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शनिवार, 19 जून 2010

साइबर सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी खेल

      सामान्य तौर पर मिथ है कि इंटरनेट पर हम जो कर रहे हैं उसे कोई नहीं जानता। लेकिन यह बात सच नहीं है। अमेरिका में साइबर निगरानी करने का प्रयास सरकारी स्तर पर सन् 2003 से चल रहा है। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने जनवरी 2008 के इंटरनेट निगरानी का आदेश जारी किया और अमेरिकी गुप्तचर विभाग को यह कहा कि वह इंटरनेट निगरानी करे। क्योंकि हैकरों के द्वारा फेडरल एजेंसियों के कम्प्यूटर सिस्टमों पर हमले की घटनाएं बढ़ गयी हैं। यह गुप्त आदेश था ।   
        इस आदेश के अनुसार नेशनल सुरक्षा एजेंसी को खास तौर पर यह दायित्व सौंपा गया है। कि वे सभी फेडरल एजेंसियों के कम्प्यूटर नेटवर्क पर निगरानी रखने का काम करेंगी। इसमें वे कम्प्यूटर नेटवर्क भी शामिल हैं जिनकी वे पहले निगरानी नहीं करती थीं। इस पूरे काम को ऑफिस ऑफ दि डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलीजेंस के द्वारा संयोजित किया जा रहा है।
        अमेरिकी गृह मंत्रालय का काम है सिस्टम की रक्षा करना और पेंटागन का काम होगा जबाबी हमले की रणनीति तैयार करना। जिससे नेट घुसपैठियों को तबाह किया जा सके।
      सन् 2005 से लेकर अब अमेरिका के कई मंत्रालयों के कम्प्यूटर नेटवर्क पर चीनी हैकरों के निरंतर हमले होते रहे हैं। खासकर रक्षा,कॉमर्स,गृह मंत्रालयों को हैकरों ने निशाना बनाया है। यहां तक कि परमाणु ऊर्जा विभाग के कम्प्यूटरों को भी चीनी हैकरों ने नहीं बख्शा है। अमेरिका के ये नेट सुरक्षा उपाय सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि अमेरिका की सीमा के परे भी इनका दायरा है।
     सबसे पहले यहखबर ‘बाटलीमूर सन ’नामक अखबार ने सितम्बर 2007 में छापी थी उस समय इस खबर की ओर ज्यादा लोगों का ध्यान ही नहीं गया। इसे ‘साइबर पहल’ नाम दिया गया है।   इस काम में NSA, CIA  और FBI के साइबर विभाग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
      इस कार्य के लिए मोटी रकम भी बजट मे आवंटित की गयी है और इसके दायरे में सरकारी और निजी क्षेत्र के सभी संस्थान ले लिए गए हैं। मूल बात यह है कि अब अमेरिका के प्रत्येक नागरिक और संस्थान की साइबर पहरेदारी की जा रही है। अब अमेरिका में सरकारी गुप्तचर संस्थाएं क्लासीफाइड और अन-क्लासीफाइड सभी किस्म की नेट निगरानी कर रही हैं इससे प्राइवेसी खतरे में पड़ गयी है।  
      बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद इस योजना में और भी तेजी आयी है और ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ( 3जुलाई 2009) के अनुसार साइबर सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता का क्षेत्र है। इसे ‘आइंस्टाइन 3’ नाम दिया गया है। इसके लिए 17 बिलियन डॉलर धन आवंटित किया गया है। इस प्रकल्प के पायलट सर्वे के लिए एटी एण्ड टी नामक विश्व विख्यात दूरसंचार कंपनी की मदद ली गयी है । इसके जरिए गैर सरकारी क्षेत्र की निगरानी का पायलट सर्वे किया जाएगा। इस समूची प्रक्रिया में मूल खतरा यह है कि निजी क्षेत्र की दूरसंचार कंपनी के हाथों सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख क्षेत्रों के कम्प्यूटर कोड और सिगनेचर चले जाएंगे। सेना के तमाम कोड जो अभी तक सरकार के ही कब्जे में थे  वे अब निजी कंपनी के पास चले जाएंगे।
     उल्लेखनीय है अमेरिका मे बगैर वारंट के अमेरिकी नागरिकों के फोनकॉल और ईमेल की जासूसी संस्थाओं के द्वारा निगरानी का आदेश बुश प्रशासन के समय से चला आ रहा है। एटी एण्ड टी के पायलट सर्वे से इसे अलग रखा गया है।
     ‘आइंस्टाइन 3’ कार्यक्रम के साइबर राडार के जरिए नागरिकों की निगरानी हो रही है। इसके तहत गृह विभाग किसी नसेड़ी ड्राइवर को नशे में गाड़ी चलाते पकड़ सकता है। अथवा तेज गति से गाड़ी चलाने वालों को सीधा पकड़ सकता है।
    दूसरी ओर नागरिक अधिकार संगठनों की मांग है कि नागरिकों के निजी ईमेल ,निजी संदेश  और प्रेम संदेश न पढ़े जाएं। वे चाहते हैं नागरिकों की प्राइवेसी और नागरिक अधिकारों की हर हालत में रक्षा की जाए। उनके निजी डाटा जैसे इंटरनेट प्रोटोकॉल एड्रेस की हिफाजत की जाए। मुश्किल यह है कि सुरक्षा एजेंसियां किसी भी व्यक्ति को महज संदेह के आधार पर अपनी जांच के दायरे में ला सकती हैं।
          
          

सोमवार, 10 मई 2010

याहू ने ईमेल के प्रसंग में नेट यूजर की प्राईवेसी का मुकदमा जीता

           याहू कंपनी ने एक महत्वपूर्ण मुकदमे  में कोलोराडो फेडरल सरकार को एक कानूनी जंग में हरा दिया है। यह मुकदमा यूजरों खासकर ईमेल करने वालों की प्राइवेसी की रक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था। भारत के ईमेल यूजरों के लिए भी इसकी महत्ता है। 
      कोलोराडो का सरकारी वकील तर्क दे रहा था कि छह महिने से ज्यादा पुराने ईमेल ,ई सामग्री के दायरे में नहीं आते। अतः संबंधित व्यक्ति के छह महिने पुराने ईमेल दे देने चाहिए। सरकार को एक केस के सिलसिले में किसी व्यक्ति के छह महिने पुराने ईमेल की जरुरत थी और वह यह ईमेल बगैर किसी ई कानून और प्राईवेसी कानून का पालन किए बगैर हासिल करना चाहती थी।   
       अमेरिका में किसी के ईमेल हासिल करने के लिए संवैधानिक वारंट की जरुरत होती है। याहू का तर्क था कि सरकारी वकील बगैर संवैधानिक वारंट के ईमेल हासिल करना चाहता है जो कानूनन गलत है।
      सरकारी वकील का कहना था कि 1986 का कानून अमेरिका की सरकार को यह अधिकार देता है कि सरकार को अगर जरुरत है तो किसी व्यक्ति के ईमेल वह नेट सर्विस प्रदाता कंपनी से हासिल कर सकती है। यदि वह ईमेल छह महिने और उससे ज्यादा पुराना है तो बगैर कारणवारंट के प्राप्त कर सकती है। बाद में सरकारी वकील अपनी राय से पीछे हट गया और कहा कि छह महिने से कम अवधि के ईमेल प्राप्त कर सकते हैं लेकिन वे ईमेल स्वयं ईमेल करने वाले को ही अदालत में पढ़ने होंगे।  
     याहू के पक्ष का गूगल,माइक्रोसॉफ्ट तथा अनेक स्वयंसेवी नेट संस्थाओं ने समर्थन किया था। उल्लेखनीय है अमेरिका में सारे सारी दुनिया के ईमेल नेट कंपनियों के द्वारा स्टोर किए जाते हैं।
    अमेरिका में सरकार के पास किसी भी व्यक्ति के ईमेल प्राप्त करने का हक है चाहे वह व्यक्ति शक के घेरे के बाहर हो। सिर्फ सरकार को यह बताना होगा कि ईमेल का किसी आपराधिक मामले में जरुरी इस्तेमाल हो सकता है।
    झंझट तब आरंभ हुआ जब कोलोराडो के मजिस्ट्रेट ने आदेश दिया है कि छह महिने के जो ईमेल यूजर के पास हैं और डाउनलोड हो सकते हों वे पेश किए जाएं। याहू ने मजिस्ट्रेट के आदेश को मानने से इंकार किया और कहा कि सन् 1986 के स्टोर्ड कम्युनिकेशन एक्ट के अनुसार सरकार को ईमेल हासिल करने के लिए कारण बताना होगा और संवैधानिक वारंट हासिल करना होगा उसके बाद ही ईमेल दिए जा सकते हैं। सारी बहस के बाद सरकार और याहू इस बात पर एकमत हो गए कि 180 दिन के अंदर के बगैर खुले या खुले ईमेल हासिल करने के लिए अदालत को कारण बताना होगा। ऐसी स्थिति में बिना वारंट के भी ईमेल दिए जा सकते हैं।    




शुक्रवार, 7 मई 2010

माइक्रोसॉफ्ट ने घुटने टेके भारत कब जागेगा

     यूरोपीय आयोग की सिफारिश के आधार पर माइक्रोसॉफ्ट ने फैसला लिया है कि वह सर्च के डाटा को 6 माह के बाद नष्ट कर देगा। माइक्रोसॉफ्ट ने यह फैसला यूरोपीय यूनियन के द्वारा सन् 2008 में बनाए वर्किंग ग्रुप की सिफारिशों के आधार पर लिया है।
      अभी तक यह होता था कि माइक्रोसॉफ्ट के सर्च ईंजन में जाने वालों के  आईपी एड्रेस माइक्रोसॉफ्ट के पास रहते थे और वह इनका चोरी छिपे दुरुपयोग कर रहा था इसे निजी सूचनाओ के दुरुपयोग की केटेगरी में देखा गया।
     माइक्रोसॉफ्ट ने अपने सर्च ईंजन के डाटा पिछले दिनों चीन सरकार को भी उपलब्ध कराए हैं जिसके आधार पर चीन सरकार का विरोध करने वालों  और तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष करने वालों को बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी हुई है।  ईमेल और दूसरे ‘ई’ संचार के उपकरणों की स्थान विशेष के संदर्भ में निशानदेही करने साथ चीन में अनेक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता पकड़े गए हैं।
     यूरोप में भी माइक्रोसॉफ्ट अपने सर्च ईंजन के डाटा का राजनीतिक हिसाब-किताब बराबर करने और व्यवसायिक लाभ के लिए दुरुपयोग कर रहा था। यूरोपीय यूनियन ने सन् 2008 में ‘आर्टिकल 29 वर्किंग ग्रुप ’ नामक संगठन का गठन किया और इसमें समूचे यूरोप के डाटा संरक्षण के काम से जुड़े कई अफसरों को भी शामिल किया गया।
     ‘आर्टिकल 29 वर्किंग ग्रुप’ ने याहू,गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने अधिकारियों के साथ विस्तार के साथ बातचीत की और यह फैसला लिया कि इन कंपनियों को यूरोप के प्राइवेसी कानूनों का पालन करना होगा।  बाद में ‘आर्टिकल 29 वर्किंग ग्रुप ’ के आदेश पर यह तय पाया गया कि ये तीनों कंपनियां अपने सर्च ईंजन के ऑनलाइन डाटा को 6 माह के बाद नष्ट कर देंगी।
      इस आदेश के बाद माइक्रोसॉफ्ट ने अपने सर्च ईंजन बिंग को नए ढ़ंग से नियोजित किया है। अभी तक याहू और गूगल ने इस दिशा में क्या कदम उठाए हैं यह साफ नहीं है। उल्लेखनीय है कि इलैक्ट्रोनिक प्राइवेसी इनफोर्मेशन सेंटर ने यूरोपीय यूनियन के देशों से अनुरोध किया था कि वे प्राइवेसी कानूनों का ख्याल रखें और सर्च ईंजन के मालिकों पर दबाब ड़ालें कि वे यूरोपीय देशों के प्राइवेसी कानूनों का पालन करें।
      माइक्रोसॉफ्ट का यूरोपीय कानूनों के सामने झुकना इस बात का संकेत है कि सरकारें यदि चाहें तो जनता की ‘ई’ प्राइवेसी की रक्षा कर सकती हैं। क्या भारत सरकार इस दिशा में कदम उठाएगी और भारत के प्राईवेसी कानूनों को मानने के लिए इंटरनेट कंपनियों को मजबूर करेगी ?             





सोमवार, 3 मई 2010

मूलभूत बुनियादी अधिकार है इंटरनेट


           इंटरनेट को ‘स्वतंत्रता की तकनीक’ मानने वालों एक बड़ा समूह है। इसमें वे लोग आते हैं जो आजकल नेट के यूजर हैं। नेट के यूजरों में यह मान्यता बढ़ती जा रही है कि इंटरनेट का कनेक्शन पाना मूलभूत बुनियादी अधिकार है। विश्व स्तर पर किए गए सर्वे में यह पाया गया कि 5 वयस्कों में से 4 वयस्क यह मानते हैं कि इंटरनेट मूलभूत बुनियादी अधिकार है और प्रत्येक व्यक्ति को इंटरनेट सेवाएं मुहैय्या कारायी जानी चाहिए इस सर्वे में ब्लॉगरों पर ज्यादा ध्यान दिया गया थ यहसर्वे बीबीसी ने कराया था। 
        बीबीसी के द्वारा सत्ताइस हजार लोगों में किए गए इस सर्वे में पांच में से चार लोगों ने इंटरनेट को फंड़ामेंटल राइट यानी मूलभूत बुनियादी अधिकार की कोटि में रखा। इंटरनेट उपभोक्ताओं ने इंटरनेट को सकारात्मक नजरिए से देखा और इसे संमस्त जनता के बुनियादी मूलभूत अधिकारों में शामिल करने के पक्ष में राय दी। सर्वे किए गए अठहत्तर प्रतिशत लोगों ने कहा इंटरनेट उनके बीच में व्यापक स्वतंत्रता लेकर आया है। दस में से नौ लोगों का मानना है कि इंटरनेट सीखने की सबसे उम्दा उपकरण है। जबकि सैंतालीस प्रतिशत लोगों का मानना है कि वे जिन चीजों की सूचनाएं पाना चाहते हैं। वे उन्हें नेट पर मिल जाती हैं। बत्तीस प्रतिशत लोगों के लिए इंटरनेट संपर्क का माध्यम है। जबकि मात्र बारह प्रतिशत के लिए मनोरंजन और अन्य किस्म की गतिविधियों का स्रोत है।
     इंटरनेट निजी राय जाहिर करने का सुरक्षित स्थान है या नहीं इस सवाल पर यूजरों में पूरी तरह विभाजन देखा गया। अड़तालीस प्रतिशत की राय थी निजी राय को व्यक्त करने का सुरक्षित माध्यम है। जबकि उनचास प्रतिशत का मानना था कि निजी राय व्यक्त करने का सुरक्षित माध्यम नहीं है।
      सर्वे में अमेरिकी नागरिकों का मानना था कि उन्हें इंटरनेट ने व्यापक पैमाने पर स्वतंत्रता दी है। सारी दुनिया में अठहत्तर प्रतिशत लोग इस राय से सहमत पाए गए जबकि अमेरिका में पचासी प्रतिशत का मानना था कि इंटरनेट ने व्यापक स्वतंत्रता दी है। पचपन प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि वे जो मन में आता है वह नेट पर बोल सकते हैं इसकी तुलना में 48 प्रतिशत लोग मानते हैं कि जो इच्छितभाव से बोल सकते हैं।
        नेट पर धोखाधड़ी को 32 प्रतिशत, हिंसक और नग्न कांटेंट को 27 प्रतिशत, प्राइवेसी की समस्या से 20 प्रतिशत लोग परेशान थे। ज्यादातर इंटरनेट यूजरों का मानना था कि इंटरनेट का नियमन सरकार को करना चाहिए। जबकि 53 प्रतिशत का मानना था कि इंटरनेट के नियमन से सरकार को अलग रखा जाना चाहिए।
        एक अन्य सर्वे में जिसे अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ने जारी किया है ,उसके अनुसार अमेरिका के दो-तिहाई वयस्कों के पास घर पर हाइस्पीड इंटरनेट कनेक्शन है। बाकी एक-तिहाई के पास घर में ब्रॉडबैण्ड कनेक्शन नहीं है। अमेरिका के 93 मिलियन यूजर में इंटरनेट यूजरों में सामाजिक-आर्थिक -जैसे शिक्षा,उम्र,आमदनी आदि- आधार पर गहरा विभाजन पाया गया है।
       कमीशन का मानना है कि साधारण नागरिक को पूरी तरह सूचना संपन्न होना जाहिए। सूचना संपन्न समाज में दोयम दर्जे के नागरिक की कोई जगह नहीं है। अमेरिकी नागरिक नयी सार्वजनिक नीति और तकनीक में निवेश किए बिना विश्वस्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते।
     सूचना का मुक्तप्रवाह बनाए रखना इन दोनों सर्वेक्षणों का केन्द्रीय लक्ष्य है। इस सर्वे से यह भी पता चला है कि अमेरिका में अभी तक 100 प्रतिशत आबादी के पास ब्रॉडबैंड नहीं पहुँचा है।

रविवार, 25 अप्रैल 2010

हाइपर टेक्स्ट की समस्याएं -2-

      सारी दुनिया एकमत है कि टेड नेल्सन ने हाइपर टेक्स्ट बनाया। किंतु मजेदार बात यह है कि इसे लेकर अनेक किस्म की आलोचनाएं दिखाई देती हैं।एक्सनाडु प्रकल्प की अकाल मौत पर काफी कुछ लिखा गया है किंतु अभी तक किसी ने भी सेक्स,नशीले पदार्थों के उद्योग,और रॉक एंड रोल के साथ इसके रिश्ते के बारे में गंभीरता से विचार नहीं किया है। 'वायर' पत्रिका ने इस प्रकल्प पर जो हमला किया उसमें अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी हुई है। कई महत्वपूर्ण लोगों का जिक्र तक नहीं किया गया है।
   मसलन् एक्सनाडु प्रकल्प का समर्थक जॉन मोछले ,जिसने जे.प्रेस्पर के साथ मिलकर डिजिटल कम्प्यूटर का स्टार कार्यक्रम बनाया था,उसका जिक्र तक नहीं है।कालविन मूर्स कहां गया इसने 'इनफार्मेशन रिट्राइवल सिस्टम' बनाया था,उसने टीआरएसी यानी ट्रेक की चमत्कारी भाषा रची थी। वह एक्सनाडु का आरंभिक समर्थक था।असल में एक्सनाडु की त्रासदी ट्रेक के कोड लाइसेंस,कापीराइट आदि को लेकर शुरू हुई।यह प्रकल्प बंद हो गया।
      हाइपर टेक्स्ट का जो सपना देखा गया वह बिखर गया।आज वह खण्ड-खण्ड रूप में चारों ओर फैला है। हाइपर टेक्स्ट सिस्ठम चारों ओर उपलब्ध है।इसके बावजूद टेड नेल्सन अविवादित तौर पर हाइपर टेक्स्ट का महान् वैज्ञानिक है।
    'वायर' ने एक्सनाडु प्रकल्प की जो कहानी छापी है उसमें 'ऑन लाइन सिस्टम' के रचयिता डॉग इगिलबर्ट का उल्लेख तक नहीं है।जबकि उसने ही हाइपर टेक्स्ट और उससे जुड़ी अनेक अवधारणाओं को निर्मित किया।उसी के प्रयासों से 'अरपनेट' प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक लागू हो पाया। यह पहला सूचना केन्द्र नेटवर्क था।
      इगिलबर्ट ने ही 'माउस' को जन्म दिया। ब्लैक एंड ह्वाइट पर्दे का निर्माण किया। उसी की डिजायन ने टेड नेल्सन के एक्सनाडु प्रकल्प के बारे में सोचने के लिए सारी दुनिया को मजबूर किया। कायदे से हमें इगिलबर्ट के अवदान को नहीं भूलना चाहिए क्योंकि उसी ने हाइपर टेक्स्ट से जुड़ी तमाम व्यवहारिक चीजों का निर्माण किया।किंतु इस व्यक्ति के बारे में 'वायर' पत्रिका भूल गई।उसने एक्सनाडु प्रकल्प पर जो आरोप लगाए थे वे सब गलत हैं। 'वायर' का लेख बहुत ही घटिया है। घटिया इस अर्थ में कि इसमें प्रत्येक चीज को अस्वीकार किया गया है।इस लेख के प्रत्येक शब्द,वाक्य आदि का चयन झूठ बोलने के लिहाज से किया गया है।
      अभी दो तरह के हाइपर टेक्स्ट उपलब्ध हैं-पहला,स्थिर है।दूसरा-गतिशील है।स्थिर हाइपर टेक्स्ट डाटावेस में परिवर्तन की अनुमति नहीं देता।किंतु गतिशील हाइपर टेक्स्ट में बदलाव ला सकते हैं।एक दस्तावेज के अनेक रूप तैयार कर सकते हैं।हन्हें समय-समय पर बदल सकते हैं।
    सन् 1960 से ब्राउन यूनीवसिटी में अनुसंधान कार्य चल रहा है जिसके कारण अनेक किस्म के हाइपर टेक्स्ट का जन्म हुआ है।सन् 1985 से इन्स्टीट्यूट फोर रिसर्च इन इनफॉर्मेशन एण्ड स्कालरशिप इण्टरमीडिया पर अनुसंधान कार्य चल रहा है।इसके कारण ही आज हमारे पास व्यापक पैमाने पर मल्टीमीडिया नेटवर्क उपलब्ध है।
      इसी तरह हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पिरसिअस प्रोजेक्ट में हाइपर कार्ड पर काम चल रहा है। ग्रीक सभ्यता, संस्कृति से जुड़े समस्त आयामों को इसमें शामिल किया गया है। दक्षिणी कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रोजेक्ट जेफरसन पर सन् 1987 से काम चल रहा है।यह संवैधानिक नोटबुक है।
      संक्षेप में हाइपर टेक्स्ट के इतिहास पर गौर करें तो पाएंगे कि सन् 1945 में वन्नेबर बुश ने 'मिमिक्स' का प्रस्ताव पेश किया।सन्1965 में टेड नेल्सन ने हाइपर टेक्स्ट पदबंध को जन्म दिया।1967 में ब्राउन यूनीवर्सिर्टी के एंडीवेन डेम ने हाइपरटेक्स्ट एडीटिंग सिस्टम एंड फ्रीसस  को बनाया।सन् 1968 में डॉग इगेलबर्ट ने एफजेसीसी के एनएलएस सिस्टम का कच्चा प्रारूप तैयार किया।सन् 1975    (जीओजी इन दिनों इसे केएमएस कहते हैं) सीएमयू आया। सन् 1978 में एमआईटी आर्किटेक्चर मशीन ग्रुप  (इन  दिनों मीडियालेव नाम ) का पहला हाइपर वीडियो डिस्क आया। सन् 1984 में फिलिविजन का हाइपरमीडिया डाटावेस आया। जेनेट वाकर ने 1985 में सिम्बालिक्स डाकूमेण्टस एग्जामिनर तैयार करके पेश किया।सन् 1985 में ब्राउन यूनीवर्सिटी के नार्मन मेयरोविट्ज ने इण्टरमीडिया का निर्माण किया। ओडब्ल्यूएल ने सन् 1986 में पहला हाइपर टेक्स्ट गाइड उपलब्ध कराया। सन् 1987 में बिल अलकिंसन ने हाइपर कार्ड पेश किया। सन् 1987 में पहलीबार हाइपर टेक्स्ट पर सबसे बड़ी कॉँफ्रेंस हुई।
    सन्1991 में वर्ल्ड वाइड वेब ने ग्लोबल हाइपर टेक्स्ट को जन्म दिया।इसे टिम बर्नर्स ली ने बनाया था। सन् 1993 में 'हार्ड डे नाइट' नामक पहली हाइपर मीडिया फिल्म बनी। इसी साल हाइपरमीडिया इनसाइक्लोपीडिया की मुद्रित प्रतियां मुद्रित इनसाइक्लोपीडिया से ज्यादा संख्या में बिकीं।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...