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मंगलवार, 17 जून 2014

औरत को थाने नहीं महिला संगठन चाहिए


      औरतों के साथ बलात्कार और हिंसाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले कहा गया सख्त कानून बनाओ,निर्भया कांड के बाद कानून सख्त बन गया। अब बदायूं कांड के बाद के कह रहे हैं सख्त सरकार बनाओ,वह भी बन जाएगी, धैर्य रखो, लेकिन पहले यह तो सोचो भाजपा की सख्त-ताकतवर सरकार मध्यप्रदेश में है और दिल्ली में भी है, लेकिन बलात्कार और हिंसाचार थम नहीं रहे हैं।बलात्कारी न तो कानून से डर रहे हैं और न सख्त सरकारों से। वे इतने निडर क्यों हैं ?

औरतों के साथ हिंसाचार कानून और सरकार बदलने मात्र से नहीं थमेगा। औरतों को संगठित होकर लंबे संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। औरत की सुरक्षा का मामला मात्र जेण्डर प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सवाल है।पितृसत्ता के वर्चस्व के सभी रुपों के खिलाफ संघर्ष का मामला है। यह औरत के स्वभाव को बदलने का मामला भी है।

औरतों की लड़ाई कानूनी लडाई नहीं है और नहीं यह सरकार पाने की लडाई है ,वह सामाजिक परिवर्तन की लडाई है ,इसमें जब तक औरतें सड़कों पर नहीं निकलेंगी और निरंतर जागरुकता का प्रदर्शन नहीं करेंगी, तब तक स्थितियां बदलने से रहीं । इन दिनों पुंस हिंसाचार का जो तूफान समाज में चल रहा है उसमें इजाफा ही होगा।

आयरनी यह है कि औरतों के ऊपर हो रहे हिंसाचार के खिलाफ औरतें अभी तक सड़कों पर निकलने को तैयार नहीं हैं। कहीं पर भी हजारों-लाखों औरतों के जुलूस नजर नहीं आ रहे। स्थिति इतनी भयावह है कि पीड़िता को देखकर भी हम अनदेखा कर रहे हैं। पुरुषों के लिए बलात्कार एक खबर होकर रह गयी, वहीं औरतों के लिए जुल्म। हमें इन दोनों के दायरे से निकलकर औरत को संघर्ष की प्रक्रिया में लाना होगा। औरत संघर्ष करेगी तो हिंसाचार थमेगा। हमें औरत को संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना होगा। हमें औरतों को सामाजिक हलचलों से दूर रखने की मनोदशा बदलनी होगी। औरतों को भी अ-राजनीतिक होकर जीने की आदत और अभ्यासों को त्यागना होगा। औरत को अ-राजनीतिक बनाने में पुंस समाज को लाभ रहा है।

औरत अ-राजनीतिक न बने हमें उसके उपाय खोजने होंगे। औरतों में सामाजिक-राजनीतिक जागरुकता पैदा करने के उपायों पर विचार करना होगा और यह काम औरतों के बिना संभव नहीं है। पहली कड़ी के तौर पर औरतों को अखबार पढ़ने, टीवी न्यूज देखने और राजनीतिक खबरों में दिलचस्पी लेने की आदत डालनी होगी।

औरत को सीरियल संस्कृति और मनोरंजन संस्कृति के बंद परकोटे से बाहर निकलना होगा। मनोरंजन की कैद में बंद औरत अपनी रक्षा नहीं कर सकती। यह वह औरत है जो सामाजिक -राजनीतिक भूमिका से संयास ले चुकी है।

यह सच है कि औरतें रुटिन कामों को सालों-साल करती रहती हैं और घरों में बैठे हुए बोर होती रहती हैं, लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि सीरियल या मनोरंजन प्रोडक्टों का रुटिन आस्वादन और भी ज्यादा बोर करता है। उनका अहर्निश आस्वादन हमें बोर और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय बनाता है।

औरत सामाजिक तौर पर निष्क्रिय न बने इसके लिए औरतों को यह जानना होगा कि वे जिसे आनंद या मनोरंजन समझ रही हैं वह तो उनकी बोरियत बढ़ाने वाला संसाधन है। औरत को मनोरंजन की नकली भूख को खत्म करने के लिए मनोरंजन के असली और कारगर रुपों को अपनाना होगा।

औरतें अ-राजनीति के दायरे के बाहर आएं इसके लिए जरुरी है कि वे अपनी पहल पर लोकतांत्रिक महिला संगठनों की शाखाएं अपने मुहल्ले में खोलें और नए सिरे से सामाजिक सवालों पर मिलने-जुलने और काम करने का सिस्टम तैयार करें। आज स्थिति यह है कि भारत के अघिकांश मुहल्लों में महिला संगठन नहीं हैं। महिला संगठनों के बिना महिलाओं को नहीं बचा सकते।



महिलाओं को हर इलाके में थाने नहीं महिला संगठनों की जरुरत है। महिलाओं के इस तरह के संगठनों की जरुरत है जो निरंतर महिलाओं के सवालों पर सोचें और महिलाओं को सक्रिय-शिक्षित करें। महिलाएं सक्रिय-शिक्षित और संगठित बनेंगी तब ही हिंसाचार रुकेगा।

गुरुवार, 10 मार्च 2011

महिलाओं का बहुआयामी संघर्ष- (1)- माकपा सांसद वृंदा कारात

(इस साल सारी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है,समूचे साल हम अपने ब्लॉग पर महिलाओं के संघर्षों और समस्याओं पर विभिन्न क्षेत्र के विचारकों और स्त्रीवादियों के आलेख उपलब्ध कराएंगे, इस कड़ी में भारत के महिला आंदोलन की गंभीर मीमांसा करते हुए का.वृंदा कारात के लेख को उनकी किताब से साभार किश्तों में छाप रहे हैं,यह लेख महिला आंदोलन की समीक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है)  
    स्वतंत्रता संघर्ष की कुठाली में भारतीय नारी आंदोलन का जन्म हुआ था। इसीलिए प्रारंभ से ही दूसरे नारी आंदोलनों के विपरीत, खास तौर पर पश्चिम में समकालीन नारी मुक्ति संघर्षों के विपरीत, जिनके सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष संबंधों को संबोधित करने के मुख्य उद्देश्य की तलाश समाप्त हो जाती थी, हमारा (भारतीय) आंदोलन एक सीमित लैंगिक ढांचे से परे अधिक श्रेष्ठ हो आगे बढ़ पाया। भारतीय नारी आंदोलन की चेतना के साथ औपनिवेशिक सत्ता से स्वाधीनता और मुक्ति के सवाल बड़ी जटिलता के साथ उलझे हुए थे। स्त्रियों की वह चेतना जो न केवल पुरुषों से संबंधित थी अपितु पूरे विश्व से उसकी चेतना की डोर बंधी थी। यह अहसास कि मुक्ति के लिए सभी संघर्ष अविभाज्य हैं, समानता के लिए वैश्विक संघर्ष में हमारे आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस पहला अखिल भारतीय महिला संगठन था। उसका चरित्र उसको स्पष्ट रूप से स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्य धारा से एकरूप करता था। बुर्जुआ उदारवादी और वामपंथी दोनों ही अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में साथ ही आ जुड़े थे। इसका गठन 1920 में महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक लोकप्रिय बनाने के आह्वानों के साथ खड़ा हो गया। महात्मा गांधी का यह आह्वान संघर्ष को उसकी ऊंची जाति और अभिजात्य वर्ग की जकड़ से अलग करने के लिए किया गया था। अत: अखिल भारतीय महिला कांग्रेस, और जो उससे जुड़े हुए थे, ने न केवल स्त्रियों के अधिकार और सम्मान की लड़ाई में एक अहम मुकाम हासिल किया अपितु इस दायित्व को स्पष्ट तौर पर देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक इकाई के रूप में स्थापित कर दिया। यही वह वास्तविक शक्ति थी जो नारी आंदोलन ने अपने जन्म के समय अर्जित की जो आंदोलन के हृदय स्थल में अभी तक संजो कर रखी गई है। यह एक ऐसी परंपरा है जो आंदोलन के खास स्वरूप में इस प्रकार गतिमान है कि उसके मार्ग में आने वाले उतार-चढ़ावों में आजतक उसका मार्गदर्शन कर रही है।
58 साल पहले पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के इतर सांप्रदायिकता और बंटवारे के साथ जो मिला वह एक ऐसी विशिष्ट स्थिति थी जो नारी आंदोलन के लिए चिंता का विषय थी। आजादी के साथ हिंसा का एक बहुत बड़ा ज्वार भी आया था। महिला संगठनों को सबसे पहला सामना हिंसा, सांप्रदायिकता और धार्मिक समुदायों के आधार पर बंटी पीड़ित महिलाओं से करना था। हिंदू और मुसलिम दोनों ही महिलाएं सांप्रदायिक लोगों की ज्यादतियों की सीधी शिकार हुई थीं। सरकारी साहित्य में इन आघातों को थोड़ी ही आवाज मिली है। शायद वह इसलिए कि त्रासदी का विस्तार इतना बड़ा था कि जो महिलाएं हिंसा का शिकार हुई थीं उनका सारा ध्यान अपनी बिखरी जिंदगियों के कोनों को समेटने में और उन्हें फिर से जोड़ने में लगा था। पंजाब, दिल्ली और बंगाल में महिलाओं के साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं का इस स्थिति से आमना-सामना हुआ। एक बार फिर से स्पष्ट था कि नारी आंदोलन को महिलाओं पर पड़े सांप्रदायिकता के विशेष प्रभाव को समझते हुए एक व्यापक राजनीतिक संघर्ष के बीच काम करना होगा।
मोटे तौर पर इसी समय के आसपास एक बहुत ही बड़ी महत्वपूर्ण धारा नारी आंदोलन में उभरकर आई। अफसोस की बात है कि इस विषय के अकादमिक अध्ययनों में इसे वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी। वाम-रेडिकल प्रवृत्ति गरीब औरतों के बीच काम करने से आकार ले पाई थी। सूखे से निबटने के लिए जिस प्रकार की जबरदस्ती महिलाओं के साथ की जा रही थी उसे देखकर ऐसी बहुत सी महिलाएं जो पहले अखिल भारतीय महिला कांग्रेस में थीं वे नारी आत्म रक्षा समिति (एनएआरएस) में शामिल होने के लिए प्रेरित हुईं। यह आंदोलन तेजी से बढ़ा और उसने संगठित वाम से बहुत ही परिपक्व संगठनात्मक संबंध विकसित किए। नारी आत्म रक्षा समिति के सदस्यों ने ऐतिहासिक तेभागा संघर्ष का समर्थन किया और उसमें भाग भी लिया। देश के अन्य स्थानों पर वाम राजनीतिक झुकाव के साथ महिलाएं कामकाजी वर्ग और तेलंगाना के संघर्ष जैसे क्रांतिकारी किसान संघर्षों में शामिल थीं। तेलंगाना वाम के लिए एक बहुत ही प्रभावशाली सीखने वाला अनुभव साबित हुआ, जिसने यह दरशाया कि महिलाएं संघर्ष कर सकती हैं।
महिलाओं के बहुआयामी संघर्ष नेराष्ट्रीय विकास के संबंध में, राजनीति के संबंध में और उनकी खुद की जिंदगियों और परिवारों के संबंध मेंआजादी के बाद भारतीय नारी आंदोलन को एक आकार दिया। आजादी के बाद बुर्जुआ-उदार विचारधारा वालों में से अधिकतर का यह विश्वास था कि एक बार स्वतंत्रता मिल जाए तो सत्ता का नया ढांचा महिलाओं की समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करेगा। अत: आवश्यकता थी स्त्री का व्यवस्था में ही प्रतिनिधित्व करने की और साथ ही उनकी चिंताओं को उचित रूप से स्पष्ट किया जाता, तब उसके बाद उनकी मांगों को पूरा किया जाता। बुर्जुआ-उदार महिला आंदोलन जो कि तब जाहिर है सैध्दांतिक रूप से कांग्रेस से जुड़ा हुआ था, महिलाओं के लिए बराबरी का मौका चाहता था, उन्हें इस खेल से कोई आपत्ति नहीं थी।
आजाद भारत के वजूद में आने के छह साल में ही यह आत्मसंतोष चकनाचूर हो गया। शायद यह विडंबना ही है कि महिला आंदोलन को अपनी सबसे बड़ी चिंता के रूप में सांप्रदायिकता और कट्टर पंथ से किसी और से काफी पहले ही उलझना पड़ा। महिला आंदोलन को कोड बिल और हिंदू पर्सनल ला सुधार के मामले में तुरंत की सभी दलों में मौजूद हिंदू अंधराष्ट्रवादियों के रूप में मौजूद बहुसंख्यक कट्टरपंथ से भिड़ना पड़ा। जिन महिलाओं ने कट्टरपंथियों के विरुध्द युध्द किया उन्होंने इस जंग में एक असाधारण साहस का परिचय दिया। वामपंथ में रेणु चक्रवर्ती, अहिल्या रांगनेकर और कई अन्य महिलाएं और अखिल भारतीय महिला कांग्रेस से कमलादेवी चट्टोपाध्याय, पद्मजा नायडू और अन्य कई महिलाएं जहां तक महिलाओं का सवाल है नेहरूवादी परियोजना के प्रतीक चिह्न थे। इन्हें मजबूरन इस प्रक्रियावादी हिंदू दक्षिणपंथ के मध्ययुगीन चेहरे से दो-दो हाथ करने पड़े जिसके सुधार विरोधी पक्ष को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद का समर्थन प्राप्त था।
इन महिलाओं की निंदा की गई। इन्हें गाली दी गई। यह दिलचस्प है कि सती विरोधी और बाद में हुए अन्य नारी आंदोलनों में हमारे खिलाफ इस्तेमाल किए गए विशेषणों की ये महिलाएं पहली शिकार थीं। जिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया उनमें से चंद थे 'पाश्चात्य', 'भारतीय परंपरा से दूर', 'झूठे धर्मनिरपेक्षतावादी'। इन बहसों में जो मुहावरा इस्तेमाल नहीं हुआ वह है 'बालकटी' (परकटी)। सालों के संघर्ष के बाद भारतीय नारी आंदोलन ने आंशिक विजय हासिल की है। फिर भी, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय राज्य और बुर्जुआ राजनीति का असली चेहरा सबके सामने बेपरदा हो गया है।
कुछ भी हो 1960 में ही यह तीखा संघर्ष हलका पड़ गया था। वह एक ऐसा समय था जिसका चेहरा-मोहरा युध्दों और सभी जन आंदोलनों से बना था, इस संकट की स्थिति में, पीछे हटना और आत्मविश्लेषी बन गया। इस दौर में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस अपना सारा ध्यान कल्याण और सामाजिक कार्यों पर केंद्रित करते हुए अपनी राह चल पड़ा। वामपंथ अपनी परंपरा के अनुरूप भूमिका अदा करते हुए अपने आधार को बढ़ाने और मौजूदा प्रभाव वाले क्षेत्रों को संगठित करने में लगा हुआ था। 1970 तक वामपंथी नारी आंदोलन महिलाओं के काम और कार्यस्थल पर समानता के मुद्दे पर श्रमिक संगठनों को प्रभावित करने की स्थिति में था। 1970 का दौर पारंपरिक उद्योगों, खासकर कपड़ा और जूट में एक बहुत बड़ी छंटनी का साक्षी रहा है। वामपंथ में महिला संगठन इस स्थिति को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थे, क्योंकि यह स्पष्ट था कि महिलाएं काम पर बहुत ही मुश्किल से रखी जाती थीं पर सबसे पहले बहुत आसानी से निकाल दी जाती थीं।
वामपंथ में महिलाओं को 1970 के दौरान कम से कम कुछ तो बड़ी सफलताएं मिली थीं : समान काम के लिए समान वेतन के महत्वपूर्ण कानूनों को पास कराने में उन्होंने योगदान दिया पर शायद बहुत ही संकेतात्मक तरीके से। हालांकि ऐसे कोई भी संयुक्त संघर्ष नहीं हुए जिनमें सभी प्रकार के महिला संगठन शामिल हों। शायद यह कुछ लोगों में एक व्यापक भ्रम के कारण था कि कदाचित एक महिला प्रधानमंत्री महिलाओं की स्थिति को सही मायने में बेहतर करने की दिशा में ज्यादा कार्य कर सके। ऐसा कुछ नहीं हुआ। बुर्जुआ-उदारवादी महिला संगठनों और वामपंथी महिला संगठनों के बीच मतभेद और गहरा गए। यह स्पष्ट है कि दरार पुराने सैध्दांतिक मुद्दों पर नहीं चटकी थी अपितु उसका ताल्लुक वास्तविक महिला के रोजमर्रा के जीवन से तत्काल बहुत ही निराशाजनक तरीके से था। अन्य कई संघर्षों की तरह भारतीय नारी आंदोलन के इतिहास के लिए भी आपातकाल एक विभाजक साबित हुई। 1975 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष की की गई घोषणा के जवाब में सरकार द्वारा प्रस्तुत भारत में महिलाओं की स्थिति रिपोर्ट इसका एक कारण था। यह कहना पड़ेगा कि भारतीय नारी आंदोलन को प्रख्यात अंतर्राष्ट्रीय महिला आंदोलनों से फायदा हुआ, क्योंकि लैंगिक मुद्दों पर इनका अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं पर बड़ा प्रभाव था। भारत में हम भाग्यशाली थे कि भारतीय महिला की स्थिति रिपोर्ट, जो कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के लिए जारी की गई थी, महिलाओं की एक ऐसी समिति ने तैयार की थी जिसकी सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता था। इसका जो परिणाम निकला था वह एक प्रारंभिक दस्तावेज था, जिसको जांचने के लिए वह सभी स्थितियां सामने रख दी गईं जिनमें आजादी के बाद महिलाओं को फायदा और नुकसान हुआ।
आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के दौरान कई नए महिला संगठन उभरकर सामने आए, जिन्होंने पहले से ही स्थापित महिला संगठनों की राजनीति को नकार दिया और पश्चिम में महिला संगठनों ने जो विचार सामने रखे थे उनकी ओर रुख किया। 1970 के दशक के दौरान अकादमिक विमर्श और विश्वविद्यालयों में युवा महिलाओं में लिंग संबंधी मुद्दों को काफी महत्व मिला। उदाहरण के लिए, यहां तक कि दिल्ली के कम रेडिकल माने जाने वाले कॉलेजों में 'मिश फ्रेशर' प्रतियोगिताओं के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। यदि आपातकाल के कारण यह तय था कि इन प्रवृत्तियों का कोई परिणाम नहीं निकल सकता था, ये संगठन लोकतंत्र के लिए चल रहे आंदोलन का एक हिस्सा बनकर फूटे और बाद में स्वायत्त समूहों के रूप में उभरे। अब भारतीय महिलाओं के आंदोलन में तीन तरह की प्रवृत्तियां थीं बुर्जुआ उदारवादी, वामपंथी और स्वायत्त समूह। जल्दी ही एक चौथा भी उभर कर सामने आयागैरसरकारी संगठन, जो कि महिलाओं को सेवाएं और एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए समर्पित था और जिनको महिलाओं को लाभ पहुंचाने के लिए जन राजनीति को एक साधन मानना स्वीकार नहीं था।
शुरुआती दौर में इन नई प्रवृत्तियों ने भारतीय नारी आंदोलन की परंपराओं को पूरी तरह से अनदेखा किया और उनकी अवमानना की और उनकी राजनीति संकीर्ण लिंग (जेंडर) राजनीति के इर्द-गिर्द आकार लेने लगी। पुराने महिला संगठनों की जो आलोचना की गई उसके केंद्र में यह बात थी कि महिला की परिवार में भूमिका और उसके बाद खुद के लिए निजी जगह को इन संगठनों द्वारा पूर्ण रूप से नजरअंदाज किया गया था। इस तर्क में कुछ दम तो था। महिलाओं के आंदोलन के विकास की राह मेंइसमें मैं वामपंथी महिलाओं के आंदोलन को शामिल करती हूंएक असमान और उत्पीड़ित पारिवारिक परिस्थितियों में एक महिला की भूमिका पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया था। यह बात विवाद के परे थी कि इस सवाल का समाधान ढूंढ़ना जरूरी था। पर इससे कैसे निबटा जाए यह एक गंभीर बहस का मुद्दा बना।
                                                                                        (क्रमशः)
(भारतीय नारीःमुक्ति और संघर्ष,वृंदा कारात,अनुवाद-उषा चौहान,ग्रंथ शिल्पी,नई दिल्ली से साभार)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष- भारतीय औरत के राजनीतिक मर्म की तलाश में


     
                                                                                   जेण्डर सामाजिक निर्मिति है। जेण्डर के प्रयोग को लेकर हिन्दी में समानधर्मा सही शब्द औरत या महिला है। जबकि लिंग के पर्याय के रूप में दोनों लिंग -स्त्री और पुरूष- का बोध होता है। लिंग के रूप में जन्म प्रकृत्या होता है। किन्तु जेण्डर के रूप में औरत का निर्माण किया जाता है। कोई भी स्त्री जन्म से औरत के गुण लेकर पैदा नहीं होती। बल्कि उसके निर्माण में परिवार,शिक्षा, संस्कृति, राजनीति,अर्थशास्त्र आदि की केन्द्रीय भूमिका होती है।
   सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में औरत की पहचान के मानक भी बदले हैं। आज औरत की पहचान का जो मानक प्रचलन में है वह दो सौ साल पहले नहीं था।अत: औरत के बारे में बात करते समय ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का होना प्राथमिक शर्त्त है। ऐतिहासिक नजरिए के बिना औरत को समझना मुश्किल है। औरत सिर्फ सामयिक ही नहीं है। वह सिर्फ अतीत भी नहीं है। उसे काल में बांधना सही नहीं होगा । उसकी पहचान को ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। वह जितनी दिखती है उससे ज्यादा छिपी रहती है। वह प्रक्रिया है यही वजह है सबसे ज्यादा लोचदार है। किसी के साथ और किसी भी स्थिति में सामंजस्य बिठा लेती है। वह कब बदलेगी,उसका नया रूप कैसा होगा,नये रूप में वह समाज के साथ किस रूप में पेश आएगी इत्यादि सवालों के तयशुदा उत्तर हमेशा गलत साबित हुए हैं। 
मसलन् यह सवाल किया जा सकता है कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में औरतों ने व्यापक स्तर पर हिस्सा लिया और राजीतिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कुर्बानी भी झेली। किन्तु यही औरत आजादी के बाद घर की चौहद्दी में वापस क्यों लौट गई ? ऐसा क्यों हुआ कि जिस औरत ने सामाजिक-राजनीति जीवन में अपने लिए व्यापक जगह तैयार की थी और राजनीति-सामाजिक मसलों पर दृढ़ रवैय्या अपनाया था , उसका समाज में पूरी तरह राजनीतिक प्रक्रियाओं में रूपान्तरण क्यों नहीं हुआ ? हमारे स्वाधीनता संग्राम ने औरत को राजनीतिक शिरकत का मौका दिया, गांधी और नेहरू जैसे नेताओं के नेतृत्व में आन्दोलन का अवसर दिया, सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में महिला सैन्य दल भी बना, महिला संगठनों के जुझारू दल भी बने किन्तु आजादी मिलने के बाद यह संघर्षशील औरत अचानक गायब हो गई। यह औरत कहां गुम हो गई ? इसके बारे में अभी तक ठीक से कुछ भी पता नहीं है ।
          आजादी के बाद सत्ता को औरत के राजनीतिक-सामाजिक रूप की बजाय उसका घर की चारदीवारी में सक्रिय रूप ही ज्यादा पसंद था। इस औरत के गायब हो जाने का दूसरा  प्रधान कारण था हमारी स्वाधीनता का पुंसवादी चरित्र। औरतें स्वाधीनता संग्राम हो या क्रांतिकारी कतारें हों सब जगहों पर नेतृत्व और फैसलेकुन कमेटियों का हिस्सा थीं। उसे राजनीतिक शिरकत के लिए घर से बाहर निकाला गया था ,उसका ब्रिटिश शासकों के खिलाफ दबाव के औजार की तरह इस्तेमाल किया गया। उसके साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को स्त्री की स्वाधीनताकामी चेतना में रूपान्तरित नहीं किया गया। उसे देश की आजादी के लिए मर मिटने के लिए तैयार किया गया। देश की पहचान के साथ जोड़ा गया। ऐसा करते समय हम यह भूल गए कि देश या राष्ट्र पुंसवाद का प्रतीक होता है। हमारे आजाद भारत के नए नक्शे में औरत में परंपरागत औरत को ही रखा गया। यही वजह है कि जब स्वाधीन भारत का जन्म हुआ तो देश नया था,मर्द नया था,मध्यवर्ग नया था,मजदूरवर्ग नया था, किन्तु औरत का वही पुराना रूप था जिससे निकलकर उसने देश की मुक्ति की कामना की थी ?
         यह सवाल महिला संगठनों से भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसा कैसे हुआ कि स्वाधीनता संग्राम की आग में तपकर जो औरत सामने आयी थी वह अचानक गैर-राजनीतिक कैसे बन गयी ? महिला संगठनों ने आजादी के तुरंत बाद औरत को राजनीतिक तौर पर जगाए रखने का काम क्यों नहीं किया ? आजादी के तुरंत बाद कांग्रेसियों ,सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों ने स्त्री जागरण की उपेक्षा क्यों की ?
जो औरत 15 अगस्त 1947 तक राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी के लिए महत्वपूर्ण मानी गयी वही औरत आजादी के बाद राजनीति के  परिदृश्य से गायब क्यों हो गई ? क्या सिर्फ राजनीतिक शिरकत से औरत की चेतना बदल जाती है ? हमारे स्वाधीनता-संग्राम ने क्या स्त्री -चेतना को बदला था ? क्या भारत -विभाजन के दौरान हुए साम्प्रदायिक कत्लेआम का औरत की चेतना के अ-राजनीतिकरण में अवदान है ? क्या भारत विभाजन ने अ-राजनीति की राजनीति की वैचारिक जमीन तैयार की थी ?क्या इसके कारण स्त्री -चेतना का साम्प्रदायिकीकरण हुआ था ? इन सवालों का अभी तक संतोषजनक उत्तर नहीं मिला है।
     यह सच है कि साम्प्रदायिक राजनीति का जो सिलसिला आजादी के आन्दोलन के दौरान शुरू हुआ उससे महिलाओं की राजनीतिक चेतना पर भी बुरा असर हुआ और भारत विभाजन में जिस तरह लाखों औरतों को नारकीय यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं,कत्लेआम और शोषण का सामना करना पड़ा उसके कारण महिलाचेतना और महिलाओं की राजनीतिक शिरकत को गहरा धक्का लगा। महिलाओं का अ-राजनीतिकरण हुआ।
जिस समय सन् 1980 के बाद महिला आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ रहा था। उसी समय बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि आंदोलन के बहाने शुरू हुई साम्प्रदायिक लहर ने महिलाओं को भी प्रभावित किया। पहलीबार महिलाओं के साम्प्रदायिक राजनीतिक संगठन सामने आए, साम्प्रदायिक हिंसाचार में औरतों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए साम्प्रदायिक हिन्दू संगठनों ने प्रयास शुरू किए। दंगों में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी देखी गई।
 महिलाओं का सन् 1947 के विभाजन ने जो अ-राजनीतिकरण किया उसी का कालान्तर में हिन्दुत्ववादी संगठनों ने जुझारू साम्प्रदायिक विचारधारा के साथ इस्तेमाल किया। यह विडम्ब्ना ही कही जाएगी कि जिस समय औरतें अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रही थीं,राजनीतिक स्पेस तैयार करने में लगी थीं, औरतों के व्यापक हितों से जुड़े सवाल उठा रही थीं,अपना जनाधार व्यापक बनाने की कोशिश कर रही थीं। औरतों के लिए राजनीतिक माहौल अनुकूल बन रहा था,ठीक उसी समय औरतों को साम्प्रदायिक विभाजन और साम्प्रदायिक हिंसा का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ा। 
    यही वह दौर है जिसमें औरत को अगड़े और पिछड़े के आधार पर, हिन्दू और मुसलमान के आधार पर विभाजित करके पेष किया गया। जेण्डर के रूप में औरत की समग्र पहचान को तोड़ा गया। अब एक ऐसी औरत सामने आयी जिसे दंगाई औरत भी कह सकते हैं। दंगा करती औरत, आग लगाती औरत ,पूरी तरह साम्प्रदायिक औजारों से लैस औरत। इस औरत की छवि भारत में पहले कभी नहीं देखी गई थी।
 औरत की जेण्डर के रूप में पहचान को अस्वीकार करने वाली समस्त धारणाएं अंतत: मर्दवादी विचारधारा की शरण में जाती हैं। इसे मर्दवाद का प्रच्छन्न लक्षण कहना गलत नहीं होगा।औरत के इस विभाजनकारी रूप ने जेण्डर के रूप में महिला की राजनीतिक और सामाजिक पहचान को जबर्दस्त क्षतिग्रस्त किया है। महिला आन्दोलन की राजनीतिक षक्ति को कमजोर किया है। विचारधारा के क्षेत्र में पुंसवाद के खिलाफ संघर्ष को कमजोर किया और सामाजिक कट्टरता को पुख्ता बनाया है।
   औरत की धारणा को लेकर साहित्यकारों और राजनीतिज्ञों में पुरूष-संदर्भ अभी भी वर्चस्व बनाए हुए है। औरत अभी भी साहित्य में बेटी,बहन,बीबी,बहू ,माँ,दादी,चाची,फूफी, मामी आदि रूपों में ही आ रही है। औरत को हमारे साहित्यकारऔर राजनीतिज्ञ परिवार के रिश्ते के बिना देख नहीं पाते ,पुरुष -संदर्भ के बिना देख नहीं पाते। कहीं-कही औरत की आर्थिक यूनिट के रूप में छवि नजर आती है।
    इस प्रसंग में हिन्दी आलोचना के बारे में सबसे पहली आपत्ति यह है कि उसमें स्त्री का एक अनुशासन (डिसिपिलीन) के रूप अभी तक अध्ययन ही नहीं किया गया। सच यह भी है कि हिन्दी में बहुत कम विषय हैं -कविता और इतिहास को छोड़कर -जिनका अनुशासन के रूप में अध्ययन-अध्यापन किया गया है।
      कायदे से ज्ञान के अनुशासन के रूप में औरत के अध्ययन-अध्यापन पर जोर दिया जाना चाहिए। हम अनुशासन के रूप अध्ययन पर जोर क्यों दे रहे हैं ? इसका प्रधान कारण है कि जब आप किसी विषय का अनुशासन के रूप में अध्ययन करते हैं तो विषय का दायरा परिभाषित करते हैं। तब ही उसका अध्ययन कर पाते हैं। जब उसके लिए विशिष्ट पध्दति चुनते हैं तो विश्लेषण के माध्यम से भाषा और अवधारणात्मक औजारों का निर्माण करते हैं। बिना यह किए आप जेण्डर या औरत को परिभाषित नहीं कर सकते।
 स्त्री के सामाजिक यथार्थ को रूपायित करने के लिए स्त्री-पुरूष की सही इमेज या अवस्था की सटीक समझ परमावश्यक है। औरत की सही समझ के अभाव में समूचा विवेचन अमूर्त्त हो जाता है, प्रभावहीन हो जाता है ,औरत अमूर्त्त या अदृश्य हो जाती है। औरत की अदृश्य स्थिति के कारण विकृत विश्लेषण जन्म लेता है, और जो निष्कर्ष निकाले जाते हैं वे अप्रामाणिक और अधूरे होते हैं। यह स्थिति आज भी हमारे साहित्य में मौजूद है।
 साहित्य में वर्णित ज्यादातर लेखन स्त्री के प्रति अमूर्त्त समझ को व्यक्त करता है। इसका प्रधान कारण है जेण्डर की सही सैध्दान्तिकी के ज्ञान का अभाव। असल में जेण्डर तय गतिशील अभ्यासों का प्रतिनिधित्व है। स्त्री के जब राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात की जाती है और उसे समस्या के समाधान के रूप में पेश किया जाता है तो उसके राजनीतिक क्षेत्र में कम प्रतिनिधित्व की बात को उठाया जाता है।ऐसी अवस्था में जेण्डर एक वैध राजनीतिक केटेगरी के रूप में उभरकर सामने आती है।यह इस बात का भी संकेत है कि औरतों का सामाजिक प्रतिनिधित्व घट रहा है।समाज में स्त्री का जो स्थान है उसके प्रति सवाल उठ खड़े हुए हैं। औरतों की आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक अवस्था संतोषजनक नहीं है। औरत के चर्चा में आने या बने रहने का अर्थ है कि औरत के मसले अभी सुलझ नहीं पाए हैं। औरत के मसले क्यों उलझते हैं क्योंकि आम लोगों में उसकी वास्तविकता का ज्ञान नहीं होता। औरत के प्रति पूर्वाग्रह काम करते रहते हैं। औरत के प्रति समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को खत्म करने के लिए औरत की जेण्डर के रूप में पहचान को समग्रता में विश्लेषित किया जाना चाहिए। इस कार्य में अर्थशास्त्र और राजनीति में जेण्डर विमर्श की सही समझ का होना जरूरी है।


                      
                       




गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

औरतों की कारपोरेट गुलामी का नया आयाम

भारत में औरतों की गुलामी का  एक नया पहलू सामने आया है। यह पहलू चौंका देने वाला है कि आखिरकार कारपोरेट घराने हमारे देश में किस तरह की कर्म संस्कृति पैदा कर रहे हैं।  समस्या के संदर्भ में हमारी किसान और महिला संगठनों से अपील है कि वे आगे आएं और इस अकल्पनीय शोषण से औरतों को मुक्त कराएं।
   इस संदर्भ में हम यहां ‘बिजनेस स्टैंडर्ड ’ के 25 अक्टूबर 2010 के अंक में प्रकाशित श्रीलता मेनन की एक रिपोर्ट साभार दे रहे हैं जो हमारी नयी कारपोरेट संस्कृति के इस नए आयाम पर रोशनी डालती है। रिपोर्ट पढ़ें-

सवालों के घेरे में है गरीब महिलाओं की मदद करने वाली परियोजना -श्रीलता मेनन    
जब वर्गीज कुरियन ने डेयरी सहकारी आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया था, तब गुजरात की लाखों गरीब महिलाएं अरबों डॉलर वाले ब्रांड की मालकिन बन गई थीं। दूध उपलब्ध कराने वालों को ब्रांड का मालिकाना हक देने वाला ऐसा ही मॉडल पंजाब में ट्रू मिल्क के नाम से उभरा है। हालांकि यह लाभ के बंटवारे और अवैतनिक श्रम से जुड़े सवाल उठा रहा है।
किला रायपुर विधानसभा के कांग्रेस विधायक जस्सी खंगूड़ा ने लुधियाना में मैक्रो वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की है, लेकिन यह दूध की खरीद उस तरह नहीं करता, जिस तरह से अमूल करता है। वह करीब 3,080 महिलाओं द्वारा खरीदे गए जानवर 22 गांवों में स्थापित मिल्किंग पार्लर कम प्रोसेसिंग प्लांट में रखते हैं। इस प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना उन्होंने खुद की है।
महंगी अंतरराष्ट्रीय ब्रीड वाली गायों (प्रति महिला पांच गाय) की खरीद की खातिर बैंक लोन हासिल करने और इसे चारा डालने व दूध दूहने में महिलाओं की भूमिका सीमित है। ऐसे में उन्होंने गायों को खंगूड़ा को उपलब्ध करा दिया है और इन गायों को वह अपनी जेब से चारा मुहैया कराती हैं। वे अपनी गायों को साथ ले जाने के लिए मुक्त नहीं हैं, लेकिन उन्हें तब तक अनिवार्य रूप से डेयरी में काम करना पड़ता है जब तक कि कर्ज की पूरी रकम चुका नहीं दी जाती है। खंगूड़ा के मुताबिक, इसकेबदले हर महिला को हर महीने 2,500 रुपये मिलते हैं। इन गायों के दूध के लिए उन्हें 18 रुपये प्रति लीटर की सहकारी दर मिलती है, इस रकम से वे चारा खरीदती हैं, बैंक का कर्ज चुकाती हैं और बाकी काम करती हैं। खंगूड़ा इस दूध की बिक्री 34 रुपये प्रति लीटर पर कर देता है, लेकिन इसकी प्रोसेसिंग पर उसे 7 रुपये प्रति लीटर खर्च करना होता है। कुल मिलाकर यह खंगूड़ा के लिए हर तरह की लागत का भुगतान किया हुआ कारोबार है, न कि ऐसी परियोजना जो महिलाओं को सशक्त करता हो।
खंगूड़ा ने महिलाओं को पांच महिलाओं वाले स्वसहायता समूह में संगठित किया है। इन महिलाओं को गाय खरीदने के लिए एसएचजी से जुड़े कार्यक्रम के तहत बैंक लोन मुहैया कराया गया है। हर महिला को 45,000 रुपये प्रति गाय की दर से पांच गाय खरीदने के लिए कर्ज मुहैया कराया जाता है। गांव में कंपनी द्वारा लीज पर ली गई चार-पांच एकड़ जमीन में स्थापित प्रोसेसिंग प्लांट व बाड़े में महिलाएं अपनी गाय रखती हैं। खंगूड़ा ने हर ऐसे प्लांट पर 3.6 करोड़ रुपये का निवेश किया है और उनका कुल निवेश करीब 100 करोड़ रुपये का है। इस रकम का इंतजाम उन्होंने कुछ अपनी संपत्ति से और कुछ कर्ज लेकर किया है, यह कुल मिलाकर उतना ही कर्ज है जो कि महिलाओं ने गाय पर निवेश किया है और चारा व अवैतनिक श्रम पर उनका निवेश जारी है।
ये महिलाएं सप्ताह में छह दिन चार से छह घंटे काम करती हैं और अपने समूह की 25 गायों की देखभाल करती हैं। लेकिन दूध और अपने काम के बदले उन्हें महज 2,500 रुपये महीना मिलता है। पांच गाय का मालिकाना हक और रोजाना 1.5 लाख लीटर दूध की बिक्री केबावजूद उन्हें इतनी कम रकम मिलती है। खंगूड़ा कहते हैं कि कर्ज के भुगतान के लिए हर महिला को करीब 2,000 रुपये मासिक भी दिए जाते हैं।
डेयरी विशेषज्ञ कहते हैं कि यह स्थिति खंगूड़ा के लिए काफी अच्छी है, जिन्होंने महिलाओं द्वारा गायों में निवेश के जरिए अपने जोखिम का बचाव कर लिया है। अगर एक गाय रोजाना सिर्फ 10 लीटर दूध देती है और इस दूध की बिक्री 20 रुपये प्रति लीटर पर की जाती है तो पांच गायों के जरिए महिलाएं रोजाना करीब 1,000 रुपये कमा सकती है। वे बताते हैं कि 4,500 रुपये प्रति माह दी जाने वाली रकम रोजाना कमाई जा सकने वाली रकम केकरीब है।

कृषि अर्थशास्त्री भास्कर गोस्वामी कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय ब्रीड वाली गाय रोजाना 45 लीटर तक दूध देती है और इसका मतलब यह हुआ कि पांच गायों से करीब 5,000 रुपये की आय हो सकती है (20 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से)।
खंगूड़ा के मुताबिक, 15,400 गायों से रोजाना कुल 1.5 लाख लीटर दूध मिलता है यानी 10 लीटर प्रति गाय के हिसाब से। खंगूड़ा कहते हैं कि यह मॉडल भविष्य का है। लेकिन इसका मतलब मालिकों के लिए मुफ्त जानवर और मुफ्त कामकाज है, जबकि पशु मालिकों को कुछ नहीं मिलता है। सप्ताह में छह दिन काम करने वाली महिलाओं को यहां तक कि उनके श्रम के लिए भी भुगतान नहीं किया जाता है।
खंगूड़ा कहते हैं कि ये महिलाएं कामगार नहीं हैं बल्कि इसकी मालकिन हैं। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि ये महिलाएं स्कीम से तब तक बाहर नहीं निकल सकती हैं जब तक कि कर्ज का भुगतान नहीं कर दिया जाता है। वे यहां किसी तरह के शोषण से इनकार करते हैं और कहते हैं कि इन महिलाओं ने फायदा देखने के बाद ही इसे आजमाया है।(बिजनेस स्टैंडर्ड ,25 अक्टूबर 2010 से साभार )
            





रविवार, 20 जून 2010

पोर्नोग्राफी पर महिला संगठनों की चुप्पी क्यों ?


                हाल ही में दिल्ली में एक महिला ने अपने पति के खिलाफ पुलिस में जबर्दस्ती ग्रुप सेक्स की शिकायत की और बताया कि उसके साथ यह नारकीय काण्ड 4 साल से चल रहा था। ग्रुप सेक्स का यह पहला सार्वजनिक मामला है। ग्रुप सेक्स की कुसंस्कृति का इंटरनेट पर दिखाए जा रहे ग्रुप सेक्स के चित्रों के साथ गहरा संबंध है। इंटरनेट ऐसी अवांछित आपराधिक क्रीडाओं के लिए प्रेरित कर रहा है। इस घटना ने समाज में आ रहे सेक्स के अस्वाभाविक रूपों के दुष्प्रभाव की ओर ध्यान खींचा है। हमें इस प्रवृत्ति से सावधान होना चाहिए।
     उल्लेखनीय है इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी का धंधा जमकर चल रहा है। लेकिन भारत के महिला और राजनीतिक संगठन सोए हुए हैं। मैं लगातार महिला संगठनों के प्रकाशनों और आंदोलन की खबरों को दैनिक अखबारों में पढ़ता रहता हूँ लेकिन अभी तक कहीं पर भी ऐसी खबर देखने में नहीं आयी है कि महिला संगठनों ने इंटरनेट के जरिए चल रहे पोर्न के धंधे पर कुछ भी बोला हो। इसका यह अर्थ नहीं है कि महिला संगठनों का पोर्नोग्राफी को समर्थन है।
       लेकिन वास्तविकता यह है कि महिला संगठनों को पोर्न के इंटरनेट प्रसारण का विरोध करते सड़कों पर या इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी के दरवाजे पर नहीं देखा गया। पोर्नोग्राफी के मामले पर महिला संगठनों की चुप्पी चिन्ता की चीज है।
           महिला संगठनों को बताना चाहिए कि क्या पोर्न महिलाओं और समाज के लिए घातक है ? क्या पोर्न के प्रसारण से महिलाओं पर हमले बढ़े हैं ? क्या पोर्न से वैवाहिक संबंधों में दरार आती है ? क्या पोर्न के प्रभाववश समाज में अस्वाभाविक सेक्स का रूझान बढ़ा है ? क्या पोर्न का बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है ? क्या पोर्न महज मनोरंजन है ? क्या पोर्न पर भारत में पाबंदी लगाना सही होगा ? क्या भारत सरकार और कारपोरेट घरानों को पोर्न का धंधा करने की इजाजत देनी चाहिए ? महिला और राजनीतिक संगठनों ने पोर्नोग्राफी के खिलाफ चुप्पी क्यों साधी हुई है ? आखिरकार हम क्या करें ? हमें इन सब सवालों पर सोचना चाहिए।

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...