सोमवार, 25 जुलाई 2016

नामवरजी का शैताननायक प्रेम

   नामवरजी का शैताननायक प्रेम नई बात नहीं है।राजनीति में वे आपातकाल के दौरान आपातकाल का समर्थन करके इस प्रेम का प्रदर्शन कर चुके हैं,इसबार वे नरेन्द्र मोदी के साथ हैं। सवाल यह है लेखक के नाते आपातकाल का समर्थन करना और लेखक के ही नाते नरेन्द्र मोदी का समर्थन करना आखिर किस तरह की राजनीतिक नैतिकता की अभिव्यक्ति है ॽ क्या इस राजनीतिक नैतिकता को लोकतांत्रिक कहेंगे ॽ

हिन्दी में शैतान नायक के प्रति प्रेम की परंपरा को बनाए रखना बड़ा दुर्लभ काम है। लेकिन वे यह काम कर रहे हैं। इस समय देश में लेखकों की अभिव्यक्ति के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं,तीन लेखकों को हिन्दुत्ववादी हत्यारों ने मौत के घाट उतार दिया ,लेकिन नामवरजी ने उस पर कोई गंभीर प्रतिवाद नहीं किया, न तो कोई लेख लिखा और न ´आलोचना´पत्रिका में कोई संपादकीय लिखा।ठीक यही स्थिति आपातकाल के समय भी थी,अभी वे बूढ़े हैं ,उस समय वे यौवन से भरे थे,लेकिन आपातकाल के खिलाफ ´आलोचना´ पत्रिका में उन्होंने एक वाक्य नहीं लिखा।वे प्रतिवाद में संपादकीय पन्ना खाली छोड़ सकते थे ,वह भी नहीं किया,उलटे आपातकाल का समर्थन किया।आजकल वे कहते हैं उन्होंने आपातकाल का विरोध किया था।

हाल के वर्षों में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के जिस तरह के हमले किए हैं उन पर नामवरजी चुप हैं ! यह चुप्पी बेहद खतरनाक है ! उलटे उन्होंने पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों पर ही आलोचना के बाण चलाए हैं।दिलचस्प बात यह है इंदिरा गांधी ने भी संविधान की धज्जियां उडायीं,नामवरजी चुप रहे !मोदीजी भी धज्जियां उडा रहे हैं वे चुप हैं ! सवाल यह है नामवरजी की एक लेखक के नाते राजनीतिक नैतिकता क्या है ॽ मुक्तिबोध की भाषा में पूछें ´पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ॽ ´

नामवरजी के लिखे को खोजने जाएंगे तो उनका आरएसएस के पक्ष में लिखा कहीं नहीं मिलेगा,बल्कि उनका साम्प्रदायिकता के खिलाफ लिखा मिलेगा। ऐसी अवस्था में आप उनको पकड़ेंगे कैसे ॽ राजनीति का नियम है कि आदमी के विचार ही नहीं व्यवहार भी देखना चाहिए।

नामवरजी का आरएसएस और मोदी के प्रति व्यवहार क्या है ॽ नामवरजी की मोदीभक्ति उनके आचरण में है,लेखन में नहीं है।लिखित रूप में तो उन्होंने आपातकाल के पक्ष में भी कुछ नहीं लिखा लेकिन आपातकाल का समर्थन किया था। उनके लेखन को देखकर नहीं लगेगा कि वे कभी फासिस्ट इंदिरा के साथ थे।नामवरजी लिखकर कभी किसी दल के साथ नहीं रहे,वे हमेशा केन्द्र में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल और पीएम के साथ रहे हैं।इसलिए नामवरजी को खोजना है तो उनके आचरण में खोजो।किसी भी लेखक को खोजना है तो उसके लेखन और आचरण दोनों को मिलाकर देखें।

नामवरजी के राजनीतिक मूल्य वे नहीं है जो आरएसएस के हैं,नामवरजी अपने मूल्य स्वयं सृजित करते रहे हैं।सतह पर लगेगा कि उनके और मोदी के मूल्य भिन्न हैं,आरएसएस और उनके मूल्य भिन्न हैं !यह भिन्नता का दर्शन उन्होंने नीत्शे से सीखा है। लिखने की बजाय बोलने और राजनीतिक आचरण की कला उन्होंने नीत्शे से सीखी है। नीत्शे में यही गुण था ।नीत्शे के गुण हिटलर से नहीं मिलते थे,लेकिन वह हिटलर के साथ था।

दिलचस्प बात यह है आरएसएस में इतना स्पेस है कि आप वामपंथी रहकर भी उनके साथ रह सकते हैं,गांधीवादी होकर भी उनके साथ रहकर सकते हैं,आरएसएस के साथ रहने के लिए उसकी विचारधारा को मानना जरूरी नहीं है,आरएसएस का मुख्य जोर साथ रहने पर है,आप निजी तौर पर अपने विचार कुछ रखें लेकिन आएसएस के साथ रहें ।जो लोग कह रहे हैं यह देखना चाहिए कि नामवरजी उनके यहां जाते हैं तो बोलते क्या हैं ॽ हमारा कहना यही है कि वे जो बोलते हैं उसे कृपा करके लिख दें,कहीं छपवा दें,वे बोलने के बहाने वैचारिक घल्लूघारा किए हुए हैं। नामवरजी वैचारिक तौर पर सबसे अविश्वसनीय वक्ता हैं,वे मौसम और माहौल देखकर बोलने में सिद्धहस्त हैं।जबकि उनके भक्तों को लगता है उनका बोलना ही महान है!



2 टिप्‍पणियां:

  1. हुए नामवर बेनिशाँ कैसे कैसे
    ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे।

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  2. हुए नामवर बेनिशाँ कैसे कैसे
    ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे।

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