मंगलवार, 3 मई 2016

अनपढ़ ईरानी की शैतानियों के प्रतिवाद में


             मोदी सरकार में मंत्री स्मृति ईरानी ने भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी´कहने के लिए विपन चन्द्रा आदि की किताब पर पाबंदी लगा दी,कमाल है,ईरानीजी आप शिक्षामंत्री हैं लेकिन आपको नहीं मालूम कि चन्द्रशेखर आजाद अपने को क्या कहते थे! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जब पहलीबार चन्द्रशेखर आजाद से मुलाकात की थी तो उसका वर्णन उन्होंने अपनी आत्मकथा में किया है,कम से कम उसी को आपने पढ़ लिया होता तो भगतसिंह संबंधी आतंकवादी-क्रांतिकारी ´गुत्थी सुलझ गयी होती,लेकिन अब तो ईरानीजी ने भगतसिंह को आतंकवादी लिखने के कारण विपन चन्द्रा आदि इतिहासकारों की किताब पर ही पाबंदी लगा दी है,तो अगला कदम उन किताबों की ओर बढ़ना चाहिए,जिनमें इन क्रांतिकारियों को आतंकवादी लिखा गया है ! ताकत है तो उन सभी किताबों पर पाबंदी जारी करके दिखाओ जिनमें आतंकवादी के रूप में क्रांतिकारियों का जिक्र है !

पंडित जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा ´मेरी कहानी´ को ही लेते हैं। याद कीजिए जब लाला लाजपतराय पर अंग्रेजों की लाठियां पड़ी थीं और उसके कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।ईरानीजी जानती हैं किसी हिन्दुत्ववादी का इस घटना पर खून नहीं खोला,दिलचस्प बात यह है कि लालाजी पर पड़ी लाठियों से भगतसिंह आदि क्रांतिकारियों का खून खोला ।जबकि उनके लालाजी से विचार नहीं मिलते थे।ईरानीजी आप कल्पना कीजिए कि किसी हिन्दुत्ववादी का उस समय खून क्यों नहीं खौला ॽभगतसिंह औप उनके साथियो ने लालाजी पर हमला करने वाले अंग्रेज शासन से बदला लेने का फैसला किया और उसके कारण भगतसिंह और उनके साथियों को सारे देश में बड़ी प्रसिद्धि मिली।इस वाकया का पंडित नेहरू ने बहुत सुंदर ढ़ंग से वर्णन किया है।

नेहरू ने लिखा है ´साइमन-कमीशन हिन्दुस्तान में दौरा कर रहा था और काले झंडे लिए ´गो बैक´के नारे लगानेवाली विरोधी भीड़ हर जगह उसका स्वागत कर रही थी।कभी-कभी भीड़ और पुलिस में मामूली झगड़ा भी हो जाता था।लाहौर में बात बहुत बढ़ गई और यकायक देश-भर में गुस्से की लहर दौड़ गई। लाहौर में जो साइमन-विरोधी प्रदर्शन हुआ वह लालालाजपत राय के नेतृत्व में हुआ।जब वह सड़क के किनारे हजारों प्रदर्शनकारियों के आगे खड़े हुए थे तब एक नौजवान अंग्रेज पुलिस अफसर ने उनपर हमला किया और उनकी छाती पर डंडे बरसाए.लालाजी का तो कहना ही क्या ,भीड़ की तरफ से किसी किस्म का झगड़ा खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं हुई थी।.....लेकिन फिरभी जिस ढ़ंग से उन पर हमला किया गया,उससे और उस हमले के बहशियाने ढ़ंग से हिन्दुस्तान के करोड़ों लोगों को धक्का लगा।उन दिनों हम पुलिस द्वारा लाठियों के मार खाने के आदी न थे।´ लालाजी की कुछ दिन बाद इस लाठीचार्ज से लगी चोटों के कारण मौत हो गई और सारे देश में गुस्से की लहर दौड़ गई।

पंडित नेहरू ने भगतसिंह आदि द्वारा इस घटना के प्रतिवाद में की गई कार्रवाई की प्रशंसा की और जो लिखा उसका तो महत्व है ही,साथ ही उनको ´आतंकवादी´कहकर सम्बोधित किया है। ईरानीजी हिम्मत है तो नेहरू की आत्मकथा पर पाबंदी लगाकर दिखाओ,हम भी देखते हैं संसद कितने दिन चलती है और आप कितने दिन ऑफिस जाती हैं !

नेहरू ने जो लिखा उसे ईरानीजी आप पढ़ें,संदर्भ है लालाजी पर पड़ी लाठियां और उसका भगतसिंह आदि के द्वारा किया गया प्रतिवाद,इस प्रतिवाद ने भगतसिंह को जनप्रिय बनाया, नेहरू ने लिखा ´इससे पहले भगतसिंह को जो लोकप्रियता मिली वह कोई हिंसात्मक या आतंकवाद का काम करने की वजह से नहीं मिली , आतंकवादी तो हिन्दुस्तान में करीब- करीब तीस बरस से रह-रहकर अपना काम कर रहे हैं, और बंगाल में आतंकवाद के शुरू के दिनों को छोड़कर और कभी किसी भी आतंकवादी को,भगतसिंह को जो लोकप्रियता हासिल हुई,उसका सौवां हिस्सा भी नहीं मिली।यह एक ऐसी जाहिर बात है,जिससे इन्कार नहीं कर सकता।इसे तो मानना पड़ेगा।´

ईरानीजी इसी क्रम में पंडित नेहरू ने बड़े मार्के की बात कही है जो आपको समझनी चाहिए। लिखा है ´मामूली तौर पर आतंकवाद से किसी देश में होने वाली क्रान्तिकारी प्रेरणा का बचपन जाहिर होता है।वह अवस्था गुजर जाती है और उसके साथ-साथ महत्वपूर्ण घटना के रूप में आतंकवाद भी गुजर जाता है; स्थानिक कारणों या व्यक्तिगत दमन के कारण कभी-कभी कुछ आतंकवादी कार्य भले ही होते रहें। बिलाशक हिन्दुस्तान की क्रान्ति का बचपन बीत चुका और इसमें कुछ शक नहीं कि उसके फलस्वरूप यहां कभी-कभी हो जानेवाली आतंकवादी घटनाएं भी धीरे-धीरे बन्द हो जाएंगी। ´

नेहरू ने साफ लिखा आतंकवाद आज तो ´महज एक तात्विक विवाद का सवाल है।´ ईरानीजी आप यह भी जान लें ,नेहरू ने लिखा है ´भगतसिंह ने अपने हिंसात्मक कार्य से लोकप्रियता प्राप्त नहीं की, बल्कि इससे प्राप्त की कि कम-से-कम उस समय लोगों को ऐसा मालूम हुआ कि उसने लालाजी की और लालाजी के रूप में राष्ट्र की इज्जत रखी है।भगतसिंह एक प्रतीक बन गया।उसके काम को लोग भूल गए,केवल प्रतीक उनके मन में रह गया।´

ईरानीजी आप बहुत ही ड्रामेबाज मंत्री हैं।आपने अपने जीवन में कभी कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं किया,कभी गंभीर किताबें नहीं पढ़ी,इसलिए किताब और जनसंघर्ष का मतलब आपको नहीं आता। क्रांतिकारियों में ये दोनों गुण होते हैं ,वे पढ़ते भी हैं और जनता के हितों के लिए लड़ते भी हैं।आपने कभी गौर किया कि भारत में कभी किसी शिक्षा मंत्री ने क्रांतिकारियों को सम्बोधित किसी भी किताब पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगायी ,ऐसा क्यों हुआ ॽक्या आप सबसे बड़ी अक्लमंद हैं ॽया फिर आपके आरएसएस के सलाहकार सबसे बड़े अक्लमंद हैं ॽ कभी गंभीरता से सोचना आपसे पहले कभी किसी आरएसएस-जनसंघ के नेता ने क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´ लिखने पर पाबंदी लगाने की न तो मांग की और न मंत्री होते हुए इस तरह की किताबों पर पाबंदी लगायी।सोचकर देखें ईरानीजी आप क्या श्यामाप्रसाद मुखर्जी,दीनदयाल उपाध्याय,अटलबिहारी बाजपेयी,मुरली मनोहर जोशी आदि से ज्यादा अक्लमंद हैं ॽ सवाल यह है इन नेताओं को, क्रांतिकारियों को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´कहने वाली किताबों से कभी कोई परेशानी नहीं हुई,लेकिन आपको परेशानी हुई और आपने ताबड़तोड़ ढ़ंगसे तुरंत पाबंदी का आदेश जारी कर दिया।

ईरानी जी आप नहीं जानतीं कि आपने अपने जीवन का सबसे घटिया काम किया है। एक सही किताब पर पाबंदी लगाना सबसे घटिया काम है,मैं इसे देशद्रोह से भी खराब हरकत मानता हूँ। दुख इस बात का है आपने भारत के सभी कानूनों को ताक पर रखकर यह काम किया है।किसी भी किताब पर पाबंदी लगाने से पहले उसके लेखक-प्रकाशक से नोटिस देकर पूछा जाता है कि आपने ऐसा क्यों लिखा ॽयदि आप उनके उत्तर से संतुष्ट नहीं होतीं तो फिर देखतीं कि जो वैध किताब है,उस पर पाबंदी लगाने का आपको हक है या नहीं।विपन चन्द्रा की किताब वैध किताब है।आप उस पर दिल्ली विश्वविद्यालय में पाबंदी नहीं लगा सकतीं।यदि वह किताब अवैध है तो सारे देश में पाबंदी लगाकर दिखाएं और फिर देखें कि आपको कानून का कितना करारा तमाचा खाना पडेगा।आपने कानून के तमाचे से बचने के लिए मंत्री पद का दुरूपयोग किया है और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को एक बेहतरीन किताब को वैध रूप में पढ़ने से वंचित किया है।

ईरानीजी आप पढ़ती नहीं हैं और आपके अनुयायी आरएसएस के लोग भी नहीं पढ़ते, आपका प्रचार करने वाले टीवी चैनलवाले भी पढ़ते नहीं हैं।इतने अनपढ़ यदि एक साथ मिल जाएं तो हमारे जैसे लोगों के लिए मुसीबतें तो आएंगी।लेकिन बुद्धिजीवी का काम तो यही है कि वह अनपढों के द्वारा पैदा की गयी मुसीबतों से देश को छुटकारा दिलाए,देश को पढ़ाए,सत्य,तथ्य और ज्ञान का अनुभव कराए।



सोमवार, 2 मई 2016

भगतसिंह को आतंकवादी-क्रांतिकारी किसने कहा ॽ

         जिस देश में मूर्ख मंत्री हो उस देश की भगवान भी रक्षा नहीं कर सकते ! मूर्ख मंत्री अपने को ज्ञानी की तरह पेश कर रहे हैं,ज्ञानियों को वे अज्ञानी करार दे रहे हैं।इसे कहते हैं बुद्धिजीवी विरोधी माहौल।हाल में भगतसिंह के मामले में जिस तरह का आचरण केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने किया है उसकी मिसाल भारत में मिलनी मुश्किल है।ईरानी के भक्त कमाल के ´अक्लमंद´ हैं जो बिना पढ़े ही हल्ला करने लगते हैं ! कहने को ये सब टैक्नोसेवी हैं लेकिन अक्ल से एकदम पैदल ! बेबकूफी और संचार क्रांति का विरल सह-संबंध इन दिनों हम भारत में देख रहे हैं ! वे हल्ला कर रहे हैं इतिहासकार विपन चन्द्रा ने भगतसिंह को ´आतंकवादी क्रांतिकारी´क्यों लिखाॽ कभी ठीक से इतिहास पढ लिया होता तो इस सवाल का उत्तर भी मिल जाता !

भारत में क्रांतिकारी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक थे डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त ,उनकी एक किताब है ´अप्रकशित राजनीतिक इतिहास,(नवभारत पब्लिशर्स,कलकत्ता 1953) ।यह पूरी किताब क्रांतिकारियों के कारनामों से भरी है।इस किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा है ´ क्रांतिकारियों का वास्तविक कार्य,जिसे ´आतंकवाद´कहा जाता है,आंदोलन का बाह्य प्रकाश मात्र था।पराधीनता की ग्लानि जब जब असह्य हो उठी,तब तब सभी देशों में देशप्रेम का प्रकाश आतंकवाद के रूप में दीख पड़ा।आतंकवाद जन-आंदोलन नहीं, बल्कि निष्फल प्राणों का कूड़ा-करकट जलाकर देशप्रेम की आग प्रज्वलित करने का प्रतीक है।´

स्वाधीनता संग्राम के दौरान आतंकवाद के बारे में डा.भूपेन्द्रनाथ दत्त के उपरोक्त कथन के जरिए उसके चरित्र,प्रकृति और उत्पत्ति के बारे में सरल ढ़ंग से समझ सकते हैं। अब हमसे यह न पूछो कि भूपेन्द्र दत्त कौन हैं ॽ इंटरनेट पर जाओ पता चल जाएगा ! स्वामी विवेकानंद के पास जाओ पता चल जाएगा ! उस जमाने में रूसी आतंकवाद से भारत के क्रांतिकारी किस तरह प्रभावित थे,इस पर उस दौर में ´मॉडर्न रिव्यू´ने लिखा ´हमारे सबसे बड़े रेडीकल राज्य सचिव को अवश्य ही बम फेंकनेवाला पैदा करने के अद्वितीय कृतित्व का श्रेय मिलना चाहिए।बंगाल में आतंकवाद के अंतिम कारण को सरकार की सोलहों आने स्वार्थी,स्वेच्छाचारी और अत्याचारी नीतियों में खोजना होगा। उसे खोजना होगा उस घृणापूर्ण और अपमानजनक तरीके में जिसे अधिकांश सरकारी और गैरसरकारी एंग्लो-इंडियनों ने बंगालियों के प्रति मंतव्य प्रकट करने और उनसे व्यवहार करने में अपनाया है।उन्होंने बंगालियों की भावनाओं को बूटों तले रौंदा है और उनके तथ्यों तथा आंकड़ों द्वारा समर्थित सबसे बड़े और सबसे तर्कसंगत आवेदनों पर जरा भी कान नहीं दिया। भावना और तरीकों में प्रशासन के रूसीकरण ने जनता के एक छोटे से हिस्से को रूसी आतंकवाद के तरीकों को अपनाने को बाध्य कर दिया है।´



भारत में आतंकवादी क्रांतिकारी´ आंदोलन की परंपरा बहुत पुरानी है।इसे आजकल के आतंकियों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए।

अक्ल का अजीर्ण है स्मृति ईरानी को

      मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के यहां अक्ल का अजीर्ण हो गया है।इसके कारण वे आए दिन अनाप-शनाप बोलती और एक्शन लेती रहती हैं।उनके अक्ल के अजीर्ण का ताजा नमूना है विपन चन्द्रा की किताब ´India’s Struggle for Independence´(1988) प्रतिबंध लगाने का सुझाव देना और दिल्ली वि.वि.के द्वारा उनके आदेश का तुरंत पालन करते हुए इस किताब की बिक्री पर रोक लगाना,पाठ्यक्रम में पाबंदी लगाना।

इस पुस्तक में विपनचन्द्रा के अलावा मृदुला मुखर्जी,आदित्य मुखर्जी ,सुचेता महाजन और के.एन पन्निकर के लिखे अध्याय भी हैं।विपन चन्द्रा ने भूमिका के अलावा इस किताब के कुल39 अध्यायों में से 22अध्याय स्वयं लिखे हैं।बाकी अन्य के लिखे हैं।मूल समस्या है भगतसिंह को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´के रूप में सम्बोधित करने को लेकर ।यह किताब1988 में आई।तब से लेकर आज तक सारे देश में यह किताब बेहद जनप्रिय है।लाखों छात्रों ने इसका लाभ उठाया है।इसके पहले इस पदबंध को लेकर कभी किसी ने कोई आपत्ति प्रकट नहीं की।हाल ही में अचानक एक टीवी कार्यक्रम में इस पदबंध का जिक्र आया और मंत्री महोदया ने राजाज्ञा जारी करके किताब को पढ़ाए जाने पर पाबंदी लगादी।इससे एक बात तो साफ है कि मोदी सरकार और आरएसएस उन तमाम धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों को सहन करने की स्थिति में नहीं हैं जो साम्प्रदायिक नजरिए का विरोध करते हैं।स्मृति ईरानी का विपनचन्द्रा आदि की किताब पर जो रूख सामने आया है वह इस बात का भी प्रमाण है कि सत्ता के अंदर किस तरह असहिष्णुता भरी पड़ी है।इससे यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार किसी भी तरह के वैज्ञानिक अनुसंधान को पसंद नहीं करती और ज्योंही कहीं पर कोई मौका मिलता है तुरंत हमलावर कार्रवाई करने पर उतारू हो जाती है।मंत्री महोदया के आदेस पर दिल्ली वि.वि. प्रशासन ने विभागीय स्वायत्तता का उल्लंघन किया है, बिना इतिहास विभाग से पूछे सीधे कार्रवाई करके नई घटिया मिसाल कायम की है। सामान्यतौर पर विभाग को अकादमिक मामलों में फैसले लेने का हक है,मंत्री या वीसी को भी यह हक नहीं है। खासतौर पर जिस तरह से इस किताब पर पाबंदी लगायी गयी है वह निंदनीय है और सरकार की फासिस्ट मनोदशा की अभिव्यंजना है।

सवाल यह है भगतसिंह आदि को ´क्रांतिकारी आतंकवादी´कहने का सिलसिला कहां से शुरू हुआ ॽ क्या क्रांतिकारियों को विपनचन्द्रा ने सम्बोधित करके इस पदबंध की शुरूआत की या फिर पहले से इसका कहीं आरंभ होता है।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आतंकवादी किसे कहें ॽआतंकवादी की परिभाषा क्या है ॽस्वयं पीएम नरेन्द्र मोदी विश्व के नेताओं और संयुक्त राष्ट्र संघ का भी आतंकवाद की परिभाषा बनाने के लिए आह्वान कर चुके हैं। सवाल यह है आरएसएस की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽभारत सरकार की नजर में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ॽ क्रांतिकारी और क्रांति की परिभाषा क्या है ॽ इससे भी बड़ा सवाल यह है क्या किसी राजनीतिक संगठन या आरएसएस जैसे संगठन के नजरिए से भारत का इतिहास लिखा जा सकता है ॽ



इतिहास लेखन एक स्वतंत्र अनुशासन है,उसके नियम,परंपराएं और दृष्टियां हैं।सामग्री संकलन की शोध पद्धतियां हैं।इनको लंबे अकादमिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्मित किया गया है,इनके बारे में किसी नेता के मूड़ और विचारों के आधार पर फैसला नहीं हो सकता।इतिहास का क्षेत्र इतिहासकारों का है ,वह राजनेताओं के जंग की जगह नहीं है।आरएसएस इतिहासलेखन को इतिहासकारों के दायरे से बाहर लाकर राजनेताओ की,संघ के काल्पनिक इतिहासकारों की कर्मशाला बनाना चाहता है।काल्पनिक इतिहास की अशिक्षित समाज में उपजाऊ जमीन होती है,वे किंवदन्तियों और पुराकथाओं को ही इतिहास के रूप में पेश करते हैं।वे इतिहासलेखन के किसी भी वैज्ञानिक पद्धतिशास्त्र को नहीं मानते।लेकिन अकादमिक जगत कल्पनाशास्त्र और किंवदन्तियों से नहीं चलता उसके लिए अकादमिक अनुशासन में प्रवेश करने, बुद्धि,विवेक और अकादमिकश्रम की जरूरत पड़ती है,जाहिरातौर पर आरएसएस के लोग इन सब पर विश्वास नहीं करते,वे अकादमिक अनुशासन को संघ के अनुशासन के जरिए अपदस्थ करने पर उतारू हैं,इससे भी शर्मनाक बात है कि दिल्ली वि. वि. के उपकुलपति महोदय संघ के अनुशासन को मानकर एक्शन ले रहे हैं।

रविवार, 1 मई 2016

ऐसे किया श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ प्रतिवाद

         मैं अपने जीवन में सुहेल हाशमी को कभी नहीं भूल सकता।उनके कारण मुझे जमकर लाठियां खानी पड़ीं,नई कमीज फट गयी।वाकया है जेएनयू में श्रीमती इंदिरा गांधी के आने का ,संभवतः1981-82 का सत्र था।छात्रसंघ ने फैसला लिय़ा था कि इंदिरा गांधी के कैंपस प्रवेश का विरोध किया जाए।जेएनयू के पुराने कैंपस में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान के सामने मैदान में पंडाल बनाकर श्रीमती गांधी के लिए मंच सजाया गया था। कैंपस के मुख्य गेट पर तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष अमरजीत सिंह सिरोही,महामंत्री अजय पटनायक,(सम्प्रति, जेएनयू शिक्षकसंघ के अध्यक्ष) नेतृत्व दे रहे थे।छात्रसंघ के ऑफिस के सामने तकरीबन 2000छात्र-कर्मचारी, मैं,सुहेल हाशमी,उपाध्यक्ष आर.वेणु आदि थे।हमलोगों के साथ इतिहासकार हरबंस मुखिया भी थे।इंदिरा गांधी के मुख्य गेट से प्रवेश करते ही सिरोही ने हाईजंप लिया और कमांडो घेरा तोड़ते हुए सीधे इंदिरा गांधी की कार के ऊपर जाकर गिरे,इसके बाद मुख्यगेट पर जमकर लाठी चार्ज शुरू हो गया।छात्रसंघ के सामने हम लोग नारे लगा रहे थे,पुलिस हमें ठेल रही थी,अचानक सुहेल ने मुझे उत्साहित किया औरमैंने पुलिस के घेरे को तोड़ा और इसके बाद जमकर लाठी चार्ज हुआ,सैंकड़ों लोग घायल हुए,पुलिस मुझे बेरहमी से मारते हुए ले गयी,उस समय छात्रों-कर्मचारियों का हजारों कंठो से प्रतिवाद सुनकर सारा कैंपस गूँज उठा इंदिरा गांधी वापस जाओ । उस लाठी चार्ज में सैंकड़ों छात्र घायल हुए लेकिन छात्रों ने वि वि की संपत्ति पर हमला नहीं किया,गुस्सा था और नारेथे।सारा आंदोलन अहिंसक था।दूसरे दिन के अखबारों में आंदोलन की खबर सुर्खियों में थी,इंदिरा गांधी का भाषण कहीं नहीं था।छात्रों ने बड़े कौशल के साथ इंदिरा गांधी के भाषण के दौरान पंडाल के अंदर लगातार उठकर पूरे भाषणभर प्रतिवाद किया और प्रतिवाद करने वाले छात्रों को पुलिस उठाती रही।पंडाल में अंदर गांधी बोल रही थीं,बाहर हजारों छात्र इंदिरा गांधी मुर्दाबाद,इंदिरा गांधी वापस जाओ,के नारे लगा रहे थे,डीडी टीवी चैनल ने पूरा भाषण रिकॉर्ड किया और उसका जो अंश टीवी पर दिखाया उसमें भाषण के समानांतर नारे जमकर गूंज रहे थे। इस बीच में एक घटना और घटी पुलिस वाले मुझे मारते -मारते वीसी ऑफिस के नीचे गाडियों के गैराज में ले गए ,वहां खड़ा करके चले गए,मैं कुछ देर बाद मौका निकालकर वहां से निकलकर फिरसे भीड़ में आ गया।इंदिरा गांधी के कैंपस से जाने के बाद हमलोग तत्कालीन वीसी नायडुम्मा से मिलने गए उनको मांगपत्र दिया,सवाल किया कि पुलिस को कैंपस में क्या उन्होंने बुलाया था तो उन्होंने कहा नहीं,हमने कहा पुलिस लाठीचार्ज के लिए माफी मांगो,उन्होंने वाकायदा माफी मांगी,प्रेस रिलीज जारी करके पुलिस लाठीचार्ज की निंदा की। पुलिस को फोन करके कहा कि गिरफ्तार छात्रों को तुरंत रिहा करो।इस तरह हम लोगों ने शांतिपूर्ण-अहिंसक प्रतिवाद का एक अध्याय पूरा किया।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू- 1-

      छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू। छात्र अस्मिता की राजनीति का आरंभ सन् 65-66 में बीएचयू में समाजवादियों ने किया और जेएनयू ने उसे सन् 1972-73के बाद से नई बुलंदियों तक पहुँचाया। देश में छात्र अस्मिता और छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक बोध देने में एसएफआई की बड़ी भूमिका रही है, खासकर जेएनयू में। जेएनयू लोकतांत्रिक छात्र राजनीति की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला के निर्माण में मार्क्सवादियों, समाजवादियों और फ्री थिंकरों की केन्द्रीय भूमिका रही है।
आमतौर पर शिक्षा का देश में जो वातावरण है वह छात्रों को सामाजिक जड़ताओं और रूढियों से मुक्त नहीं करता। इसके विपरीत जेएनयू के संस्थापकों का सपना था शिक्षा को रूढियों और सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का अस्त्र बनाया जाए। शिक्षा केन्द्र वर्जनाओं से मुक्ति के तीर्थ बनें। जेएनयू के वातावरण में सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश छिपा है। जेएनयू में पढ़ने वाला छात्र सामान्य प्रयत्न से सामाजिक रूढियों और वर्जनाओं से मुक्त होता है । जेएनयू की संरचना में वर्जना और अछूतभाव के लिए जगह नहीं है।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी बाधा है वर्जनाएं ,अछूतभाव और भेदभाव की सभ्यता। जेएनयू का इसी सभ्यता के साथ विचारधारात्मक संघर्ष है। जेएनयू का वातावरण निषेधों और वर्जनाओं के वातावरण का विकल्प देता और इस विकल्प को तैयार करने में जेएनयू के छात्रों और छात्र राजनीति की केन्द्रीय भूमिका रही है। यह वातावरण किसी एक नेता, प्रशासक, संगठन आदि की देन नहीं है बल्कि सामुदायिक प्रयासों की देन है। सामुदायिक प्रयासों ने जाने-अनजाने जेएनयू की धुरी बायनरी अपोजीशन को बना दिया। यहां पर छोटा बड़ा और बड़ा छोटा बन जाता है। भेदों की अनुभूति गायब है।
भारतीय समाज में तरह-तरह के भेद हैं किंतु जेएनयू में अभेद का वैभव है। जेएनयू भेदों को समझता है किंतु मानता नहीं है। बाकी विश्वविद्यालय भेदों को समझने के साथ भेदों में जीते हैं। शिक्षा के लिए भेद और वर्जनाएं सबसे बुरी चीजें हैं। इन्हीं दोनों चीजों को जेएनयू ने निशाना बनाया है। जेएनयू वास्तव अर्थों में संस्थान है यहां प्रत्येक स्तर पर सभी वर्ग शिरकत करते हैं। खासकर छात्रों की शिरकत अभूतपूर्व है। देश के किसी भी विश्वविद्यालय में प्रत्येक स्तर पर छात्रों की शिरकत, सम्मान और साख वैसी नहीं है जैसी जेएनयू में है। फैसलेकुन कमेटियों में सभी स्तरों पर छात्रों की शिरकत और छात्रों की राय का सम्मान जेएनयू की सबसे बड़ी पूंजी है।
जेएनयू का कोई भी आख्यान छात्रों के बिना नहीं बनता। जेएनयू छात्रों की पहचान ज्ञान ,राजनीति और लोकतांत्रिक नजरिए से बनी है। लोकतंत्र की महानता का जैसा आख्यान जेएनयू ने तैयार किया है वैसा दुनिया के किसी भी देश में देखने को नहीं मिलता। जेएनयू के छात्रों के पास दुनिया को देखने का एक विशिष्ट नजरिया है,जीवनशैली और स्वायत्ताता बोध है। यही वजह है जेएनयू का छात्र भिन्न नजर आता है।
जेएनयू के वातावरण में व्यक्तित्व रूपान्तरण की अद्भुत शक्ति है। आप किसी भी पृष्ठभूमि के हों जेएनयू में दाखिला लेने के बाद बदले बिना नहीं रह सकते। व्यक्तित्व रूपान्तरण की इतनी जबर्दस्त स्वाभाविक शक्ति अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। आखिरकार परिवर्तन की यह शक्ति आती कहां से है ?
मैं अपने छोटे से तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूँ कि जेएनयू की स्वाभाविक धारा में शामिल होने के बाद कोई भी छात्र और अध्यापक अपने को बदले बिना नहीं रह सकता। जो बदल नहीं पाते थे वे संग्रहालय की धरोहर नजर आते थे। बदलो या धरोहर बनो। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू का वातावरण किसी भी छात्र की जीवनशैली और नजरिए को प्रभावित करता है।
जेएनयू में सन् 1979 में जब प्रवेश परीक्षा देने आया तो सबसे पहले गंगा ढाबे पर अनिल चौधरी से परिचय हुआ। वह उस समय एसएफआई के और छात्र संघ के महासचिव थे। उनसे मिलने का प्रधान कारण था वह मथुरा के थे। मैं भी मथुरा का था। उन्होंने बड़े ही आत्मीयभाव से स्वागत किया और अनौपचारिक ढ़ंग से व्यवहार किया। अनिल के अंदाज में खासकिस्म का गर्वीला ठेठ देसी भाव था जो अपनी चाल-ढाल और बातचीत की भाषा में अभिजात्य भावबोध को चुनौती देता था। वह तीक्ष्णबुद्धि और तेजतर्रार छात्रनेता था। अनेक विलायत पलट नेता उसके नजरिए के सामने बौने नजर आते थे। समस्याओं को सुलझाने की उसकी अपनी देशी शैली थी और भाषण का स्थानीय मथुरिया अंदाज था।
मथुरिया अंदाज की विशेषता है बेबाकी मुखरता। अंग्रेजी भाषी अभिजात्य पृष्ठभूमि के लोग उसकी पारदर्शी बुद्धि की दाद देते थे। अनेक बार छात्र आन्दोलन के संकट के क्षणों में अनिल की मेधा बिजली की चमक की तरह दिखती थी, अनिल की हमदर्दी और संवेदनशीलता के सारे कॉमरेड कायल थे और अपने सुख-दुख का उसे साथी मानते थे।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू -2-

       जेएनयू की 'स्प्रि ‍ट' का स्रोत हैं छात्र। छात्रों की एकता,सहनशीलता,मि‍तव्ययता, अनौपचारि‍कता, बौद्धि‍कता आदि‍ के सामने सभी नतमस्तंक होते हैं। जेएनयू की पहचान जी.पार्थसारथी, नायडूम्मा, मुनीस रजा,जीएस भल्ला या नामवर सिंह से नहीं बनती। जेएनयू की पहचान की धुरी है ''छात्र स्प्रिट'। यह 'छात्र स्प्रिट' सारी दुनि‍या में कहीं पर भी देखने को नहीं मि‍लेगी। जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' का आधार न वाम वि‍चारधारा है न दक्षि‍णपंथी वि‍चारधारा है। बल्कि लोकतांत्रि‍क अकादमि‍क वातावरण,वि‍चारधारात्मक वैवि‍ध्य, और लोकतांत्रि‍क छात्र राजनीति‍ इसकी आत्मा है। जेएनयू के वातावरण और 'छात्र स्प्रि ‍ट' को नि‍र्मि‍त करने में अनेक वि‍चारधाराओं की सक्रि‍य भूमि‍का रही है। जेएनयू का अकादमि‍क वातावरण वि‍चारधाराओं के संगम से बना है। जेएनयू में आपको एक नहीं अनेक वि‍चारधाराओं के अध्ययन-अध्यापन और सार्वजनि‍क वि‍मर्श का अवसर मि‍लता है । इस अर्थ में जेएनयू वि‍चारधाराओं का वि‍श्ववि‍द्यालय है। सि‍र्फ वाम वि‍चारधारा का वि‍श्ववि‍द्यालय नहीं है।फर्क इतना है कि‍ अन्यत्र वि‍श्ववि‍द्यालयों में वि‍चारधाराओं के अध्ययन -अध्यापन को लेकर इस तरह का खुलापन,सहि‍ष्णु और लोकतांत्रि‍क भाव नहीं है जि‍स तरह का यहां पर है।
जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' के अनेक नजारे हमारी आंखों से गुजरे हैं। आज भी इस 'छात्र स्प्रिट' को आप व्यंजि‍त होते देख सकते हैं। मुझे मई 1983 का ऐति‍हासि‍क क्षण याद आ रहा है। यह क्षण कई अर्थों में छात्र राजनीति‍ के सभी पुराने मानक तोड़ता है और नए मानकों को जन्मं देता है। यह वह ऐति‍हासि‍क क्षण है जि‍समें जेएनयू अपना समस्त पुराना कलेवर त्यागकर नया कलेवर धारण करता है। छात्रों में अभूतपूर्व एकता,अभूतपूर्व भूल और अभूतपूर्व क्षति‍ के दर्शन एक ही साथ हुए हैं। जेएनयू की अभूतपूर्व क्षति‍ के लि‍ए सि‍र्फ उस समय के छात्रसंघ के नेतृत्व को दोष देना सही नहीं होगा। मई 1983 की जेएनयू की तबाही के लि‍ए छात्र बहानाभर थे। असल खेल तो प्रशासकों ने खेला था। उस खेल में अधि‍कांश नामी गि‍रामी शि‍क्षकों ने प्रशासन का समर्थन कि‍या था। एकमात्र जीपी देशपाण्डे ,प्रभात पटनायक, सुदीप्ति‍‍ कवि‍राज, उत्सा पटनायक, पुष्पेंशपंत आदि ने खुलेआम छात्रों का पक्ष लि‍या था,प्रशासकों के खि‍लाफ आवाज उठायी थी। बाकी सब तो 'बदलो' ,' बदलो' कर रहे थे। मई 83 की घटना के साथ जेएनयू की समस्त पुरानी ऐति‍हासि‍क मान्याताएं, धारणाएं, वि‍श्वास, संस्कार,आदतें, राजनीति‍क मान्यताएं, प्रशासनि‍क नजरि‍या,प्रशासकीय नीति‍यां सब कुछ धराशायी हो गए । मई 83 की घटना को बहाना बनाकर जेएनयू को सुनि‍योजि‍त ढ़ंग से प्रशासकों ने तोड़ा। इस कार्य में लोकल प्रशासकों से लेकर केन्द्रीय शि‍क्षा मंत्रालय तक सभी का हाथ था। छात्र आंदोलन को तो महज बहाने के रूप में इस्तेमाल कि‍या गया था। मई छात्र आंदोलन नहीं होता तब भी जेएनयू में बुनि‍यादी परि‍वर्तन आते। मई 83 के भयानक दमन के बाद भी 'छात्र स्प्रि ट' खत्म नहीं हुई । सारे प्रशासकीय और नीति‍गत परि‍वर्तनों को लाने का बुनि‍यादी लक्ष्य था 'छात्र स्प्रिट' को नष्ट करना। छात्रों ने कभी भी यह लक्ष्य हासि‍ल करने दि‍या।उल्लेखनीय है मई आंदोलन के कारण 170 से अधिक छात्र निष्कासित हुए,एक साल दाखिले नहीं हुए,370से अधिक छात्रों पर 20 से अधिक केस दो साल तक चलते रहे। मई 83 के भयानक उत्पीडन और दमन के बावजूद छात्रों की एकता,भाईचारा, राजनीति‍क सहि‍ष्णुता और बंधुत्व बना रहा। उल्लेखनीय है मई 83 में मैं वहां की राजनीति‍ का अनि‍वार्य हि‍स्सा‍ था। जेएनयू की स्टूडेण्ट फेडरेशन ऑफ इण्डिया की जेएनयू यूनि‍ट का अध्यक्ष और दि‍ल्ली राज्य का उपाध्यक्ष था। बाद में सन् 1984 -85 के छात्रसंघ चुनाव में अध्यक्ष बनने वाला जेएनयू का एकमात्र हि‍न्दीभाषी छात्र था। जेएनयू कि‍सी व्यक्ति का बनाया नहीं है, कुछ व्यंक्तियों का भी बनाया नहीं है। वह प्रोफेसरों का भी बनाया नहीं है। जेएनयू को बनाया है छात्र स्प्रिट ने। कि‍सी महापंडि‍त ने जेएनयू नहीं बनाया। जेएनयू में व्यक्ति नहीं 'स्प्रिट' महत्वपूर्ण है। कर्मण्यता और छात्रसेवा महत्वपूर्ण है। जेएनयू 'छात्र स्प्रिट' की धुरी है कर्मण्यता। जो छात्रों के लि‍ए काम करेगा उसे वे प्यार करते हैं। वे राजनीति‍ पर ध्यान पीछे देते हैं कर्मण्यता पर ध्यान पहले देते हैं। अकर्मण्यक होने पर वे कि‍सी भी धाकड़ नेता को घूल चटा सकते हैं। छात्रों के बीच कौन कि‍तना समय देता है, उनकी तकलीफों में कौन कि‍तना ध्यान देता है,कि‍तना समय उनकी सुख दुखभरी जिंदगी में शेयर करता है। इन चीजों को जेएनयू की 'छात्र स्प्रिट' पहचानती है। कोई बढ़ि‍या नेता हो लेकि‍न छात्रों के बीच में नहीं छात्रसंघ के दफतर में क्लर्क की तरह बैठा रहे। छात्रसंघ की कार्रवाईयों को ही महत्व दे। सार्वजनि‍क तौर पर कम मि‍ले या लोगों में कम घुले मि‍ले तो ऐसे नेता को जेएनयू के छात्र पसंद नहीं करते।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-3-

             जेएनयू की एक आयरनी है कि इसमें आइकॉन विरोधी भावबोध है। इसके बावजूद कुछ छात्रनेता ऐसे भी हुए जो अपने को जेएनयू के आइकॉन या प्रतीक पुरूष के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल रहे। इनमें जिसने सबसे ज्यादा शोहरत और साख हासिल की है वह देवी प्रसाद त्रिपाठी यानी डीपीटी। इन दिनों वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। देवी प्रसाद त्रिपाठी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1979 के अक्टूबर महिने में छात्रसंघ के चुनाव के मौके पर हुई। त्रिपाठीजी के बारे में मैं लगातार अन्तर्विरोधी बातें सुनता रहता था। खासकर जेएनयू आने के बाद अनेक एसएफआई नेता थे जो नहीं चाहते थे कि त्रिपाठी जी को कभी भी एसएफआई और उससे जुड़े मंचों पर बुलाया जाए। मजेदार बात यह थी कि ये नेतागण उनके बारे में तरह-तरह की कानाफूसी भी किया करते थे। एक अवस्था तो यह भी आयी कि माकपा के दिल्ली राज्य नेतृत्व से यह तय करा लिया गया कि त्रिपाठी को कभी जेएनयू चुनाव में प्रचार के लिए नहीं बुलाया जाएगा। सन् 1979 में डी.रघुनंदन को एसएफआई ने अध्यक्ष पद पर लड़ाने का फैसला लिया। आखिरी समय में स्थितियां एसएफआई के अनुकूल नहीं थीं। उस साल एआईएसएफ के साथ चुनावी समझौता भी नहीं हो पाया था। अंत में झक मारकर जेएनयू पार्टी ब्रांच ने निर्णय लिया कि देवीप्रसाद त्रिपाठी को प्रचार के लिए इलाहाबाद से बुलाया जाए। देवी प्रसाद त्रिपाठी उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग में अध्यापन कार्य कर रहे थे और माकपा के उ.प्र. राज्य कमेटी सदस्य थे। इलाहाबाद में पार्टी का काम मूलत: उन्हीं के जिम्मे था। उल्लेखनीय है उनके इलाहाबाद में पार्टी कार्य देखने के दौरान ही पहलीबार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यक्ष पद पर एसएफआई ने चुनाव जीता था। त्रिपाठीजी की इन सारी स्थितियों के बावजूद जेएनयू के कुछ नेताओं का उनके प्रति गुटपरस्तभाव मुझे आज तक समझ में नहीं आया। मेरी समझ है जब एक व्यक्ति पार्टी का सदस्य है तो उसके प्रति पार्टी के अंदर भेदभाव नहीं होना चाहिए। डीपीटी के संदर्भ में माकपा के अंदर भेदभाव और गुटपरस्ती को मैंने पहलीबार जब देखा तो माथा ठनका था। कई बार इस मसले को लेकर पार्टी में गर्मागर्म बहसें भी हुईं और उसका यह सुपरिणाम था कि मैं त्रिपाठीजी को देखना चाहता था, मैंने कुलदीपकुमार से अपनी इच्छा व्यक्त की मेरी डीपीटी से मुलाकात करा दो। कुलदीप ने कहा वे रघु के चुनाव प्रचार के लिए आ रहे हैं तुम मेरे साथ रहना मुलाकात हो जाएगी और त्रिपाठी आए तो सबसे पहले उन्हें खाना खिलाने के लिए हम दोनों डाउन कैम्पस में कटवारिया सराय में एक रेस्टोरैंट में ले गए हम तीनों ने जमकर खाना खाया और खूब बातें की। अंत में खाना खाकर तकरीबन ग्यारह बजे रात को हम ऊपर कैम्पस में आए और गोदावरी होस्टल (लड़कियों का) में चुनावसभा स्थल पर पहुँचे और तकरीबन एक बजे करीब डीपीटी ने अपना भाषण शुरू किया जो तकरीबन ढाई घंटे का था । इतना लंबा धारावाहिक, आकर्षक, विचारों से भरा भाषण्ा सुनकर सभी छात्र मुग्ध थे, मेरे लिए यह विलक्षण अनुभव था। मैंने अनेक नेताओं के भाषण सुने थे, सबसे लंबे भाषण के रूप में जयप्रकाशनारायण और चन्द्रशेखर का भाषण मैं मथुरा में सुन चुका था। किंतु डीपीटी के भाषण के बाद जो अनुभूति भाषणकला के प्रति पैदा हुई वह आनंददायी थी। डीपीटी का भाषण आकर्षक,सरस, मानवीय और विचारधारात्मक था। यह भाषण द्विभाषी था। अधिकांश समय अंग्रेजी को मिला तकरीबन आधा घंटा हिन्दी में भी बोले। अनिलचौधरी और रमेश दधीचि के अलावा त्रिपाठीजी तीसरे छात्र नेता थे जो हिन्दी में भी थोड़ा समय बोलते थे। रघु के चुनाव की यह अंतिम सभा थी और इसमें प्रकाश कारात, सीताराम येचुरी ने भी भाषण दिया और जब त्रिपाठीजी बोल रहे थे वे दोनों मुग्धभाव से सुन रहे थे और बार-बार यह संकेत भी कर रहे थे कि त्रिपाठी को सुनना एक आनंद से कम नहीं है। मजेदार बात यह थी कि उन्हें इतना मजा आ रहा था कि प्रत्येक बीस मिनट के बाद एक स्लिप डीपीटी की ओर बढ़ा देते थे कि बीस मिनट और बोलो। किसी नेता के भाषण के प्रति किसी नेता का यह आग्रह निश्चित रूप से विरल चीज थी। डीपीटी के भाषण शुरू होने के बाद कैम्पस में और कहीं पर किसी भी संगठन को अपनी चुनावी सभा जारी रखने में जबर्दस्त मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। विपक्ष के सभी नेता और कार्यकत्तर्ाा अपनी सभा खत्म करके उनका भाषण सुनने चले आते थे ,रघु की चुनाव सभा में कहने को मंच पर प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी बैठे थे वे पहले ही भाषण दे चुके थे उनके भाषणों के दौरान वह हलचल और सुनने की बेचैनी नहीं देखी गयी जो त्रिपाठी के भाषण के समय देखी गयी। त्रिपाठी को लंबे समय तक विपक्ष की सभाभंग करने वाले वक्ता के रूप में भी जाना जाता था। त्रिपाठी के भाषण के प्रति आम छात्रों में एक तरह का पागलपन था। मैंने अनेक छात्रों से पूछा कि भाई ऐसा क्या है जो पागल की तरह सुनने आ गए, सभी एक ही बात कहते थे कि त्रिपाठी को सुनने में मजा आता है। त्रिपाठी के भाषण के बाद जाना कि भाषण को आनंद देने वाला होना चाहिए। अमूमन नेतागण भाषणों के जरिए बोर करते हैं। त्रिपाठी के भाषणों में रस होता था। त्रिपाठी ने अपनी भाषणकला में राजनीतिक भाषण कला में समाजवादी, कम्युनिस्ट और पंडितों की कथाशैली का सम्मिश्रण करके एक ऐसा फॉरमेट तैयार किया था जिसमें समाजवादियों की तरह विचारधारात्मक विवाद थे, कथाओं की तरह आनंद और आख्यान था साथ ही कम्युनिस्टों की समाहार शैली भी थी। त्रिपाठी की कोशिश हुआ करती थी कि श्रोताओं को कुछ देर के लिए दैनन्दिन जंजाल के बाहर ज्ञान के जंजाल में आनंद लेने को तैयार किया जाए। फलत: भाषण में विवाद ,समाहार,और आनंद की त्रिवेणी का एक अच्छी विचारोत्तोजक सुबह में मिलन होता था। त्रिपाठी का भाषण आधी रात के बाद कभी शुरू होता था और सुबह सूर्योदय के पहले तक चलता था। रघु के चुनाव के समय जो जलवा था वही जलवा अगले साल वी. भास्कर के चुनाव के समय भी था और दोनों ही मौकों पर मैन ऑफ द मैच त्रिपाठी थे। त्रिपाठी का हिन्दी का देशी ठाठ हिन्दीभाषी प्रान्तों के छात्रों को बेहद अपील करता था। डीपीटी अकेले वक्ता थे जिनकी अभिजन और गैर अभिजनों में समान अपील और सम्मान था। रघु की चुनाव सभा खत्म करने के बाद डीपीटी और मै,ं कुलदीपकुमार के पेरियार होस्टल स्थित कमरे में चले आए तब त्रिपाठीजी ने अपने हंसी-मजाक वाले अंदाज में ही मुझसे अपनी ज्योतिष संबंधी जिज्ञासाएं रखीं और इस तरह मैंने पहलीबार किसी माक्र्सवादी को ज्योतिषी से प्रश्न करते पाया।

छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू-4-

        जेएनयू के प्रतीक पुरूषों में तीन कॉमरेडों का नाम आता है ये हैं देवीप्रसाद त्रिपाठी, प्रकाश कारात और सीताराम येचुरी। इनमें से एकमात्र देवी प्रसाद त्रिपाठी ने सबसे ज्यादा कुर्बानियां दीं। आपातकाल में 18 महीनों तक जेल में रहे। जबकि बाकी दोनों का किसी भी किस्म की कुर्बानी देने का रिकॉर्ड नहीं है। यह बात दीगर है कि प्रकाशकारात और सीताराम येचुरी को माकपा के शीर्ष नेतृत्व में जगह मिली। इन दोनों नेताओं के व्यक्तित्व की अपनी-अपनी निजी विशेषताएं हैं। किंतु कुछ साझा विशेषताएं भी हैं। दोनों माक्र्सवाद की किताबी भाषा से अच्छी तरह वाकिफ हैं। दोनों का माक्र्सवाद और हिंदुस्तान के प्रति दर्शकीय संबंध है। प्रकाश कारात ने जेएनयू में सन् 1980 में भास्कर वेंकटरमन के अध्यक्ष पद हेतु आखिरी चुनाव प्रचार सभा की। तब से प्रकाशकारात ने कभी छात्र चुनाव सभाओं में हिस्सा नहीं लिया।इसी साल से चुनाव के मुख्य वक्ताओं में मेरा नाम शामिल हुआ जो 1987तक बना रहा। प्रकाश कारात का भाषण पार्टी प्रेस विज्ञप्ति, पार्टी कक्षा और पार्टी के संपादकीय शैली का मिश्रित रूप था ,उसके भाषणों में जिंदगी की धड़कनों का अभाव खटकता था, चाहकर भी वह अंत तक इस कमजोरी से मुक्त हो पाया। प्रकाश के इस स्वभाव का जीवन और पार्टी के प्रति यांत्रिक और संवेदनाहीन समझ से गहरा संबंध है। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर जो लोग स्टालिन टाइप व्यक्तित्व से प्रभावित हैं उन्हें प्रकाश अपील करता है। साधारण छात्रों में उसके भाषण्ाों की न्यूनतम अपील होती थी, सिर्फ एसएफआई के सदस्यों का एक हिस्सा ही उसे आदर्श वक्ता के रूप में पसंद करता था। इसके विपरीत सीताराम येचुरी के भाषणों में पब्लिक स्कूल के डिबेटरों की शैली थी, यह शैली जेएनयू के पब्लिक स्कूल मार्का छात्रों को अपील करती थी, इसी शैली के कारण सीताराम को मीडिया में भी ज्यादा पसंद किया जाता है। पब्लिक स्कूल मार्का वक्तृता शैली मूलत: आभिजात्य पापुलिज्म को संबोधित करती है। आभिजात्य पृष्ठभूमि के छात्रों में सीताराम की जनप्रियता जबर्दस्त थी । उल्लेखनीय है आभिजात्य की जनप्रियता खोखली और अस्थायी होती है। यही वजह है सीता के भाषणों का क्षणिक प्रभाव होता था। वह जिस क्षण बोलता है तत्काल ही प्रभावहीन हो जाता है। आप जब तक भाषण सुनते हैं अच्छा लगता है, भाषण बंद और प्रभाव भी खत्म। इसके विपरीत डीपीटी के भाषणों में आख्यान और विचार की सम्मिश्रित पध्दति का प्रयोग था। डीपीटी का भाषण सुनते हुए छात्र आनंद लेते थे बाद में उसे स्मरण करके बहस करते थे। बहस अंतर्वस्तु और भाषणकला दोनों को लेकर होती थी। जेएनयू की वामपंथी छात्र संस्कृति को बनाने में जिन छात्रों की भूमिका महत्वपूर्ण थी और जो आइकॉन नहीं थे किंतु अपने जमाने के जेएनयू के बेहतरीन छात्र होने के साथ बेहतरीन संगठनकर्ता थे इनमें सर्वप्रथम दो नाम आते हैं पहला रमेश दीक्षित का और दूसरा है सुनीत चोपड़ा का। इन दोनों ने अपने-अपने तरीके से जेएनयू के छात्र आंदोलन की बुनियाद का निर्माण किया।ये दोनों देश में एसएफआई जैसे विशाल छात्र संगठन के संस्थापक सदस्यों में भी हैं। सुनीत इन दिनों माकपा में हैं,खेतमजदूर यूनियन के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं,वर्षों माकपा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य रहे हैं जबकि रमेश दीक्षित राष्ट्रवादी कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व का अंग हैं। इन दोनों छात्रनेताओं ने लंबे समय तक जेएनयू के उदात्त मानवीय चरित्र को अपने दैनन्दिन व्यवहार और विचारधारात्मक कार्यों से आगे बढ़ाया। इनके अलावा उस जमाने में छात्र आंदोलन के अग्रणी नेताओं में दिनेश अवरोल, प्रबीर पुरकायस्थ, अशोकलता जैन, इंदु अग्निहोत्री,सुहैल हाशमी, दिलीप उपाध्याय ,सीताराम प्रसाद सिंह, कैशर शमीम, रमेश दधीचि ,मनमोहन ,अनिल चौधरी ,डी.रघुनंदन आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

टीवीयुग में कन्हैया कुमार की सीमाएं-

        मेरे कल के आलेख ´कन्हैया कुमारःविभ्रम और यथार्थ´ पर टिप्पणी करते हुए प्रियंकर पालीवाल ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं जिन पर सोचने की जरूरत है। पालीवाल का मानना है,´कन्हैया कुमार,राज ठाकरे, लालूप्रसाद और नरेंद्र मोदी इन सबके भाषण उनके समर्थकों में जबर्दस्त लोकप्रिय हैं . सेंस ऑफ ह्यूमर ? खांटीपन ? देसी मुहावरा ? लफ्फाज़ी ? अन्य के लिए घृणा-प्रचार ? आखिर क्या है इनकी लोकप्रियता का राज ? इसका विश्लेषण होना चाहिए . अगर जे.एन.यू. के पूर्व छात्र नेताओं से ही तुलना करनी हो तो डी.पी.त्रिपाठी या सीताराम येचुरी से कर ली जाए . जगदीश्वर चतुर्वेदी से ही कर ली जाए . पर एक बात तय है कि कन्हैया की लोकप्रियता अभिजात वाम की लोकप्रियता नहीं है. वह वाम के आभिजात्य को तोड़ने वाली ग्रामी-वामी यानी भदेस-वामी लोकप्रियता है .´

इस प्रसंग सबसे पहली बात यह कि कन्हैया कुमार के भाषण को राज ठाकरे,लालू प्रसाद यादव ,नरेन्द्र मोदी के साथ तुलना करके नहीं देखा जाना चाहिए।राज ठाकरे लंपट राजनीति का मीडियानायक है,लालू यादव बिहार का सबसे जनप्रियनेता है,नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के नायक हैं, जबकि कन्हैया कुमार जेएनयू का छात्रनेता है।इन चारों में यह बुनियादी अंतर है।इन चारों का जनाधार अलग है और राजनीतिक नजरिया भी अलग है।चारों की भाषा और मुहावरे में भी अंतर है।कौन नेता कैसा है यह इस पर निर्भर करता है कि उसका जनाधार किस तरह के लोगों में है और वह राजनीति को किस नजरिए से देखता है।सेंस ऑफ ह्यूमर या देसी खांटीपन,कभी भी टिकाऊ नेता नहीं बनाते।उपरोक्त चारों नेताओ में राज ठाकरे घृणा की राजनीति करते रहे हैं,जबकि लालू यादव और कन्हैया कुमार ने घृणा की राजनीति नहीं की है।उनकी राजनीति का बुनियादी आधार लोकतांत्रिक परिवेश से जुड़े सवालों पर केन्द्रित रहा है।जबकि नरेन्द्र मोदी ने घृणा और विकास के रसायन के आधार पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति की है। ।

उल्लेखनीय है वाम विचारधारा कभी आभिजात्य में लोकप्रिय नहीं रही।जेएनयू में भी वह आभिजात्य की प्रिय विचारधारा नहीं है।जेएनयू में वाम राजनीति में शामिल होने वालों में अधिकांश गैर-आभिजात्य वर्ग से आए छात्र रहे हैं।यह मिथ है कि जेएनयू में पढ़ने वाले अधिकांश छात्र आभिजात्य होते हैं।सच्चाई इसके विपरीत है।एक अन्य चीज है जिसे हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए, भाषण की जनप्रियता हमेशा संदर्भ,मीडिया और परिवेश की संगति-असंगति के संबंध पर निर्भर करती है।इसका कोई तयशुदा नियम नहीं है।

कन्हैया कुमार के 9फरवरी के पहले और बाद के भाषण जनप्रिय हुए हैं,वह आम लोगों को इंटरनेट पर अपनी ओर खींचने में सफल रहा है।लेकिन वह उतने लोगों को भविष्य में अपने भाषणों के करीब नहीं खींच पाएगा।इसका प्रधान कारण है कि टीवी प्रसारण में उसकी अनुपस्थिति। टीवी प्रसारण में कन्हैया के पहले वाले भाषण आए,प्रसारित हुए,उसने उसके इंटरनेट पर उपलब्ध भाषणों की दर्शक संख्या भी बढ़ा दी।आज भी हमारे समाज में कम्युनिकेशन में टीवी चैनलों की निर्णायक भूमिका है।मेरा अनुमान है जेएनयू कैंपस के बाहर कन्हैया कुमार तब तक ही जनप्रिय रहेगा जब तक वह टीवी पर रहेगा,टीवी से गायब होते ही उसके भाषण के प्रति आकर्षण कम हो जाएगा। इसका प्रधान कारण है टेलीविजन कम्युनिकेशन। इन दिनों जितने भी नेता जनप्रिय हैं वे अपने भाषणों के कारण जनप्रिय नहीं हैं वे जनप्रिय हैं टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण।



जिस व्यक्ति को टीवी ने उछाल दिया वह जनप्रिय हो गया,चाहे वह निर्मल बाबा हो या श्रीश्री रविशंकर हो या बाबा रामदेव हो,या मोदी हो या लालू हो।इन सबकी जनप्रियता इनके भाषण कला के कारण नहीं है,बल्कि टेलीविजन कम्युनिकेशन के कारण है। इस युग में जो टीवी में है वह जनप्रिय है जो टीवी में नहीं है वह जनप्रिय नहीं है।नरेन्द्र मोदी की महा-लोकप्रियता इसलिए नहीं है कि मोदी ने महान कार्य किए हैं,बल्कि इसलिए है कि उसने टेलीविजन नेटवर्क को सबसे अधिक घेरा हुआ है।इस युग के नेता तब तक जिंदा हैं जब तक वे टीवी पर्दे पर हैं।

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

आतंकवाद,साम्प्रदायिकता और मीडिया

        आतंकवाद और साम्प्रदायिकता जुड़वाँ भाई हैं। इसलिए उनको संक्षेप में ´आ –सा´ कहना समीचीन होगा।इन दोनों में साझा तत्व है कि ये दोनों मीडिया कवरेज के बिना जी नहीं सकते।इनके लिए मीडिया कवरेज संजीवनी है।वे गिनती में कम होते हैं लेकिन टीवी और समाचारपत्र में कवरेज को लेकर पगलाए रहते हैं। वे मीडिया कवरेज के सहारे ही अपना विकास करते हैं। मीडिया कवरेज के जरिए ही ये भारतीय मध्यवर्ग तक अपनी पैठ बनाने में सफल हो जाते हैं।इनके मीडिया कवरेज का अल्पकालिक और दीर्घकालिक दो तरह का असर होता है।ये अपने को राष्ट्र-राज्य के संरक्षक के रूप में पेश करते हैं,उनकी यह छवि मध्यवर्ग को अपील करती है।खासकर पश्चिमी जीवनशैली से प्रभावित मध्यवर्ग को अपील करती है,क्योंकि यह वर्ग भारतीय समाज में अपने को राष्ट्र संरक्षक के रूप में पेश करता है। उनके इस नजरिए का पत्रकारों पर गहरा असर होता है और वे भी अपने मीडिया कवरेज के लिए राष्ट्र संरक्षकों को खोजने लगते हैं और यही वह प्रस्थान बिंदु है जहं पर टीवी बहसों से लेकर समाचारपत्रों तक साम्प्रदायिक लेखक,प्रवक्ता ,नेता आदि राष्ट्र संरक्षक के रूप में हमारे सामने पेश किए जाते हैं। ये वे लोग हैं जो राष्ट्र के प्रति अंधभक्ति का प्रचार करते हैं और राष्ट्र के बारे में किसी भी किस्म के विवेकपूर्ण विमर्श,बहस आदि को एकसिरे से खारिज करते हैं।


      ´आ-सा´के प्रवक्ताओं का मीडिया में मुख्य लक्ष्य होता है ´भय´ के फ्रेमवर्क में हर चीज को पेश करना।दूसरा लक्ष्य है विवेकवान और विवेक को निशाना बनाना,मनमाने ढ़ंग से उनकी हत्या करना,उन पर हमले करना,बोलने न देना आदि।वे शुरूआत किसी एक से करते हैं लेकिन उनके निशाने पर असल में पूरा समाज होता है। वे तकनीकी कौशल,परंपरागत नैतिकता,हिंसा और प्रभुत्वशाली भाषा इन चारों का अपने विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल करते हैं।

विज्ञान ,संस्कृत और संघ

        आरएसएस का विज्ञान और संस्कृत से तीन-तेरह का संबंध है।इस संगठन की न तो विज्ञान में रूचि है और न संस्कृतभाषा और साहित्य के पठन-पाठन में दिलचस्पी है।इसके विपरीत इस संगठन का समूचा आचरण विज्ञान और संस्कृत विरोधी है।

आरएसएस के लिए विज्ञान और संस्कृत अन्य पर,विरोधियों पर और ज्ञान संपदा पर हमला करने का बहाना है।वे ज्ञान को अर्जित करने के लिए विज्ञान और संस्कृत के पास नहीं जाते बल्कि ज्ञानसंपदा को नष्ट करने के लिए संस्कृत का बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

भारत की पुरानी परंपरा में संस्कृत साहित्य और संस्कृत भाषा आनंद सृजन और आनंद प्राप्ति का स्रोत थी और आज भी है,लेकिन संघ ने संस्कृत भाषा को आनंद की बजाय टकराव और वर्चस्व की भाषा बना दिया है। बृहदारण्यक उपनिषद में वेदान्त के बारह महावाक्यों में एक ´विज्ञानमानन्दं ब्रह्म´भी है।इसमें विज्ञान को आनंद के समान माना है।यह विज्ञान और कुछ नहीं भाषा ही है।संस्कृत में इसी के आधार पर भाषा को विज्ञान मानने की परंपरा चली आ रही है।अन्यत्र तैतिरीय उपनिषद में ´विज्ञानं देवाःसर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते´ कहा गया है यानि विज्ञान को ही ज्येष्ठ ब्रह्म माना गया है। कहने का आशय यह है कि प्राचीन परंपरा में ज्ञान का अर्थ था स्थूल वस्तुओं का ज्ञान, जिसे अविद्या या अपरा विद्या कहा गया।जबकि विज्ञान का अर्थ है वस्तुओं का सूक्ष्मज्ञान।इसे विद्या और परा विद्या कहा गया। लेकिन बाल गंगाधर तिलक ने इस परंपरा से विपरीत धारणा प्रतिपादित की, उन्होंने कहा ज्ञान का अर्थ है आध्यात्मिक ज्ञान और विज्ञान का अर्थ है इम्पीरिकल नॉलेज यानि भौतिक ज्ञान।सारी समस्याओं का गोमुख यहीं से आरंभ होता है।

जब हम भाषा के साथ विज्ञान को जोड़ते हैं तो इसका अर्थ यह है कि भाषा का विशेष ज्ञान। इसके अलावा एक और पदबन्ध है ´व्याकरण´ ,इसे लेकर भी गड़बड़झाला है। ´व्याकरण ´यानी विश्लेषण। सवाल यह है विश्लेषण से ये आरएसएस भागते क्यों हैं ॽ हर भाषा और ज्ञान की शाखा का अपना व्याकरण है।विश्लेषण पद्धति है।उसकी स्वायत्त संरचनाएं हैं उनमें गड्डमड्ड करने से बचना चाहिए। आईआईटी में पढाए जाने वाले विषयों की भाषा और व्याकरण वही नहीं है जो संस्कृत साहित्य के काव्यग्रंथों का है।इसी तरह वेद की भाषा और व्याकरण वही नहीं है जो इंजीनियरिंग की है।

भारत में संस्कृत के वैय्याकरणशास्त्रियों की सुदीर्घ परंपरा रही है।यह सच है पाणिनी इनमें सुसंगत हैं। लेकिन पाणिनी भाषा संबंधी सभी समस्याओं का समाधान नहीं करते।आरएसएस के लोग चूंकि ´भारतप्रेमी ´होने का दावा करते हैं और हिन्दूज्ञान में ही विश्वास करते हैं,अतःहम यहाँ भर्तृहरि को उद्धृत करना चाहेंगे।वाचिकरोग या भाषा के अपशब्दों के प्रयोग से बचने के लिए भाषाशास्त्र पढ़ने के लिए कहते हैं।यानि भाषा का ज्ञान आरंभिक कक्षाओं में कराया जाए।आईआईटी के छात्र आरंभिक कक्षा के छात्र नहीं हैं।वे यदि अंग्रेजी भाषा का शुद्ध प्रयोग करना नहीं जानते तो परीक्षा में पास नहीं हो सकते।

पुराने जमाने में वेदाध्ययन आरंभ करने के पहले संस्कृत व्याकरण पढ़ाने पर जोर दिया गया।इसी प्रसंग में कहना चाहते हैं कि भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अन्य विषयों के साथ संस्कृत भाषा और उसका व्याकरण पढ़ाया जाता है।संस्कृत पाठशालाओं में कक्षा 6 यानी प्रवेशिका से उत्तरमध्यमा यानि 12वीं तक व्याकरण पढ़ाया जाता है।इसके आगे व्याकरण यदि कोई पढ़ना चाहे तो वह व्याकरण विषय लेकर शास्त्री(बीए) और आचार्य(एमए) में पढ़ सकता है।अन्य विषयों के संस्कृत के छात्रों के लिए 12वीं के बाद व्याकरण नहीं पढ़ाया जाता,मैं स्वयं इसी परंपरा से पढ़ा हूँ।यानी संस्कृत में यदि कोई स्नातक स्तर पर न्याय,वेद,धर्मशास्त्र,साहित्य आदि विषय लेता है तो उसे संस्कृत व्याकरण नहीं पढाया जाता। संस्कृत में जब स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं में संस्कृत व्याकरण नहीं पढाया जाता तो फिर आईआईटी में ही इसे जबर्दस्ती क्यों पढाने पर जोर दिया जा रहा है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि संस्कृत की परंपरा 12वीं तक संस्कृत भाषा और व्याकरण पढाने पर जोर देती है,उसी पैटर्न पर सारे देश में आधुनिक शिक्षा में संस्कृत को 12वीं तक सामान्य विषय के रूप में रखा गया है।इस फैसले को लागू करने के लिए सारे देश में गंभीर मंथन हो चुका है,मुश्किल यह है कि आरएसएस और उनकी मंत्री स्मृति ईरानी बिना कुछ जाने-समझे संस्कृत को आईआईटी के छात्रों पर थोप देना चाहती हैं।यह भारतीय परंपरा में संस्कृत के पठन-पाठन के रिवाज के एकदम खिलाफ है ,यह भाषा पढ़ाने की विश्वपरंपरा के भी खिलाफ है,अतः इसका मुखर विरोध किया जाना चाहिए।










आईआईटी , संस्कृत और संघ का खेल

               मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का मानना है कि आईआईटी के छात्रों को संस्कृतभाषा की शिक्षा दी जानी चाहिए।सुनने में यह सुझाव बड़ा अच्छा लगता है लेकिन सवाल यह है संस्कृत पढ़कर आईआईटी का छात्र क्या करेगा ॽ क्या संस्कृतभाषा उसके ज्ञान-विज्ञान में कोई इजाफा करेगी ॽइससे भी बड़ी बात यह कि संस्कृत पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को आईआईटी में क्या दाखिला मिलता है ॽये कुछ सवाल हैं जिनके बारे में ईरानी और उनकी संस्कृतमंडली को जबाव देने चाहिए।

आईआईटी के पाठ्यक्रम का ढ़ांचा कुछ इस तरह का है कि उसमें संस्कृत से कोई मदद नहीं मिलेगी।मसलन्,आईआईटी के पाठ्यक्रम से संबंधित कोई भी सामग्री संस्कृत में नहीं है।दूसरी बात यह कि आईआईटी में भाषा की पढ़ाई नहीं होती बल्कि प्रौद्योगिक,इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई होती।स्मृति ईरानी को यदि संस्कृत के उत्थान की इतनी ही चिन्ता है तो उनको संस्कृत भाषा और साहित्य के पठन-पाठन पर उन विश्वविद्यालयों में जोर देना चाहिए जहां संस्कृत पढायी जाती है।अधिक से अधिक संस्कृत के शिक्षकों की नियुक्तियां कराएं,संस्कृत के विद्यार्थियों को विशेष वजीफे दें,शोध के लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट दें।संस्कृत के विद्वानों को नए-नए विषयों में अनुसंधान के लिए प्रेरित करें।यह सब करने की बजाय स्मृति ईरानी आईआईटी के छात्रों को संस्कृत पढ़ाकर न तो संस्कृत का भला करेंगी और न छात्रों का ही भला करेंगी।इस प्रसंग में चीन के अनुभव से हम सीख सकते हैं,चीन में सब कुछ चीनी भाषा में पढ़ाया जाता है लेकिन उच्च शिक्षा,प्रौद्योगिकी,इंजीनियरिंग,विज्ञान आदि की शिक्षा में वहां पर भी अंग्रेजी भाषा में पठन-पाठन पर जोर दिया गया है, इसके कारण विज्ञान से लेकर समाजविज्ञान तक हर क्षेत्र में चीनी मेधा का विश्वस्तरीय मानकों के आधार पर विकास करने में मदद मिली है।विश्व के नामी विश्वविद्यालयों में चीन के कई विश्वविद्यलयों के नाम आते हैं,यहां तक कि भारत के हजारों छात्र वहां पढ़ने जाते हैं।वहां माध्यम के रूप में चीनी भी है लेकिन अंग्रेजी भी है।



संस्कृत सुंदर और समृद्ध भाषा है ,लेकिन संस्कृत का व्याकरण तो संस्कृतसाहित्य में मदद करेगा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी,समाजविज्ञान,देशज भाषायी साहित्य में मदद नहीं करेगा।आरएसएस के लोगों की मुश्किल यह है कि संस्कृत से तथाकथित प्रेम करना जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि संस्कृत प्रेम को हासिल कैसे करें।संस्कृत के विद्वानों ने डंडे और सत्ता के जोर से संस्कृतभाषा और उसके साहित्य का निर्माण नहीं किया ।कोई भी भाषा पर्सुएसन के जरिए ही विकास करती है।संस्कृत भाषा के बारे में यह मिथ है कि वह सबसे वैज्ञानिक भाषा है ,लोग यह भी कह रहे हैं कि कम्प्यूटर की भाषा बनाने में उससे मदद मिल सकती है,हम यही कहेंगे कि भारत सरकार वैज्ञानिकों और भाषावैज्ञानिकों से कहे कि वे संस्कृत में काम करें और सिद्ध करें कि संस्कृत सच में विज्ञान की भाषा बन सकती है और उससे हमें काम करने में मदद मिल सकती है,फिलहाल तो अवस्था यह है कि हिन्दीसहित दस देशी भाषाओं के यूनीकोड फॉण्ट को ही हम इंटरनेट पर जनप्रिय नहीं बना पाए हैं,हिन्दी सबसे पिछड़ी अवस्था में है,ऐसे में संस्कृत को क्षितिज पर लाना तो दिवा-स्वप्न ही कहेंगे।

कन्हैया कुमारः विभ्रम और यथार्थ

       कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू अध्यक्ष, काफी लंबे समय से छात्र राजनीति कर रहे हैं,लेकिन 9फरवरी 2016 की घटना ने उनको रातों-रात जेएनयू कैंपस के बाहर बेहद जनप्रिय बना दिया।इस घटना के पहले वह जेएनयू में जनप्रिय थे,लेकिन 9फरवरी की घटना के मीडिया कवरेज ने उनको राष्ट्रीय स्तर पर जनप्रिय बना दिया।इस जनप्रियता का श्रेय मीडिया,साइबर मीडिया और कन्हैया के वाम नजरिए को जाता है।कन्हैया कुमार ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वह पहले किसी वाम नेता ने नहीं बोला हो।इसके बावजूद किसी युवा वाम छात्रनेता को उतनी जनप्रियता नहीं मिली,जितनी कन्हैया कुमार को मिली।इस जनप्रियता के कारणों और प्रक्रिया की खोज की जानी चाहिए।

कन्हैया कुमार जो कुछ बोलता है, जिस मुहावरे में बोलता है वह वाम छात्र राजनीति की चिर-परिचित शैली है।इसे जेएनयूएसयू के किसी भी वाम छात्रनेता में सामान्यतौर पर देख सकते हैं।इसमें विलक्षण जैसी कोई चीज नहीं है।कन्हैया कुमार जब बोलता है तो सामान्य,सहज और जोशीली भाषा में बोलता है।यह खूबी वाम छात्रनेताओं की है।

उल्लेखनीय है युवा पीढ़ी नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेताओं के भाषणों से विगत दो सालों से घिरी रही है,इस पीढ़ी ने कन्हैया कुमार में नएपन का अनुभव किया है।मोदी के केन्द्रीय राजनीति में आने के बाद उसके भाषणों का अहर्निश´फ्लो´ मीडिया और साइबर मीडिया के जरिए प्रवाहित हुआ है।यह सुनिश्चित, अनिवार्य और अपरिहार्य ´फ्लो´है जिससे सभी बोर हो चुके हैं,यह ´भाषण फ्लो´थमने का नाम नहीं ले रहा।जेएनयू और 9फरवरी की घटना को लेकर केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के नेताओं, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत आदि के अविवेकपूर्ण बयानों, आरएसएस और उसके प्रवक्ताओं की मीडिया मूर्खताओं ,कुतर्कों, ताबड़तोड़ हमला करके परास्त करने की शैली, कन्हैया कुमार आदि छात्रों को देशद्रोह के झूठे मुकदमे में पकड़वाने के षडयंत्र, और जेएनयू के बारे में जहरीले प्रचार अभियान ने हठात् कन्हैया कुमार की ओर सबका ध्यान खींचा है ।

मीडिया से लेकर साइबरमीडिया तक कन्हैया कुमार के भाषणों को बेहद सराहा गया,बहुत बड़ी संख्या में सुना गया।असल में,कन्हैया कुमार की लोकप्रियता की आग में घी का काम किया पीएम नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार की विगत दो सालों की असफलताओं ने।यही वजह है कि कन्हैया कुमार के निशाने पर केन्द्र सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियां हैं।इसके अलावा आरएसएस ने हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर इसी दौरान जो आंदोलन शुरू किया उसने भी कन्हैया कुमार के लिए पर्याप्त ईंधन जुगाड़ करके दे दिया। आरएसएस और मोदी सरकार ने 9फरवरी की कैंपस स्तर की घटना को स्थानीय घटना की बजाय राष्ट्रीय घटना बना दिया और सारे मामले को जेएनयू कैंपस के बाहर संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद की मुहिम का प्रमुख अंग बनाकर पेश किया और यह उनकी सबसे बड़ी भूल थी।यही वह मुख्य बिंदु है जहां से कन्हैया कुमार कैंपस के बाहर निकलता है और मीडिया से लेकर साइबर मीडिया तक नए संघ विरोधी-मोदी विरोधी आख्यान का नया नरेटिव बनाता है।

जबकि सच्चाई यह है जेएनयू छात्रसंघ और कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले लगातार अनेक मसलों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं।इनमें प्रमुख हैं-पूना के फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट के छात्रों के समर्थन में किया गया आंदोलन,यूजीसी के खिलाफ चलाया गया आंदोलन,हैदराबाद वि वि के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ चलाया गया आंदोलन।इन सभी आंदोलनों में जेएनयू के छात्रसंघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।इन सबमें कन्हैया कुमार की भी सक्रिय भूमिका रही है। लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर कोई नहीं जानता था।लेकिन 9फरवरी की घटना और उसे लेकर मीडिया-संघ के हमले ने हठात् कन्हैया कुमार को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाकर खड़ा कर दिया।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो कन्हैया कुमार 9फरवरी की घटना के पहले से सक्रिय था,लेकिन कैंपस तक जनप्रिय था। लेकिन 9फरवरी2016 की घटना ने उसे गुणात्मक रूप से भिन्न भूमिका में ले जाकर खड़ा कर दिया।आज कन्हैया कुमार सारे देश के छात्रों में बेहद जनप्रिय है।उसके बारे में आम लोग तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं,उसे राष्ट्रीयनेता बना रहे हैं।लेकिन कन्हैया कुमार राष्ट्रीय नेता नहीं है,वह तो जेएनयूएसयू का अध्यक्ष है,छात्रनेता है,छात्र है।वह छात्र के रूप में ही फिलहाल रहना चाहता है।लेकिन जेएनयू प्रशासन ने संघ के इशारों पर काम करते हुए कन्हैया कुमार सहित 14छात्रों के खिलाफ 9फरवरी की घटना को लेकर दण्डात्मक कार्रवाई करके साफ कर दिया है कि उनका लोकतंत्र,संविधान और न्यायपालिका में कोई विश्वास नहीं है।जेएनयू प्रशासन के इस फैसले का हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए।



रविवार, 24 अप्रैल 2016

सोशलमीडिया और साहित्य

      इन दिनों अकादमिक जगत का एक वर्ग सोशलमीडिया से क्षुब्ध है।खासकर हिन्दी के प्रोफेसर और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में सोशलमीडिया को लेकर हेयभाव है।वे इसमें लिखने-पढ़ने को थर्डग्रेड किस्म का काम समझते हैं।यदि सोशलमीडिया पर कोई मेरा जैसा प्रोफेसर सक्रिय है तो उसे एकदम अ-गंभीर और गैर-जिम्मेदार समझते हैं।मेरी फेसबुक वॉल पर आए दिन इस तरह के क्षुब्ध लोग लिखते रहते हैं कि सब समय तो फेसबुक पर रहते हो फिर पढ़ाने कब जाते हो ॽ सच्चाई यह है मैं कक्षा में कभी अनुपस्थित नहीं रहा।कभी कोर्स अधूरा नहीं छोड़ा।बल्कि हिन्दी के जितने भी प्रोफेसर हैं उनमें अब तक सबसे ज्यादा किताबें लिखी हैं।किताबों के पाठक भी हैं।कभी किताब लिखना नहीं छोड़ा।कभी किसी की चमचागिरी नहीं की,किताबें लिखने के लिए किसी से अनुदान नहीं लिया,यहां तक कि यूजीसी और अपने विश्वविद्यालय से भी कोई अनुदान नहीं लिया। इस तरह के लोग यह भी मानते हैं कि हल्के-फुल्के लेखन,फोटो लगाने,दैनंदिन गप्पबाजी करने आदि के लिए सोशलमीडिया ठीक है लेकिन कोई गंभीर साहित्यिक कार्य सोशलमीडिया के जरिए नहीं कर सकते।हम विनम्रता के साथ इस तरह का नजरिया रखने वालों से असहमत हैं।ये वे लोग हैं जो सोशलमीडिया के चरित्र से अंजान हैं या फिर जानबूझकर सोशलमीडिया विरोधी अभियान में लगे हैं।

सोशलमीडिया वस्तुतः भाषा का विस्तार है। यह भाषा का विकसित रूप है।भाषा मूलतः अभिव्यक्ति की तकनीक है। भाषा में दो तरह की अभिव्यक्ति नजर आती है।पहली अभिव्यक्ति वह है जो दैनंदिन जीवन से जुड़ी है।जिसका हम क्षणिक उपयोग करते हैं और वह उपयोग करते ही खत्म हो जाती है। दैनंदिन जीवन की क्षुद्र बातों और क्षुद्र कर्मों की सीमा में भाषा का एक रूप खत्म हो जाता है।लेकिन भाषा का एक रूप वह भी है जो वनस्पति की तरह है।जिस तरह वनस्पति की उम्र लंबी होती है,ठीक उसी तरह भाषा में रचे गए साहित्य की भी उम्र लंबी होती है।जिस तरह वनस्पति में शाखा-प्रशाखाएं होती हैं,उसी तरह साहित्य में भी विभिन्न किस्म की विधाएं होती हैं,विभिन्न माध्यमों की साहित्यिक विधाएं होती हैं।भाषा में हम तथ्य या सूचनाएं भी देते हैं उसी तरह मनोभावों को भी व्यक्त करते हैं।जिस तरह गालियां देते हैं उसी तरह कविता,कहानी आदि भी लिखते हैं।भाषा में गुस्सा,प्रेम,घृणा आदि को भी यथास्थान व्यक्त करते हैं।इसमें ध्वनि और भंगिमाएं भी होती हैं।सभ्यता के विकासक्रम में भाषा के इस रूप से हम बहुत आगे चले आए हैं।भाषा के रूपों के विकास में हमेशा ´मैं´केन्द्र में रहा है। माध्यमों में भी अभिव्यक्ति के विभिन्न विधा रूपों में ´मैं´केन्द्र में है।इसी तरह भाषा में दैनंदिन जीवन ही केन्द्र में नहीं है अपितु ज्ञान भी है।इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे संचार के तकनीकी रूप वस्तुतः भाषा का विस्तार हैं।

सोशलमीडिया में लिखे को साहित्य कहें या न कहें यह सवाल बहस के केन्द्र लाने की जरूरत है। इससे साहित्य के मौजूदा स्वरूप और दायरे का विकास होगा।इस प्रसंग में मुझे रवीन्द्रनाथ टैगोर की साहित्य संबंधी परिभाषा याद पड़ रही है। टैगोर के अनुसार साहित्य का सहज अर्थ है ´नैकट्य अर्थात् सम्मिलन´।भाषा के क्षेत्र में साहित्य का काम है ´हृदय का योग कराना´।टैगोर ने लिखा है, ´मनुष्य को तरह-तरह के उद्देश्यों के लिए मिलना पड़ता है,इसके अलावा मनुष्य को मिलना पड़ता है केवल मिलने के लिए,अर्थात् साहित्य के उद्देश्य से।´नए मीडिया रूप,खासकर सोशलमीडिया की विशेषता है मिलाना। सम्मिलन की इच्छा को नए किस्म के संचार ने प्रमुख बनाया है।जिससे आप मिलना चाहते हैं उससे अब नए मीडियम के जरिए मिलते हैं।ये मीडियम हैं मोबाइल,इंटरनेट,सोशलमीडिया आदि।अब यह आपके ऊपर है कि संचार के दौरान क्या करना चाहते हैं।यह संचार व्यक्ति का व्यक्ति से भी हो सकता है और व्यक्ति का समाज से भी हो सकता है।यह दैनंदिन जीवन से जुड़ा भी हो सकता है और कलात्मक-साहित्यिक भी हो सकता है।यह मन की इच्छाओं पर निर्भर करता है।मनुष्य के पास दो तरह की इच्छाएं हैं,पहला ,सामान्य इच्छा और दूसरा है अद्भुत इच्छा।सामान्य इच्छा को हम दैनंदिन जीवन की भाषा में अभिव्यक्त करते हैं,जबकि अद्भुत इच्छा हमारे साहित्य सृजन का मूलाधार है।अद्भुत इच्छा के कारण ही मनुष्य अपने को संसार में प्रसारित करता है।साहित्य उसी का विराट रूप है।

जब भी कोई नया मीडियम समाज में जन्म लेता है पुराने मीडियम के प्रयोगकर्ता परेशानी महसूस करते हैं। उल्लेखनीय है मानव समाज ने भाषायी और कलात्मक अभिव्यक्ति के जितने भी रूप अब तक पैदा किए वे सभी आज तक बरकरार हैं और कला या साहित्य परंपरा के अंग भी हैं।इनमें वाचिक परंपरा के रूपों से लेकर भित्तिचित्र,भित्तिलेखन तक,विधाओं जैसे कविता से लेकर निजी चिट्ठी-पत्री तक शामिल है,पोथी से लेकर किताब तक,पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सिनेमातक,रेडियो कम्युनिकेशन से लेकर इंटरनेट तक,सोशलमीडिया से लेकर ईमेल तक सब कुछ शामिल है।



साहित्य की परिधि वहां तक है जहां तक भाषा का आकाश फैला हुआ है।दिलचस्प बात यह है कि कम्प्यूटर में कोई काम भाषा के बिना संभव नहीं है।हर चीज पहले भाषा में लिखी जाती है,यहां तक कि रेडियो,टीवी,फिल्म आदि भी भाषा में लिखे जाते हैं,उसके बाद वे हम तक पहुँचते हैं।सभी किस्म के संचार का मुख्य द्वार है भाषा।इसी तरह भाषा का प्रयोग मनुष्य के बिना संभव नहीं है।इसी अर्थ में भाषा मानवीय कार्य-व्यापार की अभिव्यक्ति का मूलाधार है।यह भी कह सकते हैं मनुष्य के बिना भाषा नहीं,भाषा के बिना मनुष्य नहीं।उसी तरह मीडियम के बिना भाषा नहीं होती।भाषा जब रस की सृष्टि करती है तो मनुष्य में मिलने की इच्छा पैदा होती है।उससे मिलन की इच्छा करती है जो सभी कालों के सभी जनों में स्वीकृति पाए।भाषा में जब रस पैदा होता है तो उसे हम अनुभूति कहते हैं और इसी अनुभूति को मनुष्य विभिन्न माध्यमों के जरिए व्यक्त करने को आतुर हो उठता है।भाषा के विभिन्न माध्यमों में जो रूप हम देखते हैं वे मुनष्य ने तब बनाने आरंभ किए जब उसने नैपुण्य की सृष्टि की। नैपुण्य के कारण ही भाषा को अर्थ मिला।इन्द्रियबोध को विभिन्न उपादानों के जरिए व्यक्त करने की संभावनाएं पैदा हुईं।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

गोपेश्वर सिंह यहाँ से देखें


गोपेश्वर सिंह (प्रोफेसर हिंदी विभाग,दि.वि.वि ने जनसत्ता (17अप्रैल2016)में एक लेख”आभासी दुनिया के राग रंग´´ लिखा है, उससे हम विनम्र असहमति दर्ज करते हैं।

आप यदि सोशलमीडिया,मीडिया और साहित्यालोचना के बारे में नहीं जानते तो जाने बिना लिखते क्यों हैं ॽ कम से कम अपने पद की गरिमा का तो ख्याल करें।सोशलमीडिया-मीडिया पर अंगुली उठाकर मूलतःआप अपने निकम्मेपन पर ही अंगुली उठा रहे हैं।सोशलमीडिया और उस पर लिखने वालों पर बेसिर-पैर की बातें लिखकर आपने सोशलमीडिया के संबंध में अपनी अज्ञानता और घृणा का परिचय दिया है,साथ ही साहित्य और सोशलमीडिया ,साहित्यालोचना के ह्रास पर अपनी जो राय रखी है,वह आपके अज्ञान को सामने लाती है। मुश्किल यह है जब कम्युनिकेट करना नहीं आता तो हम ´हाय हाय´, ´पतन पतन´की भाषा बोलने लगते हैं।

जितने भी आधुनिक मीडियम और विधारूप हैं वे आत्मप्रचार के बिना नहीं बनते। किसी में यह मात्रा कम है तो किसी में ज्यादा।आत्मप्रचार या प्रचार ये दोनों संचार के लिए जरूरी तत्व हैं।हिन्दी साहित्य में इन दिनों साहित्यकार,लेखक,आलोचक आदि की जो दयनीय स्थिति नजर आ रही है उसकी जड़ें हिंदीविभाग की संरचना,शिक्षक की वैचारिक संरचना और ज्ञान की विश्वव्यापी परंपरा से उसके अलगाव में है।आलोचना के ह्रास का सोशलमीडिया या मीडिया से कोई संबंध नहीं है।दूसरी बात यह कि साहित्यालोचना कभी अखबारों या सोशलमीडिया से नहीं बनी.दुनिया के सभी प्रमुख आलोचकों ने जो भी आलोचना लिखी है,वह मीडिया से प्रभावित होकर या मीडिया में रहकर नहीं लिखी है।

साहित्यालोचना की दुर्दशा के लिए लेखक-आलोचक-प्रकाशक और हिंदी के शिक्षक सीधे जिम्मेदार हैं।सवाल यह है आलोचकों ने आलोचना लिखनी क्यों बंद कर दी ॽ क्या सोशलमीडिया या मीडिया ने आलोचना न लिखने के लिए दबाव डाला है ॽ या फिर आलोचना न लिखने के लिए कोई फतवा जारी हुआ है ॽ प्रत्येक माध्यम खास ऐतिहासिक परिस्थितियों में जन्म लेता है,यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप जानें कि सोशलमीडिया क्यों और कैसे आया ॽ लेकिन आपकी प्रकृति है कि आप बिना जाने लिखते हैं। यह दोष है,लेकिन हिंदी प्रोफेसरों में बिना जाने लिखना-बोलना अब दोष नहीं माना जाता,हम सभी में यह बीमारी अंदर तक घुस आई है कि हम बिना जाने हर विषय पर बोलने और लिखने को तैयार हो जाते हैं। हर मीडियम की अपनी सर्जनात्मक क्षमता होती है,मीडियम में सर्जनात्मक क्षमता न हो तो वह आम जनता में स्वीकृति अर्जित नहीं कर पाता।सोशलमीडिया की सर्जनात्मक क्षमता अब तक के सभी माध्यमों से कई गुना ज्यादा है।यह मानव सभ्यता का अब तक का सबसे शक्तिशाली माध्यम है।इसमें पहले के सभी माध्यम समाहित हैं।यह माध्यम तिकड़म-घृणा-जोड़तोड़ आदि के आधार पर अपना विकास नहीं करता। सोशलमीडिया वस्तुतः कम्युनिकेशन का मीडियम है।इसमें जो व्यस्त है वह सर्जक है। हिंदी के स्वनामधन्य आलोचकों का इससे कोई संबंध नहीं है।यह सोशलमीडिया है,रीयलटाइम मीडिया है,यह साहित्य नहीं है।यह नए किस्म का कम्युनिकेशन है। यह साहित्य नहीं है।हम जिसे साहित्य कहते हैं वह प्रिंटयुग और उससे पूर्व की विरासत की देन है। सोशलमीडिया और उसके विधारूप भिन्न हैं।उनको पुराने साहित्यरूपों के साथ एकमेक नहीं करना चाहिए। साहित्यालोचना के पतन के कारण सोशलमीडिया में नहीं खोजने चाहिए।साहित्यालोचना के पतन पर हम समय-समय पर बहुत लिख चुके हैं,फुरसत हो तो पढ़ लें।दूसरी बात यह कि सोशलमीडिया आने के बाद पहली,दूसरी,तीसरी साहित्य परंपरा का अंत हो चुका है।साहित्य की मनमानी परंपरा बनाकर जिस रास्ते पर हिंदीवाले चलते रहे हैं उसको हमेशा के लिए दफ्न कर दिया गया है।

सोशलमीडिया के अपने ठाट हैं, अपना मुहावरा है,अपनी सर्जनात्मकता है और विराट संचार का रीयल टाइम फलक है।इसने सामान्य से पाठक को भी शक्तिशाली बनाया है।लेखक को भी ताकत दी है।वे लेखक सोशलमीडिया से शक्ति ग्रहण नहीं कर सकते जोपुराने मीडिया से रीतिवादियों की तरह अभी भी जुड़े हैं।संक्षेप में कहें आपने अनर्गल और अप्रासंगिक लिखा है।सोशलमीडिया के बारे में एक विश्वविद्यालय प्रोफेसर की इस तरह की अज्ञानता सच में पीड़ादायक है।यह स्थिति बदलनी चाहिए।सोशलमीडिया को जानने की कोशिश करें,उस पर रहें ,लिखें,गंभीर लिखें कौन रोक रहा है।सोशलमीडिया का पेट भरने लायक हिंदी आलोचकों-लेखकों के पास बहुत कम सामग्री है।सोशलमीडिया का पेट बहुत बड़ा है।थोड़ा कहा है बहुत जानना।









शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

फ्लाईओवर तबाही और राजनीतिक जबावदेही

        गिरीश पार्क-पोश्ता फ्लाईओवर के एक अंश का कल गिरना ममता सरकार के बारे में बहुत कुछ कहता है। इस फ्लाईओवर का गिरना प्राकृतिक आपदा या ईश्वरलीला नहीं है,बल्कि यह मनुष्यजनित तबाही का आदर्श नमूना है।कोई भी फ्लाईओवर अचानक नहीं गिरता,किसी एक क्षण में नहीं गिरता बल्कि उसके क्षय की प्रक्रिया लंबा समय लेती है,सवाल उठता है कि यह प्रक्रिया इंजीनियरों की नजर से ओझल कैसे रही ॽ उन्होंने समय रहते इसे पकड़ा क्यों नहीं ॽ यह फ्लाईओवर जिस तरह गिरा है उससे पता चलता है कि इंजीनियर इसके निर्माण कार्य के दौरान सजग नहीं थे। इस प्रसंग में महत्वपूर्ण है फ्लाईओवर का अचानक गिरना और व्यापक जनहानि।राजनीति में इसकी जबावदेही होनी चाहिए। यह कहीं न कहीं भ्रष्टाचार का मामला भी है। ममता सरकार अपनी जबावदेही से इसमें बरी नहीं हो सकती।अभी तक समस्त विवरण सामने नहीं आए हैं,लेकिन प्रथमदृष्टया जो चीज नजर आ रही है कि इसके निर्माण में कहीं न कहीं गफलत हुई है,घोटाला हुआ है,निर्माण के नियमों का उल्लंघन हुआ है।यह घटना सामान्य रूटिन दुर्घटना नहीं है,बल्कि असामान्य घटना है,यह घटना बताती है कि ममता सरकार विकास के प्रति किस तरह केजुअल रवैय्या रखती है।साथ ही वह राजनीतिक दुरूपयोग करने से भी बाज नहीं आ रही।ममता बनर्जी ने कल जिस तरह का बयान दिया वह दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।कायदे से इस घटना से जुड़े अफसरों,इंजीनियरों,मंत्री आदि के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी होना चाहिए।साथ ही जो मंत्रालय इससे जुड़ा है उसके संबंधित अफसर और मंत्री को सीधे गिरफ्तार किया जाना चाहिए,साथ ही फ्लाईओवर बनाने वाली कंपनी के मालिक को गिरफ्तार किया जाना चाहिए।इस घटना को घटे इतना समय हो गया लेकिन ममता सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।ममता सरकार जिस तरह अपराधियों और जिम्मेदार लोगों को बचाने में लगी है उससे लगता है ममता के मुख्यमंत्री रहते इस घटना से जुड़े अफसर कभी पकड़े नहीं जाएंगे। राजनीतिक तौर पर ममता सरकार इस तबाही के लिए सीधे जिम्मेदार है और उसे विधानसभा चुनाव में हराकर ही इस फ्लाईओवर तबाही के लिए जिम्मेदार लोगों को दण्डित कराना संभव होगा।



बुधवार, 30 मार्च 2016

"गलतबयानी" से सच नहीं बदलता किरन खेरजी !


किरन खेरजी आप सांसद एवं अभिनेत्री हैं।हम आपकी बहुत इज्जत करते हैं।लेकिन आज कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू ,अध्यक्ष के 1984 के बयान पर आपका बयान देखकर हमें बहुत तकलीफ हुई।

आपको हमने पहले कभी 1984 के कातिलों पर बोलते नहीं सुना,वरना,आप जानती ही हैं कि उसमें कांग्रेस के अलावा आपके दल के लोगों के नाम भी मीडिया में सामने आए थे ,हाल ही में एक आरटीआई से यह रहस्य सामने आया था कि 1984 के दंगों में संघ के कुछ लोगों ने हिस्सा लिया था लेकिन उनके खिलाफ पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।पता नहीं आपको यह खबर सामने आने के बाद आपको संघ पर गुस्सा क्यों नहीं आया ॽ आपको यदि 1984 के हत्यारों से सच में घृणा है तो आपको तो भाजपा को छोड़ देना चाहिए !

कन्हैया कुमार ने 1984 के दंगों का राजनीतिक विवेचन करते समय चूक की , उसे यह चूक नहीं करनी चाहिए,लेकिन किरनजी वह दंगा करने नहीं गया,उसका दल (भाकपा या एआईएसएफ) भी कभी साम्प्रदायिक दंगे करने नहीं गया,1984 के दंगों में भी शामिल नहीं था,लेकिन कांग्रेस-आररएसएस के लोग तो शामिल थे।यह हमने मीडिया में ही नहीं पढ़ा अपने छात्र जीवन में जेएनयू , दिल्ली , में पढ़ते हुए,सिख नरसंहार पीडिताओं के मुँह से शरणार्थी शिविरों में प्रत्यक्ष सुना है। मैं उन दिनों जेएनयूएसयू का अध्यक्ष था,कन्हैया कुमार,जेएनयूएसयू,की उसी परंपरा का वारिस है।जिस तरह आप आरएसएस-भाजपा की परंपरा की वारिस है।

किरनजी आप सोचकर देखें आप कहां खड़ी हैं और कन्हैया कुमार कहां खड़ा है ॽआप हत्यारों के साथ हैं और कन्हैया सिख नरसंहार में मदद करने वालों की परंपरा में खड़ा है।आपको 1984 के दंगे पर बोलते समय सबसे पहले अपने नीचे की जमीन देखनी चाहिए ,आपके नीचे की जमीन में सिखों के हत्यारों के चिह्न मिलेंगे,जरा एकबार चप्पलें उतार जमीन पर ठीक से पैर उठाकर तो देखें कि आप किनके ऊपर खड़ी हैं ॽ किस परंपरा के साथ जुड़ी हैं ॽ

किरनजी, मैं नहीं कहता आप दंगाई हैं,मैं नहीं कहता आप अमानवीय हैं,लेकिन मैं आपसे यह उम्मीद तो कर ही सकता हूँ कि कभी हत्यारों को पुलिस के हवाले करवाने में आरएसएस पर दबाव डालेंगी,कम से कम से कम जिन आरएसएस वालों के नाम पुलिस केस दर्ज नहीं हुआ उनके खिलाफ केस दर्ज कराने की कोशिश करेंगी।मैं चाहता हूं पहले आप कांग्रेस-आरएसएस के 1984 के हत्यारों के नामोल्लेख करते हुए बयान तो जरूर दें।

किरनजी, आपने अकारण कन्हैया कुमार को कोसा है कि वह अपनी माँ का ख्याल करे,इत्यादि इत्यादि। मैं कन्हैया को नहीं जानता,मैं उससे कभी नहीं मिला,मैंने उसकी माँ को टीवी पर सुना है,उसके बयान को सुनकर यही लगा कि कन्हैया कुमार जो कुछ कर रहा है वह अपनी माँ के सपनों के अनुरूप ही कर रहा है।आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कन्हैया की मां देखने में सरल,सीधी महिला है लेकिन चेतना में क्रांतिकारी है।आप क्रांतिकारी माताओं से नहीं मिली हैं इसलिए उनके सपनों के बारे में नहीं जानतीं, कभी समय निकालकर कन्हैया कुमार की माँ से जाकर मिलकर देखो और जानने की कोशिश करो कि वह महिला क्या सोचती है अपने पुत्र के बारे में !



किरनजी ,आप कलाकार हैं,लेकिन कन्हैया के 1984 के बयान पर आपकी कलाकारी रंग नहीं दिखा पाई!! आपको दीक्षा अच्छी नहीं मिली,अच्छी ट्रेनिंग रही होती तो कन्हैयाकुमार ने बहुत कुछ बोला है मोदीजी के बारे में उसकी तीखी आलोचना करतीं,लेकिन आपको तो किसी ने सिखा दिया कि 1984 के बयान पर कन्हैया को घेर लो,लेकिन आपको तो मालूम है वो नटखट कन्हैया है,चट से दुरूस्त कर लेता है,उसने बयान की चूक को दुरूस्त कर लिया,आपने दुरूस्त अंश को क्यों नहीं पढ़ा ॽ आप अभिनय करें लेकिन पूरी स्क्रिप्ट देखकर ! अधूरी स्क्रिप्ट से अभिन्य भी अधूरा ही रहता है,आप कलाकार है,आप मेरी बात को गंभीरता से लेंगी,कन्हैया ने बयान दुरूस्त कर लिया है उसे आगे बढ़ने का साहस देंगी!!

वे वाम का साथ छोड़कर क्यों चले गए ॽ



     पश्चिम बंगाल के चुनाव में टीएमसी के खिलाफ दो साल पहले किए गए नारद वीडियो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए किसी भयानक राजनीतिक उथल-पुथल की कुछ लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।हमारा अनुमान है ऐसा कुछ भी नहीं होगा।पश्चिम बंगाल के लोग,खासकर मध्यवर्ग के अंदर इस वीडियो के आने के बाद कोई आक्रोश नजर नहीं आ रहा,यहां के लोग करप्शन से बेखबर हैं,करप्शन देखते हैं,झेलते हैं,सामंजस्य बिठाते हैं और जी रहे हैं,करप्शन को लेकर सारे देश में यही दशा है।जनचेतना की  भयावह स्थिति है कि सारधा चिटफंड कांड में टीएमसी के अधिकांश बड़े नेताओं के लिप्त होने के बावजूद वाममोर्चा कोई विशाल जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ रहा,हां,उसने निरंतर प्रतिवाद जरूर किया,लेकिन जिस स्केल पर लोग चिटफंड घोटाले से लोग प्रभावित हुए हैं उसकी तुलना में दशांश को भी जुलूसों में खींच नहीं पाया,यहां तक कि विधानसभा उपचुनावों में टीएमसी को हराने सफल नहीं हुआ।नगरपालिका चुनावों  में हरा नहीं पाया।ऐसी स्थिति में नारद वीडियो स्टिंग कोई जादू कर देगा हमें नहीं लगता।
     सवाल यह है वाम के साथ जो सामाजिक शक्तियां थीं,जो सामाजिक संतुलन था,वह आज क्यों नहीं है चुनावों की सारी लड़ाई सामाजिक संतुलन को पक्ष में करने की लड़ाई है।ममता ऐन-केन-प्रकारेण सामाजिक संतुलन को अपनी ओर झुकाने में सफल रही है और यही उनके नेतृत्व की सफलता है।

सवाल यह है जो सामाजिक शक्तियां वाम के साथ थीं वे किन कारणों से वाम को छोड़कर चली गयीं मसलन्,शरणार्थी बंगालियों के पुनर्वास में वाम ने सक्रिय भूमिका निभायी और उनकी आर्थिक-सामाजिक शक्ति के विकास में हर संभव मदद की,एक जमाना था ये लोग बेहद गरीब थे,लेकिन वाम जमाने में इनके आर्थिक हालात बदले,इनमें मध्यवर्ग पैदा हुआ,संपत्ति पैदा हुई,लेकिन वामचेतना का विकास न हो सका।वे सिर्फ वोटबैंक बने रहे।लेकिन ज्योंही वाम के खिलाफ सिंगूर-नंदीग्राम आंदोलन के कारण हवा बहने लगी,ये लोग वाम को छोड़कर चले गए।यही हाल शिक्षकों का है। शिक्षकों एक बड़ा वर्ग वाम के साथ था।लेकिन आज वे लोग भी साथ नहीं हैं। जबकि शिक्षकों पर कोई जुल्म नहीं हुआ,इसके बावजूद वे वाम को छोड़कर क्यों चले गए सरकारी कर्मचारियों के संगठन में भी यही हाल है।यह वह वर्ग है जो सचेतन कहलाता है,आर्थिक रूप से सुरक्षित है,इसको कोई खतरा न तो वाम के जमाने में था और न ममता के जमाने में था,फिर यह वर्ग वाम को क्यों छोड़कर चला गया वाम ने कभी सार्वजनिकतौर इन वर्गों के वाम-विमुख हो जाने की समीक्षा नहीं की,क्यों नहीं की ॽक्या बंगलादेशी शरणार्थियों में आई समृद्धि का वाम के नजरिए से कोई अंतर्विरोध है ॽक्या शिक्षकवर्ग के वाम-विमुख होने का वाम के नव्य-आर्थिक उदारीकरण के विरोध और केन्द्र के समान छठे वेतन आयोग के अनुसार नए वेतनमान में केन्द्र के समान महंगाई भत्ता न देने के वाम सरकार के फैसले के साथ कोई संबंध है ॽ जी हां,गहरा संबंध है।इस तरह के फैसलों ने वाम के जनाधार को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है और वाम ने अपनी आज तक आत्मालोचना नहीं की है। समस्या को जानकर भी उसके बारे में चुप रहना वाम की विशेषता है,जबकि आम जनता उत्तर चाहती है।समस्या के समाधान सुझाए बगैर वाम को आम जनता दोबारा आसानी से सत्ता पर पहुँचने नहीं देगी।वाम अपना स्टैंड साफ करे कि उसने केन्द्र के बराबर राज्य कर्मचारियों को महंगाई भत्ता क्यों नहीं दिया ॽ भविष्य में देगा या नहीं ॽ आज राज्य में कॉलेज-वि वि लेक्चरर केन्द्र की तुलना में 25हजार रूपये कम पाता है, प्रोफेसर 60रूपये कम पाता है,यह सीधे वामशासन में लागू की गयी वेतननीति का भयानक परिणाम है।यह साधारण बात नहीं है जिसे दरकिनार किया जाए।माकपा के लोग देस में अन्यत्र जितना वेतन पाते हैं पश्चिम बंगाल में माकपा के और अन्य शिक्षक उनसे काफी कम वेतन पाते हैं।यह माकपा के द्वारा किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।  

लोकतंत्र ,जुल्म और बंगाल


        पश्चिम बंगाल विधानसभा के 2016 के चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण हैं,इस चुनाव का भारतीय राजनीति पर दूरगामी असर हो सकता है।इसबार के चुनाव में कई नई चीजें नजर आ रही हैं जो पहले कभी नहीं देखी गयीं।पहलीबार वाममोर्चा और कांग्रेस के बीच में चुनाव गठबंधन हुआ है,इस तरह का गठबंधन पहले कभी नजर नहीं आया।जमीनी स्तर पर इस मोर्चे ने मिल-जुलकर काम करने की कोशिश की है,इसे आम भाषा मे सिलीगुड़ी लाइन कहते हैं। सबसे पहले सिलीगुडी नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस-वाम ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उसके परिणाम बेहतर रहे।वाम को वहां विजय मिली।सिलीगुडी लाइन से प्रेरित होकर काफी पहले वाम-कांग्रेस गठबंधन का मन बना चुके थे।

यह पहलीबार हुआ कि राजनीतिक सिद्धांतों को इस मोर्चे के निर्माण में सिलीगुड़ी में आड़े नहीं आने दिया गया,बाद में यही चीज समूचे राज्य में नजर आ रही है।लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलता जितनी जरूरी है उतना ही जरूरी है सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य ।लेकिन इसबार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सफलता हासिल करना इतना जरूरी हो गया है कि माकपा जैसा सिद्धांतनिष्ठ दल खुलकर इस गठजोड़ के प्रति सैद्धांतिक ढ़ांचा प्रस्तावित नहीं कर पाया,यह माकपा की सबसे बड़ी कमजोरी है।कायदे से संध्याभाषा में पश्चिम बंगाल पर बातें करने से माकपा के केन्द्रीय नेतृत्व को बचने की जरूरत थी और खुलकर यह बताने की जरूरत थी कि उनको कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ना क्यों जरूरी है ॽ लेकिन माकपा ने ऐसा नहीं किया। इससे माकपा जैसे सिद्धांतनिष्ठ दल की कमजोरी ही सामने आई है,जबकि पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस से कमजोर दल आज भी नहीं है।

सवाल यह है कि क्या राजनीति में सैद्धांतिक पारदर्शिता जरूरी है ॽ यदि हां तो उसका आधार कहां है ॽइस बात को कहने का यह आशय नहीं है कि वाम को कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।यह माकपा-कांग्रेस तय करें लेकिन कागज पर सैद्धातिकतौर पर परिभाषित तो करें कि वे क्यों और किन परिस्थितियों में मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं ॽ जनता की मांग है,जनता चाहती है,इसलिए वाम-कांग्रेस गठबंधन या सीट समझौता हुआ है,यह सब कहकर सिद्धांतहीनता का प्रदर्शन न करें।कांग्रेस एक सिद्धांतहीन दल है,लेकिन माकपा से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते ! भविष्य में कम्युनिस्ट आंदोलन का जो लोग मूल्यांकन करेंगे उनके लिए यह मुश्किल रहेगी कि वे माकपा-कांग्रेस इस गठजोड़ के सैद्धांतिक राजनीतिक दस्तावेज कहीं पर भी नहीं देख पाएंगे। राजनैतिक व्यवहारवाद को इस गठजोड़ का मूलाधार बना दिया गया है।

कांग्रेस-वाम की पश्चिम बंगाल में राजनीतिक एकता का एक धागा जिस तरह सिलीगुड़ी लाइन से जुड़ा है उसी तरह उसका दूसरा धागा हाल के पूना-हैदराबाद-जेएनयू के छात्र आंदोलन से भी जुड़ा है। तीसरा धागा मोदी सरकार की अ-लोकतांत्रिक और अधिनायकवादी नीतियों के खिलाफ संसद में वाम-कांग्रेस की संयुक्त कार्रवाईयों से भी जुड़ा है। इन तीनों ही धागों से मिलकर वाम-कांग्रेस का पश्चिम बंगाल में जमीनी राजनीतिक समझौता हो पाया है।

पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई यह है कि ममता सरकार ने हर मोर्चे पर निकम्मेपन और अपराधीकरण का प्रदर्शन किया है।अपराधियों ने राजनीति को बंधक बना लिया है।खासकर ममता सरकार आने के बाद हर क्षेत्र में अपराधीकरण बढ़ा है,अपराधियों के हमले बढ़े हैं।पुलिस और प्रशासन का दुरूपयोग बढ़ा है।ममता सरकार खुलेआम अपराधियों को संरक्षण देती रही है,औरतों पर अत्याचार बढ़े हैं,बुद्धिजीवियों में सत्ताभक्ति बढ़ी है,गांवों से लेकर शहर तक खुलेआम गुण्डों का दबदबा बढ़ा है।शिक्षित बंगाली मध्यवर्ग ,खासकर लेखकों,बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ भय के कारण बोलना बंद कर दिया है।त्रासद पक्ष यह है कि बुद्धिजीवी अपराधियों के संरक्षण में जीने को अभिशप्त हैं।अपराधी किस्म के लोग हर स्तर पर प्रशासन में काम करने वालों को निर्देश दे रहे हैं कि वे क्या करें और क्या न करें।बौद्धिकों का इस तरह का पतन पहले कभी नहीं देखा गया।इससे बंगाल की सांस्कृतिक-बौद्धिक इमेज क्षतिग्रस्त हुई है।समाज में दब्बूपन बढ़ा है।यह वही दब्बूपन है जिसको अपने अंतिम वर्षों में वामशासन में अपराधियों ने पैदा किया था।अपराधियों का सामाजिक क्षितिज पर निर्णायक बन जाना असल में वामयुगीन फिनोमिना है,जो अपराधी एक जमाने में वाम के साथ थे, वाम के चुनाव हारते ही ममता की छत्रछाया में चले गए,इन अपराधियों के कारण वाम को चुनावों में हारना पड़ा,यही अपराधी इसबार ममता के गले की हड्डी बन गए हैं।

सवाल यह है अपराधियों के खिलाफ वाम-कांग्रेस गठबंधन क्या कड़ा रूख अपनाएगा ॽ क्या वे यह वायदा करेंगे कि अपराधियों को संरक्षण नहीं देंगे ॽ पश्चिम बंगाल की जमीनी सच्चाई है अपराधी गिरोह विभिन्न इलाकों में सक्रिय हैं और वोट बैंक नियंत्रित करते हैं।वोट बैंक का नियंत्रण इस तरह देश में अन्यत्र नजर नहीं आता। इस अपराधीकरण पर तकरीबन सभी दल चुप हैं,जबकि सभी मसलों पर थोड़ी बहुत बातें हो रही हैं।यहां तक कि मीडिया कवरेज से भी अपराधी गिरोह गायब हैं। कम से कम मीडिया में विभिन्न इलाकों में सक्रिय अपराधी गिरोहों के काले कारनामों को प्रकाशित करने का काम होना चाहिए।लोकतंत्र को भय मुक्त करने का सबसे आसान पहला कदम है अपराधी गिरोहों की नामों के साथ पहचान को मीडिया में उदघाटित किया जाए।बिना अपराधियों को एक्सपोज किए बंगाल में लोकतंत्र नहीं बचा सकते।तकरीबन 86हजार वारंट कटे हुए लोग राज्य में खुलेआम घूम रहे थे,इनमें से रीयलसेंस में अभी भी 38हजार बाहर हैं,कहा जा रहा है बाकी को चुनाव आयोग के दबाव में पकड़कर बंद कर दिया गया ,लेकिन जमीनी हकीकत बता रही है कि अपराधी खुलेआम बाहर घूम रहे हैं,जिनके एक साल से ज्यादा समय से वारंट कटे हुए थे उनमें से अधिकांश बाहर हैं और सरेआम जनता को धमकाने का काम कर रहे हैं।ऐसी अवस्था में विधानसभा चुनाव में हिंसा का होना,गांवों,मुहल्लों में आतंक का होना स्वाभाविक है। अनेक इलाकों में टीएमसी के नेतागण गांव वालों के मतदादा पहचान पत्र घरों से जबर्दस्ती छीनकर ले गए हैं,अफसरों को कहा गया है कि सत्तारूढ़ टीएमसी के पक्ष में काम करो,मतदान कराओ। जिन इलाकों में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं वहां पर पुलिस निष्क्रिय दर्शक बनी हुई है।केन्द्रीय पर्यवेक्षक और केन्द्रीयबलों के आने के बावजूद हिंसक हमले बंद नहीं हुए हैं। आतंक-भय कम नहीं हुआ है। खासकर वाम-कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर अनेक इलाकों में दीवारलेखन से लेकर मीटिंग न करने देने के लिए टीएमसी के लोगों ने हमले किए हैं। निचले स्तर टीएमसी के छद्म संगठनों द्वारा झुग्गी-बस्ती इलाकों में भजन-कीर्तन के आयोजन किए जा रहे हैं,यह हिन्दूवोटरों को जोड़ने की साम्प्रदायिक कोशिश है। इलाके के लोगों में सामूहिक भोज कराए जा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों का कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा।



इसबार के चुनाव में कांग्रेस-वाम के पास कैडर या कार्यकर्ताओं का अभाव सहज ही देखा जा सकता है। बड़े पैमाने पर माकपा के कैडरों ने टीएमसी में शामिल होकर माकपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक जमाना था माकपा के पास इफरात में कैडर हुआ करते थे,आज टीएमसी के पास कैडर है।सांगठिक हथियारबंद लोग हैं जो एक ही इशारे पर कहीं पर भी जाकर एक्शन कर सकते हैं।यह वह टीम है जो नंदीग्राम-सिंगूर आंदोलन के दौरान बनायी गयी थी।इस टीम में तकरीबन 10हजार लोगों के होने का अनुमान है।इसके अलावा दलालों,बिल्डरों,ठेकेदारों,चिटफंड एजेंट, पुलिस अफसरों के एक अंश का ममता को खुला सहयोग हासिल है।इसने निचले स्तर पर वाम-कांग्रेस के प्रचार को बाधित किया हुआ है।अब देखना यह है कि वाम-कांग्रेस गठजोड़ किस तरह इस नाकेबंदी को तोड़ता है।एक तथ्य साफ है यदि शांतिपूर्ण मतदान होता है तो ममता नहीं जीतेगी।

रविवार, 27 मार्च 2016

जेएनयू और छिपाने की कला


        जेएनयू का 9फरवरी2016 का मुद्दा राजनीतिक-डिजिटल है।राजनीतिक आयाम समझ में आ रहेहैं उन पर बहस भी हो रही है।लेकिन डिजिटल दुरूपयोग के आयाम खुलने बाकी हैं। जिस समय 9फरवरी की घटना घटी उसी दिन मौके पर पुलिस मौजूद थी,कोई वीडियोग्राफर भी था,लेकिन तत्काल किसी ने पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं की।पुलिस ने मौके पर रहते हुए किसी की गिरफ्तारी नहीं की,यहां तक कि बाद में भी पुलिस ने किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करायी।चूंकि घटना कैम्पस में हुई थी अतःइस घटना पर विश्वविद्यालय की एफआईआर दर्ज कराने की जिम्मेदारी बनती है लेकिन वि.वि. ने भी इस घटना पर पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं करायी,यही वह बिंदु है जहां से जेएनयू की 9फरवरी की घटना एक नियोजित सत्ता षडयंत्र प्रतीत होती है।जो भी शिकायतें या एफआईआर पुलिस में हुई हैं वे भाजपा के सांसद और एबीबीपी के जेएनयू नेताओं ने करायी हैं।जबकि तकनीकी तौर पर वे इसके लिए अधिकारी नहीं हैं। असल में ,डिजिटल मेनीपुलेशन के जरिए जेएनयू के छात्रों,वि.वि.समुदाय और शिक्षकों के साथ समूचे वि.वि. को बदनाम करने की कोशिश की गयी।जेएनयू के 5 छात्रनेताओं ,जिनमें छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार शामिल है,को राष्ट्रद्रोह के झूठे मुकदमे में फंसाया गया और कन्हैया को जेएनयू से गिरफ्तार किया गया,सारे कैम्पस में पुलिस ने छापे मारे,तलाशी ली।सबसे खतरनाक बात हुई कि 9फरवरी2016 की घटना के एक वीडियो का कई टीवी चैनलों ने जमकर दुरूपयोग किया और जबकि यह वीडियो मेनीपुलेशन से तैयार किया गया था।फेक वीडियो था।

इस समूचे प्रसंगने राजनीतिक शत्रुता के लिए डिजिटल दुरूपयोग की नई मिसाल कायम की,इस तरह के डिजिटल मेनीपुलेशन की हरकतें मुजफ्फरनगर के दंगों के समय भी हुई हैं। राजनीतिक शत्रुता के लिए डिजिटल को औजार की तरह इस्तेमाल करने की इस तरह की हरकतों ने डिजिटल सचेतनता के सवालों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है।इस तरह की घटनाओं ने यह भी साफ कर दिया है कि आरएसएस डिजिटल मेनीपुलेशन में बादशाह है।

डिजिटल मेनीपुलेशन नए किस्म का खतरा है जो जमीनीस्तर पर कलह पैदा करता है। आजकल घटनाएं घट रही हैं लेकिन हम नहीं जानते कि क्या हो रहा है ॽक्यों हो रहा है ॽकौन लोग कर रहे हैं ॽघटना हो रही हैं लेकिन हम उसके ´तथ्य´और ´सत्य´को नहीं जानते।असलमें, हम सब राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं।राजनीतिक लक्ष्यों से भी दूरी बनाकर रखते हैं इसलिए नहीं जानते कि यह सब क्यों हो रहा है। साम्प्रदायिक- विभाजनकारी-आतंकी संगठनों से लेकर समर्थ भाजपा जैसा दल भी डिजिटल मेनीपुलेशन का जमकर इस्तेमाल कर रहा है। इसे ´´तकनीकी विभ्रमवाद´´कहे तो बेहतर होगा।इसका दायरा इराक,बोस्निया,अफगानिस्तान से लेकर जेएनयू तक के घटनाक्रम तक फैला हुआ है। इस दौर में जो हमले हो रहे हैं उनमें एक ओर से सत्ता हमलावर है तो दूसरी ओर हमलावर मीडिया है। लोकतांत्रिक हकों पर हमले को ´राष्ट्रसेवा´ या ´राष्ट्रवाद´कहा जा रहा है।अंधविश्वास के खिलाफ बोलने वालों पर बर्बर हमले किए जा रहे हैं।इन हमलों को वैचारिक ´श्रेष्ठत्व´कहा जा रहा है।जिन घटनाओं पर माफी मांगनी चाहिए उन पर नेतागण हेकड़ी और अहंकार से उनकी हिमायत में बोल रहे हैं।

आयरनी यह है सत्ता के हमलों को लोकतंत्र कहा जा रहा है,कानून के दुरूपयोग को न्यायपालन कहा जा रहा है।मीडिया और साइबर हमलों के जरिए सभी किस्म के कानूनों को मुक्ति दे दी गयी है।सभ्यता के मानकों को त्यागकर अधिकांश मीडिया ने आतंक का मार्ग ग्रहण कर लिया है। इसे साइबर डी-रेगूलेशन कह सकते हैं।जिसके आधार पर इराक से लेकर सीरिया तक स्वचालित मिसाइलों के हमले हो रहे हैं ,और कानूनभंग हो रहा है,´हमलावर´ को क्षमादान दे दिया गया है। ´हवाई ट्रांसपोर्ट ´और ´साइबर संचार´का पूरी तरह ´डी-रेगूलेशन´करके ग्लोबल पूंजीवाद ने नई परिस्थितियों को पैदा किया है। शांति स्थापना के नाम पर सेना और हथियारों के जरिए घेराबंदी और हमले,देश में शांति के नाम पर हिन्दुत्ववादियों के हमले,कुल मिलाकर त्रासद समय की सृष्टि कर रहे हैं।

पहले ´मतभेद´ होते थे तो उनको सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करते थे,लोग सुनते थे,लेकिन नयी संस्कृति है ´हमला करो´, ´हिंसा के जरिए´ ´कानूनी आतंक´के जरिए मुँह बंद करो। पहले राजनैतिक विवाद को जमीनी स्तर पर हल करने या जीत हासिल करने की कोशिश की जाती थी लेकिन इन दिनों विवाद को सत्ता के तंत्र के जरिए,बाहुबल के जरिए हल करने की कोशिशें हो रही हैं।पहले प्रतिवाद करने वाले का सम्मान करते थे,इन दिनों उसके खिलाफ घृणा प्रचार हो रहा है।जेएनयू की घटना इस फिनोमिना का आदर्श उदाहरण है। पहले प्रतिवाद का सम्मान करते थे, इन दिनों प्रतिवाद का अपमान करते हुए प्रतिवाद का प्रतिवाद करते हैं।इस बहाने प्रतिवाद से ही वंचित करने की कोशिशें हो रही हैं।इस हठकंडे का आरएसएस जमकर इस्तेमाल कर रहा है।अब खबरों को भी मैन्युफेक्चर किया जा रहा है,इनके आधार पर हिन्दूभारत के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं।

इन दिनों ´विवादों´में राजसत्ता का हस्तक्षेप सबसे बड़ी चुनौती है।जेएनयू के मसले पर यह तत्व सबसे उग्र रूप में सामने आया है, राजनेताओं,केन्द्रीय मंत्रियों और पुलिसतंत्र के जरिए जिस तरह स्थानीय छोटी समस्या में मोदी सरकार ने हस्तक्षेप किया है वह अपने आपमें लक्षण है कि संघ किस तरह की राजनीति कर रहा है।संघ सीधे सत्ता के जरिए नाकेबंदी करके हस्तक्षेप कर रहा है,तथाकथित आम सहमति के नाम पर आतंक पैदा कर रहा है,अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित कर रहा है। इसके अलावा संघ के दबाव में लेखकों के कॉलम बंद कराए जा रहे हैं,किताबों की खरीद-फरोख्त में विचारधारा के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं।ये सब चुप कराने के तरीके हैं।

दिक्कत यह है कि अब हर चीज तेजगति से आ रही है। तेजगति से ही संघ के हमले हो रहे हैं। जो तेजगति के मंत्र जानता है वह तो इन हमलों से बच सकता है जो नहीं जानता वह इन हमलों में मर सकता है। विश्व परिप्रेक्ष्य में देखें तो मानवाधिकार बचाने के नाम पर युद्ध हो रहे हैं।लेखक,संस्थान और राष्ट्र की संप्रभुता पर हमले हो रहे हैं।क्षेत्र,राष्ट्र-राज्य और मनुष्य की संप्रभुता खतरे में है।धर्मनिरपेक्षता और संविधान पर संविधान का नाम लेकर हमले किए जा रहे हैं।´हस्तक्षेप´को परम पुनीत कर्त्तव्य के रूप में पेश किया जा रहा है।जो लोग आरएसएस के खिलाफ हैं उनके खिलाफ सूचना युद्ध की घोषणा हो चुकी है।इस काम में कारपोरेट मीडिया और इंटरनेट का सुनियोजित ढ़ंग से इस्तेमाल हो रहा है।

हमें नए युग की प्रक्रियाओं को बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।खासकर ´कम्प्यूटर विवेकवाद´ के नजरिए से देखना चाहिए। ´कम्प्यूटर विवेकवाद´ के बहाने नए किस्म के विवेकवाद को आरोपित किया जा रहा है।यह वह विवेकवाद है जिसे कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के जरिए थोपा जा रहा है।इसका आरंभ युद्ध में स्वचालित मिसाइलों के प्रयोग से हुआ।आज यह साइबर सत्ता का सबसे प्रभावशाली औजार है।इसका जनक है कम्प्यूटर इंजीनियरिंग,और भोक्ता है शासकवर्ग।इसके जरिए सुनियोजित ढ़ंग से रेशनेलिटी को ´स्पेस´से लेकर दैनंदिन जीवन तक आरोपित किया जारहा है।इसे ´साइबर हमलावर´ कहें तो अत्युक्ति न होगी।

´साइबर हमलावर´वे हैं जिनका कोई सामाजिक दायित्व नहीं है।संविधान,कानून,संसद,समाज आदि किसी के प्रति ये लोग जबावदेह नहीं हैं।पॉल विरिलिओ के अनुसार यह ऐतिहासिक ´शिफ्ट´ है. पहले जो लोग हस्तक्षेप थे उनको आप जानते थे,उनकी भूमिका थी,दायित्व तय थे। लेकिन आज ऐसा नहीं है,आज सारा कार्य-व्यापार ´वर्चुअल स्पेस ´ से संचालित है।वहीं से चीजें देखी जा रही हैं और वहीं से ´एक्शन´ तय हो रहे हैं। इस तरह के हस्तक्षेप के बारे में पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है।आज सत्ता को परिभाषित करने के रूप बदल गए हैं।इनमें वर्चुअल स्पेस की बड़ी भूमिका है। ´वर्चुअल स्पेस´ के जरिए व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक सबकी संप्रभुता पर हमले किए जा रहे हैं।पहले राष्ट्र संरक्षक था ,लेकिन इन दिनों राष्ट्र हमलावर है।आजकल वर्चुअल स्पेस बहुत महत्वपूर्ण है ,इसे भौगोलिक क्षेत्रफल के पूरक के रूप में देखना चाहिए ।इसी तरह साइबर अभिव्यक्ति को अभिव्यक्ति के पूरक के रूप में देखना चाहिए।पहले हस्तक्षेप के जरिए बहस या संवाद करने में मदद मिलती थी, लेकिन अब हस्तक्षेप का मतलब है ´तर्कहीनता´ और ´अन्य´के स्पेस का खात्मा।अब ऐसा माहौल बना है जिसमें ´अन्य´ अप्रासंगिक है। हस्तक्षेप के नाम पर आवाज बंद की जा रही है।इससे समूचा समाज टेंशन में है।यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसमें जेएनयू और रोहित वेमुला के आंदोलन को देखने की जरूरत है।

एक तरफ मीडिया नियंत्रण बढ़ा है,वहीं दूसरी ओर साइबरसंसार के विकास के साथ ´साइबर लॉजिक बम´से हमले किए जा रहे हैं।इससे अराजकता बढ़ी है। असल में सारी चीजें ´ग्लोबल सूचना वर्चस्व´ के परिप्रेक्ष्य में विकसित हो रही हैं।इस सिस्टम की विशेषता है हर चीज को रीयल टाइम में खोजना,निशाना बनाना और वर्चुअल हमले करना। ´ग्लोबल सूचना वर्चस्व´ के तीन प्रमुख तत्व हैं,1.देश के ऊपर स्थायी उपग्रह प्रणाली की स्थापना,2.सूचना का रीयल टाइम में स्थानांतरण और प्रसारण,3.डाटा का तेजी के साथ विश्लेषण,खासकर विभिन्न चैनलों,माध्यमों आदि के जरिए आ रहे डाटा का तुरंत विश्लेषण ।

विरिलिओ कहते हैं यह असल में ´बिना दीवारों के किले´ का युग है।यह अंतरिक्ष श्रेष्ठता का युग है।जहां भी ’टकराव´ हो वहां अबाध हमले किए जाएं।साइबर स्मगलिंग पर जोर दिया जाए।पुराने संस्कारों, जिनमें धर्म भी आता है,उस पर कुछ न कहो।मसलन्, कोसोवो में बड़े पैमाने पर कब्रें खोज निकाली गयीं,उनकी सैटेलाइट इमेजों की वर्षा की गयी,लेकिन एबीसी टीवी चैनल ने एक भी कब्र नहीं दिखाई। पेंटागन से सैटेलाइट के जरिए यह दिखाया गया कि कोसोवो में पहाड़ों पर रहने वाले लोग पलायन कर रहे ये लोग ´जनसंहार´के डर से भाग रहे थे।जबकि बताया गया कि वे ´उत्पीडन´के कारण भाग रहे हैं। यह भी कहा गया कि अमेरिका का काम है ´अपराधी´खोजना। ठीक यही पद्धति जेएनयू के 9फरवरी के घटनाक्रम पर लागू की गयी।अचानक एक वीडियो ,फिर दूसरा और फिर तीसरा,चौथा.पांचवां वीडियो साइबर स्पेस में अवतरित होता है और जेएनयू पर हमले शुरू हो जाते हैं।किसी भी मीडिया घराने ने घटनास्थल पर जाकर सत्य जानने की कोशिश नहीं की,नारे लगाने वालों को कभी टीवी पर दिखाया नहीं, पुलिस घटनास्थल पर मौजूद थी लेकिन किसी भी नारे लगाने वाले को पकड़ा नहीं,यहां तक कि संघ के लोगों ने भी नहीं पकड़ा।साइबर से लेकर मीडिया तक जेएनयू पर जिस तरह का मीडिया हमला हुआ है वह टिपिकल ´मीडिया संहार´है,इसका लक्ष्य है जेएनयू को कलंकित करना,बदनाम करना,राष्ट्रविरोधी संस्थान बताना।संभवतःआजाद भारत में किसी वि.वि. पर इतना व्यापक हमला पहले कभी नहीं हुआ।यह हमला परंपरागत जासूसी,हमले,अफवाह आदि के हथकंडों से परे है। कम्प्यूटर की भाषा में यह ´ऑप्टिकल हमला´ है ,यह ऐसा हमला है जिसमें जेएनयू पर तो कड़ी निगरानी है ही,जेएनयू आंदोलन का समर्थन करने वालों पर भी निगरानी जारी है।इसके लिए ´पब्लिक ओपिनियन´पर भी निगरानी रखी जा रही है,उसको भी नियंत्रित किया जा रहा है। इसमें साइबर जासूसी से लेकर मीडिया जासूसी तक के हठकंडों का प्रयोग हुआ है। यह समूचा मॉडल ’टेली-सर्विलेंश´के नजरिए से संचालित है।इसके जरिए ही जेएनयू के बारे में आम जनता के नजरिए को प्रभावित किया जा रहा है,सामाजिक व्यवहार और आचरण को प्रभावित किया जा रहा है।

जेएनयू का आंदोलन मूलतः इमेज युद्ध के मानकों से लड़ा गया है।इमेज युद्ध में सूचनाओं के प्रवाह पर नजर रहती है,मोदी सरकार और संघ ने संगठित ढ़ंग से मीडिया से लेकर इंटरनेट तक फेक सूचनाओं के ´ फ्लो´ को बनाए रखा,उसे नियंत्रित किया।इससे बड़े पैमाने पर मीडिया प्रभावित भी हुआ। अधिकांश मीडिया घराने संघ के ´फ्लो´ में संप्रेषित सूचनाओं को ही परोस रहे हैं।इसे मीडिया का सर्वसत्तावादी हस्तक्षेप भी कह सकते हैं।इसके बहाने तर्क,प्रत्युत्तर सभी को अपदस्थ करने की कोशिश की गयी। इस हमले की विशेषता है- ´तुम सिद्ध करो कि तुमने नारे नहीं लगाए,तुम सिद्ध करो कि तुम झूठ नहीं बोल रहे,´ यानी निराधार आरोप लगाएंगे आरएसएस-पुलिस-मोदी सरकार के मंत्री ,वे आरोप के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं देंगे ,वे सिर्फ आरोप लगाएंगे ,आरोपों की अंधाधुंध वर्षा करेंगे,अब तुम जेएनयूवालो सिद्ध करो कि आरोप झूठे हैं,तुम प्रमाण दो।यह ´आरोप´ लगाने की अमेरिकी पद्धति है,इस पद्धति के आधार पर अफगानिस्तान,इराक,सीरिया आदि को तबाह किया जा चुका है।



जेएनयू की जो इमेज वर्षा हुई है उसमें बार-बार एंकर से लेकर भाजपा-पुलिस-संघ के प्रवक्ता तक यही कह रहे थे कि ´जेएनयू में देशद्रोही नारे लगे हैं,जिन्होंने नारे लगाएं वे देशद्रोही हैं,´यही मूल आधारभूत वाक्य है जिसका करोड़ों बार प्रक्षेपण किया गया।इस पंक्ति के आधार पर समूचे मीडिया में हंगामा खड़ा किया गया।भ्रम पैदा किया गया। अंत में ,जेएनयू के छात्रनेताओं,जिनमें वर्तमान छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार सहित पांच नेताओं को ´राष्ट्रद्रोह´में भाजपा सांसद महेश गिरि की एफआईआर के आधार पर निशाने पर रखा गया,इन छात्रनेताओं की गिरफ्तारी वैध ठहराने के लिए ´जेएनयू में देशद्रोही नारे लगे हैं,जिन्होंने नारे लगाएं वे देशद्रोही हैं,´इस पंक्ति को अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया गया।इसके इर्द-गिर्द मीडिया-साइबर प्रौपेगैण्डा निर्मित किया गया। यह विशुद्ध असत्य प्रचार अभियान था।इस प्रचार अभियान के जरिए जेएनयू के छात्रों से पूछा गया तुम नाम बताओ,उनको खोजकर लाओ, बताओ वे कौन थे,कहां रहते हैं,यदि नहीं बताओगे तो तुम जिम्मेदार हो।इसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए आरएसएस ने वोटक्लव से लेकर राजघाट तक भगवा ब्रिगेड को सड़कों पर उतार दिया,इनमें असामाजिक तत्वों से लेकर कुछ सौ पूर्व सैनिक भी थे।इस तरह के जुलूसों के जरिए यह माहौल बनाने की कोशिश की गयी कि जेएनयू देशद्रोहियों की शरणस्थली है।यह टिपिकल फासिस्ट तरीकों से जेएनयू की घेराबंदी है। जिसका लक्ष्य है आम जनता को जेएनयू के छात्रों के खिलाफ खड़ा करना,इसमें संघ कुछ हद तक सफल रहा,लेकिन शिक्षित समुदाय के बड़े तबके को जेएनयू के छात्र अपने साथ लाने,मीडिया के अंश को अपने सत्य के करीब लाने में सफल रहे,यह लड़ाई अभी बंद नहीं हुई है इसलिए और भी चौकन्ने रहने की जरूरत है।