रविवार, 22 मई 2016

चुनावी हिंसा का मतलब


        पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म हुए हैं लेकिन दो राज्य ऐसे हैं जहां चुनाव के बाद हिंसा अभी जारी  है।ये हैं पश्चिम बंगाल और केरल। संयोग की बात है दोनों ही राज्यों में वाम निशाने पर है या निशाना लगा रहा है।सवाल यह है वाम जहां रहता है वहां पर चुनावी हिंसा क्यों होती रही है बिहार में कुछ महिना पहले चुनाव हुए उसके पहले दिल्ली में चुनाव हुए,हाल ही में तमिलनाडु,असम और पांडुचेरी में भी चुनाव हुए लेकिन कहीं पर चुनावी हिंसा नहीं हुई।संयोग की बात है इन सब राज्यों में वाम नहीं के बराबर है।
    पश्चिम बंगाल में विगत पाँच सालों में वामदलों खासकर माकपा पर असंख्य हमले हुए हैं।इसबार भी  चुनाव के पहले और बाद में असंख्य हमले हुए हैं।वाम पर हमले ऐसे समय में हो रहे हैं जब टीएमसी को अपार बहुमत मिला है।टीएमसी वाले जीत के बाद भी उदार बनने को तैयार नहीं हैं।लगातार हिंसक हमले कर रहे हैं।
    सवाल उठता है इस हिंसा की जड़ कहां है हिंसा वे लोग करते हैं जिनका जनता पर विश्वास नहीं होता।जो जनता के दिलो-दिमाग पर हिंसा के जरिए कब्जा या वर्चस्व रखना चाहते हैं।जिस दल का जनता में असर होगा वह हिंसा का सहारा नहीं लेगा लेकिन जो दल हिंसा का सहारा लेता है वह सतह पर कहता है कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा कर रहा है या बदले की भावना से कर रहा है।
    असल में, हिंसा का असल मकसद है वर्चस्व स्थापित करना।वर्चस्व स्थापित करने वाली मनोदशा राजनीतिक कमजोरी से पैदा होती है। हिंसा जिस इलाके में होती है वहां पर वह तो असर छोड़ती ही है,इसके अलावा उन इलाकों में भी असर छोड़ती है जो दूर पड़ते हैं।लेकिन हिंसा हमेशा एक वृत्त में केन्द्रित रहती है।मसलन्,केरल के जिस जिले में माकपा-आरएसएस के बीच हिंसा हो रही है वह अधिक से अधिक केरल तक या सबंधित जिले तक सीमित रहेगी,उसके बाहर नहीं जाएगी।इस अर्थ में हिंसा स्थानीय और प्रांतीय होती है।

     मौजूदा हिंसा की जड़ें राजनीतिक असहिष्णुता में छिपी हैं।फिलहाल सभी राजनीतिकदलों में असहिष्णुता चरम पर है।कोई असहिष्णुता छोड़ने को तैयार नहीं है।मौजूदा हिंसा को पहल करके रोकने के लिए कोई दल तैयार नहीं है,उलटे गरम-गरम बयान आ रहे हैं या फिर उपेक्षा करके चुपचाप हिंसा देख रहे हैं।यह मनोदशा अ-लोकतांत्रिक और हिंसक है।हिंसा का जबाव हिंसा नहीं है,हिंसा का जबाव पुलिस भी नहीं है।हिंसा जबाव है शांति और वह संवाद-सहयोग के बिना स्थापित नहीं हो सकती।लोकतंत्र के ये दोनों महत्वपूर्ण तत्व हैं।जो दल लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कल तक वोट मांग रहा था वही दल आज मुँह फुलाए,गुस्से में ऑफिस में बैठा है या हिंसा में मशगूल है।हिंसा को हिंसा या घृणा या निंदा से खत्म नहीं कर सकते। हिंसा को खत्म करने के लिए शांति,सहयोग और संवाद की जरूरत है।

विवेकहीनता विकल्प नहीं है फेसबुक मित्रो!


हमारे फेसबुक मित्र उन्मादियों की तरह ,भाजपा के प्रचारक की तरह जीत गए जीत गए हल्ला मचाए हुए हैं ! उनकी इन हरकतों को देखकर हंसी भी आ रही है ,गुस्सा भी आ रहा है,मित्रो,फेसबुक कम्युनिकेशन है, कम्युनिकेशन की शर्त है कि दिमाग की खिड़कियां खुली रहें,दिमाग की खिड़कियां बन्द करके लोकतंत्र नहीं बचता।लोकतंत्र बचता है विवेकपूर्ण कम्युनिकेशन से,असहमतियों की गंभीर मीमांसा करने से। आपलोग पढ़े-लिखे हो,आप लोग किसी के कार्यकर्ता के तौर पर फेसबुक में दाखिल नहीं होते।आप निजी व्यक्ति के नाते यहां संवाद करते हो।यह भी जानते हो कि यह संवाद वोटरों में नहीं हो रहा,फिर इस तरह की विवेकहीनता क्यों
    विवेकहीनता सबसे बड़ी पूंजी है फासिज्म की।लोकतंत्र बचे और समृद्ध बने,यह आप-हम सबको देखना होगा।लेकिन आपलोग तो अपने कम्युनिकेशन से उलटी दिशा में दौड़ रहे हैं।मसलन्, हाल के विधानसभा चुनावों को ही लें तो अनेक नई चीजें देख पाएंगे,इन पर हमें खुलकर बातें करनी चाहिए।मसलन्,नीतियों के सवाल को प्रमुख सवाल बनाया जाना चाहिए,लेकिन आपलोग नीतियों पर तो बात नहीं करना चाहते। नीतिहीनता और अवसरवाद को लोकतंत्र के लिए कैंसर माना जाता है। कमोबेश सभी दल इसकी गिरफ्त में हैं।
    दूसरी बड़ी समस्या यह है भारत को उदार पूंजीवाद के मार्ग पर चलना है या अनुदार पूंजीवाद के मार्ग पर चलना है।हमारे मोदीभक्त मित्र कांग्रेस विरोध की विवेकहीन पगडंडी पर चलकर यदि उदारवाद का मार्ग ग्रहण करते तो हमें कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन वे तो भाजपा के अनुदार पूंजीवादी मार्ग पर बढ़ चले हैं,वे भाजपा की हर जीत पर इस तरह खुश हो रहे हैं गोया वे उदारतावाद के मार्ग पर एक और कदम आगे बढ़े हों ! लेकिन मित्रो,भारत में पहले से ही सामंती दौर की संकीर्णताएं,अनुदार भावनाएं,मूल्य आदि मौजूद हैं इनमें भाजपा का अनुदारवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र इजाफा कर रहा है।
    मोदीजी अनुदारवाद की हर स्तर नग्नतम रूप में वकालत कर रहे हैं,अनुदारवाद के स्थानीय दलों को एकजुट कर रहे हैं,इससे भारत कभी आगे नहीं जाएगा।दुर्भाग्य की बात है कारपोरेट मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है,बहुराष्ट्रीय कंपनियां मदद कर रही हैं,क्योंकि वे भारत को अनुदार देश के रूप में देखना चाहते हैं।मेरी निजी तौर पर कांग्रेस के साथ कोई मोहब्बत नहीं है।लेकिन कम से कम कांग्रेस घोषित तौर पर,नीति के तौर पर अनुदारवाद की पक्षधर नहीं है,इसलिए तुलनात्मक तौर पर भाजपा से बेहतर है।कांग्रेस की उदारवादी नीतियों ने धीमी गति से ही सही लेकिन देश में उदार मूल्यों,संरचनाओं और संस्कारों के निर्माण में केन्द्रीय भूमिका अदा की है,इसको स्वीकार करने में झिझक नहीं होनी चाहिए।कांग्रेस का हारना उदारतावाद की पराजय है।अब आपलोग तय करें भारत को उदारतावाद के मार्ग पर बढ़ते देखना चाहते हैं या फिर अनुदार मार्ग आगे बढ़ते देखना चाहते हैं।

     फेसबुक पर तथ्य और सत्य के आधारपर बातें होनीं चाहिए।मसलन्,मोदी की नीतियों पर खुलकर बातें हों,जमीनी हकीकत बड़ी भयावह है सरकारी बैंकों से केन्द्र सरकार के इशारे पर जनता के धन की खुली लूट मची हुई है।यह लूट बताती है  मोदीजी किन वर्गों की सेवा कर रहे हैं।मोदी प्रशासन का आलम यह है कि प्रचार के अलावा कोई काम नहीं हो रहा।तमाम किस्म के संवैधानिक संस्थानों पर नियोजित हमले किए जा रहे हैं और यह काम और कोई नहीं संघ परिवार कर रहा है जो सत्ता चला रहा है। आपातकाल को छोड़कर संवैधानिक संस्थाओं पर हमले कभी किसी शासकदल ने नहीं किए लेकिन मोदीजी मजे में हमले कर रहे हैं और इसके लिए ´कांग्रेस नष्ट करो ´का नारा लगाकर ध्यान हटा रहे हैं। मोदी सरकार के अगले निशाने पर बैंकिग सिस्टम है।हमलोग यदि सावधान नहीं हुए तो बाद में बहुत पछताएंगे। 

मोदी की जीत पर मुग्ध क्यों हो मित्रवर!

     इसे कहते हैं मोदी के प्रचार की जीत ! आप कुछ भी कहें फेसबुक मोदी भक्त सोचने को तैयार नहीं हैं ! वे पूरी तरह माने बैठे हैं,वे राजनीति को सरकार के गठन के आर-पार देखने को तैयार नहीं हैं।वे यह भी भूल गए कि इंदिरा गांधी जैसी दिग्विजयी नेत्री को क्षेत्रीय दल मिलकर धूल चटा चुके हैं,उसके पराभव में उनकी बड़ी भूमिका थी,आज कांग्रेस यदि हाशिए पर है तो क्षेत्रीय दलों के कारण,न कि भाजपा के कारण।भाजपा का उदय तो हाल के वर्षों में हुआ है।केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ असल मोर्चा तो क्षेत्रीय दलों ने लिया था,निकट भविष्य में भी वही होगा।कम से कम कांग्रेस को कभी -कभार किसी क्षेत्रीय दल का राजनीतिक सहयोग मिल भी जाता था लेकिन भाजपा के साथ तो कोई क्षेत्रीय दल भरोसे के साथ जाना नहीं चाहता।
भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव के आंकड़े उतने संतोषजनक नहीं हैं जितने बताए जा रहे हैं।यह सच है भाजपा की सरकार असम में बन गयी है,लेकिन यह स्थिति तो विगत दो साल से साफ है।कांग्रेस निकम्मेपन, गुटबाजी और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है।सोचने वाली बात यह है कि कांग्रेस के अलावा किस दल को भाजपा ने हराया है,क्या किसी क्षेत्रीयदल को हराने में भाजपा सफल रही है।भाजपा की सरकारें वहीं बनी हैं जहां कांग्रेस का शासन था।इससे पता चलता है कि आम जनता ने कांग्रेस के विकल्प के अभाव में भाजपा को चुना है।भाजपा को जनता अपना स्वाभाविक विकल्प नहीं मानती।यदि ऐसा ही होता तो भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर वैसी सफलता क्यों नहीं मिली जैसी इंदिरा या राजीव के दौर में कांग्रेस को मिली थी।
दूसरी बात यह कि भाजपा ने नीतिहीन ढ़ंग से जम्मू-कश्मीर और असम में जिस तरह पृथकतावादियों से समझौता करके चुनाव लड़ा है वह तो और भी शर्मनाक है।इसका अर्थ है कि भाजपा ने बोडो,उल्फा,पीडीपी आदि की राजनीति को लेकर सर्वस्वीकृत राष्ट्रीय समझ से काटकर निहित स्वार्थी ढ़ंग से अवसरवादी राजनीति करने का फैसला कर लिया है।इसलिए भाजपा हर रंगत के पृथकतावादी दलों से खुलकर हाथ मिला रही है और उस पर हम सब मूक दर्शक बने बैठे हैं।
चुनाव में जीत जरूरी है लेकिन जीतकर सरकार बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप सरकार क्यों बनाना चाहते हैं किन नीतियों और संगठनों की मदद से सरकार चलाना चाहते हैं ?
टीवी प्रचार ने हमारे आलोचनात्मक विवेक को छीन लिया है और हमने टीवी टॉक शो की नजरों से चीजों को देखने की,सतही ढ़ंग से देखने की आदत डाल ली है और यह भाजपा की सरकार बनाने से भी बड़ी जीत है।


शुक्रवार, 20 मई 2016

बंगाल और हिन्दी के बुद्धिजीवी-लेखक

      मुझे पश्चिम बंगाल में रहते हुए 27साल गुजर गए।इसबीच यहां बहुत कुछ बदला है लेकिन अफसोस यह है हिन्दी के बुद्धिजीवियों-लेखकों का संस्कार नहीं बदला।पश्चिम बंगाल में हिन्दी के बुद्धिजीवी देश के विभिन्न कोनों से आते रहे हैं।भाषण करते रहे हैं,सम्मान लेते रहे हैं।लेकिन कभी इन बुद्धिजीवियों ने आँखें खोलकर बंगाल के यथार्थ पर नहीं लिखा,जो कुछ लिखा वह किताबी विषयों पर लिखा,मसलन् रैनेसां पर लिखा,लेकिन उसकी जमीनी हकीकत को कभी जानने की कोशिश नहीं की।चूंकि अधिकांश बुद्धिजीवी प्रगतिशील थे अतःवे यहां के जमीनी यथार्थ से आँखें चुराकर भागते रहे हैं।यही हालत पश्चिम बंगाल के बंगाली बुद्धिजीवियों की है।वे नंदीग्राम के बहाने उठे और फिर सो गए।

सवाल यह है पश्चिम बंगाल के यथार्थ को जानने और समझने के लिए जिस जोखिम को उठाने की जरूरत है वह जोखिम लेखक उठाने से क्यों कतराते रहे हैं ॽ जो भी थोडा-बहुत लेखन है वह वाम के पक्ष और विपक्ष में है।वाम की आलोचना पर है। लेकिन वाम के अलावा बंगाल का सामाजिक यथार्थ भी है जिसकी ओर आलोचनात्मक नजरिए से देखने की जरूरत है।यह काम पहले नहीं हुआ अभी भी नहीं हो रहा।सारी समस्याएं यहीं पर हैं। हमारे सरोकार राजनीतिक हार -जीत तक आकर सिमटकर रह गए हैं, कुछ पद-पुरस्कार पाने तक सीमित रह गए हैं।इससे बंगाल के यथार्थ के साथ अलगाव और भी गहरा हुआ है।

मैं निजी तौर पर यथाशक्ति इस दिशा में लिखता रहा हूँ और इसकी मुझे राजनीतिक –सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ी है। एक लेखक के नाते मैंने बंगाल के यथार्थ को नहीं छोड़ा,पार्टी छूटी,पद छूटे,मित्र छूटे ,लेकिन मैंने निडर होकर लिखना नहीं छोड़ा। सवाल यह है बंगाल जब हिन्दीभाषियों को प्रभावित करता है तो यह भी तो देखें कि हिन्दीभाषी लोग और राज्य किस तरह बंगाल को प्रभावित कर रहे हैंॽ बंगाल में किन वर्गों का ह्रास हुआ ॽ किन क्षेत्रों में ह्रास हुआ ॽऔर इस ह्रास के कारण जो समाज पैदा हुआ वह कैसा है ॽ



आज का बंगाल पहले के बंगाल से भिन्न है।आज बंगाल में हिन्दीभाषी क्षेत्र की तमाम विकृतियां और अमानवीय मूल्य पैर पसार चुके हैं।बंगाली जाति पूरी तरह हिन्दीभाषियों की कु-सभ्यता के रूपों से सीख रही है,उनका अनुकरण कर रही है।यह बहुत बड़ा विपर्यय है।इसे बुद्धिजीवी देखना नहीं चाहते।

वाम- कांग्रेस गठजोड़ पराजय के सबक-


        पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय काफी महत्व रखती है।जिन लोगों की वाम के प्रति सहानुभूति है वे वाम को पश्चिम बंगाल के सामाजिक यथार्थ के संदर्भ में बहुत कम जानते हैं,जो वाम इस राज्य में है वह विचारधारा के नशे और ३४साल सत्ता में रहने के कारण यथार्थ से एकदम कटा हुआ है।लोकल से लेकर नेशनल स्तर के वामनेता,खासकर माकपानेता जमीनी यथार्थ को देखने से भागते रहे हैं।सच्चाई यह है कि वाम के पराभव का सिलसिला थमा नहीं है ऊपर से राजनीतिक अवसरवाद ने वाम को घेर लिया है।आयरनी यह है कि माकपा पोलिट ब्यूरो सदस्य पी.विजयन( केरल) से प्रणव राय से हाल ही में केरल कवरेज के दौरान पूछा कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से वाम ने जो गठबंधन किया है उस पर क्या कहना है ? विजयन ने कहा मैं नहीं जानता।आश्चर्य है वाम-कांग्रेस का यहां गठबंधन था सारे मीडिया में खबर है पूरी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ रही है लेकिन पोलिट ब्यूरो सदस्य कह रहा है,मैं नहीं जानता! चुनावी सभाओं में पोलिट ब्यूरो सदस्य गठबंधन कह रहे हैं,लेकिन एक दूसरे पोलिट ब्यूरो सदस्य विमान बसु ने कहा गठबंधन कहां है ? यह राजनीतिक दोगलापन यदि माकपा नेताओं के मन में है तो जनता कैसे उन पर विश्वास करती !माकपा ने दो टूक ढंग से कभी खुलकर नहीं बताया कि वाम- कांग्रेस गठबंधन है या चुनावी तालमेल है ?इस तालमेल को किन तर्कों को लेकर किया गया उसकी कोई लिखित रूप में चर्चा नजर नहीं आई! कोई विश्वास करेगा कि केरल के माकपा नेताओं को मालूम नहीं है कि बंगाल में क्या हो रहा है!
माकपा की जिन मुद्दों को लेकर आलोचना हमने की उन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।इससे भी बड़ी बात यह कि जब संगठन कमजोर है और हमले हो रहे हैं ,माकपानेता अपने लोगों को सुरक्षा देने में असमर्थ हैं,पोलिंग एजेंट तक देने में असमर्थ हैं,तब फिर चुनाव लड़ने क्यों गए ? क्या संगठन के बिना चुनाव लड़ना चाहिए? बंगाल में कई बार चुनाव होते हैं और माकपा चुनाव में लड़ने लायक अवस्था में नहीं है।ऐसी स्थिति में माकपा को पश्चिम बंगाल में कुछ वर्षों के लिए चुनावी राजनीति से विरत रहकर संगठन निर्माण के काम पर ध्यान देना चाहिए,इस समय माकपा अधेड़ और बूढ़ों का दल मात्र होकर रह गया है।युवाओं का संगठन में अभाव है ,और सही नीतियों का भी अभाव है।
माकपा की सबसे बड़ी चुनौती है कि वह अपनी सांगठनिक संरचनाओं ,नियमों और नीतियों को नागरिक समाज की परिकल्पना और नीतियों की संगति में नए सिरे से बनाए,यदि वह ऐसा करता है तो भविष्य में संभावनाएं हैं।वरना लोकतंत्र में हाशिए पर रहने के लिए तैयार रहे।



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ममता की जीत को यहां से देखो-


     पश्चिम बंगाल में माकपा का जनाधार जिस तरह खत्म हो रहा है वह बताता है कि माकपा ने 34साल की वामशासन की गलतियों से कोई सबक हासिल नहीं किया ।मसलन् इसबार के चुनाव में माकपा को मात्र 19.7फीसदी वोट मिले हैं जबकि टीएमसी को 44.9फीसदी वोट मिले हैं।यानी टीएमसी अकेले अपने दम पर समाज के बृहत्तर तबकों के बीचमें अपनी स्वीकृति अर्जित करने में सफल रही है।खासकर अल्पसंख्यकों,एससी,एसटी और ग्रामीणों में उसे व्यापक जन समर्थन तो मिला है, इसके अलावा शहरीजनों में भी वह जनाधार का विस्तार करने में सफल रही है।इसबार के चुनाव से यह भी निष्कर्ष निकलता है कि टीवी चैनलों का जनता पर कोई असर नहीं होता।आज भी निजी जनसंपर्क और परंपरागत संगठन के जरिए किया गया प्रचार कार्य प्रभावी होता है।जो लोग सोचते हैं कि टीवी और सोशलमीडिया से चुनाव जीता जाता है,वे गलतफहमी में हैं।
पश्चिम बंगाल में अधिकांश टीवी चैनलों ने अहर्निश ममता के खिलाफ प्रचार किया,लेकिन आम जनता पर उसका कोई असर नहीं हुआ।इसका प्रधान कारण है ममता का कैडर आधारित संगठन।दूसरी बात यह कि ममता सरकार ने विकासमूलक योजनाओं को नीचे तक लागू करके,स्वयं निरीक्षण और निर्देशन का काम किया,हर जिले में बार-बार दौरा किया,इससे सारी योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू करने में वह सफल रही। तीसरा प्रधान कारण है वाम और भाजपा का साखविहीन प्रचार।इन तीन कारणों ने मिलकर ममता की जीत को संभव बनाया।उल्लेखनीय है ममता सरकार के खिलाफ अपराधीकरण, घूसखोरी, पुलिस मशीनरी के दुरूपयोग आदि के सभी आरोप सच हैं,लेकिन आम जनता ने अपनेहित के सामान्य विकासमूलक कार्यों को केन्द्र में रखकर ममता को वोट दिया।वाम की इस मामले में 34 साल की नाकामियां आज भी सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हैं।एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं।मैं जिस मुहल्ला-गली में रहता हूँ,उसके आसपास कोई पानी की प्याऊ वाम जमाने में नहीं थी,लेकिन ममता के आने के बाद ठंड़े पानी की चार प्याऊ विभिन्न नुक्कड़ों पर इस बीच में बनायी गयीं।इससे नागरिकों को मदद मिली।सफाई के मामले में भी वाम को ममता ने मात दी है,कोलकाता पहले की तुलना में ज्यादा साफ रहता है,सड़कों और गलियों में बहुत रोशनी रहती है।यही रोशनी वाम शासन में कम नजर आती थी।यह स्थिति सारे राज्य की है।इसी तरह कन्याश्री योजना के तहत हर लड़की के बैंक खाते में 25हजार रूपये सरकार ने जमा कराए हैं,गरीबों को 50हजार रूपये तक की घर बनाने के लिए धनराशि गांवों में घर-घर जाकर बांटी है।हर लड़की को साइकिल मिली है,इन सब कार्यों के कारण राज्य का नक्शा बदला है।शिक्षा के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है।जो कि वाम शासन में नहीं हुआ था। इन सभी पहलुओं पर मैं फेसबुक पर पहले भी लिख चुका हूँ।कहने का तात्पर्य है कि ममता को वोट सकारात्मक कारणों की वजह से मिला है और इसके कारण ममता की गड़बड़ियों को जनता ने नजरअंदाज किया है।

मंगलवार, 17 मई 2016

हिन्दी की कब्र पर खड़ा है आरएसएस


     
आरएसएस के हिन्दी बटुक अहर्निश हिन्दी-हिन्दी कहते नहीं अघाते। वे हिन्दी –हिन्दी क्यों करते हैं ॽ यह मैं आज तक नहीं समझ पाया। इन लोगों के हिन्दीप्रेम का आलम है कि ये अभी तक इंटरनेट पर रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरे अनेक दोस्त हैं जो रोमनलिपि में हिन्दी लिखते हैं,मेरी उनसे कोई तकरार नहीं है,मेरी आरएसएस भक्तों के अंग्रेजी लिपि या फॉण्ट में हिन्दी लेखन को लेकर भी कोई आपत्ति नहीं है।भाषा को मैं स्वैच्छिक मानता हूँ,जिसकी जैसी रूचि हो,जिस तरह लिखना चाहे लिखे,भाषा में मन का स्वभाव या लिखने की आदत या बोलने की आदत की बहुत बड़ी भूमिका होती है।इसके अलावा मिश्रण का भी भाषा पर असर होता है।

फासिज्म के भाषाई जंजाल में जीने वाले आरएसएसवाले हिन्दी को शुद्ध करने की जब मुहिम चलाते हैं तो हंसी आती है,वे शुद्धभाषा,शुद्ध हिन्दी के प्रयोग पर बल देते हैं।लेकिन खुद कम से कम लिखते हैं। पर उपदेश का यह आदर्श नमूना है।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो खूब लिखो,लेकिन ट्विटर पोस्ट से अधिक तो संघी लोग लिखते नहीं हैं ! इतने कम शब्दों से हिन्दी बचने से रही !

हिन्दी या कोई भी भाषा लेखन और शिक्षा से बचती है,नारेबाजी से नहीं।हिन्दी को जनप्रिय बनाना है तो सबसे पहले आरएसएस वालों को अपने अनुयायी दुकानदारों को बोलना होगा कि माल की बिक्री करते समय जो बिल बनाएं वह हिन्दी में बनाएं।बाजार में भाषा का प्रयोग नहीं होगा तो भाषा में ताकत नहीं आएगी।इस समय बाजार की खरीद-फरोख्त अंग्रेजी में होती है।कम से कम हिन्दीभाषी दुकानदारों और खासकर आरएसएस से जुड़े दुकानदारों को हिन्दी को बचाने के लिए इसकी पहल करनी चाहिए।

फेसबुक –ट्विटर पर हिन्दी पारायण करने से हिन्दी बचने वाली नहीं है। खड़ी बोली हिन्दी दिल्ली के खत्री व्यापारियों की भाषा थी और उसका बाजार से गहरा संबंध था जिसके कारण वह आधुनिककाल में तेजी से साझा संचार की भाषा के रूप में फैली।लेकिन इन दिनों हिन्दीभाषी दुकानदारों ने अपने बही खाते की भाषा हिन्दी नहीं रखी,वस्तु के क्रय-विक्रय की भाषा हिन्दी नहीं रखी।मात्र विज्ञापनों और मुंबईया फिल्मों के जरिए हिन्दी को नहीं बचा सकते।

भाषा मीडियम है और मीडियम से मीडियम नहीं बचता।मीडियम का प्रसार होता है।मीडियम बचता है पठन-पाठन और आचरण से। आरएसएस वालों के लिए हिन्दी कभी आचरण की भाषा नहीं रही है।बल्कि सामाजिक टकराव और वर्चस्व का औजार रही है। इससे भाषा कमजोर हुई है।हिन्दीभाषा बढ़े इसके लिए जरूरी है इसके साथ जुड़ी धर्मनिरपेक्ष भाषिक-सांस्कृतिक परंपराओं को आरएसएस वाले आचरण में लाएं।यह संभव नहीं है कि हिन्दी और उसकी विचारधारा हिन्दुत्व हो।हिन्दी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा परंपरा है।हिन्दी साझे सामाजिक संघर्ष का परिणाम है।हिन्दी बचानी है तो धर्मनिरपेक्ष परंपराओं और आदतों को बचाना होगा।

भाषा कोई शाब्दिक कार्य-व्यापार नहीं है,वह एक वैचारिक कार्य-व्यापार भी है।आरएसएस के लोग जब धर्मनिरपेक्षता पर हमला करते हैं तो वे देश को कमजोर करते हैं,साथ ही हिन्दी को भी असहाय बनाते हैं।यह विलक्षण सच्चाई है कि विगत तीस सालों में आरएसएस ताकतवर बना दूसरी ओर और हिन्दी कमजोर हुई। भाषा को समृद्ध करने के लिए धर्मनिपेक्षता के सामने बिना शर्त आरएसएस को समर्पण करना होगा।उसे धर्मनिरपेक्षता के साथ तदर्थवादी-अवसरवादी रवैय्या त्यागना होगा। मसलन्, आरएसएस के लोग जब भाजपा के मंच से चुनाव लड़ेंगे तो धर्मनिरपेक्षता की औपचारिक शपथ लेंगे लेकिन आचरण और विचारधारा के रूप में धर्मनिरपेक्षता की बजाय हिन्दुत्व पर जोर देंगे।यह असल में हिन्दी की कब्र खोदने वाला काम है।





हिन्दू भारत !!


            जितनी सड़कों के नाम बदलने हों एकबार पत्र लिखकर मोदीजी को दे दो ! सब एक साथ बदल लो !यह रोज-रोज का झगड़ा खत्म करो !! देखते हैं उसके बाद क्या चाहते हो ?
राममंदिर बनाना है वह भी बना लो! जितनी मस्जिदें गिरानी हैं और मंदिर बनाने हैं,सब एक साथ बना लो ! न्यायपालिका पसंद न हो तो उसे अपदस्थ कर दो !!इसके बाद क्या करोगे ?
पाकिस्तान को खत्म करना हो तो वो भी कर लो ! अखंड भारत बनाना हो तो वो भी बना लो ! फिर क्या करोगे ? इसके बाद का तो तुम्हारे पास कोई एजेण्डा नहीं है।
रही बात शिक्षा की तो मारो एक अध्यादेश सारे विश्वविद्यालयों को वैदिक विश्वविद्यालय,योग पीठ,संत पीठ सिंहस्थ पीठ आदि में तब्दील कर दो ! वैज्ञानिकों से कहो कि वे और कहीं नौकरी ढूँढ लें! वैज्ञानिक संस्थान बंद कर दो!!कल-कारखाने बंद कर दो! प्रसाधन की सामग्री बंद कर दो !गोपीचंदन लगाना अनिवार्य कर दो!
लड़कियों से कहो वे देशी बनें,कपड़े बदलें,दर्जियों से कहो पुराने किस्म के देशी हिन्दू कपडों के सिवा और किसी तरह के कपड़े न बनाएं। मुसलमानों और ईसाईयों के कपड़े,संस्कार,आदतें,विचार ,नाम ,संगीत आदि सब बदल दो!!
सबको सिर पर चोटी रखना,यज्ञोपवीत पहनना,अनिवार्य कर दो! सब कुछ हिन्दू-हिन्दू कर दो!! हिन्दू संगीत,हिन्दू वाद्य,हिन्दू नृत्य,हिन्दू स्थापत्य,हिन्दू सड़कें,हिन्दू शहर,हिन्दू बैंक,हिन्दू टीवी,हिन्दू रेडियो ,हिन्दू सिनेमा औरहिन्दू जनता !!
चैन से रहने के लिए हिन्दू हिन्दू होना जरूरी है।हिन्दू नहीं तो चैन नहीं।
विदेशी ड्रेस,विदेशी माल,विदेशी तकनीक, विदेशी कम्युनिकेशन सब बंद कर दो,सब कुछ देशी कर दो,एकबार हम भी तो देखें देशी संघी भारत कितना सुंदर लगता है!!

RSSअंत में कहां मिलेगा ?


आरएसएस वाले कहते हैं उनको हिन्दू आतंकी संगठन मत कहो,हिन्दू फंडामेंटलिस्ट और साम्प्रदायिक संगठन मत कहो,हम तो यही कहेंगे अपनी राजनीति गतिविधियां बंद कर दो, लोग बोलना बंद कर देंगे।स्वयंसेवी संगठन की आड़ में राजनीति करोगे,अन्य किस्म की हथियारयुक्त गतिविधियां करोगे तो लोग अंगुली उठाएंगे,तुमने वायदा किया था राजनीति नहीं करोगे ,लेकिन सामाजिक संगठन होने का दावा करते हो।
तुम्हारे सदस्य फेसबुक से लेकर पीएम की कुर्सी तक संघ की राजनीति करते हैं,संघ प्रमुख राजनीतिक बयान देते रहते हैं ,जाहिर है राजनीति करोगे तो राजनीतिक गतिविधियों के आधार पर तुम्हारा नामकरण भी होगा,उससे चिढो मत,झेलो,और सामाजिक संगठन का दावा करना बंद करो।जितने भी नए नाम आरएसएस को दिए गए हैं वे गतिविधियों के कारण दिए गए हैं।
तुम अपने सदस्यों पर लगे केस हटवा सकते हो लेकिन गतिविधियों को नहीं मिटा सकते,आम जनता गतिविधियों को याद रखती है,वह मौका मिलने पर सबक भी सिखाती है।लेकिन तुमने जनता को सबक सिखाने,उसके दिलोदिमाग को प्रदूषित करने की नई कला विकसित की है,तुम समाचार चैनलों का जमकर दुरूपयोग कर रहे हो,आम जनता के मन को प्रदूषित कर रहे हो,लेकिन यह तिकड़म आम जनता धीरे धीरे समझ रही है।
कल्पना करो जनता जब समझ जाएगी तो बचकर कहां जाओगे,हिटलर को जब दुनिया समझ गयी तो उसकी क्या दशा की थी,मुसोलिनी जो तुम्हारा गुरू है,उसका इटली में नाम लेवा तक नहीं है,तुम बस यह सोचो कि मुसोलिनी-हिटलर जैसे ताकतवर नेता और उनके संगठन जब धरती से गायब हो सकते हैं तो आरएसएस को गायब होने में कितना वक्त लगेगा,जरा सोचकर देखो जनता पलटवार करेगी तो कहां जाओगे !!

सोमवार, 16 मई 2016

धार्मिक फंडामेंटलिज्म का तर्कशास्त्र


धार्मिक फंडामेंटलिज्म किसी एक धर्म के लोगों तक सीमित नहीं है बल्कि वह धर्म का आवरण के रूप में इस्तेमाल करता है।बुनियादी तौर पर इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।चूंकि ये लोग धर्म का आवरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं इसीलिए हिन्दू फंडामेंटलिज्म,इस्लामिक फंडामेंटलिज्म,क्रिश्चियन फंडामेंटलिज्म नाम से इनकी विचारधारा को सम्बोधित किया जाता है। भारत में इनमें से दो किस्म फंडामेंटलिस्ट संगठन सक्रिय हैं ये हैं हिन्दू फंडामेंटलिस्ट और इस्लामिक फंडामेंटलिस्ट।धर्म इनके लिए मुखौटा मात्र है।असल चीज है धार्मिक फंडामेंटलिज्म।धर्म के आवरण की इनको जरूरत इसलिए पढ़ती है जिससे ये अपने हिंसक कर्मों को वैध बना सकें।खासकर पुरानी मनोदशा के लोगों में अपने कुकर्मों को वैध बना सकें।धार्मिक फंडामेंटलिज्म उन लोगों को जल्दी अपील करता है जो धार्मिक नजरिए से घटनाओं को देखते हैं।फंडामेंटलिस्ट संगठन अपने हिंसक लक्ष्यों के लिए धर्म का राजनीतिक उपयोग करते हैं।

         धार्मिक फंडामेंटलिज्म का लोकतांत्रिक संविधान ,धर्मनिरपेक्षता,न्यायपालिका आदि में कोई विश्वास नहीं है,वे बुनियादी तौर पर हाशिए के लोगों और औरतों के हकों और मानवाधिकारों पर हमले करते हैं। वे आधुनिकता से नफरत करते हैं और उसके विकल्प के रूप में धार्मिक मान्यताओं को थोपते हैं।उनको अन्य धर्म की मान्यताओं और विश्वासों से भी गहरी चिढ़ है,इसलिए वे अन्य धर्म को सहन नहीं कर पाते।वे अपने सामाजिक और वैचारिक आधार के विकास के लिए पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों का जमकर प्रयोग करते हैं।इनके आधार पर समाज को नियमित और नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं,जो व्यक्ति उनके विचारों को नहीं मानता या विरोध करता है उसको हिंसक तरीकों से शांत करने या मार देने की कोशिश करते हैं।धार्मिक फंडामेंटलिस्ट बुनियादी तौरपर हिंसक होते हैं।वे अपने प्रभाव विस्तार के लिए वाचिक-कायिक हिंसा का जमकर प्रयोग करते हैं।इनकी बुनियादी समझ है कि बुनियादी मानवाधिकार तो धार्मिक फंडामेंटलिज्म के खिलाफ हैं।इसलिए हर स्तर पर इनका विरोध करो।

रविवार, 15 मई 2016

गरीब के पांच स्टीरियोटाइप –

        गरीबी समस्त सामाजिक विपदा की जड़ है।गरीबी को आमतौर पर हम देखकर भी अनदेखा करते हैं या फिर उसके स्टीरियोटाइप रूप से बंधकर सोचते हैं।मीडिया के प्रचार ने हमारे मन में गरीब विरोधी धारणाएं बिठा दी हैं।ये सभी धारणाएं विभिन्न किस्म के स्टीरियोटाइप के जरिए मन में आती हैं। गरीब को लेकर पहला स्टीरियोटाइप तो यही है कि गरीब पढ़ना नहीं चाहता,शिक्षा को महत्व नहीं देता।इस तरह के स्टीरियोटाइप में गरीबों के बच्चों का स्कूल न जाना,मिड डे मिल के लिए स्कूल जाना,बीच में ही पढ़ाई छोड़ देना आदि चीजें हैं जो इस स्टीरियोटाइप को पुख्ता बनाते हैं।इस स्टीरियोटाइप को बनाने में गरीब के परिवार की भी भूमिका है,गरीब के परिवार की यह स्थिति नहीं होती कि वह अपने बच्चे का ठीक से ख्याल रख सके,उसके शैक्षणिक कार्य-व्यापार पर नजर रख सके।गरीब की पढ़ने में रूचि नहीं है यह स्टीरियोटाइप तुरंत नष्ट हो जाए यदि गरीब का परिवार बच्चे पर नजर रखे,उसके शिक्षा संबंधी कार्य-व्यापार में शिरकत करे।शिक्षा का संबंध सिर्फ स्कूल से ही नहीं है उसमें परिवार की बहुत बड़ी भूमिका है। गरीब यदि शिक्षा के प्रति उपेक्षा भाव व्यक्त कर रहा है तो उसका कारण यह नहीं है कि वह पढ़ना नहीं चाहता या बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहता,उसका प्रधान कारण है उसकी दयनीय आर्थिक दशा,जिसके कारण वह दो-जून की रोटी जुटाने में ही उलझा रहता है,उस समय उसके सामने अस्तित्व रक्षा का सवाल ही प्रमुख होता है।उसकी समस्या यह है कि वह अपनी और बच्चों की जान बचाए या पढ़ाए। गरीबों में एक वर्ग वह है जिसकी न्यूनतम आय है लेकिन फिर भी वह बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाता,क्योंकि स्कूल भेजने के संसाधनों का उसके पास अभाव है।कोशिश हो कि सरकार इस मामले में पहल करके गरीबों के बच्चों को स्कूल पहुँचाने में मदद करे।

गरीबों के बारे में दूसरा स्टीरियोटाइप यह है कि वे आलसी होते हैं।सच इसके विपरीत है।वे आलसी नहीं होते।बल्कि इस तरह का प्रचार उनके मनोबल को तोड़ता है।बल्कि यह देखा गया है कि गरीब लोग ज्यादा सक्रिय होते हैं,चुस्त होते हैं।तीसरा स्टीरियोटाइप है कि गरीब नशा करता है।सच यह है खाए-अघाए लोग नशा ज्यादा करते हैं,गरीब तुलनात्मक तौर पर कम नशा करते हैं।नशे की लत उनमें पैदा की जाती है जिससे वे हमेशा गरीब बने रहें।गरीबों के बारे में चौथा मिथ है कि वे संप्रेषण के मामले में कमजोर होते हैं।हम उनको इस रूप में इसलिए देखते हैं क्योंकि हम भाषा को अस्मिता का आधार बनाकर देखते हैं।गरीब के पास सुसंस्कृत भाषा नहीं होती,लेकिन लोकल भाषा का अक्षय भंडार होता है,जिसका शिक्षितों में अभाव होता है।गरीबों के बारे में पांचवां स्टीरियोटाइप यह है कि वे अभिभावक के रूप में बहुत खराब अभिभावक होते हैं।सच यह नहीं है ।गरीब एक अभिभावक के रूप में सजग रहता है लेकिन बच्चों की स्वतंत्रता को मान्यता देता है।उसके पास स्थान का अभाव होता है जिसके कारण वह बच्चों को घर में पर्याप्त समय नहीं दे पाता। वे अपने बच्चों की बुनियादी जरूरतों के प्रति बेहद सचेत और सतर्क होते हैं और यथासंभव हिदायतें भी देते रहते हैं कि क्या करो और क्या न करो।



समस्या यह है कि हम स्टीरियोटाइप ढ़ंग से गरीबों को देखना कब बंद करते हैं।गरीबों को स्टीरियोटाइप नजरिए से देखने की बजाय मित्रवत नजरिए से देखें तो सामाजिक भेदभाव और अलगाव को कम करने में मदद मिलेगी,वरना स्टीरियोटाइप नजरिया तो भेदभाव बढ़ाता है।

शनिवार, 14 मई 2016

स्टीरियोटाइप से निकलकर देखो



फेसबुक पर स्टीरियोटाइप लेखन खूब है।जाति ,धर्म,राजनीति और लिंगाधारित स्टीरियोटाइप ने समूचे संचार को घेरा हुआ है,हम उससे भिन्न संचार की कभी चर्चा ही नहीं करते।जो जिस पर लगा है वह उसी पर लगा है।इसने संचार में रूढ़िबद्धता को जन्म दिया है।संप्रेषण के मामले में हमें स्टीरियोटाइप बनाया है। जो मोदी विरोधी हैं वे मोदी विरोध पर ही केन्द्रित हैं,जो साहित्य पर केन्द्रित हैं वे लगातार साहित्य पर लिख रहे हैं,जो दलित केन्द्रित हैं वे हमेशा दलितों के सवालों पर ही लिख रहे हैं,जो मोदी भक्त हैं वे मोदीभक्ति में ही हमेशा डूबे रहते हैं।जो समलैंगिक हैं वे उसी मसले पर चिपके पड़े हैं,जो जेएनयू केन्द्रित हैं वे सिर्फ जेएनयू के मसले पर ही ध्यान लगाए बैठे हैं।कायदे से संप्रेषण में इस तरह के रूढ़िबद्ध दायरे टूटने चाहिए लेकिन हो उल्टा रहा है।रूढ़िबद्धता बढ़ रही है।इससे वैचारिक तौर पर फंडामेंटलिज्म को मदद मिलती है।विकल्प की राजनीति के विकास में बाधाएं पैदा होती हैं। रूढिबद्ध संप्रेषण वस्तुतःनिरर्थक संप्रेषण है,वह विकल्प के रूपों के बारे में सोचने ही नहीं देता।फेसबुक सेलेकर मीडिया तक रूढिबद्धता का फलक इतना व्यापक है कि हम भिन्न चीजों पर सोचना बंद कर देते हैं। प्रचलित रूढिबद्ध विषयों पर लिखकर हम सब जाने- अनजाने सर्जनात्मकता विरोधी संचार करते हैं।एक अवस्था के बाद इसके गर्भ से कु-कम्युनिकेशन जन्म लेता है।

कीर्तन ,संस्कृति और राजनीति


       
कीर्तन-भजन हमारा समाज कब से कर रहा है यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल है।भजन के लिए पवित्र मंत्र चाहिए।जबकि कीर्तन के लिए संगीत और लय चाहिए।भजन अकेले की साधना है ,जबकि कीर्तन सामूहिक आनंद है।कीर्तन बुनियादी तौर पर शास्त्रीय संगीत का विकल्प है।शास्त्रीय संगीत में गायक प्रमुख है। जबकि कीर्तन एकल नहीं सामूहिक होता है।शास्त्रीय संगीत में गायक-श्रोता आमने-सामने होते हैं। उनमें विभाजन या अंतराल बना रहता है।जबकि कीर्तन में श्रोता की भिन्न स्थिति नहीं होती।बल्कि कीर्तन में वह शामिल होता है।गायक-श्रोता का वर्गीकरण कीर्तन के लिए बेमानी है।

शब्द का अपना इतिहास होता है,मंशा होती है और उससे जुड़ी राजनीति भी होती है।मजदूरों की बस्ती में जब कीर्तन होता है तो उसका लक्ष्य वही नहीं रहता जो मन्दिर में होने वाले कीर्तन का है।कईबार दंगों के पहले कीर्तन का आयोजन करके दंगों के लिए माहौलबनाया गया है।अपराधी लोग अपने को पुण्यात्मा के रूप में स्वीकृति दिलाने के लिए कीर्तन कराते हैं।इस नजरिए से देखें तो कीर्तन का अर्थ संदर्भ और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।फलतःकीर्तन भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भिन्न अर्थ की सृष्टि करता है।नए विमर्शों को जन्म देता है।

हिन्दीभाषी क्षेत्रों से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तरपूर्व के राज्यों तक कीर्तन के अनेक रूप प्रचलन में हैं।कीर्तन की विशेषता है किसी मंत्र विशेष का संकीर्तन।जैसे-हरे राम हरे राम ,राम राम हरे हरे,हरे कृष्णा हरे कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा हरे हरे।यह वैष्णव सम्प्रदाय का जनप्रिय कीर्तन है।इन दिनों इस कीर्तन में पश्चिम और पूर्व का सम्मिश्रण खूब हो रहा है।हरे राम हरे कृष्णा सम्प्रदाय से लेकर श्रीश्री रविशंकर आदि तमाम धार्मिक गुरूओं के यहां कीर्तन के सम्मिश्रित रूपों को आसानी से देखा जा सकता है। कीर्तन में मंत्र,शरीर, और संगीत लय इस कदर गुंथे होते हैं कि उनसे निकलकर सोचना असंभव होता है।



कीर्तन में नाद का आनंद और उन्माद अंतर्ग्रथित है।अंतमें शिरकत करने वाले के पास कीर्तन की स्मृति मात्र रह जाती है।कीर्तन ने संगीत प्रस्तुति के प्रभुत्वशाली रूपों को चुनौती दी है और शिरकत के भावबोध को जन्म दिया है। कीर्तन में हर कोई शिरकत कर सकता है।इस अर्थ में कीर्तन सेकुलर है। प्रिफॉर्मर और श्रोता के बीच के भेद को कीर्तन खत्म कर देता है।कीर्तन में हर कोई अपनी लय,भाव,भाषा और भंगिमा के साथ शिरकत करता है।कीर्तन में कोई भी गीत या मंत्र बार-बार दोहराया जाता है और पुनरावृत्ति के क्रम में ही संगीत की लय में एकता और आनंद की सृष्टि होती है।पुनरावृत्ति समर्पण और धर्मनिरपेक्ष भावबोध निर्मित करती है।इस अर्थ में कीर्तन धर्मनिरपेक्षीकरण का महत्वपूर्ण औजार है। कीर्तन में शरीर,शब्द और गीतात्मक ये तीनों मिलकर नए परिवेश और अनुभूति की सृष्टि करते हैं।यह प्रक्रिया अशिक्षित-शिक्षित में अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है,ध्वनि और शब्द की अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है।इसमें अंतर्निहित द्वयार्थात्मकता भी अपना खतरनाक खेल खेलती है।अभी तक हम मानते रहे हैं कि शब्द सबसे ताकतवर होता है,हठात कीर्तन हमें यह बोध देता है लय और नाद ताकतवर होते हैं। वेद की ऋचाओं के पाठ के जरिए नाद की जो परंपरा आरंभ हुई वह सचेत रूप से कीर्तन में चली आई है,उसी तरह वैदिक ऋचाओं का पाठ जिस नाद की सृष्टि करता है वह ऋचाओं में निहित अर्थ को छिपाने का काम करता है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए और सवाल उठाना चाहिए कि कीर्तन की मंशा क्या है ॽ विचारधारा क्या है ॽविचारधारा का संबंध मंशा से है।आयोजक कौन है और किसलिए आयोजन किया जा रहा है ॽऔर किस स्थान पर आयोजन किया जा रहा हैॽ ये सवाल कीर्तन से गहरे जुड़े हैं,इनके आधार पर कीर्तन की विचारधारा को रेखांकित करने में मदद मिल सकती है।

औरत के हक में और संशय के प्रतिवाद में


      फ़ेसबुक से लेकर मासमीडिया तक , नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक औरतों के प्रति संशय और संदेह का वातावरण बन रहा है । औरत हो या पुरुष किसी पर भी संदेह या संशय के आधार पर बातचीत नहीं करनी चाहिए ।मानवीय सभ्यता के विकास में मानवीय भरोसे और विश्वास की बड़ी भूमिका रही है। कभी-कभार इन संबंधों में विपर्यय भी देखा गया है।औरतों में बहुत छोटा किंतु नगण्य अंश है जो विश्वासघात भी करता रहा है । यह पहले भी था और आगे भी रहेगा ।

मानवीय संबंध स्त्री-पुरुष संबंधों के बिना नहीं बनते । नए युग में इन संबंधों का स्वरुप नए ढंग और तरीक़े से बनाना होगा । नए मानवीय मूल्यों को औरतें भी अर्जित कर रही हैं ।वे निडर होकर जीने की कोशिश कर रही हैं ,हमें उनकी इस कोशिश में हर संभव मदद करनी चाहिए ।औरत निडर और आधुनिक बनेगी तो वह हमारी पुरानी आस्थाओं को तोड़ेगी और चुनौती भी देगी ।हम सभी लोग औरत के इस नए परिवर्तन को समझ नहीं पा रहे हैं ।

औरत बदलती है तो सबसे पहले पुरानी आस्थाएँ टूटती हैं , औरत का पुराना स्टीरियोटाइप टूटता है । इस क्रम में अनेक मर्दों और औरतों को त्रासदियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।औरत का बदलना और समाज में निडर होकर घूमना, बातें करना , मिलना -जुलना , मित्रों के साथ शाम गुज़ारना , पुरुष के साथ निडर होकर घुलना-मिलना सामान्य और सही प्रवृत्ति है।औरत जितनी निडर होगी समाज में पोंगापंथ , साम्प्रदायिकता, फंडामेंटलिज्म, लिंगभेद उतना ही कम होगा या इन सबसे लड़ने में मदद मिलेगी ।

औरत के साथ नए युग के अनुसार हमें व्यवहार करना सीखना होगा । औरत के प्रति संशय या संदेह मूलतः पितृसत्तात्मकता की अभिव्यक्ति है । पितृसत्ता की विचारधारा सामाजिक विकास में सबसे बड़ी बाधा है । पितृसत्ता तो समाजवाद, पूँजीवाद की भी अम्मा है ।हिंदी में कहावत है चोर को न मारो चोर की अम्मा को मारो। लिंगभेद या औरत के प्रति अविश्वास की अम्मा है पितृसत्ता । यह बेहद बारीक ढंग से काम करती है और इसके रुपों से लड़ने के लिए बेहद सतर्क प्रयासों की ज़रुरत है ।

पितृसत्ता का महान गुण है कि वह स्वयं पर संदेह करना नहीं सिखाती । हम सब में पितृसत्ताप्रेम वैचारिक तौर पर कूट-कूटकर भरा है । औरत जब घर से निकलती है , अपने दुख सार्वजनिक करती है या सुख की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करती है तो पितृसत्ता को धक्का लगता है और यही धक्का हम अपने अंदर महसूस करते हैं और काँपने लगते हैं , औरत पर संदेह करने लगते हैं ।

औरतों की हाल में जितनी भी सही-ग़लत शिकायतें आई हैं वे पितृसत्ता को कमज़ोर कर रही हैं और इस प्रक्रिया को किसी भी क़ीमत पर रुकना नहीं चाहिए । इस प्रक्रिया में अनेक श्रेष्ठ पुरुषों की बलि भी चढ़ेगी और यह अस्वाभाविक नहीं है । जिनको हम महान,निष्कलंक और निर्दोष मान रहे हैं उनके पितृसत्तात्मकता अपराधों को अपराध नहीं मानते उलटे पुण्य कार्य या सही काम मानते हैं । औरत का हर एक्शन पुरुष की महानता का निषेध है । पितृसत्ता को धराशायी करने वाली सबसे बड़ी बाधा यही महान श्रेष्ठ लोग हैं जो विभिन्न रंगतों और विचारधाराओं में हमारे बीच वैचारिक वैधता का आदर्श लिए खड़े हैं ।

औरत का सामान्य जीवन , सामान्य आचरण परिभाषित करने के लिए औरत के नज़रिए से चीज़ों को देखने की आदत विकसित करनी होगी । हमारे मीडिया का वर्चस्वशाली विमर्श ,चैटिंग,फ़ेसबुक कमेंट्स आदि पूरी तरह पितृसत्तात्मकता के आवरण में आ रहे हैं । औरत का हर एक्शन इस आवरण को छिन्न- भिन्न करता है । वह जब भी बोलती है तो पितृसत्ता को कमज़ोर करती है ,वह जब पुरुषों से सार्वजनिक या निजी तौर पर मिलती है तो अपना स्पेस बना रही होती है ।

औरत की समस्या है कि उसके पास भारत में निजी स्पेस और सार्वजनिक स्पेस बहुत कम है।औरत के लिए निजी और सार्वजनिक स्पेस के अभाव को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया । नई सक्रिय औरत अपनी नई दुनिया रच रही है । जिसमें वह क्रमश: वर्जनाओं और सामाजिक बंदिशों से लड़ रही है । इधर दो दशकों में औरतों पर ख़ासकर शिक्षित औरतों पर हमले तेज़ी से बढ़ें हैं । वह जब इनका प्रतिवाद करती है तो तरह तरह के बहाने खोजकर हमलोग औरत को दोषी ठहराने या फिर उदार मूल्यों पर ही हमले करने आरंभ कर देते हैं ।

भारत के विकास के लिए औरत पर अविश्वास करने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर संशय के नज़रिए से सोचने की ज़रुरत नहीं है । औरत पर अविश्वास करनासामाजिक विकास के चक्र को उलटी दिशा में मोड़ना है ।ठगने ,झूठ बोलने या छल का काम औरत करें या मर्द करें हमें सतर्क रहना चाहिए और प्रतिवाद करना चाहिए । कोई औरत झूठे इल्ज़ाम लगाए तो झूठे इल्ज़ाम का विरोध करो , औरतों के ख़िलाफ़ संशय पैदा मत करो । क़ानून में इस तरह के प्रावधान होने चाहिए जिससे ग़लत इल्ज़ाम लगाने पर औरत को भी दण्डित किया जा सके । मौजूदा दौर में अनेक मामलों में औरतों के द्वारा ग़लत आरोपों के संगीन मामले सामने आए हैं और इस तरह के मामलों में क़ानूनी प्रक्रिया की मदद ली जानी चाहिए ।

औरत की सामाजिक बराबरी की लड़ाई का यह सबसे कठिन दौर है । औरत का आज जितने बडे कैनवास में सामाजिक एक्सपोजर हो रहा है उतना पहले कभी नहीं हुआ । फलत: हम आए दिन नई स्त्री समस्याओं और चुनौतियों से दो-चार हो रहे हैं । इस प्रक्रिया से किनाराकशी या इसे रोकने के प्रयास निश्चिततौर पर असफल होंगे। औरत घर से निकली है तो वह अपने रास्ते , अपना संसार भी बनाएगी और इस काम में हम सबको औरत पर विश्वास और मित्रता का भाव बनाए रखना होगा । आज औरत को संरक्षक की नहीं मित्र की ज़रुरत है । हमारे मन में बैठा यही संरक्षक भाव औरत की नई हक़ीक़त को समझने में बाधाएँ पैदा कर रहा है । औरत की नई हक़ीक़त को मित्रभाव से ही समझ सकते हैं और यहपरिवर्तन हमें अपने व्यवहार में करना पड़ेगा ।

भारत में स्त्री और सामाजिक समूहों के साथ दो तरह का भेदभाव और शोषण पाया जाता है, पहला ,सामाजिक शोषण और भेदभाव के रुप में है ,और दूसरा ,केजुअल शोषण और भेदभाव है । केजुअल शोषण और भेदभाव भी उतना खराब और निंदनीय है जितना सामाजिक भेदभाव और शोषण। इस केजुअल भेदभाव का एक रुप साम्प्रदायिक-अंधक्षेत्रीयतावादी नजरिए में भी व्यक्त होता रहता है । हम मुसलमानों और अन्य समूहों के प्रति हंसी-मजाक में अपनी भेददृष्टि को व्यक्त करते रहते हैं । खासकर मीडिया में यह रुप व्यापक है। मीडिया ( फिल्म,टीवी और अखबार के कार्टून सीरीज) ने केजुअल भेदभाव को वैध बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है। भेदभाव किसी भी रुप में हो केजुअल हो या अन्य रुप में हो वह स्वीकार्य नहीं है । अफसोस यह है कि हम केजुअल भेदभाव के प्रति अभी तक सचेत नहीं हो पाए हैं ।

यह सच है पुराने कानून में अनेक स्त्री विरोधी प्रावधान रहे हैं लेकिन हमारे यहां कानूनी संतुलन को असंतुलन में बदलने की कला में अ-सामाजिक तत्व सफल रहे हैं । कानून जेण्डर संतुलन और संरक्षण के साथ काम करे,इसके लिए कानून के दुरुपयोग को रोकने वाली सामाजिक-राजनीतिक संरचनाएं बनायी जाएं । साथ ही अपराधी बचने न पाएं और जल्दी न्याय हो । सरकार सारे कर्म करने के बावजूद जल्द न्याय की व्यवस्था करने में असफल रही है ।औरतों की राय को परम पवित्र मानने वाले भारतीय फेमिनिस्टों को जरा औरतों के बारे में यूरोप की फेमिनिस्टों की राय पर भी गौर करना चाहिए। औरत के नाम पर अंधा विमर्श या स्त्री फंडामेंटलिज्म वस्तुतः स्त्री विरोधी है । भारत की स्त्री अधिकार रक्षक संस्थाएं और विदुषियां भारतीय औरतों की नकारात्मक और समाज विरोधी धारणाओं की कभी आलोचनाएं नहीं लिखतीं यह त्रासद है।





चैनलों का पागलपन


         
टीवी चैनलों की खबरें और टॉकशो यही संदेश देते हैं कि हमारे देश का मीडिया इरेशनल और पगलाए लोगों के हाथों में कैद है। किसी व्यक्ति विशेष या चर्चित व्यक्ति के नाम का अहर्निश प्रसारण पागलपन है।एक जाता है दूसरा आता है। पहला पागल तब तक रहता है जब तक दूसरा पागल मिल नहीं जाता । यह मीडिया पागलपन है। हमें जनता की खबरें चाहिए,पागलों की खबरें नहीं चाहिए। यदि यह रिवाज नहीं बदला तो समाचार टीवी चैनलों को पागल चैनल कहा जाएगा।टीवी पागलपन वस्तुतः मीडिया असंतुलन है ।मीडिया अपंगता है ।मीडिया संचालक अपने को समाज का संचालक या जनमत की राय बनाने वाला समझते हैं। सच इसके एकदम विपरीत है। अहर्निश प्रसारणजनित राय निरर्थक होती है। और चिकित्साशास्त्र की भाषा में कहें तो पागल की बातों पर कोई विश्वास नहीं करता । उन्मादी प्रसारण राय नहीं बनाता बल्कि कान बंद कर लेने को मजबूर करता है ।

मीडिया पागलपन के तीन सामयिक रुप "मोदी महान","कांग्रेस भ्रष्ट" और "विपक्ष देशद्रोही "। टीवी वालो खबरें लाओ। एक बात का अहर्निश प्रसारण खबर नहीं है। चैनलों को देखकर लगेगा कि भारत गतिहीन समाज है। यहां इन तीन के अलावा और कुछ नहीं घट रहा !भारत गतिशील और घटनाओं और खबरों से भरा समाज है।चैनल चाहें तो हर घंटे नई खबरें दिखा सकते हैं। लेकिन पागल तो पागल होता है !एक बात पर अटक गया तो अटक गया !!

टीवी एंकर अपने को समाज का रोल मॉडल समझते हैं और टॉक शो में उनकी भाव-भंगिमाओं को देखकर यही लगेगा कि इनका ज्ञान अब निकला ! लेकिन ज्ञान निकलकर नहीं आता ! वहां सिर्फ एक उन्माद होता है जो निकलता है । उन्माद का कम्युनिकेशन हमेशा सामाजिक कु-संचार पैदा करता है । यह एंकर की ज्ञानी इमेज नहीं बनाता बल्कि उसकी इमेज का विलोम तैयार करता है एंकर ज्ञानी कम और जोकर ज्यादा लगता है । उससे दर्शक खबर या सूचना की कम उन्मादी हरकतों की उम्मीद ज्यादा करता है । अब लोग टीवी खबरें और टॉक शो पगलेपन में मजा लेने के लिए खोलते हैं । हमारे समाज में पागल लंबे समय से सामाजिक मनोरंजन का पात्र रहा है। पागल के प्रति समाज की कोई सहानुभूति नहीं रही है ।न्यूज मीडिया में अचानक यह फिनोमिना नजर आ रहा है कि "हम तो अर्णव गोस्वामी जैसे नहीं हैं"।"सारा मीडिया भ्रष्ट नहीं है। " ´’सब चीखते नहीं हैं”अब इन विद्वानों को कौन समझाए कि मीडिया पर संस्थान के रुप में ध्यान खींचा जा रहा है,यह निजी मामला नहीं है।

मीडिया कैसा होगा यह इस बात से तय होगा कि राजनीति कैसी है ॽ राजनीतिकतंत्र मीडिया के बिना रह नहीं सकता और मीडिया राजनीतिकतंत्र के बिना जी नहीं सकता । ये दोनों एक -दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़े हैं।जब राजनीति में ईमानदारी के लिए जगह नहीं बची है तो मीडिया में ईमानदारी के लिए कोई जगह नहीं होगी।भारत की राजनीति इस समय रौरव नरक की शक्ल ले चुकी है। ऐसे में निष्कलंक मीडिया संभव नहीं है।राजनीति जितनी गंदी होती जाएगी,मीडिया भी उतना गंदा होता जाएगा।

राजनीति की गंदगी से मीडिया तब ही बच सकता है जब वह खबरें खोजे,राजनीति और राजनीतिकदल नहीं।हमारे मीडिया ने खबरें खोजनी बंद कर दी हैं। राजनीतिक संरक्षक-मददगार खोजना आरंभ कर दिया है। फलतः मीडिया में खबरें कम और दल विशेष का प्रचार ज्यादा आ रहा है।यह मीडिया गुलामी है ।

टीवी चैनलों के टॉकशो में आने वाले लोग हैं राजनेता,बैंकर,वकील,राजनयिक, सरकारी अफसर आदि हैं। ये सारे लोग झूठ बोलने की कला में मास्टर हैं। मीडिया की नजर में ये ही ओपिनियनमेकर हैं ।इनमें अधिकांश मनो- व्याधियों और कुंठाओं के शिकार और गैर-जिम्मेदार होते हैं।मीडिया" इनकी खबर को जनता की खबर", "इनकी राय को जनता की राय"।"इनके सवालों को जनता के सवाल " बनाकर पेश कर रहा है।इस तरह के लोग जब मीडिया में जनमत की राय बनाने वाले होंगे तो सोचकर देखिए समाज में किस तरह की राय बनेगी ? मनो-व्याधियों के शिकार की राय कभी संतुलित और सही नहीं होती । वह खुद बीमार होता है और श्रोताओं को भी बीमार बनाता है । यही वजह है आम लोगों में टॉकशो को लेकर बहुत खराब राय है। त्रासद बात यह है कि मनोव्याधिग्रस्त ये लोग अपनी तमाम व्याधियों को सामाजिक व्याधि बना रहे हैं। वे स्वयं सत्तासुख पाने के लिए राय देते हैं और "जनता में भी सत्तासुख असली सुख है" .यही भावबोध पैदा करने में सफल हो जाते हैं ।

जबकि सच यह है जनता के भावबोध,दुख,सुख और खबरें अलग हैं और उनका टीवी मीडिया में न्यूनतम प्रसारण होता है। अधिकांश समय तो ये मनोव्याधिग्रस्त लोग घेरे रहते हैं।इसी अर्थ में न्यूज चैनल पागलचैनल हैं।

टीवी वाले बताते रहते हैं कि ईमानदार लोगों को सत्ता में आना चाहिए । सवाल ईमानदार लोगों के सत्ता में आने का नहीं है। सवाल यह है कि ताकतवर लोगों को, सत्ताधारीवर्ग के लोगों की शक्ति को कैसे कम किया जाय़ ।सवाल यह नहीं है कि अरविंद केजरीवाल लाओ, सवाल यह है कि कांग्रेस-भाजपा आदि दल जो सीधे सत्ताधारीवर्गों की नुमाइंदगी करते हैं उनको कैसे रोका जाए।

हत्यारा हत्याएं करता है। लेकिन कारपोरेट घराने,राजनेता, और धार्मिक मनोव्याधिग्रस्त लोग अर्थव्यवस्था और समाज को नष्ट करते रहते हैं ,और टीवी चैनल इनका महिमामंडन करते रहते हैं ।

कपिल के लाफ़्टर शो कार्यक्रम में औरतों पर वल्गर हमले हो रहे हैं । दादी, भुआ आदि की तो शामत आई हुई है । यह कैसा मनोरंजन है जिसमें औरत को निशाना बनाना पड़े ।घिन आती है ऐसे हास्य पर ।टीवी पर चुनाव की चौपालें अर्थहीन हंगामों में बदल दी गयी हैं । कमाल है !कारपोरेट हस्तक्षेप का !!

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मीडिया और फेसबुक मेँ वाक्य-वीर यौन शोषण पर खूब शब्द खर्च करते हैं, लेकिन श्रमिक या मीडियाकर्मी के शारीरिक और बौद्धिक शोषण पर चुप रहते हैँ.इन शब्दवीरोँ को यौन शोषण के अलावा शोषण के अन्य रुप नजर क्यों नहीं आते ?मीडिया मेँ स्त्री का शारीरिक शोषण गलत है, उससे भी ज्यादा मीडिया मेँ श्रम का शोषण होता है,यौन उत्पीडन का जो विरोध कर रहे हैँ वे मीडियाकर्मियों के शोषण पर बहादुरी से बोलते नहीं हैँ.यौन-उत्पीडन तो मीडिया मेँ चल रहे बृहद शोषण का छोटा अंश है.



शुक्रवार, 13 मई 2016

भक्त प्रोफेसरों के प्रतिवाद में -

           जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल की बैठक में शिक्षकों ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है वह हम सबके लिए गौरव की बात है।इससे देश के प्रोफेसरों को सीखना चाहिए। जेएनयू के शिक्षकों ने अपने संघर्ष और विवेक के जरिए जेएनयू कैंपस के लोकतांत्रिक परिवेश और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत किया है।हमारे देश के विश्वविद्यालयों के अधिकांश प्रोफेसर यह भूल गए हैं कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व तब तक है जब तक विश्वविद्यालय स्वायत्त हैं।प्रोफेसर अपने पेशे के अनुरूप आचरण करें।लेकिन हमारे अधिकांश प्रोफेसरों ने अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु विश्वविद्यालय के स्वायत्त स्वरूप पर हमलों को सहन किया ,हमलों में मदद की ,इसके कारण राजनेताओं और मंत्री का मन बढ़ा है।इस तरह के प्रोफेसरों को ´भक्त प्रोफेसर´ कहना समीचीन होगा। प्रोफेसर का पद गरिमा और बेहतरीन जीवनमूल्यों से बंधा है उसकी ओर भक्तप्रोफेसरों ने आलोचनात्मक ढ़ंग से देखना बंद कर दिया है।वे शासन की भक्ति में इसकदर मशगूल हैं कि उनको देखकर प्रोफेसर कहने में शर्म आती है,इस तरह के ´भक्तप्रोफेसरों´ की स्थिति गुलामों जैसी है।हमें हर हाल में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए और विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर स्वायत्तता,अकादमिक स्वतंत्रता और अकादमिक गरिमा के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।

हमारे सामने नमूने के तौर पर दिल्ली के दो विश्वविद्यालय हैं और वहां दो भिन्न किस्म के रूख प्रोफेसरों के नजर आ रहे हैं।जेएनयू में शिक्षकसंघ लोकतांत्रिक हकों के पक्ष में खड़ा है और लड़ रहा है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और डीयू के अधिकांश प्रोफेसरों का रवैय्या चिंता पैदा करने वाला है।स्मृति ईरानी ने आदेश दे दिया है कि दिविवि की अकादमिक कौंसिल की बैठक का एजेण्डा पहले मंत्रालय से स्वीकृत कराओ उसके बाद अकादमिक परिषद की बैठक करो,कोई फैसला लेने के पहले मंत्री से अनुमति लो।यह सीधे डीयू की स्वायत्तता पर हमला है लेकिन भक्तप्रोफेसर चुप हैं,वे चुप क्यों हैं ॽ शिक्षकसंघ चुप क्यों है ॽकोई जुलूस या धरना इस आदेश के खिलाफ क्यों नहीं निकला ॽ क्या इस तरह चुप रहकर विवि की स्वायत्तता की रक्षा होगी ॽ पीएम की डिग्रियों को लेकर विवाद हो रहा है लेकिन दिविवि शिक्षक संघ चुप है ॽकौन रोक रहा है प्रतिवाद करने से ॽ हमें शिक्षक संघों को निहित स्वार्थी घेरेबंदी से बाहर निकालना होगा। हमें प्रोफेसर की मनो-संरचना में घुस आई भक्ति को नष्ट करना होगा।इस भक्ति का ज्ञान से बैर है।यह भक्ति वस्तुतःनए किस्म की गुलामी है जिसे हम विभिन्न रूपों में जीते हैं।

उस मनो-संरचना के बारे में गंभीर सवाल खड़े करने चाहिए जिसमें जिसमें विवि के प्रोफेसर रहते हैं। प्रोफेसर का पद स्वतंत्र और स्वायत्त चिंतनशील नागरिक का पद है।इस पद को हमने तमाम किस्म के दबाव-अनुरोध-मित्रता और निहित स्वार्थी राजनीतिक पक्षधरता का गुलाम बना दिया है।अब हमारे प्रोफेसरों को स्वतंत्र और स्वायत्त विचार पसंद नहीं हैं, अनुगामी विचार पसंद हैं।हमें बस्तर के माओवादियों की जंग तो अपील करती है लेकिन विवि में उपकुलपति के अ-लोकतांत्रिक फैसले नजर नहीं आते।मंत्री के हमले देखकर हमारा खून नहीं खौलता।ये असल में भक्त प्रोफेसर हैं,जो हर हाल में वीसी के भक्त बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं।

हमने प्रोफेसर के नाते किसी न किसी राजनीतिकदल के लठैत का तमगा अपने सीने पर चिपका लिया है।प्रोफेसर जब अपने शिक्षा के काम को राजनीतिक दल के लक्ष्यों के अधीन बना देता है तो वह वस्तुतःआत्महत्या कर लेता है।यही वह बुनियादी बिंदु है जहां से स्वायत्तत प्रोफेसर का अंत होता है और भक्त प्रोफेसर जन्म लेता है। भक्त प्रोफेसर ´ पर उपदेश कुशल बहुततेरे´ की धारणा से ऊपर से नीचे तक लिपा-पुता होता है।इन लोगों ने ही अकादमिक गरिमा,स्तर,मूल्य आदि की गिरावट में बहुमूल्य योगदान किया है।भक्त प्रोफेसर शिक्षा में कैंसर हैं।वे स्वयं को नष्ट करते हैं,छात्रों को नष्ट करते हैं और विवि की स्वायत्ता को भी नष्ट करते हैं।





फेक डिग्रियों के खेल में-


          पी एम नरेन्द्र मोदी की बीए,एमए की डिग्री के मामले पर डीयू के रजिस्ट्रार ने जिस तरह का बयान दिया है वह बताता है कि मोदीजी की डिग्रियां फेक हैं।रजिस्ट्रार का कहना है नाम और वर्ष की त्रुटियां सामान्य बात है।रजिस्ट्रार गलत कह रहे हैं,किसी भी छात्र के प्रमाणपत्र और अंकतालिका में ये त्रुटियां पकड़ी जाने पर आपराधिक मामला बनता है।वि.वि.संबंधित छात्र पर केस करता है या फिर उसे दाखिला नहीं देता।दूसरी बात नाम और वर्ष की त्रुटियों को तो प्रकारान्तर से रजिष्ट्रार ने मान लिया है,ऐसे में मोदीजी की डिग्रियां फेक है।डीयू के वीसी ने रजिस्ट्रार के बयान से अपने को पृथक रखा है,यानी डिग्री फेक हैं।असल में,  मोदीजी को अपनी डिग्रियों का मूल रूप दिखाना चाहिए।गुजरात वि वि और दिल्ली विवि के मौजूदा प्रशासन को इस बीच में उन्होंने शामिल क्यों किया है ? उनको डिग्री मिल चुकी है,मूल उनके पास है वही दिखाया जाना चाहिए।डुप्लीकेट का सवाल तब पैदा होता है जब मूल खो जाए,मूल खोया नहीं है,मूल उनके ही पास है,यदि खोया है तो उन्होंने पहले कभी डुप्लीकेट निकलवाया होगा वही दिखाएं। यह भी बताएं डुप्लीकेट कब बनवाया और क्यों बनवाया। 
आज जब केजरीवाल ने डिग्री पर सवाल खड़े किए हैं तो डुप्लीकेट इन विश्वविद्यालयों से निकलवाकर दिखाने का मतलब क्या है ? आम आदमी पार्टी ने इन दोनों विश्विद्यालयों से 18सवाल उनकी डिग्री के बारे में पूछे हैं जिनका जबाव मुख्य सूचना आयुक्त के आदेश के बावजूद इन दोनों विश्वविद्यालयों ने लिखित रूप में नहीं दिया है।मोदीजी की डिग्रियां असली हैं तो इन 18सवालों के जबाव देने से ये दोनों विश्वविद्यालय क्यों मना कर रहे हैं।इन सब स्थितियों को देखते हुए यही लगता है डिग्रियां फेक हैं।
जिन 18सवालों को आम आदमी पार्टी ने पूछा है वे सामान्य सवाल हैं उनसे देश की एकता-अखण्डता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं पहुँचेगा,वैसी अवस्था में उन सवालों के जबाव न देना गलत है और सूचना प्राप्ति अधिकार कानून का उल्लंघन है।यह राष्ट्रीय सूचना आयुक्त के आदेश की अवहेलना भी है,इस अर्थ में संविधान का अपमान है,कानून का अपमान है।

गुरुवार, 12 मई 2016

फेसबुक पापाचार


एक सज्जन हैं और लेखक हैं। लेकिन फेसबुक पर लड़की देखकर लंपट भावबोध में चले जाते हैं।फेसबुक पर उनके कुकर्म देखें ,फेसबुक में कुकर्म भाषा में होता है।जैसे, हलो, कैसी हो,अकेली हो,मैं तो अंधेरे में बैठा हूँ। वगैरह -वगैरह।
अब इन जनाब को कौन समझाए कि जान न पहचान बड़े मियाँ सलाम करके लड़की देखी और पीछे हो लिए।काश,ये जनाब सभ्य हो पाते !
जीवन में कमीनापन पसंद नहीं करते तो फेसबुकलेखन में कमीनापन कैसे मान लें। कमीनेपन की लेखन में कोई जगह नहीं है। कमीनापन असभ्यता है। लेखन का काम है कमीनेपन को नंगा करना, न कि कमीनापन करना।
फेसबुक पर सक्रिय पापबुद्धि का एक और रुप है, हाल ही में जिस दिन समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो मैंने उसदिन कई पोस्ट लगायीं। एक जनाब चैटिंग में आए और लगे बतियाने,बोले अजी सर,अब आपके पास तो कई समलैंगिकों के प्रस्ताव आ जाएंगे। अब आपलोग ही बताएं इस तरह की मनोदशा के लोगों का पागलखाने के अलावा और कहीं इलाज संभव है ?
     फेसबुक पर पापाचार का आलम यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को दुष्टलोग आए दिन सताते हैं। सताने के तरीके जानें - शुरु होतेही कहेंगे, हलो,कैसी हो,इसके बाद नाम-पता-अभिरुचि आदि जानेंगे फिर कहेंगे लेख आदि लिखती हो तो भेजो मैं फलां फलां पत्रिका निकालता हूँ ,मैं फलां प्रकाशक को जानता हूँ, इसके बाद डर्टी भाषा में चले जाते हैं। मैसेज बॉक्स को गंदे संदेशों और फोटो से भर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति को नामर्द कहते हैं।फेसबुक पर लड़की की मित्रता मिलती तो उपहार की तरह है लेकिन यदि उसका लंपटगिरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो हमारे देश में बड़े जालिम कानून हैं लंपटो !!
     फेसबुक पापाचार का नया रुप है लड़की को देखकर उन्मत्त हो जाना । उसकी व्यस्तता और खाली समय की खोजबीन करना। गैर जरुरी पर तौर प्रशंसा करना ।यह फेसबुक पर हताश मन की अभिव्यक्ति है।
फेसबुक पर लड़की देखते ही प्रशंसा करना। मुखमंडल या फोटो पर बलिहारी- बलिहारी हो जाना।यह बीमारी है। फेसबुक पर लड़की को सुंदर और वांछनीय मानना अंततःपापाचार है। इसका वास्तव भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है। यह फेसबुक लंपटगिरी है।फेसबुक पर कोई लड़की किसी लड़के से बात करती है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वे प्रेम करते हैं। फेसबुक कम्युनिकेशन प्रेम की नहीं सामान्य कम्युनिकेशन की जगह है। फेसबुक पर अनजान लोगों में ,खासकर लड़की के प्रति घनिष्ठता का प्रदर्शन मात्र कम्युनिकेशन है ,यह न मित्रता है ,और न घनिष्ठता है।
फेसबुक पर लड़कियां स्वतंत्र नहीं होतीं। यहां पर भी उनकी घेराबंदी होती रहती है। स्त्री को मर्दवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति के लिए उकसाने का सबसे अच्छा तरीका है औरत को बेबकूफियां करने वाले वाक्य या पोस्ट लिखने दो और धड़ाधड़ लाइक करते जाओ। यह फेसबुक लंपटई का नया देशी मुहावरा है।फेसबुक लंपटता मर्द की अल्पकालिक शाब्दिक तड़प है।
फेसबुक कल्चर स्वस्थ कल्चर बने और इसे फेक होने से यथासंभव बचाएं।यह बडा माध्यम है कम्युनिकेशन का। फेसबुक पर ज्यादा से ज्यादा यथार्थवादी-मानवीय और सरल बनें।तर्क करें और पंगे न करें। नई बातें लिखें ,अपमान न करें। आलोचना लिखें,गाली न दें या हेयभाषा न लिखें। यह नया कम्युनिकेशन है और इसका शास्त्र अभी रचा जाना है।
जिस तरह समाज में मूर्खों की कमी नहीं है ,वैसे ही फेसबुक पर भी मूर्खों की कमी नहीं है,वे बिना बुलाए चले आते हैं। जिस तरह समाज में फंडामेंटलिस्ट और अविववेकवादी हैं, फेसबुक पर भी हैं। फेसबुक को समृद्ध करने का तरीका है मूर्खों और अविवेकवादियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। अविवेकवादी-फंडामेंटलिस्ट किसी भी दल में हो सकते हैं। हम उनको पहचानें और छोडें।
फेसबुक कल्चर है असहमत के साथ बैठना,कम्युनिकेट करना और आलोचना करना। "हेट " ,"निंदा "या "घृणा" से दूर रहना। मोदी हो या फंडामेंटलिस्ट हों या कांग्रेसी हों हम इनको पसंद नहीं करते, फिर भी ये लोग समाज में हैं तो इनकी हरकतों की बार बार आलोचना करते हैं।आलोचना करना लोकतंत्र में जीना है। यह विरोधी को गले लगाना नहीं है।
     फेसबुक शरीफों का वधस्थल है। यहां पर कम्युनिकेशन तो है ही ,वध भी होता है । खासकर यदि कोई व्यक्ति जनप्रिय हो। उसकी समाज में साख हो तो उसका जनता की आलोचना से बचना मुश्किल है ।


भारतीय परिवार और लोकतंत्र


         
भारतीय परिवार स्वभाव से अ-राजनीतिक और पुंसवादी है।परिवार का यह ढाँचा बदले इसकी ओर स्वाधीनता संग्राम में ध्यान गया।जिन परिवारों में लोकतांत्रिक राजनीतिक माहौल था वहाँ से जो राजनीति में आया उसकी राजनीतिक भूमिका बेहतर रही है।बेहतर से मतलब लोकतंत्र की मान्यताओं और संस्थाओं के निर्माण में ऐसे लोगों की बेहतर भूमिका रही है । सवाल है कि लोकतंत्र के निर्माण में परिवार की भी कोई भूमिका होती है क्या ? क्या लोकतंत्र के लिए परिवार को बदलने की ज़रुरत है या नहीं ? संघ परिवार ने ऐसे नेता दिए जो परिवारविहीन हैं। परिवारविहीन नेता सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ कम निबाहते हैं। सामाजिक विध्वंस ज़्यादा करते हैं !

पूरा परिवार राजनीति करे, यह संस्कार हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम ने पैदा किया था । नेहरु परिवार आज़ादी की लड़ाई में तपा और बदला। गांधी परिवार ने नेहरु परिवार की इस विरासत की यथाशक्ति रक्षा की । गांधी परिवार की तरह कोई परिवार संघ के नेता क्यों नहीं पैदा कर पाए ? लोकतांत्रिक परिवार हो और राजनीतिक परिवार हो, यह स्वाधीनता संग्राम की देन है,आज़ादी के बाद कम्युनिस्टों,सोशलिस्टों और कांग्रेसियों ने लोकतांत्रिक-राजनीतिक परिवार की परंपरा का काफ़ी हद तक निर्वाह किया है । लोकतांत्रिक- राजनीतिक परिवार लोकतंत्र का स्वस्थ मूल्य है।संघ परिवार के नेता आए दिन गांधी परिवार पर जो हमले करते हैं वह असल में लोकतांत्रिक -राजनीतिक परिवार की संरचना पर हमले हैं। संघ परिवार चाहता है हमारे देश में लोकतांत्रिक-राजनीतिक परिवार न हों बल्कि उपभोक्ता परिवार हों ,जिनका अ-राजनीति की राजनीति में विश्वास हो। इस तरह के परिवार फासिज्म का आसानी से जनाधार बनते हैं ।नरेन्द्र मोदी इस तरह के परिवारों के लाड़ले हैं।

गांधी परिवार राजनीतिक परिवार है और लोकतंत्र के प्रति वचनवद्ध है। वे परिवार अच्छे हैं जो लोकतांत्रिक राजनीति करते हैं । कम से कम गांधी परिवार ने राजनीति के अलावा कोई धंधा नहीं किया ।

"संघ परिवार "और "गांधी परिवार" में कौन देशभक्त है ?किस "परिवार" ने देश के लिए क़ुर्बानियाँ दी हैं ?

परिवार पर बातें करते समय मेरा-तेरा परिवार करके न देखें । परिवार को एक संस्थान की तरह देखें। यह कहना सही नहीं है कि मेरा परिवार तो ठीक है और आपकी बातें हम पर लागू नहीं होतीं।

महाशय,हमारे आपके भद्रजनों के परिवार अंदर से पूरी तरह सड़ चुके हैं ।कभी आपको अंदर से दुर्गंध महसूस क्यों नहीं होती ? कभी परिवार को बदलने की मांग को लेकर हमारे आजाद देश में कोई जुलूस क्यों नहीं निकला ?

समाज को बदलने के लिए हमें अपना एजेण्डा बदलना होगा ।सरकार,पुलिस,नेता,भ्रष्टाचार,मनमोहन सिंह,कांग्रेस,भाजपा आदि के खिलाफ बोलना आसान है,जुलूस निकालना आसान है, लेकिन अपने परिवार के सड़े तंत्र के खिलाफ बोलना और जुलूस निकालना बेहद कठिन है।

हमसब कायर हैं और हमने लोकतंत्र के विभिन्न तंत्रों के आवरण में अपनी कायरता को छिपा लिया है , रेशनलाइज कर लिया है । लोकतंत्र के आवरण के बाहर निकलकर परिवार को खोलें और सड़कों पर,मीडिया में ,लोकसभा से लेकर पंचायतों तक बहस करें और समाधान खोजें ।

भारत को अपराधमुक्त बनाना है तो परिवार को अपराधमुक्त बनाओ। देश में लोकतंत्र लाना है तो परिवार में पहले लोकतंत्र स्थापित करो।फलतः देश में बहुत बडी मात्रा में अपराधों में गिरावट स्वतःमहसूस करेंगे । समाज में होने वाले अपराध हमारे परिवार के अंदर होने वाले अपराधों का ही विस्तार हैं ।

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गालिब के रंग-

             
ग़ालिब सदा किराये के मकानों में रहे, अपना मकान न बनवा सके। ऐसा मकान ज़्यादा पसंद करते थे, जिसमें बैठकख़ाना और अन्त:पुर अलग-अलग हों और उनके दरवाज़े भी अलग हों, जिससे यार-दोस्त बेझिझक आ-जा सकें।
5 अक्टूबर को (18 सितम्बर को दिल्ली पर अंग्रेज़ों का दुबारा से अधिकार हो गया था) कुछ गोरे, सिपाहियों के मना करने पर भी, दीवार फाँदकर मिर्ज़ा के मुहल्ले में आ गए और मिर्ज़ा के घर में घुसे। उन्होंने माल-असबाब को हाथ नहीं लगाया, पर मिर्ज़ा, आरिफ़ के दो बच्चों और चन्द लोगों को पकड़कर ले गए और कुतुबउद्दीन सौदागर की हवेली में कर्नल ब्राउन के सामने पेश किया। उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफ़ारिश ने रक्षा की। बात यह हुई जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ़्तार करके ले गए, तो अंग्रेज़ सार्जेण्ट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूछा-‘क्या तुम मुसलमान हो?’ मिर्ज़ा ने हँसकर जवाब दिया कि, ‘मुसलमान तो हूँ पर आधा।’ वह इनके जवाब से चकित हुआ। पूछा-‘आधा मुसलमान हो, कैसे?’ मिर्ज़ा बोले, ‘साहब, शरीब पीता हूँ; हेम (सूअर) नहीं खाता।’



जब कर्नल के सामने पेश किए गए, तो इन्होंने महारानी विक्टोरिया से अपने पत्र-व्यवहार की बात बताई और अपनी वफ़ादारी का विश्वास दिलाया। कर्नल ने पूछा, ‘तुम दिल्ली की लड़ाई के समय पहाड़ी पर क्यों नहीं आये, जहाँ अंग्रेज़ी फ़ौज़ें और उनके मददगार जमा हो रहे थे?’ मिर्ज़ा ने कहा, ‘तिलंगे दरवाज़े से बाहर आदमी को निकलने नहीं देते थे। मैं क्यों कर आता? अगर कोई फ़रेब करके, कोई बात करके निकल जाता, जब पहाड़ी के क़रीब गोली की रेंज में पहुँचता तो पहरे वाला गोली मार देता। यह भी माना की तिलंगे बाहर जाने देते, गोरा पहरेदार भी गोली न मारता पर मेरी सूरत देखिए और मेरा हाल मालूम कीजिए। बूढ़ा हूँ, पाँव से अपाहिज, कानों से बहरा, न लड़ाई के लायक़, न मश्विरत के क़ाबिल। हाँ, दुआ करता हूँ सो वहाँ भी दुआ करता रहा।’ कर्नल साहब हँसे और मिर्ज़ा को उनके नौकरों और घरवालों के साथ घर जाने की इजाज़त दे दी।

1857 के ग़दर के अनेक चित्र मिर्ज़ा 'ग़ालिब' के पत्रों में तथा इनकी पुस्तक ‘दस्तंबू’ में मिलते हैं। इस समय इनकी मनोवृत्ति अस्थिर थी। वह निर्णय नहीं कर पाते थे कि किस पक्ष में रहें। सोचते थे कि पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे? इसीलिए क़िले से भी थोड़ा सम्बन्ध बनाये रखते थे। ‘दस्तंबू’ में उन घटनाओं का ज़िक्र है जो ग़दर के समय इनके आगे गुज़री थीं। उधर फ़साद शुरू होते ही मिर्ज़ा की बीबी ने उनसे बिना पूछे अपने सारे ज़ेवर और क़ीमती कपड़े मियाँ काले साहब के मकान पर भेज दिए ताकि वहाँ सुरक्षित रहेंगे। पर बात उलटी हुई। काले साहब का मकान भी लुटा और उसके साथ ही ग़ालिब का सामान भी लुट गया। चूँकि इस समय राज मुसलमानों का था, इसीलिए अंग्रेज़ों ने दिल्ली विजय के बाद उन पर विशेष ध्यान दिया और उनको ख़ूब सताया। बहुत से लोग प्राण-भय से भाग गए। इनमें मिर्ज़ा के भी अनेक मित्र थे। इसीलिए ग़दर के दिनों में उनकी हालत बहुत ख़राब हो गई। घर से बाहर बहुत कम निकलते थे। खाने-पीने की भी मुश्किल थी। ऐसे वक़्त उनके कई हिन्दू मित्रों ने उनकी मदद की। मुंशी हरगोपाल ‘तुफ़्ता’ मेरठ से बराबर रुपये भेजते रहे, लाला महेशदास इनकी मदिरा का प्रबन्ध करते रहे। मुंशी हीरा सिंह दर्द, पं. शिवराम एवं उनके पुत्र बालमुकुन्द ने भी इनकी मदद की। मिर्ज़ा ने अपने पत्रों में इनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।

जब असदउल्ला ख़ाँ 'ग़ालिब' सिर्फ़ 13 वर्ष के थे, इनका विवाह लोहारू के नवाब 'अहमदबख़्श ख़ाँ' (जिनकी बहन से इनके चचा का ब्याह हुआ था) के छोटे भाई 'मिर्ज़ा इलाहीबख़्श ख़ाँ ‘मारूफ़’ की बेटी 'उमराव बेगम' के साथ 9 अगस्त, 1810 ई. को सम्पन्न हुआ था। उमराव बेगम 11 वर्ष की थीं। इस तरह लोहारू राजवंश से इनका सम्बन्ध और दृढ़ हो गया। पहले भी वह बीच-बीच में दिल्ली जाते रहते थे, पर शादी के 2-3 वर्ष बाद तो दिल्ली के ही हो गए। वह स्वयं ‘उर्दू-ए-मोअल्ला’ (इनका एक ख़त) में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि-

"7 रज्जब 1225 हिजरी को मेरे वास्ते हुक्म दवा में हब्स[ सादिर[ हुआ। एक बेड़ी (यानी बीवी) मेरे पाँव में डाल दी और दिल्ली शहर को ज़िन्दान मुक़र्रर किया और मुझे इस ज़िन्दाँ में डाल दिया।"

मुल्ला अब्दुस्समद 1810-1811 ई. में अकबराबाद आए थे और दो वर्ष के शिक्षण के बाद असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) उन्हीं के साथ आगरा से दिल्ली गए। दिल्ली में यद्यपि वह अलग घर लेकर रहे, पर इतना तो निश्चित है कि ससुराल की तुलना में इनकी अपनी सामाजिक स्थिति बहुत हलकी थी। इनके ससुर इलाहीबख़्श ख़ाँ को राजकुमारों का ऐश्वर्य प्राप्त था। यौवन काल में इलाहीबख़्श की जीवन विधि को देखकर लोग उन्हें ‘शहज़ाद-ए-गुलफ़ाम’ कहा करते थे। इससे अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि, उनकी बेटी का पालन-पोषण किस लाड़-प्यार के साथ हुआ होगा। असदउल्ला ख़ाँ (ग़ालिब) शक्ल और सूरत से बड़ा आकर्षक व्यक्तित्व रखते थे। उनके पिता-दादा फ़ौज में उच्चाधिकारी रह चुके थे। इसीलिए ससुर को आशा रही होगी कि, असदउल्ला ख़ाँ भी आला रुतबे तक पहुँचेंगे एवं बेटी ससुराल में सुखी रहेगी, पर ऐसा हो न सका। आख़िर तक यह शेरो-शायरी में ही पड़े रहे और उमराव बेगम, पिता के घर बाहुल्य के बीच पली लड़की को ससुराल में सब सुख सपने जैसे हो गए।

ग़ालिब अथवा मिर्ज़ा असदउल्ला बेग़ ख़ान (अंग्रेज़ी:Ghalib अथवा Mirza Asadullah Baig Khan, उर्दू: غالب अथवा مرزا اسدللا بےغ خان) (जन्म- 27 दिसम्बर, 1797 ई. आगरा - 15 फ़रवरी, 1869 ई. दिल्ली) जिन्हें सारी दुनिया 'मिर्ज़ा ग़ालिब' के नाम से जानती है, उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि रहे हैं। इनके दादा 'मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ' समरकन्द से भारत आए थे। बाद में वे लाहौर में 'मुइनउल मुल्क' के यहाँ नौकर के रूप में कार्य करने लगे। मिर्ज़ा क़ौक़न बेग ख़ाँ के बड़े बेटे 'अब्दुल्ला बेग ख़ाँ से मिर्ज़ा ग़ालिब हुए। अब्दुल्ला बेग ख़ाँ, नवाब आसफ़उद्दौला की फ़ौज में शामिल हुए और फिर हैदराबाद से होते हुए अलवर के राजा 'बख़्तावर सिंह' के यहाँ लग गए। लेकिन जब मिर्ज़ा ग़ालिब महज 5 वर्ष के थे, तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए। मिर्ज़ा ग़ालिब को तब उनके चचा जान 'नसरुउल्ला बेग ख़ान' ने संभाला। पर ग़ालिब के बचपन में अभी और दुःख व तकलीफें शामिल होनी बाकी थीं। जब वे 9 साल के थे, तब चचा जान भी चल बसे। मिर्ज़ा ग़ालिब का सम्पूर्ण जीवन ही दु:खों से भरा हुआ था। आर्थिक तंगी ने कभी भी इनका पीछा नहीं छोड़ा था। क़र्ज़ में हमेशा घिरे रहे, लेकिन अपनी शानो-शौक़त में कभी कमी नहीं आने देते थे। इनके सात बच्चों में से एक भी जीवित नहीं रहा। जिस पेंशन के सहारे इन्हें व इनके घर को एक सहारा प्राप्त था, वह भी बन्द कर दी गई थी।