सोमवार, 15 दिसंबर 2014

रायपुर साहित्य मेला के बहाने लिबरल बनने की चाह



   रायपुर साहित्य मेला में आना कई मायनों में सार्थक रहा, यह मेला असल में भाजपा के अंदर चल रही लिबरल राजनीतिक प्रक्रिया के अंग के रुप में देखा जाना चाहिए। भाजपा की आंतरिक संरचनाओं में लिबरल बनाम हिन्दुत्व के अंतर्विरोधों को सहज ही देखा जा सकता है। यह एक सच्चाई है कि छत्तीसगढ़ सरकार का हाल की कई अमानवीय - जनविरोधी घटनाओं के कारण आम जनता से अलगाव बढा है। जिस दिन (१२-१४ दिसम्बर २०१४) साहित्यमेला आरंभ हुआ उस दिन (१२ दिसम्बर) विभिन्न विरोधी राजनीतिक दलों ने रमन सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करते हुए जुलूस निकाले, कांग्रेस ने साहित्यकारों से साहित्य मेला में न जाने की अपील की। लेकिन इसके बावजूद यह मेला हुआ। स्थानीय साहित्यकारों को भी इस सम्मेलन में सक्रिय रुप से भाग लेते देखा गया। एक बुज़ुर्ग साहित्यकार ने केदारनाथ सिंह के रवैय्ये की तीखी आलोचना भी की, उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार का दिल्ली स्थित जनसंपर्क अधिकारी केदारजी के घर मुख्यमंत्री का निमंत्रण पत्र लेकर गया था उन्होंने आने के बारे में अपनी स्वीकृति भी दी,इसके बाद ही निमंत्रण पत्र से लेकर अन्य सभी प्रचार सामग्री  में उनका नाम दिया गया। स्थानीय लेखकों से बातें करके यह भी पता चला कि भाजपा सरकार का इस कार्यक्रम में कोई हस्तक्षेप नहीं था, स्थानीय लेखकों की मदद से ही सारा कार्यक्रम तय किया गया था । तीन दिन चले कार्यक्रम में कहीं पर भी कोई भाजपा या संघ का नेता नजर नहीं आया, समूचे कार्यक्रम को पेशेवर लोगों के जरिए संचालित किया गया, बाहर से आए लेखकों को बेहतरीन होटलों में रखा गया और सम्मानजनक ढंग से आदर-सत्कार किया गया। चूँकि यह हिन्दी के लेखकों का मेला था इसलिए राज्य सरकार ने राज्य के कॉलेज शिक्षकों को मेले में भाग लेने के लिए तीन दिन का अवकाश देकर बेहतर मिसाल क़ायम की। इन शिक्षकों के रहने आदि की भी व्यवस्था की गयी। दिलचस्प बात यह रही कि समूचा शहर साहित्यमेला की प्रचार सामग्री से पटा पडा था, हर जगह साहित्यकारों के नाम की सूचना सुंदर ढंग से दी गयी थी। मुश्किल यह थी कि जिस स्थान पर ( पुख़ौती मुक्तांगन, नया रायपुर ) यह मेला आयोजित किया गया था वह शहर से तक़रीबन २५किलोमीटर दूर था, पहले दो दिन कार्यक्रम में कम दर्शक थे लेकिन तीसरे दिन शहर के विभिन्न इलाक़ों से मुफ़्त बस सवारी की व्यवस्था करके सैंकडों लोगों को साहित्यमेला स्थल तक लाने में राज्य प्रशासन सफल रहा । इससे यह भी पता चला कि रायपुर में मेलाप्रेमी-साहित्यप्रेमी जनता भी है। जो लोग शहर के विभिन्न इलाक़ों से यहाँ आए उनमें मध्यवर्ग के मराठी भाषी और आसपास के गाँवों के लोग ज़्यादा थे। 
              

रायपुर साहित्यमेला में दिया गया भाषण- वर्चुअल रियलिटी की चुनौतियाँ


          आभासी संसार यानी वर्चुअल जगत,यह असल में वर्चुअल रियलिटी है। यह तकनीकी है,अवधारणा नहीं है,यह वातावरण है,एनवायरमेंट है। 7जून1989 को कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तंपनी ऑटोडेक्स और कम्प्यूटर कंपनी बीपीएल ने इसकी घोषणा की। इसका जन्म 1984 में एक विज्ञानकथा के गर्भ के जरिए हुआ।विलियम गिब्सन के उपन्यास 'न्यूरोमेंसर' से इसका सिलसिला शुरु होता है। इसका राजनीतिक आयाम भी है,यह 'स्टारवार'कार्यक्रम के गर्भ से निकली तकनीक है।यह समाजवाद के पराभव के साथ आई तकनीक है। जो लोग पूंजीवाद के प्रति आलोचनात्मक रवैय्या रखते थे,समाज को बदलना चाहते थे,जिनमें युद्ध के खिलाफ और शांति के पक्ष में भावनाएं थी उन्हीं को वर्चुअल रियलिटी ने निशाना बनाया।नई जीवनशैली दी।वर्चुअल रियलिटी के सिद्धांतकार जेरोन लेनियर ने वर्चुअल रियलिटी को पेश करते हुए नारा दिया '' जनता को कल्पनाशीलता से मुक्त करो,लोगों को संप्रेषित करने में मदद करो।'' आरंभ में वर्चुअल रियलिटी में सामाजिक आलोचना का भाव था बाद में सिर्फ तकनीकी रह गई।जो आलोचक थे वे व्यवसायी हो गए। 

     जेरोन लेनियर ने लिखा है ' वर्चुअल रियलिटी हमारे बाहरी जगत पर असर डालती है।हमारे आंतरिक जगत पर असर नहीं डालती।नया वस्तुगत यथार्थ पैदा करती है।तुम इसमें रमण कर सकते हो,यह संक्रमणशील है,तुम इसकी चीजों का दुरुपयोग नहीं कर सकते;यह कृत्रिम वातावरण की खुली तकनीकी है। इसने व्यक्ति,निजता, समुदाय, समय और आकार आदि के बारे में हमारी अब तक की समस्त धारणाओं को बदला है।' 

        वर्चुअल रियलिटी का काम है कार्रवाई,शिरकत और नियंत्रण स्थापित करना।यह दुनिया को वर्चस्ववादी दृष्टिकोण से देखने का विमर्श तैयार करती है।इसीलिए वर्चस्ववादी ताकतों को सबसे प्रिय है।इसका काम मुख्य काम है व्यस्त रखना।लक्ष्य है वर्चस्व स्थापित करना।इसका लक्ष्य सत्य या विवेक नहीं है, बल्कि निजी दृष्टिकोण है।यह समस्त विमर्शों को अपने मातहत बना लेना चाहती है।

         उल्लेखनीय है साँफ्टवेयर में संगीत क लय की तरह हर चीज को व्यक्त करने की क्षमता है । यहाँ संगीत से लेकर व्यक्ति तक हर चीज को व्यक्त कर सकते हैं । मौजूदा दौर में मनुष्य की हर गतिविधि सॉफ़्टवेयर से जुडी हैं या उसके जरिए संचालित हो रही हैं । कहने के लिए www के नाम पर तरह तरह के डिज़ायन और साफ्टवेयर इस्तेमाल किए जा रहे हैं इसे वेब 2.0 (web 2.0) की विचारधारा कहते हैं औ, सतह पर यह स्वतंत्रता का वायदा करती है लेकिन असलियत में यहाँ मनुष्य से ज़्यादा मशीनों को स्वतंत्रता है । वे इसे 'ओपेन कल्चरया खुली संस्कृति कहते हैं। ब्लागसोशलमीडियावीडियोयू -ट्यूब ,हल्की टिप्पणियाँ यहाँ नाटकीय और हार्मलेस नजर आती हैं ।लेकिन बृहत्तर स्तर पर यह विखंडित(फ्रेगमेंट) संस्कृति का लगावरहित संचार  है। इससे निजी मेल मुलाक़ात की परंपरा या आदत की क्षति होती है ।कम्युनिकेशन इन दिनों कभी -कभी अति-मानवीय फिनोमिना नजर आता है । मनुष्य से परे का फिनोमिना नजर आता है।

               मौजूदा दौर में व्यक्ति से हमारी आकांक्षाएँ बहुत कम हो गयी हैंन्यूनतम आकांक्षाओं के साथ जीना रहना सामान्य बात हो गयी है । तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह बताती है कि आदमी कितनी जल्दी बदलता है । डिजिटल डिज़ायन में छोटा सा परिवर्तन व्यापक स्तर पर समाज को प्रभावित करता है । ख़ासकर वे लोग जो इसका इस्तेमाल करते हैं वे तेज़ी से प्रभावित होते हैं । वर्चुअल रियलिटी की खूबी है कि निज की शक्ति और सामाजिक दृष्टि को रुपान्तरित करती है । इसी अर्थ में तकनीक को मनुष्य या निज का एक्सटेंशन कहा गया ।

     हमारी अस्मिता तुरंत गजटस बदलते ही रुपान्तरित हो जाती है । सूचना तकनीक के साथ सोशल इंजीनियरिंग के बिना काम करना संभव नहीं है। हमें सवाल करना चाहिए ब्लॉगिंगट्विटिंगफेसबुक आदि से व्यक्ति कितना बदलता है मैं क्या हूँ मेरी पहचान क्या है जिन लोगों ने इसके प्रोग्राम बनाए वे तो सिर्फ़ यही माँग करते हैं कि आप कम्प्यूटर से संपर्क-संबंध रखें यानी अपने दिमाग़ के किसी कोने के साथ कम्प्यूटर का संबंध बनाकर रखें। कम्प्यूटर में अनजान वैज्ञानिकों की भीड़ के बनाए प्रोग्राम हैं जिनके साथ हम संपर्क रखते हैं । यह एक तरह से अल्लम-गल्लम लोगों के समूह हैं ,जो मनुष्य कहलाते हैं। ये ही लोग हैं जो अंगागि-भाव से जुड़े हैं। इनकी राय ही वैध राय है । यहाँ रीयल व्यक्ति की नहीं कृत्रिम व्यक्ति की राय मिलती है । यह व्यक्ति भी फार्मूलाबद्ध ढंग से बोलता है । रुढिबद्ध भाषातयशुदा भाषा उसकी विशेषता है और यह सब काम मशीन करती है । यह कृत्रिम मनुष्य है जो कम्प्यूटर में बैठा हुआ है । लेकिन मनुष्य तो फ़ार्मूला नहीं है । मनुष्य फ्रेगमेंट नहीं है।लेनियर ने लिखा " फ्रेगमेंट आर नेट पीपुल्स"मनुष्य  तो परिवर्तनशील है। वह तो रहस्यमय विश्वासों में डूबा व्यक्ति है। लेनियर ने लिखा क्या कोई तकनीकीविद विश्वास करेगा कि अतीत से बेहतर भविष्य हो सकता है.तकनीकीविदों को आदर्शवादी होना चाहिए उनके पास आदर्श विचार होने चाहिए।

          तकनीकी विकास की प्रक्रिया निरंतर विभ्रम पैदा करती रही है। यह एक तरह का तकनीकी पागलपन भी है। इसके कारण वास्तव और आदर्श कम्प्यूटर में निरंतर विभ्रम बना रहता है । तकनीक यह मानकर चलती है कि प्रत्येक तकनीक नए के ब्राण्ड रुप में काम करे या  जानी जाय। समूची रणनीति यह है कि  हम कम्प्यूटर के बारे में यथार्थवादी ढंग से न सोचें। कम्प्यूटर के प्रोग्राम जिस गति से आ रहे हैं उसके कारण एकदिन हम बंद गली में जाकर क़ैद हो सकते हैं!

   नई तकनीक आने के साथ जो चीज़ें आई हैं वे मनुष्य के अंगों से जुड़ी हैं,मसलन् हमारे आँखों और कान से वेबकाम्स और मोबाइल फ़ोन जुड़े हैं ये हमारी स्मृति की विस्तारित मेमोरी या स्मृति का अंग हैं। ये वे स्ट्रक्चर हैं जो दुनिया और अन्य लोगों से  जोड़ सकता हैऔर ये संरचनाएँ पलटकर यह भी सोचने का मौक़ा देती हैं कि व्यक्ति चाहे तो स्वयं के बारे में सोच सकता है ।  

          लेनियर ने लिखा है कि तकनीक की नई उप-संस्कृति  आज सबसे ज्यादा प्रभावशाली है और असर पैदा करने वाली है। मजेदार बात यह है कि इस उप-संस्कृति का कोई नाम नहीं है। लेकिन साइबर वैज्ञानिक इसे डिजिटल माओवादी कहते हैं। इसमें आदिवासियों जैसा सांस्कृतिक खुलापन और साझा सर्जनात्मक तत्व हैं। यह कम्प्यूटर साइंस के कृत्रिम विवेक से जुड़ी है। इसकी विशेषता है संदर्भविरोध या एंटीकंटेस्ट,इसमें फाइलें एक-दूसरे के साथ बिना संदर्भ के साझा की जा सकती हैं,समाहित की जा सकती हैं। इसकी राजधानी सिलिकॉनवेली है। लेकिन इसकी शक्ति सारी दुनिया में फैली हुई है। इसने साइबर समग्रतावाद को जन्म दिया है। इस प्रसंग में लोग सबसे बड़ी गलती यह कर रहे हैं कि वे निजी नेटवर्क को ध्वस्त करने में लगे हैं। इससे अराजकता और बढ़ेगी। नेटवर्क में अराजकता न बढ़े इसके लिए जरुरी है कि ज्यादा से ज्यादा रियल लोग नेटवर्क में शिरकत करें। यदि नेटवर्क में अमूर्त लोग रहते हैं तो यह अर्थहीन हो जाएगा। नेटवर्क अर्थहीन न बने इसके लिए जरुरी है कि रीयल लोग नेटवर्क में सक्रिय हों। रीयल लोग रहेंगे तो नेटवर्क अर्थवान रहेगा। क्योंकि अर्थवत्ता नेटवर्क में नहीं रीयल लोगों में है।

     आभासी संसार में शब्द सर्जना का रीयल सुख तब ही संभव है जब हम इसके मसलों पर खुलकर बहस करें। हमें इसके मसलों को जानना होगा और उन पर बौद्धिकों के बीच में बहस चलानी होगी। हमारे वैज्ञानिकों से लेकर मीडिया तक,राजनेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं तक आभासी संसार का उपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है लेकिन उसके बुनियादी संरचना से जुड़े सवालों पर कोई गंभीर विचार विमर्श अभी नहीं हो रहा है। राजीव गांधी के कम्प्यूटर मिशन से लेकर नरेन्द्र मोदी के डिजिटल इंडिया के मिशन तक सूचना तकनीक के प्रचार-प्रसार का एक ही लक्ष्य है सूचना उपभोक्ता तैयार करना, सूचना तकनीक के उपभोक्ता तैयार करना, यहां तक कि हमारी तथाकथित बड़ी सूचना-संचार कंपनियां भी सेवाक्षेत्र में ही सीमित हैं और उन्हीं कामों पर जोर दे रही हैं जहां उपभोक्ता है और मुनाफा है। 

    आभासी संसार का सपना डिजिटल बुद्धिजीवी से जुड़ा है। आम जनता के दैनंदिन जीवन में डिजिटल कम्युनिकेशन का दखल बढ़ा है। हमें डिजिटल गुरु बनना है तो हमारे देश के बौद्धिकों को डिजिटल आदतों और संस्कारों को अपनाना होगा।  अभी अधिकांश बौद्धिक-लेखक आदि प्रिंटसंचार और तदजनित मसलों तक सीमित हैं। पूरा देश अभी भी 19वीं सदी के सवालों से जूझ रहा है। देश इन सवालों से मुक्त हो इसके लिए जरुरी है 'डिजिटल छलांग' लगाई जाय,'डिजिटल छलांग' बौद्धिकों को डिजिटली एक्टिव किए बिना संभव नहीं है। विश्व में बौद्धिक वर्चस्व की प्रक्रियाओं में दखल देने के लिए यह जरुरी है, वरना हमारे देश की डिजिटल प्रतिभाओं का अमेरिका-ब्रिटेन आदि देशों की ओर प्रतिभा पलायन होता रहेगा। आभासी संसार में शब्द सर्जना के लिए डिजिटल प्रतिभाओं को रोकना,उनके लिए यहां पर्याप्त संसाधन जुटाना और प्रभावशाली संरचनाओं का निर्माण करना बेहद जरुरी है। हम पहले से देश के प्रति बेगानेपन के शिकार थे,आभासी संसार ने हमारे बेगानेपन को और बढ़ाया है, कम्प्यूटर आने के बाद हमारे देश में प्रतिभा पलायन तेज हुआ है,इसे किसी भी कीमत पर रोकने की जरुरत है। 

  सवाल यह है कि संचार क्रांति को ज्ञानक्रांति में कैसे बदलें ? सूचनासमाज को ज्ञानसमाज कैसे बनाएं ? हमारे यहां ज्ञान समाज और सूचना समाज की समस्याओं को लेकर कोई बहस नहीं है,बौद्धिकों से लेकर मीडिया तक इसके सवालों पर एकसिरे से चुप्पी छाई हुई है, यह चुप्पी क्यों है ? मजेदार बात है सूचना तकनीक और आभासी संसार के बारे में अधिकांश खबरे कानून-व्यवस्था की समस्या से जुड़ी हैं या फिर उपभोक्ता के नजरिए से आती हैं यानी प्रोडक्ट की बिक्री के प्रसंग में सूचना तकनीकी की खबरें आ रही हैं। 

     आभासी संसार में शब्द सर्जना के लिए आंतरिक प्रतिबंधों,पुराने संस्कारों,खासकर कम्युनिकेशन की पुरानी आदतों और झिझक से लड़ने की जरुरत है। लेखक के नाते हमारे अंदर अनेक किस्म के आंतरिक प्रतिबंधकाम करते रहते हैं,इनसे लड़ने की जरुरत है। आभासी संसार में दखल बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के स्तर पर कम्प्यूटर और डिजिटल तकनीक के आविष्कार  और नए सॉफ्टवेयर निर्माण ध्यान देने की जरुरत है। अभी हमारे यहां सभी कम्पयूटर पाठ्यक्रम प्रयोजनमूलक हैं ,और सेवाक्षेत्र केन्द्रित हैं। उनमें रिसर्च और नए अनुसंधान के लिए कोई स्थान नहीं है। 

     आभासी संसार और भारतीय पूंजीवाद के रिश्ते को भी हमें खोलकर देखना चाहिए। हमारे देश का पूंजीपतिवर्ग तो कम्प्यूटर को सेवा और मुनाफे से अधिक मानकर नहीं चलता हमें विचार करना चाहिए कि हमारे देश के पूंजीपतिवर्ग की प्रकृति क्या है ? इससे तय होगा कि हमारे देश के आभासी संसार की प्रकृति क्या होगी ?

    हमारे देश के पूंजीपतिवर्ग की चारित्रिक विशेषता है मुनाफा-मुनाफा और सिर्फ मुनाफा कमाना। उसके पास मुनाफा कमाने का विवेक तो है लेकिन ज्ञान,खोज,अनुसंधान और नए के निर्माण की बुद्धि नहीं है। वह व्यापार में रिस्क लेता है लेकिन ज्ञान और खोज के क्षेत्र में उसने कभी कोई जोखिम नहीं उठाया। 'खोज' के बिना आधुनिकता का नजरिया नहीं बनता। यही वजह है भारत के पूंजीपति के पास दौलत है, मुनाफा कमाने की तकनीक है लेकिन खोज की संरचनाएं नहीं हैं। खोज के लिए वह निवेश नहीं करता। इससे भी भयानक स्थिति अकादमिक जगत में है वहां पर विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम तो हैं ,लेकिन 'खोज ' का नजरिया गायब है। ये पाठ्यक्रम सिर्फ नौकरी पाने की कला सिखाते है। इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि हमारे देश से प्रतिभा पलायन बड़े पैमाने पर हुआ। प्रतिभा पलायन से बचने का एक ही तरीका है प्रतिभा संरक्षण की संरचनाओं का निर्माण और संसाधनों का विकास। प्रतिभा को शत्रु या प्रतिस्पर्धी के रुप में देखने की बजाय मित्र-नागरिक के रुप में देखा जाय। प्रतिभाशाली व्यक्ति लोकतंत्र की शक्ति होता है। प्रतिभाशाली व्यक्ति को  डिजिटल  युग में दाखिल कर पाते हैं तो हमारे सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक विमर्श के बुनियादी आधार में परिवर्तन हो आएगा। हम देखेंगे कि हठात हम जिन मसलों पर उलझते थे वे एकसिरे से अप्रासंगिक हो गए है। डिजिटल इंडिया में जाने के लिए हम यह सोचे कि डिजिल संसार में डिजिटल उपभोक्तासमाज के साथ जाना चाहते हैं या फिर डिजिटल बौद्धिकों को भी साथ में लेकर जाना चाहते हैं। केन्द्रसरकार की संचारनीति का मुख्य जोर डिजिटल उपभोक्तावाद पर है। इन नीतियों के केन्द्र में सेवाक्षेत्र और सेवकक्षेत्र है,बौद्धिकों का क्षेत्र इसके लक्ष्य से बाहर है। 

         आभासी संसार का कोई भी परिप्रेक्ष्य स्थानीय संरचनाओं और तकनीकी सचेतनता पर आधारित है। भारत की लेखकीय दुनिया किस तरह की तकनीकीचेतना की अवस्था में है इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है कि आभासी संसार किस तरह की समस्याओं से मुखातिब है स्थिति यह है कि कम्युनिकेशन के कम्प्यूटरजनित रुपों के इस्तेमाल के मामले में लेखक-शिक्षक सबसे पीछे हैं, कायदे से इनको आगे होना चाहिए। हमारे यहां यह विलक्षण स्थिति है कि जो जितना ज्ञानी है,वह उतना ही कम्प्यूटर और डिजिटल सर्जना से दूर है। सचेतन लोगों का दूर रहना अपने आपमें बड़ी चुनौती है। वे दूर क्यों हैं ? इसके पीछे क्या कारण हैं ? सबसे पहले उसकी खोज करने की जरुरत है।भारतीय लेखक का मनोजगत और उसके दैनंदिन अभ्यास में पुरानी लेखकीय आदतें रुढ़िबद्ध हैं। इनके प्रति वह संरचना के स्तर पर संघर्ष नहीं करता। उसमें परिवर्तन की इच्छा का अभाव है। 

  आभासी संसार के आने के बाद भाषाओं के साथ सबसे बड़ी दुर्घटना घटी है। भाषा का पहले कोई मालिक नहीं होता था लेकिन अब भाषाओं के मालिक संगठन का उदय हो गया है। इसे 'यूनीकोड कंस्टोरियम' कहते हैं। इसमें Adobe Systems, Apple, Google, IBM, Microsoft, Oracle Corporation, Yahoo! and Oman's Ministry of Endowments and Religious Affairs सदस्य हैं। इसमें कोई भारतीय कंपनी नहीं है और नकोई भारतीय वैज्ञानिक इसके बोर्ड का सदस्य ै। लेकिन संस्था के रुप में भारत इसका सदस्य है। लेकिन भारत का कोई प्रतिनिधि उसकी सूची में नहीं है।  

   हिन्दी में वेबसाइट कल्चर का क्रमशःविकास हो रहा है,प्रयोजनमूलक कम्प्यूटर शिक्षा का भी विकास हो रहा है । लेकिन बाधाएं भी अनेक हैं,ब्लॉगिंग और वेबसाइट की मदद करने वाली संस्थाओं का अभाव है, हिन्दी वेबसाइट के प्रमोशन में व्यापार-जगत की कोई दिलचस्पी नहीं है। जबकि स्थानीय स्तर पर इस तरह के मददगार बनाए जा सकते,आर्थिक संसाधनों के अभाव में वेबसाइट को बनाए रखना अपने आप में बड़ी चुनौती है।  दूसरी बड़ी चुनौती है वैविध्यपूर्ण सामग्री के धारावाहिक फ्लो की। कायदे से भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों को,खा,कर छत्तीसगढ़ की सरकार को अपने सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सभी के लिए वाई-फाई की सुविधा देनी चाहिए,साथ ही विभिन्न विषयों के विभागों के वेबसाइट निर्माण के लिए नियमित आर्थिक मदद देनी चाहिए।साथ ही वेबप्रकोष्ठ भी बनाया जाय। सभी विभागों की शोध पत्रिकाओं को नेट पर होना चाहिए। 

    विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा पहल करके विभिन्न विषयों पर नई-पुरानी सामग्री के अपलोड करने की नियोजित स्कीम बनाकर लागू की जानी चाहिए। हम यदि डिजिटल इंडिया में जाना चाहते हैं तो यह अनिवार्य करें कि विभिन्न विश्वविद्यालयों की वेबसाइट पर विभिन्न विषयों की भारत के लेखकों,समाजविज्ञानियों,वैज्ञानिकों आदि की किताबें निबंध और पाठ्य सामग्री उपलब्ध हों। फिलहाल दशा यह है कि जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय की वेबसाइट तक दरिद्रतम रुप में है। कायदे से सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वाई-फाई की सुविधा हो, प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तक के सभी शिक्षकों को मुफ्त नेट कनेक्शन दिया जाय। साथ ही प्रत्येक स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय की वेबसाइट हो, वहां शिक्षकों-छात्रों के मुफ्तलेखन के वॉल हों। 

       प्राचीन रचनाओं को नेटलूट से बचाने के लिए भारत सरकार,लेखक संगठन और प्रकाशक संगठन मिलकर प्रयास करें वरना हमारी समस्त रचनाएं अमेरिकी दूरसंचार कंपनियों खासकर गूगल के स्वामित्व में चली जाएंगी। यह दुर्भाग्यजनक है कि हमने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है। इस प्रसंग में सबसे पहला कदम यही हो सकता है कि भारत अपना सर्चइंजन तैयार करके उपलब्ध कराए। साथ ही साइबर कानूनों का जनहित में पुनर्मूल्यांकन किया जाय। इसी प्रसंग में बौद्धिकसंपदा अधिकार कानून की नए सिरे से समीक्षा की जानी चाहिए। 

     गूगल ने 16दिसम्बर2014 से स्पेनिश गूगल न्यूजसेवा को स्थायी तौर पर बंद करने की घोषणा की है। यह घोषणा स्पेनिश बौद्धिक संपदा कानून में लाए गए परिवर्तन के कारण करनी पड़ी। स्पेन ने किसी लिंक और समाचारलेख से जुड़ी सामग्री के प्रकाशन को एकदम फ्री करने का फैसला किया है। जबकि गूगल इसके लिए पैसे लेता था। खासकर न्यूजलाइन एग्रीगेटर में मुफ्त इस्तेमाल करने का प्रावधान कर दिया है। उल्लेखनीय है गूगल लिंक शेयर करने और न्यूजलेख शेयर करने का चार्ज वसूल करता है। उल्लेखनीय है जर्मनी ने 2013 में इसी तरह का कानून बनाया था लेकिन गूगल के दबाव के कारण वे मुफ्त शेयर करने वाले प्रावधान को लागू नहीं कर पाए और गूगल को भुगतान करते रहे। हमें भारत के संदर्भ में इस पहलू की जांच करने की जरुरत है कि क्या न्यूजसेवा के जरिए लिंक और न्यूजलेख शेयर करने पर गूगल को भुगतान करना पड़ता है ?

       आभासी संसार में शब्द सर्जना का नया दौर डिजिटल बुक के साथ आरंभ होगा। हमें देखना चाहिए कि इसका क्या असर होगा ? क्या इससे किताब पढ़ने की आदत कम होगी ? क्या इससे पाठक की रीडिंग आदत का सार्वजनिक उदघाटन हो जाएगा तो पाठक पर कोई बुरा असर पड़ेगा? क्या इससे पाठक को संकलित की गयी सूचना पर वर्चस्व स्थापित करने का मौका मिलता है ? डिजिटल बुक पढ़ने की सूचना सार्वजनिक होने से क्या रीडिंग आदत पर कोई बुरा असर होता है ? अभी तक विचार की प्राइवेसी हुआ करती थी लेकिन डिजिटल बुक आने के बाद उसकी प्राइवेसी खत्म हो गयी है,यह प्राइवेसी हमारी अभिव्यक्ति की आजादी,विचार और खोज का हिस्सा थी। विचार की यदि प्राइवेसी नहीं होगी तो विचारों का विकास संभव नहीं है। यह हम सब जानते हैं कि मार्क्स,लेनिन, माओ,स्टालिन आदि के विचारों को पढ़ने के कारण पाठक के घरों पर छापे पड़े हैं,सजाएं तक हुई हैं,खासकर अमेरिका से लेकर भारत तक यह स्थिति देखने में आती है। यदि किसी के घर माओवादी सामग्री मिल जाय या किसी प्रतिबंधित संगठन की सामग्री मिल जाय तो पुलिस परेशान करना आरंभ कर देती है। अमेरिका-ब्रिटेन आदि में तो हालात यहां तक खराब हैं कि लाइब्रेरी आने-जाने वालों का रिकॉर्ड मगाकर देखा जा रहा है कि लाइब्रेरी में कौन सा पाठक किस तरह की किताबें पढ़ता है या लेता है।इसके आधार पर उसके खिलाफ कार्रवाई हो रही हैं। पिछले दिनों एक भारतीय को बम से संबंधित किताबें पढ़ने,वेबसाइट देखने के कारण 25साल की सजा ब्रिटेन की अदालत ने सुना दी थी,जबकि उस लड़के का किसी आतंकी संगठन से कोई संबंध नहीं था। 

   अभी हालात यह  हैं कि आप दुकान पर जाइए चुपचाप किताब खरीदो और चलते बनो, लेकिन इंटरनेट पर यह मुसीबत है कि आपके पीछे लोग लगे रहते हैं, क्या पढ़ रहे हो,कहां से पढ़ रहे हो।फोलो करते रहते हैं। इसके कारण यूजर को अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है, अनेक देशों में प्रतिबंधित साहित्य को पढ़ने वालों पर सख्त कार्रवाई हुई है। डिजिटल बुक में पाठक की पढ़ने की आदत गुप्त नहीं रहती, आप किसी भी पाठक की रीड़िंग आदत का विश्लेषण कर सकते हैं,पता कर सकते हैं कि वह कहां क्या पढ़ रहा है।जबकि पुराने ढ़ांचे में पढ़ने की आदत गुप्त रहती थी।  आप एकबार डिजिटल बुक की दुनिया में दाखिल हुए तो फिर दूरसंचार कंपनियां आपका पीछा करती रहती हैं कि कहां और क्या पढ़ रहे हो ,कहां से किताब ले रहे हो आदि। 

     डिजिटल बुक खोजते समय अपनी पढ़ने की प्राइवेसी का ख्याल रखें ऐसी किसी भी वेबसाइट पर डिजिटल बुक न पढ़ें जो आपसे रजिस्ट्रेशन की मांग करती हो या आपकी कोई निजी जानकारी मांगती हो। ऐसी वबसाइट पर जाएं जो पाठक की पहचान को जानने की कोशिश न करे, गुमनाम ढ़ंग से किताब पढ़ना जरुरी है,इससे आपको अपनी प्राइवेसी बचाने में मदद मिल सकती है। आपकी निजी सूचनाएं सुरक्षित रह सकती हैं। अनेक वेबसाइट हैं जहां डिजिटल बुक के साथ अनेक फीचर जुड़े होते हैं जिनकी हम उपेक्षा करते हैं और नहीं जानते कि इन फीचर का मतलब क्या है । मसलन् किंडल के जरिए सन् 2009 में अमाजॉन की किताब डाउनलोड करते समय यह पाया गया कि वहां एक ऐसा ही फीचर था जिसके जरिए अमाज़ान ने यूजर की सूचनाएं एकत्रित कर ली थीं, यह हाल सोनी 2005 में सोनी ने किया था वह अपनी साइट से डाउनलोड करने वालों की सूचनाएं एकत्रित करता रहा और इसके जरिए उसने यूजर की संगीत सुनने की आदतों और संगीत की प्राथमिकताओं को पता कर लिया। डिजिटल असमानता




मुख्य बिंदु - अमेरिकी विदेशनीति के अंतर्ग्रथित अंश के तौर पर इंटरनेट स्वाधीनता की मांग अमेरिका कर रहा है । चीन -ईरान आदि देशों के संदर्भ में ।साथ ही सोशलमीडिया की आजादी की माँग की जा रही है ।आज फेसबुक और ट्विटर को अमेरिका राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है । 
       
      इंटरनेट पर एक खास किस्म का अधिनायकवाद चल रहा है । मसलन राज्य बनाम राज्यविरोधी , पश्चिमपरस्त बनाम पश्चिमविरोधी । इस तरह का ध्रुवीकरण आमजनता के वैविध्य और विभिन्न स्तरों की अनदेखी करता है । मसलन रुस,चीन और भारत में जनता का बहुत बड़ा वर्ग है जो नव्य उदारीकरण का विरोधी है । 

          इंटरनेट पर राष्ट्रवाद ,अतिवाद और धार्मिक फंडामेंटलिज्म की आंधी चल रही है। इंटरनेट पर हिजबुल्ला ,मुस्लिम ब्रदरहुड या संघ परिवार की अतिसक्रियता बताती है कि इंटरनेट सभी को इमपावर करता है । खासकर उन ताकतों को ज्यादा ताकतवर बनाता है जो राज्य को कमज़ोर करना चाहते हैं ।उनको शक्ति देता है जो लोकतांत्रिकीकरण के पक्ष में हैं । 
        इसीतरह फेसबुक और ट्विटर सबको शक्तिशाली बनाते हैं । यह भी नहीं कह सकते कि इंटरनेट का सारा उत्पादन अच्छा है यहाँ पर बुरी चीजें भी हैं । 
           
डिजिटल असमानता -
    डिजिटल समानता का आधार है डिजिटल तकनीक की उपलब्धता और अनुपलब्धता । जिनके पास डिजिटल तकनीक है , कम्प्यूटर है या मोबाइल है । इसमें भी यह देखना होगा कि ब्राडबैंड या इंटरनेट कनेक्शन है या नहीं  ? कितने के पास इनमें से क्या है और क्या नहीं है । खासकर इंटरनेट यूजर और इंटरनेट के बिना । जो इंटरनेट यूजर हैं वे संचार समृद्ध हैं और जो इंटरनेट यूजर नहीं हैं वे संचार दरिद्र हैं । अब इनमें भी देखें कि किस जाति के लोगों में इंटरनेट की खपत ज्यादा है ? पश्चिम में काले - गोरे का भेद इस प्रसंग में आया 
है । भारत में यह भेद नहीं है लेकिन जो सामाजिक - धार्मिक जनसंख्या है उसके आधार पर हमें देखना चाहिए । इससे डिजिटल के सामाजिक विभाजन को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं । गाँव और शहर, कस्बे या छोटे शहर और महानगर, महानगर के मध्यवर्गीय और कच्ची बस्तियों या स्लम में रहने वालों के बीच का डिजिटल भेद समझने में मदद मिलेगी । 

       जातियों में भी किन जातियों में इंटरनेट का उपयोग ज्यादा है और किनमें कम है यह भी देखने की ज़रुरत है । 

कहने का तात्पर्य यह है कि भेद के जितने मौजूदा रुप हैं उनको इंटरनेट के साथ जोड़ें तो डिजिटलभेद का संसार खुल जाएगा । यह संभव है सवर्ण हो और सामाजिक भेदभाव का शिकार न हो लेकिन इंटरनेट कनेक्शन न रखता हो । असवर्ण हो और इंटरनेट कनेक्शन रखता हो तो उसे डिजिटल समृद्ध ही कहेंगे । भले ही सामाजिक जीवन में विभिन्न किस्म के भेदभाव का शिकार हो लेकिन वैसे नेट कनेक्शन रखता हो तो उसे कनेक्टेड कहेंगे । यह कनेक्टिविटी सुपरफीशियल है । नेट की दौड़ में वे ही लोग शामिल हो सकते हैं जो पहले से आर्थिक समर्थ हैं और नये कम्युनिकेशन की जिनको ज़रुरत है । मसलन ऐसे करोड़ों लोग हैं जो निजी कम्युनिकेशन में विश्वास करते हैं  और जिनको लोकल कम्युनिकेशन में ही रहना है तो वे क्यों लें नेट कनेक्शन या मोबाइल फोन ? 

डिजिटल भेदभाव को कम करने का एक बडासाधन है सामुदायिक काॅलसेंटर और सामुदायिक कम्प्यूटर सेवा । इसके अलावा इंटरनेट पर मुफ्त और ओपन सोर्स साॅफ्टवेयर की उपलब्धता और नेट संसाधनों के रुप में मुफ्त ज्ञान सामग्री और लाइब्रेरी के ज़रिए डाउनलोड सुविधा । 

डिजिटल भेदभाव न हो इसके लिए जरुरी है कि ब्राडबैंड को आम जनता तक पहुँचाया जाय । कम्प्यूटर तकनीक मुफ्त में प्रदान की जाय। 

विकसित देशों का डिजिटल परिदृश्य और अनुभव - 

डिजिटल भेदभाव का आलम यह है कि पाँच में एक वयस्क अमेरिकी वयस्क इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करता ।' पेव इंटरनेट प्रोजेक्ट ' के अनुसार सन् 2011 में 94 फीसदी काॅलेज शिक्षित अमेरिकन इंटरनेट का इस्तेमाल करते  थे , किंतु इनमें 43 फीसदी हाईस्कूल तक पास नहीं थे । आॅनलाइन रहने वालों में 62फीसदी लोग ऐसे थे जिनकी सालाना आमदनी  30 हज़ार डालर सालाना थी जबकि आॅनलाइन रहने वालों में 97 फीसदी की आमदनी 70 हज़ार डालर सालाना थी । इसमें भी नस्ल ,वर्ग और जातीयता का भेद बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है । 

'पेव' के सर्वे के अनुसार अमेरिका की 88 फीसदी आबादी के पास सेलफोन है, 57 फीसदी के पास लेपटाॅप है, 19फीसदी के पास ई बुक रीडर है और 19 फीसदी के पास टेबलेट कम्प्यूटर है ।  63 फीसदी अपने वायरलैस के जरिए आॅनलाइन रहते हैं । 
    जो नौजवान इंटरनेट पर नहीं जाते उनमें से आधे ने कहा है कि इंटरनेट उनके लिए प्रासंगिक नहीं है इसीलिए वे इंटरनेट पर नहीं जाते । इनमें से ज्यादातर ने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया । यहाँ तक कि इनमें से अधिकांश के घर में भी इंटरनेट नहीं है । औसतन पाँच में से एक युवक ने कहा कि वे नहीं जानते कि इंटरनेट तकनीक का प्रयोग कैसे करते हैं । दस में से एक युवक ने कहा कि वो भविष्य में ईमेल या इंटरनेट का प्रयोग करेगा । 

       अमेरिका में 27फीसदी युवा किसी न किसी रुप में अपाहिज हैं । जिन युवाओं में अपंगता  नहीं है उनमें से मात्र 54फीसदी ही इंटरनेट पर जाते हैं जबकि अपाहिज युवाओं 81 फीसदी जाते हैं । अपाहिज युवाओं में दो फीसदी युवा ऐसे हैं जो इंटरनेट का किसी भी तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते । 

' पेव' के सर्वे के अनुसार सन् 1995 में अमेरिका में दस में से एक वयस्क आॅनलाइन था । जबकि अगस्त 2011 में कराए सर्वे के अनुसार 78 फीसदी वयस्क और 95 फीसदी तरुण या अवयस्क आॅनलाइन पाए गए । 

एक ज़माना था जब इंटरनेट यूजर के डाटा विश्लेषण में नस्ल , पैसा ,लिंग,  अल्पसंख्यक और उम्र या शिक्षा को बुनियादी पैमाना मानकर देखा जाता था । लेकिन 'पेव' के नए सर्वे से पता चलता है कि अब ये पैमाने बेमानी हो गए हैं । 

सर्वे में उन कारणों की जाँच की गयी जिनके कारण सन् 2000 में पाँच में से एक अमेरिकी  वयस्क इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करता था । तकरीबन 54 फीसदी मानते थे कि इंटरनेट ख़तरनाक है , खासकर उम्रदराज लोग यह मानते थे ।इनकी हाईस्कूल से भी कम शिक्षा थी । तकरीबन 39फीसदी मानते थे कि इंटरनेट बड़ा खर्चीला है । खासकर 30साल से कम उम्र के ,हिस्पेनिक वयस्क मानते थे । इनकी शिक्षा हाईस्कूल से कम थी । लेकिन हाल में 2011 में कराए सर्वे से पता चला कि जो लोग इंटरनेट पर नहीं जाते उनमें से 49 फीसदी मानते हैं कि इंटरनेट उनके लिए प्रासंगिक नहीं है । वे इंटरनेट का किसी भी रुप में इस्तेमाल नहीं करना चाहते । इसके अलावा इंटरनेट का इस्तेमाल न करने वाले 21फीसदी ने कहा कि इंटरनेट खर्चीला है अतः वे नहीं जाते । तकरीबन इतने ही लोगों ने कहा कि वेइस्तेमाल करना नहीं जानते इसलिए नहीं जाते । 

'पेव' के सन् 2011 के सर्वे में खोज की गयी कि इंटरनेट का इस्तेमाल न करने के पीछे क्या कारण हैं ? पता चला 31फीसदी की कोई दिलचस्पी नहीं है, 12फीसदी ने कहा कम्प्यूटर नहीं है , 10 फीसदी ने कहा बहुत खर्चीला है , 9फीसद ने कहा मुश्किल है , 7फीसदी मानते हैं कि यह समय की बर्बादी है , 6फीसदी मानते हैं इंटरनेट उनके पास नहीं है , 6फीसदी ने कहा कि उनके पास सीखने का समय नहीं है ।4फीसद ने कहा कि वे सीखने के लिहाज अब काफ़ी बूढे हो गए हैं, 4फीसदी ने कहा कोई ज़रुरत नहीं है ।2फीसदी ने कहा कि नहीं जानते कैसे सीखें, 2 फीसदी अपंगता के कारण इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं ,1 फीसदी वायरस आदि के डर के  कारण इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं । 
     
अमेरिका के बारे में यह मिथ है कि वहाँ पर सबके पास फोन है ,इंटरनेट है या मोबाइल है । सच यह नहीं है । यह सच है कि अमेरिका में आम लोगों में फोन कनेक्टिविटी बेहतर है लेकिन गाँवों या छोटे शहरों में रहने वाले कम आयवर्ग के सभी लोगों में अभी तक फोन नहीं पहुँचा है । सैंट्रल सिटी और ग्रामीण इलाकों में फोन अभी तक 79.8 फीसदी लोगों तक पहुँचा है । गाँवों में 81.6फीसदी और शहरों में 81.7 फीसदी लोगों तक पहुँचा है । गाँव के लोगों में मात्र 4.5 आबादी तक कम्प्यूटर पहुंचा है । इनमें मात्र 23.6फीसदी घरों में कम्प्यूटर है । जबकि सैंट्रल सिटी में मात्र 7.6फीसदी आबादी तक पहुँच है और इनमें मात्र 43.9फीसदी के पास कम्प्यूटर है । जबकि शहरी इलाकों में मात्र 8.1जनता के पास कम्प्यूटर पहुँचा है और इसमें भी 44.1 फीसदी के पास निजी कम्प्यूटर है । 

ग्रामीण अमेरिकी घरों में (जिनमें अमेरिकन इण्डियन आदि आते हैं ) मात्र 75.5 फीसदी के पास फोन है । ग्रामीण काले लोगों में मात्र 6.4 फीसदी के पास कम्प्यूटर है । सैंट्रल सिटी के मात्र 10.4 काले लोगों के पास कम्प्यूटर है । सैंट्रल सिटीवासी हिस्पैनिकों में मात्र 10.5 के पास कम्प्यूटर है । शहरी काले लोगों में मात्र 11.8फीसदी के पास कम्प्यूटर है । एशियाई और पेसीफिक बाशिंदों में मात्र 26.7 फीसदी के पास कम्प्यूटर है । ग्रामीण नेटिव अमेरिकन के पास सबसे कम निजी कम्प्यूटर हैं । 

       सर्वोच्च 10 इंटरनेट पहुँच वाले देशों में अमेरिका सबसे ऊपर है और उसके बाद स्वीडन, डेनमार्क, स्विटजरलैंड, नाॅर्वे ,नीदरलैंड ,कनाडा ,आस्ट्रेलिया , सिंगापुर ,दक्षिण कोरिया का नाम आता है ।ये सभी समृद्ध देश हैं , कोरिया को छोड़कर । 

इसी तरह ब्रिटेन में चार में से एक वयस्क कभी भी इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करता ।एक तिहाई घरों में इंटरनेट कनेक्शन नहीं है । ब्रिटेन में 65साल उम्र से ऊपर के 39फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं है । सामाजिक- आर्थिक तौर पर कमज़ोर तबके के 49फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं है । सोशल हाउसिंग में रहने वाले 70 फीसदी लोगों के पास इंटरनेट नहीं या वे आॅनलाइन नहीं हैं । निचले स्तर पर रहने वाले मात्र 25 फीसदी को ही सरकारी तंत्र संपर्क कर पाता है यदि सबके साथ नेट संपर्क करे तो आर्थिकबोझ ही नहीं उठा सकती सरकार ? फलत: 75फीसदी से ज्यादा ग़रीब लोग आॅनलाइन सरकारी संपर्क के बाहर हैं । ब्रिटेन के जो लोग आॅनलाइन नहीं हैं उनमें 38 फीसदी लोग हैं जो बेरोजगार हैं । 

एक ज़माना था भारत और चीन में 50 -50मिलियन टेलीफोन उपभोक्ता थे । देखते ही देखते चीन का आंकड़ा बदल गया और भारत का आंकड़ा जस का तस बना रहा । चीन ने सालाना 25मिलियन का इजाफा किया है लेकिन उस गति से भारत अपना विकास नहीं कर पाया है । इस प्रसंग में बार बार अमेरिका का उदाहरण दिया जाता है लेकिन अभी भी वहाँ पर मात्र  65 फीसद जनता ही इंटरनेट की यूजर है वहाँ पर शत प्रतिशत का लक्ष्य सन् 2020 तक पाने का लक्ष्य रखा गया है । दूसरी बात यह कि अमेरिका में 35डालर प्रति माह इंटरनेट भाड़ा खर्च करने की स्थिति में ग्रामीण जन हैं । हमारे यहाँ तो महानगरीय मध्यवर्ग भी इतना पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं है । 

सारी दुनिया में कम्प्यूटर - इंटरनेट का विकास तेज़ी से हुआ है और यह देखा गया है कि सन् 1990 में विश्व के 100 में से 2.5 के पास पर्सनल कम्प्यूटर था ,सन् 2001में 100 में 9 के पास कम्प्यूटर आ गया । जबकि इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या 1990 में शून्य थी जो 2001 में बढ़कर 8.1 जनसंख्या हो गयी । 

आंकडे बताते हैं कि सन् 2001 में उत्तरी अमेरिका में 100 में 61.1कम्प्यूटर था । जबकि उस समय दक्षिण एशियाई देशों में 100 में 0.5 के पास कम्प्यूटर था । इसी तरह कम्प्यूटर की पहुँच अफ्रीकी देशों में 100 में से 1 एक के पास कम्प्यूटर था । 
यूरोप और सेंट्रल एशियाई देशों में 100 में 18.1 के पास कम्प्यूटर था । 

नेट लाइब्रेरी और ओपनसोर्स -

पहले इंटरनेट सामग्री के संरक्षण को लेकर अनेक असुविधाएं थीं लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं है ।  Wayback Machine आने के बाद से एक बड़ा परिवर्तन आया है कि इंटरनेट पर जो भी चीज़ इंटरनेट लाइब्रेरी में लिखी जाती है वह स्वत: संरक्षित हो जाती है । ब्रेवस्टार ने इंटरनेट आर्काइव नामक संस्था का गठन किया और इस पर वेबक मशीन का प्रयोग आरंभ किया । इस पर लाइब्रेरी है जिसमें हज़ारों किताबें हैं । इंटरनेट आर्काइव में इस समय 150 विलियम आइटम हैं । यह गुटेनवर्ग प्रकल्प से भिन्न लाइब्रेरी है । प्रोजेक्ट गुटेनवर्ग में चालीस हज़ार ई बुक हैं । इनको मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है  और किसी भी पापुलर ई बुक रुप में पढ़ा जा सकता है । 
        ओपन लाइब्रेरी की खूबी है कि यह दुनिया की अनेक लाइब्रेरी के साथ काम कर रही है और उनके केटेलाॅग को इंटरनेट पर लाए हैं । अभी तक ये 20मिलियन टाइटिल्स को स्कैन करके इंटरनेट पर दे चुके हैं । इसके अलावा 1.7 मिलियन किताबों को सार्वजनिक कर चुके हैं । यहाँ से मुफ्त में किताबें डाउनलोड की जा सकती हैं । 

       इंटरनेट प्रकाशन के तीन तत्व हैं । ये हैं स्पीड,काॅस्ट और एक्सिस । स्पीड में नकारात्मक ध्वनि भी निकलती है फास्ट फूड जैसी । यहाँ'फास्ट 'नकारात्मक है । इसी तरह 'फ्री' का अर्थ है अगंभीर या चीप । इसी प्रकार एक्सिस का मतलब है जनता का सहज पहुँच के दायरे में । अकादमिक ज्ञानदाता मानते रहे हैं कि ज्ञान को जनता में नहीं समझदारी या बुद्धिमान लोगों को ही देना चाहिए। जो ज्ञान सामान्य जनता को दिया जाता है वह सस्ता और ग़ैर अकादमिक होता है । 

भारत का अनुभव -

भारत में इनदिनों लेपटाॅप बाँटकर डिजिटल भेद को कम करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इससे डिजिटल भेद कम नहीं होगा । डिजिटल भेदभाव कम करने के लिए जरुरी है कि युवा इंटरनेट का नियमित इस्तेमाल करें । नियमित इस्तेमाल ही है जो उनको भेद ख़त्म करने में मदद करेगा । डिजिटल भेद को ख़त्म करने के लिए आॅनलाइन रहें और कंटेंट पैदा करें । उनकी डिजिटल सार्वजनिक मंचों पर आवाज सुनाई दे । 

डिजिटल स्पेस में दो तरह के लोग हैं एक वे हैं जो आॅनलाइन हैं और दूसरे वे हैं जो आॅफलाइन हैं । जो आॅलाइन हैं वे डिजिटल असमान हैं । डिजिटल समानता के लिए आॅनलाइन होना जरुरी है । नीति निर्माताओं औरपत्रकारों के लिए आ़नलाइन कंटेंट महत्वपूर्ण और जरुरी है । किसी के पास डिजिटल गैजेट्स हैं लेकिन वो आॅनलाइन नहीं रहता तो ऐसे व्यक्ति को डिजिटल असमान की कोटि में ही रखेंगे । 

डिजिटल विभाजन अमेरिका से लेकर भारत तक वैसे ही फैला है जैसे अभाव और बेकार फैली हुई है । मसलन यूरोपीय देशों में 77फीसदी लोग नेट से जुड़े हैं जबकि अफ्रीका में मात्र 7 फीसदी लोग ही नेट से जुड़े हैं । यही हाल भारत का है । अमेरिका का सारी दुनिया में ब्राॅडबैंड की प्रति व्यक्ति में चौदहवां स्थान है । यह डिजिटल अंतराल अविकसित मुल्कों में और भी ज्यादा है । 

       भारत में डिजिटल असमानता को देखने का तरीका यह भी हो सकता है कि कितने फीसदी एसीएसटी हैं जिनके पास डिजिटल गजैट्स हैं और नेट का नियमित प्रयोग करते हैं ? इसी तरह अल्पसंख्यकों और औरतों में कितने हैं जो नियमित नेट पर लिखते हैं । एक बड़ा हिस्सा है जो आॅनलाइन तो रहता है लेकिन कंटेंट निर्माण में उसकी कोई भूमिका नहीं है । हाशिए के जागरुक लोगों का कंटेंट निर्माण न करना उनको डिजिटल असमान में बनाए रखता है । 
     स्मार्ट फोन की हाल मेंखपत बढ़ी है लेकिन स्मार्ट फोन से आप १०पेज का लेख नहीं लिख सकते । डिजिटल असमानता को ख़त्म करने के लिए डिजिटल कंटेंट बनाएँ और डिजिटल उत्पादन पर नियंत्रण रखें और डिजिटल सक्रियता बनाए रखें । 

      भारत में दो तरह के डिजिटल लोग हैं एक वे हैं जो स्पीडवाले नेट का इस्तेमाल करते हैं और एक वे हैं जो धीमी गति के नेट का इस्तेमाल करते हैं या जिनके शहरों में नेट बेहद धीमी गति से चलता है । जो डिजिटल समर्थ  हैं वे राकेट की गति में रहते हैं और डिजिटल असमर्थ हैं वे चींटी की गति से चलते हैं । हमें देखना चाहिए कि हाइस्पीड नेट के कितने यूजर हैं ? 
     

        यह भी देखें  भारत में नेट कनेक्टेड सक्रिय मध्यवर्गीय कितना है ? 

अमेरिका और भारत में कम्प्यूटर के उपयोग को लेकर जो अंतर है उसे भी देखें , मसलन् , भारत में 1000 में 6 लोगों के पास निजी कम्प्यूटर है जबकि अमेरिका में 10 में से 6 के पास निजी कम्प्यूटर है । इस अंतराल का सूचना ,ज्ञान ,शिक्षा और विकास पर व्यापक असर देखा जा सकता है । 

डिजिटल भेदभाव का सीधा संबंध व्यक्ति की आय और बिजली की उपलब्धता से है । हमें देखना चाहिए प्रति व्यक्ति आमदनी क्या और वो किस किस मद में खर्च कितना पैसा खर्च करता है । इस नजरिए से देखने पर पाएंगे कि भारत में डिजिटल असमानता सभी असमानताओं से बड़ी असमानता है । मसलन प्रति व्यक्ति आय और उस आय का नियमित खर्चा किन किन मदों में होता है इसे देखना चाहिए । शहर और गाँव में किस रुप में विभिन्न मदों में खर्चा होता है और किस तरह उसका पूरे आर्थिकतंत्र पर असर हो रहाहै इसे देखने की ज़रुरत है । 

    डिजिटल असमानता को आय,व्यय,बिजली,शहर,गाँव, जाति,शिक्षा और भाषा के आधार पर देखा जाना चाहिए । 
यह भी देखें कि कम्प्यूटर है तो उसकी मेंटीनेंस भी है या नहीं । दफ्तरों में एक बड़ा हिस्सा मेंटीनेंस के बिना सड़ रहा है । दूसरा यह कि कम्प्यूटर है तो इंटरनेट है या नहीं ? एक कम्प्यूटर या एक इंटरनेट कनेक्शन को कितने लोग इस्तेमाल करते हैं  ? 
     भारत में स्थिति एकदम विलक्षण है । यहाँ पर टेलीफोन कनेक्शन का कुछ खास महानगरों या राज्यों में ही सबसे ज्यादा विकास हुआ है। यूएनडीपी रिपोर्ट 2001 के अनुसार 1.4 मिलियन टेलीफोन कनेक्शन में से 1.3 मिलियन कनेक्शन दिल्ली ,बंगलौर, तमिलनाडु ,दक्षिण कर्नाटक और महाराष्ट्र में ही हैं । 
      ताज़ा आंकडे बताते हैं कि दिसम्बर 2012 तक इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 15 करोड हो जाने का अनुमान है । शहरी भारत में 10.5करोड तथा ग्रामीण भारत में साढें चार करोड इंटरनेट यूजर हैं । वर्तमान यूजरों में 9.7 करोड एक्टिव यूजर हैं । यूजरों में 48 फीसदी यूजर इंटरनेट का हर हफ्ते कम से कम 5 या 6 बार इस्तेमाल करते हैं । जबकि 28फीसदी रोज़ इस्तेमाल करते हैं । 
     ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट यूजरों की संख्या में तेज़ी से इजाफा हुआ है । सन् 2010 में गांवों में 50लाख इंटरनेट यूजर थे वहीं जून 2012 में यह संख्या बढ़कर 3.8करोड हो गयी है । आई क्यूब की रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में रहने वाले 83.3 करोड लोगों में  7करोड लोग कम्प्यूटर साक्षर हैं । इसमें से 3.8करोड यूजर हैं और  3.1 करोड सक्रिय यूजर हैं । 
   ग्रामीण भारत में 32.3करोड मोबाइल धारकों में 36लाख ग्रामीण इंटरनेट का मोबाइल पर इस्तेमाल करते हैं । 
     इसके अलावा भारतीय भाषाओं का प्रयोग बढ रहा है । अभी79 फीसदी लोग अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल करते हैं । 
जबकि हिंदी इस्तेमाल करने वालों की संख्या 32 फीसद हो गयी है ।
आज भी लोग इंटरनेट सेवाओं को हासिल करने के लिए अपने घर से दस किलोमीटर दूर जाकर ही साइबर कैसे आदि की सेवाओं का उपयोग कर पाते हैं । 

इंटरनेट और विकास- 
  
      इंटरनेट का हमारी अर्थव्यवस्था के विकास में बहुत बड़ा योगदान है । भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इंटरनेट का 30विलियम डालर का योगदान है । आगामी तीन सालों में यह बढ़कर 100 विलियन डालर हो जाएगा । यानी कुल जीडीपी का 1.6फीसद है जो सन् 2015 तक विकसित होकर 3.3 फीसद हो जाएगा । इसके कारण इंटरनेटजनित अर्थव्यवस्था शिक्षा और स्वास्थ्य से भी बड़ी अर्थव्यवस्था हो जाएगी । 
      सन् 2015 तक इंटरनेटजनित उद्योग में 22मिलियन लोगों को नौकरी मिलेगी । मैंकेजीकी रिपोर्ट के अनुसार भारत में पीसी की पहुँच अभी 1000 लोगों में मात्र 48 के बीच है । यह अर्जेंटीना,मैक्सिको और वियतनाम से भी नीचे है । यानी सारी दुनिया में 57वें नम्बर पर हैं । 



डिजिटल असमानता को परखने के पैमाने - 

डिजिटल असमानता के तीन बड़े रुप हैं पहला, विकसित और अविकसित देशों के बीच डिजिटल असमानता , दूसरा एक ही देश में असमानता और तीसरा डिजिटल यूजरों के बीच असमानता । 
डिजिटल असमानता को देखने के लिए हम देखें कि प्रथम, क्या यूजर आर्थिक तौर सक्षम है और इंटरनेट आदि का खर्चा उठा सकता है ? दूसरा ,क्या  यूजर ज्ञानात्मकतौर पर सक्षम है ? क्या कम्प्यूटर और इंटरनेट के उपयोग के तरीकों को बेहतर ढंग से जानता है ? तीसरा ,क्या यूजर के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट पर पर्याप्त सामग्री है ? चौथा , क्या यूजर जानता है कि उसके पास राजनीतिक संरचनाओं और सत्ता की संरचनाओं का वह इंटरनेट पर किस तरह इस्तेमाल करे ? किस तरह कम्युनिकेट करे ? पाँचवा , यूजर की शिक्षा और ज्ञान का स्तर किस तरह का है और वह इसका सही उपयोग जानता है कि नहीं ? छठा , किसी समुदाय विशेष के ईज्ञान को जानने के लिए उसकी भाषा ,शिक्षा , साक्षरता और संस्थान संरचनाओं और सूचना और तकनीक के इस्तेमाल के स्तर का ज्ञान होना चाहिए । यानी डिजिटल असमानता को समझने के लिए समग्र नजरिए की ज़रुरत है । किसी एक पहलू पर केन्द्रित होकर देखने से डिजिटल असमानता को देख ही नहीं सकते । 
      इसके अलावा यूजर की तकनीकी क्षमता या कौशल की भी बडी भूमिका होती है । मसलन् जो तकनीक उपयोग में लायी जा रही है उसका तकनीकी स्तर क्या है ? तकनीक के उपयोग की कितनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता है ? सामाजिकतौर पर किस तरह की मदद मिल सकती है और किस तरह के नेटवर्क मदद के लिए उपलब्ध हैं ? तकनीक के इस्तेमाल का स्तर क्या ? ये चार बड़े कारक हैं जिनके आधार पर तकनीकी क्षमता का अनुमान किया जा सकता है । 

औरतों के संदर्भ में - 
  
 यह सच है  कि बाज़ार में सबसे बड़ी क्रेता औरतें हैं लेकिन कम्प्यूटर की सबसे बड़ी यूजर अभी औरतें नहीं हैं । अधिकांश औरतें अभी भी इंटरनेट और कम्प्यूटर के दायरे के बाहर हैं । तीन-चौथाई औरतों ने तो अभी बटन तक नहीं पकड़ी है । हाल ही में अमेरिका में पहलीबार ऐसा हुआ है कि पुरुषों की तुलना में औरतों की संख्या में औसतन इजाफा हुआ है। एशिया में भी पुरुष समुदाय बड़ा यूजर है इंटरनेट का । मसलन औरतें बहुत कम ईमेल रखती हैं । औरतें जितनी मोबाइल फोन और इंटरनेट सेवाओं को जानेंगी या इनका उपयोग करेंगी उतना ही वे अभिव्यक्ति और गतिशीलता के मामले में सक्रिय होंगी । औरत की सक्रियता और पहचान को निर्मित करने और उसे सूचना संपन्न बनाने में यह माध्यम बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकता है । यहाँ तक कि उसकी बाज़ार संबंधी समझ बनाने और अच्छा क्रेता बनाने में भी मददगार हो सकता है । स्त्री के सबलीकरण में संचार की बड़ी भूमिका रही है। स्त्री को अपनी बात संप्रेषित करने के अत्याधुनिक उपकरण और परिवेश मुहैय्या कराना समाज का दायित्व है और इसमें सरकारों की बड़ी भूमिका हो सकती है । 

ब्लाग के फ़ायदे -

ब्लाॅग  ने सहभागिता और सामाजिक लेखन को बढ़ावा दिया है और एक नए किस्म की संस्कृति पैदा की है । कम्युनिकेशन के रुप में लेखक और पाठक का नया संबंध बना है जो पाठक है वह लेखक भी है और अपने विचार रीयलटाइम में दे सकता है । ब्लाॅग लेखन में गद्य या पद्य के अलावा या यों कहें शब्दों के अलावा अनेक मीडिया रुपों का भी उपयोग किया जा सकता है । कृति के इस्तेमाल के प्रति पुराना नज़रिया बदला है । आप मेरे लेखन का इस्तेमाल करें मैं आपके लेखन का इस्तेमाल करूँ । यह लेखन में खुले,पारदर्शी और सहभागी लेखनयुग के आगमन की सूचना है । 

ब्लाॅग में शोध कार्यों के लिए भी इस्तेमाल की अनंत संभावनाएं हैं । शोधार्थी अपना ब्लाॅग बनाएँ और इसमें सहपाठी मित्रों को शामिल करें। साहित्य का शिक्षक होने के नाते मैं नए मीडिया की उपेक्षा नहीं कर सकता। नया मीडिया नई संवेदनशीलता और नए दृष्टिकोण की माँग करता है। पुराने नज़रिए से नया मीडिया बहुत कम समझ में आएगा। यह मीडिया शेयरिंग पर निर्भर है। शेयरिंग और अनौपचारिकता के बिना नया मीडिया अर्जित करना संभव नहीं है। पुरानी लेखकीय आदतें इस माध्यम में मदद नहीं करतीं। 
 
 डिजिटल युग में आलोचना- 

नए युग में निजी अनुभव और व्यक्तित्वकेन्द्रित लेखन आ रहा है। सवाल यह है कि इसे आलोचना में रुपान्तरित कैसे करें ? यह एक तरह का अनौपचारिक लेखन भी है, निजी अनुभव और निजी नज़रिए को  महान बताया जा रहा है, जबकि बेहतर लेखन वह है जो अन्य के नज़रिए की कसौटी पर खरा उतरे ।इंटरनेट के आने के बाद लेखक-पाठक का नया संबंध पैदा हुआ है।नए संबंध की रीयलटाइम कम्युनिकेशन ने प्रकृति तय की है। पहले लेखक का पाठक से लिखने के बाद संबंध ख़त्म हो जाता था । लेकिन नए दौर में पाठक कभी भी लेखक से संपर्क कर सकता है,और अपनी राय कह सकता है। (रायपुर साहित्यमेला में 14दिसम्बर 2014 को दिया गया भाषण)
   











शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

गीता इवेंट नहीं है

           श्रीमद्भगवद्गीता को लेकर देश में अचानक बहस हो रही है और इस बहस को पैदा करने में संघ समर्थित संतों-महंतों और-मीडिया की बड़ी भूमिका है। इवेंट बनेगा तो मीडिया हो-हल्ला होगा! इवेंट बनाना मासकल्चर का अंग है जबकि गीता संस्कृति का अंग है। गीता जयन्ती के मौके पर विभिन्न संघी नेताओं के भाषणों ने मनोरंजन करके गीता की ओर ध्यान खींचा है। गीता को सनसनी बनाना, संविधान से महान बताना,मनोरोग के उपचार की पुस्तक बताना अपने आपमें विवादास्पद और अविवेकपूर्ण बातें हैं।अविवेक हमेशा से फासिस्टों का ईंधन रहा है। संघ-संत और मीडिया के लिए गीता का इवेंट और अविवेकवाद से अधिक महत्व नहीं है। गीता-गीता कहने से भाजपा या किसी भी दल के मतों में इजाफा होने वाला नहीं है। क्योंकि गीता में जो विचार निहित हैं वे भाजपा-संघ-संतसमाज के स्वभाव से मेल नहीं खाते।

गीता के बारे में सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सैंकड़ों सालों के बाद आज भी गीता जनप्रिय क्यों है ? भारत का अन्य कोई ग्रंथ इतना जनप्रिय क्यों नहीं है ? गीता की जनप्रियता दिनों-दिन क्यों बढ़ी? भाजपा-संघ- तय कर लें कि उनको गांधी-नेहरु-आंबेडकर का गीता का आख्यान चाहिए ? या फिर गपोड़ी संतों की व्याख्या चाहिए ? गीता को संतों ने नहीं विद्वानों –दार्शनिकों और सामाजिक हस्तियों ने जनप्रिय बनाया है । गीता को समझने के लिए उसकी शाब्दिक व्याख्या में जाने की बजाय उसके मर्म की खोज की जानी चाहिए।

गीता को इवेंट बनाने के चक्कर में संतों –संघियों ने गीता का जन्मदिन खोज निकाला,जो कि अनैतिहासिक है, अनैतिहासिकता के पैमाने फासिज्म की वैचारिक मदद करते हैं, इस अनैतिहासिकता का फासिस्ट चरमोत्कर्ष तब सामने आया जब एक संघी नेता ने गीता को संविधान से भी ऊपर दर्जा देने की बात कही! दूसरे ने मनोरोगों के इलाज की रामबाण दवा कहकर पेश किया! इस तरह का इरेशनलिज्म हमेशा से फासिज्म की अभिव्यक्ति शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। इस प्रसंग में पंडित जवाहरलाल नेहरु ने लिखा है ''गीता का संदेसा सांप्रदायिक या किसी एक खास विचार के लोगों के लिए नहीं है।क्या ब्राह्मण और क्या अजात,यह सभी के लिए है। यह कहा गया है कि '' सभी रास्ते मुझ तक पहुँचाते हैं।'' इसी व्यापकता की वजह से सभी वर्ग और सम्प्रदाय के लोगों को गीता मान्य हुई है।''

गीता मात्र हिन्दुओं का ग्रन्थ नहीं है ,वह पूरे भारतीय जनता की विरासत का अंग है,वैसे ही जैसे नाथों-सिद्धों का साहित्य समूची मानवता की विरासत का अंग है,जिस तरह चार्वाक हमारी विरासत का अंग हैं।सवाल यह है विरासत में से क्या चुनें और उसे किस नजरिए से देखें ? पंडित नेहरु ने लिखा है ''बौद्धकाल से पहले जब इसकी रचना हुई,तब से आजतक इसकी लोकप्रियता और प्रभाव घटे नहीं है,और आज भी इसके लिए हिंदुस्तान में पहले –जैसा आकर्षण बना हुआ है।विचार और फ़िलसफ़े का हर एक सम्प्रदाय इसे श्रद्धा से देखता है और अपने-अपने ढ़ंग से व्याख्या करता है।संकट के वक़्त,जब आदमी का दिमाग सन्देह से सताया हुआ होता है और अपने फ़र्ज के बारे में उसे दुविधा दो तरफ़ खींचती होती है,वह रोशनी और रहनुमाई के लिए गीता की तरफ ओर भी झुकता है,क्योंकि यह संकट–काल के लिए लिखी गयी कविता है- राजनैतिक और सामाजिक संकटों के अवसर के लिए और उससे भी ज्यादा इन्सान की आत्मा के संकट-काल के लिए। ''

सवाल यह है क्या संघ परिवार आज किसी संकट से गुजर रहा है ? क्या वे अपने अंदर विचारधारा का संकट देख रहे हैं और उससे निकलने का मार्ग गीता में खोज रहे हैं ? पंडित नेहरु ने साफ लिखा है गीता ''संकट-काल के लिए लिखी कविता'' है। नेहरु ने गीता के मर्म को उद्घाटित करते हुए लिखा '' यह हमें जिंदगी के फ़र्जों और कर्तव्यों का सामना करने के लिए पुकारती है,लेकिन हमेशा इस तरह कि इस रुहानी ज़मीन और विश्व के बड़े मकसद को नज़र-अंदाज़ न किया जाय।हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ रहने की बुराई की गयी है और यह बताया गया है कि काम और ज़िदगी को युग के सबसे ऊँचे आदर्शों के अनुसार होना चाहिए,क्योंकि हर एक युग में ख़ुद आदर्श बदलते रहते हैं। एक खास जमाने के आदर्श-युग-धर्म- का सदा ध्यान रखना चाहिए।''

'' चूंकि आज के हिंदुस्तान पर मायूसी छायी हुई है और उसके चुपचाप रहने की भी एक हद हो गई है,इसलिए काम में लगने की यह पुकार ख़ासतौर पर अच्छी मालूम पड़ती है।यह भी मुमकिन है कि जमाने-हाल के लफ़्जों में,इस पुकार का समाज के सुधार की और समाज-सेवा की और अमली,बेगरज़ देशभक्ति के और इन्सानी दर्दमंदी के पुकार की सेवा समझा जाय।गीता के अनुसार ऐसा काम अच्छा होता है,लेकिन इसके पीछे रुहानी मकसद का होना लाजिमी है।यह काम त्याग की भावना से किया जाना चाहिए और उसके नतीजों की फ़िक्र न करनी चाहिए। अगर काम सही है,तो नतीजे भी सही होंगे,चाहे वे फौरन न जाहिर हों,क्योंकि कार्य-कारण का नियम हर-हालत में अपना काम करेगा ही ।''

रविवार, 7 दिसंबर 2014

वफादार प्रकाशन सम्बन्ध के प्रतिवाद में



     हिन्दी में पुस्तक प्रकाशन वफ़ादारी के युग में है। लेखक और प्रकाशक का रिश्ता "वफ़ादार उत्पादक प्रकाशन सम्बन्ध" पर टिका है। इस सम्बन्ध के दायरे में अधिकांश लेखक और प्रकाशक जीने के लिए अभिशप्त हैं।यह मूलत:वफ़ादारी का गैर-पूँजीवादी सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में किसी क़िस्म की प्रकाशकीय आधुनिकता नहीं है। 
        "वफ़ादार उत्पादक सम्बन्ध" की लाक्षणिक विशेषता है "सब कुछ अनौपचारिक है",लेखक को नहीं मालूम कि उसकी पुस्तक कहाँ बिक रही है? कितनी बिक रही है और कितनी आय कर रही है ?अधिकांश प्रकाशक , लेखक के साथ कोई लिखित अनुबंध नहीं करता, कोई लिखित दस्तावेज़ लेखक को मुहैय्या नहीं कराता। मज़ेदार बात यह है कि यह हरकत वह लेखक संघ के धाकड नेताओं के साथ भी करता है। लेखक संघों के तक़रीबन सभी बडे नेता किसी न किसी प्रकाशक की वफ़ादार सूची में वरीयता से ऊपर स्थान बनाए हुए हैं। वे अपने अल्पहितों की तो सोचते हैं लेकिन लेखक के सामान्य हितों को लेकर कभी कोई प्रयत्न नहीं करते।
      इस वफ़ादार सम्बन्ध के कारण लेखक-प्रकाशक सम्बन्धों का पूँजीवादी सम्बन्ध विकसित नहीं हो पाया है। लेखक संघ वफ़ादारी के आगे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनकी जो भूमिका हो सकती थी उसका पालन नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि "अनौपचारिकता" और "निजी वफ़ादारी " से आगे वे देख ही नहीं पा रहे हैं। यह लेखक संघ के क्षय की सूचना है और "निजी वफ़ादारी" के महान बनने का संकेत भी है!  
      "निजी वफ़ादारी" का साइड इफेक्ट है कि लेखक संघ के सभी बडे लेखकों की आँखों के नीचे हिन्दी के अधिकांश बडे प्रकाशक, लेखकों का खुलेआम शोषण कर रहे हैं ,लेकिन कभी किसी लेखक संघ को किसी प्रकाशक के दरवाज़े पर आंदोलन करते नहीं देखा गया । क्या हम यह मान लें कि हिन्दी के प्रकाशकों के द्वारा प्रकाशन के नियमों का पालन हो रहा है ?
       समस्या का सबसे दुर्भाग्यजनक पक्ष यह है कि हिन्दी के सबसे बडे प्रकाशक ने सभी आंदोलनकारी लेखक नेताओं को अपना वफ़ादार बनाकर बंधुआ बना लिया है !हमारे नामी लेखक बंधुओं को इस बंधुआभाव से कोई परहेज़ नहीं है ।  सवाल यह है कि लेखक- प्रकाशक सम्बन्ध को पेशेवर पूँजीवादी सम्बन्ध बनाने में 'प्रलेसं' ,'जसम'और 'जलेसं' की कोई भूमिका बनती है या नहीं ? क्या कभी इन संगठनों ने हिन्दी के एकमात्र बडे प्रकाशन समूह के खिलाफ कोई बयान तक जारी करके लेखक के हितों के लिए कोई प्रयास किया ? मैं निजी तौर पर कोलकाता के कई लेखकों को जानता हूं जिनको इस प्रकाशक ने एक भी पैसा रॉयल्टी का नहीं दिया , यहाँ तक कि वह कोई अनुबंध तक नहीं करता। इस बडे नामी प्रकाशक का वफादार बनाने का तरीक़ा यह है कि वह लेखक संगठन के लिए विज्ञापन दे देता है या उनकी पत्रिका को किताब के रुप में छाप देता है,वह लेखक संघ को १०-२०फीसदी रॉयल्टी देकर अपनी वफ़ादारी निभा देता है, वफादार लेखक ख़ुश हो जाता है कि यह क्या कम है कि प्रकाशक ने हमारी पत्रिका छाप दी या किताब छापकर रॉयल्टी दे दी! 
     वफादार लेखकनेता भूल जाते हैं कि प्रकाशक अपनी इस तथाकथित सदाशयता की आड़ में बारीकी से अपने सरप्लस कमाने के धंधे को चमका रहा है ! वे कभी प्रकाशक द्वारा की जा रही अनैतिक हरकतों पर नहीं बोलते। स्थिति इतनी भयावह है कि राज्य के स्तर पर , विभाग के स्तर पर, विश्वविद्यालय में पुस्तक ख़रीद के स्तर पर, सरकारी थोक खरीद के स्तर पर हिन्दी के सबसे बडे प्रकाशक ने सबसे घृणित हथकंडे अपनाए हैं और लेखक संगठनों की ओर से कभी कोई बयान तक नहीं आया! 
     हिन्दी के बडे प्रकाशक किस तरह काम करते हैं उसके नमूने हर राज्य में बिखरे पड़े हैं। अभी कुछ समय पहले तक बिहार में सरकारी स्तर पर होने वाली खरीद में एक हिन्दी के संघपरस्त प्रकाशक की इजारेदाराना भूमिका, जो कई सालों से चल रही थी , सारी किताबें उससे ही ख़रीदी जा रही थीं, उसके खिलाफ किसी संगठन ने चूँ तक नहीं की, बाद में नीतीश सरकार ने इस मामले का संज्ञान लिया और वह प्रकाशक काली सूची के हवाले कर दिया गया। सवाल यह है कि एकप्रकाशक विशेष को ही मोटे ठेके कैसे मिल रहे हैं ? एक प्रकाशक विशेष को हाल ही में छत्तीसगढ़ से बहुत मोटा ठेका मिला है। प्रकाशक विशेष को इजारेदाराना ढंग से खरीद का ठेका मिलना, क्या हम सब लेखकों के लिए चिन्ता की बात नहीं है ? लेकिन "जलेसं" या "जसमं" और "प्रलेसं" के सभी बडे नेताओं के मुँह बंद हैं ! यही वह बिन्दु है जहाँ पर हम सबको लोकतांत्रिक प्रकाशकीय दृष्टिकोण अपनाने की ज़रुरत है। वफ़ादारी  का संबंध अ-लोकतांत्रिक सम्बन्ध है और यह लेखक विरोधी सम्बन्ध है। 
                   मैं अब तक ५० किताबें लिख चुका हूँ और मैंने आरंभ में यह निर्णय लिया कि मैं किताब उसी प्रकाशक को दूँगा जो लेखक के साथ पारदर्शिता रखे, रॉयल्टी दे, संयोग की बात है कि मैंने जिस प्रकाशक को किताबें दीं वह सभी लेखकों को रॉयल्टी देता है , बाकी तथ्य भी लेखक के साथ शेयर करता है। लेकिन हिन्दी का सबसे बड़ा प्रकाशक यह काम नहीं करता, इसके मालिक कईबार मुझसे किताब माँग चुके हैं , बदले में मोटी रक़म पहले देने का वायदा भी कर चुके हैं ,लेकिन मैंने उनको विनम्रतापूर्वक मना कर दिया । कहने का आशय यह कि लेखक संघ कम से कम इस तरह के प्रकाशक को किताब न दे जो इजारेदाराना हरकत करता हो, बिक्री के लिए घूस देता हो,लेखक को रॉयल्टी न देता हो। कम से कम लेखक की मान मर्यादा की रक्षा का दायित्व "वफादार लेखक-प्रकाशक सम्बन्ध" से ऊपर है। 

संसद ,अंधविश्वास और वैज्ञानिकचेतना



जिस देश में प्रधानमंत्री से लेकर सांसद तक अंधविश्वासी और गँवार संतों की चरणरज को परम प्रसाद मानते हों!कूपमंडूक और जाहिल संतों को प्रेरक मानते हों!जिस देश के सांसद कूपमंडूक ज्ञान को विज्ञान मानते हों और लाखों जनता उनको जय- जय हो करके चुनती हो! गंभीरता से सोचो उस देश की संसद की चेतना कैसी होगी ?  हमने कभी लोकतंत्र के परम स्वायत्तरुप संसद और "परम मनुष्य "सांसदों के बारे में वैज्ञानिकचेतना की कसौटी पर बातें नहीं कीं।इससे अनेक क़िस्म के लोकतांत्रिक अंधविश्वास फैले हैं।
    लोकतंत्र में दो तरह के अंधविश्वास हैं, पहली कोटि में परंपरागत अंधविश्वास आते हैं, ये हमें विरासत में मिले हैं, दूसरी कोटि में पूँजीवादी अंधविश्वास आते हैं जो हमें पूँजीवाद के आगमन के साथ समाजवाद और बुर्जुआ लोकतंत्र ने दिए हैं। मज़ेदार बात है हमने कभी न तो समाजवादरचित अंधविश्वासों पर बहस की और न बुर्जुआ अंधविश्वासों पर सवाल खड़े किए । समाजवाद ने पुराने या विरासत में प्राप्त अंधविश्वासों को नष्ट किया लेकिन नए समाजवादरचित अंधविश्वासों पर किसी को सवाल ही खड़े करने नहीं दिया गया। भारत में भी अंग्रेज़ों के ज़माने से लेकर आजतक ईश्वर की सत्ता को ख़ारिज करना अपराध घोषित कर दिया गया, मज़ेदार बात तो यह है कि हमारे यहाँ भगवान के नाम पर ज़मीन-जायदाद होती है, भगवान मुकदमे लड़ता है!ऐसे में उसके न होने की बातें करना तो "महान अपराध "ही माना जाएगा!संविधान की सौगंध सबसे बड़ा अंधविश्वास है! सांसदों का आचरण उसके अनुरूप नजर ही नहीं आता,इसके बावजूद सांसद महान हैं! कहने का आशय यह कि बुर्जुआ लोकतंत्र में पुराने और नए अंधविश्वास बने रहते हैं , विभिन्न तरीक़ों के जरिए उनको क़ानूनी और अन्य क़िस्म का संरक्षण मिला हुआ है।

        संसद को लेकर जिस तरह का पूजाभाव हमारे ज़ेहन में है वह अपने आपमें एक रुढि है, सांसदों को लेकर जो मान्यता है वह भी रुढिग्रस्त है,इससे भी बड़ी बात यह कि लोकतंत्र भी रुढियों और तथाकथित लोकतांत्रिक अंधविश्वासों से भरा हुआ है। लोकतांत्रिक अंधविश्वास न हों तो लोकतंत्र ख़त्म हो जाय। हमने कभी विचार ही नहीं किया है हमारे सांसद कितने वैज्ञानिकचेतना संपन्न है? कोई सर्वे भी नहीं किया कि जिन सांसदों को हम आज़ादी के बाद से लेकर आज तक चुनते रहे वे वैज्ञानिकचेतना से लैस हैं या नहीं? सच यह है हमारे अधिकांश सांसद अंधविश्वासी और अवैज्ञानिक चेतना से लैस हैं।इसके बावजूद संसद महान हैं!
   हमारे न्यायाधीशों में अधिकांश में वैज्ञानिकचेतना का अभाव है,इसके बावजूद न्याय महान है !न्यायाधीश महान हैं! ये धारणाएँ बताती हैं कि हमारे अंधविश्वास और रुढियों के खिलाफ कोई गंभीर जंग न तो संसद में लड़ी गयी और न संसदीय संरचनाओं में ही लड़ी गयी।
      यूपीएससी पास करने वाले अधिकतर "महानजन" भगवान के आगे भीख माँगते,रोते बिसूरते देखे गए हैं! जिस देश के क्रीम कहे जानेवाले "महानजनों" में अंधविश्वास का यह आलम हो वहाँ वैज्ञानिकचेतना की रक्षा करना , उसका प्रचार- प्रसार करना बहुत ही मुश्किल काम है। ऐसी अवस्था में भारत विश्वगुरु कैसे बन सकता है ?
वैज्ञानिकचेतना हासिल करना नए मनुष्य के निर्माण के आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया से जुडा है। हमने अपने देश में सतही संरचनाओं को तो यूरोप की नक़ल पर तैयार कर लिया , यूरोप जैसे कपड़े पहन लिए हैं, यूरोपीय वस्तुएँ जमा कर लीं,लेकिन नए यूरोपीय वैज्ञानिक मूल्यों को ग्रहण नहीं किया , मूल्यों की पुरानी मीनारों में बंद रहकर हम विश्वगुरु का सपना देख रहे हैं लेकिन साक्षात जीवन में घट रही अनहोनी और अमानवीय ज़िन्दगी के प्रति बेख़बर बने हुए हैं। 
     वैज्ञानिकचेतना की सबसे बड़ी खूबी है कि हम अमानवीय मूल्यों और ऐसी चीजों को न मानें जिनको यथार्थ में रेशनल तर्क की कसौटी पर परख न सकें।हमारे वैज्ञानिक सोच का आलम यह है कि हमने सवाल खड़े करने बंद कर दिए हैं!" हाँ जी-हाँ जी कहना उसी गाँव में रहना", की मनोदशा ने पुरानी और नई रुढियों और अंधविश्वासों के प्रति हमें गूँगा बना दिया है। वैज्ञानिकचेतना हमने गूंगेपन से मुक्त करती है।" हाँ जी" के गुलामबोध से मुक्त करती है ।सोचो क्या गूंगाभारत विश्वगुरु बन सकता है ?