सोमवार, 11 नवंबर 2019

मोदी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति -





मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है

मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।

जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?

वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।

जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।

कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।

कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।

मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।

कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।

मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।



मथुरा के चौबों का परिवर्तित संसार और इतिहास की धर्मनिरपेक्ष परंपरा-



            
            
         मथुरा के इतिहास की चर्चा चौबों के बिना संभव नहीं है। ऐतिहासिक तौर पर इस जाति ने यहां के माहौल,परंपरा,इतिहास,संस्कृति आदि के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। पैदाइशी चौबे कैसे होते हैं ऐतिहासिक तौर पर उनकी क्या भूमिका रही है, इसके बारे में तथ्यों को खासतौर पर समझने की कोशिश की जानी चाहिए। आमतौर पर चौबे का जो अर्थ लिया जाता है उससे भिन्न अर्थ में उनको देखने की जरूरत है। मसलन् धर्मनिरपेक्ष परंपराओं और साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में इस जाति की भूमिका को नए सिरे से व्याख्यायित करने की जरूरत है। मैं चतुर्वेदी हूँ और इस नाते जाति गौरव के वशीभूत होकर यह सब नहीं लिख रहा ।बल्कि मैं एक नागरिक के नाते अपनी परंपराओं को नई दृष्टि से देखना चाहता हूँ।
    यह सच है कि आजकल चौबों में एक बहुत छोटा वर्ग है जो पंडागिरी-प्रोहिताई करता है। जबकि बृहत्तर चौबे समाज विभिन्न किस्म के पेशों में कार्यरत है। इनमें चार्टर्ड एकाउंटेंट ले लेकर परिवहन क्षेत्र, कारखानेदार से लेकर दुबई में काम करने वाले सैंकड़ों चतुर्वेदी मजदूर तक शामिल हैं। इस जाति में बड़ी संख्या में लेखक-बुद्धिजीवी-शिक्षक आदि भी  हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि चौबों की जब भी बात होती है उनकी पंडा-प्रोहित की इमेज ही हमेशा सामने रखकर बातें की जाती हैं।इससे उनके बारे में सही समझ नहीं बन जाती।विगत 70सालों में चतुर्वेदी जाति का बहुत बड़ा अंश इस पेशे को छोड़कर अन्य पेशों में जा चुका है। अब अधिकांश चौबे पंडागिरी नहीं करते। कहने का आशय यह कि विगत 70 सालों में चतुर्वेदी जाति गुणात्मक तौर पर बदली है। उसमें विभिन्न पेशेवर वर्गों का जन्म हुआ है।इस समय एक दर्जन से अधिक अरबपति हैं।जबकि करोड़पतियों की संख्या सैंकड़ों में है। इस सामाजिक रूपान्तरण और उसके साथ आए सांस्कृतिक परिवर्तनों को समझने की जरूरत है। चौबे बदले हैं,यह समझने की जरूरत है।
           मैं खासतौर पर मध्यकाल में चौबों  की धर्मनिरपेक्ष भूमिका के बारे में कुछ पहलुओं का जिक्र करना चाहूँगा। ये ऐसे तथ्य हैं जो इन दिनों मुसलमानों  और मुसलिम शासकों के खिलाफ चल रहे असत्य प्रचार अभियान की पोल खोलते हैं। इस प्रसंग में सबसे पहले शंकराचार्य का जिक्र करना समीचीन होगा। श्रीजगदगुरू शंकराचार्य जब मथुरा पधारे तो वे मथुरा में डिब्बारामजी चौबे द्वारा आयोजित व्यवस्था में रहे, उस समय उत्तम पांडेजी को उन्होंने अपना तीर्थ प्रोहित माना और विधि-विधान के साथ तीर्थाटन किया और उन पर हाथरस से लेख लिखा। इस प्रसंग को उन्होंने संवत1951 भाद्रपद महिने के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को लिखा।यह पत्र 16 पृष्ठों में है और इसमें डिब्बारामजी को पूर्ण सम्मानित के रूप में सम्बोधित किया गया है।
       मथुरा के चौबे शंकराचार्य के काल में भी बड़े ज्ञानी थे . इसके बारे में पारसी सम्प्रदाय के मान्यग्रन्थ शातिर में उल्लेख मिलता है।यह ग्रंथ विक्रम संवत पूर्व 414 का है, ,जब फारस में जरथुस्त नाम का धर्म प्रचारक अपना मत प्रचार करने लगा तब वलख के लोगों ने उससे शास्त्रार्थ करने के लिए हिन्दुस्तान से एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाया, लिखा  एकन् विरेमने व्यास नाम अजहिन्द आगद,दानाकिइल्मोहुनरमंद चुना अस्त,चूँ व्यास हिन्दी-वलख आमक,गश्ताश्प जरस्तरख रव्वा नन्द’-अर्थात् एक ब्राह्मण व्यास नामवाला यहाँ हिन्ददेश से आया है,वह बड़ा ज्ञान और बुद्धि का समुद्र है,क्योंकि यह महात्मा व्यास हिन्द देश से वलख में आया है-फारस के बादशाह गश्तास्प ने तब अपने प्रधान पण्डित जरथुस्त को उसके सामने बुलाया। व्यास ने जरथुस्त से कहा -‘ मन मरदे अम हिन्दी निजाद मैं हिन्दू देश का उत्पन्न हुआ परूष हिन्दू हूँ। शास्त्रार्थ लंबा चला और महात्मा व्यास देव जरथुस्त को परास्त कर हिन्दुस्तान लौट आए। इस किस्से का जिक्र स्वामी करपात्रीजी महाराज ने ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिन्दूधर्म ’ नामक किताब  में जिक्र किया है।
           महमूद गजनवी के मथुरा आगमन के समय जो  स्थितियां बनीं, उनका विभिन्न रूपों में वर्णन मिलता है। उस वर्णन का एक पहलू चौबों की भूमिका से जुड़ा है।उन दिनों एक चतुर्वेदी थे भट्ट दिवाकर ,वे विलक्षण विद्वान् थे और अपने पांडित्य को प्रदर्शित करने के लिए विदेश में कम्पूचिया तक गए थे।उनके बनाए अनेक शिष्य भी थे।बाद में उन्होंने कम्पूचिया की रानी से शादी की , रानी से उनकी जो संतान हुई वह बाद में राजसिंहासन पर बैठी।यह वाकया विक्रम संवत् 964 का है। दिवाकर भट्ट ने ‘मथुरा वर्णन’ नामक रचना लिखी है। यह समूचा वाकया कम्पूचिया में  प्राप्त किसी शिलालेख में दर्ज है,इसका जिक्र स्वामी करपात्रीजी ने किया है।महमूद गजनवी के मथुरा हमले का विस्तार से जिक्र करते हुए चम्पत कवि रचित ‘बडौ साकौ’ नामक काव्य रचना मिलती है। इसमें गजनवी के हमले को ‘ बडौ साकौ’ नाम से चित्रित किया है। मथुरा में चौबियापाड़े में वराहदेव के मन्दिर में अन्नकूट के समय ,यह कविता सस्वर पढ़ी ती थी। यह पर्व कार्तिकमास में होता है, उस मौके पर माथुर चौबों की गान मण्डली ‘बडौ साकौ’ नामक कविता का सस्वर पाठ किया करती थी। अब यह परंपरा गायब हो चुकी है।उस समय मदनदादा बड़े ही गंभीर स्वर में इस काव्य रचना का पाठ किया करते थे। उस कविता की एक झलक देखें- दोहा-
‘ गजनी वारौ महमदा,दलबादल सौ छाइ।
रावल तक डायौं कटक ,मथुरा घेरी सो आइ।।
जै रतनेसुर नगरपति,जै महाविद्या माइ।
चौबेन मौ ,कौ कहौं ,सब सुनियो ध्यान लगाइ।।’
छन्द- ‘ आयौ महमदा अर्रातौ ,होरी झर सौ झर सौ झर्रातौ।
       मन्दिर देव किये औंधे ,चौबे बनिया सब रौंधे।।
      महल हवेली ठाड़े रोवैं,धाट बाट मरघट में सौनैं।
      चौबे गूजर जादों अहीर,मूँड़ लिपेटैं कफ्फन चीर।।
      लाठी सोटा फरसा बल्लम,जो पायौ सो लियो अगल्लम।
      मार मार की परी पुकार,मच्यौ परी में हाहाकार।।’
यह  एक ऐतिहासिक लम्बी कविता है।इसमें गजनवी के अत्याचारों का विस्तार वर्णन किया गया है।भट्ट दिवाकर के अनुसार उस समय मथुरा में 36हजार माथुर ब्राह्मणों की बस्ती थी,इसमें से दो हजार माथुर कत्ल कर दिए गए,बीस हजार पलायन कर गए,मथुरा में कुल छह हजार पुरूष और आठ हजार नारी वर्ग,यानी कुल चौदह हजार बाकी बचे रह गए। महमूद गजनवी के आक्रमण के कारण अहीर,वैश्य, कारीगर आदि समुदायों के बड़ी संख्या में लोग मारे गए।महमूद को मथुरा में 21वें दिन रसद मिलनी  बन्द हो गई और उसके सिपाही भूखे मरने लगे तो वह मथुरा छोड़कर भाग खड़ा हुआ।वह यहां से लूट का 100 ऊंट सामान लादकर ले गया। उल्लेखनीय है महमूद गजनवी से यादवों ने जमकर मोर्चा लिया था।करौली राज्य के संस्थापकों में से एक राजा हरपाल देव ने महमूद गजनवी जब मथुरा पर हमला करने आ रहा था तो उसके सारे घोड़े छीनकर तवनगढ़ में बंद कर दिए थे।बाद में गजनवी ने उनसे माफी मांगी तब उसके घोड़े वापस लौटाए,उसी दौर में करौली में चौबों के 500 परिवार मथुरा छोड़कर जाकर बस गए थे। मथुरा और महावन पर राजा भोज के शासन का जिक्र भी मिलता है। उस समय भोज की राजसभा में मथुरा के वनमाली (उपनाम मालोजी) चतुर्वेदी ,उसकी विद्वत सभा के सदस्य थे, और राजा फूलचन्द उनका सेनापति था। वह महावन में किला बनाकर रहता था।
       मथुरा के शिक्षित बुद्धिजीवियों में वाचिक इतिहास परंपरालंबे समय तक बनी रही।लेकिन 1990 के  बाद से समाज में मध्यवर्ग का अधिकतर हिस्सा इन सबको भूल चुका है। उसको अपनी परंपरा और इतिहास का कोई ज्ञान नहीं है। मेरा संयोग से ऐसे परिवार में जन्म हुआ जिसमें चर्चिका देवी का मंदिर है। यह देवी मंदिर कहने को बहुत  छोटा है। इस मंदिर के पास अपनी कोई संपदा नहीं है। लेकिन ऐतिहासिक तौर पर यह मंदिर बहुत पुराना है। चर्चिका देवी चौबों की कुलदेवी है।चौबों की एक और कुलदेवी है महाविद्या। इस तरह उनकी दो कुलदेवी हैं। यह हमारे समाज की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग है। इतिहासकार और प्रसिद्ध विद्वान् बालमुकुन्द चतुर्वेदी ने ‘माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का इतिहास’ (1986) में लिखा है पृथ्वीराज चौहान जब मथुरा आया तो उसने ‘मथुरा में गोकर्णशिव तथा पद्मासनस्थ चण्डी(चर्चिका) की पूजा की जो चौबों की 64 अल्लों की पूजनीय थी।’ इसका जिक्र प्रसिद्ध रासो ग्रंथ ‘पृथ्वीराज रासो’ में मिलता है। उसे बालमुकुन्दजी ने उद्धृत किया है। बालमुकुंद चतुर्वेदी ने ‘सुदर्शन’ पत्रिका में लिखा चौहान नरेश ने चंडी चर्चिका और पप्पलेश्वर शिव की बड़े समारोह से पूजा कर 6दिन निराहार व्रत करके बहुत सा सोना जवाहरात द्रव्य तथा एक सहस्र सवत्सा गौऐं रत्नकंचन से सजाकर माथुर ब्राह्मणों को दान करके दी इन पृथ्वीराज के गुरू हृषीकेष मिश्र छिरौरा थे-जो नामी वैद्य थे।इनके ही पुत्र जजीदत्त माथुर राजा के अंगरक्षक और पुरोहित थे।
    महाकवि चंदवरदाई के रासो ग्रंथ से ज्ञात होता है कि पृथ्वीराज की बहिन पृथाबाई के संरक्षक थे चौबे ऋषिकेश मिश्र। मिश्रजी को पृथ्वीराज ने पृथाबाई के ससुराल चित्तौड़ रावल समरसिंह के यहाँ भेज दिया था।तभी से चित्तौड़ में माथुर चतुर्वेदी जाकर बस गए। वेणीदत्त माथुर तो अंत तक पृथ्वीराज चौहान के साथ रहे।वे पृथ्वीराज के साथ कैद होकर गजनी गये और वहीं मारे गए।उल्लेखनीय है मुहम्मद गोरी , मुहम्मद गजनवी ,अलाउद्दीन खिलजी,फिरोज तुगलक,सिकन्दर लोदी,इब्राहीम लोदी,बाबर आदि मुगल राजाओं के शासनकाल में मथुरा की जनता को भयानक अत्याचारों का सामना करना पड़ा।इन राजाओं के हमलों में यहाँ के मन्दिरों को भी नुकसान पहुँचा।मथुरा के प्रसिद्ध केशवदेव मंदिर,जो कृष्ण का असली जन्मस्थान है, इस मंदिर को सिकन्दर लोदी ने तोड़ा।उसके अलावा भी अनेक मन्दिरों को तोड़ा गया। मथुरा के लिए और खासकर चौबों के लिए अकबर के शासनकाल को स्वर्णयुग कह सकते हैं।अकबर और चौबों के प्रिय संबंधों को लेकर अनेक किंवदन्तियां मथुरा के वाचिक इतिहास का अंग रही हैं। यह भी उल्लेख मिलता है कि मथुरा में अकबर को ब्रजभक्ति के रसाचार्य श्री उद्धवाचार्य देव ने मथुरा के मंदिरों के दर्शन कराये।अकबर ने चौबों को अनेक मौकों पर जमीन, संपत्ति, सोना,जवाहात आदि दान में दिए। उनके दान आदि का उल्लेख करते हुए कई फरमान मिलते हैं।इससे एक बात साफ होती है कि अकबर को हिन्दूधर्म और हिन्दुओं से प्रेम था और वह चौबों को अपना गुरू मानता था। इस फरमान से यह भी पता चलता है कि मथुरा का एक नाम इस्लामाबाद भी था। यहाँ अकबर ने पृथ्वीराम बिहारी को जो फरमान जारी किया वह पढ़ें, इस फरमान पर शाही मुहर लगी है।मूल पढ़ें -
‘यह कि मुसद्दियान मेहमात हाल व इस्तकवाल परगने हवेली इस्लामाबाद उर्फ मथुरा विदानन्द जूं व जहूर पैवस्त कि मवाजी शस बीघे जमीन बंजर खारे हजमाह,लायक जरायत व मूजिव सनद व मोहर मुख्तार खान मरहूम वगैराह व जौजे महद मुआश पिरथी जुज्नारदार (चौबे विरहमन ओलिया)बुं खेत बख्शा मशारइज हां काविज व मुतशर्रिफ अस्त,लिहाजा वदस्तूर साविक व हाल दुरूश्त शुद, वायद कि आराजी मस्तूर हस्वुल जिमन(जमुना) अज और मुहर कदीम व तसर्रूफ व तआल्लक वो खेत मजकूर वा मुजास्ता व वजह हस्वपल वहद राजिय व मुत फरजन शवंददर नस्ल इजाव हस्व दस्तूर व अमल आयंदा हमेश इरसाल अज।ईंसनद मुजर्रद मुखिल बंदिश शुद।व तारीख पंजुम माह मोहर्रम उल हाम चहार शंबा इकवाल मानूप कलमी शुद 978हिजरीः अव 1030 हिजरी- मवानी जमनआं के मौलाये शस वीघे जमीन बंजर वाकय इस्लामावाद दर वजह वजह मद्द (खैरात) मुआशा वदस्तूर साविक वहाल शुद।
      शाहंशाह अकबर का पहिला फरमान 978 हिजरी(1615 विकर्म संवत्) का है। उसकी पुष्टि में एक दूसरा फरमान जहाँगीर राज्य के शासन में 1667 विक्रमी संवत् में आगरा के  सूबेदार नवाव महियर खाँ मुसद्दी परगना हवेली इस्लामाबाद द्वारा एक कुंआ सहित यह भूमि पृथ्वीराम बिहारी की धर्मपत्नी के नाम जारी किया गया। इस फरमान का भाषान्तर पढ़ें-
  ‘ ‘‘ईश्वर बड़ा है’’ यह कि अपस्थित वादी प्रार्थी वर्तमान निवासी परगना हवेखी इस्लामाबाद उर्फ मथुरा का खुद मौजूद है,और यह दावा करता है कि रकवा छै बीघे जमीन बंजर ऊंची नीची पूजा सेवा भजन ध्यान तथा तीर्थ यात्रियों के उपयोग योग्य है जो परानी बादशाही मपहरबंद सनद के व इसी मुताविक दिवंगत नवाव मुख्त्यार खान आदि हाकिमों की अदालती मुहरों युक्त स्वीकृति पत्रों के यहाँ के ब्राह्मण चोबे पिरथी(श्री पृथ्वीराज मिहारी) जो जनेऊधारी था और पीर पैगम्बर औसया दान करामाती था उसकी पस्वस्ती योग्य विधवा धर्म पाल पवित्र आचरण युक्त की सहायता न गुजरवशर के लिये एक भूमि(खेत) जो पहिले बादशाह द्वारा अर्पित और पुरस्कृत किया गया है तथा जिस पर अभी हाल में भी प्रार्थी उचित रूप में अधिकार प्राप्त अपनी वंश परम्परा के अनुसार है।इस बारे में यह पाया गया कि मौजूदा भूमि जो जमना नदी के किनारे है और पुरानी वंश परंपरागत मुहरों व प्रमाण लेखों सनदों के मुताबिक यह भूमि (खेत)) उसी हालत में है कारण उदारता की रीति के अनुसार बादशाह की इच्छा व राजधर्म काकर्त्तव्य पालन हेतु वंश परम्परा का लाभ उठाने के प्रयोजन से शाही कीति नीति के अनुसार तथा हमेशा हमेशा भविष्य में इस पर अमल करते रहने के लिए यह लेख लिखा गया है कि प्रमाण रहे।प्रमाणपत्र लेख बद्ध हुआ।तारीख 5महीना मुहर्रम उल हराम चहार शंबा को स्वीकृति अनुसार कलमबद्ध हुआ।’
 ये दोनों ही फरमान बालमुकुंद चतुर्वेदी के परिवार के पास हैं।
     चौबों के कई भेद हैं। मथुरा में रहने वाले चौबों को कडुए चौबे कहते हैं।जो लोग मथुरा के बाहर रहते हैं उनको मीठे चौबे कहते हैं।मीठे चौबों में तीन भेद हैं कुलीन चौबे,बदलुआ चौबे और सैंगवार चौबे। फिलहाल कडुबे चौबों में एक भेद प्रवासी माथुर चतुर्वेदी भेद भी आ जुड़ा है। मथुरा के बाहर जो चौबे निकल गए वे पंडा-पुरोहिताई नहीं करते।उनमें पहले बड़ी संख्या में किसानी करते थे,बाद में शिक्षा के प्रसार ने उनको विभिन्न किस्म के व्यवसाय,पेशेगत कामों और व्यापार की ओर ठेला। मथुरा में रहने वाले कडुवे चौबों में सन् 1950 तक पंडा-पुरोहिताई का काम ही होता था। बाद में आधुनिक शिक्षा के प्रकाश ने यहां के चौबों को शिक्षा और चार्टर्ड एकाउंटेंसी और परिवहन उद्योग में जाने की प्रेरणा दी।आज स्थिति बदल गयी है। अब इस जाति के लोग विभिन्न आधुनिक पेशों में कार्यरत हैं।
      इनकी जनप्रिय जीवन शैली में एक खास तरह की अनौपचारिकता और सादगी है।मथुरा के चौबों ने कांग्रेस के नेतृत्व में स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई में बड़ी संख्या में हिस्सा लिया।इसका सुफल यह रहा कि चौबों में राजनीति में भाग लेने की आदत और संस्कार हैं।इसमे उनमें उदारवादी मूल्यों को पैदा किया। कालान्तर में विभिन्न राजनीतिक दलों में चौबों की शिरकत बढ़ी। कांग्रेस के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी,जनसंघ-आरएसएस में भी इस जाति के लोग शामिल हुए और इन दलों के नेता बने।यह एक वास्तविकता है कि शहर के सबसे सक्रिय और जागरूक समुदाय के रूप में चतुर्वेदियों की महत्वपूर्ण भूमिका आज भी है। वे संख्याबल में कम हैं लेकिन राजनीतिक शिरकत,नेतृत्वगत क्षमता और निष्ठा की भावना के कारण वे सहज ही किसी भी दल में शामिल हो जाते हैं। 
      विगत 70 सालों में जातिगत सीमाओं को तोड़कर इस समाज के युवा आगे निकले हैं। आमतौर पर अपनी ही जाति में शादी करने की इनमें परंपरा है।लेकिन धीरे-धीरे अन्तर्जातीय विवाह,अन्तर्धार्मिक विवाह भी हुए हैं,खान-पान,जीवनशैली आदि में भी आधुनिकता ने प्रवेश किया है। सन् 1960 तक मथुरा के चौबे शहर के अंदर पुराने मुहल्लों में ही रहना पसंद करते थे,उनकी प्रमुख बस्ती थी चौबियापाड़ा, इसमें अनेक छोटी-छोटी गलियां हैं। लेकिन विगत 50 सालों में तेजी से शहर के बाहर नयी बस्तियों में घर बसाने की परंपरा शुरू हुई और अब बड़ी संख्या में आधुनिक अपार्टमेंट और कोठियों में एक वर्ग रहता है और आधुनिक कारोबार करता है।
     पहले अधिकांश चतुर्वेदी लड़कियां अशिक्षित होती थीं, लेकिन लोकतंत्र की हवा ने उनके जीवन को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। अब चतुर्वेदियों में बच्चों को आधुनिक स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाने की आदत पड़ गयी है।बड़ी संख्या में लड़कियां पढ़ रही हैं। उनमें आधुनिक साज-सज्जा,संस्कार  के मूल्य पैदा हुए हैं। उनके सजने-संवरने की आधुनिक संस्कृति ने जड़ें जमाली हैं। वे पुराने बंद समाज के साज-श्रृंगार से तेजी से बाहर निकल रही हैं। इस सारे परिवर्तन के बावजूद समाज में बड़े पैमाने पर रूढ़ियों और पुराने जड़ संस्कार प्रचलन में हैं।
    मथुरा के चौबों के कुलाचार जगप्रसिद्ध हैं। इनमें दोपहर में कच्ची रसोई खाना, चौबों के ही हाथ का खाने की लंबे समय से परंपरा है, यह चीज धीरे धीरे टूट रही है।इसके अलावा अधिकांश चौबों के यज्ञोपवीत संस्कार भी होते हैं,वे चौबों में ही शादी करते हैं,पूरी तरह शाकाहारी है,प्याज,लहसुन,मांस,मदिरा,बाड़ी,सिगरेट आदि का अधिकांश चौबे सेवन नहीं करते।सिर पर चोटी और कंधे पर जनेऊ धारण करते हैं।ठेठ ब्रजभाषा में बोलते हैं।स्वभाव से बेहद सरल होते हैं।चीजों की जटिलताओं से आमतौर पर अनभिज्ञ होते हैं।यह सरलता शिक्षितों में भी है।अधिकांश चौबों में मृतक संस्कार पूरे वैदिक विधि-विधान के साथ होते हैं और श्राद्ध आदि भी नियम से करते हैं।
    आजादी के पहले स्थिति यह थी कि मथुरा के चौबे बाहर रहने वाले चौबों में शादी नहीं करते थे, एकदम आदिवासियों की तरह मथुरा में ही रहने वाले चौबों में ही शादी करते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह स्थिति बदली, सबसे पहले कुछ नौजवानों ने शहर में ही अंतर्जातीय विवाह किए, उसका जाति में जमकर विरोध हुआ,लेकिन धीरे धीरे बंद समाज के दरवाजे खुले,बाहर की हवा ने प्रवेश किया।    
     आजादी के बाद सबसे पहले साठ के दशक में मथुरा में एक चतुर्वेदी युवक ने अग्रवाल परिवार की लड़की से प्रेम किया और शादी की।इस तरह समाज में अन्तर्जातीय विवाह की नींव पड़ी। इस शादी ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया।उस समय समाज में बेहद तनाव था। प्रेम करना उस समय अपराध माना जाता था। लेकिन उस नौजवान ने प्यार किया।दिलचस्प है कि वे दोनों अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे। असल में किसी भी समाज को बदलने में प्रेम विवाह या अंतर्जातीय प्रेम बुनियादी कारक की भूमिका अदा करते हैं। मथुरा में चौबों के बंद समाज को भी प्रेम विवाह ने खोला,उसका अगला कदम था चतुर्वेदी औरतों का पर्दाप्रथा ,घूंघट प्रथा और चादर प्रथा से बाहर निकलना।साठ के दशक में ही कुछ युवा लड़कियों ने साहस करके एक दिन निर्णय लिया कि वे गली-बाजार में बिना घूंघट के निकलेंगी,इस पर पूरी जाति में ,खासकर चौबियापाड़े में तूफान उठ खड़ा हुआ। उन लड़कियों का समाज में जमकर विरोध हुआ ,यहां तक कि उनके घर से बाहर बिना घूंघट के निकलने पर पत्थर आदि भी फेंके गए। लेकिन उन लड़कियों ने साहस से काम लिया और समाज के गलत रीति-रिवाजों का विरोध जारी रखा।दिलचस्प है उनकी मदद किसी राजनीतिक दल ने नहीं की। जो लड़कियां घूंघट प्रथा और चादर न पहनने की जिद कर रही थीं, उनमें से अधिकतर अशिक्षित थीं या बहुत कम पढ़ी लिखी थीं। उनको जीवन के अनुभवों ने पर्दाप्रथा और चादर प्रथा से मुक्त होने की प्रेरणा दी और उन्होंने बगैर किसी संगठन का निर्माण किए पूरे समाज से घूंघट और चादरप्रथा को हटा दिया। यह एकतरह की मूक सामाजिक क्रांति थी। जो औरतें क्रमशःइस तरह के कदम उठा रही थीं वे नहीं जानती थीं कि वे समाज के बंद दरवाजे क्यों और कैसे खोल रही हैं। ये वे औरते थीं जो प्रगतिशील विचारों और मूल्यों से एकदम अनभिज्ञ थीं लेकिन जीवन के अनुभवों ने उनको घूंघट और चादर प्रथा से बाहर निकलने के लिए मजबूर किया। आज स्थिति यह है पूरे चतुर्वेदी समाज में चंद औरतें बची हैं जो चादर का इस्तेमाल करती हैं। अंतर्जातीय प्रेम पहला बड़ा परिवर्तन था। दूसरा परिवर्तन था घूंघट और चादरप्रथा को नष्ट करना। तीसरा बड़ा परिवर्तन था चतुर्वेदी लड़कियों की स्कूली शिक्षा,तीसरा बड़ा परिवर्तन था कामकाज और नौकरी के सिलसिले में मथुरा के बाहर जाकर जाना। चौथा बड़ा परिवर्तन था शहर में ही पंडागिरी के अलावा कामकाज और आमदनी के नए क्षेत्रों की तलाश करना, व्यापार करना।इस सबके कारण समाज के बड़े हिस्से में बुनियादी बदलाव आया,उसकी परजीवी अर्थव्यवस्था बदली और समाज तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर गया।इस सबने पूरे समाज का धर्मनिरपेक्षीकरण किया और बंद समाज की संरचनाओं को पूरी तरह नष्ट कर दिया। किसी भी बंद समाज को खोलने की पहली शर्त है कि उसके सदस्य अपनी पहल से बाहर निकलें,समाज की कुरीतियों को चुनौती दें। आजकल चौबों में सबसे बड़ी कुरीति में शादी-ब्याह का खर्चा और दहेज प्रथा।दूसरी बड़ी कुरीति है शाऩोशौकत के प्रदर्शन के नाम पर, धार्मिक रीति-रिवाजों के नाम पर गांव के भोज के नाम पर पूरी जाति को भोज कराना।इस समय स्थिति यह है कि चतुर्वेदियों में अनेक अरबपति हैं। लेकिन उन्होंने मथुरा में खासकर चतुर्वेदियों के ऊपर शिक्षा पर कोई पैसा खर्च नहीं किया। इन लोगों में सामाजिक विकास के कामों में  पैसा खर्च करने की आदत नहीं है।मथुरा में एकमात्र माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय है। जिसमें संस्कृत माध्यम से प्रथमा से आचार्य पर्यन्त संस्कृत माध्यम से शिक्षा दी जाती है।यह कॉलेज कलकत्ता में रहने वाले बैजनाथ चौबे ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति इस कॉलेज के नाम कर दी।चतुर्वेदी युवाओं में बहुत कम हैं जिनके पास उदार पूंजीवादी मूल्य हैं। आजभी बड़ा अंश परंपरावादी और अनुदार राजनीति, साम्प्रदायिक राजनीति का पक्षधर है। जब तक चतुर्वेदी युवा उदार पूंजीवादी मूल्यों को नहीं अपनाते तब तक वे साम्प्रदायिक राजनीति से मुक्त नहीं होंगे। अनुदारवादी-साम्प्रदायिक राजनीति प्रतिहिंसा और सामन्ती गिरोहबंदी में बांधे रखती है। एक खास तरह की भीड़ संस्कृति का हिस्सा बनाए रखती है।यहीं से नए सिरे से आधुनिक घेटो समाज की शुरूआत होती है। यह आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है।
        सवाल यह है मथुरा में चौबे कब से रह रहे हैं ॽ मथुरा कब से हैॽ ये दो सवाल बेहद महत्वपूर्ण है इन सवालों के संदर्भ में परंपरागत पुराण,स्मृति,उपनिषद,मध्यकालीन दस्तावेज और ब्रिटिश कालीन गजेटियर आदि में सामग्री मिलती है। इस सामग्री में अनेक दिलचस्प सूचनाएं मिलती हैं जिनसे चौबों के इतिहासकार चौबों को जोड़ते हैं।इस प्रसंग में पहली बात यह कि चतुर्वेदी या चौबे पदबंध बहुत बाद में प्रचलन में आया, उनसे जुड़ा सबसे पुराना नाम है ‘माथुर ब्राह्मण’।दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि चौबे मूलतः सनातन हिन्दू धर्म के मानने वाले हैं और सनातन हिन्दू धर्म की परंपराओं का पालन करते रहे हैं।इसका उनके खानपान, जीवनशैली, शादी-ब्याह-संस्कार आदि पर गहरा असर है।यही वजह है कि मथुरा में उनका सनातन हिन्दू धर्म के विरोधियों से समाजसुधार आंदोलन के दौरान मतभेद रहे हैं, उन्होंने दयानन्द सरस्वती के नजरिए का इसी आधार पर जमकर विरोध किया।फलतः इस जाति पर समाज सुधार आंदोलनों का कोई असर नहीं पड़ा।
    ब्राह्मणों के अनेक के नाम प्रचलन में हैं जैसे कान्यकुब्ज, सारस्वत, सनाढ्य,गौड,मैथिल,महाराष्ट्रियन,द्राविड, गुर्जर आदि।इन सबके साथ क्षेत्रीयता का अहंकार जुड़ा हुआ है। लेकिन माथुर ब्राह्मण यानी चौबों के साथ क्षेत्रीयता का अहंकार जुड़ा नहीं है। वे राजनीतिक या सामाजिक समूह के रूप में कभी सक्रिय नहीं रहे। उनमें लंबे समय से ऋषियों की परंपरा से जोड़ने की आदत रही है, जिसका इन दिनों तेजी से क्षय हुआ है। ब्राह्मणों की सबसे बड़ी विशेषता है ‘फूट’ ।इसके कारण उनमें जाति भेदभाव पनपा।कलह के नए नए आख्यानों का जन्म हुआ। इसी तरह का एक आख्यान राजा जयचन्द के जमाने का मिलता है। राजा जयचन्द ने एक यज्ञ कराया उसमें कान्यकुब्ज आदि ब्राह्मणों के अलावा माथुर ब्राह्मणों को भी बुलाया। किसी कुटिल बुद्धि ने इन दोनों में फूट डालने के लिए एक श्लोक लिखकर प्रचलित कर दिया।उसे ब्राह्मण मंडली के सामने पेश किया।यह श्लोक था- ‘‘सर्वेद्विजा कान्यकब्जा माथुरं मागधंबिना।प्रायचित्तं प्रकुर्वन्तु बौद्ध धर्मेण दूषिताः।। ’’ कहा जाता यह श्लोक सुनकर माथुर ब्राह्मण यज्ञ बीच में ही छोड़कर चले आए और उनके शाप के बाद ही संयोगिता हरण हुआ,दूसरे ही वर्ष मुहम्मद गोरी ने कन्नौज पर हमला किया। संभवतः इस तरह की भेदभावपूर्ण बातें और भी प्रचलन में रही होंगी। इसी तरह का एक उल्लेख कवि केशवराय की रचनाओं में मिलता है। उन्होंने एक श्लोक की रचना की है।उसमें मागध और माथुर ब्राह्मणों में द्वेष का जिक्र मिलता है।केशव कवि सनाढ्य थे। वाकया यह है कि ओरछा के राजा इन्द्रजीत सिंह बुन्देले ने एकबार यज्ञ किया। उस यज्ञ में 5 किस्म के ब्राह्मण बुलाए ।ये थे- माथुर ,मागध,गुजरातके कापट, कन्नौज के कान्यकुब्ज,कटकपुरी (उड़ीसा) के कीटक । उस समय किसी ने इन 5 किस्म के ब्राह्मणों के खिलाफ एक श्लोक लिखकर राजा के पास पहुँचा दिया। बाद में यह श्लोक कवि केशवराय तक पहुँचा । दूसरे दिन यज्ञमंडप में जब राजा पहुँचा तो कवि केशव राय ने प्रतिवाद किया और यह श्लोक पढ़कर सुनाया, उन्होंने लिखा, ‘‘ माथुरो मागधश्चैव कापटो कीट कानजौ।पंचविप्रा न पूजयन्ते बृहस्पति समा यदि।।’’ इस श्लोक में पाँच कोटि के ब्राह्मणों को बृहस्पति के समान कहा गया है।यह श्लोक सुनाकर ब्राह्मण लोग यज्ञ छोड़कर अपने-अपने घरों को चल दिए।
      असल में चौबों में जातिचेतना अंग्रेजों के जमाने में ही पैदा हुई। उल्लेखनीय है अंग्रेजों ने सचेत रूप से सारे देश में जातिबोध, जाति गौरव और जातिचेतना को पैदा करने का काम किया। अंग्रेजों के शासन स्थापित होने के पहले भारत में जातिचेतना उतनी नहीं थी जितनी अंग्रेजों के जमाने में थी। यही वजह है अंग्रेजों के आने के बाद जाति विमर्श मुख्य विमर्श बना। वर्णाश्रम व्यवस्था और उसके तमाम स्तरों और सामाजिक श्रेणियों की खुलकर आलोचना सामने आई, यही वह दौर है जिसमें ज्योतिबा फुले-भीमराव आम्बेडकर आदि ने वर्णाश्रम व्यवस्था की गंभीर आलोचना पेश की, फुले-आम्बेडकर की आलोचना ने समूचे समाज को गहरे तक प्रभावित किया। सवाल यह अंग्रेजों के द्वारा निर्मित जातिबोध, जाति की पहचान आदि के जो प्रयास हुए उन पर ज्योतिबा फुले-आम्बेडकर की आलोचना का क्या असर हुआ ॽ समाज में जातिचेतना का ह्रास हुआ या विकास हुआ ॽ स्वाधीनता संग्राम में भी जाति और वर्ण व्यवस्था के सवाल केन्द्र में थे, पूंजीवाद का विकास हो रहा था। वहीं पर गांधी-आम्बेडकर-नेहरू जैसे महान नेता मैदान में थे,उनके पीछे लाखों देशवासी भी थे।इस सबके बावजूद जाति और वर्ण वैषम्य समाज में खत्म क्यों नहीं हुआ ॽ
    असल में पूंजीवाद के रहते जाति वैषम्य खत्म नहीं हो सकता। पूंजीवाद अपनी वैषम्यपूर्ण नीतियों के कारण उन तमाम परंपराओं और मूल्यों को आत्मसात कर लेता है जो वैषम्य या ऊंच-नीच की धारणा के पक्ष में हैं। गांधी-आम्बेडकर-नेहरू आदि की सबसे बड़ी असफलता है कि उनके पास पूंजीवाद का समग्रता में कोई आलोचनात्मक नजरिया नहीं है। मसलन् आम्बेडकर ने वर्णाश्रम व्यवस्था की सबसे गंभीर आलोचना की लेकिन ब्रिटिश शासन और पूंजीवादी राजसत्ता की कभी गंभीर आलोचना नहीं की। पूंजीवाद की विशेषता है कि वह परंपरा के उन सभी वैचारिक मूल्यों और दृष्टियों को आत्मसात कर लेता है जो वैषम्य और भेदभाव को रेखांकित करते  हैं। इस नजरिए से देखें तो गांधी-आम्बेडकर-नेहरू की जाति संबंधी आलोचना से समाज में थोड़ा सुधार तो हुआ, अछूत समस्या से मुक्ति मिली,नौकरियों से लेकर संसद तक समान अधिकार मिले। लेकिन समाज में जातिचेतना, जाति की पहचान और भी अधिक पुख्ता हुई,जाति की पहचान से मुक्ति नहीं मिली।
    विगत 70 साल के लोकतांत्रिक सामाजिक-आर्थिक विकास के कारण बड़ी संख्या में असवर्ण जातियों में बड़ी संख्या में मध्यवर्ग का उदय हुआ, इन जातियों में अमीर भी पैदा हुए,लेकिन जाति की पहचान खत्म नहीं हुई।उलटे दलितों में ऊंच-नीच बढ़ा। सवाल उठता है जाति की पहचान क्या पूंजीवाद में खत्म हो सकती हैॽ
      पूंजीवाद रहेगा तो जाति की पहचान रहेगी, धर्म की पहचान रहेगी। क्योंकि पूंजीवाद के पास जाति और धर्म की पहचान से मुक्त होने का कोई विकल्प नहीं है। यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसके आधार पर पूंजीवाद के बाहर जाति की पहचान खत्म करने के वैचारिक उपायों पर सोचने की जरूरत है। गांधी-आम्बेडकर-नेहरू के नजरिए का अतिक्रमण करके नए विकल्प तलाशने होंगे। इन तीनों ही नेताओं के नजरिए की मुश्किल यह है कि वे पूंजीवाद विकास के मॉडल के आधार पर जातिप्रथा को खत्म करने के बारे में सोचते हैं, वे यह देखने में असमर्थ हैं कि पूंजीवादी विकास का मॉडल जातिचेतना या अस्मिता की राजनीति को और ज्यादा घनीभूत करता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें जो चौबों में गांधी-आम्बेडकर-नेहरू के जातिप्रथा विरोधी नजरिए का कोई असर न तो स्वाधीनता संग्राम में हुआ और न बाद में हुआ,जबकि इस जाति के अनेक लोगों ने स्वाधीनता संग्राम में बड़ी संख्या में खुलकर शिरकत की, अनेक लोग जेल गए।
      19वीं और 20वीं शताब्दी में हिन्दी में तकरीबन 130 से अधिक जाति पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हुईं। इतनी पत्र-पत्रिकाएं पहले कभी सामने नहीं आईं। हरेक जाति के गौरवपूर्ण आख्यान वाली इन पत्रिकाओं का पत्रकारिता के इतिहास में अम्बिकादत्त वाजपेयी ने विस्तार से जिक्र किया है। कहने का आशय यह कि अंग्रेजों का काल जातिचेतना के उभार का काल है। यही वो समय है जिसमें अंग्रेजों ने जाति इतिहास, जाति विमर्श,जाति की पहचान,जातिगत आधार पर जनगणना आदि पर जोर दिया।
     सवाल उठता है  जाति विमर्श सामाजिक फूट के विमर्श में रूपान्तरित कैसे और क्यों हुआ ॽ जातिचेतना कैसे साम्प्रदायिक चेतना में रूपान्तरित होती है ॽ इन दो सवालों पर सभी रंगत के विचारक कन्नी काटते नजर आते हैं।जाति चेतना और जाति पहचान वस्तुतः साम्प्रदायिक चेतना बनाती है, वह समानतावादी चेतना नहीं बनाती।आप दलित जातियों के पक्षधर हों या सवर्ण जातियों के पक्षधर हों,अंततः वैचारिकतौर पर साम्प्रदायिक चेतना और साम्प्रदायिक सामाजिक गोलबंदी की ही मदद करेंगे।क्योंकि जाति चेतना का स्वाभाविक परिणाम है साम्प्रदायिक चेतना।दिलचस्प है महाराष्ट्र,यूपी,बिहार,हरियाणा आदि जातिचेतना के ही किले नहीं है बल्कि साम्प्रदायिक चेतना के भी किले हैं।जाति चेतना बबूलचेतना है।  
      हरेक जाति में एक जमाने में जाति गौरव और श्रेष्ठत्व के दावे पेश किए गए। जाति प्रतिस्पर्धा की रणनीतियों को अपनाया गया। कहीं नाम लेकर कहीं पर बिना नाम लिए दूसरी जाति से अपनी जाति को श्रेष्ठ सिद्ध करके हमारे देश में जातिवाद की फसल खूब काटी गयी है।इन दिनों तो यह फसल बहुत ही अधिक हो रही है और हरेक राजनीतिक दल उस फसल को काटने में लगा है। जाति की मुश्किल यह है कि वह अतीत में भी थी और वर्तमान में भी है। अतीत में जैसी थी आज उससे अधिक बदसूरत है।सवाल यह है जाति को बदसूरत किसने और क्यों बनाया ॽ चौबों में एक विशेषता है वह यह कि इनमें जातिबोध नहीं है,उलटे जाति सहिष्णुता है। वे लंबेसमय से देश-विदेश के विभिन्न इलाकों में जा रहे हैं,अर्थोपार्जन कर रहे हैं और उनकी निजी अर्थव्यवस्था का चरित्र बदल रहा है।  
     आधुनिककाल में खासकर सन् 1970 के बाद तेजी से मध्यपूर्व के इलाके में दुबई नामक शहर के उदय और विकास ने मथुरा के चतुर्वेदी युवाओं को बहुत आकर्षित किया। इसका सुफल यह निकला कि बेरोजगार चतुर्वेदी युवाओं का एक बड़ा वर्ग दुबई गया और उसने वहां विभिन्न किस्म के पेशेवर कामों में सक्रिय भूमिका निभायी, इससे सैंकड़ों चतुर्वेदी परिवारों की अर्थव्यवस्था में बदलाव आया। दुबई के अलावा जिस शहर ने सबसे अधिक चौबों को आकर्षित किया वह है मुबंई।  आजादी के बाद मुंबई में जाकर सैंकड़ों युवा कामकाज की तलाश में,चार्टर्ड एकाउंटेंसी के बहाने जाकर बस गए,उससे समाज का चरित्र बदला, समाज के वर्ग में महानगरीयबोध पैदा हुआ।कहने का आशय यह कि चौबों में ग्लोबल और महानगरीय बोध पैदा करने में उनकी यजमानी वृत्ति ने कम और दुबई-मुंबई के माहौल ने अधिक मदद की। इस समूची प्रक्रिया में जाति की दीवारें कमजोर हुई हैं।एक जमाना था प्रतिष्ठित चौबे जाति के बाहर शादी करने से डरते थे लेकिन आज ऐसा नहीं है। यह ताकत उनको महानगरीयबोध से मिली।महानगरीय बोध जाति के बंधन तोड़ता है।
      विक्रम संवत् 1370 के पहले प्रकृत भाषा में ‘‘चड विज्ज’ पदबंध मिलता है, इसका अर्थ बालमुकुंद चतुर्वेदी ने ‘चौबेजी’ किया है। वे इसे ‘चौबे’ का ऐतिहासिक प्रमाण मानते हैं। मथुरा में पहले चौबों का माथुर ब्राह्मण कहा जाता था और उनकासबसे महत्वपूर्ण संदर्भ-सूत्र बौद्ध इतिहास में मिलता है। एक जमाने में कलकत्ता विश्वविद्यालय ने ‘गिलक्रिस्ट मैन्युत्कृष्ट’(ननिनाक्षदत्त,संपादक, गिलगित मेन्यूस्क्रिफ्ट-कलकत्ता विश्वविद्यालय,कलकत्ता, जिल्द3 भाग1,पृ.15-17)   नाम से तिब्बत के गिलगिट बौद्ध मठ की पुरानी पाण्डुलिपियों को प्रकाशित किया था, इनकी खोज में महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की महत्वपूर्ण भूमिका थी। ‘गिलक्रिस्ट मैन्युत्कृष्ट’ के आधार पर कृष्णदत्त वाजपेयी ने ‘ब्रजभारती पत्रिका में ‘‘प्राचीन मथुरा में यक्ष’’ नामक निबंध लिखा,इस निबंध में विस्तार से उस अंश ‘गिलक्रिस्ट’ के हवाले से उद्धृत किया गया जिसमें माथुर ब्राह्मणों का जिक्र है।
    महात्मा बुद्ध जब मथुरा आए तो उस समय के घटनाक्रम का इसमें वर्णन है,उस वर्णन के क्रम में बुद्ध और माथुर ब्राह्मणों के बीच के समूचे आख्यान को बड़े ही सुंदर ढ़ंग से पेस किया गया है। वाजपेयी ने पहले मूल पाठ पेश किया है बाद में उसका भाषान्तर दिया है। इस भाषान्तर में जो चीजें सामने आती हैं उनको पढ़कर नए किस्म के चौबों का एहसास होता है। पूरा अंश यहां प्रस्तुत है।
  ‘‘ भगवान बुद्धके मथुरा आने पर बड़े 2 भवनों और परिवारों के स्वामी माथुर ब्राह्मणों ने जब यह सुना कि भगवान बुद्ध भिक्षा के लिये मथुरा में आये हैं और प्रवेश करते समय उन्हें नगर अधिकारी देव (यक्षिणी) ने तिरष्कृत कर लौटा दिया ।।1।।इस प्रकार मथुरा पुरी में बिना प्रवेश किये ही वे गर्दभ यक्ष(गिरधरपुर) के भवन को चले गये इस बात को सुनकर वे पवित्र माथुर ब्राह्मण फिर दूसरी बार पवित्रता से बनाये हुए भोज्य पदार्थ और तृप्त होने योग्य पकवानों को हरेक अलग-2अपने यज्ञ पात्रो में रख-रखकर लाये और फिर उन सबको गाढ़ाओं में रखकर जिस मार्ग से भगवान बुद्ध गये थे उसी मार्ग से चले।।2।। वहाँ पहुँचकर भगवान के चरणों में शीष झुकाकर प्रणाम करते हुए एक तरफ बैठे।।3।। श्रद्धा युक्त माथुर ब्राह्मणों गृहपतियों की धर्मचर्या से भगवान बुद्ध भिक्षा गमन से पूर्व की तरह ही परम हर्षित होकर मौन हो उन्हें देखने लगे।।4।। इसके बाद श्रद्धालु नगर के स्वामी वे ब्राह्मण उठकर बैठने योग्य आसन आदि को ठीक ठाक करके जहाँ भगवान बैठे थे वहाँ जाकर दोनों हाथ जोड़कर विनयपूर्वक प्रणाम करते हुए एक तरफ बैठ गये,प्रणाम करते हुए प्रभु से इस प्रकार बोले।।5।। इत्यादि। इस पूर् प्रकरण का वर्णन करते हुए 43 श्लोक हैं। इस समूचे आख्यान की खूबसूरत बाच यह है कि चौबों ने भगवान बुद्ध को जहाँ एक ओर भोजन कराया तो वहीं दूसरी ओर बुद्ध ने कहा हमारे भिक्षुक तब भोजन करेंगे जब वे शहर में मुक्तभाव से पहले घूम-फिर आएं। भोजन करने के पहले सभी भिक्षुक शहर में आए ,मुक्त भाव से उन्होंने विचरण किया, बाद में अनेक मथुरा निवासी यक्ष और यक्षणियों ने बौद्ध धर्म में दीक्षा ली, माथुर ब्राह्मणों ने बौद्धों के लिए साढ़े तीन हजार विहार बनवाए। उस समय साढ़े तीन हजार यक्ष भगवान बुद्ध की शरण में आए। इस पूरे आख्यान से एक ही संदेश निकलता है कि चतुर्वेदियों में बौद्धधर्म के प्रति श्रद्धा थी।जबकि वे बौद्ध नहीं थे। मजेदार बात है चौबों ने जहाँ एक ओर भगवान बुद्ध के लिए साढ़े तीन हजार विहार बनवाए वहीं दूसरी ओर उनको शास्त्रार्थ के लिए भी ललकारा। उस समय नीलभूति वीरभद्र नामक विद्वान हुआ करते थे वे अपनी वैदिक उपासना पद्धति,वैदिक बोध के विलक्षण विद्वान थे, उन्होंने भगवान बुद्धको शास्त्रार्थ के लिए ललकारा, लेकिन महात्मा बुद्ध उनसे शास्त्रार्थ करने नहीं आए। नीलभूति शिव के उपासक थे और नगला भूतिया में रहते थे।उसी दौर में महात्मा बुद्ध से शास्त्रार्थ करने वाला दूसरा विद्वान् था महाकात्यायन, उनसे बुद्ध ने शास्त्रचर्चा की।उनको अवन्ती के राजा ने मथुरा भेजा था।उस समय अवन्ती के राजा चण्ड प्रद्योत का दोहित्र अवन्तीपुत्र नामक राजा था। इस शास्त्रचर्चा में महाकात्यायन पर महात्मा बुद्ध का गहरा असर पड़ा और वे स्वयं बौद्धधर्म के प्रचारक हो गए। दिलचस्प है वे अवन्ती से आए थे महात्मा बुद्ध को ले जाने के लिए लेकिन महात्मा बुद्ध अवन्ती(उज्जयनी) नहीं गए। महात्मा ने कहा मेरी अब वहां आवश्यकता नहीं है। बाद में महाकात्यायन मथुरा में ही आकर बस गए।कालान्तर उनके वंशजों को महाब्राह्मण यानी कट्या के नाम से जाना गया। इस दौर का तीसरा माथुर ब्राह्मण था महादेव माथुर, यह चौबिया पाड़े में महादेव गली,नगला पायसा, का निवासी था। उसे सर्वप्रथम चौबे बौद्ध कह सकते हैं। महादेव माथुर पहले चतुर्वेदी थे जो महान क्रान्तिकारी बौद्ध बने।  महादेव माथुर के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार जगदीशप्रसाद चतुर्वेदी ने एक महत्वपूर्ण लेख लिखा था जिसका शीर्षक है ‘‘ बौद्धकाल के क्रान्तिकारी विश्वविख्यात आचार्य महादेव माथुर’’ , जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी के अनुसार ‘‘ बौद्ध धर्म को सन्यासियों के धर्म से बढ़ाकर सारी जनता का धर्म बनाने का गौरव तथा बौद्ध धर्म को भारत के अतिरिक्त सारे संसार में फैलाने का श्रेय मथुरा के दो व्यक्तियों को है।इनमें एक हैं महादेव (माथुर) और दूसरे हैं उपगुप्त (सौगांधिकवैश्य)। उपगुप्त के विषय में तो यह मतभेद भी है कि वे मगध या कहीं अन्यत्र के गंध बिक्रेता परिवार से मथुरा आये थे किन्तु महादेव के विषय में तो यह निर्विवाद मान्यता है कि वे मथुरा के प्राचीन निवासी ब्राह्मणों (माथुरों) के परिवार में से थे।उपगुप्त का विशाल यश विहार मथुरा के पूर्व यमुना तटपर सप्तर्षि टीले ,बलि टीले से सुदूर रावणकोटि और बुध तीर्थ तक फैले भूभाग में था,जहाँ अनेक महत्वपूर्ण स्तूप विहार और उपवन शोभायमान थे। इनने हजारों लोगों को बौद्धधर्म में दीक्षित किया था।इससे भी अधिक प्रभावशाली दूसरे व्यक्ति महादेव थे,जिनका स्थान महादेव की गली मथुरा के नगला पाइसा मुहल्ले में है और जिसके समीप एक प्राचीन मंदिरनुमा नीची खिड़की में प्राचीन काल की अनेक ज्ञात-अज्ञात मूर्तियां दीवाल में चुनी हुई हैं।’’
 ‘‘ तथागत भगवान बुद्धकी मृत्यु के 100 वर्ष बाद बौद्ध साधुओं में धार्मिक आचार विचार को लेकर एक विवाद खड़ा हुआ,जो सिद्धांतों को न लेकर साधारण रहन-सहन की चर्चा को लेकर उठा था, जिसमें भिक्षु कश्यप की अध्यक्षता में विचार होकर संगीती के निर्णय के रूप में विनय सूत्र नाम के कुछ नियम निश्चित किये गए।इसी समय एक दूसरी संगीती में बौद्ध भिक्षुओं के ताड़ी पीने सोना चादी संग्रह करने को धर्म विरूद्ध घोषित किया गया। इसमें बहुसंख्यक भिक्षु असंतुष्ट हुए उन्होंने वैशाली में ही एक दूसरी सभा(संगीती) बुलायी जिसमें 10हजार बौद्ध लोग एकत्रित हुए और इसका नाम ‘महासंगीती’ रक्खा गया तथा इलके निर्णयों को मानने वाले ‘महासांधिक’ कहलाये।
     इस महासांधिक दल या सम्प्रदाय के नेता महादेव थे। यह सम्प्रदाय महासंघ के रूप में अफगानिस्तान,चीन,कोरिया,कंबोडिया, जापान,वर्मा ,श्याम देव तक फैला।महादेव के पांच सिद्धान्त निश्चित किये गये जो सीधे सरल सुधारवादी और सर्वजनसुलभ थे। इनमें 1.था यह कि अर्हत या सिद्ध पुरूष भी जाने अजाने पाप कर सकता है जिससे वह स्थानच्युत नहीं होता है।2.यह कि कोई भी व्यक्ति अर्हत बन सकता है।3.यह कि सिद्धांत को लेकर अर्हत के मन में भी शंकायें उत्पन्न होती हैं।4.कोई भी व्यक्ति बिना गुरू के सिद्ध या अर्हत नहीं हो सकता।5.भाव विभोर होना ध्यान का एक पवित्र मार्ग या सिद्धि है।अब दो शाखायें बनी ,1. थेरवादी (स्थिर परंपरावादी) 2. महासांधिक । इनमें पहिला वर्ग रूढ़िवादी अनुदारदल या सत्तावादी था तथा दूसरा उदारवादी परिवर्तनवादी या लोकतान्त्रिक था। महादेव इस दूसरे दल के महासांधिक संप्रदाय के नेता थे,जिसने बौद्ध सिद्धांतों पर नये सिरे से विचार करने की पद्धति डाली।इसने अभिधर्म,यतिसंविद और निर्देश तथा कुछ जातकों को अस्वीकार कर किया। महादेव उदारवादी थे, और उनकी विचारधारा में मथुरा के शालीन ब्राह्मण माथुर वंश की विशालता का समावेश  था। इनने आचार्यवाद के नाम से धम्मपिटक और विनयपिटक ग्रन्थों के नवीन भाष्य किये।तथा संकुचित बौद्ध धर्म को विश्व विस्तार के स्तर पर  नये सांचे में ढ़ला, जिन्हें चीनी यात्री ह्वेनसांग फ्याईयान अपने साथ चीन ले गये और वहां चीनी भाषा में अनुवाद और महाप्रसार हुआ।’’ महादेव माथुर के कारण मथुरा बौद्धों के महासांधिकों का सबसे बड़ा केन्द्र बना।उनको ही बौद्धधर्म को विश्व में फैलाने का श्रेय प्राप्त है।
      उल्लेखनीय है बौद्ध के समय मथुरा ब्राह्मण धर्म के प्रचार का बड़ा केन्द्र था बाद में यहाँ बौद्धों ने भी अपना सामाजिक विस्तार किया।यहीं पर बौद्धधर्म को ब्राह्मणधर्म और विचारधारा से गहरा टकराव भी हुआ,इस टकराव के कारण बौद्धों को ब्राह्मण विरोधी अपने अनेक विचारों को नरम करना पड़ा। कृष्णदत्त वाजपेयी ने ‘हिन्दुस्तान’ में (27सितम्बर1959) लिखा है जिन लोगों ने इस क्षेत्र में बुद्ध को प्रभावित किया उनमें माथुर ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
     गिलगिट के विवरण से कई चीजें सामने आती हैं, पहली बात यह कि बुद्ध के आगमन के समय मथुरा में चौबों के पास बड़ी मात्रा में संपत्ति थी, वे समृद्ध थे जिसके कारण वे साढ़े तीन हजार विहार बना पाए।दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि मथुरा के बौद्धिक जगत में उनका वर्चस्व था,वे बड़े विनयशील और दयालु थे।
--6---
    चौबों के इतिहास लेखन में बालमुकुंद चतुर्वेदी का महत्वपूर्ण स्थान है। चौबों के इतिहास के अलावा साहित्य की विभिन्न विधाओं में उन्होंने 80 से अधिक ग्रंथ लिखे हैं, इनमें तकरीबन 45 से अधिक किताबें प्रकाशित हैं। बाकी अप्रकाशित हैं। मथुरा और ब्रज के संदर्भ में वे एक महत्वपूर्ण संदर्भ-सूत्र हैं।उनकी स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय भागीदारी रही। ब्रज की लोकतांत्रिक चेतना के वे सबसे अच्छे लेखकों में से एक हैं।जिस समय महात्मा गांधी की हत्या हुई तो उन्होंने हिन्दू महासभा और आरएसएस को संबोधित करते हुए ‘ऐ हिन्दू सभा संघ वालो यदि तुममें जोश और जवानी थी ,तो तुम्हें देश के बापू पर गोलियां नहीं बरसानी थीं।’ यह रचना डंडेशाही मेले में गाई गई और उससे तब संघ वाले बौखला उठे और तब जमुना प्रसाद ऐडवोकेट ने श्री मुकुन्दजी पर मुकदमा चलाने का तार से नोटिस दिया किन्तु जनता का वायुमण्डल बदला देखकर वे ढीले पड़ गये। चौबों के इतिहास पर उनकी लिखी किताब है ‘माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का इतिहास’। यह किताब बेहद महत्वपूर्ण है। इस किताब को राजेन्द्र प्रसाद चतुर्वेदी ने सन् 1986 में प्रकाशित किया।यह पूरी किताब किस्सागोई की शैली में लिखी गयी है। मुझे अपने इस लेख को लिखने में इस किताब से बहुत मदद मिली। इस किताब में इतिहास लेखन की अपनी उलझनें हैं लेकिन वे उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना महत्वपूर्ण है इसमें सूचनाओं का एक जगह एकत्रित होना।
     यह सच में वाचिक तथ्यों के आधार पर इतिहास परंपरा की खोज करना सबसे मुश्किल और परिश्रम साध्य काम है।खासकर एक ऐसे शहर के बारे में जिसका ऐतिहासिक तौर पर अस्तित्व रहा हो।मथुरा नया बसा शहर नहीं है। यह ऐतिहासिक शहर है और इसमें कई हजार सालों की शहरी सभ्यता की जड़ें हैं। उनका इतिहास है, इस इतिहास से मथुरा का संग्रहालय भरा पड़ा है।यह संग्रहालय विश्व के श्रेष्ठतम संग्रहालयों में गिना जाता है।दिलचस्प बात यह है कि मथुरा शहर के अधिकांश युवा मथुरा के इतिहास से अपरिचित हैं क्योंकि उन्होंने कभी गंभीरता से मथुरा संग्रहालय नहीं देखा।इसके अलावा प्राचीन मंदिर और वे ऐतिहासिक स्थान हैं जहां पुराना मथुरा बसा हुआ था।
     मथुरा का मतलब मंदिर-पंडे और बाजार मात्र नहीं है।मथुरा का मतलब तीर्थ मात्र नहीं है। मथुरा को एक तीर्थ मात्र में संकुचित करने का अर्थ है मथुरा के शहर के मर्म  को खत्म करना। आधुनिककाल की यह सबसे बड़ी दुर्घटना है कि ऐतिहासिक शहरों के साथ जुड़ा इतिहासबोध और मूल्यबोध सुनियोजित ढ़ंग से खत्म किया गया। पूंजीवादी विकास का जो रास्ता चुना गया उसमें शहरों की ऐतिहासिक धरोहरों की जमकर उपेक्षा हुई और हर चीज को धर्म और कर्मकांड के हवाले कर दिया गया।कल्पना कीजिए मथुरा शहर यदि इटली में होता तो इटली वाले इस ऐतिहासिक शहर का संरक्षण और विकास किस तरह करते ! आप इटली जाएं और देखें ऐतिहासिक शहर कैसे बचाए जाते हैं !
      हमारे यहां पूंजीवाद का ऐतिहासिकता से बैर है।मथुरा की ऐतिहासिक संपदा के संरक्षण के लिए जिस तरह के संसाधन,कारीगर और कौशल की आवश्यकता है उसकी हमारे शासकों ने जरूरत महसूस नहीं की। यहां से चुने गए सभी सांसद-विधायक भी ऐतिहासिक शहर की महत्ता के बोध से वंचित हैं। उन्होंने कभी इस शहर की ऐतिहासिकता को बचाने के लिए कुछ नहीं किया।इससे भी बड़ी त्रासदी यह कि इस शहर के रहने वालों में ऐतिहासिक इमारतों और उनको बचाने की भावना तकरीबन नहीं है। यह दिलचस्प है कि जनता इतिहासहीन और शासकवर्ग भी इतिहासहीन हैं। इतिहास का मतलब धर्म और मंदिर की मूर्ति तक सीमित होकर रह गया है।यह कहानी एक तरह से भारत हरेक ऐतिहासिक शहर की है।
    इन दिनों आप मथुरा शहर में आएं तो आपको कहीं पर भी ऐतिहासिक बोध नजर नहीं आएगा। इसके विपरीत अव्यवस्थित और अराजकता का शहर में वर्चस्व है।गंदगी का साम्राज्य है।सवाल यह है  ऐतिहासिकता के मरने पर क्या पैदा होता है ॽ असल में इतिहास और ऐतिहासिकबोध हमें बहुत सारी अमानवीय विचारधाराओं और सामाजिक रूढ़ियों से बचाता है। यही वजह है वे तमाम विचारधाराएं जो मूलतः अमानवीय हैं इतिहास और ऐतिहासिकता पर ही सबसे अधिक हमले करती हैं।क्योंकि अमानवीयता को सबसे बड़ी चुनौती यहीं से मिलती है।
    मथुरा शहर विभिन्न धर्मों का संगम था.यहां जैन-बौद्ध-ईसाई और आर्यसमाज की परंपराएं थीं, लेकिन अब यह सब नदारत है। शहर के अंदर पैदा हुए नव-धनाढ्यवर्ग में पैसा कमाने और जमीन खरीदकर बड़े-बड़े भवन बनाने के अलावा कोई सांस्कृतिक मूल्य नजर नहीं आता। संस्कृति के क्षेत्र में फूड़ता और बेसुरेपन का साम्राज्य है। मध्यवर्ग और किसानवर्ग में संस्कृतिहीनता,उपभोक्तावाद और जातिवाद ने इस कदर किलेबंदी कर ली है कि शहर स्वस्थ संस्कृति की चर्चा को सुनने वाले अच्छे श्रोताओं का अभाव पैदा हो गया है। कहने का आशय यह कि मथुरा इन दिनों सांस्कृतिक क्षय के दौर से गुजर रहा है।चंद लोग हैं जो अपनी ओर से संस्कृति के लिए उत्सवधर्मी ढ़ंग से कुछ करते रहते हैं।इस बात को लिखने का आशय यह कि ऐतिहासिक शहरों को ,उनकी ऐतिहासिक इमारतों ,ऐतिहासिक वातावरण को सत्ता और समाज के शिक्षितवर्गों की साझी सक्रियता के बिना बचाया नहीं जा सकता।
    मथुरा की त्रासदी यह है कि यह धर्मनिरपेक्ष शहर था,लेकिन आधुनिककाल में इसे धार्मिक शहर ,हिन्दू तीर्थस्थान में रूपान्तरित कर दिया गया इससे इस शहर की ऐतिहासिक धर्मनिरपेक्ष आत्मा ही मर गयी।शहर में धर्मनिरपेक्ष माहौल और ऐतिहासिक अनुभूतियों का अब दूर-दूर तक पता नहीं मिलेगा। एक जमाने में महात्मा बुद्ध, महावीर,शंकराचार्य,महाप्रभु बल्लभाचार्य आदि ने यहां आकर अपने विचारों को लेकर शास्त्र चर्चा की थी अपने मंदिर,बौद्ध विहार,स्तूप आदि बनाए थे।अब उनकी बनायी परंपराएं सिर्फ मंदिर और भगवान की मूर्तियों तक सीमित रह गयी हैं ,उनके विचार मथुरा के माहौल से गायब हो गए हैं।
    कोई भी धर्म जब विचारहीन होकर काम करता है तो उसमें तमाम किस्म व्याधियां और पतनशील मूल्य स्थान बना लेते हैं। धर्म की महत्ता ईश्वर से नहीं मंदिर से नहीं बल्कि उसके विचारों से होती है। हमने विभिन्न धर्मों के विचार त्याग दिए, उनको सामाजिक विमर्श से गायब कर दिया और उनकी जगह मंदिर, मूर्ति आदि को प्रतिष्ठित कर दिया।विचार के बिना धर्म सिर्फ कंकाल है।विचारणीय सवाल यह है धर्म से विचार विच्छेद कैसे हुआ और किसने किया ॽ मथुरा में धर्म,भगवान,विचार और मूल्य ये चारों चीजें एक साथ ही दाखिल होती हैं।लेकिन अब मथुरा में अब न तो धर्म बचा है, न उससे जुड़े विचार और मूल्य बचे हैं।बची हैं तो सिर्फ भगवान की मूर्तियां। खाली मूर्तियां अपने आपमें सांस्कृतिक पतन और सांस्कृतिक संकट की सूचना है। 
    चौबों के जाति इतिहास लेखन की शुरूआत संवत् 1930 से होती है। छंगालालजी मिहारी ने सबसे पहले ‘माथुर मान मंजरी’ नामक पुस्तिका लिखी। यह पुस्तिका इनकी लिखी किताब ‘ब्रज मथुरा का इतिहास’ का हिस्सा है। इसके बाद संवत् 1958 ‘माथुर चन्द्रोदय’ नामक पुस्तिका चौबों के गुरू महाराज वासुदेवजी और गुरू महाराज श्री रज्जू की अनुमति से ‘‘माथुर मंडली’’ मथुरा से प्रकाशित हुई और विश्वकर्मा यंत्रालय ने छापा था।यह असल में चौबों की सामूहिक सहमति से तैयार की गई पुस्तिका है। यह पुस्तिका अंग्रेजों द्वारा भेजी गयी एक चिट्ठी के उत्तर के रूप में लिखी गयी।यह चिट्ठी 25फरवरी 1901 की लिखी गयी।आरंभ में इसे ‘मसौदा’ के नाम से छापा गया।इस पत्र को रामदासजी साहब मुनीम सेठजी मथुरावालों के नाम भेजा गया था,इस पत्र में चौबों के बारे में जानकारी मांगी गयी थी। इस पत्र के आधार पर चौबों की सामूहिक सभा हुई और उसमें तमाम विवरण तैयार किये गये।29अप्रैल1901 को यह सभा हुई।संभवतः यह चौबों की पहली जातिसभा भी है। इस सभा में आई सूचनाओं के आधार पर पुस्तिका को मसौदे के रूप में जारी किया गया और जाति के लोगों से निजी राय देने का आग्रह किया गया,बाद में इस राय को अंतिम रूप देकर पुस्तिका प्रकाशित की गयी और उसे मथुरा के मजिस्ट्रेट बी.के. दलाल को सौंप दिया गया।इस पुस्तिका में पौराणिक प्रमाणों के आधार पर चौबों की प्राचीनता सिद्ध करने की कोशिश की गयी।इस पुस्तिका में श्री शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, विष्णु स्वामी,श्रीनिम्बार्काचार्य आदि के चौबों के साथ संपर्क और चौबों के बारे व्यक्त मतों को व्यक्त किया गया साथ ही अकबर,आलमगीर, शाहजहाँ आदि राजा-महाराजाओं के फरमानों का भी जिक्र है। इन सबके आधार पर चौबों के श्रेष्ठत्व का दावा पेश किया गया ।बाद में संवत् 1960 में पंडित दत्तरामजी ने ‘माथुर कीर्ति ध्वजा’ नामक पुस्तिका प्रकाशित की।इसके अलावा राधा चन्द शर्मा की मथुरा भास्कर(संवत्1963),नारायणदत्त चतुर्वेदी का निबन्ध ‘माथुर मानमण्डन’(वि.सं.1900),युगलकिशोर का ‘माथुर इतिहास’,उत्तर प्रदेशीय तीर्थ पुरोहित महासभा रचित ‘मथुरा एवं माथुर चतुर्वेदी संक्षिप्त परिचय’(वि.सं.2033),संवत् 2040 में प्रकाशित चतुर्वेदी सेवा समाज स्मारिका और बालमुकुन्द चतुर्वेदी लिखित ‘माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मणों का इतिहास’(ईस्वी सन्1986)  उल्लेखनीय किताबें हैं। इन सबमें बालमुकुन्द चतुर्वेदी की किताब में विस्तार के साथ चौबों के इतिहास पर रोशनी डाली गयी है। इस पूरी किताब में मूल्यवान हैं चौबों से संबंधित कुछ प्रमुख सूचनाएं।लेकिन जिस परिप्रेक्ष्य को आधार बनाकर यह किताब लिखी गयी है उसमें अनेक असुविधाएं हैं और अनेक ऐसी बातें हैं जिनसे बचा जाना चाहिए।मसलन्,वाराह देव परंपरा, विभिन्न देवताओं के साथ चौबों के इतिहास को जोड़ने के परिप्रेक्ष्य से हटकर जाति के इतिहास को देखने की जरूरत है।
    जाति का विकास देवों और पुराणों की परंपरा के आधार पर नहीं होता। जाति तो ठोस सामाजिक परिस्थितियों में अपना विकास करती है।सवाल उठता है कि वे कौन सी ठोस सामाजिक परिस्थितियां हैं जिनमें चौबे जाति ने विकास किया हैॽ चौबों का अन्य जातियों के साथ आचार-व्यवहार,रंग,रक्त आदि को लेकर क्या कभी कोई सम्मिश्रण हुआ ॽ क्या चौबों पर अन्य जातियों और धर्मों के लोगों का असर हुआ ॽ वे कौन से धर्म हैं जिनसे यह जाति प्रभावित हुई है ॽक्या चौबे आरंभ से ही वैदिक ब्राह्मण थे ॽ इत्यादि सवालों के उत्तर अभी तक सामने नहीं आए हैं।
     जाति के अध्ययन को पौराणिक और काल्पनिक कहानियों के आधार पर निर्मित न करके नृतत्वशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय प्रमाणों के आधार निर्मित किया जाना चाहिए। पौराणिक आख्यानों,ऋषियों और देवतों की परंपराओं से जाति को जोड़ने का अर्थ है जाति श्रेष्ठत्व और अति प्राचीनता से जोड़ने का अर्थ है तो जाति अति प्राचीन बताना।लेकिन इससे जाति की सही बनाबट समझ में नहीं आती। इससे जाति के विकास के वैज्ञानिक कारणों का पता नहीं चलता।यह असल में पुराने किस्म की किस्सागोई और दन्तकथाओं में लौटना है।आज के दौर में जातिश्रेष्ठत्व सबसे बड़ी बीमारी है।इससे बचने की जरूरत है।जब जातिश्रेष्ठत्व पर जोर देते हैं तो मूलतःजाति को मजबूत करते हैं।उसे ज़ड़ बना रहे होते हैं। जाति एक गतिशील तत्व है उसका स्वातंत्र्योत्तर दौर में क्षय अवश्यंभावी है, नया समाज जाति गौरव पर नहीं नागरिकबोध और नागरिक गौरव पर टिका है।हमें सामाजिक व्याख्याओं के लिए नागरिकता के पैमाने का इस्तेमाल करना चाहिए और संविधान की रोशनी में सामाजिक परिवर्तन और जाति परिवर्तनों को विश्लेषित करना चाहिए।
 


सोमवार, 10 दिसंबर 2018

गांधी का पुनर्पाठ-5-

        असल में सत्याग्रह तो गांधी के समग्र राजनीतिक पाठ का मूलाधार है, उनके आंदोलन की समग्रभाषा और अंतर्वस्तु इसकेजरिए पढ़ी जा सकती है। इसके जरिए स्वाधीनता संग्राम के समग्र पाठ को पढ़ा जा सकता है। सत्याग्रह आंदोलनों की एक अन्य विशेषता यह है कि वे राजसत्ता की संरचनाओं के भ्रष्ट और दमनकारी रूपों को सामने लाते हैं, सतह पर ये रूप स्थानीय प्रतीत होते हैं लेकिन उनकी प्रकृति व्यापक होती है, राष्ट्रीय होती है। वे बार बार अन्याय को रेखांकित करते हैं। वे सिस्टम के एब्नार्मल आचरण को उद्घाटित करते हैं। 
सत्याग्रह के तीन महत्वपूर्ण तत्व हैं, ये हैं, 1.सत्य,2.अहिंसा और 3. साधन-शुद्धि। ‘‘ वह मानते थे कि साध्य और साधन एक-दूसरे के पर्यायरूप ही हैं। साध्य साधन का अंतिम परिणाम मात्र है। साधन में नैतिकता का ध्यान न रखा जाये तो उसे प्राप्त साध्य का बाह्य रूप कैसा भी क्यों नहो,वह वैसा साध्य नहीं होगा जैसाकि प्राप्त करने की इच्छाकी गई थी और जिसके लिए प्रयत्न किया गया ।[i] इसी तरह सत्याग्रह की पहली शर्त यह है कि सत्य का पूरी तरह पालन किया जाए।[ii] अहिंसा सत्य का ही स्वाभाविक परिणाम है। सत्याग्रही के लिए आवश्यक है कि वह जो कुछ करे छिपाकर करने के बजाय खुले तौर पर और निर्भयता के साथ करे,साथ ही जिसे अन्यायपूर्ण और अवैध सत्ता मानता हो उसका विरोध करे।[iii]
अब संक्षेप में ‘सत्याग्रह’ के उदय को जान लें। ‘ सत्याग्रह’ माने सत्य का आग्रह ,साथ ही निष्क्रिय या अनाक्रामक प्रतिरोध की अवधारणा को गांधीजी ने प्रतिपादित किया।पैसिव रेज़िस्टेंस शब्द से सत्याग्रह तक गांधीजी कैसे पहुँचे,इसका इतिहास उन्होंने स्वयं लिखा है,‘दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में जो घटनाक्रम विस्तार से बताया है वह एकबार फिर से पढ़ने की जरूरत है। गांधीजी ने लिखा है ‘‘ उस नाट्यशाला में सभा हुई।ट्रान्सवाल के भिन्न भिन्न शहरों से प्रतिनिधि भी बुलाये गये। पर मुझे स्वीकार करना चाहिए कि जो प्रस्ताव मैंने बनाये थे उनका पूरा अर्थ स्वयं मैं ही न समझ सका था। इसी प्रकार यह अंदाज भी न लगा सका था कि इनका दूरवर्ती परिणाम क्या होगा।सभा हुई।नाट्यशाला में कहीं भी जगह नहीं खाली बची।सबके चेहरे मानों यही कह रहे थे कि कोई नयी बात आज हमें करनी है।’’[iv]
गांधीजी ने लिखा ‘‘ हम में से कोई भी इस बात को नहीं जानते थे कि कौम के इस निश्चय अथवा आंदोलन को किसी नाम से पुकारा जाय। उस समय मैंने इस आन्दोलन का नाम ‘पैसिव रैजिस्टेन्स’ रक्खा था।मैं उस समय पैसिव रेजिस्टेन्स का महत्त्व भी न तो जानता था और नसमझता ही था। मैं तो केवल यही जानता था कि एक नवीन वस्तु का जन्म हुआ है। पर जैसे-जैसे आन्दोलन बढ़ता गया वैसे–वैसे ‘पैसिव रेज़िस्न्स’ के नाम से घोटाला होने लगा और इस महान् युद्ध को एक अंग्रेजी नाम से पुकारना भी मुझे लज्जाजनक मालूम हुआ। दूसरे कौम को यह शब्द जल्दी याद होने लायक भी न था। इसलिए इस युद्ध के लिए सर्वोत्कृष्ट नाम ढूँढ़नेवाले के लिए मैंने ‘‘इण्डियन औपीनियन’’ में एक छोटे से इनाम की घोषणा की। उत्तर में कितने ही नाम आये। उस समय युद्ध के रहस्य की चर्चा ‘‘इम्डियन ओपीनियन’’ में अच्छी तरह हो चुकी थी। इसलिए उम्मीदवारों के लिए उस शब्द को ढूँढ़ने के लिए प्रमाण की कोई कमी न थी। मगनलाल गांधी ने भी इस प्रतिस्पर्धा में भाग लिया था। उन्होंने ‘ सदाग्रह’ नाम भेजा ।इस शब्द को पसंद करने के लिए उन्होंने कारण बताते हुए लिखा था कि कौम का आन्दोलन एक भारी आग्रह है। और यह आग्रह ‘सद्’ अर्थात शुभ है। इसलिए उन्होंने इस नाम को इतना पसंद किया है। मैंने उनकी दलील का सार बहुत थोड़े में दिया है। मुझे यह नाम पसन्द तो आया तथापि मैं उसमें जिस वस्तु का समावेश करना चाहता था उसका समावेश उससे नहीं होता था।इसलिए मैंने उसके ‘द्’ को ‘त्’ बनाकर उसमें ‘य’ जोड़ दिया और ‘सत्याग्रह’ नाम तैयार कर लिया। सत्य के अन्दर शान्ति समाविष्ट मानकर किसी भी वस्तु के लिए आग्रह किया जाय तो उसमें से बल उत्पन्न होता है। इसलिए ‘‘आग्रह’’ के द्वारा उसमें ब का भी समावेश करके भारतीय आन्दोलन का नामाभिधान -‘सत्याग्रह’ अर्थात् सत्य और शान्ति से उत्पन्न होने वाला बल –करके उसका प्रयोग शुरू कर दिया। तब से इस युद्ध को ‘‘पैसिव रेज़िस्टेन्स’’ नाम से पुकारना बन्द कर दिया और यहाँ तक कि अँग्रेजी लेखों में भी कई बार पैसिव रेज़िस्टेन्स को छोड़कर सत्याग्रह अथवा उसी अर्थ के अन्य अँग्रेजी शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया। ‘सत्याग्रह’ के नाम से पुकारे जानेवाली वस्तु का और सत्याग्रह का जन्म इस तरह हुआ।’’[v]
उल्लेखनीय है जिस सभा का जिक्र गांधीजी ने किया है,उस सभा की अध्यक्षता ट्रान्सवाल ब्रिटिश इण्डियन एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री अब्दुल गनी ने की थी।वे उस इलाके जनप्रिय नेता और व्यापारी थे। उसी सभा में अन्य लोगों के अलावा सेठ हाजी हबीब का भी भाषण हुआ।उनका भाषण बहुत ही जोशीला था और उसने उपस्थित लोगों को काफी प्रभावित किया, समूची सभा का कार्रवाई हिन्दी और गुजराती में चली, सभा तमिल और तेलुगूभाषी भारतीय भी मौजूद थे उनके लिए सभा के वक्तव्यों को उनकी भाषा में समझाकर पेश किया गया। महात्मा गांधी ने सेठ हाजी हबीब के भाषण के उत्तर में ही ‘सत्याग्रह’ की अवधारणा को पेश किया और कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनके बारे में आमतौर पर चर्चा नहीं होती। हबीब सीहब ने अपने भाषण में कईबार कसम खाई और उपस्थित जनसमूह में जोश पैदा कर दिया,कई लोगों ने हबीब साहब के भाषण के समर्थन में अपने विचार पेश किये,यही वो प्रसंग है जिसमें गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ की धारणा पेश की। साथ ही कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। चूंकि हबीब साहब ने कई बार ईश्वर की कसम खाकर प्रस्ताव के पक्ष में अपने मत का इजहार किया था, इस पर गांधीजी ने जो कहा वह महत्वपूर्ण है,‘‘ ऐसे प्रस्तावों के बीच कोई ईश्वर का नाम नहीं लेता था। सात्विक दृष्टि से देखा जाय तो निश्चय और ईश्वर का नाम लेकर प्रतिज्ञा करने में कोई भेद न होना चाहिए। बुद्धिमान मनुष्य जिस किसी बात का विचारपूर्वक निश्चय कर लेता है उससे विचलित नहीं होता। उसके लिए वह ईश्वर को साक्षी बनाकर की गयी प्रतिज्ञा के बराबर ही है। पर संसार सात्विक निर्णयों से नहीं चलता। ईश्व को साक्षी बनाकर की गयी प्रतिज्ञा और सामान्य निश्चय में वह जमीन-आसमान का भेद णानता है।सामान्य निश्चय को बदलते मनुष्य को लज्जा महसूस नहीं मालूम होती। पर प्रतिज्ञाबद्ध मनुष्य से अगर अपनी प्रतिज्ञा भंग हो जाता है तो वह स्वयं शरमाता है और समाज उसे फटकार देता है-पापी समझता है।यह बात इतनी गम्भीर है कि कानून में भी समाविष्ट हो गयी है। क्योंकि यदि किसी बात की कसम खाकर आदमी उसे भंग करे तो वह एक अपराध माना गया है और कानून में उसके लिए सख्त सजा रक्खी गयी है।
इन विचारों का रखनेवाला प्रतिज्ञाओं का अनुभवी,प्रतिज्ञाओं के मीठे फल चखनेवाला मैं भी उपर्युक्त प्रतिज्ञा की बात सुनकर स्तब्ध हो गया। एक क्षणभर के अंदर मैंने उसके तमाम परिणामों को देख लिया। उस घबराहट से शक्ति का जन्म हुआ। और यद्यपि मैं वहाँपर न तो स्वयं प्रतिज्ञा करने गया था और न लोगों से प्रतिज्ञा करवाने गया था तथापि सेठ हाजी हबीब की बात मुझे बहुत ही पसंद आयी।पर साथ ही मुझे यह भी उचित मालूम हुआ कि जनता को उसके परिणामों से परिचित करा देना चाहिए और इतने पर भी वह प्रतिज्ञा करे तो सहर्ष स्वागत करना चाहिए और अगर न करे तो मुझे समझ लेना चाहिए कि लोग अभी अन्तिम कसौटी पर चढ़ने के लिए तैयार नहीं हुए। इसलिए मैंने अध्यक्ष महाशय से इस बात की इजाजत माँगी कि वे मुझे हाजी हबीब के भाषण कारहस्य समझाने दें। मुझे आज्ञा मिल गयी। मैं उठा और उस समय मैंने जो कुछ कहा उसका सार मुझे जिस प्रकार याद है ,मैं नीचे दे रहा हूँ।
‘‘ मैं सभा को अभी यह बात समझा देना चाहता हूँ कि आजतक हमने जो प्रस्ताव जिस प्रकार स्वीकृत किये हैं उनमें,उनकी रीति में जमीन-आस्मान का फर्क है। यह प्रस्ताव बड़ा गंभीर है क्योंकि उस पर अमल करने पर ही दक्षिण अफ्रीका में हमारा अस्तित्व निर्भर है। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने की जो नवीन रीति हमारे इन भाईने बतायी है वह जितनी नवीन है उतनी गम्भीर भी है। मैं स्वयं प्रस्ताव को इस प्रकार स्वीकार करने के विचार से नहीं आया था इसका पूरा श्रेय तो सेठ हबीब को ही है,और मैं इसकी जिम्मेदारी भी उन्हींके ऊपर है। उनको मैं धन्यवाद देता हूँ। उनकी सूचना मुझे बहुत अच्छी लगी। और अगर आप उनकी सूचना को स्वीकार कर लें तो आप भी उनकीगम्भीर जिम्मेदारी के हिस्सेदार हो सकते हैं। पर पहले आपको समझ लेना चाहिए कि वह जिम्मेदारी क्या है और कौम के सलाहकार और सेवक की हैसियत से मेरा यह धर्म है कि मैं आपको वह पूरी तरह समझा दूँ।
‘‘ हम सब एक ही सिरजनहार को मानते हैं। से मुसलमान भले ही खुदा कहकर पकारें,हिन्दू भले ही ईश्वर कहकर उसका भजन करें पर वह है एक ही स्वरूप। उसको साक्षी बनाकर उसे हमारा मध्यस्थ बनाकर हम प्रतिज्ञा लें या कसम खावें यह कोई ऐसी-वैसी बात नहीं। ऐसी कसम खाकर यदि हम उससे विचलित हो जायें तो कौम के, संसार के और परमात्मा के हम अपराधी होंगे। स्वयम मैं तो यह मानता हूँ कि यदि मनुष्य सावधानी से और निर्मल-बद्धिपूर्वक कोई प्रतिज्ञा करके बादमें उसे तोड़दे तो वह अपनी मनुष्यता खो बैठता है और जिस तरह यह मालूम होते ही कि पारा चढाया हुआ ताँबेका सिक्का रूपया नहीं है, उसे कोई नहीं पूछता,इतना ही नहीं बल्कि उस खोटे सिक्केको रखनेवाला दण्डनीय माना जाता है,ठीक सी तरह झूठी कसम खानेवाला आदमी भी कौड़ी कीमत का हो जाता है,बल्कि लोक-परलोक में दोनों जगह वह सजा का पात्र हो जाता है।’’[vi]
इस किताब में गांधीजी ने ‘सत्याग्रह’ और ‘ पेसिव रेज़िस्टेन्स’ के अंतर कोस्पष्टकरते हुए लिखा, ‘‘ मैं यह तो नहीं जानता कि पैसिव रेजिस्टेन्स इन दो शब्दों का अंग्रेजी में भाषा में पहले पहल प्रयोग किसने और कब किया। पर अंग्रेजी राष्ट्र में जब किसी छोटे समाज को कोई कानून पसंद न होता था तब वह उस कानून के खिलाफ बवा करने के बदले उसका स्वीकार ही नहीं करता और इस कार्य के लिए उसे जो-जो सजायें होतीं उन्हें सह लेता था। अंग्रेजी में इसी को पैसिव रेजिस्टेन्स अर्थात् ‘ सौम्य प्रतिकार’ कहा है। ’’[vii]
इसी में गांधी ने आगे लिखा ‘‘ सत्याग्रह केवल आत्मा का बल है।’’ [viii] उल्लेखनीय है कि पैसिव रेजिस्टेन्स का विचार गांधीजी को रूखी लेखक तोलस्तोय से लिया था। तोलस्तोय ने गांधीजी के ‘सत्याग्रह ’ के बारे में लिखा ‘‘वह न केवल भारतके लिए बल्कि समस्त मानव-जातिके लिए बड़े महत्वका है।’’[ix]

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...