मंगलवार, 29 जुलाई 2014

बत्रापंडित के पोंगापंथ के ख़तरे


     ये जनाब मुकदमेबाज हैं। संघ की नई रणनीति के तहत ये शिक्षाजगत में संघ के मुखौटे हैं । अब तक का राजनीतिक अनुभव रहा है कि संघ पहले वैचारिक हमले करता है , फिर राजनीतिक हमले ,उसके बाद शारीरिक और अंत में क़ानूनी आतंकवाद का सहारा लेता है और फिर विजय दुंदुभि बजने लगती है !
     उदार  आधुनिक लोकतांत्रिक , वैज्ञानिक और संवैधानिक वैविध्यपूर्ण  विचारों और किताबों पर प्रतिबंध लगाना फंडामेंटलिज्म है । इस फंडामेंटलिज्म को हमेशा शिक्षा की रक्षा के नाम पर सक्रिय देखा गया है । 
   सवाल यह है कि बत्रापंडित जैसे पोंगापंथियों के मुखौटे की संघ को ज़रुरत क्यों पड़ी ? संघ  और उससे जुड़ा राजनीतिक दल इस काम को अपने नाम से सीधे क्यों नहीं करता ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि केन्द्र या राज्य में जहाँ पर बत्रापंडित को मौक़ा मिलता है वे शिक्षा पर ही मेहरबानी क्यों करते हैं ? 
        आधुनिककाल में  शिक्षा को राजनीति के बाद सबसे बड़ा विचारधारात्मक जंग का मैदान माना जाता है और यही वजह है कि संघ और उनके मुखौटे राजनीति और शिक्षा पर सबसे ज़्यादा हमले करते हैं। 
    संघ के बजरबट्टुओं की वैचारिक जंग का तीसरा बड़ा क्षेत्र है हमारा संविधान । वे आए दिन संविधान की मूल धारणाओं और भावनाओं की पिछड़े नज़रिए से आलोचनाएँ करते  हैं । 
   संविधान ,शिक्षा या राजनीति इसमें कोई चीज़ स्थायी नहीं है , इनमें निरंतर संशोधन, परिवर्द्धन और मूलगामी परिवर्तनों की ज़रुरत रहती है। इन क्षेत्रों में बदलाव यदि आगे की ओर ले जाने वाले हों तो समाज में अमनचैन स्थापित होता है लेकिन बदलाव अतीतोन्मुखी हों तो समाज , राजनीति, शिक्षा, न्यायपालिका ,  संस्कृति आदि के क्षेत्र में नए क़िस्म का रुढिवाद और फंडामेंटलिज्म पैदा होने की संभावनाएँ होती हैं। 
    संयोग की बात है कि बत्रापंडित जो सुझाव दे रहे हैं उनमें अतीतोन्मुखी जीवनशैली पर ज़ोर है। अतीतोन्मुखी जीवनशैली मूलत: भारतीय परंपरा का निषेध है और उदार सामाजिक संरचनाओं के निर्माण में बाधक है । 
    बत्रापंडित अपने को किताबों के 'सामाजिक संपादक 'के पद पर नियुक्त कर चुके हैं। ये साहब नहीं जानते कि भारतीय परंपरा में किताबों के 'सामाजिक संपादक 'की कभी किसी हिन्दू या ग़ैर हिन्दू उदार या अनुदार विचारक, दार्शनिक, संत, कवि आदि ने वकालत नहीं की । 
   भारतीय समाज को कभी ' किताबों के सामाजिक संपादक ( सोशल आॅडिटर) ' की ज़रुरत नहीं पड़ी । भारतीय परंपरा में दर्शन से लेकर जीवनशैली तक, धर्म से लेकर शिक्षा तक किताबों की दुनिया प्राचीनकाल , मध्यकाल और आधुनिककाल तक वैविध्यपूर्ण और सहिष्णु रही है ।
   ब्रिटिश शासनकाल में पहली बार किताबें ज़ब्त हुईं.विचारों पर क़ानूनी पाबंदियाँ लगायी गयीं । ब्रिटिशशासन से हमें विचारों पर पाबंदी की क़ानूनी हिदायतें देखने को मिलती हैं । 
      बत्रापंडित की अवैज्ञानिक और काल्पनिक धारणाओं के आधार पर हमने देश की एकता और अखंडता का निर्माण नहीं किया है । हमारे देश में संविधान निर्माण की प्रक्रिया से लेकर आज तक ठोस वैज्ञानिक और उदार विचारों के आधार पर विविधता को हर क्षेत्र में स्वीकृति दी गयी और विविधता को जीवनशैली, शिक्षा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, राजनीति आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानकर क़ानूनी व्यवस्थाओं और वैध संरचनाओं का निर्माण किया गया। 
   मसलन हमारे संविधान के तहत आप पोंगापंथ का प्रचार कर सकते हैं ,लेकिन कोई वैज्ञानिक नज़रिए से प्रचार करना चाहे तो उसे भी हमारा संविधान और क़ानून मान्यता देता है । 
   आप जादू - टोने के पक्ष में किताबें लिख सकते हैं और वैज्ञानिकचेतना पर भी किताबें लिख सकते हैं । लेकिन बत्रापंडित का सारा ज़ोर इस वैविध्य को नष्ट करने पर है वे वाद -विवाद में विश्वास नहीं करते ,वे जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं  और इसके लिए सभी गैर-ज्ञानपरक हथकंडे अपनाते हैं । 
    वे दिल जीतने में विश्वास नहीं करते वे दिल को क़ैद करने में विश्वास करते हैं । ' सामाजिक संपादक' के नाम पर उनके निशाने पर विज्ञानसम्मत शिक्षा है। वे कभी सामाजिक रुढियों , अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों ,भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-पिशाचिनी आदि के ख़िलाफ़ मुहिम नहीं चलाते ।
    वे कभी उपभोक्तावाद, सभी रंगत के कठमुल्लापन, जातिप्रथा , दहेजप्रथा आदि के ख़िलाफ़ बिगुल नहीं बजाते । 
    बत्रापंडित ने ' स्वच्छंदता' के ख़िलाफ़ मुहिम के नाम पर अतीतोन्मुखी जीवनशैली और मूल्यों की हिमायत को प्रमुखता से पेश किया है यह असल में अतीतोन्मुखी फ़ंडामेंटलिस्ट स्वच्छंदता है जिसका भारत की विविधता और संविधान की मूल मान्यताओं से बैर है । वे इसके जरिए ' सांस्कृतिक आतंक' पैदा करना चाहते हैं । 
      बत्रापंडित एक गैर पेशेवर संघी कार्यकर्ता है ,जिसके जरिए संघ अपना सांस्कृतिक काम करता रहा है । यह व्यक्ति अपने गैर- पेशेवर कामों मेंकानून के चोर दरवाज़ों का बड़े ही कौशल के साथ इस्तेमाल करता रहा है । स्थिति यह हैकि वह सीधे मंत्री से लेकर प्रकाशक तक सीधे आदेश की भाषा में बोलता है । 
   बत्रापंडित की मान्यता है ' मेरी मानो वरना मुकदमे झेलो' , यह रणनीति किसी भी प्रकाशक को ठंडा करने के लिए काफ़ी है, क्योंकि कोई भी प्रकाशक मुकदमेबाजी से डरता है । इस रणनीति का बत्रापंडित को लाभ भी मिला है और कई प्रकाशक उनके दबाव में आ गए हैं , संघ नियंत्रित सरकारें उनकी किताबें ख़रीद रही हैं और अब ये जनाब राष्ट्रीय स्तर पर बड़े सांस्कृतिक संकट को पैदा करने की मुहिम में लग गए हैं  ।
  हमारी अपील है कि बत्रापंडित के पोंगापंथ के सामने केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री समर्पण न करें । यदि वे उनके दबाव में आती हैं तो इससे संविधान की मूल भावनाओं और अकादमिक स्वायत्तता का हनन होगा । 
     
       
  

सोमवार, 28 जुलाई 2014

मोदी बाबू के कमाल के ६० दिन-



एक तरफ़ हाफ़िज़ सईद से अपने दूत के ज़रिए गप्पें ! दूसरी ओर सईदभक्त आतंकियों की घुसपैठ और सीमा पर निरंतर गोलीबारी!
एक तरफ़ संसद में सर्वधर्म सद्भाव की नक़ली अपील ! दूसरी ओर मुरादाबाद में नए क़िस्म के मुज़फ़्फ़रनगर मार्का 'सद्भाव'की अथक कोशिश ! अहर्निश संविधान की मूलभावनाओं भाजपा और सहयोगी दलों के घटिया वैचारिक हमले !
एक तरफ़ देश को स्वच्छ प्रशासन का गुजरात के नाम पर भरोसा !दूसरी ओर गुजरात में नौ हज़ार करोड़ रुपयों के खर्चे का हिसाब किताब न देना !
सीएजी के अनुसार रिलायंस-अदानी आदि को सारे क़ानून तोड़कर लूट में हज़ारों करोड़ रुपयों की मदद करना ! 

एक तरफ़ संविधान के अनुसार काम करने का वायदा दूसरी ओर संवैधानिक नियमों और क़ायदों का सरेआम उल्लंघन !
एक तरफ़ देशभक्ति का नक़ली नाटक दूसरी ओर विगत ६० दिनों में पाक फ़ायरिंग में मारे गए शहीदों के घर मोदी बाबू का न जाना !
एक तरफ़ चुनाव के समय सोनिया- राहुल - वाड्रा के ख़िलाफ़ नक़ली मंचीय नाटक और इधर साठ दिनों में इनके 'अवैध 'धंधों पर हमले न करना ! 
महँगाई का बढ़ना , ख़ासकर टमाटर का १००रुपये के पार पहुँच जाना आदि बातें हैं जो मोदी को सबसे निकम्मा और ग़ैर-भरोसेमंद पीएम बना रही हैं।

दिल्ली में नार्थ -ईस्ट के लोगों पर हमलों में इज़ाफ़ा और बलात्कारों का न रुकना बताता है कि लोकतंत्र में प्रचार के नाम पर टीवी और मीडिया उन्माद के ज़रिए जनता से ठगई की गयीहै।

ब्रिक्स में मोदीजी और भोंपू नेटवर्क



नरेन्द्र मोदी का पीएम के नाते ब्रिक्स सम्मेलन पहला बड़ा कूटनीतिक सम्मेलन था । इस सम्मेलन में क्या हुआ ? भारत ने क्या खोया और क्या पाया यह बात भारत का मीडिया कम से कम जानता है । 
 मोदीजी ने अपनी ख़ामियों को छिपाने की रणनीति के तहत मीडिया के समूचे तामझाम को अपनी यात्रा से बेददखल कर दिया।
    'नियंत्रित ख़बरें और सीमित कवरेज 'की रणनीति के तहत स्थानीय स्तर पर भक्तटीवी चैनलों का भोंपू की तरह इस्तेमाल किया। यह एक तरह से भोंपू टीवी कवरेज यानी अधिनायकवादी कम्युनिकेशन माॅडल की वापसी है। दुर्भाग्यजनक है कि भारत में व्यापक मीडिया नेटवर्क के रहते हुए मोदी ने भोंपूनेटवर्क का ब्रिक्स कवरेज के लिए इस्तेमाल किया। 
       ब्रिक्स भोंपू टीवीकवरेज की ख़ूबी थी कि पीएम कम और भोंपू ज़्यादा बोल रहे थे। पहलीबार ऐसा हुआ कि जो मीडिया साथ में गया था उससे भी सम्मेलन और सामयिक विश्व घटनाक्रम पर मोदीजी ने  प्रेस काॅफ्रेंस करके अपने ज्ञान -विवेक और विश्व राजनीतिक नज़रिए का परिचय नहीं दिया। यहाँ तक कि सम्मेलन में भी मोदीजी ने सरलीकृत रुप में गोल गोल बातें कीं। 
    ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी अपने विदेशनीति विज़न को सामने नहीं रख पाए और यह बताने में असमर्थ रहे कि इनदिनों राजनीतिक तौर पर सबसे बड़ी चुनौती क्या है ? कम से कम इस मामले में मनमोहन सिंह का रिकाॅर्ड बेहतर रहा है उनके भाषण हमेशा नई रणनीतियों के परिप्रेक्ष्य से भरे रहते थे। उनके बोलने का गंभीर असर होता था और नई समस्याओं को हल करने में उनके नज़रिए से विश्व के नेताओं को मदद मिलती थी , लेकिन मोदीजी ने इस पक्ष का अभी विकास नहीं किया है।
   मोदीजी भारत की सक्रिय नीति निर्माता की भूमिका को महज़ हिन्दीवक़्ता की भूमिका तक सीमित करके देख रहे है। 
  मोदी सरकार समझना होगा कि  भारत को विश्व राजनीतिक मंचों पर महज़ हिन्दीवक्ता के रुप में नहीं सक्रिय नीति निर्माता के रुप में भूमिका निभानी है । 
    मोदीजी और उनके मंत्रीमंडल के सहयोगियों को विदेशनीति से लेकर अन्य नीतियों के संदर्भ में विश्वमंचों पर हिन्दीवक्ता के दायरे के बाहर निकलकर सोचना होगा। भाषाप्रेम और सरलीकृत भाषणों से आगे निकलकर नीतिगत तौर पर पहल करनी होगी।  विश्व की जटिलताओं को समझना होगा और उनमें हस्तक्षेप करना होगा। ब्रिक्स में वे मौक़ा चूक गए।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मोदी और वर्चुअल मुखौटालीला -किश्त १ -




नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री मीडिया लहर ने बनाया अब यही मीडिया लहर मुश्किलें खड़ी कर रही है । मोदी संभवत: पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका मीडिया ने सबसे जल्दी अलोकप्रियता का भाष्य लिखना आरंभ कर दिया है।
   मोदी को मीडिया ने मुखौटों के माध्यमों से आम लोगों के बीच में जनप्रियता दिलाई इसलिए मोदी का मीडिया विवेचन कभी मुखौटों को हटाकर नहीं किया जा सकता। मोदी ने अपनी ऐसी इमेज बनाकर पेश की थी कि वह हर उस व्यक्ति में है जो उसका प्रचारक है इस तरह मोदी ने अपने नायक का निर्माण किया था। सभी निजी व्यक्तियों की इमेज और निजता को अपहृत करके मोदी 'महान' की इमेज को मीडिया ने तैयार किया था । निश्चित रुप से यह बेहद खर्चीला ,सर्जनात्मक और कलात्मक काम था ।फलत: मोदी व्यक्ति नहीं मुखौटों का संगम है। 
        मोदी को देखने का हम नज़रिया बदलें मोदी पहले भी बहुत गरजते थे ,अब भी गरज रहे हैं , पहले भी वे मुखौटों के ज़रिए गरज रहे थे ,अब भी मुखौटों के ज़रिए गरज रहे हैं ,मोदी को निजी तौर पर प्रधानमंत्री के रुप में देखना ,अंश को देखना  है, मोदी समग्रता में सिर्फ़ मुखौटों में मिलेगा,निचले स्तर पर सभी संघी सदस्यों और हमदर्दों में मिलेगा।  मोदी का मुखौटों के बिना अर्थ न पहले समझ सकते थे और न उनके पीएम बनने के बाद ही समझ सकते हैं। मोदी यदि संघ के साधारण सदस्य की मेहनत के फल के मालिक हैं तो वही मोदी निचले स्तर साधारण संघी सदस्य की दबंगई के पाप के भी मालिक हैं यह नहीं होसकता कि नेता को कार्यकर्ता के अच्छे काम फलें और बुरे असर ही न करें । 
      वर्चुअल इमेजों ने मोदी की रचना जिस रसायन से की है उस रसायन में ही उसका विलोम भी अंतर्निहित है। संयोग की बात है कि वर्चुअल इमेज में विलोम भी उसी मार्ग से बनता है उन्हीं लोगों से बनता है जो इमेज के सर्जक हैं । 
     मोदी की वर्चुअल इमेजरी के बनते विलोम को पूर्णता प्राप्त करने में कितना वक़्त लगेगा यह तय करना मुश्किल है लेकिन यह तय है कि मोदी इमेज विध्वंस की वर्चुअल प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है । न्यायपालिका के शिखर से इमेज भंजन का सूत्रपात हुआ है। सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश की नियुक्ति पर सरकार ने जिस तरह हस्तक्षेप किया उसने  मोदी की इमेज पर कलंक का अमिट दाग छोड़ दिया है। 
          वर्चुअल विचारधारा हमेशा व्यक्ति को छोड़ देती है इमेज को पकड़ लेती है और इमेज के ज़र्रे ज़र्रे पर हमले करती है।  वर्चुअल इमेज में व्यक्ति गौण होता है और उसकी इमेज मूल्यवान होती है और उसके रेशे- रेशे को तोड़ना पेचीदा काम है अत : यह काम भी मीडिया उतनी ही बेरहमी से करता है जितनी एकाग्रता से वह इमेज बनाता है। रीगन से बुश तक की इमेज के विध्वंस को देखें तो यह चीज़ सहज ही समझ में आ सकती है। 
   इमेज का क्षय वस्तुत: उस आभामंडल को नष्ट करता है जो आभामंडल वर्चुअल ने निर्मित किया है । इससे व्यक्ति की सक्रियता बढ़ती है और इमेज की घटती है। 
   मनमोहन इमेज के साथ यही हुआ लेकिन बेहद धीमी गति से। क्योंकि मनमोहन सिंह की वर्चुअल इमेज अदृश्य रंगों से बनायी गयी थी फलत: उस इमेज को नष्ट करने में ज़्यादा समय लगा । 
   इसके विपरीत मोदी की इमेज मुखौटों और हाइस्पीड मीडिया के जरिए बनी है अत:इमेज विखंडन भी हाइस्पीड और मुखौटों के ज़रिए होगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें  इनदिनों मीडिया में मुखौटालीला चल रही है। मोदी के मुखौटों की वर्चुअल धुलाई हो रही है ।
      


 

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

कोलकाता में गाली,हिंसा और बम


     कल मैं बंगला टीवी चैनल पर टीएमसी सांसद और अभिनेता तापस पाल को हिंसक भाषा में भाषण देते हुए देख रहा था तो मन में सोच रहा था कि बंगाली जाति के कितने बुरे दिन आ गए हैं कि उनके आइकॉन आम जनता में  हिंसक भाषा में बोल रहे हैं और दर्शक तालियां बजा रहे हैं।
     बंगाली जाति मधुरभाषी,सांस्कृतिकतौर पर सभ्यजाति है। इसमें हिंसकभाषा कहां से आई ? बंगाली जाति के नेता भारत में सभ्यता और राजनीति के सिरमौर रहे हैं और देश उनको बड़े ही सम्मान की नजर से देखता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
   सांसद तापस पाल की भाषा इतनी खराब और दबंगई से भरी थी कि ममता सरकार में शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी तक ने इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति प्रकट की। नेता हो या नागरिक , गाली और हिंसा की भाषा में बोलना तो अपराध है, असभ्यकर्म है।
      प.बंगाल में गाली,हिंसा और बम की राजनीति में गहरा संबंध है ।  हिंसा हमेशा गाली की भाषा के दरवाजे से ही दाखिल होती है। राजनीति में गाली की भाषा कब आती है और कब वह हिंसा में तब्दील हो जाती है इसका ठीक से अध्ययन तो हमारे समाज में नहीं हुआ लेकिन यह सच है कि गाली और हिंसा जुड़वां बहनें हैं। ये दोनों बहनें तब जन्म लेती हैं जब समाज में कर्मसंस्कृति का क्षय होता है।परजीवी और पराजित मनोदशा में गाली और हिंसा जन्म लेती है।
     पश्चिम बंगाल में जिसे नक्सलबाडी आंदोलन कहते हैं वह इस राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक पतन का प्रस्थान बिंदु है। पश्चिम बंगाल में हिंसाचार का श्रीगणेश यहीं से होता है। धमकी,गाली,बम,क्रांति की गजब खिचडी इस बीच पकी है। इसमें बौद्धिकों ने सुविधानुसार क्रांति और वाम राजनीति को पॉजिटिव तत्व के रुप में छांट लिया लेकिन अन्य चीजों को छोड़ दिया।
     क्रांति या वामराजनीति में गाली,घृणा (पूंजीपति और सामंती तत्त्वों के प्रति घृणा) को इस हद तक विकसित किया गया कि उसने सामाजिक-राजनीतिक संतुलन में बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर दिया। हमारे अनेक वामपंथी मित्र यह पढ़कर नाराज भी हो सकते हैं लेकिन सच तो यही है कि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है। आप अपने वर्गशत्रु से भी नफरत नहीं कर सकते। लोकतंत्र में सबके लिए स्थान है।अमीर के लिए भी और गरीब के लिए भी। पूंजीपति और बड़े जमींदारों के खिलाफ घृणा का सिलसिला अंततःगाली के मार्ग से गुजरते हुए हिंसा और बम के मार्ग तक गया। इसके कारण पहले निजी हिंसा को वैध बनाया गया,बाद राजनीतिक हिंसा भी वैध हो गयी,फिर पुलिस हिंसा भी वैध मान ली गयी।
    हमलोग अपनी सुविधा से हिंसा में अंतर करने लगे, तेरी हिंसा और मेरी हिंसा में पाप-पुण्य खोजने लगे। अपने दल की हिंसा को हिंसा न मानकर आत्मरक्षा में उठाया कदम मानने लगे।
    जबकि हिंसा तो हिंसा है और वह लोकतंत्र का विलोम है। इसी तरह घृणा तो घृणा है वह सभ्यता और लोकतंत्र का विलोम है। वर्गीय घृणा पैदा करके वोट जुटाए जा सकते हैं, सीटें जीती जा सकती हैं। सत्ता पा सकते हो लेकिन सभ्यता के क्षय को नहीं रोक सकते।
   वाममोर्चा निरंतर अपार बहुमत हासिल करके भी हिंसा को नहीं रोक पाया। इसका प्रधान कारण वही है जिसका मैंने जिक्र किया है। लोकतंत्र में हिंसा,गाली और घृणा की कोई जगह नहीं है। यदि लोकतंत्र के सारथी  हिंसा,गाली और घृणा के रथ पर सवार होकर आएंगे तो लोकतंत्र में सभ्यता के क्षय और हिंसा के विस्तार को रोक नहीं सकते। पश्चिम बंगाल में वस्तुतः यही हुआ है।
    हिंसा को हर दल ने वैध बनाया,हिंसा की मदद ली और राजनीतिक वैभव का विस्तार किया। यह विलक्षण संयोग है कि नक्सली हिंसा के दमन के नाम पर कांग्रेस ने कुछ साल शासन किया लेकिन हिंसा का कांग्रेस को जो चस्का लगा वह उसे आपातकाल तक ले गया और कांग्रेस में धीरे धीरे अपराधीकरण एक स्वाभाविक फिनोमिना बन गया।
    नक्सलबाड़ी आंदोलन के पहले कांग्रेस के शासकों को हिंसा की राजनीति करते नहीं देखा गया। तेलंगाना आंदोलन अपवाद है। यह भी कह सकते हैं राजनीतिक हिंसाचार की जो परंपरा कांग्रेस ने तेलंगाना आंदोलन (1946-48) ने डाली, वह नक्सलबाडी आंदोलन के दौर में तरुणाई में पहुँची और आपातकाल में पूर्ण यौवन को प्राप्त हुई। इस समूची प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल के भद्रसमाज में हिंसा और असभ्यता की दीमक प्रवेश कर गयी और आज उससे पूरा राज्य प्रभावित है।
    दुखद बात यह है कि वामदलों ने सभ्यता के क्षय की प्रक्रियाओं की हमेशा अनदेखी की। हिंसा को हिंसा से खत्म करने की रणनीति अपनायी, गाली का जबाव गाली से देने की पद्धति इजाद की,जो साथ नहीं वह वर्गशत्रु। जो साथ छोड़ गया वह वर्गशत्रु। इस रणनीति के परिणाम सामने हैं। इसका सबसे बड़ा परिणाम है सामाजिक अलगाव।  
  वामराजनीति के विकास के दौर में हिंसा कम नहीं हुई बल्कि बढी । बंगाली समाज और ज्यादा असभ्य बना।  वाम,नक्सल,कांग्रेस, टीएमसी आदि सब भूल गए हैं कि कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती। कीचड़ को साफ करने के लिए साफ-स्वच्छ जल चाहिए। हिंसा से हिंसा खत्म नहीं होती, गाली से सभ्यता विकसित नहीं होती। हिंसा को शांति से खत्म किया जा सकता है। गाली को गाली से खत्म नहीं कर सकते,बल्कि सभ्य आचरण से खत्म किया जा सकता है।
  लोकतंत्र में सभ्यता के विकास के लिए लोकतांत्रिक सभ्य पैमानों को अपनाने की जरुरत है। गाली ,हिंसा और बम तो वर्चस्व और हताशा के पैमाने हैं। ये पैमाने लोकतंत्र में अपनाए जाएंगे तो असभ्यता का विकास होगा,समाज और भी जंगलीपन की ओर भागेगा। हम तय करें कि लोकतंत्र में कैसे जीना चाहते हैं ? सभ्यता के पैमानों के आधार जीना चाहते हैं या असभ्यता के पैमानों के आधार पर जीना चाहते हैं?        


सोमवार, 30 जून 2014

कोलकाता की बंद गलियां और वोट का खेल

       

मुझे याद आ रहा है टॉलीगंज का वह चुनाव जब मैं आशीष दा के लिए चुनाव प्रचार के लिए नुक्कड़ सभाएं कर रहा था। रोज शाम होते ही इस विधानसभा क्षेत्र में नुक्कड़ सभाएं करने निकल पड़ता था। सभाओं को कहां करना है इसका पूरा कार्यक्रम माकपा के राज्य ऑफिस से तैयार होकर मिलता था और पार्टी की स्थानीय शाखाओं को पता रहता था। उस चुनाव से कुछ समय पूर्व तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ था। आशीष दा के खिलाफ टीएमसी का राज्य अध्यक्ष चुनाव लड़ रहा था। आशीष दा माकपा के श्रेष्ठतम शिक्षकनेता थे, कलकत्ता वि वि में कॉमर्स विभाग में प्रोफेसर थे,वे हमारी पार्टी ब्रांच के सचिव भी थे। इसलिए उनके लिए ज्यादा काम करने पर जोर था। खैर, एक वाकया बेहद पीड़ादायक घटा।

एकदिन मैं टालीगंज इलाके में एक गली में चुनाव सभा के लिए गया। मेरे साथ एक लोकल कॉमरेड था और रिक्शे पर लाउडस्पीकर कसा हुआ था। स्थानीय कॉमरेड मुझे घुमाते हुए एक बंद गली में ले गया और एक ऐसी जगह खड़ा कर दिया जहां गली बंद हो जाती थी, मैंने कहा यहां तो कोई नहीं है और गली बंद है, कोई सुननेवाला नहीं है, वह बोला यहीं मीटिंग करनी है, शाम के सात-साढ़े सात बजे होंगे। मैंने उस कॉमरेड को काफी समझाने की कोशिश की कि यहां कोई सुनने वाला नहीं है ,तुम क्यों बोलने के लिए जोर डाल रहे हो, वह बोला आप भाषण दीजिए लोग घरों में बैठे हुए सुनेंगे। लाउडस्पीकर की आवाज दूर दूर तक जाएगी। मैंने बंद गली में बिना श्रोताओं के अपना भाषण दिया,वहां उस कॉमरेड और रिक्शाचालक के अलावा और कोई नहीं था।

मैं भाषण देकर स्थानीय पार्टी ऑफिस चला आया ,वहां पर बैठे लोकल सचिव से मेरे साथ गए कॉमरेड ने कहा कि मीटिंग बहुत अच्छी हो गयी है,और इन्होंने बढ़िया भाषण दिया। मैंने कहा कि वहां तो कोई सुनने वाला नहीं था, घर अंदर से बंद थे, जो लोग आ रहे थे वे रुक नहीं रहे थे,सीधे घरों में जा रहे थे और दरवाजे बंद कर ले रहे थे,यह मीटिंग नहीं है,बल्कि बकबास है, लोकल सचिव ने कहा आप नहीं जानते इस इलाके में ऐसे ही मीटिंग होती है मैंने पूछा क्यों तो बोला यह वेश्याओं की गली है यहां सब पेशेवर वेश्याएं रहती हैं और धंधा करती हैं। जो लोग आ जा रहे थे वे उनके ग्राहक थे। मैंने कहा आपलोग इसे रोकते क्यों नहीं ? इस पर वह ऊटपटांग तर्क देने लगा,मैं उससे सहमत नहीं हो पाया, अंत में मैंने राज्य पार्टी ऑफिस आकर का. अनिल विश्वास को सारा किस्सा बताया कि मुझे इस तरह के इलाकों में न भेजें, वे बोले क्या करें पार्टी को उन लोगों में वोट के लिए जाना होता है। मैंने कहा मैं ऐसे इलाकों में नहीं जा पाऊँगा।इस पर बोले लोकतंत्र में सबसे वोट चाहिए। हम वेश्यावृत्ति रोक नहीं सकते। लेकिन वोट तो मांग सकते हैं।



कोलकाता और मिथ भंजन

       
मैं पहलीबार कोलकाता एसएफआई कॉफ्रेंस में शामिल होने आया था। संभवतः1981-82 की बात है।अनेक मित्र थे जो जेएनयू से इस कॉफ्रेस में डेलीगेट के रुप में आए थे । मुझे याद है कॉफ्रेंस को बीच में आधा दिन का अवकाश करके डेलीगेट को फुटबाल का मैच दिखाने की व्यवस्था की गयी। मैं और अजय ब्रह्मात्मज दोनों मैच देखने की बजाय धर्मतल्ला घूमने चले आए,हमने मैच नहीं देखा। एक मजेदार हादसा हुआ और उसने कोलकाता और वाम राजनीति का पहलीबार एक मिथ तोड़ा। मिथ यह था कि वामदल जहां होते हैं वहां समाज बहुत ही सुंदर और नैतिक दृष्टि से अव्वल होता है।

हम दोनों धर्मतल्ला में मद्रास होटल के आसपास नीचे घूम रहे थे अचानक एक दलाल आया और मेरे कान में धीरे कहने लगा 'छोरी चाहिए छोरी चाहिए'-'चोरी का माल चाहिए ,चोरी का माल चाहिए' , वह लड़कियों का सप्लायर था। अजय मुझसे थोड़ा दूर मूडी बनवा रहा था, मैं घबड़ाकर उसके पास गया और कहा कि सामने जो आदमी देख रहे हो वो यह सब कह रहा है, अजय ने कहा वो मुझसे क्यों नहीं कहता,कुछ देर बाद वो आदमी फिर पास से गुजरा और वही पंक्तियां दोहरा गया। इस घटना ने पहलीबार वाम का मिथ तोड़ा।

ताकतवर वाम आंदोलन के होते हुए सड़क पर सरेआम औरतों को वेश्यावृत्ति कराने वाले छुट्टा घूम रहे थे,इस धंधे में शामिल औरतें वहीं कहीं पर मौजूद थीं,यह हमारे लिए चौंकाने वाली चीज थी। सड़क पर सरेआम धंधेबाजी बिना पुलिस की मदद के संभव नहीं थी, साथ ही कोलकता में जहां पर हर गली-मुहल्ला वाम के दखल और निगरानी में था वहां पर इस तरह का कांड़ निरंतर धंधे के रुप में चल रहा हो तो इसमें राजनीतिक दलों के संरक्षण से भी इंकार नहीं किया जा सकता।



रविवार, 29 जून 2014

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा


        रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम पर बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।
अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।
अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।
अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण के आने के बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। खासकर उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला।मसलन् अस्मिता निर्माण के उपकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हुई हैं।
उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित,अवसादमय, वर्णशंकर, रूपों को जन्म दिया। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक, साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता की राजनीति का विमर्श फैला हुआ है।
आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।
अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।
भारत की खोज से सभ्यता विमर्श सामने आया,अछूत खोज ने परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोला। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।
आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया।
अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाय।
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बारे में रामविलास शर्मा ने जिस नजरिए से विचार किया है उसके आधार पर अस्मिता की राजनीति को समझने में हमें मदद मिल सकती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा की'गाँधी,आम्बेडकर ,लोहिया और इतिहास की समस्याएँ' (2000) किताब बेहद महत्वपूर्ण है।
सामंतवाद,साम्राज्यवाद ,क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग, राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत समस्या को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्ति ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।
रामविलास शर्मा ने लिखा है '' भारत में वर्ग हैं, जाति बिरादरी हैं।दोनों यथार्थ हैं। परंतु वर्ग ऐसा य़थार्थ है जो जीवंत है,जो आगे बढ़ रहा है और जाति बिरादरी ऐसा यथार्थ है जो मर रहा है और पिछड़ रहा है। आम्बेडकर ने कहा थाः जब परिवर्तन आरंभ होता है,तब सदा पुराने पुराने और नए के बीच संघर्ष होता है। नए का समर्थन न किया जाए तो यह खतरा बना रहता है कि वह इस संघर्ष में निरस्त कर दिया जाएगा।"
रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर की विश्वदृष्टि की खोज करते हुए रेखांकित किया कि उनके दृष्टिकोण का आधार वर्ग हैं।मजदूरवर्ग है। न कि जाति। उन्होंने लिखा है, " यदि इस समय अभ्युदयशील वर्गों का समर्थन न किया गया, जाति-बिरादरी का समर्थन किया गया, तो यह संभव है,जाति-बिरादरी बनी रहे और वर्गों की भूमिका पीछे छूट जाए। जाति-बिरादरी के भेद वर्गों के संगठन और वर्ग संघर्ष द्वारा ही संभव किए जा सकते हैं।आम्बेडकर ने कहा था,मजदूरवर्ग को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा थाःमजदूरों को केवल अपने संघ कायम करने से संतोष नहीं करना चाहिए उन्हें घोषित करना चाहिए कि उनका उद्देश्य शासन-तंत्र पर अधिकार करना है।" दुखद बात यह है कि आम्बेडकर की वर्गीय दृष्टि की बजाय अस्मिता की राजनीति करने वालों ने जाति और वर्ण के बारे में लिखी बातों को अपना लिया है और बाकी सारी बातों को त्याग दिया है।
भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।
आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति सिर्फ मनोवैज्ञानिक चीज नहीं है। उसका ठोस आर्थिक आधार है। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं है। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?
अनेक विचारक वर्णभेद को नस्लभेद के रूप में चित्रित करते हैं। इस चित्रण को बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से साहित्य में इस्तेंमाल किया जा रहा है। आम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते।दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी ,वे लगातार अपने विचारों का विकास करते हैं। विचारों की विकासशाल प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे। आम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि आर्य एक जाति थी,नस्ल थी। आमेहेडकर ने इस धारणा का खंडन किया है। आर्य एक समुदाय था। "आम्बेडकर ने लिखाः आर्य एक जन समुदाय का नाम है। जो चीज उन्हें आपस में बैंधे हुए थी,वह एक विशेष संस्कृति,जो आर्य संस्कृति कहलाती थी,को सुरक्षित रखने में उनकी दिलचस्पी थी। जो भी आर्य संस्कृति स्वीकार करता था,वह आर्य था।आर्य नाम की कोई नस्ल नहीं थी।" आम्बेडकर ने यह भी लिखा है कि " आर्यों में रंग संबंधी द्वेषभाव था जिससे उनकी समाज व्यवस्था निर्धारित हुई,यह बात निहायत बेसिर-पैर की है।यदि कोई ऐसा जन-समुदाय था जिसमें रंग सम्बन्धी द्वेषभाव का अभाव था तो वह आर्यों का समुदाय था और ऐसा इसलिए कि उनमें कोई ऐसा रंग प्रधान नहीं था जिससे वे अलग पहचाने जाते।"
भीमराव आम्बेडकर ने इस धारणा का भी खंडन किया है कि दस्यु लोग अनार्य थे।वे यह भी नहीं मानते कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। वे यह भी मानते हैं कि शूद्र भी आर्य हुआ करते थे।
भीमराव आम्बेडकर ने सन् 1946 में 'शूद्र कौन थे ?' ( हू वेयर द शूद्राज ) नामक किताब लिखी। इस किताब में पश्चिमी विद्वानों की तमाम धारणाओं का उन्होंने खंडन किया। " आम्बेडकर ने इन विद्वानों की 7 मुख्य स्थापनाएँ प्रसुत की हैः 1. जिन लोगों ने वैदिक साहित्य रचा था, वे आर्य नस्ल के थे। 2. यह आर्य नस्ल बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया था ।3. भारत के निवासी दास और दस्यु के रूप में जाने जाते थे और ये आर्यों से नस्ल के विचार से भिन्न थे।4. आर्य श्वेत नस्ल के थे, दास और दस्यु काली नस्ल के थे।5. आर्यों ने दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त की।6.दास और दस्यु विजित होने के बाद दास बना लिए गए और शूद्र कहलाए।7. आर्यों में रंगभेद की भावना थी और इसलिए उन्होंने चातुर्वर्ण्य का निर्माण किया। इसके द्वारा उन्होंने श्वेत नस्ल को काली नस्ल से, यथा दासों और दस्युओं से अलग किया। आगे आम्बेडकर ने इन सातों स्थापनाओं का खंडन किया।" इन सभी मतों का इन दिनों प्राच्यवादी पश्चिमी विचारक खूब प्रचार कर रहे हैं।इन विचारों से हिंदी लेखकों का एक तबका भी प्रभावित है।
रामविलास शर्मा ने सवाल उठाया है कि शूद्र अनार्य नहीं थे तो वे कौन थे ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आम्बेडकर के विचारों का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है, " इस प्रश्न के उत्तर में आम्बेडकर की तीन स्थापनाएँ हैः (1) शूद्र आर्य थे।(2) शूद्र क्षत्रिय थे। (3) क्षत्रियों में शूद्र ऐसे महत्वपूर्ण वर्ग के थे कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा शूद्र हुए थे।"
रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर का मूल्यांकन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं दी हैं। ये अवधारणाएं अनेक मामलों में आम्बेडकर के चिंतन से भिन्न मार्क्सवादी नजरिए को व्यक्त करती हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है, "आम्बेडकर के विचार से हिंदुओं का जो साहित्य पवित्र या धार्मक कहलाता है,वह प्रायःसबका सब ब्राह्मणों का रचा हुआ है।ब्राह्मण विद्वान् उसका आदर करें, यह स्वाभाविक है।उसी तरह अब्राह्मण विद्वान उसके प्रति आदर प्रकट न करें, यह भी स्वाभाविक है। यहाँ ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद करने के बदले पुरोहित और अपुरोहित का भेद करना उचित होगा। बहुत से ब्राह्मणों ने पुरोहित वर्ग के विरुद्ध साहित्य रचा है।इसके सिवा प्राचीन साहित्य का कुछ अंश क्षत्रियों का रचा हुआ भी है।और जो सबसे पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद है,उसे रचने वाले सामंती व्यवस्था के ब्राह्मण थे,इसका कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जब अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं,तब उत्पादन से उनका संबंध टूट जाता है। अपने से भिन्न श्रमिक वर्ग के बिना वे अवकाश में जीवन बिता नहीं सकते। ऋग्वेद में शूद्र शब्द केवल एक बार पुरूष सूक्त में आया है और वह सूक्त बाद में जोडा गया है,यह बहुत से लोगों की मान्यता है।यदि ऋग्वेद में शूद्र नहीं हैं, तो उस में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी नहीं हैं।"
रामविलास शर्मा इस धारणा का भी खंडन किया है कि साहित्य का उदभव किसी धार्मिक पाठ से हुआ है। वे मानते हैं कि साहित्य का उदभव लौकिक या सेक्युलर होता है। इस मिथ का भी खंडन किया है कि प्राचीनकाल में ब्राह्णणों की प्रधानता थी। उनका मानना है कि " भारयीय समाज में पहले क्षत्रियों की प्रधानता थी,ब्राह्मणों की नहीं,यह उस साहित्य से प्रमाणित होता है जिसे ब्राह्मणों का रचा हुआ माना जाता है।"
रामविलास शर्मा ने यह भी लिखा है कि रामायण,महाभारत के नायक क्षत्रिय माने गए हैं।किसी भी प्राचीन महाकाव्य का नायक ब्राह्मण नहीं है। यही नहीं, महाभारत में धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले अब्राह्मण ही हैं। युधिष्ठिर को धर्म और राजनीति की बातें भीष्म समझाते हैं और अर्जुन को दर्शन और धर्म का ज्ञान कृष्ण देते हैं। महाभारत में एक प्रसिद्ध ब्राह्मण है द्रोणाचार्य। वह राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं और युद्ध में सेनापति का कार्य करते हैं।इन कथाओं में शस्त्रयुक्त क्षत्रिय और शस्त्रविहीन ब्राह्मण वर्गों का अस्तित्व नहीं है।"
बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित मतों का खंडन करते हुए लिखा "शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे,आर्यों के शत्रु थे।आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं ? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा प्रकट क्यों करते हैं ?शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास् ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए ? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास् ने अश्वमेध कैसे किया ?शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है ? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए,इसके लिए शब्द भी बताता है।शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है।यदि आरंभ में ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा ? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह संपत्ति संग्रह नहीं कर सकता।ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों उल्लेख कैसे है ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता। ऐसा था तो महाभारत के राजाओं के मंत्री शूद्र थे,ऐसा क्यों कहा गया ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास् के उदाहरण से,तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है।"
आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

कोलकाताचेतना नया फिनोमिना


       मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में नौकरी ली और वहां पढ़ाने गया तो दो-तीन दिन बाद स्टाफरुम में जेएनयू के दो पुराने मित्रों से मुलाकात हुई,एक राजनीतिविज्ञान में प्रवक्ता थे और दूसरे विज्ञान में। वे दोनों मिलकर बड़े खुश हुए ,लेकिन तत्काल बोले तुम दिल्ली छोड़कर यहां क्यों आए नौकरी करने ? कोलकाता कोई अच्छी जगह नहीं है। मेरे लिए उनका कथन चौंकाने वाला था।

दूसरी घटना यह घटी कि कोलकाता के दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने मेरे खिलाफ परिचय हुए बिना मोर्चा खोल दिया और रोज अखबारों में मेरे खिलाफ लिखाना आरंभ कर दिया । मेरे खिलाफ रोज एक नयी गॉसिप वे तैयार करके सप्लाई करते। उनके गॉसिप अभियान ने रंग दिखाया और आनंद बाजार पत्रिका से लेकर संडे मेल तक,यहां तक कि स्थानीय हिन्दी अखबारों में भी मेरा इन दो स्वनाम धन्य हिन्दी शिक्षकों ने यश फैला दिया। मजेदार बात थी कि ये दोनों शिक्षक मुझसे नियमित मिलते भी थे और सामने प्रशंसा करते पीछे से चुगली और निंदा करते। इस समूचे प्रकरण ने मुझे पश्चिम बंगाल के हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवियों को समझने के अनेक सूत्र दिए।

इस राज्य में हिन्दीभाषीचेतना मूलतः व्यक्तित्वहीनचेतना है। जिसकी अभिव्यंजना उन दो शिक्षकों में मिलती है जिनका मैंने जिक्र किया। विलक्षण बात है हिन्दीभाषी यहां व्यक्तित्व निर्माण नहीं कर पाए, अपनी अस्मिता का निर्माण नहीं कर पाए। बंगाली जाति अपनी अस्मिता बचाने के लिए जंग कर रही थी। अस्मिता के ह्रास और अभाव को इस तरह हिन्दीभाषी और बंगाली एक-दूसरे के पूरक की तरह झेल रहे थे।

जिन दो बंगाली शिक्षकों ने मेरे कोलकाता आने पर आश्चर्य व्यक्त किया था वे यह मान चुके थे कि कोलकाता एक चुका हुआ शहर है। इसमें विकास की संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं। मैं उस समय वामचिंतन के असर में था लेकिन शहर और विश्वविद्यालय की दशा के साथ माकपा के नेताओं और खासकर शिक्षक नेताओं के रवैय्ये को देखकर अपने नजरिए को बदलने को मजबूर हुआ।

मैं जब कोलकाता आया था तो इस शहर का ह्रासकाल आरंभ हो गया था। शहर के ह्रासकाल में बुद्धिजीवियों .या फिर कहें मध्यवर्ग के लोगों में सबसे पहले भगदड़ मचती है ,वे नए शहरों की ओर भागते हैं। ह्रास के इस दौर में पहले मध्यवर्ग ने भागना आरंभ किया फिर गांवों से पलायन आरंभ हुआ।

वामशासन की विचारधारा आम जनता में स्थानीय मोह पैदा करने की बजाय स्थानीय अलगाव पैदा करने में सफल रही। वाम विचारधारा से स्थानीय अलगाव पैदा होता है यह बात मैंने यहीं पर आकर सीखी। मजेदार बात है कि जो वाम के साथ है वो ही बाहर जाने की कोशिश कर रहा है। जो वाम राजनीति कर रहा है वही कह रहा है चीजें बदल रही हैं,अपना राज्य अच्छा नहीं लग रहा। यहीं पर आकर मैंने कोलकाताचेतना के दर्शन किए इसे मैं पश्चिम बंगाल के लिए सबसे खतरनाक चेतना मानता हूँ।

कोलकाताचेतना के कारण ही जो बंगाली जाति एक जमाने में इस राज्य पर गर्व करती थी वही अब गर्व नहीं करती। वामशासन के बाद पश्चिम बंगाल के स्वाभिमान और आत्मनिर्भर भावबोध का क्षय हुआ और एक विलोम तैयार हुआ वह है कोलकाताचेतना। इस चेतना के लोग अब बाहर जाने के बाद कोलकाता लौटना नहीं चाहते। जो व्यक्ति एकबार यहां से निकल गया वह लौटकर वापस यहां आना नहीं चाहता। अपनी जमीन, अपने शहर, अपने परिवेश,अपनी भाषा,अपनी संस्कृति आदि से अलगाव कोलकाताचेतना की विशेषता है। बंगाली जाति को इस चेतना ने सामाजिक की बजाय व्यक्तिकेन्द्रित बना दिया। अब बंगाली जाति सामूहिक भावबोध की बजाय व्यक्तिगत भावबोध में डूब गयी। उनके लिए पश्चिम बंगाल रहने की नहीं कभी-कभार पर्यटन की जगह होकर रह गया। वामशासन के बाद कोलकाता में ही नहीं समूचे बंगाल में बुनियादी बदलाव आया उसने समूचे राज्य को देश के अन्यान्य क्षेत्रों में जाने के लिए मजबूर कर दिया। विकास की संभावनाएं खत्म होती चली गयीं उसके कारण मध्यवर्ग की आशाएं भी स्थानान्तरित होती चली गयीं।



पश्चिम बंगाल में वामशासन 1977 में आया उसके बाद चीजें तेजी से बदलीं इनमें सबसे बड़ी चीज बदली वह थी पश्चिम बंगाल की आत्मनिर्भरभावना। वाम के पहले यह राज्य आत्मनिर्भर राज्य था,वामशासन में आत्मनिर्भर भावबोध का चौतरफा ह्रास हुआ। आत्मनिर्भरता के अवसर इस शहर में कम होते गए। बाहर से आने वाले लोगों की संख्या कम होती गयी और बाहर जाने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गयी।जो यहां रह गए उनमें सकारात्मक भावबोध की बजाय कुंठा-हताशा का विस्तार होता गया,उसका ही दुष्परिणाम है कि आज पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा निराशा में डूबा हुआ राज्य है। वाम आंदोलन,आक्रामक मार्क्सवाद,संगठनबद्ध समाज ने एक खास किस्म की घेरेबंदी आरंभ की जिसके कारण जो घेरे में है वह जीवित है जो घेरे के बाहर है वह परेशान है और भागने की तैयारी में है।

शनिवार, 28 जून 2014

भाषा की गुलेल

         बेहद संवेदनशील और गंभीर शहर है। इसमें महानगर ,गांव और छोटे शहर की मनोदशाएं एक ही साथ तैरती रहती हैं। इन तीनों मनोदशाओं को बाजार से लेकर ऑफिस तक,कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालय तक अंतर्क्रियाएं करते देख सकते हैं। यहां इन तीनों मनोदशाओं के साक्षात चित्र भी मिल जाएंगे। इच्छाओं का ऐसा संगम अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। यह तय करना मुश्किल है कि इस शहर का ड्राइवर कौन है ? महानगरीय भावबोध या ग्रामीण भावबोध ?

यह ऐसा शहर है जिसके सामान्य बहस मुबाहिसे में गरीब-मेहनतकश के स्वर-दुख,भाषा,भाषिक मुहावरे और जरुरतों को आप चलते फिरते सुन सकते हैं,महसूस कर सकते हैं। विभिन्न समस्याओं पर लोग बातें करते,भाषण देते मिल जाएंगे,और एक ही नारा सब जगह मिलेगा,'गरीब की कौरे वांचबे',या गरीब कैसे जिंदा रहेगा ?

महंगाई पर बात करो यही टेक सुनने को मिलेगी, वाम और दक्षिण राजनीति पर बात करो तो यह टेक सुनने को मिलेगी। मेहनतकशों और ग्रामीणों की भाषा और उससे जुड़े मुहावरे ,टेक और संस्कृति को आप यहांके बाजारों में तैरते हुए महसूस कर सकते हैं। जिंदादिली और व्यंग्य में वाद-विवाद का तो खैर कोलकाता में जो आनंद है वह शायद और कहीं पर देखने को न मिले।

एक वाकया देखा।एक दिन मिनीबस में दमदम पार्क से मेडीकल कॉलेज जा रहा था। मिनीबस में अच्छी खासी भीड़ थी, लोगों के हाथ और शरीर एक-दूसरे से टकरा रहे थे। अचानक देखा कि दो यात्री आपस में विवाद करने लगे। एक का दूसरे से शरीर रगड़ा खा रहा था,पहले ने दूसरे से कहा सीधे खड़े हो और अपने शरीर का वजन ठीक रखो। दूसरे व्यक्ति ने कहा मैं ठीक ही खड़ा हूँ,आप सही ढ़ंग से खड़े हों।इसी पर बातचीत थोड़ा तेजभाषा में शिफ्ट कर गयी।

कुछ देर बाद पहले व्यक्ति ने दूसरे से कहा 'बोकार मतो दांडिए आछो', पहले ने ध्यान नहीं दिया,बात फिर आगे बढ़ गयी ,पहले ने फिर कहा ' इडियटेर मतो दांडिए आछो', यह शब्द सुनते ही दूसरा व्यक्ति भड़क गया और बोला 'इडियट ' क्यों कहा ? यह मेरा अपमान है ? पहले ने कहा मैंने तो तुमको पहले 'बोका' कहा था तब तुमको गुस्सा क्यों नहीं आया ? अब इडियट कहने पर क्यों भड़क रहे हो,इस पर पहला बोला 'इडियट' मत बोलो,यह गाली है,दूसरे ने कहा 'बोका' भी तो कहा तब गुस्सा क्यों नहीं आया ? यह संवाद सुनकर सारी मिनीबस हँस रही थी और वे दोनों 'बोका' और 'इडियट' की बहस में उलझे हुए इन दोनों शब्दों की सांस्कृतिक मीमांसा करते हुए अपने गुस्से का इजहार कर रहे थे। भाषा में आनंद लेना,सहज ग्रामीण और शिक्षित भाषा में तकरार करना और भाषिक प्रयोगों पर गर्व करना कोलकाता की जान है। यह भाषिक रंग अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है।













































शुक्रवार, 27 जून 2014

कमाऊ चेतना के हिन्दीभाषी

        सन् 1989 से पहले कोलकाता दो बार आया था।एकबार एसएफआई के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय और दूसरीबार अपनी शादी के समय।लेकिन कोलकता को समझने का मौका तब ही मिला जब 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर नौकरी मिली। उसके बाद ही कोलकाता के हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों और बंगाली बुद्धिजीवियों को करीब से देखने और जानने का मौका मिला।

पहले दो अनुभव बड़े ही शानदार रहे। मैंने एकदिन एक कार्यक्रम के सिलसिले में अभिनेता उत्पल दत्त को फोन किया, मैंने फोन पर उनसे लंबी बातचीत की।मैं बेहद खुश हुआ कि फोन उन्होंने ही उठाया था। मैं चाहता था कि कोलकाता के 300साल होने पर वे बोलें। मेरा प्रस्ताव सुनकर वे बेहद खुश हुए काफी बातें भी कीं,बोले, मैं इनदिनों अस्वस्थ चल रहा हूँ वरना मैं जरुर जाता। उसके बाद मैंने रंगमंच के बड़े अभिनेता अरुण मुखर्जी को फोन किया उनसे मिलने घर गया,लंबी बातचीत हुई,वे कार्यक्रम में आए भी। उनसे बातचीत में पता चला कि उत्पल दत्त और सत्यजित राय दोनों अपना फोन स्वयं उठाते हैं और घर पर आने वाले को दरवाजे तक छोड़ने भी जाते हैं। यह शिष्टाचार बहुत ही अच्छा लगा।

मजा तब आया जब कोलकाता के 300 के कार्यक्रम में विष्णुकांत शास्त्री को अभिनेता अरुण मुखर्जी की तीखी आलोचना का मंच से सामना करना पड़ा। मुझे याद पड़ रहा है शास्त्रीजी के पास अपनी कोई डिफेंस नहीं थी। हिन्दीभाषी और बंगलाभाषी बुद्धिजीवी भिडंत का यह मेरा पहला अनुभव था। अरुण मुखर्जी ने साफ कहा कि हिन्दीभाषी लोग कोलकाता की मुख्यधारा में रहकर भी बंगला संस्कृति और सभ्यता को न तो समझे हैं और और नहीं उनमें आत्मसात्करण की प्रक्रिया नजर आती है। इस क्रम में उन्होंने कहा मैंने बंगला नाटकों के दर्शकों में कभी हिन्दीभाषी नहीं देखे। कभी-कभार इक्का-दुक्का हिन्दीभाषी दर्शक नजर आते हैं।



पहली भिडंत में यह तथ्य सामने आया कि एक साथ रहते हुए भी बंगला रैनेसां का हिन्दीभाषियों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। हिन्दीभाषी लोग यहां कमाने,खाने,मनीआर्डर करने से आगे चेतना विकसित नहीं कर पाए हैं। यह कार्यक्रम कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दीविभाग ने आयोजित किया था।

गुरुवार, 26 जून 2014

थानेदार यूजीसी का बेसुरापन

        डीयू में बीए में दाखिले को लेकर यूजीसी रोज सर्कुलर इस तरह जारी कर रहा है गोया वो छात्रों का सबसे बड़ा रखवाला हो ! सच यह है यूजीसी केन्द्र सरकार का पिछलग्गू संस्थान है। दिविवि और यूजीसी की टकराहट में विवि प्रशासन के जिद्दीभाव ने काफी मुश्किलें खड़ी की हैं। मुझे एक वाकया याद आ रहा है सन् 1983 में जेएनयू में किसी समस्या पर आंदोलन हुआ जेएनयू प्रशासन और छात्रों के बीच टकराव हुआ।समूचा छात्र आंदोलन कुचल दिया गया। नरसिंहा राव शिक्षामंत्री थे। मैं उन दिनों जेएनयू में एसएफआई का अध्यक्ष था।छात्रसंघ पर समाजवादी युवजनसभा का कब्जा था। समूचा छात्र समुदाय एकजुट होकर संघर्ष कर रहा था।

छात्र आंदोलन का दमन करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया। छात्रावास खाली करा दिए गए। यह आंदोलन मई1983 में हुआ था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी नियम कायदे तोड़कर सारी नीतियां बदल दीं। किसी से राय नहीं ली,किसी की राय नहीं सुनी। छात्र,शिक्षक,कर्मचारी संगठनों की राय नहीं मानी और नहीं विभागों में बैठक हुई,नहीं बोर्ड आफ स्टैडीज की मीटिंग हुई।

जेएनयू की सारी नीतियां शिक्षा मंत्रालय के आदेश से एक ही एसी मीटिंग में चंद मिनटों में बदल दी गयीं। जुलाई में होने वाले नए सत्र के दाखिले नहीं किए गए। पहलीबार किसी केन्द्रीय विश्वविद्यालय में नए दाखिले नहीं हुए। पुराने छात्र कोर्स खत्म करके चले गए। जेएनयू की छात्र संख्या मई 1983 में 3000के आसपास थी जो जुलाई में घटकर 1400 के आसपास हो गई। 400छात्रों पर 18 धाराओं में झूठे मुकदमे ठोक दिए गए। 170 से अधिक छात्रों को निष्कासित कर दिया गया। हमसभी छात्रों ने इस सबके खिलाफ यूजीसी को कईबार ज्ञापन दिया। नए सत्र में दाखिले की मांग की। अलोकतांत्रिक ढ़ंग से नीतियों के बदले जाने का विरोध किया।यह भी बताया कि जेएनयू की नीतियां बदलने के पहले विभिन्न स्तरों पर सहमति नहीं ली गयी। किसी भी वर्ग की राय नहीं ली गयी। यहां तक कि जेएनयू की दाखिलानीति तक बदल दी गयी जो संसद से स्वीकृत थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।

उल्लेखनीय है जेएनयू के इस नीतिगत परिवर्तन के विरोध में हम सभी छात्रों ने हर स्तर पर गुहार लगायी। पीएम,राष्ट्रपति,यूजीसी,सभीदलों के सांसदों आदि सबसे अनुरोध किया अंत में परिणाम जीरो निकला। जेएनयू में जुलाई 1983 में दाखिले नहीं हुए। प्रशासन ने नई नीतियों के तहत एक साल बाद दाखिले लिए ,हमलोगों ने जुलाई 1983 में वि वि खुलने पर पूरे साल संघर्ष चलाया यूजीसी दसियों बार गए लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। यूजीसी का यही कहना था कि विश्वविद्यालय स्वायत्त है हम कुछ नहीं कर सकते।

कोई भी व्यक्ति जेएनयू के जुलाई1983 में दाखिले न लिए जाने की सच्चाई जेएनयू जाकर या उस समय के अखबार पढ़कर जान सकता है। कोई अखबार नहीं है जिसने जेएनयू के छात्रों की खबर को प्रथम पन्ने पर न छापा हो। लेकिन न तो केन्द्र सरकार ने सुना और नहीं यूजीसी ने। सभी ने यही कहा हम हस्तक्षेप नहीं कर सकते। लेकिन इधर दिविवि के खिलाफ शिक्षकों और छात्रों के आंदोलन के पक्ष में एक साल बाद यूजीसी की अति सक्रियता चिन्ता पैदा करती है। यूजीसी रोज दाखिले शुरु करने के लिए दबाव डाल रहा है। धमकियां दे रहा है।



जबकि यही सक्रियता जेएनयू के प्रसंग में गायब थी। जेएनयू में जो कुछ विश्वविद्यालय कर रहा था वह केन्द्र सरकार की अनुमति से कर रहा था। फलतःयूजीसी भी उस पाप में शामिल हो गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और डीयू के टकराव का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि विश्वविद्यालय की नीतियां बनाने , कोर्स आदि बनाने के बारे में फैसले लेने की हक किसको है ? यूजीसी की क्या भूमिका है औरकहां तक है ? इस मसले पर कायदे से अदालत से स्पष्ट नीतिगत निर्देश लेने की जरुरत है।इसके लिए दिविवि के दाखिले यदि कुछ विलम्ब से भी हो सकते हैं। अदालत के हस्तक्षेप की जरुरत इसलिए भी है क्योंकि यूजीसी ने अपने कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण किया है। वह थानेदार की भूमिका में उतर आया है।



बुधवार, 25 जून 2014

डीयू शिक्षक आंदोलन के अछूते प्रश्न


         डीयू के शिक्षक आंदोलन कर रहे हैं, वे बड़े आंदोलन कर चुके हैं और अनेक आंदोलन जीत भी चुके हैं,यह भी सच है उनके अंदर अपने शिक्षकों के हितों की रक्षा का भाव बड़ा प्रबल है। शिक्षकों में इस तरह का जागरुक संगठन सभी कॉलेज-विश्वविद्यालयों में होता तो बहुत अच्छा होता। मैंने निजी तौर पर उनके अनेक संघर्षों में समर्थक के नाते हिस्सा भी लिया है। वहां संगठन करने वाले नेताओं में एक अच्छा-खासा अंश बेहद संवेदनशील और जागरुक है। लंबे संघर्षों को लड़ने का जो तजुर्बा डीयू के शिक्षकसंघ के पास है वैसा अनुभव अन्यत्र किसी भी विश्वविद्यालय के शिक्षक संगठन को नहीं है।

शिक्षकों के अनेक मूल्यवान हकों को दिलाने में डीयू शिक्षकसंघ की महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिका रही है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि डीयू के शिक्षकसंघ का इस विश्वविद्यालय के अकादमिक स्तर को ऊँचा उठाने में बहुत कम योगदान है। मसलन् शिक्षकों के द्वारा अकादमिक जिम्मेदारियों का ठीक से पालन हो इस ओर शिक्षकसंघ ने ध्यान ही नहीं दिया। इस विश्वविद्यालय के शिक्षकों के पास भारत में सबसे अधिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुविधाएं हैं, संसाधन हैं,पगार भी बेहतरीन है।लेकिन शैक्षणिक वातावरण में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है । उलटे अकादमिक वातावरण में गिरावट आई है।

शिक्षकों में भाई-भतीजावाद चरम पर है. शिक्षकों की कक्षाओं में अनुपस्थिति खूब रहती है। प्रिफार्मेंस जरुरत के अनुरुप नहीं है। शिक्षकसंघ को इन चीजों को देखना चाहिए।

शिक्षक संघ में इसके विपरीत एक बीमारी घुस आई है कि वे शिक्षकों को गैर-पेशेवर बनाने में लगे रहते हैं। वे गैर-अकादमिक कार्यों में मशगूल रखते हैं। शिक्षक संघ का काम सिर्फ आंदोलनकारी निर्मित करना नहीं है बल्कि उसका काम पेशेवर शिक्षण को बढ़ावा देना भी है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन साला कोर्स रहे या चारसाला कोर्स रहे, यह महत्वपूर्ण नहीं है। पढ़ाने वाले कैसे हैं ? क्या पढ़ाने वाले शिक्षकों के स्तर में सुधार आएगा ? विश्वविद्यालय और कॉलेजों में समस्या कोर्स के साथ साथ शिक्षक की भूमिका की भी है। शिक्षकों में एक बड़ा वर्ग ऐसा पैदा हुआ है जो शिक्षा के दायित्वों को मांग-पूर्ति के फ्रेमवर्क में निभाता रहा है। इसमें भी अनुपस्थित शिक्षकों की तादाद बहुत बड़ी है। ये लोग कभी कक्षा में नहीं जाते।

शिक्षकसंघ की यह भूमिका भी है कि शिक्षकों को मजबूर करे कि वे समय पर कक्षा में जाएं और अपनी टीचिंग के स्तर को गुणवत्तापूर्ण बनाएं। मुझे नहीं मालूम कि शिक्षक संघ ने कभी इससे जुडे मसलों पर आंदोलन किया हो या शिक्षकों में जनजागरण अभियान चलाया हो।

शिक्षकों की सामान्य मानसिकता है कि वे हर चीज को रूटिन या रूढि में बदल देते हैं। शिक्षक की मानसिकता रुढिबद्धता से मुक्त होकर कक्षा और अनुसंधान मेंभूमिका निभाए इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।

जो शिक्षक समाज का प्रेरक है उसके हकों के लिए लड़ना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण है शिक्षक को पेशेवर शिक्षक में रुपान्तरित करना। शिक्षक को पेशेवर शिक्षक में रुपान्तरित किए बिना शिक्षा को नहीं बचा सकते।इस समाज को मरने से नहीं बचा सकते।

शिक्षकों में राजनीति हो, लेकिन पेशेवर शिक्षा की चेतना भी हो। हमारे शिक्षकों और शिक्षक संगठनों ने दुनिया से बहुत कुछ सीखा है लेकिन पेशेवर शिक्षण की कला बहुत कम शिक्षकों ने सीखी है। हम लोगों के बीच पेशेवर शिक्षक दुर्लभ होते जा रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थिति तो और भी भयावह है। शिक्षक संगठनों ने शिक्षक को पेशवर शिक्षक बनाने की जिम्मेदारी निभायी होती तो जो चीजें डंडे से चलायी जा रही हैं वे बातों से हल हो सकती थीं।

शिक्षकों में पेशेवराना नजरिए को विकसित न कर पाने के कारण हम दुनिया में पिछड़ते जा रहे हैं। चारसाला कोर्स के प्रसंग में टीवी पर आए कवरेज में यह बात सामने आई कि इस कोर्स का स्तर बड़ा घटिया है या इसमें प्राथमिक स्तर की चीजें पढाई जा रही हैं। सवाल यह है कि यह प्राथमिक स्तर का कोर्स भी डीयू के शिक्षकों ने बनाया है। हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि शिक्षको में ज्ञान का ऊँचा स्तर क्यों नहीं है ? डीयू के प्रशासक भी शिक्षक हैं,इसके बावजूद शिक्षा में निम्नस्तर के साल जब उठ रहे हैं तो यह इस बात का संकेत है कि डीयू का समग्रता में अकादमिक स्तर जितना ऊँचा होना चाहिए वैसा नहीं बन पाया है।

शिक्षा के स्तर को ऊँचा उठाने में प्रशासन के अलावा शिक्षक संगठन की बड़ी भूमिका हो सकती है लेकिन इस भूमिका की ओर शिक्षकसंघ ने कभी ध्यान नहीं दिया। मूल सवाल यह है कि शिक्षकसंघ ने पेशेवर शिक्षक के निर्माण में भूमिका अदा क्यों नहीं की ? क्या शिक्षकसंघ इस जिम्मेदारी से बच सकते हैं ?

शिक्षकसंघ यदि हकों की जंग लड़ना जानता है तो उसे यह भी जानना चाहिए कि पेशेवर शिक्षा का माहौल कैसे बनाया जाता है ? शिक्षकों के हकों की लडाई तात्कालिक होती है लेकिन पेशेवर शिक्षा का माहौल बनाए रखने की लडाई अहर्निश लड़नी पड़ती है। हमारे शिक्षक संघ शिक्षा की पेशेवर जंग के एकदम विपरीत खड़े रहते हैं, शिक्षकहकों की रक्षा के नाम पर कामचोर और नियमविरुद्ध काम करने वाले शिक्षकों के साथ ही हमेशा नजर क्यों आते हैं ?

शिक्षकों के लोकतांत्रिक हकों में पेशेवर गुणवत्ता विकसित करने की कला का भी स्थान है। पेशेवर कौशल हासिल करना मानवाधिकार का अंग है। मानवाधिकारों में सिर्फ सुविधाएं ही नहीं आतीं।राजनीतिक हक ही नहीं आते अपितु पेशवराना कौशल निर्मित करना भी आता है। डीयू के शिक्षकसंघ ने आंदोलन किए और जीते लेकिन पेशेवर शिक्षक तैयार करने की ओर ध्यान नहीं दिया।



जो शिक्षकसंघ को ट्रेड यूनियन की तरह चला रहे हैं वे क्या बताएंगे कि यदि किसी फैक्ट्री में मजदूर काम में गैर पेशेवर हो,अकुशल ढ़ंग से काम करे तो क्या कोई मालिक उसे सहन करेगा ? क्या कारखाने का स्तर बचा रहेगा ? फिर शिक्षा में ही अकुशल शिक्षक की हिमायत क्यों की जाती है ? अकुशल शिक्षकों को नौकरी से क्यों नहीं निकाला जाता ? क्या शिक्षा का काम फैक्ट्री मजदूर के काम से कम महत्व का है ? जिस तरह अकुशल मजदूर कारखाने के लिए मुसीबत होता है वैसे ही अकुशल शिक्षक भी। हमें अपना नजरिया बदलना होगा। हम अकुशल वकील पसंद नहीं करते अकुशल डाक्टर पसंद नहीं करते हम अकुशल शिक्षक क्यों बनाए रखते हैं और पसंद करते हैं ?

मंगलवार, 24 जून 2014

अंतहीन आंदोलन,हिंसाचार और डीयू


    विश्वविद्यालय स्वायत्त नहीं होते। स्वायत्तता धोखा है।स्वायत्तता कभी नहीं रही।वीसी चमचा होता है।हमेशा अपने चमचों से एसी भर लेता है। एसी का वो मनमानी के लिए दुरुपयोग करता है। सरकार के एजेंट की तरह काम करता है। हठात ये सारे तर्क उनसे सुनने को मिल रहे हैं जो कल तक विश्वविद्यालयों के बारे में हर आंदोलन में यह कहते थे कि हमें हर हालत में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए। ये सारी बातें दिल्ली विश्वविद्यालय के चारसाला पाठ्यक्रम (FYUA) को यूजीसी द्वारा वैध घोषित किए जाने के कारण नए सिरे से उठी हैं।

मेरी दि वि वि के प्रशासन या उसके चार साला पाठ्यक्रम के साथ कोई निजी सहानुभूति या विरोध नहीं है। मैं वस्तुगत तौर पर एक राजनीतिक नजरिए से देख रहा हूँ। चीजें साफ ढ़ंग से नजर आएं इसके लिए एक अनुभव बताता हूँ।

मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति हेतु सन्2000 में आवेदन किया और सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 2001 में मैं प्रोफेसर हो गया।यह मेरा समूचे अकादमिक जीवन में एकमात्र प्रमोशन था। मैं मात्र 11 साल के शैक्षणिक अनुभव के बाद ही प्रोफेसर बन गया। यह सुखद अनुभव इतने कम समय में बहुत कम शिक्षकों को नसीब होता है। जबकि एक शिक्षक तीनबार प्रमोशन पाने का हकदार है। मुझे पदोन्नति का नियुक्ति पत्र मिल गया । बाद में पता चला कि मेरी नियुक्ति प्रक्रिया के सारे कागजात यूजीसी स्वीकृति हेतु भेजे गए हैं और यूजीसी उनको स्वीकृति देगी तब ही मैं प्रोफेसर माना जाऊँगा। मैं परेशान रहने लगा काफी दिन तक यूजीसी का उत्तर नहीं आया ।

एकदिन मैंने कलकत्ता वि .वि .के अधिकारियों से पूछा कि मेरी नियुक्ति पर यूजीसी का स्वीकृति पत्र अभी तक क्यों नहीं आया ? पता चला यह नियम और परंपरा है कि विश्वविद्यालय से नियुक्ति संबंधी जो कागजात यूजीसी भेजे जाते हैं उन पर यदि एक माह के अंदर यूजीसी आपत्ति नहीं भेजती तो मान लिया जाता है कि नियुक्ति वैध है। फलतः यूजीसी से मेरी नियुक्ति बगैर उनके पत्र के एक माह बाद वैध मान ली गयी। यदि मुझसे कोई पूछे कि यूजीसी का नियुक्ति वैधता प्रमाणपत्र दिखाओ तो मैं दिखा नहीं पाऊँगा । यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि दिविवि शिक्षकसंघ बार बार कह रहा है चारसाला पाठ्यक्रम को विजिटर की अनुमति जरुरी है,अब इन ज्ञानी लोगों को कौन बताए कि एक निश्चित समयावधि तक विजिटर आपत्ति नहीं करता तो कोर्स को स्वीकृत मान लिया जाता है और यह कन्वेंशन छह दशक से जारी है। विजिटर यानी राष्ट्रपति ने जब आपत्ति नहीं की तो शिक्षकसंघ के नेताओं की आपत्ति का कोई महत्व नहीं है। विजिटर की स्वीकृति अंतिम होती है।

यूजीसी के फैसले के कारण दि. वि.वि. का चारसाला पाठ्यक्रम आए या जाए, वीसी हटाया जाए या रहे,हमें इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह कोर्स रहेगा या जाएगा इसका फैसला अकादमिक परिषद यानी एसी को ही करना है। यह फैसला बदला भी जा सकता है और बरकरार भी रख सकते हैं।

मीडिया में कहा गया यूजीसी ने दिविवि के चारसाला बीए पाठ्यक्रम को अवैध घोषित कर दिया है। यह बुनियादी तौर पर सही नहीं है। यूजीसी ने पहले इस कोर्स को स्वीकृति दी इसके बाद ही यह कोर्स आरंभ हुआ। यह अनुमति कैसे और क्यों मिली,यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है इसको यूजीसी द्वारा स्वीकृति देना। यह कोर्स विजिटर और राष्ट्रपति के पास भी भेजा गया था। समय पर न तो यूजीसी ने और नहीं विजिटर ने आपत्ति की।इसलिए मान लिया गया कि सबकुछ ठीकठाक है। लागू करो। इस बीच में कोई अदालत भी नहीं गया।

यह भी सत्य है कि चारसाला पाठ्यक्रम का शिक्षकसंघ ने विरोध किया,अनेक छात्रसंगठनों ने भी विरोध किया। यह भी सच है कि वीसी का शिक्षकों और छात्रों के संगठनों के प्रति अलोकतांत्रिक और हठधर्मीवाला रवैय्या था। इससे चीजें सुलझने की बजाय उलझी ज्यादा हैं। आंदोलनकारियों ने चारसाला कोर्स को खत्म करने के आंदोलन को अंतहीन आंदोलन की तरह चलाकर आत्मघाती आंदोलन की शिक्षाविरोधी मिसाल कायम की है।

माकपा में एकवर्ग रहा है जो अंतहीन आंदोलन की राजनीति में विश्वास करता रहा है। अंतहीन आंदोलन के कारण हमेशा लोकतांत्रिक हकों का क्षय हुआ है। प्रशासन को मनमानी करने,हमले करने का बहाना मिलता है। अंतहीन आंदोलन की राजनीति हमेशा गरम गरम नारों और उत्तेजनापूर्ण अविवेकवाद को अभिव्यंजित करती है। यह विवेकहीन बहादुरी का आदर्श नमूना है।दिविवि शिक्षक संघ ने वस्तुतः इसी मॉडल को अपनाकर आंदोलन किया है और उसके कारण कैम्पस का सारा वातावरण नष्ट हुआ है। अधिकारियों ने मौके का लाभ उठाया है और सभी परंपराओं को तिलांजलि देदी। अंतहीन आंदोलन के मार्ग की ये सामान्य और अपरिहार्य परिणति है।

पश्चिम बंगाल इस तरह के अंतहीन आंदोलनों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रहा है। इस मार्ग पर चलकर पूरे राज्य का शिक्षा ,समाज और उद्योग बर्बाद हो चुका है।ये आत्मघाती आंदोलन की राजनीति है। आज इस मार्ग पर चलने के कारण पश्चिम बंगाल के सारे कॉलेज आज अखाडे बने हुए हैं, राजनीतिक हिंसाचार रोजमर्रा की चीज हो गया है। यही फिनोमिना दिविवि में भी पैदा हो गया है। कल यानी 23जून को आजतक टीवी चैनल के हल्लाबोल कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान एक शिक्षक की जिस तरह छात्रनेताओं ने पिटाई की और लहू-लुहान किया वह संकेत है कि दिविवि यदि संभला नहीं तो पश्चिम बंगाल की तरह हर कॉलेज में हिंसा का शासन होगा।

उल्लेखनीय है अंतहीन आंदोलन की धारणा जब भी लागू करेंगे हिंसा होगी और संस्थान या कारखाने बंद होंगे। 23 जून की हिंसा उसकी अभिव्यक्ति है,प्रशासन का हिंसाचार उसकी अभिव्यक्ति है। अंतहीन आंदोलन के कारण पश्चिम बंगाल के सारे उद्योग खत्म हो गए या शिफ्ट होकर अन्य राज्यों में चले गए। अंतहीन आंदोलन के कारण पुलिस और गुण्डों की हिंसा ने रूटिन रुप धारण कर लिया है। यही सिलसिला दिविवि में चल रहा है। अंतहीन आंदोलनकारी नहीं जानते कि आंदोलन वापस कैसे लिया जाय। वे हर संघर्ष को नाक की लडाई या आर-पार की लडाई मानकर लड़ रहे हैं। दिविवि में दुर्भाग्य से यही हुआ है। माकपा के लोग दिविवि में अंतहीन आंदोलन की थ्योरी में फंस गए हैं । अंतहीन आंदोलन की थ्योरी आत्मघाती और हिंसक है।

दि वि वि में हमारी दिलचस्पी एक नागरिक के नाते है। हम सत्य और तथ्य जानने में रुचि रखते हैं। यूजीसी के जिस आदेश का हवाला दिया जा रहा है वह क्या है ? क्या यूजीसी ने अपने सदस्यों की राय के आधार पर चारसाला पाठ्यक्रम को अवैध घोषित किया है ? यदि हां तो यही काम विगत एक साल में क्यों नहीं किया गया ?क्यों एक साल पहले कोर्स लागू करने दिया ? या जिस हेकड़ी के साथ सर्कुलर निकाला गया है उसके पीछे यूजीसी नहीं है बल्कि मानव संसाधन मंत्रालय और उसके पीछे संघ के बंदे काम कर रहे हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ की अध्यक्षा की मौजूदगी में कई टीवी चैनलों पर यूजीसी के सदस्य एमएम अंसारी ने बार-बार साफ शब्दों में कहा कि यूजीसी का ताजा सर्कुलर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के आदेश पर निकाला गया है और उस आदेश का यूजीसी के सर्कुलर में जिक्र भी है, इस तथ्य का डीयू शिक्षक संघ ने खंडन नहीं किया है। क्योंकि यूजीसी का इसमें वे इस्तेमाल कर रहे हैं। कहने का आशय है कि यूजीसी के चारसाला कोर्स को अवैध घोषित करने वाला सर्कुलर यूजीसी की स्वाभाविक राय नहीं है बल्कि नई सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय की राय है। यह एक राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित राय है।

उल्लेखनीय है कि मानव संसाधन मंत्रालय भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में किए गए वायदे को लागू कर रहा है। यह सर्कुलर एक बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए जारी किया गया है दुखद यह है कि माकपा और उनके सहयोगी इसके पीछे निहित मोदी सरकार के असल मंतव्य को नहीं देख रहे हैं और अपनी नाक की जीत को देख रहे हैं। होसकता है इससे उनको कुछ क्षण के लिए राजनीतिक विजय का सुख मिले लेकिन यह विजय तो आसन्न पराभव की आहटें लेकर आई है ,उन आहटों को वे सुन नहीं पा रहे हैं।

मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि माकपा में इस तरह के तत्व हैं जो अनुदार हैं,कंजरवेटिव हैं जो सहज ही इधर लाल दिखते हैं तो रातों-रात भगवा या हरे या नीले हो जाते हैं। प.बंगाल में तो इस समय लाल के भगवा या नीले या हरे होने का अंधड़ चला हुआ है। स्मृति ईरानी को इसका श्रेय जाता है कि उसने यूजीसी के एक सामान्य सर्कुलर के बहाने माकपा के नेतृत्ववाले शिक्षकसंघ और माकपाके नेताओं को अपने पीछे लामबंद कर लिया। माकपा-भाजपा का यह संयुक्त मोर्चा कितने दूर तक जाता है यह देखना दिलचस्प होगा। यह माकपा के राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा है।

उल्लेखनीय है पश्चिम बंगाल में शिक्षा में हुए तमाम किस्म के अ-लोकतांत्रिक कामों की दिल्ली विश्वविद्यालय के माकपा शिक्षकनेताओं ने कभी न तो निन्दा की और नहीं आलोचना की। मैं य़हां अशोक मित्र कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट का संकेत में जिक्र करना चाहता हूँ। यह कमीशन पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु सरकार ने बनाया था जिसने निष्कर्ष के रुप में कहा कि वामशासन ने उच्चशिक्षा के समूचेतंत्र को बर्बाद करके रख दिया है। आश्चर्य की बात है कि वामशिक्षक संगठनों ने कभी अशोक मित्र कमीशन की रिपोर्ट को प्रकाशित नहीं होने दिया.जबकि अशोकमित्र तो उनके ही मित्र थे।यह बात में इसलिए कह रहा हूँ कि माकपा में लंबे समय से एक वर्ग रहा है जो स्वभाव से कठमुल्ला,पढ़ने-लिखने से नफरत करने वाला, पढ़ने-लिखने वालों का उपहास करने वाला,एंटी इंटेलेक्चुअल। यही वर्ग संयोग से दिविवि में शिक्षकों में फिलहाल नेतृत्व कररहा है। यही वह वर्ग है जो कल तक कांग्रेस शासन के साथ माल-मिठाई उडा रहा था , अब ये ही लोग विभिन्न बहानों से मोदी सरकार में विभिन्न संस्थानों में सरकारी कृपापदों पर बैठे नजर आएंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय का चारसाला कोर्स का आंदोलन और उसके बहाने स्मृति ईरानी के कृपाकटाक्षों का गिरना तो शुरुआतभर है। आनेवाले समय में ये लोग और भी सघनभाव से देशभक्ति और शिक्षा सुधार की आड़ में मोदी,भाजपा और संघ के एजेण्डे के साथ नजर आएंगे।

मंत्री से गुहार लगाना उचित है लेकिन मंत्री का दुरुपयोग करके विश्वविद्यालय की मान-मर्यादाओं पर हमले करना गलत है। मंत्री की मदद लो, लेकिन अकादमिक दंगल यूजीसी में नहीं होगा। यह दिलचस्प खोज का विषय है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,शिक्षामंत्री (सिब्बल और राजू),यूजीसी,संसद और राष्ट्रपति तक वामनेतृत्व वाला शिक्षक संघ गया और कहीं पर भी उनकी बात नहीं मानी गयी। लेकिन मोदी सरकार आते ही एक साल बाद हठात उनके इशारे पर भाजपा मंत्री काम करने लगी और कल तक जो चीज सभी संस्थान वैध कह रहे थे, यूजीसी वैध कह रही थी, वह अचानक अवैध कहने लगी। राजनीतिक मेनीपुलेशन और सरेंडर का इससे बड़ा उदाहरण मिलना असंभव है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के चारसाला कोर्स का मौजूदा विवाद मोदीयुग का शिक्षा में आरंभ है । यह मोदी सपने की अभिव्यंजना है। वे अब सीधे उच्चशिक्षा को ऊपर से तोड़ने जा रहे हैं,माहौल बनना आरंभ हो गया है। लामबंदी शुरु हो गयी है। कंजरवेटिव एकजुट होने लगे हैं। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में साफ कहा गया है वे विश्वविद्यालय आयोग को खत्म करेंगे। मनमोहन सरकार में भी इस तरह की कोशिशें हुई थीं लेकिन वे दबा दी गयीं।

मोदी सरकार का असल लक्ष्य है मनमोहन सरकार के अधूरे कामों को पूरा करना। मनमोहन सरकार ने चारसाला कोर्स की अनुमति देकर जो काम आरंभ किया था वह अधूरा पड़ा है। इस कोर्स का लक्ष्य वह नहीं है जो विश्वविद्यालय दावा कर रहा है।इस कोर्स का लक्ष्य है विदेश की सप्लाई लाइन को तेज करना। निजी विदेशी विश्वविद्यालयों के आने का मार्ग प्रशस्त करना। मोदी सरकार भी यही काम मुस्तैदी से करना चाहती है लेकिन शैली भिन्न रहेगी। मोदी शैली होगी उच्चशिक्षा के मौजूदा ढाँचे को ऊपर से तोड़ा जाय। चारसाला कोर्स नव्य-उदार लक्ष्यों की संगति में बनाया गया था, वे इसे अंशतः रखना चाहते हैं यह बात शिक्षक संघ भी कह रहा है। असल में हमें मोदी शिक्षा स्वप्न के नव्य उदार लक्ष्यों से मुठभेड़ के लिए तैयार रहना चाहिए।यह शुरुआत है।













सोमवार, 23 जून 2014

" अपनी अपनी आधुनिकता " के बहाने


हरबंस मुखिया ने तद्भव पत्रिका ( अप्रैल २०१३)में " अपनी अपनी आधुनिकता "शीर्षक से एक लेख लिखा है ।
आधुनिकता के जिन कारकों का उन्होंने ज़िक्र किया है उनमें अधिकांश कारक इतिहास विमर्श में पुंसवाद की कोटि में आते हैं फलत:इससे जो विमर्श बनता है वह पुंसवाद की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पाता ।

इस लेख में आधुनिकता के जिन कारकों का ज़िक्र किया गया है वे सभी प्रचलन में हैं और उनके विभिन्न देशों में अनुयायी भी हैं। आधुनिकता का कोई भी विमर्श स्त्री और वर्णव्यवस्था या जातिप्रथा के प्रति परिवर्तनकामी नजरिए के बिना नहीं बनता। मुखिया ने इन दोनों ही पहलुओं की अनदेखी की है। वे अपने लेख में स्थल और समय को ही आधार बनाते हैं। दिलचस्प बात है कि वे आधुनिकता के सभी किस्म के आधारों की चर्चा करते हैं लेकिन स्त्री और वर्णव्यवस्था को उसमें शामिल नहीं करते।

सवाल यह है कि आधुनिक या आधुनिकता की कोई परिभाषा स्त्री के बिना संभव है ? आधुनिकता की कोटियाँ स्त्री को नजरअंदाज क्यों करती हैं ?


आधुनिकता के सभी विमर्श इसीलिए अधूरे साबित हुए हैं क्योंकि वे स्त्री की मुक्ति के सवालों को सम्बोधित नहीं करते ।हरिवंश मुखिया ने माना है आधुनिकता का अस्थाई चरित्र है और हम उसके इस अस्थायी चरित्र को स्वीकारें । आधुनिकता को परिवर्तनशील मानें । उसके नाम परिवर्तन की संभावनाओं को भी मानें । लिखा है, "अत: यह आवश्यक है कि हम इसके अस्थायी चरित्र को स्वीकार करें और इसकी परिवर्तनशीलता से साक्षात्कार करें । यूँ भी बाइसवीं या तेइसवीं सदी में अठारवीं ,उन्नीसवीं व बीसवीं सदी को 'आधुनिक ' माना जाना लगभग असंभव लगता है । जाहिर है कि प्राचीन , मध्यकालीन व आधुनिक की जगह विश्लेषण की कुछ नयी श्रेणियाँ ले लेंगी जिनका अनुमान हम नहीं लगा सकते । "" यह समय है कि हम उस दिशा की तरफ़ चलना शुरू करें । एक क़दम शायद यह हो कि हम घने मूल्ययुक्त प्राचीन, मध्यकाल व आधुनिक की श्रेणियों से मुक्ति पा लें और उनके स्थान पर मूल्य उदासीन श्रेणियों का प्रयोग करना शुरू करें - जैसे पूर्व, सम्प्रति, हाल ,समकालीन आदि । या इतिहासकाल के लिए सहस्राब्दी, शताब्दी, दशक आदि का प्रयोग करें जो कि केवल समय के वर्णन की इकाइयां हैं । यह प्रस्थान की दिशा में अदना सा क़दम होगा । लेकिन बहुत लम्बे सफ़र आखिर एक अदना क़दम से ही शुरू होते हैं । "( तद्भव,p.90)


मुखिया ने यहाँ कई महत्वपूर्ण पहलुओं की ओर ध्यान खींचा है । पहला, आधुनिकता परिवर्वतनशील है इसका कोई भी नाम रख सकते हैं । दूसरा , आधुनिकता की धारणाओं को अतीत में ले जाने की आवश्यकता नहीं है । रामविलास शर्मा और पुरूषोत्तम अग्रवाल यही काम करते रहे हैं । वे मध्यकाल में आधुनिकता खोज रहे हैं । तीसरा , आधुनिकता का नाम बदला जा सकता है । नाम की रुढि से बचने की ज़रूरत है । चौथा, मूल्य की बजाय मूल्यहीन केटेगरी का प्रयोग आरंभ करें।


हरबंस मुखिया ने रेखांकित किया है , " हमें यह स्वीकार कर लेना आवश्यक है कि 'आधुनिकता ' का मुद्दा जो सदियों से अब तक विवादमुक्त चला आ रहा था, अब विवादों से घिर गया है और इसके एकांगी चरित्र की जगह विविधता ने ले ली है ;यह मानना भी आवश्यक है कि हम पहले जैसे विश्वस्त एक स्वरीय सूत्रों से बहुस्तरीय व्याख्याओं की ओर अग्रसर हो चुके हैं जहां से वापसी असम्भव है ।यह प्रगति आर्थिक व्यवस्था और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण ज्ञान के विश्वीकरण के संदर्भ में हुआ है जिसमें अनेक दबी हुई आवाजें बुलंद हुई हैं और अनेक नये प्रश्न किये जा रहे हैं जोपहले कभी नहीं किये गये थे । सामाजिक विज्ञानों और दर्शन में निश्चयवाद व मार्क्सवाद की निश्चिंतिताओं से हटकर अर्थों के विविध स्तरों कीओरप्रगति हुई है । "

मुखिया नेयहां माना है कि आधुनिकता आज विवादास्पद है , सवाल यह है कि इसे विवादास्पद किसने बनाया ? इसे विवादास्पद बनाया उत्तर आधुनिकों ने,हमें उनका आभारीहोना चाहिए कि उनके आलोचनात्मक हस्तक्षेप के बाद आधुनिकता के बनाए सारे मानक सवालों के घेरे में आ गए । उत्तर आधुनिक समीक्षा के दबावों के कारण ही आधुनिकता की एक स्वरीयता ख़त्म हुई । विविधता की धारणा को मान्यता मिली ।


इसके अलावा बायनरी अपोजीशन की अवधारणा का जमकर इस्तेमाल हुआ , इसके कारण 'दबी हुई आवाजें बुलंद हुईं । ' 'बायनरी अपोजीशन 'को उत्तर संरचनावादियों ने महत्ता और स्वीकृति दिलाई ।


मुखिया ने 'ज्ञान के विश्वीकरण ' की तरफ़ ध्यान खींचा है और उसे एक कारक के रुप में रेखांकित किया है । ज्ञान के वैश्वीकरण में संचारक्रांति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । उल्लेखनीय है कि आधुनिकता के जिन प्रधान कारकों को समय और स्थल के आधार पर मुखिया ने विश्लेषित किया है वे कारक संचारक्रांति के कम्प्यूटर पैराडाइम आने के साथ अप्रासंगिक हो गए हैं । इस प्रक्रिया में ईंधन का काम किया उपग्रह प्रणाली ने इसके कारण ज्ञान , अवधारणा आदि के समस्त विमर्श देश-काल और राष्ट्र की सीमा का अतिक्रमण कर गए हैं । यही वजह है कि हम विविधता के पक्ष में खड़े हैं और आधुनिकता के परिवर्तन की बातों पर सोच रहे हैं ।

आज आधुनिकता का विमर्श ज्ञान से बेदखल हो गया है और उसकी जगह जीवनशैली के सवाल केन्द्र में आ गए हैं ।जीवनशैली के प्रसंगों को हरिवंश मुखिया ने छूने की ज़रूरत ही महसूस नहीं की ।

आधुनिकता को जब ज्ञान की बजाय जीवनशैली के सवालों की कसौटी पर कसने के प्रयास किए जाएंगे तो समस्या के मूल सवाल ही बदल जाएंगे । कहने का आशय यह है कि टेलीकम्युनिकेशन और जीवनशैली को आधुनिकता विमर्श में शामिल किए बिना कोई नया पैराडाइम नहीं बनता । हरबंस मुखिया ने आधुनिकता विमर्श में कम्युनिकेशन ,जीवनशैली और टेलीकम्युनिकेशन को शामिल न करके जो खाका खींचा है उसमें गतिशील तत्व नदारत हैं । आधुनिकता को गतिशील ,विविधतापूर्ण और नयी संभावनाओं से भरी देखने के लिए इन तत्वों को आधुनिकता विमर्श में शामिल करना ज़रूरी है । एक अन्य तत्व है जिस पर कम ध्यान गया है वह है मध्यकाल या आधुनिककाल में स्त्रीमुक्ति या स्त्री के प्रति नज़रिया क्या है ? स्त्री को मुक्ताकाश दिए बिना आधुनिकता का विकास संभव नहीं है ।

भारत के संदर्भ में जो विचारक मध्यकाल में ही आधुनिकता की खोज करके ले आए हैं वे ज़रा नए सिरे से अपने संदर्भों को स्त्री के प्रति मध्यकालीन लेखकों के नजरिए और कम्युनिकेशन के संदर्भ में खोलकर विचार करें । स्त्री के प्रति मुक्तिकामी या प्रगतिशील नजरिए के बिना आधुनिकता का विकास संभव नहीं है ।

रविवार, 22 जून 2014

दिल्ली विश्वविद्यालय का खेल - मोदी सरकार की पहली पराजय

       विश्वविद्यालय स्वायत्तता अपहरण का एक खेल दिल्ली में चल रहा है। इस खेल में संयोग से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ,माकपा और भाजपा एक ही मंच पर आकर मिल गए हैं। इस खेल की खूबी है कि ये तीनों खिलाडी संविधान,अकादमिक स्वायत्तता और बौद्धिक स्वतंत्रता इन तीनों का मखौल उडाने में लगे हैं।

विगत सप्ताह मोदी सरकार आने के बाद यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को सर्कुलर भेजकर चार साला बीए कोर्स बंद करने का निर्देश दिया ,वह पूरी तरह असंवैधानिक है। यूजीसी इस तरह का आदेश किसी भी विश्वविद्यालय को नहीं दे सकता। सवाल यह है कि यूजीसी ने जब यह कोर्स लागू किया गया उस समय यह राय क्यों नहीं दी ?

यूजीसी सुझाव दे सकती है.आदेश नहीं। यूजीसी के आदेशों की हकीकत यह है कि गुजरात में अभी तक कॉलेज-विश्वविद्यालयों में छठे वेतन आयोग के आधार पर बने वेतनमान लागू नहीं हुए हैं। पश्चिम बंगाल में शिक्षकों का छठे वेतनमान के आधार पर वेतन मिला लेकिन बकाया धन अभी तक नहीं मिल पाया है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो दिए जा सकते हैं। मूल बात यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। यहां तक कि संसद को भी हक नहीं है।विजिटर को भी हक नहीं नहीं है। विजिटर या शिक्षामंत्री किसी भी फैसले के एकमहिने के अंदर विरोध करता है तो वह विरोध विचारयोग्य होता है। यदि एक महिने के बाद राय आतीहै तो विचारयोग्य भी नहीं होता।

विश्वविद्यालय के फैसले अकादमिक परिषद लेती है,कार्यकारी परिषद लेती है। शिक्षामंत्री या यूजीसी नहीं । यूजीसी ने दिल्ली विश्वविद्यालय को चारसाला कोर्स को खारिज करने का आदेश देकर अपने संवैधानिक कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण किया है। यूजीसी को जबाव देना होगा कि विगत समय में उसने और उसके अधिकारियों ने यही फैसला क्यों नहीं लिया ? क्यों दिविवि को कोर्स लागू करने को कहा ? क्या उन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई ? हमारे शासकों को नौकरशाही को उपकरण बनाकर काम करने से बाज आना चाहिए।

चारसाला कोर्स की गुणवत्ता और गुणहीनता, संवैधानिकता और असंवैधानिकता,प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर बहस का समय खत्म हो चुका है क्योंकि कोर्स लागू हो चुका है। हजारों विद्यार्थी एक साल से पढ़ रहे हैं, नए दाखिले होने जा रहे हैं। रिव्यू ही करना है तो पहले बैच के निकलने पर रिव्यू करो। लेकिन यह काम अकादमिक परिषद करेगी न कि यूजीसी। चारसाला कोर्स प्रासंगिक है या नहीं यह तय करने का काम विश्वविद्यालय का है। यह कोर्स तय करते समय बहुमत से तय पाया गया कि कोर्स आरंभ किया जाय।सभी इस फैसले को मानने को बाध्य हैं। इस मामले में माकपा-भाजपा की हठधर्मिता विलक्षण है।

शिक्षक संघ इसके विरोध में था अनेक छात्रसंगठन भी विरोध में थे,कई राजनीतिक पार्टियां भी विरोध में थीं। लेकिन विश्वविद्यालय के फैसले अकादमिक परिषद में होते हैं और दिविवि की अकादमिक परिषद ने पक्ष-विपक्ष पर विचार करने के बाद यह कोर्स आरंभ किया। शिक्षा के फैसले सड़कों पर जुलूसों और धरना स्थलों या फेसबुक पर नहीं होते।

यह मसला कईबार यूजीसी में भी गया,अनेक ज्ञानीलोगों ने यूजीसी से लेकर शिक्षामंत्री,प्रधानमंत्री,संसद और राष्ट्रपति तक अपनी राय भेजी लेकिन कहीं से भी यह नहीं कहा गया कि दिविवि यह कोर्स बंद कर दे। सबने कहा यह विश्वविद्यालय का आंतरिक मामला है बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

लेकिन भाजपा को जनादेश मिलतेही पहला हमला दिविवि की स्वायत्तता पर हुआ जो निंदनीय है। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में चारसाला बीए कोर्स को खत्म करने का वायदा किया गया है। मोदी के सत्तारुढ़ होते ही निहित स्वार्थी लोग असंवैधानिक हथकंडों का इस्तेमाल करके यह कोर्स बंद कराना चाहते हैं जबकि इस मामले में नियमानुसार दिविवि प्रशासन एकदम सही मार्ग का अनुसरण कर रहा है। कल के अकादमिक परिषद के फैसले के बाद यह साफ हो चुका है कि भाजपा और माकपा के शिक्षक संगठनों के पास अकादमिक परिषद में समर्थन का अभाव है। मात्र 10 शिक्षक उनके पक्ष में थे बाकी सभी ने विवि के पक्ष का समर्थन किया। यह यूजीसी और प्रकारान्तर से भाजपा की पहली बड़ी पराजय है।यह मोदी सरकार के स्वायत्तता अपहरण अभियान की पहली बड़ी हार है।

इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि दिविवि को चारसाला कोर्स लागू करने पर पिछली सरकार का पूर्ण समर्थन था,संसद से लेकर पीएम तक,यूजीसी से लेकर शिक्षामंत्री तक सबने पिछले साल हस्तक्षेप करने से मना किया और दिविवि प्रशासन का साथ दिया। मोदी सरकार को पुरानी सरकार के इस फैसले का आदर करना चाहिए।



शुक्रवार, 20 जून 2014

हिन्दीभक्तों का भाषायी बेगानापन


         मोदी सरकार ने आते ही राजभाषा के तौर पर प्राथमिकता के साथ हिन्दी में काम करना आरंभ कर दिया है। इसके परिणामों के बारे में हम कुछ साल बाद चर्चा करेंगे। इस पर भी बाद में ही चर्चा करेंगे कि हिन्दी इस तरह मजबूत होती है या दुबली-पतली ही रहती है। इस समूचे प्रसंग में बुनियादी बात यह है कि कोई भी भाषा सरकारी मदद से ताकतवर नहीं बनती। यदि ऐसा ही था तो अंग्रेजी को तो घर घर की भाषा होना चाहिए था।

भाषा की जमीन शिक्षा और निजी दैनंदिन व्यवहार पर निर्भर करती है। हमसब हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय लोगों की मुश्किल यह है कि हमारा अपनी भाषा से खोखला लगाव है। यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं की भी है। आजादी के बाद जो मध्यवर्ग पैदा हुआ है वह स्वभाव और विचार से अपनी भाषा से कोसों दूर है। हिन्दी भाषी में अपनी भाषा को लेकर जिस तरह का बेगानापन है वैसा ही बेगानापन मराठी-मलयाली या बंगाली में भी अपनी भाषा को लेकर मिलेगा।

विचारणीय सवाल यह है कि हमारे देश की जनता का शिक्षितवर्ग अपनी भाषाओं से दूर कैसे चला गया ? वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से वह अपनी भाषा से प्यार तो करता है लेकिन लिखने-पढ़ने के लिए उसे गैर जरुरी मानता है ? यह महज राजभाषा की समस्या नहीं है। इस समस्या की जडें कहीं गहरे हमारी आर्थिक योजना और मनोदशा में हैं।

हमारी आर्थिक नीतियों का लक्ष्य कहने को आत्मनिर्भर रहा है लेकिन व्यवहार में हमने आत्मनिर्भर समाज बनाने लायक न तो कभी शिक्षा पर खर्च किया और नहीं भाषा के रखरखाव पर खर्च किया। शिक्षा और संस्कृति को हमने कभी प्रधान एजेण्डा नहीं बनाया। सीमित उत्पादन-सीमित विकास ही हमारी योजनाओं का लक्ष्य रहा है। हमारे देश में हिन्दीभाषा को लेकर जो लोग आए दिन हिन्दीप्रेम व्यक्त करते रहते हैं वे यह भूल जाते हैं कि सरकारी बैशाखी पर सवार होने के कारण हिन्दी और भी ज्यादा अपाहिज बनी है। सरकारी आफिसों में हिन्दी इनाम,प्रमोशन ,भाषायी राजनीति और टाइमपास की भाषा बनकर रह गयी है।

भाषा की मूल जगह शिक्षा संस्थान और बाजार हैं। सरकारी ऑफिस तो भाषा का कैदघर है। हमें यह पढ़कर दुख होता है कि जो लोग सरकारी ऑफिसों में कामकाज की हिन्दी बनाने पर खुश हैं वे कभी इस पहलू पर नहीं सोचते कि हिन्दी को शिक्षा में प्रसार कैसे दिया जाय ? भाषा को सीखने और व्यवहार में लागू करने का आग्रह हमारी चेतना में खत्म हो गया है। ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी को हमने बहुत गंभीरता के साथ सीख लिया है। हमारे मध्यवर्ग के लोगों में बुनियादी तौर पर भाषा का क्षय हुआ है। सभी भाषाएं क्षयग्रस्त हुई हैं।

अंग्रेजी दां लोगों में भाषा का भयानक क्षय हुआ है , वे ही बताते हैं लोगों को ठीक से अंग्रेजी लिखनी तक नहीं आती। एकबार हमारे एक दोस्त कुलदीप कुमार ने कहा कि ये उदयप्रकाश काहे को फेसबुक पर अंग्रेजी में लिखते हैं, अंग्रेजी गलत-सलत लिखते हैं। यही हाल और भी बहुत से फेसबुक लेखकों का है।

हमारे ढ़ेर सारे मित्र अंग्रेजी जानते हैं मैं तो कभी अंग्रेजी पढ़ा नहीं और मैंने कोई डिग्री नहीं ली। मैं संस्कृत माध्यम से पढ़ा बाद में जेएनयू जाकर हिन्दी में पढ़ा। वहां पर भी मैंने अंग्रेजी नहीं सीखी.यह मेरी कमजोरी रही है और जिद भी रही है कि मैं अंग्रेजी नहीं सीखूँगा लेकिन मैं अंग्रेजी का कभी विरोधी नहीं रहा। मैं आज भी अंग्रेजी नहीं जानता। मैं किसी तरह अंग्रेजी में लिखे को पढ़ लेता हूँ और अपना काम कर लेता हूँ आज भी कोई सामान्य पत्र अंग्रेजी में लिखाना होता है तो किसी न किसी की मदद लेकर लिखाता हूँ। मुझे कोई अफसोस नहीं है कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता।

मैंने कभी अंग्रेजी न जानने के कारण न तो जेनयू में और न कभी कलकत्ता विश्वविद्यालय में परेशानी महसूस की। मैं बेहतरीन अंग्रेजी जानने और बोलने वालों के बीच में जेएनयू में मजे में धारावाहिक हिन्दी बोलता रहा और मित्रलोग मजे लेते रहे। भाषा को मैंने कभी प्रतिष्ठा,इज्जत,सामाजिक हैसियत की चीज नहीं माना, भाषा मेरे लिए कम्युनिकेशन का माध्यम थी और आज भी है।

मैंने कभी नहीं सोचा कि मैं कैसे जिऊँगा ?क्योंकि मैं अंग्रेजी नहीं जानता ! मैंने कभी अपना आवेदनपत्र अपने हाथ से नहीं भरा क्योंकि मैं अंग्रेजी लिखना नहीं जानता था। मैंने जेएनयू में दाखिले का फार्म भरा तो वो भी मेरे दो दोस्तों ने मिलकर भरा ,बाद में मेरे रजिस्ट्रेशन का छमाही फोलियो दोस्त ही भरते थे, वे ही स्कालरशिप का फार्म भरते थे। वहां पर अनेक पेपरों की सामग्री अंग्रेजी में थी उसे मैं कष्ट करके पढ़ता था और मित्रों की मदद लेता था। लेकिन अंग्रेजी नहीं जानता था इसकी मुझे कोई पीड़ा नहीं थी। मैं स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज में ही नहीं पूरे विश्वविद्यालय में पहला कौंसलर था जो अंग्रेजी एकदम नहीं जानता था और जेएनयू छात्रसंघ का चुनाव जीता। मैंने जब जेएनयू में छात्रसंघ के अध्यक्ष का चुनाव जीता तो मैं सभी स्कूलों में विजयी हुआ। उन स्कूलों में भी विजयी हुआ जिनमें एसएफआई नहीं थी। सारा कैंपस जानता था मैं अंग्रेजी एकदम नहीं जानता।इसके बावजूद सारा कैम्पस बेइंतिहा प्यार करता था।

कहने का आशय यह कि अंग्रेजी से ही कम्युनिकेशन होता है,सम्मान मिलता है,हैसियत बढ़ती है,यह धारणा बोगस है। भाषा हमारे कम्युनिकेशन की चीज है सामाजिक हैसियत या श्रेष्ठता प्रदर्शन की चीज नहीं है। मैंने कभी अंग्रेजी में भाषण नहीं दिया हां अंग्रेजी दां लोगोंके साथ एक ही मंच पर जमकर हिन्दी में भाषण दिया है। जेएनयू में प्रकाश कारात, देवीप्रसाद त्रिपाठी,सीताराम येचुरी,टी.के.अरुण आदि के साथ सैंकडों भाषण दिए हैं और हिन्दी को वही गरिमा मिली जो किसी अंग्रेजी में बोलने वाले को मिलती है। मुझे अंदर से सुख भी है कि मैं जेएनयू में हिन्दी को राजनीतिक कर्म की साझा भाषा बनाने, साझा कम्युनिकेशन की भाषा बनाने का माध्यम बना।

मैं सात साल जेएनयू में छात्र राजनीति में शीर्ष पर सक्रिय रहा लेकिन हिन्दी में बोलने के कारण मुझे कभी परेशानी नहीं नहीं हुई। मैं यह मानता हूँ भाषा हमारी जीवनानुभूति और संचार की भाषा होती है । हमें अपनी भाषा में बोलना,पढ़ना-लिखना अच्छी तरह से आना चाहिए। हम स्वयं अपनी भाषा का अपमान करते हैं और दोष सरकार पर डालते हैं। एक और अनुभव साझा करता हूँ।

मैंने 1989 में जब कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग में प्रवक्ता पद पर कार्य आरंभ किया तो उस समय हमारे विभाग में अन्य शिक्षकों के अलावा प्रो.विष्णुकांत शास्त्री भी पढ़ाते थे ,वे भाजपा के बहुत बड़े नेता थे,बाद में सांसद बने, यूपी के राज्यपाल बने, सुसंस्कृत और मृदुभाषी व्यक्ति थे। हिन्दीभक्त थे। मेरी पहली तनखबाह आई तो मैं क्लर्क के पास अपना चैक लेने गया तो उस समय शास्त्री जी भी मेरे पास खड़े थे, मैंने अपना चैक लिया और पे फोलियो पर हिन्दी में दस्तखत किए। शास्त्रीजी मेरे दस्तखत हिन्दी में देखकर चौंक गए,बोले बेटा तुम हिन्दी में दस्तखत करते हो , मैंने कहा हाँ, बोले बहुत अच्छी बात है, मैं तो अंग्रेजी में करता रहा हूँ. मैंने कभी सोचा ही नहीं कि हिन्दी में भी दस्तखत करके काम चल सकता है. मैंने हँस कर कहा आज से ही आरंभ कर दीजिए,उसके बाद से शास्त्रीजी हिन्दी में दस्तखत करके चैक लेने लगे।

यह वाकया मैंने इसलिए लिखा है जिससे हिन्दीप्रेमी लोग समझें भाषा का विकास व्यवहार में लागू करने से होता है, भाषा बहस की चीज नहीं है, राजनीति की चीज नहीं है। भाषा हमारी प्राणवायु है। हमने ऐसा मध्यवर्ग तैयार किया है जो भाषा को ओढ़ता है, भाषा उसके स्वाभाविक कम्युनिकेशन के मिजाज का अंग नहीं बन पायी है। मोदी सरकार से उम्मीद रखने से पहले हमलोग अपने को दुरुस्त करें। अपने आसपास की गतिविधियों में हिन्दी का व्यवहार करें।

स्थिति इतनी भयावह है कि हमारे यहां कलकत्ता विश्वविद्यालय में ऐसे शिक्षक हैं जो सारे देश को हिन्दी का उपदेश देते हैं लेकिन हिन्दी विभाग के मीटिंग के मिनिटस अंग्रेजी में लिखते हैं। मेरी लाख आपत्तियों के बावजूद वे नहीं माने। मैंने अपने अध्यक्षकाल (चारबार अध्यक्ष रहा विभाग में)में हमेशा हिन्दी में मिनटस  लिखे।



कहने का आशय यह कि जो काम हम आसानी से अपनी भाषा में कर सकते हैं पहले वह काम तो अपनी भाषा में करें। मसलन हम अपने दस्तखत पहले हिन्दी में करें, अपने सामान्य कम्युनिकेशन को हिन्दी में करें। स्थिति बदतर है कि हम किसी न किसी बहाने से अपने समस्त कम्युनिकेशन की भाषा अंग्रेजी बनाए हुए हैं। इससे हिन्दी की क्षति हुई है।

गुरुवार, 19 जून 2014

चटपटे गोलगप्पों की हिमायत में

कोलकाता आएं और फुचका न खाएं यह हो नहीं सकता। कोलकाता में रहें और फुचका न खाएं यह भी हो नहीं सकता। फुचका के खोमचे पर जाएं और औरतें नजर न आएं यह भी हो नहीं सकता। फुचका वाला किसी कच्ची बस्ती में न रहता हो यह भी हो नहीं सकता। दिल्ली में इसे गोलगप्पे कहते हैं और मैं जब मथुरा रहता था तो वहां टिकिया कहते थे। शाम को अमूमन टिकिया खाने की आदत सी पड़ गयी थी। मैं आज भी गोलगप्पे को टिकिया कहता हूँ।
     कोलकाता की पहचान में जहां एक ओर लालझंडा है,छाना की मिठाई और रसगुल्ला है। वहीं दूसरी ओर फुचका भी है। फुचका बनाने और बेचने वाले अधिकांश लोग हिन्दीभाषी हैं। जिह्वा सुख के लिए,स्वाद को चटपटा बनाने या मोनोटोनस स्वाद से छुट्टी पाने के लिए जब भी कुछ चटपटा-खट्टा खाने की इच्छा होती है फुचका मददगार साबित होता है।
     फुचका औरतों का प्रिय खाद्य है,इसलिए इसके साथ जेण्डर पहचान भी है। फुचका शौकीनों में औरतों की संख्या ज्यादा है। मैं नहीं जानता कि बाजार में बिकने वाले अन्य किसी खाद्य के साथ जेण्डर पहचान इस तरह जुडी हो। औरतों के साथ फुचका का जुड़ना कई मजेदार पहलुओं की ओर ध्यान खींचता है , आमतौर पर औरतें घरेलू काम करते और घरेलू भोजन खाते हुए बोर हो जाती है और स्वाद बदलने के लिए पुचका खाती हैं। फुचका भोजन नहीं है। यह दोपहर के खाने और शाम के नाश्ते के बीच का लघु नाश्ता है,यह अंतराल में भूख या स्वाद को जगाने के लिए लिया जाने वाला खाद्य है।
      फुचका पूरी तरह लघुव्यापार है और लंबे समय तक इसी अवस्था में इसके बने रहने की संभावनाएं हैं। यदि आप अपने शहर को देखें तो पाएंगे कि वहां क्रमशःफुचका की खपत बढ़ी है।
    यह छोटी पूंजी का व्यापार है और ऐसे लोगों का व्यापार है जो कच्ची बस्ती या झुग्गी-झोंपडियों में रहते हैं। फुचका की बढ़ती खपत ने बड़े हलवाईयों को भी गोलगप्पे बेचने के लिए मजबूर किया है।
   फुचका इस बात का भी संदेश देता है कि हमारे समाज में चटपटे और खट्टे भोजन की मांग लगातार बढ़ रही है। अनेक लोग इसके अस्वास्थ्यकर होने की बातें भी कर रहे हैं। इसके बावजूद फुचका खाने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है।
    फुचकावाला जानता है उसका कितना माल आमतौर पर रोज खप सकता है। पुचका के व्यापार में रिस्क कम है बशर्ते फुचका बढ़िया खिलाएं। फुचका पर्यावरण फ्रेंडली खाद्य है। इसके बनाने और बेचने में घर के लोग ही मदद करते हैं इस अर्थ में फुचका गरीब की रसोई का विस्तार है।
    फुचका खाते हुए हम सब जाने- अनजाने गरीब के स्वाद में शिरकत करते हैं। गरीब के स्वाद में खूब लाल और हरी मिर्च और तीखापन होता है।
     फुचकावाले की खूबी है कि वह स्वाद को नियंत्रण में रखता है ,आप जैसा और जितना तीखा-चटपटा खाना चाहते हैं वह खिलाएगा। हर खाने वाले के स्वाद के वैविध्य की वह कदर करता है और स्वाद को मांग के अनुरुप ढाल देता है। इस अर्थ में फुचकावाला मुझे ज्यादा खुला,लोकतांत्रिक लगता है। वह हलवाई से भिन्न है। हलवाई इकसार स्वाद का मास्टर होता है।जबकि फुचकावाला स्वाद का नियंत्रक और लोकतांत्रिक होता है। फुचका का सिस्टम रिस्क मुक्त और पर्यावरण फ्रेंडली होता है।
  फुचका की सामान्य विशेषता है कि यह स्वाद के मानकीकरण का निषेध करता है। यह निषेध इसमें अन्तर्निहित है। यही वजह है कि फुचका हर इलाके में और अलग-अलग फुचकावाले के यहां भिन्न स्वाद में मिलेगा। यह स्वाद की भिन्नता फुचका से इतर सामग्रियों की प्रकृति पर निर्भर करती है। इसके कारण ही फुचका के स्वाद का खाने के पहले अनुमान नहीं कर सकते। फुचका वाला आमतौर पर पब्लिक स्पेस में खड़ा रहता है। पब्लिक स्पेस में अनौपचारिक ढ़ंग से खाने की आदत के विकास में फुचका की बड़ी भूमिका है। भोजन की अनौपचारिकता हमें ज्यादा मानवीय बनाती है। इस अर्थ में फुचकावाला इंसानियत के कम्युनिकेशन और लिंक का काम भी करता है।    

जनता के स्वाद का बादशाह हलवाई


       हलवाई के बिना बाजार और जीवन में मजा नहीं है। हलवाई हमारे बाजार की शोभा हुआ करते थे उनसे ही बाजार या इलाके पहचान थी। छोटे शहरों में हलवाई लोकल पहचान का संकेत था। हलवाई को मैं समानान्तर बाजार मानता हूँ। एक तरफ विभिन्न किस्म के दुकानदार और दूसरी ओर हलवाई की दुकान। हलवाई लंबे समय से बाजार के परंपरागत खाद्य उद्योग की धुरी रहा है। हलवाई कब दुकान पर आया ? कब घर तक चला आया और कब हलवाई का सामाजिक कायाकल्प हो गया हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया।

भारत में हलवाई परिवार की रसोई और मेहमाननबाजी का भागीदार होकर आया,जब भी पहला हलवाई आया होगा वह निश्चित तौर पर प्रगतिशील रहा होगा। घर के बाहर हलवाई की बनी चीजें खाना या उन चीजों को घर में लाकर खाने की परंपरा तब ही आई होगी जब हमारे समाज के कुछ अतिरिक्त धन बचता होगा। हलवाई की बनी चीजें पुराने वर्णसमाज के तंत्र,मूल्यबोध और तयशुदा आदतों को तोड़ने में मदद करती रही हैं।

हलवाई ने भोजन की निजता में एक नयी कोटि भोजन की सामाजिकता को शामिल किया। हमारे यहां भोजन निजी होता था और निजी व्यक्ति के विस्तारित संबंधों को ही हम दावतों में बुलाकर सामाजिकता निभाते थे। लेकिन हलवाई की बनी चीजों के आने के साथ सामाजिक जीवन और खासकर जीवनशैली में धीमी गति से परिवर्तनों की शुरुआत होती है।

हलवाई कहने को वैश्यजाति का अंग रहा है। लेकिन हलवाई का काम और तंत्र जिस तरह जीवनशैली ,खानपान और पापुलर कल्चर को प्रभावित करता रहा है उसकी कभी हमने विस्तार से मीमांसा ही नहीं की। हलवाई मतलब खाने की वस्तुओं का दुकानदार।

हलवाई का व्यापार सबसे पुख्ता व्यापार रहा है। यह विकेन्द्रित और छोटी पूंजी से आरंभ होने वाला कारोबार है। मसलन् कचौडी की दुकान खोलने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की आज भी जरुरत नहीं पड़ती। विकेन्द्रीकृत ढ़ंग से इसने आम जनता के स्वाद को बदला और नवीकृत किया। हलवाई को जनता के स्वाद बादशाह कहना अतिशयोक्ति नहीं है।

एक हलवाई अपने माल के जरिए मुनाफा कमाने के साथ अभिरुचि और स्वाद का भी निर्माण करता है। सबसे अच्छा हलवाई वह माना जाता है जिसके माल के स्वाद को आप बार बार महसूस करें और लौटकर उसकी दुकान पर आएं। हलवाई की रिटर्न अपील बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। वह अपने अपभोक्ता को बाँधता है और उसकी रुचि को स्टीरियोटाइप होने से बचाता है।

हलवाई का काम पेसन का काम है। हलवाई के पकवान हमारी खाद्य अभिरुचि को सीधे प्रभावित करते हैं। हलवाई का सबसे बड़ा आनंद यह है कि यह अनौपचारिक खानपान को बढ़ावा देता है। खाने में हम जितना अनौपचारिक होंगे उतने ही बेहतर सामूहिक मनुष्य होगे। खानपान में हम जितने संगठित और औपचारिक रहेंगे उतने ही एकांतवासी होंगे।

हलवाई के खाने में बाजार की ध्वनियों और खुली हवा की गंध रहती है। वहां रेस्तराँ की तरह तयशुदा धुनें और गंध नहीं तैरती ।

हलवाई खुलेपन को लेकर आया। खानपान में खुलेपन को लेकर आया। रेस्तराँ ने खानपान को बंद रेस्तराँ का खाद्य बना दिया। हलवाई ने समाज में खुलेपन और लिबरल माहौल को पैदा किया।वह बाजार में जीवनशैली को प्रभावित करने वाले प्रमुख कर्ता के रुप में दाखिल हुआ।

हलवाई गतिशील है। वह जड़ नहीं है। गतिशील हलवाई हमेशा नए पर नजर रखता है। जड़ हलवाई यथास्थितिवादी होता है। वह दसियों साल एक जैसा सामान बेचता रहता है ।गतिशील हलवाई सामान की लिस्ट बढ़ाता जाता है,अपनी इमेज का नए युग के साथ रुपान्तरण करता जाता है। भारत के हलवाई आज से तीस साल पहले तक लोकल थे लेकिन विगत तीस सालों में इन्होंने अपने को बाजार निर्माण की नयी प्रक्रियाओं से जोड़ा है। अपने को लोकल से ऊपर उठाकर क्षेत्रीय-राष्ट्रीय और ग्लोबल बनाया है।

हलवाई कल तक लघु व्यापार था. लेकिन विगत चार दशकों में इसने उद्योग की शक्ल लेली है। एक-एक हलवाई के यहां सैंकड़ों –हजारों लोग काम कर रहे हैं। हल्दीराम से लेकर भीखाराम तक अनेक देशज हलवाई पूरे देश में मिल जाएंगे और इनकी ग्लोबल शाखाएं भी मिल जाएंगी। हलवाईयों का कारोबार खरबों रुपये का है। हलवाई उद्योग मूलतःराष्ट्रीय उद्योग है जिसका बहुराष्ट्रीय खाद्य कंपनियों से सीधा मुकाबला है।

जनतापूजा और उसके भक्तलेखक!


          इस बार के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा की जीत हुई है।उसे भारत की जनता ने वोट देकर सत्ता सौंपी है। भाजपा कई राज्यों में पहले भी चुनाव जीतती रही है। इसके पहले एनडीए के नेतृत्व में भाजपा को पहले भी केन्द्र में शासन करने का मौका मिला है। समस्या भाजपा की जीत की नहीं है ,फिलहाल मूल समस्या यह है जनता को कैसे देखें ?

जनता कोई बुद्धिहीन और विचारधाराहीन आधारों पर न तो जीती है और नहीं वोट देती है। जनता की भी अपनी विचारधारा है। यह कहना सही नहीं है कि जनता की कोई विचारधारा नहीं होती। जनता मात्र वोटबैंक नहीं है कि परेशान हुई और वोट दे आयी। जनता को अमूर्त और विचारधाराहीन मानना सही नहीं है। जो लोग जनता की चेतना में व्याप्त विचारधाराओं को नहीं देखते वे यथार्थ देखने का विभ्रम खड़ा करते हैं।

सच यह है कि जनता में आधुनिक वैज्ञानिक विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार की हमने कोशिश ही नहीं की। हमने यह मान लिया कि जनता महान है और उसके वोट से जीतने वाले नेता उससे भी महान हैं। जनता और चुने हुए प्रतिनिधियों की विचारधारा को देखने का यह तरीका सबसे खतरनाक और सब्जेक्टिव है।

लंबे समय तक जनता इस तरह के नेताओं को चुनती रही जिनके अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों और वैज्ञानिक नजरिए को लेकर गहरी आस्थाएं थीं लेकिन इससे जनता स्वतःही लोकतांत्रिक नहीं हो गयी। हमें देखना चाहिए आम जनता की चेतना में आज भी सभी रंगत की पूर्व-आधुनिक मान्यताएं और मूल्य घर किए हुए हैं। नेता वोट पाते रहे और हम जनता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहे। जनता के बुरे और घटिया मूल्यों को लेकर न तो नेहरु ने कोई बड़ी मुहिम चलायी और न जयप्रकाश नारायण ने मुहिम चलायी,न भाजपा ने सोचा और न कांग्रेस ने सोचा। इन सबके लिए जनता महान थी,उसमें कोई दोष नहीं था। निर्दोष और मूल्यवान जनता का इन दलों और राजनेताओं का राजनीतिक भावबोध हम सभी के मन में स्टीरियोटाइप की तरह जड़ें जमाए बैठा है।

भारत को जनतांत्रिक देश बनाने के लिए नेता,राजनीतिकदलों और संगठनों की विचारधारा के मूल्यांकन के साथ साथ जनता में व्याप्त विचारधाराओं की भी समय समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।

सच यह है आम जनता के एक हिस्से में साम्प्रदायिक विचारधारा का गहरा असर है और इस साम्प्रदायिक चेतना का साम्प्रदायिक राजनीतिक दल समय समय पर लाभ उठाते रहे हैं और जनता उनको नियमित वोट भी देती रही है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आम जनता का एक ठोस अंश है जो भाजपा और इसी तरह के दलों को नियमित वोट देता रहा है।ये वे वोटर हैं जो विचारधारात्मक प्रतिबद्धता के आधार पर वोट देते रहे हैं। ये चंचल वोटर नहीं हैं जो आज भाजपा के साथ तो कल किसी और के साथ चले जाएं।चंचल वोटरों का क श है जो समय-समय पर विभिन्न दलों के साथ जुड़ता और टूटता है। ऐसा समूह भाजपा के साथ भी है।लेकिन भाजपा के अधिकांश वोटर वैचारिकतौर पर भाजपा से जुड़े हैं।

चंचल वोटर की सामयिक समस्याओं को लेकर प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं और उसी आधार पर वह अपने वोट की प्राथमिकता भी बदल देता है। लेकिन वोटरों में एक वोटर है जो स्थिरभाव से जुड़ा रहता है यह प्रतिबद्ध वोटर है। भाजपा के पास प्रतिबद्ध वोटर की संख्या निरंतर बढ रही है। इससे यह पता चलता है कि भाजपा अपने साम्प्रदायिक प्रचार के जरिए जनता के एक अंश को वैचारिकतौर पर निरंतर जोड़े रखने में सफल रही है। ऐसी अवस्था में इस जनता को साम्प्रदायिक कहने से हमारे लेखक-बुद्धिजीवी परहेज क्यों कर रहे हैं ? जब जनता में जातिवादी को रेखांकित कर सकते हैं तो साम्प्रदायिक या आतंकी मनोभाव को रेखांकित क्यों नहीं कर सकते।

जनता शुद्ध नहीं होती। जनता महज जनता नहीं होती। जनता महान भी नहीं होती। जनता के पास दिलोदिमाग है। उसके जीवन के व्यापक अनुभव हैं,परंपराएं हैं और मूल्य भी हैं,जिनके आधार भी जनता के मूल्यबोध और वैचारिकतंत्र का निर्माण होता है।इसलिए जनता को हमें विचारधाराहीन नहीं समझना चाहिए।

हमने एक सुविधा का शास्त्र बनाया है हम साम्प्रदायिकता की आलोचना करेंगे, यानी प्रवृत्ति की आलोचना करेंगे लेकिन इस प्रवृत्ति की वाहक जनता की आलोचना नहीं करेंगे। हम जातिवाद की आलोचना करेंगे लेकिन इस जातिवाद के वाहक व्यक्ति या समूहों की आलोचना नहीं करेंगे। हमें दोनों ही स्तरों पर यह आलोचना विकसित करनी होगी। हमें प्रवृत्ति और व्यक्ति,प्रवृत्ति और समूह या समुदाय आदि के अन्तस्संबंधों को भी देखना होगा और उसे रेखांकित करके आलोचना करने का जोखिम उठाना होगा। वरना तो यही होगा जनता सही और नेता गलत। हमें यह कहने की आदत विकसित करनी होगी,नेता गलत है तो उसको वोट देने वाले भी गलत हैं।

आलोचना के केन्द्र में जनता के न रहने का दुष्परिणाम यह निकला है कि जनता के प्रति अनालोचनात्मक भावबोध पैदा हुआ है। इसने जनता में तमाम किस्म की अप्रासंगिक विचारधाराओं को बनाए रखने में मदद की है। जनता को हमें अनालोचनात्मक और पूजाभाव से देखना बंद करना चाहिए और जनता के विभिन्न स्तरों और समूहों में व्याप्त वैचारिक रुपों की बार-बार समीक्षा करनी चाहिए।

हम जानते हैं जनता अच्छी भी होती है और बुरी भी होती है।यह कैसे हो सकता है कि जनता सिर्फ अच्छी होती है। यदि जनता अच्छी होती है तो फिर समाज में इतनी अप्रासंगिक विचारधाराएं और जीवन मूल्य वर्चस्व क्यों जमाए हुए हैं ?लोकतंत्र की बेहतरी के लिए हम जनता को पूजना बंद करें। जनता का विवेक पूजन से नहीं आलोचनात्मक विवेक और मूल्यांकन के प्रचार-प्रसार से आगे बढ़ता है।