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March, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का दिल जीतने में जुटी ममता सरकार

पश्चिम बंगाल का बजट आनेवाला है और राज्य का आर्थिक संकट गहरा हो गया है।नियमानुसार कोई राज्य अधिकतम जितना रूपया उधार ले सकता है उस सीमा तक ममता सरकार उधार ले चुकी है। आज स्थिति यह है कि राज्य को यदि किन्ही कारणों से जरूरत पड़े तो बैंक से लेकर बाजार तक कोई कर्ज नहीं मिल सकता। पिछले साल अक्टूबर2012 में राज्य सरकार के कर्मचारियों आदि की तनख्बाह –पेंशन आदि देने के लिए 45दिन के लिए 4000 हजार करोड़ का कर्ज लिया था। पिछले साल रिजर्व बैंक ने कर्ज के नियमों में दोबार ढ़ील देकर राज्य को 22,423करोड़ रूपये का कर्ज दिया। सन् 2012-13 के बजट दस्तावेज के अनुसार राज्य की कर से होने वाली अनुमानित आय 76,943करोड़ रूपये और व्यय 83,801 करोड़ रूपये आंका गया है। यानी अनुमानित बजट घाटा 6,585करोड़ रूपये का आंका गया है। लेकिन सन् 2013-14 में यह घाटा बढ़ जाने की संभावनाएं हैं। इसके अलावा राज्य पर इस साल कर्ज की रकम 2.26लाख करोड़ हो जाएगी। फलतःभारत के कर्जगीर राज्यों में उसका नाम सबसे ऊपर आ गया है। मार्च 2012 तक पश्चिम बंगाल के ऊपर 2,08,382 करोड़रूपये का कर्ज था मूलधन और ब्याज चुकाने के लिए उसे सालाना 23,199 करोड़ …

हूगो चावेज और फेसबुक

वेनेजुएला के राष्ट्रपति हूगो चावेज नहीं रहे। वे लंबे समय से कैंसर से जूझ रहे थे।चावेज ने अपने कामों से वेनेजुएला और लैटिन अमेरिकी देशों पर जबर्दस्त असर पैदा किया था,फिदेल के बाद वे इस क्षेत्र के सबसे जनप्रियनेता भी थे और सारी दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीक भी थे.क्रांतिकारी चावेज को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि। -2- वेनेजुएला के क्रांतिकारी नेता चावेज की विशेषता थी कि वे प्रति सप्ताह 40 घंटे से ज्यादा टीवी -रेडियो से सीधे अपने देश की जनता के साथ संवाद करते थे। वे लिखी स्क्रिप्ट देखकर भाषण नहीं देते थे और न उनके लिए कोई स्क्रिप्ट लिखी गयी। स्वतःस्फूर्त बोलना,सोचना और आम जनता की इलैक्ट्रोनिकी माध्यमों के जरिए लाइव प्रसारण के माध्यम से समस्याओं पर खुलकर विचार विमर्श करना उनकी आदत थी.अपने देश की जनता से वे किस हद तक जुड़े थे यह इस बात से समझ में आएगा कि उन्होंने अपने देश की जनता के साथ जो वायदे किए उनको काफी हद तक पूरा किया। क्रांति को पार्टी के ऑफिस से निकालकर आम जनता का औजार बनाया और क्रांतिकारी विचारों के पारदर्शी और अबाधित बहस-मुबाहिसे की अपने देश में स्…

चुनावी पापुलिज्म की आम बजट से विदाई

एक जमाना था केन्द्रीय बजट के आने के पहले आमलोगों में उत्सुकता होती थी ,आम आदमी मन लगाकर रेडियो –टीवी पर सुनता-देखता  था कि केन्द्र सरकार के आमबजट में नया क्या आनेवाला है ?  लेकिन इनदिनों बजट को लेकर जिज्ञासा एकसिरे से खत्म हो गयी है।मीडिया का भी वित्तमंत्री पर कोई दबाब नजर नहीं आया।        आमबजट को लेकर सांसदों से लेकर आम आदमी तक बढ़ते बेगानेपन ने एक नए किस्म के आर्थिक अज्ञान को बढ़ावा दिया है। कायदे से संचारक्रांति के दौर में बजट की सूचनाओं का विवेचन ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए लेकिन हो उलटा रहा है। आम बजट आज सबसे ज्यादा रहस्यमय दस्तावेज है और इस रहस्य को कारपोरेट मीडिया ने जमकर बढ़ावा दिया है। वित्तमंत्री पी.चिदम्बरम् ने जब पिछले सप्ताह सन् 2013-14 का आमबजट पेश किया तो उन्होंने पहला अच्छा काम यह किया है कि बजट को चुनावी राजनीति से पृथक् कर दिया है। पहले बजट में चुनावी प्रलोभन हुआ करते थे लेकिन इसबार के बजट में कोई आर्थिक प्रलोभन नहीं हैं। यह मनमोहन सरकार का आखिरी बजट है। बजट को चुनावी राजनीति से अलग करने का अर्थ है देश की अर्थव्यवस्था को पापुलिज्म से अलग करना। इससे यह भी संकेत म…