बुधवार, 30 नवंबर 2016

फिदेल की माँ , धर्म और गरीबी

        फिदेल कास्त्रो को स्पष्टवादिता का संस्कार क्रांति से मिला। क्रांतिकारी होने के नाते वे हर बात को स्पष्ट ढ़ंग से कहते थे।फिदेल का मानना था ´क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हर चीज के बारे में स्पष्ट और बेबाक बोलते हैं।´ यही स्पष्टवादिता क्रांतिकारियों को अभिव्यक्ति के मामले में अन्य विचारधारा के नेताओ से अलग करती है।मार्क्सवादियों में धर्मसंबंधी निजी सवालों के उत्तर देते समय अनेक किस्म के विभ्रम नजर आते हैं।लेकिन फिदेल के अंदर कोई विभ्रम नजर नहीं आते।

जब एफ.बिट्टो ने फिदेल से सवाल पूछा कि आपका जन्म धार्मिक परिवार में हुआ है ॽ तो फिदेल ने कहा इस सवाल का मैं किस तरह जवाब दूँ ॽ मैं इस सवाल का इस तरह उत्तर देना चाहूँगा,पहली बात यह कि मैं एक धार्मिक राष्ट्र से आता हूँ,दूसरी बात यह कि मैं एक धार्मिक परिवार में जन्मा,मेरी माँ लीना धार्मिक महिला थीं।मेरे पिता भी धार्मिक व्यक्ति थे।गांव में मेरा जन्म हुआ और मेरी माँ भी गांव की ही रहने वाली थीं।वह क्यूबा की रहने वाली थी।जबकि पिता गलीशिया,स्पेन के अत्यंत गरीब किसान थे।

फिदेल की माँ को किसी ईसाई मिशनरी ने धर्म की शिक्षा नहीं दी थी,वह एकदम अनपढ़ थीं। लेकिन उनकी गहरी धार्मिक आस्थाएं थीं।उन्होंने वयस्क होने के बाद अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा। फिदेल के पिता का नाम एंजेल था। फिदेल ने कहा ´मेरी माँ एकदम निरक्षर थीं,उसने अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा,मुझे याद नहीं है कि उसको लिखना-पढना सिखाने के लिए कोई शिक्षक मिला था,क्योंकि उसने किसी भी शिक्षक का कभी कोई जिक्र नहीं किया।उसने बहुत परिश्रम करके लिखना-पढ़ना सीखा,मैंने कभी नहीं सुना कि वह कभी पढ़ने के लिए स्कूल गयी ,वह स्व-शिक्षित थी,उसने कभी किसी स्कूल और चर्च में जाकर कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की।मेरा मानना है उसके धार्मिक विश्वासों का स्रोत उसके परिवार की धार्मिक परंपराएं थीं।खासकर उसकी माँ (फिदेल की नानी) और माँ की माँ बड़ी धार्मिक थीं।´

बिट्टो ने फिदेल से पूछा कि क्या आपकी माँ नियमित चर्च जाती थी तो फिदेल ने कहा ´ वे नियमित चर्च नहीं जाती थीं,क्योंकि मेरा जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका शहर से बहुत दूर गांव में पड़ता था,वहां कोई चर्च नहीं था।´

फिदेल का जहां जन्म हुआ उस गांव का नाम था बीरान,इस गांव में कुछ बड़ी इमारतें थी,कुछ रिहायशी घर थे,इन सबका स्पेनिश स्थापत्य था.चूंकि फिदेल के पिता स्पेनिश थे,अतः घर का स्थापत्य स्पेनिश था।उनके पास गांव में एक टुकड़ा जमीन का प्लॉट था,जिसमें खेती होती थी और लकड़ी का घर भी था,साथ ही पशुपालन भी करते थे।जाड़ों में पशुओं को घर के अंदर रखना होता था।घर में सूअर और गाएं थीं जिनका परिवार पालन-पोषण करता था।

दिलचस्प बात है फिदेल कास्त्रो के यहां तकरीबन बीस-तीस गाएं भी थीं, वे जब छह साल की उम्र के थे तो जाडों में घर में गायों के साथ सोते थे। फिदेल का बचपन का यह दौर गाय के गोबर और दूध के बीच गुजरा।

फिदेल की माँ की मृत्यु 6अगस्त1963 को हुई,यानी क्यूबा की क्रांति के छह महिने बाद।जबकि पिता की मृत्यु पहले ही 21अक्टूबर1956 को हो चुकी थी।उस समय फिदेल 30साल और दो महिने के थे।फिदेल ने अपनी आत्मकथा ´माई लाइफः फिदेल कास्त्रो´ में लिखा है कि वे अपनी मां के धार्मिक विश्वासों और आस्थाओं का हमेशा सम्मान करते थे।उनको एक क्रांतिकारी की माँ होने के नाते बहुत कष्ट उठाने पड़े।वे अत्यंत गरीब और सहिष्णु थीं।







धर्म और फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,मार्क्सवादी थे,लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है।एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
          हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते,धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं ,धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म,संत-महंत,पंडे,पुजारी,तांत्रिक ,ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है,इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है।इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्मकी छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं।धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया । हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं,झूठ में जीवन जीते हैं,झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है।झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए।लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना,गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है।इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक,राजनैतिकऔर सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है।इसमें फिदेल से उनकी 23घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखाजोखा है।यह किताब मूलतःक्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया।धर्म और मार्क्सवाद के अन्तस्संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है।इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए।ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे।ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।













मंगलवार, 29 नवंबर 2016

नंगे का अर्थशास्त्र

         मोदीजी ने जब से नोटबंदी लागू की है,उसने हम सबके अंदर के डरपोक और अज्ञानी मनुष्य को एकदम नंगा कर दिया है।कहने के लिए हम सब पढ़-लिखे,शिक्षित लोग हैं लेकिन हम सबमें सच को देखने के साहस का अभाव है।सच कोई आंकड़ा मात्र नहीं होता,सच तो जीवन की वास्तविकता है और जीवन की वास्तविकता या यथार्थ को तब ही समझ सकते हैं जब जनता के जीवन को अपने मन,सुख और वैभव को मोहपाश से मुक्त होकर नंगी आंखों से देखें।

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है।

तकरीबन इसी तरह का नशा एक जमाने में नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू करते समय सारे मीडिया ने हम सबके मन में उतारा था,वह नशा कुछ कम हो रहा था कि अचानक मोदी अफीम के नशे में जनता को फिर से डुबो दिया गया है। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं जो नीति जनता के विवेक का अपहरण करके लागू की जाती है वह कभी भी जनहित में नहीं हो सकती। जनता के विवेक को दफ्न करके मोदीजी जिस नीति को लागू कर रहे हैं वह सारे देश के लिए समग्रता में विध्वंसक साबित होगी।

फिदेल कास्त्रो ने ऐसे ही नशीले माहौल को मद्देनजर रखकर कहा था ,´ हममें से जो विद्वान नहीं हैं उनको भी साहस की खुराक चाहिए। दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसे अधिकाधिक जान लेने की कोशिश के बावजूद कभी-कभी हमारे पास यह जानने के लिए समय नहीं होता कि हम जिस अद्वितीय इतिहास प्रक्रिया से गुजर रहे हैं उसके बारे में क्या नए तथ्य और विचार उभरकर सामने आ रहे हैं और हमारे सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य कैसा होगा? ´

कालेधन को बाहर निकालने के प्रयास पहले भी विभिन्न सरकारों ने किए हैं,मोदीजी इस मामले में नया कुछ नहीं कर रहे। उन्होंने जो नया काम किया है वह है नोटबंदी।नोटबंदी से कालेधन वालों पर कोई खास असर नहीं होगा।यही वजह है कि उन्होंने नोटबंदी के 20दिन बाद अचानक स्वैच्छिक आय घोषणा योजना-2 की घोषणा की है उसके लिए आयकर कानून में कुछ संशोधन सुझाए हैं। ये संशोधन लागू हो जाने पर भी कालेधन पर कोई अंकुश नहीं लगेगा और कालाधन बाहर नहीं आएगा।

इस प्रसंग मे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था कम से कम कालेधन से नहीं चल रही,कालाधन समानान्तर अर्थव्यवस्था जरूर है लेकिन देश की मूल अर्थव्यवस्था नहीं है।मोदी सरकार आने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह हुई है कि मूल अर्थव्यवस्था पंगु हो गयी है।कहीं पर कोई परिणाम नजर नहीं आ रहे।बेकारी और विकास में कोई परिवर्तन नहीं आया।इससे ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार ने नोट नीति की घोषणा की और 500 और 1000 के नोट अमान्य घोषित कर दिए। अब समस्या यह है वे इस नोटबंदी पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही,कालेधन के समर्थक आदि के तमगे लगा रहे हैं। हम जानना चाहते हैं यह कौन सा अर्थशास्त्र है जिसमें सवाल नहीं खड़े कर सकते ॽ

मोदीजी ने जो नोट नीति बनायी है उस पर समानता के आधार पर विभिन्न मतों के अनुसार सवाल उठाने की इजाजत सरकार दे, नीति पर बहस की बजाय सरकार और मीडिया मिलकर नोट नीति के खिलाफ सवाल खड़े करने वालों को अपमानित कर रहे हैं ,सवाल उठाने को ही देशद्रोह और कालेधन की हिमायत कह रहे हैं।यह तो देश की प्रतिभा और जनतांत्रिक मतभिन्नता का अपमान है,यह तानाशाही है और अल्पविवेक का शासन है।

मोदीजी को मालूम होना चाहिए भारत में अर्थशास्त्र की बड़े पैमाने पर पढायी होती है और हमारे यहां सभी किस्म के मत पढाए जाते हैं,विभिन्न किस्म के मतों का अध्ययन करके आने वाले लोगों की यह पहली जिम्मेदारी बनती है कि वे नोट नीति पर खुलकर बोलें,विभिन्न राजनीतिक दलों की भी यह जिम्मेदारी है वे अपने मतों को खुलकर व्यक्त करें। मीडिया और सरकार दोनों मिलकर मतविभन्नता का गला घोंटकर खत्म कर देना चाहते हैं।यह पारदर्शिता का हनन है।



मोदी-मीडिया मिलकर प्रचार कर रहे हैं कि नीति के मामले में हर हालत में अनुशान पैदा करने की जरूरत है,नीति से विचलन और मत-भिन्नता मोदी के लेखे अनुशासनहीनता है,यह देशद्रोह है,कालेधन की सेवा है।इस तरह के तर्क बुनियादी तौर पर फासिस्ट तर्क हैं।किसी भी नीति पर बहस के लिए अनुशासन की शर्त लगाना गलत ही नहीं अ-लोकतांत्रिक भी है।पारदर्शिता और खुलेपन के लिए अनुशासन की विदाई करना पहली जरूरत है।सरकार ने जो नीति जारी की है तो उससे संबंधित सूचनाएं भी जारी करे,नीति पर विभिन्न दृष्टियों से बहस हो,विभिन्न विचारों की रोशऩी में नीति को परखा जाए,विभिन्न कसौटियों पर कसा जाए,यह किए बिना नोट नीति को सीधे लागू करना तानाशाही है। सब जानते हैं मीडिया पर सरकार का संपूर्ण वर्चस्व है और वह इस वर्चस्व का खुला दुरूपयोग कर रही है।नोट नीति लागू करते समय सरकार की शर्त है हमारी बात मानो,नहीं मानोगे तो देशद्रोही कहलाओगे।यह बुनियादी नजरिया लोकतंत्र विरोधी है।

रविवार, 27 नवंबर 2016

फिदेल की औरतें और चंडूखाने के चंडूबाज


            हिन्दू फंडामेंटलिस्टों और समाजवाद विरोधियों का जनप्रिय धंधा है चरित्र-हनन अभियान चलाना। पहले ये लोग स्वायत्त ढ़ंग से यह काम करते थे, लोकल थे,लेकिन मोदी के उभार के बाद हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने भी तालिबानियों की तरह साइबर तरक्की की है, वे अब लोकल नहीं रहे,साइबर में आते ही ग्लोबल हो गए हैं। हिन्दू फंडामेंटलिस्टों का फेसबुक पर प्रिय धंधा है कम्युनिस्टों के खिलाफ मिथ्या प्रचार करना,समाजवाद के बारे में,समाजवादी नेताओं और विचारकों के बारे में कपोल-कल्पित कहानियां प्रचारित-प्रसारित करना।ये सल में चंडूबाज हैं।

फिदेल कास्त्रो की मौत के बाद सारी दुनिया में फिदेल के चरित्र-हनन की आंधी चल रही है।इस आंधी में अनेक रंगत के लोग शामिल हैं,इनमें जेएनयू के पुराने प्रतिक्रियावादी और मोदीभक्त भी शामिल हैं।ये लोग जब जेएनयू में पढ़ते थे,तब भी इनको समाजवाद और साम्यवाद से एलर्जी थी,आज भी है,कहने को ये शिक्षित हैं,लेकिन साम्यवाद को लेकर ये लोग किताब,विचार,विमर्श,तथ्य और सत्य किसी से संबंध नहीं रखते,सिर्फ चंडूबाजों की तरह फेसबुक पर लिख रहे हैं।इनके अलावा अनेक आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं जो आए दिन अपनी साम्यवाद विरोधी चंडू आवाजें सुनाते रहते हैं। हाल में इन लोगों ने फिदेल कास्त्रो के निजी जीवन को लेकर घटिया किस्म की चंडूखाने की खबरें प्रसारित की हैं।इनमें कोई सच्चाई नहीं है।

यह सच है फिदेल कास्त्रो की निजी जिंदगी के बारे में दुनिया बहुत कम जानती है।स्वयं जिन परिस्थितियों में कास्त्रो जैसे क्रांतिकारी काम करते रहे हैं उसमें सब कुछ सार्वजनिक करके रखकर सत्ता चलाना बहुत ही मुश्किल काम है,खासकर जब सामने सीआईए और बहुराष्ट्रीय मीडिया घराने जहर उगलने के लिए खड़े हों। इस स्थिति से निबटने का सबसे बेहतर तरीका यही होता कि स्वयं कास्त्रो अपने परिवार,पत्नी,बच्चे,माँ-बाप,भाई आदि के बारे में स्वयं ही कुछ लिखते,इससे विभ्रम पैदा नहीं होता।

मेरा मानना है क्रांतिकारियों को अपने परिवार और परिवारीजनों के बारे में स्वयं लिखना चाहिए,इससे तथ्य और सत्य के बीच किसी तरह के विभ्रम की संभावनाएं नहीं रहतीं।इसके बावजूद यह सच है कि फिदेल कास्त्रो अनुशासित क्रांतिकारी थे।निजी और सार्वजनिक जीवन में औरतों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था और समानता का भाव था।इस नजरिए को क्यूबा के सामाजिक यथार्थ की रोशनी में देखना चाहिए,न कि सीआईए के प्रचार अभियान के नजरिए से।

सवाल यह है क्यूबा में क्रांति के पहले औरतों का जीवन स्तर क्या था और आज क्या है ॽ अथवा फिदेल कास्त्रो के जमाने में क्या था ॽ जो फिदेल की 25हजार रखैलों का फेसबुक पर बार-बार जिक्र कर रहे हैं वे यह नहीं बताते कि उनकी सूचना का स्रोत क्या है ॽ उलेखनीय है सीआईए के फिदेल के खिलाफ जब सारे मिथ्या प्रचार अभियान धराशायी हो गए तब अंतिम अस्त्र के रूप में 25हजार रखैलों की खबर को चंडूबाजों ने मीडिया में प्रसारित किया।

क्यूबा और फिदेल पर बातें करते समय यह ध्यान रखें कि अमेरिका में एक बहुत बड़ा तंत्र है जिसको फिदेल और क्यूबा के खिलाफ मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने के लिए ही अरबों रूपये दिए जाते हैं। इन मनगढ़ंत कहानियों को सबसे पहले सीआईए के चंडूबाज तैयार करते हैं और उसके बाद सारी दुनिया में मीडिया एक ही झटके में प्रचारित-प्रसारित कर देता है। फिदेल की 25 हजार रखैलों की कहानी इसी सीआईए के कारखाने की देन है।इस कहानी का जन्मस्थान है मियामी।

ध्यान रहे फिदेल की मौत के बाद फिदेल के किलाफ सबसे ज्यादा घृणाभरे जुलूस और नारे मियामी में लगे हैं।मियामी उन तमाम क्यूबाईयों का बसेरा है जो क्यूबा को छोड़कर चले आए या फिर जिनके क्यूबा के प्रशासन से मतैक्य नहीं था या फिर जिनको क्यूबा में मानवाधिकार हनन नजर आ रहा था,इस तरह के लोगों को अमेरिका ने क्रांति के बाद के समय से ही हर स्तर पर प्रलोभन देकर प्रोत्साहित किया और उनको फिदेल और क्यूबा की क्रांति के खिलाफ प्रचार के औजार की तरह इस्तेमाल किया। सीआईए किस मनगढ़ंत कहानियां बनाता रहा है इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।





फिदेल और सीआईए के मेढ़क -

       कल फिदेल कास्त्रो की मौत हुई,क्रांति के हमदर्दों को इससे दुख पहुंचा,वे फेसबुक पर उन पर लिख रहे हैं, सारी दुनिया में फिदेल की मौत की खबर प्रमुख खबर बनी,लेकिन हमारे देश में क्रांति विरोधी,समाजवाद विरोधी और मोदीपंथी लोग फिदेल के खिलाफ जहर उगलते हुए सक्रिय हो गए।

अरे भाई,जब फिदेल से कोई लेना-देना नहीं है तो फिर उनकी मौत पर यह मेढ़कों की तरह टर्र-टर्र क्यों ? मरे फिदेल हैं लेकिन आप लोगों के दिमाग का कैंसर क्यों फट पड़ा?

हिन्दू सभ्यता की परंपरा मान्यता है जब भी कोई व्यक्ति मरता है तो उसके गुण बताए जाते हैं,लेकिन इन दिनों मोदीपंथी जंगलियों की एक नई पौध पैदा हुई है जो उनकी मौत पर घृणा अभियान चला रहे हैं।लगता है इन लोगों के अंदर हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की सभ्यता का कोई असर ही नहीं है !

कल से जिन लोगों ने फिदेल के बारे गंदा,जहरीला प्रचार किया है ,वे वस्तुतःन तो क्यूबा को जानते हैं और फिदेल को जानते हैं।उनको यदि जानकारी है तो सीआईए द्वारा पेश की गयी सूचनाओं की,वे सीआईए गुलामों की तरह फेसबुक से लेकर मीडिया तक फिदेल के बारे में सफेद झूठ की वर्षा कर रहे हैं। इस तरह के लोग क्यूबा के बारे में भारत की सर्वमान्य नीति की मुखालफत कर रहे हैं और सीआईए के एजेंट का काम कर रहे हैं।मोदीपंथियों की यह देशभक्ति नहीं बल्कि देशद्रोही हरकत है।

फिदेल कास्त्रो क्या थे और क्या बन गए ,क्यूबा क्या था और आज किस रूप में सारी दुनिया के सामने खड़ा है,वह अकल्पनीय मिसाल है सामाजिक परिवर्तन की।

क्यूबा की अमेरिका द्वारा पांच दशक तक की गयी लंबी आर्थिक नाकेबंदी ,सीआईएके षडयंत्र ,भाड़े के सैनिकों और बुद्धिजीवियों की विश्वव्यापी फौज और बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के संगठित अभियान के बाद भी फिदेल और क्यूबा का सामाजिक परिवर्तन के रास्ते पर आगे बढ़ते जाना और दुनिया में क्यूबा का एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़े रहना अपने आपमें प्रशासनिक -कूटनीतिक कौशल की शानदार मिसाल है।

फिदेल का भारत के साथ खास संबंध था,जेएनयू के साथ खास संबंध था, जेएनयू के छात्र आंदोलन के प्रेरकों में फिदेल अग्रणी थे,देश में क्यूबा को लेकर जितने अभियान चले हैं उनमें भारत के नौजवानों की केन्द्रीय भूमिका रही है।

क्यूबा के कष्ट के दिनों में भारत की जनता और सरकार फिदेल कास्त्रो और क्यूबा की जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही है।लाखों नौजवानों ने चंदा देकर,किसानों ने गेंहूँ देकर,मजदूरों ने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से चंदा देकर क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार की कठिन समय में रक्षा की है।समाजवाद और क्रांति के पक्ष में इस तरह की पक्षधरता विरल है।

खासकर सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा की क्रांतिकारी सत्ता को बचाने में भारत की सरकार और जनता की शानदार भूमिका रही है।



भारत - क्यूबा मित्रता का मूलाधार है फिदेल कास्त्रो और उनका नजरिया।फिदेल के नजरिए और भारत के नजरिए में अनेक स्तरों पर नीतिगत साम्य रहा है,भारत के कम्युनिस्टों और उदारवादियों के साथ क्यूबा की गहरी मित्रता रही है,यह ऐसी मित्रता है जो कठिन चुनौतीपूर्ण समय में खरी उतरी है।इस मित्रता को अमेरिकी दवाब तक तोड़ नहीं पाया।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

विध्वंस के स्तूप बनाते मोदीजी

           पीएम मोदी की विशेषता है जो कहते हैं उससे एकदम उलटा आचरण करते हैं,नोटबंदी उनकी इसी खासियत का परिणाम है।पहले वायदा किया था कि पांच सौ और हजार के नोट 30दिसम्बर तक बदले जा सकेंगे, लेकिन आज सरकार ने घोषणा की है कि पुराने नोट अब बदले नहीं जाएंगे।इसी तरह पहले कहा करते थे संसद सर्वोच्च है अब कहते हैं ट्विटर और एप सर्वोच्च हैं ! नोट नीति के पक्ष में उन्होंने जो सर्वे किया है उसमें करोड़ों पीड़ित किसानों की राय शामिल नहीं है। सवाल है ये पाँच लाख कौन हैं जो जनता के कष्ट को सही मान रहे हैं? जनता की तकलीफ़ों को जायज ठहराने की मोदी एप सर्वे ने जो कोशिश की है उससे एक बात साफ़ है कि यह सर्वे तयशुदा ढंग से तैयार किया गया है। यह जनता की नेचुरल राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस सर्वे का लक्ष्य है नोटबंदी के फैसले में निहित संविधानविरोधी फैसले को छिपाना और मोदी के नोटबंदी के फासिस्ट और संविधान विरोधी फैसले को वैध ठहराना।मोदी एप सर्वे में वे ही लोग शामिल हैं जो स्मार्टफ़ोन वाले हैं। देश की अधिकांश जनता के पास न स्मार्टफ़ोन हैं और न इंटरनेट है। करोड़ों दैनिक मज़ूरी करने वालों की राय का इस सर्वे से कोई लेना देना नहीं है। नोटबंदी से यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है।

कालेधन और नोटबंदी पर अर्थशास्त्रियों की राय महत्वपूर्ण होगी लेकिन इसबार कहा जा रहा है संसद नहीं, अर्थशास्त्री नहीं, राजनीतिक दल नहीं, सिर्फ भाजपा,सिर्फ पाँच लाख मोदी यूजर तय करेंगे कि मोदी की नोट नीति सही है। मोदीभक्तों को जवाब देना चाहिए कि भाजपा करोड़ों सदस्यों वाला दल है उसमें से मात्र पाँच लाख लोग ही मोदी एप में वोट देने क्यों आए ? करोड़ों मोदी भक्त कहाँ हैं ? क्या मोदी एप के सर्वे का भाजपा सदस्यों ने बहिष्कार किया है? दिलचस्प बात है जो अर्थशास्त्र नहीं जानते, नोट नीति के बारे में नहीं जानते , वे बता रहे हैं नोटबंदी सही है, मोदी एप सर्वे की धुरी इसी तरह के लोग हैं।

संसद में पूर्ण बहुमत होने के बाद भी नोटबंदी का प्रस्ताव संसद में पेश करने से मोदी सरकार क्यों भाग रही है? मोदीजी क्यों डरे हुए हैं? मात्र पाँच लाख लोगों ने मोदी एप पर नोटबंदी पर पीएम के सर्वे का जवाब दिया। 125 करोड़ की आबादी में मात्र इतने कम लोगों के प्राथमिकतौर पर रिएक्शन सामने आए हैं। करोड़ों रूपये सोशलमीडिया पर ख़र्च करने बाद मात्र पाँच लाख लोगों ने सर्वे में भाग लिया है। इससे मोदी की इंटरनेट जनता पर बहुत कम लोगों तक पकड़ का अंदाज़ा लगता है।मात्र पाँच लाख लोग मोदी नीति के पक्ष में बोले हैं।बाकी जनता जो चुप है वह साथ नहीं है।

नोटबंदी के कारण अब तक 75 से ज्यादा लोग मारे गए हैं,इनमें 17लोग अस्पताल में पुराने नोट न लेने और इलाज के अभाव में मारे गए हैं।८नवम्बर के बाद पुराने नोट नहीं लिए जा रहे, खासकर निजी अस्पताल में पुराने नोट नहीं लिए जा रहे हैं।सवाल यह है सरकार ने पुराने नोटों को सरकारी अस्पताल में वैध रखा लेकिन निजी अस्पताल में वैध क्यों नहीं रखा ?

हम माँग करते हैं कि जिन लोगों के पास आधारकार्ड और जनधन खाता है और राशन ख़रीदने के पैसे नहीं हैं उनको केन्द्र सरकार गेहूँ,आटा, दाल, तेल और सब्ज़ी उधार दे । नोट नीति की तबाही थमने वाली नहीं है।इसके अलावा जिसके पास आधार कार्ड और जनधन खाता है उसे सरकारी और निजी अस्पताल में मुफ्त दवा और इलाज की सुविधा दी जाय ।

रिजर्व बैंक ने संविधान प्रदत्त अधिकारों , स्वायत्तता और जवाबदेही का जिस तरह त्याग किया है और रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने जिस तरह की गैर ज़िम्मेदाराना और संविधानविरोधी भूमिका अदा की है उसका हर स्तर पर प्रतिवाद होना चाहिए, साथ ही पीएम की नोटबंदी के असंवैधानिक निर्णय का भी प्रतिवाद होना चाहिए। आज बैंक कर्मचारी सबसे ज्यादा संकट में घिरे हैं। अब बैंक कर्मचारियों को संघर्ष का एलान करना चाहिए और साफ कहना चाहिए कि उनको अकारण असंवैधानिक और जनविरोधी नोट नीति का अंग बना दिया गया है।आप जरा बैंक कर्मचारियों की मुश्किलों और बैंकिंग व्यवस्था के बारे में सोचें नोट नीति के कारण विगत दस दिनों से बैंकों का सारा कारोबार ठप्प पड़ा है। फिलहाल बैंक रूपये लेने देने के काम में लगे हैं।बैंकों की आमदनी ठप्प पड़ी है, कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ गया है। कर्मचारी बेहद तनाव में काम कर रहे हैं।बैंकों के समूचे कामकाज के ठप्प हो जाने से प्रतिदिन कितने हजार रूपये की क्षति हो रही है ? विगत दस दिनों से जो काम बंद पड़े हैं उस बक़ाया काम को समाप्त करने में बैंक कर्मचारियों को कितने हजार घंटे काम करना पड़ेगा ?यही हालात यदि कुछ सप्ताह और रहते हैं तो बैंक कर्मचारी शारीरिक तौर पर भयानक दवाब में आ जाएंगे।

फेडरेशन ऑफ राजस्थान ट्रेड ऐंड इंडस्‍ट्री (फोर्टी) का मानना है नोटबंदी से राजस्थान में आगामी दो माह में करीब एक लाख करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित होगा, समाचार पत्रों, सोशल मीडिया आदि के जरिये भ्रांति व भय के माहौल में व्यापारी वर्ग डरा हुआ है तथा मजदूर वर्ग को रोजगार की उपलब्धता के बावजूद भी आर्थिक तंगी का सामना करना पड रहा है। फोर्टी ने प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को कल सौंपा है जिसमें प्रधानमंत्री से व्यापार व उद्योग जगत के साथ-साथ आमजन को राहत पहुंचाने की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि नोट बंदी के कारण विनिर्माण क्षेत्र और खुदरा क्षेत्र में बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करने के लिए पर्याप्‍त नकदी उपलब्ध नहीं होने के कारण उत्पादन पर भी असर पडा है।





मोदी सरकार की असंवैधानिक और विध्वंसक नोट नीति-

            पीएम नरेन्द्र मोदी डर के मारे संसद में नहीं बोल रहे,डर के मारे बैंक पीड़ितों से नहीं मिल रहे, आत्महत्या कर रहे किसानों से नहीं मिल रहे,उनके अंदर का डर इस कदर हावी है कि रिजर्व बैंक को स्वायत्त ढ़ंग से काम नहीं करने दे रहे।इसके विपरीत राहुल गांधी एकदम निडर और निस्संकोच आम जनता में जाकर मिल रहे हैं,बैंक और एटीएम की लाइन में लगे लोगों से मिल रहे हैं,कर्ज से पीड़ित किसानों से मिल रहे हैं ।आंदोलनकारी पूर्व सैनिकों से मिल रहे हैं।लोकतंत्र में तानाशाह और लोकतांत्रिक नेता का अंतर देखना हो तो डर के पैमाने से देखो,डरा नेता जनता से दूर रहता है, हिटलर की तरह हमेशा सभा मंच पर नजर आता है जनता से दूर रहता है,जबकि लोकतांत्रिक नेता हमेशा जनता में नजर आता है।

जिस तरह आपातकाल ने उत्तरभारत में कांग्रेस की कमर तोड़ी थी वैसे ही नोटबंदी ने भाजपा की पूरे देश में रीढ़ तोड़ दी है। आपातकाल के लाभ विपक्ष ने उठाए उसी तरह नोटबंदी से पैदा हुई तबाही का लाभ विपक्ष को मिलना तय है। नोटबंदी के मायने हैं " नो अपील नो वकील और नो दलील" । यही आपातकाल का मोटो था।जिसे सुप्रीम कोर्ट में उस जमाने के महान्यायवादी ने व्यक्त किया था।

पी एम नरेन्द्र मोदी लगातार झूठ बोल रहे हैं,वे कह रहे हैं नोट बंदी का कुछ दिन तक ही बुरा असर रहेगा,सच यह है इसका बहुत ज्यादा दिनों, कई महिने और कई साल तक बुरा असर रहेगा।भारत की सारी दुनिया में इससे मट्टी पलीत हुई है।अब विदेशी पूंजी निवेश कम से कम भारत में निकट भविष्य में नहीं आएगा।सारी दुनिया जान गयी है भारत में इस समय ऐसा पीएम है जिसके पास स्नातक स्तर के ज्ञानधारी देशभक्त और नौकरशाह हैं।

सारी दुनिया में जितने पीएम हैं वे बेहतरीन शिक्षितों से विभिन्न पहलुओं पर सलाह करके नीति बनाते हैं लेकिन मोदीजी ज्ञानी और विद्वानों से कोसों दूर रहते हैं ,उनके पास नौकरशाह सलाहकार हैं,ये नौकरशाह सलाहकार अधिक से अधिक स्नातक हैं और इनकी कोई विशेष योग्यता नहीं है।इसके अलावा यह भी पता चला है कि नोट नीति बनाते समय कुछ ही लोगों से सलाह करके फैसला लिया गया,ये कुछ लोग कौन हैं यह भी सामने आना बाकी है,उनके काम करने की पद्धति वही है जो आपातकाल में श्रीमती गांधी की थी,वे चंडाल चौकड़ी से घिरी हुई थीं,सारे फैसले चंडाल चौकड़ी लेती थी, मंत्रीमंडल कागजी था,संविधान फालतू था।मोदीजी भी चंडाल चौकड़ी से घिरे हैं और वही देश को संचालित कर रही है।नोट बंदी का फैसला इसी चंडाल चौकड़ी ने लिया है।अखबारों में अभी जो नाम आ रहे हैं वे सब गलत हैं।असली नाम कुछ और हैं।नोट बंदी का फैसला न तो रिजर्व बैंक ने लिया है और न मंत्रीमंडल ने विस्तार से बहस करके लिया है,यह फैसला मूलतःपीएम का है और उसे सारे देश पर थोप दिया गया है। नियमानुसार यह फैसला संसद और रिजर्व बैंक को लेना था,लेकिन संसद को ठेंगे पर रखा गया है,रिजर्व बैंक को रबड़ स्टैम्प की तरह इस्तेमाल किया गया है।इस सबको नाम दिया गया सीक्रेसी का।

जो नीति सारे देश पर लागू होनी है उस पर सीक्रेसी की क्या जरूरत यह बात हमारी समझ में नहीं आती।यह कैसी नीति है जिस पर रिजर्व बैंक बहस न करे,संसद बहस न करे,मंत्रीमंडल में बहस न हो,देश में बहस न हो और देश से कह दिया जाए कि तुम नीति का पालन करो।यही तो अधिनायकवाद है।



नोट नीति के जरिए पीएम मोदी की जनता में पहलीबार प्रशासनिक दक्षता परीक्षा हुई और वे इसमें बुरी तरह फेल हुए हैं।जबकि वे प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी के दावे पर वे लोकसभा का चुनाव जीतकर आए थे। इस नीति के पहले उनकी नीतिगत तौर पर जनता में कोई परीक्षा नहीं हुई थी,यहां तक कि जिन जनधन खाता धारकों के करोड़ों खाते खुलवाने का वे दावा करते हैं उसमें बैंक कर्मचारियों की बड़ी भूमिका थी,इसमें मोदीजी की प्रशासनिक क्षमता नजर नहीं आती,जिस तरह वे खाते खुले हैं,सारा देश जानता है, उनकी अक्षमता,मूर्खता और जनविरोधी भावनाओं को आम जनता में नंगा करके रख दिया है।कल राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विमुद्रीकरण की नीति को सटीक आलोचना करते हुए तबाही के जिस मंजर का खाका पेश किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।इसके विपरीत कल वित्तमंत्री अरूण जेटली की पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर हमला करने वाली प्रेस कॉंफ़्रेंस देखकर यह विश्वास हो गया है कि मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है और असहिष्णुता के शिखर पर बैठी है। जेटली के बयान का मर्म यह था कि मनमोहन सिंह को बोलने का कोई हक नहीं है।क्योंकि उनके शासन में कालाधन आया , सबसे ज्यादा घोटाले हुए , वे महान पापी हैं! जो महान पापी हैं उनको मोदीजी जैसे चरित्रवान,ईमानदार, बेदाग़ नए कपड़े पहने वाले नेता की नीति की आलोचना करने का कोई हक नहीं है।मोदी जी इतने महान हैं कि विगत सत्तर साल में इस तरह का चरित्रवान और पुण्यात्मा कोई पीएम नहीं बना है! सच तो यह है उनसे बेहतर कोई पीएम न तो सोच सकता है और न बोल ही सकता है!!
मोदीजी महान हैं! क्योंकि वे संविधान के बंधनों से मुक्त हैं! हमेशा १२५ करोड लोगों के बंधन में बँधे रहते हैं। १२५ करोड लोगों की तरह ही सोचते हैं, हँसते हैं, गाते हैं ,खाते हैं, रोते हैं!!उनके मन और तन में १२५ करोड़ मनुष्य वास करते हैं!करोड़ों जीव-जन्तु-पशु-पक्षी उनके हृदय में निवास करते हैं !
उनका मन मंदिर है और हृदय जंगल है।वे इस जंगल के बेताज बादशाह हैं। वे वैसे ही अक्लमंद हैं जैसे जंगल में पशु -पक्षी अक्लमंद होते हैं।जिस तरह १२५ करोड जनता कभी किसी अर्थशास्त्री से राय नहीं लेती जो मन में आए काम करती है मोदीजी भी ठीक वैसे ही काम करते हैं।यही वजह है मोदीजी महान हैं! मोदीजी की आलोचना वही कर सकता है जो उनके जैसा महान हो ! मनमोहन चूँकि मोदीजैसे महान नहीं हैं इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से दरकिनार करने की जरूरत है।रही बात संसद की तो संसद नक्षत्रों से भरी है उसमें मोदी जैसा सूर्य मिसफ़िट है। यही वजह मोदी जैसा सूर्य हमेशा संसद के बाहर ही चमकता है , कल पंजाब में दिखाई देंगे ।

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोट बंदी यानी मोदी सरकार ठप्प है !

            पीएम नरेन्द्र मोदी ने 9नवम्बर से नोटबंदी की नीति लागू करते समय आम जनता से पचास दिन मांगे हैं।कहा है पचास दिन में यह नीति अभीप्सित लक्ष्य हासिल न कर पाए तो जनता पीएम को दण्डित कर सकती है।सवाल यह है नोट बंदी के पहले जो वायदे पूरे करने की बात थी उनका क्या हुआ ॽ क्या उन वायदों को भी 50दिन के लिए स्थगित कर दिया जाय ॽ सवाल यह है नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार ठप्प क्यों हो गयी ॽ

यह सच है नोटबंदी के कारण सब कुछ ठहर गया है। नोटबंदी के बारे में जो कुछ कहा गया उससे उलट परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं।मसलन् यह नहीं कहा गया कि नोटबंदी से कामगारों को बेकारी का सामना करना पड़ेगा,खासकर दैनिक मजूरी करने वालों को तत्काल रोजी-रोटी से हाथ धोना पडेगा।बाजार में सन्नाटा पसर जाएगा।बैंकिंग के नियमित कामकाज बंद हो जाएंगे।आयकर विभाग के नियमित काम ठप्प हो जाएंगे।पुराने नोटों का कालाधन धंधा शुरू हो जाएगा,मुद्रा दलालों की चाँदी ही चाँदी होगी।निर्माण कार्य,विकास कार्य,सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन ठप्प हो जाएगा।

नोटबंदी लागू करने के साथ यह कहा गया इससे काले धन पर रोक लगेगी।लेकिन व्यवहार में ठीक उलटा हुआ है।व्यवहार में मुद्रा दलालों ने बड़ी मात्रा में बैंकरों की मदद से करोड़ों रूपये का धंधा किया है।अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि पुराने खारिज नोट कितनी बड़ी संख्या में मुद्रा दलालों के जरिए बदले गए हैं।अभी तक जन-धन एकाउंट में 21हजार करोड़ रूपये जमा होने की बात केन्द्र सरकार ने मानी है।लेकिन दलालों ने अमान्य मुद्रा में से कितनी मुद्रा को परिवर्तित कराने में मदद की,इसका कोई आंकड़ा सरकार नहीं दे पायी है।जन-धन एकाउंट में अवैध पैसा जमा होने वाली बात भी इसलिए कही जा रही है जिससे ममता बनर्जी और राहुल गांधी को इस मुहिम से जोड़ा जाए,क्योंकि जन-धन एकाउंट में बड़े पैमाने पर पैसा सरकार के मुताबिक बंगाल और कर्नाटक में ही जमा हुआ है।

मोदी सरकार ने सब कुछ जानते हुए भी कि किनके पास अवैध कालाधन कैश में घरों रखा हुआ है उनके यहां घरों पर छापे न मारकर नोटबंदी का रास्ता चुना।सरकार यदि कालेधन के मगरमच्छों को पकड़ना चाहती तो आसानी से पकड़ सकती थी लेकिन उसने यह सब करना जरूरी नहीं समझा,उलटे उनको जन-धन एकाउंट के जरिए धन जमा करने की सुविधा मुहैय्या करायी।जिस तरह अनाप-शनाप तरीकों से जन-धन एकाउंट खुलवाए गए थे उस समय अनेक लोगों ने इन खातों के दुरूपयोग होने की ओर ध्यान खींचा था लेकिन सरकार ने एक भी बात नहीं मानी।आज यही जन-धन एकाउंट कालेधन को बैंकों में जमा करने के सबसे बड़े स्रोत बनकर सामने आए हैं।

नोटबंदी के बाद बैंकों में पारदर्शिता दिखनी चाहिए। केन्द्र सरकार तुरंत अब तक छापे गए और बैंक से दिए गए नोटों का हिसाब सार्वजनिक करे और बताए कि नए नोट कितनी संख्या में जारी किए गए हैं ॽइस समूची प्रक्रिया की गहराई में जाकर जांच करने की जरूरत है।दिलचस्प बात है मोदी सरकार नोटबंदी की नीति लागू होने के बाद एक भी मुद्रा दलाल को अवैध मुद्रा के लेन-देन के चक्कर में पकड़ नहीं पायी है।इसका प्रधान कारण हमारे यहां अवैध,खारिज,फटे-पुराने नोट आदि का कारोबार करने वाले पचासों वर्षों से यह धंधा कर रहे हैं और वैध ढ़ंग से वे अपना काम करते रहे हैं। सवाल यह है जब उनका धंधा वैध है तब आप कालेधन वाले को पकड़ेंगे कैसे ॽ

दूसरा सवाल यह है जुलाई से सितम्बर माह 2016 के बीच में बैंकों में जमा पूंजी में जबर्दस्त उछाल आया है,वे कौन लोग हैं जिन्होंने अचानक बैंकों में बड़ी मात्रा में धन जमा किया है ॽ बैंकों के सारे खातों को खंगालने की जरूरत है, साथ ही राजनीतिक दलों के खातों को भी खंगालने की जरूरत है। इस अवधि के बीच में जिन लोगों ने पांच लाख ,दस लाख,पचास लाख या उससे ऊपर धन जमा किया है उन लोगों कि शिनाख्त की जानी चाहिए,उनसे आय के स्रोतों की जानकारी देने के लिए कहा जाना चाहिए।इसके अलावा दो लाख से ऊपर के गहने खरीदने वालों की जांच हो।खासकर उन लोगों की जिन्होंने हठात् 8नवम्बर के बाद से महंगे दाम पर सोना खरीदा है, विगत 15दिनों में सोना खरीदने वालों के नाम तो सरकार जारी कर ही सकती है।यह कैसे संभव है कि जिन लोगों ने पहले सोना नहीं खरीदा अचानक 8नवम्बर की 8बजे की घोषणा के बाद ही सोना खरीदा ! उन कंपनियों और ठेकेदारों की भी खोज की जाए जिन्होंने एडवांस में अपने मजदूरों को कई महिने की पगार दे दी और अपना कालाधन सफेद कर लिया। ये बातें उस गोरखधंधे की एक झलक देती हैं जो नोटबंदी के नाम पर विगत 15 दिनों से हो रहा है और मोदी सरकार की इसे रोकने में कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती,उलटे हुआ यह है कि नोट बंदी के बाद सरकार के सभी विभाग ठप्प हो गए हैं। नोटबंदी को यदि अचानक लागू करना था तो सरकारी विभाग ठप्प क्यों हो गए ॽ







बुधवार, 23 नवंबर 2016

मोदी एप सर्वे यानी फ़्रॉड का फ़्रॉड -

   

  नोटबंदी पर मोदी एप सर्वे में विपक्ष ने भाग नहीं लिया,सिर्फ भाजपा-आरएसएस ने इसमें भाग लिया, मोदीजी की साइबरमंडली-मीडिया मंडली ने जनमत जुटाने का काम किया और इसके बाद १२५करोड की आबादी में वे मात्र पाँच लाख लोगों की राय ही वे जुटा पाए, इससे एक बात साफ है कि अधिकांश भाजपाईयों ने इस सर्वे का बहिष्कार किया है, भाजपा यदि पूरी तरह दिलचस्पी लेती तो यह सर्वे कबीं ज्यादा बड़ी संख्या में लोगों की पाय जुटा पाता। 
       इस तरह के सर्वे की सबसे बडी कमज़ोरी यह है कि सर्वे कर्ता मानकर चल रहा है कि सर्वे में जो लोग भाग ले रहे हैं वे कालेधन,भ्रष्टाचार और नोटबंदी के सभी पहलुओं से वाक़िफ़ हैं।जबकि सच इसके एकदम विपरीत है। अधिकतर लोगों की बात छोड़ दें सिर्फ ९नवम्बर से कल तक के अखबार उठाकर देखेंगे तो उपरोक्त विषयों से संबंधित बहुत कम सामग्री इनमें मिलेगी। इतनी कम जानकारी के आधार देश की महत्वपूर्ण नीति के बारे में जन समर्थन का दावा करना गलत है, अवैज्ञानिक है।
     सवाल यह है जिस व्यक्ति को नोट बंदी का बेसिक नहीं मालूम उसकी राय को सही कैसे कहते हैं ? स्वयं पीएम मोदीजी ने आज तक नहीं बताया कि नोटबंदी का फैसला उन्होंने कैसे और किस अधिकार से लिया? जबकि संवैधानिक तौर पर ने यह फैसला वे नहीं ले सकते। नोटबंदी का फैसला लेने का एकमात्र संवैधानिक हक रिजर्व बैंक के पास है और सच यह है कि रिजर्व बैंक ने नोटबंदी का फैसला नहीं लिया बल्कि रिजर्व बैंक पर मोदीजी ने अपना फैसला थोप दिया और आदेश दिया कि इसे लागू करो।यह कदम अपने आपमें असंवैधानिक है।
        मोदीजी अपने असंवैधानिक फैसले को छिपाने के लिए मोदी एप सर्वे का मुखौटे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह भी है मोदीजी ने स्वयं सर्वे क्यों किया ? कभी भी कोई नीति निर्धारक स्वयं सर्वे नहीं करता । तटस्थ संस्थाएँ सर्वे करती हैं ।उससे  जनमत की सही भावनाएँ सामने आती हैं। सर्वे के पहले जनमत को  विवादास्पद मसले पर शिक्षित किया जाता है उसके बाद राय ली जाती है, मोदीजी यह मानकर चल रहे हैं कि नोटबंदी पर जनता सब कुछ जानती है और उससे सीधे सवाल किए जाने चाहिए। हालात यह है कि स्वयं मोदीजी ने आज तक विस्तार से कालेधन और नोट नीति के संवैधानिक पहलुओं पर किसी भी पेशेवर पत्रकार के सवालों के सीधे जवाब नहीं दिए हैं, क्योंकि वे जानते नहीं हैं। सवाल यह है जब पीएम अपनी नीति के बारे में अज्ञानी हो तब आम जनता कैसे ज्ञानी हो सकती है? 

नोटबंदी और मीडिया के अक्षम्य अपराध-


          नोटबंदी के आतंकियों और माओवादियों पर असर की झूठी खबरों से मीडिया भरा पड़ा है,जबकि आँखों के सामने भारत के प्रत्येक नागरिक के यहां तबाही मची हुई है,कम से कम पचास लाख घरों में शादियां हो रही हैं और वहां सभी एकस्वर से मोदी सरकार की निंदा कर रहे हैं लेकिन मीडिया में यह सब गायब है , नोटबंदी का आतंकियों पर क्या असर हुआ है,यह बताने में मीडिया मगन है,जबकि मीडिया को किसी आतंकी से कोई पुष्ट और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिली है।इनमें सारे फोटो पुराने हैं,सिर्फ ऑफिस में बैठकर गप्पें तैयार की जा रही हैं।नोटबंदी ने समूचे बैंकिंग सिस्टम को पंक्चर कर दिया है।आयकर विभाग परेशान है कि कैसे काम करे,मुश्किल से दस लोगों को आयकर विभाग ने नोटिस भेजा और उससे यह आभास पैदा किया गया कि पता नहीं कितना बड़ा तीर मार लिया गया,जबकि आयकर विभाग को मालूम है कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

मोदी जी सरेआम मायावती और दूसरे नेताओं पर हमले कर रहे हैं और सफेद झूठ बोल रहे हैं।नोटबंदी से इन नेताओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।कम से कम अब तक 14 दिनों में मोदीजी ने किसी नेता के यहां छापा मारकर एक लाख के अमान्य नोट तक नहीं पकड़े हैं,उलटे आयकर विभाग ने 91लाख के नोट महाराष्ट्र के भाजपा विधायक और मंत्री की कार से पकड़े हैं।नोटबंदी लागू होने के कुछ समय पूर्व भाजपा के खाते में कोलकाता में 3करोड़ रूपये के नोट जमा कराए गए हैं।इसके बाद भी यह हल्ला कि विपक्ष के पास कालाधन है और उसको नोटबंदी से नष्ट कर दिया गया है।यह पहला मौका है जब मीडिया पीएम और वित्तमंत्री के बयानों की तथ्यपरक जांच नहीं कर रहा। उसका कमर कसकर अफवाह अभियान में जुट जाना इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है।

भारत के इतिहास में सहकारी बैंकों को कभी सामान्य बैंकिंग प्रणाली से काटकर नहीं रखा गया,लेकिन नोटबंदी के बाद सहकारी बैंकिग व्यवस्था ठप्प पड़ी है। वहां कोई लेन-देन नहीं हो रहा,कोई काम नहीं हो रहा।यहां तक कि तुलनात्मक तौर पर पोस्ट ऑफिस से भी इन बैंकों का बुरा हाल है।

इस समस्त प्रक्रिया में पेट्रोल पंप वाले से लेकर बिग बाजार के मालिक तक पर हमारी सरकार को विश्वास है ,उनको किसी न किसी रूप में दो हजार रूपये नागरिकों को निकालने की वहां से सुविधा दे दी गयी है,लेकिन सहकारी बैंकों को तो बिग बाजार और पेट्रोल पंप मालिक कंपनियों जैसे लेन-देन की भी सुविधा नहीं दी गयी है।

सवाल यह है कि ये कंपनियां क्या अपने पॉकेट से नागरिकों को दो हजार रूपये बांटेगी ?कहीं नई मुद्रा को सलेक्टिव ढ़ंग से कारपोरेट घरानों को देने की मुहिम तो नहीं चल रही ?मसलन् बिग बाजार ने दो हजार की मुद्रा डेबिड कार्ड के आधार पर नागरिक को दी तो आखिरकार वह मुद्रा बिग बाजार कहां से जुगाड़ करेगा ,जिस समय बैंकों के पास मुद्रा न हो वैसे में बिग बाजार जैसे निजी नैटवर्क को दो हजार रूपये डेबिड कार्ड के जरिए देने का फैसला नए किस्म की मोदी -कारपोरेट मिलीभगत का नमूना है।यह नोटबंदी की आड़ में चल रहा मोदी करप्शन है।

इसी तरह यह प्रचार भी तथ्यहीन है कि कैशलैस सोसायटी करप्शन मुक्त होती है।सारी दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो कैशलैस हो,यहां तक कि जिन देशों में कैशलैस सिस्टम बहुत पुख्ता है वहां पर भी करचोरी बड़ी मात्रा में होती है।कैशलेस सिस्टम अंततःकैश पर ही चलता है।सिर्फ अंतर यह है कि चलमुद्रा का एक बड़ा अंश चलन से बाहर रहता है, वह बैंकों के पास रहता है।

पहले से ही एक लाख करोड़ रूपये की प्लास्टिक मनी चलन में है।यह प्लास्टिक मनी मोदीजी के पीएम बनने के पहले से ही चलन में है।प्लास्टिक मनी बाजार की पूरक मुद्रा है, विनिमय की मुद्रा है,यह वस्तुतः मुद्रा नहीं, मुद्रा का वायदा है,गारंटी है।असल मुद्रा तो इसके कारण चलन के बाहर है।

सारी दुनिया में 1.2 बिलियन लोग हैं जिनकी जिंदगी प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम पैसे से चलती है,भारत में आबादी का बहुत बड़ा अंश है जिसकी रोज की आय तीस रूपये से भी कम है।ऐसे में कैशलैस विनिमय की बात करना अवैज्ञानिक है,साथ ही गरीबों के साथ भद्दा मजाक है।

इस दौर में आम जनता की राय को बनाने और नियंत्रित करने में मीडिया सबसे बड़ी भूमिका अदा कर रहा है अतः मीडिया की भूमिका पर व्यापक बहस होनी चाहिए।सवाल यह है मीडिया यह मानकर क्यों चल रहा है कि नोटबंदी अच्छी बात है,सही फैसला है ?बिना इस नीति की तहकीकात किए,उसके बुनियादी आधार के बारे में सवाल खड़े किए बिना मीडिया ने जिस तरह का माहौल बनाया है उससे पहली बात यह निकलती है कि मीडिया वालों में साक्षरता का अभाव है,मीडिया साक्षरता के अभाव के कारण नोटबंदी के प्रति इस तरह का अनालोचनात्मक रवैय्या पैदा होता है।आम जनता देखती है कि मीडिया समर्थन कर रहा है फलतः जनता मानकर चल रही है कि मोदीजी की नोट बंदी सही है।मीडिया बार बार असुविधाओं को चित्रित कर रहा है उसमें भी वह बड़ी कृपणता के साथ पेश आ रहा है। विगत 14 दिनों में मीडिया का समूचा कवरेज नोटबंदी के प्रति अनालोचनात्मकता से लबालब भरा रहा है।

मीडिया का काम है कि वह जनता की आवाज बने,लेकिन हमारे यहां मीडिया खुल्लमखुल्ला सरकार और कारपोरेट घरानों की आवाज के रूप में काम कर रहा है,ऐसे में मीडिया साक्षरता का काम और भी महत्वपूर्ण हो उठा है।

नोटबंदी के सवाल पर मीडिया ने दो बड़े अपराध किए हैं उसने आर्थिक सूचनाओं को छिपाया है और अ-प्रासंगिक सूचनाओं का प्रसार किया है। दूसरा अपराध यह किया है कि मीडिया अपनी भूमिका भूलकर सरकार के भोंपू की भूमिका अदा कर रहा है।हम सब जानते हैं आम जनता मीडिया द्वारा प्रसारित सूचनाओं पर पूरी तरह निर्भर है ऐसे में आम जनता से सही सूचनाएं छिपाना और सरकार की ही सिर्फ सूचनाओं को प्रसारित करना अपराध की कोटि में आता है।



















मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी पर जनमत एप का मोदी पाखण्ड -

         पी एम नरेन्द्र मोदी संसद में किसी हॉल में बैठकर भाजपा सांसदों को सम्बोधित कर सकते हैं,संसद शुरू होने के बाद वे दो बार उनको सम्बोधित कर चुके हैं लेकिन वहीं पास में संसद के सदन में आकर भाषण देने में क्यों डर रहे हैं ?
वे संसद की बिल्डिंग में जा रहे हैं लेकिन सदन में नहीं जा रहे,सदन से वे कन्नी क्यों काट रहे हैं ? उनसे क्या कोई संवैधानिक चूक हुई है ?जी हां,हमने फेसबुक पर जितने भी मसले संवैधानिक उल्लंघन के रेखांकित किए थे आज वे सभी मुद्दे विपक्ष भी उठा रहा है।
मोदीजी सदन में बोलते हैं तो वे अपने बयान की संवैधानिक पुष्टि के लिए मजबूर होंगे,दिलचस्प बात है मोदी मंत्रीमंडल के सभी लोग संसद में बोलने को तैयार हैं एकमात्र मोदी बोलना नहीं चाहते,क्योंकि वे अपने को संवैधानिक जवाबदेही से बाहर रखना चाहते हैं।
मसलन्, संसद में यदि वे कहते हैं कि मैंने नोट बंदी का फैसला लिया तो यह संवैधानिक बयान होगा जो सीधे संविधान के उल्लंघन के दायरे में आता है मोदीजी को नोट बंदी का फैसला लेने का हक नहीं है,यदि वे कहते हैं मंत्रीमंडल ने फैसला लिया तो यह कहना भी असंवैधानिक होगा।यही बुनियादी वजह है कि वे संसद से बाहर बोल रहे हैं,संसद के बाहर उनके बोलने का कोई संवैधानिक मूल्य नहीं है।
जो खबरें सामने आई हैं वे ये हैं कि मोदीजी ने नोट बंदी के लिए सभी संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को अमान्य या दरकिनार करके नोटबंदी का फैसला लिया है,वे मीडिया और सोशलमीडिया के जरिए आम जनता की राय को मेनीपुलेट करना चाहते हैं।यही वजह है कि आज उन्होंने एक एप के जरिए नोटबंदी से जुड़े 10 सवालों पर राय जानने की कोशिश की है,पीएम की ओर से जो दस सवाल नागरिकों से पूछे गए हैं,वे सवाल गलत हैं और उन सवालों को जिस क्रम से रखा गया है उनके उत्तर पहले से ही तय हैं।
कायदे से नोटबंदी को लेकर पहले सभी आधिकारिक सूचनाएं जनता को दी जाएं और फिर सवाल किए जाएं तो कुछ हद तक संतुलित राय मिलेगी।
मसलन् ,पहले जनता को यह बताया जाए कि नोटों पर पाबंदी लगाने का संवैधानिक अधिकार किस संस्था को है ,हमारे देश में अधिकतर लोग नहीं जानते,कम से कम पीएम को नोटबंदी के फैसले लेने का संवैधानिक हक नहीं है,यह रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दूसरी बात यह कि रिजर्व बैंक ने यह फैसला कब लिया ,क्या यह फैसला कुछ मिनटों या घंटों में लिया यदि हां तो इस तरह का गंभीर फैसला लेने के लिए बैंक के मुखिया पर किसने दवाब डाला,नोटबंदी का फैसला सबसे बड़ा फैसला है,यह हठात नहीं लिया जा सकता।यह ऐसा फैसला है जिससे देश का हर नागरिक प्रभावित हुआ है और परेशान है,उसके संवैधानिक हक पर इस फैसले के जरिए हमला बोला गया है,बेहतर यही होगा कि रिजर्व बैंक सभी तथ्यों को आम जनता के सामने रखे।जनता को नोट बंदी से जुड़े सभी तथ्यों की जानकारी देने के बाद ही पीएम को इस फैसले पर जनमत की राय लेनी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया तक को नहीं मालूम कि किसने फैसला लिया और क्यों फैसला लिया,मीडिया एकतरफा ढ़ंग से नोटबंदी के पक्ष में प्रचार कर रहा है और उसी भाषा में प्रचार कर रहा है जिस भाषा में 8नवम्बर2016 को आठ बजे मोदीजी बोले थे।इस तरह नियोजित प्रचार और सूचनाओं के अभाव के आधार पर कोई भी जनमत की राय एकसिरे अवैज्ञानिक और निराधार ही कही जाएगी।सूचनाओं के पर्याप्त प्रचार-प्रसार के बाद ही जनमत की राय ली जानी चाहिए।
इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि मोदीजी को हठात् जनमत के समर्थन की जरूरत क्यों है ? वे तो मानकर चल रहे हैं कि उनके साथ सारा देश खड़ा है,वे सही कर रहे हैं,जनता खुश है,बस जरा सी तकलीफ है,सब कुछ यदि पचास दिन तक ऐसे ही चलता रहा तो मोदीजी किला फतह कर लेंगे।
जनमत की राय का एप जारी करके मोदीजी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि आम जनता और खासकर भाजपा के सांसदों-विधायकों में एक अच्छा-खासा हिस्सा उनके पक्ष में नहीं है,इसलिए उन पर दवाब पैदा करने के लिए मोदीजी ने एप के जरिए जनमत की राय का औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दूसरा ,वे विपक्ष के खिलाफ प्रचार अभियान के अंग के रूप में इस एप को लेकर आए हैं,इसके सवालों में यह बात निहित है।
दिलचस्प बात यह है कि नोट बंदी पर रिजर्व बैंक के हक पर हमला बोला गया,संसद के हक पर हमला बोला गया,मीडिया-सोशलमीडिया के जरिए आम जनता के दिमाग पर हमले चल रहे हैं,अब एप के जरिए बमबर्षा की जाएगी।

रविवार, 20 नवंबर 2016

यह एंटी करप्शन नहीं फासिज्म है !

       देश में भ्रष्टाचार,बेईमानी और घूसखोरी के खिलाफ जून १९७५ को लाए गए आपातकाल को भारत की जनता भूली नहीं है। इंदिरा गांधी के उन दिनों के भाषणों को देखना चाहिए। मोदीजी इन दिनों जो भाषा बोल रहे हैं वह अधिनायकवाद की भाषा है,जब आपातकाल लगा तो उस समय भी इंदिराजी के साथ एक योगी था नाम था धीरेन्द्र ब्रह्मचारी , तकरीबन वैसा ही इस समय हो रहा है, मोदी के साथ योगी रामदेव हैं।आपातकाल को विनोवा भावे ने अनुशासन पर्व कहा था और इस समय अन्ना हजारे वही भाषा बोल रहे हैं। आरएसएस ने उस समय इंदिराजी को सहयोग देने के लिए तीनपत्र लिखे थे।आज संयोग से वे देश की केन्द्र सरकार चला रहे हैं उनका नायक पीएम है।
मोदी वही भाषा बोल रहे हैं जो आपातकाल लगाते समय श्रीमती इंदिरा गांधी बोल रही थी। वे भी कठोर फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं ,मोदीजी भी सख्त हैं।
आपातकाल में सभी अरबपति इंदिरा के साथ थे, मोदी के साथ भी कारपोरेट घराने हैं।जनता पर नसबंदी , राजनीतिक कारणों से गिरफ्तारी के बहाने बेशुमार जुल्म किए गए।

मोदीजी ने नोटबंदी के बहाने जनता जनजीवन और शांति पर सीधे हमला किया है। यह संयोग है बिडला की एक कंपनी ने "एक्टिव एप "के नाम से फासिस्ट नजरिए का विज्ञापन जारी किया है। आपातकाल में १जुलाई१९७५ को घनश्याम दास बिडला के नेतृत्व में देश के सभी अमीरों ने दिल्ली में आपातकाल और बीस सूत्री कार्यक्रम के समर्थन में जुलूस निकाला था।

जनता ने आपातकाल में असीम धैर्य का परिचय दिया था,लेकिन मन में वह कांग्रेस से नफरत करने लगी,किसी को अंदाजा नहीं लगा कि जनता नाराज है। सारा सरकारी तंत्र पीएम को यही कह रहा था जनता आपके साथ है, लेकिन चुनाव होने पर कांग्रेस बुरी तरह हार गयी। ठीक वैसा ही माहौल इन दिनों है, मोदीजी की योजना है कि जनता भडक जाए तो फिर सीधे सेना की मदद लेकर कुचल दिया जाए, मोदीजी ने जिस दिन नोटनीति घोषित की उसी दिन तीनों सेनाध्यक्षों के साथ बैठक की। हमारा अनुमान है यह बैठक पाक के सीमापर हो रहे हमलों को लेकर नहीं हुई।

आपातकाल को अध्यादेश के जरिए लागू किया गया।नोटबंदी को भी सरकारी आदेश के जरिए लागू किया गया है।दोनों ही मामलों में संसद की अवहेलना की गयी।
हम जनता के विवेक और संयम पर भरोसा करते हैं ,किसी भी अवस्था में जनता को संयम और विवेक को छोडना नहीं चाहिए।जरूरत है मोदी सरकार और आरएसएस के प्रति नफरत को और भी गहरा बनाएं और वोट और शांतिपूर्ण प्रतिवाद के जरिए अपना मन वोट में व्यक्त करें।

धिक्कार है ! नोटबंदी राष्ट्रीय अपराध है !

      जिन लोगों को बाजार नजर न आए,बैंक में लाइन नजर न आए,सूना एटीएम नजर न आए,पाकिस्तान से आए आतंकी नजर न आएं,जनता का क्रोध नजर न आए,औरतों और किसानों की पैसे की तंगी से पैदा हुई तकलीफें नजर न आएं,दैनिक मजदूरों-असंगठित मजदूरों-ठेके पर काम करने वाले मजदूरों-बैंक कर्मचारियों की परेशानियां और मौतें नजर न आएं, आश्चर्य है वे लोग बता रहे हैं वे देश जानते हैं और देश तरक्की कर रहा है !

आम जनता के जमाधन को अचल करना राष्ट्रीय अपराध है औंर यह राष्ट्रीय अपराध किया है आरएसएस-मोदी सरकार ने।
भक्त तो अंततःभक्त हैं पोंदू खोलकर महान नेता के सामने आँखें बंद करके खड़े हैं,कह रहे हैं मार ले ,जितनी चाहे मार ले,महान नेता जितनी मारता है उतने ही खुश होते हैं ,महान नेता जितना तबाह करता है खुश होते है ,महान नेता जितने ज्यादा करेंट के झटके देतां है,उतना ही जोर से कहते हैं "आई लाइक इट", लोकतंत्र में ठेठ भाषा में इसे बाट लगाना कहते हैं,लोकतंत्र की बाट लगी पड़ी है और ये लोग भविष्य की बातें कर रहे हैं,पहले कह रहे थे,परिणाम एक दो दिन में देख लेना,फिर बोले सात दिन में,ये दोनों ही समय निकल गए,परिणाम नहीं दिखा,हां,कुपरिणाम जरूर सामने आ गए हैं।
9नवम्बर से देश की अर्थ व्यवस्था में अकेला बाजार प्रतिदिन 30हजार करोड़ रूपये का नुकसान उठा रहा है, बैंकों ने कितना नुकसान उठाया है वह भी इसमें जोड़ लिया जाए तो जितना कालाधन यह सरकार पकड़ेगी उससे ज्यादा की अब तक क्षति हो चुकी है।सारे लोग कह रहे हैं 5-7लाख करोड़ रूपये से ज्यादा का कालाधन हाथ नहीं लगेगा,लेकिन इतने का तो देश का नुकसान अब तक हो चुका है।इसके बाद भी यदि आप कह रहे हैं कि नोटबंदी सही नीति है तो हम तो यही कहेंगे कि आपसे बड़ा बैसाखनंदन अब देश में दूसरा नहीं है।कम से कम मोटा गणित का हिसाब ही लगा लिया होता तो ,समझ जाते कि देश को किस दिशा में ले जा रहे हो।
मोदी सरकार की नोटबंदी की नीति मूलतः फंडामेंटलिस्ट आर्थिक नीति है,इसको उपभोग और उपभोक्तावाद से सख्त नफरत है,वे लगातार इस पर हमले करते रहते हैं,मोदीजी ने फंडामेंटलिस्टों की नीतियों के अनुरूप नोटबंदी लागू करके समूचे उपभोक्ता बाजार को ही तबाह कर दिया है ,जिस तरह बाजार और नागरिक को तबाह करके फंडामेंटलिस्ट आनंद मनाते हैं ठीक वैसा ही आनंद मोदीपंथी फंडामेंटलिस्ट मना रहे हैं।ये वे लोग हैं जो इस देश के हिन्दुत्ववादी अभियान और हमारी शिक्षा व्यवस्था के तंत्र से निकले हैं।
जनता को बिजली के करेंट के झटके देकर अर्थनीति लागू करने का फार्मूला फंडामेंटलिस्टों की देन है इसका हमारे देश के संविधान,संसद से स्वीकृत नीतियों और उदारतावादी मूल्यों से गहरा बैर है।
खतरा बड़ा है तुम तय करो किस ओर हो ,नई नोटबंदी की नीति फंडामेटलिस्ट समाज बनाने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है,इसके कारण आज समूचा लोकतंत्र खतरे में है।आपलोगों ने यदि जल्द ही विवेक से काम नहीं लिया तो तय है आगे और भी तकलीफें आने वाली हैं।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

अस्मिता का पुनर्पाठ

          आदमी की निगाह का निर्धारक तत्व है वर्तमान। वह जब भी कोई चीज़,वस्तु,घटना , परंपरा,इतिहास या लिंग को देखता है तो वर्तमान के नज़रिएसे देखता है। सवाल यह है इंटरनेट या सूचना तकनीकी युग में औरत कोकैसे देखें ? इंटरनेट में लिंगबोध या लिंग जैसी कोई चीज़ नहीं होती। लिंगकी पहचान या स्त्री अस्मिता मूलत:प्रेस क्रांति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित अवधारणा है। प्रेस क्रांति को ज्यों ज्यों अपदस्थ करते जाएँगे लिंगरहित अवस्था से जुड़ी समस्याओं में गुजरते जाएँगे। सवाल उठता है इंटरनेट युग या ऑनलाइन युगमें अस्मिता कैसेनिर्मित होती है ? हमारा आज भी अधिकांश समाज ग़ैर-इंटरनेट अवस्थामें जी रहा है, वहाँ ठीक से प्रेसक्रांति भी नहीं पहुँची है ऐसे में हमारे समाज में एक औरत में कई औरतों की इमेज और भाव-भंगिमाएँ सहज रूप मेंदेखी जा सकती हैं। मसलन्,जो लड़की इंटरनेट यूज़र है वह अतीत के स्त्रीमूल्यों से बुरी तरह बंधी है। जो पश्चिमी मूल्यों की क़ायल है वह दिमाग़ सेदहेज और संपत्ति के मोह में डूबी हुई है।तमाम क़िस्म के सामाजिकपरवर्जन में डूबी है।इसी तरह जो लड़की सूचना तकनीक का जमकरउपयोग कर रही है उनमें से अधिकांश की सामयिक राजनीति औरसमकालीन समस्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसी तरह नए बदलेमाहौल ने एक बड़ा परिवर्तन यह किया है कि उसने शिक्षित -अशिक्षितसभी क़िस्म की महिलाओं को मोबाइल से जोड़ दिया है।कम्युनिकेशन केलिहाज़ से यह लंबी छलाँग है। मोबाइल कम्युनिकेशन ने स्त्रीभेद औरउम्रभेद को एक ही झटके में ख़त्म कर दिया है। इसके कारण स्त्री के निजी और सार्वजनिक रूपों , बातों और संस्कारों में मूलगामी परिवर्तन हुआ है।

पहले स्त्री की कायिक मौजूदगी केन्द्र में थी लेकिन इंटरनेट-मोबाइल-एसएमएस ने स्त्री की भाषिक मौजूदगी को प्रमुख बना दिया है ।अब स्त्रीभाषा में मिलती है।पहले स्त्री के शरीर पर बहुत बातें हुई हैं, समूचाश्रृंगाररस स्त्री शरीर के ऊपर केन्द्रित है। लेकिन स्त्री की कायिक सत्ताका रीतिकाल के समापन के साथ पूँजीवाद ने नवीकरण किया है। पहलेसाहित्य में श्रृंगाररस थी जीवन में नहीं था । पूँजीवाद ने श्रृंगार कोवायवीयता बियावान से निकालकर भौतिक बनाया है ।

रैनेसां में स्त्री शरीर के सवाल केन्द्र में आते हैं।मध्यकाल में कविता में औरत का शरीर है जबकि रैनेसां में गद्य में औरत के शरीर कोरखा गया , कम्युनिकेशन और व्यापार के केन्द्र में स्त्री शरीर को रखा।यानी आधुनिककाल आते ही औरत को घर की चहारदीवारी से बाहरनिकाला गया।पहले की तुलना में औरत ने व्यापक सामाजिक स्थानबनाया । उसका बहुआयामी शोषण हुआ। नए श्रम विभाजन में औरत नेअपनी जगह बनायी। नए कम्युनिकेशन , नए सामाजिक बदलाव में औरतने सक्रिय भूमिका निभायी।ख़ासकर राजनीति और राजनीतिक अर्थशास्त्रके निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दिलचस्प बात यह है श्रृंगारऔरत करती थी लेकिन तय व्यवस्था ने किया। किसी महिला ने श्रृंगाररस पर नहीं लिखा। पुरूषों ने लिखा। इसी तरह सेक्स और उसका संबंधकैसा हो यह भी पुरूषों ने लिखा।कामसूत्र और श्रृंगार रस पर लिखा समूचाशास्त्र पुरूषों ने रचा। पुरूष माने व्यवस्था यह धारणा कई हज़ार सालों मेंनिर्मित हुई है। अब यह आदत बन गयी है। औरतों ने इन विषयों पर क्योंनहीं लिखा यह रहस्य बना हुआ है।जबकि उस ज़माने में औरतें जमकरलिख रही थीं।इसी तरह रैनेसां में स्त्री के सवाल केन्द्र में हैं लेकिन औरतेंचुप हैं ।औरतों की इस चुप्पी को जितना खोला जाएगा भिन्न क़िस्म केसवाल जन्म लेंगे।

मध्यकाल और रैनेसां में स्त्री को बाँधने, नियमित और नियंत्रित करनेके शास्त्र रचे गए।यह काम इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप ढंग से हुआफलत:स्त्री के तन,मन और अनुभूति को समाज सीमित रूप में ही जानपाया।औरत को इस क्रम में वैविध्यपूर्ण और मानवीय बनाने की बजायवायवीय-मिथकीय- रहस्यात्मक बना दिया।सच यह है मध्यकाल में पुरूष,औरत को बहुत कम जानता था।लेकिन आधुनिककाल में स्त्री के शरीर कीबजाय उसके सामाजिक अस्तित्व के सवाल जब उठे तो स्त्रीशरीर औरपुरूष के नज़रिए से मुक्ति का मार्ग निकला। स्त्री के बारे में , उसके मन,तन और सामाजिक कार्य व्यापार के बारे में सामाजिक सचेतनता बढी।कहने का आशय यह है कि तन के परे स्त्री के सामाजिक अस्तित्व केसवाल समाज और मीडिया में जितना स्थान घेरेंगे उतना ही स्त्रीताक़तवर बनेगी। स्त्री देह के सवाल पुरुष वर्चस्व को बनाए रखते हैं।जबकि स्त्री के सामाजिक अस्तित्व के सवालों पर संवाद और विमर्श सेमहिला सशक्तिकरण में इज़ाफ़ा होता है।

विगत चार दशकों के दौरान स्त्री अस्मिता की राजनीति साहित्यविमर्श के केन्द्र में है। क़ायदे से स्त्री अस्मिता को स्थिर अवधारणा के रूपमें देखने से बचना चाहिए। हिन्दी में अधिकांश लेखन स्त्री अस्मिता केस्थिर रूप से जुड़ा है। जबकि स्त्री अस्मिता को रूपान्तरित अवधारणा केरूप में देखना चाहिए। मसलन् एक स्त्री की अस्मिता सिर्फ़ स्त्री केविभिन्न रूपों में ही रूपान्तरित नहीं होती बल्कि अनेकबार वहलिंगातिक्रमण भी कर जाती है। मसलन् स्त्री अस्मिता या अस्मिता केस्थिर रूप के ज़रिए समलैंगिक या लेस्बियन अस्मिता को समझ ही नहींसकते। इसी तरह यदि मायावती-ममता -जयललिता आदि स्त्रियाँ जब राजनीति करती हैं तो वे मात्र स्त्री नहीं रह जातीं बल्कि उनकी राजनेता कीअस्मिता बन जाती है। यह वस्तुत: स्त्री अस्मिता का रूपान्तरित रूप है जोबेहद महत्वपूर्ण है। इसी तरह स्त्री और उच्च तकनीक के अन्तस्संबंधों सेजिस अस्मिता का निर्माण होता है वह स्त्री अस्मिता से भिन्न है। डोना हर्वेके अनुसार उच्च तकनीक के पैराडाइम में स्त्री या पुरूष का लिंगभेद ग़ायबहो जाता है, ऊँच -नीच, छोटेबडे का भेद ग़ायब हो जाता है। यहाँ पर तोज्ञान और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में पहचान बनती है। हम डोना केनज़रिए से असहमत हैं,अंत: वे सही हैं,यह स्थिति नेट के प्रसंग में कम है, लेकिन कम्प्यूटर के संदर्भ में ज़्यादा है। नेट पर बडे पैमाने परस्त्रीविरोधी सामग्री है, बेवसाइट हैं।अभी तक सोशलमीडिया लेकर बेवसाइट तक स्त्री के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है।वर्चुअल स्त्री के लिए समाज की ज़रूरत नहीं है लेकिन वास्तव औरत की दुनिया को समाज या समुदाय के बिना निर्मित नहीं कर सकते।वर्चुअल स्पेस में औरत नहीं उसकी इमेज मात्र रहती है। यह वास्तव स्त्री नहीं है।

रेमण्ड विलियम्स ने लिखा है मानवीय सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करते समय सबसे बाधा यह है कि हम तात्कालिक और नियमित अनुभवों को निष्पन्न विचारों के साथ जोड़ देते हैं।इस क्रम में सारवान अतीत की ओर जाते हैं साथ ही सामयिक जीवन की ओर भी जाते हैं।इसमें संबंधो,संस्थानों और उन रूपों की ओर जाते हैं जिनमें सक्रिय हैं और रूपान्तरित कर रहे हैं,इस प्रक्रिया को निर्माण प्रक्रिया न कहकर समग्र कहना समीचीन होगा। इस नजरिए से देखें तो रोमांस,नौकरी ,शादी ,शिक्षा आदि कोई भी चीज जो अस्मिता को बनाती है वह तात्कालिक सामाजिक संरचनाओं और रूपों से निर्मित नहीं होती।मनुष्य सिर्फ तात्कालिक चीजों से ही नहीं बनता।बल्कि उसके निर्माण की प्रक्रिया सामाजिक अभ्यासों पर निर्भर है।सामाजिक अभ्यासों का निर्माण दीर्घकालिंक प्रक्रिया में होता है।इसलिए अस्मिता पर विचार करते समय इस पर सोचें कि उसके निर्माण के उपकरण कौन से हैं ॽ

सारी दुनिया में अस्मिता की अवधारणा को जनप्रिय बनाने और स्थापित करने में अमेरिकी समाजविज्ञानी-मनोशास्त्री जी.एच.मीड की बहुत बड़ी भूमिका है।भारत में अस्मिता के जिन उपकरणों का जो लोग इस्तेमाल करते हैं उनमें मीड के नजरिए के उपकरण जाने-अनजाने चले आए हैं।मसलन्, अस्मिता को व्यक्ति की सहजजात क्षमताओं को सामाजिक जीवन,आत्म-चेतना और आत्म-अभिव्यंजनाओं के साथ जोड़कर सामाजिक इतिहास का उत्पाद बनाकर पेश किया गया।इस तरह की वस्तुगत प्रस्तुतियों को संवेदनाओं के साथ जोड़कर पेश किया गया और यही अस्मिता का बुनियादी आधार है। सामान्यतौर पर अस्मिता की अवधारणा सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक रूपों के साथ निजी जगत की अभिव्यंजना है। मेरे लेखे अस्मिता निजी जीवन की भूमिकाओं सामाजिक परिणाम है।इसलिए अस्मिता को सामाजिक आचार-व्यवहार और अभ्यासों के जरिए ही समझा जा सकता है।अस्मिता का एक छोर जिस तरह सामाजिक अभ्यासों से जुड़ा है वहीं दूसरा छोर मनोजगत की संरचनाओं से जुड़ा है।मसलन् व्यक्ति अपनी देखभाल कैसे करता है,उसके प्रेरक कौन हैं,उसके इर्द-गिर्द जो घट रहा है उसके प्रति उसका किस तरह का रूख है,वह करीबी यथार्थ की कितनी देखभाल करता है।क्योंकि इन सबसे मिलकर ही मानवीय गतिविधियों का निर्माण होता है।मसलन्, निज के संदर्भ में अस्मिता नजर आती है,उसके हक नजर आते हैं ,जबकि अन्य के प्रति हम बेगाने बने रहते हैं तो इसे अस्मिता की अनुभूति नहीं कहेंगे।अस्मिता बनती है निजी और सामाजिक सरोकारों के साथ जुड़ने से।इसमें निजी जितना महत्वपूर्ण है,सामाजिक भी उतना ही महत्वपूर्ण है।हमें निजी तौर पर प्रभुत्व जितनी पीड़ित करता है सामाजिक तौर पर भी वह उतना ही पीड़ादायक होता है।इसलिए प्रभुत्व के सवाल निजी और सामाजिक दोनों ही धरातल पर हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं।अस्मिता सिर्फ निज की मुक्ति का प्रकल्प नहीं है बल्कि सामाजिक मुक्ति का प्रकल्प भी है।अस्मिता बनाम प्रभुत्व का अन्तर्विरोध एकायामी नहीं है बल्कि बहुआयामी है।अमूमन हिन्दी में अस्मिता एकायामी दिशा में गतिशील है इसलिए सामाजिक स्तर पर प्रभावहीन है।अस्मिता के सवाल सुविधा,आरक्षण आदि के ही सवाल नहीं हैं बल्कि अस्मिता के सवाल दीर्घकालिक अभ्यासों और सांस्थानिक रूपों को चुनौती देने के सवाल भी हैं।

सन् 1977 के बाद से अस्मिता विमर्श पर जितना लिखा गया है उतना किसी अन्य विषय पर नहीं लिखा गया है।यह स्थिति भारत की ही नहीं सारी दुनिया की है।भारत के संदर्भ में आपातकाल मूल रूप से पैराडाइम बदलता है। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की रक्षा का सवाल सबसे बड़ा सवाल बन गया,लोकतंत्र हमारे देश की अस्मिता के पहचान का सबसे बड़ा रूप है,बाकी सारी अस्मिताएं इसके अधीन हैं या मातहत हैं। अस्मिता के सवाल लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में उठाए जाने चाहिए। आपातकाल के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन यही आया कि उसने पहले से चले आ रहे बहस के मुद्दों को सामाजिक क्षितिज से ठेलकर हाशिए पर डाल दिया और उन मुद्दों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया जो लोकतंत्र से सीधे जुड़े हुए थे।लोकतंत्र बचेगा तो देश बचेगा,तमाम किस्म की अस्मिताएं भी बचेंगी।यही वह मूल प्रस्थान बिंदु है जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में अस्मिता के सवाल उठे और उन पर व्यापकतौर पर लिखा गया।हिन्दी में दलित और स्त्री के संदर्भ में अस्मिता के सवाल ज्यादा उठे।

अस्मिता का कोई न मित्र है न शत्रु । अस्मिता की सारी आपत्तियां 'अन्याय' के खिलाफ हैं। 'अन्याय' के खिलाफ सामाजिक लामबंदी का उपकरण है अस्मिता। सवाल यह है अंत में अस्मिता किस बिंदु पर पहुँचती है ? क्या पुन: लौटकर अस्मिता की ओर लौटते हैं अथवा मानवता की ओर पहुँचते हैं।अस्मिता मूलत: राजनीतिक मंशा की देन है। अस्मिता पर राजनीति के बिना चर्चा संभव नहीं है। अस्मिता में निहित व्यक्तिगत और सामाजिक इच्छाओं को अभिव्यक्त किया है।अस्मिता विमर्श का इतिहास से गहरा संबंध है। इतिहास में जाए बिना इसका चित्रण और विवेचन संभव नहीं है।

अस्मिता विकल्प है। वह कभी स्वाभाविक नहीं होती। वह सामाजिक निर्मिति है।अस्मिता की धुरी है मनुष्य और मानवता।वह प्रतिस्पर्धी और बहुरूपी है। उसका दूसरा तत्व है भावुकता और सामाजिक तनाव। तीसरा , आत्महीनता। चौथा ,अस्मिता का सम-सामयिक फ्रेमवर्क । पांचवां , अस्मिता की राजनीति। अस्मिता विमर्श का सत्ता विमर्श के साथ गहरा संबंध है । छठा, अस्मिता विमर्श व्यक्तिवादी विमर्श है।अस्मिता विमर्श का इन दिनों जो रूप देखने में आ रहा है उसके दो प्रमुख आयाम है पहला है 'अन्याय' और दूसरा है ' इच्छापूर्त्ति'। सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों में इन दो रूपों में अस्मिता का व्यापक उपभोग हो रहा है। अस्मिता विमर्श मूलत: उत्पादक है। सामाजिक शिरकत को बढ़ावा देती है। ध्यान रहे जाति,लिंग,नस्ल,त्वचा,धर्म आदि पर आधारित अस्मिता की सीमित भूमिका होती है। अस्मिता का मूलाधार है मानवता। मनुष्य ही प्रधान अस्मिता है। बाकी इसके मुखौटे हैं।

अस्मिता के फ्रेमवर्क में इन दिनों अनेक लेखक-लेखिकाओं की आत्मकथाएं आई हैं। अतः आत्मकथा के प्रमुख तत्वों को जानना बेहद जरूरी है।आत्मकथा का पहला तत्व है व्यक्तिगत अस्मिता और निर्वैयक्तिकता। आत्मकथा का दूसरा तत्व है उपस्थिति,वर्तमान और प्रस्तुति। रोलां बार्थ के शब्दों में आत्मकथा को उपन्यास के चरित्रों के माध्यम से व्यक्त होना चाहिए।आत्मकथा लिखते समय चिर-परिचित क्षेत्र हमेशा परेशान करते हैं। चिर-परिचित वातावरण समस्या पैदा करता है।दलितों की आत्मकथा को ही लें।इन आत्मकथाओं में चिर-परिचित यथार्थ है भारत की जाति समस्या। जाति समस्या लेखक को परेशान और उत्तेजित दोनों ही करती है। जातिप्रथा को करीब से जानने के कारण लेखक को इसके बारे में सटीक वर्णन ,विवरण और ब्यौरे तैयार करने में मदद मिली है। लेखक को जातिप्रथा की अनेक 'दरारें' नजर आती हैं। आत्मकथा में 'दरारों' की केन्द्रीय भूमिका होती है। 'दरारें' पुराने व्यक्तित्व की जगह नए व्यक्तित्व को सामने लाने का काम करती हैं। लेखक की जाति उत्पीड़न की पीड़ाएं जितनी बार व्यक्त होती हैं उतनी ही बार उसका नया रूप सामने आता है। पुराना रूप बदल जाता है। लेखक कहीं पर भी पुराने रूप को स्थापित करने का प्रयास नहीं करता। हमेशा नए रूप को सामने लाता है। पुराने रूप के साथ सामंजस्य बिठाने की बजाय 'दरारों' और 'अंतरालों' के बीच में से नए रूप में लेखक सामने आता है। रोलां बार्थ ने आत्मकथा के बारे में लिखा है आत्मकथा में आप स्वयं को नहीं देखते बल्कि इमेज को देखते हैं। अपनी आंखों को नहीं देखते। आत्मकथा लेखन हमेशा विचलनभरा होता है। विचलन के ऊबड़ खाबड़ पैरामीटर सर्किल बनाते हैं। इन रास्तों से गुजरने के बाद एक ही संदेश संप्रेषित होता है कि जिंदगी अर्थपूर्ण है।

आत्मकथा का केन्द्र बिंदु कौन सा है ? यह खोजने की जरूरत है।आत्मकथा में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। आस्था के साथ लिखी आत्मकथा इमेज बनाती है। आत्मकथा में चित्रण के लिए चित्रण नहीं होता बल्कि प्रस्तुति पर जोर रहता है। आत्मकथा चिर-परिचित यथार्थ की प्रस्तुति होती है। प्रस्तुति में अंतराल ज्यादा साफ नजर आते हैं। क्योंकि आत्मकथा में समग्रता के तत्व का पालन नहीं होता।आत्मकथा में न्यूनतम अनुकरण, उद्धाटन ,विवरण और आख्यान होता है। आत्मकथा में नामों का जिक्र और नामों के साथ जुड़े अनुभवों का वर्णन होता है। फलत: आत्मकथा के दायरे में अनेक मील के पत्थर और पैरामीटर होते है। आत्मकथा भाषा प्रमुख है।वही आत्मकथा है। भाषा का संसार ही है जिसके कारण वह अपील करती है। आत्मकथा की भाषा में प्रस्तुति 'मैं' के अंत की घोषणा है। ''मैं'' संकेत मात्र होकर रह जाता है। भाषा सामूहिक प्रयासों से बनती है। आत्मकथा के 'मैं' का राजनीतिक - दार्शनिक चीजों में लोप हो जाता है। भाषाविज्ञान में लोप हो जाता है। आत्मकथा में '' मैं'' हमेशा घुला मिला होता है। आत्मकथा में जैसे 'तुम','वह','हम' होते हैं वैसे ही 'मैं' भी होता है। आत्मकथा में सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों एक हो जाते हैं। वक्ता और विषय एक हो जाते हैं।आत्मकथा का तीसरा प्रमुख तत्व है सुसंगत अनुभूति। जीवन के तथ्यों को सीधे बगैर किसी लाग-लपेट के अनुभूतियों के साथ पेश करना इसकी खूबी है। यहां तथ्यों को बगैर चासनी के पेश किया जाता है। बगैर किसी कृत्रिमता के पेश किया है। तथ्यों को अकृत्रिम भाव से पेश करना आत्मकथा का उत्तर आधुनिक फिनोमिना है। उत्तर आधुनिक आत्मकथा में अनिश्चितता,विचलन आदि को सहज ही देख सकते हैं। इसमें भाषा और विमर्श प्रभावशाली होते हैं।

आत्मकथा का पांचवां तत्व है छवि,काल्पनिक छवि और कल्पना। वाल्टर वूगीमैन के अनुसार '' वैध ज्ञान की पद्धति, कल्पना का अंत है।'' कहानी में शब्द,भाषा और भाषण चेतना निर्मित करते हैं। यथार्थ परिभाषित करते हैं। कल्पना के जरिए रूढिबद्धता से अपने को मुक्त करते हैं। अन्य किस्म का व्यक्तित्व निर्मित करते हैं। कल्पना के जरिए ही सामाजिक-साहित्यिक रूढियों को खारिज करने में मदद मिलती है। मनुष्य का रूपान्तरण होता है। यह रूपान्तरण सामंजस्य बिठाकर नहीं होता। व्यक्ति क्या है और व्यक्ति की क्या छवि बन रही है इन दोनों पर लेखक की नजर होती है,इसकी प्रस्तुति के दौरान लेखक रूढिबद्धता से बचने की कोशिश करता है। पूर्ण स्वतंत्रता और कल्पना का इस्तेमाल करता है। स्वतंत्रता और कल्पना के प्रयोग के कारण ही आत्मकथा ऊर्जा से भरी होती है। पढ़ने वालों के मन में ऊर्जा का संचार करती है। साहस और आस्था के साथ जोखिम उठाने की प्रेरणा देती है।

आत्मकथा का छठा तत्व है विमर्श,उद्धाटन और समापन। आत्मकथा में आत्म को उद्धाटित करने के लिए साहस की जरूरत होती है। अनेक लेखकों में साहस का अभाव होता है। आत्मविश्वास और साहस के बिना आत्मकथा लिखना संभव नहीं है। जो लेखन में जोखिम उठाते हैं और अपनी बात कहते हैं। वे अपना बोझ हलका करते हैं साथ ही समाज को भी खुली हवा में सांस लेने का मौका देते हैं।आत्म के बहाने लेखक लंबे समय से बंद कमरों को खोलता है। आत्मकथा में उद्धाटित करते समय लेखक डरता है, डरता है कि कहीं पकड़ा न जाऊँ ? अन्य के सामने नंगे खड़े होने का डर रहता है। यह शर्म और डर कहां से आता है ? असल में जो बौनेपन के शिकार होते हैं वे शर्माते हैं, डरते हैं। औसत बुद्धि के लेखक शर्माते और डरते हैं। इनमें से ज्यादातर रूढियों में जीते और तयशुदा मार्ग पर चलते हैं। 'क्लीचे' में जीते और बातें करते हैं।मजेदार बात यह है आत्मकथा में आत्म को बताना तो बहुत दूर की बात है लोग कहां जा रहे हैं यह तक साफतौर पर नहीं बताते। वे सामान्य सी चीज को बताने में डरते हैं, शरमाते हैं। उन्हें डर लगता है यदि अपनी बात बता देंगे तो पता नहीं क्या हो जाएगा। अमूमन हमें न बताने की आदत है। छिपाने की आदत है। छिपाना हमारी प्रकृत्ति है। जो छिपाया जा रहा है वह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही वह भी महत्वपूर्ण है जो बताया जा रहा है। आत्मकथा को लिखने का मकसद होता है बंद अनुभूतियों को खोलना। छिपे हुए को सामने लाना। आत्मकथा के वातावरण को विभिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना । निष्कर्ष निकालने से बचना।निष्कर्ष आत्मकथा को बंद गली में ले जाते हैं।आत्मकथा का मार्ग खुला होता है उसे निष्कर्ष के बहाने बंद करना आत्मकथा के मानकों की अवहेलना है। लेखन को इस बात से आंकना चाहिए कि आप कितना भूलते हैं और कितना क्षमा करते हैं। लेखन में अनुभवों की संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता।







शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

राष्ट्रवादी नंगई के प्रतिवाद में

        कल से मोदी के अंधभक्तों ने फेसबुक से लेकर टीवी चैनलों तक जो राष्ट्रवादी नंगई दिखाई है वह शर्मनाक है।ये सारी चीजें हम सबके लिए बार-बार आगाह कर रही हैं कि देश को हमारी जनता ने कितने खतरनाक लोगों के हाथों में सौंप दिया है.इससे एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि टीवी न्यूज चैनल समाचार देने के लक्ष्य से काफी दूर जा चुके हैं।जो लोग मोदी के हाथों में देश को सुरक्षित देख रहे थे ,वे भी चिन्तित हैं कि किस कम-अक्ल नेता के पल्ले पड़े हैं !

सवाल किए जा रहे है आप सर्जीकल स्ट्राइक के पक्ष में हैं ॽआप इसका स्वागत करते हैं ॽमेरा मानना है ये दोनों ही सवाल बेतुके और गलत मंशा से प्रेरित हैं। लेखकों-बुद्धिजीवियों और अमनपसंद जनता कभी भी इस तरह के सवालों को पसंद नहीं करती।लेखक के नाते हम सब समय जनता के साथ हैं और शांति के पक्ष में हैं।हमारे लिए राष्ट्र,राष्ट्रवाद,सेना आदि से शांति का दर्जा बहुत ऊपर हैं।जेनुइन लेखक कभी भी सेना ,सरकार और युद्ध के साथ नहीं रहे।जेनुइन लेखकों ने हर अवस्था में आतंकियों और साम्प्रदायिक ताकतों का जमकर विरोध किया।सिर्फ भाड़े के कलमघिस्सु ही युद्ध और उन्माद के पक्ष में हैं ।

जेनुइन लेखक की चिन्ताएं सत्य और शांति के साथ जुड़ी हैं,इस सत्य को फेसबुक और मीडिया में सक्रिय मतांधों की भीड़ नहीं समझ सकती। दिलचस्प पहलू यह है टीवी मीडिया इन मतांधों को व्यापक और अहर्निश कवरेज दे रहा है इसने देश में शांति के वातावरण को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया है। टीवी न्यूज चैनल और मोदी के अंधभक्त,जिनमें पेड नेटदल भी शामिल है,उनकी विगत तीन साल से यह कोशिश है कि हर हालत में अशान्ति बनाए रखी जाय,दुखद बात यह है केन्द्र सरकार भी इन मतांधों के इशारों पर हरकतें कर रही है। केन्द्र सरकार के मंत्री भी मतांधों की तरह बोल रहे हैं।

भारत-पाक के बीच के तनाव में हम सब यही चाहते हैं कि शान्ति हर हाल में बहाल हो।लेकिन संघ परिवार यह चाहता है कि अशान्ति बनाए रखी जाय।इसके लिए पाक विरोधी घृणा पैदा करने के लिए संघ के प्रचारतंत्र के जरिए रोज नए मुद्दे छोड़े जा रहे हैं ,इन मुद्दों को नियोजित ढ़ंग से टीवी न्यूज चैनलों से प्राइम टाइम में प्रक्षेपित किया जा रहा है,अधिकांश टीवी चैनलों के टॉक टाइम की ठेके पर खरीददारी हो चुकी है,हर चैनल संघी झूठ का बेहतरीन प्रस्तोता बनने की होड़ में लगा है।संघी प्रचारतंत्र का इस तरह इलैक्ट्रोनिकतंत्र खड़ा कर दिया गया है ।हम सबके लिए यह गंभीर चुनौती है।हमने कभी सोचा ही नहीं था कि टीवी न्यूज चैनल इस तरह संघी प्रचारतंत्र का अंग बनकर अहर्निश आम जनता के ऊपर हमले करेंगे,शांति के पक्षधरो पर हमले करेंगे.जनता के ऊपर ये हमले सभी किस्म के संचार के नियमों और संहिताओं को तोड़कर किए जा रहे हैं।कायदे से टीवी न्यूज चैनलों के इस तरह के रवैय्ये के खिलाफ संयुक्त भाव से लेखकों-बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों को एकजुट होकर प्रतिवाद करना चाहिए।आम जनता में रोज इन चैनलों को बेनकाब करना चाहिए।राज्यों से लेकर जिलों तक न्यूज चैनलों के खिलाफ कन्वेंशन और सभाएं आयोजित की जानी चाहिए।आम जमता को इन न्यूज चैनलों की हरकतों के खिलाफ सचेत करने और गोलबंद करने की सख्त जरूरत है।आज माध्यम साक्षरता को प्रधान एजेण्डा बनाने की जरूरत है।

भारत-पाक में सामान्य संबंध कैसे बहाल हों इस पर सरकार सोचे,लेकिन दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही देशों में सरकारें उन्मादियों,आतंकियों और साम्प्रदायिक ताकतों के हाथों में हैं।ये लोग अमेरिका के पिछलग्गू हैं।अमेरिका चाहता है भारत और उसके आसपास के मुल्कों में मित्रतापूर्ण वातावरण खत्म हो जाय।संयोग से दोनों सरकारें सचेत रूप से भारतीय उपमहाद्वीप का माहौल बिगाडने में लगी हैं।



लेखकों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे मोदी सरकार और सेना के साथ खड़े हों।लेखकों की जिम्मेदारी है वे आम जनता के साथ खड़े हों।भारतीय उपमहाद्वीप की जनता के साथ खड़े हों।उन तमाम प्रयासों का समर्थन करें जिनसे इस उपमहाद्वीप में शांति बहाल करने में मदद मिले।सेना आतंकियों को मारे,देश की सीमाओं की रक्षा करे,यह उसका नियमित काम है।इसके लिए सेना की जय हो जय हो करने की जरूरत नहीं है।मसलन्,मैं एक शिक्षक हूँ,नियमित कक्षा में जाकर पढाना मेरी नौकरी का हिस्सा है,मैं यह काम करके कोई महान् कार्य नहीं करता,इसके लिए मेरी प्रशंसा नहीं होनी चाहिए।इसी तरह सेना का काम है सीमाओं की चौकसी करना,शांति बहाल रखना,आतंकियों के हमलों को विफल करना,सेना यह काम करती रही है।सेना ने पहले भी अनेक बार सर्जीकल स्ट्राइक की हैं।यह विशिष्ट किस्म की हमलावर कार्रवाई है,लेकिन इसके लिए युद्धोन्माद की कोई जरूरत नहीं है।भारत की शांतिपसंद जनता,धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों,जेएनयू,जादवपुर,हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्रों पर वैचारिक हमले करने की कोई जरूरत नहीं है।कल मैं जब टाइम्स नाउ देख रहा था तो अर्णव गोस्वामी को मैंने देश के शांतिपसंद लोगों पर हमले करते पाया,जेएनयू आदि पर हमले करते हुए पाया,इस तरह के हमले बताते हैं कि आरएसएस के लोग अंदर तक कितने बर्बर हो चुके हैं और दिमागी तौर पर दिवालिया हो चुके हैं,अर्णव गोस्वमी जब मतांधों की तरह बोलता है तो वह वस्तुतःवही कह रहा होता है जो आरएसएस के लोग उसे बोलने के लिए कहते हैं,वह तो बेचारा संघ का भोंपू है,उसके जरिए आप संघ की प्रचार प्रणाली,राष्ट्रविरोधी प्रचार सामग्री को सहज ही देख सकते हैं।हो सकता है इतने दिनों तक संघ के इशारों पर नाचते-नाचते वह स्वाभाविक तौर पर मतांध हो गया हो !

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

वे 27साल और कलकत्ते का हिन्दी छंद


आज से 27 साल पहले कलकत्ते में मेरी शिक्षक के रूप में पहली और आखिरी पक्की नौकरी लगी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में 22अप्रैल 1989 को प्रवक्ता के रूप में मैंने नौकरी आरंभ की।बाद में सन् 1993 में रीडर और 2001 में प्रोफेसर बना। जिस समय नौकरी आरंभ की थी तो मेरे पास 2शोध डिग्रियां थीं,उनके शोध –प्रबंध थे,वे अप्रकाशित थे।जेएनयू में पढ़ने और छात्र राजनीति में सक्रिय रहने के कारण सारे देश में कमोबेश प्रगतिशील खेमे से जुड़े लोग मुझे जानते थे।मैं शुरू से ही रिजर्व प्रकृति का रहा हूँ।कोई बोलता है तो बोलता हूं,हलो करता है तो हलो करता हूँ,अधिकतम समय घर पर रहना और पढ़ना-लिखना,यही मेरी दिनचर्या रही।इस चक्कर में कलकत्ते में 27साल तक रहने के बाद भी मैं न तो बहुत सारे लोगों को नहीं जानता और न मेरी मित्रता है।

मैं जब दिल्ली में जेएनयू में पढ़ता था तो 1979 से 1987 के बीच में मेरा अधिकतर समय जेएनयू कैम्पस में ही गुजरा,दिल्ली के लेखकों में बहुत कम आना जाना होता था,जब कभी जनवादी लेखक संघ के ऑफिस जाता तो वहां लेखकों से मुलाकात हो जाती थी,बातें हो जाती थीं।उससे ज्यादा लेखकों से मिलने का मौका मुझे नहीं मिला।कलकत्ता आया तो मेरे मन में दो लोगों से मिलने की इच्छा थी वे हैं सत्यजित राय और उत्पल दत्त।इन दोनों से मैं इनके घर जाकर मिला और बातें कीं।इनमें उत्पल दत्त से दो बार मिला।बाकी बंगला बुद्धिजीवियों से गणतांत्रिक लेखक-शिल्पी संघ के दो-तीन कार्यक्रमों में सामान्य शिष्टाचार के नाते मुलाकात जरूर हुई। चूंकि मैं माकपा का सक्रिय सदस्य था,इस नाते लोकसभा-विधानसभा चुनावों के समय 1989 से 2005 तक मैंने वाममोर्चे और माकपा की चुनावी सभाओं में जमकर हिस्सा लिया और उसी के बहाने पश्चिम बंगाल को करीब से गैर-कम्युनिस्ट की नजर से देखा।माकपा की चुनाव सभाओं में अधिकतर दलितों-मुसलमानों और हिन्दीभाषी बस्तियों में सभाएं करने जाता था।इसके कारण इन समुदायों के जीवन को बहुत करीब से देखने का मौका मिला। इसके अलावा जनवादी लेखक संघ और पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी की गतिविधियों में भी हिस्सा लेता रहा,क्योंकि इन दोनो में एक दौर में जिम्मेदार पदों पर काम कर रहा था। यही ले-देकर अपना 27 साल का राजनीतिक-सामाजिक लेखा-जोखा है।मेरी इस दौरान किसी भी नेता ,मंत्री आदि से कोई मित्रता नहीं हो पायी।जबकि मैं बहुत सारे मंत्रियों-नेताओं आदि को जानता था।

कलकत्ता विश्वविद्यालय में मैंने जब पढ़ाना आरंभ किया तो उस समय मेरे दो लक्ष्य थे,पहला था मीडिया को एकदम नए नजरिए से देखा और लिखा जाए जिससे हिन्दी में मासमीडिया के पठन-पाठन को बदला जाए,उस समय यह लग रहा था कि यह बड़ा क्षेत्र है जो आने वाले दौर में अकादमिक और सामाजिक तौर पर बहुत गर्म रहेगा।इसी चीज को मद्देनजर रखते हुए मीडिया पर नियोजित ढ़ंग से काम आरंभ किया।खासकर मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र,संरचना और विचारधारा के सवालों को 1960 के बाद सारी दुनिया में पैदा हुए वामपंथी विचारकों के विचारों की रोशनी में विश्लेषित करने की कोशिश की,संभवतः पहलीबार हिन्दी को मीडिया में वाम विचारकों का परिचय मेरी किताबों के माध्यम से हुआ।किताबें कब और कैसे लिखी गयीं इन पर बाद में कभी विस्तार से लिखूँगा।

यह एक विलक्षण संयोग है कि मैंने मीडिया पर जितना भी लिखा निरूद्देश्य लिखा,किसी पाठ्यक्रम के लिए नहीं लिखा,मैंने जिन विषयों पर लिखा वे विषय पाठ्यक्रम में कहीं पर भी पढ़ाए नहीं जाते थे, लेकिन बाद में किताब बाजार में आने के बाद अनेक विश्वविद्यालयों के मीडिया पाठ्यक्रम बदले गए और आज स्थिति तुलनात्मक तौर पर बहुत बेहतर है।संतोष की बात है मेरी सभी किताबें बिना किसी प्रचार के बिकी हैं,एक किताब को छोड़कर कोई किताब सरकारी खरीद में नहीं ली गयी,सारी किताबें छात्रों-शिक्षकों और पाठकों ने खरीदीं और मुझे संतोष दिया।

मैंने रॉयल्टी के लिए लेखन आरंभ नहीं किया।बल्कि यह कहना सही होगा कि किताब लिखने में मेरे पैसे ज्यादा खर्च हुए,संतोष यह था कोई किताब मैंने अपने पैसे नहीं छपवाई,प्रकाशक को जैसे उचित लगा उसने किताबें बेचीं,मैंने कभी हिसाब नहीं मांगा,उसने मन मर्जी से जो दे दिया वह मैंने ले लिया।क्योंकि मुझे बाजार की हकीकत का अंदाजा है। बाजार का सत्य यह है कि किताब की रायल्टी से मेरा एक महिने का खर्चा नहीं उठ सकता।मैंने फिर भी किताबें लिखीं ,क्योंकि यह मेरी सामाजिक जिम्मेदारी का अंग है।लेखन को मैं लाइफ लाइन मानता हूँ। जो लिखता नहीं है वह मर जाता है।सन् 1989 में कोई किताब नहीं थी,आज तकरीबन 50 किताबें हैं।यही ले-देकर मेरा सबसे बड़ा सुख है।यही मेरा संतति-सुख भी है।यह पिछले 27साल की सामान्य गतिविधि का लेखा-जोखा है।

मेरा दूसरा लक्ष्य था विभाग के सहकर्मियों के साथ न्यूनतम मतभेद रखकर काम किया जाय।मैं जब कोलकाता आया था तो मेरा बाहरी व्यक्ति के रूप में,पार्टी कैडर के रूप में जमकर प्रचार किया गया, बहुत ही विपरीत माहौल था।आज भी है। संभवतःबंगाल में हिन्दी में मैं पहला पार्टी मेम्बर था जिसकी नियुक्ति हुई थी।उस समय माकपा के सारे देश के विश्वविद्यालयों में चंद शिक्षक थे जो पार्टी मेम्बर थे।मेरे नौकरी जॉयन के करने के साथ ही स्थानीय अखबारों में खूब उलटा-पुलटा छपवाया गया,इसकी कहानियां बाद में फिर कभी लिखूँगा।लेकिन यह सच है कि मैंने 27 साल एकदम विपरीत माहौल में काम किया ।मैंने कभी सहकर्मियों के साथ संवाद बंद नहीं किया । साथ में काम करना है तो इतना स्पेस छोड़ना होगा कि सहकर्मी अपने मन की कर सकें।कुल मिलाकर विभाग में दो बार विभाग की अध्यक्षता पूरे समय रही ,इसके अलावा कार्यवाहक अध्यक्ष का काम मुझे लेक्चरर के रूप में ही मिल गया जो कि वि.वि. में थोड़ा विरल है।मैं अपने 27 साल के कार्यकाल में कभी किसी भी काम से वीसी से नहीं मिला।मेरी प्रकृति है मैं अधिकारियों से दूर रहता हूँ। मुझे अपना काम पसंद है अधिकारियों से मिलना-जुलना,उनकी गुडबुक में रहना,चमचागिरी करना यह मेरी प्रकृति में नहीं है। मैंने इसकी कीमत भी दी,लेकिन कीमत बहुत कम है।मेरा मानना है एक शिक्षक को अपना स्वाभिमान और निजता की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए।

मैंने अपनी 27 साल की नौकरी में एक नियमित शिक्षक के रूप में काम किया,इसका मुझे फल मिला,छात्रों और शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिला।मैंने जब नौकरी आरंभ की उस समय विष्णुकांत शास्त्री,पीएन सिंह,शंभुनाथ पढा रहे थे,चन्द्रा पाडेय ने मेरे साथ ही नौकरी आरंभ की इस विभाग में।बाद में अमरनाथजी आए, उसके बाद सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी ने विभाग में सहकर्मी के रूप में काम करना शुरू किया।इस समय अमरनाथ ,सोमा बंध्योपाध्याय,राजश्री शुक्ला,राम आह्लाद चौधरी साथ काम कर रहे हैं।इन सभी को बहुत शुक्रिया।यही 27 साल की कहानी है।





रविवार, 25 सितंबर 2016

दिल्ली की बर्बरता का रहस्य

         दिल्ली ने बर्बरता के नए मानक बनाए हैं।दिल्ली में केन्द्र सरकार है,संसद है,सुप्रीम कोर्ट है, पुलिस है,सेना है,सबसे ज्यादा लेखक-बुद्धिजीवी है,राजनीतिक नेताओं का जमघट है।आईआईटी,एम्स,जामिया,डीयू जैसे संस्थान हैं। लेकिन दिल्ली में बर्बर समाज है।ऐसा बर्बर समाज जिसकी रोज दिल दहलाने वाली कहानियां मीडिया में आ रही हैं,आखिर दिल्ली इतनी बर्बर कैसे हो गयी,एक सभ्य शहर असभ्य और बर्बर शहर कैसे हो गया,इसके लक्षणों पर हम बहस क्यों नहीं करते,दिल्ली में बर्बरता के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा कहां मर गया,वे कौन सी चीजें हैं जिनसे दिल्ली में बर्बर समाज बना है,वे कौन लोग हैं जो बर्बरता के संरक्षक हैं,क्या हो गया दिल्ली में सक्रिय राजनीतिकदलों और स्वयंसेवी संगठनों को.वे चुप क्यों हैं ?

दिल्ली के बर्बर समाज का प्रधान कारण है दिल्ली के लोगों और संगठनों का दिल्ली के अंदर न झांकना,दिल्ली से अलगाव,स्वयं से अलगाव, वे हमेशा दिल्ली के बाहर झांकते हैं,बाहर जो हो रहा है,उस पर प्रतिक्रिया देते हैं,वे मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली में तो सब ठीक है,गड़बड़ी तो यूपी-बिहार-हरियाणा-पंजाब आदि में है,वे मानकर चल रहे हैं,दिल्ली के समाज के अंदर नहीं देश के अंदर झांकने की जरूरत है।

यह बाहर झांकने के बहाने दिल्ली के यथार्थ से आंखें चुराने की जो आदत है वही पहली बड़ी समस्या है।

दिल्ली के बाशिंदों खासकर बुद्धिजीवियों-लेखकों-राजनेताओं में राजधानी में रहने का थोथा अहंकार है,श्रेष्ठताबोध है,दूसरे से ऊँचा दिखने की उनमें थोथी होड़ है,इसने दिल्ली के यथार्थ से उनको पूरी तरह काट दिया है।

मसलन्,दिल्ली में पढ़ाने वाला हर हिन्दी का प्रोफेसर अपने को सरस्वती का पुत्र समझता है जबकि सच यह है कि वह एसएमएस खोलना तक ठीक से नहीं जानता।जहां बुद्धि का इस तरह का अहंकार हो,वहां यदि शिक्षितों का यथार्थ से अलगाव हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

दिल्ली के लोगों की खुशहाली,उनकी गाड़ी,शानो-शौकत,उनकी अदाएं सतह पर देखने में अच्छी लगती हैं लेकिन ये चीजें पूरे दिल्ली समाज को चिढ़ाती भी हैं।यह जिंदगी के नकलीपन का एक रूप है।

दिल्ली की जिन्दगी में नकलीपन की परतों को कायदे से खोला जाना चाहिए।नकलीपन की सबसे बड़ी परत है ग्राम्य बर्बरता का बचे रहना।यह गांवों को समाहित करके बसाया गया महानगर है।इस शहर में बाहर से लाखों लोग गांवों से आकर बस गए हैं।वे भी अपने साथ ग्राम्य बर्बरता के रूपों को लेकर आए हैं।हमने ग्राम्य बर्बरता को संस्कृति के लिए खतरे के रूप में देखा ही नहीं कभी उसके खिलाफ जंग नहीं लड़ी।बल्कि यों कहें दिल्ली ने ग्राम्य बर्बरता के साथ घोषित तौर पर सांस्कृतिक समझौता कर लिया। ग्राम्य बर्बरता असल में समूचे देश की समस्या है,लेकिन हमने कभी इसके खिलाफ कोई कार्ययोजना न तो संस्कृति में बनायी और न राजनीति में बनायी,उलटे गांवों के महिमामंडन का आड़ में ग्राम्य बर्बरता का महिमामंडन किया है। लोकसंस्कृति,लोकगीत,लोक संगीत की आड़ में उसे छिपाया है,उसके सवालों से आँखें चुरायी हैं।सवाल यह है ग्राम्य बर्बरता से क्या आज भी लड़ना चाहते हैं ?

दिल्ली के बर्बर समाज की धुरी है लंपटवर्ग।यह वह वर्ग है जिसने अपराध, असामाजिकता,ग्राम्य बर्बरता और आधुनिकता के मिश्रण से एक विलक्षण सामाजिक रसायन तैयार किया है,इस सामाजिक रसायन की निर्माण प्रक्रिया या उसके कारकों की विस्तार के साथ खुलकर चर्चा होनी चाहिए।

लंपटवर्ग की संस्कृति का समाज के विभिन्न सामाजिक समूहों पर प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है।यह नया उदीयमान वर्ग है इसका आपातकाल के बाद सारे देश में तेजी से विकास हुआ है।लंपटवर्ग में गांव से लेकर शहर तक के लोग शामिल हैं,इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।दंगों से लेकर दैनंदिन बर्बर हिंसाचार तक इस वर्ग की इमेजों को हम आए दिन मीडिया में देखते रहे हैं।लंपटवर्ग की ताकत बहुत बड़ी है।इसने धीरे धीरे नियोजित संगठित छोटे-छोटे गिरोहों की शक्ल में अपना विकास किया है।इस गिरोह का नैटवर्क केबल नैटवर्क वसूली से लेकर जाति पंचायतों तक फैला हुआ है।

सामान्य तौर पर हम लोग लंपटवर्ग की सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक शक्ति के सवालों पर बात करने से भागते रहे हैं।लेकिन सच्चाई यह है कि लंपटवर्ग आज सबसे शक्तिशाली है,भले ही वह सतह पर एकाकी नजर आता हो।लेकिन वह अकेला नहीं है,उसका अपना समाज है,उसके पास सामाजिक समर्थन है। इस लंपटवर्ग को वैचारिक खाद्य मासमीडिया और मासकल्चर के विभिन्न रूपों से मिलती रही है।

दिल्ली की महागनरीय संस्कृति के विकास के साथ लंपटवर्ग का समानान्तर विकास हुआ है । दिल्ली में लंपटवर्ग का पहला बर्बर हमला 1984 में सिख जनसंहार के समय देखने को मिला।यही वह लंपटवर्ग है जिसको हाल ही में हरियाणा के जाट आरक्षण आंदोलन में समूचे हरियाणा में लूटपाट करते देखा गया,हरियाणा,यूपी,आदि की विभिन्न जाति पंचायतों की हजारों की भीड़ में देखा गया। यही वह वर्ग है जो हठात् साम्प्रदायिक दंगे के समय हजारों की भीड़ में विभिन्न शहरों में हिंसा,आगजनी,लूटपाट करते देखा गया है।सवाल यह है लंपटवर्ग ,लंपट संस्कृति और लंपट समाज के आर्थिक स्रोत कौन से हैं और किस तरह की संस्कृति से वह संजीवनी प्राप्त करता है।



भारत में लोगों की आदत है हर चीज में जाति खोजने की।लेकिन लंपट समूह जातिरहित समूह है।लंपटों की कोई जाति नहीं होती।वे तो सिर्फ लंपट होते हैं।लंपट समूह ने एक नए किस्म की अ-लिखित आचार संहिता को जन्म दिया है।



दिल्ली की बर्बरता पर बातें करेंगे तो नेतागण तुरंत उसे गांव बनाम शहर,झोंपड पट्टी बनाम कालोनी,गरीब बनाम अमीर,निम्न जाति बनाम उच्चजाति आदि में बांट देंगे।लंपट समाज को इस तरह के वर्गीकरण में बांटकर नहीं देखा जाना चाहिए।लंपट समाज की पहली बड़ी विशेषता है संस्कृतिहीनता, प्रचलित सभी किस्म के सांस्कृतिक मूल्यों का अस्वीकार।

युद्ध का मतलब है राजनीतिक पराभव !

      कल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कोझीकोड में बोल रहे थे तो उनके चेहरे पर चिन्ताएं साफ नजर आ रही थीं,उनकी स्वाभाविक मुस्कान गायब थी,उनके ऊपर मीडिया का उन्मादी दवाब है।यह उन्मादी दवाब और किसी ने नहीं उनकी ढोल पार्टी ने ही पैदा किया है।इसे स्वनिर्मित मीडिया कैद भी कह सकते हैं। यह सच है कि भारत ने आतंकियों के उडी में हुए हमले में अपने 18बेहतरीन सैनिकों को खोया है।ये सैनिक न मारे जाते तब भी मीडिया उन्माद रहता।क्योंकि मोदी सरकार के पास विकास की कोई योजना नहीं है,उनकी सरकार को ढाई साल होने को आए वे अभी तक आम जनता को यह विश्वास नहीं दिला पाए हैं कि वे अच्छे प्रशासक हैं।अच्छे प्रशासक का मतलब अपने मंत्रियों में आतंक पैदा करना नहीं है,उनके अधिकार छीनकर पंगु बनाना नहीं है।मोदी ने सत्ता संभालते ही सभी मंत्रियों को अधिकारहीन बनाकर सबसे घटिया प्रशासक का परिचय दिया और आरंभ में ही साफ कर दिया कि वे एक बदनाम प्रधानमंत्री के रूप में ही सत्ता के गलियारों में जाने जाएंगे।

मैंने आज तक एक भी ऐसा अफसर नहीं देखा जो उनकी कार्यशैली की प्रशंसा करता हो।उनकी कार्यशैली ने चमचाशाही पैदा की है।नौकरशाहों में वफादारों की भीड़ पैदा की है लेकिन ईमानदार नौकरशाह मोदीजी से दूर रहना ही पसंद करते हैं। बाबा नागार्जुन के शब्दों को उधार लेकर कहूँ तो मोदी जी की विशेषता है ´तानाशाही तामझाम है लोकतंत्र का नारा।´यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें कश्मीर समस्या और पाक तनाव को देखने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जानते हैं कि युद्ध के बाद कोई प्रधानमंत्री भारतीय राजनीति में साबुत नहीं बचा है।सन् 1962 के बाद नेहरू की वह इमेज नहीं रही जो पहले थी,सन्1965 के युद्ध के बाद लाल बहादुर शास्त्रीजी टूट गए,कांग्रेस पूरी तरह कमजोर हो गयी,सन् 1971 में पाक को पराजित करके बंगलादेश बनाकर श्रीमती इंदिरा गांधी की आम जनता में सारी इमेज चंद सालों में ही भ्रष्टनेता की होकर रह गयी और बाबू जयप्रकाशनारायण,मोरारजी देसाई के हाथों उनको बिहार और गुजरात के साथ देश में मुँह की खानी पड़ी,स्थिति यहां तक बदतर हो गयी कि उनको अपनी रक्षा के लिए आपातकाल लगाना पड़ा।सन् 1971 की विजय के बाद इंदिरा गांधी और कांग्रेस वही नहीं रहे जो 1971 के पहले थे।कांग्रेस बुरी तरह टूटी ,देशभर में हारी।यही हाल कारगिल युद्ध में जीत के बाद भाजपा का हुआ,अटलजी को इस विजय के बाद हम देख नहीं पाए हैं।भाजपा के सारे ढोल-नगाड़े पराजय में बदल गए मनमोहन सिंह नए प्रधानमंत्री के रूप में सामने आए।कहने का अर्थ यह है कि युद्ध के बाद कोई भी पार्टी विजेता नहीं रही,सन् 1971 जैसी जीत किसी को नहीं मिली,लेकिन आपातकाल जैसा बदनाम कदम भी किसी और ने नहीं इंदिरा गांधी ने ही उठाया,आम जनता से सबसे ज्यादा कांग्रेस 1971 के बाद ही कटनी शुरू हुई है उसके बाद वह कभी टिकाऊ ढ़ंग से आम जनता में अपनी जड़ें नहीं बना पायी।

कहने का आशय यह कि युद्ध किसी का मित्र नहीं होता।युद्ध में कोई विजेता नहीं होता,युद्ध में कोई नायक नहीं होता।अमेरिका में देखें,इराक को तहस-नहस करने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के बारे में सोचें उनकी पार्टी इराक युद्ध के बाद लौट नहीं पाई जबकि इराक को वे जीत लिए,अफगानिस्तान को रौंद दिए।इन दो युद्धों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह कंगाल कर दिया।इराक युद्ध के बाद अमेरिका में सबसे ज्यादा किसी से जनता यदि घृणा करती थी तो वे थे राष्ट्रपति जार्ज बुश।

चूंकि आरएसएस के लोगों का नायक हिटलर है तो देखें द्वितीय विश्वयुद्ध ने हिटलर की सारी दुनिया में किस तरह की इमेज बनायी ॽसबसे ज्यादा घृणा किए जाने वाले नेता के रूप में सारी दुनिया हिटलर को याद करती है ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संभवतःयह सब जानते हैं कि सन् 1962,1965,1971 और अंत में कारगिल युद्ध ने तत्कालीन नेताओं को खैरात में जनाक्रोश दिया।कम से कम जनाक्रोश की कीमत पर पाक से युद्ध करना मोदीजी पसंद नहीं करेंगे।महत्वपूर्ण यह नहीं है कि युद्ध में कौन जीतेगा,महत्वपूर्ण यह है कि युद्ध के बाद नेता ,देश और भाजपा का क्या होगा ॽ युद्ध यदि होता है तो यह तय है भारत जीतेगा,लेकिन मोदी-भाजपा आम जनता में हार जाएंगे।

मैं हाल ही में कारगिल गया था वहां लोगों से मिला,बड़ी संख्या में कारगिल युद्ध के चश्मदीद गवाहों से भी मिला,कारगिल की गरीबी और बदहाल अवस्था से सब लोग परेशान हैं।कारगिल युद्ध जीतकर भी वहां की आम जनता के दिलों में हमारे नेता अपने लिए वह स्थान नहीं बना पाए जो होना चाहिए। कारगिल का इलाका बेहद गरीब है।विगत 76दिनों से कश्मीर में कर्फ्यू लगे होने के कारण वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गयी है। पर्यटन ही वहां रोटी-रोजी का एकमात्र सहारा है।जो लोग कश्मीर में कर्फ्यू लगाकर खुश हैं वे कश्मीर की जनता को तो कष्ट दे ही रहे हैं,कारगिल और लद्दाख की जनता को भी तकलीफ दे रहे हैं।

आज की स्थिति में यदि युद्ध होता है तो कश्मीर-कारगिल-लेह-लद्दाख की जनता हमारी सेना के साथ खड़ी होगी इसमें संदेह है।हम सब जानते हैं कि हमने कारगिल युद्ध सिर्फ अपनी सेना के बल पर नहीं जीता,बल्कि कारगिल-लद्धाख की जनता की मदद से वह युद्ध जीता गया।



मीडिया में जो लोग युद्ध करो,पाक पर हमला करो,आतंकी ठिकानों पर हमले करो आदि सुझाव दे रहे हैं वे नहीं जानते या फिर जान-बूझकर सच्चाई को छिपा रहे हैं।कश्मीर का इलाका अशांत रखकर ,आम जनता को घरों में कैद करके भारतीय सेना के बलबूते पर कभी भी सफलता नहीं मिल सकती।हमें ध्यान रखना होगा कि कारगिल युद्ध के समय कारगिल की खास जनजातियों की मदद के बाद ही हम कारगिल युद्ध में विजय हासिल कर पाए थे।उस समय कारगिल में जनता हमारे साथ थी।आज स्थिति एकदम विपरीत है।विगत76दिनों से कश्मीर-कारगिल-लेह-लद्दाख की जनता बेहद परेशान है और उसके मन में केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के खिलाफ जबर्दस्त गुस्सा है।जनता को विरोध में करके कोई देश युद्ध नहीं जीत पाया है।

सोमवार, 19 सितंबर 2016

कम्प्यूटर युग में हिन्दी

          

सरकार की आदत है वह कोई काम जलसे के बिना नहीं करती। सरकार की नजर प्रचार पर होती है वह जितना हिन्दीभाषा में काम करती है उससे ज्यादा ढोल पीटती है।
सवाल यह है दफ्तरी हिन्दी को प्रचार की जरूरत क्यों है ॽ जलसे की जरूरत क्यों है ॽ भाषा हमारे जीवन में रची-बसी होती है।अंग्रेजी पूरे शासनतंत्र में रची-बसी है,उसको कभी प्रचार की या हिन्दी दिवस की तरह अंग्रेजी दिवस मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। भाषा को जब हम जलसे का अंग बनाते हैं तो राजनीतिक बनाते हैं।हिन्दी दिवस की सारी मुसीबत यहीं पर है।यही वह बिन्दु है जहां से भाषा और राजनीति का खेल शुरू होता है।भाषा में भाषा रहे,जन-जीवन रहे,लेकिन अब उलटा हो गया है। भाषा से जन-जीवन गायब होता जा रहा है।हम सबके जन-जीवन में हिन्दी भाषा धीरे धीरे गायब होती जा रही है,दैनंदिन लिखित आचरण से हिन्दी कम होती जा रही है।भाषा का लिखित आचरण से कम होना चिन्ता की बात है।हमारे लिखित आचरण में हिन्दी कैसे व्यापक स्थान घेरे यह हमने नहीं सोचा,उलटे हम यह सोच रहे हैं कि सरकारी कामकाज में हिन्दी कैसे जगह बनाए।यानी हम हिन्दी को दफ्तरी भाषा के रूप में देखना चाहते हैं !

हिन्दी सरकारी भाषा या दफ्तरी भाषा नहीं है। हिन्दी हमारी जीवनभाषा है,वैसे ही जैसे बंगला हमारी जीवनभाषा है।हम जिस संकट से गुजर रहे हैं ,बंगाली भी उसी संकट से गुजर रहे हैं।अंग्रेजी वाले भी संभवतः उसी संकट से गुजर रहे हैं।आज सभी भाषाएं संकटग्रस्त हैं।हमने विलक्षण खाँचे बनाए हुए हैं हम हिन्दी का दर्द तो महसूस करते हैं लेकिन बंगला का दर्द महसूस नहीं करते।भाषा और जीवन में अलगाव बढ़ा है।इसने समूचे समाज और व्यक्ति के जीवन में व्याप्त तनावों और टकरावों को और भी सघन बना दिया है।

इन दिनों हम सब अपनी -अपनी भाषा के दुखों में फंसे हुए हैं। यह सड़े हुए आदमी का दुख है।नकली दुख है।यह भाषाप्रेम नहीं ,भाषायी ढ़ोंग है।यह भाषायी पिछड़ापन है।इसके कारण हम समग्रता में भाषा के सामने उपस्थित संकट को देख ही नहीं पा रहे।हमारे लिए आज महत्वपूर्ण यह नहीं है कि भाषा और समाज का अलगाव कैसे दूर करें,हमारे लिए जरूरी हो गया है कि सरकारी भाषा की सूची में अपनी भाषा को कैसे बिठाएं।सरकारी भाषा का पद जीवन की भाषा के पद से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है और यही वह बुनियादी घटिया समझ है जिसने हमें अंधभाषा प्रेमी बना दिया है।हिन्दीवाला बना दिया है।यह भावबोध सबसे घटिया भावबोध है।यह भावबोध भाषा विशेष के श्रेष्ठत्व पर टिका है।हम जब हिन्दी को या किसी भी भाषा को सरकारी भाषा बनाने की बात करते हैं तो भाषाय़ी असमानता की हिमायत कर रहे होते हैं।हमारे लिए सभी भाषाएं और बोलियां समान हैं और सबके हक समान हैं।लेकिन हो उलटा रहा है।तेरी भाषा-मेरी भाषा के क्रम में हमने भाषायी विद्वेष को पाला-पोसा है।बेहतर यही होगा कि हम भाषायी विद्वेष से बाहर निकलें। जीवन में भाषाप्रेम पैदा करें।सभी भाषाओं और बोलियों को समान दर्जा दें।किसी भी भाषा की निंदा न करें,किसी भी भाषा के प्रति विद्वेष पैदा न करें।दुख की बात है हमने भाषा विद्वेष को अपनी संपदा बना लिया है,हम सारी जिन्दगी अंग्रेजी भाषा से विद्वेष करते हैं और अंग्रेजी का ही जीवन में आचरण करते हैं।हमने कभी सोचा नहीं कि विद्वेष के कारण भाषा समाज में आगे नहीं बढ़ी है। प्रतिस्पर्धा के आधार पर कोई भी भाषा अपना विकास नहीं कर सकती।

मेरे लिए हिन्दी जीवन की भाषा है।इसके बिना मैं जी नहीं सकता।मैं सब भाषाओं और बोलियों से वैसे ही प्यार करता हूँ जिस तरह हिन्दी से प्यार करता हूँ।हिन्दी मेरे लिए रोजी-रोटी की और विचारों की भाषा है।भाषा का संबंध आपके आचरण और लेखन से है।राजनीति से नहीं।भाषा में विचारधारा नहीं होती।भाषा किसी एक समुदाय,एक वर्ग,एक राष्ट्र की नहीं होती वह तो पूरे समाज की सृष्टि होती है।



जब बाजार में कम्प्यूटर आया तो मैंने सबसे पहले उसे खरीदा,संभवतःबहुत कम हिन्दी शिक्षक और हिन्दी अधिकारी थे जो उस समय कम्प्यूटर इस्तेमाल करते थे।मैंने कम्प्यूटर की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली।मैं कम्प्यूटर के तंत्र को नहीं जानता,लेकिन मैंने अभ्यास करके कम्प्यूटर पर लिखना सीखा ,अपनी लिखने की आदत बदली,कम्प्यूटर पर पढ़ने का अभ्यास डाला।कम्प्यूटर आने के बाद से मैंने कभी हाथ से नहीं लिखा,अधिकांश समय किताबें भी डिजिटल में ही पढ़ता हूँ।जब आरंभ में लिखना शुरू किया तो उस समय यूनीकोड फॉण्ट नहीं था,कृति फॉण्ट था,उसमें ही लिखता था।बाद में जब पहलीबार ब्लॉग बनाया तो पता चला कि इंटरनेट पर यूनीकोड फॉण्ट में ही लिख सकते हैं और फिर मंगल फॉण्ट लिया,फिर लिखने की आदत बदली,और आज मंगल ही मंगल है।कहने का आशय यह कि हिन्दी या किसी भी भाषा को विकसित होना है तो उसे लेखन के विकसित तंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए। भाषा लेखन से बदलती है,समृद्ध होती है।भाषा बोलने मात्र से समृद्ध नहीं होती।

हमारे एक मित्र हैं ,प्रोफेसर हैं,जब भी कोई उनसे पूछता है भाईसाहब आपकी विचारधारा क्या है तुरंत कहते हैं हम तो मार्क्सवादी हैं! लेकिन ज्यों ही भाषा की समस्या पर सवाल दाग दो तो उनका मार्क्सवाद मुरझा जाता है! वे उस समय आरएसएस वालों की तरह हिन्दीवादी हो जाते हैं।मार्क्सवाद और संघी विचारधारा के इस खेल ने ही हिन्दी को कमजोर बनाया है।हिन्दी को कमजोर संवैधानिक भाषादृष्टि ने भी बनाया है।हम संविधान में अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को देखना नहीं चाहते।हम भूल जाते हैं कि हिन्दी संविधान या राष्ट्रवाद या राष्ट्र की नहीं जनता की भाषा है।वह भाषायी मित्रता और समानता में जी रही है,संविधान में नहीं।





मित्रता के मायने

        एक जमाना था जब राजनीति देखकर मित्र बनाया जाता था।मित्रता की राजनीति पर बातें होती थीं,केदारनाथ अग्रवाल और रामविलास शर्मा के बीच का मित्र संवाद जगजाहिर है।

मित्रता में राजनीति की तलाश का दौर क्या अब खत्म हो गया है ?मुझे लगता है अब खत्म हो गया है,अब स्वार्थों की मित्रता रह गयी है।यह उत्तर शीतयुद्धीय मित्रता का दौर है।इसमें मित्रता नहीं स्वार्थ बड़ा है।

सबसे अच्छी मित्रता वह है जो अज्ञात से ज्ञात की ओर ले जाए,लेकिन इन दिनों बीमारी यह है कि मित्रता में हम ज्ञात से ज्ञात की ओर ही जाते हैं।इस क्रम में वर्षों दोस्त रहते हैं लेकिन एक-दूसरे से कुछ नहीं सीखते। इस तरह के मित्र अज्ञात से डरते हैं,अज्ञात सामने आता है तो नाराज हो जाते हैं,बुरा मान जाते हैं।मुक्तिबोध के शब्दों में कहें " यह तो अपनी ही कील पर अपने ही आसपास घूमते रहना है।यह अच्छा नहीं है।इसलिए अज्ञात से डरने की जरूरत नहीं है। "

मुक्तिबोध ने मित्रता की पेचीदगियों के समाधान के रूप में बहुत महत्वपूर्ण समाधान पेश किया है,मैं स्वयं भी मुक्तिबोध के समाधान का कायल रहा हूँ और इसका पालन करता रहा हूँ।

मुक्तिबोध के अनुसार- "हम अपने जीवन को एक-उपन्यास समझ लें,और हमारे जीवन में आनेवाले लोगों को केवल पात्र,तो ज्यादा युक्ति-युक्त होगा और हमारा जीवन भी अधिक रसमय हो जाएगा।"

सवाल यह उठता है मैं आज यह सब क्यों लिख रहा हूँ इसलिए कि आज की जिन्दगी में एक-दूसरे को लेकर जहर बहुत उगला जा रहा है,इस जहर से बचने का एकमात्र रास्ता है मुक्तिबोधीय समाधान।

हमारे जो मित्र साहित्य में सत्य खोज रहे हैं ,सत्य की कसौटी खोज रहे हैं,साहित्य की प्रासंगिकता के सवालों के उत्तर खोज रहे हैं,वे एकायामी नजरिए के शिकार हैं। सत्य की कसौटी साहित्य नहीं ,मनुष्य का जीवन है,उसका अन्तर्जगत है।

साहित्य में सत्य नहीं होता,सत्य का आभास होता है।इसी तरह जो मित्र साहित्य में प्रकाश ही प्रकाश खोज रहे हैं,वे भूल कर रहे हैं,साहित्य का प्रकाश सत्य से भिन्न होता है। इसी प्रसंग में मुक्तिबोध ने एक बहुत ही मार्के की बात कही है, "साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा रखना मूर्खता है।"

मुक्तिबोध के अनुसार "आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है,स्वयं का चरित्र साक्षात्कार अत्यन्त कठिन है।" यहीं पर हमारी मित्रता की अनेक गुत्थियों के सवालों के उत्तर छिपे हैं।

अनेक मित्र मेरी तरह-तरह से आलोचना और विश्लेषण करते हैं,मैं उनकी बातों को आमतौर पर चुप सुन लेता हूँ ,बाद में सोचता हूँ,उसमें कोई बात ऐसी लगे जो मेरी कमजोरियों को सामने लाए तो तत्काल मान भी लेता हूँ।लेकिन मैं किसी भी मित्र के द्वारा किए गए व्यक्तित्व विश्लेषण को अंतिम मानने को तैयार नहीं हूँ।क्योंकि मैंने अपने को लगातार सुधारा है। लेकिन मुझे मुक्तिबोध की ही तरह स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण अविवेकपूर्ण लगता है।मौजूदा दौर उसी का है।

इस दौर में हमारे मित्र स्वयं-कृत व्यक्तित्व विश्लेषण को बड़ी निष्ठा और दृढ़ आस्था के साथ करते हैं।इस तरह के विश्लेषण को मुक्तिबोध ने अविवेकपूर्ण माना है।

मित्रता के लिए जरूरी है "मैं" भाव को न छोड़ें।अनेक मित्र हैं जो अपने स्वार्थ के लिए मुझे "मैं" भाव से दूर ले जाना चाहते हैं।इसके कारण अविवेकपूर्ण अधिकार भावना का भी प्रदर्शन करते हैं,इससे बचने की सलाह मुक्तिबोध देते हैं।नए दौर में मित्रता का मुहावरा सीखना हो तो मुक्तिबोध से सीखना चाहिए।

मित्रता में जब प्यार नाटकीय रूपों में व्यक्त होने लगे तो समझो मित्रता गयी पानी भरने ! मुक्तिबोध को घिन आती थी ऐसी मित्रता और इस तरह के मित्रों से ! इस तरह की मित्रता घरघोर आत्मबद्ध भाव की शिकार होती है।वह इल्जाजिक पर सवार होकर आती है।इस तरह की मित्रता तथाकथित "हृदय की गाथाओं" से गुजरकर हम तक आती है।इसमें अहंकार कूट-कूटकर भरा है।इसमें खास किस्म का मनोवैज्ञानिक स्वार्थ भी है।

मित्रता का नया पैमाना है आत्मरक्षा और उसके संबंध में अपनी दृढता के भावबोध का प्रदर्शन,मुक्तिबोध इसके गहरे आलोचक थे।

सबसे अच्छी दोस्त होती है माँ! दोस्त बनना है तो माँ जैसा त्याग और निस्वार्थ प्रेम पैदा करो।

सबसे अच्छा दोस्त वह जो एकांत दे!

सबसे अच्छा मित्र वह जो परेशान न करे !