शनिवार, 31 अगस्त 2013

भाषाओं के अंत का आख्यान

भारत के नीति निर्धारकों ने राष्ट्र-राज्य की धारणा के तहत जातीयभाषा पर जोर देकर लोकल भाषाओं के साथ असमान व्यवहार को बढावा दिया और उसके भयावह परिणाम सामने आ रहे हैं। विगत 50 सालों में भारत में 250 भाषाएं गायब हो गयी हैं। इन दिनों प.बंगाल में 10भाषाएं अंत के करीब हैं।
सन् 1961 की जनगणना में 1,652भाषाएं दर्ज हैं लेकिन1971 की जनगणना में मात्र 108भाषाएं हैं। भाषाओं की संख्या में इतनी बड़ी कमी का कारण है जनगणना के नियमों में बदलाव। सरकार ने भाषाओं की सूची में उन्हीं भाषाओं को शामिल किया जिनके बोलने वालों की संख्या 10हजार से ज्यादा थी। आज हम नहीं जानते कि 10हजार से कम लोगों में बोली जाने वाली भाषा की क्या अवस्था है। कायदे से यह बंदिश हटा देनी चाहिए। हमें भाषा और बोलियों का विस्तृत हिसाब रखना चाहिए। भारत में 780भाषाएं 66किस्म की स्क्रिप्ट में लिखी जाती हैं। सारे देश में भारत की सभी भाषाओं के पठन-पाठन की व्यवस्था के लिए व्यापक कदम उठाने की जरूरत है।

मनमोहन नीतियों का उल्टा खेल

भारत की अर्थव्यवस्था में अनेक समस्याएं हैं, विश्वमंदी का असर है, औद्योगिक उत्पादन कम हुआ है, भ्रष्टाचार चरम पर है,रूपया लुढ़क रहा है।बेकारी और मंहगाई है, इसके बाबजूद हालात बहुत खराब नहीं हैं। बैंकों में पर्याप्त पैसा है। सरकारी कर्मचारियों को नियमित पगार मिल रही है। संकट के बाबजूद साढ़े चार फीसदी विकास दर बनी हुई है। निवेश का माहौल भी है। कोई बैंक दिवालिया नहीं हुई है। 
जीवन की गति और विकास की गति में द्वंद्व और तनाव है लेकिन विकास धीमी गति से जारी है। इस स्थिति का श्रेय नेहरूयुगीन नीतियों के द्वारा निर्मित ठोस आर्थिक आधार को जाता है। मनमोहन सिंह के अनेक प्रयासों के बाबजूद बैंकिंग प्रणाली से लेकर अन्य क्षेत्रों में नियमों की विदाई नहीं की गयी और इसमें मजदूरों-किसानों के संगठनों खासकर वामदलों और कांग्रेस के अंदर सक्रिय नेहरूपंथियों की भी भूमिका रही है।
नव्य उदारवादियों की मांग थी कि अर्थव्यवस्था की सारी खिड़कियां खोल दो।यह मांग वामदलों ने कभी नहीं मानी और कहा था सारी खिड़कियां मत खोलो वरना ग्लोबल हवा में वह जाओगे वैसे भी जितनी खिड़कियां खोल रहे हो उससे भी प्रदूषित हवा ही आएगी और अब यह धारणा सही साबित हुई है।
कल मनमोहन सिंह संसद में मैन्यूफैक्चरिंग पर जोर दे रहे थे, ये ही साहब विगत बीस सालों से सेवाक्षेत्र पर जोर दे रहे थे। कल मनमोहन सिंह सादगी और कम खर्चे की बात कर रहे थे बीस सालों से खूब खर्च करो,बचत कम और खर्चे ज्यादा करो ,का नीतियों के तहत सुझाव दे रहे थे।
उपभोक्तावाद को बेलगाम हवा देने में मनमोहन सिंह की अक्षम्य भूमिका रही है। उनकी नीतियों ने सादगी को समाज में घृणा की चीज बना दिया है। अमीरी और शानोशौकत को आदर्श जीवन शैली बना दिया है। इसका ही दुष्परिणाम है कि आज मनमोहन सिंह कह रहे हैं सोना मत खरीदो। कांग्रेस को मनमोहन सिंह की नीतियों का उपभोक्तावादी और उपभोगवादी पैराडाइम बदलने के प्रयास करने चाहिए। मनमोहन सिंह और आनंद शर्मा ने विपक्ष और न्यायालयों को विकास का शत्रु या बाधक कहा है। असल में अवरूद्ध विकास तो मनमोहन सिंह की नीतियों में ही है। इनलोगों ने उत्पादक शक्तियों और बुनियादी उद्योगों के निर्माण पर कम जोर दिया और सेवाक्षेत्र पर ज्यादा जोर दिया। असंतुलित परिणाम सामने हैं। मनमोहन सिंह से पूछा जाए कि उनके विगत 9साल के शासन में केन्द्र सरकार ने कितने बड़े बुनियादी क्षेत्र में उद्योग स्थापित किए और जिन कारपोरेट घरानों के वे छूट और सहायता देते रहे हैं उनके द्वारा कितने बड़े उद्योग स्थापित किए गए ? मनमोहन सिंह से सवाल है कि उन्होंने क्या भिलाई जैसा कोई कारखाना स्थापित किया ? क्या दूरसंचार जैसा महान नेटवर्क स्थापित किया ? जी नहीं उल्टे दूरसंचार को निजीक्षेत्र को सौंप दिया ,मनमोहन सरकार को संचित पूंजी को खाने वाली सरकार कहा जा सकता है।

शनिवार, 20 जुलाई 2013

नरेन्द्र मोदी के चुनावी विभ्रम


भाजपा और नरेन्द्र मोदी का आनेवाले चुनाव में संभावित वैचारिक नारा "ताकतवर-भारत" का होगा। मोदी के प्रचार अभियान के प्रधान मुद्दे होंगे पड़ोसियों से दबकर मत रहो ।उनसे अकड़ से पेश आओ। अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों का समानता के नाम पर दबाब बनाए रखो। उन्हें मैनस्ट्रीम से बाहर रखो।
मोदी और भाजपानेताओं के भाषणों का मूल मुद्दा मनमोहन सरकार की करप्टशासन प्रणाली और अनेकों घोटाला गाथाएं रहेंगी।
मोदी के प्रचार का लक्ष्य है धर्मनिरपेक्ष सामाजिक बहुलतावाद को "भारत पहले "पदबंध के जरिए बहस से गायब करो। युवाओं की बात करने के बहाने,मध्यवर्गीय युवाओं को अपील करो। खेतीहरयुवाओं-अल्पसंख्यकयुवाओं पर ध्यान न दो। मजदूरों-किसानों के मूल सवालों से आम चुनाव में जनता का ध्यान हटाओ। नव्य-उदार नीतियों के जनविरोधी चरित्र पर से ध्यान हटाने के लिए "आदर्श गुजरात विकास " पर जोर दो। गुजरात विकास के कारपोरेट चरित्र का महिमामंडन करो और देश को उसका अनुगमन करने का संदेश दो।
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नरेन्द्र मोदी जिस संघ परिवार से आते हैं उसकी खूबी है कि गुरू गोलवल्कर जो लिख गए हैं उन विचारों में अब तक कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है। मोदी गुरूजी के कथनों से ही प्रेरित होकर अपना रेहटोरिक सुनाते रहते हैं ।
मोदी से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या वे संघ की विचारधारा या गोलवल्कर के विचारों को भाजपा के राजनीतिक घोषणापत्र का हिस्सा बनाकर गुजरात सरकार या भावी केन्द्र सरकार में लागू कर सकते हैं ?
मोदी या संघीनेताओं के चरित्र का यह दुरंगापन है कि वे भाषण देते हैं संघ के विचारों के अनुकूल ,और सरकार में आचरण करते हैं एकदम भिन्न।

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नरेन्द्र मोदी जबाब दें- 1-

नरेन्द्र मोदी और उनकी मीडियाटीम से सवाल किया जाना चाहिए कि मोदी का गुरू गोलवल्कर के मुसलमान और ईसाइयों से संबंधित विचारों से सहमति है क्या ? नीचे गोलवल्कर का उद्धरण दे रहे हैं ,नरेन्द्र मोदी क्या इससे सहमत हैं ?

"The non-Hindu people of Hindustan must either adopt Hindu culture and languages, must learn and respect and hold in reverence the Hindu religion, must entertain no idea but of those of glorification of the Hindu race and culture... in a word they must cease to be foreigners; Or may stay in the country, wholly subordinated to the Hindu nation, claiming nothing, deserving no privileges, far less any preferential treatment— not even citizens' rights"

— M. S. Golwalkar

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नरेन्द्र मोदी जबाव दें- 2-

मोदी का बड़ा जोर है कि इनको एसआईटी ने निर्दोष माना है,जबकि किसी अदालत ने उनको निर्दोष नहीं माना है। सवाल यह है कि जमशेदपुर दंगों में संघ की भूमिका के लिए मोदी क्या संघ की निंदा करेंगे ?

"After giving careful and serious consideration to all the materials that are on record,the Commission is of the view that the RSS with its extensive organisation in jamshedpur and which had close links with the Bharatiya Janata Party and the Bharatiya Mazdoor Sangh had a positive hand in creating a climate which was most propitious for the outbreak of communal disturbances. In the first instance, the speech of Shri Deoras (delivered just five days before the Ram Navami festival) tended to encourage the Hindu extremists to be unyielding in their demands regarding Road No. 14. Secondly, his speech amounted to communal propaganda. Thirdly, the shakhas and the camps that were held during the divisional conference presented a militant atmosphere to the Hindu public. In the circumstances, the commission cannot but hold the RSS responsible for creating a climate for the disturbances that took place on the 11th of April, 1979"

— Jitendra Narayan in a report on Jamshedpur riots of 1979
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मोदी से सवाल है कि वे हिटलर के बारे में क्या सोचते हैं , वे क्या गुरू गोलवल्कर के विचारों से सहमत हैं। मोदी जानते हैं कि भारत में हिटलर को घृणा की नजर से देखा जाता है। भारत हिन्दूराष्ट्र नहीं है। दूसरी बात यह कि नस्लवादी मानसिकता पर गर्व नहीं किया जा सकता।नस्लवाद आधुनिकयुग का धीमाजहर है,वैसे ही हिन्दुत्व भी धीमाजहर है। गुरू गोलवल्कर का मानना था-
"To keep up the purity of the Race and its culture, Germany shocked the world by her purging the country of the semitic Races — the Jews. Race pride at its highest has been manifested here. Germany has also shown how well nigh impossible it is for Races and cultures, having differences going to the root, to be assimilated into one united whole, a good lesson for us in Hindusthan to learn and profit by.
Ever since that evil day, when Moslems first landed in Hindustan, right up to the present moment, the Hindu Nation has been gallantly fighting on to take on these despoilers. The Race Spirit has been awakening."
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कल (18जुलाई 2013)अन्ना हजारे का बयान कुछ था लेकिन आज दूसरा बयान आया है। अन्ना ने कहा है मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं है। पढ़ें- NEW DELHI: Calling BJP communal, activist Anna Hazare on Friday said he never described Narendra Modi as secular.

"He (Modi) belongs to a party that sympathizes with only one community, and is against other communities. It is also known that it is totally against one particular community," Hazare told reporters.

"Modi represents what BJP stands for. From their statements, it appears to be communal. I don't want to talk about an individual person, because it is a matter of his political party. BJP has nominated Narendra Modi as chairman of its campaign committee," he said.

Hazare said a non-communal person, who can provide better governance, should come to power after the elections.

He said that he was misquoted by a section of media which said he viewed Modi as not being communal.

"This is wrong. Journalists asked me whether I consider Narendra Modi communal or not. I immediately said I don't have any proof against him, so I can't say anything on it. But some newspaper wrote that Anna Hazare said Modi is not communal ... This does not mean that he is secular or non-secular."
(टाइम्स ऑफ इण्डिया से साभार)
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नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक पैंतरेबाजी में शालीन राजनीतिक एजेण्डा कभी नहीं रहा। इसबार राष्ट्रीय क्षितिज पर आकर उन्होंने बेबकूफी-विमर्श का जो दायरा बनाया है उसकी कायदे से कांग्रेस और अन्यदलों को उपेक्षा करनी चाहिए। मोदी बोलें तो उनको बोलने दें । मोदी असल में पब्लिक रिलेशन के एजेण्डा सेटिंग पैटर्न पर चल रहे हैं।इस चक्र में फंसने के बाद न तो खबरें रहेंगी।और न राजनीतिक कार्यक्रम पर ही बातें होंगी। मोदी के जनसंपर्कचक्र का अर्थ है सिर्फ प्रौपेगैण्डा और सिर्फ प्रौपेगैण्डा। मोदी न तो खबर है और न इवेंट है,वह तो प्रौपेगैंडा है और प्रौपेगैण्डा खबर नहीं होती है।
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नेताओं में बेबकूफी दूसरा शो विपक्ष की ओर से चल रहा है,मुलायम को अफसोस है ,कल हो सकता है राजनाथ सिंह भी गुजरात पर अफसोस जाहिर कर बैठें।मोदी तो तय है गुजरात दंगों के लिए माफी मांगेंगे। समस्या यह है कि किस समय मांगें ? इसबार का चुनाव नेताओं से सबकुछ कराएगा। अफसोस-दुख-निंदा करने वाले नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि अरे भाई आपने जब घटना घटी थी तब अफसोस -दुख जाहिर क्यों नहीं किया ?
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भारत में मूर्खता का अंधड़ चल रहा है। सबसे बड़ा हिन्दू कौन ? इवेंट प्रतियोगिता का नियोजित शो चल रहा है। छोटे बच्चों की तरह नेतागण तुतला -तुतलाकर कह रहे हैं मैं बड़ा हिन्दू -मैं बड़ा हिन्दू। कोई चोटी दिखा रहा है ,कोई जनेऊ,कोई शंकराचार्य,कोई राम को तो कोई किसी और को। 21वीं सदी की यह सबसे बड़ी बेबकूफी है।
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भाजपा ने उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा के लिए मदद के सवाल को आगामी लोकसभा चुनाव के साथ जोड़ दिया है। सस्ती राजनीति का संसार में यह दुर्लभ उदाहरण है।
भाजपा-कांग्रेस आदि दल अपनी रैलियों में पैसे खर्च करके लोग लाते हैं।फोकट में इन दलों की रैली में कोई नहीं आता। भाजपा जैसी समर्थ पार्टी के लिए पांच लाख का चंदा जुटाना आसान बात है,मौटे तौर पर इससे कई गुना ज्यादा पैसा तो हैदराबादरैली में आने वाले लोगों की परिवहन व्यवस्था और खाने-पीने पर खर्च हो जाएगा।
भाजपा का कहना है हैदराबाद में मोदी की मीटिंग में शामिल हो और पांच रूपया दो । यह पैसा उत्तराखंड के प्राकृतिक आपदा पीड़ितों को दिया जाएगा।
नरेन्द्र मोदी और भाजपा को यदि उत्तराखंड आपदा पीड़ितों की इतनी ही चिन्ता है तो वे इस तरह का सस्ता हथकंडा अपनाकर मदद क्यों कर रहे हैं ? यह अपमान है आपदा पीड़ितों का।
जो मदद करते हैं वे ढोल नहीं बजाते। पीड़ा में मदद की ढोल,मीटिंग के नाम पर जलसा करना ,आपदा में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनहीनता है। मदद के नाम पर लोग जुटाना और उनसे वोट की अपील करना,घटिया राजनीति है।
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हमारा प्रस्ताव है देश में चारों ओर जिस राज्य के मजदूर ज्यादा काम करते हों ,उस राज्य के पैदाइशी नागरिक को प्रधानमंत्री पद सौंपना चाहिए। क्योंकि असली समाज संचालक वे ही हैं।
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कांग्रेस - भाजपा के नेताओं से मीडिया और जनता यह सवाल बार-बार पूछे कि धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिकतंत्र के निर्माण के लिए इन दोनों दलों क्या किया ? यदि इन दोनों दलों ने कुछ किया होता तो बाबरी मस्जिद का विध्वंस न होता। भारत की धर्मनिरपेक्ष राजनीति की दावेदार इनदोनों पार्टियों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर बाबरी मस्जिद विध्वंस बदनुमा दाग है।
मंदिर तोड़ना, गुरूद्वारे जलाना,मस्जिद गिराना धर्मनिरपेक्ष राजनीति का काम नहीं है। लेकिन अफसोस यह है कि भारत में यह सब होता रहा है। किसने मस्जिद गिरायी, किसने गुरूद्वारे लाए और किसने मंदिरों पर हमले किए इसके बारे में देश के तमाम जागरूक लोग जानते हैं.हम यहां नाम नहीं लेना चाहते।
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आज टीवी चैनलों पर खूब आनंद आया । कांग्रेस और भाजपा के प्रवक्ता मुर्गे की तरह लड़ रहे हैं। इन दोनों ही पुण्यात्मा दलों में होड़ मची है भारतीय राजनीति के सबसे बड़े पुण्यात्मा होने की। इस होड़ में इन दलों के नेताओं ने झूठ और बेशर्मी की सभी हदें तोड़ दी हैं। अरे भाईयो गुजरात हमारा है वह भाजपा-कांग्रेस का नहीं है। गुजरात यदि शिक्षा में पीछे रह गया तो यह भी भारत की कमी है ।इसे सिर्फ मोदी के खाते नहीं डाल सकते।
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चुनाव आएं और मुसलमान याद न आएं हो नहीं सकता। मोदी भी याद कर रहे हैं और मोदी विरोधी भी मुसलमानों को याद कर रहे हैं। यानी मुसलमानों के बिना ये दल जी नहीं सकते। मुसलमानों का मैनस्ट्रीम से अलगाव खत्म करने का सही तरीका उनको याद करना मात्र नहीं है। मुसलमान अपने हैं तो इनदलों को मुसलमानों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्ते बनाने पर जोर देना चाहिए। दंगे से ज्यादा जरूरी है मुसलमानों के साथ खान-पान , वोट पाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है शादी-ब्याह के संबंध बनाना। उर्दू को पढ़ना -पढ़ाना,उसे मात्र मुसलमानों की भाषा न रहने देना। बाकी वैषम्य अपने आप समझने में सहायता मिलने लगेगी।
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नरेन्द्र मोदी को संघ परिवार ने मैदान में उतारकर सारे देश में मनमोहन सरकार की जनविरोधी नीतियों पर से बहस को खिसकाकर मोदी के व्यक्तित्व विवेचन और क्षमता के प्रचार में लगा दिया है।
देश मनमोहन सिंह की नीतियों से तबाह है ,मोदी पर संघ परिवार बहस चलाकर बहुराष्ट्रीय निगमों और कारपोरेट घरानों की लूटलीला पर परदा डालने का काम कर रहा है।
आज मोदी का राष्ट्रवाद समस्या नहीं है,समस्या यह है कि भाजपा के पास मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों का कोई विकल्प है तो अब तक मोदी ने उन नीतियों को पेश क्यों नहीं किया ?

नरेन्द्र मोदी मजमेवाजों की तरह चुनाव को नाटक बनाने में लगे हैं। वे नीतियों पर नहीं बोल रहे,थोथे बयान दे रहे हैं। थोथे बयान अंततः बहुराष्ट्रीयनिगमों को मदद करते हैं।
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-3-

मोदी ने कहा है "मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं। "
सवाल यह है कि वे नागरिक की अस्मिता को मानते हैं या नहीं,वे अपने को भारत का नागरिक कहना पसंद क्यों नहीं करते, असल में नागरिक की पहचान में समानता,बंधुत्व और लोकतंत्र का भाव अभिव्यंजित होता है। लेकिन हिन्दू राष्ट्रवादी की संघी अवधारणा मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति घृणा से भरी है।
एक हिन्दूराष्ट्रवादी कभी नागरिक भावबोध से लैस नहीं हो सकता। मोदी को भारत का नेता बनना है तो हिन्दू राष्ट्रवाद को छोड़ना होगा और भारत के नागरिकबोध को मानना होगा।
हिन्दू राष्ट्रवाद या मुस्लिम राष्ट्रवाद या राष्ट्रवाद का नागरिकभावबोध और नागरिक हकों से तीखा अन्तर्विरोध है। मोदी आने वाले चुनाव में हिन्दू राष्ट्रवादी के नाते नागरिकहकों पर हमलावर हो सकते हैं ?
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-2-

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने एक झूठा बयान दिया है कि गुजरात दंगों के प्रसंग में वे निर्दोष हैं। सच है कि सुप्रीमकोर्ट ने उनको अभी क्लीन चिट नहीं दी है। यदि वे अपने को निर्दोष मानते हैं तो उनको यह बात अपने नेताओं को पहले समझानी थी कि उन्होंने 2002 से लेकर 2013 तक उनको भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया ? सन् 2014 में ही वे उम्मीदवार क्यों बनाए गए हैं ?
असल में उनको और संघ-परिवार को भय है कि कहीं मोदी को सुप्रीमकोर्ट दोषी करार न दे दे। यदि ऐसा होता है तो न्यायालय पर भी हमले करने में आसानी होगी।

मोदी से सवाल पूछा गया 2002 में आपने जो कुछ किया वह बिल्कुल ठीक था, तो उन्होंने कहा 'बिल्कुल। जितनी अक्ल मुझे ऊपर वाले ने दी है, जितनी अनुभव मैंने हासिल किया और उन हालात में जितनी ताकत मुझे हासिल थी, उसे देखते हुए जो कुछ मैंने किया वह बिल्कुल सही था और इसी बात की जांच एसआईटी ने की थी।'
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नरेन्द्र मोदी के नए वैचारिक खेल-1-

भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी हिन्दुत्व के मौलिक चिंतक हैं। आज उनका एक नया रूप सामने आया है, वे गुजरात के दंगों में मारे गए लोगों को न तो मुसलमान मानते हैं और इंसान मानते हैं,वे उनको पिल्ला यानी कुत्ता मानते हैं। मारे गए लोगों की कुत्ते से तुलना करना निश्चिततौर पर संघ की विचारधारा का एकदम नया रूप है।
नवभारत टाइम्स के अनुसार "गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में गुजरात के दंगों पर विवादास्पद बयान दिया है।जब उनसे पूछा गया कि क्या जो कुछ हुआ उसका उन्हें दुख है, तो उन्होंने कहा, 'दुख तो होता ही है। अगर कुत्ते का बच्चा भी कार के नीचे आ जाए तो भी दुख होता है।' "


दंगों में मारे गए लोगों को इंसान न मानना और उनकी पिल्ले यानी कुत्ते के बच्चे से तुलना करना स्वयं में इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में मोदी आक्रामक हिन्दुत्व का कार्ड खेलने जा रहे हैं। यह सच है कि वे जो बोल रहे हैं,होशोहवास में बोल रहे हैं, सोचिए मोदी की कार ड्राइविंग का क्या हश्र होता यदि उनकी कार किसी ट्रेन या ट्रक की चपेट में आ जाती ? मोदी के मन में गुजरात दंगों में माए गए मुसलमानों के प्रति कोई दुख नहीं है। हम चाहते हैं मोद कार चलाएं और उसी तरह कार दौडाएं जैसे वे गुजरात में दौडा रहे हैं। ईश्वर उन्हें अगले चुनाव में वोटों की चपेट में वैसे ही ले जैसे कोई कार किसी ट्रेन की चपेट में आती है। उस दुर्घटना में मोदी बचें और भाजपारूपी कार ध्वस्त हो।

जनसत्ता के निराला पर प्रतिक्रियावादी हमले


 हाल ही में जनसत्ता अखबार में शंकरशरण का लेख छपा है जिसमें सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' को हिन्दुत्ववादी सिद्ध करने का आधारहीन प्रयास किया गया है। इस लेख में निराला को समग्रता में देखने की कोशिश ही नहीं की गयी है। साथ ही इस लेख में निरर्थक प्रगतिवाद पर हमला बोला गया है। अप्रासंगिकता को आलोचना में दीमक कहते हैं।
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जनसत्ता जैसे अखबार की प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम जारी है और उसमें कविताओं के साथ आलोचना कम कु-समीक्षा ज्यादा लिखी जा रही है।हाल ही में शंकर शरण जैसे लेखक ने अपने लेख में निराला की प्रसिद्ध कविता तुलसीदास का गलत मूल्यांकन किया है।
असल में उसी कविता में निराला ने कविता लिखने का मकसद भी लिखा है। निराला ने लिखा है- "करना होगा यह तिमिर पार। देखना सत्य का मिहिर द्वार।"
यह कविता हिन्दुत्ववादी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली कविता नहीं है। बल्कि इसका लक्ष्य भिन्न है।
इस कविता का मूल लक्ष्य है सांस्कृतिक अंधकार को पार करके सत्य को पाना। साम्प्रदायिक नजरिए का सत्य के सत्य बैर है। शंकरशरण जैसे लेखक इस मूल बात को पकड़ने में असमर्थ रहे हैं। कविता किसके लिए लिखी गयी है यह बात कविता में निराला ने स्वयं लिखी है । सवाल यह है शंकरशरण यह लेख क्यों इनदिनों मोदी को महान बनाने की मुहिम के हिस्से के तौर पर इस तरह के लेख छापकर जनसत्ता अखबार जाने-अनजाने मोदी की जनसंपर्ककला का शिकार बन गया। निराला का हिन्दुत्व से कोई संबंध नहीं है। निराला विचार और कर्म दोनों में साम्प्रदायिकता विरोधी थे।
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शंकर शरण जैसे लेखक को यह भी जानना चाहिए कि साम्प्रदायिक समस्या पर निराला आखिरकार क्या सोचते थे। निराला ने लिखा है- "हिंदू और मुसलमानों की समस्या इस देश की पराधीनता की सबसे बड़ी समस्या है।"
शंकरशरण जैसे लेखकों का इस समस्या के प्रति रूख क्या है ,यह बात भी जाननी दिलचस्प है। वे निराला में से मनवांछित यथार्थ खोज रहे हैं। इस तरह के लेखन को निराला मानसिक दु्र्बलता मानते थे।
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शंकर शरण जैसे लेखकों को ध्यान में रखकर ही निराला ने लिखा था- "हमारे देश में धार्मिक कट्टरता ही प्रबल है। इसका परिणाम यह होता है कि कट्टरता का जड़त्व मस्तिष्क का विकास नहीं होने देता।अपने अनुकूल न होने पर धार्मिक तत्व झूठे जान पड़ते हैं।यह आत्मानुकूल तत्ववृत्ति बहुत बड़ी मानसिक दुर्बलता है। इसके कारण सभी रेखाओं से मन-शक्ति का विकास नहीं हो पाता। प्रहार करने वाली पशुवृत्ति बनी रहती है।मनुष्य सब देशों के साहित्य,समाज,राजनीति और धर्म का महत्व समझ नहीं पाता।प्रगति एक हद तक बंधी रहती है। "
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निराला ने लिखा था- " हिंदुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान इस देश में संकीर्ण हो रहे हैं। "

भारतीय मध्यवर्ग के वहशी रूप

              
भारत में मध्यवर्ग का तेजगति से पतन हो रहा है ।इतनी तेजगति से अन्य किसी वर्ग का पतन नहीं हुआ है। मध्यवर्ग के आदर्शनायक आईएएस -आईपीएस अफसरों में बहुत बड़ा समुदाय तैयार हुआ है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। ये वे लोग हैं जिनके पास सब कुछ है।सबकुछ होते हुए भी ये क्यों भ्रष्ट हो रहे हैं ?
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भारत के मध्यवर्ग ने सामाजिक-आर्थिक शक्ति अर्जित करते ही सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों और लोकतांत्रिक लक्ष्यों से अपने को सचेत रूप से अलग किया है।
अधिकतर मध्यवर्गीय शिक्षितलोग राजनीति को बुरा मानते हैं या भ्रष्ट राजनीति की हिमायत करते हैं या अधिनायकवादी या फासिस्ट राजनीति की हिमायत करते हैं।मध्यवर्ग का इस तरह का चरित्र बताता है कि भारत में संपन्नता जिन वर्गों में पहुंची है उनमें लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक नहीं पहुंचे हैं।
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भारत में मध्यवर्ग में सांस्कृतिक परवर्जन तेजी से बढ़ा है। दुनिया के अनेक देशों में आधुनिककाल में वैज्ञानिकचेतना और स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों का मध्यवर्ग में विकास हुआ है ,लेकिन भारत में उलटी गंगा बह रही है। 
भारत के मध्यवर्ग में इन दिनों प्रतिगामिता की आंधी चल रही है। सेक्स से लेकर धर्म तक इसे सहज ही देखा जा सकता है। मध्यवर्ग में प्रतिगामिता के कारण इस वर्ग के बहशीयाना चरित्र की आए दिन परतें खुल रही हैं। 
आश्चर्य की बात है इस वर्ग के पतनशील मूल्यों पर हम सबने हमले करने बंद कर दिए हैं। प्रतिगामिता के साथ हमसब सामंजस्य बिठाकर जीने लगे हैं। मध्यवर्गीय प्रतिगामिता अब हमारे अंदर गुस्सा पैदा नहीं करती। यह स्थिति बदलनी चाहिए।
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मध्यवर्ग की पतनशीलता के तीन बड़े क्षेत्र हैं ,एक है स्त्री उत्पीड़न-शोषण , दूसरा है खुला भ्रष्टाचार और तीसरा है तिकड़मबाजी।

मध्यवर्ग के लोगों में शिक्षितों में आज स्त्री उत्पीड़न ,हिंसाचार,यौनशोषण आदि जिस तरह सतह पर आ गया है,उसने हमें सारी दुनिया में सभ्य कहलाने लायक नहीं छोड़ा। यही हाल भ्रष्टाचार का है। तिकड़मबाजी में तो मध्यवर्ग के नायक सबसे आगे हैं। इन तीनों प्रवृत्तियों को देखकर यही लगता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का मध्यवर्गीय मूल्य-संरचना पर सकारात्मक असर बहुत कम पड़ा है।

मंगलवार, 25 जून 2013

फेसबुक विचार वैतरणीः भाजपा और 2014 का लोकसभा चुनाव




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BJP अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भाजपा को असली भगवा रंग में पेश करके भाजपा का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय कर दिया है। राजनाथ सिंह ने धर्मनिरपेक्षता को बीमारी कहा है और उसे बुरा माना है। उन्होंने कहा- “You know there is a disease called encephalitis which is very bad .....similarly there is another disease called secularitis from which the Congress and its allies are suffering in the manner they have been trying to create a divide on the lines of secularism and communalism in the country,”( हिन्दू,24जून 2013)

राजनाथ सिंह ने इस बयान के जरिए धर्मनिरपेक्षता पर हमला किया है। कल मोदी ने राष्ट्रवादीभावबोध से हमला किया था।आज धर्मनिरपेक्षता पर हमला किया गया,अगला हमला संभवतः राष्ट्रीयएकता पर होगा।
धर्मनिरपेक्षता भारतीय जीवन का महासच है, और साम्प्रदायिकता लघुसच है, यह देखना होगा कि देश की जनता किस सच को स्वीकार करती है।
साम्प्रदायिक भाजपा-संघ परिवार-मोदी को देश की जनता लगातार ठुकराती रही है। भाजपा को अपनी राजनीतिक महत्ता का अहसास हो जाएगा यदि वे इसबार अकेले चुनाव लड़ लें।
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भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है- “Our country must be saved from this disease (secularitis),” he said and urged all political parties to oppose it.
यानी देश को फंडामेंटलिज्म और प्रतिक्रियावादी राजनीति की ओर ले जाने का आह्वान किया है राजनाथ सिंह ने। राजनाथ सिंह जबाव दें कौन सा देश है जो फंडामेंटलिज्म या अनुदारवादी नीतियों के आधार पर अपना प्रगतिशील ढ़ंग से विकास कर पाया है ? आधुनिक होने के लिए धर्मनिरपेक्ष होना जरूरी है।
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जो लोग गुजराती अस्मिता और गुजराती जातीयता को आगामी चुनाव में भाजपा के वोटबैंक का आधार बनाकर मोदी को नेता बनाना चाहते हैं वे जानलें कि आंध्र में क्या हो रहा है।
आंध्र में आज विभाजन का खतरा साक्षात खड़ा है,यह तेलुगू जातीयता के राज्य विभाजन की नई दिशा है। यह वैसे ही है जैसे राममंदिर आंदोलन के बाद हिन्दू उन्माद पैदा करके भाजपा-कांग्रेस आदि ने मिलकर यूपी-मध्यप्रदेश और बिहार को विभाजित किया।
कहने का मतलब है जातीयता और राष्ट्रवाद के आधार मोदी जो राजनीति कर रहे हैं वह विभाजनकारी है और इसके कभी भी कहीं पर भी सुखद परिणाम नहीं निकले हैं। यह बात योरोप से लेकर भारत तक सही है।
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भाजपा -संघ परिवार और मोदी को इस सवाल का जबाव देना होगा कि उनका आगामी लोकसभा 2014 चुनाव में एजेण्डा राष्ट्रवाद है या राष्ट्रीय विकास है ?
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जो राजनेता अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीयता का इस्तेमाल करते हैं वे यह भूल जाते हैं कि राष्ट्रीयता में अंतर्गृथित तौर पर विभाजनकारी तत्व शामिल रहता है। राष्ट्रीयता कभी भी साम्प्रदायिकता या पृथकतावाद या आतंकवाद में रूपांतरित हो सकती है।
नरेन्द्र मोदी ने गुजराती अस्मिता और गुजराती जातीयता के सवाल को जिस शक्ति के साथ उठाया उसने स्वाभाविकतौर पर साम्प्रदायिक हिंसाचार में रूपान्तरण किया, यह हिंसा तब भी होती यदि गोधराकांड न होता।
पंजाब में अकालियों की पंजाबी जातीयता का हश्र हम देख चुके हैं.शिवसेना के मराठी जातीयता के विभाजनकारी रूपान्तरण से हम बाकिफ हैं।
सवाल यह है कि मोदी,भाजपा या संघ परिवार जातीय उन्माद और राष्ट्रवाद को छोड़कर आगामी चुनाव लड़ता है या नहीं ? ये दोनों ही प्रवृत्तियां आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं।
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मोदी और भाजपा को यह बात समझ में आ गयी है कि गुजरात महान,गुजराती जातीयगर्व आदि के आधार पर मोदी राष्ट्रीयनेता नहीं बन सकते। यह राष्ट्रीयता की सीमा है। नरेन्द्र मोदी ,संघ परिवार और भाजपा को यह बात समझनी होगी कि राष्ट्रीयता के ईंधन से देश की अन्य राष्ट्रीयताओं में अपील पैदा नहीं की जा सकती।
राष्ट्रीयता का उन्माद एक सीमा के बाद राजनीतिक बेड़ी बन जाता है और यही कष्ट इनदिनों मोदी का है। वे गुजराती राष्ट्रीयता की जंजीरों में बंधे हैं। ये बेडियां उन्होंने ही डाली हैं, अब वे इनको तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं इसमें उनको शायद ही सफलता मिले। क्योंकि वे अपना राष्ट्रीयताप्रेम खारिज कर नहीं सकते और बिना राष्ट्रीयताप्रेम खारिज किए राष्ट्रप्रेम पैदा नहीं होता। डर है कि गुजराती राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के द्वंद्व में भाजपा अपनी गुजरात के संसदीय आधार से हाथ न धो बैठे.
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कल (22जून2013 )जब नरेन्द्र मोदी पंजाब से अपना चुनाव अभियान शुरू कर रहे थे तो अचानक उन्हें कश्मीर के युवाओं का खूब ख्याल आया, सवाल यह है कि चुनावी प्रचारसभा में ही ख्याल क्यों आया ,पहले कभी मोदी को कश्मीर के युवा नजर क्यों नहीं आए ? असल में युवाओं को मोदी राष्ट्रवादी उन्माद का ईंधन बनाने की कोशिश कर रहे थे। जो नेता युवाओं को राष्ट्रवाद का ईंधन बनाता है वह उनका सबसे ज्यादा नुकसान करता है। आज के दौर में राष्ट्रवाद कैंसर है।
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कोई ये बता सकता है कि गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने किस फार्मूले से केवल गुजरातियों को चुनचुनकर सड्क और हवाई मार्ग से राहत सुविधाएं मुहैया करवाई होंगी। क्‍या प्रांतीयता पूछकर राहत कार्य संभव है्।(सुधासिंह का स्टेटस)
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केदारनाथ आपदा में फंसा है वहां मदद की जरूरत है ,सन् 2014 के लोकसभा चुनाव अभी बहुत दूर हैं ,लेकिन नरेन्द्र मोदी चुनावप्रचार पर निकल दिए हैं। इसे क्या कहें -चुनावप्रेम या देशप्रेम ?
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बिहार के मुख्यमंत्री ने नरेन्द्र मोदी को कारपोरेट घरानों के साथ जोड़ा है और इसी प्रसंग में मुझे आडवाणी की सबसे रोचक टिप्पणी याद आ रही है। उन्होंने लिखा है- "देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के बारे में सन 2008 के राष्ट्रमंडल खेलों से सुना जा रहा है जिसके चलते हमारे राष्ट्र की काफी बदनामी हुई है। परन्तु वर्तमान के दौर में अलग श्रेणी के नायकों के शामिल होने से यही तथ्य उभरता है कि इस सभी गिरावट की जड़ में पैसा मुख्य है।

किसी ने सही ही कहा है: धन रखना बहुत अच्छा है; यह एक मूल्यवान चाकर हो सकता है। लेकिन धन आपको रखे तो यह ऐसा है जैसे कोई शैतान आपको पाल रहा है, और यह सर्वाधिक स्वार्थी और खराब किस्म का शैतान है!"
यहां जोडें यदि धनवान पाले तो हैवान हो सकता है।
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मोदी के नवरत्न अदालत के जरिए पुरस्कृत- एनडीए के टूटने की खबरों के बीच बीजेपी कैंपेन कमिटी के अध्यक्ष और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को करारा झटका लगा है। गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार में सीनियर मंत्री बाबूभाई बुखेरिया को अवैध खनन मामले में पोरंबदर की एक अदालत ने सजा सुनाई है। अदालत ने गुजरात के जल संसाधन मंत्री बुखेरिया और 3 अन्य लोगों के साथ 3 साल कैद की सजा सुनाई है। बुखेरिया पर 5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
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आज आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और लालकृष्ण आडवाणी के बीच मुलाकात हुई और तकरीबन 45 मिनट बातें हुईं। इस बातचीत में आडवाणी ने मोदी के खिलाफ एक पूरी चार्जशीट दी है और अपनी राय रखकर समझाने की कोशिश की है संघ का नया दांव भाजपा का देश में राजनीतिक अलगाव बढ़ाएगा। इस पर मोहन भागवत सहमत नहीं थे। अंत में दोनों में मोदी पर कोई सहमति नहीं बन पायी है। संभावना यह है कि मीडिया और इंटरनेट में आडवाणी अपने हमले और तेज करेंगे।
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भाजपानेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में एक सुंदर उद्धरण दिया है,
डेविडसन की टिप्पणी है: पैसा नगण्य है। लेकिन इससे जो सिध्दान्त स्थापित हुआ है, और जो इतिहास फिर से लिखा गया है, वह अथाह है।
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भाजपा का पुनःहिन्दुत्व की शरण में लौटना इस बात का संकेत है कि भाजपा के पास 21वीं सदी का कोई सपना नहीं है। वे हिन्दुओं को गरमाकर कुछ समय बाद अलकायदा टाइप दिशा ग्रहण करेंगे। यह बात आडवाणी पहचान रहे हैं और यही वह बिंदु है जहां पर उनको चुप रहने को कहा गया है।
आज भाजपा के सामने दो रास्ते हैं -1.एनडीए का रास्ता और 2.अलकायदा रास्ता। अलकायदा रास्ता प्रकारान्तर से कांग्रेस की सेवा है और भारत की सत्ता राहुल गांधी को सौंपने की एक तरह से प्रच्छन्न घोषणा भी है।
मोदी वैसे ही लड़ रहे हैं कांग्रेस से ,जैसे विन लादेन कभी अमेरिका से लड रहा था ,और अंत में अमेरिका के हाथों अफगानिस्तान सौंपकर ही मरा।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मेरठ में मोदी की हिमायत करते हुए जो बयान दिया है उससे साफ हो जाना चाहिए कि मोदी को अगुवा बनाकर संघ परिवार देश में विकास का नहीं विभाजनकारी एजेंडा लागू करना चाहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बीजेपी में राष्ट्रीय भूमिका दिए जाने का समर्थन करते हुए कहा कि "हिन्दुत्व ही वह रास्ता है जिससे देश में परिवर्तन लाया जा सकता है।"

मोदी का कद बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि" कोई पसंद करे या नहीं करे, हिन्दुत्व ही वह मार्ग है जो देश में परिवर्तन लाएगा। इसी में देश का सम्मान निहित है"।

भागवत ने सोमवार की शाम संघ के प्रशिक्षण शिविर में कहा कि" हमने नेता और एजेंडा बदल कर देख लिया, कुछ काम नहीं आया। राजनीति के द्वारा भारत को महाशक्ति नहीं बनाया जा सकता है, ऐसा सिर्फ हिन्दुत्व से किया जा सकता है।"

यानी भाजपा में जो कुछ बदलाव आए हैं वे संघ के आदेश पर आए हैं। संघ का इससे चरित्र फिर से साफ हुआ है कि वह सांस्कृतिक संगठन का मुखौटा लगाए राजनीतिक संगठन है।
दूसरी बात यह कि जब सारी दुनिया साइबरयुग में जाने की सोच रही है देश,नस्ल,राष्ट्र,राष्ट्रवाद आदि की सीमाओं का अतिक्रमण कर रही है ऐसी स्थिति में हिन्दुत्व के नाम पर एकजुट करना देश को 14वीं सदी में ले जाने की कोशिश ही कही जाएगी।
तीसरी बात यह कि मोदी के बहाने आनेवाले समय में विकास का नहीं हिन्दुत्व का एजेण्डा आने वाला है।
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कांग्रेस के नेताओं के विलक्षण बयान आने लगे हैं। एक नेता ने कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत कभी भी नरेन्द्र मोदी को अपना नेता नहीं मानेगा। यह बयान धर्मनिरपेक्षता की गलत समझ पर आधारित है।
धर्मनिरपेक्ष भारत में साम्प्रदायिक व्यक्ति भी प्रधानमंत्री -मंत्री-मुख्यमंत्री आदि हो सकता है। अटल-आडवाणी-नानाजी देशमुख -कल्याण सिंह आदि खांटी साम्प्रदायिक नेता इसके आदर्श उदाहरण हैं। यहां तक कि कागज पर नियमानुसार भाजपा धर्मनिरपेक्ष दल है और यह बात उसने अपने दलीय संविधान में मानी है। यह दीगर बात है कि उसके नेता अहर्निश साम्प्रदायिक प्रचार करते रहते हैं। कांग्रेस के नेताओं को इस तरह के बयानों से बचना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष भारत में अनिश्वरवादी भी मंत्री आदि हो सकता है।
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भाजपा या किसी भी दल को साम्प्रदायिक है या धर्मनिरपेक्ष है ,उसके अल्पसंख्यकों के प्रति नजरिए के आधार पर देखना चाहिए।
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भाजपा क्या है और कांग्रेस क्या है,यह मुद्दा यहां बहस तलब नहीं है।एक घटना केन्द्र में है और उसकी संभावित परिणतियों पर अनुमान हमसब लगा रहे हैं। कानूनन भाजपा धर्मनिरपेक्षदल है।हमारा संविधान किसी साम्प्रदायिकदल को चुनावी मान्यता नहीं देता। लेकिन उसकी विचारधारात्मक समझ उसे साम्प्रदायिक बनाती है।इसी तरह कांग्रेस कहने को धर्मनिरपेक्षदल है विचारधारा के आधार पर ,लेकिन उसने अनेकमर्तबा निहितदलीय स्वार्थों के लिए साम्प्रदायिक पत्ते खेले हैं।
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एनडीए का बिखरना लोकतंत्र के लिए अशुभ है,उसमें से धर्मनिरपेक्ष जदयू का निकल जाना और भी अशुभ है,क्योंकि अब यह मोर्चा और भी ज्यादा कंजरवेटिव और विभाजनकारी मुद्दों के आधार पर लोगों में उन्माद पैदा करेगा। जदयू ने अलग होकर साम्प्रदायिक ताकतों के लिए उन्मादी रास्ते तलाशने की मोड़ दिया है।
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नरेन्द्र मोदी -भाजपा के जंजाल से मुक्त होकर नीतीश कुमार ने ठीक वही काम किया है जो किसी जमाने में वीपी सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर किया था। भारत की नई लीडरशिप अब नीतीश-अखिलेश यादव -राहुल गांधी और मायावती के चतुष्कोण पर केन्द्रित है और नई लोकसभा की संभावनाओं में वाममोर्चा इनके पूरक होंगे। यह काम यूपीए से अलग तीसरा मोर्चा बनाकर हो या अन्य किसी शक्ल में,वामदलों का आगामी कन्वेंशन इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। नए समीकरण में नीतीश महत्वपूर्ण हैं।
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भाजपा के लोग नीतीश के पुराने भाषणों को बांट रहे हैं, वे नहीं जानते कि उनके नेताओं के पुराने भाषण यदि बंटेंगे तो मोदी,भाजपा और संघ परिवार की क्या गत होगी ? चुनाव में पुराने भाषण कम जाति, नए भाषण और नए मुद्दे ज्यादा काम करते हैं,खासकर बिहार और यूपी में।
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नीतीश कुमार ने मोदी को एक ही एक्शन में नायक से खलनायक बना दिया है और भावी रणनीति अब यादवों और नीतीश कुमार पर निर्भर है। बिहार-यूपी में गणित साफ दिख रहा है कि भाजपा हाशिए के बाहर है।
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नरेन्द्र मोदी बड़े नसीब वाले हैं,कांटे निकालने में माहिर हैं,भाजपा की उलझी जुल्फें संवारने में लगे हैं,इस पर पढ़ें-

उलझी थी ज़ुल्फ़ उस ने सँवारा सँवर गई
शाने को क्या ख़बर ये बला किस के सर गई।।जमील मजहरी।।
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भाजपा-जदयू विवाद में अंदर खाते की बातें आनी बाकी हैं,लेकिन बात बिगड गयी है तो इसका कोई समाधान संभव नहीं है.रहीम ने क्या कहा है पढ़ें-

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ।
रहिमन बिगरै दूध को, मथे न माखन होय ॥
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आज भाजपा के सभी नेता चैन की नींद सोएंगे,कई दिनों से नीतीश कुमार से परेशान थे।
कांटा निकल गया और दर्द बंद अब आराम से देश में रामरथ दौडाएंगे,कोई न रोकनेवाला है और न साथ से भागनेवाला।
हमें तो लगता है नीतीश बाबू ने भाजपा का साथ रामजी की कृपा के कारण ही छोड़ा है. राजनाथ सिंह की भगवान ने जिस तरह मदद की है,ईश्वर यूपीए की भी इसी तरह मदद करे।
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नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा-संघ परिवार और कारपोरेट मीडिया सुनियोजित प्रचार चला रहा है । कहा जा रहा है भारत की सब बीमारियों की रामबाण दवा है मोदी। मोदी को गद्दी दो और देश की तकदीर बदलो।मोदी को लाने का अर्थ है हिन्दुस्तान को मूर्खिस्तान बनाना। मूर्खिस्तान पर काका की कविता पढ़ें-

मूर्खिस्तान ज़िंदाबाद / काका हाथरसी

स्वतंत्र भारत के बेटे और बेटियो !
माताओ और पिताओ
आओ, कुछ चमत्कार दिखाओ। 
नहीं दिखा सकते ?
तो हमारी हाँ में हाँ ही मिलाओ। 
हिंदुस्तान, पाकिस्तान अफगानिस्तान
मिटा देंगे सबका नामो-निशान
बना रहे हैं-नया राष्ट्र मूर्खितान
आज के बुद्धिवादी राष्ट्रीय मगरमच्छों से
पीड़ित है प्रजातंत्र, भयभीत है गणतंत्र
इनसे सत्ता छीनने के लिए
कामयाब होंगे मूर्खमंत्र-मूर्खयंत्र
कायम करेंगे मूर्खतंत्र।

हमारे मूर्खिस्तान के राष्ट्रपति होंगे-
तानाशाह ढपोलशंख
उनके मंत्री (यानी चमचे) होंगे-
खट्टासिंह, लट्ठासिंह, खाऊलाल, झपट्टासिंह
रक्षामंत्री-मेजर जनरल मच्छरसिंह
राष्ट्रभाषा हिंदी ही रहेगी, लेकिन बोलेंगे अँगरेजी। 
अक्षरों की टाँगें ऊपर होंगी, सिर होगा नीचे
तमाम भाषाएँ दौड़ेंगी, हमारे पीछे-पीछे।
सिख-संप्रदाय में प्रसिद्ध हैं पाँच ककार’-
कड़ा, कृपाण, केश, कंघा, कच्छा। 
हमारे होंगे पाँच चकार’-
चाकू, चप्पल, चाबुक, चिमटा और चिलम।

इनको देखते ही भाग जाएँगी सब व्याधियाँ
मूर्खतंत्र-दिवस पर दिल खोलकर लुटाएँगे उपाधियाँ
मूर्खरत्न, मूर्खभूषण, मूर्खश्री और मूर्खानंद।

प्रत्येक राष्ट्र का झंडा है एक, हमारे होंगे दो
कीजिए नोट-लँगोट एंड पेटीकोट 
जो सैनिक हथियार डालकर 
जीवित आ जाएगा
उसे परमूर्ख-चक्रप्रदान किया जाएगा। 
सर्वाधिक बच्चे पैदा करेगा जो जवान
उसे उपाधि दी जाएगी संतान-श्वान
और सुनिए श्रीमान-
मूर्खिस्तान का राष्ट्रीय पशु होगा गधा
राष्ट्रीय पक्षी उल्लू या कौआ
राष्ट्रीय खेल कबड्डी और कनकौआ। 
राष्ट्रीय गान मूर्ख-चालीसा
राजधानी के लिए शिकारपुर, वंडरफुल !
राष्ट्रीय दिवस, होली की आग लगी पड़वा। 

प्रशासन में बेईमान को प्रोत्साहन दिया जाएगा
ईमानदार सुर्त होते हैं, बेईमान चुस्त होते हैं। 
वेतन किसी को नहीं मिलेगा
रिश्वत लीजिए
सेवा कीजिए !

कीलर कांडने रौशन किया था
इंगलैंड का नाम
करने को ऐसे ही शुभ काम-
खूबसूरत अफसर और अफसराओं को छाँटा जाएगा
अश्लील साहित्य मुफ्त बाँटा जाएगा। 

पढ़-लिखकर लड़के सीखते हैं छल-छंद
डालते हैं डाका
इसलिए तमाम स्कूल-कालेज 
बंद कर दिए जाएँगे काका
उन बिल्डिगों में दी जाएगी हिप्पीवादकी तालीम 
उत्पादन कर से मुक्त होंगे
भंग-चरस-शराब-गंजा-अफीम
जिस कवि की कविताएँ कोई नहीं समझ सकेगा
उसे पाँच लाख का अज्ञानपीठ-पुरस्कार मिलेगा। 
न कोई किसी का दुश्मन होगा न मित्र
नोटों पर चमकेगा उल्लू का चित्र !

नष्ट कर देंगे-
धड़ेबंदी गुटबंदी, ईर्ष्यावाद, निंदावाद। 
मूर्खिस्तान जिंदाबाद !
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नीतीश कुमार-मोदी प्रसंग में-

पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय ।
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ॥
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नरेन्द्र मोदी पर कबीर ये पंक्तियां पढ़ें-

जहाँ आप तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
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मोदीपंथी मीडिया पर-

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥कबीर।।
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