बुधवार, 27 अप्रैल 2011

क़हर-ए-बंगाल- जिगर मुरादाबादी


( जिगर मुरादाबादी की यह एक पुरानी ग़ज़ल है उसमें 16 शेर हैं । वो ग़ज़ल उन्होंने     1942 के अकाल पर लिखी थी। उसके कुछ शेर हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं।)
बंगाल की मैं शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ,
हर चन्द कि हूँ दूर मगर देख रहा हूँ।
इफ्लास की मारी मख्लूक सरे राह,
बेगारो कफ़न ख़ाक बसर देख रहा हूँ।
बच्चों का तड़पना वो बिलखना वो सिसकना,
माँ-बाप  की मायूस नज़र देख रहा हूँ।
बेरहमी बेदर्दी,औ-अफ्लास-ओ -गुलामी,
है शामते ऐमाल ,जिधर देख रहा हूँ।
इन्सान के होते हुए इन्सान का यह हश्र,
देखा नहीं जाता,मगर देख रहा हूँ।


-----------------------------------
बेदारी -ए-अहसास है हर सिम्त नुमायाँ
बेताबी -ए-अरबाब-ए-नजर देख रहा हूँ।
खामोश निगाहों में उमड़ते हुए जज्ब़ात,
जज्ब़ात में तूफ़ाने शरर देख रहा हूँ।
अंजामे सितम अब कोई देखे कि न देखे ,
  मैं साफ़ इन आँखों से मगर देख रहा हूँ।
सैयाद ने लूटा था इनादिल का नशेमन
सैयाद का लुटते हुआ घर देख रहा हूँ।


( कुछ शब्दों के अर्थ- बेदारी -जागृति,सिम्त- दिशा,अरबाब- मालिक,सैयाद- शिकारी,इनादिल- बुलबुलें,नशेमन- घोंसला

2 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्वोत्तर के चुनावों में बंग्लादेशी अल्प घुसपैठियों के ऊपर एक पोस्ट लिखने का आग्रह करता हूं.. निष्पक्ष दृष्टि से....

    उत्तर देंहटाएं

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...