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रघुवीर सहाय की 12 कविताएं

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उसका रहना
रोज़ सुबह उठकर पाते हो उसको तुम घर में

इससे यह मत मान लो वह हरदम मौजूद रहेगी/"



 बेटे से टूट रहा है यह घर जो तेरे वास्ते बनाया था जहाँ कहीं हो आ जाओ...  नहीं यह मत लिखो लिखो जहाँ हो वहीं अपने को टूटने से बचाओ हम एक दिन इस घर से दूर दुनिया के कोने में कहीं बाहें फैलाकर मिल जाएँगे।


भ्रम निवारण
तुम क्या समझते हो कि हर लड़की जो मुझे देखकर  मुस्कुराती है मेरी पहचानी है नहीं,वह तो सिर्फ  अपनी दुनिया में मस्त रहती है।


ग़रीबी
 हम गरीबी हटाने चले और उस समाज में जहाँ आज भी दरिद्र होना दीनता नहीं भारतीयता की पहचान है,दासता विरोध है दमन का प्रतिकार है हम ग़रीबी हटाने चले हम यानी ग़रीबों से नफ़रत हिकारत परहेज़ करनेवाले  हम गरीबी हटाते हैं तो ग़रीब का आत्म सम्मान लिया करते हैं इसलिए मैं तो इस तरह ग़रीबी हटाने की नीति के विरूद्ध हूं क्योंकि वही तो कभी-कभी अपने सम्मान की अकेली  रचना रह जाती है।


ख़तरा
 एक चिटका हुआ पुल है एक रिसता हुआ बाँध है ज़मीन के नीचे बढ़ता हुआ पानी है ख़तरे में राम ख़तरे में राजधानी है पहले खुदा के यहाँ देर थी अँधेर न था अब खुदा के यहाँ अंधेर है और उसमें देर नहीं।



नहीं छापते  अपना लिखा बार बार…

मनमोहन की 8 कविताएं

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कविवर मनमोहन भारतीय संस्कृति- मनमोहन पहले पहल जब हमने सुना चमड़े का वॉशर है तो बरसों बरस नल का पानी नहीं पिया
तब कुओं-बावडि़यों पर हमारा कब्ज़ा था जो आख़िर तक बना रहा
हमने कुएँ सुखा दिए पर ऐरों-गैरों को फटकने न दिया अब भी कायनात में पीने योग्य जितना पानी बचा है दलितों की बस्ती की ओर रूख करे इससे पहले हमीं खींच लेते हैं
हमारे विकास ने जो ज़हर छोड़ा ज़मीन की तहों में बस गया है
बजबजाते हुए हमारे विशाल पतनाले हमारी विष्ठा हमारा कूड़ा और हमारा मैल लिए सभ्यता की बसावट से गुजरते हैं और नदियों में गिरते हैं जिन्होने बहना बंद कर दिया है
कितना महान सांस्कृतिक दृश्य है कि हत्याकांड सम्पन्न करने के बाद हत्यारा भीड़ भरे घाट पर आता है और संस्कृत में धारावाहिक स्तोत्र बोलता हुआ रूकी हुई यमुना के रासायनिक ज़हर में सौ मन दूध गिराता है


हाय सरदार पटेल ! - मनमोहन सरदार पटेल होते तो ये सब न होता कश्मीर की समस्या का तो सवाल ही नहीं था ये आतंकवाद वातंकवाद कुछ न होता

क़हर-ए-बंगाल- जिगर मुरादाबादी

( जिगर मुरादाबादी की यह एक पुरानी ग़ज़ल है उसमें 16 शेर हैं । वो ग़ज़ल उन्होंने1942 के अकाल पर लिखी थी। उसके कुछ शेर हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं।) बंगाल की मैं शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ, हर चन्द कि हूँ दूर मगर देख रहा हूँ। इफ्लास की मारी मख्लूक सरे राह, बेगारो कफ़न ख़ाक बसर देख रहा हूँ। बच्चों का तड़पना वो बिलखना वो सिसकना, माँ-बापकी मायूस नज़र देख रहा हूँ। बेरहमी बेदर्दी,औ-अफ्लास-ओ -गुलामी, है शामते ऐमाल ,जिधर देख रहा हूँ। इन्सान के होते हुए इन्सान का यह हश्र, देखा नहीं जाता,मगर देख रहा हूँ।

----------------------------------- बेदारी -ए-अहसास है हर सिम्त नुमायाँ बेताबी -ए-अरबाब-ए-नजर देख रहा हूँ। खामोश निगाहों में उमड़ते हुए जज्ब़ात, जज्ब़ात में तूफ़ाने शरर देख रहा हूँ। अंजामे सितम अब कोई देखे कि न देखे , मैं साफ़ इन आँखों से मगर देख रहा हूँ। सैयाद ने लूटा था इनादिल का नशेमन सैयाद का लुटते हुआ घर देख रहा हूँ।

( कुछ शब्दों के अर्थ- बेदारी -जागृति,सिम्त- दिशा,अरबाब- मालिक,सैयाद- शिकारी,इनादिल- बुलबुलें

टेलीविजन और वामपंथी बचकानापन

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टेलीविजन में बड़बोलापन महंगा पड़ता है। यहां जो ज्यादा बोलता है टीवी उसी को पीटता है। विधानसभा कवरेज पर आने वाली खबरों और टॉक शो में राज्य के ठोस राजनीतिक मसलों पर बहसें हो रही हैं। टेलीविजन कवरेज ने इसबार के चुनाव को पूरी तरह अ-राजनीतिक बना दिया है। पहलीबार ऐसा हो रहा है कि समूचे प्रचार अभियान में राजनीति गायब है। ठोस राजनीतिक सवाल गायब हैं। परिवर्तन के नारे ने सारे राजनीतिक सवालों को हाशिए पर ठेल दिया है। टीवी टॉक शो में सतही और हास्यास्पद बातें खूब हो रही हैं। टीवी टॉकरों की शैली है वे एक मसले से दूसरे मसले,एक अत्याचार से दूसरे अत्याचार,एक झूठ से दूसरे झूठ,काले धन के एक आख्यान से दूसरे आख्यान की ओर रपटते रहते हैं। वे किसी मसले पर टिककर बात नहीं करते। एक से दूसरे विषय पर लुढ़कना और ओछी दलीलों के ढ़ेर लगाना यह टीवी का वामपंथी बचकानापन है। कीचड़ उछालने,छिछोरी नारेबाजी ,फतवेबाजी और वामपंथी लफ्फाजी की टीवी पर आंधी चल रही है। नेताओं के चेहरों पर आत्ममुग्धता हावी है। टॉक शो और लाइव प्रसारणों में चरित्रहनन, धमकी,ब्लैकमेल,रईसी दृष्टिकोण, चरित्रहीन उपदेशक का ढुलमुलपन खुलकर अभिव्यक्त हुआ है…

देवी ,तुम तो काले धन की बैसाखी पर टिकी हुई हो- नागार्जुन

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( यह कविता इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि कल तृणमूल की अध्यक्षा ममता बनर्जी ने अपने एक भाषण में सीपीएम के कॉमरेड़ों को 1972-77 जैसे सबक सिखा देने की सरेआम धमकी है,वे मंच पर घूम घूमकर भाषण दे रही हैं, उल्लेखनीय है यह दौर पश्चिम बंगाल में अर्द्धफासीवादी आतंक के नाम से जाना जाता है,इस दौर में माकपा के 1200 से ज्यादा सदस्य कांग्रेस की गुण्डावाहिनी के हाथों मारे गए थे और 50 हजार से ज्यादा को राज्य छोड़कर बाहर जाना पड़ा था, उस समय बाबा नागार्जुन ने यह कविता लिखी थी ,जो ऐतिहासिक दस्तावेज है,यह कविता आज भी प्रासंगिक है,इसके कुछ अंश यहां दे रहे हैं)

लाभ-लोभ के नागपाश में जकड़ गए हैं अंग तुम्हारे घनी धुंध है भीतर -बाहर दिन में भी गिनती हो तारे।
नाच रही हो ठुमक रही हो बीच-बीच में मुस्काती हो बीच-बीच में भवें तान कर आग दृगों से बरसाती हो।
रंग लेपकर ,फूँक मारकर उड़ा रहीं सौ -सौ गुब्बारे महाशक्ति के मद में डूबीं भूल गई हो पिछले नारे।
चुकने वाली है अब तो डायन की बहुरूपी माया ठगिनी तू ने बहुत दिनों तक जन-जन को यों ही भरमाया।


(ममता बनर्जी ने जमकर पैसा खर्च किया है और इसमें काले धन की बड़ी भूमिका भी है,ढ़ेर सारे वाम और दाए…

कविता शांति-मठ नहीं बर्बर युद्ध है - भरत सिंह

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रूस के महान कवि मायकोव्स्की ने कहा था: 'कविता शांति-मठ नहीं / कविता बर्बर युध्द है'। निस्संदेह दिनकर की कविता प्राय: शांति मठ नही है किंतु बर्बर युध्द भी नहीं है, हां, क्रांतिकारी प्रबुध्द दलितों का युध्द उनके काव्य का मूल प्रतिपाद्य अवश्य है।

दिनकर ने स्वयं को 'काल का चारण' कहा है। निस्संदेह समय उनका सारथी था। अपने एक व्याख्यान में उन्होंने कहा है: ''साहित्य कला का न तो मैं स्वामी हूं और न उसका विद्वान आलोचक। मैं तो काल का चारण हूं और उसी के संकेत पर जीवन की टिप्पणियां लिखा करता हूं।''

दिनकर की काव्य चेतना में रोमांटिक कविता का प्रभाव आजीवन अक्षुण्ण बना रहा है। इस प्रसंग में उन्होंने कहा है: ''रोमांटिक कविता का सबसे बड़ा लक्षण आवेश है।... आवेश शब्द से एक ध्वनि यह भी निकलती है कि कवि अपने होश में नहीं है, वह स्वयं नहीं लिख रहा है बल्कि कोई और शक्ति उससे लिखवा रही है।'' इससे स्पष्ट है कि दिनकर की रोमांटिक काव्य चेतना बहुत गहरी है। उनके यहां आवेश उफान या झाग नहीं है, जिसे बहुत से कम्युनिस्ट आलोचक प्राय: कहते रहते हैं। दिनकर का स्वच्छंदत…