रविवार, 14 नवंबर 2010

भूमंडलीकरण और विकास - 4- फिदेल कास्त्रो

28 जनवरी को जोसे मार्ती के जन्म की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर बोलते हुए मैंने अमरीका के राष्ट्रपति के कई भाषणों को उध्दृत किया था और उनका विश्लेषण किया था। अब मैं केवल कुछ पंक्तियां ही उध्दृत करूंगा जो स्वत: स्पष्ट है :
'हम युध्द के हर आवश्यक हथियार का प्रयोग करेंगे।'
'हर क्षेत्र में हर राष्ट्र को अब फैसला करना है। आप हमारे साथ हैं या आतंकवादियों के साथ।'
'यह सभ्यता का युध्द है।'
'हमारे समय की सबसे बड़ी उपलब्धि, हर समय की सबसे बड़ी आशाअब हमारा भरोसा करें।'
'और हम जानते हैं कि ईश्वर तटस्थ नहीं है।'
(20 सितंबर 2001)
'हमारी सुरक्षा के लिए आपकी सेना का रूप बदलना जरूरी हैएक ऐसी सेना जो एक क्षण की सूचना पर दुनिया के किसी भी अंधेरे कोने (...) पर आघात कर सके और अग्रिम कार्रवाई (...) के लिए तैयार हो।'
'हमें 60 या उससे अधिक देशों में आतंकवादी ठिकानों को उजागर करना है।'
'हम सही और गलत के संघर्ष में फंसे हैं।'
(वेस्ट प्वाइंट मिलिट्री एकेडमी भी 200वीं वर्षगांठ पर 1 जून 2002 को दिया गया भाषण)
'अमरीका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कहेगा कि वह इराक द्वारा दुनिया की निरंतर
अवज्ञा के तथ्य पर विचार करने के लिए 5 फरवरी को बैठक बुलाए।'
'हम सलाह लेंगे लेकिन इस बारे में कोई गलतफहमी भी नहीं रहनी चाहिए। हमारे लोगों की सुरक्षा और दुनिया की शांति के लिए यदि सद्दाम हुसैन खुद को पूरी तरह निरस्त्र नहीं करता तो हमारे नेतृत्व वाला गठबंधन उसे निरस्त्र करेगा।'
'और यदि हम पर युध्द लादा गया तो हम अमरीकी सेना की पूरी ताकत और बल के साथ लड़ेंगे।'
(5 फरवरी 2003 को कांग्रेस को संबोधन)
राष्ट्रपति बुश को विश्वास है कि ईश्वर तटस्थ नहीं है लेकिन तथ्य यह है कि पोप जॉन पॉल द्वितीय तथा दुनिया के लगभग सभी धार्मिक नेता इस युध्द के खिलाफ हैं। ईश्वर के इरादों का वास्तव में कौन खुलासा कर सकता है?
दो दिन पहले हम यहां मानवता के भविष्य पर चर्चा कर रहे थे। कुछ सोच रहे थे कि भूमंडलीकरण के बाद क्या होगा, मौजूदा विश्व आर्थिक व्यवस्था लंबी चलेगी या थोड़े दिन चलेगी। बहुत बड़े जोखिम के साथ मैं इन सवालों का जवाब देने की कोशिश करूंगा। मैंने इन पर कई बार सोचा है।
मैं अपने कुछ निजी विश्वासों के आधार पर बात करूंगा। मनुष्य इतिहास नहीं रचते। व्यक्ति अपेक्षाकृत लंबी अवधियों तक बड़ी घटनाओं में तेजी ला सकते हैं या उनमें विलंब कर सकते हैं। लेकिन वे निर्णायक तत्व नहीं हैं और न ही वे अंतिम परिणाम को रोक सकते हैं। मानव या प्रकृति के कारण हुई अत्यधिक गंभीर दुर्घटनाएं, परमाणु युध्द, पर्यावरण का तेजी से विनाश तथा जलवायु में अपेक्षाकृत अचानक परिवर्तन हमारी जाति के अत्यधिक प्रतिभाशाली भविष्यद्रष्टा के अनुमानों और भविष्यवाणी को झुठला सकते हैं। इन चीजों से अभी भी बचा जा सकता है।मानव समाज की विकास प्रक्रिया से प्राप्त वस्तुपरक तत्व वास्तव में निर्णायक तत्व होते हैं।
अर्थशास्त्र प्राकृतिक विज्ञान नहीं है। यह पूरी तरह से सटीक नहीं हो सकता। यह समाज विज्ञान है। किसी विशिष्ट सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में किसी खास समय उभरी अवधारणाएं और विचार, प्रवृत्तियां और नियम उस व्यवस्था के अंतिम चरण तक पहुंच या उसके खत्म हो जाने के बाद भी बने रहते हैं। इससे अकसर घटनाओं का सही खुलासा नहीं हो पाता। समाज विज्ञान के बारे में बैठकों या सम्मेलनों में व्यक्त विचारों और सिध्दांतों में भारी अंतर इसका प्रमाण हैं। किसी गंभीर क्रांतिकारी प्रक्रिया में की गई भारी गलतियां इसका एक और अच्छा उदाहरण हैं। मेरा मानना है कि राजनीति विज्ञान और कला दोनों का संयोग है, हालांकि वह विज्ञान के मुकाबले कला अधिक है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों ही मामलों में जिम्मेदारी मानवों पर आती है और वे इतने भिन्न और परिवर्तनीय हैं जितने कि उनकी जैविकीय बनावट में कण।
हम इतिहास से एक सबक सीख सकते हैं जिस पर मैं अकसर बल देता हूं। बड़े समाधान बड़े संकटों से ही निकल सकते हैं। इस नियम के बहुत कम अपवाद हैं।
आज हमारे सामने बहुत बड़ा आर्थिक और राजनीतिक संकट है। शायद यह सबसे पहला संपूर्ण भूमंडलीय संकट है। मौजूदा आर्थिक व्यवस्था असह्य है और टिक नहीं सकती। बड़े और मूलभूत परिवर्तनों के बगैर कोई समाधान संभव नहीं है। इस वास्तविकता को समझने के लिए यहां तथा अन्यत्र दिए गए प्रचुर आंकड़ों को दोहराने की आवश्यकता नहीं है। स्थानीय, क्षेत्रीय और गोलार्धीय संकट अब जल्दी-जल्दी आते हैं। यही इसका प्रमाण है। कोई भी अमीर या गरीब देश इस संकट से नहीं बचा है। बहुत से राजनीतिक दल पूरी से अविश्वसनीय हो चुके हैं। लोग लगातार अनियंत्रित होते जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय निकायों और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं या अत्यधिक धनी देशों के समूहों जैसे कि ग्रुप ऑफ 7 को बैठक के लिए जगह नहीं मिलती। दुनिया जिस त्रासदी में जी रही है इससे प्रभावित या उसके प्रति संवेदनशील सामाजिक आंदोलनों और संगठनों की संख्या हर जगह लगातार बढ़ रही है। आधुनिक तकनीक के कारण संदेशों को परंपरागत संचार माध्यमों की मदद के बगैर फैलाया जा सकता है।
80 करोड़ लोग अभी भी निरक्षर हैं। लेकिन अरबों लोगों को किसी न किसी माध्यम से एक निश्चित सूचना उपलब्ध है। वे बेरोजगारी, गरीबी में तेजी से वृध्दि, जमीन की कमी, खराब सेहत, असुरक्षा तथा न्यूनतम सफाई स्थितियों को तो झेल ही रहे हैं स्कूल, मकान, आत्मसम्मान और सामाजिक स्तर के अभाव से रोजाना परेशान हैं। यहां तक कि उपभोक्तावादी वाणिज्यिक विज्ञापन भी उन्हें अपनी अभावग्रस्तता और लाचारी से वाकिफ कराते हैं।
इस व्यवस्थित छलावे को जारी रखने का कोई कारण नहीं है। उन सबको मारा नहीं जा सकता। इस धरती की जनसंख्या पहले ही 6.2 अरब हो चुकी है। एक शताब्दी में उसमें चार गुना वृध्दि हुई है। तीसरी दुनिया के असंतुष्ट लोगों की जमात में विकसित देशों के पेशेवर और मध्य वर्ग से सैकड़ों शिक्षित मजदूर तथा स्त्री-पुरुष शामिल हो गए हैं जो अपने और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में अधिकाधिक चिंतित होते जा रहे हैं क्योंकि वे प्राकृतिक साधनों के गैर जिम्मेदाराना और अंधाधुंध इस्तेमाल के फलस्वरूप हवा, पानी, पौधों को विषाक्त होते और हर सुंदर चीज को गायब होते हुए देख रहे हैं। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानव अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।
इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि मानवता को अपना रास्ता बदलना होगा। यह कैसे बदलेगा? राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन के नए रूपों को कैसे अंगीकार किया जाएगा? यह सबसे मुश्किल सवाल है। इससे मैं अंतिम विचार पर पहुंचा हूं जिसे मैं आपके सामने अभिव्यक्त करना चाहता हूं।
इस मामले में व्यक्ति पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे।
इसलिए उनके पास सूचना होनी चाहिए और उन्हें सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। सूचना के प्रसार, वाद-विवाद को बढ़ावा देने और जागरूकता पैदा करने की जिम्मेदारी उन्नत लोगों पर होनी चाहिए। पोर्टो अलेग्रे में वर्ल्ड सोशल फोरम संघर्ष के नए तरीकों का उत्साहजनक उदाहरण है। वहां चिंतन तथा विचार-विमर्श के लिए जमा एक लाख लोग उभरती हुई ताकतों के बारे में झलक प्रस्तुत करेंगे और दुनिया में वस्तुपरक ढंग से लाए जाने वाले परिवर्तनों को आगे बढ़ाएंगे।

क्यूबा में हम इसे विचारों का संघर्ष कहते हैं। हम तीन साल और दो महीने से पूरी तरह से इस संघर्ष में लगे हैं। इसके परिणामस्वरूप 100 से अधिक सामाजिक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनमें से अधिकांश शिक्षा, संस्कृति, ज्ञान के प्रसार, स्कूल व्यवस्था में क्रांति, व्यापक राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर सूचना के प्रसार, सामाजिक कार्य, उच्च शिक्षा के लिए अधिक अवसर, हमारी सर्वाधिक जरूरी सामाजिक समस्याओं का गहराई से पता लगाने और उनके कारण तथा समाधान ढूंढ़ने के कार्य में लगे हैं। हमारा ध्येय है कि पूरी आबादी को व्यापक सामान्य ज्ञान और संस्कृति प्राप्त हो जाए जिसके अभाव में विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त व्यक्ति को भी व्यावहारिक दृष्टि से निरक्षर ही कहा जाएगा।
हमारी योजनाएं बहुत महत्वाकांक्षी हैं लेकिन हम उनके परिणामों से बहुत प्रोत्साहित हुए हैं।
दुनिया में बहुत बड़े आर्थिक संकट के बावजूद हमारे देश में बेरोजगारी घटकर 3.3 प्रतिशत रह गई है। वर्ष के अंत तक इसके घटकर 3 प्रतिशत रह जाने का उम्मीद है। इससे हमें पूर्ण रोजगार वाला देश होने का दर्जा मिल जाएगा।
बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष में संभवत: सर्वाधिक उपयोगी योगदान विनम्रतापूर्वक यह दिखाना होगा कि यदि समाज के सभी मानव और भौतिक संसाधन लोगों की सेवा में लगा दिए जाएं तो बहुत थोड़े से बहुत कुछ किया जा सकता है।
प्रकृति को नष्ट नहीं किया जा सकता तथा गले-सड़े, फिजूलखर्च उपभोक्ता समाजों को बचाया नहीं जा सकता। एक ऐसा क्षेत्र है जहां अनंत दौलत पैदा की जा सकती है वह है ज्ञान, संस्कृति और कला का क्षेत्र जिसमें शामिल हैं अध्यवसायी, नैतिक, सौंदर्यात्मक और भाईचारे पर आधारित शिक्षा, एक पूरा बौध्दिक जीवन जो सामाजिक तौर पर सुदृढ़ बौध्दिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हो। इसके बगैर जीवन की गुणवत्ता की बात करना निरर्थक होगा।
क्या कोई हमें इन ध्येयों को प्राप्त करने से रोक सकता है?
हम अपनी इस घोषणा को सिध्द कर देना चाहते हैं कि बेहतर दुनिया संभव है!
मानवता द्वारा अपना इतिहास खुद लिखे जाने का समय आ गया है!




                         

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