैं तो इसलिए नहीं बुलाए जाते कि बहुत सरल सीधे, विचारधाराहीन इंसान हैं ! भक्तों का तर्क है वे सबके हैं और सब उनके हैं ! यदि मामला इतना सा ही होता तो नामवरजी को न तो कोई बुलाता और न कोई उनका 90वां जन्मदिन ही मनाता।वे बड़े कद के लेखक-शिक्षक-बुद्धिजीवी हैं। उनकी समाज में व्यापक भूमिका है। वे साधारण लेखक रहे होते तब भी संभवतः हमें कोई आपत्ति न होती। जाने-अनजाने नामवरजी के बारे में जितने तर्क उनकी हिमायत में दिए जा रहे हैं वे अंततःनामवरजी को विचारधाराहीन,दृष्टिहीन मनुष्य के रूप में पेश कर रहे हैं।लेकिन नामवरजी विचारधाराहीन मनुष्य नहीं हैं।वे बेहतरीन इंसान हैं।मैं निजी तौर पर उनका प्रशंसक -आलोचक हूँ,उनके गलती करने पर हर समय टोका है,लेकिन संवाद नहीं छोड़ा।बहिष्कार नहीं किया।

नामवरजी का मोदीप्रेम हाल की घटना नहीं है यह मोदीजी के लोकसभा चुनाव के समय ही सामने आ गया था,उस समय भी हमने फेसबुक पर उनके टीवी पर दिए गए बयान की आलोचना की थी। सवाल यह है क्या मौजूदा मोदी…

मोदी की गोदी में नामवर !

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नामवरजी के व्यक्तित्व से प्रभावित छात्र,शिक्षक और लेखकों का बड़ा समूह है। दिलचस्प बात है कि नामवरजी के गैर-साहित्यिक व्यक्तित्व और कारनामों को लेकर बहुत कम लोग जानते हैं।खासकर उनके जेएनयू में काम करने के दौरान किए गए अकादमिक फैसलों की जिनको पहचान है वे बेहतर ढ़ंग से जानते हैं कि जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में काम करते हुए नामवरजी ने कभी भी छात्रों के हितों से जुड़े सवालों पर (मेरे सात साल के जेएनयू छात्रजीवन के दौरान) कभी कोई स्टैंड नहीं लिया, उलटे वे हमेशा जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के खिलाफ खड़े नजर आए।        नामवरजी की रीतिकालीन मनोदशा का आदर्श नमूना है जेएनयू ।मैं उन दिनों छात्र राजनीति में सक्रिय था।मैं वहां पढ़ता था। नामवरजी खुलकर कभी छात्रों के पक्ष में न तो एकेडमिक कौंसिल में बोले और न बोर्ड़ ऑफ स्टैडीज में बोले, उलटे छात्रों को विक्टिमाइज करने में अपने विभाग में अग्रणी भूमिका निभाते रहे ।ये बातें इसलिए जानना जरूरी है क्योंकि नए सिरे से नामवरजी पर रीतिकाव्य लिखा जा रहा है।मुश्किल यह है कि जो लोग देश में खुलकर वाम के नाम से जाने जाते हैं और जेएनयू में प्रोफेसर हु…

´तन्मयता´में मथुरा मिलेगा

लोग पूछते हैं आपने क्या सीखा ,किससे सीखा,कैसे सीखा ॽ उनके लिए मेरे पास कोई जबाव नहीं होता।क्योंकि मैं बड़ा हुआ सामान्य किस्म के लोगों के बीच में।सारी जिन्दगी सामान्य़ किस्म के लोगों में गुजारी,जो कुछ भी सीखा उनसे ही सीखा या फिर लेखकों की किताबों से सीखा।

मैं बहुत कम साहित्यकारों और प्रोफेसरों को जानता हूँ,उससे भी कम संख्या में लेखकों-प्रोफेसरों से निजी परिचय है।आमतौर पर लेखकों –प्रोफेसरों से दूर ही रहा हूँ। यह मेरी सबसे बड़ी कमी कह सकते हैं। हमारे अनेक मित्र साहित्यकार हैं और साहित्यकारों में उनका सम्मानजनक स्थान है।मैंने कभी अपने को न तो साहित्यकार के रूप में महसूस किया और न साहित्यकारों की तरह लिखा,जितनी किताबें लिखीं वे सब पाठक के नाते लिखीं।मैं कईबार इस बात को व्यक्त कर चुका हूँ मुझे नागरिकबोध में जीने में मजा आता है।साहित्यकार,आलोचक,प्रोफेसर या किसी विषय के विशेषज्ञ के रूप में मेरी कभी कोई तैयारी नहीं रही।

मथुरा की निजी चेतना का मूलाधार है ´तन्मयता´,यह मैंने मथुरा से सीखा। मैं जो भी काम करता हूँ,´तन्मयता´और ´एकाग्रता´ के भाव से करता हूँ।यह मथुरा की संस्कृति का सबस…

आदिविद्रोही से क्या सीखा-

सवाल यह है  ´आदिविद्रोही´ से मैंने क्या सीखा ॽ ´आदिविद्रोही´तो गुलाम स्पार्टकस की जीवनकथा है। हावर्ड फ़ास्ट ने लिखा  ´मैंने यह कहानी इसलिए लिखी कि मेरे बच्चे और दूसरों के,जो भी इसे पढ़ें,हमारे अपने उद्विग्न भविष्य के लिए इससे ताकत पायें और अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ें,ताकि स्पार्टकस का सपना हमारे समय में साकार हो सके।´इस किताब का हिन्दी अमृतराय ने किया है।
     फ़ास्ट के लेखन की विशेषता है उत्पीड़ितों के साथ सक्रिय संवेदनात्मक लगाव।अमृत राय ने लिखा हावर्ड फ़ास्ट के पास तीक्ष्ण ऐतिहासिक दृष्टि है । उसके लिए ´इतिहास वह जो अपना स्रोत कोटि-कोटि साधारण –जनों की क्रिया-शक्ति में पाता है,जिसकी दृष्टि राजा से अधिक प्रजा पर होती है और जो उन सामाजिक शक्तियों को समझने का प्रयत्न करता है ,जिनके अन्तस्संघर्ष से जीवन में प्रगति होती है। ´

मथुरा का आदिविद्रोही मार्ग

अजीब बात है मथुरा जैसे धार्मिक शहर में हम मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग से आने वाले युवाओं के पास उस समय मंदिर,पंडे,पुजारी,जनसंघ,कांग्रेस,बगीची,अखाड़े,यमुना नदी का किनारा और घाट के किस्से हुआ करते थे। अचानक 1974 का बिहार आंदोलन शुरू हुआ,मैं निजी तौर पर राजनीति नहीं जानता था लेकिन बाबू जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित था, समाजवाद के विचार से उस समय तक मेरा कोई परिचय नहीं था।

मुझे सबसे पहले समाजवादी सोवियत संघ का साहित्य पढ़ने को अपने संस्कृत कॉलेज माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ने को मिला और यह साहित्य पढ़ने को दिया मथुरानाथ चतुर्वेदी ने,जो उस समय मथुरा जनसंघ के अध्यक्ष थे, बाद में नगरपालिका अध्यक्ष भी रहे,आरएसएस के मथुरा में सबसे बड़े समय नेता हुआ करते थे।मेरे कॉलेज में सोवियत साहित्य और पत्रिकाएं मुफ्त में आती थीं,वे ही उनको संभालकर रखते थे,उनसे ही 1972-73 में सोवियत साहित्य पहलीबार पढ़ने को मिला,वे हमारे कॉलेज की लाइब्रेरी के भी इंचार्ज थे,अतः पुस्तकालय से आसानी से किताबें भी मिल जाया करती थी।वहीं से पहलीबार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का लिखा महाभार…

ग्राम्य -बर्बरता और गाली

फेसबुक पर कुछ लोग गजब तर्क दे रहे हैं,कह रहे हैं गालियों को धर्म के साथ न जोड़ें,हम यही कहेंगे धर्म के साथ जाति,रोटी,बेटी,नौकरी,हैसियत सब जुडी है फिर गाली ने ऐसा खास क्या किया है कि धर्म से काटकर गालियों को देखा जाए ! गाली देने वाले किस धर्म को मानते और जानते हैं,इससे स्वभावतःधर्म के साथ गालियां भी जुड़ेंगी।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब राजनीति में गालियों के बिना संप्रेषण संभव है तो गालियां क्यों दी गयीं ? फेसबुक पर बिना गालियों के बातें कह सकते हैं तो मोदीभक्त गंदी-गंदी गालियां क्यों लिखते हैं ?निश्चित तौर पर उनके संघ प्रतिपादित हिन्दू धर्म में गालियां परिशिष्ट के रूप में सिखाई जाती हों ! इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में सबसे पिछड़े इलाके में भी आम लोग अशिक्षित लोग गालियां देकर बातें नहीं करते।गालियां समाज में से कैसे जाएं इस पर हमने सोचा ही नहीं। हिन्दी के पब्लिक कम्युनिकेशन में गालियां जिस पर तरह प्रचलन में हैं कम से कम बंगला में यह सब नहीं है।बंगाली कभी आपस में बातें करते हुए गालियां नहीं देते,कलकत्ते में बात करते लोग देखें वे आमतौर पर गालियां नहीं बोलते,फिर हिन्दी में ही गालियां क्यों …

हिन्दू समाज शर्मनाक समाज

हमारा हिन्दू समाज शर्मनाक समाज है जिसमें औरतों , दलितों और मुसलमानों को सरेआम शिक्षित लोग मीडिया से लेकर फेसबुक तक अपमानित करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं।इससे पता चलता है कि शिक्षितों के अंदर हमने किस तरह के असभ्य मनुष्य का निर्माण किया है।

हम कितने संस्कृतिहीन "हिन्दू "हैं कि जिन हाथों से दुर्गापूजा करते हैं उन्हीं हाथों से स्त्री को घर में आकर मारते हैं।जिस मुख से दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं उसी मुख से मादर ...बहिन ...बोलने में एक क्षण का विलम्ब नहीं करते। यहाँ तक कि औरतों को भी गालियों से अपमानित करते रहते हैं। औरतों को दी जाने वाली सबसे बर्बर गाली रंडी है जिसे विभिन्न भाषायी पदबंधों में सजाकर देते हैं। स्त्री के विभिन्न अंग -प्रत्यंगों को लेकर गालियाँ हिन्दुओं की संस्कृति और जनप्रिय भाषा का अभिन्न हिस्सा रही हैं,और आज भी हैं! इन सब पर संसद से लेकर सड़क तक कभी हल्ला नहीं सुना गया लेकिन आज मायावती ने संसद में दयाशंकर का मामला उठाकर शानदार काम किया है।उन्होंने कम से कम औरत के मान -सम्मान की रक्षा की है।ये वे हिन्दू हैं जो औरत को नागिन कहते हैं! ड…

राजनाथ सिंह की वाचिक हिंसा

कल संसद में गुजरात में दलितों के प्रतिवाद के विरोध में गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भाषण सुनकर लगा कि हमारे देश में इस तरह का संवेदनहीन गृहमंत्री होगा यह तो कभी सोचा ही नहीं था,सत्ता में रहने का तकाजा है कि मोदी एंड कंपनी के लोग विनम्रता से सामाजिक जीवन में घट रही गलतियों को बिना हील-हुज्जत के मानें और विनम्रता के साथ कार्रवाई का आश्वासन दें ,लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे ,उलटे दलितों पर हो रहे हमलों की प्रच्छन्नतः हिमायत कर रहे हैं, राजनाथ कह रहे थे कि पहले भी अत्याचार हुए हैं आंकड़े देखो,गुजरात में कम हो रहे हैं।शर्म आनी चाहिए इस तरह के वाक्य मुंह से कैसे निकलते हैं !

वर्तमान के अपराधों को वैध ठहराने के लिए हर शैतान अतीत का सहारा लेता है,आरएसएस का यही पैंतरा है।चूँकि पहले यह हुआ था इसलिए आज यह हो रहा है।यह आपराधिक भाषा है राजनाथ सिंह ! दूसरी बात यह आँकड़े बिकिनी की तरह होते हैं,वे अपने आप नहीं बोलते,उनको जैसे बोलने को कहोगे वे वैसा ही बोलेंगे।

राजनाथ सिंह जी! यथार्थ देखो खुलेआम आरएसएस के लोग विभिन्न क्षेत्रों में दलितों और औरतों को निशाना बनाते रहे हैं।

राजनाथजी! सच ताक़तवर होता ह…

फेसबुक सूक्तियाँ

नियमित अच्छी चीजों को पढ़ने की आदत होनी चाहिए।नियमित रीडिंग बेहतर इंसान बनाती है।

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मनुष्य के अंदर का खालीपन सिर्फ दो चीजों से भरा जा सकता है ,वह है प्रेम और त्याग ।

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जो धर्म भय पैदा करे वह धर्म नहीं है,धर्म वह है जो अभय दे।

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रामचरित मानस में रचित राम को एक ही चीज पसंद है प्रेम।प्रामाणिक प्रेम प्रसन्नता का जनक है।

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सत्य के लिए आक्रामकता नहीं त्याग और विनम्रता चाहिए।

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सत्य को धैर्य के बिना नहीं पा सकते।वह स्वाभाविक चीज है।

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सद्गुरू सबसे समर्थ वैद्य है।

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श्रद्धा का स्थान फेसबुक नहीं मनुष्य का हृदय है।

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मानव समाज में विचारों का दान श्रेष्ठ दान है।

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अभिभावक के बिना लड़का-लड़की की पहचान होती है,जब पहचान होती है तो फिर हर जगह अभिभावक का नाम क्यों लिखते हो,सीधे नाम लिखो पता लिखो,बंदे के बारे में विवरण लिखो,अभिभावक पिता होगा या माँ,इन दोनों के दबाव से व्यक्ति की पहचान को निकालना चाहिए।व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखो,वंशधर की तरह नहीं।

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ग़ज़ब का फिल्मीगेम है ये फ़िल्म में हीरो -हीरोइन दोनों होते हैं लेकिन खबर बनती है सलमान की फ़िल्म हिट! अमीर की फ़िल्म हिट! कभी अनुष्का का भी नाम ले लिया करो मीडि…

सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति

भारत सरकार सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति लेकर आई है।यह नीति 2015 की नीति की तुलना में काफी उदार है।अब सेना के लोग खुलकर सोशलमीडिया का इस्तेमाल कर पाएंगे।उनको अपने पद,मूवमेंट,सेना के ऑपरेशन आदि की सोसलमीडिया में जानकारी शेयर न करने को कहा गया है। ‘Policy on Usage of Social Media’ नामक नीति में कहा है- “The Rules suggested that serving officers and jawans of the Army can have media account on their name provided that the account holder doesn’t mention anything about his services including rank, place of posting, Unit and Corps etc. They will not upload photographs or videos or make comments while inter-acting on social media, which mentions specific information, unit or establishment,” “As a general parameter, conduct which will be unacceptable in physical domain in the Army will also be unacceptable in the Cyber/ Social Media domain,” “Indian Army recognizes the positive potential of social media platforms as exponentially faster means of conveying messages, information and opinions, …