शनिवार, 19 अगस्त 2017

नायक के लिए तरसता समाज


   अजीब तर्क दिया जा रहा है वे कह रहे हैं विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं है, कोई ऐसा नेता नहीं है जो मोदीजी का विकल्प हो!यह असल में उनका तर्क है जो नायक के सहारे समाज की मुक्ति के दिवा-स्वप्न देखते हैं। नायक केन्द्रित मनोदशा हमारी राजनीति की रही है उसने नायक पूजा को सबसे बड़ा बनाया है। अभावों में जीने वाले लोग हमेशा नायक में मुक्ति की खोज करते  हैं, हमारे समाज की बुनावट भी कुछ ऐसी है कि हमें नायक के बिना नींद नहीं आती, बस नायक मिल जाए तो हम चैन की नींद सोएँ! 
      सवाल यह है नायक की तलाश करके हम जाना कहाँ चाहते हैं ? किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं ? नायक पूजा की संस्कृति निर्मित करके हमने देश को शक्तिशाली बनाया या खोखला ?क्या भारत को नायक चाहिए या विकल्प में कुछ और चाहिए ? आमतौर पर वैचारिक संकट के समय नायक की तलाश सबसे ज्यादा करते हैं, हम अच्छे विचार नहीं खोजते,अच्छे मूल्य नहीं खोजते ,अच्छी नीति नहीं खोजते,उलटे नायक खोजते हैं, चाहे नायक मूल्यहीन हो।
       नायक खोजने की आदत समाज में परजीविता की गहरी जड़ों को रेखांकित करती है।हमें जब राजनीति के नायक से बोरियत होने लगती है तो हम फ़िल्मी नायक से दिल बहलाने लगते हैं।नायक की आड़ में जीने और आनंद लेने की मानसिकता बुनियादी तौर पर वैचारिक और सांस्कृतिक दरिद्रता की प्रतीक है।हमें हर हालत में नायक पूजा से बचना चाहिए।नायक पूजा हमारे आलोचनात्मक विवेक को सबसे पहले अपहृत करती है।हम मूल्यों पर बहस नहीं कर रहे, नीतियों पर संवाद-विवाद नहीं कर रहे, बल्कि नायक पर विवाद कर रहे हैं। 
     भारत में नायक का विचार अजर,अमर है।दिलचस्प बात है एक नायक के जाते ही हठात् दूसरा नायक हमारी आँखों के सामने आ बैठता है।कल तक जो नायकपूजा के रुप में इंदिरा गांधी से  नफरत करते थे वे ही नायक के रुप में नरेन्द्र मोदी की अहर्निश पूजा कर रहे हैं।मोदी में उन्होंने तकरीबन वे सारे गुण खोज लिए हैं जिन गुणों के लिए वे इंदिरा गांधी की आलोचना कर रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि मोदी अनेक मामलों में   इंदिरा गांधी के अनुयायी नजर आते हैं।मसलन् इंदिरा गांधी ने नक्सलवाडी आंदोलन को कुचलने के नाम पर बंगाल के युवाओं की बडे पैमाने पर हत्याएँ कीं , ठीक यही हालात कश्मीर में मोदीजी ने किए हैं,निर्दोष कश्मीरी आए दिन में मारे जा रहे हैं, १९७२-७७ केबंगाल के अर्द्ध फासी आतंक को लेकर सारे देश में बेगानापन था यहां तक कि बाबू जयप्रकाश नारायण से ज्योति बसु ने कहा कि हमारे बंगाल में जुल्म हो रहा है विधानसभा चुनावों में व्यापक धाँधली हुई है तो  बाबू जयप्रकाश नारायण को विश्वास नहीं हुआ,सन् १९७२ में बंगाल में विधानसभा चुनाव में भयानक धाँधली हुई और सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने, बंगाल में नक्सलवाडी आंदोलन से लेकर १९७७तक कई हजार वाम युवा पुलिस की गोलियों के शिकार हुए।ठीक वही पैटर्न कश्मीर और बस्तर में चल रहा है।
       मूल मुद्दा यह है कि भारत को नायक खोजने की बीमारी से कैसे छुट्टी दिलाई जाए।हम सबको नायक केन्द्रित राजनीति की बजाय जनराजनीति पर जोर देना चाहिए। जनता को शिक्षित करना चाहिए , जनता की समस्याओं को प्रमुखता से केन्द्र में रखना चाहिए। 
       हमारी राजनीति में जनता की समस्याएँ केन्द्र में नहीं रहतीं नायक केन्द्र में रहता है।नायक के केन्द्र में रहने का अर्थ है जनता की समस्याओं का चेतन जगत में अंत, हम समस्याओं पर सोचना बंद कर देते हैं, नायक के भाषण, कपड़े, मीडिया जलवे, शोहरत के झूठे क़िस्सों में समय व्यतीत करने लगते हैं। 
      मोदी के प्रचार की सबसे बडी विशेषता है कि उसने सार्वजनिक जीवन से बुनियादी समस्याओं पर बहस को गायब कर दिया है और हम सब मोदी के जश्न और शोहरत के क़िस्सों में व्यस्त हो गए हैं। नायक के रुप में मोदी के भाषण,जश्न,जलसों और शोहरत से आम जनता के जीवन में ख़ुशहाली आने वाली नहीं है, ये सारी चीजें तो मोदी मोह में बाँधे रखने की कला के नुस्ख़े हैं।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

कैंसर है मोदीमोह !




अब बेचारे बेरोज़गार गाली खाएँ।मोदीजी को बेकारी नजर नहीं आ रही , बेकारी का हल्ला करने वालों को वे बेकारों का दलाल कह रहे हैं।वे रोजगार देने वाली कोई नई स्कीम लागू नहीं कर पाए उलटे जितनी स्कीम उन्होंने लागू की हैं , नए कानून बनाए हैं ,उनसे बेकारी बढी है।इसी को कहते हैं चौपट राशि प्रधानमंत्री!
        मसलन् , पीएम ने हाल ही में एनपीए यानी बैंकों का बडी कंपनियों से क़र्ज़ा वसूल करने के लिए कानून लागू किया जिसके तहत क़र्ज़ा भुगतान न करने वाली कंपनियों से वसूली होनी थी लेकिन इस कानून के लागू होते ही इंफ़्रास्ट्रक्चर की कंपनियां आवेदन लेकर चली आईं कि वे बैंकों का क़र्ज़ा चुकाने की स्थिति में नहीं हैं।परिणाम सामने हैं आम्रपाली और जेपी इंफ़्रास्ट्रक्चर को पैसा दे चुके हजारों लोगों का अपना घर बनाने का सपना चूर चूर हो गया वे करोडों के बैंक कर्ज में डूब गए,वे कह रहे हैं हम बैंकों की किश्त देने की स्थिति में नहीं हैं।इससे बैंकों का एनपीए कम होने की बजाय और बढ़ेगा ।वहीं दूसरी ओर कंपनियों का क़र्ज़ा ठिकाने लगा दिया जाएगा उनको दिवालिया घोषित कर दिया जाएगा दूसरी ओर मध्यवर्ग को न तो घर मिलेगा और न बैंकों से राहत मिलेगी । एक अन्य परिणाम यह भी निकलेगा कि भवन निर्माण में सन्नाटा गहराता चला जाएगा।हम अपील करेंगे कि मोदीमोह से निकलो यह कैंसर की तरह है।
   मोदीमोह में जो वर्ग फँसा वह मौत के मुँह में गया ।मोदी मोह में व्यापारी और दुकानदार सबसे पहले फँसे वे आज सबके सब मोदीमोह की पीडा से करो रहे हैं, इनमें सबसे पहले सोने के व्यापारी मोदी कैंसर के शिकार हुए , बाद में नोटबंदी और जीएसटी ने समूचे व्यापार को मोदी कैंसर की चपेट में ले लिया, दूसरे चरण में मोदी कैंसर ने जिओ कनेक्शन के जरिए समूचे दूरसंचार उद्योग को तबाही के कगार पर पहुँचा दिया है,पतंजलि के बहाने समूचे घरेलू वस्तु बाजार कंपनियों को मोदी कैंसर के हवाले कर दिया है। पतंजलि खुलेआम मिलावटी सामान बेच रहा है ।
     युवाओं में मोदीमोह ने अविवेक और असभ्यता को वैध बनाया है।घरेलू महिलाओं में राष्ट्रवादी हिंसा और घृणा के प्रति प्रेम पैदा किया है।राष्ट्रीय फिनोमिना के रुप में मोदीमोह ने छद्म यथार्थ में जीने के संस्कार पैदा किए हैं।वहीं दूसरी ओर जनता की सुनने और समझने की क्षमता का  अपहरण कर लिया है।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

फासिज्म का नया मुहावरा



मोदी ने फासिज्म को नया रुप दिया है उसने हिंदुत्व को सर्वोपरि स्थान दिया है देश -विदेश सब जगह हिंदुत्व के फ्रेमवर्क में चीजों को पेश किया है। हिंदू मिथकों और मिथकीय पात्रों को सामान्य अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया है। हिंदू नैतिकता को महान नैतिकता बनाया है और उसके कारण  देश में हिंदुत्व का माहौल सघन हुआ है।दूसरा बडा परिवर्तन यह कि किया है उसने "सर्जिकल स्ट्राइक " या "युद्ध "इन दो पदबंधों को हिंदुत्व की नैतिकता बना दिया है।अब हर चीज के खिलाफ मोदीजी "सर्जिकल स्ट्राइक "कर रहे हैं या "युद्ध "कर रहे हैं।मसलन् , कालेधन के खिलाफ सर्जीकल स्ट्राइक, गंदगी के खिलाफ युद्ध , गरीबी के खिलाफ युद्ध आदि पदबंध  आए दिन सत्तातंत्र के प्रचार के रुप में कारपोरेट मीडिया हमारे ज़ेहन में उतार रहा है। वे "सर्जीकल स्ट्राइक'' या "युद्ध" के नाम पर सभी किस्म के वैचारिक मतभेदों को अस्वीकार कर रहे हैं।वे मांग कर रहे हैं कि वैचारिक मतभेद बीच में न लाएँ ।वे यह भी कह रहे हैं यह बहस का समय नहीं है ,काम करने का समय है बहस मत करो, सवाल मत करो, सिर्फ सत्ता का अनुकरण करो।
   एक जमाना था आम आदमी साम्प्रदायिक विचारों से नफरत करता था अपने को उनसे दूर रखता था लेकिन आज स्थिति गुणात्मक तौर पर बदल गयी है, आज साम्प्रदायिक विचारों से आम आदमी नफरत नहीं करता बल्कि उससे जुड़ना अपना सौभाग्य समझता है।कल तक धार्मिक पहचान मुख्य नहीं थी लेकिन आज दैनन्दिन जीवन में वह प्रमुख होउठी है, पहले जाति पूछने में संकोच करते थे आज खुलकर जाति पूछते हैं।
       आज फासिज्म वह है जो आपको पसंद नहीं है।आज आप पुरानी फासिज्म की अवधारणाओं के आधार पर उसे समझा नहीं सकते।मसलन् मोदीभक्तों और मोदी सरकार को जो पसंद नहीं है उसे वे  मानने को तैयार नहीं हैं। वे सिर्फ इच्छित बात ही सुनना चाहते हैं। अनिच्छित को इन लोगों ने फासिज्म बना दिया है।यह ओरवेलियन परिभाषा है कि जो बताती है अनिच्छित है वह फासिज्म है।

नए किस्म का फासिज्म



फासिज्म के मायने क्या हैं इस पर भारत में बहुत बहस है और इस बहस में बड़े बड़े दिग्गज उलझे हुए हैं लेकिन आजतक उसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा तय नहीं कर पाए हैं। फासिज्म वह भी है जो हिटलरऔर मुसोलिनी ने किया , फासिज्म वह भी जो आपातकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया,फासिज्म का एक रुप वह भी है जो पीएम नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। मोदी के फासिज्म की लाक्षणिक विशेषताएँ भिन्न हैं। मोदीजी का फासिज्म विकास और गरीब के कंधों पर सवार है लेकिन इसके प्रशासन के संचालक  कारपोरेट घराने हैं।इसकी धुरी है मीडिया प्रबंधन और राज्य के संसाधनों की खुली लूट ।यह अपने विरोधी को राष्ट्रद्रोही , राष्ट्र विरोधी कह कहकर कलंकित करता है,इसके पास मीडिया और साइबर मीडिया की बेशुमार ताकत है।यह ऐसी सत्ता है जो किसी की आवाज नहीं सुनती बल्कि सच यह है यदि जीना चाहते हैं तो सिर्फ उसकी आवाज़ें सुनो।मोदी के शासन में आने के बाद से अहर्निश मोदी की सुनो,मोदी के भक्तों की सुनो।दिलचस्प पहलू यह है कि इस समय मोदी और भक्तों के अलावा कोई नहीं बोल रहा ।सब लोग इनकी ही सुन रहे हैं । जनता बोल नहीं रही। वो सिर्फ सुन रही है और आज्ञा पालन कर रही है।हमारे जैसे लोग जो कुछ कह रहे हैं उसे न तो जनता सुन रही है और  न सत्ता सुन रही है सिर्फ हम ही अपनी आवाज सुन रहे हैं।हम तो सहमत को सुना रहे हैं । अपने ही हाथ से अपनी पीठ ठोक रहे हैं। जब जनता न सुने , सरकार न सुने, संवादहीनता हो तो समझो फासिज्म के माहौल में जी रहे हैं।इस माहौल को पैदा करने के लिए प्रत्यक्षत: हक छीनने , या संविधान को स्थगित करने या बर्बर हमले करने की जरूरत नहीं है।

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

सोनिया गांधी का मतलब



         पिछले तीन सालों से देश में जो कुछ चल रहा है उसके प्रतिवाद के संदर्भ में सोनिया गांधी की राजनीतिक भूमिका फिर से महत्वपूर्ण हो उठी है।सोनिया गांधी ने मोदी की आँधी में जिस तरह लोकसभा का चुनाव जीता और नियोजित ढंग से कांग्रेस के मूल स्वभाव को बदलने की दिशा में  कदम उठाए हैं वे इस बात को पुष्ट करते हैं कि सोनिया गांधी देश की राजनीति में सामान्य नेत्री नहीं हैं।सोनिया गांधी में कांग्रेस को जोड़े रखने की क्षमता है।साथ ही देश के विकास का एजेण्डा भी तय करने की क्षमता है। यह सच है कांग्रेस को जितना आक्रामक होना चाहिए वह उतनी आक्रामक नजर नहीं आ रही लेकिन यह भी बडा सच है कि कांग्रेस के नए कलेवर के निर्माण के लिए सोनिया गांधी का नेतृत्व में बने रहना भी जरूरी है। पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा राजनीतिक हमले सोनिया गांधी झेलती रही हैं लेकिन उन्होंने कभी उफ़ तक नहीं की। उन्होंने जितनी बार बोला है देश के सच को बयां किया है।लोकतंत्र के लिए वह नेता मूल्यवान होता है जो सच बोलता है, सोनिया गांधी सच बोलती हैं और सच में जीती हैं यह उनकी सबसे बडी ताकत है।
         सोनियागांधी के चरित्र हनन की जिस तरह कोशिशें हुई हैं उससे उनके व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पडा उलटे वे ताकतवर होकर निकली हैं। सोनिया गांधी कम बोलती हैं लेकिन प्रासंगिक बोलती हैं। वे नियमित संसद जाती हैं वहाँ बैठकर सारी बहस सुनती हैं, इसके विपरीत मोदीजी संसद में न्यूनतम समय भी नहीं बैठते। संसद उनके लिए फालतू चीज है। मोदी के लिए संसदीय परंपराओं और संवैधानिक मान्यताएँ अवसरवादियों के खेल की तरह है वहीं सोनिया के लिए ये प्राणवायु हैं।

भारत के मुसलमान दुनिया के मुसलमानों से भिन्न हैं

      


भारत में हिंदुओं और मुसलमानों ने अन्य समुदायों के साथ मिलकर स्वाधीनता संग्राम लड़ा, संसदीय जनतंत्र चुना, भारत के अधिकांश मुसलमानों ने भारत विभाजन को अस्वीकार करके भारत में रहकर लोकतंत्र के विकास में भूमिका निभाने का फैसला किया । लोकतंत्र का मार्ग मुसलमानों का चुना मार्ग है ,यह साम्प्रदायिक ताकतों के द्वारा निर्मित मार्ग नहीं है। बल्कि साम्प्रदायिक ताकतें तो एकजुट भारत के खिलाफ १९४७ के पहले भी थीं और १९४७ के बाद भी रही हैं। 
        भारत के मुसलमानों ने हमेशा भारत के संविधान को माना और संसदीय लोकतंत्र को पुख्ता बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।भारत के मुसलमानों ने कभी साम्प्रदायिकता के आधार पर न तो वोट दिया और न कभी साम्प्रदायिक नेताओं को संसद और विधानसभा में चुनकर भेजा ।इसके बावजूद मुसलमानों के विकास के लिए लोकतंत्र में जिस तरह की सुविधाएँ और समान अवसर होने चाहिए  मनमोहन सरकार के पहले तक किसी सरकार ने उनका ख्याल नहीं किया । 
पहलीबार सच्चर कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद विस्तार से पता चला कि आजादी के चालीस साल बाद भी मुसलमानों के सामाजिक  -शैक्षणिक-आर्थिक हालात बेहद खराब हैं। यहां तक कि वामशासन वाले पश्चिम बंगाल में तो सबसे ज्यादा खराब थे।इसलिए यह कहना कि मुसलमानों के लिए कांग्रेस और वाम ने महत्वपूर्ण काम किए हैं यह सही नहीं है। पहलीबार सच्चर कमीशन ने हमारे सिस्टम में निहित मुसलिम विरोधी भावों को उजागर किया।इसके बाद यूपीए सरकार ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में १५सूत्री कार्यक्रम लागू किया। आरएसएस के मुसलिम विरोधी प्रचार से अप्रत्यक्षतौर पर कांग्रेस और वाम कहीं न कहीं प्रभावित रहे हैं , मुसलिम तुष्टीकरण का उन पर संघ का आरोप बेबुनियाद है।सच्चाई यह है कि अधिकांश मुसलमान बहुत ही खराब अवस्था में आज भी रह रहे हैं। मुसलिम तुष्टीकरण का नारा लगाकर आरएसएस हमेशा मुसलमानों के हकों पर हमले करने की कोशिश करता रहा है।
       भारत के मुसलमान बाकी दुनिया के मुसलमानों से वैचारिक तौर पर भिन्न रहे हैं, यह वैचारिक भिन्नता आधुनिककाल में ही नहीं दिखती बल्कि मध्यकाल में भी दिखती है। बाकी दुनिया के मुसलिम शासकों और भारत के मध्यकालीन मुसलिम शासकों के विचारों में बुनियादी अंतर है,इसके कारण आधुनिककाल में भी मुसलमानों में अंतर चला आया, बाद में आधुनिककाल के मुसलिम विचारकों और स्वाधीनता सेनानी मुसलमानों में बाकी समाज के साथ मिलकर उदारतावाद को मज़बूत बनाने और देश में उदारतावाद का माहौल बनाने का फैसला किया, यह परंपरा बाकी दुनिया में मुसलिम देशों में नजर नहीं आती। 
    दूसरी बात यह कि मुसलमानों का भारत में एक ही विचारधारा की ओर रूझान कभी नहीं रहा, उनमें उदार,धार्मिक,क्रांतिकारी और अनुदारवादी किस्म के लोग और संगठन  रहे हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक मुसलमान उदारवादी रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को एक ही विचारधारा के दायरे में रखकर नहीं देखना चाहिए।मुसलमानों में भी विचारों की बहुलता है।अफसोस की बात यह है कि हम मुसलमानों को न तो जानना चाहते हैं और न उनके यथार्थ को देखना चाहते हैं।उलटे आरएसएस के प्रचार को सच मानकर चलते हैं। सच यह है मुसलमानों के यथार्थ जीवन को लेकर आरएसएस कुछ नहीं जानता ,वह साम्राज्यवादी ताकतों के मुसलमान विरोधी प्रचार माल को ही हमारे सामने परोसता रहता है।
        आरएसएस और उसके भोंपू मीडिया में चल रहे मुसलिम रूढिबद्ध प्रचार अभियान को एकसिरे से ठुकराने की जरूरत है।मुसलमान भी इस देश के नागरिक हैं, उनके सुख-दुख भी हिंदुओं जैसे होते हैं, वे सतह पर भिन्न हो सकते हैं लेकिन अंदर से तो भारतवासी हैं। सवाल यह है ऊपर की धार्मिक पहचान को हम क्यों अहमियत देते हैं ? मुसलमान तो मनुष्य हैं जैसे हिंदू मनुष्य हैं।हम सभी लोगों को मनुष्य के रुप में देखें। कोई यदि अपने को हिंदू कहे या मुसलमान, हमें उसके प्रति मित्रता और भाईचारे का भाव रखना चाहिए।
         यह सच है देश में इस समय सत्ता का आतंक और भय छाया हुआ है लेकिन इस भय को मित्रता और शिरकत से तोड़ सकते हैं। राजनीतिक खेमेबाज़ी से यह चीज हासिल नहीं हो सकती।

रविवार, 30 जुलाई 2017

क्रांतियाँ बेकार नहीं जातीं -


                 
    विश्व विख्यात इतिहासकारों में एरिक हॉब्सबाम अग्रणी हैं।उनके लेखन की विशेषता है इतिहासलेखन को विशेषज्ञों के अध्ययन-अध्यापन के दायरे से बाहर लाकर जनोपयोगी बनाना,साधारण पाठक के लिए बोधगम्य बनाना। साधारण पाठक और इतिहासकार इन दोनों के बीच इतिहास को किस तरह जनप्रिय बनाया जाए इसी बुनियादी लक्ष्य को सामने रखकर उन्होंने 4प्रमुख किताबें लिखीं,वे हैं,1.क्रांति का युग,2.पूंजी का युग,3. साम्राज्य का युग और 4.अतिरेकों का युग।इन चारों किताबों के अनुवाद संवाद प्रकाशन,मेरठ ने छापे हैं। हमारी समीक्षा के केन्द्र में ´पूंजी का युग´ नामक किताब है।अंग्रेजी में यह ´एज आफ कैपीटल´नाम से प्रकाशित है।
     एरिक हॉब्सबाम ने´´पूंजी का युग´´(इतिहास 1848-1875) में लिखा ´बुर्जुआ समाज की विजय जितनी विज्ञानके अनुकूल थी,उतनी कला के लिए नहीं रही।´ यह सच है बुर्जुआ समाज के जन्म के साथ विज्ञान के क्षेत्र में सबसे तेजगति से विकास होता है लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि लेखकों-कलाकारों के अंदर व्यक्तिवादी मूल्यों के विकास के कारण साहित्य को नित नई ऊँचाईयों को स्पर्श करने का मौका मिला,इसके अलावा छापे की मशीन के आने के साथ ही साहित्य का लोकतांत्रिकीकरण हुआ। रचना के केन्द्र में मनुष्य आया और ईश्वर की विदाई हुई।कमोबेश यह प्रक्रिया हर देश में बुर्जुआ समाज के उदय के साथ घटित हुई।साहित्य और कला के मध्यकालीन मूल्यों की जगह नए आधुनिक कला मूल्यों का जन्म हुआ।
      एरिक हॉब्सबाम की कृति ´पूंजी का युग´कई मायनों में महत्वपूर्ण है।इस किताब में ´पूंजी´ को आधार बनाकर आधुनिककालीन राजनीतिक-आर्थिक और कलागत परिवर्तनों की व्याख्या पेश की गयी है।यह किताब आधुनिककाल का वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य बनाने में मददगार साबित हो सकती है। इस पुस्तक का अनुवाद वंदना राग ने किया है,अनुवाद बेहतरीन है और पढ़ते हुए लगता ही नहीं है कि यह पुस्तक अनुदित है।हिंदी पत्रिका जगत की मुश्किल यह है कि विश्व विख्यात लेखकों की वैचारिक किताबें हिंदी में खूब छप रही हैं लेकिन उन पर चर्चा या उनके मूल्यांकन या पुस्तक समीक्षा के काम को साहित्यिक पत्रिका के संपादक उपेक्षा की नजर से देखते हैं।जबकि इस तरह की वैचारिक किताबों के बारे में व्यापक  चर्चा होनी चाहिए। इससे हिंदी के विचार-जगत और पाठक जगत को विश्व के वैचारिक विमर्श के साथ जोड़ने और आलोचना में छाई अवधारणाहीन बहसों से बचने में मदद मिल सकती है।
     इस किताब का सबसे रोचक पहलू है ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ तत्कालीन क्रांतियों के संबंध की खोज।´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´ अज्ञात जर्मन लेखकों के नाम से 24फरवरी 1848 जर्मन में प्रकाशित होता है।बाद में इसे अंग्रेजी,फ्रेंच,इटालियन आदि अनेक भाषाओं में अनुदित करके छापा गया। हॉब्सबाम ने लिखा ´यह कहना सही होगा कि इसके राजनैतिक आग्रहों का जर्मन क्रांतिकारियों के छोटे तबके से बाहर बहुत कम प्रभाव रहा.अलबत्ता1870 के बाद प्रभाव बढ़ा.कुछही हफ्तों में और मैनीफेस्टो के प्रकाशन के कुछ ही घंटों बाद,मसीहाओं की आशाएं,आशंकाएं सब साकार होने को आईं.फ्रांसीसी राजशाही को बग़ावत के बाद सत्ता से अपदस्थ कर दिया गया.गणतंत्र राज्य की घोषणा कर दी गई और यूरोपीय क्रांति का आग़ाज हो गया।´
  ´आधुनिक दुनिया के इतिहास में कई महत्वपूर्ण क्रांतियां हुई हैं.कई क्रांतियां इससे अधिक सफल रही हैं.मगर जंगली आग की तरह इस तीव्रता से चारों ओर फैलने वाली,सरहदों, राज्यों, देशों और महासागरों के पार जाने वाली क्रांतियां कम ही हुई हैं´ दिलचस्प बात यह है 24 फरवरी को ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´प्रकाशित होता है और उसी दिन फ्रांस ने गणतंत्र राज्य की घोषणा की। हॉब्सबाम ने लिखा है ´दो मार्च तक क्रांति दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी,छह मार्च बवेरिया,ग्यारह मार्च बर्लिन,तेरह मार्च वियना और तत्काल ही हंगरी,अठारह मार्च मिलान और फिर इटली में फैल गई।´उल्लेखनीय है उन दिनों सबसे तेज संचार व्यवस्था  राथ्सचाइल्ड बैंक की थी ,वह भी पेरिस से वियना तक खबर पांच दिन से कम में नहीं पहुँचाती थी,लेकिन उससे भी तेज गति से क्रांति की आग चारों ओर फैल गयी।उन दिनों कुछ ही हफ्तों में यूरोप के दस से ज्यादा देशों में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´के प्रकाशन के साथ ही क्रांति हो गई।उस क्रांति के असर से कोई भी सरकारी तंत्र अपना अस्तित्व नहीं बचा पाया।अन्य क्षेत्रों में भी इसके निश्चित प्रभाव दिखाई दिए।हॉब्सबाम कहते हैं कि गंभीर अर्थों में यह वैश्विक क्रांति थी।इस क्रांति ने 1848 में यूरोप के विकसित और पिछड़े दोनों ही किस्म के देशों को प्रभावित किया।हालांकि यह क्रांति सबसे व्यापक थी लेकिन यह सबसे कम सफल साबित हुई.इसके घटित होने के 6माह के बाद ही यह भविष्यवाणी की जा सकती थी कि इसकी विश्वव्यापी असफलता निश्चित है.लगभग 18 महीनों बाद सिर्फ़ एक को छोड़ सारी अपदस्थ सत्ताएं वापस,दोबारा सत्ता पर काबिज़ हो चुकीं थीं। हॉब्सबाम के अनुसार ´1848 की क्रांतियां विलक्षण ढ़ंग से इस किताब से अपना रिश्ता जोड़ती हैं।´ एक क्रांतिकारी किताब के रूप में ´कम्युनिस्ट घोषणापत्र´की सामाजिक-राजनीतिक ताकत का इससे एहसास होता है।हॉब्सबाम ने लिखा ´1848 की क्रांतियों के लिए व्यापक अध्ययन की आवश्यकता है और राज्य,जनता तथा भौगोलिक क्षेत्रों की अलग पड़ताल ज़रूरी है।यहां यह संभव नहीं।फिर भी उन सभी लोगों में कुछ बातें सामूहिक रूप से थीं.यह समझा जा सकता है.सिर्फ़ यह नहीं कि उनके घटित होने का समय एक था,बल्कि यह भी कि उनका एक साझा मिज़ाज था और एक साझा शैली थी.वह एक रहस्यमय-यूटोपियन माहौल था और उससे मिलता-जुलता आडंबरपूर्ण वक्तृत्व था´, ´शुरूआती दौर में स्वतंत्र होने का एहसास,जबर्दस्त आशा और आशावादी भ्रम.यह लोगों का वसंत था-और ठीक वसंत की तरह,स्थायी नहीं था इसलिए दीर्घायु नहीं हो पाया।´इन सभी क्रांतियों की प्रमुख साझा बात थी ´कि वे सब विजयी हुए फिर जल्द ही पराजित हुए´,´शुरूआती दिनों में ज़्यादातर क्रांति के क्षेत्रों की सरकारें या तो पूरी तरह ध्वस्त हुई हैं या असमर्थता की शिकार हुईं.सारी सरकारें बिना चुनौती के समर्पण कर गईं।अपेक्षाकृत बहुत ही कम समय में क्रांतियों ने अपनी पहलकदमी खो दी।´ अगस्त 1849 तक फ्रांस को छोड़कर सभी देशों में क्रांति मृतप्रायः हो गई। ´सारे पुराने सत्ताशाली अपनी सत्ताओं पर विराजमान हो चुके थे,कई जगहों पर पहले की अपेक्षा और शक्तिशाली अंदाजों में,क्रांतिकारी निर्वासित हो इधर-उधर बिखर गए थे.सारे संस्थागत बदलाव,सारे राजनैतिक और सामाजिक स्वप्न,जो1848 के वसंत में देखे गए थे,वे सारे के सारे नेस्तनाबूत हो चुके थे।´
      ´पूंजी के युग´ ने कला और साहित्य के क्षेत्र में जिन चीजों को जन्म दिया वे पहले के किसी भी युग में संभव नहीं थीं।यह सच है आधुनिककाल के पहले बहुत कुछ बेहतरीन साहित्य और दर्शन लिखा गया,उच्च कोटि के स्थापत्य और कला रूपों का निर्माण हुआ।लेकिन उन सबके बनाए मानकों और मूल्यों के दायरे और लेखकीय दायित्वों को आधुनिककाल में लेखक ने नए सिरे से परिभाषित किया। ´पूंजी के युग´ की केन्द्रीय विशेषता है हर चीज को बार-बार परिभाषित करना ।यहां तक कि तयशुदा चीजों,परिभाषाओं,संबंधों आदि को भी बार-बार परिभाषित करने की जरूरत पड़ती है,इसने साहित्य में ´समकालीनता´की धारणा को जन्म दिया।पहले साहित्य तो था लेकिन ´समकालीनता´ की धारणा नहीं थी।पहले लेखक नैसर्गिक भाव से लिखता था अब उसमें नया तत्व जुड़ा ´समकालीनता´।नए युग की रूचियां,स्वाद और मूल्य  ´समकालीनता´से प्रभावित थे।यह सच है कि कलाओं और साहित्य में गुणवत्ता के लिहाज से गिरावट आई,लेकिन ´उपन्यास´विधा के जन्म ने साहित्य के समूचे संसार को ही बदल दिया।
     ´पूंजी के युग´की महानतम साहित्यिक उपलब्धि है उपन्यास।हॉब्सबाम ने उपन्यास के बारे में लिखा ´साहित्य-उपन्यास के माध्यम से पोषित हुआ।यह एक ऐसा फार्म था जो बुर्जुआ समाज के उद्भव एवं अंतर्द्वद्वों से मुठभेड़ कर अपनी बात सक्षम ढ़ंग से रख रहा था।´ उल्लेखनीय है पुराने विधा रूपों नाटक,काव्य,महाकाव्य आदि में नए बुर्जुआ समाज को अभिव्यक्ति करने की साहित्यिक क्षमता ही नहीं थी,उपन्यास के जन्म के साथ पूर्व के सभी विधारूपों के चरित्र में उपन्यास की संगति में बदलाव आए।उल्लेखनीय है उपन्यास ,साहित्य की विभिन्न विधाओं में से एक विधा नहीं है।बल्कि यह विधाओं का राजा है।उसने अपने जन्म के साथ यह घोषणा की कि पहले से प्रचलित विधाएं अपने चरित्र को बदलें और उपन्यास की संगति में अपना विकास करें,जो विधा यह नहीं कर पाएगी वह अप्रासंगिक होने को अभिशप्त है।सन् 1848 के बाद शहरों और भवनों की संरचनाओं और स्थापत्य में बदलाब आया।भवन निर्माण कला को राजसी और आध्यात्मिक भवन कला के दायरे बाहर लाया गया।अब स्थापत्य कला के क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष और नागरिकबोध संपन्न इमारतों का जन्म हुआ। पहले वाले भवन पुराने किलों और राजसी वैभव के प्रतीक हुआ करते थे लेकिन नए भवन –स्थापत्य के केन्द्र में इसके लिए कोई जगह ही नहीं थी।
     हॉब्सबाम के अनुसार ´वियना शहर के पुराने किलों और दीवारों को 1850 के वर्षों में ढहा दिया गया और उससे उपजी ख़ाली जगहों में शानदार चक्करदार सड़कें बनाकर उनके पास बड़े भवनों को निर्मित कर दिया गया।वे कौन -से भवन थेॽ वे क्या थे ॽ एक स्टॉक एक्सचेंज(विनिमय-बाज़ार) का प्रतिनिधि था,दूसरा धर्म का (वोतिवखीशें),तीन उच्च शिक्षण संस्थान ,नागरिक सुविधा और सार्वजनिक मसलों से जुड़े प्रशासनिक भवन थे जैसे शहर की नगरपालिका,न्यायपालिका तथा संसद के महल, और लगभग आठ थिएटर संग्रहालय,शिक्षण-संस्थान आदि थे।´
     यह असल में बुर्जुआजी के विनीत भाव की अभिव्यक्ति का युग भी है।इस प्रक्रिया में बाजार भी बदला,नए किस्म के बाजार का जन्म हुआ।नए विस्तृत और वैभवशाली बाजार ने जन्म लिया।19वीं सदी में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अर्जित उपलब्धियों ने इन सभी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।जनोत्पादन और जनोपभोग को नई ऊँचाईयां मिलीं।हर स्तर पर ये दोनों प्रवृत्तियां नजर आने लगीं।जनोत्पादन के कारण हर चीज सस्ते और पुनरूत्पादित रूप में सामने आई।पुनरूत्पादन की तकनीक ने साहित्य,पत्रकारिता,शिक्षा आदि में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया।इन क्षेत्रों का लोकतांत्रिकीकरण हुआ।साथ ही कलाओं और साहित्य में अवमूल्यन के तत्व का भी प्रवेश हुआ।पहले कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन नहीं होता था लेकिन नए युग में तेजी से कला और साहित्य रूपों का अवमूल्यन होने लगा।तकनीकी विकास ने साहित्य और कला के आभामंडल को छिन्न-भिन्न कर दिया।पहले लेखक राज्याश्रित था,उसके ही सहारे आजीविका के लिए जिंदा था लेकिन नए ´पूंजी के युग´में वह ´पूंजी´पर आश्रित था,´पूंजी´के नियमों से संचालित था।हॉब्सबाम ने लिखा है ´कला अपने स्वरूप में वैभवशाली और धन का उपार्जन करने वाली थी।सर्जनात्मक प्रतिभा जन-मानस को आकर्षित करती थी और स्तरहीन भी नहीं थी´, ´हम उन लोगों को खोज सकते हैं,जो बुर्जुआ समाज के प्रतिरोध में खड़े  या उन्हें हतप्रभ करने की योजना बना रहे थे।या उन लोगों को भी जो ग्राहक खोजने में असफल रहे। यह विशेषतया फ्रांस में हुआ।´
    ´पूंजी के युग´ में एक नए किस्म के कलाबोध,जीनियस और व्यक्तिगत-उद्यम को जन्म दिया।हॉब्सबाम के अनुसार ´इस दौर में स्त्री-पुरूष वस्तुओं से सुविधासंपन्न हो रहे थे और साथ ही सम्मान भी पा रहे थे।राजसत्ताओं,रजवाड़ों और कुलीन-वर्ग के समाज में कलाकार सज्जा प्रदान करनेवाला व्यक्ति ही नहीं था,बल्कि स्वयं सज्जा का पर्याय बन राजदरबार में उपस्थित रहता था अथवा महंगी विलासिता प्रदान करने वाली वस्तुओं का देयकर्ता होता था,जैसे केश-सज्जा करनेवाले,पोशाक बनानेवाले जिनकी आवश्यकता फ़ैशनेबल लोगों को बनाए रहती थी।बुर्जुआ समाज के लिए वह ´जीनियस´(विलक्षण) था,जो दरअसल व्यक्तिगत उद्यम का ग़ैर-वित्तीय संस्करण था।वह एक ऐसा ´आदर्श´था जो भौतिक सुख-सुविधा को ताज मुहैय्या कराता था और साथ ही आध्यात्मिक  मूल्यों को भी जिलाए रखता था।´
    ´पूंजी के युग´में कला की नई समझ पैदा हुई,जिसके तहत कहा गया कि कला को संपूर्ण मांगों का पूर्तिकर्ता होना चाहिए।पारंपरिक धर्म की जगह पढ़े-लिखे स्वतंत्र लोगों के बीच उसने अपने लिए जगह हासिल कर ली।इस वर्ग को हम मद्यमवर्ग के रूप में जानते हैं।यह इस युग का नया वर्ग था।इसके अलावा नए वर्ग के रूप में मजदूरवर्ग सबसे ताकतवर वर्ग के रूप में  जन्म लेता है।साहित्य में इन दोनों वर्गों की पक्षधरता,जीवनदृष्टि और चित्रण को लेकर सबसे ज्यादा लिखा गया।इस तरह के लेखन में बुर्जुआ और मजदूरवर्ग के आत्मविश्वास से भरपूर नजरिए का जमकर चित्रण हुआ। ´आत्मविश्वास´ इस दौर की सबसे बड़ी लेखकीय पूंजी है।
    ´पूंजी के युग´ में सृजन के हर क्षेत्र में एक ही प्रश्न छाया हुआ था ,वह था ´यह आखिर है क्या ´,यह इस युग का जायज सवाल है।इसके ही गर्भ से यथार्थवाद का जन्म हुआ। ´यथार्थ´ और ´जीवन´ को लेकर साहित्य और अन्य कला रूपों में सबसे ज्यादा वैचारिक-सर्जनात्मक बहसें हुईं। ´शाश्वत साहित्य´ की धारणा का अंत हुआ, ´साहित्य´की नई धारणा का उदय हुआ,साहित्य का मतलब ही है परिवर्तन,समाज और साहित्य की अंतर्क्रियाओं को समझने की ओर ध्यान गया और यह मान लिया गया कि जिस तरह समाज प्रतिक्षण बदलता है वैसे ही साहित्य भी बदलता है।इसी प्रकार पहले लेखक महत्वपूर्ण था लेकिन ´य़थार्थवाद´के युग में लेखक को हल्का बनाया गया और ´य़थार्थवाद´को प्रमुख और वजनी बनाया गया।पुराना साहित्य अतीत से जोड़ता था,नए युग का साहित्य भविष्य से जोड़ता है,यह बुनियादी अंतर हरेक कला रूप में अभिव्यंजित हुआ।
     सन् 1848 का कला और साहित्य पर राजनैतिक दृष्टि से असर यह हुआ कि राजनीतिक प्रतिबद्धता के बिना कला संभव ही नहीं थी।इस दौर में ´जो आंखें देखती हैं´,नारे के तहत साहित्य और फोटोग्राफी के बीच एक नए रिश्ते की शुरूआत हुई।वास्तविकता भी यही थी कि ’पूंजी के युग´की नायिका है फोटोग्राफी और नायक है उपन्यास।ये दोनों मिलकर समूचे समाज को वृहत्तर स्तर पर प्रभावित करते हैं।इस दौर के बारे में हॉब्सबाम ने लिखा ´बदलाव,तकनीकी ईजादों ,तथा विषयवस्तुओं को लेकर समकालीनता नए अर्थ गढ़ती है।´ इस प्रक्रिया में रचना में एक नए गुण का समावेश होता है वह है ´वर्तमान´।अब कला,साहित्य, राजनीति,दर्शन आदि को ´वर्तमान´की कसौटी पर रखकर परखा जाने लगा।साहित्य और जीवन, कला और जीवन, दर्शन और जीवन के बीच मौजूद महा-अंतराल का इसने अंत कर दिया।
पुस्तक का नाम- पूंजी का युग
लेखक-एरिक हॉब्सबाम
अनुवाद-वंदना राग
प्रकाशक-संवाद प्रकाशन,मुंबईःमेरठ।  
(इंद्रप्रस्थ भारती मेंप्रकाशित)

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