बुधवार, 18 मार्च 2015

मुगलों की पहली देन


संघ परिवार के लोग आए दिन मुगलों के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं और समसामयिक जीवन में हिन्दू मुसलमानों के बीच में वैमनस्य पैदा करने के लिए अतीत की बुराईयोंका खूब पारायण करते हैं। हमारा मानना है भारत में धर्मनिरपेक्ष वातावरण बनाने केलिए अतीत की सकारात्मक उपलब्धियों पर नजर रखें तो बेहतर होगा। मुगल शासन की भारतको दस बड़ी देन हैं। इनका जिक्र इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने किया है। मुगलशासन कीपहली बड़ी देन है ,'' बाहरी दुनिया केसाथ संबंध –स्थापन,भारतीय नौशक्ति का संगठन और समुद्रपार विदेशों में वाणिज्य।''
सरकार के अनुसार ''आठवीं शताब्दी मेंनवजाग्रत हिन्दूधर्म अपने घर को संभालने में लग गया । उसने हिन्दू समाज को नए रुपमें संगठित करके उसे अति कठिन बंधनों से जकड़ दिया,जिससे विदेशी का संपूर्णबहिष्कार हुआ और समाज के अंगों में नवीनता का संयोग या किसी प्रकार का परिवर्तन मात्र ही पाप और आचारभ्रष्टतासमझी जाने लगी। उस समय हिन्दू समय 'अचलायनी' बन गया,और उसके अपने देश की भौगोलिक परिधि के अंदर ही अपनी दृष्टि कोइस तरह आबद्ध करके रखा,मानो भारत के बाहर कोई देश ही नहीं है । ''


किंतु मुसलमानों के भारत जीतने के बाद भारतवर्षकूप-मंडूक बनकर नहीं रह सका और अन्यान्य देशों के साथ फिर उसका संबंध औरआदान-प्रदान जारी हुआ । विश्व के विभिन्न देशों के साथ व्यापार संबंध स्थापित हुए। उस समय बोखारा,समरकंद बलख औरखुरासान,खारिजम और फारस के देशों के साथ नियमित व्यापार होता था। उस समय अफगानिस्तानदिल्ली-साम्राज्य का सूबा था। बोलनघाटी से हर साल भारतीय मालों से लदे 14हजार ऊँटकंधार और फारस जाया करते थे।मछलीपट्टन बंदरगाह से प्रतिवर्ष असंख्य जहाजसिंहल,सुमात्रा,जावा,स्याम,चीन यहां कि जंजीबार आदि देशों में जाया करते थे। इससेभारत को उदार बनाने में मदद मिली,हिन्दूधर्म की रुढ़ियां कमजोर हुईं।

मुगल शासक और हिन्दू लेखक

        संघ परिवार के मुस्लिम विरोधी कुप्रचार ने देश का सबसे ज्यादा अहित किया है ,खासकर नयी युवा पीढ़ी के दिमाग में मुसलमानविरोधी कु-संस्कार पैदा किए हैं। इससे आधुनिक समाज के निर्माण की प्रक्रिया बाधित हुई है। मुगल शासकों ने बड़े पैमाने पर हिन्दी के कवियों को अपने शासन से मदद दिलवायी। मसलन् ,शहाबुद्दीन गोरी के यहां आश्रित कवि थे- केदार कवि । 

हुमायूं के यहां -क्षेम बंदीजन ।

सम्राट अकबर के आश्रित हिन्दी कवियों में प्रमुख हैं- गंग,नरहरि,करण,होल,ब्रह्म (बीरबल) अमृत,मनोहर,जगदीश,जोध,जयत,जगामग,कुम्हणदास ,टोडरमल,माधौ और श्रीपति आदि।

शाहजहां के यहां पंडितराज जगन्नाथ कविराज,हरिनाथ,कुलपति मिश्र, कवीन्द्र सुंदर, चिंतामणि,शिरोमणि ,दुलह,वेदांगराय,सुकवि बिहारीलाल आदि।

औरंगजेब के यहां -ईश्वर,इंद्रजीत त्रिपाठी ,मतिराम,कालिदास त्रिवेदी,कृष्णपंथी घनश्याम,जयदेव आदि।

मुसलमानों की देन है इतिहास रचना


 
 इतिहास के  बिना मनुष्य बोगस नजर आता है। भारत में मुग़लों के आने के पहले इतिहास लेखन की परंपरा नहीं थी । आरएसएस के लोग मुसलमानों को बर्बर और हिन्दू विरोधी प्रचारित करने के चक्कर में यह भूल ही गए कि मुसलमानों के आने के बाद ही भारत में इतिहास लिखने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ है। मुग़लों के आने के पहले हिन्दुओं में सांसारिक घटनाओं और दैनंदिन ज़िंदगी की घटनाओं का इतिहास लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी। हिन्दुओं के लिए तो संसार माया था और माया का ब्यौरा कौन रखे ! मुसलमानों को इसका श्रेय जाता है कि हमने उनसे इतिहास लिखना सीखा। मुग़लों के आने के पहले हिन्दूसमाज में दैनंदिन जीवन में क्या घटा और कैसे घटा इसका हिसाब रखना समय का अपव्यय माना जाता था । यही वजह है कि मुग़लों के आने के पहले कभी किसी व्यक्ति ने इतिहास नहीं लिखा। कुछ राज प्रशस्तियाँ या अतिरंजित वर्णन जरुर मिलते हैं। उनमें तिथियों का कोई कालक्रम नहीं है। इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार उस दौर में काल -निरुपण ग्रंथ तो एकदम नहीं मिलते। 
    यदुनाथ सरकार ने लिखा है" अरब लोग पक्के व्यवहारवादी थे और प्रकृत-वस्तुओं पर सर्वदा सजग दृष्टि रखा करते थे। इसीलिए उन्होंने इस्लाम  के आदि युग से लेकर घटनाओं का इतिहास , राजाओं की तिथि-संवत और राजाओं की जीवनियां लिख छोड़ी हैं। उनके इस इतिहास में तिथि संवतों का पूर्ण समावेश पाया जाता है । " यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से भारत में इतिहास रचना आरंभ होती है। बाद में हिन्दू लेखकों ने इस पद्धति का प्रयोग किया । मुसलमान इतिहासकारों की रचनाओं के जरिए ही हमें उस दौर के हिन्दू समाज और हिन्दू राजाओं के बारे में जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। 
   कहने का तात्पर्य है कि भारत के निर्माण में मुसलमानों की देन को भूलना नहीं चाहिए। इतिहास रचना हमें मुसलमानों से ही प्राप्त हुई ।
    

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

बलात्कार को भूलो और माफ़ करो के नज़रिए से न देखो !



आज अख़बार से पता चला कि कोलकाता के पार्कस्ट्रीट बलात्कार कांड की पीड़िता की मृत्यु हो गयी , अफ़सोस है कि अपराधी मस्त हैं और पीड़िता चल बसी। यह न्याय और राज्य सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि बलात्कार तो बर्बरता है, औरत पर सामाजिक हमला है। वह कोई 
सामान्य घटना नहीं ।यह शारीरिक हिंसा है, बलात्कार इससे भी जघन्य शारीरिक -मानसिक हिंसाचार के साथ सामाजिक हत्या है।  
   सामान्य हिंसाचार जैसे चांटा मारने का प्रतिकार हो सकता है, बदले में चांटा मार सकते हैं,या सहन करके रह सकते हैं। चांटा मारना सामान्य उत्पीड़न है। फिर भी हिंसा है।निंदनीय है।सामान्य हिंसा या अपमान को एक अवधि के बाद औरत भूल सकती है ,लेकिन बलात्कार तो स्त्री की सामाजिक हत्या है। बलात्कार के बाद औरत मर जाती है। उसका मन , तन और सामाजिक परिवेश नष्ट हो जाता है। 
   हम याद करें द्रौपदी के अपमान को जिसके कारण उसने पांडवों से कह दिया था कि जाओ पहले मेरा अपमान करने वालों का वध करके आओ। मैं फिर में केश बाँधूँगी ।स्त्री का अपमान वह छोटे रुप में हो या बलात्कार जैसे बर्बर रुप में हो , उसे"भूलो और माफ़ करो ", के नज़रिए से नहीं देखना चाहिए। 
      बलात्कार बर्बरता है यह सभ्यता के सभी  मानकों का उल्लंघन है। बलात्कार कभी सामान्य रुप में घटित नहीं होता . वह स्त्री की योनि,मन और सामाजिक ज़िंदगी को हमेशा के लिए नष्ट कर देता । बलात्कार पीड़िता स्वयं तो पीडित होती ही है उसका परिवार भी पीडित होता है, यातनाएँ झेलता है। बलात्कारी को कभी न तो लिंग में कष्ट होता है , न मन में तकलीफ़ होती और न सामाजिकतौर पर उसकी कोई क्षति होती है। 
     हमारे समाज का पुंसवादी ढाँचा , नेतागण और मीडिया का पुंसवादी परिवेश हमेशा बलात्कारी के पक्ष में खडा रहता है। मीडिया में आएदिन औरतों पर हमलों को महिमामंडित किया जाता है, बलात्कार को जायज़ ठहराते हुए फ़िल्में और सीरियल बड़ी संख्या में आते रहते हैं। यहाँ तक कि हमारे तमाम स्वनाम धन्य बडे कलाकार ऐसी फ़िल्मों में अभिनय भी करते हैं। अख़बारों में बलात्कारियों के पक्ष में अनेक पत्रकारगण आएदिन माहौल बनाते रहते हैं। 
               बलात्कार औरत पर बर्बर हमला है,अक्षम्य सामाजिक अपराध है। बलात्कारी का एकमात्र इलाज है कि उसे हमेशा के लिए जेल में बंद रखा जाय और दंड स्वरुप नपुंसक बनाया जाय। बलात्कार सामान्य अपराध नहीं है। बलात्कारी के प्रति कठोर बनें और बलात्कार की पीड़िता के साथ सामाजिक एकजुटता प्रदर्शित करें । 

रविवार, 8 मार्च 2015

'हाय ईसाई-हाय ईसाई' !!

     संघ प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों ''हाय ईसाई-हाय ईसाई'' के दर्द से पीड़ितहैं। उनके दर्द की दवा भारत के किसी धर्म में नहीं है । मोहन भागवत की खूबी यह हैकि वे निजीतौर पर ''हाय ईसाई'' की पीड़ा से परेशान नहीं है वे सांगठनिक तौर परपरेशान हैं !राजनीतिकतौर पर परेशान हैं ! ''हाय ईसाई'' धीमा बुखार है। जो भागवतियोंको बारह महिने रहता है ! कभी-कभी पारा कुछ ज्यादा चढ़ जाता है !  खासकर उस समय पारा ज्यादा चढ़ जाता है जब वेईसाईयों को गरीबों की सेवा करते देखते हैं ,स्कूल चलाते देखते हैं ।अस्पताल चलातेदेखते हैं। आम लोगों के घरों में ईसामसीह की तस्वीर देखते हैं।अथवा किसी ईसाई संत कोदेखते हैं ।  
    कोढ़ियों की सेवा या अति गरीबों की सेवा का कामसंघ भी कर सकता है उसे किसने रोका है, उन्होंने यह काम क्यों नहीं किया ?  बतर्जमोहन भागवत ,देस तो हिन्दुओं का है ! फिरदुखी-असहाय हिन्दुओं को ये संघी लोग मदद क्यों नहीं करते ?क्यों ईसाई मिशनरी के लोग ही यह कामकरते हैं ? क्याहमें लज्जा नहीं आती कि देश हमारा है और सेवा बाहर से आया धर्म और व्यक्ति कर रहेहैं । हमें हिन्दूधर्म के मठाधीशों की अमानवीय,अकर्मण्य और संवेदनहीन मनोदशाओं कोआलोचनात्मक नजरिए से देखना चाहिए।
   हमेंसवाल खड़े करने चाहिए कि हिन्दूधर्म के ठेकेदारों ने अति-गरीबों की उपेक्षा क्योंकी ? आम जनता मेंबढ़ती गरीबी-अशिक्षा-बीमारियों की बाढ़ से धर्म के ठेकेदारों के दिल क्यों नहींपसीजे ? शंकराचार्य सेलेकर संघ तक सभी का यह दायित्व बनता है कि वे देस में गरीबों की निःशुल्क चिकित्साव्यवस्था कराएं,हिन्दू कारपोरेट घरानों से कहें कि हिन्दुओं के हितार्थ धन दें ! लेकिन अफसोस है कि आज तक संघ ने हिन्दुओं कीमुफ्त चिकित्सा का कोई बड़ा प्रकल्प  अपनेहाथ में नहीं लिया ? कोढ़ियोंकी मुक्ति का कोई बड़ा हिन्दू नायक पैदा नहीं किया! किसने रोका था संघ को अतिगरीबों की सेवा करने से । किसने रोका थागरीबों के लिए शिक्षा संस्थान खड़े करने से ? संघ ने  हिन्दू मंदिरों सेहोने वाली आमदनी को विकास कार्यों में खर्च करने की कोई मुहिम क्यों नहीं चलायी ?
    संघ के संरक्षण में सैंकड़ोंअखाड़े हैं, हजारों संयासी हैं जिनका वे ख्याल रखते हैं। सैंकड़ों मंदिर और सम्प्रदायहैं जो मंदिरों से धन उठाते हैं ,मंदिर बनवाते हैं या भवन बनवाते हैं या फिर संघका '' हम हिन्दू हमहिन्दू''  प्रचार  करतेहैं। प्रचार से धर्म नहीं बचता। धर्म बचता है जनता की सेवा से। हिन्दू धर्म कोबचाना है तो संघ के लोग सेवा करना सीखें। धर्म में सेवा का महत्व है। प्रेम कामहत्व है। मुश्किल यह है कि संघ को सेवा और प्रेम से कोई लेना-देना नहीं है।उलटेइन चीजों से ऩफरत करते हैं।
    संघपर बातें करते समय संघ के  समग्र आचरण कोदेखें ,उसमें निजी कार्य करने वालों को नहीं। संघ की समग्रता में जो भूमिका रही हैवह सारी दुनिया में चिन्ता पैदा कर रही है। संघ ने ईसाई और इस्लाम के खिलाफ जिसतरह मोर्चे खोले हुए हैं उससे देश में सामाजिक घृणा बढ़ रही है। सामान्य मध्यवर्गके लोगों में ईसाईयों और इस्लाम के खिलाफ नफरत बढ़ी है। फेसबुक पर समझदार लोग भी ''हाय ईसाई –हाय ईसाई'' कर रहे हैं ! यह बेहद चिन्ताजनक स्थिति है।
   ''हाय ईसाई हाय ईसाई''का नारा धार्मिक असहिष्णुता बढ़ाने वाला है और सामान्य सामाजिक परिवेश को घृणा सेभर रहा है। यह संविधान की मूल भावना पर हमला है। असल में मोहन भागवत और उनकीहिन्दूभजन मंडली बुनियादी तौर इस तरह के प्रसंगों को उठाकर  संविधान की मूल धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिकभावना को घायल कर रही है। वे ईसाईयों और मुसलमानों के बारे में आधारहीन औरकाल्पनिक बातों को प्रचारित करते हैं और फिर उन पर विश्वास  पैदा करने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं ।
   घृणाके प्रचारकों की यह विशेषता रही है कि उसको सत्य से नफरत होती है। मोहन भागवत कीभी यही समस्या है,वे सत्य कम बोलते हैं और सत्य अधिक बोलते हैं। किसी संगठन कासरगना यदि असत्य बोले और उसको ही काल्पनिक कहानियों के जरिए प्रचारित करे तो उसेहम एक ही तरीके से रोक सकते हैं, हम उसका प्रतिवाद करें । जिस तरह 'हाय ईसाई हाय ईसाई' का नारा काल्पनिक है और असत्य पर आधारित है, वैसे ही संघ का 'हम हिन्दूसब हिन्दू' का नाराकाल्पनिक है।
   भारतआधुनिक देश में इसमें नागरिक रहते हैं,हिन्दू-ईसाई आदि नहीं रहते। संविधान ने हमेंनागरिक की पहचान दी है। हमें नागरिकों के हक दिए हैं। हिन्दुओं या ईसाईयों के पासउनके धर्म के दिए सीमित अधिकार हैं। असल अधिकार तो वे हैं जिन्हें हम नागरिकअधिकार कहते हैं। देश नागरिक अधिकारों में जीता है,धर्म में नहीं।हम धार्मिक नहीं,नागरिक हैं।

     

गालियाँ और कु-संस्कृति

       पुनरुत्थानवाद की खूबी है कि वह पुराने असभ्य सामाजिक रुपों ,भाषिक प्रयोगों ,आदतों या संस्कारों को बनाए रखता है।गालियां उनमें से एक हैं। पुनरुत्थानवाद के असर के कारण हिन्दीभाषी राज्यों में गालियां आज भी असभ्यता के बर्बर रुप के तौर पर बची हुई हैं और आम सम्प्रेषण का अंग हैं। हिन्दी में रैनेसां का शोर मचाने वाले नहीं जानते कि हिन्दी में रैनेसां असफल क्यों हुआ ? रैनेसां सफल रहता तो हिन्दी समाज गालियों का धडल्ले से प्रयोग नहीं करता। बांग्ला ,मराठी ,तमिल,गुजराती में रैनेसां हुआ था और वहां जीवन और साहित्य से गालियां गायब हो गयीं। लेकिन हिन्दी में गालियां फलफूल रही हैं। गालियां असभ्यता की सूचक हैं। जिस साहित्य और समाज में अभिव्यक्ति का औजार गाली हो वह समाज पिछडा माना जाएगा। गालियां इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में सभ्यता का विकास धीमी गति से हो रहा है। यथार्थ की भाषिक चमक यदि गाली के रास्ते होकर आती है तो यह सांस्कृतिक पतन की सूचना है। 
हिन्दी में अनेक लेखक हैं जो साहित्य में गालियों का प्रयोग करते हैं। अकविता से लेकर काशीनाथ सिंह तक के साहित्य में गालियां सम्मान पा रही हैं। गाली अभिव्यक्ति नहीं है। यथार्थ कभी गालियों के जरिए व्यक्त नहीं होता। अधिकांश बड़े साहित्यकारों ने यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए कभी गालियों का प्रयोग नहीं किया। गालियों का किसी भी तर्क के आधार पर महिमामंडन करना गलत है। हिन्दी में कई लेखक हैं जो अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए गालियों का प्रयोग करना जरूरी समझते हैं। युवाओं में गालियों का सहज प्रयोग मिलता है। इन दिनों इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी गालियों का प्रयोग बढ़ गया है।सवाल उठता है हिन्दी समाज इतना गाली क्यों देता है ? क्या हम गालियों से मुक्त समाज नहीं बना सकते ? वे कौन सी सांस्कृतिक बाधाएं हैं जो हमें गालियों से मुक्त नहीं होने देतीं ? प्रेमचंद ने लिखा है '‘हर जाति का बोलचाल का ढ़ंग उसकी नैतिक स्थिति का पता देता है। अगर इस दृष्टि से देखा जाए तो हिन्दुस्तान सारी दुनिया की तमाम जातियों में सबसे नीचे नजर आएगा। बोलचाल की गंभीरता और सुथरापन जाति की महानता और उसकी नैतिक पवित्रता को व्यक्त करती है और बदजवानी नैतिक अंधकार और जाति के पतन का पक्का प्रमाण है। जितने गन्दे शब्द हमारी जबान से निकलते हैं शायद ही किसी सभ्य जाति की ज़बान से निकलते हों।'’
आम तौर पर हिन्दी में पढ़े लिखे लोगों से लेकर अनपढ़ लोगों तक गालियों का खूब चलन है। कुछ के लिए आदत है। कुछ के लिए धाक जमाने,रौब गांठने का औजार हैं गालियां। पुलिस वाले तो सरेआम गालियों में ही संप्रेषित करते हैं। गालियों के इस असभ्य संसार को हम तरह-तरह से वैध बनाने की कोशिश भी करते हैं। कायदे से हमें अश्लील भाषा के खिलाफ दृढ़ और अनवरत संघर्ष करना चाहिए। यह काम सौंदर्यबोध के साथ -साथ शैक्षिक दृष्टि से भी जरूरी है। इससे हम भावी पीढ़ी को बचा सकेंगे।गालियों के प्रयोग के खिलाफ हमें खुली निर्मम बहस चलानी चाहिए। बगैर बहस के गालियां पीछा छोड़ने वाली नहीं हैं। बहस से ही दिमागी परतों की धुलाई होती है।गालियां मिथ्या साहस की अभिव्यक्ति हैं। गालियां एक सस्ती,घृणित और नीच अश्लीलता है। गालियां महज यांत्रिक आघात नहीं करतीं। इनसे न तो सेक्सी बिम्ब उभरते हैं और न कामुक अनुभूतियां ही पैदा होती हैं। सेक्सी गालियां हमारी अरूचिकर और अस्वास्थ्यकर संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति हैं। अश्लील गालियां और अश्लील मजाक के जरिए परपीड़न होता है। गंदे किस्से, चुटकुले,चालू अश्लील शब्द मानवीय सौंदर्य की गरिमा को कम करते हैं। मानव इतिहास आदिम शरीरक्रियात्मक मानकों को कूड़े के ढ़ेर पर फेंक चुका है। लेकिन अभी भी हमारे अनेक मित्र गालियों की हिमायत कर रहे हैं। इस प्रसंग में प्रसिद्ध रूसी शिक्षाशास्त्री अन्तोन माकारेंको याद आ रहे हैं उन्होंने लिखा है- '‘पुराने जमाने में शायद गाली-गलौज की गंदी भाषा कमजोर शब्दावली तथा मूक-निरक्षरता के लिए सहायक की तरह अपने ही ढ़ंग से काम आती थी। स्टैंडर्ड गाली की सहायता से आदिम- भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता था, जैसे क्रोध,प्रसन्नता, आश्चर्य, निंदा और ईर्ष्या । लेकिन अधिकांशतः यह किसी भी भावना को व्यक्त नहीं करती थी, बल्कि असम्बद्ध ,मुहावरों और विचारों को जोड़ने के साधन का काम देती थी।'’
हमें इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि हिन्दी में गालियां कहां से आ रही हैं? गालियों के मामले में हम लोकल और ग्लोबल एक ही साथ होते जा रहे हैं। जाने-अनजाने असभ्यता का विनिमय कर रहे हैं। कुछ लोग भाषा को उग्र या आक्रामक बनाने के लिए गालियों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारी जनता उग्र और आक्रामक भाषा पसंद नहीं करती। वह इसे असभ्यता मानती है। गालियों से अभिव्यक्ति में पैनापन नहीं आता बल्कि असभ्यता का संचार होता है। तीक्ष्णता और अभद्रता में हमें अंतर करना चाहिए। हमें बहस-मुबाहिसों में असभ्यता से बचना चाहिए। बहस मुबाहिसे में यदि असभ्यता आ जाती है तो फिर गालियां स्वतः ही चली आती हैं। हिन्दी में स्थिति इतनी बदतर है कि एक नामी साहित्यिक पत्रिका के संपादक आए दिन अपने संपादकीय तेवरों को आक्रामक बनाने के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग करते थे। वे भाषा में तीक्ष्णता पैदा करने के लिए ऐसा करते थेलेकिन यह मूलतः असभ्यता है। हमें अभिव्यक्ति के लिए तीक्ष्णता का इस्तेमाल करना चाहिए ,असभ्य भाषिक प्रयोगों का नहीं। इन जनाब के संपादकीय अनेक मामलों में अधकचरी विद्वता और अक्षम तर्कपूर्ण शैली से भरे होतेथे।
हमें विचारों की तीक्ष्णता और साहित्यिक अभिव्यंजना की अभद्रता के बीच अंतर करना चाहिए। लेखन में गाली का प्रयोग एक ही साथ गलत और सही दिखता है। एक जमाने में महान रूसी लेखक पुश्किन ने तीक्ष्णता और अभद्रता के अंतर का विवेचन करते हुए लिखा था, ‘ 'गाली कभी-कभी ,निश्चय ही,बिल्कुल अनुचित है। जैसे कि आपको नहीं लिखना चाहिएः ‘‘यह हांफता हुआ बूढ़ा,चश्मा लगाए हुए एक बकरा है,एक कमीना झूठा है,बदकार है,बदजात है।’’- ये व्यक्ति को दी गयी गालियां हैं। किन्तु अगर आप चाहें ,तो लिख और छाप सकते हैं कि ‘‘यह साहित्यिक पुराना उपासक(अपने लेखों में) एक निरर्थक बकवासी है,हमेशा दुर्बल,हमेशा उकताने वाला,कष्टकर और बिल्कुल अहमक़ तक है।’,'’क्योंकि यहां पर कोई व्यक्ति नहीं एक लेखक है।’'
इसी प्रसंग में अन्तोन माकारेंको ने लिखा है, ‘'हमारे देश में गाली-गलौज के शब्दों का ‘‘तकनीकी’’ महत्व खत्म हो गया है, लेकिन भाषा में वे अभी भी मौजूद हैं। अब वे मिथ्या साहस को, ‘‘लौह चरित्र’’ को,निर्णायकत्व,सरलता ,सुरूचि के प्रति तिरस्कार को अभिव्यक्त करते हैं। अब वे एक किस्म के ऐसे नखरे हैं,जिनका मकसद सुनने को खुश करना ,उनको जीवन के प्रति सुनानेवाले के साहसिक रवैय्ये और पूर्वाग्रहहीनता को दर्शाना है।'’
साहित्य में गाली के पक्षधरों का मानना है पात्र यदि गाली देते हैं तो हमारे लिए उससे बचना संभव नहीं है। इस प्रसंग में यही कहना है कि गालियां साहित्य नहीं हैं। गालियां जीवन का यथार्थ भी नहीं हैं। गालियां महिलाओं का अपमान हैं और बच्चों के लिए हानिकारक हैं। गालियों के प्रति हमें लापरवाह नहीं होना चाहिए। गालियों को साहित्य में रखकर हम उन्हें दीर्घजीवी बना रहे हैं। उन्हें मूल्यबोध प्रदान कर रहे हैं। विरासत के रूप में गालियां हमारे समाज और संस्कृति की गंभीर क्षति कर रही हैं। प्रेमचंद ने लिखा है '‘ गाली हमारा जातीय स्वभाव हो गयी है।’','‘गालियों का असर हमारे आचरण पर बहुत खराब पड़ता है। गालियाँ हमारी बुरी भावनाओं को उभारती है और स्वाभिमान व लाज-संकोच की चेतना को दिलों से कम करती हैं जो दूसरी क़ौमों की निगाहों में ऊँचा उठाने के लिए जरूरी है।’'
जब कोई व्यक्ति गालियों का इस्तेमाल करता है तो पढ़ने या सुनने वाला किसी सापेक्ष शब्द को नहीं सुनता बल्कि वह गाली के जरिए उसमें अन्तर्निहित सेक्स के अर्थ तक पहुँचता है। इस दुर्भाग्य का मूल सार यह नहीं है कि सेक्स का राज पाठक या श्रोता के सामने खुल जाता है, बल्कि यह कि वह राज अपने सबसे ज्यादा कुरूप,मानवद्वेषी तथा अनैतिक रूप में उदघाटित होता है। ऐसे शब्दों का बारम्बार होने वाला उच्चारण या लिखित प्रयोग पाठक या श्रोता को सेक्सी मामलों पर अत्यधिक ध्यान देने की,विरूपित दिवास्वप्न देखने की आदत पैदा करता है। इससे लोगों में अस्वास्थ्यकर रूचियों का विकास होता है।
अधिकांश गालियां स्त्रीकेन्द्रित हैं और उनके गुप्तांगों को लेकर हैं या उसके विद्रूपों को लेकर हैं। इससे सामाजिक हिंसा में बढ़ोतरी होती है। साथ ही यह भावना पैदा होती है कि औरत इस्तेमाल की चीज है। अपमानित है। मादा है। आश्चर्यजनक बात है कि हमारे स्कूली पाठ्यक्रमों से लेकर बड़ी कक्षाओं तक गालियों के खिलाफ कोई पाठ नहीं है। सारे देश के बुद्धिजीवी आराम से आए दिन सिलेबस बनाते हैं और पढ़ाते हैं। लेकिन गालियों के बारे में कभी क्लास नहीं लेते। कभी बोलते नहीं हैं। उलटे यह देखा गया है कि जिस बच्चे को डांटना होता है उस पर गालियों की बौछार कर देते हैं।
गालियों का प्रयोग सत्य को स्थगित कर देता है। हम जब गाली देते हैं या गाली लिखते हैं तो उस समय हमारी नजर गाली पर होती है सत्य पर नहीं,हम गाली में उलझे होते हैं। गालियों के प्रयोग से वर्तमान साफ नजर नहीं आता। गालियों का प्रयोग विचारों और यथार्थ को एक नई भंगिमा में तब्दील कर देता है। एक विलक्षण किस्म के पाठ की सृष्टि करता है। वह अवधारणाओं के अर्थ और यथार्थ के अर्थ को संकुचित करता है। अर्थ संकुचन गालियों की पूर्वशर्त है। यह य़थार्थ को उसके स्रोत से काट देता है । जबकि लेखक यही दावा करता है कि वह वास्तविकता दरशाने के लिए गालियों का प्रयोग कर रहा है। गालियों के साहित्यिक प्रयोग को स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में ही पेश किया जाता है। जबकि सच इसके एकदम विपरीत है।गालियों का प्रयोग अर्थविस्तार नहीं करता उलटे अर्थसंकोच करता है। जब कोई लेखक यथार्थ को गालियों में खींच लाता है तो वह यथार्थ के साथ जुड़े बुनियादी तर्कों से उसे अलग कर देता है। यथार्थ के सत्य और असत्य विकल्पों की संभावनाएं खत्म कर देता है। गालियों का प्रयोग यथार्थ की बहस को वर्तमान काल में ले आता है। अब उसके लिए वर्तमान का जीवंत यथार्थ बेमानी होता है। गालियों का प्रयोग वर्तमान यथार्थ को शरणार्थी बना देता है।
वैसे अधिकांश रचनाओं में एकाधिक अर्थ की संभावनाएं होती हैं लेकिन गाली के प्रयोग वाले अंशों में एक ही अर्थ होता है। एकाधिक अर्थ या भिन्न अर्थ की संभावनाओं को गालियां नष्ट कर देती हैं। गालियों का प्रयोग सामाजिक गैर -बराबरी को बनाए रखता है। सामाजिक हायरार्की को आप इसके प्रयोगों के जरिए अपदस्थ नहीं कर सकते। गालियों में परिवर्द्धन और सम्बर्द्धन संभव नहीं है वे जैसी बनी थीं वैसी ही चली आ रही हैं। यह सिलसिला सैंकड़ों सालों से चला आ रहा है। गालियों के जरिए युगीन विचारों को नहीं पकड़ सकते। हिन्दी में जिसे दिल्लगी कहते हैं वह भी गालियाँ है। प्रेमचंद ने दिल्लगी को गालियों से कुछ कम घृणित माना है। गालियों को उन्होंने ‘जातीय कमीनेपन’ और ‘नामर्दी’ का सबूत कहा है। साथ ही इसे ‘जातीय पतन की देन’ माना है। उनके ही शब्दों में गालियां‘' जातीय पतन दिलों की इज़्ज़त और स्वाभिमान की चेतना को मिटाकर लोगों को बेग़ैरत और बेशर्म बना देती है।’'गालियां अनुभूति की शक्ति मिटा देती हैं।

किसान के हक में

       किसान का नाम आते ही राजनीति का रोमांस गायब हो जाता है। किसान के सवाल आते ही राजनीति की वर्गीयबुनाबट खुलने लगती है। लोकतंत्र के विभ्रम टूटने लगते हैं। किसानों का नंदीग्रामप्रतिवाद हाल के वर्षों का ऐसा आंदोलन रहा है जिसने मनमोहन सरकार को पुराना भूमिअधिग्रहण कानून बदलने के लिए मजबूर किया था। जबकि पुराने कानून के तहत सारे देशमें तकरीबन दस लाख एकड़ जमीन विभिन्न सरकारें किसानों से छीनकर कारपोरेट घरानों कोसौंप चुकी थीं। नंदीग्राम आंदोलन ने वाम राजनीति को शिखर से लेकर नीचे तक बुरी तरहक्षतिग्रस्त किया। उस आंदोलन के बाद मनमोहन सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण कानूनबनाया था,जिसे पिछली संसद पास कर चुकी थी, नई मोदी सरकार को उसे लागू करना थालेकिन मोदी सरकार ने उसे लागू करने के पहले ही खत्म कर दिया और नया भूमि अधिग्रहणअध्यादेश जारी कर दिया,यह अध्यादेश क्या है इसके परिणाम क्या होंगे इस पर मीडियामें बहुत सार्थक और सटीक सामग्री और सूचनाएं आ रही हैं,यह किसानों के  पक्ष में मीडिया की सकारात्मक भूमिका को सामनेलाता है। इस कानून के खिलाफ बृहत्तर राष्ट्रीय एकता भी बनती नजर आ रही है। जरुरतहै इस कानून के खिलाफ जनांदोलन तेज करने की । भाजपा के दुरंगेपन को नंगा करने की ।

     उल्लेखनीय है कि मनमोहनसरकार में निर्मित भूमि अधिग्रहण कानून को भाजपा ने पूर्ण समर्थन दिया था,यहां तककि संपूर्ण विपक्ष ने समर्थन दिया था, वह कानून संसद की आम सहमति से बना था, मोदीसरकार ने बिना किसी कारण के उस कानून को लागू करने के पहले ही खत्म करके नयाअध्यादेश जारी करके संसद का अपमान किय़ा है, राजनीतिक सहमति को तोड़ा है और इससे भीबड़ी बात यह है कि यह मसला भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में नहीं था। जो मसला चुनावघोषणापत्र में नहीं है उसे मोदी सरकार जोर-जबर्दस्ती से पास करना चाहती है । यदियह कानून इतना ही जरुरी था तो भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इसका जिक्र क्यों नहींकिया ? मोदी ने अपने भाषणों में इस तरह का कानूनलाने की मंशा जाहिर क्यों नहीं की ?
        सवाल यह है मोदी सरकारइतने उतावलेपन से कानून क्यों बदलना चाहती है ? क्यादेश के कारपोरेट घराने देश में पैसा निवेश करने के लिए इतने बेचैन हैं कि उनकोरातों-रात देश की जमीन कौडियों के भाव पर सब कानून तोड़कर दे दी जाय ? हम जानना चाहते हैं कि भारत के कारपोरेट घरानों को विगत मनमोहन सरकारने जो जमीन आवंटित की थी क्या उस पर कारखाने लगाए गए हैं ? क्याजो जमीन भारत सरकार ने विकास के नाम पर किसानों से ली है उस पर काम हो रहा है ? यदि पुरानी जमीन खाली पड़ी है और कारपोरेट घराने वायदा नहीं निभा पाएहैं तो फिर नई जमीन हासिल करने के लिए वे बैचैन क्यों हैं ? हमारे देश में लाखों बीमार-बंद कारखाने हैं पहले उनको चंगा करने की ओरकारपोरेट घराने ध्यान क्यों नहीं देते ? वे नई जमीनें क्यों हड़पना चाहते हैं ?क्या जमीनें खरीद लेनेभर से विकास होता है ? क्या हाउसिंग सोसायटियों के बनाने सेदेश का विकास होगा ? क्या इससे देश की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी ? क्या किसान औरमजदूरों की उत्पादकता में बढोतरी होगी ?
    अब तक का अनुभव बताता है कि किसानों से विगत सरकारों के जरिए हथियाई गई दसलाख एकड़ से ज्यादा जमीन के बावजूद देश की उत्पादकता में कोई इजाफा नहीं हुआ है।नए कारखाने बहुत कम इलाको में खुले हैं, अधिकतर सेज के इलाके सूने पड़े हैं । मोदीसरकार कम से कम सीएजी की रिपोर्ट को ही गंभीरता से देख लेती तो उसे सेज प्रकल्पोंकी दशा का अंदाजा लग जाता। लेकिन मोदी सरकार ने तो तय कर लिया है हर हालत में राष्ट्रीयसंपदा और संसाधनों को कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंप देना है। इससे आरएसएस काहिन्दूमार्ग भी आसानी से समझ में आ सकता है। आरएसएस कहने के लिए राष्ट्रवादी होनेका दावा करता है लेकिन उनका हिन्दू नायक जब पीएम बनता है तो खुलकर किसानों औरगरीबों की संपदा पर डाकेजनी का कानून बनाकर पेश करता है। यह मजेदार तथ्य है किआरएसएस के नियंत्रण में केन्द्र सरकार के आने के बाद से सबसे खुशहाल हैं कारपोरेटघराने। कारपोरेट घरानों को जितना फायदा मिला है और उनकी संपदा में जिस तेज गति सेइजाफा हुआ है उसने संघ को कारपोरेट संघ में रुपान्तरित कर दिया है।
    हमें किसानों के पक्ष में बिना किसी संशय के सोचना चाहिए। किसान के मसलोंके लिए जो भी संगठन संघर्ष करें, जो भी नेता लड़े , हमें उससे सहयोग करना चाहिए।किसान के सवाल और खासकर किसान की जमीन को विकास के नाम पर हथियाने के सभी प्रयासोंको हर स्तर पर विफल करने की जरुरत है । मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण अध्यादेशवस्तुतः किसान और विकास विरोधी है। यह देश के साथ भाजपा की गद्दारी का आदर्शप्रमाण है। यह आरएसएस के दुरंगेपन का भी आदर्श प्रमाण है ।     

        

नागरिक की तलाश में

    सामान्य तौर पर हर प्रोफेसर अपने को विद्वान कहलाना पसंद करता है, लेखक कहलाना पसंद करता है। लेकिन मैं शुरु से विद्वान और लेखक के भावबोध से चिढ़ता रहा हूँ।मेरे अंदर न तो लेखक के गुण हैं और न विद्वान के लक्षण हैं। मुझे अधिकतर लेखक -प्रोफेसर लेखक अहंकारी, खोखले , गैर-ज़िम्मेदार और धूर्त प्रतीत होते हैं। मैं अपने जीवन में कभी न तो विद्वान बन पाया और न मेरी विद्वान बनने की आकांक्षा रही, यही हालत लेखक मन की भी रही है। मैंने अधिकतर प्रोफ़ेसरों को विद्वत्ता के आडंबर में लिपटे देखा है और उनके जीवन पर चालाकियों और धूर्तताओं का जो रंग चढ़ा देखा है उसने मुझे यह महसूस करने के लिए मजबूर किया है कि मैं कम से कम न तो विद्वान हूँ और न लेखक हूँ। मुझे यह देखकर दुख होता है कि हमने प्रोफेसर विद्वानों की ऐसी पीढ़ी तैयार की जो झूठ और अनपढता के मामले में अव्वल है। इनकी विशेषता है कम से कम पढ़ना और बड़ी बड़ी हाँकना, अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बातें और आचरण करना । 

मेरे परिचित अधिकांश हिन्दी प्रोफेसर न तो कभी समय पर कक्षा में जाते हैं और न पूरा समय कक्षा में रहते हैं, यहाँ तक कि ये लोग सारी ज़िंदगी न्यूनतम किताबें तक नहीं पढ़ते ।
ये लोग जश्न, मंच,उत्सव, संगोष्ठी में जीना पसंद करते हैं लेकिन कभी कुछ भी न तो नया बोलते हैं और नहीं कभी नए विचार पर सुसंगत लिखते हैं, लेकिन विद्वत्ता की हेकड़ी में रहते हैं। वे नागरिक की तरह आचरण नहीं करते । उनमें न तो नागरिक जैसी सभ्यता है और ना ही नागरिकबोध ही है। ऐसी अवस्था में उनकी सारी भाव-भंगिमाएँ घिन पैदा करती हैं। मैं सोचता हूँ कि जो प्रोफेसर -लेखक आए दिन कबीरदास-तुलसीदास -प्रेमचंद के उद्धरण सुनाते रहते हैं वे कभी सामान्य तौर पर भारत के संविधान की बातें और उद्धरण क्यों नहीं सुनाते ? जिस लेखक में संविधानचेतना और नागरिकचेतना पैदा नहीं हुई है मैं उसे शिक्षित मानने को तैयार नहीं हूँ। लोकतंत्र में मुझे लोकतांत्रिक नागरिक चाहिए , विद्वान-प्रोफेसर-लेखक नहीं।

कुलदीप कुमार की षष्ठीपूर्ति पर विशेष-सर्जनात्मकता के साठ साल


सभ्यता के संस्कार अर्जित करना और उनको जीवन में सर्जनात्मक ढंग से ढालना सबसे मुश्किल काम है। मेरे जिन मित्रों ने सभ्यता और संस्कृति के वैविध्यपूर्ण श्रेष्ठतम मानकों को अपने दैनंदिन जीवन में विकसित किया है उनमें कुलदीप कुमार अद्वितीय है। वह बेहतरीन इंसान होने के साथ बहुत ही अच्छा मित्र भी है। मित्रता ,ईमानदारी, मिलनसारिता,सभ्यता और बेबाक लेखन को उसने जिस परिश्रम और साधना के साथ विकसित किया है वह हम सबके लिए प्रेरणा की चीज है।
कुलदीप से मेरी सन् 1979 में पहलीबार जेएनयू में दाख़िले के बाद मुलाक़ात हुई। संयोग की बात है कि कुलदीप की पत्नी और प्रसिद्ध स्त्रीवादी विदुषी इंदु अग्निहोत्री भी तब से मेरी गहरी आंतरिक मित्र हैं। कुलदीप के स्वभाव में स्वाभिमान कूट -कूटकर भरा है। मध्यवर्गीय दुर्गुणों -जैसे -सत्ताधारियों के बीच जी -जी करके रहना, जी -जी करके दोस्ती गाँठना , नेताओं और सैलीब्रिटी लोगों की चमचागिरी करना , गुरुजनों की चमचागिरी करना , संपादक की ख़ुशामद करना, हर बात में कमर झुकाकर बातें करना, मातहत भाव में रहना आदि , दुर्गुणों से कुलदीप का व्यक्तित्व एकदम मुक्त है। उसके व्यक्तित्व में ईमानदारी,स्वाभिमान और व्यक्तिगत सभ्यता का संगम है।
कुलदीप ऐसा पत्रकार है जिसने अपने लेखन के लिए पार्टीतंत्र के दवाबों को मानने से साफ़ इंकार किया। हमलोगों ने जेएनयू में एक साथ खुलकर एसएफआई के लिए काम किया , सालों माकपा में काम किया, और लोकतांत्रिक छात्र आंदोलन के निर्माण में सक्रिय भूमिका अदा की । कुलदीप ने कभी राजनीति को कैरियर नहीं बनाया और राजनेताओं के साथ अपने संपर्क -संबंधों को अपनी नौकरी हासिल करने या प्रमोशन हासिल करने या सरकारी पद हासिल करने का ज़रिया नहीं बनाया।
कुलदीप ने विगत पैंतीस साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में विभिन्न क्षेत्रों में जमकर लिखा है। राजनीति से लेकर संस्कृति तक कई हज़ार लेख देश के विभिन्न दैनिक राष्ट्रीय अख़बारों (हिन्दू, टेलीग्राफ़, संडे आब्जर्वर, टाइम्स ऑफ़ इण्डिया, इकोनोमिक टाइम्स, नवभारत टाइम्स, पायनियर, जनसत्ता, अमर उजाला आदि, इसके अलावा कई विदेशी पत्र पत्रिकाओं और वेबसाइट के लिए भी नियमित लेखन किया है) में लिखे हैं ।
कुलदीप ने बेहतरीन मर्मस्पर्शी कविताएँ लिखी हैं जो "हिन्दी समय डॉट कॉम "पर उपलब्ध हैं। कुलदीप कुमार ने संगीत पत्रकार के रुप विशेष रुप से जो महारत हासिल की है । मित्रता, मिलनसारिता और सभ्यता विमर्श उसके प्रमुख लक्षण हैं। मैं कई सालों से अनुरोध करता रहा हूँ कि वह अपने लेखन को पुस्तकाकार रुप दे। हम चाहते हैं कि वह जिस कर्मठता और ईमानदारी के साथ अब तक लिखता रहा है वह सिलसिला जारी रखे। हम उसके दीर्घायु जीवन की कामना करते हैं।

'स्त्री असभ्यता' हमारी चिंता में क्यों नहीं है !

       औरत सभ्य होती है,लेकिन औरत के अंदर अनेक ऐसी आदतें,परंपराएं और मूल्य हैं जो उसे असभ्यता के दायरे में धकेलते हैं। औरत को संयम और सही नजरिए से स्त्री के असभ्य रुपों को निशाना बनाना चाहिए। असभ्य आयाम का एक पहलू है देवीभाव ।  औरत को देवीभाव में रखकर देखने की बजाय मनुष्य के रुप में,स्त्री के रुप में देखें तो बेहतर होगा । औरत में असभ्यता कब जाग जाए यह कहना मुश्किल है लेकिन असभ्यता के अनेक रुप दर्ज किए गए हैं। खासकर औरत के असभ्य रुपों की स्त्रीवादी विचारकों ने खुलकर चर्चा की है। हमें भारतीय समाज के संदर्भ में और खासकर हिन्दू औरतों के संदर्भ में उन  क्षेत्रों में दाखिल होना चाहिए जहां पर औरत के असभ्य रुप नजर आते हैं।
       औरत की असभ्य संस्कृति के निर्माण में पुंसवाद की निर्णायक भूमिका है। इसके अलावा स्वयं औरत की अचेतनता भी इसका बहुत बड़ा कारक है। मसलन्, जब कोई लड़की शिक्षित होकर भी दहेज के साथ शादी करती है , दहेज के खिलाफ प्रतिवाद नहीं करती तो वह असभ्यता को बढ़ावा देती है।हमने सभ्यता के विकास को शिक्षा,नौकरी आदि से जोड़कर इस तरह का स्टीरियोटाइप विकसित किया है कि उससे औरत के सभ्यता के मार्ग का संकुचन हुआ है।  
    हमारी शिक्षा लड़कियों को सभ्य कम और अनुगामी ज्यादा बनाती है। औरत सभ्य तब बनती है जब वह सचेतन भाव से सामाजिक बुराईयों के खिलाफ जंग करती है। औरत की जंग तब तक सार्थक नहीं हो सकती जब तक हम उसे आम औरत के निजी जीवन तक नहीं ले जाते। हमारे सभ्य समाज की आयरनी यह है कि वह सभ्य औरत तो चाहता है लेकिन उसे सभ्य बनाने के लिए आत्मसंघर्ष करने की प्रेरणा नहीं देता। मसलन्,औरतों में दहेज प्रथा के खिलाफ जिस तरह की नफरत होनी चाहिए वह कहीं पर भी नजर नहीं आती।
    औरत सभ्य है या असभ्य है यह इस बात से तय होगा कि वह अपने जीवन से जुड़े बुनियादी सवालों और समस्याओं पर विवेकवादी नजरिए से क्या फैसला लेती है ? समाज ने स्त्री के लिए अनुकरण और निषेधों की श्रृंखला तैयार की है और उसे वैध बनाने के तर्कशास्त्र, मान्यताएं और संस्कारों को निर्मित किया है। इसके विपरीत यदि कोई औरत अनुकरण और निषेधों का निषेध करे तो सबसे पहले औरतें ही दवाब पैदा करती हैं कि तुम यह मत करो,ऐसा मत करो, परिवार की इज्जत को बट्टा लग जाएगा। औरत को बार-बार परिवार की इज्जत का वास्ता देकर असभ्य कर्मों को करने के लिए कहा जाता है। खासकर युवा लड़कियों के अंदर दहेज प्रथा के खिलाफ जब तक घृणा पैदा नहीं होगी, औरत को सभ्य बनाना संभव नहीं है। औरत सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह उन तमाम चीजों से नफरत करना सीखे जो उसको सभ्य बनने से रोकती हैं। दहेज प्रथा उनमें से एक है।
    औरत के अंदर असभ्यता का आधार है अनुगामी भावबोध ,जब तक औरतें अनुगामी भावबोध को विवेक के जरिए अपदस्थ नहीं करतीं वे सभ्यता को अर्जित नहीं कर पाएंगी। समाज में अनुगामी औरत को आदर्श मानने की मानसिकता को बदलना होगा।
   औरत को असभ्य बनाने में दूसरा बड़ा तत्व है, औरतों और खासकर लड़कियों का सचेतभाव से मूर्खतापूर्ण हरकतें करना, मूर्खता को वे क्रमशः अपने जीवन का आभूषण बना लेतीं हैं। तमाम किस्म के स्त्रीनाटक इस मूर्खतापूर्ण आचरण के गर्भ से निकलते हैं।स्त्री की  मूर्खतापूर्ण हरकतें अधिकांश पुरुषों को अच्छी लगती हैं। फलतः लड़कियां सचेत रुप से मूर्खता को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग बना लेती हैं। इससे स्त्री की छद्म इमेज बनती है। स्त्री सभ्य बने इसके लिए जरुरी है कि वह छद्म इमेज और छद्म मान्यताओं में जीना बंद करे।
    छद्म इमेज का आदर्श है लड़कियों में फिल्मी नायिकाओं को आदर्श मानने का छद्मभाव। मसलन्, माधुरी दीक्षित ,रेखा,ऐश्वर्या राय में कौन सी चीज है जिससे लड़कियां प्रेरणा लेती हैं ?  क्या सौंदर्य-हाव-भाव आदि आदर्श हैं ? यदि ये आदर्श हैं तो इनसे सभ्यता का विकास नहीं होगा। सौंदर्य के बाजार और प्रसाधन उद्योग का विकास होगा। यदि इन नायिकाओं के कैरियर और उसके लिए इन नायिकाओं द्वारा की गयी कठिन साधना और संघर्ष को लड़कियां अपना लक्ष्य बनाती हैं तो वे सभ्यता का विकास करेंगी और पहले से ज्यादा सुंदर दिखने लगेंगी। ये वे नायिकाएं हैं जिन्होंने अपने कलात्मक जीवन को सफलता की ऊँचाईयों तक पहुँचाने के लिए कठिन रास्ता चुना और समाज में सबसे ऊँचा दर्जा हासिल किया। अपने अभिनय के जरिए लोगों का दिल जीता।

    कहने का अर्थ है कि फिल्मी नायिका से सौंदर्य टिप्स लेने की बजाय,उसके सौंदर्य का अनुकरण करने की बजाय, कलात्मक संघर्ष की भावनाएं और मूल्य यदि ग्रहण किए जाते तो देश में हजारों माधुरी दीक्षित होतीं! दुर्भाग्य की बात है कि हम यह अभी तक समझ नहीं पाए हैं कि औरत का सौंदर्य उसके शरीर में नहीं उसकी सभ्यता में होता है ! औरत जितनी सभ्य होगी वह उतनी ही सुंदर होगी। सभ्यता के निर्माण के लिए जरुरी है कि औरतें स्वावलंबी बनें। अनुगामी भाव से बचें। 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

ब्रज संस्कृति की चुनौतियाँ



ब्रज संस्कृति का विगत दो सौ सालों में निरंतर ह्रास हुआ है। यह संस्कृति मूलत: साहित्य, भाषा और जीवनशैली से जुड़ी रही है। विगत दो सौ सालों में ब्रज के अंदर साहित्य और संस्कृति का  ह्रास हुआ है । हिन्दी लेखकों द्वारा ब्रज भाषा को सबसे पहले साहित्य से सचेत रुप से खदेड़ा गया । ब्रज भाषा के आधुनिकीकरण के प्रयासों को किसी ने हाथ नहीं लगाया। आधुनिककाल के पहले ब्रज भाषा को कविता का भाषा के रुप में प्रतिष्ठा और स्वीकृति प्राप्त थी लेकिन आधुनिक काल आने के बाद ब्रज पर हमले बाहर से नहीं अंदर से हुए , दिलचस्प बात यह है कि ये हमले और किसी ने नहीं किए बल्कि साहित्य के नामी लेखकों ने किए, ख़ासकर खड़ी बोली हिन्दी को साहित्य में प्रतिष्ठित करने के लिए यह काम किया गया और इस क्रम में हिन्दीभाषी क्षेत्र की सभी भाषाएँ पिछड़ गयीं और उनको मुख्यधारा के साहित्य से अलग कर दिया गया । यह काम किया गया खड़ी बोली हिन्दी को जातीय भाषा के रुप में प्रतिष्ठित करने के बहाने, लेकिन हिन्दीभाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों के प्रति समान व्यवहार नहीं किया गया। इससे भाषा संहार की प्रक्रिया ने जन्म लिया। यह भाषा संहार उर्दू से लेकर ब्रज तक, अवधी से लेकर भोजपुरी तक फैला हुआ है। 
हमारे साहित्यकार और आलोचक भाषा के क्षेत्र में चल रहे इस भाषा संहार के प्रति सचेत होना तो दूर अपितु इस संहार का उपकरण बन गए। कहा गया कि ब्रज को कविता के पद से जब तक हटाया नहीं जाता तब तक खड़ी बोली हिन्दी की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती । हमने हिन्दीभाषी क्षेत्र की जनता के लिए एक ही भाषा को आधार के रुप में चुना और इसी खड़ी बोली हिन्दी को जनसंपर्क भाषा और राष्ट्रीय भाषा बनाने पर इस क़दर ज़ोर दिया कि ब्रज, अवधी आदि भाषाएँ पिछड़ गयीं। भाषाओं और बोलियों में समानता और भाईचारा पैदा करने की बजाय हमने भाषायी प्रतिस्पर्धा और भाषा संहार को किसी न किसी रुप में महिमामंडित किया, हिन्दी भाषी क्षेत्र की आम जनता को आधुनिकीकरण का जो मॉडल पेश किया वह  भाषायी संहार पर आधारित था।
      हिन्दी भाषी क्षेत्र में जो मध्यवर्ग बना वह अपनी बोली और भाषा के साहित्य से शून्य था , इस मध्यवर्ग ने जब एकबार अपनी भाषा को त्यागा तो फिर उसने खड़ी बोली हिन्दी को अपनाने की बजाय अंग्रेज़ी को अपनी पहचान और प्रतिष्ठा का अंग बना लिया। यह मजेदार फिनोमिना है कि खड़ी बोली हिन्दी के जिन लेखकों ने खड़ी बोली हिन्दी को अपनाने पर ज़ोर दिया वे लेखक कम से कम हिन्दीभाषी क्षेत्र के नागरिकों को खड़ी बोली हिन्दी के प्रति आकर्षित करने में असमर्थ रहे । 
               आज़ादी के बाद ख़ासतौर पर ब्रजभाषा , साहित्य और ब्रज संस्कृति का तेज़ी से ब्रज के मध्यवर्ग से अलगाव बढा है। ब्रज में आज भी मध्यवर्ग का एक तबक़ा ब्रजभाषा बोलता है लेकिन लिखता -पढ़ता नहीं है। उसके लिखने - पढ़ने की भाषा अंग्रेज़ी बनती चली गयी। इसके अलावा ब्रज क्षेत्र में सक्रिय शिक्षा संस्थानों में साहित्य और भाषा का अकादमिक स्तर आरंभ से ही बहुत ख़राब रहा है इसने ब्रज और खड़ी बोली हिन्दी के माहौल को  क्षतिग्रस्त किया । इस क्षेत्र में जो विश्वविद्यालय हैं वे ब्रज के प्रति कोई लगाव नहीं रखते । वरना इन  विश्वविद्यालयों में ब्रजभाषा और साहित्य के उन्नयन और शिक्षण का काम गंभीरता के साथ किया जाता। 
          कोई भी भाषा तब तक आत्मनिर्भर नहीं बनती जब तक उसके शिक्षण के काम को न किया जाय । हमने मान लिया कि ब्रज भाषा को पढाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है। ब्रजभाषा के विगत दो सौ सालों में कितने शब्द मर गए हम नहीं जानते , हमने फ़ील्ड सर्वे करके ब्रजभाषा के विभिन्न जिलों में उतार -चढ़ाव का कोई हिसाब नहीं रखा । हम नहीं जानते कि ब्रज का  प्रत्येक जिले के शहर और गाँव में भाषायी नक़्शा किस तरह बदला है। 
                  दिलचस्प बात यह भी है राज्य सरकार  और नवोदित मध्यवर्ग और नव-धनाढ्यवर्ग ने भी ब्रजभाषा के अंदर मौजूद वैविध्य और अंतरों को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की।  हममें से अधिकतर ब्रजभाषा के शब्दों के खो जाने का दर्द नहीं जानते । शब्द के खो जाने या नष्ट होने का अर्थ है ब्रज संस्कृति का क्षय । त्रासद पक्ष यह है कि परिवारीजन मरता है तो हम रोते हैं, शोक मनाते हैं लेकिन जब शब्द मरते हैं तो नोटिस तक नहीं लेते ! आखिरकार भाषा के प्रति हम इतने बेगाने क्यों हो गए हैं? ब्रजभाषा यहाँ के जीवन में रची- बसी है लेकिन इसके साथ घटित दुर्व्यवहार की हमने कभी ठंडे मन से समीक्षा नहीं की।  राज्य में सरकारें आई और गईं लेकिन भाषाओं के साथ हमने आंतरिक रिश्ता तोड़ दिया । स्थानीय भाषाओं और संस्कृति के साहित्य को हमने उत्सव, इनाम और इवेंट मात्र बना दिया। 
       ब्रज का मतलब मंदिर नहीं है, ब्रज का मतलब गऊ या गोवर्धन पर्वत या राधा-कृष्ण का मंदिर नहीं है। संस्कृति को साहित्य और लोकगीतों ने रचा है, पर्वतों और गऊ ने नहीं रचा है। आज हम गऊ, पर्वत या मंदिर के पुराने युग में नहीं लौट सकते। यह ब्रज- संस्कृति का प्रतिगामी नजरिया है।  ब्रज के साहित्यकारों ने साहित्य को रजवाड़ों और सामंती संस्कृति से मुक्ति दिलाने का काम किया। मध्यकालीन साहित्यकारों ने गऊ, गोवर्धन या भगवान पर कम से कम ध्यान दिया। लेकिन परंपरावादियों ने ब्रज संस्कृति को गाली,गऊ,भगवान और धार्मिकता में संकुचित कर दिया । 
   भगवान और भक्ति ब्रज संस्कृति के कम्युनिकेशन उपकरण हैं, इनको धार्मिकता नहीं समझना चाहिए । यह दुखद है कि ब्रज संस्कृति का आधार ब्रजभाषा का साहित्य था लेकिन हमने साहित्य को धार्मिकता के जरिए अपदस्थ कर दिया, क़ायदे से आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के दौरान साहित्य की प्रक्रियाओं को आधुनिक और सघन बनाया जाता लेकिन हमने उस ओर ध्यान ही नहीं दिया । इस क्रम में ब्रज के लोककला रुपों का सफ़ाया हुआ । 
       
                      हम क्या करें -
(१) भाषिक संरचनाओं और उनमें आ रहे परिवर्तनों का ज़मीनीस्तर पर डाटा एकत्रित किया जाय  । ब्रजभाषा का ज़मीनी स्तर फील्डवर्क करके शब्दकोश बनाया जाय। 
(२)  ब्रजभाषा के उत्थान और प्रचार के लिए यूपी में विभिन्न विश्वविद्यालयों में ब्रजभाषा और अन्य भाषाओं और बोलियों के अध्ययन की व्यापक अकादमिक व्यवस्था की जाय । स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ब्रजभाषा के स्वतंत्र अध्ययन पर ख़ासतौर पर ज़ोर दिया जाय। 
(३) ब्रज के कला रुपों ख़ासकर प्रिफॉर्मिग आर्ट से संबंधित कला रुपों, रासलीला, स्वाँग, नौटंकी, भगतआदि के संरक्षण और विकास के बारे में महत्वाकांक्षी योजना बनाने के लिए पेशेवर लोगों का वर्किंग ग्रुप बनाकर योजना तैयार की जाय। 
(४) ब्रज संस्कृति अकादमी का राज्य सरकार गठन करे , इसके जरिए ब्रज कला रुपों के संरक्षण के विकास की महत्वाकांक्षी योजना बनायी जाय, यह गंभीर क़िस्म की अकादमी हो और सारी दुनिया के लोग इसमें आने के लिए तरसें। 
            

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

"आप" की जीत का सच



   दिल्ली विधानसभा चुनाव हो गए, चौदह फ़रवरी 2015 को नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण करेंगे । वे रोड शो करते हुए सभा स्थल तक जाएँगे। यह नए क़िस्म का शक्ति प्रदर्शन और मीडिया इवेंट है । यह असल में मोदी के जलसेबाज फिनोमिना का जलसेबाजी से खोजा जा रहा विकल्प है । यह दुनिया के सामने लोकतंत्र को मजमे में तब्दील करने का शो भी है। अन्ना हज़ारे के सुझाव को केजरीवाल ने मान लिया होता तो बेहतर होता।   यह लोकतंत्र के नायक की पहली चूक गिनी जाएगी। सादगी से शपथग्रहण समारोह करने से केजरीवाल का क़द छोटा नहीं होता , जलसेबाजी से क़द बड़ा भी नहीं होता ! केजरीवाल का जलसा प्रेम अंततः मोदी के छंद में बँधने की शुरुआत है । मोदी को बेनक़ाब करने के लिए मोदी का छंद चुनाव तक प्रासंगिक है , सत्तारुढ़ होने के बाद जलसेबाजी करना लोकतंत्र और नेता की ताक़त कम और कमज़ोरी ज्यादा दिखाता है। बेहतर होता शपथग्रहण की जलसेबाजी न होती ! 
         केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को दिल्ली में अभूतपूर्व विजय हासिल हुई है । यह जीत क्यों और कैसे मिली ? किन शक्तियों की इस जीत में भूमिका थी ? कारपोरेट घरानों की प्रतिस्पर्धा की क्या भूमिका थी ? संघ और कांग्रेस की क्या भूमिका थी ? देश की भावी राजनीति का स्वरुप क्या होगा ? इत्यादि सवालों पर आने वाले समय में विस्तार से सूचनाएँ और विश्लेषण आएँगे । लेकिन एक बात तय है कि यह जीत अभूतपूर्व है। 
         ' आप' की जीत के बारे में जनमत सर्वेक्षण दूसरी बार एकसिरे से ग़लत साबित हुए हैं , इससे जनमत सर्वेक्षण की वैज्ञानिकता के सभी दावों पर सवालिया निशान लगा है । जनमत सर्वेक्षण लगातार दो बार ग़लत साबित होना, यहाँ तक तक कि 'आप' का सर्वे भी ग़लत साबित होना दर्शाता है कि आम जनता अॉंकड़ा नहीं है। आम जनता की राय को मीडिया इच्छित दिशा में नहीं मोड़ सकता ! मीडिया प्रचार की सीमाएँ हैं , लेकिन ज़मीनी प्रचार की कोई सीमा नहीं है,वह आज भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली है। 
       दूसरा संदेश यह निकलता है कि धर्मनिरपेक्ष संगठन के निकास के आम जनता में व्यापक आसार हैं । धर्मनिरपेक्ष राजनीति को किसी भी तरह हाशिए पर रखकर लोकतंत्र का अपहरण नहीं किया जा सकता।  ' आप' किस वर्ग के विचारों का दल है इसके बारे में वे भी नहीं छिपाते। लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है कि ' आप' धर्मनिरपेक्ष - लोकतांत्रिक  दल है और उसके पास लोकतंत्र का वैकल्पिक नजरिया है और संविधान में वर्णित मूल्यों के प्रति उसकी गहरी आस्थाएँ हैं। यही चीज उसे अन्य बुर्जुआदलों ( कांग्रेस-भाजपा-सपा-बसपा आदि) से भिन्न बनाती है । 
                       भारत में स्वस्थ बुर्जुआ राजनीति के लिए पर्याप्त स्थान है और यही चीज " आप" की प्रासंगिकता के साथ बुर्जुआ राजनीति की प्रासंगिकता को भी पुष्ट करती है । 
           केजरीवाल की 2015 की दिल्ली जीत का प्रधान कारण है दैनंदिन जन समस्याओं का समाधान न कर पाने में केन्द्र सरकार की असफलता । केन्द्र सरकार ने यदि जन समस्याओं के समाधान का प्रयास किया होता तो भाजपा को इतनी बुरी हार का सामना न करना पड़ता। कहने को दिल्ली राजधानी है लेकिन अराजक और जनविरोधी विकास के कांग्रेसी मॉडल का आदर्श नमूना है। मोदी सरकार ने विगत आठ महिनों में इस मॉडल में कोई बदलाव नहीं किया। बिजली के बिल, बिजली की सप्लाई , पानी की सप्लाई और क़ानून और व्यवस्था , प्रदूषण आदि समस्याओं के साथ झुग्गी- झोंपड़ियों के अबाधित प्रसार और नागरिक सुविधाविहीन संसार ने आम जनता को भयानक क्रोध से भर दिया है ।
   " आप" ने आमजनता को उपरोक्त सवालों पर परंपरागत कम्युनिकेशन के आधार पर संगठित किया । जन समर्थन जुटाने के परंपरागत तरीक़ों के जरिए ताक़तवर संगठन का निर्माण किया ।साथ ही आम जनता को मतदान पेटियों तक पहुँचाया। इस प्रक्रिया में "आप" का जनाधार क्रमश: बढा और उसका प्रचार भी सबसे ज्यादा प्रभावशाली रहा। 
         यह कहना ग़लत है कि संघ की फूट का या कांग्रेस के मतों की "आप" की जीत में कोई निर्णायक भूमिका है। कांग्रेस और संघ ने यथाशक्ति संघर्ष किया लेकिन आम जनता के व्यापकतम तबक़ों को अपने साथ जोड़ने में ये दोनों ही दल असफल रहे हैं। जो दल चुनाव लड़ते हैं वे हारने के लिए नहीं लड़ते । संघ-भाजपा - कांग्रेस ने चुनाव ताक़त के साथ लड़ा अत: उनके वोट "आप" को नहीं मिले । 
    भाजपा को एक साल पहले विधानसभा चुनाव में जितने मत मिले थे तक़रीबन उतने ही वोट उसे इसबार भी मिले हैं। यह बात दीगर है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे कम वोट मिले हैं। लेकिन लोकसभा चुनावों के वोटों के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। 
       केजरीवाल की जीत में "आप" की मीडिया और प्रौपेगैण्डा रणनीति बेहद आकर्षक और प्रभावशाली रही है। उसके सभी शीर्ष नेताओं का सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं और रोड शो तक सक्रिय रहना, टीवी से लेकर नुक्कड़ सभाओं तक बोलना बेहद प्रभावशाली रहा है। इस समूची प्रक्रिया में " आप" ने लोकतंत्र का राजनीतिक चरित्र निखारा है और राजनीति के प्रति आम लोगों की आस्था को पुख़्ता बनाया है। 
                  भाजपा आरंभ से मोदी और टीवी उन्माद पर केन्द्रित रही और ये दोनों ही पहलू ज़मीनीस्तर पर आम जनता को प्रभावित करने में असमर्थ रहे। आश्चर्यजनक बात यह रही कि विकास की बातें करने वाले मोदी ने निजी हमले किए, निम्नस्तरीय राजनीतिक जुमलेबाजी और नारेबाज़ी की भाषा का प्रचार में इस्तेमाल किया। वे एक भी सकारात्मक बात आम जनता के सामने नहीं रख पाए । किरनबेदी को भाजपा ने आख़िरी समय में केजरीवाल के दबाव में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रुप में पेश किया । 
    असल में  किरनबेदी की टीवी इमेज से प्रभावित होकर ही मोदी ने उनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया। सच यह है कि किरन बेदी की टीवी इमेज का संबंध अन्ना के आंदोलन से था , उस इमेज का भाजपा की राजनीति से कोई संबंध नहीं था । अत: भाजपा की राजनीति में किरनबेदी की इमेज एकदम मिसफ़िट लग रही थी और इसने भाजपा की समूची व्यूह रचना को पंगु बनाकर रख दिया । भाजपा की सबसे बड़ी असफलता यह रही कि उसके पास कोई भाजपाई इमेज मैदान में पेश करने लायक नहीं थी। वैसी स्थिति में भाजपा को कम से कम इमेज संकट का सामना नहीं करना पड़ता । लेकिन परिणाम में कोई गुणात्मक अंतर नहीं पड़ता । इमेज की प्रचार में भूमिका होती है, वोट लाने में संगठन की भूमिका होती है। दिल्ली में भाजपा का संगठन लोकसभा विजय के बाद सत्तादास होकर रह गया । 
      कांग्रेस की स्थिति यह है कि वह लोकसभा और दिल्ली विधानसभा की चुनावी हार से अभी तक बाहर नहीं निकल पायी है। यही वो अनुकूल परिवेश था जिसमें केजरीवाल के नेतृत्व में "आप" को 67 सीटों पर जीत मिली और तीन सीटों पर भाजपा विजयी रही।  
            
                

दिल्ली विश्व पुस्तकमेला के शिरकत विरोधी आयाम



विश्व पुस्तक मेला (१४ -२२फरवरी २०१५) पर लेखकों -पाठकों की निगाहें टिकी हैं ! कुछ के लिए यह इवेंट है !कुछ के लिए लोकार्पण उत्सव है!कुछ के लिए प्रकाशन का अवसर है !   विश्व पुस्तक मेला स्वभावत: शिरकत विरोधी है। यह प्रकाशकों , पाठकों और लेखकों की शिरकत सीमित करता है।  यह मान लिया गया है कि यह भी एक इवेंट है और उसी रुप में आयोजित कर दो ! लेखक संगठनों का विश्व पुस्तक मेला की समस्याओं की ओर कभी  ध्यान ही नहीं गया और लेखकों ने निजी तौर पर भी पहल करके कुछ भी लिखने की ज़रुरत महसूस नहीं । यहाँ तक कि हिन्दी के लोकार्पण नरेशों ( नामवर सिंह आदि) का भी ध्यान नहीं गया। 
        विश्व पुस्तक मेला का ढाँचा इस तरह का है जिसमें प्रकाशकों को शिरकत का मौक़ा कम मिलता है। इसमें शिरकत करने वाले प्रकाशकों को खर्च ज्यादा करना पड़ता है और मेला मात्र ७ दिन चलता है जिसके कारण इसमें जो लागत खर्च होती है वह भी छोटे दुकानदार झेल नहीं पाते। क़ायदे से मेले में स्टाल लगाने का ख़र्चा न्यूनतम रखा जाय और मेला दो सप्ताह चले।
     मसलन् कोलकाता पुस्तक मेला तुलनात्मक तौर पर कम खर्चीला पड़ता है और मेला १५ दिन तक चलता है।इसके अलावा  कोलकाता पुस्तक मेला में कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता। इसके विपरीत विश्व पुस्तक मेला में प्रवेश शुल्क लिया जाता है। क़ायदे से स्टाल का शुल्क तुरंत कम किया जाय जिससे ज्यादा प्रकाशक पुस्तक मेला में शामिल कर सकें ,मेले की अवधि एक सप्ताह से बढ़ाकर दो सप्ताह की जाय और प्रवेश शुल्क ख़त्म किया जाय । इससे पुस्तक मेले मे पुस्तक प्रेमियों की शिरकत बढ़ाने में मदद मिलेगी।
      इसके अलावा भारत की विभिन्न भाषा की पत्रिकाओं के स्टॉल और लेखक- सांस्कृतिक संगठनों के स्टॉल लगाने के लिए विशेष रुप से प्रोत्साहन दिया जाय ।इनको मुफ़्त में स्थान मुहैय्या  कराया जाय।इससे लेखकों - संपादकों को साहित्यिक पत्रिकाओं को आम जनता में प्रचारित प्रसारित करने का मौक़ा मिलेगा। चूँकि प्रधानमंत्री सारे देश में पुस्तकालय अभियान चलाने का फ़ैसला कर चुके हैं अत: देश के विभिन्न बडे पुस्तकालयों के प्रदर्शनी स्टॉल लगाए जाएँ। 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

मोदी का सपनों का पुल

         नेता वही अपील करता है जो सपनों का पुल बनाए। सपनों के पुल पर सरपट दौड़े। इसबार नेता के सपनों में झोंपड़ी को जगह मिली है। जबसे झोंपड़ी को जगह मिली है, झोंपड़ीवालों को नींद नहीं आ रही। वे पक्केघर के सपने से बेचैन हैं ! डरे हैं! वे हजम नहीं कर पा रहे हैं कि उन्होंने ऐसा कौन सा पुण्यकार्य किया है जो झोंपड़ी को सभी नेता पक्के मकान में तब्दील करने में लगे हैं ! रामलाल कल कड़कड़दूमा से मोदीजी की मीटिंग से लौटा तो सारी रात सो नहीं पाया ! वह डरा हुआ था । उसे इस सपने से ही दहशत हो रही थी कि उसे घर बैठे पक्का घर मिल जाएगा! वह परेशान था कि कोई भी नेता उसकी पगार बढ़ाने की बात क्यों नहीं कर रहा ? महंगाई कम करने की बात क्यों नहीं कर रहा ? झोंपड़ी में रहनेवाले विगत दो महिने से बहुत परेशान हैं। वे सपनों के कारण सो नहीं पा रहे हैं ! 

दिल्ली के झोंपड़ीवालों ने इतने सपने पहले कभी नहीं देखे। वे पहले गुण्डों के सपने देखते थे,पुलिसवाले के सपने देखते थे, कभी –कभी फिल्मी सपने देखते थे।लेकिन घर का सपना कभी नहीं देखते थे। मजेदार बात यह है कि गुण्डे-पुलिस के सपने से उनको मुक्ति आज तक नहीं मिली । वे अपनी मजूरी के बढ़ने का सपना देखते थे लेकिन आजतक बढ़ी नहीं है,जितना कमाते हैं सब खर्च हो जाता है। वे सोच नहीं पा रहे हैं कि कमरतोड़ मेहनत करने बावजूद वे एक भी पैसा बचा क्यों नहीं पाते ? वे सोच रहे हैं कोई नेता उनको पैसे की बचत का सपना क्यों नहीं दिखाता ?

कल नरेन्द्र मोदी जब कडकडडूमा में बोल रहे थे तो सपनों का पुल बना रहे थे, सवाल यह है वे सपनों का पुल क्यों बना रहे थे ? वे तो 9 महिने से दिल्ली के प्रशासन को देख रहे हैं, वे तो बिना विधानसभा चुनाव जीते ही दिल्ली के लिए सब कुछ कर सकते हैं, उनके पास सारे अधिकार हैं,उनको किसने रोका सपनों को साकार करने से ? वे दिल्ली के ज्ञात-अज्ञात को जानते हैं वे अब दिल्ली की हर फाइल के मालिक हैं।

मोदी और उनके दल के नेता कहते रहे हैं शीला दीक्षित भ्रष्ट थीं ,सोनिया भ्रष्ट थीं लेकिन उन्होंने अभी तक कोई जांच आयोग क्यों नहीं बिठाया ? हमारे नेतागण दूसरे नेता को हेय दिखाने के लिए जमकर भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का हंगामा करते हैं, लेकिन कभी कार्रवाई नहीं करते,स्थिति यह है कि किरन बेदी कल तक भाजपा को भ्रष्ट दल मानती थीं आज उसी दल का अंग हैं। कहने का अर्थ है दिल्ली में भ्रष्टाचार पहले की तुलना में और भी पुख्ता हुआ है। सपनों के पुल पर भ्रष्टाचार सवार होकर आएगा तो यही होगा !

सपने की खूबी है कि वह हर चीज को अपने रंग में रंग लेता है। ठोस को भी वायवीय बना देता है। उसकी अज्ञात सोपानों की अबाधित यात्रा में रुचि होती है। सपनों के रंग मनुष्य को हमेशा अपील करते हैं। दिल्ली में भी सपना जगा है कि अब दिल्ली में झोंपड़ी नहीं रहेंगी, उसकी जगह पक्के घर होंगे ! दिल्ली में झोपड़ी गायब हो जाएगी यह सोचकर मन खुश है। एक सवाल उठता है कि क्या गुजरात में झोंपड़ी वाले नहीं हैं ? क्या सभी झोंपड़ीवालों को मोदीजी ने अपने शासन में पक्के मकान दिए ? जी नहीं, मोदी जब गुजरात में अपार बहुमत देने के बावजूद झोंपडीवालों के लिए पक्के मकान नहीं बना पाए तो दिल्ली में तो वे एकदम नहीं बनाएंगे ।



मोदी का नसीब और अभागा लोकतंत्र

               
       नसीब का तर्कशास्त्र परजीवियों को भाता है। लोकतंत्र नसीब तंत्र नहीं है। लोकतंत्र में भाग्य को श्रेय देना जनता का अपमान करना है। जनता से किए गए वायदों से मुँह मोड़ना है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कल जब दिल्ली में एक आमसभा में बोल रहे थे तो अपने नसीब यानी भाग्य को श्रेय दे रहे थे। लोकतंत्र को भाग्यतंत्र कहना सही नहीं है। राजसत्ता यदि भाग्य का ही खेल होता,कुंडली के ग्रहों का ही खेल होता तो राजाओं का पराभव कभी नहीं होता। राजतंत्र की विदाई नहीं होती।

मोदी वोट की राजनीति में भाग्य का सिक्का उछालकर असल में आम जनता की पिछड़ीचेतना का दोहन करना चाहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि आम जनता अब भाग्य के भरोसे रहे !उनकी सरकार अब वायदे पूरे करने नहीं जा रही !

लोकतंत्र में भाग्य की हिमायत के कई आयाम हैं जिन पर गौर करने की जरुरत है। लोकतंत्र को भाग्य का खेल मानने का अर्थ है संविधान का अपमान करना। संविधान हमारे नागरिक और शासकों को अंधविश्वास फैलाने की अनुमति नहीं देता।नसीब तो अंधविश्वास का हिस्सा है। मोदी पीएम इसलिए नहीं बने कि उनका भाग्य अच्छा था बल्कि इसलिए बने कि जनता ने उनको वोट दिया। तेल के दाम इसलिए कम नहीं हुए कि मोदी का भाग्य अच्छा है बल्कि विश्व राजनीति के उतार-चढ़ाब के कारण कम हुए। विकसित पूंजीवादी मुल्कों और ओपेक के अंतर्विरोधों के कारण तेल के दाम सारी दुनिया में कम हुए हैं।

दुनिया में कोई भी घटना इसलिए नहीं घटती कि भगवान चाहता है या भाग्य या ग्रह चाहते हैं ,बल्कि हर घटना का अपना कार्य-कारण संबंघ होता है,प्रक्रिया होती है।नसीब की इसमें कोई भूमिका नहीं होती। मोदी के पीएम बनने में नसीब की कोई भूमिका नहीं है। आम जनता के वोट ,कारपोरेट लॉबी की मदद,आक्रामक मीडिया रणनीति और वायदों के अम्बार ने उनको प्रघानमंत्री बनाया है। मोदी यदि अपने वायदों को पूरा नहीं करेंगे तो आम जनता उनके खिलाफ जा सकती है।

लोकतंत्र यदि भाग्य का खेल होता तो मोदी ने इतने बड़े पैमाने पर मीडियाप्रचार क्यों किया ? अरबों रुपये खर्च करके प्रौपेगैण्डा क्यों किया ? नसीब ही महान होता तो वे किरनबेदी के लिए वोट मांगने क्यों निकले हैं ? क्यों उनके 200सांसद और 22केन्द्रीय मंत्री और वे स्वयं दिल्ली की जनता के घर -घर जाकर वोट मांग रहे हैं ? इससे पता चलता है कि लोकतंत्र भाग्यतंत्र नहीं है, ग्रहतंत्र नहीं है। ग्रहतंत्र होता तो फिर प्रचार की जरुरत ही न होती, ईश्वर या संतों के आशीर्वाद से ही लोकतंत्र में जीत मिल जाती तो राजनीतिक वायदे न करने पड़ते,प्रचार न करना पड़ता,महाभाग्यवान संत हारते नहीं ,रामराज्य पार्टी का तो चारों ओर जय-जयकार होता, क्योंकि करपात्रीजी महाराज जैसे संत उसके नेता थे।

लोकतंत्र में हुई हार-जीत का नसीब और बदनसीब के वर्गीकरण से कोई लेना-देना नहीं है। लोकतंत्र तो राजनीति है ,इसके राजनीतिक तर्क और प्रक्रियाएं है। लोकतंत्र में नसीब,भगवान,संत-महंत आदि की राजनीति अंततः परजीवीपन को बढ़ावा देगी। इससे मोदी के 'मेक इन इंडिया' के नारे का अंतर्विरोध है। इस नारे को या आम नागरिक को अपने जीवन में सफलता हासिल करनी है तो यह काम नसीब के भरोसे नहीं कर्म के आधार पर ही हो सकता है। नसीब पर जोर देने का अर्थ है कर्म का निषेध करना। कर्म का निषेध करके मोदी भारत के युवाओं में अंधविश्वास फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

लोकतंत्र में नसीब-बदनसीब की बातें करने का अर्थ है गरीबों और स्त्रियों का अपमान करना। बहुरंगी, बहुस्तरीय भेदभाव को अपरिवर्तनीय मानना। मोदी जी जब आप नसीब-बदनसीब के मुहावरे में बोल रहे थे तो सीधे कह रहे थे अमीर इसलिए अमीर है क्यों कि वह नसीब में लिखाकर लाया है, गरीब इसलिए गरीब है क्योंकि नसीब में लिखाकर लाया है। यानी अमीर हमेशा अमीर रहेंगे क्योंकि पूर्वजन्म में पुण्य करके आए हैं, गरीब हमेशा गरीब रहेंगे क्योंकि पूर्वजन्म में पाप करके आए हैं। इसका अर्थ यह भी है कि अमीर-गरीब की स्थिति को बदला नहीं जा सकता है, जो जैसा है वैसा ही रहेगा,क्योंकि यह तो नसीब में लिखा है!

नसीब –बदनसीब का समूचा तर्कशास्त्र स्वभावतः लोकतंत्र विरोधी और अविवेकवादी है। इसमें सामाजिक जिम्मेदारी से भागने की भावना निहित है।

मोदीजी आपने नसीब-बदनसीब की बहस को उठाकर अपने राजनीतिक लक्ष्य को साफ कर दिया है,इस अर्थ में आप ईमानदार भी हैं। आप ईमानदार हैं इसलिए मन की बात साफ शब्दों कह देते हैं। नसीब-बदनसीब की अवधारणा में आपने ईमानदारी के साथ कह दिया है कि आप अपना चुनाव घोषणापत्र या जनता से किए गए वायदे लागू करने नहीं जा रहे। मैं आपकी इसी साफगोई का कायल हूं!



शनिवार, 31 जनवरी 2015

लोकतंत्र के कु-संवादी और पाँच सवाल का झुनझुना

        आज (30जनवरी ) गांधी की हत्या की गयी थी।यह हत्या उस विचार ने की जिसके हिमायती इन दिनों दिल्ली में घर –घर जाकर वोट मांग रहे हैं। गांधी से बड़ा कोई संवादी नहीं था,लेकिन संवाद करने की बजाय हत्यारे ने उनकी ह्त्या कर दी। गांधी की हत्या में जिस संगठन के विचारों की भूमिका थी उसे सारा देश जानता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के हत्यारे को नायक बनाकर पेश किया जा रहा है। हत्यारे के पूजकों के खिलाफ मोदी सरकार के किसी भी मंत्री या प्रधानमंत्री ने एक बयान तक जारी नहीं किया। सवाल यह है गांधी के हत्यारे का महिमामंडन करने वालों की संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री ने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? यह क्यों नहीं कहा कि देश में हम कहीं पर भी गोडसे की मूर्ति नहीं लगने देंगे।

दिल्ली में गांधी मारे गए और दिल्ली में ही गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की तैयारियां हो रही हैं। किरनबेदी साफतौर पर जबाव दें कि यदि वे मुख्यमंत्री बनती हैं तो गांधी के हत्यारे का मंदिर बनेगा या नहीं ? मंदिर बनाने वालों की उन्होंने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? क्या इस उत्तर से काम चलेगा कि कानून अपना काम करेगा ! संघ के नेताओं-सांसदों-मंत्रियों और किरनबेदी से दिल्ली की हर गली में गोड़से के मंदिर बनाए जाने पर सवाल किया जाना चाहिए। संघ परिवार दो-टूक ढ़ंग से गोड़से पूजकों की निंदा करने में असफल रहा है,संघ की चुप्पी का अर्थ यह भी हो सकता है कि संघ उनका समर्थन कर रहा हो ? क्या गोड़से समर्थकों को लोकतंत्र की चौखट(दिल्ली सरकार) में प्रवेश करने की अनुमति दी जा सकती है ?

लोकतंत्र संवाद से समृद्ध होता है। नेता-मंत्री-सांसद या पीएम के भाषण से नहीं। नेता के शामिल होने से दलबल समृद्ध होता है,मीडिया समृद्ध होता है। संवाद के लिए लोकतांत्रिक विवेक और लोकतांत्रिक आचरण का होना पहली शर्त्त है। जिस नेता को संवाद करना है उसके पास लोकतांत्रिक विवेक न हो तो संवाद संभव ही नहीं है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जहां से लोकतंत्र में संवाद-विवाद और विचारधारात्मक संघर्षों को देखा जाना चाहिए। संवाद की दूसरी शर्त है सहिष्णुता और जिम्मेदारी। संवाद करने वाला या सवाल करने वाला कितनी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाता है ? अपने विचारों के प्रति वह कितना गंभीर है। कितना हास्यास्पद है कि मोदी सरकार एक तरह कारपोरेट घरानों की मदद लेकर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने में लगी है,लेखकों –कलाकारों को संघी बंदे निशाना बना रहे हैं,ऐसे में भाजपा सवाल पूछने का नाटक कर रही है !

भाजपा और संघ का समूचा आचरण कु-संवादी का है। वे संवाद में विश्वास नहीं करते,संसद में विश्वास नहीं करते, संवाद के नाम पर नॉनसेंस या कु-संवाद करते हैं। यह हास्यास्पद है कि वे सत्ता पाने के बाद सवाल कर रहे हैं ! देश की समस्याओं के समाधान और उन पर संवाद का सिलसिला आरंभ करने की बजाय एक ऐसी पार्टी से सवाल कर रहे हैं जिसका जन्म कुछ साल पहले हुआ है।

सवाल यह है मोदी सरकार-भाजपा ने उन सवालों के समाधान क्यों नहीं खोजे या सुझाए जिनसे दिल्ली की जनता परेशान है? दिल्ली की जनता के प्रति भाजपा और मोदी सरकार जिम्मेदार भाव से पेश आती तो दिल्ली की जनता को एक साल बाद तमाम फजीहत के बाद चुनाव की बजाय तत्काल चुनाव कराके सरकार दी जा सकती थी ! मोदी-भाजपा-संघ जानते थे कि उनके पास सरकार बनाने का बहुमंत नहीं था इसके बावजूद वे एक साल तक जोड़तोड़ में लगे रहे।अंत में झकमारकर उनको चुनाव कराना पड़ा। लोकतंत्र में झकमारकर काम करने वाले नेता या दल को जनविरोधी कहा जाता है। मोदी इस अर्थ में जनविरोधी हैं कि वे दिल्ली की जनता के लिए आठ महिने में कोई कदम नहीं उठा पाए।

भाजपा संभवतः देश का पहला बड़ा दल है जो समग्रता में अविवेकवादी या इरेशनल है। इरेशनल से क्या संवाद संभव है ? भाजपा और मोदी के इरेशनल नजरिए का आदर्श उदाहरण है भाजपा का परमाणु संधि पर यू-टर्न। भाजपा और उसके सभी नेता एकसिरे से संसद के मंच पर परमाणु संधि का विरोध करते रहे और हठात सत्ता में आते ही परमाणु संधि के पक्ष में बयान देने लगे,सबसे बड़ा उपहास तो यह है कि वे उसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं ! संभवतः भारत में इससे बड़ा इरेशनल रुप किसी दल का देश ने नहीं देखा। जिस दल के नेता ने संसद में साफ कहा हो कि वे सत्ता में आएंगे तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेंगे, लेकिन वे तो उसी विचार की गोद में चले गए जिसका वे विरोध कर रहे थे। इस तरह के इरेशनल दल के साथ संवाद कैसे संभव है ? क्या भाजपानेता दिल्ली चुनाव में जो वायदे कर रहे हैं उनको पूरा करेंगे? विगत लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा अभी तक पूरा नहीं किया है। संवाद की मांग है कि संवादी असत्यवादी न हो।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तेजी से साम्प्रदायिक हमले हो रहे हैं,संघ के संगठनों के नेताओं के घटिया-जनविरोधी-असामाजिक बयानों की मीडिया में बाढ़ आई हुई है। प्रशासन को साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति नरम बर्ताब करने,मित्रवत व्यवहार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्थिति उस कदर खराब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा सरेआम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर संघ द्वारा किए जा रहे हमलों के खिलाफ बोलकर गए हैं। वे एक तरह से इन हमलों की निंदा करके गए हैं। लेकिन संघ अपने नजरिए पर अड़ा हुआ है। संघ का इस तरह का रुख देश को विभाजित करने वाला है। देश में और दिल्ली में गिरिजाघरों पर हमले बढ़े हैं लेकिन मोदी सरकार ने इन हमलों की कभी निंदा नहीं की। किरनबेदी ने इन हमलों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। सवाल यह है दिल्ली की जनता क्या ऐसे नेता और दल को वोट देगी जो सरेआम धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की निन्दा तक न करे।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि सीबीआई जैसी संस्था का दंगाईयों को बचाने के लिए खुला दुरुपयोग किया जा रहा है। अमितशाह के मामले में सीबीआई दुरपयोग करती नजर आई है। यह लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है। इस दुरुपयोग के खिलाफ किरनबेदी ने कोई राय व्यक्त नहीं की। जबकि वे सीबीआई को निष्पक्ष बनाने की मांग करती रही हैं लेकिन अवसरवादी नजरिए के चलते ऐसे दल में शामिल हो गयी हैं जिसका नाम सीबीआई के दुरुपयोग में शामिल है।



सच्चाई यह है लोकतंत्र में सु-संवाद आने बंद हो गए हैं। लोकतंत्र के लिए यह कु-संवाद है कितने सांसद या मंत्री प्रचार करने आ रहे हैं, पीएम प्रचार करने आ रहे हैं। सांसदों-मंत्रियों और प्रधानमंत्री की भूमिका सु-संवाद की रही होती तो उनको जनता में आने की जरुरत ही नहीं पड़ती।जनता के पास कान हैं,आँखें हैं और बहुत बड़ा दिल है। जनता जिस उदारता के साथ नेताओं के साथ पेश आती है हमारे नेता उस उदारता के साथ पेश नहीं आते। अंतमें, सवाल पूछने का हक उसको है जो सत्य के पक्ष में खड़ा है। कम से कम भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

किरनबेदी जी ! पुंसवाद का हिमालय है आरएसएस !!

  
    कल भाजपानेत्री-मंत्री और पूर्व जेएनयू छात्रा निर्मला सीतारामन प्रेस को सम्बोधित करके औरतों के सवाल पर अरविंद केजरीवाल को कोस रही थीं तो अजीब और बेतुका लग रहा था। अरविंद केजरीवाल की औरतों के सवालों पर आलोचना आधारहीन है। यह भाजपा के राजनीतिक दिवालिएपन का प्रमाण है। मैं निजी तौर पर निर्मला सीतारामन को छात्र जीवन से जानता हूँ वे भी किरनबेदी की तरह अ-राजनीति की राजनीति किया करती थीं और मुक्तचिंतकों (फ्रीथिंकर संगठन) के दल में थीं,यह बताने की जरुरत नहीं है कि वे क्या नजरिया रखती थीं। उस दौर के सभी जेएनयू मित्र जानते हैं कि उनकी राजनीति में कोई खास रुचि नहीं होती थी। आमतौर पर महिलाओं के सवालों से जुड़े संघर्षों से वे दूर रहती थीं । इस व्यक्तिगत अवगुण के अलावा हम उस समस्या की ओर आएं जिसकी ओर उन्होंने ध्यान खींचा है।

दिल्ली में भाजपा नया दल नहीं है।संघ का सबसे ताकतवर संगठन इस शहर में है ,इसके बावजूद दिल्ली में औरतों के प्रति सामान्य शिष्ट संस्कृति नहीं बची है। संघ के अलावा कांग्रेस का व्यापक जनाधार है। सवाल यह है दिल्ली में औरत के लिए असुरक्षित माहौल बनाने में इन दोनों दलों की कोई भूमिका है या नहीं ? वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से दिल्ली में औरतें सुरक्षित महसूस नहीं करतीं ? दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की ही सरकारें रही हैं, केजरीवाल की तो मात्र49दिन सरकार रही है। आम आदमी पार्टी की उम्र भी बहुत ज्यादा नहीं है। केजरीवाल को राजनीति में आए कुछ साल ही हुए हैं। इसके अलावा यह भी देखें कि दिल्ली की पुलिस व्यवस्था केन्द्र के तहत रही है। दिल्ली में महिला आंदोलन बेहद कमजोर है। लेकिन दिल्ली राजनीति का केन्द्र है।

निर्मला सीतारामन का राजनीतिक अनुभव भी बहुत ज्यादा नहीं है,भाजपा में आने के बाद ही वे राजनीति में सक्रिय हुई हैं, यही हाल किरनबेदी का है, वे चार दशकों से दिल्ली में रह रही हैं,लेकिन राजनीति में आने की उनकी कभी इच्छा नहीं हुई ,वे राजनीति में क्यों नहीं आईं ? भाजपा तो पहले भी थी ,संघ भी था फिर वे राजनीति में शामिल क्यों नहीं हुईं ? आज जब राजनीति में शामिल हुई हैं तो उनको इसका स्पष्टीकरण देना ही चाहिए कि वे राजनीतिक दलों से और खासकर भाजपा से दूर क्यों थीं ? किरनबेदी को भाजपा में शामिल होने में इतना समय क्यों लगा ? किसने रोका था ?

राजनीति में कोई औरत क्यों शामिल होती है यह वही बेहतर ढ़ंग से बता सकती है। लेकिन एक बात सच है किरनबेदी अबोध और अज्ञानी नहीं हैं । वे जब भाजपा में शामिल हुई हैं तो उनके ज़ेहन में साफ लक्ष्य है कि वे मुख्यमंत्री बनने के लिए शामिल हुई हैं, एक साल पहले भाजपा उनको इस पद का प्रस्ताव देती तो वे भाजपा में चली जातीं,खैर,भाजपा को एक साल लगा तय करने में ! भाजपा भी मजेदार दल है वे किरनबेदी की ईमानदार -कर्मठ छवि को इतने लंबे समय के बाद पहचान पाए ! किरनबेदी और भाजपा के मेल-मुलाकात-संबंध बनाने में हुई देरी से एक बात साफ है कि भाजपा किसी पवित्र लक्ष्य के तहत किरनबेदी को चुनाव नहीं लड़ा रही है और किरनबेदी भी किसी पुण्य कार्य के लिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं वे अवसरवादी राजनीति के कारण मिले फायदे का लाभ उठाने के लिए चुनाव लड़ रही हैं। चूँकि मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मिला है इसलिए लड़ रही हैं, औरतों के हितों की रक्षा का सवाल तो कहीं पर भी सामने नहीं है। बुर्जुआदलों में अधिकतर औरतें अवसर के कारण,पद के कारण या पारिवारिक कारणों से शामिल होती हैं। औरतों के हकों के संघर्ष के लिए वे शामिल नहीं होतीं।

औरतों के हितों के लिए संघर्ष करने का न तो किरनबेदी और न निर्मला सीतारामन का कोई इतिहास है।संघ में औरतों के हितों के लिए लड़ने वाली कोई नेत्री नहीं है। इससे भी बड़ा सवाल यह है औरतों के लिए कौन सी राजनीति करनी चाहिए ? क्या औरतों को ग्लैमर या नेतापद की राजनीति करनी चाहिए? औरतों को वह राजनीति करनी चाहिए जिससे पुंसवाद कमजोर हो और स्त्री ताकतवर बने। भाजपा और संघ तो पुंसवाद के हिमालय पर्वत हैं ।किरनबेदी उसकी पुत्री हैं !

स्त्री की चुनौती है पुंसवाद और पुंसवादी राजनीतिक नजरिया। स्त्री तब तक दिल्ली में या देश में असुरक्षित है जब तक वह पुंसवाद से लड़ने को अपना प्रधान लक्ष्य नहीं बनाती । भाजपा या कांग्रेस में शामिल होने से कोई भी औरत ताकतवर और सुरक्षित नहीं बनती। तंदूरकांड से लेकर सोनिया गांधी तक औरत की अवस्था काफी शोचनीय है। इंदिरा गांधी से ज्यादातर ताकतवर कोई महिला नहीं हो सकती। लेकिन वे भी पुंसवाद से जंग को मुख्य़ जंग नहीं बना पायीं। औरतों पर हमले नहीं रोक पायीं। गुजरात में दंगों में हजारों औरतें ही विधवा हुई हैं या यातना की शिकार हुई हैं,1984 के दंगों में भी औरतें ही हमले के केन्द्र में रही हैं। हत्यारे औरतों को ही विधवा बनाकर गए हैं। औरतों के लिए सुरक्षित विकल्प कम से कम भाजपा और कांग्रेस तो नहीं हो सकते। आपातकालीन अनुभव औरतों के लिए नारकीय अनुभव रहा है, उस दौर में संघ ने आपातकाल का समर्थन किया और संघ प्रमुख ने औरतों पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। यहां तक कि देवराला सतीकांड के समय संघ और उसके संगठनों ने खुलेआम सतीप्रथा की हिमायत की। हम नहीं जानते किरनबेदी ने उस समय क्या किया था ? क्या संघ की निंदा की थी ? वे थीं लेकिन संघ के खिलाफ कुछ नहीं बोलीं ! एक जागरुक औरत वह है जो औरतों के हकों के लिए हमेशा सचेत रहे। किरनबेदी-निर्मला सीतारामन आदि पदासीन औरतें पुंसवाद का औजार हैं वैसे ही जैसे संघ के दुर्गावाहिनी टाइप संगठनों में काम करने वाली औरतें पुंसवाद की औजार हैं।पुंसवाद का औजार बनकर औरत बेहद खतरनाक भूमिका अदा करती है वह अधिनायकवाद की हद तक जा सकती है । इंदिरा गांधी इसका साक्षात प्रमाण है। दुनिया में और भी उदाहरण हैं।

औरतों के हकों को वे ही संगठन सुरक्षित रख सकते हैं जो उसके लिए समझौताहीन वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष करते रहे हों। औरतों को इसी तरह के संगठनों में शामिल होकर सक्रिय राजनीति करनी चाहिए। इसी प्रसंग में यह भी ध्यान रहे कि भाजपा आदि दलों के लिए औरतें सिर्फ मतदाता हैं और इससे ज्यादा उनका कोई महत्व नहीं है। हां, इस प्रसंग मे कांग्रेस को यह श्रेय जाता है कि उसने औरतों की रक्षा के तमाम बेहतरीन कानून बनाने में पहल की, औरतों के संगठनों की मांगों पर समय-समय पर सकारात्मक कदम उठाए, हाल ही में निर्भयाकांड के समय भी कांग्रेस ने बलात्कार विरोधी कानून में सही परिवर्तन किया। कांग्रेस को भाजपा की तुलना में स्त्री पक्षधर दल कह सकते हैं, कम से कम औरतों के लिए इसने लिबरल स्पेस,लिबरल शिक्षा और लिबरल माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। औरतों की रक्षा के जितने भी कानून बने हैं वे सब कांग्रेस ने बनाए हैं। कांग्रेस का यह गुण है कि वह जन-आंदोलन,महिला आंदोलन की आवाज को सुनती रही है और उससे उठे सवालों के ईमानदारी के साथ समाधान खोजती रही है। गर्भपात के अधिकार से लेकर, छेड़खानी,दहेजप्रथा विरोधी तमाम कानूनों को कांग्रेस ने महिला आंदोलन के दबाव में बनाया। इसके विपरीत संघ और भाजपा ने हमेशा औरतों के लिबरल स्पेस और माहौल का विरोध किया है औरतों पर हमले किए हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक इसके सैंकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं।

अरविंद केजरीवाल का महत्व यह नहीं है कि उसके पास कोई नई बातें हैं,नया विचार है, नया नजरिया है । केजरीवाल का महत्व इसमें है कि उसने ईमानदारी को मूल्यवान बनाया है। वह निर्विवाद रुप से ईमानदार है। वह ईमानदारी के साथ औरतों की रक्षा में खड़ा है,औरतों के ऊपर जुल्म के खिलाफ खडे होने के कारण ही उसको आलोचनाएं झेलनी पड़ रही हैं । यह भी सच है केजरीवाल के जीतने से दिल्ली से औरतों के पक्ष में सजगता बढ़ेगी,भाजपा जीतती है तो औरतों पर हमले बढ़ेगे। औरतों को बचाना है तो हमें दिल्ली के लिबरल स्पेस को बचाना है। भाजपा खुलकर लिबरल स्पेस खत्म कर रही है। इससे औरत और भी कमजोर बनेगी।

औरतें दिल्ली में जमकर वोट करें ,हर उम्मीदवार से औरतों के सवालों पर सवाल करें और देखें कि वो औरतों के बारे में कितना जानता है। औरतों के सवाल मात्र बलात्कार के सवाल नहीं हैं, विकास और सांस्कृतिक सुरक्षा के सवाल भी हैं जिन पर औरतें ,स्त्री पक्षधरता की मांग कर रही हैं । अफसोस की बात है सभी राजनीतिक दल इस पहलू पर चुप हैं , सबने मिलकर औरतों के सवालों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। कायदे से कांग्रेस,भाजपा और आप तीनों से औरतों के सवालों पर लिखित में आश्वासन देने के लिए दबाव पैदा करने की जरुरत है ।





गुरुवार, 29 जनवरी 2015

लोकतंत्र ,कुर्सी संघ और रसमलाई !



        लोकतंत्र में कुर्सीसंघ का जन्म हुआ है। कुर्सीसंघ का नया नारा है डिलीवरी और डिलीवरी ! कुर्सीसंघ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 11 केन्द्रीय मंत्री, 70 सांसद, प्रधानमंत्री, 1 सुपरकॉप, डेढ़ लाख संघ के तोते मैदान में उतारे हैं। कमाल का सीन बन रहा है ! दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में तोते और  बिल्लियां कभी मैदान में नहीं उतरी थीं। जहाँ देखो तोता जहाँ देखो बिल्ली ! तोते बोलते कम हैं और बिल्लियों का स्वभाव है डिलीवरी ! तोते कह रहे हैं हम न हिन्दू हैं न मुसलमान हैं ! चमार हैं न कुम्हार हैं! हम तो बस तोते हैं! तोते आठ महिने में ख़ूब मोटे हुए हैं! उडते हैं तो सुंदर लगते हैं! बोलते हैं तो ध्यान खींचते हैं! वे कह रहे हैं कलरव ही जीवन है! 
       कुर्सीसंघ के सर्जक ने कहा है लोकतंत्र  के लिए तोते- बिल्लियाँ सबसे उपयुक्त पात्र हैं! लोकतंत्र लाना है तो तोते और बिल्लियों की मानो और मजे में रहो ! कुर्सी संघ का नारा है  डिलीवरी -डिलीवरी - डिलीवरी! टीवी टॉकशो -टॉक शो ! 
     दिल्ली में तोते - बिल्लियाँ और टीवीवाले समझा रहे हैं लोकतंत्र लाना है तो धरना मत दो, आंदोलन मत करो, नारे मत लगाओ,हडताल मत करो,  इंक़लाब की बातें मत करो, संविधान की बातें मत करो, संविधान में जो लिखा है वो रद्दी है !  दूध पियो और अमरूद खाओ!  महँगाई, ग़रीबी,बेकारी , कुपोषण, अज्ञानता, बलात्कार ,लोकतंत्र और संविधान की चेतना ये सब फ़ालतू चीज़ें हैं, असल चीज है टीवी टॉक शो  और रसमलाई !
          तोते कह रहे हैं बड़ी गद्दी परम सत्य! बड़ा तोता परम सत्य!  कुर्सी ही सत्य है !कुर्सी ही शिव है ! कुर्सी ही सुंदर है! कुर्सी ही सडक है! कुर्सी ही जीवन है! कुर्सी ही जलेबी है! कुर्सी ही रसमलाई है! कुर्सी पर बैठना है तो रसमलाई की चेतना पैदा करो! आंदोलन, धरना,माँगें, हडताल, कामगारों के हक, झुग्गी-झोंपड़ी वालों के हक , छात्रों के हक, औरतों के हक , ये सब बेमानी हैं !रसमलाई खाओ संघ के गुन गाओ!लोकतंत्र को समृद्ध बनाओ! बड़े तोते ने कहा लोकतंत्र में कुर्सी हो, तोते हों और बिल्लियाँ हों और रसमलाई हो! रसमलाई  बनानेवाले हों ! रसमलाई खानेवाले हों! लोकतंत्र में रसमलाई का ही तो कमाल है कि टाटा पैदा हुआ, अम्बानी पैदा हुआ, अदानी पैदा हुआ! रसमलाई की ही महिमा है कि ओबामा अमेरिका से दौडा चला आया और कहने लगा रसमलाई दो रसमलाई दो! सारी दुनिया मुग्ध है कुर्सीसंघ के इस कौशल पर कि उसने रसमलाई को राष्ट्रीय माल बना दिया! कल तक रसमलाई दुकान तक ही सीमित थी अब रसमलाई चुनाव मेनीफेस्टो तक फैल गयी है। रसमलाई का यह विस्तृत कैनवास एक ही माँग पैदा कर रहा है रसमलाई - रसमलाई! 




बुधवार, 28 जनवरी 2015

कैमरा और जनतंत्र


       कैमरे ने नेताओं के होश उडाए हुए हैं। कैमरे की खूबी है आप उसके बिना रह भी नहीं सकते,राजनीतिज्ञ की मुश्किल है वे कैमरे में जी नहीं सकते। कैमरे के प्रबंधन के कौशल में जो माहिर हैं उनको राजनीति प्रबंधन सीखने की जरुरत है। हमारे अधिकांश नेता न तो ठीक से कैमरा प्रबंधन जानते हैं और नहीं राजनीति प्रबंधन कला के उस्ताद हैं। वे कैमरे के सामने खड़ा होना भर जानते हैं। नेताओं के लिए कैमरे के तदर्थ है, जबकि राजनीति के वे होलटाइमर का रवैय्या है। राजनीति में वे पेशेवर नहीं हैं। राजनीति में होलटाइमर बहुत खराब होता है। यह राजनीति का निष्क्रिय तत्व है।राजनीति और कैमरा दोनों ही राजनेताओं से पेशेवर और नाटकीय रवैय्ये की मांग करते हैं।

किरनबेदी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे कैमरा और राजनीति दोनों में तदर्थभाव से काम कर रही हैं। पहले वे स्वयंसेवी राजनीति करती थीं,फिलहाल भाजपा की होलटाइमर हैं। राजनीति और कैमरे के लिहाज से ये दोनों रुप निरर्थक हैं। अप्रासंगिक हैं। कैमरा तब अपील करता है जब आप नाटकीय हों और जनता में हों। कैमरा तब अपील नहीं करता जब आप कैमरे के फ्रेम में हों। किरनबेदी की सारी मुश्किलें यहीं पर हैं। वे पहले कैमरे के फ्रेम में थी,फ्रेम से फ्रेम में उनरा रुपान्तरण निष्क्रिय इमेज का रुपान्तरण है। किरनहेदी तब अपील कर रही थीं, जब वे लोकपाल बिल के समय नाटक कर रही थीं। नाटकीयता ने उनको जनप्रिय बनाया,आंदोलन ने नहीं। लालू को देखें और सीखें। लालू नाटकीयता और भाषिकखेल में मास्टर है,इसलिए कैमरे में वह सबसे सुंदर लगता है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह अपील नहीं करते,क्योंकि ये न तो नाटकीय हैं और न ही भाषिकखेल खेलते हैं। इनकी तुलना में मोदी ने नाटकीयता और भाषिकखेल का जमकर इस्तेमाल किया और कैमरे में जगह बना ली।

नरेन्द्र मोदी ने लंबी राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद कैमरे के फ्रेम में अपने को फिट किया।मोदी ने इस अवस्था तक पहुँचने के लिए आरएसएस की सालों होलटाइमरी की,झूठ बोलने की कला सीखी,परिवार छोड़ा,पत्नी के बारे में झूठ कहा,फिर पेशवर राजनीति आरंभ की,बादमें पेशेवर राजनेता की तरह राजनीति और कैमरे के प्रबंधन में दक्षता प्राप्त की। पेशेवर होने की पूर्व शर्त्त है वैचारिक ,नाटकीयता,भाषायी कौशल और प्रतिबद्धता।कैमरे को ये चीजें पसंद हैं। जो प्रतिबद्ध है कैमरा उसके साथ खेलने में मजा लेता है खेल ही खेल में खलनायक को नायक और नायक को खलनायक बनाता है।

कैमरे में नायक-खलनायक का खेल थमता नहीं है,बल्कि यह खेल तब ही थमता है जब नेता को कैमरा ,नायक-खलनायक की अवस्था से निकालकर डिजिटल फोटो कब्रिस्तान में ले जाकर महज एक फोटो में रुपान्तरित कर देता है। इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा कोई नहीं कह सकता। यही वह परिप्रेक्ष्य जिसमें केजरीवाल-किरनबेदी के कैमराखेल को देखें।

दिल्ली विधान चुनाव में विगत एक साल में दो चुनाव हुए हैं, एक हो चुका है ,दूसरा होने जा रहा है। कैमरे की मुश्किल यह है कि पुलिस आइकॉन उसमें मृत होते हैं।निष्प्रभावी होते हैं। किरनबेदी कितनी सख्त अफसर रही हैं इससे कैमरा आश्चर्य या रोमांच पैदा नहीं कर सकता। कैमरे के रोमांच के लिए किरनबेदी के पास कोई नौटंकी या नाटकीयता नहीं है। कैमरे का दिल जीतने के लिए नाटकीयता का होना जरुरी है । कैमरे के सामने नए कौशल, नयी भाव-भंगिमा और नए नारे के साथ जब तक आप नहीं जाएंगे कैमरा अपना खेल आरंभ नहीं करता। असल में तो कैमरे के सामने नेता को ही खेलना होता है, मोदी को नायक से महानायक बनाने में नाटकीयता और भाषिकखेल की बड़ी भूमिका रही है। तकरीबन यही पद्धति केजरीवाल की भी है।

केजरीवाल ने अपने फोटो के साथ पहले जगदीशमुखी का फोटो लगाकर प्रचार किया और इमेज युद्ध में जगदीशमुखी को आउट कर दिया। यह स्टायल उसने किरनबेदी के फोटो पर लागू की है। अब दिल्ली में प्रत्येक ऑटो पर केजरीवाल-किरनबेदी का फोटो एक साथ लगा है। आम जनता देख रही है और संदेश ग्रहण कर रही है। इमेज युद्ध की यह कला बेहद आकर्षक और मारक है। इस कला में केजरीवाल ने पहल करके दो काम किए पहला अपना प्रतिद्वंद्वी तय किया दूसरा अपना और विरोधी का वनलाइनर प्रचार आरंभ किया, राजनीति में वनलाइनर जल्दी कम्युनिकेट करता है। सड़क पर चलते वाहन में वनलाइनर नारा यदि फोटो के साथ हो तो वह किसी भी टीवी कवरेज से ज्यादा मारक होता है।

किरन बेदी की दूसरी बड़ी मुश्किल है कि वह टीवी कैमरा देखते ही अपना मुखारबिंद ठीक नहीं रख पाती है। उसकी अति-सजगता उसका विलोम बनाती है। इसके विपरीत केजरीवाल सामान्य बने रहते हैं,व्यंग्यात्मक बने रहते हैं,नाटकीय बने रहते हैं। यही वजह है केजरीवाल का हर फोटो कुछ नया कहता है। राजनेता की नाटकीयता कैमरे को जीवंत बनाती है।

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

ओबामा -मोदी विज़न का लक्ष्य असुरक्षित भारत




अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत से जा चुके हैं। उनकी तीन दिन की यात्रा कई मायनों में उल्लेखनीय रही। इसमें सबसे उल्लेखनीय है भाजपा का परमाणु शांति संधि पर यू-टर्न। भाजपा जब विपक्ष में थी तो उसने इस संधि का हर स्तर पर वाम के साथ विरोध किया था और कहा था कि भाजपा जब सत्ता में आएगी तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेगी,लेकिन हुआ उल्टा,भाजपा ने भारत की शर्तों को लागू कराने की बजाय संधि के प्रसंग में अमेरिकी बातों को मान लिया । इसका अर्थ है कि परमाणु संधि पर भाजपा को मनाने में मनमोहन सिंह की बजाय ओबामा सफल रहे।

भाजपा को परमाणु संधि पर यदि अपना नीतिगत मंतव्य बदलना ही था तो उसे कम से कम आम जनता के सामने उसके कारणों पर रोशनी डालनी चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि लायबिलटी बिल पर संसद से पारित प्रावधानों में कोई कतर-ब्योंत करने का प्रधानमंत्री को अधिकार नहीं है। सच्चाई यह है भारतीय कंपनियां इस बिल के प्रावधानों को एकसिरे से खारिज करती रही हैं और यही काम भिन्न तरीके मोदी ने किया है। लायबिलटी बिल में कोई संशोधन किए बिना परमाणु समझौते को लागू करना संभव नहीं होगा। तीसरी बात यह कि दुर्धटना की स्थिति में भारतीय कंपनियां या विदेशी कंपनियों की इसमें कोई जिम्मेदारी तय नहीं की गयी है। उनको सभी किस्म की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है जबकि अन्य देशों में ऐसा नहीं है। भोपाल गैस त्रासदी का अनुभव हमारे सामने है,भोपाल के गैस पीड़ित आज तक परेशान और पीड़ित दर-दर भटक रहे हैं। लायबिलटी संबंधी अनुच्छेदों पर 'बिजनेस लाइन '(26जनवरी2015) अखबार में एम.रमेश ने लिखा है ''First is the Section 17 (b), which in effect confers on the plant owner—the Nuclear Power Corporation of India—the right to be indemnified (right to recourse) by the supplier (such as GE, Westinghouse), even if there is no specific provision granting such a right in the commercial agreements between the owner and the supplier. The section uses the words “shall have the right to recourse”.

The right to recourse is a commercial issue, so why make it automatic under law, ask the foreign suppliers. After the Bhopal gas leak experience, where the victims were paid paltry sums as compensation, what else would one expect the Indian legislators to do?

The Second objection has been on Section 46 which says the supplier can be sued under any Indian law, not just under CLND.

However, it has always been clear that neither of these sections could possibly be a deal-breaker. First of all, there is a cap on the liability. If any nuclear accident happens, it is the duty of the owner of the nuclear plant to compensate the victims. In India, the owner can only be the public sector Nuclear Power Corporation of India Ltd.

Now, the Rule 24 of the Civil Liability for Nuclear Damage Rules, 2011, which mandates the owner to restrict the liability of the supplier to the owner’s liability or the value of the contract, whichever less. NPCIL’s liability has been capped at Rs 1,500 crore. Therefore, the maximum liability of a supplier of a nuclear reactor, such as GE or Westinghouse or Rosatom, cannot exceed Rs 1,500 crore, about $ 250 million. A quarter billon dollar is nothing very big. The $40+ billion that BP is having to pay for its Gulf of Mexico OIL spill (11 people died in the accident), puts this in the perspective.

“The cap of Rs. 1,500 crore appears atypically lower in comparison with liability amounts in other countries which can run into billions of dollars for a single accident. Similarly, a cap based on the ‘value of the contract’ risks being lower than even this amount,” notes a study of the nuclear liability law made by the legal think-tank, Vidhi Centre for Legal Policy.

NPCIL further has a right to waive its right to be compensated by incorporating a specific provision to that effect in its contracts, though it is doubtful if it would get away with it if it does.

Second, the supplier is liable only if the defect of the product is traced back to it, which, as any nuclear expert will tell you, is next to impossible.

The Americans have been more worried about the Section 46, than Section 17 (b), because a group of victims could sue the reactor supplier directly under some other legislation, such as law of torts. But then, this right is always there as a principle of natural justice and Section 46 does nothing more than to highlight that right.

Besides, the Russians and the French have shrugged off these issues and are getting down to business. Would the US have sat on legal technicalities and watched all the business slip from its hands?

इसके अलावा दोनों देशों के संयुक्त बयान में जिस तरह की बातों की ओर संकेत किया गया है उससे एक बात साफ है कि भारत अगले पांच सालों में एशिया में अमेरिकी राह आसान बनाने का काम करेगा और अमेरिकी हितों के विस्तार के लिए काम करेगा। इसका पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंध सामान्य बनाने की प्रक्रियाओं पर सीधे असर पड़ेगा। मोदी सरकार के आने के बाद से पाकिस्तान से हमारे संबंध खराब हो चुके हैं। सार्क के मंच को मोदी अपने अहंकार और कूटनीतिक अज्ञान से अधमरा बना चुके हैं। यदि इस दस्तावेज का विज़न एशिया में दुर्भाग्य से मोदी ने लागू करने की कोशिश की तो भारत सीधे अमेरिकी नियंत्रण में काम करेगा।इससे एशिया और पड़ोसी मुल्कों के साथ तनाव बढ़ने के साथ सैन्य प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। चीन के साथ हमारे संबंध खराब होंगे। इस दस्तावेज के अनुसार एशिया में आतंकवाद की नई लहर आने की संभावनाएं भी बनती हैं। क्योंकि अमेरिका चाहता है कि एशिया में उसकी दादागिरी चले। अमेरिकी दादागिरी का अर्थ है पृथकतावादी,फंटामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठनों की आंधी। पहले से ही अमेरिका तालिबान को खुला संरक्षण दे रहा है और अफगानिस्तान में तालिबान को सरकार में शामिल करने के लिए दबाव डाल रहा है। तालिबान, अलकायदा,हक्कानी,दाऊद इब्राहीम आदि के अलावा अनेक संगठन हैं जिनकी अमेरिकी एजेंसियां खुलेआम मदद करती रही हैं। इसके अलावा पाकिस्तान को सैन्य साजो-सामान की सप्लाई को वह बरकरार रखे हुए है और विभिन्न किस्म के आतंकी संगठनों को पाक संस्था आईएसआई प्रशिक्षित करती रही है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप में अस्थिरता बनी हुई है। यह सब अमेरिकी नीति के तहत हो रहा है। कायदे से अमेरिका संचालित आतंकवाद विरोधी मुहिम से दूर रहने की जरुरत है लेकिन मोदी सरकार तो एशिया में उसी मुहिम का हिस्सा बनने जा रही है । इसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए।अमेरिका की आतंकवादविरोधी मुहिम राष्ट्रीय अस्थिरता और जातीय संघर्षों को जन्म देने वाली रही है। अफगानिस्तान,पाकिस्तान,इराक, सीरिया, लीबिया आदि के अनुभव यही बताते हैं। मोदी सरकार ने अमेरिकी रणनीतिक साझेदारी में शामिल होकर भारत की संप्रभुता के साथ समझौता किया है। कायदे से विपक्ष को संसद के आगामी अधिवेशन में इन सभी मसलों को लेकर मोदी सरकार ने खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए।