सोमवार, 15 सितंबर 2014

बर्बरता के प्रतिवाद में


भारत में सभ्यता विमर्श है लेकिन हमने कभी यह ठहरकर नहीं सोचा कि सभ्यता के पर्दे के पीछे बर्बरता के किस तरह के रुप समाज में विकसित हो रहे हैं । हम सभ्यता और धर्म की ऊँची मीनारों पर सवार हैं लेकिन  बर्बरता की भी ऊँची मीनारों का निर्माण किया है । हमने बर्बरता के लक्षणों की तफ़सील के साथ जाँच- पड़ताल नहीं की । 
     आज़ाद भारत की नींव भारत -विभाजन और तेलंगाना विद्रोह के दमन से पैदा हुई बर्बरता पर रखी गयी है । यह संयोग है कि भारत विभाजनजनित बर्बरता की तो कभी -कभार चर्चा सुनने को मिल जाती है लेकिन तेलंगाना के किसान आंदोलन के दमन और बर्बरता के रुपों की कभी चर्चा ही नहीं होती, यहाँ तक कि कम्युनिस्ट थिंकरों के यहाँ भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता ।
    भारत में लोकतंत्र का कम और बर्बरता का ज़्यादा विकास हुआ है । बर्बरता की जब भी बातें होती हैं तो हम वफ़ादारी के आधार पर पक्ष- विपक्ष तय करने लगते हैं या फिर राजनीतिक - सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर ।
   भारत में दो तरह की बर्बरता है , पहली बर्बरता घर के अंदर है ,दूसरी बर्बरता घर के बाहर समाज के विभिन्न स्तरों पर घट रही है। संक्षेप में , बर्बरता के दो बड़े एजेंट हैं परिवार और पुलिस ।
  बर्बरता के पारिवारिक तत्वों को हमने सामाजिक तौर पर चुनौती नहीं दी । लंबे समय तक पारिवारिक बर्बरता को हम छिपाते रहे। सन् 1970-71 के बाद से पारिवारिक बर्बरता के रुपों को धीरे धीरे हमने सार्वजनिक करना आरंभ किया लेकिन इसके बारे में कोई समग्र समझ नहीं बनायी ।
    पारिवारिक बर्बरता का प्रधान कारण है पारिवारिक सदस्यों में समानता , सद्भाव और एक- दूसरे के प्रति लगाव का अभाव । जीवनशैली के विभिन्न पारिवारिक रुपों में वर्चस्व की मौजूदगी । साथ ही परिवार को नए लोकतांत्रिक ढाँचे के अनुरूप परिवर्तित न कर पाना ।  

  लोकतंत्र में कोई भी चीज, वस्तु, विचार या जीवन मूल्य जब जन्म लेता है तो वह प्रसारित होता है । लोकतंत्र में प्रसार की क्षमता के कारण ही बुरी चीज़ें, बुरी आदतें और बुरे मूल्य तेज़ी से प्रसारित हुए ।बर्बरता का प्रसार उनमें से एक है । 
     त्रासदी की हमारे समाज में आँधी चल रही है।   इसमें पारिवारिक बर्बरता, जातिवादी, साम्प्रदायिक, पृथकतावादी ( उत्तर पूर्वी राज्यों , पंजाब और कश्मीर ), माओवादी -नक्सलवादी बर्बरता,आपातकालीन आतंकी बर्बरता के साथ पुलिसबलों की दैनंदिन बर्बरता शामिल है ।  हिंसा और बर्बरता के इन सभी क्षेत्रों के आँकड़े चौंकाने वाले हैं । 
        परिवार में दहेज- हत्या, स्त्री- उत्पीड़न , बच्चों और बूढ़ों का उत्पीड़न या उनके प्रति बर्बर व्यवहार हमें त्रासद नहीं लगता बल्कि इसे हम 'बुरा' कहकर हल्का बनाने की कोशिश करते हैं । इसी तरह की कोई घटना घटित होती है तो हमें बुरा लगता है । हम यही कहते हैं 'बुरा' हुआ। जबकि यह त्रासद है , दुखद है , लेकिन हम 'बुरा 'कहकर अपने भावों को व्यक्त करते हैं। 
    दैनन्दिन पारिवारिक जीवन की त्रासदियों में भय , शाॅक , चौंकाने वाला और उत्पीड़न सबसे बड़े तत्व हैं। आधुनिक त्रासदी को इन तत्वों के बिना परिभाषित ही नहीं कर सकते । त्रासदी को महज़ बुरे के रुप न देखा जाय।
    मार्क्सवादी आलोचक  टेरी इगिलटन के अनुसार त्रासदी को जब हम 'बुरा' या ' बहुत बुरा हुआ' कहते हैं तो इसमें निहित दर्द को महसूस नहीं करते । 
     टेरी इगिलटन के अनुसार शिक्षित और अशिक्षित संस्थानों के बीच में त्रासदी के अर्थ को लेकर बहुत बड़ा भेद है। इस प्रसंग में शिक्षितों के संस्थान तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा विश्वसनीय हैं। वे यह महसूस करते हैं कि त्रासदी का अर्थ ' बुरा' से बढ़कर होता है । वे दुख में निहित मूल्य की खोज करते हैं और उसे रेखांकित करते हैं । 
     त्रासदी को हमें दुख या बुरे के रुप से ज़्यादा व्यापक अर्थ में देखना चाहिए । त्रासदी का मतलब दुख मात्र नहीं है । 
     हमारे समाज में जो अनुदारवादी हैं वे त्रासदी को 'दुख'या 'बुरे ' के रुप में ही देखते हैं। वे इसमें निहित दर्द, पीड़ा, उत्पीड़न और भय की उपेक्षा करते हैं।
    मसलन् ,गुजरात के दंगों को मोदीपंथी दुखद या बुरा मानते हैं , त्रासद नहीं मानते हैं , त्रासदी और बर्बरता नहीं मानते । इसी तरह दहेज- हत्या को हम बुरा कहते हैं बर्बरता या त्रासदी नहीं कहते । इस तरह हमलोग जाने -अनजाने बर्बरता के साथ सहनीय संबंध बना लेते हैं। 
     पारिवारिक बर्बरता को कम करके आँकने और देखने का सबसे जनप्रिय मुहावरा है ,'चार बर्तन होंगे तो खनकेंगे।' पति-पत्नी  के बीच की बर्बरता को हम उपेक्षणीय मानते हैं । कहते हैं 'जहाँ प्यार होता है वहाँ झगड़ा भी होता है ।' 'पारिवारिक झगडा' कहकर बर्बरता को कम करके पेश किया जाता है और इस प्रक्रिया में घटित त्रासदी की अनदेखी की जाती है । यह त्रासदी लिंगमुक्त है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ महिलाओं के साथ त्रासद घटनाएँ घटित होती हैं , यह भी देखा गया है कि पुरुषों , बच्चों और बूढ़ों के साथ त्रासद घटनाएँ बढ़ी हैं ।
   त्रासदी में अपूरणीय मानवीय क्षति होती है । इसके दो छोर हैं , पहला , निजी, शारीरिक और मानसिक है तो दूसरा , सार्वजनिक, राजनीतिक और अन्य के प्रति जबावदेही  है । 
      सवाल यह है कि लोकतंत्र के विकास के साथ- साथ समाज में सभ्यता का विकास कम और बर्बरता का विकास ज़्यादा क्यों हुआ ? बर्बरता के साथ सामंजस्य बिठाने की मानसिकता का विकास क्यों हुआ ? बर्बरता का कैनवास दिनोंदिन क्यों बढा ? 
मेरे लेखे ,बर्बरता के विकास का प्रधान कारण है समाज में नई जीवन प्रणाली , सामाजिक संरचनाओं और नियमों के विकास की प्रक्रिया का अभाव। पुरानी प्रणाली का पूरी तरह बिखर जाना या ध्वस्त हो जाना और नियमन की नई प्रणाली का निर्मित न हो पाना । 
   एरिक हाॅब्सबाम के अनुसार ' नियमों और नैतिक आचरण ' की परंपरागत और सार्वभौम प्रणाली जब ध्वस्त हो जाती है तो बर्बरता पैदा होती है ।
    सामाजिक- राजनीतिक नियमन की  राजकीय प्रणाली को जब हम आधार बनाकर समाज को संचालित करने लगते हैं तब भी बर्बरता में इज़ाफ़ा होता है । 
    राजकीय नियमन बर्बरता के प्रति सहिष्णु बनाता है, राजकीय बर्बरता को वैध और स्वीकार्य बनाता है फलत: राजकीय बर्बरता की हम अनदेखी करते हैं ,पुलिस और सैन्यबलों की बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। 
      काम संतुष्टि के अभाव और  बंदूक़ की सभ्यता के विकास ने बर्बरता के क्षेत्र में लंबी छलाँग लगायी है। असहाय और मातहत लोगों के प्रति बर्बरता के ये दो बडे अस्त्र हैं। 
    हम बर्बरता की ओर जितना तेज़ी से बढ़े हैं उतनी ही तेज़ी से दक्षिणपंथी राजनीति का ग्राफ़ बढ़ा है ।  उदार राजनीति का ह्रास हुआ है । 
      भारतीय  समाज में एक तरफ़ निरंतर पुलिस बर्बरता है तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक दंगों , पृथकतावादी -आतंकी आंदोलनों का हिंसाचार है। इसके अलावा राजनीतिक हत्याओं का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ा है।   
    स्वाधीनता संग्राम और मध्यकाल की तुलना में स्वाधीन भारत में राजनीतिक हत्याएँ कई गुना ज़्यादा हुईं ।  जितने लोग युद्ध( 1962,1965,1971 ) में मारे गए उससे कई गुना ज़्यादा लोग पुलिस के हाथों थानों में मारे गए या पुलिसबलों से मुठभेड़ में मारे गए । 
     गाँवों में जातिगत बर्बरता को हमने सामान्य रुटिन मानकर आँखें बंद कर लीं। जातिगत बर्बरता के हमने सुंदर वैध तर्कों का परंपरागत कम्युनिकेशन के ज़रिए प्रचार किया और परंपरागत ग़ुलामी को वैध बनाने की कोशिश की । असल में यह वर्गयुद्ध है जो अपने ही देश के नागरिकों के ख़िलाफ़ जारी है । 
    जातिगत श्रेष्ठता को आधार बनाकर किए गए बर्बर हमलों ने भारत के सुंदर भविष्य की सभी संभावनाओं को दफ़न कर दिया । शैतान को हमने भगवान बना लिया और हर घर में जातिरुपी शैतान की पूजा-अर्चना, मान- मर्यादा बढ़ा दी ।
      इसी दौर में तमाम प्रगतिशीलों को पुरानी और नई जाति व्यवस्था में भेद करके पुरानी को बेहतर कहते सुना गया । पुरानी जाति व्यवस्था के 'अच्छे' गुणों की खोज खोजकर चर्चा की गयी और यह काम नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील आलोचक ने ख़ूब किया । 
     जाति व्यवस्था पुरानी हो या नई वह हमेशा से बर्बर रही है और उसका मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य के साथ सीधे अंतर्विरोध है उसकी किसी भी क़िस्म की हिमायत बर्बरता को वैधता प्रदान करती है । 
     यही हाल साम्प्रदायिक बर्बरता का है जिसके कारण हज़ारों दंगे हुए ,उनमें हज़ारों लोग बर्बरता की बलि चढ़ गए । भारत विभाजन से लेकर आज तक हुए दंगों के ग्राफ़ को देखें तो पाएँगे कि हमारे ज़ेहन में साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता के प्रति घृणा घटी है । तरह - तरह के घटिया तर्कों के ज़रिए हमने साम्प्रदायिक हिंसा को वैधता प्रदान की है । सतह पर साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता टुकड़ों में होती रही है लेकिन उसके बीच में एक बारीक कड़ी है जो सभी क़िस्म के बिखरे टुकड़ों को जोड़ती है ।
     साम्प्रदायिक बर्बरता का सबसे बड़ा योगदान है कि हमारे समाज में पहचान के आधुनिक वर्गीय और पेशेवर रुपों की बजाय धार्मिक रुपों की ओर रुझान बढा है । 
  साम्प्रदायिक बर्बरता ने देश की ' ब्रेनवाशिंग' की है । भारतीय मन को साम्प्रदायिक मन में रुपान्तरित किया है ।  बहिष्कार करने और साम्प्रदायिक समूह में रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है ।महानगरों या शहरों में मिश्रित बस्तियाँ या बसावट ग़ायब हो गयी है। 
    अल्पसंख्यकों और ख़ासकर मुसलमानों को समाज में वैध तरीक़ों के ज़रिए ठेलकर समूहबंद 'घेटो ' में बंद कर दिया है या फिर उनकी बस्तियाँ अलग बसा दी गयी हैं। इसने समाज में ' हम' और ' तुम' के आधार पर विभाजन को वैध बनाया है और यह बर्बरता का वह साइड इफ़ेक्ट है जो हिंसाचार के बाद भी जारी है । 
        बर्बरता के दो तरह के प्रभाव होते हैं ,पहला पतात्कालिक होता है और दूसरा प्रभाव दीर्घकालिक होता है । तात्कालिक प्रभाव पर हमारी तत्काल प्रतिक्रिया सुनने में आती है लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में हमारी कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आती ।
   बर्बरता का दीर्घकालिक प्रभाव बेहद ख़तरनाक होता है और मौन उत्पीडक का काम करता है । इसमें व्यक्ति हर स्तर पर बिखर जाता है, नष्ट हो जाता है । इससे समाज में बर्बरता को चुप सहने और देखने की बीमारी का जन्म होता है और हम फिर बर्बरता को देखते हैं और चुप रहने लगते हैं । अब बर्बरता हमारे ज़ेहन में रुटिन बनकर छा जाती है । वह रोज़मर्रा की चीज़ हो जाती है और हम उसे 'बुरा'भर कहकर मन के भावों को व्यक्त करने लगते हैं ।
     यही हाल पुलिस बर्बरता का है ,हम कभी नहीं सोचते कि पुलिस जब किसी अपराधी के प्रति असभ्य तरीक़ों का इस्तेमाल करती है या 'थर्ड डिग्री'उत्पीडन के तरीक़े अपनाती है तो वह राजकीय संस्थाओं को बर्बर बनाती है । राजकीय संस्थाएँ जब बर्बर हो जाती हैं तो समाज में सभ्यता को बचाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है । इससे समाज की नैतिक प्रगति बाधित होती है । 
     अपराधियों से सूचनाएँ हासिल करने के लिए पुलिस के बलप्रयोग ने जबरिया सूचना हासिल करने और जबरिया मुखबिर की तरह काम करने की पद्धति का विकास किया , इस पद्धति का कालांतर में साम्प्रदायिक -पृथकतावादी -माओवादी और आतंकी संगठनों ने भी इस्तेमाल किया । इन संगठनों से प्रभावित इलाक़ों में आतंक और प्रति आतंक    को बढ़ावा मिला जिसने राजकीय बर्बरता में इज़ाफ़ा किया ।मसलन पुलिस के बर्बर दमन से आतंकी संगठन ख़त्म हो जाते हैं , जैसा पंजाब में हुआ , तो लोग राजकीय बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। इसके चलते आमलोगों में यह धारणा भी बनी कि सभ्यता के मुक़ाबले बर्बरता ज़्यादा कारगर हथियार है । इसने हमेशा के लिए सभ्यता की सीमाओं को कमज़ोर कर दिया । 
      सभ्य तरीक़ों की बजाय हम जब बर्बर तरीक़ों को वैध मानने लगते हैं तो स्वयं को अमानवीय बना रहे होते हैं। अमानवीयता में मज़े लेना आरंभ कर देते हैं । फलत: हम अमानवीयता के आदी हो दाते हैं । इस समूची प्रक्रिया के वाहक युवा बनते हैं । वे असहनीय चीज़ों को, अमानवीय चीज़ों को सहन करने लगते हैं , उनमें मज़ा लेने लगते हैं। 
     आज बर्बरता के निशाने पर युवा हैं। बर्बरता युवाओं को विभिन्न रुपों में अपनी ओर आकर्षित कर रही है । साम्प्रदायिक-पृथकतावादी -माओवादी-आतंकी हिंसा के वाहक युवा हैं, वे अपने बर्बर हिंसा से रोमैंटिक संबंध बना रहे हैं । 
     परिवार से लेकर समाज तक बर्बरता के विभिन्न रुपों में युवाओं की बड़े पैमाने पर शिरकत चिन्ता की बात है । 
    युवाओं में बर्बरता के प्रति बढ़ते आकर्षण और बेगानेपन को हमें  जुड़वाँ पहलू की तरह देखना चाहिए । यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । मसलन युवाओं में दहेज के प्रति कोई घृणा नहीं है उलटे वे दहेज माँगने लगे हैं । 
    यही हाल साम्प्रदायिक -आतंकी-पृथकतावादी -माओवादी- नक्सल राजनीति का है ,उसकी धुरी भी युवा हैं। एक तरफ़ युवाओं का यह रुप और दूसरी ओर उनका 'अ- राजनीतिक 'रुप असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और ये दोनों मिलकर बर्बरता को महत्वहीन बनाते हैं। सच यह है बर्बरता महत्वहीन नहीं है वह एक सच्चाई है और इसने जीवनशैली से लेकर राजनीति तक, आदतों से लेकर आचार- व्यवहार और नैतिकता के विभिन्न स्तरों तक अपने पैर पसार लिए हैं ।
    अब बर्बरता एक नई ऊँचाई की ओर जा रही है और अब इसने युवाओं में येन-केन-प्रकारेण पैसा कमाने की अंधी होड़ पैदा कर दी है। अब बर्बरता महत्वहीन हो गयी है और पैसा कमाना महत्वपूर्ण हो गया है और यह बर्बरता का वह छोर है जहाँ पहुँचकर सभ्यता और मानवीय मूल्यों की खोज का काम और भी दूभर हो गया है । 
     
      
      
     


शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मुसलमानों की हिमायत में

        आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह प्रचार आरंभ किया है उसे देखते हुए सामयिक तौर पर मुसलमानों की इमेज की रक्षा के लिए सभी भारतवासियों को सामने आना चाहिए। मुसलमानों को देशद्रोही और आतंकी करार देने में इन दिनों मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय हो उठा है,ऐसे में मुसलमानों की भूमिका को जोरदार ढ़ंग से सामने लाने की जरुरत है। सबसे पहली बात यह कि भारत के अधिकांश मुसलमान लोकतांत्रिक हैं और देशभक्त हैं। वे किसी भी किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति का अंग नहीं रहे हैं। चाहे वह मुस्लिम साम्प्रदायिकता ही क्यों न हो। भारत के मुसलमानों ने आजादी के पहले और बाद में मिलकर देश के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी है और उनके योगदान की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

भारतीय मुसलमानों के बारे में जिस तरह का स्टीरियोटाइप प्रचार अभियान मीडिया ने आरंभ किया है कि मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं,अनुदार होते हैं,नवाजी होते हैं,गऊ का मांस खाते हैं,हिन्दुओं से नफरत करते हैं,चार शादी करते हैं,आतंकी या माफिया गतिविधियां करते हैं।इस तरह के स्टीरियोटाइप प्रचार जरिए मुसलमान को भारत मुख्यधारा से भिन्न दरशाने की कोशिशें की जाती हैं।जबकि सच यह है मुसलमानों या हिन्दुओं को स्टीरियोटाइप के आधार पर समझ ही नहीं सकते। हिन्दू का मतलब संघी नहीं होता।संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा अधिकांश हिन्दू नहीं मानते।भारत के अधिकांश हिन्दू- मुसलमान कुल मिलाकर भारत के संविधान के द्वारा परिभाषित संस्कृति और सभ्यता के दायरे में रहते हैं और उसके आधार पर दैनंदिन आचरण करते हैं।अधिकांश मुसलमानों की सबसे बड़ी किताब भारत का संविधान है और उस संविधान में जो हक उनके लिए तय किए गए हैं उनका वे उपयोग करते हैं।हमारा संविधान किसी भी समुदाय को कट्टरपंथी होने की अनुमति नहीं देता। भारत का संविधान मानने के कारण सभी भारतवासियों को उदारतावादी मूल्यों,संस्कारों और आदतों का विकास करना पड़ता है।

समाज में हिन्दू का संसार गीता या मनुस्मृति से संचालित नहीं होता बल्कि भारत के संविधान से संचालित होता है। उसी तरह मुसलमानों के जीवन के निर्धारक तत्व के रुप में भारत के संविधान की निर्णायक भूमिका। भारत में किसी भी विचारधारा की सरकार आए या जाए उससे भारत की प्रकृति तय नहीं होती,भारत की प्रकृति तो संविधान तय करता है। यह धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है और इसके सभी बाशिंदे धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं।संविधान में धार्मिक पहचान गौण है, नागरिक की पहचान प्रमुख है।इस नजरिए से मुसलमान नागरिक पहले हैं ,धार्मिक बाद में ।आरएसएस देश का ऐसा एकमात्र बड़ा संगठन है जिसकी स्वाधीनता संग्राम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही,यह अकेला ऐसा संगठन है जिसके किसी बड़े नेता को साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी हमले का शिकार नहीं होना पड़ा। उलटे इसकी विचारधारा के भारत की धर्मनिरपेक्ष -लोकतांत्रिक संस्कृति और सभ्यता विमर्र्श पर गहरे नकारात्मक असर देखे गए हैं। इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुसलिम नेताओं ने कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । ब्रिटिशशासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए। मसलन्, रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवालाबाग कांड में 70 से अधिक देशभक्त मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं।आरएसएस के प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनकी देशभक्ति और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं।हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शासद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे।

    आरएसएस के लोगों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनको देश के लिए कुर्बानी देने से किसने रोका था ?स्वाधीनता संग्राम में उनके कितने सदस्य शहीद हुए ? इसकी तुलना में यह भी देखें कितने मुसलमान नेता-कार्यकर्ता शहीद हुए ? देशप्रेम का मतलब हिन्दू-हिन्दू करना नहीं है। हिन्दू इस देश में रहते हैं तो उनकी रक्षा और विकास के लिए अंग्रेजों से मुक्ति और उसके लिए कुर्बानी की भावना आरएसएस के लोगों में क्यों नहीं थी ?जबकि अन्य उदार-क्रांतिकारी लोग जो हिन्दू परिवारों से आते थे, बढ़-चढ़कर कुर्बानियां दे रहे थे, शहीद हो रहे थे।संघ उस दौर में क्या कर रहा था ? यही कहना चाहते हैं संघ कम से कम कुर्बानी नहीं दे रहा था। दूसरी ओर सन् 1930-32 के नागरिक अवज्ञा आंदोलन में कम से कम 43मुसलमान नेता-कार्यकर्ता विभिन्न इलाकों में संघर्ष के दौरान पुलिस की गोलियों से घायल हुए और बाद में शहीद हुए। सवाल यह है संघ इस दौर में कहां सोया हुआ था ?

     कायदे से भारत के शहीद और क्रांतिकारी मुसलमानों की भूमिका को व्यापक रुप में उभारा गया होता तो आज नौबत ही न आती कि आरएसएस अपने मुस्लिम विरोधी मकसद में सफल हो जाता। मुसलमानों के प्रति वैमनस्य और भेदभावपूर्ण रवैय्ये को बल इसलिए भी मिला कि आजादी के बाद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने मुसलमानों की जमकर उपेक्षा की।इस उपेक्षा को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में साफ देख सकते हैं। संघ के प्रचार का कांग्रेस पर दबाव रहा है और कांग्रेस ने कभी मुसलमानों को लेकर दो-टूक रवैय्या नहीं अपनाया। इसका ही यह परिणाम है कि मुसलमान हाशिए पर हैं। संघ ने मुस्लिम तुष्टीकरण का झूठा हल्ला मचाकर कांग्रेस को मुसलमानों के हितों की उपेक्षा करने के लिए मजबूर किया और कांग्रेस ने संघ को जबाव देने के चक्कर में नरम हिन्दुत्व की दिशा ग्रहण की और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मुसलमानों को उठाना पड़ा।

बुधवार, 10 सितंबर 2014

मध्यवर्गीय जंगलीपन के प्रतिवाद में

भारत के मध्यवर्ग में जंगलीपन की आंधी चल रही है। मेरठ,मुजफ्फरनगर,कोलकाता,त्रिवेन्द्रम से लेकर लखनऊ तक इस आँधी के थपेड़े महसूस किए जा सकते हैं। कल कोलकाता के साल्टलेक इलाके में पुलिस अफसरों ने स्त्री विरोधी आदेश नेट पर जारी किया,उसके पहले सांसद तापस पाल ने स्त्री विरोधी बयान दिए,इसके पहले कई 'भद्र'नेता स्त्रीविरोधी बयान दे चुके हैं। इन 'भद्र' नेताओं में सभी रंगत के लोग शामिल हैं। यही हाल मेरठ-मुजफ्फरनगर में सक्रिय संघसेना का है । उनकी समूची मध्यवर्गीय भगवा सेना फेसबुक से लेकर अखबारों तक,यूपी में पंचायतों से लेकर कोर्ट-कचहरी तक सक्रिय है। यही हाल कमोबेश केरल का भी है। 'लव जेहाद' केरल से आया है। फेसबुक से लेकर दैनिक अखबारों तक इस मध्यवर्गीय जंगलीपन को सहज रुप में देखा जा सकता है। यह मध्यवर्गीय जंगली
आंधी है।

मध्यवर्गीय जंगलीपन का नया रुप है 'लव जेहाद' के नाम पर शुरु किया गया राजनीतिक प्रपंच। हमारे समाज में पहले से ही 'प्रेम' को निषिद्ध मानकर बहुत कुछ होता रहा है। मध्यवर्ग ने खाप पंचायतों और सलाशी पंचायतों के जरिए औरतों के ऊपर बेशुमार जुल्म किए हैं। परिवार और पिता की 'इज्जत' के नाम पर लड़कियों को दण्डित किया है, प्यार करने वाले लड़कों की हत्याएं की हैं। हाल ही में बिजनौर में भाजपा सांसद के खिलाफ घटिया किस्म के पोस्टर लगाए गए हैं,जिसमें उसे किसी लड़की के साथ वृन्दावन में घूमते दिखाया गया। संकेत यह है लड़की के साथ घूमना अपराध है!यह उसके अवैध संबंध का प्रतीक है!
चिन्ता की बात है कि 'ऑनरकिलिंग' से लेकर 'लव जेहाद' तक की समूची सांस्कृतिक –आपराधिक कवायद के निशाने पर औरतें और नागरिक स्वाधीनता है। हमारे समाज का मध्यवर्ग इन घटनाओं को मूकदर्शक की तरह देख रहा है या उसमें मजे ले रहा है। स्थिति इतनी भयावह है कि लड़कियों को तरह-तरह के रुपों,बहानों और प्रेरणाओं के नाम पर नए सिरे से बंदी बनाने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। अखबारों में इनके पक्ष में लेख प्रकाशित किए जा रहे हैं ,इन आपराधिक कृत्यों को वैध ठहराने का काम मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का एक तबका खुलेआम कर रहा है। मध्यवर्ग में इस तरह कीड़े-मकोड़े की मानसिकता वाले विचारक अचानक सक्रिय क्यों उठे हैं ? वे कौन से कारक हैं जिनके कारण संघ और उसके संगठन सीधे स्त्री स्वाधीनता पर हमला करने का साहस जुटाने की कोशिश कर रहे हैं ? सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश के सम्मानजनक अखबार संतुलन के नाम पर 'लव जेहाद' के पक्ष में लेख तक छाप रहे हैं। यह कौन सा संपादकीय संतुलन है जिसे वे निभा रहे हैं ? 'लव जेहाद' के पक्ष में लेखों को छापना या उसके प्रवक्ताओं को कवरेज में संतुलन के नाम पर टीवी में मंच देना सीधे स्वाधीनता के हमलावरों को स्थान देना है। हम यदि अभी नहीं संभले तो निकट भविष्य में जंगली मध्यवर्गीय संगठन हमारे घरों में घुसकर तय करेंगे कि घर में क्या पकेगा और क्या नहीं पकेगा ? कान पर किया बिकेगा और क्या नहीं बिकेगा ? अभी वे यह कह रहे हैं कि किससे शादी करोगे और किससे शादी नहीं करोगे? अभी वे कह रहे हैं कि किससे प्रेम करोगे ,किससे नहीं करोगे? ये वही लोग हैं जो कल तक खाप पंचायतों के जरिए हिन्दू युवाओं पर हमले कर रहे थे, ये ही वह इलाका है जहां पर 'लव जेहाद' के नाम समूची मशीनरी को फिर से सक्रिय कर दिया गया है। यही वे इलाके,शहर और कस्बे हैं जहां पर कल तक खाप पंचायतों के जरिए हमले किए गए,अब इन हमलों को 'लव जेहाद' के नाम संगठित किया जा रहा है। यह मध्यवर्गीय जंगलीपन है और इसका ग्राम्य बर्बरता से गहरा सम्बन्ध है।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता



आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो। 
       हिन्दूबोध वस्तुत: वायवीय है उसे संघी बंदे व्यक्ति की 'अच्छी' 'बुरी' आदतों के साथ नत्थी करके पेश करते हैं। इस तरह वे हिन्दूबोध को 'अच्छीआदत' के रुप में सम्प्रेषित करते हैं। इसमें व्यक्ति के ख़ास क़िस्म के एक्शन को उभारते हैं। इस प्रक्रिया में वे संघ की फ़ासिस्ट विचारधारा पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और संघ को मानवीय या सामाजिक संगठन के रुप में पेश करते हैं। सच यह है कि संघ की विचारधारा का मूलाधार हिन्दुत्व के रुप में फासिज्म है। हिन्दू तो आवरण है। 
  फासिज्म की लाक्षणिक विशेषता है अमीरों की खुलकर सेवा करना। ग़रीबों और हाशिए के लोगों के हकों पर खुलकर हमले करना। संसदीय संस्थाएँ और संवैधानिक मान-मर्यादाओं को न मानना। संवैधानिक संस्थाओं कोअर्थहीन बनाना। अपने हर एक्शन को क़ानूनी तौर पर वैध मानना। यहाँ तक कि दंगे करने को भी वैध मानना। जनसंहार को वैध मानना। जनप्रिय नेताओं के ज़रिए शिक्षा, स्वास्थ्य, मज़दूरी आदि मानवाधिकारों पर चालाकी के साथ हमले करना। मज़दूर क़ानूनों और काम के समय को निशाना बनाना। 
        फासीवाद का भारत में आगमन राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, संत समागमों, मुस्लिम विद्वेष ,जातिद्वेष ,धार्मिक श्रेष्ठता , स्त्री नियंत्रण के सवालों से होता है। दूसरी बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन कारपोरेट पूँजीवाद के बिना रह नहीं सकता। सतह पर देश की एकता का नारा लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिक या हिन्दू- मुस्लिम विभाजन बनाए रखने पर ज़ोर, कहने के लिए आर्थिक विकास पर ज़ोर लेकिन व्यवहार में कारपोरेट विकास पर ज़ोर ,कहने के लिए शांति बनाए रखने का नारा लेकिन व्यवहार में अहर्निश तनाव बनाए रखने वाले एक्शनों की श्रृंखला बनाए रखना । सतही तौर पर स्त्री के विकास की बातें करना लेकिन व्यवहार में स्त्री विरोधी आचरण करना, स्त्री उत्पीड़न और हिंसाचार को संरक्षण देना। उन तमाम रुढियों को मानना और मनवाना जिनसे स्त्री को परंपरागत रुढियों के खूँटे से बाँधकर रखा जा सके।अंधविश्वास और भाग्यवाद को बढ़ावा देना।  
        भारत में संघ और भाजपा ने अपने को लिबरल संस्कृति और विचारधारा के साथ कांग्रेस आदि लिबरल दलों के विकल्प के रुप में पेश किया है। सारी दुनिया में फासिज्म ने हमेशा उदारतावाद के विकल्प के रुप में पेश किया है। भारत में भी यही दशा है। वे जिस हिन्दुत्व की बातें करते हैं वह तो सभी क़िस्म के नवजागरणकालीन मूल्यों और मान्यताओं का निषेध है। वे नवजागरण के मूल्यों पर प्रतिदिन हमले करते हैं। धर्मनिरपेक्षता पर आए दिन होने वाले हमले फासीवादी नवजागरणविरोधी नज़रिए का एक नमूना मात्र हैं। वे सतीप्रथा का देवराला सतीकांड के समय समर्थन और हिमायत कर चुके हैं।इसी तरह स्त्री के आधुनिक रुपों और स्त्री स्वायत्तता को वे एक सिरे से ख़ारिज करते हैं।नवजागरण ने उदारतावादी विचारों को प्रवाहित किया जबकि संघ सभी क़िस्म के उदारतावादी  विचारों का हिन्दुत्व के नज़रिए से विरोध करता है। 
      संघ सिर्फ़ मार्क्सवाद विरोधी ही नहीं है वह उदारतावाद का भी विरोधी है। संघ को समझने के लिए हमें परंपरागत मार्क्सवादी व्याख्याओं से बहुत कम मदद मिलेगी । इसके वैचारिक तानेबाने में परंपरागत अविवेकवाद और ऊलजुलूल बातें भरी हुई हैं। संघ उन तमाम ताक़तों के साथ सहज ही संबंध बना लेता है जो ताकतें अविवेकवाद की हिमायत करती हैं। इसलिए संघ को सामाजिक- वैचारिक तौर पर अलग-थलग करने लिए अविवेकवाद की भारतीय परंपरा को चिह्नित करना और फिर उसके प्रति सचेतनता बढ़ाने की ज़रुरत है। 
   संघ के लोग शनिपूजा से लेकर हनुमानपूजा, लक्ष्मीपूजा से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा ,उत्सवों और पर्वों से अपने को सहज भाव से जोड़कर जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करते हैं और जनता में संपर्क- सम्बन्ध बनाते हैं। वे आधुनिकतावाद के अविवेकवादी आंदोलनों , तकनीकी रुपों और कलारुपों के साथ सहज रुप में जुड़ते हैं और मासकल्चर को ही संस्कृति बनाने या उसके ज़रिए संस्कृति का पाखंड रचते हैं। 
     संघ के जनाधार के निर्माण में हिन्दी सिनेमा के मर्दवादी सांस्कृतिक रुपों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह परंपरागत मर्दानगी का नवीकृत रुप भी है। समाज में एक तरफ़ दबे-कुचले लोगों की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा और दूसरी ओर संघर्ष में पराजयबोध ने आनंद के क्षणों में मर्दानगी को एक नया आनंददायक नुस्खा बनाया है। यह अचानक नहीं है कि मर्दानगी के अधिकाँश नायक भाजपा के साथ हैं या मोदी के साथ है। मोदी के साथ अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, सलमान खान आदि की मौजूदगी और मित्रता ने मर्दानगी के नायकों एवं संघ के संबंधों को मज़बूत बनाया है। शरीर का उपभोग ,शरीरचर्चा और शरीर का प्रदर्शन जितना बढ़ेगा या महिमामंडित होगा संघ उतना ही मज़बूत बनेगा।
    बम्बईया हिन्दी सिनेमा ने ऐसी कृत्रिम भाषा विकसित की है जो देश में कहीं नहीं बोली जाती ।जनाधाररहित भाषा और उसमें भी प्रतिवादी तेवरों की अभिव्यक्ति अपने आप में सुखद ख़बर है।ऐसे भाषिक प्रयोग संवादों मिलते हैं जो हिन्दीभाषी क्षेत्र में कहीं नज़र नहीं आते। इस तरह कृत्रिम भाषा का साइड इफ़ेक्ट यह है कि हम फेकभाषा में जीने लगते हैं, फेकभाषा में प्रतिवाद करते हैं, यही राजनीति में फेकभाषा को प्रतिवाद की भाषा बनाने में सहायक हुई है। प्रतिवाद की फेकभाषा को संघ ने जनप्रिय बनाया है और इसी फेकभाषा के ज़रिए हिन्दुत्व और हिन्दूभावबोध का प्रचार किया है । 


आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता



आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो। 
       हिन्दूबोध वस्तुत: वायवीय है उसे संघी बंदे व्यक्ति की 'अच्छी' 'बुरी' आदतों के साथ नत्थी करके पेश करते हैं। इस तरह वे हिन्दूबोध को 'अच्छीआदत' के रुप में सम्प्रेषित करते हैं। इसमें व्यक्ति के ख़ास क़िस्म के एक्शन को उभारते हैं। इस प्रक्रिया में वे संघ की फ़ासिस्ट विचारधारा पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और संघ को मानवीय या सामाजिक संगठन के रुप में पेश करते हैं। सच यह है कि संघ की विचारधारा का मूलाधार हिन्दुत्व के रुप में फासिज्म है। हिन्दू तो आवरण है। 
  फासिज्म की लाक्षणिक विशेषता है अमीरों की खुलकर सेवा करना। ग़रीबों और हाशिए के लोगों के हकों पर खुलकर हमले करना। संसदीय संस्थाएँ और संवैधानिक मान-मर्यादाओं को न मानना। संवैधानिक संस्थाओं कोअर्थहीन बनाना। अपने हर एक्शन को क़ानूनी तौर पर वैध मानना। यहाँ तक कि दंगे करने को भी वैध मानना। जनसंहार को वैध मानना। जनप्रिय नेताओं के ज़रिए शिक्षा, स्वास्थ्य, मज़दूरी आदि मानवाधिकारों पर चालाकी के साथ हमले करना। मज़दूर क़ानूनों और काम के समय को निशाना बनाना। 
        फासीवाद का भारत में आगमन राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, संत समागमों, मुस्लिम विद्वेष ,जातिद्वेष ,धार्मिक श्रेष्ठता , स्त्री नियंत्रण के सवालों से होता है। दूसरी बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन कारपोरेट पूँजीवाद के बिना रह नहीं सकता। सतह पर देश की एकता का नारा लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिक या हिन्दू- मुस्लिम विभाजन बनाए रखने पर ज़ोर, कहने के लिए आर्थिक विकास पर ज़ोर लेकिन व्यवहार में कारपोरेट विकास पर ज़ोर ,कहने के लिए शांति बनाए रखने का नारा लेकिन व्यवहार में अहर्निश तनाव बनाए रखने वाले एक्शनों की श्रृंखला बनाए रखना । सतही तौर पर स्त्री के विकास की बातें करना लेकिन व्यवहार में स्त्री विरोधी आचरण करना, स्त्री उत्पीड़न और हिंसाचार को संरक्षण देना। उन तमाम रुढियों को मानना और मनवाना जिनसे स्त्री को परंपरागत रुढियों के खूँटे से बाँधकर रखा जा सके।अंधविश्वास और भाग्यवाद को बढ़ावा देना।  
        भारत में संघ और भाजपा ने अपने को लिबरल संस्कृति और विचारधारा के साथ कांग्रेस आदि लिबरल दलों के विकल्प के रुप में पेश किया है। सारी दुनिया में फासिज्म ने हमेशा उदारतावाद के विकल्प के रुप में पेश किया है। भारत में भी यही दशा है। वे जिस हिन्दुत्व की बातें करते हैं वह तो सभी क़िस्म के नवजागरणकालीन मूल्यों और मान्यताओं का निषेध है। वे नवजागरण के मूल्यों पर प्रतिदिन हमले करते हैं। धर्मनिरपेक्षता पर आए दिन होने वाले हमले फासीवादी नवजागरणविरोधी नज़रिए का एक नमूना मात्र हैं। वे सतीप्रथा का देवराला सतीकांड के समय समर्थन और हिमायत कर चुके हैं।इसी तरह स्त्री के आधुनिक रुपों और स्त्री स्वायत्तता को वे एक सिरे से ख़ारिज करते हैं।नवजागरण ने उदारतावादी विचारों को प्रवाहित किया जबकि संघ सभी क़िस्म के उदारतावादी  विचारों का हिन्दुत्व के नज़रिए से विरोध करता है। 
      संघ सिर्फ़ मार्क्सवाद विरोधी ही नहीं है वह उदारतावाद का भी विरोधी है। संघ को समझने के लिए हमें परंपरागत मार्क्सवादी व्याख्याओं से बहुत कम मदद मिलेगी । इसके वैचारिक तानेबाने में परंपरागत अविवेकवाद और ऊलजुलूल बातें भरी हुई हैं। संघ उन तमाम ताक़तों के साथ सहज ही संबंध बना लेता है जो ताकतें अविवेकवाद की हिमायत करती हैं। इसलिए संघ को सामाजिक- वैचारिक तौर पर अलग-थलग करने लिए अविवेकवाद की भारतीय परंपरा को चिह्नित करना और फिर उसके प्रति सचेतनता बढ़ाने की ज़रुरत है। 
   संघ के लोग शनिपूजा से लेकर हनुमानपूजा, लक्ष्मीपूजा से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा ,उत्सवों और पर्वों से अपने को सहज भाव से जोड़कर जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करते हैं और जनता में संपर्क- सम्बन्ध बनाते हैं। वे आधुनिकतावाद के अविवेकवादी आंदोलनों , तकनीकी रुपों और कलारुपों के साथ सहज रुप में जुड़ते हैं और मासकल्चर को ही संस्कृति बनाने या उसके ज़रिए संस्कृति का पाखंड रचते हैं। 
     संघ के जनाधार के निर्माण में हिन्दी सिनेमा के मर्दवादी सांस्कृतिक रुपों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह परंपरागत मर्दानगी का नवीकृत रुप भी है। समाज में एक तरफ़ दबे-कुचले लोगों की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा और दूसरी ओर संघर्ष में पराजयबोध ने आनंद के क्षणों में मर्दानगी को एक नया आनंददायक नुस्खा बनाया है। यह अचानक नहीं है कि मर्दानगी के अधिकाँश नायक भाजपा के साथ हैं या मोदी के साथ है। मोदी के साथ अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, सलमान खान आदि की मौजूदगी और मित्रता ने मर्दानगी के नायकों एवं संघ के संबंधों को मज़बूत बनाया है। शरीर का उपभोग ,शरीरचर्चा और शरीर का प्रदर्शन जितना बढ़ेगा या महिमामंडित होगा संघ उतना ही मज़बूत बनेगा।
    बम्बईया हिन्दी सिनेमा ने ऐसी कृत्रिम भाषा विकसित की है जो देश में कहीं नहीं बोली जाती ।जनाधाररहित भाषा और उसमें भी प्रतिवादी तेवरों की अभिव्यक्ति अपने आप में सुखद ख़बर है।ऐसे भाषिक प्रयोग संवादों मिलते हैं जो हिन्दीभाषी क्षेत्र में कहीं नज़र नहीं आते। इस तरह कृत्रिम भाषा का साइड इफ़ेक्ट यह है कि हम फेकभाषा में जीने लगते हैं, फेकभाषा में प्रतिवाद करते हैं, यही राजनीति में फेकभाषा को प्रतिवाद की भाषा बनाने में सहायक हुई है। प्रतिवाद की फेकभाषा को संघ ने जनप्रिय बनाया है और इसी फेकभाषा के ज़रिए हिन्दुत्व और हिन्दूभावबोध का प्रचार किया है । 


रविवार, 7 सितंबर 2014

इंटरनेट पर वाम-वाम को राम राम



इंटरनेट और उससे जुड़े माध्यमों और विधा रुपों के आने के बाद से संचार की दुनिया में मूलगामी बदलाव आया है। वैचारिक संघर्ष पहले की तुलना में और भी ज़्यादा जटिल और तीव्र हो गया है। जनसंपर्क और जनसंवाद पहले की तुलना में कम खर्चीला और प्रभावशाली हो गया है। लेकिन वामदलों और ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टियों में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती। यह सच है कि वामदलों के पास बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा है और ज्ञान के मामले में ये लोग विभिन्न क्षेत्र में बेजोड़ हैं। आज भी भारत की बेहतरीन समझ के विभिन्न क्षेत्रों में मानक इन्होंने ही बनाए हैं। लेकिन इंटरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम के आने के बाद वामदलों के रवैय्ये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। 
     वामदल जानते हैं कि नेट कम्युनिकेशन न्यूनतम खर्चे पर चलने वाला कम्युनिकेशन है। यह ऐसा कम्युनिकेशन है जो लोकतांत्रिक होने के लिए मजबूर करता है। यह दुतरफ़ा कम्युनिकेशन है। यहाँ दाता और गृहीता एक ही धरातल पर रहते हैं और रीयल टाइम में  मिलते हैं। यहाँ आप अपनी-अपनी कहने के लिए स्वतंत्र हैं साथ ही अन्य की रीयल टाइम में सुनने ,सीखने और बदलने के लिए भी मजबूर हैं। विचारों में साझेदारी और उदारता इसका बुनियादी आधार है। 
     वामदलों की नियोजित नेट गतिविधियाँ इकतरफ़ा कम्युनिकेशन की हैं और इसे बदलना चाहिए। दुतरफ़ा कम्युनिकेशन की पद्धति अपनानी चाहिए। वामदलों की वेबसाइट हैं लेकिन वहाँ यूजरों के लिए संवाद की कोई खुली जगह नहीं है।वामदलों के बुद्धिजीवियों- लेखकों आदि को कम्युनिकेशन के प्रति अपने पुराने संस्कारों को नष्ट करना होगा। 'हम कहेंगे वे सुनेंगे', ' हम लिखेंगे वे पढेंगे' , 'हम देंगे वे लेंगे' इस सोच के ढाँचे को पूरी तरह नष्ट करने की ज़रुरत है। नये दौर का नारा है 'हम कहेंगे और सीखेंगे',' हम कहेंगे और बदलेंगे'। 
     इंटरनेट कम्युनिकेशन आत्मनिर्भर संचार पर ज़ोर देता है । वामदलों के लोग परनिर्भर संचार में जीते रहे हैं। नए दौर की माँग है आत्मनिर्भर बनो। रीयल टाइम में बोलो। बिना किसी की इजाज़त के बोलो।पार्टी की लक्ष्मणरेखा के बाहर निकलकर लोकतान्त्रिक कम्युनिकेशन में शामिल हो और लोकतांत्रिक ढंग से कम्युनिकेट करो। पार्टी में नेता को हक़ है बोलने का , नेता को हक़ है लाइन देने का, पार्टी अख़बार में नेता को हक़ है लिखने का। लेकिन इंटरनेट में प्रत्येक पार्टी सदस्य और हमदर्द को हक़ है बोलने, लिखने और अपनी राय ज़ाहिर करने का। यह राय ज़ाहिर करने का वैध और लोकतांत्रिक मीडियम है । यह प्रौपेगैण्डा का भी प्रभावशाली मीडियम है। यह कम खर्चीला मीडियम है और इसमें शामिल होकर सक्रिय रहने से संचार की रुढियों से मुक्ति मिलने की भी संभावनाएँ हैं। अभी स्थिति यह है कि फ़ेसबुक पर वाम मित्र लाइक करने, एकाध पोस्ट लिखने, फ़ोटो शेयर करने से आगे बढ़ नहीं पाए हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और वामदलों को सुनियोजित ढंग से अपने सदस्यों को खुलकर इंटरनेट माध्यमों पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए प्रेरित करना चाहिए इससे पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी। 
     

शनिवार, 6 सितंबर 2014

बेमिसाल सुनील गुप्ता

 
         सुनील गुप्ता के अकस्मात हमारे बीच से चले जाने की ख़बर फ़ेसबुक पर पढ़ी । मन को बेहद दुख हुआ।मैं सुनील को तब से जानता हूँ जब वह जेएनयू पढ़ने आए थे। हम दोनों सतलज में रहते थे। रोज़ का मिलना और तरह - तरह के विषयों पर आदान प्रदान आदत बन गयी थी। सुनील मेरे साथ 1980-81 में छात्रसंघ में कौंसलर रहे। सुनील के जीवन का हिंदीप्रेम मुझे बेहद अपील करता था साथ ही उनकी सादगी को मैं मन ही मन सराहता था और उनको अनेकबार कहता भी था कि आपके समाजवादी विचार और सादगी को हर नागरिक को सीखना चाहिए।
सुनील अपने समाजवादी आदर्शों और ग़रीबों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता के लिए हम सभी मित्रों में सम्मान की नज़र से देखे जाते थे। शानदार अकादमिक रिकॉर्ड के बावजूद सुनील ने ग़रीबों की सेवा करने का फ़ैसला करके युवाओं में मिसाल क़ायम की थी और उसका यह त्याग हमलोगों में ईर्ष्या की चीज़ था।
सुनील से मेरी लंबे समय से मुलाक़ात नहीं हो पायी लेकिन मैं उसके लिखे को खोजकर पढ़ता रहा हूँ। सुनील का अकस्मात निधन भारत के समाजवादी आंदोलन की अपूरणीय क्षति है ।
     सुनील जब जेएनयू आए तो उस समय उसका कैम्पस बदल रहा था। पहले जेनयू कैम्पस में जो कुछ होता था वह भारत के किसी भी विश्वविद्यालय से मेल नहीं खाता था। लेकिन 1978-79 से कैम्पस ने नई अँगडाई लेनी शुरु की और देश के छात्र आंदोलन की बयार यहां पर भी आने लगी। देश में जो घट रहा था उसकी अभिव्यंजना जब कैम्पस में होने लगे तो लोग कहते हैं कि अब यह कैम्पस देश की मुख्यधारा से जुड़ गया है।
     कैम्पस में आरक्षण,अल्पसंख्यक,दलित राजनीति ,जातिवाद , साम्प्रदायिकता आदि प्रवृत्तियों का असर दिखने लगा। इससे कैम्पस में नए किस्म की अस्मिता राजनीति का दौर शुरु हुआ। यही वह परिवेश था जिसमें छात्र राजनीति में नया छात्र समीकरण बनकर सामने आया। पहलीबार यह देखा गया कि सोशियोलॉजी विभाग में जाति के आधार एक ही जाति के भूमिहार छात्रों के दाखिले हुए और बड़े पैमाने पर उसके खिलाफ आंदोलन हुआ और उस आंदोलन में फ्री-थिकरों और एसएफआई की बड़ी भूमिका थी। यह संयोग कि बात थी कि उस समय हमारे समाजवादी मित्रगण जातिवादी दाखिले के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। समाजवादियों और फ्रीथिंकरों का एलायंस हुआ करता था वह टूट गया। यही वह परिवेश है जिसमें नए सिरे से समाजवादी युवजनसभा ने अपने को संगठित किया ।
      जेएनयू कैम्पस में सुनील गुप्ता समाजवादी युवजनसभा के नेता थे और सभी छात्र उनका सम्मान करते थे। वे पढ़ने में बेहतरीन थे और हिन्दी के अनन्य भक्त थे। वे मुख्यभाषा के रुप में हिन्दी का अपने भाषणों में इस्तेमाल करते थे। दिलचस्प बात यह थी कि वे समाजविज्ञान के स्कूल में अर्थशास्त्र पढ़ते थे। इस स्कूल में हिन्दीभाषी क्षेत्र से आने वाले छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा थी लेकिन अधिकतर छात्र हिन्दी से परहेज करते थे। हिन्दी में भाषण सुनना पसंद नहीं करते थे।
   सन् 1980-81 में मैंने एसएफआई के पैनल से कौंसलर का चुनाव लड़ा था। उस समय तक छात्रसंघ चुनाव में यह परंपरा थी कि एसएफआई पैनल में मुख्य वक्ता के रुप में पदाधिकारी उम्मीदवार ही बोला करते थे। साथ में अतिथि नेता बोलते थे। सभी अंग्रेजी में बोलते थे । स्थिति यह थी कि सभी छात्र संगठनों के चुनाव पैनल में प्रधानवक्ता पुराने अनुभवी कैम्पसनेता या बाहर के नेता रहते थे और सबको अंग्रेजी में बोलने की आदत थी। यहां तक कि समाजवादी नेता भी अंग्रेजी-हिन्दी में मिलाकर बोलते थे। मसलन् यदि समाजवादियों की मीटिंग 3 घंटे चली तो मुश्किल से 15-20 मिनट समय हिन्दी को मिल पाता था। मैं निजी तौर पर इस स्थिति बेहद दुखी था और तय कर चुका था कि हिन्दी को भाषणकला की मुख्य भाषा बनाना होगा।
      मैंने एसएफआई की मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा कि मुख्यवक्ताओं के साथ मैं हिन्दी में बोलूँगा। पहले इसको किसी ने नहीं माना बाद में  काफी जोर देकर अपनी बात कही तो सभी मान गए और यह हिन्दी के लिए शुभ खबर थी। मेरा मानना था  कैम्पस में हिन्दी को मुख्य भाषणभाषा बनना है तो एसएफआई को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। क्योंकि वह कैंपस में सबसे बड़ा छात्र संगठन है। कैम्पस की राजनीति हिन्दी उस समय अस्तित्वहीन थी। उन दिनों हिन्दी वहां सिर्फ भारतीय भाषा संस्थान (हिन्दी-उर्दू दो ही भाषाएं इसमें थीं) की भाषा थी। समाजवादी हिन्दी के पक्षधर थे लेकिन वे अंग्रेजी दां फ्रीथिंकरों के  मित्र थे इसके कारण फ्रीथिंकरों और समाजवादियों के संयुक्त मोर्चे में अंग्रेजी का वर्चस्व हुआ करता था,चुनाव सभाओं में इस मोर्चे के अधिकांश वक्ता फ्रीथिंकर हुआ करते थे जो अंग्रेजी में ही बोलते थे।
        हिन्दी के लिहाज से 1980-81 का छात्रसंघ चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था। एसएफआई का एआईएसएफ से संयुक्त मोर्चा  नहीं बना।  वहीं पर अन्य मोर्चे भी मैदान में थे। इसबार के चुनाव की पहली मीटिंग पेरियार होस्टल में हुई उसमें मुख्यवक्ता थे-प्रकाश कारात,सीताराम येचुरी,डी.रघुनंदन,अनिल चौधरी,अध्यक्षपद  के प्रत्याशी वी.भास्कर और जगदीश्वर चतुर्वेदी। मेरे अलावा सभी ने अंग्रेजी में बेहतरीन भाषण दिया था। लेकिन संयोग की बात थी कि इस मीटिंग में मेरा भाषण सबसे अच्छा हुआ और यह पहलीबार था कि कोई वक्ता पूरे समय हिन्दी में एसएफआई के मंच से तकरीबन 40-50 मिनट बोला हो।इस भाषण का असर यह हुआ कि एसएफआई ने तय किया कि मैं प्रत्येक चुनावसभा में भाषण दूँ। उस रात पहलीबार जब मैं भाषण देकर अपने छात्रावास आया तो सुनीलजी ने गरमजोशी के साथ मेरे भाषण की प्रशंसा की और कहा कि आपने तो एसएफआई को ही बदल दिया। वे इतनी देर हिन्दी कहां सुनते हैं और कैम्पस में चुनावसभा में इतनी देर हिन्दी कौन सुनता है। यह भी कहा आप हमारे साथ होते तो और भी मजा आता। लेकिन यह हिन्दी की शुरुआत थी। मैंने उस समय सुनील से कहा कि आप हिन्दी को कैम्पस में लाना चाहते हैं तो जिद करके भाषण दें लोगों को हिन्दी सुनने को मजबूर करें और वे मेरे इस सुझाव से सहमत थे। मेरे और सुनील या अन्य किसी छात्रनेता में एक बुनियादी अंतर यह था कि ये सब बहुभाषी वक्ता थे। मैं हिन्दी के अलावा और कोई भाषा नहीं जानता था और यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी भी थी। सारा कैम्पस जानता था कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता। लेकिन इससे मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। मुझे याद है कि पहली चुनावसभा के तत्काल बाद नीलगिरि ढाबे पर समाजवादी छात्रनेता स्व. दिग्विजय सिंह ने कहा था  तुम यह बताओ तुमने पार्टी को राजी कैसे किया ? मैं हँसने लगा।  मैंने कहा दादा कैम्पस बदल रहा है। भविष्य की मुख्य वक्तृताभाषा यहां हिन्दी ही होगी। इसी चुनाव में आखिरी चुनावसभा गोदावरी होस्टल में हुई जिसमें प्रकाश कारात ने साफ कहा कि मैं आगे से छात्रसंघ के चुनावों में भाषण देने नहीं आऊँगा, क्योंकि नई लीडरशिप आ गयी है और ये इतना सुंदर बोलते हैं कि अब मेरे आने की जरुरत ही नहीं है। खासतौर पर उसने मेरे भाषण का जिक्र किया और कहा कि हिन्दी को जिस तरह यहां सम्प्रेषणीय और बाँधे रखने की भाषा के रुप में जगदीश्वर ने पेश किया है उसे मैं इस चुनाव की बड़ी उपलब्धि मानता हूँ।  यह संस्मरण बताने का बडा कारण है कि जेएनयू में सुनील जब आए तो परिवेश बदल रहा था और अंग्रेजी का वर्चस्व टूट रहा था। यही वह परिवेश था जिसमें समाजवादी युवजन सभा ताकतवर संगठन के रुप में उभरी। हिन्दीभाषी छात्र अपने को समाजवादी युवजन सभा में अभिव्यंजित होते देख रहे थे। इस चुनाव में सुनील और मैं दोनों कौंसलर बने और दोनों हिन्दी में बोलकर चुनाव जीते।
देखते ही देखते सुनील और उनके साथियों की मेहनत रंग लाई और 1982-83 में समाजवादी युवजनसभा समूचा चुनाव जीत गयी,नलिनीरंजन मोहन्ती(समाजवादी युवजन सभा) छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। वे विशुद्ध अंग्रेजी भाषी थे। लोग अचम्भित थे कि जो समाजवादी हिन्दी की हिमायत करते थे उनका उम्मीदवार ऐसा व्यक्ति था जो हिन्दी नहीं बोलता था। खैर, यह अनुभव कई मायनों में मूल्यवान था। उसमें सुनील के साथ-साथ समाजवादी मित्रों के राजनीतिक मनोभावों को जानने –समझने का मौका मिला।
     इस अनुभव का सबक यह मिला कि सुनील और उनके साथ के समाजवादी मित्र हठी लोग हैं। कैम्पस में प्रतिबद्ध राजनीति थी और उसके अनेक मानक देखे गए लेकिन समाजवादी राजनीति में नया फिनोमिना देखा गया जिसमें प्रतिबद्धता के साथ हठीभाव भी था। समाजवादी टूट जाने के लिए तैयार थे लेकिन अपने हठ को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। इसने कैम्पस में अतिवादी रुझानों को जन्म दिया। संघर्ष होते थे लेकिन समझौते नहीं हो पाए।  राजनीति में एक खास किस्म की कट्टरता का जन्म हुआ और उसने समूचे कैम्पसके चरित्र को ही बदल दिया।
     प्रतिबद्ध राजनीति में छात्रों की मांगें होती हैं.उनके लिए संघर्ष होता है, लेकिन अधिकारियों के साथ संवाद और समझौते का रास्ता खुला रखना पड़ता है और लक्ष्मणरेखाएं खींचकर आंदोलन नहीं किए जाते। सुनील के कैम्पस में आने के पहले समाजवादियों में वैचारिक लचीलापन था जो सुनील के सक्रिय होने के बाद खत्म हो गया। सुनील की लीडरशिप का यह कमाल था कि समाजवादी पहलीबार छात्रसंघ का चुनाव जीते और मीलिटेंट भाव से राजनीति की कैम्पस में शुरुआत हुई। इस राजनीति का मूल संस्कार हठवादी था। यह हठवाद छात्रों को काफी अपील करता था। जबकि सच यह है कि छात्र राजनीति अनमनीय भाव से नहीं की जा सकती । लेकिन कैम्पस में समाजवादी हठवाद का श्रीगणेश हुआ और इसका परिणाम कैम्पस और स्वयं समाजवादी युवजन सभा के लिए आत्मघाती साबित हुआ। समाजवादी युवजन सभा जिस लहर के साथ उभरकर सामने आई मात्र 1982-83 के एक साल के छात्रसंघ के लीडरशिप के दौरान हाशिए पर चली गयी। यहां तक कि अधिकांश छात्रों का समाजवादी युवजन सभा से मोहभंग हो गया। कैम्पस भायानक अराजकता के दौर से गुजरा, जेएनयू में एक साल दाखिले नहीं हुए। सैंकड़ों छात्र निष्कासित हुए।
      समाजवादी हठवाद का लक्षण है कि हम जो मानते हैं उसे हूबहू लागू करेंगे चाहे जो हो। इस समझ के कारण समूचे हिन्दीभाषी क्षेत्र में समाजवादी उफान की तरह आए और फिर उसी तरह भुला दिए गए। सन् 1983 में किसी समस्या पर विवाद यह था कि प्रतिवाद करना है और वीसी का घेराव करना है। हमारा (एसएफआई) प्रस्ताव यह था कि घेराव करो लेकिन आफिस में करो। समाजवादियों का कहना था घर पर घेराव करेंगे। हमने इसका प्रतिवाद किया लेकिन वे नहीं माने, छात्रों ने उनका समर्थन किया हमारी बात नहीं मानी। परिणाम सामने था, समूचा छात्र आंदोलन दमन के जरिए तोड़ दिया गया। जेएनयू की तमाम नीतियां बदल दी गयीं।छात्रसंघ को अप्रासंगिक बना दिया गया।सैंकड़ों छात्र निष्कासित हुए और सैंकड़ों छात्रों पर 18 से ज्यादा धाराओं में मुकदमे ठोक दिए गए 400से ज्यादा छात्र 15 दिनों तक तिहाड़ जेल में बंद रहे। जेएनयू में अभूतपूर्व दमन हुआ। समूचा समाजवादी नेतृत्व छात्रों में अलग-थलग पड़ गया। जो छात्र एक साल पहले समाजवादी युवजनसभा पर जान छिड़कते थे वे ही नफरत करने लगे।यह समाजवादी हठ की स्वाभाविक परिणति थी।
    समाजवादी हठ एक तरह की वैचारिक कट्टरता है जिसको सुनील ने अपनी सादगी,त्याग और ईमानदारी के जरिए आकर्षित बना लिया और वे बाद में इसके जरिए गरीबों के बीच में काम करने कैम्पस के बाहर म.प्र. में चले गए। मेरा निजी तौर पर उनसे कैम्पस में नियमित संपर्क था लेकिन उनके कैम्पस के बाहर जाने के बाद कोई सम्पर्क नहीं रहा। इसका प्रधान दोषी मैं ही हूँ। मैं उतना मिलनसार नहीं हूँ। कम मिलता हूँ। जबकि सुनील जमीनी कार्यकर्ता होने के नाते मिलनसारिता में बेमिसाल था। वह मित्रों का ख्याल भी रखता था। उसके अचानक जाने से समाजवादी आंदोलन की बड़ी क्षति हुई है।  (सामयिक वार्ता, जुलाई 2014 में प्रकाशित)
     

नरेन्द्र मोदी का डिजिटल टाइमपास



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कल टीवी पर शिक्षक दिवस के बहाने बोल रहे थे तो वे सामान्यबोध के धरातल से सम्बोधित कर रहे थे। सामान्यबोध ने उनके राजनीतिकबोध को दबाए रखा । असल में वे बच्चों की चेतना के दबाव में थे। जैसा उम्मीद थी सब कुछ नियोजित था और नियोजन में कोई ऐसी बात नहीं घटती कि वक़्ता को परेशानी हो या उलझन हो। बच्चों में मोदी को लेकर कुतूहल था और मोदी अपनी शैली से उसे उभारने की कोशिश कर रहे थे । बच्चों के सवाल बच्चों जैसे थे लेकिन मोदी के जबाव बच्चों के अनुकूल नहीं थे बल्कि पीएम के अनुकूल थे। 
    प्रधानमंत्री का काॅमनसेंसभाषण मीडिया के पैरामीटर के अनुसार तय किया गया था और उसमें उन बातों को ही कहने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया जो बातें बच्चे आए दिन अपने स्कूलों में शिक्षकों या माता-पिता से सुनते हैं। सुनें हुए को सुनना कोई असर नहीं छोड़ता , हाँ, उससे टाइमपास जरुर होता है।फलत:बच्चों के साथ मोदी सत्र टाइमपास का डिजिटल रुप था। 
    डिजिटल टाइमपास की यह ख़ूबी है वहाँ पर कहीं गयी बातें तेजगति से आती हैं और जाती हैं। चूँकि टाइमपास में रुढिबद्ध सम्प्रेषण के रुपों का प्रयोग करते हैं अत: कम्युनिकेशन बड़ा सरल- सहज लगता है। सरल- सहज कम्युनिकेशन का मतलब यह नहीं है कि सम्प्रेषक सरल - सहज है। असल में भाषायी रुढियों का प्रयोग सरल का विभ्रम खड़ा करता है लेकिन यह विभ्रम क्षणिक होता है। डिजिटल कम्युनिकेशन जितने देर चलता है उतनी देर असर रहता है बाद में उसका असर नदारत हो जाता है, जैसे पोर्न फ़िल्म का असर जब तक चलती है तब तक असर रहता है बंद हुई ,असर ग़ायब। कम्प्यूटर चल रहा है तो आप सक्रिय हैं यदि बंद कर दिया तो कम्प्यूटर असरहीन होता है। यही हाल मोदी के डिजिटल भाषणों का है। चल रहे थे तो असर था ,बंद हैं तो असर ख़त्म।यही वजह थी कि मोदी के भाषणों को तक़रीबन १साल अहर्निश चलाया गया।
       शिक्षक दिवस पर मोदी कम्युनिकेशन की मूल चिन्ता थी 'हज़म 'करने की। वे चाहते थे शिक्षक दिवस के प्रतीक पुरुष के रुप में जाने जाएँ या फिर महान विचारक के रुप जाने जाएँ! लेकिन यह सब संभव नहीं हो पाया। क्योंकि 'शिक्षक'को हज़म करना संभव नहीं है । उसकी सत्ता-महत्ता तो राज्यसत्ता से स्वायत्त है और यह स्थिति उसने सैंकडों सालों में अर्जित की है। शिक्षक संस्थान है उसे डिजिटल क्रांति से अपदस्थ नहीं कर सकते। शिक्षक -छात्र के सम्बन्ध का कोई विकल्प नहीं है। अमेरिका में डिजिटल क्रांति आज तक शिक्षक को अपदस्थ नहीं कर पायी है। 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

'गुरु' के नए 'कू-भाषी' कॉमेडियन


        बेवकूफियों से हास्य पैदा करना,ऊल-जलूल बातों से हास्य पैदा करना, कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है। इस कार्यक्रम से बबूल संघ ,उसके साइबर बटुक और मोदी सरकार बहुत प्रभावित है। वे कपिल के कॉमेडी शो को भारत का राजनीतिक कंटेंट बना रहे हैं। देश के हर जलसे,दिवस,नायक,अच्छे नाम,अच्छे गुण आदि को राजनीतिक 'कू-भाषा' से अपदस्थ कर रहे हैं। वे हर अच्छे दिन और अच्छे त्यागी पुरुष को टीवी इवेंट बना रहे हैं ! 'कू' कर रहे हैं।। इस 'कू -कल्चर' के नए नायक इन दिनों टीवी टॉक शो पर आए दिन दिख जाएंगे। फेसबुक में दिख जाएंगे!   कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है ' कू-भाषा' का हास्य के लिए दुरुपयोग ,वहां हास्य कम और 'कू-भाषा' का दुरुपयोग ज्यादा होता है और यही भाषिक दुरुपयोग सांस्कृतिक भ्रष्टाचार की नई खाद है और इससे आमलोगों में भाषायी कुरुपता पैदा होती। 'कू-भाषा' की संस्कृति का विस्तार होता है।नव्य-आर्थिक उदारीकरण ने सारी दुनिया में 'कू-भाषा' को नए-नए रुपों में प्रसारित किया है।इसके भाषिक प्रयोगों को हम आए दिन युवाओं से लेकर फेसबुक तक देख सकते हैं। 'कू-भाषा' का नया प्रयोग है 'शेल्फी'!

कपिल के कॉमेडी शो का मूलाधार है 'कू-भाषा'। यही वह बिंदु है जहां पर बबूल संघ का कपिल शो के साथ मेल बैठता है। संघ की दीर्घकालिक सांस्कृतिक रणनीति है भारत को सांस्कृतिक रुप से विद्रूप बनाओ। भाषा ,व्यवहार और राजनीति में अंतर पैदा करो। विलोम की सृष्टि करो। जिस भाषा को बोलो,जिस नायक की जय-जयकार करो उसके कंटेट को पूरी तरह बदलो ! यह काम वे पहले छोटे स्केल पर करते थे, अपनी गोष्ठियों-सभाओं-शाखाओं में करते थे लेकिन इधर के वर्षों में वे बृहत्तर तौर पर करने लगे हैं। राजनीतिक एजेण्डे के तौर पर,साइबर एजेण्डे के तौर पर,टीवी टॉकशो के तौर पर,मंत्रालय के कार्यक्रम के अंग के तौर पर कर रहे हैं,इसलिए संस्कृति में वे 'कू' कर रहे हैं और इसके लिए 'कू-भाषा' और केरीकेचर की शैली का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका नया 'कू' है 'गुरु दिवस' मनाओ का नारा। बबूल संघ की सांस्कृतिक हेकड़ी का आलम यह है कि वे अपनी 'कू-भाषा'की आलोचना सुनने को तैयार नहीं होते, जो आलोचना करता है उस पर निजी हमले आरंभ कर देते हैं।मसलन् आपने कहा कि शिक्षक दिवस को 'गुरु दिवस' कहना सही नहीं है तो पलटकर हमला शुरु ! क्या तुम्हारा कोई गुरु नहीं है ? क्या राहुल ने मनमोहन सिंह को 'गुरु' नहीं कहा! गांधीजी ने 'गुरु' नहीं कहा ! 'गुरु' कहना और 'गुरु' मानना और 'गुरु' के अनुरुप या बतायी दिशा में आचरण करना एकदम भिन्न चीजें हैं। जब आप किसी को गुरु कहते हैं तो यह आपका निजी मामला है। लेकिन ज्योंही इसे सार्वजनिक करते हैं तो 'गुरु' का मामला निजी नहीं रह जाता,'गुरु' निजी नहीं रह जाता। 'गुरु' सार्वजनिक मूल्यांकन के दायरे में आ जाता है।लेकिन बबूल संघ और मोदी सरकार की ज्ञानी 'गुरु' में नहीं ,फिल्मी 'गुरु' में दिलचस्पी है! आप सब जानते हैं फिल्मों में कई किस्म के 'गुरु' चित्रित हुए हैं। इनका गुरु ज्ञान का प्रतीक नहीं है बल्कि इनका 'गुरु' तो उन सभी लक्ष्यों को समर्पित है जिनको 'गुरु गोलवलकर' बता गए हैं। इनके नए गुरु तो 'जन-संपर्क विशेषज्ञ' हैं जो बता रहे हैं कि भाषा में उलझाओ,भाषिक पदबंधों में सांस्कृतिक उत्पाद मचाओ। भाषिक उपद्रव यानी 'कू-भाषा' से मीडिया कवरेज बनाने में मदद मिलती है,वाक्य को इवेंट बनाने में मदद मिलती है। इसलिए बबूल संघ को आदित्यनाथ से लेकर तोगड़िया,मोदी से लेकर साइबर बटुक जैसी मीडिया इवेंट या हेडलाइन बनाने वाली भाषा चाहिए। वे भाषिक प्रयोगों के जरिए सांस्कृतिक 'कू' करने में लगे हैं। उनकी दिलचस्पी संस्कृति को अपदस्थ करने में हैं।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

सोशल मीडिया और बर्बरता

        सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बर्बरता का महाख्यान चल रहा है। जिस तरह आईएसआईएस की पोस्ट अबाधित रुप में पेश की जा रही हैं, बर्बर संगठनों के पक्ष में निरंतर लिखा जा रहा है। उससे यह संकेत जा रहा है कि सोशल मीडिया के लिए बर्बरता सबसे बड़ी खबर है और राजनीतिक आंदोलन, प्रतिवाद और लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई मूल्य नहीं है।अधिकांश मीडिया, बर्बरता की प्रस्तुतियों में इस कदर व्यस्त है कि उनको जनांदोलनों की किसी खबर या समस्या के कवरेज की कोई चिंता ही नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बर्बरता का नाटक चल रहा है और हम सब उसके मूकदर्शक बन गए हैं।बर्बरता का जितने बड़े रुप में प्रसारण हो रहा है जनांदोलनों का उतने बड़े रुप में प्रसारण नहीं हो रहा। यानी मीडिया की नजर में बर्बरता प्रासंगिक है,मोहन भागवत के नॉनशेंस बयान,बत्रा पंडित का पोंगापंथ और भगवापंथ की इरेशनल खबरें प्रासंगिक हैं, लेकिन अन्य लोकतांत्रिक खबरें और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष विचार प्रासंगिक नहीं हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया का यह बर्बरता प्रेम , बर्बरता का मित्र बना रहा है और लोकतंत्र से दूसरी बढ़ा रहा है। बर्बरता प्रेम का ही परिणाम है कि अनंतमूर्ति से लेकर विपनचन्द्र तक की मौत पर बर्बरता प्रेमी खुशी का इजहार कर रहे हैं। इस तरह का बर्बरता प्रेम गुलाम युग में देखा गया था।सोशलमीडिया -मीडिया कवरेज ने नार्सीसिस्ट भावबोध की सृष्टि की है। इसके कारण मीडिया ने करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाया है। इसने जहां एक ओर परपीड़क आनंद और उसके भोक्ताओं का बर्बर समाज पैदा किया है वहीं दूसरी ओर मूल्याधारित राजनीति को पूरी तरह निम्नस्तर पर उतार दिया है। मुनाफेखोर मीडिया घराने खुश हैं कि उनकी रेटिंग और मुनाफों में उछाल आया है वहीं दूसरी ओर वे मीडिया -सोशलमीडिया के जरिए लोगों की वधलीला भी कर रहे हैं। आज सोशलमीडिया में किसी के हत्या की तस्वीर लगाइए और खूब कवरेज पाइए। नैतिकता,सभ्यता और भद्रता के जितने ज्यादा परखच्चे उड़ाएंगे उतना ही दावे के साथ ज्यादा मुनाफा कमाएंगे।

पी साईनाथ ने कहा-' मीडिया में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर...हिरोशिमा-नगासाकी पर बम गिराए जाने के बाद The Times of India ने अपने 11 नंबर पेज पर शीर्षक लगाया था, "Excellent results in raid on Nagasaki" और इसके नीचे एक और ख़बर थी जिसका शीर्षक था, "Uranium shares go up 90 points after Hiroshima.'' इस घटना पर पूरी दुनिया में वाइट हाउस से जारी प्रेस रिलीज़ आधारित जो पत्रकारिता की गई, उसने पत्रकारिता में उसी वक्‍त दो स्‍कूल बना दिए- एक पत्रकारों का और दूसरा स्‍टेनोग्राफरों का। आज पत्रकारिता में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर हैं जो धीरे-धीरे कॉरपोरेट स्‍टेनोग्राफर होते जा रहे हैं। ये कहना है जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ का।'

'दिल्ली के कॉन्‍सटिट्यूशन क्‍लब में आयोजित एक समारोह में अपने संबोधन के दौरान पी. साईनाथ ने पत्रकारिता को लेकर कई अन्य बातें भी बताईं, जिसमें से एक यूं हैं.... हिरोशिमा-नगासाकी पर अमेरिकी बमबारी का जश्‍न मनाते हुए जब न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के (अमेरिकी सैन्‍य विभाग प्रायोजित) पत्रकार विलियम लॉरेन्‍स 'बम के सौंदर्य की तुलना बीथोवन की सिम्‍फनी के ग्रैंड फिनाले' से और बमबारी से पैदा हुए 'मशरूम की आकृति के धुएं के गुबार की तुलना स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी' से कर रहे थे, ठीक उस वक्‍त सिर्फ एक फ्रीलांसर पत्रकार था जिसने इस घटना का सच सामने लाने के लिए अपने खर्च पर हिरोशिमा जाने का फैसला किया। ऑस्‍ट्रेलिया के इस पत्रकार का नाम था विल्‍फ्रेड बर्चेट। उसकी बेहतरीन रिपोर्टिंग 'द डेली एक्‍सप्रेस' में छपी।'

'विल्‍फ्रेड बर्चेट की रिपोर्टिंग का वैश्विक मीडिया के समक्ष खण्‍डन करने के लिए टोक्‍यो में अमेरिकी मैनहैटन प्रोजेक्‍ट के ब्रिगेडियर जनरल थॉमस फैरेल ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स रखी। बर्चेट को पता चला कि प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स उसी के ऊपर है, तो वह वहां पहुंच गया। उसने ब्रिगेडियर से कुछ सवाल किए। सवालों से असहज होकर ब्रिगेडियर ने उससे कहा कि वह जापान के साम्राज्‍यवादी प्रोपेगेंडा का शिकार हो गया है। बाहर निकलते ही एलाइड ताकतों के प्रमुख के निर्देश पर उसका पासपोर्ट ज़ब्‍त कर लिया गया, उसे हिरासत में ले लिया गया और हिरोशिमा-नगासाकी बमबारी की रिपोर्टिंग पर प्री-सेंसरशिप लगा दी गई।छूटने के बाद दोबारा जब बर्चेट ने पासपोर्ट बनवाया तो फिर से गुप्‍तचर एजेंसियों ने उसे चुरा लिया। इसके बाद वह आजीवन बिना पासपोर्ट के रहा। बर्चेट ने अपनी आत्‍मकथा 'पासपोर्ट' के नाम से लिखी और हिरोशिमा में लगे विकिरण के असर से बेहद गरीबी में जीते हुए बगैर किसी नागरिकता के उसका निधन हुआ। उधर, अमेरिकी सैन्‍य विभाग द्वारा प्रायोजित न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के पत्रकार को दुनिया के सामने बम का सौंदर्य बखान करने के लिए पुलित्‍ज़र पुरस्‍कार से नवाज़ा गया। तभी से दुनिया भर की पत्रकारिता में दो ध्रुव कायम हो गए- लॉरेन्‍स की और बर्चेट की पत्रकारिता। अब आपको तय करना है कि आप क्‍या बनना चाहेंगे- विलियम लॉरेन्‍स या विल्‍फ्रेड बर्चेट?'

(पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के वॉल से)







गुरुवार, 21 अगस्त 2014

नरेन्द्र मोदी की बेलगाम भाषा के खतरे

बेलगाम भाषा का टकराव पैदा करती है।साथ ही पीड़ादायक आनंद की सृष्टि भी करती है। सुनने वाला आनंद में रहता है लेकिन इस तरह की भाषा सामाजिक कष्टों की सृष्टि करती है और तनाव पैदा करती है। मोदी बाबू ने मैनस्ट्रीम मीडिया में बेलगाम भाषा को जनप्रिय बनाया है। हाल ही में वे जब हरियाणा में बोल रहे थे तो लोग समझ ही नहीं पाए कि उनके साथ क्या घट रहा है,यही हाल चुनावी सभाओं का भी था।

मोदी के भाषायी प्रयोगों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि मोदी ने वक्तृता का ऐसा इडियम विकसित किया है जिसमें रेशनल के लिए कोई जगह नहीं है। वे भाषा में शब्दों का प्रयोग करते समय पद,सामाजिकता और संस्थान की भाषा के मानकों का अतिक्रमण करते हैं। चुनावों में इस तरह का अतिक्रमण चलता है लेकिन सामान्य स्थितियों में पद और संस्थान की भाषा का ख्याल रखा जाना चाहिए।

मसलन मोदी का हाल ही में वैज्ञानिकों को यह कहना कि 'चलता है' का रवैय्या नहीं चलेगा। यह कथन अपने आप में बहुत कुछ कहता है।प्रधानमंत्री अपनी संस्थान की भाषा भूलकर और पेशेवरलोगों की भाषा भूलकर जिस मुहावरे में बोल रहे थे वह बेलगाम भाषा का नमूना है। नभाटा के अनुसार मोदी ने कहा ''अब 'चलता है' वाला रवैया बिल्कुल नहीं चलेगा और इसे छोड़ना ही होगा।'' । मोदी ने यह भी कहा '' डीआरडीओ ग्लोबल समुदाय को ध्यान में रखकर खुद में बदलाव लाए।'' , अफसोस की बात है कि मोदी को इतना ही नहीं मालूम कि यह संस्थान विश्व प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखकर अपनी प्राथमिकताएं तय करके काम कर रहा है। सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक इसमें काम करते हैं।इन वैज्ञानिकों के बीच में प्रधानमंत्री की भाषा में बोलना चाहिए न कि गैर-सांस्थानिक भाषा में।इसके अलावा वैज्ञानिकों के बीच में बोलते समय यह भी ध्यान रहे कि वे गुलाम नहीं हैं जो आदेशों पर काम करें। वे जो तय करते हैं उसकी रोशनी में काम करते हैं। इसी तरह जब 15अगस्त को लालकिले से मोदी बोल रहे थे तो पद-संस्थान की भाषिक मर्यादा का अतिक्रमण करके बोल रहे थे।मसलन् , बिना संसद की अनुमति के उन्होंने योजना आयोग को खत्म करने की घोषणा कर डाली।साथ में हिदायतों और नसीहतों की जड़ी लगा दी। नसीहतें तानाशाह देते हैं,लेकिन मोदी तो लोकतंत्र के नायक के रुप में बोल रहे थे उनको नसीहतें देने की जरुरत नहीं थी।

मोदी ने अपनी भाषा को पद-संस्थान की भाषा के अनुकूल भाषा परिवर्तन नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं कि वे देश में भाषा में भिडंत करते-कराते नजर आएंगे। हाल ही में हरियाणा में हाइवे के उदघाटन पर उनका जो भाषण था वह प्रधानमंत्री का उदघाटन भाषण नहीं था वह तो भिड़ंत भाषण था ,जाहिरा तौर पर परिणाम सामने है,कांग्रेस के कई नेताओं ने तेज और सही प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस तथ्य को मोदी समझें और दुरुस्त करें कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं और उस पद और संस्थान की भाषायी परंपरा है,वह परंपरा यदि टूटती है तो जमीनी स्तर पर सामाजिक बिखराव और टकराव पैदा होना लाजिमी है।

मोदी की भाषा में हेकड़ी,उपदेश,दादागिरी के साथ फासिस्ट भाषायी भावबोध छिपा है ,मोदी को इसको सचेत रुप से अपने भाषिक संसार से बेदखल करना होगा वरना टकरावों का जन्म होगा।



रविवार, 17 अगस्त 2014

अशोक वाजपेयी की शीतयुद्धीय दृष्टि और केदारनाथ सिंह

अजीब संयोग है कि केदारनाथ सिंह को जब से ज्ञानपीठ मिला है लगातार उसकी आलोचना हो रही है। इस आलोचना की नई कड़ी अशोक वाजपेयी हैं। उनका मानना है 'ज्ञानपीठ उनसे पहले, मुझ नाचीज की राय में, हमारे दो बड़े गद्यकारों कृष्णा सोबती और कृष्ण बलदेव वैद को मिलना चाहिए था। केदारजी अच्छे कवि हैं, लेकिन उन्हें बड़ा कवि कहने में मुझे संकोच होगा। हो सकता है कि मैं गलत होऊं अपने इस आकलन में, मेरे हिसाब से अज्ञेय-मुक्तिबोध-शमशेर-नागार्जुन की चतुर्थी के बाद हिंदी में पिछले लगभग पचास वर्षों में कोई बड़ा कवि नहीं हुआ है। लेकिन बड़े गद्यकार हुए हैं।' (जनसत्ता,17अगस्त 2014)

वाजपेयी की यह धारणा एकदम निराधार है। हिन्दी में 'कवि चतुष्टयी' तो कृत्रिम ढ़ंग से आलोचकों ने रची है। इस तरह की टीम अपने आप में बेमेल है,क्योंकि इसमें केदारनाथ अग्रवाल नहीं हैं,रघुवीर सहाय नहीं हैं,सर्वेश्वर नहीं हैं,हरीश भादानी शामिल नहीं हैं। ये सभी लेखक वाजपेयी के शीतयुद्धीय नजरिए के बाहर पड़ते हैं।

यह अजीब स्थिति है कि अशोक वाजपेयी पहले एक चतुष्टयी बनाते हैं फिर उसके आधार पर कौन महान कवि है और कौन अ-महान कवि है; आदि के बारे में फतवेबाजी करते हैं। अशोक बाजपेयी बुनियादी तौर पर जब शीतयुद्धीय नजरिए से लेखकों की चतुष्टयी बनाकर देखेंगे तो उनको बाहर कुछ भी नजर नहीं आएगा।

वाजपेयीजी की आदत रही है चौखटे बनाने की, जिसे वे आलोचना के मानक कहते हैं,असल में ये मानक कम आलोचना के शीतयुद्धीय पूर्वाग्रह हैं। इनका किसी भी किस्म के रेशनल आलोचनात्मक विवेक के साथ सम्बन्ध नहीं है। अशोक वाजपेयी से पूछा जाय कि बड़ा कवि किस आधार पर चुना जाएगा ? बड़े कवि के पैमाने बदलते रहे हैं और इनमें वस्तुगत कारणों के अलावा सब्जेक्टिव कारण भी रहे हैं। अशोक बाजपेयी चयन समिति में नहीं थे वरना क्या वही करते जो उन्होंने लिखा है ?

जीवित लेखकों में 'जनोन्मुख आधुनिकता' के केदारनाथ सिंह बड़े कवि हैं । यही वह सबसे दुर्लभ चीज है जो बार-बार उनकी कविताओं की ओर ध्यान खींचती है। इन दिनों 'जनोन्मुख आधुनिकता' की चिन्ताओं को हमने कभी खुलकर देखा नहीं है। दूसरी बड़ी बात यह कि वे अकेले ऐसे कवि हैं जो लगातार शीतयुद्धीय राजनीति के फ्रेमवर्क के बाहर रहकर कविताएं लिख रहे हैं। जिन लेखकों को अशोक वाजपेयी ने अपनी 'चतुष्टयी' में शामिल किया है वे सभी शीतयुद्धीय फ्रेम के बाहर नहीं देखते। इसके विपरीत केदारनाथ अग्रवाल,केदारनाथ सिंह,रघुवीर सहाय,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना आदि की कविताएं शीतयुद्धीय फ्रेमवर्क के बाहर आती हैं।



केदारजी की कविता का दूसरा बड़ा पहलू है कि वे मध्यवर्गीय और बुर्जुआ संवेदनशीलता के सकारात्मक लक्षणों के साथ कविता में बगैर प्रत्यक्ष राजनीति किए खेलते हैं। विगत 30सालों में 'जनोन्मुख आधुनिकता' और उससे जुड़ी संवेदना के लक्षणों की जिस सतर्कता से सर्जनात्मक रक्षा केदारजी ने की है वह उनको बड़ा कवि बनाती है।

शनिवार, 9 अगस्त 2014

यूपी में अफवाह का तूफान और फासिस्टों की नई रणनीति

     फेसबुक से लेकर राजनीति तक बेवकूफी का नया तूफान चल रहा है । शिक्षित मध्यवर्ग के लोगों का एक हिस्सा सरेआम बेवकूफियां कर रहा है और मीडिया उसे कवरेज भी दे रहा है । बेवकूफी के इस नए तूफान का केन्द्र इन दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश है ।
यूपी में कुछ भी हो या घटे ,तुरंत अफवाहें आरंभ हो जाती हैं। अफवाहों के दबाव के कारण आमलोग विवेक-कानून की बात सुनने को तैयार नहीं हैं । घटना हुई कि बेवकूफों फौज अपने –अपने घरों से निकल पड़ती है और 'मार साला को' हल्ला बचाना शुरु कर देती है। अविवेकवाद की यूपी में जिस तरह की आंधी चल रही है ऐसी आंधी पहले कभी नहीं देखी गयी। कई महिने हो गए लेकिन आंधी थमने का नाम नहीं ले रही ।
मसलन् कोई अपराध हुआ है कि हल्ला शुरु हो जाता है, उसके बाद किसी भी तर्क को लोग सुनने को तैयार नहीं होते । वे सिर्फ अफवाह सुनना चाहते हैं। उनके पास हर घटना के अपने तर्क,निष्कर्ष और फैसले होते हैं, ये लोग अपने तर्कों के आधार पर मीडिया कवरेज चाहते हैं, फेसबुक लेखन कर रहे हैं,जनता को भड़का रहे हैं, पुलिस को गरिया रहे हैं । इसके आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण कर रहे हैं ।
पहले कभी- कभार कोई घटना होती थी और एक-दो दिन में शांत हो जाती थी। लेकिन नया फिनोमिना यह है कि अफवाहें शांत नहीं हो रहीं ,अफवाहों के कारखाने चल रहे हैं और बेवकूफों की फौज इसमें अहर्निश श्रम कर रही है । यह खतरनाक स्थिति है । हमें सावधान होना होगा वरना बाद में पछताएंगे ।
यदि कोई घटना घटे तो निजी आग्रहों और निष्कर्षों के आधार पर भड़काऊ बातें लिखना,अफवाह लिखना बंद करें । उससे सामाजिक घृणा बढ़ रही है । अफवाह असभ्य बनाती है,आदिम बनाती है ।
कलम और दिमाग में ताकत है तो कोई सकारात्मक काम करो, बुरा ही काम करना है तो अनेक बुरे अवैध -धंधे हैं वे चुन लो,लेकिन अफवाह फैलाना या घृणा का लेखन बंद होना चाहिए।
खासकर संघ परिवार से जुड़े लोग इस दिशा में गंभीरता से सोचें वरना जान लें जनता को भड़काकर लाभ तो उठा सकते हैं ।लेकिन विनाश तय है । हिटलर का पराभव याद करो और जितना जल्दी हो रास्ता बदलो वरना पराभव तय है । त्रासदी यह है कि तब तक समूचा भारत नरक कुंड में डूब जाएगा, और भारत की नई पीढ़ी घृणा और तिरस्कार में डूब चुकी होगी ।
हो सकता है मेरठ में बलात्कार पीड़िता जो कह रही है वह सही हो ,यह भी हो सकता है कि गलत हो, लेकिन यह तय कौन करेगा ? न्यायालय को जनोन्माद और मीडिया उन्माद पैदा करके दबाव में लाने की रणनीति बंद होनी चाहिए ।
संघ की रणनीति है कि वह पहले अफवाह पैदा करो, फिर अफवाह पर भरोसा करो.फिर उसे प्रचार अभियान में रुपान्तरित करो । कहीं पर भी कोई भी घटना घटे ,संघ के लोग तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। वे तथ्यों और सत्य के आने का इंतजार नहीं करते । उनके पास तयशुदा रणनीति है और लोग हैं ,जिनका काम ही है अफवाह बनाना ।
अफवाहें स्वतःस्फूर्त नहीं होतीं, वे निर्मित की जाती हैं और उन्हें संघ के संगठनों के जरिए वितरित किया जाता है । इसके बाद मीडिया दुरुपयोग के जरिए अफवाह को वैध बनाया जाता है । फलतःआमलोग और प्रशासन समझ ही नहीं पाता कि वह क्या करे, अफवाहों से लड़े या घटना पर काम करे ।
अफवाहें असल में पीड़ित को न्याय से वंचित करती हैं। अफवाहें न्यायबुद्धि और मीडियाबुद्धि को प्रभावित करती हैं । अफवाहें तो सभी माध्यमों की सरताज हैं,बस जरुरत इस बात की है कि आपके पास अफवाह को प्रचारित करने वाला सांगठनिक नेटवर्क हो।
मंदिर आंदोलन के समय से रणनीति रही है अफवाहों के आधार पर पहले जनता को इकट्ठा करो, मीडिया को इकट्ठा करो,फिर हिंसाचार करो या घृणा अभियान चलाओ,इसका परिणाम यह हुआ है कि आमलोगों में सच जानने की इच्छा ही खत्म हो गयी है। आमलोग सच से कोसों दूर कर दिए गए हैं ।
अब वही 'सत्य' है जो अफवाहों से पुष्ट है, उसमें ही हम मजा लेने लगे हैं,बदला लेने लगे हैं,न्याय करने लगे हैं,अफवाहों के आधार पर ही तर्क करने लगे हैं ।
भारत में नागरिकचेतना और नागरिक अधिकारों के लिए अफवाहें सबसे बड़ा खतरा है। अफवाह तो लोकतंत्र का विलोम है,लोकतंत्र में सत्य महत्वपूर्ण है,अफवाह के लिए सत्य अप्रासंगिक है,लोकतंत्र के लिए विवेकवाद महत्वपूर्ण है ,अफवाह के लिए विवेक की नहीं ,जो कहा-सुना जा रहा है उसे मानो,अनुकरण करो। अफवाह का आधार है सामाजिकभेद,लिंगभेद और सामाजिक घृणा , जबकि लोकतंत्र में सामाजिक घृणा के लिए कोई जगह नहीं है। समग्रता में देखें तो अफवाह तो लोकतंत्र के लिए जहर है। नागरिक बनें और अफवाहों का तुरंत जमीनी स्तर पर जबाव दें ।

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

सी-सैट और फेसबुक



यूपीएससी की परीक्षा में सी-सैट का पेपर हटाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन जारी है। यह आंदोलन मूलतःलोकतांत्रिक है और अभ्यर्थियों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को अभिव्यंजित करता है । हर जिम्मेदार नागरिक को इस आंदोलन का समर्थन करना चाहिए। इस आंदोलन में अनेक रंगत की विचारधारा के युवा सक्रिय हैं । इसके बावजूद इसकी प्रकृति अभी तक शांतिपूर्ण आंदोलन की बनी हुई है जो युवाओं की राजनीति करने वालों के लिए बड़ी उपलब्धि है । इस आंदोलन के असर से हमारी संसद भी प्रभावित हुई है और विपक्ष के प्रमुखदल अभी भी सी-सैट को हटाने की मांग पर अड़े हुए हैं। मोदी सरकार ने इस आंदोलन के प्रति जो रुख व्यक्त किया है वह अलोकतांत्रिक और युवाविरोधी है। हम यहां पर इस आंदोलन पर फेसबुक लिखी अपनी टिपप्णियां दे रहे हैं।

-1-

एप्टीट्यूट और कॉम्प्रिहेंशन परीक्षा का सी- सैट से भिन्न प्रारूप तलाश करने में मुश्किल कहाँ है ?

लोकतंत्र में यदि यूपीएससी की परीक्षा का पूरा ढाँचा ही नए सिरे से तैयार करना पड़े तो इसमें कौन सी परेशानी है? यूपीएससी को युवाओं के विरोध की मूल स्प्रिट को समझना चाहिए ।

-2-

क़ायदे से़ यूपीएससी को मोदी सरकार के द्वारा सी-सैट आंदोलन पर दिए गए वायदे को ठुकरा देना चाहिए । साथ ही पहल करके सी- सैट के नए विकल्प की तलाश के लिए कमेटी बनाकर युवाओं के द्वारा उठायी गयी आपत्तियों पर गंभीरता से विचार करके जल्द समाधान पेश करना चाहिए।

-3-

मोदी सरकार की तुग़लक़ी शैली का नमूना है यूपीएससी के विवाद पर लिया गया आज का फ़ैसला !

समस्या सी- सैट को हटाने की थी और सरकार ने अंग्रेज़ी के नम्बरों को हटा दिया ।

सी- सैट का विकल्प खोजा जाय और नए विकल्पों पर सोचने के लिए यूपीएससी से सरकार कहे। मोदी सरकार ने आज जो फ़ैसला लिया है वह ग़लत है । इस फ़ैसले को सरकार वापस ले।

-4-

यूपीएससी के काम में मोदी सरकार हस्तक्षेप करके गलत मिसाल कायम न करे ।

-5-

जेएनयू में परीक्षा देने वाले अधिकांश छात्र किस भाषा में परीक्षा देते हैं ? मेरे ज़माने ( १९७९-१९८७)में समाजविज्ञान से लेकर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, लाइफ़ साइंस से लेकर बायोटैक्नोलाॅजी में सभी छात्र अंग्रेज़ी माध्यम से परीक्षा देते थे , जबकि विदेशी छात्र एक फ़ीसद थे। यही हाल संभवत: अभी भी है ।

सवाल यह है भारतीय भाषाओं के प्रति युवाओं का भाषाप्रेम एमए या एमफिल करते समय कहाँ चला जाता है? वे मीडियम के रुप में अपनी भाषा के बारे में उस समय क्यों नहीं सोचते ? जो लोग भारतीय भाषाओं की हिमायत कर रहे हैं वे कभी भारतीय भाषाओं में उच्चशिक्षा में पठन- पाठन करने के लिए आंदोलन क्यों नहीं करते ?

सी-सैट का आंदोलन युवा प्रतिवाद का प्रतीक है।वे परिवर्तन चाहते हैं इसका भाषा के साथ कोई संबंध नहीं है । यह आंदोलन जायज़ है ,और युवाओं की राय का सरकार को सम्मान करते हुए सही समाधान खोजना चाहिए साथ ही युवाओं के साथ बर्बरता बंद होनी चाहिए ।

सी - सैट को हटाकर नई प्रणाली आ भी जाएगी तो उससे भारतीय भाषाओं का कोई उपकार यूपीएससी के ज़रिए संभव नहीं है ।

अब तक का अनुभव यही बताता है कि यूपीएससी के ज़रिए सरकारी पदों पर पहुँचने वाले लोग कभी भी भारतीय भाषाओं या हिन्दी के प्रति अनुरागी भाव से काम करते नहीं मिले, भारतीय भाषाओं के प्रति अधिकांश आईएएस-आईपीएस आदि का तदर्थ या कामचलाऊ संबंध रहा है । भारतीय भाषाओं को यह तबक़ा महज़ कम्युनिकेशन की भाषा के तौर पर इस्तेमाल करता रहा है ,यह उसकी पेशागत मजबूरी है ,इससे भारतीय भाषाएँ मज़बूत नहीं हुई हैं.यही काम हर अंग्रेज़ अफ़सर भी करता था ,वह जहाँ नौकरी करता था वहाँ की भाषा सीख लेते थे जिससे जनता से कम्युनिकेट कर सकें। यही बात हमें उनकी परंपरा में ले जा रही है ।

यूपीएससी तो सत्ता की सीढ़ी है और सत्ता में शामिल होकर सत्ता की भाषा को पालना पोसना ही काम होता है इससे भारतीय भाषाओं का कोई लेना- देना नहीं है। भारतीय भाषाएँ सत्ता की भाषा नहीं हैं ।
-6-

ग़ज़ब स्थिति है अब प्रतियोगिता (यूपीएससी) परीक्षा में भागलेने वाले तय करेंगे कि क्या पूछा जाय और किस तरह पूछा जाय और किसको चुना जाय ! दुनिया हंस रही है हमारे युवाओं के ऊपर ! इस तरह के सवाल कभी अमेरिका में दाख़िला का प्रयास करने वाले युवा या डाक्टरी ,आईआईटी या इंजीनियरिंग परीक्षा देने वाले युवा क्यों नहीं उठाते ? क्या भारतीय भाषाओं का हिसाब वहाँ ठीक है ?

-7-

पता चला है दिल्ली के मुखर्जी नगर को पुलिस छाबनी बना दिया है मोदी बाबू ने। मोदी बाबू युवाओं द्वारा जनधुलाई के लिए तैयार रहिए। दिल्ली में भाजपा साफ समझो।

-8-

सी- सैट हटाओ आंदोलनकारियों पर मोदी सरकार के निंदनीय पुलिसिया हमले जारी।

-9-

यूपीएससी के मौजूदा आंदोलन में एक तथ्य बार बार दोहराया गया कि हिन्दी में जो पेपर अनुवाद करके आया उसका अनुवाद बड़ा ख़राब था। हमारा कहना है कि यह अनुवाद तो किसी हिन्दी पढ़े-लिखे 'योग्य 'व्यक्ति ने ही किया होगा ? और इन सज्जन की नौकरी भी किसी हिन्दीवालों ने ही लगायी होगी !

इसका अर्थ यह भी है कि हम कितने ख़राब हिन्दी के छात्र तैयार कर रहे हैं और हमने अनुवाद का कितना घटिया सिस्टम विकसित किया है ।

मज़ेदार बात है कि हिन्दी के पठन पाठन की दुर्दशा पर कोई बात नहीं कर रहा। एक सवाल और भी है कि क्या हिन्दी को सभी क्षेत्रों में युवालोग समान रुप से समझते हैं ?





मंगलवार, 29 जुलाई 2014

बत्रापंडित के पोंगापंथ के ख़तरे


     ये जनाब मुकदमेबाज हैं। संघ की नई रणनीति के तहत ये शिक्षाजगत में संघ के मुखौटे हैं । अब तक का राजनीतिक अनुभव रहा है कि संघ पहले वैचारिक हमले करता है , फिर राजनीतिक हमले ,उसके बाद शारीरिक और अंत में क़ानूनी आतंकवाद का सहारा लेता है और फिर विजय दुंदुभि बजने लगती है !
     उदार  आधुनिक लोकतांत्रिक , वैज्ञानिक और संवैधानिक वैविध्यपूर्ण  विचारों और किताबों पर प्रतिबंध लगाना फंडामेंटलिज्म है । इस फंडामेंटलिज्म को हमेशा शिक्षा की रक्षा के नाम पर सक्रिय देखा गया है । 
   सवाल यह है कि बत्रापंडित जैसे पोंगापंथियों के मुखौटे की संघ को ज़रुरत क्यों पड़ी ? संघ  और उससे जुड़ा राजनीतिक दल इस काम को अपने नाम से सीधे क्यों नहीं करता ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि केन्द्र या राज्य में जहाँ पर बत्रापंडित को मौक़ा मिलता है वे शिक्षा पर ही मेहरबानी क्यों करते हैं ? 
        आधुनिककाल में  शिक्षा को राजनीति के बाद सबसे बड़ा विचारधारात्मक जंग का मैदान माना जाता है और यही वजह है कि संघ और उनके मुखौटे राजनीति और शिक्षा पर सबसे ज़्यादा हमले करते हैं। 
    संघ के बजरबट्टुओं की वैचारिक जंग का तीसरा बड़ा क्षेत्र है हमारा संविधान । वे आए दिन संविधान की मूल धारणाओं और भावनाओं की पिछड़े नज़रिए से आलोचनाएँ करते  हैं । 
   संविधान ,शिक्षा या राजनीति इसमें कोई चीज़ स्थायी नहीं है , इनमें निरंतर संशोधन, परिवर्द्धन और मूलगामी परिवर्तनों की ज़रुरत रहती है। इन क्षेत्रों में बदलाव यदि आगे की ओर ले जाने वाले हों तो समाज में अमनचैन स्थापित होता है लेकिन बदलाव अतीतोन्मुखी हों तो समाज , राजनीति, शिक्षा, न्यायपालिका ,  संस्कृति आदि के क्षेत्र में नए क़िस्म का रुढिवाद और फंडामेंटलिज्म पैदा होने की संभावनाएँ होती हैं। 
    संयोग की बात है कि बत्रापंडित जो सुझाव दे रहे हैं उनमें अतीतोन्मुखी जीवनशैली पर ज़ोर है। अतीतोन्मुखी जीवनशैली मूलत: भारतीय परंपरा का निषेध है और उदार सामाजिक संरचनाओं के निर्माण में बाधक है । 
    बत्रापंडित अपने को किताबों के 'सामाजिक संपादक 'के पद पर नियुक्त कर चुके हैं। ये साहब नहीं जानते कि भारतीय परंपरा में किताबों के 'सामाजिक संपादक 'की कभी किसी हिन्दू या ग़ैर हिन्दू उदार या अनुदार विचारक, दार्शनिक, संत, कवि आदि ने वकालत नहीं की । 
   भारतीय समाज को कभी ' किताबों के सामाजिक संपादक ( सोशल आॅडिटर) ' की ज़रुरत नहीं पड़ी । भारतीय परंपरा में दर्शन से लेकर जीवनशैली तक, धर्म से लेकर शिक्षा तक किताबों की दुनिया प्राचीनकाल , मध्यकाल और आधुनिककाल तक वैविध्यपूर्ण और सहिष्णु रही है ।
   ब्रिटिश शासनकाल में पहली बार किताबें ज़ब्त हुईं.विचारों पर क़ानूनी पाबंदियाँ लगायी गयीं । ब्रिटिशशासन से हमें विचारों पर पाबंदी की क़ानूनी हिदायतें देखने को मिलती हैं । 
      बत्रापंडित की अवैज्ञानिक और काल्पनिक धारणाओं के आधार पर हमने देश की एकता और अखंडता का निर्माण नहीं किया है । हमारे देश में संविधान निर्माण की प्रक्रिया से लेकर आज तक ठोस वैज्ञानिक और उदार विचारों के आधार पर विविधता को हर क्षेत्र में स्वीकृति दी गयी और विविधता को जीवनशैली, शिक्षा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, राजनीति आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानकर क़ानूनी व्यवस्थाओं और वैध संरचनाओं का निर्माण किया गया। 
   मसलन हमारे संविधान के तहत आप पोंगापंथ का प्रचार कर सकते हैं ,लेकिन कोई वैज्ञानिक नज़रिए से प्रचार करना चाहे तो उसे भी हमारा संविधान और क़ानून मान्यता देता है । 
   आप जादू - टोने के पक्ष में किताबें लिख सकते हैं और वैज्ञानिकचेतना पर भी किताबें लिख सकते हैं । लेकिन बत्रापंडित का सारा ज़ोर इस वैविध्य को नष्ट करने पर है वे वाद -विवाद में विश्वास नहीं करते ,वे जबरिया मनवाने में विश्वास करते हैं  और इसके लिए सभी गैर-ज्ञानपरक हथकंडे अपनाते हैं । 
    वे दिल जीतने में विश्वास नहीं करते वे दिल को क़ैद करने में विश्वास करते हैं । ' सामाजिक संपादक' के नाम पर उनके निशाने पर विज्ञानसम्मत शिक्षा है। वे कभी सामाजिक रुढियों , अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों ,भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-पिशाचिनी आदि के ख़िलाफ़ मुहिम नहीं चलाते ।
    वे कभी उपभोक्तावाद, सभी रंगत के कठमुल्लापन, जातिप्रथा , दहेजप्रथा आदि के ख़िलाफ़ बिगुल नहीं बजाते । 
    बत्रापंडित ने ' स्वच्छंदता' के ख़िलाफ़ मुहिम के नाम पर अतीतोन्मुखी जीवनशैली और मूल्यों की हिमायत को प्रमुखता से पेश किया है यह असल में अतीतोन्मुखी फ़ंडामेंटलिस्ट स्वच्छंदता है जिसका भारत की विविधता और संविधान की मूल मान्यताओं से बैर है । वे इसके जरिए ' सांस्कृतिक आतंक' पैदा करना चाहते हैं । 
      बत्रापंडित एक गैर पेशेवर संघी कार्यकर्ता है ,जिसके जरिए संघ अपना सांस्कृतिक काम करता रहा है । यह व्यक्ति अपने गैर- पेशेवर कामों मेंकानून के चोर दरवाज़ों का बड़े ही कौशल के साथ इस्तेमाल करता रहा है । स्थिति यह हैकि वह सीधे मंत्री से लेकर प्रकाशक तक सीधे आदेश की भाषा में बोलता है । 
   बत्रापंडित की मान्यता है ' मेरी मानो वरना मुकदमे झेलो' , यह रणनीति किसी भी प्रकाशक को ठंडा करने के लिए काफ़ी है, क्योंकि कोई भी प्रकाशक मुकदमेबाजी से डरता है । इस रणनीति का बत्रापंडित को लाभ भी मिला है और कई प्रकाशक उनके दबाव में आ गए हैं , संघ नियंत्रित सरकारें उनकी किताबें ख़रीद रही हैं और अब ये जनाब राष्ट्रीय स्तर पर बड़े सांस्कृतिक संकट को पैदा करने की मुहिम में लग गए हैं  ।
  हमारी अपील है कि बत्रापंडित के पोंगापंथ के सामने केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री समर्पण न करें । यदि वे उनके दबाव में आती हैं तो इससे संविधान की मूल भावनाओं और अकादमिक स्वायत्तता का हनन होगा । 
     
       
  

सोमवार, 28 जुलाई 2014

मोदी बाबू के कमाल के ६० दिन-



एक तरफ़ हाफ़िज़ सईद से अपने दूत के ज़रिए गप्पें ! दूसरी ओर सईदभक्त आतंकियों की घुसपैठ और सीमा पर निरंतर गोलीबारी!
एक तरफ़ संसद में सर्वधर्म सद्भाव की नक़ली अपील ! दूसरी ओर मुरादाबाद में नए क़िस्म के मुज़फ़्फ़रनगर मार्का 'सद्भाव'की अथक कोशिश ! अहर्निश संविधान की मूलभावनाओं भाजपा और सहयोगी दलों के घटिया वैचारिक हमले !
एक तरफ़ देश को स्वच्छ प्रशासन का गुजरात के नाम पर भरोसा !दूसरी ओर गुजरात में नौ हज़ार करोड़ रुपयों के खर्चे का हिसाब किताब न देना !
सीएजी के अनुसार रिलायंस-अदानी आदि को सारे क़ानून तोड़कर लूट में हज़ारों करोड़ रुपयों की मदद करना ! 

एक तरफ़ संविधान के अनुसार काम करने का वायदा दूसरी ओर संवैधानिक नियमों और क़ायदों का सरेआम उल्लंघन !
एक तरफ़ देशभक्ति का नक़ली नाटक दूसरी ओर विगत ६० दिनों में पाक फ़ायरिंग में मारे गए शहीदों के घर मोदी बाबू का न जाना !
एक तरफ़ चुनाव के समय सोनिया- राहुल - वाड्रा के ख़िलाफ़ नक़ली मंचीय नाटक और इधर साठ दिनों में इनके 'अवैध 'धंधों पर हमले न करना ! 
महँगाई का बढ़ना , ख़ासकर टमाटर का १००रुपये के पार पहुँच जाना आदि बातें हैं जो मोदी को सबसे निकम्मा और ग़ैर-भरोसेमंद पीएम बना रही हैं।

दिल्ली में नार्थ -ईस्ट के लोगों पर हमलों में इज़ाफ़ा और बलात्कारों का न रुकना बताता है कि लोकतंत्र में प्रचार के नाम पर टीवी और मीडिया उन्माद के ज़रिए जनता से ठगई की गयीहै।

ब्रिक्स में मोदीजी और भोंपू नेटवर्क



नरेन्द्र मोदी का पीएम के नाते ब्रिक्स सम्मेलन पहला बड़ा कूटनीतिक सम्मेलन था । इस सम्मेलन में क्या हुआ ? भारत ने क्या खोया और क्या पाया यह बात भारत का मीडिया कम से कम जानता है । 
 मोदीजी ने अपनी ख़ामियों को छिपाने की रणनीति के तहत मीडिया के समूचे तामझाम को अपनी यात्रा से बेददखल कर दिया।
    'नियंत्रित ख़बरें और सीमित कवरेज 'की रणनीति के तहत स्थानीय स्तर पर भक्तटीवी चैनलों का भोंपू की तरह इस्तेमाल किया। यह एक तरह से भोंपू टीवी कवरेज यानी अधिनायकवादी कम्युनिकेशन माॅडल की वापसी है। दुर्भाग्यजनक है कि भारत में व्यापक मीडिया नेटवर्क के रहते हुए मोदी ने भोंपूनेटवर्क का ब्रिक्स कवरेज के लिए इस्तेमाल किया। 
       ब्रिक्स भोंपू टीवीकवरेज की ख़ूबी थी कि पीएम कम और भोंपू ज़्यादा बोल रहे थे। पहलीबार ऐसा हुआ कि जो मीडिया साथ में गया था उससे भी सम्मेलन और सामयिक विश्व घटनाक्रम पर मोदीजी ने  प्रेस काॅफ्रेंस करके अपने ज्ञान -विवेक और विश्व राजनीतिक नज़रिए का परिचय नहीं दिया। यहाँ तक कि सम्मेलन में भी मोदीजी ने सरलीकृत रुप में गोल गोल बातें कीं। 
    ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी अपने विदेशनीति विज़न को सामने नहीं रख पाए और यह बताने में असमर्थ रहे कि इनदिनों राजनीतिक तौर पर सबसे बड़ी चुनौती क्या है ? कम से कम इस मामले में मनमोहन सिंह का रिकाॅर्ड बेहतर रहा है उनके भाषण हमेशा नई रणनीतियों के परिप्रेक्ष्य से भरे रहते थे। उनके बोलने का गंभीर असर होता था और नई समस्याओं को हल करने में उनके नज़रिए से विश्व के नेताओं को मदद मिलती थी , लेकिन मोदीजी ने इस पक्ष का अभी विकास नहीं किया है।
   मोदीजी भारत की सक्रिय नीति निर्माता की भूमिका को महज़ हिन्दीवक़्ता की भूमिका तक सीमित करके देख रहे है। 
  मोदी सरकार समझना होगा कि  भारत को विश्व राजनीतिक मंचों पर महज़ हिन्दीवक्ता के रुप में नहीं सक्रिय नीति निर्माता के रुप में भूमिका निभानी है । 
    मोदीजी और उनके मंत्रीमंडल के सहयोगियों को विदेशनीति से लेकर अन्य नीतियों के संदर्भ में विश्वमंचों पर हिन्दीवक्ता के दायरे के बाहर निकलकर सोचना होगा। भाषाप्रेम और सरलीकृत भाषणों से आगे निकलकर नीतिगत तौर पर पहल करनी होगी।  विश्व की जटिलताओं को समझना होगा और उनमें हस्तक्षेप करना होगा। ब्रिक्स में वे मौक़ा चूक गए।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

मोदी और वर्चुअल मुखौटालीला -किश्त १ -




नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री मीडिया लहर ने बनाया अब यही मीडिया लहर मुश्किलें खड़ी कर रही है । मोदी संभवत: पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका मीडिया ने सबसे जल्दी अलोकप्रियता का भाष्य लिखना आरंभ कर दिया है।
   मोदी को मीडिया ने मुखौटों के माध्यमों से आम लोगों के बीच में जनप्रियता दिलाई इसलिए मोदी का मीडिया विवेचन कभी मुखौटों को हटाकर नहीं किया जा सकता। मोदी ने अपनी ऐसी इमेज बनाकर पेश की थी कि वह हर उस व्यक्ति में है जो उसका प्रचारक है इस तरह मोदी ने अपने नायक का निर्माण किया था। सभी निजी व्यक्तियों की इमेज और निजता को अपहृत करके मोदी 'महान' की इमेज को मीडिया ने तैयार किया था । निश्चित रुप से यह बेहद खर्चीला ,सर्जनात्मक और कलात्मक काम था ।फलत: मोदी व्यक्ति नहीं मुखौटों का संगम है। 
        मोदी को देखने का हम नज़रिया बदलें मोदी पहले भी बहुत गरजते थे ,अब भी गरज रहे हैं , पहले भी वे मुखौटों के ज़रिए गरज रहे थे ,अब भी मुखौटों के ज़रिए गरज रहे हैं ,मोदी को निजी तौर पर प्रधानमंत्री के रुप में देखना ,अंश को देखना  है, मोदी समग्रता में सिर्फ़ मुखौटों में मिलेगा,निचले स्तर पर सभी संघी सदस्यों और हमदर्दों में मिलेगा।  मोदी का मुखौटों के बिना अर्थ न पहले समझ सकते थे और न उनके पीएम बनने के बाद ही समझ सकते हैं। मोदी यदि संघ के साधारण सदस्य की मेहनत के फल के मालिक हैं तो वही मोदी निचले स्तर साधारण संघी सदस्य की दबंगई के पाप के भी मालिक हैं यह नहीं होसकता कि नेता को कार्यकर्ता के अच्छे काम फलें और बुरे असर ही न करें । 
      वर्चुअल इमेजों ने मोदी की रचना जिस रसायन से की है उस रसायन में ही उसका विलोम भी अंतर्निहित है। संयोग की बात है कि वर्चुअल इमेज में विलोम भी उसी मार्ग से बनता है उन्हीं लोगों से बनता है जो इमेज के सर्जक हैं । 
     मोदी की वर्चुअल इमेजरी के बनते विलोम को पूर्णता प्राप्त करने में कितना वक़्त लगेगा यह तय करना मुश्किल है लेकिन यह तय है कि मोदी इमेज विध्वंस की वर्चुअल प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है । न्यायपालिका के शिखर से इमेज भंजन का सूत्रपात हुआ है। सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश की नियुक्ति पर सरकार ने जिस तरह हस्तक्षेप किया उसने  मोदी की इमेज पर कलंक का अमिट दाग छोड़ दिया है। 
          वर्चुअल विचारधारा हमेशा व्यक्ति को छोड़ देती है इमेज को पकड़ लेती है और इमेज के ज़र्रे ज़र्रे पर हमले करती है।  वर्चुअल इमेज में व्यक्ति गौण होता है और उसकी इमेज मूल्यवान होती है और उसके रेशे- रेशे को तोड़ना पेचीदा काम है अत : यह काम भी मीडिया उतनी ही बेरहमी से करता है जितनी एकाग्रता से वह इमेज बनाता है। रीगन से बुश तक की इमेज के विध्वंस को देखें तो यह चीज़ सहज ही समझ में आ सकती है। 
   इमेज का क्षय वस्तुत: उस आभामंडल को नष्ट करता है जो आभामंडल वर्चुअल ने निर्मित किया है । इससे व्यक्ति की सक्रियता बढ़ती है और इमेज की घटती है। 
   मनमोहन इमेज के साथ यही हुआ लेकिन बेहद धीमी गति से। क्योंकि मनमोहन सिंह की वर्चुअल इमेज अदृश्य रंगों से बनायी गयी थी फलत: उस इमेज को नष्ट करने में ज़्यादा समय लगा । 
   इसके विपरीत मोदी की इमेज मुखौटों और हाइस्पीड मीडिया के जरिए बनी है अत:इमेज विखंडन भी हाइस्पीड और मुखौटों के ज़रिए होगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें  इनदिनों मीडिया में मुखौटालीला चल रही है। मोदी के मुखौटों की वर्चुअल धुलाई हो रही है ।
      


 

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

कोलकाता में गाली,हिंसा और बम


     कल मैं बंगला टीवी चैनल पर टीएमसी सांसद और अभिनेता तापस पाल को हिंसक भाषा में भाषण देते हुए देख रहा था तो मन में सोच रहा था कि बंगाली जाति के कितने बुरे दिन आ गए हैं कि उनके आइकॉन आम जनता में  हिंसक भाषा में बोल रहे हैं और दर्शक तालियां बजा रहे हैं।
     बंगाली जाति मधुरभाषी,सांस्कृतिकतौर पर सभ्यजाति है। इसमें हिंसकभाषा कहां से आई ? बंगाली जाति के नेता भारत में सभ्यता और राजनीति के सिरमौर रहे हैं और देश उनको बड़े ही सम्मान की नजर से देखता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
   सांसद तापस पाल की भाषा इतनी खराब और दबंगई से भरी थी कि ममता सरकार में शिक्षामंत्री पार्थ चटर्जी तक ने इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति प्रकट की। नेता हो या नागरिक , गाली और हिंसा की भाषा में बोलना तो अपराध है, असभ्यकर्म है।
      प.बंगाल में गाली,हिंसा और बम की राजनीति में गहरा संबंध है ।  हिंसा हमेशा गाली की भाषा के दरवाजे से ही दाखिल होती है। राजनीति में गाली की भाषा कब आती है और कब वह हिंसा में तब्दील हो जाती है इसका ठीक से अध्ययन तो हमारे समाज में नहीं हुआ लेकिन यह सच है कि गाली और हिंसा जुड़वां बहनें हैं। ये दोनों बहनें तब जन्म लेती हैं जब समाज में कर्मसंस्कृति का क्षय होता है।परजीवी और पराजित मनोदशा में गाली और हिंसा जन्म लेती है।
     पश्चिम बंगाल में जिसे नक्सलबाडी आंदोलन कहते हैं वह इस राज्य के सांस्कृतिक-राजनीतिक पतन का प्रस्थान बिंदु है। पश्चिम बंगाल में हिंसाचार का श्रीगणेश यहीं से होता है। धमकी,गाली,बम,क्रांति की गजब खिचडी इस बीच पकी है। इसमें बौद्धिकों ने सुविधानुसार क्रांति और वाम राजनीति को पॉजिटिव तत्व के रुप में छांट लिया लेकिन अन्य चीजों को छोड़ दिया।
     क्रांति या वामराजनीति में गाली,घृणा (पूंजीपति और सामंती तत्त्वों के प्रति घृणा) को इस हद तक विकसित किया गया कि उसने सामाजिक-राजनीतिक संतुलन में बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर दिया। हमारे अनेक वामपंथी मित्र यह पढ़कर नाराज भी हो सकते हैं लेकिन सच तो यही है कि लोकतंत्र में घृणा का कोई स्थान नहीं है। आप अपने वर्गशत्रु से भी नफरत नहीं कर सकते। लोकतंत्र में सबके लिए स्थान है।अमीर के लिए भी और गरीब के लिए भी। पूंजीपति और बड़े जमींदारों के खिलाफ घृणा का सिलसिला अंततःगाली के मार्ग से गुजरते हुए हिंसा और बम के मार्ग तक गया। इसके कारण पहले निजी हिंसा को वैध बनाया गया,बाद राजनीतिक हिंसा भी वैध हो गयी,फिर पुलिस हिंसा भी वैध मान ली गयी।
    हमलोग अपनी सुविधा से हिंसा में अंतर करने लगे, तेरी हिंसा और मेरी हिंसा में पाप-पुण्य खोजने लगे। अपने दल की हिंसा को हिंसा न मानकर आत्मरक्षा में उठाया कदम मानने लगे।
    जबकि हिंसा तो हिंसा है और वह लोकतंत्र का विलोम है। इसी तरह घृणा तो घृणा है वह सभ्यता और लोकतंत्र का विलोम है। वर्गीय घृणा पैदा करके वोट जुटाए जा सकते हैं, सीटें जीती जा सकती हैं। सत्ता पा सकते हो लेकिन सभ्यता के क्षय को नहीं रोक सकते।
   वाममोर्चा निरंतर अपार बहुमत हासिल करके भी हिंसा को नहीं रोक पाया। इसका प्रधान कारण वही है जिसका मैंने जिक्र किया है। लोकतंत्र में हिंसा,गाली और घृणा की कोई जगह नहीं है। यदि लोकतंत्र के सारथी  हिंसा,गाली और घृणा के रथ पर सवार होकर आएंगे तो लोकतंत्र में सभ्यता के क्षय और हिंसा के विस्तार को रोक नहीं सकते। पश्चिम बंगाल में वस्तुतः यही हुआ है।
    हिंसा को हर दल ने वैध बनाया,हिंसा की मदद ली और राजनीतिक वैभव का विस्तार किया। यह विलक्षण संयोग है कि नक्सली हिंसा के दमन के नाम पर कांग्रेस ने कुछ साल शासन किया लेकिन हिंसा का कांग्रेस को जो चस्का लगा वह उसे आपातकाल तक ले गया और कांग्रेस में धीरे धीरे अपराधीकरण एक स्वाभाविक फिनोमिना बन गया।
    नक्सलबाड़ी आंदोलन के पहले कांग्रेस के शासकों को हिंसा की राजनीति करते नहीं देखा गया। तेलंगाना आंदोलन अपवाद है। यह भी कह सकते हैं राजनीतिक हिंसाचार की जो परंपरा कांग्रेस ने तेलंगाना आंदोलन (1946-48) ने डाली, वह नक्सलबाडी आंदोलन के दौर में तरुणाई में पहुँची और आपातकाल में पूर्ण यौवन को प्राप्त हुई। इस समूची प्रक्रिया में पश्चिम बंगाल के भद्रसमाज में हिंसा और असभ्यता की दीमक प्रवेश कर गयी और आज उससे पूरा राज्य प्रभावित है।
    दुखद बात यह है कि वामदलों ने सभ्यता के क्षय की प्रक्रियाओं की हमेशा अनदेखी की। हिंसा को हिंसा से खत्म करने की रणनीति अपनायी, गाली का जबाव गाली से देने की पद्धति इजाद की,जो साथ नहीं वह वर्गशत्रु। जो साथ छोड़ गया वह वर्गशत्रु। इस रणनीति के परिणाम सामने हैं। इसका सबसे बड़ा परिणाम है सामाजिक अलगाव।  
  वामराजनीति के विकास के दौर में हिंसा कम नहीं हुई बल्कि बढी । बंगाली समाज और ज्यादा असभ्य बना।  वाम,नक्सल,कांग्रेस, टीएमसी आदि सब भूल गए हैं कि कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती। कीचड़ को साफ करने के लिए साफ-स्वच्छ जल चाहिए। हिंसा से हिंसा खत्म नहीं होती, गाली से सभ्यता विकसित नहीं होती। हिंसा को शांति से खत्म किया जा सकता है। गाली को गाली से खत्म नहीं कर सकते,बल्कि सभ्य आचरण से खत्म किया जा सकता है।
  लोकतंत्र में सभ्यता के विकास के लिए लोकतांत्रिक सभ्य पैमानों को अपनाने की जरुरत है। गाली ,हिंसा और बम तो वर्चस्व और हताशा के पैमाने हैं। ये पैमाने लोकतंत्र में अपनाए जाएंगे तो असभ्यता का विकास होगा,समाज और भी जंगलीपन की ओर भागेगा। हम तय करें कि लोकतंत्र में कैसे जीना चाहते हैं ? सभ्यता के पैमानों के आधार जीना चाहते हैं या असभ्यता के पैमानों के आधार पर जीना चाहते हैं?        


सोमवार, 30 जून 2014

कोलकाता की बंद गलियां और वोट का खेल

       

मुझे याद आ रहा है टॉलीगंज का वह चुनाव जब मैं आशीष दा के लिए चुनाव प्रचार के लिए नुक्कड़ सभाएं कर रहा था। रोज शाम होते ही इस विधानसभा क्षेत्र में नुक्कड़ सभाएं करने निकल पड़ता था। सभाओं को कहां करना है इसका पूरा कार्यक्रम माकपा के राज्य ऑफिस से तैयार होकर मिलता था और पार्टी की स्थानीय शाखाओं को पता रहता था। उस चुनाव से कुछ समय पूर्व तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ था। आशीष दा के खिलाफ टीएमसी का राज्य अध्यक्ष चुनाव लड़ रहा था। आशीष दा माकपा के श्रेष्ठतम शिक्षकनेता थे, कलकत्ता वि वि में कॉमर्स विभाग में प्रोफेसर थे,वे हमारी पार्टी ब्रांच के सचिव भी थे। इसलिए उनके लिए ज्यादा काम करने पर जोर था। खैर, एक वाकया बेहद पीड़ादायक घटा।

एकदिन मैं टालीगंज इलाके में एक गली में चुनाव सभा के लिए गया। मेरे साथ एक लोकल कॉमरेड था और रिक्शे पर लाउडस्पीकर कसा हुआ था। स्थानीय कॉमरेड मुझे घुमाते हुए एक बंद गली में ले गया और एक ऐसी जगह खड़ा कर दिया जहां गली बंद हो जाती थी, मैंने कहा यहां तो कोई नहीं है और गली बंद है, कोई सुननेवाला नहीं है, वह बोला यहीं मीटिंग करनी है, शाम के सात-साढ़े सात बजे होंगे। मैंने उस कॉमरेड को काफी समझाने की कोशिश की कि यहां कोई सुनने वाला नहीं है ,तुम क्यों बोलने के लिए जोर डाल रहे हो, वह बोला आप भाषण दीजिए लोग घरों में बैठे हुए सुनेंगे। लाउडस्पीकर की आवाज दूर दूर तक जाएगी। मैंने बंद गली में बिना श्रोताओं के अपना भाषण दिया,वहां उस कॉमरेड और रिक्शाचालक के अलावा और कोई नहीं था।

मैं भाषण देकर स्थानीय पार्टी ऑफिस चला आया ,वहां पर बैठे लोकल सचिव से मेरे साथ गए कॉमरेड ने कहा कि मीटिंग बहुत अच्छी हो गयी है,और इन्होंने बढ़िया भाषण दिया। मैंने कहा कि वहां तो कोई सुनने वाला नहीं था, घर अंदर से बंद थे, जो लोग आ रहे थे वे रुक नहीं रहे थे,सीधे घरों में जा रहे थे और दरवाजे बंद कर ले रहे थे,यह मीटिंग नहीं है,बल्कि बकबास है, लोकल सचिव ने कहा आप नहीं जानते इस इलाके में ऐसे ही मीटिंग होती है मैंने पूछा क्यों तो बोला यह वेश्याओं की गली है यहां सब पेशेवर वेश्याएं रहती हैं और धंधा करती हैं। जो लोग आ जा रहे थे वे उनके ग्राहक थे। मैंने कहा आपलोग इसे रोकते क्यों नहीं ? इस पर वह ऊटपटांग तर्क देने लगा,मैं उससे सहमत नहीं हो पाया, अंत में मैंने राज्य पार्टी ऑफिस आकर का. अनिल विश्वास को सारा किस्सा बताया कि मुझे इस तरह के इलाकों में न भेजें, वे बोले क्या करें पार्टी को उन लोगों में वोट के लिए जाना होता है। मैंने कहा मैं ऐसे इलाकों में नहीं जा पाऊँगा।इस पर बोले लोकतंत्र में सबसे वोट चाहिए। हम वेश्यावृत्ति रोक नहीं सकते। लेकिन वोट तो मांग सकते हैं।