शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

मुर्दा बयानों के नायक

                   आरएसएस के पूर्व सरसंघसंचालक के.सी. सुदर्शन साहब दो दिन पहले भोपाल में बोले और खूब बोले। किसी को उनके बोलने पर आपत्ति नहीं है। उन्हें भारत के धर्मनिरपेक्ष कानून और संविधान ने यह अधिकार दिया है वे और उनके अनुयायी इसका उपयोग करें।
   मजेदार बात यह है स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका था जब आरएसएस के लोगों पर आतंकी घटनाओं में शामिल होने के आरोप लगे हैं। उनकी गिरफ्तारियां हुई हैं और अदालत में चार्जशीट भी दाखिल हुई हैं। आरएसएस का मानना है उसके लोगों को राजनीतिक विद्वेष के कारण मिथ्या आरोपों में फंसाया जा रहा है और कांग्रेस उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रही है। आरएसएस का चरित्रहनन करने की कोशिश की जा रही है। इस सबके प्रतिवाद में सारे देश में आरएसएस ने 10 नवम्बर 2010 को प्रतिवाद दिवस मनाया। इस मौके पर सभी संघी नेताओं को धरने,प्रदर्शन और जुलूसों में देखा गया और यह आरएसएस को धर्मनिरपेक्ष संविधान ने हक दिया है वे अपने साथ किए जा रहे अन्याय का प्रतिवाद करें। 
  समस्या यह नहीं है कि आरएसएस क्या है ? समस्या यह है कि आरएसएस के नेता के.सी.सुदर्शन ने इस तरह अशालीन बयान क्यों दिया ? आरएसएस आतंकी है या साम्प्रदायिक है,यह फैसला आसानी से संभव नहीं है। आरएसएस ने आम लोगों में हिन्दुत्व का जितना ज़हरीला प्रचार किया है उसके कारण अनेक लोग तो अब मान ही चुके हैं संघ ही देश का भविष्य है। हिन्दुत्व ही भारत की आत्मा है। हिन्दूराष्ट्र ही भारत के भाग्य का चन्द्रमा है।
    के.सी. सुदर्शन के बयान पर कांग्रेस ने हल्ला किया है,वह भी सारे देश में प्रतिवाद करेंगे । मजेदार बात यह है कि कांग्रेस को आतंकी संघ परिवार की हरकतों के खिलाफ प्रतिवादस्वरूप जुलूस निकालने की याद नहीं आयी ,लेकिन सोनिया गांधी के बारे में के.सी. सुदर्शन के बयान पर प्रतिवाद स्वरूप सड़कों पर उतरने की याद आयी। इससे एक बात तो कम से कम कह सकते हैं कि मसला कांग्रेस के लिए भी हिन्दू आतंकवाद नहीं है। बल्कि सोनिया गांधी के बारे में के.सी. सुदर्शन के द्वारा दिया गया वह घटिया बयान है जिसमें उन्होंने सभ्यता और शालीनता के सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
        के.सी. सुदर्शन संघ परिवार में गंभीर विचारों के धनी हैं और उनकी सारी इन्द्रियाँ दुरूस्त हैं। उन्होंने पूरे होशोहवास में अपना बयान दिया है और यह बयान संघ परिवार की भावी राजनीतिक कार्रवाईयों के लिए मार्गदर्शक का काम करेगा। इस बयान को हल्के ढ़ंग से नहीं लेना चाहिए। राममंदिर आंदोलन के बाद लंबे अंतराल के बाद संघ परिवार राजनीति के मैदान में आने जा रहा है। 10 नवम्बर का प्रतिवाद उसकी शुरूआतभर है। इस प्रतिवाद की राजनीतिक मंशाएं राममंदिर आंदोलन से भी ज्यादा गहरी हैं।
     हिन्दू आतंकवाद का विरोध करने के बहाने संघ अपने को नए कलेवर में रूपान्तरित करने की तैयारियां कर चुका है। इस राजनीतिक प्रक्रिया में संघ परिवार आने वाले समय में खूब कीचड़ उछालेगा। सोनिया गांधी पर किया गया तथ्यहीन और अशालीन वाचिक हमला आरएसएस के स्वयंसेवकों के लिए हरी झंड़ी है कि जाओ और जो भी मन में आए बको। जितना इच्छा झूठ बोलो।
    चूंकि असत्य प्रचार का आरंभ संघ के बड़े नेता ने किया है इसलिए अब संघ परिवार के लोग राममंदिर आंदोलन के समय से भी ज्यादा सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाएंगे। यह संघ परिवार को आतंकी विचारधारा का कवच पहनाने की बड़ी योजना का हिस्सा है।
   संघ परिवार में पहले हिन्दुओं को हजम करने की कोशिश की गयी और जब उसमें सफलता नहीं मिली तो नयी बदली हुई परिस्थितियों में संघ परिवार ने नया राजनीतिक मार्ग ग्रहण किया है और वह है आतंकी हिंसा के आयोजन,संगठन और प्रचार का। सोनिया गांधी पर किया गया वैचारिक हमला इस बड़ी डिजाइन का हिस्सा है।
   आरएसएस के लोग जानते हैं कि वे देश के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रदायिक हिंसाचार में लिप्त रहे हैं और बड़ी ही चालाकी से वे अपने को इससे अलग दिखाने का प्रयास भी करते रहे हैं। लेकिन गुजरात के जनसंहार के समय से उन्होंने हिंसा से अपने को अलगाने या छिपाने का काम बंद कर दिया है। गुजरात के दंगों के बाद से वे अब खुल्लमखुल्ला खेलने लगे हैं। गुजरात की हिंसा के पहले उनके जो प्रेरक थे वे भी बदल गए हैं। अब उन्हें जिन तत्वों से प्रेरणा मिल रही है उनका भारत की किसी भी किस्म की राजनीतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं है। विश्व में चल रही अलकायदा-तालिबान आदि संगठनों का वायरल बुखार उन्हें भी स्पर्श कर गया है।
    संघ अपने बुनियादी कार्यक्रम को बंद नहीं करना चाहता। मीडिया के अनुसार बुनियादी कार्यक्रम है हिंसा और घृणा फैलाना। हिन्दुत्व के नाम पर वे जिस तथाकथित ऐतिहासिक सत्य और तथ्य का प्रचार करते रहे हैं वह अब प्रेरणा देने का काम नहीं कर रहा। नई बदली हुई परिस्थितियों में वे कुछ वैसा करना चाहते हैं जिसकी तुलना हिटलर से न की जाए। मुसोलिनी से न की जाए। वे अपने आलोचकों के द्वारा की गयी पुरानी तुलनाएं सुन-सुनकर बोर हो गए हैं वे अपने लिए नयी तुलनाओं की तलाश में हैं। वे पुरानी हिन्दुत्ववादी की पहचान से बाहर आना चाहते हैं,वे पुराने तौर-तरीकों से बाहर आना चाहते हैं,उन्हें अलकायदा-तालिबान की चमक और दबदबा आकर्षित करने लगा है। उन्हें माओवादियों का हिंसक आचरण अपील करने लगा है। वे अपने संगठन के पास अलकायदा जैसी विश्वव्यापी शक्ति की कल्पना के सपने देख रहे हैं।
    वे मानते हैं कि वे साम्प्रदायिक नहीं हैं ,हिन्दू आतंकी नहीं है। इन नामों से उन्हें सम्बोधित नहीं किया जाए। वे अपने नए वैचारिक झंझावात से सभी किस्म के ऐतिहासिक सत्यों पर पर्दा डाल देना चाहते हैं। के.सी. सुदर्शन जब भोपाल में बोल रहे थे तो उनका सारा जोर इसी बात पर था कि संघ परिवार के बारे में जो कुछ भी कहा जा रहा है वह असत्य है। उन्होंने यह भी बताया कि हिन्दू आतंकी कर्म से उनका कोई लेना देना नहीं है। हो सकता है सुदर्शनजी की बात में सच्चाई हो। लेकिन आज के जमाने में मुश्किल यह है कि मीडिया के जरिए छनकर हम तक हिन्दू आतंक की खबरे पहुँची हैं। ये खबरें किसी ने बनायी नहीं हैं। ये वास्तव खबरें हैं। मीडिया के जरिए ही उन त्रासद घटनाओं के विवरण और ब्यौरे हम तक पहुँचे हैं जिनमें बताया गया है कि संघ परिवार आतंकी बम धमाकों में हाथ था। हो सकता है संघ के हाथ होने वाली बात में सच्चाई न हो। लेकिन उस त्रासद घटना को असत्य नहीं कहा जा सकता।
     हमें हिन्दुत्ववादी संगठनों की हिस्सेदारी वाली घटनाओं के लक्षणों और प्रवृत्तियों पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। हो सकता है संघ परिवार के लोग प्रमाणों के अभाव में आतंकी घटनाओं से बरी हो जाएं। लेकिन वे उस सत्य से बरी नहीं हो सकते जो उनके साथ जुड़ गया है। उनके साथ नया सत्य है आतंकी का। इस कलंक को वे धा नहीं पाएंगे।
    संघ परिवार के लोग जानते हैं कि अदालत में प्रमाणित सत्य से बड़ा सामाजिक सत्य होता है। आज के युग में सत्य मीडिया निर्मित यथार्थ है। मीडिया सत्य यह है कि आरएसएस धीरे धीरे अपना हिन्दुत्व का मुखौटा त्यागकर दूसरा मुखौटा खोज रहा है। बतर्ज सीबीआई और कांग्रेस नेताओं के संघ ने अपने लिए हिन्दू आतंकी का मुखौटा चुन लिया है। इस मुखौटे को संघ परिवार क्या जल्दी ही अपने चेहरे से हटा पाएगा ? जी नहीं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद जो मुखौटा मीडिया ने संघ को पहनाया था उससे आज तक वे मुक्त नहीं हो पाए हैं। राममंदिर आंदोलन ने जो मुखौटा पहनाया था उसे वे अभी तक उतार नहीं पाए हैं। अब कई आतंकी हमलों की घटनाओं में संघ परिवार के लोगों के नाम आए हैं उससे संघ को एक नया मुखौटा मिला है और इसे भी जल्दी उतारना उनके लिए संभव नहीं है। हमें ध्यान रखना चाहिए मीडिया जो मुखौटा पहना देता है उसे आप चाहकर भी नहीं उतार सकते।
   संघ परिवार अपने मुखौटों से तब ही मुक्त हो सकता है जब वह संबंधित मसले और व्यक्तियों को पूरी तरह त्याग दे। जिन लोगों का हिंसाचार में नाम आया है उन्हें सीने से लगाए रखने से मीडिया का मिथ पुख्ता बनेगा।
    संघ परिवार के लोग जानते हैं कि उनके आदमी ने क्या किया है ? वे यह भी जानते हैं कि एकबार मीडिया में कलंक का टीका लग जाने के बाद लाख कोशिशें करने के बाबजूद भी साफ होने वाला नहीं है।
    संघ वाले कितना ही हल्ला मचाएं बाबरी मसजिद को ढहाए जाने के अपराध से वे मुक्त नहीं हो सकते भले ही उनके पक्ष में अदालत का फैसला आ जाए। सच को आप किसी साबुन से धोकर साफ नहीं कर सकते। सच सच है उसे संघ के धरने,प्रदर्शन बदल नहीं सकते। सच को लोग भूलते नहीं हैं। वह स्मृति में रहता है। सामाजिक चेतना में रहता है।
     सोनिया गांधी के बारे में सुदर्शनजी ने जो कुछ कहा है वह पूर्णतः असत्य है। असत्य बोलकर सत्य की सृष्टि नहीं की जा सकती। हिटलर से लेकर अलकायदा तक असत्य को सत्य और सत्य को असत्य बनाने में लगे हैं लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली है। संघ परिवार के लोग गुजरात में चुनाव जीत सकते हैं लेकिन गुजरात में हुई हिंसा के कलंक से अपने को मुक्त नहीं कर सकते।
     सत्य सबसे बड़ा होता है ,भाषण,मीडिया, संगठन, सरकार, हिन्दुत्व ,आतंकवाद, भगवा आतंकवाद आदि से बड़ा होता है। संघ परिवार को साहस दिखाकर उन आतंकी घटनाओं के सत्य का उदघाटन करना चाहिए जिनमें वे शामिल बताए जा रहे हैं। वे सत्य की तलाश नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि संघ पर हिन्दू आतंक का आरोप गलत है। हो सकता है यह आरोप गलत हो। लेकिन यह आरोप सही भी हो सकता है । ऐसी स्थिति में क्या करेंगे ?
    संघ परिवार की मुश्किल यह है कि वह मीडिया निर्मित इमेजों में घिर गया है। इमेजों में घिरने के बाद उनके बाहर निकलना असंभव है। दूसरी बात यह है कि अपराध और दण्ड में कोई समानता नहीं होती। संघ वाले अपराधी करार दिए जाएंगे तो क्या इससे किसी को राहत मिलेगी ? चैन मिलेगा ? अपराध का क्या सजा के साथ समान रूप में विनिमय संभव है ? जी नहीं।
हमारा समाज मीडिया निर्मित मिथकों के युग में दाखिल हो चुका है। अब मीडिया ही सारी घटनाओं को निर्मित करता है। वही मिथ बनाता है। इस अर्थ में वर्तमान समय मीडिया निर्मित मिथकों से भरा है। मीडिया मिथ इसलिए सफल हैं क्योंकि उनमें लक्ष्यीभूत संगठन,समूह,विचारधारा आदि को शामिल कर लिया जाता है।
   हिन्दू आतंकी या भगवा आतंकी के मिथ में जब एकबार संघ परिवार को मीडिया ने शामिल कर दिया है तो उस इमेज से बाहर निकलना असंभव है। मीडिया ने इस चक्कर में आतंकी अपराध को भी धार्मिक मिथ बना दिया है। यह काम उसने इस्लाम के संदर्भ में किया है,ईसाई और सिख धर्म के संदर्भ में किया है और अब वह यह काम हिन्दू धर्म के संदर्भ में भी कर रहा है। इस क्रम में मीडिया सबसे पहले ऐतिहासिक यथार्थ को पूरी तरह नष्ट कर देता है। चीजें ऐतिहासिक तौर पर रहेंगी तो मिथ बनाने में असुविधा होती है। नया मीडिया हथकंडा है ऐतिहासिकता को नष्ट करो ,फिर मिथ बनाओ। संघ के लोग अपने इतिहास को लेकर घूम रहे हैं लेकिन उसका कोई दाम नहीं है। कोई सुनने वाला नहीं है।
    नया संसार ऐसा है जिसमें अतीत की समस्त कल्पना और फैंटेसियों का वैभव गायब हो चुका है। हिंसा और यथार्थ की समस्त पूंजी गायब है। मसलन युवाओं की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि बाबरी मसजिद किसने गिरायी, गुजरात में दंगे किसने किए,दंगा पीडित कैसे हैं इत्यादि इत्यादि। यह हिंसा और यथार्थ की पूंजी के लोप का ही परिणाम है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात का नायक है। माओवादी हीरो हैं।
    कहने का अर्थ है मौजूदा दौर में मीडिया ने यथार्थ को विभ्रम में बदल दिया है। सुदर्शन जी इस सत्य को जानते हैं। हम लाख प्रमाण दें संघ ऐसा है वैसा है,कोई सुनने वाला नहीं है क्योंकि यथार्थ का इस दौर में लोप हो चुका है। आज की वास्तविकता है यथार्थ का लोप। यथार्थ का लोप ही आज का सबसे बड़ा यथार्थ है।
    अब ऐसे बयान दिए जा रहे हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।  सुदर्शन जी के बयान की भी यही दशा है उसका सोनिया गांधी के जीवन की वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। वे जो बातें कह रहे हैं वे सब कल्पना की बातें हैं।
    ध्यान रहे यह अंतहीन मुर्दा बयानों का दौर है। मीडिया में अंतहीन मुर्दा बयानों का सिलसिला बना हुआ है। ये बयान किसी भी दल के हों,इनका अंतहीन सिलसिला बना रहेगा। अब संचार नहीं हो रहा है,अंतहीन संचार हो रहा है। मीडिया में मुर्दा बयानों की बाढ़ आयी हुई है। सुदर्शनजी का बयान भी एक मुर्दा बयान है। मुर्दा बयानों में सत्य नहीं होता।





1 टिप्पणी:

  1. अपने जन्म से ही जो काम संघ कानाफूसी के माध्यम से करता आ रहा है वह अब खुलेआम करना चाहता है।

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