शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

जय श्री राम और खोखले हम


       जय श्री राम, जै माई जी की, राधे राधे, जय श्री कृष्ण , राजाधिराज की जय आदि सम्बोधन सूचक नारे हैं।ये खोखले नारे हैं।ये जिन प्रतीकों-मिथों से जुड़े हैं उनमें सामाजिक सक्रियता पैदा करने की क्षमता नहीं है।

आधुनिककाल और आधुनिक समाज में जब इन नारों के जरिए नमस्कार-प्रणाम करते हैं तो अवचेतन में बैठे धार्मिक मन को अभिव्यक्त करते हैं।इससे यह भी पता चलता है आप आधुनिक नहीं बने हैं।

आधुनिक बनने के लिए आधुनिक सम्बोधनों का इस्तेमाल करना चाहिए,उससे आधुनिक संवेदनशीलता और अनुभूति के निर्माण में मदद मिलती है।

मसलन्, जब हलो कहते हैं तो आधुनिक मन को व्यक्त करते हैं लेकिन ज्योंही फोन पर राधे राधे कहकर सम्बोधित करते हैं तो धार्मिक चेतना को व्यक्त करते हैं।

जय श्री राम का नारा कोई क्रांतिकारी नारा नहीं है, कोई ऐसा नारा नहीं है जिसके कारण देश प्रगति की दिशा में छलांग लगाकर चला गया हो,बमबटुकों को यहनारा पसंद है।

बुनियादी तौर पर यह अर्थहीन नारा है, खोखला नारा है।इसमें कुछ करने की क्षमता का अभाव है। यह परजीवी समाज का नारा है।इसका न तो लोकतंत्र से संबंध है और न विकास से संबंध है, और न इसका रामाश्रयी धार्मिक परंपरा से संबंध है।यह बाबरी मसजिद विध्वंस के दौर में चर्चित हुआ नारा है। इसका ऐतिहासिकता,धर्म,परंपरा और भाईचारे से तीन -तेरह का रिश्ता है।



यह नारा जितनी बार लगा है उसने नागरिक की अस्मिता को क्षतिग्स्त किया है और व्यक्ति की बजाय धर्म की पहचान को उभारा है।इस परिप्रेक्ष्य में यह प्रतिगामिता और कुंठा की अभिव्यक्ति है।

उठो और जागोःसंवैधानिक मान्यताएं खतरे में हैं

         बिहार के घटनाक्रम को मात्र भ्रष्टाचार का मामला न समझें।नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार कई स्तरों पर संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं को नष्ट करने का काम कर रही है।अफसोस की बात है आम लोगों को यह नजर ही नहीं आ रहा।हो सकता है लालू यादव के परिवार ने भ्रष्टाचार किया हो लेकिन उससे लड़ने और निबटने के लिए महागठबन्धन को तोड़ना तो गले नहीं उतरता।

महागठन्धन जब बना था तब भी बिहार और लालू के परिवार में भ्रष्टाचार था,लेकिन एक अंतर था,महागठबंधन का निर्माण साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए किया गया था।उसके उद्देश्यों में कहीं पर भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं है।लेकिन बिहार में चीजें जिस तरह संचालित की गयी हैं, न्यायपालिका की देश में जिस तरह खुली अवहेलना हो रही है, संसदीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर जिस तरह हंगामे किए जा रहे हैं,मीडिया को सत्य और विवेक की हत्या के लिए जिस तरह नग्नतम रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है वह अपने आपमें विरल घटना है।

बिहार में जदयू का महागठबंधन से निकलकर भाजपा के साथ सरकार बनाना ,कोई साधारण घटना नहीं है।यह घटना संकेत है कि संसदीय लोकतंत्र और जनादेश की हमारे नेताओं में कोई इज्जत नहीं है। उल्लेखनीय है इस तरह की घटनाएं पहले भी हुई हैं लेकिन बिहार हर मामले में अजूबा है,इसबार समूचे जनादेश को ही पलट दिया गया । बिना दल-बदल के समूचे जदयू का स्वैच्छिक भाव से राजनीतिक मन परिवर्तन करके रख दिया गया है। मात्र कुछ एफआईआर के बहाने, कुछ छापों के बहाने यह सब हुआ है।इसका अर्थ यह भी है कि मोदी से लेकर नीतीश कुमार तक किसी के मन में जनादेश को लेकर कोई वचनवद्धता नहीं है।

असल में मोदीजी ने समूची राजनीति में पैसे और सत्ता की भूमिका को महानतम बना दिया है।इस भूमिका को आमलोगों के जेहन में उतारने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है। मोदी फिनोमिना की सबसे बड़ी विशेषता है कि अब भाजपा कहीं पर आंदोलन नहीं करती, सिर्फ मीडिया हमले करवाती है, संगठित प्रचार अभियान चलाती है और उसके बाद लक्ष्य को निशाना बनाकर गिरा देती है।भाजपा की समूची रणनीति यह है कि हर हालत में भाजपा और मोदी का वैचारिक-प्रशासनिक वर्चस्व मानो।इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद और मीडिया के हठकंड़ों का खुलकर प्रयोग हो रहा है।

भाजपा-मोदी का वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक बात आम लोगों के जेहन में उतारी जा रही है कि ´मोदी सही और बाकी गलत´,मोदी की मानो,चैन से रहो।मोदी की मनवाने के लिए पहले प्यार से घूस देकर फुसलाया जाता है, बाद में मीडिया के कोड़े लगवाए जाते हैं,अंत में प्रशासनिक हमले होते हैं।मसलन्,यदि आप विपक्ष में हैं तो पहले भाजपा कोशिश करती है कि आप उसके साथ चले जाएं,यदि साथ नहीं जाते तो दल-बदल कराया जाता है, दल-बदल से भी मामला न संभले तो मीडिया हमले कराकर बदनाम किया जाता है, तब भी न संभले तो सीबीआई-आईडी आदि के छापे और मीडिया से अहर्निश बदनामी करके हर एक्शन को देशहित, ईमानदारी की रक्षा में,जनता की सेवा में समर्पित कर दिया जाता है।इस समूची प्रक्रिया में सत्य क्या यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता ,सिर्फ मीडिया में जो बताया गया है वह महत्वपूर्ण रह जाता है।मीडिया के जरिए दिमागों की इस तरह की नाकेबंदी ने हमारे सोचने-समझने और स्वतंत्र रुप से फैसले लेने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दी है।अब हम मीडिया में जो कहा जा रहा है उसे सत्य, न्याय, जनहित आदि के पैमानों पर नहीं परखते अपितु हमारी आदत हो गयी है कि मीडिया में जो कहा जा रहा उसे आँखें बंद करके मानने लगे हैं।

मोदी की मीडिया रणनीति की धुरी है ´घृणा´,कल तक हम मुसलमानों से नफरत कर रहे थे, विभिन्न किस्म के प्रचार अभियानों के जरिए इसे जेहन में उतारा गया,बाद में लवजेहाद के जरिए,कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ,घृणा के तत्व के आधार पर कांग्रेस विरोधी प्रचार संगठित किया गया, घृणा के आधार पर पाकविरोधी, आतंकविरोधी प्रचार चलाया गया और अब घृणा के आधार पर ही तेजस्वी यादव और उनके परिवारीजनों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया गया। घृणा के आधार पर मोदी विरोधियों पर हमले किए जा रहे हैं।´घृणा´के आवरण के रूप में भ्रष्टाचार विरोध का इस्तेमाल किया गया, लेकिन मूल चीज है ´घृणा´।कहने का आशय यह कि ´घृणा´के बिना मोदी से प्यार पैदा नहीं होता। मोदी के गुण क्या हैं, मोदी ने कौन सा अच्छा काम किया है, ये चीजें मोदी प्रेम का आधार नहीं हैं बल्कि ´घृणा´ही मोदी प्रेम का आधार है। इस ´घृणा´को हम हर मसले पर मीडिया प्रस्तुतियों में सक्रिय भूमिका अदा करते सहज ही देख सकते हैं। मसलन् , मीडिया वाले गऊ गुंडई से लेकर तेजस्वी प्रकरण तक इसे साफतौर पर देख सकते हैं।यानी ´घृणा´का इतने व्यापक मॉडल के रूप में भारत में प्रयोग विगत ढाई हजार सालों में कभी नहीं देखा गया।हमारे यहां ´घृणा´थी लेकिन नैतिक रूप में। एक वैचारिक अस्त्र के रूप में मोदी ने इसका आविष्कार करके देश को गहरे संकट में डाल दिया है।अब हम गलत में मजा लेने लगे हैं,गलत हमें अच्छा लगने लगा है।यह ´घृणा´के मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धि है।´घृणा´के मॉडल की विशेषता है सभी किस्म के तर्क और विवेक का अंत। मोदी के व्यक्तित्व के सामने आज हम इस कदर अभिभूत हैं कि किसी भी चीज को वास्तव रूप में देखना ही नहीं चाहते।वास्तव से नफरत करने लगे हैं।





मंगलवार, 25 जुलाई 2017

आरएसएस को जेएनयू पर गुस्सा क्यों आता है -



जेएनयू पर एकबार फिर से बमबटुकों के हमले शुरू हो गए हैं। फ़रवरी 2016 के बाद यह हमलों का दूसरा चरण है।जेएनयू वीसी ने आरएसएस के नेतृत्व के आदेश के बाद ही टैंक लगाने का प्रस्ताव रखा है।वीसी के बयान के बाद संघ के साइबर टट्टू सोशलमीडिया में अहर्निश दौड़ रहे हैं और जेएनयू को गरियाने में लगे हैं। हम कहना चाहते हैं कि जेएनयू सच में महान है वरना बार -बार संघ हमले न करता। जेएनयू महान वाम की वजह से नहीं है, बल्कि विवेकवादी उदार अकादमिक परंपरा के कारण महान है।
      संघ अपनी नई टैंक मुहिम के बहाने जेएनयू के बारे में  यह धारणा फैलाने की कोशिश कर रहा है कि जेएनयू को मानवताविरोधी और राष्ट्रविरोधी संस्थान के रूप में कलंकित किया जाय।पहले हम यह जान लें कि जेएनयू को ये लोग नापसंद क्यों करते हैं? देश में और भी विश्वविद्यालय हैं उनको बदनाम करने की कोई मुहिम नहीं चल रही, क्योंकि वे सब संघ और टैंक कल्चर के क़ब्ज़े में हैं ! 
    आरएसएस की जेएनयू के प्रति घृणा का प्रधान कारण है जेएनयू के शिक्षक-छात्र संबंध।जेएनयू में देश के अन्य विश्वविद्यालयों के जैसे शिक्षक -छात्र संबंध नहीं हैं। यहां अधिकांश शिक्षक अपने छात्रों को मित्रवर मानकर बातें करते हैं।ज़्यादातर शिक्षकों के अकादमिक आचरण में पितृसत्तात्मकता नजरिया नहीं है।यहां वे शिक्षक होते हैं गुरू नहीं।यह वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से जेएनयू अन्य विश्वविद्यालयों  से अलग है। 
   दूसरी बडी चीज है सवाल खड़े करने की कला , यह कला यहां के समूचे माहौल में है।यहां छात्र सवाल करते हैं साथ ही "खोज" के नजरिए को जीवन का लक्ष्य बनाते हैं।कक्षा से लेकर राजनीतिक मंचों तक कैंपस में सवाल करने की कला का साम्राज्य है , यह  दूसरा बडा कारण है जिसके कारण जेएनयू को आरएसएस नापसंद करता है।आरएसएस को ऐसे कैंपस चाहिए जहाँ छात्रों में सवाल उठाने की आदत न हो , खोज करने की मानसिकता न हो।उल्लेखनीय है जिन कैंपस में सवाल उठ रहे हैं वहीं पर संघ के बमबटुकों के साथ लोकतांत्रिक छात्रों और शिक्षकों  का संघर्ष हो रहा है। 
       आरएसएस ऐसे छात्र -शिक्षक पसंद करता है जो हमेशा "जी जी "करें और सवाल न करें !आरएसएस वाले अच्छी तरह जानते हैं कि जेएनयू के छात्र वामपंथी नहीं हैं। वे यह भी जानते हैं जेएनयू के अंदर संघ की शिक्षकों में एक ताकतवर लॉबी है।इसके बावजूद वे जेएनयू के बुनियादी लोकतांत्रिक चरित्र को बदल नहीं पा रहे हैं।यही वजह है  वे बार -बार हमले कर रहे हैं।इन हमलों के लिए नियोजित ढंग से मीडिया का दुरूपयोग कर रहे हैं।राष्ट्रवाद और हिंदुत्व तो बहाना है।असल में जेएनयू के लोकतांत्रिक ढाँचे और लोकतांत्रिक माहौल को नष्ट करना है। संघ को लोकतांत्रिक माहौल से नफरत है उसे कैंपस में अनुशासित माहौल चाहिए जिससे कैंपस को भोंपुओं और भोंदुओं का केन्द्र बनाया जा सके।
     जेएनयूछात्रसंघ और छात्रसंघ का संविधान तीसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज है जिसे आरएसएस नष्ट करना चाहता है। जेएनयू अकेला विश्वविद्यालय है जहाँ छात्रसंघ पूरी तरह स्वायत्त है ,छात्रसंघ के चुनाव स्वयं छात्र संचालित करते हैं,छात्रसंघ के चुनाव में पैसे की ताकत की बजाय विचारों की ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। छात्रों को अपने पदाधिकारियों को वापस बुलाने का अधिकार है।छात्रसंघ किसी नेता की मनमानी के आधार पर काम नहीं करता बल्कि सामूहिक फैसले लेकर काम करता है।छात्रसंघ की नियमित बैठकें होती हैं और उन बैठकों के फैसले पर्चे के माध्यम से छात्रों को सम्प्रेषित किए जाते हैं। छात्रसंघ के सभी फैसले सभी छात्र मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। विवादास्पद मसलों पर छात्रों की आमसभा में बहुमत के आधार पर बहस के बाद फैसले लिए जाते हैं।ये सारी चीजें छात्रों ने बडे संघर्ष के बाद हासिल की हैं इनके निर्माण में वाम छात्र संगठनों की अग्रणी भूमिका रही है।जाहिरातौर पर आरएसएस और बमबटुकों को इस तरह के जागृत छात्रसंघ से परेशानी है और यही वजह है बार बार छात्रसंघ पर हमले हो रहे हैं। इसके विपरीत आरएसएस संचालित छात्रसंघों को देखें और उनकी गतिविधियों को देखें तो अंतर साफ समझ में आ जाएगा।
        जेएनयू में टैंक कल्चर के प्रतिवाद की परंपरा रही है। टैंक कल्चर वस्तुत: युद्ध की संस्कृति को अभिव्यंजित करती है। जेएनयू के छात्रों का युद्धके प्रतिवाद का शानदार इतिहास रहा है।इस्रायल के हमलावर रूख के खिलाफ प्रतिवाद से लेकर वियतनाम युद्ध के प्रतिवाद तक, अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिवाद से लेकर तियेनमैन स्क्वेयर पर चीनी टैंक दमन के प्रतिवाद तक छात्रों के सामूहिक प्रतिवाद की जेएनयूछात्रसंघ की परंपरा रही है।जेएनयू के छात्रों को मानवतावादी नजरिए से सोचने-समझने और काम करने की प्रेरणा वहाँ के पाठ्यक्रम से मिलती रही है जिसे आरएसएस पसंद नहीं करता।

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

नए राष्ट्रपति का उदय और संघ की नई रणनीति-

         रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के साथ ही आरएसएस का देश के सर्वोच्च का शिखर पर पहुँचने का सपना पूरा हो गया।यह संघ का बाल स्वप्न था। इस सपने में अनेक अंतर्विरोधी चीजें शामिल हैं। इनको सिलसिलेबार ढ़ंग से समझें। पहली बात यह कि कोविंद का राष्ट्रपति बनना ,दलित वोटबैंक राजनीति में कोई मदद नहीं करेगा।क्योंकि इस पदपर दलित को बिठाकर कांग्रेस को कोई दलित वोट नहीं मिला।दूसरी बात यह कि कोविंद के राष्ट्रपति बनने के पहले से ही सुरक्षित सीटों पर भाजपा की बेहतर स्थिति रही है।इसलिए आरक्षित सीटों में 19-20 का अंतर ही आएगा।
एक अन्य भय पैदा किया जा रहा है कि भारत का संविधान अब सुरक्षित नहीं है। यह भय निराधार है। भारत में मौजूदा स्थिति में आरएसएस का लक्ष्य संविधान नहीं है बल्कि सत्ता है और सत्ता की विभिन्न संरचनाओं को वे अपने अनुसार चलाने की कोशिश करेंगे। संविधान परिवर्तन करना इनके बूते के बाहर है और यह फिलहाल लक्ष्य नहीं है।
आरएसएस की मौजूदा मुहिम को दक्षिणपंथी क्रांति कहना समीचीन होगा।यह ऐसी क्रांति है जिसके बनियान और अंडरबियर आरएसएस के हैं और ऊपरी सभी कपड़े कांग्रेसी हैं। मोदी सरकार पूरी निष्ठा के साथ नव्य आर्थिक नीतियों को लागू कर रही है।इससे यह भ्रम नहीं रखना चाहिए कि संघ के लोग देशी नीति को लागू करने में विश्वास करते हैं।आरएसएस ने अपने स्वदेशी जागरण मंच के जरिए जितनी भी घोषणाएं की थीं उन सबको मोदी सरकार के जरिए कब्रिस्तान पहुँचा दिया है।
कोविंद के सत्तारूढ़ होने से आरएसएस की धर्मनिरपेक्षताविरोधी इमेज को कुछ हद तक साफ करने में मदद जरूर मिलेगी। आरएसएस के लोग केन्द्र की सत्ता में लंबी पारी खेलने के मूड में हैं। लेकिन मोदीजी के निजी रूख और नजरिए ने आरएसएस की लंबी पारी खेलने की आशाओं पर वैसे ही पानी फेर दिया है जैसे मनमोहन सिंह ने गांधी परिवार के सत्तारूढ़ होने के सपनों पर पानी फेरा था।
कोविंद-नायडू-सुमित्रा महाजन ये तीनों उस इलाके से आते हैं जहां आरएसएस कमजोर है।मोदीजी ने चालाकी के साथ मजबूत इलाकों के नेताओं को संवैधानिक पदों पर नहीं आने दिया है।इससे आरएसएस की लंबी पारी खेलने की संभावनाएं धूमिल हो गयी हैं।
दूसरी एक बात और वह यह कि समाज और मीडिया में हिंदू राष्ट्रवाद के प्रधान एजेंडा बन जाने के बाद विकास का एजेंडा गायब हो गया है।जबकि 2014 का चुनाव विकास के मुद्दे पर लड़ा गया था,लेकिन 2019 में विकास नहीं हिंदू राष्ट्रवाद प्रधान मसला होगा और वैसी स्थिति में 2019 में मोदीजी की वापसी संभव नहीं है। मोदी के बाद सिर्फ दो विकल्प होंगे ,पहला देश फिर से उदारतावाद की ओर लौटे या मोदी से ज्यादा कट्टरपंथी को शासनारूढ़ करे।


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व्यापारीवर्ग बनाम नरेन्द्र मोदी के पंगे

नरेन्द्र मोदी को सत्ता पर बिठाने में देश के व्यापारियों और कारपोरेट घरानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।यह वर्ग विगत तीन सालों में मोदी सरकार की नीतियों के कारण किसी न किसी रुप में परेशान है,असंतुष्ट है और धीरे धीरे विभिन्न समूहों के तौर पर सड़कों पर प्रतिवाद के लिए निकल रहा है।मसलन्, विगत बजट के समय स्वर्ण व्यापारियों ने दो महिने तक आंदोलन किया, इधर विभिन्न स्तरों पर मांस के व्यापारी विरोध करते रहे हैं,नोटबंदी के कारण छोटे उद्योगों के मालिकों में गहरा असंतोष पैदा हुआ है।सबसे दिलचस्प है जीएसटी के विरोध में व्यापारियों का एक दिन का राष्ट्रीय बंद और उसके बाद कपड़ा व्यापारियों का सघन होता आंदोलन।ये सारी चीजें इस बात की ओर संकेत कर रही हैं कि मोदीजी को जो वर्ग सत्ता में लेकर आया उसी वर्ग के साथ अंतर्विरोध खुलकर सामने आ गए हैं।

दिलचस्प बात यह है व्यापारियों के जन- आंदोलन हो रहे हैं, विशाल रैलियां हो रही हैं,इस तरह की रैलियां हाल-फिलहाल के वर्षों में नजर नहीं आईं। मसलन् सूरत इन दिनों अशांत है।सूरत की अशांति को सामान्य रुटिन अशांति के रूप में न देखें। बल्कि उसे व्यापक फलक पर रखकर देखें कि किस तरह व्यापारियों के विभिन्न समूहों में मोदी सरकार के खिलाफ प्रतिवाद जन्म ले रहा है।वहीं दूसरी ओर मजदूरों-किसानों के आंदोलन भी हो रहे हैं। इन सबके कारण एक नए किस्म का प्रतिवादी राजनीतिक माहौल जन्म ले रहा है।



अनेक राजनीतिक विशेषज्ञ हैं जो यह मानकर चल रहे हैं कि मोदीजी 2019 में लौटकर फिर से सत्ता में आ रहे हैं। ये विशेषज्ञ भूल रहे हैं कि 2014 में मोदी के खिलाफ कोई असंतोष नहीं था बल्कि आशाएं जुड़ी हुई थीं।लेकिन 2019 तक मोदी के खिलाफ समाज के हर स्तर पर व्यापक असंतोष पैदा होगा,यह अनिवार्य है।कम से कम व्यापारियों के विभिन्न रूपों में हो रहे प्रतिवादों को गंभीरता से लेने की जरूरत है।व्यापारी समुदाय यदि बार बार प्रतिवाद कर रहा है तो यह तय है समाज में अशांति बहुत गहरे जा घुसी है,इस अशांति को मीडिया प्रबंधन के जरिए संभालना संभव नहीं है।इंतजार करें जमीन पक रही है।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदीजी कॉमनसेंस और भीड़ संस्कृति

        मोदीजी का व्यक्तित्व तो संघ में जैसा था वैसा ही आज भी है।वे पहले भी बुद्धिजीवी नहीं थे,बुद्धिजीवियों का सम्मान नहीं करते थे, औसत कार्यकर्ता के ढ़ंग से चीजें देखते थे,हिंदू राष्ट्रवाद में आस्था थी,विपक्ष को भुनगा समझते थे,हाशिए के लोगों के प्रति उनके मन में कभी सहानुभूति नहीं थी, सेठों-साहूकारों के प्रति सहानुभूति रखते थे,साथ ही उनके वैभव को देखकर ईर्ष्या भाव में जीते थे,ये सारी चीजें उनके व्यक्तित्व में आज भी हैं बल्कि पीएम बनने के बाद ये चीजें ज्यादा मुखर हुई हैं।लेकिन एक बड़ा परिवर्तन हुआ है,जब तक वे पीएम नहीं बने थे,मध्यवर्ग का बड़ा तबका उनसे दूर था, बुद्धिजीवी उनके विचारों के प्रभाव के बाहर थे,लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रचार ने उनके व्यक्तित्व और नजरिए की उपरोक्त खूबियों के प्रभाव में उन तमाम लोगों को लाकर खड़ा कर दिया जो पीएम होने पहले तक उनसे अप्रभावित थे।
मसलन्, विश्वविद्यालयों -कॉलेजों के शिक्षक और बुद्धिजीवी उनसे कल तक अप्रभावित थे,लेकिन आज उनसे गहरे प्रभावित हैं।आप दिल्ली के दो बड़े विश्वविद्यालयों जेएनयू और डीयू में इस असर को साफतौर पर देख सकते हैं।यही दशा देश के अन्य विश्वविद्यालयों की है।
सवाल यह है एक औसत किस्म के बौद्धिकता विरोधी नेता से बुद्धिजीवी समुदाय क्यों प्रभावित हो गया , इनको बुद्धिजीवी की बजाय भक्तबुद्धिजीवी कहना समीचीन होगा। वे कौन से कारण हैं जिनके कारण पीएम मोदी का यह वर्ग अंधभक्त बन गया। यह अंधभक्ति ज्ञान-विवेक के आधार पर नहीं जन्मी है,क्योंकि इससे तो मोदीजी के व्यक्ति्व का तीन-तेरह का संबंध है



मोदीजी का तर्क है कि देखो जनता क्या कह रही है, मीडिया क्या कह रहा है और मैं क्या कह रहा हूँ, हम तीनों मिलकर जो कह रहे हैं,वही सत्य है।यह मानसिकता और विचारधारा मूलतःअंधविश्वास की है।अंधविश्वासी इसी तरह के तर्क देते रहे हैं।

जरा इतिहास उठाकर देखें,सत्य कहां होता है ,सत्य क्या भीड़ में,नेता में या मीडिया में होता है या इनके बाहर होता है ?

वास्तविकता यह है सत्य इन तीनों के बाहर होता है,सत्य वह नहीं है जो झुंड बोल रहा है,सत्य वह भी नहीं है तो नेता बोल रहा है या मीडिया बोल रहा है,सत्य वह है जो इन तीनों के बाहर हमारी आंखों से,हमारे विवेक से ओझल है।

जरा उपरोक्त तर्कों के आधार पर परंपरा में जाकर देखें,मसलन्,राजा राममोहन राय के सतीप्रथा के विरोध को देखें,जिस समय उन्होंने सतीप्रथा का विरोध किया,बंगाल में अधिकांश लोग सतीप्रथा समर्थक थे,अधिकांश मीडिया भी सती प्रथा समर्थकों के साथ था,अधिकांश शिक्षितलोग भी उनके ही साथ थे। लेकिन सत्य राजा राममोहन राय के पास था,उनकी नजरों से देखने पर अंग्रेजों को भी वह सत्य नजर आया वरना वे भी सती प्रथा को बंद करना नहीं चाहते थे।

कहने का आशय यह है सत्य वह नहीं होता जो भीड़ कह रही है।कल्पना करो आर्यभट्ट ने सबसे पहले जब यह कहा कि पृथ्वी घूमती है और सूर्य की परिक्रमा लगाती है तो उस समय लोग क्या मानते थे, उस समय सभी लोग यही मानते सूर्य परिक्रमा करता है,सभी ज्योतिषी यही मानते थे,उन दिनों राजज्योतिषी थे वराहमिहिर उन्होंने आर्यभट की इस धारणा से कुपित होकर आर्यभट को कहीं नौकरी ही नहीं मिलने दी, तरह-तरह से परेशान किया। लेकिन आर्यभट ने सत्य बोलना बंद नहीं किया, आज आर्यभट्ट सही हैं,सारी दुनिया इस बात को मानने को मजबूर है।जान लें आज भी जो ज्योतिष पढाई जाती है उसमें आर्यभट्ट हाशिए पर हैं, वे न्ययूनतम पढाए जाते हैं लेकिन सत्य उनके ही पास था।

कहने का आशय यह कि हमें भीड़,नेता के कथन और मीडिया की राय से बाहर निकलकर सत्य जानने की कोशिश करनी चाहिए।सत्य आमतौर पर हमारी आंखों से ओझल होता है उसे परिश्रमपूर्वक हासिल करना होता है,उसके लिए कष्ट भी उठाना पड़ता है।बिना कष्ट उठाए सत्य नहीं दिखता।सत्य को कॉमनसेंस के साथ गड्जडमड्ड नहीं करना चाहिए।

मोदीजी ,उनका भोंपू मीडिया और उनके भक्त हम सबके बीच में कॉमनसेंस की बातों का अहर्निश प्रचार कर रहे हैं।

कॉमनसेंस को सत्य मानने की भूल नहीं करनी चाहिए।सत्य तो हमेशा कॉमनसेंस के बाहर होता है।जीएसटी का सत्य वह नहीं है जो बताया जा रहा है सत्य वह है जो आने वाला है, अदृश्य है ।भीड़चेतना सत्य नहीं है।

मोदीजी की विशेषता यह नहीं है कि वे पीएम हैं, वे पूंजीपतिवर्ग से जुड़े हैं,उनकी विशेषता यह है कि उनके जैसा अनपढ़ और संस्कृतिविहीन व्यक्ति अब बुर्जुआजी की पहचान है।
बुर्जुआ संस्कृति-राजनीति के आईने के रूप में जिन नेताओं को जानते थे,जिनसे बुर्जुआ गौरवान्वित महसूस करता था वे थे गांधी,आम्बेडकर, नेहरू-पटेल-श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि।वे बुर्जुआजी के बेहतरीन आदर्श थे, उनकी तुलना में मोदीजी कहीं नहीं ठहरते।
मोदी की विशेषता है उसने बुर्जुआजी को सबसे गंदा,पतनशील संस्कृति का प्रतिनिधि दिया।आज का बुर्जुआ नेहरू को नहीं मोदी को अपना प्रतिनिधि मानने को अभिशप्त है।यही मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।बुर्जुआ राजनीति का सबसे निकृष्टतम अंश है जिसकी नुमाइंदगी मोदीजी करते हैं,आज बुर्जुआ मजबूर है निकृष्टतम को अपना मुखौटा मानने के लिए, अपना प्रतिनिधि मानने के लिए।इस अर्थ में मोदीजी ने बुर्जुआ के स्वस्थ मूल्यों की पक्षधरता की सारी कलई खोलकर रख दी है।
आज का बुर्जुआ ,मोदी के बिना अपने भविष्य की कल्पना नहीं कर सकता।मोदी मानी संस्कृतिहीन नेता।यही वह बिंदु है जहां से मोदी की सफलता बुर्जुआवर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रही है।मोदी जी का नजरिया बुर्जुआजी के ह्रासशील चरित्र की अभिव्यंजना है।
एक अन्य पहलू है वह है मोदीजी का पूरी तरह जनविरोधी , मजदूरवर्ग और किसानवर्ग विरोधी चरित्र।उनके इस चरित्र के कारण नए भक्त बुद्धिजीवियों को मोदी बहुत ही अपील करते हैं। नया भक्त बुद्धिजीवी और नया मध्यवर्ग स्वभावतः मजदूर-किसान विरोधी है। नए भक्तबुद्धिजीवी का देश की अर्थव्यवस्था और वास्तव सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं से कोई लेना-देना नहीं है।यहां तक कि वे जिन वर्गों से आए हैं उन वर्गों के हितों की भी रक्षा नहीं करते।वे तो सिर्फ मोदी भक्ति में मगन हैं।यह मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि है।



शनिवार, 1 जुलाई 2017

ठंडे समाज की सिहरन


       तमाम ठंड़े दिमाग के लोग यही कह रहे हैं मोदीजी उपकार करेंगे!आरएसएस देश का मान-सम्मान ऊँचा करेगा।दुनिया में जहां पर भी आरएसएस जैसे संगठनों के लोग सत्ता में आए हैं सरकार ,समाज और देश का मस्तक गर्व से ऊँचा ही हुआ है ! इसलिए आरएसएस के प्रति शत्रुभाव रखने की जरूरत नहीं है ! दंगों में लोगों का मारे जाना, गऊ रक्षकों के हाथों निर्दोष लोगों की हत्या,कश्मीर में चल रहा उत्पीड़न असल में उत्पीड़न नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक काम है जिसे इस देश को हर हालत में और खुशी खुशी संपन्न करना चाहिए ! हमें ठंड़े रहकर चीजों को देखना चाहिए। ठंड़े रहकर ही समाधान खोजने चाहिए।हमें ठंड़े रहकर जीने की कला हिमालय से सीखनी चाहिए।कितना ठंड़ा है और कितना ऊँचा है ! कितना निर्जन है !ठंड़ा समाज,ठंड़ा दिमाग और निर्जन समाज और हिमालय जैसी शांति और ठंड़क ही है जो भारत को महान बनाती है ! उसके मान-सम्मान में इजाफा करती है।

ठंड़ा रहना,ठंड़ा सोचना और सिहरन में काँपते रहना यही है 21वीं सदी के भारत का सच।आप ठंड़े हैं तो सुरक्षित हैं ! ऐसे बनो कि कभी पिघलो मत।चाहे जितनी चिंताएं दिखाई दें,आदमी तकलीफों में डूब जाए लेकिन ठंड़े रहो! गुलफाम रहो!गुलाम रहो!

कल्पना करो बार-बार उन ऐतिहासिक क्षणों के बारे में मोदी सरकार क्यों याद दिला रही है ॽ उन नेताओं के नामों और कामों का स्मरण क्यों कर रही है जिनके जमाने में समाज गर्म था ॽउन क्षणों में मोदी सरकार क्यों मौजूद दिखना चाहती है जो समाज के गर्म क्षण थे।

सन् 1947 में जब देश आजाद हुआ तो समाज गर्म था,पटेल ने विभिन्न रियासतों का भारत में विलय कराया था तब भारत गर्म था।आम जनता के मन में आशा और उमंगों की हिलोरें उठ रही थीं ,समाज में गर्म हवाएं चल रही थी, हर आदमी बेचैन था।यानी आज के ठंड़े माहौल से पुराने वाले माहौल की विलोम के रूपमें ही तुलना संभव है।कांग्रेस सत्ता के शिखर पर थी संसद में छाई हुई थी,आरएसएस संसद के बाहर था, लेकिन कल कांग्रेस संसद के बाहर खड़ी थी, कल आरएसएस ने संसद को घेरा हुआ था,सन् 47 में वे मुखबिर थे,आज वे देश के संरक्षक हैं,पहले वे गांधी के परमशत्रु थे ,आज वे गांधी के परमभक्त हैं! सन् 47 में कम्युनिस्टों और क्रांतिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी लेकिन आज वे राजनीतिक प्रक्रिया के बाहर खड़े हैं। सन्47 के समाज में गर्म ऊर्जा थी,सन्2017 के समाज में सारी ऊर्जा ठंड़ी पड़ी है।गर्म समाज और ठंडे समाज में यही अंतर है।गर्म समाज ने सुई से लेकर परमाणु बम तक सब चीजों का निर्माण किया,ठंड़े समाज ने मात्र एप का निर्माण किया।विज्ञापनों का निर्माण किया।गर्म समाज के पास कुर्बानी का जज्बा था,ठंड़े समाज के पास आराम के साथ जीने,परजीवी की तरह रहने की आदत है।गर्म समाज सोचता था ,ठंड़ा समाज भोक्ता है।

ठंड़े समाज की स्प्रिट के साथ सन्47 की स्प्रिट की तुलना करना बेवकूफी है।आप चाहकर भी वह स्प्रिट पैदा नहीं कर सकते।सन्47 में सारा देश संसद में था,सारे मत-मतान्तर संसद में थे,लेकिन सन्17 में तो सिर्फ एक ही मत संसद में था,गैर-मोदी मत-मतान्तरों को खदेड़कर बाहर कर दिया गया।याद रखो ठंड़े समाज में हरकत नहीं होती।ठंडा शरीर हरकत नहीं करता।जो हरकत नहीं करता वह समाज का निर्माण नहीं करता।हिमालय से भारत नहीं, भारत बनता है हिमालय को तोड़कर ! हिमालय प्रगति का प्रतीक नहीं है बल्कि हिमालय को बदलना ही प्रगति है।अफसोस की बात है हम ठंड़े होते जा रहे हैं!हिमालय होते जा रहे हैं!हिमालय बनने या ठंड़े समाज बनने का अर्थ है सभ्यता को,समाज को,दिमाग को प्रकृति को गिरवी रखना,तय करो किस ओर हो हिमालय की ओर या मनुष्यता की ओर ! मनुष्यता की सारी उपलब्धियां वे हैं जो उसने हिमालय को तोड़कर हासिल की हैं,लेकिन ठंड़े समाज का अंग बनकर आप उपलब्धियां हासिल नहीं कर सकते लेकिन हिटलर हासिल कर सकते हैं !





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