बुधवार, 5 जून 2013

शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां


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फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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शीतयुद्धोत्तर परिप्रेक्ष्य की तलाश और मार्क्सवादी रूढ़ियां-1-

फेसबुक पर हिन्दीलेखकों में लेखकीय ध्रुवीकरण शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क से बंधा है। कायदे से शीतयुद्धीय राजनीति और सीआईए- -सोवियत कम्युनिज्म के दायरे से बाहर निकलकर चीजों को देखने की जरूरत है। खासकर मार्क्सवादी और प्रगतिशील लेखकों को अपना नजरिया बदलना पड़ेगा। मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य शीतयुद्धीय राजनीति के पक्ष-विपक्ष मे बांधता है।
नए जमाने की मांग है लोकतंत्र और दुर्भाग्य की बात है कि सीआईए या अमेरिकी साम्राज्यवाद या समाजवाद दोनों ही लोकतंत्र की सत्ता-महत्ता और स्वायत्तता को स्वीकार नहीं करते। मंगलेश डबराल,वीरेन्द्रयादव, अशोक पाण्डेय आदि ने मेरी पोस्ट पर अशोक पाण्डेय की फेसबुक वॉल पर जो बहस चलायी है उसमें भागलेने वाले सुधीजन शीतयुद्ध की राजनीति के दायरे के बाहर निकलकर नहीं सोच पाए हैं।
चार्ली चैप्लिन,ब्रेख्त आदि सभी नामी प्रगतिशील लेखकों के नजरिए की मुश्किलें वही हैं जो शीतयुद्धीय राजनीति की हैं। वे भी उसके दायरे के बाहर नहीं देख पाते। प्रगतिशीलों का शीतयुद्धीय राजनीति को समाजवाद के नजरिए से देखना मार्क्सवादी रूढ़िवाद है। मार्क्सवादी रूढ़िवाद हमें लोकतांत्रिक नजरिए से सोचने में बाधाएं पैदा करता है।
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तीसरी मार्क्सवादी रूढ़ि है -मार्क्सवादी कल्पनाशीलता। भारत में विभिन्न रंगत के मार्क्सवादियों में एक विलक्षण साम्य है वे रहते पूंजीवाद में हैं,अधिकार पूंजीवाद के चाहते हैं,पूंजीवादी संरचनाओं के दुरूस्तीकरण के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन चाहते हैं समाजवाद ।
हिन्दी के प्रगतिशील लेखकों-आलोचकों ने कभी गंभीरता के साथ "कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य और साहित्य" के अन्तस्संबंध पर विचार नहीं किया ।वे पूंजीवाद के सरलीकरणों और अमेरिकी बहानेबाजी के जरिए अपने दायित्व से भागते रहे हैं।
भारतीय समाज के निर्माण में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की प्रधान भूमिका रही है। इसे सोवियत समाजवादी नजरिए या अमेरिकी नजरिए से नहीं समझा जा सकता। इसे समाजवाद के आग्रह के नजरिए से भी नहीं समझा जा सकता।
समाजवाद का आग्रह लोकतंत्र की शक्ति को समझने में बाधा पैदा करता है। भारत का वर्तमान लोकतंत्र से निर्धारित हो रहा है और भविष्य में भी लोकतंत्र से जल्दी मुक्ति मिलने वाली नहीं है। समाजवाद यहां के लिए कल्पनाशीलता है। लोकतंत्र को हमें लोकतंत्र के नजरिए से देखना होगा। समाजवाद के नजरिए से लोकतंत्र को देखना मार्क्सवादी कल्पनाशीलता है ।
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मार्क्सवादी रूढ़िवाद की चौथी रूढ़ि है लोकतंत्र को हिकारत की नजर से देखना। हिन्दी के प्रगतिशील  लेखकों में बड़ा हिस्सा है जो समाजवाद के आख्यान और गुणों को जानता है लेकिन भारत में लोकतंत्र में लेखकीय और नागरिक अधिकारों की चेतना से शून्य है।
    मसलन्, हिन्दीलेखकों में  लेखक के अधिकारों को लेकर कोई गुस्सा नहीं है। मसलन्, हमने यह कभी नहीं सुना कि नामवर सिंह या अन्य किसी लेखक ने राजकमल के मालिक से लेखकों की रॉयल्टी समय पर देने के लिए कभी संघर्ष किया हो।
     मैं निजी तौर पर दर्जनों लेखकों को जानता हूँ जिनको प्रकाशक रॉयल्टी नहीं देता और लेखकसंघ चुप तमाशा देखते रहते हैं।
      भारत के लेखक के लिए उसके अधिकारों की चेतना समाजवादी चेतना से ज्यादा महत्वपूर्ण है। लेखक के अधिकारों की चेतना लोकतंत्र के प्रति प्रेम और आस्था पैदा करके ही पैदा की जा सकती है। लोकतंत्र में हिकारत से देखना लोकतंत्र का निषेध है।
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हिन्दी लेखकों में मार्क्सवादीदंभ बहुत बड़ी समस्या है । मार्क्सवादीदंभ भाव रहने वाले लेखक बेहतर न लिखकर भी अपने लेखकीय श्रेष्ठत्व का दावा करते हैं।
इसके कवच के तौर पर वे मार्क्सवाद को पहले सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं ,बाद में मार्क्सवादियों और फिर अपने को सर्वश्रेष्ठ घोषित करते हैं। ये लेखक भूल गए हैं कि मार्क्सवाद का जन्म श्रेष्ठता के सिद्धांत और संस्कार के प्रतिवाद में हुआ था।
मार्क्सवाद ,मार्क्सवादी और निज को श्रेष्ठ मानने का विचार अवैज्ञानिक है। मार्क्सवाद ने कभी श्रेष्ठता का दावा नहीं किया। स्वयं मार्क्स ने श्रेष्ठ होने का दावा नहीं किया।
एक अच्छा मार्क्सवादी दंभी नहीं संवेदनशील होता है,विनयी होता है,अन्य को सम्मान देता है।
दंभी की भाषा हेटभाषा होती है, रूप में भी और अंतर्वस्तु में भी। एक अच्छा मार्क्सवादी वह है जिसके पास अन्य के विचारों और विचारधारा के लिए जगह है। अन्य हैं इसलिए मार्क्सवाद उनसे भिन्न और वैज्ञानिक है।
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मार्क्सवादी लेखकों की इस दौर में सबसे बड़ी असफलता है कि वे शीतयुद्ध में साहित्य के अवमूल्यन को नहीं रोक पाए। साहित्य के जो मानक रचे गए उनमें इजाफा नहीं कर पाए।साहित्य के नए पैराडाइम को पकड़ नहीं पाए। फलतःआज वे हाशिए के बाहर चले गए हैं। लंबे समय से हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की कोई किताब बाजार में नजर नहीं आई और हिन्दी के मार्क्सवादी आलोचकों ने समीक्षा का कोई नया मानक नहीं बनाया।
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शीतयुद्ध और उसके बाद के दौर में जातीय विध्वंस का ग्लोबल चक्र चला है। पूर्व समाजवादी समाजों से लेकर कांगो-सोमालिया-इराक अफगानिस्तान आदि तक इसका दायरा फैला हुआ है। एक जमाने में समाजवादी समाज में जातीय समस्या के समाधान का हिन्दी में खूब गुणगान किया गया लेकिन जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो इस जातीय विघटन पर हिन्दी में अधिकांश मार्क्सवादी चुप रहे। यहां तक कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां और माओवादी-नक्सल भी चुप रहे। यह चुप्पी अचानक नहीं है बल्कि शीतयुद्धोत्तर यथार्थ को वैज्ञानिक ढ़ंग से न देख पाने का फल है।
शीतयुद्धोत्तर यथार्थ पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और संश्लिष्ट है। नए यथार्थ और नई राजनीतिक समस्याओं के खिलाफ मोर्चा लेते हुए आप स्वयंसेवी संगठनों और व्यक्तियों के समूहों को देख सकते हैं लेकिन मार्क्सवादी दलों-संगठनों को कहीं पर भी नहीं देखेंगे।

मसलन् यूनियन कारबाइड के खिलाफ विगत 25 सालों में कौन संघर्ष कर रहा है ?मोदी के दंगों के खिलाफ कौन केस लड़ रहा है ?आदि अनेक समस्याएं हैं जहां पर छोटे स्वयंसेवी संगठन संघर्ष कर रहे हैं ,कम्युनिस्टदल सोए हैं।

मंगलवार, 4 जून 2013

केजीबी और साहित्य



केजीबी सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी है,यह लंबे समय तक समाजवादी सोवियत संघ का ,आज अंग है रूस का। इस संस्था ने कला-साहित्य का कोई आंदोलन प्रमोट नहीं किया लेकिन साहित्य-कला के क्षेत्र में सोवियत संघ में काफी बड़ी संख्या में लेखकों को उत्पीडित किया। इनमें बड़े नाम हैं सोल्जेनित्सिन , सखारोव आदि।
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सोवियत संघ ने समाजवाद का जो मॉडल चुना यह वह मॉडल नहीं है जिसकी कल्पना मार्क्स-एंगेल्स ने की थी। समाजवादी सोवियत संघ में मानवाधिकारों को लेकर कोई समझ ही नहीं थी। खासकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि के लिए संविधान से लेकर सामाजिक संरचनाओं में कोई जगह नहीं दी गयी।फलतः विभिन्न किस्म की विचारधाराओं के माननेवाले लेखन और लेखकों के लिए भी कोई जगह नहीं थी। इसके विपरीत भारत में लोकतंत्र है और सभी नागरिकों को मानवाधिकारों की संविधान प्रदत्त गारंटी है। यहां पर कम्युनिस्टलेखक, विरोधी विचारधारा की आलोचना का संवैधानिक हक रखते हैं। इसके बाबजूद वे सोवियतसंघ आदि देशों के लेखकों के अभिव्यक्ति की आजादी के दर्द को महसूस करने में असमर्थ रहे।
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कार्ल मार्क्स -एंगेल्स के विचारों में क्रांतिकारी भावबोध इसलिए विकसित हुआ क्योंकि वे पूंजीवाद की उदार परंपराओं में विकसित हुए और क्रांतिकारी परंपराओं की खोज में सफल रहे । उन्हें उदार पूंजीवादी माहौल मिला। यदि सोवियत संघ में मार्क्स-एंगेल्स होते तो उनके साथ वही होता जो प्लेखानोव के साथ हुआ। प्लेखानोव को रूसी मार्क्सवाद का जनक माना जाता है।
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माइकेल एंजेलो ने एक बार स्वयं अपने विषय में कहा था " मेरा उपदेश ज्ञानी होने का दावा करने वाले अनेक अज्ञानियों को जन्म देगा।" इस पर प्लेखानोव ने कहा दुर्भाग्यवश यह भविष्यवाणी पूरी हो गयी है। आजकल मार्क्स का ज्ञान ऐसे अनेक अज्ञानियों को जन्म दे रहा है,जो ज्ञानी होने का दावा करते हैं।स्पष्ट रूप से इसमें मार्क्स का कोई कसूर नहीं है,बल्कि कसूर उन लोगों का है जो उनके नाम पर मूर्खता की बातें कर रहे हैं।ऐसी मूर्खताओं से बचने के लिए हमें भौतिकवाद की प्रणाली के महत्व को समझना आवश्यक है।
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सोवियत संघ के पतन में जिन कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की उनमें KGB की भूमिका प्रधान कारक है। अर्सा पहले इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली ने सोवियत संघ के पतन पर एक विशेषांक निकाला था उसमें केजीबी के पूर्वप्रधान ने यह बात रेखांकित की थी। इसके अलावा केजीबी का काम था सोवियत नागरिकों की इलैक्ट्रोनिक नजरदारी करना और आंतरिक प्रतिवाद का दमन करना। इसके कारण घर-घर में जासूस पैदा हो गए,बाप अपने बेटे पर, बीबी अपने पति पर केजीबी के लिए जासूसी कर रहे थे। यह सीधे नागरिकों के जीवन को नरक बनाने के प्रयास थे जो अंत में सोवियत संघ के विघटन और समाजवाद के पतन तक ले गए।

सोमवार, 3 जून 2013

फेसबुक मित्रों का हिप्पोक्रेटिक चरित्र

                 
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फेसबुक यूजर नई समस्याओं के समाधान रामायण,महाभारत, हनुमान चालीसा ,शिवचालीसा आदि में क्यों खोजता हैं ? अतीत के बोझ को त्यागे बिना आधुनिक नहीं बन सकते फेसबुक यूजर.
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फेसबुक यूजर अपनी वर्तमान इमेज के एक अंशमात्र को अभिव्यक्त करता है। वह अपना अतीत छिपाता है। सच बोलने से कतराता है ,फलतःजो मित्रता बनती है वह खोखली होती है। यह माउस मित्रता है या मूषक मित्रता है।
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फेसबुक में एनीमि यानी शत्रु की केटेगरी नहीं है, फलतः यही लगता है कि यह मीडियम शत्रुरहित है लेकिन अजातशत्रु युधिष्ठिर का हश्र हम देख चुके हैं उनका कोई शत्रु नहीं था लेकिन घर में 100 कौरव शत्रु निकले, क्या आप शत्रुओं से घिरे हैं ?
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फेसबुक में लाइक है ,डिसलाइक नहीं है। मित्रता के लिए मित्र की कठोर बात को भूलने की जरूरत होती है ,संभवतः इसी कारण डिसलाइक का विकल्प नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता के जरिए मित्रगण मित्रता का दावा करते हैं। इस मित्रता में कोई सामाजिक बंधन और जिम्मेदारी नहीं है।
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फेसबुक पर नकली उदारता का प्रदर्शन अंततः हिप्पोक्रेसी है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो नकली उदारता की बाढ़ का प्रत्येक वॉल पर सहज ही प्रदर्शन देख सकते हैं। नकली उदारता को बुद्धिमत्तापूर्ण अभिव्यक्ति समझनेकी भूल न करें।
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी वही करते हैं जो आमजीवन में भी हिप्पोक्रेट हैं। हिप्पोक्रेट बड़े महत्वाकांक्षी होते हैं। लेकिन फेसबुक तो महत्वाकांक्षाओं का अन्त है।
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कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिप्पोक्रेसी का निषेध हर स्तर पर किया जाना चाहिए। जो कलात्मक अभिव्यक्ति में अक्षम हैं वे ही नकली अस्मिता का इस्तेमाल करते हैं। हमें इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि फेसबुक आने के बाद हिप्पोक्रेसी बढ़ी है या घटी है ? जो लोग सामने मिलने पर अच्छे से बात नहीं करते वे फेसबुक पर भद्रभाव से बातें करते हैं, यह नकली कम्युनिकेशन का आदर्श प्रमाण है।
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फेसबुक में जो नकली नाम से सक्रिय है वे मूलतःवे लोग हैं जिनका स्वयं के प्रति कोई श्रद्धा और सम्मान नहीं है। नकली लोग और नकली नाम अंततः हिप्पोक्रेसी का वातावरण बनाते हैं और यह कु-कम्युनिकेशन की कोटि में आता है।
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फेसबुक में नकली नामों का जमघट है यह फेसबुक यूजर की हिप्पोक्रेसी है और हिप्पोक्रेट समाज नहीं बदल सकते।
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हिप्पोक्रेसी के कारण शब्द और अर्थ व्यक्ति के विचार और कर्म के बीच फांक नजर आती है। इस दरार को फेसबुक ने और भी चौड़ा किया है।
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फेसबुक यूजर को कलाकार-लेखक की कोटि में नहीं रख सकते। इसका प्रधान कारण है लेखक-कलाकार को कम्युनिकेशन में अंततःसफलता मिलती है लेकिन फेसबुक में कम्युनिकेशन के कु-कम्युनिकेशन में रूपान्तरित होने का खतरा हमेशा बना रहता है।पता नहीं आपकी लिखी पंक्तियां किसे कष्ट दे रही हो ? या कौन गलत ढ़ंग से पढ़ रहा हो ?
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फेसबुक पर हिप्पोक्रेसी खूब दिखती है। हिप्पोक्रेसी के कारण ही मित्रगण कुछ भी वायदा करते हैं, क्योंकि वायदा करने में कोई क्षति नहीं है।
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नया कम्युनिकेशन युग मनुष्य की संप्रेषण क्षमताओं का विस्तार है। साथ ही कम्युनिकेशन तकनीकी मनुष्य की संवेदनशीलता का विस्तार है।
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इंटरनेट कम्युनिकेशन के विभिन्न रूपों के आने के साथ ही प्राइवेसी का नया पैराडाइम सामने आया है।
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फेसबुक में सवारी कोई नहीं सब ड्राइवर हैं।
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फेसबुक वस्तुतः ऑटोमेशन युग का कम्युनिकेशन है इसमें जब भी आप कम्युनिकेट करेंगे अपने आप कम्युनिकेट करना होगा। आप क्या हैं और किस तरह कम्युनिकेट करना चाहते हैं यह निजी तौर पर खोज करनी पड़ेगी।

फेसबुक ,डिजिटल मानवाधिकार और नार्सिज्म



मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
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हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों का बतर्ज मैकलहान मशीनीकरण करते हैं,इस क्रम में पेश की गयी हर चीज अपना विलोम बनाती है। हमें मैकलुहान की यह बात याद रखनी चाहिए-
All media work us over completely. They are so persuasive in their personal, political, economic, aesthetic, psychological, moral, ethical, and social consequences that they leave no part of us untouched, unaffected, unaltered. The medium is the massage. Any understanding of social and cultural change is impossible without a knowledge of the way media work as environments .
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हिन्दी के बौद्धिकों में एक बड़ा वर्ग है जो अभी मानवाधिकारचेतना को महत्वहीन मानता है। उनमें संयोग से उन लेखकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं। नया दौर डिजिटल ह्यूमनिज्म का है। वे लोग जो मानवाधिकारों न समझे वे डिजिटल मानवाधिकार को समझेंगे इसमें संदेह है। मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो हिन्दी में है और फेसबुक पर आएदिन फोटोबाजी करते रहते हैं। लेकिन मानवाधिकारों के प्रति कभी नहीं बोलते। डिजिटल मानवाधिकार विलासिता के लिए नहीं है। फेसबुक पर सिर्फ फोटो लगाना,आत्मगान करना विलासिता है,हिन्दी में इसे फेसबुक रूढ़िवाद कहते हैं।
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मार्शल मैकलुहान ने लिखा है हम ऐसे युग में हैं जहां व्यापार ही हमारी संस्कृति है । यह वह युग है जहां संस्कृति ही हमारा व्यापार है।
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फेकबुक कम्युनिकेशन के दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक त्रासदियां सबसे ज्यादा घट रही हैं लेकिन हिन्दी फेसबुक में यह सब नदारत है। अति-कनेक्टविटी वालों का यथार्थजीवन से अलगाव है। दूरसंचार कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने सामाजिक जीवन के अर्थपूर्ण संपर्क को तोड़ दिया है। इसके कारण टाइम और स्पेस का शासन भी खत्म हो गया है। अब हम बिना जाने तत्क्षण राय देने लगे हैं,लाइक करने लगे हैं।अनजान लोगों की लाइकलाइन पगलाती रहती है।
अनजान का लाइक अब पैमाना है लोकप्रियता का। अब लाइक करने वाला भी लेखक बन गया है ,उसे लेखक के बराबर दर्जा मिल गया है। फलतःलेखक और लाइककर्ता दोनों मित्र हो गए हैं। अब हम लेखक के आन्तरिक और निजी विवरणों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं।
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फेसबुक टाइमलाइन की खूबी है कि यूनीफॉर्म,कंटीनुअस और कनेक्टेड है। कथाकार उदयप्रकाश जैसे नार्सिस्ट लोग (फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्टों के संदर्भ में) इस तत्व की जानते हुए अनदेखी करते रहे हैं।
एक सम्मानित लेखक के द्वारा किया गया नार्सिज्म बहुत खतरनाक होता है इसे हम हिटलर के प्रसंग में अनेक लेखकों में देख चुके हैं।
नार्सिज्म यानी आत्ममुग्धता और अहर्निश असत्य का प्रचार। हिन्दी लेखकों को इससे बचना चाहिए। फेसबुक पर इस बात को लिखना इसलिए जरूरी लगा कि क्योंकि फेसबुक पर यह नार्सिज्म खूब चल रहा है। किसी के भी बारे में अनाप-शनाप लिखने की बाढ़ आई हुई है। इसमें एक पहलू वह भी जिसमें व्यक्ति अपने बारे खूब काल्पनिक बातें लिखता है। इस तरह की काल्पनिक और बेसिपैर की बातें लिखना नार्सिज्म का वैचारिक धर्म है।
मसलन् किसी के फोटो का दुरूपयोग,विकृतिकरण,कैरीकेचर,पर्सनल हमला करना,किसी को गलत उद्धृत करना, विषयान्तर करके निजी जीवन पर हमला करना, किसी के नाम से असत्य बोलना आदि फेसबुक पर नार्सिज्म की सामान्य प्रवृत्तियां हैं और इसमें हमारे नामी और सुधीजन बाजी मारे हुए हैं। नार्सिज्म वैचारिक एड्स है।
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फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव,निजी राय,जन्मदिन,मृत्यु दिवस,शादी,ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते हैं।
फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं।यहां वातावरण अदृश्य है।इसकी संरचनाएं और बुनियादी नियम पर्वेसिव हैं।सतह पर यह सहज कम्युनिकेशन का मीडियम है। लेकिन यह सीधे व्यक्ति के अन्तर्मन और धमनियों या नसों को प्रभावित करता है। हमारे हिन्दी नार्सिस्ट इस बुनियादी तथ्य को नहीं समझते और अंट-शंट लिखते रहते हैं। अंटशंट लेखन,आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा कम्युनिकेशन में पर्वर्जन है।नार्सिज्म है।
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फेसबुक संवाद का माध्यम है,संवाद के आरंभ होने का अर्थ है प्रौपेगैण्डा का अंत। फेसबुक पर किसी भी विचारधारात्मक सवाल पर विचार विमर्श कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाता है। वह प्रौपेगैण्डा नहीं रहता।
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हिन्दी का एक बड़ा लेखक फेसबुक पर नार्सिज्म के प्रचारक के रूप में काम कर रहा है,उसके वॉल पर जाएं तो आपको भारत के कम और निजी फोटो ज्यादा नजर आएंगे।बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार  विगत 12सालों में भारत में महिलाओं की संख्या में गिरावट आई है औरत आत्मनिर्भर होने की बजाय घरों में कैद हुई हैं लेकिन हिन्दी लेखकों को यह स्त्रीयथार्थ नजर ही नहीं आता।  12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि क्षेत्र के रोजगार में 1.4 करोड़ की कमी आई। पांच साल की इस अवधि में कुल रोजगार महज 30 लाख ही बढ़े।वर्ष 2004-05 से 2009-10 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में 50 लाख रोजगार गंवाए गए।
हिन्दी के लेखकों को पंचवर्षीय योजनाएं कभी ध्यान नहीं खींचतीं,वे पुरस्कार,किताब मार्केटिंग ,सरकारीपद,नेता की चमचागिरी,हिन्दी प्रोफेसर बन पाने और न बन पाने या प्रोफेसर से समीक्षा लिखवाने में ही सारी शक्ति खर्च करते हैं।
फेसबुक पर भी नामधारी लेखक देश की गंभीर समस्याओं पर बहस नहीं चलाते बल्कि नार्सिज्म का प्रचार कर रहे हैं। वे फेसबुक पर नार्सिज्म के नायक हैं और कहानी में यथार्थवादी -जादुई यथार्थवादी हैं । अब कल्पना कीजिए कि नार्सिज्म की सेवा करके फेसबुक पर ये नामधारी लेखक किस विचारधारा की सेवा कर रहे हैं? फेसबुक पर हिन्दीलेखकों और पाठकों में आत्मप्रशंसा और आत्ममुग्धता कम हो और देश की समस्याओं पर ज्यादा बातें हों तब ही फेसबुक को एक सार्थक मीडियम बना सकते हैं।
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भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर पर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने की तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।
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भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।
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भारत और यूरोप के मीडिया में एक अंतर है। यूरोप में मानवोत्तर दौर की ओर मीडिया प्रयाण कर रहा है ,वहां सारवान मानवीय मसले उठाए जा रहे हैं।मानवीय त्रासदी और मानवाधिकारों के सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में इसके उलट अमानवीय ,बोगस,मृत विषयों को व्यापक कवरेज दिया जा रहा है।
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माओवादी हिंसा प्रभावित इलाके हमारे देश में कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य की असफलता के ध्रुवतारे हैं। इनइलाकों में माओवादियों-सरकार और कारपोरेट घरानों के द्वारा सार्वजनिक संपदा की इस -उस तरह खुली लूट हो रही है। जमकर हिंसाचार हो रहा है। एक तरह से ये इलाके कत्लघर बने हुए हैं।
सार्वजनिक संपदा की लूट को तमाशबीन की तरह देखना मध्यवर्ग की प्रवृत्ति रही है।वे इवेंट में मजा लेते हैं।फलतः मीडिया इस इलाके की घटनाओं को इवेंट बनाकर पेश करता रहा है।
आयरनी यह है कि माओवादीनेता आदिवासी संपदा संरक्षण के नाम पर अन्य किसी भी दल को वहां घुसने नहीं देते। अन्यदलों के नेताओं को इन इलाकों में जाने की फुर्सत नहीं है। यहां तककि मुख्यमंत्री को भी समय नहीं मिलता कि वो इन इलाकों में जाए और जनता की सुने। दलविहीन,संसाधन-सुविधाविहीन और तंत्रविहीन समाज के रूप में ये इलाके लूट और कत्ल के केन्द्र बन गए हैं। सैंकडों टीवी चैनलों और इंटरनेट क्रांति के बाबजूद इन इलाकों का निरंतर जमीनी कवरेज अभी अदृश्य बना हुआ है।
मुझे याद है विनायकसेन की रिहाई के समय एकमात्र कईदिन तक मीडिया ने प्रधान कवरेज दिया था। उसके बाद माओवादी हिंसा प्रभावित इलाकों का कवरेज हाशिए का कवरेज रहा है।
मीडिया की या जिम्मेदारी है कि वह सारवान और सारहीन खबर में अंतर को बार बार सामने लाए। माओवादी हिंसा से अनेक मौत,अनेक मसले,नीतियां,प्रशासन और राजनीतिकदलों का संबंध है और सबसे बड़ा संबंध आदिवासियों की जिन्दगी का है। उनके जीवन पर केन्द्रित होकर अहर्निश कवरेज जब तक नहीं आएगा केन्द्र-राज्य सरकारों के ऊपर दबाब पैदा नहीं होगा। सवाल यह है कि क्या मीडियावाले आदिवासी इलाकों में जाने को तैयार हैं ? क्या उनके पास जमीनी हकीकत को बताने वाले संवाददाता हैं ?जागो बंधु जागो।
राजनीतिकदलों, मीडिया और बुद्धिजीवियों में एक प्रवृत्ति नजर आई है कि वे छत्तीसगढ़ में माओवादियों और पुलिसबलों के हिंसाचार पर जमकर कईदिनों तक न तो बहस करते हैं और न उसे प्रधान एजेण्डा बनाकर रखते हैं। एक तरह से देखें तो दामिनीरेपकांड के बराबर भी कभी प्रधान एजेण्डा इस इलाके के हिंसाचार को नहीं बनाया गया। मैनस्ट्रीम राष्ट्रीय मीडिया जब तक इस हिंसाचार को प्रमुख एजेण्डा नहीं बनाता तब तक समस्या की ओर ध्यान नहीं जाने वाला। अभी भी क्रिकेटसट्टाकांड महान खबर है। बदलो मित्रो ,बदलो। छत्तीसगढ़ के सरकारी-माओवादी हिंसाचार को प्रधान एजेण्डा बनाओ।
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छत्तीसगढ़ में माओवादियों द्वारा कांग्रेसीनेताओं पर किया गया हमला लोकतंत्र पर हमला है। यह बात सोनिया गांधी ने सही कही है। लेकिन भाजपा ने इसे युद्ध की घोषणा कहा है। लगता है भाजपावाले युद्ध की परिभाषा भी नहीं जानते। युद्ध कहकर उन्माद पैदा किया जा सकता है लेकिन जनता का दिल नहीं जीता जा सकता। भाजपा आज तक बस्तर आदि इलाकों में आम जनता का दिल क्यों नहीं जीत पायी ,जबकि उनके पास पूर्ण बहुमत है।
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केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश का मानना है कि माओवादी आतंकवादी हैं। यदि ऐसा है तो कम से कम आतंकियों का समर्थन करने वाली बेवसाइट सरकार बंद करे। उन लोगों पर पाबंदी लगाए जो माओवादियों का समर्थन करते हैं।
मेरी नजर में माओवादी आतंक फैला रहे हैं ,हत्याएं कर रहे हैं,अन्य समाजविरोधी गतिविधियां कर रहे हैं,लेकिन आतंकी कहना सही नही नहीं है।
माओवादियों को यदि केन्द्र का एकमंत्री आतंकवादी मानता है तो केन्द्र सरकार को उनको आतंकवादी संगठन की केटेगरी में वर्गीकृत करके प्रतिबन्धित संगठन घोषित कर देना चाहिए।
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टीवी चैनलों ने माओवादी हिंसा में मारे गए लोगों के अंतिम संस्कार का लाइव प्रसारण क्यों नहीं किया ? क्या आपलोगों ने किसी चैनल पर अंतिम संस्कार का लाइव प्रसारण देखा ?
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माओवादियों और आतंकियों को कम करके आंकने और उनके द्वारा पैदा किए गए खतरे की अनदेखी करने का दुष्परिणाम है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का समूचा प्रमुख नेतृत्व माओवादियों के हाथों मारा गया। आतंकवादियों के प्रति तदर्थभावबोध मौत के मुँह में ले जा सकता है।
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भारतीय मीडिया में कु-सूचना तेजी से चलती है ,उनके लिए सत्य और तथ्य प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
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शीतयुद्ध ,सीआईए और साहित्य

   

ओम थानवी और अर्चना वर्मा ने साहित्य और सीआईए के अन्तस्संबंध की बहस को नितांत व्यक्तिगत और आत्मगत रूप से देखा है। साहित्य और सीआईए के अन्तस्संबंध को अशोक पाण्डेय या अन्य लेखक की राय मात्र के रूप में न देखकर,उसके मर्म में छिपे बड़े सवाल के रूप में वस्तुगततौर पर देखा जाता तो बेहतर होता। 
सीआईए के साथ साहित्य या कला के संबंध के सवाल को कमलेशजी ने ही पहले उठाया था तो उसकी जड़ों में जाने की जरूरत थी, न कि आत्मगत ढ़ंग से रिएक्ट करने की।
ओमथानवी,अर्चना वर्मा,अशोक पाण्डेय आदि की प्रतिक्रियाओं में निजी राय में जल्द ही मूल्य निर्णय करने का जो भाव है वह चीजों को सही परिप्रेक्ष्य में समझने नहीं देता। 
मूल्य निर्णय से आलोचना यथासंभव बचे तो आलोचना में मजा आता है। ओमथानवी,अर्चना वर्मा,अशोक पाण्डेय आदि अपने मित्र हैं और लोकतांत्रिक लोग हैं। सवाल इन लोगों की पक्षधरता का भी नहीं है। 
सवाल है सीआईए और कला के अन्तस्संबंध का। इस सवाल पर क्या स्टैंड है ओम थानवी या अर्चना वर्मा का। इस प्रसंग में मैं यहां बहस का दायरा बड़ा करने की कोशिश कर रहा हूं जिससे हिन्दी की तू-तू-मैं-मैं से आलोचना को बचाया जाए। यह सर्वमान्य तथ्य है कि सीआईए ने आधुनिककलाओं को औजार की तरह इस्तेमाल किया था और इसके अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं। वे इंटरनेट पर भी हैं।
हिन्दी में जाने-अनजाने सीआईए पर जब भी बहस होती रही है और यह आभास भी दिया गया है कि सीआईए का काम तो जासूसी करना है ,साहित्य ,कला, संस्कृति से उसे कोई लेना-देना नहीं है।सच इसके एकदम विपरीत है।
सीआईए ने कला,साहित्य,संस्कृति के क्षेत्र में महज पुस्तकों का प्रकाशन करके समाजवाद को नंगा करनेवाली सस्ती किताबें मुहैय्या कराने का काम ही नहीं किया बल्कि इससे आगे जाकर गंभीर काम किया है जिसकी हिन्दी के अधिकांश पत्रकार,लेखक और आलोचक उपेक्षा करते रहे हैं। सीआईए ने अमूर्त एक्सप्रेनिस्ट कला आंदोलन को पैसा दिया,संगठित किया और राजनीतिक समर्थन दिया। उसने Jackson Pollock, Sam Francis, Willem de Kooning, Barnett Newman, Robert Motherwell, Mark Rothko जैसे कलाकारों का सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल किया। Frances Stonor Saunders की लिखी किताब The Cultural Cold War – The CIA and the World of Arts and Letters.इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। इस किताब में बताया गया है कि सीआईए ने किस तरह दुनिया के अनेक देशों में कलाकारों, साहित्यकारों आदि का अपनी सांस्कृतिक नीति के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया।
हिन्दीलेखक सीआईए का सवाल आते ही लेखकों का एक वर्ग सीआईए के प्रति आत्मगत नजरिए का किसी न किसी रूप में शिकार होता रहा है। ऐसे ही आत्मगतता और अधूरी समझ हाल ही अर्चना वर्मा के कथादेश में प्रकाशित लेख और आज (2-6-13)के जनसत्ता में प्रकाशित ओम थानवी के लेख में नजर आती है। सीआईए को लेकर ये दोनों लेख तदर्थवादी नजरिए को व्यक्त करते हैं।
सीआईए जैसा विशाल नियोजित संगठन चलताऊ नजरिए से समझ में नहीं आएगा। हिन्दी में संभवतः सबसे पहले मुक्तिबोध ने शीतयुद्ध की अमेरिकी राजनीति को नईकविता के प्रसंग में रेखांकित किया था और उसी दौर में रामविलास शर्मा ने भी कई लेख लिखे थे।
इसी क्रम में सुधीश पचौरी ने अपनी पीएचडी में शीतयुद्धीय राजनीति की नई कविता के दौर में क्या भूमिका रही है उसका "नई कविता का वैचारिक आधार " किताब में जिक्र किया है। इसी सिलसिले में भारतभवन और अमेरिकी फंडिंग को लेकर जनवादियों और प्रगतिशीलों में बहस हुई है और उस बहस में भी कई महत्वपूर्ण लेख एक जमाने में सुधीश पचौरी ने उत्तरगाथा आदि में लिखे थे।
यह खुला सच है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम नामक संगठन का जन्म सीआईए के सहयोगी संगठन के रूप में हुआ था और उसके भारत में भी सदस्य थे जिसमें बाबू जयप्रकाशनारायण, अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी आदि के नाम प्रमुख हैं।

कुछ समय पहले टीवी पर When the CIA Infiltrated Culture नामक डाकूमेंटरी देखी थी। इसे तीन साल की कड़ी मेहनत और रिसर्च के बाद इसे तैयार किया गया था। इसमें बताया गया कि किस तरह संस्कृति के क्षेत्र में मार्शलप्लान के तहत सीआईए ने कला को सब्सडाइज को किया और कलाओं के जरिए व्यक्तिगत चयन की आजादी के सवाल को प्रचारित किया गया। इस काम Farfield Foundation और the Congress for Cultural Freedom का जमकर इस्तेमाल किया गया। सन् 50 और 60 के दशक में यूरोप के पचासों संगठनों को करोड़ों डॉलर की सालाना मदद दी गयी। इसी क्रम में सीआईए ने विचारधाराहीनता की विचारधारा का प्रचार किया। वे लेखक -कलाकार जो विचारधारा का निषेध करते थे वे जाने-अनजाने इस खेमे का हिस्सा बनते चले गए। इसमें वे लेखक भी शामिल हैं जो सभी किस्म की विचारधारा का निषेध करते थे और वे भी जो मार्क्सवाद विरोधी थे,समाजवाद विरोधी थे,सोवियत संघ विरोधी थे।" नो आइडियोल़ॉजी "उनकी विचारधारा थी। हमारे ओमथानवी टाइप लोग उसी कोटि में आते हैं।

सीआईए के सांस्कृतिक मार्शल प्लान में लेखकों से यह मांग की गयी कि वे कला से राजनीति को धो-पोंछकर साफ कर दें।राजनीतिरहित कलाओं के सृजन पर जोर दिया गया>
सीआईए के अनुसार लेखक हर विषय पर लिख सकता था लेकिन सीआईए स्पांसर "फ्रीडम "के प्रति आलोचनात्मक नजरिया व्यक्त करने आजादी इन लेखकों को नहीं थी। लेखक सामुदायिकता की आलोचना करे,व्यक्तिनिष्ठता की आलोचना करे,सरकार की आलोचना करे,बाजार की शक्तियों के पक्ष में लिखे।
इसी तरह एक्सप्रेसनिज्म,अमेरिकी अवांगार्द ,संगीत समारोह,कला प्रदर्शनियों आदि पर जोर दिया गया। गुंटर ग्रास ने When the CIA Infiltrated Culture नामक वृत्तचित्र में कहा-“The ideology of the CIA was that the West had to be the most modern of the modern,”

क्या इस बयान से कमलेश जैसे लेखक कहीं प्रभावित तो नहीं हैं ?

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा


रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।

अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।

अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।

अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण आने बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। खासकर उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला।मसलन् अस्मिता निर्माण के उपरकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हुई हैं।

उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित, अवसादमय, वर्णशंकर, रूपों को जन्म दिया। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक, साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता की राजनीति का विमर्श फैला हुआ है।

आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।

अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।

भारत एक खोज से सभ्यता विमर्श सामने आया,अछूत खोज ने परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोला। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।

आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया।

अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाए।

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बारे में रामविलास शर्मा ने जिस नजरिए से विचार किया है उसके आधार पर अस्मिता की राजनीति को समझने में हमें मदद मिल सकती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा की 'गाँधी,आम्बेडकर ,लोहिया और इतिहास की समस्याएँ' (2000) किताब बेहद महत्वपूर्ण है।

सामंतवाद,साम्राज्यवाद ,क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग, राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत समस्या को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्ति ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।

रामविलास शर्मा ने लिखा है '' भारत में वर्ग हैं, जाति बिरादरी हैं।दोनों यथार्थ हैं। परंतु वर्ग ऐसा य़थार्थ है जो जीवंत है,जो आगे बढ़ रहा है और जाति बिरादरी ऐसा यथार्थ है जो मर रहा है और पिछड़ रहा है। आम्बेडकर ने कहा थाः जब परिवर्तन आरंभ होता है,तब सदा पुराने पुराने और नए के बीच संघर्ष होता है। नए का समर्थन न किया जाए तो यह खतरा बना रहता है कि वह इस संघर्ष में निरस्त कर दिया जाएगा।"[1]

रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर की विश्वदृष्टि की खोज करते हुए रेखांकित किया कि उनके दृष्टिकोण का आधार वर्ग हैं।मजदूरवर्ग है। न कि जाति। उन्होंने लिखा है, " यदि इस समय अभ्युदयशील वर्गों का समर्थन न किया गया, जाति-बिरादरी का समर्थन किया गया, तो यह संभव है,जाति-बिरादरी बनी रहे और वर्गों की भूमिका पीछे छूट जाए। जाति-बिरादरी के भेद वर्गों के संगठन और वर्ग संघर्ष द्वारा ही संभव किए जा सकते हैं।आम्बेडकर ने कहा था,मजदूरवर्ग को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा थाःमजदूरों को केवल अपने संघ कायम करने से संतोष नहीं करना चाहिए उन्हें घोषित करना चाहिए कि उनका उद्देश्य शासन-तंत्र पर अधिकार करना है।"[2] दुखद बात यह है कि आम्बेडकर की वर्गीय दृष्टि की बजाय अस्मिता की राजनीति करने वालों ने जाति और वर्ण के बारे में लिखी बातों को अपना लिया है और बाकी सारी बातों को त्याग दिया है।

भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।

आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति सिर्फ मनोवैज्ञानिक चीज नहीं है। उसका ठोस आर्थिक आधार है। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं है। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?

अनेक विचारक वर्णभेद को नस्लभेद के रूप में चित्रित करते हैं। इस चित्रण को बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से साहित्य में इस्तेंमाल किया जा रहा है। आम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते।[3] दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी ,वे लगातार अपने विचारों का विकास करते हैं। विचारों की विकासशाल प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे। आम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि आर्य एक जाति थी,नस्ल थी। आमेहेडकर ने इस धारणा का खंडन किया है। आर्य एक समुदाय था। "आम्बेडकर ने लिखाः आर्य एक जन समुदाय का नाम है। जो चीज उन्हें आपस में बैंधे हुए थी,वह एक विशेष संस्कृति,जो आर्य संस्कृति कहलाती थी,को सुरक्षित रखने में उनकी दिलचस्पी थी। जो भी आर्य संस्कृति स्वीकार करता था,वह आर्य था।आर्य नाम की कोई नस्ल नहीं थी।"[4] आम्बेडकर ने यह भी लिखा है कि " आर्यों में रंग संबंधी द्वेषभाव था जिससे उनकी समाज व्यवस्था निर्धारित हुई,यह बात निहायत बेसिर-पैर की है।यदि कोई ऐसा जन-समुदाय था जिसमें रंग सम्बन्धी द्वेषभाव का अभाव था तो वह आर्यों का समुदाय था और ऐसा इसलिए कि उनमें कोई ऐसा रंग प्रधान नहीं था जिससे वे अलग पहचाने जाते।"[5]

भीमराव आम्बेडकर ने इस धारणा का भी खंडन किया है कि दस्यु लोग अनार्य थे।[6] वे यह भी नहीं मानते कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। वे यह भी मानते हैं कि शूद्र भी आर्य हुआ करते थे।

भीमराव आम्बेडकर ने सन् 1946 में 'शूद्र कौन थे ?' ( हू वेयर द शूद्राज ) नामक किताब लिखी। इस किताब में पश्चिमी विद्वानों की तमाम धारणाओं का उन्होंने खंडन किया। " आम्बेडकर ने इन विद्वानों की 7 मुख्य स्थापनाएँ प्रसुत की हैः 1. जिन लोगों ने वैदिक साहित्य रचा था, वे आर्य नस्ल के थे। 2. यह आर्य नस्ल बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया था ।3. भारत के निवासी दास और दस्यु के रूप में जाने जाते थे और ये आर्यों से नस्ल के विचार से भिन्न थे।4. आर्य श्वेत नस्ल के थे, दास और दस्यु काली नस्ल के थे।5. आर्यों ने दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त की।6.दास और दस्यु विजित होने के बाद दास बना लिए गए और शूद्र कहलाए।7. आर्यों में रंगभेद की भावना थी और इसलिए उन्होंने चातुर्वर्ण्य का निर्माण किया। इसके द्वारा उन्होंने श्वेत नस्ल को काली नस्ल से, यथा दासों और दस्युओं से अलग किया। आगे आम्बेडकर ने इन सातों स्थापनाओं का खंडन किया।"[7] इन सभी मतों का इन दिनों प्राच्यवादी पश्चिमी विचारक खूब प्रचार कर रहे हैं।इन विचारों से हिंदी लेखकों का एक तबका भी प्रभावित है।

रामविलास शर्मा ने सवाल उठाया है कि शूद्र अनार्य नहीं थे तो वे कौन थे ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आम्बेडकर के विचारों का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है, " इस प्रश्न के उत्तर में आम्बेडकर की तीन स्थापनाएँ हैः (1) शूद्र आर्य थे।(2) शूद्र क्षत्रिय थे। (3) क्षत्रियों में शूद्र ऐसे महत्वपूर्ण वर्ग के थे कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा शूद्र हुए थे।"[8]

रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर का मूल्यांकन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं दी हैं। ये अवधारणाएं अनेक मामलों में आम्बेडकर के चिंतन से भिन्न मार्क्सवादी नजरिए को व्यक्त करती हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है, " आम्बेडकर के विचार से हिंदुओं का जो साहित्य पवित्र या धार्मक कहलाता है,वह प्रायःसबका सब ब्राह्मणों का रचा हुआ है।ब्राह्मण विद्वान् उसका आदर करें, यह स्वाभाविक है।उसी तरह अब्राह्मण विद्वान उसके प्रति आदर प्रकट न करें, यह भी स्वाभाविक है। यहाँ ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद करने के बदले पुरोहित और अपुरोहित का भेद करना उचित होगा। बहुत से ब्राह्मणों ने पुरोहित वर्ग के विरुद्ध साहित्य रचा है।इसके सिवा प्राचीन साहित्य का कुछ अंश क्षत्रियों का रचा हुआ भी है।और जो सबसे पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद है,उसे रचने वाले सामंती व्यवस्था के ब्राह्मण थे,इसका कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जब अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं,तब उत्पादन से उनका संबंध टूट जाता है। अपने से भिन्न श्रमिक वर्ग के बिना वे अवकाश में जीवन बिता नहीं सकते। ऋग्वेद में शूद्र शब्द केवल एक बार पुरूष सूक्त में आया है और वह सूक्त बाद में जोडा गया है,यह बहुत से लोगों की मान्यता है।यदि ऋग्वेद में शूद्र नहीं हैं, तो उस में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी नहीं हैं।"[9]

रामविलास शर्मा इस धारणा का भी खंडन किया है कि साहित्य का उदभव किसी धार्मिक पाठ से हुआ है। वे मानते हैं कि साहित्य का उदभव लौकिक या सेक्युलर होता है। इस मिथ का भी खंडन किया है कि प्राचीनकाल में ब्राह्णणों की प्रधानता थी। उनका मानना है कि " भारयीय समाज में पहले क्षत्रियों की प्रधानता थी,ब्राह्मणों की नहीं,यह उस साहित्य से प्रमाणित होता है जिसे ब्राह्मणों का रचा हुआ माना जाता है।" [10]

रामविलास शर्मा ने यह भी लिखा है कि रामायण,महाभारत के नायक क्षत्रिय माने गए हैं।किसी भी प्राचीन महाकाव्य का नायक ब्राह्मण नहीं है। यही नहीं, महाभारत में धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले अब्राह्मण ही हैं। युधिष्ठिर को धर्म और राजनीति की बातें भीष्म समझाते हैं और अर्जुन को दर्शन और धर्म का ज्ञान कृष्ण देते हैं। महाभारत में एक प्रसिद्ध ब्राह्मण है द्रोणाचार्य। वह राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं और युद्ध में सेनापति का कार्य करते हैं।इन कथाओं में शस्त्रयुक्त क्षत्रिय और शस्त्रविहीन ब्राह्मण वर्गों का अस्तित्व नहीं है।"[11]

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित मतों का खंडन करते हुए लिखा "शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे,आर्यों के शत्रु थे।आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं ? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा प्रकट क्यों करते हैं ?शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास् ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए ? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास् ने अश्वमेध कैसे किया ?शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है ? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए,इसके लिए शब्द भी बताता है।शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है।यदि आरंभ में ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा ? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह संपत्ति संग्रह नहीं कर सकता।ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों उल्लेख कैसे है ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता। ऐसा था तो महाभारत के राजाओं के मंत्री शूद्र थे,ऐसा क्यों कहा गया ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास् के उदाहरण से,तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है।"[12]

आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

आधुनिककाल में पहलीबार शूद्रों को यह बात समझाने में ज्योतिबा फुले को सफलता मिली कि मनुष्य के अस्तित्व की पहचान शिक्षा से होती है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु समान होता है। शूद्रों के लिए शिक्षा का अर्थ वही नहीं था जो सवर्णों के लिए था। शूद्रों के लिए शिक्षा अस्तित्वरक्षा, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और आत्मोध्दार के साथ अस्मिता की स्थापना का उपकरण भी थी। यही वजह है कि शिक्षा का शूद्रों में जितना प्रसार हुआ है अस्मिता की राजनीति का भी उतना ही प्रसार हुआ है।

ज्योतिबाफुले -आंबेडकर के द्वारा शुरू की गई अस्मिता की राजनीति विदेश से लायी गई चीज नहीं है। साम्राज्यवादी साजिश का अंग नहीं है। बल्कि यह तो भारत के संतुलित विकास के परिप्रेक्ष्य के गर्भ से उपजी राजनीति है। इसका आयातित अस्मिता की मौजूदा राजनीति के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। शूद्रों की शिक्षा का लक्ष्य था, सामाजिक भेदभाव को खत्म करना, मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता पैदा करना और समानता को व्यापक मूल्य के रूप में स्थापित करना।

आम्बेडकर ने अछूत के रूप में जिन जातियों को रखा उनका चयन अंग्रेजों ने किया था।सन् 1935 के कानून में उन जातियों की सूची बना दी गयी जिनको अनुसूचित जातियां कहा जाता है। इस तरह के वर्गीकरण पर रामविलास शर्मा ने लिखा है "अछूत हमेसा अचूत बने रहें,यह स्थिति अंग्रेज पक्की कर रहे थे।"[13] अछूतप्रथा से हिंदुओं को आर्थिक लाभ था और यह धर्म पर आधारित थी। आम्बेडकर का मानना था कि हिंदू सामाजिक गठन की विशेषता है और वह अन्य सभी जन समुदायों से हिन्दुओं को अलग करती है।[14]

अछूत समस्या हमारे देश में कई हजार सालों से है। किंतु इसके खिलाफ कभी सामाजिक आंदोलन नहीं हुए। आखिरकार क्या कारण है कि भारत में विगत ढाई हजार सालों में कभी क्रांति नहीं हुई ? क्या अछूत समस्या को खत्म किए बगैर क्रांति संभव है ? क्या वजह है कि आधुनिककाल में ही अछूत समस्या के खिलाफ सामाजिक आंदोलन संभव हो पाया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में जातिभेद खत्म हो सकता है ? इन सभी सवालों का एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है।

भारत में जातिव्यवस्था के खिलाफ क्रांति अथवा सामाजिक क्रांति न हो पाने के तीन प्रधान कारण हैं , पहला ,अंधविश्वासों में आस्था,दूसरा ,पुनर्जन्म की धारणा में विश्वास और तीसरा ,कर्मफल के सिध्दान्त के प्रति विश्वास। इन तीन विचारधारात्मक बाधाओं के कारण भारत में सामाजिक क्रांति नहीं हो पायी। अंधविश्वासों में आस्था के कारण हमने कभी जातिभेद क्यों है ? गरीब गरीब क्यों है और अमीर अमीर क्यों है ? क्या पीपल के पेड़ को पूजने से मनोकामना पूरी होती है ? क्या साहित्य में जो रूढ़ियां चलन में हैं वे वास्तव में भी हैं ? इत्यादि चीजों को यथार्थ में कभी परखा नहीं। हम यही मानकर चलते रहे हैं कि मनुष्य गरीब इसलिए है क्योंकि पहले जन्म में कभी बुरे कर्म किए थे। उसका ही फल है कि इस जन्म में गरीब है। अमीर इसलिए अमीर है क्योंकि वह पहले जन्म में पुण्य करके आया है।

अच्छे कर्म करोगे अच्छे घर में जन्म लोगे। बुरे कर्म करोगे नीच कुल में जन्म होगा। निचली जाति में उन्हीं लोगों का जन्म होता है जिन्होंने पहले बुरे कर्म किए थे। निचली जातियों को नरक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया और एक नए किस्म के प्रचार अभियान की शुरूआत हुई। इससे जातिभेद को वैधता मिली। कर्मफल के सिध्दान्त की सबसे बड़ी किताब है श्रीमद्भगवतगीता इसके आधार पर कर्मफल के सिध्दान्त को खूब प्रचारित किया गया। कर्म किए जा फल की चिन्ता मत कर। उल्लेखनीय है गीता को आदर्श दार्शनिक किताब के रूप में तिलक से लेकर गांधी तक सभी ने प्रधानदर्जा दिया था। गीता आज भी मध्यवर्ग की आदर्श किताब है।

उल्लेखनीय है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने जातिप्रथा को इन तीनों विचारधारात्मक बाधाओं के दायरे बाहर निकालकर पेश किया। संभवत: बाबासाहेब अकेले बड़े स्वाधीनतासेनानी थे जिनकी कर्मफल के सिध्दान्त,पुनर्जन्म और अंधविश्वासों में आस्था नहीं थी। यदि इन तीनों चीजों में आस्था रही होती तो अछूत समस्या को राष्ट्रीय समस्या बनाना संभव ही न होता। कहने का तात्पर्य यह है अछूत समस्या से मुक्ति के लिए, जातिप्रथा से मुक्ति के लिए चार प्रमुख कार्य किए जाने चाहिए।

पहला- अंधविश्वासों के खिलाफ जंग।

दूसरा- पुनर्जन्म की धारणा के खिलाफ जनजागरण।

तीसरा- कर्मफल के सिध्दान्त के खिलाफ सचेतनता।

चौथा- अछूत जातियों के साथ रोटी-बेटी के संबंध और पक्की दोस्ती।

ये चारों कार्यभार एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक को भी त्यागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है शिक्षा ,नौकरी अथवा आरक्षण मात्र से अछूत समस्या का समाधान संभव नहीं है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए आमलोगों में खासकर दलितों में विज्ञानसम्मत चेतना का प्रसार करना बेहद जरूरी है। विज्ञानसम्मतचेतना के अभाव में दलित हमेशा दलित रहेगा। उसकी दलितचेतना से मुक्ति नहीं होगी। जातिभेद कभी खत्म नहीं होगा। हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि हमारी शिक्षा हमें कितना विज्ञानसम्मत विवेक देती है ? सच यही है कि हमारी शिक्षा में कूपमंडूकता कूटकूटकर भरी पड़ी है। पैंतीस साल के शासन के वाबजूद पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में से कूपमंडूकता को पूरी तरह विदा नहीं कर पाए हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिप्रथा एक तरह का पुराने किस्म का सामाजिक अलगाव है। जातिप्रथा को आज नष्ट करने के लिए सामाजिक अलगाव को नष्ट करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव आज के दौर में व्यापक शक्ल में सामने आया है। हम एक-दूसरे के दुख-सुख में साझीदार नहीं बनते। कभी एक-दूसरे के बारे में खबर-सुध नहीं लेते। यही सामाजिक अलगाव पहले जातियों में भी था। खासकर निचली कही जाने वाली जातियों के प्रति सामाजिक अलगाव यकायक पैदा नहीं हुआ। बल्कि इसे पैदा होने में सैंकड़ों साल लगे। सामाजिक अलगाव को अब हमने वैधता प्रदान कर दी है। सामाजिक अलगाव को हम स्वाभाविक मानने लगे हैं। नए युग की विशेषता मानने लगे हैं। नए आधुनिक जीवन संबंधों की अनिवार्य परिणति मानने लगे हैं। सामाजिक अलगाव की अवस्था में जातिभेद और जातिघृणा बढ़ेगी। क्योंकि सामाजिक अलगाव से जातिघृणा को ऊर्जा मिलती है। यह अचानक नहीं है कि सन् 1970 के बाद के वर्षों में पूंजीवादी विकास जितना तेज गति से हुआ है। सामाजिक अलगाव में भी इजाफा हुआ है। जाति संगठनों में भी इजाफा हुआ है। जातिघृणा और जाति संघर्ष बढ़े हैं। जातिघृणा,जातिसंघर्ष और जातिगत तनाव तब ही पैदा होते हैं जब हम अलगाव की अवस्था में होते हैं।

सामाजिक अलगाव पूंजीवादी विकास की स्वाभाविक परिणति है ,इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए। अचेत रूप से सामाजिक अलगाव को स्वीकार लेने का अर्थ है आपसी अलगाव में इजाफा। अलगाव खत्म होगा तो संगठन की महत्ताा भी समझ में आती है। सामाजिक शिरकत,सामाजिक साझेदारी, व्यक्तिगत और सामाजिक भावनात्मक विनिमय और आर्थिक सहयोग ये चीजें जितनी बढ़ेंगी उतनी ही भेद की दीवार गिरेगी।

हमें सोचना चाहिए आरक्षण किया,संविधान में संरक्षण दिया, तमाम किस्म के कानून बनाए,सभी दल इन कानूनों के प्रति वचनबध्द हैं,इसके बावजूद जाति उत्पीड़न थमने का नाम नहीं लेरहा। एससी,एसटी का अलगाव कम नहीं हो रहा। उनकी असुरक्षा की भावना कम नहीं हो रही। इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल के उदाहरण से समझाना चाहूँगा।यहां पर जातियाँ हैं। जातिभेद भी है। किंतु निचले स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टियों के संगठनों का तंत्र इस कदर फैला हुआ है कि आप उसकी परिधि के बाहर जा नहीं सकते। यह तंत्र सामाजिक संपर्क,सामाजिक संबंध और आपसी भाईचारा बनाए रखने और विनिमय का काम करता है। इसका सुफल यह निकला है कि आमलोगों में अभी शिरकत और सहयोग का भाव बचा हुआ है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख में सहयोग करते हैं। यही वजह है पश्चिम बंगाल में जातिगत तनाव और जाति संघर्ष नहीं हैं।

जबकि सच यह है आरक्षण यहां कम लागू हुआ है। राजनीति में दलितों का नहीं सवर्णों का बोलवाला है। इसके बावजूद जातिसंघर्ष नहीं हैं। यथासंभव निचली जातियों को जमीन का हिस्सा भी मिला है। संगठन के कारण उनकी आवाज सुनी भी जाती है। इसके कारण उत्पीडन करने की हिम्मत नहीं होती। आंबेडकर ने स्वयं संगठन को महत्ता दी थी, संगठन के तौर पर आदर्श सांगठनिक संरचना कम्युनिस्टों के पास है। मुश्किल यहां से शुरू होती है। कम्युनिस्ट कतारें अभी भी उपरोक्त तीन विचारधारात्मक बाधाओं को नष्ट नहीं कर पायी हैं। अभी भी कम्युनिस्ट कतारों में अंधविश्वासों में आस्था रखने वाले, पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले,कर्मफल के सिध्दान्त में विश्वास करने वाले बचे हुए हैं। किंतु इनकी संख्या में तुलनात्मक तौर पर गिरावट आयी है।

किंतु एक चीज जरूर हुई है कि जातिभेद का जितना प्रत्यक्ष तांडव देश के अन्य इलाकों में नजर आता है वैसा यहां नजर नहीं आता। इसका प्रधान कारण है सामाजिक रूप से कम्युनिस्ट संगठनों का सामाजिक संरचनाओं में घुलामिला रहना। आंबेडकर के इस विचार को कि जातिप्रथा को नष्ट करने के लिए जरूरी है कि शूद्रों और गैर शूद्रों में रोटी-बेटी के संबंध हों। यही चीज कमोबेश पश्चिम बंगाल में लागू करने में वामपंथियों को सफलता मिली है। इस अर्थ में वे इस राज्य में सामाजिक क्रांति में एककदम आगे जा पाए हैं। दूसरी बात यह है कि दलितों पर उत्पीडन की घटनाएं इस राज्य में कम से कम होती हैं। यदि कभी दलित उत्पीड़न की कोई घटना प्रकाश में आती है तो प्रशासन से लेकर राजनीतिक स्तर तक ,यहां तक कि मध्यवर्गीय कतारों में भी उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया होती है। यह इस बात का संकेत है कि सामाजिक संवेदनशीलता अभी बची हुई है। अन्य राज्यों में स्थिति बेहद खराब है।

जिस राज्य में दलित मुख्यमंत्री हो,दलित पार्टी का शासन हो,वहां दलित उत्पीडन की घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गयी हैं। इन घटनाओं के प्रति आम जनता में संवेदनशीलता कहीं पर भी नजर नहीं आती। क्योंकि उन राज्यों में सामाजिक अलगाव को कम करने का कोई भी प्रयास राजनीतिक दल नहीं करते। बल्कि राजनीतिक लाभ और क्षुद्र सांगठनिक लाभ हेतु सामाजिक अलगाव का इस्तेमाल करते हैं।

एक वाक्य में कहें तो उत्तरप्रदेश,बिहार आदि राज्यों में जातिदलों ने सामाजिक अलगाव को अपनी राजनीतिक पूंजी में तब्दील कर दिया है। वे सामाजिक अलगाव का निहितस्वार्थी लक्ष्यों को अर्जित करने के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। इससे जातिसंघर्ष बढ़े हैं। सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है। सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है। अछूत समस्या बढ़ी है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए सामाजिक अलगाव को खत्म करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव का राजनीतिक दुरूपयोग बंद करना जरूरी है।

दलित का राजनीतिक दुरूपयोग सामाजिक टकराव और तनावों को बनाए रखता है और विगत साठ सालों में हमारे विभिन्न राजनीतिक दलों ने दलित समस्या के समाधान के नाम पर यही किया है। उनके लिए दलित मनुष्य नहीं है बल्कि वोट है। एक अमूर्त पहचान है। बेजान चीज है। सत्ताा का स्रोत है। यही दलित की आयरनी भी है। अब हम दलित को मनुष्य के तौर पर नहीं वोटबैंक के तौर पर जानते हैं। आरक्षण के नाम से जानते हैं। वोटबैंक और आरक्षण में दलित की पहचान का रूपान्तरण दलित को वर्चुअल बना देता है। दलित का वर्चुअल बनना मूलत: मध्यकाल में लौटना है। वर्चुअल बनने के बाद दलित और भी दुर्लभ हो गया है। हमें दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल बनने का अर्थ है वह है भी और नहीं भी। वर्चुअल दलित मायावती जैसे नेताओं की पूंजी है। ये दोनों एक-दूसरे के चौखटे में फिट बैठते हैं। मायावती के यहां दलित वर्चुअल है। ठोस हाड़मांस का इन्सान नहीं है। यही वजह है दलित की किसी भी समस्या को ठोस रूप में मायावती अपने चुनावी घोषणापत्र में व्यक्त नहीं करती। बल्कि यह कहना सही होगा कि मायावती स्वयं वर्चुअल है। उसने कोई भी ठोस चुनावी घोषणापत्र भी जारी नहीं किया। यही हाल दलितों के मसीहा लालू-मुलायम का है। ये दलितों के हैं और दलितों के नहीं भी हैं। दलित इनके यहां वर्चुअल है और दलित के लिए ये वर्चुअल हैं। कहने का तात्पर्य यह है दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल होने का अर्थ है दलित का लोप । यह एक तरह से बेहद त्रासद और भयावह है।