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भारत के नंगे अमीर

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मीडिया में अद्भुत दृश्य चल रहा है। टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक ,देशी-विदेशी राजनयिकों से लेकर अमेरिका के महान ताकतवर लोगों तक सबको आप मीडिया में नंगा देख सकते हैं। अमीर इस तरह नंगे कभी नहीं हुए। टाटा ने जनसंर्पक अधिकारी नीरा राडिया के साथ हुई बातचीत का टेप बाहर आने पर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी है कि उनकी प्राइवेसी का हनन हुआ है। वहीं उनकी प्रतिक्रिया आते ही केन्द्र ने तत्काल जांच के आदेश दे दिए हैं। 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में सारी पार्टियां परेशान हैं, और केन्द्र सरकार के सभ्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख तो मिट्टी में ही मिल गयी है। उधर अमेरिकी प्रशासन परेशान है ढ़ाई लाख केबिल मेल के लीक होने से। जिस वेबसाइट ने लीक किया है उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के बारे में अमेरिकी अधिकारी विचार कर रहे हैं। टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक समस्त कारपोरेट घराने कम से कम आज बेईमानी-धोखाधड़ी आदि के मामलों में जन अदालत में नंगे खड़े हैं। उनके खिलाफ प्रमाण थे। इसे कांग्रेस पार्टी जानती थी। प्रधानमंत्री जानते थे। वे चुप रहे। कल जब संचारमंत्री कपिल सिब्बल प्रेस कॉफ्रेस करके 85 संचार कंपनियों को…

उत्तरआधुनिकतावाद का प्रधान फिनोमिना है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार

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उत्तर आधुनिकतावादी विकास का प्रधान लक्षण है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार,नेताओं में संपदा संचय की प्रवृत्ति, अबाधित पूंजीवादी विकास,उपभोक्तावाद की लंबी छलांग और संचार क्रांति। इन लक्षणों के कारण सोवियत अर्थव्यवस्था धराशायी हो गयी। सोवियत संघ और उसके अनुयायी समाजवादी गुट का पराभव एक ही साथ हुआ। सामान्य तौर इस पराभव को मीडिया में साम्यवाद की असफलता कहा गया। वास्तव में यह साम्यवाद की असफलता नहीं है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह ‘आधुनिकीकरण की छलयोजना’ है। अस्सी के दशक से सारी दुनिया में सत्ताधारी वर्गों और उनसे जुड़े शासकों में पूंजी एकत्रित करने,येन-केन प्रकारेण दौलत जमा करने की लालसा देखी गयी। इसे सारी दुनिया में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार कहा जाता है और देखते ही देखते सारी दुनिया उसकी चपेट में आ गयी। आज व्यवस्थागत भ्रष्टाचार सारी दुनिया में सबसे बड़ी समस्या है। पश्चिम वाले जिसे रीगनवाद,थैचरवाद आदि के नाम से सुशोभित करते हैं यह मूलतः आधुनिकीकरण की छलयोजना है और इसकी धुरी है व्यवस्थागत भ्रष्टाचार। ध्यान रहे रीगनवाद-थैचरवाद को हम नव्य आर्थिक उदारतावाद के नाम से भी जानते हैं और भारत में इसके जनक न…

यूरोपीय लेखक संसद में कठमुल्लों की पराजय

यूरोपीय लेखक संसद का हाल ही में इस्ताम्बूल में सम्मेलन खत्म हुआ है। उसके समापन के बाद यूरोपीय लेखक संसद ने एक घोषणापत्र जारी किया है। यह घोषणापत्र बेहद महत्वपूर्ण है। यह घोषणापत्र ऐसे समय में संसद ने पास किया है तब तुर्की के कठमुल्लों के दबाब के चलते वी.एस.नायपाल जैसे बड़े लेखक को मतभिन्नता के कारण इस सम्मेलन का उदघाटन करने से रोका गया था। संसद पर काफी दबाब था कि वह कठमुल्लों के दबाब में आ जाए ,लेकिन अंत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रक्षकों की जीत हुई और कठमुल्लों को मुँह की खानी पड़ी। यहां हम यूरोपीय लेखक संसद का घोषणापत्र अविकल छाप रहे हैं।


27 November 2010

We have all, as writers, come to the European Writers' Parliament in Istanbul to focus on literature as a means of broadening our world. We share the belief that literature is a place where different viewpoints meet and clash in the most constructive way – within written texts and in dialogue between their authors. In the context of the rising tide of intolerance in the world, in Europe and in Turkey, we regret that the pa…

पश्चिम बंगाल में हिन्दीभाषियों की उपेक्षा

( पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार द्वारा संचालित पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी नामक संस्था है जिसे लेकर स्थानीय लेखकों में जबर्दस्त रोष है,उस पर प्रेस में तीखी प्रतिक्रियाएं भी आई हैं, हम यहां उन्हें सिलसिलेबार दे रहे हैं,जिससे वाममोर्चे का हिन्दीभाषियों के प्रति क्या रूख है उसे जानने का आप सबको मौका मिले,यहां पर हम हाल ही में गठित शासी निकाय के एक सदस्य डा.अशोक सिंह द्वारा  मुक्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नाम भेजा गया पत्र प्रकाशित कर रहे हैं,यह पत्र कई महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान खींचता है।)

श्री बुद्धदेव भटाचार्य   
                                              दिनांक: 25 नवंबर 2010 मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल सरकार राइटर्स बिल्डिंग, कोलकाता
विषय:पश्चिम बंग हिंदी अकादमी का पुनर्गठन और साधारण परिषद की सदस्यता से इस्तीफा
आदरणीय मुख्यमंत्री जी, 18 नवंबर 2010 को पश्चिम बंगाल सरकार के सूचना और संस्कृति विभाग की ओर से पश्चिम बंग हिंदी अकादमी के पुनर्गठन की लिखित सूचना अकादमी के एक कर्मचारी के माध्यम से सुरेन्द्रनाथ सांध्य कालेज, कोलकाता में मिली| पश्चिम बंग हिंदी अकादमी की 41 सदस्यीय साधारण परिषद मे…

आदिवासी अस्मिता की चुनौतियां

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आदिवासी समस्या राष्ट्रीय समस्या है। भारत की राजनीति में आदिवासियों को दरकिनार करके कोई राजनीतिक दल नहीं रह सकता। एक जमाना था आदिवासी हाशिए पर थे लेकिन आज केन्द्र में हैं। आदिवासियों की राजनीति के केन्द्र में आने के पीछे प्रधान कारण है आदिवासी क्षेत्रों में कारपोरेट घरानों का प्रवेश और आदिवासियों में बढ़ती जागरूकता। आदिवासियों के प्रति वामपंथी दलों का रूख कांग्रेस और भाजपा के रुख से बुनियादी तौर पर भिन्न है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को कभी भी आदिवासी बनाए रखने, वे जैसे हैं वैसा बनाए रखने की कोशिश नहीं की है। वामपंथी दलों ने आदिवासियों को साम्राज्यवादी विचारकों द्वारा दी गयी घृणित पहचान से मुक्त किया है। उन्हें मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठा दी है। यह कार्य उनके मानवाधिकारों की रक्षा करते हुए किया है। आदिवासियों को वे सभी सुविधा और सुरक्षा मिले जो देश के बाकी नागरिकों को मिलती हैं। आदिवासियों का समूचा सांस्कृतिक तानाबाना और जीवनशैली वे जैसा चाहें रखें,राज्य की उसमें किसी भी किस्म के हस्तक्षेप की भूमिका नहीं होगी,इस प्रक्रिया में भारत के संविधान में संभावित रूप में जितना भी संभव है उसे आद…

उत्तर मार्क्सवाद के दौर में क्रांति का मार्ग

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उत्तर आधुनिकतावाद दौर में क्रांति पर सबसे तेज हमले हुए हैं। इन हमलों के आंतरिक और बाह्य दोनों ही किस्म के रूप रहे हैं। इनकी मीमांसा करने का यहां अवकाश नहीं है। उस पर आगे कभी बात करेंगे। हम कायदे से क्रांति की आवधारणा पर नए सिरे से विचार करें। क्योंकि उत्तर आधुनिकता के दौर पर क्रांति की अवधारणा के खिलाफ जितना लिखा गया है उतना अन्य किसी अवधारणा के बारे में नहीं लिखा गया है। क्रांति संबंधी बहस का बृहत्तर रूप में गहरा संबंध सिद्धांत और व्यवहार की एकता के साथ है। इस प्रसंग में पहली बात यह कि क्रांति का वास्तव अर्थ इन दिनों विकृत हुआ है। उसका अवमूल्यन हुआ है। क्रांति का अर्थ परिवर्तन मान लिया गया है और प्रत्येक परिवर्तन को क्रांति कहने का रिवाज चल निकला है। क्रांति के अर्थ का यह विकृतिकरण है। क्रांति का अर्थ है बुनियादी या आमूल-चूल परिवर्तन।
क्रांति पर बहस करते हुए आमतौर पर कुछ इमेजों,कुछ आख्यानों, कुछ देशों ,कुछ खास क्षण विशेष आदि का जिक्र किया जाता है और यह क्रांति का भ्रष्टीकरण करने में मदद करता है। क्रांति पर बात करने के लिए उसे साम्यवादी और साम्यवादविरोधी विचारकों और प्रचार सामग्री के द…

वी एस नायपॉल प्रसंगःफंडामेंटलिज्म के प्रतिवाद में

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वी एस नायपाल बड़े लेखक हैं । उन्हें बुकर पुरस्कार और नोबुल पुरस्कार भी मिल चुका है। उनके विचार अनेक धर्मनिरपेक्ष विचारकों और लेखकों को पसंद नहीं हैं। मैं भी उनके अनेक विचारों से असहमत हूँ। लेकिन हाल ही में यूरोपीय लेखक संसद से उनको बाहर कर दिए जाने के फैसले को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ।यह सीधे लेकक की स्वतंत्रता का हनन है। उल्लेखनीय है यूरोपीय लेखक संसद का लाजा अधिवेशन तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल में चल रहा है। संसद के आयोजकों ने नायपाल को उदघाटन के लिए बुलाया था। लेकिन स्थानीय तुर्की लेखकों और धार्मिक प्रेस ने नायपाल के बुलाए जाने का विरोध किया और कहा कि उनकी मौजूदगी इस्लाम का अपमान है। सारी दुनिया जानती है नॉयपाल के इस्लाम के बारे में क्या विचार हैं। वे इस्लाम की जितनी तीखी आलोचना करते हैं उतनी गहराई के साथ भारत के हिन्दुत्ववादियों और भाजपा के प्रेमी भी हैं। नॉयपाल उन चंद लेखकों में हैं जिन्होंने बाबरी मसजिद गिराए जाने का स्वागत किया था। तुर्की के धार्मिक प्रेस ने नॉयपाल को बुलाए जाने के खिलाफ विगत कई दिनों से हंगामा खड़ा किया हुआ है। उसके दबाब में आकर ही आयोजकों को उन्हें आने के ल…

भूखा किसान,नीतीश की जीत और मीडियाखेल

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बिहार में नीतीश बाबू विधानसभा चुनाव जीत गए लेकिन किसान पर कोई कृपादृष्टि किए बगैर। लालू यादव ने इसे एनडीए की रहस्यमय जीत कहा है। एनडीए ने अपने प्रचार में मीडिया फ्लो को ध्यान में रखकर मध्यवर्गीय एजेण्डे को केन्द्र में रखा था। सवाल उठता है एनडीए और खासकर नीतीश कुमार जैसे पुराने समाजवादियों को बिहार में चुनाव लड़ते हुए किसानों की समस्याएं नजर क्यों नहीं आईं ? मीडिया के तथाकथित कवरेज से बिहार का किसान क्यों गायब था ? बिहार के विभिन्न जिलों से आने वाले किसी भी टॉक शो में किसान को प्रधान एजेण्डा क्यों नहीं बनाया गया ? इसके कारण क्या हैं ? क्या बिहार के विकास का कोई भी नक्शा किसान को दरकिनार करके बनाया जा सकता है ? जी नहीं। लेकिन मीडिया में एनडीए के चतुर खिलाडियों ने यही ज्ञान बांटा है बिहार तरक्की पर है और एनडीए उसके कारण ही जीता है। यह प्रचार है इसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। जरा बड़ी तस्वीर पर नजर ड़ालें तो चीजें साफ दिखने लगेंगी। टेलीविजन विज्ञापनों में खाना खाता किसान नजर नहीं आता। आमतौर पर मध्यवर्ग के बच्चे,औरतें और पुरूष खाना खाते या पेय पदार्थ पीते नजर आते हैं। चॉकलेट खात…

भारतीय विद्रोह-कार्ल मार्क्स

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विद्रोही सिपाहियों द्वारा भारत में किए गए अनाचार सचमुच भयानक, वीभत्स और अवर्णनीय हैं। ऐसे अनाचारों को आदमी केवल विप्लवकारी युध्दों में, जातियों, नस्लों और, सबसे अधिक, धर्म-युध्दों में देखने का खयाल मन में ला सकता है। एक शब्द में, ये वैसे ही अनाचार हैं जैसे वेंदियनों ने 'नीले सैनिकों' पर किए थे और जिनकी इंगलैंड के भद्र लोग उस वक्त तारीफ किया करते थे; वैसे ही जैसे कि स्पेन के छापेमारों ने अधर्मी फ्रांसीसियों पर, सर्बियनों ने जर्मन और हंगरी के अपने पड़ोसियों पर, क्रोट लोगों ने वियना के विद्रोहियों पर, कावेनाक के चलते-फिरते गार्डों अथवा बोनापार्ट के दिसंबरवादियों ने सर्वहारा फ्रांस के बेटे-बेटियों पर किए थे। सिपाहियों का व्यवहार चाहे जितना भी कलंकपूर्ण क्यों न रहा हो, पर अपने तीखे अंदाज में, वह उस व्यवहार का ही प्रतिफल है जो न केवल अपने पूर्वी साम्राज्य की नींव डालने के युग में, बल्कि अपने लंबे जमे शासन के पिछले दस वर्षों के दौरान में भी इंगलैंड ने भारत में किया है। उस शासन की विशेषता बताने के लिए इतना ही कहना काफी है कि यंत्रणा उसकी वित्तीय नीति का एक आवश्यक अंग थी।* मानव इतिहास …

26/11 के सबकः आतंकवादी खबरों के उत्पादक थिंक टैंक

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मुम्बई की 26/11 की घटना के बाद से आतंकवाद पर मीडिया में काफी चर्चा हुई है। इस चर्चा के केन्द्र में आमतौर आतंकी कसाब पर चल रहा मुकदमा सुर्खियों में रहा है। यह कवरेज कैसे आया और अतिरंजित ढ़ंगसे क्यों आया ? इस पर कभी मीडिया के लोगों का ध्यान नहीं गया। इस प्रक्रिया में आतंकियों के प्रति सतर्कता और सावधानी के सवालों पर कम ध्यान दिया गया ।
     पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के आने के साथ यह अनुभूति पैदा करने की कोशिश की गई थी कि मुंबई में आतंकी हमला हो सकता है। लेकिन सामान्यतौर पर मुम्बई में आतंकी हमला कोई समस्या नहीं रहा है। इसी तरह अन्य महानगरों में भी आतंकवाद समस्या नहीं है।       केन्द्र सरकार बड़े उत्सवधर्मी ढ़ंग से सतर्कता वार्ता जारी करती रहती है ,आज भी जारी की गई है। सवाल उठता है भारत के लिए क्या आतंकवाद सचमुच में एक बड़ी समस्या है ? यदि ऐसा है तो विगत एक वर्ष में सारी दुनिया में आतंकी हमले में कितने हिन्दुस्तानी मारे गए ? काश्मीर को छोड़कर देश के अन्य भागों में कितने लोग विगत एक साल में आतंकी हमले में मारे गए ?     इसी तरह हम अमेरिकी मीडिया में आतंकवाद के खतरे के बारे…

बिहार के परिणाम- धुर दक्षिणपंथी विकास मॉडल का नया उभार

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बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम आ चुके हैं। इन परिणामों का भारत की भावी राजनीति के लिए बड़ा महत्व है। इन परिणामों ने पश्चिम बंगाल के वामनेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है। बिहार में नीतीशकुमार की जीत का प्रधान कारण है शांतिपूर्ण ढ़ंग से चुनावों का होना। पश्चिम बंगाल में भी यदि हिंसारहित चुनाव होते हैं तो वाम मोर्चे का आगामी विधानसभा चुनाव जीतना असंभव है। वामनेता इस बात से परेशान हैं कि हिन्दीभाषी उनके साथ नहीं हैं। यहां रहने वाले हिन्दीभाषी अमूमन बिहार और यू.पी. की राजनीति से सीधे प्रभावित होते हैं। मौजूदा रूझान वाममोर्चे के लिए खतरे की सूचना हैं। क्योंकि बिहार में सभी रंगत के वामदलों की चुनावी एकजुटता असरहीन साबित हुई है। एक अन्य संदेश यह है कि ममता बनर्जी के कद को राहुल गांधी-सोनिया गांधी के जरिए छोटा नहीं किया जा सकता। राहुल-सोनिया का जादू खत्म हो चुका है। बिहार के मुस्लिंम मतदाता केन्द्र सरकार के मुसलमानों के विकास के लिएकई हजार करोड़ रूपयों के अनेक विकास कार्यक्रमों से एकदम प्रभावित नहीं हुए हैं। यह माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के लिए नौकरियों में आरक्षण करके वाममोर्चा मुसल…