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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

केदारनाथ अग्रवाल जन्म शताब्दी के मौके पर विशेष- फगुआ के दो व्यंग्य



मैना-

गुम्बज के ऊपर बैठी है,कौंसिल घर की मैना।

सुंदर सुख की मधुर धूप है,सेंक रही है डैना।।

तापस वेश नहीं है उसका ,वह है अब महारानी।

त्याग-तपस्या का फल पाकर, जी में बहुत अघानी।।

कहता है केदार सुनो जी ! मैना है निर्द्वंद्व।

सत्य-अहिंसा आदर्शों के, गाती है प्रिय छंद।।
 जनरक्षा-
आजादी है:जनता-रक्षा का हौआ एक बनाओ। 
सभी जनों को हड़ताली कह,जल्दी जेल पठाओ।। 
टाटा,बिड़ला,डालमिया को,भुज-बंधन में भेंटों। 
गोली,आंसू -गैस मारकर,मजदूरों को मेटो।। 
कहता है केदार सुनो जी ! तुम भी बेचो त्याग। 
भेष बदलकर जी भर खेलो,आजादी का फाग।।


गुरुवार, 17 मार्च 2011

केदारनाथ अग्रवाल जन्म शताब्दी के मौके पर उनकी छह कविताएं

छह छोटी कविताएँ

[१]

चली गयी है कोई श्यामा
आँख बचाकर, नदी नहाकर
काँप रहा है अब तक व्याकुल
विकल नील जल।

[
२]
इकला चाँद
असंख्यों तारे,
नील गगन के
खुले किवाड़े.
कोई हमको
कहीं पुकारे
हम आयेंगे
बाँह पसारे।

[
३]
न इश्क
न हुस्न
गये हैं दोनों बाहर
अवमूल्यन में
कर्ज़ चुकाने

[
४]
छूट गयी 'बस'
रह गया मैं
पाँव पर खड़ा,
चाकू-सा
खुला दिन
मेरी देह में गड़ा।

[
५]
हे मेरी तुम !
पेड़
न फूले--
नहीं हँसे
खड़े हुए हैं मौन डसे ।

[
६]
हे मेरी तुम !
कुछ न हुआ, अब
बूढ़ा हुआ सुआ ।
पखने हुए भुआ ।
देखो,
काल ढुका ;
मन सहमा;
तन काँपा, और झुका ।

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रविवार, 13 मार्च 2011

अज्ञेय और समीक्षा का स्टीरियोटाइप


       कोलकाता में साहित्यकारों पर सुंदर आयोजन होते हैं। लेकिन मूल्यांकन केजुअल और स्टीरियोटाइप होता हैं। यहां लेखक का खूब स्वागत होता है,जलसे खूब होते हैं,लेकिन विचारों और मूल्यांकन के मामले में कभी कोई नयी बात नहीं उठती। बाहर से आने वाले विद्वान कोलकाता में केजुअल बोलते हैं,वैसे वे अब सब जगह केजुअल ही बोलते हैं। या किताबी बोलते हैं। यह फिनोमिना हाल में स.ही.वा.अज्ञेय के जन्मशती वर्ष पर आयोजित एक सुंदर कार्यक्रम में दिखाई दिया। किसी साहित्यकार पर किताबी और अप्रासंगिक बातें बोलने का अर्थ है हवा में बोलना। यह वैसे ही है जैसे अंधा कुत्ता हवा पर भूँकता है।
   हमारे समालोचक सिर्फ बोलने के लिए बोलते हैं ऐसी अवस्था में वे साहित्य की दुर्गति के साथ श्रोताओं की दुर्गति भी करते हैं। इन लोगों के कारण साहित्य शिक्षा की स्थिति तीन-तेरह की हो गयी है। अज्ञेय  और अन्य हिन्दी के लेखकों की शताब्दी पर बोलने वाले वक्तागण चिकने और गोलमटोल शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। इनके पास बताने के लिए कोई नया विचार नहीं होता,वे किसी नए रंग या पहलू का उदघाटन नहीं करते। इस तरह के समारोहों में भाग लेने वाले एक ही टोली के सदस्य हैं और यही टोली सभी साहित्यकारों से संबंधित आयोजनों पर मंचों की शोभा बढ़ा रही है। इस तरह के आयोजनों और बी.ए. -एम.ए. की कक्षा में अंतर नहीं है । लेखक के बारे में स्टीरियोटाइप बोलना,भावुक होकर बोलना,किताबी बोलना ये सब साहित्य ढ़ोंग है,पाखण्ड है । सेमीनार विचार-विमर्श का मंच हैं। साहित्य ढ़ोंग की जगह नहीं है। इस तरह के आयोजनों में उत्सवधर्मिता हावी है,विचार गायब हैं,नया मूल्यांकन गायब है। यह बाजार रीतिवाद है।
    अज्ञेय के बारे में दो बातें उल्लेखनीय हैं। ये दोनों बातें कविवर त्रिलोचन ने कही हैं। त्रिलोचन ने कहा है 'आधुनिक कविता का पहला संकलन है 'तारसप्तक' ।' यदि आधुनिक कविता का यह पहला संकलन है तो आधुनिक काव्य का नया अर्थ भी यहां पर होगा ? उल्लेखनीय है आरंभ में नामवर सिंह तारसप्तक को कचरा मानते थे। इस पर त्रिलोचन ने नामवर सिंह को सलाह दी थी कि तारसप्तक को ढ़ंग से पढ़ो। त्रिलोचन ने लिखा है ,"उन्होंने 'तारसप्तक' को बोधपूर्वक पढ़ा था। मेरे कहने पर जब उन्होंने भावपूर्वक पढ़ा तो बात खुलने लगी। अर्थात् यह संभव है कि मजाक बनाते बनाते कोई तदाकार हो सकता है। भृंगी कीट जिस कीड़े के चारों ओर चक्कर लगाता है,वह वैसा ही हो जाता है।" यह बात त्रिलोचन ने 28 मार्च 1968 में एक व्याख्यान कही थी। इन दिनों सेमीनारों में वक्तागण तदाकार होने की बात तो दूर रही संतुलन और बौद्धिक विवेक से भी काम नहीं ले रहे हैं।
       त्रिलोचन ने दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कही है कि आधुनिक कविता का पैमाना यह है कि वह छायावाद से अपने को कितना मुक्त करती है। 'तारसप्तक' में छायावाद का प्रभाव है लेकिन अज्ञेय ने सचेत रूप से अपने को छायावादी भावबोध से अलगाया है । त्रिलोचन का मानना है 'रूपाभ' से आधुनिकता शुरू होती है। आधुनिकता की गति अलग है वह किसी खास क्षण से शुरू नहीं होती। अज्ञेय पर आधुनिकतावादी होने का आरोप लगाया जाता है। यह बात आधुनिकता को सही परिप्रेक्ष्य में समझे बिना कही जा रही है। त्रिलोचन के शब्दों में 'आधुनिकता उस नए चरित्र को उभारती है जो समवर्ती जीवन में मिलता है।' अज्ञेय ने अपनी रचनाओं में आयातित आधुनिकता का चित्रण नहीं किया है। उनके यहां आधुनिकता की पहचान पूंजीवादी व्यवस्था के साथ जुड़ी हुई है। हिन्दी के अधिकांश समीक्षक आधुनिकता को पूंजीवाद के साथ जोड़कर नहीं देखते। उनके यहां पूंजीवाद का गंभीर विवेचन नहीं मिलता।
    अज्ञेय का सामाजिक सत्य के प्रति आग्रह था और अपनी रचनाओं के प्रति आत्मविश्वास था। वे अतीत के बोझ से एकदम मुक्त थे। यही चीज उन्हें कम्प्लीट आधुनिक लेखक बनाती है। यह चीज उनसे सीखनी चाहिए। अनेक आलोचक और शिक्षक अतीत की गठरी सिर पर रखकर कक्षाओं में जाते हैं और साहित्य के प्रति अरूचि पैदा करते हैं। साहित्य के पठन-पाठन का अर्थ अतीत का बोझ ढ़ोना नहीं है। अतीत के बोझ से साहित्य और व्यक्ति जितना मुक्त होगा उसके उतने ही आधुनिक होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
        दूसरा सवाल है कवि -आलोचक-शिक्षक-साहित्यकार बंधनों से कितना मुक्त है ? हिन्दी में कवि-लेखक -आलोचक इतने बंधनों में बंधे हैं कि उनसे निर्बंध रचना और आलोचना की उम्मीद ही नहीं कर सकते। जिस तरह एक अच्छी रचना के लिए लेखक के अंदर असंतोष का होना जरूरी है वैसे ही एक सेमीनारिस्ट के अंदर असंतोष का होना जरूरी है। असंतोष के बिना आप अच्छा और नया बोल नहीं सकते। भावुक प्रस्तुतियां,प्रशंसात्मक प्रस्तुतियां,भांडशैली की वक्तृता अंततः साहित्य का वातावरण नष्ट करती है ।
    वक्ता और लेखक में असंतोष तब पैदा होता है जब उसे जीवन की विषमताएं परेशान करती हैं। यह परेशानी जितनी गहरी होगी उतना ही उदगारों में बेचैनी और नयापन आएगा। सेठाश्रयी और सरकारश्रयी समारोहों में लोग बेचैन होकर नहीं बोलते। उनमें सामाजिक उद्विग्नता नहीं होती फलतः नए विचारों की सृष्टि नहीं होती।      
    अज्ञेय को एक जमाने में क्षणवादी-आधुनिकतावादी-अस्तित्ववादी कहा गया और यह सब काम हुआ शीतयुद्ध की राजनीति के तहत। शीतयुद्ध के दौरान बहुत कुछ समीक्षा ने गलत-सलत सोचा था। उसमें हिन्दी समीक्षकों का अज्ञेय पर लिखा भी आता है आज उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है,वह आलोचना का कचरा है।
   अज्ञेय ने 'अलगाव' पर सबसे ज्यादा लिखा है। आलोचना की त्रासदी यह है कि उसने 'अलगाव' को कभी आधुनिक पूंजीवादी फिनोमिना के रूप में नहीं देखा। यह पूंजीवादी विकास प्रक्रिया का सकारात्मक और स्वाभाविक फिनोमिना है। इसका आधुनिक राष्ट्र के साथ गहरा संबंध है। आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ 'जीवन का निजीकरण' होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' पैदा होती है। ये सारी चीजें एक विशिष्ट ऐतिहासिक अवस्था की देन हैं। प्राचीनकाल में अलगाव का आदर्शकवि कालिदास है और अलगाव का आदर्श रस श्रृंगार रस का साहित्य है। प्राचीन साहित्य में अलगाव का जिस तरह का महिमामंडन कालिदास के यहां है वैसा अन्यत्र कहीं नहीं है। कालिदास ने ऐसे नायक को पेश किया जो सर्वगुण सम्पन्न है। आनंद में मगन है। आनंद को व्यक्त करता है। कालिदास के पात्र जो कुछ करते हैं ,अपने लिए करते हैं। कालिदास के नायक प्रेम करते हैं अपने लिए ,युध्द करते हैं अपने लिए, अकेले ही सारी मुसीबतों का सामना करते हैं। एक तरह से समूची सृष्टि के साथ संघर्ष करते हैं।
प्राचीनकालीन समाज में रची गई रचनाओं को अलगाव के साथ सबसे पहले जोड़कर कार्ल मार्क्स ने देखा था। कार्ल मार्क्स ने अपनी डाक्टरेट थीसिस से विकास किया था। उसने एपीक्यूरियन कवियों को 'रोम के नायक कवि' की संज्ञा दी थी। यही स्थिति हमारे कालिदास की है। उन पर कभी अलगाव की अवधारणा की रोशनी में विचार नहीं किया गया। कालिदास ऐसा कवि है जिसका सभी चीजों से संघर्ष होता है और सभी चीजें नायक के साथ युध्द करती नजर आती हैं। कालिदास के पात्र आरंभ से ही अपने बारे में सोचते हैं, अपने लिए संघर्ष करते हैं और आनंद लेते हैं। अपने लिए संघर्ष करना और आनंद मनाना यही अलगाव की धुरी है। वह स्वयं के प्रति कठोर है, इनके सामने प्रकृति अपनी सारी अच्छाईयां खो देती है, अच्छाईयों के लिए शब्द अधूरे लगते हैं। अच्छाईयों के लिए शब्द नहीं मिलते।
      एपीक्यूरियन कवियों का नारा था ''वार ऑफ ऑल अगेंस्ट ऑल।'' यानी ''सबके खिलाफ और सबके लिए जंग।'' यही नारा भारत के प्राचीन कवियों का भी था। प्राचीन कवियों के यहां जीवन और आनंद के बीच अंतराल नहीं था। सारी चीजें शरीर में केन्द्रित थीं। शरीर प्रमुख विमर्श था। श्रृंगार का समूचा विमर्श शरीर और आनंद का विमर्श है। रस का सारा विमर्श शरीर को केन्द्र में रखता है। नख-शिख वर्णन में उसे सहज ही देखा जा सकता है। नायक का शरीर कैसा है, आंखें कैसी हैं, पीड़ा कैसी है, चिन्ताधारा कैसी है और नायक जब चिन्ता में घिरा होता है तो कैसे कृशकाय हो जाता है और जब नायक युध्दरत होता है तो उसकी भंगिमाएं,शारीरिक सौष्ठव किस तरह का होता है ? इसी तरह नायिका जब कृति में आती है तो सारी ऊर्जा उसके शरीर के सौंदर्य वर्णन पर ही खर्च की गई। कहने का तात्पर्य यह कि प्राचीन कवि 'स्व' से बेहद प्यार करता है। शरीर से बेहद प्यार करता है। प्राचीन महाकाव्यों में निज के बहाने ,शरीर और उसके आनंद की सृष्टि पर जोर है। शरीर का विमर्श अलगाव का विमर्श है। भगवान के बारे में भी जब कवि रूपायन करने बैठा तो शरीर ही प्रमुख विषयवस्तु था। शरीर,स्व,आनंद और निजता ये चार चीजें हैं जो अलगाव के कारण कृति के केन्द्र में आयीं। अन्तर्विरोधों के बिना इन चारों चीजों का विकास संभव नहीं है।ये चार चीजें अज्ञेय के लेखन में भी प्रमुख हैं।
    लेखक के अस्तित्व की परिस्थितियां उसका जीवन से अलगाव पैदा करती हैं। अलगाव के कारण लेखक बाहरी चीजों को आत्मसात करता है और अपने अलगाव को अभिव्यक्त करता है। इस क्रम में वह अपने अस्तित्व के रूपों से स्वायत्त नजर आता है। परम नजर आता है। मार्क्स के शब्दों में यह 'अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता' है।
मार्क्स ने प्राचीन काल में अलगाव को उत्पत्तिपरक रूप में विश्लेषित करते हुए ' पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता' और '' अमूर्त व्यक्तिनिष्ठता'' की चर्चा की है। मार्क्स के अनुसार आधुनिक राष्ट्र के उदय के साथ यह धारणा नकारात्मक नहीं रह जाती बल्कि सकारात्मक हो जाती है। सकारात्मक शक्ति बन जाती है। सकारात्मक का अर्थ है 'वास्तव' और 'अनिवार्य'। इसके लिए किसी नैतिक स्वीकृति की जरूरत नहीं है। इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति का आधुनिक राष्ट्र में 'आत्मकेन्द्रित' रूप में विकास होता है। 'पृथक्कृत व्यक्तिनिष्ठता ' के लिए आधुनिक राष्ट्र स्वाभाविक परिस्थितियां पैदा करता है।
      अलगाव का आधार है 'आत्मकेन्द्रिकता' ,इसका '' सबके खिलाफ और सबके लिए जंग'' की धारणा से गहरा संबंध है। इस धारणा के आधार पर आंतरिक वैधता ,प्रकृति के सार्वभौम नियमों की वैधता और आंतरिक अनुभूति को महत्वपूर्ण माना गया। आधुनिक समाज व्यक्ति को अपने साथ एकीकृत नहीं करता, कुछ तो यह संयोग की बात है और कुछ व्यक्तिगत प्रयासों के ऊपर भी निर्भर करता है। मार्क्स ने लिखा है बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सुख भोगता है। राजनीतिक अर्थ में बुर्जुआ समाज में व्यक्ति अपने को राष्ट्र से पृथक् कर लेता है। अपनी निजी अवस्थाओं को राष्ट्र से अलग कर लेता है। जहां उसकी मनुष्य,राष्ट्र,,समुदाय और मानवीय निर्धारणकर्त्ता के रूप में महत्ता उद्धाटित होती है। व्यक्ति के अन्य गुण सामने आते हैं और वे उसके अस्तित्व को निर्धारित करने में मदद करते हैं। मार्क्स के अनुसार मनुष्य का व्यक्ति के रूप में अस्तित्व बुनियादी तत्व है। बुर्जुआ समाज में व्यक्तिवाद और व्यक्तिगत अस्तित्व ही अंतिम सत्य है। बाकी सब चीजें जैसे श्रम,गतिविधियां बगैरह इसके साधन हैं। बुर्जुआ समाज में वास्तव आदमी निजी व्यक्ति (प्राइवेट इण्डिविजुअल) होता है। यह ऐसा व्यक्ति है जो मूलत: बाहरी और भौतिक है।
   अनेक समीक्षकों ने अज्ञेय की कृतियों में लेखक के निजी जीवन को खोज लिया है,दूसरी ओर पाठक उनकी रचनाओं में अपने जीवन के पहलुओं को खोज रहे हैं। साहित्य पढ़ने का यह तरीका गलत है।
सआदत हसन मंटो ने साहित्य के बारे में लिखा है अदब एक फ़र्द(आदमी) की अपनी जिंदगी की तस्वीर नहीं। जब कोई अदीब कलम उठाता है तो वह अपने घरेलू मामलात का रोजनामचा पेश नहीं करता। वह अपनी ज़ाती ख्बाहिशों,खुशियों,रंजिशों ,बीमारियों और तंदुरूस्तियों का जिक्र नहीं करता।उसकी कलमी तस्वीरों में,बहुत मुमकिन है,आँसू उसकी दुखी बहन के हों,मुसकराहटें आपकी हों और क़हक़हे एक खस्ताहाल मज़दूर के। इसलिए अपनी मुसकराहटों,अपने आँसुओं और अपने क़हक़हों की तराज़ू में उन तस्वीरों को तोलना बहुत बड़ी ग़लती है।









                   


रविवार, 21 नवंबर 2010

अज्ञेय जन्म शताब्दी वर्ष पर विशेष- बलाओं की मां है साम्प्रदायिकता

    स.ही.वा.अज्ञेय हिन्दी के बड़े साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिष्ठा उनमें भी है जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं। अज्ञेय के बारे में प्रमुख समस्या है कि उन्हें किस रूप में याद करें ? क्या उन्हें धिक्कार और अस्वीकार के साथ देखें ? क्या वे सचमुच में ऐसा कुछ लिख गए हैं जिसके कारण उन्हें याद किया जाए ?
    मेरे मन में अज्ञेय को लेकर लंबे समय से कई सवाल उठते रहे हैं मसलन् क्या एक व्यक्ति मार्क्सवाद में दीक्षित होने के बाद उसके प्रभाव से मुक्त हो जाता है ? क्रांतिकारी अज्ञेय और आधुनिकतावादी अज्ञेय में ऐसे कौन से तत्व हैं जिनसे हम सीख सकते हैं ? हिन्दी के समीक्षकों ने अज्ञेय के साथ क्या न्याय किया है ? क्या क्रांतिकारी अज्ञेय का लेखन आज के दौर में हमारी कोई मदद कर सकता है ?
   मुझे अज्ञेय इसलिए पसंद हैं कि वे साहित्य को अभिव्यक्ति नहीं संप्रेषण मानते हैं। हिन्दी के अधिकांश आलोचकों ने साहित्य को अभिव्यक्ति माना है। अज्ञेय ने संप्रेषण माना है। अज्ञेय ने लिखा है-‘‘ मैंने हमेशा माना है कि रचना का पहला धर्म अभिव्यक्ति नहीं है,संप्रेषण है।’’ साहित्य को संप्रेषण मानने का अर्थ है उसे कम्युनिकेशन के रूप में देखना। यह साहित्य का विकसित नजरिया है।
    एक और महत्वपूर्ण बात है जो अपील करती है वह है लेखक के नाते उनका यह कहना कि कहानी लेखन मुझे इसलिए बंद करना पड़ा ,क्योंकि कहानी लिखने से अर्थवत्ता का एहसास नहीं हो रहा था।
    संप्रेषण के लिए उन्हें जब कहानी नाकाफी लगने लगी तो उन्होंने कहानी लिखना बंद कर दिया।  उन्हें जो नजरिया नाकाफी लगा उसे छोड़ दिया। वे आज के तमाम हिन्दी लेखकों की तरह नहीं हैं जो किसी नजरिए से इसलिए चिपके हैं क्योंकि उन्हें उससे प्यार है,पुराना संबंध है,विचारधारात्मक लगाव है,लेकिन व्यवहार में उसे नहीं लागू करते।
    ऐसे ढ़ेर सारे लेखक हैं जिनके नजरिए ,साहित्य और जीवन में महा-अंतराल है। अज्ञेय इस अर्थ में बड़े लेखक हैं कि वे जिस विचार को मानते थे उसे व्यवहार में, साहित्य में ,पत्रकारिता में उतारने की क्षमता भी रखते थे।
   अज्ञेय के नजरिए के दो छोर हैं ,पहला है अर्थवत्ता, और दूसरा है संप्रेषण। अर्थवत्ता की तलाश में उनको विचारधारात्मक रूपान्तरण करना पड़ा और संप्रेषण के लिए विधा रूपों में नए प्रयोगों की ओर जाना पड़ा।
    अज्ञेय लिखने के लिए लिखने में विश्वास नहीं करते थे। विचारधारात्मक आग्रहों के आधार पर नहीं लिखते थे बल्कि संप्रेषण के लिए लिखते थे। लेखन को संप्रेषण मानना बड़ी उपलब्धि है और यह हिन्दी की पहली और दूसरी परंपरा से भिन्न परंपरा है। संप्रेषण पर जोर देने का अर्थ है समाज और पाठक को केन्द्र में रखकर लिखना। उसे साथ लेकर चलना।
     अज्ञेय उन चंद लेखकों में हैं जो मौजूदा दौर की बेहतर समझ रखते थे। सामयिक यथार्थ को ज्यादा गहराई से पहचानते थे। उन्होंने लिखा है- ‘‘ जानकारी हासिल करने के (या जानकारी को विकृत करके जबरन वह विकृति स्वीकार कराने के ) साधन लगातार ऐसे लोगों के दृढ़तर नियंत्रण में चले जा रहे हैं जिन पर हमारा नियंत्रण लगातार कमजोरतर होता जा रहा है। यहां तक कि स्वयं हम कहां खड़े,और जिस युग अथवा काल-खंड में जी रहे हैं वह वास्तव में क्या है ,उससे हमारा रिश्ता क्या अथवा कैसा है ,यही पहचानना हमारे लिए दिन-प्रतिदिन कठिनतर होता जा रहा है। ’’
   अज्ञेय का मुझे अच्छा लगने का एक और कारण है उनका साम्प्रदायिकता और अधिनायकवाद विरोधी नजरिया। इस प्रसंग में मुझे उनकी एक कहानी ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई -भाई’ याद आ रही है। यह छोटी बड़ी शानदार कहानी है। इस कहानी में मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बेपर्दा किया गया है। पूरी कहानी का ढ़ांचा एकदम धर्मनिरपेक्ष है। इस कहानी के आरंभ में अज्ञेय ने साम्प्रदायिकता को ‘डर’ और 'छूत' की बीमारी कहा है। लिखा है डर ‘‘बला नहीं बलाओं की माँ है।’’ ..‘‘ जहां डर आता है,वहां तुरंत घृणा और द्वेष और कमीनापन आ घुसते हैं, और पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन कौन-सी दबी हुई व्याधियां !’’
अज्ञेय ने जिस तरह मुस्लिम साम्प्रदायिकता को नंगा करते हुए ‘मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई’ कहानी लिखी थी। उसी तरह हिन्दू साम्प्रदायिकता को निशाना बनाते हुए ‘रमंते तत्र देवता’ कहानी लिखी थी। इन दोनों कहानियों में रेखांकित किया गया है कि किस तरह दोनों ही रंगत की साम्प्रदायिकता  ने औरतों को निशाना बनाया है। यह कहानी 1946 के कलकत्ता में हुए दंगों पर लिखी गयी है। उस समय कोलकाता कैसा था इस पर अज्ञेय ने लिखा ‘‘शहर बहुत से छोटे-छोटे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में बंट गया था। जिनकी सीमाओं की रक्षा पहरेदार नहीं करते थे, लेकिन जो फिर भी परस्पर अनुल्लंघ्य हो गए थे। लोग इसी बंटी हुई जीवन-प्रणाली को लेकर भी अपने दिन काट रहे थे।’’
   इसी कहानी में एक अन्य जगह लिखा है ‘‘ नफ़रत के एक-एक बीज से हमेशा सौ-सौ जहरीले पौधे उगे हैं। नहीं तो यह जंगल यहां उगा कैसे ,जिसमें आज हम-आप खो गए हैं और क्या जानें निकलेंगे कि नहीं ? हम रोज़ दिन में नफ़रत का बीज बोते हैं और पौधा फलता है तो चीखते हैं कि धरती ने हमारे साथ धोखा किया !’’   
                 

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

प्रधानमंत्री सुनो हिन्दी का कॉमनवेल्थ गेम वर्धा में चल रहा है

     हिन्दी के उत्थान के नाम पर सार्वजनिक तौर पर जो कुछ हो रहा है उसकी सामाजिक समीक्षा की सख्त जरूरत है। हिन्दी के नाम पर सरकारी स्तर पर बहुत सारे अपव्यय और अगंभीर अकादमिक कार्य हो रहे हैं। इनमें दो संस्थान खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। एक है केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ,आगरा और दूसरा है महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा।
    इन दोनों संस्थानों का लाखों का बजट है और इसका बहुत बड़ा हिस्सा हिन्दी बौद्धिकों के समागम के नाम पर फिजूल खर्च होता रहता है। हाल ही में कवि चतुष्टयी के नाम पर हिन्दी के तकरीबन 40 विद्वानों को बुलाया गया था और सेमीनार में वक्ताओं को मुश्किल से 5-10 मिनट का समय मिलाथा। हो सकता है कुछ लोग ज्यादा भी बोले हों। समस्या यह नहीं है कि इन लोगों को क्यों बुलाया गया समस्या यह है कि क्या विषय के जानकारों को बुलाया गया था ?
    विश्वविद्यालय के उपकुलपति को कम से कम सार्वजनिक तौर पर यह बताना चाहिए कि जिन विद्वानों को बुलाया गया उनमें से कितने हैं जिन्होंने संबंधित विषय से जुड़े किसी भी पहलू पर पांच शोधपत्र भी लिखे हैं ? कुछ विद्वान तो ऐसे हैं जिन्होंने दस-बीस साल में कोई काम कवि चतुष्टयी (नागार्जुन,अज्ञेय,केदारनाथ अग्रवाल,शमशेर,फैज) पर नहीं किया है। हो सकता है हमारी अज्ञानता हो लेकिन उनके कामों के बारे में सार्वजनिक सूचनाएं दी जाएं। यह कैसे हो सकता है कि जिस व्यक्ति को विश्वविद्यालय बोलने के लिए हजारों रूपये खर्च करके बुला रहा है उसने अपने जीवन में संबंधित विषय पर एक भी महत्वपूर्ण निबंध नहीं लिखा,गंभीर शोध कार्य नहीं किया। ऐसे विद्वानों को इतनी बड़ी तादाद में बुलाने का अर्थ क्या है ?
     विश्वविद्यालय के उपकुलपति कम से कम वक्ताओं के शोधपूर्ण लेखन का महत्वपूर्ण पक्ष जनहित में जरूर जारी करेंगे। इस समारोह में बुलाए गए अधिकांश विद्वानों ने कोई भी उल्लेखनीय काम कवि चतुष्टयी पर नहीं किया है। यह हिन्दी के नाम पर अपव्यय है और सार्वजनिक धन की लूट है। किसी भी कीमत पर ऐसी हरकतों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कुछ समय पहले इसी विश्वविद्यालय ने लेखकों का एक बड़ा जमावड़ा किया था जिसमें 130 से ज्यादा विद्वान बुलाए गए थे। ये लोग क्यों आए और इन लोगों ने मिलने-जुलने,मार्ग व्यय और भत्ते-दक्षिणा के अलावा क्या किया कोई नहीं जानता। कहने का अर्थ यह है कि हिन्दी के नाम पर वर्धा में कॉमनवेल्थ गेम हो रहा है । सवाल उठता है वर्धा वाले कॉमनवेल्थ गेम के मार्ग पर क्यों चल पड़े हैं ? कोई उनसे सवाल नहीं पूछता कि आखिरकार सार्वजनिक धन का दुरूपयोग क्यों कर रहे हो भाई?
                           

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

श्रेष्ठताः विभ्रम या नरक


           ( हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर)
      राजकिशोर जी का वर्धा की कवि चतुष्टयी संगोष्ठी पर आलेख देखकर यह तो पता चल गया कि हिन्दी साहित्य में श्रेष्ठता और श्रेष्ठत्व के भूखों का अभी भी अकाल नहीं पड़ा है । (http://mohallalive.com ) इससे यह भी पता चला कि हिन्दी में आधुनिकतावाद बचा है। यह सिद्ध होता है कि हिन्दी के नामी-गिरामी लोगों पर नागार्जुन-शमशेर-केदार की तुलना में अज्ञेय का गहरा असर है। वर्धा का वातावरण जैसाकि राजकिशोर जी ने लिखा है श्रेष्ठतामय था। यह अज्ञेय की जीत है।
     महात्मा गांधी विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी की खबर है कि वहां श्रेष्ठों का संगम हुआ था और श्रेष्ठों को ‘‘ सूर्य की रश्मियों का पूरा स्पेक्ट्रम’’ कहा है राजकिशोरजी ने। इससे कम से कम अज्ञेय की आत्मा को शांति जरूर मिलेगी। हिन्दी में श्रेष्ठता के लेखक के रूप मे अज्ञेय विख्यात हैं। पता नहीं नामवरजी को कैसा लग रहा होगा जब कोई वरिष्ठ पत्रकार और ऐसा पत्रकार जिसके समाजवादी विवेक का हिन्दी जगत लोहा मानता हो। ऐसा पत्रकार जिसने सारी जिंदगी श्रेष्ठों और श्रेष्ठियों के खिलाफ लिखा हो,उसके लेखन में श्रेष्ठता का जयगान नामवरजी को कैसा लग रहा होगा ?
    मैं जहां तक नामवरजी को जानता हूँ वे श्रेष्ठता से नफरत करते हैं, वे महानता से भी घृणा करते हैं। यह बात दीगर है कि उनके भक्त उन्हें कुछ भी बनाने पर तुले हैं। राजकिशोरजी ने लिखा है मैंने ‘‘पहली बार लक्ष्य किया कि श्रेष्ठता के संपर्क में आने पर हम कैसे अचानक थोड़ा ऊपर उठा अनुभव करने लगते हैं।’’
  अरे भाई हिन्दी के प्रोफेसरों को काहे को पोदीना के पेड़ पर चढ़ाए दे रहे हैं। वे अगर श्रेष्ठ होते तो हिन्दी के प्रोफेसर नहीं होते कुछ और होते। हिन्दी के प्रोफेसरों के बारे में मुक्तिबोध ने लिखा था -''बटनहोल में प्रति‍नि‍धि पुष्‍प लगाए एक प्रोफ़ेसर साहि‍त्‍यि‍क से रास्‍ते में मुलाकात होने पर पता चला कि हि‍न्‍दी का हर प्रोफेसर साहि‍त्‍यि‍क होता है। अपने इस अनुसन्‍धान पर मैं मन ही मन बड़ा खुश हुआ। खुश होने का पहला कारण था अध्‍यापक महोदय का पेशेवर सैद्धान्‍ति‍क आत्‍मवि‍श्‍वास। ऐसा आत्‍मवि‍श्‍वास महान् बुद्धि‍मानों का तेजस्‍वी लक्षण है या महान् मूर्खों का दैदीप्‍यमान प्रतीक ! मैं नि‍श्‍चय नहीं कर सका कि वे सज्‍जन बुद्धि‍मान हैं या मूर्ख ! अनुमान है कि वे बुद्धि‍मान तो नहीं, धूर्त और मूर्ख दोनों एक साथ हैं।'’ मेरे ख्याल से हिन्दी प्रोफेसरों के बारे में मुक्तिबोध सटीक बात कह रहे हैं।  
    श्रेष्ठता सामाजिक जीवन का सबसे बड़ा विभ्रम है,छल है। इसके प्रभाव के कारण यथार्थ नजर नहीं आता। यही वजह है श्रेष्टों का संसार वास्तव संसार से कटा होता है। 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

नागार्जुन जन्मशती पर विशेष -कश्मीर में मात खाएँगे हिन्दी पंडित,पाकिस्तानी पीर

                      (जनकवि बाबा नागार्जुन)
           कश्मीर में लंबे समय से अशान्ति चल रही है। पाकिस्तान और उसके अनुयायी पृथकतावादी संगठन एक ओर हैं तो दूसरी ओर हिन्दुत्ववादी संगठन हैं,बीच में कहीं तीसरा धड़ा धर्मनिरपेक्ष काश्मीरियों का है जो कश्मीर की रक्षा किए हुए हैं और उनके कारण ही आज कश्मीर भारत का हिस्सा है वरना हिन्दू साम्प्रदायिक ताकतें और फंडामेंटलिस्ट-पृथकतावादी अपने-अपने तरीकों से जम्मू-कश्मीर को बांट चुके होते।
    जो लोग नागार्जुन के बारे में बातें कर रहे हैं उनसे सम-सामयिक सवालों पर स्टैंड लेने के लिए कहा जाना चाहिए। बाबा की कविता का मामला साहित्य का मामला नहीं है। यह समाज और राष्ट्र का मामला भी है। बाबा नागार्जुन के पास कश्मीर को लेकर एक समझ थी और वे कश्मीर की धड़कन को अच्छी तरह पहचानते थे। कश्मीर पर लिखी उनकी कविता का शीर्षक है ‘ केसर की मासूम क्यारियों से आती आवाज’। बाबा ने लिखा-
‘‘ काश्मीरी ही काश्मीर कर सकते उद्धार/’’ जो लोग यह समझते हैं कश्मीर की समस्या देशी है वे गलतफहमी के शिकार हैं,पहले भी आज भी काश्मीर की समस्या बाहरी ताकतों के द्वारा पैदा की गई है। अमेरिका और पाक की इन दिनों कश्मीर में अतिरिक्त दिलचस्पी दर्ज की गई है। अमेरिकी रवैय्ये पर बाबा ने लिखा-‘‘ अमरीकी बन्दर पंचों की खुल जाएगी पोल/काश्मीर में बजा करेंगे काश्मीर के ढ़ोल।’’
कश्मीर को लेकर तथाकथित सुलह कराने वालों पर बाबा ने लिखा - ‘‘ डिनर नई दिल्ली में और कराची में कर लंच/ तौल रहे रावलपिंडी में लड्डू बन्दर पंच।’’
अंत में बाबा नागार्जुन ने जो लिखा वह और भी महत्वपूर्ण है। लिखा ‘‘ मात खाएँगे हिन्दी पंडित,पाकिस्तानी पीर/ लो देखो ,वह खड़ा हो रहा नया-नया कश्मीर।’’        
      







गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कवि चतुष्टयी जन्मशती पर विशेष - नामवरजी बोलो कौन पा रहा है, कौन खो रहा है ?

               (नामवर सिंह और बाबा नागार्जुन)
        वर्धा में महात्मा गांधी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कवि चतुष्टयी जन्मशती पर आलोचक नामवर सिंह ने जो कहा वह कमाल की बात है । अब हमारे गुरूवर बिना परिप्रेक्ष्य के सिर्फ विवरण की भाषा बोलने लगे हैं। परिप्रेक्ष्यरहित आख्यान और रिपोर्टिंग का नमूना देखें- "इस कार्यक्रम के उद्घाटन भाषण में नामवर जी ने बीसवी सदी को सर्वाधिक क्रांतिकारी घटनाओं की शताब्दी बताया। ऐसी शताब्दी जिसमें दो-दो विश्वयुद्ध हुए, विश्व की शक्तियों के दो ध्रुव बने, फिर तीसरी दुनिया अस्तित्व में आयी। समाजवाद का जन्म हुआ। सदी का अंत आते-आते इन ध्रुवों के बीच की दूरी मिटती गयी। तीसरी दुनिया भी बाकी दुनिया में मिलती गयी और समाजवाद प्रायः समाप्त हो गया। नामवर जी ने नागार्जुन की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाबा ने काव्य के भीतर बहुत से साहसिक विषयों का समावेश कर दिया जो इसके पहले कविता के संभ्रांत समाज में वर्जित सा था।"
     नामवर सिंह जानते हैं कि परिप्रेक्ष्यरहित विवरण बड़े खतरनाक होते हैं। उनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता है ,इनके पैर नहीं होते। नामवर सिंह का बीसवीं शताब्दी का वर्णन जलेबी मार्का व्याख्यान कला का आदर्श नमूना है। आपको इसमें बीसवीं सदी का ओर-छोर हाथ नहीं लगेगा। कौन खिलाड़ी था और कौन पिट रहा था,यह पता नहीं चलेगा। इस तरह के व्याख्यान की मुश्किल यह है कि इसमें भारत गायब है।भारत का यथार्थ गायब है। प्रतिवादी लोकतंत्र की चुनौतियां गायब हैं। सवाल उठता है नामवर सिंह ने ऐसा क्यों किया ?
       नामवर सिंह ने यह भी नहीं बताया कि मनमोहन सिंह के नव्य उदार अर्थशास्त्र और तदजनित संस्कृति का क्या करें ? लोकतांत्रिक प्रतिवादों का जो दमन हो रहा है उसका क्या करें ? हो सकता है, उन्होंने इस पर बोला हो,पर वेब  रिपोर्ट में यह गायब है।
    लेकिन इस समूची उधेड़बुन में हमें यह सवाल तो नामवर सिंह से पूछना है कि वे अज्ञेय के अमेरिकापरस्त रूझान और बाकी कवियों के अमेरिकी साम्राज्यविरोधी नजरिए में कैसे सामंजस्य बिठा रहे हैं ? क्या अज्ञेय पर अलग से कार्यक्रम नहीं किया जा सकता था ? जो कवि (अज्ञेय) लोकतांत्रिक संघर्षों से भागता हो उसका उन कवियों के साथ कैसे मूल्यांकन कर सकते हैं जो प्रतिवादी लोकतंत्र को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। कुर्बानी देने वाले लेखक और कुर्बानीरहित लेखक के बीच में कैसे पटरी बिठायी जा सकती है ?
    अज्ञेय और अन्य कवियों में अंतर यह है कि अज्ञेय को बुर्जुआ लोकतंत्र पसंद था, लेकिन नागार्जुन,केदार और शमशेर को बुर्जुआ लोकतंत्र नापसंद था। वे अपने लिए,अपने समाज के लिए,पीड़ित जनता के लिए प्रतिवादी लोकतंत्र की तलाश कर रहे थे, प्रतिवादी लोकतंत्र का वातावरण बना रहे थे। उसके लिए विभिन्न रूपों में इन कवियों ने अनेक कुर्बानियां दीं। इसके विपरीत अज्ञेय ने लोकतंत्र के लिए कौन सी कुर्बानी दी ? सवाल उठता हिन्दी के स्वनाधन्य बड़े आलोचक अनालोचनात्मक ढ़ंग से क्यों सोचने लगे हैं ?  साहित्य,साहित्यकार और साहित्य के सामाजिक सरोकारों के प्रति वे अनालोचनात्मक क्यों होते जा रहे हैं ? वे साहित्य में सच की खोज से क्यों भाग रहे हैं ? साहित्य में सच की खोज से भागने का प्रधान कारण है लेखक का सामयिक यथार्थ से अलगाव और दिशाहीन नजरिया। नामवर सिंह और उनके समानधर्माओं के लिए नागार्जुन की एक कविता को उद्धृत करने का मन कर रहा है। बाबा ने लिखा था-
  
"यह क्या हो रहा है जी ?
आप मुँह नहीं खोलिएगा !
कुच्छो नहीं बोलिएगा !
कैसे रहा जाएगा आपसे ?
आप तो डरे नहीं कभी अपने बाप से
तो बतलाइए,यह क्या हो रहा है ?
कौन पा रहा है, कौन खो रहा है ?
प्लीज बताएँ तो सही...
अपनी तो बे-कली बढ़ती जा रही
यह क्या हो रहा है जी
प्लीज बताएं तो सही...."







कवि चतुष्टयी जन्मशती पर- विभूतिनारायण राय का साम्राज्यवादी आख्यान

                     (स्व.बाबा नागार्जुन)       

     बाबा नागार्जुन,केदारनाथ अग्रवाल,अज्ञेय और शमशेर का यह जन्मशती वर्ष है। यह समारोह ऐसे समय में आरंभ हुआ है जब देश भयानक मंदी की मार और नव्य-उदार आर्थिक नीतियों की मार से गुजर रहा है। सवाल उठता है क्या इसे तिलांजलि देकर कवि चतुष्टयी की जन्मशती मनायी जा सकती है ? लेकिन हिन्दी के कई प्रतिष्ठित लेखकों -आलोचकों और संस्थानों ने साम्राज्यवाद और सत्ता के प्रति आलोचनात्मक रूख को तिलांजलि देकर इस आयोजन का आरंभ कर दिया है।  
   बाबा नागार्जुन को मंदी और नव्य-उदारीकरण के संदर्भ में पढ़ना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। मैंने करीब एक दशक से बाबा को  नहीं पढ़ा था,कभी पढ़ा भी तो चलताऊ ढ़ंग से पढ़ा और रख दिया,लेकिन इस बीच में उनकी जो भी किताबें बाजार में दिखीं खरीदता चला गया और इस सप्ताह उन्हें मन लगाकर पढ़ गया।
   बाबा नागार्जुन से मुझे कईबार व्यक्तिगत तौर पर जेएनयू में पढ़ते समय मिलने और बातें करने का मौका मिला था। उनसे मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई जब मैंने उनकी आपात्कालीन कविताओं पर एम.फिल् करने का फैसला किया था। केदारनाथ सिंह गाइड थे। उसके बाद तो कईबार मिला और उनके साथ लंबी बैठकें भी कीं।
      बाबा नागार्जुन सहज,सरल,पारदर्शी और धुनी व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिवादी लोकतंत्र उनके स्वभाव में रचा-बसा था। उनकी कविता लोकतंत्र की तरह पारदर्शी और आवरणहीन है। उन्हें प्रतिवादी लोकतंत्र का बिंदास लेखक भी कह सकते हैं। प्रतिवादी लोकतंत्र की प्राणवायु में जीने वाला ऐसा दूसरा लेखक हिन्दी में नहीं हुआ। नामवर सिंह को नागार्जुन का व्यंग्य खास लगता है मुझे उनका प्रतिवादी लोकतंत्र के प्रति लगाव खास लगता है।
     नागार्जुन के व्यक्तित्व और कविता की यह खूबी थी कि वे जैसा सोचते थे वैसा ही जीते भी थे। आज हिन्दी के अधिकांश लब्ध प्रतिष्ठित लेखक इससे एकदम उलट हैं। सोचते कुछ हैं जीते कुछ हैं। आज के हिन्दी लेखकों के कर्म और विचार में जो महा-अंतराल आया है वह हमारे लिए चिन्ता की बात है। कवि चतुष्टयी की जन्मशती पर कम से कम हिन्दी के स्वनामधन्य बड़े लेखक इस सवाल पर सोचें कि उनके कर्म और विचार में महा-अंतराल क्यों आया है ? उनके हाथ से सामयिक यथार्थ क्यों छूट गया है ?
     कवि चतुष्टयी जन्मशती पर बड़े-बड़े प्रतिष्ठानी जलसों की खबरें आ रही हैं । इन जलसों के बहाने सत्य को असत्य में तब्दील करने की कोशिशें आरंभ हो गयी हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह काम प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधाओं की आंखों के समाने हो रहा है वे असत्य का जयगान सुन रहे हैं। यह हिन्दी के प्रतिवादी कवियों का अपमान है। मैं यहां सिर्फ एक झलकी दिखाना चाहता हूँ।
   हाल ही में वर्धा स्थित महात्मा गांधी विश्वविद्यालय ने एक बड़ा ही भव्य कार्यक्रम शमशेर, अज्ञेय, केदार और नागार्जुन के जन्मशती पर आयोजित किया था। इसमें जो विचार वक्ताओं ने रखे हैं ,उन पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत है। हमारे प्रगतिशील लेखक किस संसार की छवि बना रहे हैं और सत्ताभक्त साहित्य प्रशासक विभूतिभूषण राय किस नजरिए से संसार की छवि बना रहे हैं,इसे देखना बड़ा ही दिलचस्प होगा।
   मैंने कभी राय साहब को देखा नहीं है। मिलने का भी सौभाग्य नहीं मिला। लेकिन जो रिपोर्ट इस सेमीनार की सामने है उस पर कहे बिना नहीं रह सकता। एक वाक्य में कहूं तो विभूतिनारायण राय ने बाबा नागार्जुन और अन्य प्रतिवादी कवियों की आत्मा को अपने बयान से कष्ट पहुंचाया है। राय साहब ने कहा है -
"बीसवीं शताब्दी को यदि एक वाक्य में परिभाषित करना हो तो मैं उसे हाशिए की शताब्दी कहना चाहूंगा। इस सदी में उपनिवेशवाद का अंत हुआ, लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ स्थापित हुईं और सदियों से समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग- जैसे दलित, आदिवासी और स्त्रियाँ- पहली बार मनुष्य का जीवन जीने का अवसर पा सके। इससे पहले हाशिए पर अटके लोगों के मानवाधिकार समाज के प्रभु वर्ग द्वारा अपहृत कर लिए गये थे। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई और विश्व मानवाधिकारों के चार्टर की घोषणा हुई तो मानव सभ्यता को जो उपहार मिला वह किसी भी धार्मिक पुस्तक से नहीं मिल पाया था।"( http://hindustaniacademy.blogspot.com)
    इस साधुभाषा का हिन्दी के प्रतिवादी कवियों के सोच से क्या संबंध है ? राय साहब इतने भोले कैसे हैं कि उन्हें समाजवादी व्यवस्था का उदय और पराभव नजर नहीं आया, उन्हें दो-दो विश्वयुद्ध नजर नहीं आए और उन्हें अमेरिकी साम्राज्यवाद का आतंकी नव्य उदार चेहरा नजर नहीं आया, आखिरकार विभूति बाबू किसकी चारण वंदना कर रहे हैं ? उन्होंने जैसा भाषण दिया है वैसा भाषण अमेरिका के ह्वाइट हाउस के कर्मचारी रोज देते हैं। हिन्दी के प्रगतिशील लेखक यह कैसे भूल सकते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद नाम का पूरा विचारधारात्मक तंत्र है जिसके जबड़े में हम सब फंसे हैं। राय साहब के साहबी बयान से तय हो चुका है कि अब ज्ञान-गंगा किधर बहेगी।
   हम सोचें कि क्या किसी लेखक को अमेरिकी साम्राज्यवाद के गुनाहों पर इस साधुभाषा के बहाने पर्दा डालने की अनुमति दी जा सकती है ? क्या नागार्जुन,केदार और शमशेर की साम्राज्यवाद विरोधी चेतना और अज्ञेय की अमेरिकी साम्राज्यपरस्त समझ में पटरी बिठायी जा सकती है ? जी हां ,यह काम इस साधुभाषा के बहाने किया जा रहा है।
     मजेदार बात यह है कि नागार्जुन,केदार और शमशेर और अज्ञेय को आप एक साथ कैसे रख सकते हैं ? कभी उनका नजरिया नहीं मिला तो अब उनकी एक साथ जन्मशती कैसे मना सकते हैं ? जब इस तरह का घल्लूघारा होगा तो समाजवाद और साम्राज्यवाद का क्या करोगे ? काग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ अज्ञेय के रिश्ते का क्या करोगो ? जन्मशती के नाम पर इस तरह की विचारधाराहीनता सिर्फ अब हिन्दी के सत्ताभक्तों के यहां ही संभव है यही वजह है कि विभूति बाबू ह्वाइट हाउस के कर्मचारी की भाषा बोल रहे हैं।  
    दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी के मंच,गोष्ठी या सेमीनार अमेरिकी साम्राज्यवाद की भाषा के मंच नहीं रहे हैं। विभूति बाबू ने इस बयान के साथ ही सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ और भी पुख्ता कर ली है। इस मौके पर मुझे नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है,उसका शीर्षक है "इतना ही काफी है"। नागार्जुन ने लिखा है -
" बोल थे नेह -पगे बोल,
यह भी बहुत है! इतना ही काफी है!"

         





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