सोमवार, 27 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस , साम्प्रदायिकता और संघी मासूमियत

       इन दिनों वाम राजनीति हाशिए पर है और संघी राजनीति सत्ता,समाज और मीडिया के केन्द्र में है। खासकर मोदी सरकार बनने के बाद से सारा परिदृश्य बदल गया है। अचानक स्वाधीनता सेनानियों को हड़प लेने की कोशिशें हो रही हैं,  मासूम तर्क दिए जा रहे हैं। संघी लोग जानते हैं कि मासूम तर्कों से इतिहास नहीं रचा जाता। मासूम तर्क यह है कि स्वाधीनता सेनानी सबके हैं, इसलिए वे हमारे भी हैं, उनको दलीय राजनीति में बांधकर या किसी विचारधारा विशेष के परिप्रेक्ष्य में मत देखो, खासकर स्वाधीनता सेनानियों पर जब भी बातें करो, फूलमालाएं चढ़ा कर प्रणाम करो, विचार-विनिमय मत करो, आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल मत करो।
   संघ की रणनीति है स्वाधीनता सेनानियों के विचार,राजनीति,संघर्ष आदि में निहित विचारधारा की चर्चा मत करो, उन्हीं पहलुओं की चर्चा करो जो हिन्दुत्व के फ्रेमवर्क में फिट बैठते हैं। इस तरह के तर्कशास्त्र के जरिए संघ और उसके संगठन संगठित ढ़ंग से स्वाधीनता संग्राम की विरासत को विकृत कर रहे हैं। उसे युवाओं में गलत ढ़ंग से पेश कर रहे हैं, साथ ही यह भी संदेश दे रहे हैं कि स्वाधीनता आंदोलन की परंपरा राष्ट्रवाद की परंपरा है, धर्मनिरपेक्षतारहित हिन्दुत्व की परंपरा है। उनके लिए स्वाधीता सेनानी का बलिदान तो स्वीकार्य है लेकिन बलिदान के साथ जुड़ा विचार स्वीकार्य नहीं,संघ को स्वाधीनता सेनानी की वोट के लिए और अपने कलंकों को छिपाने के लिए इमेज चाहिए,फोटो चाहिए। संघ के लिए स्वाधीनता सेनानी महज फोटोग्राफ है । यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसकी रोशनी में सुभाषचन्द्र बोस के बारे में चल रही मौजूदा बहस को भी देखें।
    सुभाष चन्द्र बोस महज राजनेता,स्वाधीनता सेनानी नहीं थे, बल्कि उच्चकोटि के विचारक भी थे। वे स्वभाव से आमूल-चूल परिवर्तनकामी थे। उनका साम्प्रदायिकता को लेकर सुनिश्चित नजरिया था ।
     लोकतंत्र में कोई चीज,विचार या संगठन अछूत नहीं हैं और हमें अछूत मनोवृत्ति के प्रचार-प्रसार से बचना चाहिए। साम्प्रदायिक एकता सामाजिक विकास के लिए बेहद जरुरी है। सुभाष चन्द्र बोस ने 4मई1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' के संपादकीय में लिखा  हमें साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति अछूत भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। हमें राजनैतिक अछूतभाव से बचना चाहिए। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को राजनैतिक अछूत मानकर दूर नहीं रखना चाहिए। 
    24फरवरी 1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' में लिखे संपादकीय में सुभाष ने साफ लिखा  आम जनता में स्वाधीनता की भावना पैदा करने के लिए नए नजरिए,नए भावबोध,स्प्रिट,परिप्रेक्ष्य और नए विज़न की जरुरत है।
    सवाल यह है कि संघ ने क्या नया विज़न पैदा किया? लोकतंत्र के अनुरुप नई स्प्रिट पैदा की ? कम्युनिस्टों ,समाजवादियों और कांग्रेसियों पर सुभाष की अपील का असर हुआ लेकिन संघ पर कोई असर नहीं हुआ। संघ के साम्प्रदायिक नजरिए से मुक्त नहीं किया। अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा से मुक्त नहीं किया,दंगे की राजनीति से मुक्त नहीं किया, गपोड़ी इतिहास से मुक्त नहीं किया, ऐसी स्थिति में सुभाष की विरासत के बारिस बनने की उनकी कोशिश हास्यास्पद ही कही जाएगी।
       सुभाष का मानना था  हमें आज अपने चारों ओर फैली साम्प्रदायिकता पर हमला करना चाहिए और आम जनता में राष्ट्रवाद की भावना पैदा करनी चाहिए। इस काम के लिए क्रांतिकारी मनोदशा बनाने की जरुरत है,उससे ही यह लक्ष्य हासिल करना आसान होगा। साम्प्रदायिकता तब ही खत्म होगी जब साम्प्रदायिक मनोदशा खत्म होगी। अतः सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे साम्प्रदायिकता-मुस्लिम,सिख,हिन्दू,ईसाई - को नष्ट करें।  हमें कोशिश करनी चाहिए कि ये समुदाय साम्प्रदायिकता का अतिक्रमण करके वास्तव अर्थ में राष्ट्रवादी मानसिकता विकसित करें। सेना के अग्रणी दस्तों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करें। (इसके विपरीत संघ हमारे पूर्व सैनिकों में हिन्दुत्व का प्रचार करता रहा है ) ,सेना की यह भी जिम्मेदारी है कि वह सभी सम्प्रदायों के बीच में सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पैदा करे। हिन्दू-मुस्लिम,सिख,ईसाईयों के बीच में एकता पैदा करने का काम करे। साम्प्रदायिक समस्या का समाधान करे। इससे समूचा वातावरण स्वतः बदल जाएगा। साथ ही साम्प्रदायिकता का अंत भी होगा। हमारी सेना के अग्रणी दस्तों को इस मामले में आदर्श भूमिका अदा करनी चाहिए।
            


रविवार, 26 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस और जनसंघर्ष


      सुभाष चन्द्र बोस के बारे में इन दिनों मीडिया में जिस तरह से सनसनी पैदा की जा रही है उससे यह खतरा पैदा हो गया है कि कहीं उनके नजरिए को प्रदूषित न कर दिया जाय। सुभाष के नजरिए की आधारभूमि है भारत की मुक्ति। वे आजीवन वामपंथी रहे और उनकी वामपंथी विचारधारा में गहरी आस्थाएं थीं। हमारे देश में अनेक किस्म के समाजवादी पहले भी थे और आज भी हैं, पहले वाले समाजवादी ऐसे थे जो दक्षिणपंथी राजनेताओं के साथ काम करते थे या फिर किताबी समाजवादी थे। सुभाष का नजरिया इन दोनों से भिन्न था।
     सुभाष आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर थे, वे संविधानवादी और सुधारवादी नजरिए से सामाजिक बदलाव की बहुत कम संभावनाएं देख रहे थे, इसलिए उन्होंने संविधानवाद और सुधारवाद से बचने की सलाह दी थी। कांग्रेस में ये दोनों ही दृष्टियों के मानने वाले लोग बड़ी संख्या में थे।
    सवाल यह है  क्या संविधानवादी और पूंजीवादी सुधारवादी मार्ग के सहारे हम समाज में आमूलचूल परिवर्तन कर पाए हैं ? सच यह है कि ये दोनों ही नजरिए 65साल में अभीप्सित परिणाम पैदा करने में असमर्थ रहे हैं। यह तब हुआ है जबकि देश का शासन पांच दशकों तक कांग्रेस के पास रहा बाद में आए शासकों ने मूलतः कांग्रेस की बनायी नीतियों का ही पालन किया। मोदी भी कांग्रेस की बनायी नीतियों पर चल रहे हैं।
      सुभाष ने संविधानवाद और जनसंघर्ष के बीच में अंतर्विरोध की तरफ 19अगस्त सन् 1939 में ध्यान खींचाथा, लेकिन इस अंतर्विरोध की अनदेखी की गयी। आज यही अंतर्विरोध अपने चरम पर है। एक तरह से सभी रंगत की गैर-वाम विचारधाराएं संविधानवाद की आड़ में एकजुट हैं और जनसंघर्षों का खुलकर विरोध कर रही हैं। पहले यही काम कांग्रेस ने किया अब यही काम मोदी सरकार कर रही है। जब हमारे सामने जनसंघर्षों को कुचलने के लिए संविधानवाद का खतरा हो तो हमें गंभीरता से देखना होगा कि आखिरकार सुभाष चन्द्र बोस की हमारे लिए आज किस रुप में प्रासंगिकता बची है।
   देश के आजाद होने के बाद संविधानवाद पर जोर दिया गया और तमाम किस्म के जनसंघर्षों और आंदोलनों पर संविधान के तहत ही हमले किए गए। यही वह संविधान है जो तमाम किस्म की पवित्र घोषणाओं की जनसंघर्षों के संदर्भ में घनघोर और नंगी अवहेलना करता  है। संविधान के नाम पर आपातकाल आया और संविधान के नाम पर ही अब तक सेज के लिए दस लाख एकड़ जमीन ले ली गयी और अब नग्नतम रुप में भूमि अधिग्रहण बिल पेश है, जिसे हर हालत में संसद से पास कराकर परम पवित्र वाक्य में तब्दील कर दिया जाएगा।
   कायदे से हमें सुभाष चन्द्र बोस को जनसंघर्षों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना चाहिए। लेकिन हो यह रहा है हमारे इतिहासकार बंधु सुभाष को इतिहास की घटना विशेष के संदर्भ में रंग-बिरंगे रुप में पेश कर रहे हैं इससे सुभाष के बारे में विकृत समझ बन रही है।
    'जनसंघर्ष बनाम संविधानवाद' के संदर्भ में यदि सुभाष को देखें तो पाएंगे कि सुभाष जनसंघर्षों के साथ खड़े हैं। सुभाष ने माना कि उन्होंने 'संविधानवाद का विरोध करके 'अपराध' किया है और मैं उसकी कीमत अदा कर रहा हूँ।' वह मानते थे 'संविधानवाद बनाम जनसंघर्ष' का अंतर्विरोध इस दौर का मूल अंतर्विरोध है और इसकी रोशनी में ही राजनीतिक प्रक्रिया का विकास होगा। सुभाष की यह समझ इतिहास के अब तक के अनुभव से सही साबित हुई है।   

      

हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य



       जो लोग फेसबुक से लेकर मोदी की रैलियों तक मोदी-मोदी का नारा लगाते रहते हैं वे सोचें कि मोदी में नारे के अलावा क्या है ,वह जब बोलता है तो स्कूली बच्चों की तरह बोलता है,कपड़े पहनता है फैशन डिजायनरों के मॉडल की तरह, दावे करता है तो भोंदुओं की तरह, इतिहास पर बोलता है तो इतिहासअज्ञानी की तरह ।
मोदी में अभी तक पीएम के सामान्य लक्षणों ,संस्कारों, आदतों और भाषण की भाषा का बोध पैदा नहीं हुआ है। मसलन् पीएम को दिल्ली मेट्रो में सैर करने की क्या जरुरत थी ? वे क्या मेट्रो से कहीं रैली में जा रहे थे ?मेट्रो सफर करने का साधन है, सैर-सपाटे का नहीं।
मोदी सरकार के लिए भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपराएं बेकार की चीज है। असल है देश की महानता का नकली नशा। उसके लिए शांति,सद्भाव महत्वपूर्ण नहीं है ,उसके लिए तो विकास महत्वपूर्ण है, वह मानती है शांति खोकर,सामाजिक तानेबाने को नष्ट करके भी विकास को पैदा किया जाय। जाहिर है इससे अशांति फैलेगी और यही चीज मोदी को अशांति का नायक बनाती है।
मोदी की समझ है स्वतंत्रता महत्वपूर्ण नहीं है, विकास महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता और उससे जुड़े सभी पैरामीटरों को मोदी सरकार एकसिरे से ठुकरा रही है और यही वह बिंदु है जहां से उसके अंदर मौजूद फासिज्म की पोल खुलती है।
फासिस्ट विचारकों की तरह संघियों का मानना है नागरिकों को अपनी आत्मा को स्वतंत्रता और नागरिकचेतना के हवाले नहीं करना चाहिए, बल्कि कुटुम्ब,राज्य और ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए. संघी लोग नागरिकचेतना और लोकतंत्र की शक्ति में विश्वास नहीं करते बल्कि थोथी नैतिकता और लाठी की ताकत में विश्वास करते हैं।
पीएम मोदी की अधिनायकवादी खूबी है- तर्कवितर्क नहीं आज्ञा पालन करो। इस मनोदशा के कारण समूचे मंत्रीमंडल और सांसदों को भेड़-बकरी की तरह आज्ञापालन करने की दिशा में ठेल दिया गया है, क्रमशःमोदीभक्तों और संघियों में यह भावना पैदा कर दी गयी है कि मोदी जो कहता है सही कहता है, आंख बंद करके मानो। तर्क-वितर्क मत करो। लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं विकास में बाधक है,तेजगति से काम करने में बाधक हैं,अतः उनको मत मानो। सोचो मत काम करो। धर्मनिरपेक्ष दलों-व्यक्तियों की अनदेखी करो, उन पर हो रहे हमलों की अनदेखी करो।राफेल डील से लेकर लैंड बिल तक मोदी का यह नजरिया साफतौर पर दिखाई दे रहा है।
हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य -

-1- पूर्व शासकों को कलंकित करो, 2.स्वाधीनता आंदोलन की विरासत को करप्ट बनाओ,3.हमेशा अतिरंजित बोलो,4. विज्ञान की बजाय पोंगापंथियों के ज्ञान को प्रतिष्ठित करो,5. भ्रष्टाचार में लिप्त अफसरों को संरक्षण दो, 6.सार्वजनिकतंत्र का तेजी से निजीकरण करो,7. विपक्ष को नेस्तनाबूद करो,8.विपक्ष के बारे में का हमेशा बाजार गर्म रखो,9.अल्पसंख्यकों पर वैचारिक-राजनीतिक -आर्थिक और सांस्कृतिक हमले तेज करो,10.मतदान को मखौल बनाओ. 11.युवाओं को उन्मादी नारों में मशगूल रखो,12. खबरों और सूचनाओं को आरोपों-प्रत्यारोपों के जरिए अपदस्थ करो,13.भ्रमित करने के लिए रंग-बिरंगी भीड़ जमा रखो,लेकिन मूल लक्ष्य सामने रखो,बार-बार कहो हिन्दुत्व महान है,जो इसका विरोध करे उस पर कानूनी -राजनीतिक-सामाजिक और नेट हमले तेज करो,14.धनवानों से चंदे वसूलो,व्यापारियों को मुनाफाखोरी की खुली छूट दो।15.पालतू न्यायपालिका का निर्माण करो।

भाषण ,पिता और पिटाई


              यह घटना उस समय की है जब मैं मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में उत्तरमध्यमा के अंतिम वर्ष का छात्र था सबसे कम उम्र और सबसे छोटी कक्षा का पहलीबार छात्रसंघ का महामंत्री चुना गया था,यह घटना सन् 1974 की है। संस्कृत पाठशाला में आम सभा के जरिए छात्रसंघ का चुनाव होता । उस चुनाव में मैं जीत गया,जीतने के साथ महासचिव होने के नाते मुझे भाषण देना था, छात्रसंघ की परंपरा थी कि जो महासचिव चुना जाता था वह भाषण देता था,मैं भाषण देने से हमेशा बचता था, बल्कि यह कहें तो बेहतर होगा कि मुझे भाषण देना पसंद ही नहीं था। लेकिन छात्रसंघ की परंपरा का निर्वाह करते हुए मैंने अपने गुरुजनों के आदेश पर भाषण देना आरंभ दिया, भाषण संस्कृत में देना था , छात्रसंघ की समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी, संस्कृत में मिनट्स लिखे जाते थे और संस्कृत में संचालन होता था ,छात्रों और शिक्षकों को संस्कृत में ही बोलने का अघोषित निर्देश था, वैसे छात्र हिन्दी में भी बोल सकते थे, लेकिन एक परंपरा चली आ रही थी जिसके कारण समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी।
      मैंने पहलीबार भाषण दिया वह भी संस्कृत में और भाषण देते समय मेरी आंखों से लगातार आँसू टपक रहे थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं क्यों रो रहा हूँ,मेरी गुरुजन भी परेशान थे, संयोग की बात थी कि मेरा भाषण  भाषा और शैली के लिहाज से अच्छा रहा, मेरे गुरुजनों ने मेरी खूब प्रशंसा की और एक सवाल किया कि तुम बोलते हुए रो क्यों रहे थे ? यह सवाल मेरे लिए आज भी अनुत्तरित है।
    संस्कृत कॉलेज में पढ़ते समय दूसरा महत्वपूर्ण भाषण सन् 1976 में छात्रसंघ के अध्यक्ष के रुप में दिया, यह आपातकाल का दौर था और संभवतः मेरा कॉलेज अकेला कॉलेज था जिसमें कानून तोड़कर छात्रसंघ का चुनाव हुआ और छात्रसंघ का सालाना जलसा भी हुआ जिसमें 'कौत्स की गुरु दक्षिणा' संस्कृत नाटक का मंचन हुआ और मेरा अध्यक्षीय भाषण हुआ। परंपरा के अनुसार यह में मेरा पहला लिखित संस्कृत भाषण था।
         आपातकाल में ही माकपा नेता सव्यसाची से संपर्क हुआ और आपातकाल के बाद उनके साथ पहलीबार होलीगेट पर तांगा स्टैंड पर सन् 1977 में नुक्कड़सभा में भाषण दिया। सव्यसाची का उन दिनों रिक्शा-तांगेवालों पर गहरा असर था, इसलिए सुनने वालों में वे ही ज्यादा था, संयोग की बात थी मेरे पिता ने मुझे भाषण देते देख लिया और उन्होंने मेरा भाषण सुना और चुपचाप गुस्से में घर चले आए, मैं बाद में जब घर पहुँचा तो उन्होंने कम्युनिस्टों को जीभर कर गालियां दीं, सव्यसाची को गालियां दीं, साथ भी मुझे पीटा भी और कहा कि तुम्हारा इतना पतन होगा मैंने यह तो सोचा ही नहीं था ,तुम पंडित हो,शास्त्री हो, तुमको कथा कहनी चाहिए, प्रवचन करना चाहिए, शास्त्रार्थ करना चाहिए, यह क्या तांगेवालों-रिक्शावालों में भाषण देते घूम रहे हो, यह तुम्हारे सम्मान के अनुरुप नहीं है अगलीबार यदि मैंने तुमको कम्युनिस्टों के साथ देखा तो डंडों से पीटूँगा।
      लेकिन मैं लाचार था, मेरे दोस्त लगातार बढ़ रहे थे और सभी पर साम्यवाद का गहरा असर था और सभी अच्छे परिवारों से आते थे,धीरे धीरे मेरे मंदिर पर आने वाले लोगों ने भी पिता से शिकायत की कि पंडितजी आपका बेटा तो बिगड़ गया है, आज वहां बोलते देखा,फलां जगह भाषण दे रहा था। मैं भाषण देकर जब भी लौटकर आता तो पिता पूछते  तुम फलां जगह भाषण देने गए थे आज, मैं सच बोल देता,बस,उसके बाद मेरी कसकर पिटाई होती, बाद में मैंने सच बोलना बंद कर दिया, उसके बाद मेरे पिता जब भी पूछते थे मैं साफ कह देता कि मैं भाषण देकर नहीं आ रहा,तो वे कहते कि फलां आदमी फिर तुम्हारा नाम क्यों ले रहा था, मैं कहता वे लोग चिढ़ते हैं,इसलिए झूठी शिकायतें करते रहते हैं।
उस दौर के भाषण और आंदोलनकर्म की एक दुर्घटनाबड़ी ही दिलचस्प है। किशोरी रमण गर्ल्स डिग्री कॉलेज में छात्राओं का शानदार आंदोलन हुआ,तकरीबन 15दिन तक हड़ताल के कारण कॉलेज बंद रहा। एक दिन इस आंदोलन के दौरान में चार सौ छात्राओं का जुलूस लेकर मथुरा के जिलाधीश के घर पर गया था, जुलूस में मैं अकेला लड़का था ,बाकी चार सौ लड़कियां थीं, उन दिनों मैं मथुरा में एसएफआई का जिलामंत्री था।यह वाकया सन् 1978 का है। उस समय डीएम एस.डी. बागला थे। संयोग की बात थी गर्मी का दिन था हम सीधे  उनके बंगले पर पहुँचे लेकिन वे बंगले पर नहीं थे, लड़कियां भूखी- प्यासी थीं, पानी आदि की बंगले के बाहर कोई व्यवस्था नहीं थी। मैंने चौकीदार से पानी देने को कहा उसने मना कर दिया, मैंने लड़कियों से कहा डीएम के घर के अंदर जाओ और जबर्दस्ती पानी पीओ और जो मिले खा-पी लो, बाकी जो होगा मैं देख लूँगा। मेरे बोलते ही 400लड़कियों ने बंगले के अंदर धावा बोल दिया और पूरा बंगला हमारे कब्जे में था, आराम से खाया-पिया,डेढ़ घंटे बाद डीएम आए,बंगले का अस्त-व्यस्त सीन देखकर घबड़ाए और बोले बंद करवा दूँगा ,लड़कियां बिफरी हुईं थीं और इतनी लड़कियों को देखकर डीएम के होश उड़े हुए थे, मैंने कहा आपने यदि भूल से गलती कि तो ये लड़कियां आपको पीटेंगी, डीएम शांत हो गए, उन्होंने हमारी मांगे ध्यान से सुनीं और हमें कार्रवाई का आश्वासन देकर विदा किया। लेकिन डीएम ने मेरे पिता को संदेशा भिजवा दिया कि पंडितजी अपने बेटे को संभालिए वरना हाथ से निकल जाएगा, एक साथ इतनी लड़कियों के साथ उसका जुलूस में आना अच्छा लक्षण नहीं है। मैं शाम को घर लौटा तो पिता ने पूछा कहां गए थे मैंने झूठ बोला कि कहीं नहीं कॉलेज से आ रहा हूँ, बस फिर क्या था जमकर पिटाई हुई और कमरे में बंद कर दिया गया, (दिलचस्प बात यह थी कि डीएम मेरे मंदिर पर हर रविवार आते थे, वे पिता और मुझे जानते थे। वे अंदर से दुखी थे कि मैं कम्युनिस्ट क्यों हूँ !) लड़कियों का  आंदोलन चरम था पर मैं घर में कैद था, पिता कहीं बाहर जाने ही न दे रहे थे, बाहर सारे मित्र और कॉमरेड परेशान थे, कोई संपर्क नहीं कर पा रहा था , खैर किसी तरह दो दिन बाद में पिता को यह वचन देकर बाहर निकला कि किसी आंदोलन-जुलूस में नहीं जाऊँगा और कहीं पर भाषण नहीं दूँगा।कॉमरेडों से नहीं मिलूँगा। लेकिन मैं क्या करूँ मैं अपनी आदत से लाचार था,बाहर भाषण देता था और घर पर आए दिन पिता से पिटता था, सन् 1979 में जेएनयू जाने बाद ही पिता की पिटाई से मुक्ति मिला।  

       

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

श्रद्धा के बिना माकपा


                                              
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की 21वीं पार्टी कॉग्रेस हाल ही में खत्म हुई है। यह कॉग्रेस एक मायने में महत्वपूर्ण है कि इसने माकपा में श्रद्धा के नायक को अपदस्थ किया है।श्रद्धा को नहीं। प्रकाश कारात के जमाने में माकपा श्रद्धालुओं और भक्तों का दल होकर रह गया था। माकपा के नेतागण श्रद्धालुओं की तरह बातें करते थे और श्रद्धालुओं की तरह ही अविवेकवादी आचरण कर रहे थे। प्रकाश कारात को यह श्रेय जाता है उसने प्रतिबद्ध माकपा को श्रद्धालु माकपा में तब्दील किया । कहने के लिए सीताराम येचुरी महासचिव हुए हैं,लेकिन पोलिट ब्यूरो अभी श्रद्धालुओं से भरा है। इस कमजोरी के बावजूद प्रकाश कारात की श्रद्धा की नीति को कॉग्रेस ने पूरी तरह ठुकरा दिया है।साथ ही श्रद्धा के नायक को विदा किया है ,यह सकारात्मक पक्ष है। 
उल्लेखनीय है विगत दस सालों में माकपा में प्रतिबद्धता घटी, श्रद्धा और अंध-श्रद्धा बढ़ी है। इस श्रद्धा और अंध-श्रद्धा की धुरी है पार्टी का संघात्मक ढ़ांचा और अभिजात्य भावबोध। इसके कारण पार्टी में छोटे-बड़े का भेद बढ़ा है। यह माकपा की अभी भी मूल समस्या है। संघात्मक ढ़ांचे को माकपा किसी भी तरह तोड़ नहीं पाई है। इसबार की पार्टी कॉग्रेस में भी यह ढ़ांचा ज्यों का त्यों बना रहा । सिर्फ महासचिव किसी तरह इस ढ़ांचे की पकड़ के बाहर से ऊपर आ गया है। सीताराम कैसे महासचिव बने हैं यह तो पार्टी के अंदर के लोग जानें लेकिन हम बाहर से माकपा को जिस तरह देख पा रहे हैं उसके आधार पर कह सकते हैं कि सीताराम येचुरी की महासचिव के पद पर प्रतिष्ठा के साथ यदि प्रकाश कारात के श्रद्धालु कॉमरेडों की प्रकाश सहित पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति से विदाई हो जाती तो बेहतर होता। अब मुश्किल यह है कि सीताराम को श्रद्धालुओं के साथ मिलकर फैसले लेने होंगे। 
माकपा को श्रद्धालुओं ने पोलिट ब्यूरो से लेकर निचले स्तर तक प्रदूषित किया है। कायदे से प्रकाश कारात के जमाने में जो श्रद्धातंत्र माकपा में निर्मित हुआ था उसको सर्वोच्च कमेटी से ही तोड़े जाने की जरुरत है, प्रकाश कारात सहित उन तमाम पोलिट ब्यूरो सदस्यों को पार्टीतंत्र से बाहर किया जाना चाहिए,अथवा उनको निरस्त्र किया जाय, जिन लोगों ने माकपा को श्रद्धालुओं,दलालों,प्रमोटरों और तमाम किस्म निहित स्वार्थी तत्वों की पार्टी बनाया। मसलन् ,पश्चिम बंगाल माकपा में प्रमोटर,दलाल और असामाजिक तत्वों की पकड़ संगठन पर इतनी मजबूत रही है कि पार्टी का सचिव भी उनके सामने फैसले लेने में शर्माता था। 
विगत एक दशक से माकपा की समस्या उसकी नीतियां कम और कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं खासकर महासचिव का राजनीतिक व्यवहार सबसे बड़ी समस्या रहा है। वह स्थानीयतावाद और प्रांतीयतावाद को किसी भी तरह कम नहीं कर पाया। प्रांतीयतावाद के आगे महासचिव बौना बना रहा और समूची पार्टी कभी अखिल भारतीय दल की तरह काम ही नहीं कर पाई। यहां तक कि पोलिट ब्यूरो में भी इसकी अभिव्यंजना साफतौर पर देखी जा सकती है। 
श्रद्धातंत्र ने पार्टी को रोबोट दल में तब्दील कर दिया। कॉमरेडों का रोबोट आचरण आज भी दहशत और थरथराहट पैदा करता है, उनका अहंकार आज भी मन में घृणा पैदा करता है। कॉमरेड भूल ही गए कि मौजूदा दौर पूजावाद और श्रद्धा का नहीं है। यह अविश्वास और बहस का युग है। शक दूर करने का युग है। श्रद्धा के पक्षधर पुराने ख्यालों और दस्तूरों में जी रहे हैं। उनकी समझ का यथार्थ से कोई मेल नहीं है। उनकी यथार्थ जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं है । जबकि आज के कॉमरेड मार्क्सवाद का यथार्थ के साथ मेल देखना चाहते हैं। वे उन तमाम चीजों के बारे में सवाल खड़े करना चाहते हैं जिनको माकपा ने गढ़ा है। वे सार्वजनिक तौर पर बहस-मुबाहिशे करके चीजों के बारे में समझना चाहता है। पार्टी का माहौल बदलना चाहते हैं। उनको अ-न्याय,निजी रंजिशों और कॉमरेडों की हैवानियत से सख्त नफरत है। लेकिन श्रद्धेयनेता इन चीजों पर ध्यान देना नही देना चाहते। वे उन मसलों पर बातें करना नहीं चाहते जिनसे माकपा के कॉमरेडों का मन और सामाजिक जीवन बदरुप हुआ है। 
श्रद्धेय नेताओं ने बदरंगी रुपों को पार्टी अनुशासन और ऊपर के नेता की राय के नाम पर हमेशा ढ़ंकने की कोशिश की है। इन लोगों ने यह भावना पैदा की है कि पाटी में नेता के बिना हमारा कोई नहीं है। नेता नहीं तो तुम नहीं । 21वीं पार्टी कॉग्रेस में हो सकता है पार्टी के बदरंग भावबोध की जमकर चर्चा हुई हो, लेकिन हम नहीं कह सकते कि वहां इस पर गौर किया गया था । यदि गंभीरता से श्रद्धा और अंध-श्रद्धा के दौर की समीक्षा की जाती तो प्रकाश कारात और उनके बासी श्रद्धासुमन बाहर फेंके क्यों नहीं गए ? जिन नेताओं के आचरण के कारण पार्टी आज रसातल के मुहाने पर खड़ी है वे सभी पोलिट ब्यूरो में बरकरार क्यों हैं ? पार्टी के जिन दोषों की 21वीं कॉग्रेस में चर्चा हुई है, वे दोष, व्यक्तिविहीन नहीं हैं। उनके साथ कोई न कोई नेता जुडा रहा है, ऐसे मं सामूहिक फैसले और निजी जिम्मेदारी के सिद्धांत का पालन करते हुए दोषयुक्त कार्यकलापों को प्रश्रय देने वाले नेताओं को पार्टी की सर्वोच्च कमेटी से निकाला क्यों नहीं गया ? 
सवाल यह भी है कि प्रकाश कारात के दौर में पार्टी सांगठनिक तौर पर कमजोर हुई है या ताकतवर बनी है ? सब जानते है कि पार्टी का राष्ट्रीय स्तर से लेकर निचले स्तर तक ह्रास हुआ है, लेकिन इस ह्रास के लिए महासचिव को दण्डित क्यों नहीं किया गया ? यह कैसे संभव है कि पश्चिम बंगाल में जो नेतागण तबाही के नायक हैं वे अभी भी पोलिट ब्यूरो में बने हुए हैं , क्या पार्टी में ईमानदार लोगों की कमी है ? पार्टी के पोलिट ब्यूरो में उन लोगों को बरकरार रखा गया है जो समूची पार्टी को दलदल,कीचड़ और बदनामी में छोड़ गए हैं। 
इसका अर्थ यह भी है कि माकपा में अभी भी नेताओं के बीच में श्रद्धा की गाँठ बंधी हुई है यही वजह है संगठन में कोई उनको टस से मस नहीं कर पाया। कायदे से श्रद्धा की गांठ को तोड़ा जाना चाहिए। श्रद्धा से देवता बनाए जा सकते हैं, बुर्जुआ नेता बनाए जा सकते हैं,कम्युनिस्ट नेता नहीं बनाए जा सकते। कम्युनिस्ट नेता, श्रद्धा से नहीं बनते, वे तो प्रतिबद्धता से बनते हैं। माकपा में फिलहाल तो हमें श्रद्धा के फूल खिलते नजर आ रहे हैं। देखते हैं नया माली (सीता) पूरे बगीचे को कैसे श्रद्धासुमनों से मुक्त करता है।

गजेन्द्र की आत्महत्या से उठे सवाल


    एक व्यक्ति ने आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान ,रैली के दायरे में ही  जंतर- मंतर पर सरेआम पेड़ पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस आत्महत्या के गर्भ से अनेक सवाल उठ खड़े हुए हैं। गजेन्द्र की आत्महत्या से यह संदेश गया है कि किसान या आम आदमी की जिंदगी उतनी खुशहाल नहीं रह गयी है जितना मीडिया के जरिए प्रचार किया जा रहा है। आम आदमी की जिंदगी लगातार असंख्य परेशानियों से घिरती जा रही है। कितना भयानक दृश्य है कि जो व्यक्ति सामूहिक लड़ाई का अंग बनकर रैली में भाग लेने आया था उसके मन की थाह किसी के पास नहीं थी, वह अपनी जेब में आत्महत्या का पुर्जा लिखकर लाया था। उसने अपने किसी भी संगी-साथी को भनक तक नहीं लगने दी कि वह किस तकलीफ में है। वह सामूहिक जंग में भी  एकाकी और पराएपन में कैद था।  
      गजेन्द्र का रैली में सरेआम फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेना और रैली में शामिल हजारों लोगों का उसको देखते रहना,लंबे समय तक रैली के आयोजकों का उसकी स्थिति की ओर ध्यान न देना इस बात का द्योतक है कि हम घनघोर अमानवीय समय और अमानवीय भावबोध में डूबे नेताओं और संगठनों के बीच में जी रहे हैं। हमारा समाज अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं की हृदयहीन अमानवीय दशा में जीने को अभिशप्त है। मेरे लिए बेहद कष्ट की बात यह है कि 'आप' रैली में यह घटना सरेआम घटती है लेकिन किसी की आंखों में आंसू तक नहीं निकले! हमारे नेताओं के आंसू क्यों सूख गए हैं ? रैली में शामिल जनता की आंखों में आंसू क्यों नहीं थे ?  किसी किसान की आत्महत्या या किसी व्यक्ति की हत्या को देखकर हम द्रवित क्यों नहीं होते ? हम इतने अमानवीय कैसे हो गए हैं ?
  हम माँग करते हैं पुलिस की चूक के लिए दिल्ली के पुलिस प्रमुख को तुरंत हटाया जाय। केन्द्रीय गृहमंत्री इस्तीफ़ा दें। मोदी सरकार अपनी सामूहिक और मंत्री की निजी ज़िम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। बेशर्मी की हद है कि गृहमंत्री से मोदी ने अभी तक इस्तीफ़ा नहीं माँगा है,  पुलिस के निकम्मेपन के लिए पुलिस मुखिया को सस्पेंड नहीं किया गया है। मृतक को श्रद्धांजलि देने की मोदी को फुर्सत नहीं है। वे अस्पताल तक देखने नहीं गए।गृहमंत्री नहीं गए। मोदी सरकार की यह हृदयहीनता निंदनीय है।
      सवाल उठता है हमारे किसी भी कैमरामैन के फांसी का लाइव दृश्य लेते समय हाथ क्यों नहीं कांपे ? उसने कैमरा फेंककर मरने वाले को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की ? क्या पेशागत दायित्व यही शिक्षा देता है कि मनुष्य को मरने दो तुम अपना काम करो। यह तो स्वार्थियों का तर्क है, अ-सामाजिक तर्क है।  
     आम आदमी पार्टी और ख़ासकर अरविंद केजरीवाल जवाब दें कि उनकी रैली में एक व्यक्ति फांसी लगाता है तो उनकी क्या कोई सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी नहीं हैं ?  वे सोचें कि उनकी उन्मादी प्रचार शैली आम आदमी को राहत देती है या फिर परेशानियों और बेचैनी में ठेलती है ?

      गजेन्द्र ने सरेआम फांसी लगाकर केजरीवाल एंड कंपनी को सरेआम नंगा कर दिया है और सीधे संदेश दिया है कि यह पार्टी हृदयहीनों का दल है। कल से लेकर आज तक मृतक के परिवार किए आर्थिक मदद की घोषणा न तो दिल्ली सरकार ने की है और न मोदी की केन्द्र सरकार ने की है। मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह केन्द्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे तुरंत आर्थिक सहायता राशि की घोषणा करें । गजेन्द्र की फांसी के लिए ये दोनों भी जिम्मेदार हैं। यदि समय रहते प्रयास किया गया होता तो गजेन्द्र को बचाया जा सकता था।  

मनुष्य "पाने" की नहीं "देने" की भावना से बचता है


आजकल जो राजनीतिक आंदोलन और रैलियां होती हैं वे आम जनता या संघर्ष में शामिल जनता के मन में कैथारसिस या विरेचन या कुर्बानी की भावना पैदा नहीं करतीं, इसके उलटे आम जनता में लालच और मोह पैदा करती हैं। राजनीतिकदलों की समूची प्रचारनीति इस बात पर टिकी  है कि येन-केन प्रकारेण आम लोगों को अपने साथ लाया जाय,वे जनता की राजनीतिक शिक्षा नहीं करते, वे उसमें त्याग की भावना पैदा नहीं करते, वे प्रचार के जरिए उसमें उन्माद की भावना पैदा करके उसके विवेक को कुंद बनाते या विवेक का अपहरण कर लेते हैं। त्याग की भावना पैदा किए किए बना  किसानों और नौजवानों में किसी भी किस्म के उल्लास की भावना पैदा नहीं की है।
        जंतर-मंतर की रैली में आया किसान कायदे से उत्साह-उमंग में घर जाता तो बढ़िया होता लेकिन वह रैली में आने के बाद गहरी निराशा और हताशा में चला गया और उसने आत्महत्या का फैसला कर लिया,हमें यह बात सोचनी चाहिए कि वामदलों की किसानसभाएं और भारतीय किसान यूनियनों की राजनीति भी कमोबेश राजनीति का वही हथकंड़ा अपना रही हैं जो राजनीतिकदल अपना रहे हैं।
        हमें गंभीरता के साथ इस सवाल पर सोचना चाहिए कि जब किसानों की समस्या पर चौतरफा बातें हो रही हों और जुलूस आदि निकल रहे हों, टीवी पर असंख्य ट़ॉक शो हो रहे हों ऐसे में किसानों में आत्महत्या का सिलसिला थम क्यों नहीं रहा , कहीं हमारी संघर्ष की राजनीति में ही कोई बड़ा दोष तो नहीं आ गया ?
   राजनीति जब अर्थवाद और अवसरवाद के पैमानों से चलने लगती है तो आम जनता में लालच-लोभ और निराशा पैदा करती है, निहित स्वार्थी भावबोध पैदा करती है। किसान ,भूमि अधिग्रहण बिल आदि मसलों पर मोदी से लेकर राहुल तक,वामदलों से लेकर केजरीवाल तक यह फिनोमिना फैला हुआ है।  ये सभी मोर्चे "देने" की बजाय "पाने" की भावना से प्रचार कर रहे हैं।  
      लोकतंत्र में पाने की भावना से लड़ी गयी लड़ाईयां हमेशा हताशा में रुपान्तरित होती हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में अधिकांश लड़ाईयों में आम जनता हारती है क्योंकि सामाजिक-राजनीतिक शक्ति संतुलन उसके पक्ष में न होकर जनविरोधी ताकतों के पक्ष में रहता है।
     कहने का अर्थ यह है कि हमें हताशा,निराशा और आत्महत्या से समाज को बचाना है तो हमें राजनीति को अर्थवाद,अवसरवाद और कारपोरेटवाद से बचाना चाहिए। जंगजू संगठनों की मुश्किल यह है कि वे कारपोरेट घरानों से लड़ना जाहते हैं लेकिन अर्थवाद और अवसरवाद के उपकरणों और रणनीतियों के जरिए। कारपोरेट घरानों को इन उपकरणों के जरिए परास्त नहीं किया जा सकता। बल्कि ये दोनों रणनीतियां तो कारपोरेट नीतियों का अंग हैं।

        हमें समग्रता में अर्थवाद,अवसरवाद और कारपोरेटवाद के खिलाफ संघर्ष की रणनीति बनानी चाहिए। इसके अलावा उन्मादी प्रचारशैली से बचना चाहिए । उन्मादी प्रचारशैली अंततः विवेक की हत्या करती है। इससे नागरिक विवेक नष्ट होता है और पशु विवेक में इजाफा होता है। उन्मादी प्रचार जितना तेज हो रहा है अविवेक का तांडव उतना ही बढ़ता जा रहा है।       

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

पेजथ्री मार्क्सवाद की भँवर



सीताराम येचुरी के माकपा महासचिव बनते ही मीडिया में आशा का संचार दिख रहा है। उनको कोई भिन्न खबर मिली है। हमने बहुत पहले लिखा था, फिर लिख रहे हैं,सीताराम के महासचिव बनने से माकपा सुधरने नहीं जा रही। लेकिन एक काम जरुर होगा मीडिया में माकपा जरुर नजर आएगी,क्योंकि सीता का मीडिया जनसंपर्क हमेशा से अच्छा रहा है। लेकिन माकपा को मीडिया में नहीं आम जनता में काम करना है।
     माकपा की विशाखापत्तनम कॉगेंस में ऐसा कुछ भी नया नहीं घटा जिससे लगे कि माकपा में जल्द ही कोई बड़ा बदलाव आएगा। माकपा सबसे कंजरवेटिव किस्म की कम्युनिस्ट पार्टी है, अनुदारवादी भावबोध इसमें कूट-कूटकर भरा हुआ है। माकपा में अनुदारवादियों के अलावा एक बड़ा तबका असामाजिक तत्वों का भी दाखिल हुआ है जिसने माकपा की इमेज को क्षतिग्रस्त किया है। माकपा यदि आंतरिक अनुदारवाद और असामाजिक कार्यकर्ताओं के तंत्र को तोड़ने में सफल होती है तब तो कोई नई आशा की किरन फूट सकती है वरना विशाखापत्तनम कॉग्रेस मात्र रुटिन कॉग्रेस ही मानी जाएगी।

     हम तो चाहते हैं कि माकपा यह करे, वह करे, भारत की राजनीति के केन्द्र में आ जाए,लेकिन माकपा की भौतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि उसे न यह करने दे रही हैं न वह करने दे रही हैं। माकपा अपनी भौतिक परिस्थितिथियों की दास है, माकपा के हमारे मित्रों को माकपा की भौतिक अवस्था का हमसे भी बेहतर अंदाजा है। यही वजह है कि माकपा अपनी पार्टी कॉग्रेस के बाद भी कोई नया नारा या कोई नया राजनीतिक कार्यक्रम आम जनता के लिए पेश नहीं करने जा रही है। यहां तक कि पार्टी के अंदर सामान्य पारदर्शिता भी अभी तक पैदा नहीं हुई है।
       मसलन् आम जनता को यह जानने का हक है कि केरल के पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंदन और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को किस कारण से पोलिट ब्यूरो से हटा दिया गया, आम जनता यह भी जानना चाहती है विमान बसु को किस गुण के कारण पोलिट ब्यूरो में बनाए रखा गया है,जबकि ये पश्चिम बंगाल में पार्टी को नष्ट करने में अग्रणी रहे हैं. तमाम किस्म के असामाजिक तत्वों और जनविरोघी कार्यों को अंजाम देने में विमान बसु के नेतृत्व की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, उनको कायदे से पार्टी से निकाल दिया जाना चाहिए लेकिन वह पार्टी में मौजूद हैं। इस तरह के हालात में पार्टी के हमदर्दों को भविष्य में कोई आशा की किरण नजर नहीं आती। माकपा जबतक पार्टी के नियमों को भंग करने वाले नेताओं को पोलिट ब्यूरो में बरकरार रखती है वह किसी भी तरह अपनी खोई साख हासिल नहीं कर सकती।

      माकपा के अनेक सदस्यों की स्थिति यह है कि वे फेसबुक पर पार्टी की समस्याओं पर खुलकर चर्चा कर नहीं करते, देश की समस्याओं पर उनको लिखने की फुर्सत नहीं है या फिर उनका मानना है फेसबुक आदि नॉनसेंस मीडियम है ! गंभीर काम तो जुलूस निकालना और पार्टी ऑफिस में बैठना है !  सोशलमीडिया  कम्युनिकेशन को वे अपराध या पार्टी का अनुशासन भंग समझते हैं। फेसबुक को वे पापबुक समझते हैं। इसलिए दबी नजर से देखते हैं,दबे दबे से लिखते हैं, खुलकर बोलने और लिखने में उनको तकलीफ होती है, उनको लगता है फेसबुक लेखन तो मार्क्सवाद का विसर्जन है ! 
     यदि फेसबुक आदि जनमाध्यमों को लेकर स्पष्टवादिता और अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल न कर पाने की अवस्था रहती है तो हम तो यही कहना चाहते हैं कि माकपा के मित्रगण अभी माकपा के चौखटे के बाहर निकले ही नहीं हैं उनको भारत के संविधान के आईने में अपने को नागरिक की तरह देखने की आदत और संस्कार डालने की जरुरत है, वे पार्टी मेम्बर पीछे हैं ,नागरिक पहले हैं। उनके पार्टी के अधिकारों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, नागरिक के अधिकार ।
     माकपा के अधिकांश सदस्यों में नागरिक अधिकारचेतना अभी विकसित ही नहीं हो पायी है, वे हमेशा पार्टी के आतंक,प्रेम और श्रद्धा  में जीते हैं, पता नहीं उनके अंदर नागरिक चेतना, नागरिक श्रद्धा और नागरिक कम्युनिकेशन की भावना कब पैदा होगी ?कॉमरेड अच्छा पार्टी मेम्बर वही है जो अच्छा नागरिक भी है। कॉमरेडशिप से नागरिकता महान है, समझ लो वरना बाद में पछताओगे!1


माकपा के संदर्भ में राजनीति के अपराधीकरण का सवाल सबसे प्रमुख सवाल है। विशाखापत्तनम कॉग्रेस इस सवाल पर टो टूक फैसला लेने में असमर्थ रही है, बल्किमाकपा में राजनीति के अपराधीकरण के लिए जो जिम्मेदार  हैं वे पोलिट ब्यूरो में रख लिए गए हैं। उनलोगों को संगठन में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है जो माकपा के अपराधीकरण के खिलाफ बोल रहे थे। का.अच्युतानंदन उनमें से एक हैं। पहले यही गति स्व. नृपेन चक्रवर्ती की हुई और दोनों मौकों पर प्रकाश कारात की बड़ी भूमिका रही है।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

भूरा के सर्जक


          मेरा जन्म परंपरागत परिवार में हुआ,घर में दादी का वर्चस्व था, वही परिवार की मुखिया थी और उसने ही परिवार के सभी महत्वपूर्ण फैसले लिए। मेरे निर्माण में मेरी माँ के अलावा दादी और बुआ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। बचपन में स्त्रीमन को पढ़ने के सूत्र मुझे इन तीनों से ही मिले। परिवार की स्त्रियां बच्चे के मन को  रचती हैं । मैं 13-14 साल की उम्र से ही सुबह चार बजे उठ रहा हूँ। सुबह उठाने का काम माँ और दादी करती थी,इन दोनों की जिम्मेदारी थी कि मैं सुबह उठूँ और पढ़ूँ. वह सिलसिला आज तक बना हुआ है। मैं सुबह उठकर सो न जाऊँ इसलिए मुझे एक गिलास में  रोज चाय मिलती थी जिसमें तेज काली मिर्च हुआ करती थीं। बेहतर बात यह थी कि मेरे लिए एक छोटा कमरा अलग से बनवा दिया गया था जिसमें मैं अकेले सोता था,मेरे लिए एक रेडियो ,एक टेबिल लैंप, कुर्सी-टेबिल की व्यवस्था कर दी गयी थी ।   
      मेरा जन्म संयुक्त परिवार में हुआ था, जिस मकान में जन्म हुआ वह तीन आंगन का  था और उसमें आठ कमरे थे । लंबी छतें थीं। घर में एक भी पंखा नहीं था, एक छोटी सी घड़ी थी । परिवार के पालन-पोषण का आधार परंपरागत यजमानी थी । साथ में चर्चिका देवी के मंदिर से भी कुछ आमदनी हो जाती थी। मैंने जेएनयू में दाखिला लेने के पहले तक अधिकांश समय वे ही कपड़े पहने जो मंदिर पर चढ़ावे में आते थे। कभी-कभार मेरे लिए बाजार से लट्ठे का कपड़ा खरीदकर पायजामा बनवा दिया जाता था बाकी मंदिर पर चढ़े कपड़े के शर्ट या कुर्ता बनाकर पहनता था। संयोग की बात थी कि मेरे परिवार में और भी बच्चे थे लेकिन उन सबको बाजार से अच्छे कपड़े खरीदकर बनवाए जाते थे । मेरी माँ गूंगी और बहरी दोनों थी लेकिन देखने में बहुत सुंदर थी, वह जब तक जिंदा रही,मैं अधिकांश समय उसके ही साथ रहता था.वह अकेला छोड़ती ही नहीं थी,उसकी आंखों के सामने खेलना,कूदना, पतंगें उड़ाना, यमुना किनारे घाटों पर खेलना, नदी में नहाना,दोस्तों के साथ क्रिकेट और शतरंज खेलना आदि सब कुछ उसकी आंखों के सामने होता था। वह जब नानी के घर जाती थी तो अधिकांश समय अपने साथ लेकर जाती थी । एक तरह से वह छाया की तरह हमेशा साथ रहती थी। मैं एकमात्र स्कूल अकेले जाता था ,बाकी समय मेरे समय और साथ की मालिक मेरी माँ थी । मैं कल्पना ही नहीं कर सकता था कि वो रहेगी और मुझे अकेला छोड़ देगी । वह मुझे सब कुछ करने देती थी ,मैं जो चाहता था वह मुझे मिलता था,मेरी हर रुचि का ख्याल रखती थी। पिता चाहते थे कि मैं पंडिताई सीखूँ और अच्छा पंडित बनूँ ।जबकि पंडित बनना मेरी रुचि का अंग नहीं था लेकिन मैं नहीं जानता था कि मैं क्या बन सकता हूँ। यह संयोग की बात है कि सन्1976 में माँ की मृत्यु के बाद मैंने खेलना बंद कर दिया।   मैंने उसी साल शास्त्री की परीक्षा पास की थी।माँ की मृत्यु के एक सप्ताह पहले परीक्षा परिणाम आया था। वह बेहद खुश थी,उसके साथ हम फिल्म देखने गए थे।वह जब तक जिंदा रही जन्मदिन मनाया जाता था। वह मेरे शास्त्री होने पर बेहद खुश थी। उसकी मृत्यु ने परिवार की अपूरणीय क्षति की,मेरा बचपन एक ही झटके में गायब हो गया।
       मथुरा में घरों की बनाबट और स्थापत्यकला की यह विशेषता थी कि सारा शहर छतों से जुड़ा हुआ था। प्रत्येक मकान की छत एक-दूसरे से जुड़ी थी। यह विलक्षण बात थी कि मथुरा में आप छतों के जरिए सारा शहर घूमकर आ सकते थे । छत से छत का जुड़ने का अर्थ है पड़ोसियों के दिल मिले हुए हैं। इन दिनों छतों के बीच में दीवारें आ गयी हैं और दिलों में भी दीवारें हैं।
      गली दशावतार में घर होना बड़े सौभाग्य की बात थी,तकरीबन हर घर में कुँआ था और कई धर्मशालाएं थीं,गली के ठीक सामने यमुना किनारा और लोकप्रिय सतीघाट-सतीबुर्ज था।यह हमलोगों की पारिवारिक धरोहर भी है, पुरखों को कभी तीन घाट दान में मिले थे । नगरपालिका में आज भी पिता के नाम ये तीन घाट दर्ज हैं। मथुरा के घाटों की चर्चा फिर कभी। ये तीनों घाट मथुरा के पवित्रतम घाट विश्रामघाट के साथ जुड़े हैं।
    मेरे घर से सटा हुआ घर दयानंद सरस्वती के गुरु स्वामी विरजानंद सरस्वती का है, बचपन से मैं विरजानंद सरस्वती के किस्से सुनकर बड़ा हुआ। ठीक एक घर छोड़कर कानपुर वालों का घर है गली के नुक्कड़ पर उसमें एक जमाने में 'हरे राम हरे कृष्ण' सम्प्रदाय के संस्थापक संत वर्षों रहे, मैं बचपन में उनसे अनेकबार बालसुलभ बहसों में उलझ चुका हूँ । बचपन का सबसे सुंदर समय वह भी था जब प्रिय वैदिक विद्वान दत्तात्रेय कुंठे जी महाराज रोज मेरे मंदिर पर दर्शन करने आते थे और मैं उनको प्रणाम करता और वे मेरे पिता को प्रेरित करते कि मुझे सामवेदी होने के कारण सामवेद पढाया जाय। स्वयं दत्तात्रेयजी वेदों के विलक्षण विद्वान थे। उनसे मेरे पिता पढ़े थे, मैंने भी बचपन में उनकी कक्षाएं कीं, वेद पढ़े । बचपन का दूसरा रोचक समय वह  था जब करपात्री जी महाराज मथुरा आते थे और जितने दिन मथुरा रहते मेरे मंदिर दोपहर में दर्शन करने आते, पिता के साथ जमकर शास्त्रचर्चा करते ,आमतौर पर दोपहर में यह होता था, मैं हमेशा आश्चर्य के साथ करपात्री जी की बातें सुनता था और मजे लेता था, शास्त्रज्ञान तो एकदम नहीं था लेकिन उनकी बातों से मेरा मन बहुत बहलता था। उनकी बोलने की शैली बहुत ही मधुर और तार्किक हुआ करती थी। करपात्री जी मेरे पिता से बातें करते समय यदि मैं नजर नहीं आता था तो वे कहते थे कि बेटे को बुलाओ,आशीर्वाद दूँगा। इस चक्कर में मैं अपनी दोपहर की नींद से अनेक दिन वंचित हुआ और मुझे पांडित्य के साथ संवाद-विवाद की कला को सीखने का मौका मिला।
मजेदार बात यह है कि मैंने राहुल सांकृत्यायन की करपात्री जी के विचारों पर लिखी किताब रामराज्पय और मार्क्सवाद पढी नहीं थी उस समय लेकिन मैं उनसे सहमत नहीं था, जबकि मैं उनका करीबी था, रामराज्य परिषद की ओर से प्रचारकरते थे चुनावों में मुझे पता नहीं क्यों रामराज्य परिषद मनोरंजक दल लगता था ।
  यह भी रोचक घटना है राधामोहन चतुर्वेदी, कांग्रेसी नेता,बड़े स्वाधीनता सेनानी थे और हमारे मंदिर पर नियमित आते थे और उनसे भी जमकर पुरानी कहानियां सुनने को मिलती थीं, राधेश्याम चतुर्वेदी,एडवोकेट सोशलिस्ट थे और कैलाशनाथ चतुर्वेदी ठेकेदार,कम्युनिस्ट थे और ये सभी हमारे मंदिर पर आते थे,इनसे भी जमकर साम्यवाद और लोहिया के बचपन में किस्से सुने ।यह बचपन ही था जिसमें मनीराम बागड़ी जैसे सोशलिस्ट नेता को भी करीब से जानने और सुनने का मौका मिला। कांग्रेस के बड़े नेताओं में लक्ष्मीरमण आचार्य (यूपी के वित्तमंत्री) और दयालकृष्ण एडवोकेट (  यूपी में मंत्री बने ) नियमित हमारे मंदिर पर आते थे और उनसे रोचक राजनीतिक कहानियां सुनने और विवाद करने का मौका मिला । 
मेरे बचपन में मुश्किल यह थी कि मेरे मंदिर पर दर्शन करने आने वालों में संस्कृत के विद्वान बहुत आते थे और वे ही मेरे ज्ञान संचार और संवाद का आधार बने। कालान्तर में मुझे उन सभी विद्वानों से पढ़ने का मौका भी मिला। इस तरह प्राचीन ज्ञान परंपरा मुझे सहज ही घर बैठे मिल गयी। वैदिक विद्वानों में दत्तात्रेय कुंठे जी महाराज, लालनकृष्ण पंड्या,दर्शन के विद्वान सवलकिशोर पाठक, व्याकरण के विलक्षण विद्वान् बलदेव चतुर्वेदी ,संस्कृत साहित्य के वनमाली शास्त्री,कृष्णचन्द्र चतुर्वेदी और सिद्धात ज्यौतिष के प्रखर विद्वान संकटाप्रसाद उपाध्याय से तेरह वर्षों से प्रथमा से लेकर आचार्य पर्यंत श्री माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ने का मौका मिला। इसी कॉलेज में हिन्दी के शिक्षक मथुरानाथ चतुर्वेदी से प्रथमा से लेकर शास्त्री पर्यन्त हिन्दी पढ़ी। मथुरानाथ चतुर्वेदी राजनीतिक तौर पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक नेताओं में थे, वे मथुरा में जनसंघ के निर्विवाद नेता थे,उनसे राजनीतिक विषयों पर बातें करते हुए राजनीति का सबसे पहले परिचय हुआ और वे ही मुझे सोवियत समाजवादी साहित्य और वहां से प्रकाशित पत्रिकाएं नियमित दिया करते थे,माकपा नेता  सव्यसाची से तो बहुत बाद में आपातकाल में मुलाकात हुई ।दिलचस्प बात यह थी कि मथुरानाथ जी ने मुझे कभी आरएसएस का साहित्य पढ़ने को नहीं दिया और नहीं आरएसएस की विचारधारा मानने के लिए कहा,वे हमेशा सामान्य राजनीतिक विषयों पर राय व्यक्त करते थे और मैं आमतौर पर उनसे मतभिन्नता रखता था।         




गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

गऊमांस,तम्बाकू,प्राइम टाइम सिनेमा और राज्य आतंकवाद

 जन-जागरण के काम को  हमारे नेतागण कानून और पुलिस के सहारे करना चाहते हैं। इससे सामाजिक जारुकता पैदा नहीं होगी । सामाजिक जागरुकता के लिए घरों से निकलो ,लोगों से मिलो और समझाओ और यह काम निरंतर करो। लेकिन इतना परिश्रम करने का समय किसी भी दल के पास नहीं है। खासकर जो चीजें आम लोगों के खान-पान और आदतों में हैं उनको छुड़ाने के लिए जमीनी स्तर से लेकर टीवी तक प्रचार अभियान तेज करो। यह सब करने की बजाय राजनेताओं ने सीधे कानून बनाकर आम जनता के जीवन पर हमला करना आरंभ कर दिया है। यह राज्य आतंकवाद है। 
      मसलन्, संघ परिवार को गऊ मांस नापसंद है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप सीधे गऊमांस बंद कर देंगे। भारत में यह संभव नहीं है। यदि ऐसा करेंगे तो लाखों चमड़ा मजदूर भूखे मर जाएंगे। अकेले महाराष्ट्र में गऊहत्या पर पाबंदी से कोल्हापुरी चप्पल का उद्योग बंद हो गया है। लाखों परिवारों के घरों में राशन-पानी बंद हो गया है। यही हाल बाकी देश का है। यदि संघ परिवार सच में गऊहत्या रोकना चाहता है तो जन-जागरण करे और आम लोगों को समझाए कि वे गऊ मांस न खाएं। लेकिन कानूनी आतंकवाद का सहारा न ले। यही बात हम दिल्ली में तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर लगी पाबंदी पर भी कहना चाहते हैं। तम्बाकू का लोग इस्तेमाल न करें, यह आम आदमी पार्टी का चेतना अभियान तो हो सकता है, कानूनी अभियान नहीं। इस तरह की कानूनी बंदिशों से तम्बाकू उत्पाद बिकने बंद नहीं होंगे, बल्कि खुलेआम ब्लैक में बिकेंगे। दूसरी ओर हजारों लोगों के रोजगार पर भी बुरा असर होगा। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनेता यदि अपने विचारों के अनुरुप समाज बनाना चाहते हैं जो सामाजिक जन-जागरण करें,कानूनी आतंकवाद का सहारा न लें।
       आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों में कानूनी आतंकवाद का सहारा लेने की प्रवृत्ति सबसे प्रबल है, वे कानून के नाम पर आम जनता,व्यापार और दैनंदिन जीवन में अराजकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।मसलन् ,महाराष्ट्र सरकार ने प्राइम टाइम समय में मराठी फिल्म दिखाने का आदेश जारी करके व्यापार के हक पर हमला बोला है।  किस समय कौन सी फिल्म दिखायी जाएगी यह हॉल का मालिक तय करेगा ,सरकार नहीं।यदि आम लोगों के जीवन में सरकारें इस तरह हमले करेंगी तो वे दिन दूर नहीं जब गली-मुहल्लो में संघ के बंदों को आम जनता घेरेगी ।
       संघ परिवार ने कानून आतंकवाद का जिस तरह इस्तेमाल आरंभ किया है वह हमारे संविधान की बुनियादी भावनाओं के खिलाफ है। सरकार में आने के बाद से संघ परिवार और उसके विभिन्न संगठन विभिन्न स्तरों पर आम जनता के जीवन में कानूनी हमले कर रहे हैं , यह संविघान और लोकतंत्र विरोधी काम है। उनके इस काम की जो लोग आँखें बंदकरके प्रशंसा कर रहे हैं या समर्थन कर रहे हैं,वे असल में संघ के भोंपू का ही काम कर रहे हैं। हम तो यही कहना चाहते हैं कि संघ को यदि आम जनता के जीवन का वैविध्यपूर्ण जीवन पसंद नहीं है तो वह अपना देश और अपनी जनता भारत के बाहर चुन ले।भारत में रहना है तो संविधान का पालन करना होगा। आम जनता के वैविध्यपूर्ण जीवन,खान-पान,जीवनशैली,धर्म आदि को नतमस्तक होकर मानना होगा । 

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

संघ का कुँआ

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघियों के एनजीओ संगठनों के सम्मेलन में कहा कि हम तो नेकी कर कुँआ में डाल की भावना से काम करते हैं!
भागवत जी यह कुँआ क्या आरएसएस है ? या फिर भविष्य में इस्लाम और ईसाइयत पर हमले नहीं होंगे इसका वायदा है? सच कहो ,माजरा क्या है? कारपोरेट मुगलों के सामने कुँआ के जुमले की जरुरत क्यों पड़ी? कारपोरेट मुगलों को अपने जलसे में क्यों बुलाया ? क्या साख में लगे दाग मिटाने को ? बेहतर होता रामजी की शरण में जाते,प्रेमजी की ओर जाना गले नहीं उतर रहा! या फिर महान हिन्दूनेता बनने की तमन्ना जगी है ? जो काम हिन्दूसमाज दो हजार साल में न कर पाया वह आप करेंगे हमें संदेह है ! फिर भी नेक काम में देरी किस बात की! कहो स्वयंसेवकों से १.अंधविश्वासों के खिलाफ जंग लडें! २. दूसरे धर्मों खासकर इस्लाम और ईसाई धर्म के खिलाफ बोलना बंद करें, ३. संविधान का मन से पालन करें,धर्मनिरपेक्षता से प्यार करें! यदि ये तीन काम संघ के स्वयंसेवक करने लगेंगे तो नेकी को कुएं में डालने की नहीं समाज में डालने की जरुरत महसूस होगी ! नेकी वह काम की जो समाज के काम आए ,कुएँ (संघ) के नहीं!

आम आदमी पार्टी और लोकतंत्र की चुनौतियाँ


         'आप' के आंतरिक कलह को लेकर मीडिया में इनदिनों जमकर लिखा गया है। इसमें निश्चित रुप से आनंदकुमार,प्रशांत भूषण,योगेन्द्र यादव आदि के द्वारा उठाए सवाल वाजिब हैं । कुछ महत्वपूर्ण सवाल केजरीवाल एंड कंपनी ने भी उठाए हैं जो अपनी जगह सही हैं। दोनों ओर से जमकर एक-दूसरे के व्यवहार और राजनीतिक आचरण की समीक्षा भी की गयी है। गंदे और भद्दे किस्म के हमले भी हुए हैं। अंततः स्थिति यह है कि 'आप' एक राजनीतिक दल के रुप में बरकरार है । जब तक वह राजनीतिक दल के रुप में बरकरार है और केजरीवाल जनता के मुद्दे उठाता है आम जनता में उसकी राजनीतिक साख बनी रहेगी ।
     'आप' एक राजनीतिक दल है, वह कोई एनजीओ नहीं है। वह बृहत्तर लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया का अंग है। राजनीतिक दल होने के नाते और खासकर दिल्ली में सत्ताधारी दल होने के नाते उसकी साख का फैसला उसके सरकारी और गैर-सरकारी कामकाज पर निर्भर  है। राजनीतिक प्रक्रिया में दलीय लोकतंत्र के सवाल बहुत छोटे सवाल हैं। राजनीतिक प्रक्रिया के लिए नेताविशेष के निजी दलीय आचरण के सवाल भी बहुत बड़े सवाल नहीं होते। उल्लेखनीय है लोकतंत्र में निजी आचार-व्यवहार कभी भी निर्णायक राजनीतिक सवाल नहीं बन पाता।          
      राजनीतिक प्रक्रिया में निजी की हाशिए के सवाल जैसी भूमिका भी नहीं होती। राजनीति में दलीय भूमिका होती है,दलीय सार्वजनिक संघर्ष की भूमिका होती है। राजनीतिक प्रक्रिया बेहद निर्मम होती है। वह निजी को निजी नहीं रहने देती। निजी को राजनीतिक बना देती। निजी जब राजनीतिक बनता है वह मूल्य नहीं रह जाता,वह राजनीति का लोंदा बन जाता है।  यदि किसी नेता की निजी बातों, चीजों, आदतों या निजी नजरिए को आप हमले के लिए चुनते हैं तो उससे नेता पर कोई फर्क नहीं पड़ता।हम जान लें राजनीतिक प्रक्रिया ,नेता या नेताओं के निजी व्यवहारों से निर्देशित नहीं होती। वह तो राजनीतिक प्रक्रिया से निर्देशित होती है।
      व्यक्तित्व विश्लेषण के लिए निजी का महत्व है लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया के लिए निजी बातों और निजी नजरिए का कोई महत्व नहीं है, राजनीतिक प्रक्रिया में तो राजनीतिक एक्शन ही प्रमुख है। इसलिए अरविंद केजरीवाल निजी तौर पर कैसा आदमी है, इसका कोई खास असर राजनीतिक प्रक्रिया पर होने वाला नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया में नेता का निजी आचरण और निजी नजरिया ही यदि महत्वपूर्ण होता तो मोदी पीएम न होते, श्रीमती इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में न आतीं, उसके पहले कांग्रेस को तोड़कर वे पीएम न बन पातीं। कहने का आशय यह कि केजरीवाल को देखने के लिए हमें उसके निजी आचार-व्यवहार के दायरे से बाहर निकलकर देखना होगा।
     लोकतंत्र में राजनीतिक प्रक्रिया बहुत ही जटिल और संश्लिष्ट होती है। 'आप' का जन्म ऐतिहासिक कारणों से हुआ है और उसके खाते में कुछ ऐतिहासिक काम भी मुकर्रर हैं, हम चाहें या न चाहें , उसे वे काम करने हैं,वह यदि इसमें चूकती है तो अप्रासंगिक होने को अभिशप्त है। 'आप' ने दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके बहुत बड़ी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है। उसने साम्प्रदायिक ताकतों को बुरी तरह परास्त किया है। उसने कांग्रेस को दिल्ली में कहीं का नहीं छोड़ा। सवाल यह है  क्या वह आने वाले समय में अपने राजनीतिक एक्शन के जरिए आम जनता के ज्वलंत सवालों पर नियमित सक्रियता बनाए रख पाती है ?

     'आप' के सामने पहली चुनौती है दिल्ली सरकार चलाने की और सरकार को पारदर्शी-लोकप्रिय बनाए रखने की। दूसरी बड़ी चुनौती है केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का स्वतंत्र और अन्यदलों के साथ मिलकर विरोध संगठित करने और व्यापक जनांदोलन खड़ा करने की।उल्लेखनीय है व्यापक हित के जनांदोलनों के अभाव के गर्भ से 'आप' का जन्म हुआ है, 'आप' को यह नहीं भूलना है कि जनांदोलन करना उसकी नियति ही नहीं लोकतंत्र की आज ऐतिहासिक अवस्था की जरुरत भी है। तीसरी बड़ी चुनौती है सत्ता के लोकतांत्रिकीकरण की, सत्ता के लोकतांत्रिकीकरण के जिस मॉडल की उसने वकालत की है उसको वह धैर्य के साथ दिल्ली में लागू करे और जन-समस्याओं के त्वरित और जनशिरकत वाले मॉडल को विकसित करे, इससे उसकी राजनीतिक साख तय होगी ।  

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

गुड फ़्राइडे पर अ-न्याय खेल



गुड फ़्राइडे हो या दीपावली  ये हमारे सद्भाव के पर्व हैं। दुखद है कि अब निहित स्वार्थी ताक़तें इन त्यौहारों पर भी राजनीति की रोटियाँ सेंकने से बाज़ नहीं आ रही हैं। हमें संस्थागत हित बनाम व्यक्तिगत हित का सवाल उठाते समय यह बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि संस्थान के हित कभी उसमें काम करने वालों के हितों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। संयोग की बात है कि संस्थान के हित को लोकतांत्रिक हक़ों से ऊपर तरजीह देने की बात कही जा रही है। यह भाषा सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्याधीश ने कही है , इसके पहले कभी गुडफ्राइडे या दीपावली के दिन जजों कीकोई सरकारी कॉंफ़्रेंस नहीं रखी गयी। 
  सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश का तर्क है कि संस्थान के कर्तव्य प्रधान हैं और निजी चीज़ें गौण हैं तो इस तर्क के भयानक अ-लोकतांत्रिक परिणाम हो सकते हैं।
       धर्म हमारी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। वह सरकारी तौर -तरीक़ों और मान्यताओं से नियमित नहीं होता। जजों के सम्मेलन  की तिथि तय करते समय तिथि की धार्मिक महत्ता का ख़्याल रखना चाहिए। सवाल यह है कि जजों का यह सम्मेलन अन्य किसी दिन क्यों नहीं रखा गया ? क्या ३६५ दिन में यही एक दिन ख़ाली बचा था ? यदि ऐसा है तो हमें गंभीरता से हिसाब माँगना होगा कि हमारे जज सारे साल क्या करते हैं? कितने दिन अवकाश पर रहते हैं ? 
      उल्लेखनीय है जजों की समाज के प्रति ज़िम्मेदारी जितनी महत्वपूर्ण है उसका वे यदि ईमानदारी के साथ पालन कर रहे होते तो न्याय प्रणाली में इतनी सडांध न होती ! न्यायपालिका आज राजनीति से ज़्यादा भ्रष्ट हो चुकी है, ऐसे में जजों का हठात् गुडफ्राइडे के दिन सम्मेलन हमें तो किसी अन्य मंशा की भनक दे रहा है। क्या अब आने वाले समय में न्यायपालिका भी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में जाने वाली है  ? 
         न्यायपालिका में न्याय कम और ग़ैर- न्याय ज़्यादा व्यक्त होता रहा है। ऐसे में न्यायपालिका को और भी ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाने की ज़रूरत है। जजों को लोकतांत्रिक बनाने की ज़रूरत है। वह न्याय किसी काम का नहीं जो लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान न करे। हमारी न्यायप्रणाली में न्याय और लोकतंत्र के अन्तस्संबंध पर ज़ोर कम रहा है। वहाँ तो न्यायप्रणाली और न्याय के संतुलन पर ही ज़ोर रहा है, इससे भारत का आम आदमी लाभान्वित नहीं हुआ है। यह असल में " न्याय के लिए न्याय " की प्रणाली है। जिसमें न्याय कम और न्याय के नाम पर उत्पीड़न और पैसे की विभिन्न स्तरों पर लूट बहुत होती है। 
     " गुड फ़्राइडे" पर जजों की कॉंफ़्रेंस न होती तो न्यायप्रणाली छोटी नहीं हो जाती! जिन लोगों ने यह फ़ैसला लिया उन्होंने अपने राजनीतिक स्वार्थों का ख़्याल रखा  । इससे न्याय की मर्यादा सम्मानित नहीं होती। उलटे इससे  न्यायप्रणाली में निहित राजनीतिक स्वार्थ की मनोदशा व्यक्त हुई है। 

अल -शबाब के केन्या हिंसाचार के मायने


केन्या में अल-शबाब द्वारा किया गया गरिस्सा विश्वविद्यालय  नृशंस हत्याकांड निंदनीय है। इस घटना के जितने विवरण और ब्यौरे मीडिया में आ रहे हैं, उनसे अल-शबाब की आतंकी हरकतों का संकेत मात्र मिलता है। अल-शबाब के हमले में 147 लोग मारे गए इनमें अधिकतर लड़कियां हैं.तकरीबन 20 पुलिस और सुरक्षाकर्मी भी मारे गए हैं। यह हमला जिस तरह हुआ है उसने सारी दुनिया के लिए संकेत दिया है कि आतंकी हमेशा सुरक्षा की दृष्टि से  कमजोर इलाकों पर ही हमले करते हैं। इन हमलों के पीछे अल-शबाब की साम्प्रदायिक मंशाएं साफ दिख रही हैं, उनके निशाने पर गैर-मुस्लिम छात्र थे।
     उल्लेखनीय है यह संगठन केन्या में गैर-मुस्लिमों पर निरंतर हमले करता रहा है और इसे सोमालिया के  अल-कायदा के हिंसक हमलों के खिलाफ इस्तेमाल करने के मकसद से 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की शांतिसेना की मदद के लिए शामिल किया गया था। अल-शबाब को अफ्रीकी यूनियन सेना की मदद से मुख्य सघन आबादी वाले इलाकों में तैनात किया गया और  उसके वर्चस्व का विस्तार किया गया।  खासकर केन्या,सोमालिया और उगांडा में उसके नेटवर्क का विस्तार करने में संयुक्त राष्ट्रसंघ शांति सेना और अफ्रीकी यूनियन सेना की अग्रणी भूमिका रही है। यह संगठन कई बार आम जनता पर आतंकी हमले कर चुका है। खासकर गैर-मुस्लिमों पर हमले करने में इसकी अग्रणी भूमिका रही है।
   अल-शबाब का गरिस्सा विश्वविद्यालय में निरीह छात्रों पर हमला करने के पीछे क्या मकसद था यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है लेकिन इस घटना ने समूचे केन्या को हिलाकर रख दिया है, उल्लेखनीय है कुछ दिन पहले पाकिस्तान में इसी तरह का आतंकी हमला स्कूली बच्चों पर हुआ था। पैटर्न साफ है कि आतंकी संगठन शिक्षा संस्थानों पर हमले करके आम जनता में दहशत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में स्कूल में काम करने वाली नन पर हमला और बलात्कार उसी पैटर्न का अंग है।

      केन्या के जिस इलाके , गरिस्सा में यह हमला हुआ है वह बेहद गरीब और अभावग्रस्त है। यहां आमलोगों के पास कृषि आधारित काम-काज के अलावा कोई काम नहीं है। पशुपालन और कृषि ही उनकी आजीविका का आधार है, गरिस्सा वि वि में तकरीबन 900छात्र रहते हैं और जिस समय(3अप्रैल2015) शाम को पांच बजे यह आतंकी हमला हुआ उस समय विश्वविद्यालय में हलचल थी।  इनमें से 147 लोग घटनास्थल पर ही मारे गए ।  गरिस्सा विश्वविद्यालय में सभी छात्र 6 डोरमेट्री में रहते हैं। हमलावर आतंकी चुन-चुनकर ईसाईयों को खोज रहे थे। गरिस्सा विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कॉलिन वतनगोला ने कहा कि वह जब नहा रहा था तब उसने अचानक कैम्पस में गोलियां चलने की आवाजें सुनीं। गोलियों की आवाजें सुनने के साथ छात्रों ने अपने कमरे अंदर से बंद कर लिए,अध्यक्ष ने भी अंदर से कमरा बंद कर लिया था।गोला ने कहा  हम सिर्फ जूतों  और गोलियों की आवाजें सुन रहे थे,बीच बीच में अल-शबाब जिंदाबाद के नारे सुन रहे थे।
  अल-शबाब के आतंकियों ने बंदूक की नोंक पर जबरिया डोरमेट्री खुलवायीं और एक-एक छात्र से पूछा कि  कौन मुस्लिम है और कौन ईसाई है ? जिस छात्र ने अपने को ईसाई कहा उसे वहीं अलग करके गोलियों से भून दिया गया। छात्रसंघ के अध्यक्ष ने कहा प्रत्येक गोली के चलने पर उसे यही महसूस हो रहा था कि ये गोलियां अब मुझे भी लग सकती हैं। इस घटना के बाद बाकी बचे सभी छात्र गंभीर मानसिक यंत्रणा और आतंक की पीड़ा से गुजर रहे हैं। सारे केन्या में मातम फैला हुआ है।
      केन्या के आतंकी हमले का यही सबक है कि हर कीमत पर सभी धर्म के मानने वालों में प्रेम और सद्भाव बनाए रखें। भारत में जो लोग ईसाईयों पर हमले कर रहे हैं वे असल में उस अंतर्राष्ट्रीय आतंकी शिविर के मनसूबों को पूरा कर रहे हैं जो आतंकी कहलाते हैं और अपने को मुसलमानों का रखवाला भी कहते हैं। आतंकी हरकत चाहे वे किसी भी रुप में हो उसकी हम सबको एकजुट भाव से निंदा करनी चाहिए। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि समुदायों में हर हाल में सद्भाव बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है ।