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सोमवार, 17 नवंबर 2014

स्वाधीनता सेनानी कमला नेहरु

                पंडित नेहरु के जीवन पर बातें हों और उनकी पत्नी कमला पर बातें न हों,यह हो नहीं सकता। विचारणीय पहलु यह है कि लेखक के नाते नेहरु को कौन सी चीजें कमला में रेखांकित करने की जरुरत पड़ी ? पहली चीज जिसे नेहरु मूल्यवान मानते हैं वह है इन्सानी रिश्ता। इन्सानी रिश्ते को राजनीति और अर्थशास्त्र की बहसों के बहाने नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर पति-पत्नी के संबंधों के बीच इन्सानी रिश्तों का एहसास रहना चाहिए।नेहरु ने रेखांकित किया है कि भारत और चीन में इन्सानी रिश्तों के एहसास को नजर-अंदाज नहीं किया गया। यह हमारी पुरानी अक्लमंद तहज़ीब की देन है। इंसानी एहसास व्यक्ति में संतुलन और हम-वज़नीपन पैदा करता है। नेहरु लिख रहे हैं कि इन दिनों यह एहसास कम हो गया है। इसी क्रम में नेहरु ने लिखा '' यक़ीनी तौर पर इसे मुमकिन होना चाहिए कि भीतरी संतुलन का बाहरी तरक्की से,पुराने ज़माने के ज्ञान का नये जमाने की शक्ति और विज्ञान से मेल क़ायम हो। सच देखा जाय, तो हम लोग दुनिया के इतिहास की एक सी मंज़िल पर पहुँच गए हैं कि अगर यह मेल न क़ायम हो सका,तो दोनों का ही अंत और नाश रखा हुआ है।'' नेहरु चाहते थे हम मानव-सभ्यता की अबतक की सभी महान उपलब्धियों को आत्मसात करके विकास करें।  कमला के बारे में उनका लेखन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे उसे अपनी पत्नी के रुप में नहीं देखते थे,वे उसे भारत की औरतों का प्रतीक मानते थे।
       नेहरु ने लिखा '' मेरे लिए वह हिंदुस्तान की महिलाओं ,बल्कि स्त्री-मात्र,की प्रतीक बन गई। कभी-कभी हिंदुस्तान के बारे में मेरी कल्पना में वह एक अज़ीब तरह से मिल-जुल जाती,उस हिंदुस्तान की कल्पना में ,जो अपनी सब कमजोरियों के बावजूद हमारा प्यारा देश है,और जो इतना रहस्यमय और भेद-भरा है। कमला क्या थी ? क्या मैं उसे जान सका था ,  उसकी असली आत्मा को पहचान सका था ? क्या उसने मुझे पहचाना  और समझा था ? क्योंकि मैं भी अनोखा आदमी रहा हूँ और मुझमें भी ऐसा रहस्य रहा है ,ऐसी गहराईयाँ रही हैं,जिनकी थाह मैं खुद नहीं लगा सका हूँ। कभी-कभी मैंने ख़याल किया है कि वह मुझसे इसीवजह से ज़रा सहमी रहती थी। शादी के मामले में मैं खातिर-ख़ाह आदमी न रहा हूं , न उस वक्त था। कमला और मैं,एक-दूसरे से कुछ बातों में बिलकुल ज़ुदा थे,और फिर भी कुछ बातों में हम एक-जैसे थे।हम एक-दूसरे की कमियों को पूरा नहीं करते थे। हमारी जुदा-जुदा ताकत ही आपस के व्यवहार में कमजोरी बन गई। या तो आपस में पूरा समझौता हो ,विचारों का मेल हो,नहीं तो कठिनाईयां तो होंगी ही।हममें कोई भी साधारण गृहस्थी की ज़िन्दगी गुजारे,उसे कुबूल करते हुए ,नहीं बिता सकते थे।''
    कमला की बीमारी के समय पंडित नेहरु उनके साथ रहे और उनकी देखभाल भी की, यह एकमात्र उनके करीब रहने और एक-दूसरे से शेयर करने का सबसे बेहतरीन समय था। कमला की खूबी थी कि वह निडर और निष्कपट थीं। वे नेहरु के राजनीतिक लक्ष्यों को जानती,मानती और उसमें यथाशक्ति मदद भी करती थी।सन् 1930 में जब कांग्रेस के सभी नेता जेलों में बंद थे उन्होंने राजनीति में जमकर रुचि दिखाई। मजेदार बात यह थी उस समय सारे देश में औरतें सड़कों पर संघर्ष के मैदान में उतर पड़ीं, इन औरतों में कमला भी थी। मैदान में उतरनेवाली औरतों में सभी वर्गों और समुदायों की औरतें थीं। नेहरु ने 'हिंदुस्तान की कहानी' में इसका जिक्र किया है। उस समय मोतीलाल नेहरु ने बीमारी की हालत में कांग्रेस के आंदोलन का नेतृत्व किया और बड़ी संख्या में औरतों ने उस आंदोलन में हिस्सा लिया। यह घटना 26जनवरी1931 की है। इस दिन सारे देश में आजादी की सालगिरह मनाने का फैसला लिया गया। देश में हजारों जलसे हुए उनमें एक ''यादगार प्रस्ताव'' पास किया गया। यह प्रस्ताव हर सूबे की भाषा में था। कमला ने इसके पहले1921के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। कमला दिखने में सामान्य थी, लेकिन कर्मठता के मामले में असाधारण थी।  उनकी क्षयरोग के कारण 28फरवरी 1936 में स्विटजरलैंड में मृत्यु हुई। नेहरु ने अंतिम समय का वर्णन करते हुए लिखा है, '' ज्यों-ज्यों आखिरी दिन बीतने लगे,कमला में अचानक तबदीली आती जान पड़ी। उसके जिस्म की हालत,जहांतक हम देख सकते थे,वैसी ही थी,लेकिन उसका दिमाग अपने इर्द-गिर्द की चीज़ों पर कम ठहरता। वह मुझसे कहती कि कोई उसे बुला रहा है या कि उसने किसी शक़्ल या आदमी को कमरे में आते देखा,जबकि मैं कुछ न देख पाता था।
   28फरवरी को, बहुत सबेरे उसने अपनी आखिरी सांस ली।इंदिरा वहां मौजूद थी,और हमारे सच्चे दोस्त और इन महीनों के निरंतर साथी डाक्टर अटल भी मौजूद थे।
   कुछ और मित्र स्विटजरलैंड के पास के शहरों से आ गए और हम उसे लोज़ान के दाहघर में ले गए।चंद मिनटों में वह सुंदर शरीर और प्यारा मुखड़ा,जिस पर अकसर मुस्कराहट छाई रहती थी,जलकर ख़ाक हो गया। और अब हमारे पास सिर्फ़ एक बरतन रहा,जिसमें उस सतेज,आबदार और जीवन से लहलहाते प्राणों की अस्थियां हमने भर ली थीं।''
नेहरु जब कमला की अस्थियां लेकर लौट रहे थे तो उनका मन एकदम खिन्न और उदास था,उस क्षण को याद करते हुए लिखा है, '' मैंने ऐसा महसूस किया कि मुझमें कुछ नहीं रह गया है और मैं बिना किसी मकसद का हो गया हूं।मैं अपने घर की तरफ़ अकेला लौट रहा था,उस घर की तरफ़ जो अब घर नहीं रह गया था,और मेरे साथ एक टोकरी थी,जिसमें राख़ का एक बरतन था।कमला का जो कुछ बच रहा था,यही था।और हमारे सब सुख सपने मर चुके थे और राख़ हो चुके थे। वह अब नहीं रही,कमला अब नहीं रही-मेरा दिमाग़ यही दुहराता रहा।'' नेहरु ने अपनी आत्मकथा कमला को समर्पित करके बेहतरीन श्रद्धांजलि दी।

रविवार, 16 नवंबर 2014

नेहरु का पत्नी प्रेम

     व्यक्तित्व मूल्यांकन का आधार नैतिकता नहीं, नजरिया होना चाहिए।व्यक्ति के नजरिए और निजी जीवनशैली को जोड़कर देखना चाहिए। भारतीय परंपरा में नजरिए की उपेक्षा करके नैतिकता के आधार पर हमेशा सामंती और फासिस्ट ताकतें हमले करती रही हैं। ये ताकतें नेहरु को भी ऩिशाना बनाती रही हैं। नेहरु की आलोचना का कोई मुद्दा नहीं मिलता तो ये नैतिकता के ठेकेदार उनके निजी जीवन के मसलों पर हमले आरंभ कर देते हैं। हमारे यहाँ फेसबुक से लेकर तमाम किस्म के किताबी संस्मरणों तक नेहरुजी की निजी जिंदगी के पहलुओं के विकृतिकरण की खूब कोशिशें होती रही हैं। नेहरु जैसे बड़े व्यक्तित्व को देखने –समझने के लिए अभी हमारे देश में खुलकर विमर्श करने की जरुरत है। नेहरु के निजी पहलुओं को नेहरु के नजरिए के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। मुश्किल यह है कि नेहरु पर हमले करने वाले, पहलु नेहरु का चुनते हैं, और नजरिया अपना जोड़ देते हैं ,और इस तरह वे नेहरु की 'कलंकगाथा' निर्मित करते हैं। नेहरु के व्यक्तित्व और आचरण से हम आधुनिक मूल्यों और मानवतावादी नजरिए को लेकर बहुत कुछ सीख सकते हैं। इस प्रसंग में पहली शर्त है कि व्यक्ति के रुप में नेहरु के निजी विषयों पर लिखे- कहे पर विश्वास करें।

नेहरु का समूचा व्यक्तित्व आधुनिक था,इसकी खूबी थी अन्य के जीवन में हस्तक्षेप न करना, अन्य का सम्मान करना और अन्य को समानता के नजरिए से देखना। आधुनिक होने की ये पूर्व शर्तें हैं। हमालोगों में मुश्किल यह है कि हमने आधुनिकता का अर्थ नए कपड़े,नए हाव-भाव,नए किस्म का घर,नया फर्नीचर,नई गाडी,नया घर मान लिया। आधुनिक होने का ये चीजें प्रमाण नहीं हैं। आधुनिक होने के लिए आधुनिक नजरिए का होना बेहद जरुरी है। नेहरु इस अर्थ में आधुनिक थे कि उनके पास आलोचनात्मक विवेक था,विज्ञान और न्याय की कसौटी या वैज्ञानिक कसौटी पर चीजों,वस्तुओं,विचारों और व्यक्तियों के आचरण को वे परखकर देखते थे। उन्होंने स्वयं को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने की भरसक कोशिश की। आधुनिक होने का अर्थ पुराने का विरोधी नहीं है, आधुनिक होने का अर्थ है विज्ञान और न्यायसम्मत नजरिए से लैस होना। अपने समूचे आचरण को विज्ञान और न्यायसम्मत बनाना। अन्य का सम्मान करना,मानवाधिकारों का सम्मान करना, उनको मानना। इस नजरिए से नेहरु के अपनी पत्नी के साथ संबंधों को ध्यान से देखें तो बेहतर होगा।

पंडित नेहरु अपनी पत्नी को बेहद प्यार करते थे और उस प्यार से उनको शक्ति मिलती थी।हिन्दी में जो लेखक-आलोचक इन दिनों आत्मकथाओं के नाम पर अल्लम-गल्लम लिख रहे हैं वे नेहरु के आत्मकथा लेखन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। नेहरु ने कमला के बारे में लिखा है '' कुछ थोड़ी सी तालीम के अलावा उसे कायदे से शिक्षा नहीं मिली थी। उसका दिमाग शिक्षा की पगडंडियों में से होकर नहीं गुजरा था। हमारे यहां वह एक भोली लड़की तरह आई और जाहिरा उसमें कोई ऐसी जटिलताएं नहीं थीं, जो आजकल आमतौर से मिलती हैं। चेहरा तो उसका लड़कियों –जैसा बराबर बना रहा,लेकिन जब वह सयानी होकर औरत हुई ,तब उसकी आंखों में एक गहराई, एक ज्योति, आ गई और यह इस बात की सूचक थी कि इन शांत सरोवरों के पीछे तूफ़ान चल रहा है। वह नई रोशनी की लड़कियों –जैसी न थी,न तो उसमें वे आदतें थीं, वह चंचल थी। फिर भी नए तरीकों में वह आसानी से घुल-मिल जाती थी। दर-असल वह एक हिंदुस्तानी और खासतौर पर कश्मीरी लड़की थी-चैतन्य और गर्वीली,बच्चों-जैसी और बड़ों –जैसी,बेवकूफ़ और चतुर। अजनबी,लोगों से और उनसे,जिन्हें वह पसंद नहीं करती थी,वह संकोच करती थी;लेकिन जिन्हें वह जानती और पसंद करती थी,उनसे वह जी खोलकर मिलती और उनके सामने उसकी खुशी फूटी पड़ती थी।चाहे जो शख्स हो उसके बारे में झट से अपनी राय कायम कर लेती। यह राय उसकी हमेशा सही न होती,और न इन्साफ़ की नींव पर बनी होती,लेकिन अपनी इस सहज पसंद या विरोध पर वह दृढ़ रहती। उसमें कपट नाम को न था। अगर वह किसी व्यक्ति को नापसंद करती और यह बात जाहिर हो जाती ,तो वह उसे छिपाने की कोशिश न करती। कोशिश भी करती तो शायद वह उसमें कामयाब न होती। मुझे ऐसे इन्सान कम मिले हैं.जिन्होंने मुझ पर अपनी साफ-दिली का वैसा प्रभाव डाला हो,जैसा उसने डाला था।''(हिदुस्तान की कहानी,पृ.49-50)

इस समूचे उद्धरण में जो चीज समझने की है वह ध्यान में रखें तो आत्मकथाओं के बारे में, उनमें आए चरित्रों के बारे में सही नजरिया बना सकते हैं। मसलन् , आत्मकथा में देखें कि चरित्रों की राय ''इन्साफ़ की नींव पर '' आधारित है या नहीं ? व्यक्तित्व की आंतरिक बुनाबट किस तरह की है उसमें छल और निष्कपट भावबोध की क्या भूमिका है ? नेहरु के इस बयान से एक बात और साफ होती है कि कमला को वे बेइंतिहा प्यार करते थे। इस प्यार की अभिव्यक्ति में वे अपने मन की उन तमाम बातों को स्पष्ट ढ़ंग से कहते हैं जो वे कमला के बारे में महसूस करते थे। उन्होंने आत्मालोचना करते हुए लिखा , '' मैंने अपने ब्याह के शुरु के सालों का ख़याल किया,जबकि बावजूद इस बात के कि मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था,मैं करीब-करीब उसे भूल गया था,और उसे उस संग से वंचित रखता था,जिसका उसे हक़ था,क्योंकि उस वक्त उस मक़सद को पूरा करने में लगा रहता था,जिसे मैंने अपनाया था। '' आगे लिखा '' जब-जब और धंधों से निपटकर उसके पास आता,तो मुझे ऐसा अनुभव होता कि किसी सुरक्षित बंदरगाह में पहुँच गया हूँ। अगर घर से कई दिनों के लिए बाहर रहता ,तो उसका ध्यान करके मेरे मन को शांति मिलती और मैं बेचैनी के साथ घर लौटने की राह देखता। अगर वह मुझे ढ़ाढ़स और साहस देने के लिए न होती और मेरे थके मन और शरीर को नया जीवन न देती रहती,तो भला मैं कर ही क्या पाता ? '' नेहरु के इन शब्दों में साफ कहा कि '' मैं उसे हद से ज्यादा चाहता था''।

कमला के व्यक्तित्व के बारे में नेहरु ने लिखा '' वह जो कुछ मुझे दे सकती थी,उसे मैंने उससे ले लिया था।इसके बदले में इन शुरु के दिनों में मैंने उसे क्या दिया ? जाहिरा तौर पर मैं नाकामयाब रहा,और मुमकिन है कि उन दिनों की गहरी छाप उस पर हमेशा बनी रही हो। वह इतनी गर्वीली और संवेदनशील थी कि मुझसे मदद मांगना नहीं चाहती थी,अगरचे जो मदद मैं उसे दे सकता था , वह दूसरा नहीं दे सकता था।वह राष्ट्रीय लड़ाई में अपना अलग हिस्सा लेना चाहती थी; महज़ दूसरे के आसरे रहकर या अपने पति की परछाईं बनकर वह नहीं रहना चाहती थी। वह चाहती थी कि दुनिया की निगाहों में ही नहीं,बल्कि अपनी निगाहों में वह खरी उतरे।'' नेहरु ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक की चित्रा को उद्धृत करते हुए लिखा '' मैं चित्रा हूँ,देवी नहीं हूँ कि मेरी पूजा की जाय। अगर तुम खतरे और साहस के रास्ते में मुझे अपने साथ रखना मंज़ूर करते हो,अगर तुम अपनी जिन्दगी के बड़े कामों में मुझे हिस्सा लेने की इजाजत देते हो,तो तुम मेरी असली आत्मा को पहचानोगे।'' नेहरु जी ने लिखा यह बात कमला ने '' शब्दों में नहीं कही ,धीरे-धीरे यह संदेश मैं उसकी आंखों में पढ़ पाया।''

नेहरुजी का कमला के बारे में मानना था '' मेरे लिए वह हिन्दुस्तान की महिलाओं,बल्कि स्त्री-मात्र ,की प्रतीक बन गयी।''



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