कम्युनिस्ट विचारधारा ने निष्क्रिय दर्शक और अनुगामी जनता के निर्माण की कला पूंजीवाद से सीखी है। यह मूलत: पूंजीवादी कला है इसका मार्क्सवाद से कोई लेना-देना नहीं है। सोवियत संघ ,चीन आदि समाजवादी देशों ने इस कला को प्रथम विश्वयुद्ध के पूंजीवादी प्रचार अभियान के अनुभवों से सीखा था। पूंजीवाद ने इसी कला को विज्ञापन और जनसंपर्क की कला में तब्दील कर दिया, जबकि समाजवादी सोवियत संघ आदि देशों ने क्रांतिकारी अनुगामिता में रूपान्तरित कर दिया। पश्चिम बंगाल में सक्रिय वाम संगठन बड़े ही कौशल के साथ जनसंपर्क और विज्ञापन की प्रचार रणनीतियों का अनुगामी बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
जनसंपर्क और विज्ञापन की रणनीतियों के आधार पर किया गया प्रचार अभियान जनता को अपनी ओर आकर्षित करने में तब ही सफल होता है जब उस प्रचार अभियान को नीचे ले जाने वाली संरचनाएं उपलब्ध हों। वाम के पास ऐसी सांगठनिक संरचनाएं हैं जो प्रतिदिन अहर्निश विचारों की मार्केटिंग करती रहती हैं। ग्राहक पर कड़ी नजर रखती हैं, उसका प्रोफाइल रखती हैं, उसके मूवमेंट पर नजर रखती हैं। विज्ञापन रणनीति का मूल मंत्र है आक्रामकता। आक्रामक प्रचार और येनकेन प्रकारेण ध्यान खींचना,बांधे रखना। ये सारे मंत्र वाम के पास हैं।
मार्केटिंग का सबसे बढ़िया तरीका है माल को हर हाल में बेचना, सबको बेचना, पक्के ग्राहक बनाना, ऐसे ग्राहक बनाना जो खरीदें किंतु सोचें नहीं, भोग करें किंतु भागें नहीं। जो भागना चाहे उसे पाने की कोशिश करो। साम,दाम,दंड,भेद का इस्तेमाल करो। पटाओ और अनुयायी बनाओ। कोई भी आंदोलन हो ,कितना भी बड़ा आंदोलन हो, कितना ही बड़ा जनोन्माद पैदा हो, कितनी ही बड़ी गलती हो, जनता को फुसलाना और अनुगामी बनाना,उसके दिलोदिमाग को हर हालत में काबू में करना ही वाम की रणनीति रही है। वाम कभी विपक्ष के सामने नहीं झुकता किंतु जनता के बीच साम,दामदंड,भेद की कला का इस्तेमाल करता है। यह समूची विज्ञापन,जनसंपर्क और मार्क्सवादी सांगठनिक संरचनाओं के सहमेल से बनी रणनीति है।