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September, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यापारियों से सीधे मुठभेड़ के मूड़ में ममता

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अब विकास के सपने नहीं आते। उनका खुदरा व्यापार में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी का विरोध उनकी नई मनोदशा की अभिव्यक्ति है। वे इन दिनों विकास की नहीं विकास के विरोध की भाषा बोल रही हैं। विकास के नाम पर जनता का असीम प्यार और समर्थन पाने के बाद ममता का विकास की बजाय बागी की भाषा में बोलना उस असंतुलन को व्यक्त करता है जो पश्चिम बंगाल में पहले से मौजूद है। लोकतंत्र में बागी और विकास में सीधे टकराव है। 

ममता की खूबी है कि उन्होंने वाममोर्चे की नाकामियों और जनविरोधी हरकतों का प्रतिवाद करते हुए बागी और विकास के बीच नकली संतुलन बनाकर जो विभ्रम पैदा किया था वह विगत पांच सालों में खूब चला। लेकिन अब यह विभ्रम टूट रहा है। सत्ता में आने के बाद बागी और विकास का नकली संतुलन टूटा है। राज्य के शासन पर बागी सवार हैं और विकास काफूर हो गया है।

ममता की मुश्किल यह है कि वे बागी के तानबाने में कैद हैं और बागी के नजरिए से राज्य प्रशासन को चलाना चाहती हैं। बागी के नजरिए से शासन चलाने का अर्थ है वस्तुगत प्रशासनिक प्रणाली का अभाव। बागी भाव से शासन चलाएंगे तो हमेशा दल…

राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण ममता अकेली पड़ी

ममता बनर्जी और सोनिया गांधी में कल तक मित्रता थी इनदिनों दोनों नेत्रियों में छत्तीस का आंकड़ा है। ममता की राजनीतिक अदूरदर्शिता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कल तक ममता बनर्जी पापुलिज्म की बेताज बादशाह थीं लेकिन आज वे संकट में हैं। राज्य में मुख्यमंत्री बनने के एक साल के अंदर उन्होंने सबसे पहले प्रणव मुखर्जी का विश्वास खोया,हाल में मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का साथ खोया और जल्द ही उनको कांग्रेस का राज्य में साथ भी खोना पडेगा ।इसके अलावा देश-विदेश के उद्योगपतियों की नजरों में ममता बनर्जी की साख गिरी है। ममता यह मानकर चल रही थी कि वे जल्द ही तिकड़मों के जरिए भारत की राजनीति में बड़ा स्थान बना लेंगी। लेकिन अब यह सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा। मनमोहन सरकार से समर्थन वापसी के बाद ममता और भी अकेली हो गयी हैं।

पिछले सप्ताह कोलकाता के टाउनहॉल में टीएमसी सांसदों-विधायकों और मंत्रियों की बैठक में एक दर्जन सांसदों ने भरी सभा में साफ कहा कि मनमोहन सरकार से समर्थन वापस नहीं लेना चाहिए। इस पर ममता बनर्जी ने कहा कि समर्थन वापस लेते ही केन्द्र सरकार गिर जाएगी और उनको भरोसा है कि स…

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य म…

मनमोहन के फैसले ने ममता की घबराहट बढ़ायी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार को 72घंटे का अल्टीमेटम दिया है और कहा है डीजल के बढ़े दाम और खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश का फैसला वापस ले। लेकिन मनमोहन सिंह सरकार अपने ये दोनों फैसले वापस नहीं लेने जा रही है। सबकी आंखें ममता के अगले कदम पर टिकी हैं।     ममता का तर्क है कि सरकार ने हमसे सलाह नहीं ली, हमारे मंत्री ने मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया।अतःहम इस फैसले को नहीं मानते। केन्द्र सरकार के फैसले की घोषणा के तत्काल बाद तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं की ममता के साथ अनौपचारिक बैठक हुई।इसमें पार्थ चटर्जी-सुब्रत मुखर्जी आदि ने ममता की राय से असहमति व्यक्ति की।      तृणमूल सरकार में वरिष्ठमंत्री ने नाम न बताए जाने की शर्त पर कहा यह फैसला यूपीए-2 सरकार का सामूहिक फैसला है। इस फैसले से यूपीए-2के सभी दल बंधे हैं। मंत्रीमंडल किसी दल विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह तो सारे देश का प्रतिनिधित्व करता है। सभी सत्तारूढ़ दल मंत्रीमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी से बंधे हैं। कोई मंत्री मंत्रीमंडल की बैठक में शामिल हो या न हो वह मंत्रीमंडल के सामूहिक फैसलों से बंधा …

ऑडीटर,पत्रकार ,स्टैनोग्राफर और कोलगेट मीडिया कवरेज

कोलगेट कांड पर मीडिया लबालब भरा है।कोई भी अखबार उठाओ या चैनल देखो चारों ओर कोलगेट की वर्षा हो रही है।इस तरह की समाचार वर्षा हाल-फिलहाल के दिनों में किसी भी खबर की नहीं देखी गयी। कोलगेट कांड में सच क्या है यह सब लोग जानते हैं। इसमें धांधली हुई है। यह धांधली मुख्यमंत्रियों ने की या केन्द्रीय मंत्री ने की या प्रधानमंत्री ने की ,लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली आवंटन के पहले हुई या बाद में हुई यह सवाल भी बेमानी है।लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि धांधली हुई है। एक कंपनी ने की या चार ने की लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली पर कोई विवाद नहीं है। सभी दल मानते हैं कि कोलगेट में कुछ न कुछ गड़बड़ है।पहले कांग्रेस मानने को तैयार नहीं थी लेकिन अब वह भी मान रही है कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। दो सांसदों की शिकायत पर सीबीआई जांच कर रही है,कई कंपनियों के खिलाफ नियमों के उल्लंघन को लेकर एफआईआर दायर की गयी हैं।विपक्ष का कोलगेट कांड पर गुस्सा और प्रतिवाद जायज है।

इस सबसे अलग हटकर हमें यहां पर इस विषय पर विचार करना है कि आखिरकार मीडिया में कोलगेट रिपोर्टिंग का स्रोत क्या है ?क्या यह पत्रकारों के परिश्रम का खेल…

हिन्दी के 12 कटु सत्य

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1.हिन्दीभाषी अभिजन की हिन्दी से दूरी बढ़ी है ।

2.राजभाषा हिन्दी के नाम पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है लेकिन उसका भाषायी,सांस्कृतिक,अकादमिक और प्रशासनिक रिटर्न बहुत कम है।

3.इस दिन केन्द्र सरकार के ऑफिसों में मेले-ठेले होते हैं और उनमें यह देखा जाता है कि कर्मचारियों ने साल में कितनी हिन्दी लिखी या उसका व्यवहार किया। हिन्दी अधिकारियों में अधिकतर की इसके विकास में कोई गति नजर नहीं आती।संबंधित ऑफिस के अधिकारी भी हिन्दी के प्रति सरकारी भाव से पेश आते हैं। गोया ,हिन्दी कोई विदेशी भाषा हो।

4.केन्द्र सरकार के ऑफिसों में आधुनिक कम्युनिकेशन सुविधाओं के बावजूद हिन्दी का हिन्दीभाषी राज्यों में भी न्यूनतम इस्तेमाल होता है।

5.हिन्दीभाषी राज्यों में और 10 वीं और 12वीं की परीक्षाओं में अधिकांश हिन्दीभाषी बच्चों के असंतोषजनक अंक आते हैं. हिन्दी भाषा अभी तक उनकी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे है।

6.ज्यादातर मोबाइल में हिन्दी का यूनीकोड़ फॉण्ट तक नहीं है।ज्यादातर शिक्षित हिन्दी भाषी यूनीकोड फॉण्ट मंगल का नाम तक नहीं जानते।ऐसी स्थिति में हिन्दी का विकास कैसे होगा ?

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इंफोसिस परेशान है ममता सरकार की दिशाहीन नीतियों से

हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ब्लूमवर्ग मार्केट मैगजीन ने दुनिया में आर्थिक क्षेत्र में प्रभावशाली 50 नेताओं में स्थान दिया है और लिखा है कि भारत में केन्द्र सरकार की नीतियों को प्रभावित करने वाली वह ताकतवर नेत्री है। बिडम्बना यह है कि यही ताकतवर नेत्री राज्य के लिए औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने में असमर्थ रही है। बल्कि यह कहें तो ज्यादा सही होगा कि आज ममता सरकार की नीतिहीनता सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आई है। ममता बनर्जी के आने केबाद औद्योगिक विकास एकदम बंद हो गया है।पश्चिम बंगाल के औद्योगिक दुर्दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।

हाल की घटनाएं बताती हैं कि ममता सरकार जिस तरह काम कर रही है उससे औद्योगिक समस्याएं हल होने की बजाय उलझती जा रही हैं। मंत्रियों से लेकर नौकरशाह तक सभी को नीतिगत दिशाहीनता ने असहाय बनाकर रख दिया है।मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जब शासन संभाला था आमलोगों में उनको लेकर जबर्दस्त उत्साह था और यह उम्मीद भी जगी थी कि वे कुछ बेहतर और नया करेंगी लेकिन उद्योगपतियों से लेकर राजनेताओं तक,साधारण ग्रामवासी लेकर फैक्ट्री मजदूर तक सबको निराशा हाथ लगी है।

फेसबुक और अभिव्यक्ति की लक्ष्मणरेखा

फेसबुक पर अमर्यादित,गाली गलौज, पर्सनल कमेंटस (छींटाकशी) आदि को तुरंत हटादें साथ ही सार्वजनिक तौर पर सावधान करें। न माने तो ब्लॉक कर दें।

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फेसबुक पर स्वीकृति या साख बनाने के लिए जरूरी है कि नियमित लिखें और सारवान और सामयिक लिखें।प्रतिदिन किसी भी मसले को उठाएं तो उससे जुड़े विभिन्न आयामों को अलग-अलग पोस्ट में दें। इससे एजेण्डा बनेगा। कभी-कभार अपनी कहें ,आमतौर पर निजता के सवालों और निजी उपलब्धियों के बारे में बताने से बचें। यदि आप प्रतिदिन अपनी रचनात्मक उपलब्धियां बताएंगे तो अनेक किस्म के कु-कम्युनिकेशन में कैद होकर रह जाएंगे, इससे मन संतोष भी कम मिलेगा। मन संतोष तब ज्यादा मिलता है जब सामाजिक सरोकारों के सवालों पर लिखते हैं और लोग उस पर तरह तरह की राय देते हैं।

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फेसबुक कम्युनिकेशन के लिए इसकी संचार अवस्था को स्वीकारने और समझने की जरूरत है। मसलन् आपने किसी के स्टेटस पर कोई टिप्पणी दी,जरूरी नहीं है वह व्यक्ति आपके उठाए सवालों का ज…

पश्चिम बंगाल में पूंजीनिवेश के मित्रतापूर्ण माहौल की तलाश में रतन टाटा

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पश्चिम बंगाल में औद्योगिक पूंजी निवेश में सबसे बड़ी बाधा है नेताओं का पूंजीपति विरोधी राजनीतिक कठमुल्लापन । इस राजनीतिक कठमुल्लेपन को विभिन्न कम्युनिस्ट ग्रुपों और दलों ने विगत चार दशक में समय समय पर हवा दी फलतःराज्य में पूंजीनिवेश बंद हो गया। यहां पर वह नेता जनशत्रु माना जाता है जो औद्योगिक पूंजी निवेश की बातें करता है।

आमजनता की ग्राम्यचेतना के सबसे पिछड़े मूल्यों को बनाए रखकर औद्योगिकीकरण का विरोध करना यहां के नेताओं और सांस्कृतिक नायकों की विशेषता है। विगत वाम मोर्चा सरकारों से लेकर मौजूदा ममता सरकार के आने के बाद भी यह राजनीतिक कठमुल्लापन खत्म नहीं हुआ है।सच यह है कि जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करने और वोट जुटाने के लिए राजनीतिकदलों ,स्वयंसेवी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों ने विभिन्न रूपों में राजनीतिक कठमुल्लेपन को हवा दी है।

राजनीतिक कठमुल्लापन स्थानीय मीडिया में भी व्यापक कवरेज और सम्मान प्राप्त करता रहा है।इसके कारण राज्य के बौने नेता अपने को महान नेता समझते हैं। जिन नेताओं ने कभी राज्य में एक भी पैसे का पूंजीनिवेश नहीं कराया वे जनहितकारी होने का …