रविवार, 24 जुलाई 2016

नामवरजी के आने-जाने की विचारधारा और भोले भक्त

        नामवरजी का आना-जाना कोई सीधा -सरल मामला नहीं है।वह कोई विचारधाराहीन काम नहीं है।वे असाधारण लेखक हैं।वे कहीं जब बुलाए जाते हैं तो इसलिए नहीं बुलाए जाते कि बहुत सरल सीधे, विचारधाराहीन इंसान हैं ! भक्तों का तर्क है वे सबके हैं और सब उनके हैं ! यदि मामला इतना सा ही होता तो नामवरजी को न तो कोई बुलाता और न कोई उनका 90वां जन्मदिन ही मनाता।वे बड़े कद के लेखक-शिक्षक-बुद्धिजीवी हैं। उनकी समाज में व्यापक भूमिका है। वे साधारण लेखक रहे होते तब भी संभवतः हमें कोई आपत्ति न होती। जाने-अनजाने नामवरजी के बारे में जितने तर्क उनकी हिमायत में दिए जा रहे हैं वे अंततःनामवरजी को विचारधाराहीन,दृष्टिहीन मनुष्य के रूप में पेश कर रहे हैं।लेकिन नामवरजी विचारधाराहीन मनुष्य नहीं हैं।वे बेहतरीन इंसान हैं।मैं निजी तौर पर उनका प्रशंसक -आलोचक हूँ,उनके गलती करने पर हर समय टोका है,लेकिन संवाद नहीं छोड़ा।बहिष्कार नहीं किया।

नामवरजी का मोदीप्रेम हाल की घटना नहीं है यह मोदीजी के लोकसभा चुनाव के समय ही सामने आ गया था,उस समय भी हमने फेसबुक पर उनके टीवी पर दिए गए बयान की आलोचना की थी। सवाल यह है क्या मौजूदा मोदीशासन सामान्य रूटिन लोकतांत्रिक सरकार का शासन है ॽक्या मोदी निजी तौर पर सामान्य बुर्जुआनेता हैं ॽ क्या अटल-आडवाणी की तरह के संघी नेता हैं ॽ यदि हमारे मित्र ऐसा सोच रहे हैं तो बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं।

देश में पहलीबार ऐसा हुआ है कि एक ऐसा व्यक्ति शासन पर आ बैठा है जिसने अपने राजनीतिक कर्म से लोकतंत्र को बहुत गहरे जाकर क्षत-विक्षत किया है।गुजरात के दंगे साधारण घटना नहीं है। संविधान पर नियमित सोची समझी साजिश के तहत पहले उन्होंने गुजरात में निरंतर हमले किए,यहां तक कि न्यायपालिका को पंगु बना दिया,यही वजह थी कि सुप्रीमकोर्ट को उन दंगों के मुकदमों की सुनवाई की व्यवस्था गुजरात के बाहर करनी पड़ी।यह भारत के इतिहास की असाधारण घटना है।125से ज्यादा लोग दंगों के लिए सजा पा चुके हैं,यहां तक कि मोदीमंत्रीमंडल की एक सदस्या भी सजा भोग रही है।यह सब देखने जानने के बावजूद यदि नामवरजी जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति मोदी की गोदी में जा रहा है तो सवाल तो खड़े होंगे !

कुछ लोग कह रहे हैं इंदिरा गांधी कला संग्रहालय राष्ट्रीय संस्थान है,वह संघ का नहीं है,अतः वहां जाने में कोई हर्ज नहीं। इस तरह के तर्क नामवरजी जैसे व्यक्ति को टुईंया लेखक बना देते हैं, उनके जाने-आने को अर्थहीन सामान्य घटनामात्र बना देते हैं।हम जानते हैं नामवरजी बहुत उदार हैं,भले हैं,जो बुलाता है उसके यहां चले जाते हैं।लेकिन क्या मोदी सरकार आने के बाद बुद्धिजीवियों के लिए स्थितियां सामान्य रह गयी हैं ॽ



आज बुद्धिजीवियों के बीच में अघोषित मोदीआतंक फैला हुआ है।केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में स्थिति सबसे बदतर है।स्वयं जेएनयू में भी हालात असामान्य हैं।जेएनयू के आरएसएस से जुड़े शिक्षकों ने जांच रिपोर्ट के नाम पर छात्रसंघ के ऊपर सीधे हमला बोला है,अनेक छात्रनेताओं के खिलाफ कार्रवाई हुई है,नामवरजी चुप रहे।पहलीबार ऐसा हुआ है कि आरएसएस के शिक्षकों ने जेएनयू की छात्राओं को कलं कित, अपमानित करने वाली रिपोर्ट जारी करके सभी छात्राओं के चरित्र पर सवाल खड़े किए हैं,उनको अपमानित किया है।जेएनयू में संघी वीसी ने सभी फैसलेकुन कमेटियों को पंगु कर दिया है।इस तरह की घटनाएं तो आपातकाल में भी नहीं हुई थीं।जेएनयू की एकेडमिक कौंसिल का एजेण्डा वीसी नहीं मानव संसाधनमंत्री तय कर रहा है। यही हाल दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य केन्द्रीय विश्वविद्यालयों का है वहां पर मानव संसाधन मंत्री से स्वीकृति लिए बिना एकेडमिक कौंसिल का एजेण्डा वीसी तय नहीं कर सकता।कम से कम आपातकाल में भी यह स्थिति नहीं थी कि एकेडमिक कौंसिल का एजेंडा मंत्री तय करे! नामवरजी भोले नहीं हैं और अज्ञानी नहीं हैं जो यह न जानते हों! विगत सभी सरकारों के साथ मोदी सरकार के अंतर को सिर्फ इसी एकमात्र उदाहरण से समझा जा सकता है।

मोदी की गोदी में नामवर !

       नामवरजी के व्यक्तित्व से प्रभावित छात्र,शिक्षक और लेखकों का बड़ा समूह है। दिलचस्प बात है कि नामवरजी के गैर-साहित्यिक व्यक्तित्व और कारनामों को लेकर बहुत कम लोग जानते हैं।खासकर उनके जेएनयू में काम करने के दौरान किए गए अकादमिक फैसलों की जिनको पहचान है वे बेहतर ढ़ंग से जानते हैं कि जेएनयू में प्रोफेसर के रूप में काम करते हुए नामवरजी ने कभी भी छात्रों के हितों से जुड़े सवालों पर (मेरे सात साल के जेएनयू छात्रजीवन के दौरान) कभी कोई स्टैंड नहीं लिया, उलटे वे हमेशा जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के खिलाफ खड़े नजर आए।
       नामवरजी की रीतिकालीन मनोदशा का आदर्श नमूना है जेएनयू ।मैं उन दिनों छात्र राजनीति में सक्रिय था।मैं वहां पढ़ता था। नामवरजी खुलकर कभी छात्रों के पक्ष में न तो एकेडमिक कौंसिल में बोले और न बोर्ड़ ऑफ स्टैडीज में बोले, उलटे छात्रों को विक्टिमाइज करने में अपने विभाग में अग्रणी भूमिका निभाते रहे ।ये बातें इसलिए जानना जरूरी है क्योंकि नए सिरे से नामवरजी पर रीतिकाव्य लिखा जा रहा है।मुश्किल यह है कि जो लोग देश में खुलकर वाम के नाम से जाने जाते हैं और जेएनयू में प्रोफेसर हुआ करते थे उनमें से अधिकांश की जेएनयू प्रशासन के साथ और छात्रों के विरोध में सक्रिय भूमिका हुआ करती थी।कुछ ही शिक्षक थे जो आमतौर पर छात्रों के पक्ष में जेएनयू प्रशासन के खिलाफ बोलते थे,जो छात्रों के पक्ष में बोलते थे उनमें प्रोफेसर प्रभात पटनायक, उत्सापटनायक,हरवंश मुखिया, जी.पी.देशपांडे, प्रो.विमलकुमार,परिमल कुमार,जीएस भल्ला के नाम प्रमुख हैं।इन चंद शिक्षकों के अलावा कुछ नामी शिक्षक ऐसे भी थे जो छात्रहित के सवालों पर खुलकर स्टैंड लेते थे,अकादमिक जगत में उनका कद बहुत ऊँचा हुआ करता था।बाकी सभी प्रोफेसरों का हाल यह था कि वे खुलकर जेएनयू प्रशासन के अ-लोकतांत्रिक,छात्र विरोधी फैसलों के साथ आँख बंद करके खड़े रहते थे।

नामवरजी के जेएनयू संबंधी कार्य-व्यापार की हर हालत में मीमांसा करने की जरूरत है,क्योंकि उनकी भक्तमंडली बड़ी व्यापक है और नामवरजी अपने जेएनयू कारनामों के लिए झूठ बोलते रहे हैं।यह चीजें नए सिरे से उठाने की इच्छा इसलिए हुई है कि नामवरजी सारे एथिक्स तोड़कर आरएसएस के साथ इन दिनों खुलकर गलबहियां डाले घूम रहे हैं।नामवरजी रीतिकालीन अवगुणों के अलावा अनेक गुण भी हैं।लेकिन उनके गुणों की क्षमता अब चुक गयी है जिसके कारण वे इन दिनों खुलकर देश के सबसे बदनाम शासक नरेन्द्र मोदी के साथ खुलकर खड़े हैं।नामवरसिंह के नरेन्द्र मोदी के साथ चल रहे इस रीतिकालीन भावबोध की खुलकर आलोचना होनी चाहिए,साथ ही इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि एक प्रोफेसर-लेखक-बुद्धिजीवी के कर्म और लेखन में साम्य और वैषम्य के समाज पर किस तरह के प्रभाव पड़ने की संभावनाएं होती हैं।


शनिवार, 23 जुलाई 2016

´तन्मयता´में मथुरा मिलेगा

         लोग पूछते हैं आपने क्या सीखा ,किससे सीखा,कैसे सीखा ॽ उनके लिए मेरे पास कोई जबाव नहीं होता।क्योंकि मैं बड़ा हुआ सामान्य किस्म के लोगों के बीच में।सारी जिन्दगी सामान्य़ किस्म के लोगों में गुजारी,जो कुछ भी सीखा उनसे ही सीखा या फिर लेखकों की किताबों से सीखा।

मैं बहुत कम साहित्यकारों और प्रोफेसरों को जानता हूँ,उससे भी कम संख्या में लेखकों-प्रोफेसरों से निजी परिचय है।आमतौर पर लेखकों –प्रोफेसरों से दूर ही रहा हूँ। यह मेरी सबसे बड़ी कमी कह सकते हैं। हमारे अनेक मित्र साहित्यकार हैं और साहित्यकारों में उनका सम्मानजनक स्थान है।मैंने कभी अपने को न तो साहित्यकार के रूप में महसूस किया और न साहित्यकारों की तरह लिखा,जितनी किताबें लिखीं वे सब पाठक के नाते लिखीं।मैं कईबार इस बात को व्यक्त कर चुका हूँ मुझे नागरिकबोध में जीने में मजा आता है।साहित्यकार,आलोचक,प्रोफेसर या किसी विषय के विशेषज्ञ के रूप में मेरी कभी कोई तैयारी नहीं रही।

मथुरा की निजी चेतना का मूलाधार है ´तन्मयता´,यह मैंने मथुरा से सीखा। मैं जो भी काम करता हूँ,´तन्मयता´और ´एकाग्रता´ के भाव से करता हूँ।यह मथुरा की संस्कृति का सबसे बेहतरीन तत्व है। यह ऐसा तत्व है जो व्यक्ति को भौतिक संसार की ओर ले जाता है। इस तत्व में बांधकर रखने की क्षमता है, दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है ´दिल जीतना´,मथुरा की माटी में ´दिल जीतने´की कला रमी-बसी है।रासलीला ने कई बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया था।तीसरा महत्वपूर्ण तत्व है ´वर्गीकरण´करके न देखना,मथुरा के लोग सभ्यता के प्रचलित सामाजिक वर्गीकरणों में न तो सोचते हैं और न बोलते हैं।जो व्यक्ति ´वर्गीकरण´की केटेगरी में बोलता है उसे औचक भाव से देखते हैं।वहां सामान्य शिक्षित समुदाय में भी वर्गीकरण बहुत कम इस्तेमाल नहीं होते हैं।



मथुरा इसलिए अच्छा लगता है कि वहां के मित्रों ने राजनीति सिखाई,संस्कृत साहित्य की विरासत से जुड़ा,मार्क्सवाद वहीं मिला,तंत्र-मंत्र और ज्यौतिषशास्त्र भी वहीं मिला,इससे भी बड़ी बात यह कि वहां के लोगों से बेइन्तहा प्यार मिला,निःस्वार्थ मित्रता की शिक्षा मिली। यह ज्ञान मिला कि जो दूर है उसे पास लाओ, मित्र बनाओ।स्मृति,कष्ट और प्रतिबद्धता को भूलो मत।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

आदिविद्रोही से क्या सीखा-


  सवाल यह है  ´आदिविद्रोही´ से मैंने क्या सीखा ॽ ´आदिविद्रोही´तो गुलाम स्पार्टकस की जीवनकथा है। हावर्ड फ़ास्ट ने लिखा  ´मैंने यह कहानी इसलिए लिखी कि मेरे बच्चे और दूसरों के,जो भी इसे पढ़ें,हमारे अपने उद्विग्न भविष्य के लिए इससे ताकत पायें और अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ें,ताकि स्पार्टकस का सपना हमारे समय में साकार हो सके।´इस किताब का हिन्दी अमृतराय ने किया है।

     फ़ास्ट के लेखन की विशेषता है उत्पीड़ितों के साथ सक्रिय संवेदनात्मक लगाव।अमृत राय ने लिखा हावर्ड फ़ास्ट के पास तीक्ष्ण ऐतिहासिक दृष्टि है । उसके लिए ´इतिहास वह जो अपना स्रोत कोटि-कोटि साधारण –जनों की क्रिया-शक्ति में पाता है,जिसकी दृष्टि राजा से अधिक प्रजा पर होती है और जो उन सामाजिक शक्तियों को समझने का प्रयत्न करता है ,जिनके अन्तस्संघर्ष से जीवन में प्रगति होती है। ´

मथुरा का आदिविद्रोही मार्ग

       अजीब बात है मथुरा जैसे धार्मिक शहर में हम मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग से आने वाले युवाओं के पास उस समय मंदिर,पंडे,पुजारी,जनसंघ,कांग्रेस,बगीची,अखाड़े,यमुना नदी का किनारा और घाट के किस्से हुआ करते थे। अचानक 1974 का बिहार आंदोलन शुरू हुआ,मैं निजी तौर पर राजनीति नहीं जानता था लेकिन बाबू जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित था, समाजवाद के विचार से उस समय तक मेरा कोई परिचय नहीं था।

मुझे सबसे पहले समाजवादी सोवियत संघ का साहित्य पढ़ने को अपने संस्कृत कॉलेज माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ने को मिला और यह साहित्य पढ़ने को दिया मथुरानाथ चतुर्वेदी ने,जो उस समय मथुरा जनसंघ के अध्यक्ष थे, बाद में नगरपालिका अध्यक्ष भी रहे,आरएसएस के मथुरा में सबसे बड़े समय नेता हुआ करते थे।मेरे कॉलेज में सोवियत साहित्य और पत्रिकाएं मुफ्त में आती थीं,वे ही उनको संभालकर रखते थे,उनसे ही 1972-73 में सोवियत साहित्य पहलीबार पढ़ने को मिला,वे हमारे कॉलेज की लाइब्रेरी के भी इंचार्ज थे,अतः पुस्तकालय से आसानी से किताबें भी मिल जाया करती थी।वहीं से पहलीबार सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का लिखा महाभारत पढ़ा,जो बच्चों के लिए लिखा गया था। सोवियत भूमि,सोवियत नारी और संभवतः सोवियत दर्पण पत्रिका नियमित मथुरानाथजी ही देते थे।इस तरह अनजाने ही सही लेकिन समाजवादी साहित्य पहलीबार हमारे शिक्षक के हाथों मेरे पास पहुँचा।यह बेहद दिलचस्प बात है कि मथुरानाथजी ने कभी मुझे पांचजन्य पढ़ने को नहीं दिया,जबकि वह अखबार वे नियमित पढ़ते थे।यहीं से मुझे नियमित दैनिक अखबार पढ़ने की आदत पड़ी।सबसे दिलचस्प बात यह कि मेरे गुरूजी और ज्योतिष के शिक्षक संकटाप्रसाद उपाध्याय की राजनीतिक विषयों में गहरी दिलचस्पी थी, उनके बनारस के घर के आसपास के इलाके में उन दिनों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गहरा असर था,अतः उनके विचारों का झुकाव वाम की ओर था। मथुरानाथजी तो जनसंघ के नेता ही थे,लेकिन इन दोनों के राजनीतिक विचार नहीं मिलते थे,इन दोनों शिक्षकों से समय-समय पर राजनीतिक विषयों पर जमकर बातें होती थीं,इसके कारण मेरी राजनीतिक विषयों में दिलचस्पी पैदा हो गयी।



एक दिन अचानक वियतनाम के आजाद होने की खुशी में कोई एक कार्यक्रम शिवदत्त चतुर्वेदी ने भाकपा के कार्यालय पर आपातकाल में रखा और मुझे उसने पहल करके अपना मित्र बनाया और उस कार्यक्रम में बुलाया उसमें मेरी अनेक कॉमरेडों से पहलीबार मुलाकात हुई।यह मेरे जीवन का पहला सेमीनार,गोष्ठी भी था। इसमें का.सव्यसाची भी थे।वे उस समय माकपा के जिलामंत्री थे। इसी कार्यक्रम में चौधरी वीरेन्द्र सिंह से मुलाकात हुई जो एसएफआई के सचिव थे।आपातकाल में इतने कॉमरेडों का मिलना सुखद आश्चर्य था ,इस मुलाकात ने मेरी राजनीतिक शिक्षा की विधिवत शुरूआत की।सव्यसाची ने उस कार्यक्रम में बहुत अच्छा भाषण दिया,मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ,बाद में उनसे मिला, तो बोले कुछ किताबें जरूर पढो।मैंने पूछा क्या पढूँ,बोले हावर्ड फास्ट का ´आदिविद्रोही´ उपन्यास पढ़ो।संभवतःयह मेरे जीवन की पहली क्रांतिकारी किताब है जिसे मुझे सव्यसाची ने पढ़ने को दिया उसके बाद,हावर्ड फास्ट का ही ´समरगाथा´ उपन्यास दिया,इसके बाद ´सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास´ दिया,बाद में रोदेरिजो रोखास के लिखे चिली के फासिस्टों के अत्याचार की कहानी की किताब ´चिली के सरफरोश´दी। मैंने करीब से देखा कि सव्यसाची ने तकरीबन सभी युवाओं को ´आदिविद्रोही´ उपन्यास पढ़ने को दिया। हम जितने युवालोग सव्यसाची के साथ काम करते थे सभी ने ´आदिविद्रोही´ पढ़ा था, इसके अलावा गोर्की का ´माँ ´ उपन्यास भी पढ़ा था।संभवतः ´आदिविद्रोही´ ने हम सबको वैकल्पिक संस्कार दिए, प्रतिवाद की भाषा दी,जनता के साथ लगाव रखने और जनता से प्रेम करने का संस्कार दिया।

गुरुवार, 21 जुलाई 2016

ग्राम्य -बर्बरता और गाली


फेसबुक पर कुछ लोग गजब तर्क दे रहे हैं,कह रहे हैं गालियों को धर्म के साथ न जोड़ें,हम यही कहेंगे धर्म के साथ जाति,रोटी,बेटी,नौकरी,हैसियत सब जुडी है फिर गाली ने ऐसा खास क्या किया है कि धर्म से काटकर गालियों को देखा जाए !
गाली देने वाले किस धर्म को मानते और जानते हैं,इससे स्वभावतःधर्म के साथ गालियां भी जुड़ेंगी।इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब राजनीति में गालियों के बिना संप्रेषण संभव है तो गालियां क्यों दी गयीं ?
फेसबुक पर बिना गालियों के बातें कह सकते हैं तो मोदीभक्त गंदी-गंदी गालियां क्यों लिखते हैं ?निश्चित तौर पर उनके संघ प्रतिपादित हिन्दू धर्म में गालियां परिशिष्ट के रूप में सिखाई जाती हों !
इसके विपरीत पश्चिम बंगाल में सबसे पिछड़े इलाके में भी आम लोग अशिक्षित लोग गालियां देकर बातें नहीं करते।गालियां समाज में से कैसे जाएं इस पर हमने सोचा ही नहीं।
हिन्दी के पब्लिक कम्युनिकेशन में गालियां जिस पर तरह प्रचलन में हैं कम से कम बंगला में यह सब नहीं है।बंगाली कभी आपस में बातें करते हुए गालियां नहीं देते,कलकत्ते में बात करते लोग देखें वे आमतौर पर गालियां नहीं बोलते,फिर हिन्दी में ही गालियां क्यों हैं ?
मैं नहीं जानता सच्चाई क्या है लेकिन लगता है हिन्दीभाषी मोदीभक्त फेसबुक पर गालियां ज्यादा देते हैं,उसी तरह आरएसएस से जुड़े संगठनों के हिन्दीभाषी नेता भी सार्वजनिकतौर पर आए दिन गालियां देते रहते हैं।
जंगली बुद्धि में गालियां रहती हैं,बुद्धि का यह रूप कहीं पर भी हो सकता है,लेकिन वहां पर इसका विकास ज्यादा होता है जहां पर ग्राम्य-बर्बरता बची हुई है।हिन्दीभाषी क्षेत्र में ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ हमने कोई जंग नहीं लड़ी,इसके विपरीत रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का सबसे बड़ा योगदान था कि उन्होंने ग्राम्य-बर्बरता के खिलाफ जंग लड़ी और उसे ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी,हिन्दीभाषी क्षेत्र में ऐसा कुछ भी न हो सका।बंगाल गालियों से मुक्त हो गया,लेकिन हिन्दीभाषी मुक्त न हो सके।हिन्दीभाषी क्षेत्र में गाली वाला नायक है,बंगला में एकदम नापसंद किया जाता है,उससे लोग नफरत करते हैं।ममता के खिलाफ माकपा के कई नेताओं ने गंदी गालियों का प्रयोग किया था वे नेता और माकपा आज कूड़े के ढ़ेर पर पड़े हैं।


हिन्दू समाज शर्मनाक समाज


                हमारा हिन्दू समाज शर्मनाक समाज है जिसमें औरतों , दलितों और मुसलमानों को सरेआम शिक्षित लोग मीडिया से लेकर फेसबुक तक अपमानित करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं।इससे पता चलता है कि शिक्षितों के अंदर हमने किस तरह के असभ्य मनुष्य का निर्माण किया है।

हम कितने संस्कृतिहीन "हिन्दू "हैं कि जिन हाथों से दुर्गापूजा करते हैं उन्हीं हाथों से स्त्री को घर में आकर मारते हैं।जिस मुख से दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं उसी मुख से मादर ...बहिन ...बोलने में एक क्षण का विलम्ब नहीं करते। यहाँ तक कि औरतों को भी गालियों से अपमानित करते रहते हैं। औरतों को दी जाने वाली सबसे बर्बर गाली रंडी है जिसे विभिन्न भाषायी पदबंधों में सजाकर देते हैं। स्त्री के विभिन्न अंग -प्रत्यंगों को लेकर गालियाँ हिन्दुओं की संस्कृति और जनप्रिय भाषा का अभिन्न हिस्सा रही हैं,और आज भी हैं! इन सब पर संसद से लेकर सड़क तक कभी हल्ला नहीं सुना गया लेकिन आज मायावती ने संसद में दयाशंकर का मामला उठाकर शानदार काम किया है।उन्होंने कम से कम औरत के मान -सम्मान की रक्षा की है।ये वे हिन्दू हैं जो औरत को नागिन कहते हैं! डायन कहते हैं! हम उनके नजरिए पर कभी बात ही नहीं करते! हम फिर भी कहते हैं हिन्दूधर्म महान है! शर्म आनी चाहिए हिन्दू होने पर जिसमें औरत के नाम से सबसे घटिया भाषा का इस्तेमाल करते हुए हर पुलिस वाला और हर लठैत औरत के नाम पर आए दिन माँ- बहिन की करता रहता है।

औरत को कलंकित करना हिन्दू परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहा है। औरत को हिन्दुओं ने अंत में औरत नहीं रहने दिया बल्कि गाली में तब्दील करके रख दिया है। यह हिन्दूधर्म का सबसे बर्बर रूप है।हमने आज तक एक भी पुलिस वाले को माँ की गाली देने के लिए नौकरी से नहीं निकाला! हम महान हिन्दू हैं! हम गर्वित हैं हमारे यहाँ औरत अब एक गाली है! औरत को जिस हिन्दू के गाली बनाया होगा वह जरूर कोई तपस्वी रहा होगा!

वह अकेला संगठन नहीं है जिसकी ज़ुबान से बार- बार वेश्या या रंडी शब्द निकलता है। वे हर औरत में वेश्या के अलावा और कोई चीज़ नहीं देखते, इसे कहते हिन्दुत्ववादी दृष्टि ! वह उनके लिए पहले भी भोग्या थी,आज भी भोग्या है। यह वह दृष्टि है जो बार-बार विभिन्न व्यक्तियों के श्रीमुख से निकलती रहती है। जेएनयू को कलंकित करने के लिए संघ समर्थक शिक्षकों ने जेएनयू पर महान जाँच रिपोर्ट जारी की जिसमें जेएनयू की छात्राओं का नामकरण वही किया जो दयाशंकर कह रहे हैं, और वह राजस्थान का बदनाम विधायक याद करें, रवीश कुमार से लेकर बरखादत्त तक को किसी न किसी रूप में "रंडी" पदबंध से कलंकित किया गया।असल में यह संघ की प्रतिगामी विचारधारा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।इनके लिए औरत तो भ्रष्ट होती है।औरतों को कलंकित करने के लिए हिन्दू ग्रंथों में किस तरह की उपमाएँ प्रचलित हैं ज़रा उनको याद करें फिर संघ के नेताओं के स्त्री विरोधी बयानों की परीक्षा करें!

जिस समाज में औरत को रांड और रंडी कहने का चलन हो वह हिन्दू समाज गर्व की नहीं शर्म की चीज है।दूसरी बात यह मोदीजी ! गालियां जब इतनी ही बुरी हैं तो आपने दयाशंकर के खिलाफ एफआईआऱ दर्ज कराने का भाजपा को आदेश क्यों नहीं दिया ? दयाशंकर के बोलने के तत्काल बाद पहले ही एक्शन क्यों नहीं लिया ? कमाल है !आप भी दयाशंकर से डरते हैं !आपको भी एक्शन लेने के लिए मायावती के सहारे की जरूरत पड़ी!मायावती प्रतिवाद नहीं करतीं तो आप क्या दयाशंकर के खिलाफ एक्शन लेते ? हम जानते हैं आपको गालियां प्रिय हैं,हर हिन्दू को गालियां प्रिय हैं,वे उनको मंत्रों की तरह पवित्र मानते हैं।

संघी हिन्दुत्व के निशाने पर तीन समुदाय रहे हैं ,पहला, मुसलमान, दूसरा दलित,तीसरा औरत। इन तीनों समुदायों के खिलाफ हिन्दुत्ववादी संगठन लंबे समय से मुहिम चलाते रहे हैं। इस समय गो आंदोलन और कश्मीर जंग के नाम पर दलितों और मुसलमानों के खिलाफ संगठित हमले किए जा रहे हैं। यह बेहद गंभीर संकट की अवस्था है , देश में दलित और अल्पसंख्यक बटुक संघ के हमलों के शिकार बन रहे हैं।

आरएसएस का गऊ आंदोलन किस तरह गरीब विरोधी और दलित विरोधी है यह गुजरात में दलितों के प्रतिवाद आंदोलन ने एक्सपोज कर दिया है।यह आंदोलन सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे देश में फैलेगा,मोदी सरकार को तुरंत घोषणा करनी चाहिए कि आरएसएस के लोग गऊ के नाम पर आम जनता को सताना बंद करें। एक ओर गऊ को उद्योग की तरह हिन्दू इस्तेमाल कर रहे हैं और दूसरी ओर गरीबों पर हमले कर रहे हैं,असल में गऊरक्षा का सवाल भाजपाईयों की कमाई और बहुराष्ट्रीय मांस उद्योग के हितों की रक्षा से जुड़ा है,यह दलित,गरीब और विकास विरोधी है।



असल में , मोदीजी के विकास का डीजल खत्म हो गया है,अब भाजपा राष्ट्रवाद के नाम पर देश में मुहिम चलाएगी। चरित्र हनन की मुहिम चलाएगी।राष्ट्रवाद के आने का अर्थ है विकास का अंत और तनावों के सिलसिले की शुरूआत।सावधान मित्रो,राष्ट्रवाद देश के लिए जहर है,प्रेमचन्द और रवीन्द्रनाथ टैगोर तक ने राष्ट्रवाद को देश के लिए नुकसानदेह माना था लेकिन मोदीजी,भाजपा और आरएसएस अब उसी विनाशकारी प्रचार के लिए निकलने की तैयार कर रहे हैं,हम सबकी जिम्मेदारी है कि राष्ट्रवाद की आड़ में आ रहे इस फासीवादी प्रचार अभियान को बेनकाब करें।

राजनाथ सिंह की वाचिक हिंसा

      कल संसद में गुजरात में दलितों के प्रतिवाद के विरोध में गृहमंत्री राजनाथ सिंह का भाषण सुनकर लगा कि हमारे देश में इस तरह का संवेदनहीन गृहमंत्री होगा यह तो कभी सोचा ही नहीं था,सत्ता में रहने का तकाजा है कि मोदी एंड कंपनी के लोग विनम्रता से सामाजिक जीवन में घट रही गलतियों को बिना हील-हुज्जत के मानें और विनम्रता के साथ कार्रवाई का आश्वासन दें ,लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे ,उलटे दलितों पर हो रहे हमलों की प्रच्छन्नतः हिमायत कर रहे हैं, राजनाथ कह रहे थे कि पहले भी अत्याचार हुए हैं आंकड़े देखो,गुजरात में कम हो रहे हैं।शर्म आनी चाहिए इस तरह के वाक्य मुंह से कैसे निकलते हैं !

वर्तमान के अपराधों को वैध ठहराने के लिए हर शैतान अतीत का सहारा लेता है,आरएसएस का यही पैंतरा है।चूँकि पहले यह हुआ था इसलिए आज यह हो रहा है।यह आपराधिक भाषा है राजनाथ सिंह ! दूसरी बात यह आँकड़े बिकिनी की तरह होते हैं,वे अपने आप नहीं बोलते,उनको जैसे बोलने को कहोगे वे वैसा ही बोलेंगे।

राजनाथ सिंह जी! यथार्थ देखो खुलेआम आरएसएस के लोग विभिन्न क्षेत्रों में दलितों और औरतों को निशाना बनाते रहे हैं।

राजनाथजी! सच ताक़तवर होता है , आँकड़े बेजान होते हैं, सच बेजान नहीं होता। आँकड़ों के ज़रिए न तो बहस जीत सकते हो और नहीं दलितविरोधी बटुकसंघ को बचा सकते हो!



बुधवार, 20 जुलाई 2016

फेसबुक सूक्तियाँ




नियमित अच्छी चीजों को पढ़ने की आदत होनी चाहिए।नियमित रीडिंग बेहतर इंसान बनाती है।

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मनुष्य के अंदर का खालीपन सिर्फ दो चीजों से भरा जा सकता है ,वह है प्रेम और त्याग ।

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जो धर्म भय पैदा करे वह धर्म नहीं है,धर्म वह है जो अभय दे।

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रामचरित मानस में रचित राम को एक ही चीज पसंद है प्रेम।प्रामाणिक प्रेम प्रसन्नता का जनक है।

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सत्य के लिए आक्रामकता नहीं त्याग और विनम्रता चाहिए।

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सत्य को धैर्य के बिना नहीं पा सकते।वह स्वाभाविक चीज है।

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सद्गुरू सबसे समर्थ वैद्य है।

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श्रद्धा का स्थान फेसबुक नहीं मनुष्य का हृदय है।

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मानव समाज में विचारों का दान श्रेष्ठ दान है।

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अभिभावक के बिना लड़का-लड़की की पहचान होती है,जब पहचान होती है तो फिर हर जगह अभिभावक का नाम क्यों लिखते हो,सीधे नाम लिखो पता लिखो,बंदे के बारे में विवरण लिखो,अभिभावक पिता होगा या माँ,इन दोनों के दबाव से व्यक्ति की पहचान को निकालना चाहिए।व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखो,वंशधर की तरह नहीं।

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ग़ज़ब का फिल्मीगेम है ये फ़िल्म में हीरो -हीरोइन दोनों होते हैं लेकिन खबर बनती है सलमान की फ़िल्म हिट! अमीर की फ़िल्म हिट! कभी अनुष्का का भी नाम ले लिया करो मीडियावालो।हीरोइन के बिना फ़िल्म नहीं बनती फिर प्रचार में हीरो का ही जयगान क्यों ?

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मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने व्यंग्य करते हुए कहा "आखिर शादी के लिए जितनी पूछ आईएएस, इंजीनियर, डॉक्टर आदि अन्य

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पेशों के युवकों की है उतनी पूछ वकीलों की क्यों नहीं है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आईएएस, इंजीनियर और चिकित्सक बनना उतना आसान नहीं है लेकिन जो देखो वही वकील बन जाता है। शायद यही कारण है कि शादी के लिए वकीलों की पूछ नहीं होती है।’

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ठठेरेबाजी और नॉनसेंस भाषा को एमटीवी आदि टीवी चैनल ने रियलिटी शो का अनिवार्य अंग बनाकर रद्दी को मुनाफे में बदल दिया है। आज के युवाओं को इस तरह के रियलिटी शो की तू-तड़ाक की भाषा प्रभावित कर रही है।

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मैं गंभीर लोगों से डरता हूं।मुझे गंभीरता नहीं व्यंग्य पसंद है।

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आत्मा,परमात्मा,अन्तर्मन,अंतर्दृष्टि,परमपिता,परम तत्व,परम,अन्तरात्मा आदि पदबंध अप्रासंगिक हो गए हैं।

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मेरे लिए फेसबुक खेल है और खेल में सूरदास के अनुसार- खेलन में को काकों गुसईंया। यानी सब समान हैं।

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किसी भी कला का ज्ञान मनुष्य को बूढा नहीं होने देता।

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धर्म पुरानी जीवन संहिता है,संविधान नई जीवन संहिता है। तय करो किस ओर हो तुम।

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सही ज्ञान वह है जो मनुष्य को सही-गलत की पहचान कराए।

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तर्क में परास्त करना सबसे घटिया चीज है,इससे आनंद नष्ट होता है।सुंदर तर्क वह है जो संवाद में खींचे,संवाद खुला रखे।

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बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी पुनर्जन्म की धारणा में आस्था।

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अंतर्दृष्टि जैसी कोई चीज नहीं होती।

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महाभारत तो कुरूक्षेत्र के बिना लिखा गया।

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पवित्रता सबसे घटिया शब्द है,इसने सबसे ज्यादा पीड़ित किया है।

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मोक्ष का मतलब मरना नहीं है, मोक्ष का मतलब मोह रहित सावधानी से जीना है।

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जो धर्म मातहत भाव का प्रचार करे वह धर्म नहीं अधर्म है।

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जिस तरह दुख की कोई सीमा नहीं होती,उसी तरह सुख की भी कोई सीमा नहीं है।

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विवेकहीन भक्ति और प्रेम अंततःदुख देते हैं।

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भक्ति और प्रेम में विधि निषेध नहीं होते,बल्कि सभी किस्म के विधि निषेधों का अंत हो जाता है।

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दुनिया से विरक्ति पैदा कर दे वह गुरू नहीं बल्कि दुनिया को समझाए वह है गुरू।

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व्यक्ति के विकास के लिए एकांत जरूरी है।

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आधुनिक धार्मिक प्रचारक इन दिनों धर्म-चर्चा कम राजनीतिक और व्यापारिक चर्चाएं ज्यादा करते हैं।इनमें से अधिकांश के साथ कारपोरेट घरानों में से कोई न कोई बंदा काम कर रहा है।धर्म इन सबके कारण अधर्म में रूपान्तरित हो गया है।धर्म यदि धर्म का मार्ग छोड़कर अन्य मार्ग ग्रहण कर ले तो समझो धर्म का अंत हो गया .वह राजनीति बन गया।दिलचस्प बात यह है कि इन नए धर्म प्रचारकों को टीवी बहुत पसंद है,बिना टीवी के इनके विचारों का प्रसार नहीं होता।टीवी से धर्म का प्रचार धर्म को धर्म नहीं रहने देता,बल्कि राजनीतिक बनाता है।

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सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति



भारत सरकार सेना के लिए नई सोशलमीडिया नीति लेकर आई है।यह नीति 2015 की नीति की तुलना में काफी उदार है।अब सेना के लोग खुलकर सोशलमीडिया का इस्तेमाल कर पाएंगे।उनको अपने पद,मूवमेंट,सेना के ऑपरेशन आदि की सोसलमीडिया में जानकारी शेयर न करने को कहा गया है।
‘Policy on Usage of Social Media’ नामक नीति में कहा है-
“The Rules suggested that serving officers and jawans of the Army can have media account on their name provided that the account holder doesn’t mention anything about his services including rank, place of posting, Unit and Corps etc. They will not upload photographs or videos or make comments while inter-acting on social media, which mentions specific information, unit or establishment,”
“As a general parameter, conduct which will be unacceptable in physical domain in the Army will also be unacceptable in the Cyber/ Social Media domain,”
“Indian Army recognizes the positive potential of social media platforms as exponentially faster means of conveying messages, information and opinions, important role the social media can play for the Army personnel in their personal life for keeping them in touch with their families and friends and in building a cohesive Indian Army Community while upholding its image as a disciplined and professional citizens.
“The social media can also serve as instrument for promoting national security and its values in mass internal communications for building, raising and sustaining morale of all ranks within the Army,”

नई नीति बुरहान वानी के सोशलमीडिया हीरो बनने के संदर्भ में लाई गयी है।खासकर जम्मू-कश्मीर में तैनात सेना को इससे मदद मिलेगी,अन्य इलाकों में काम करने वाले सैनिक भी लाभ उठा पाएंगे।

मोदीजी का कश्मीरी खेल



मोदी सरकार का कश्मीर को लेकर रवैय्या साफ है वे कानून-व्यवस्था का मसला मानकर चल रहे हैं इसीलिए वहां सेनाध्यक्ष को परिस्थिति का जायजा लेने भेजा है,यदि राजनीतिक समस्या मानते तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भेजते।दुर्भाग्यजनक है मोदी मंत्रीमंडल के किसी सदस्य का,यहां तक कि मोदीजी का कश्मीर के हालात पर ट्विट मूवमेंट नजर नहीं आ रहा,सवाल यह है संकट की अवस्था में इन सबके मुँह पर ताला क्यों लग जाता है? आतंकियों के खिलाफ और आम जनता के पक्ष में बोलने के लिए इनके पास कोई वाक्य तक नहीं है,इतने गूंगे तो नहीं हो ट्विटर नरेश मोदीजी!

कश्मीर के बिगड़े हुए हालात पर सर्वदलीय बैठक बुलाने से पीएम मोदी भाग क्यों रहे हैं,यह देश आऱएसएस के इशारे पर चलेगा तो हर राज्य में संकट पैदा होगा।कश्मीर पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग एक सप्ताह से विपक्ष कर रहा है लेकिन मोदीजी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही।देश को चलाने का यह तरीका अंततःदेश का नुकसान करेगा,गरीब कश्मीरियों के लिए और संकट पैदा करेगा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कश्मीर की घटना का संज्ञान लिया,केन्द्र -राज्य सरकारों को 15 दिन में जबाव देने का आदेश दिया। हमने भी फेसबुक पर यह मांग रखी थी कि मानवाधिकार आयोग संज्ञान ले। आयोग का शुक्रिया।

कश्मीर की निहत्थी जनता पर पुलिसबलों की कार्रवाई के परिणाम सामने आने लगे लगे हैं विभिन्न अस्पतालों में पेलेटगन और गन से घायल हुए मरीजों में से 93मरीज हमेशा के लिए अपाहिज हो सकते हैं,ये गंभीर रूप से घायल हैं,इनके इलाज का खर्चा न तो राज्य सरकार दे रही है और केन्द्र सरकार दे रही है बल्कि अस्पताल अपनी ओर से मुफ्त इलाज कर रहे हैं और खर्चा उठा रहे हैं। Bone & Joint Hospital में इसतरह के 60 मरीजों का इलाज चल रहा है बाकी 30मरीजों का दूसरे अस्पतालों में इलाज चल रहा है। इन मरीजों को देखने अभी तक कोई नेता नहीं पहुँचा,किसी ने सहायता कोष नहीं बनाया,कमाल है 40 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे गए हैं लेकिन अभी तक इन मौतों पर सुप्रीमकोर्ट ने भी संज्ञान नहीं लिया। कहां सो गया भारत का मानवतावाद ।



जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय ने हाल के घटनाक्रम में घायल लोगो को मुफ्त इलाज की सुविधा दिए जाने का आदेश दिया है ।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने आम जनता को सरकारी दुकानो से राशन तुरंत मुहैय्या कराने के आदेश दिए हैं,साथ में यह भी कहा है कि नागरिकों को उधार राशन दिया जाय।

जम्मू-कश्मीर उच्चन्यायालय ने राज्य सरकार की इस बात के लिए आज तीखी आलोचना की कि उसने कर्फ्र्यू ग्रस्त इलाकों में जरूरत की अनिवार्य वस्तुओं की सप्लाई नहीं की।न्यायालय की यह टिप्पणी केन्द्र सरकार के मुँह पर भी करारा तमाचा है।अदालत ने राज्य के हालात में अदालत में पेश की गयी रिपोर्ट पर असंतोष व्यक्त किया है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले श्रीनगर में 400 सरकारी दुकानें हैं जिनमें बमुश्किल 50दुकानें खुली रही हैं।



कश्मीर के हाल के घटनाक्रम में 2115लोग घायल हुए थे इनमें से 1924 को अस्पताल से इलाज के बाद घर भेज दिया गया है।लेकिन191लोग अभी भी गंभीर रूप से घायल हैं जिनका इलाज चल रहा है,इनमें 70 की आंखों में पेलेट गन के छर्रे लगे हैं।

कल (18जुलाईR 2016)अनंतनाग जिले के गाजीगुंड इलाके में सेना के ऑपरेशन के दौरान तीन लोग मारे गए,इनमें दो औरतें भी हैं,सेना ने इस घटना के जांच के आदेश दिए हैं।यह सही दिशा में उठाया कदम है,उल्लेखनीय है सेना के वाहन पर लोग पत्थर फेंक रहे थे जिसके जबाव में सेना ने गोली चलायी।कायदे से सेना को बुरहान वानी की मौत और उसके बाद के समूचे घटनाक्रम पर जांच का आदेश देना चाहिए।

सवाल यह घायलों को देखने अभी तक जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री अस्पताल और उनके घर क्यों नहीं गयीं,किसके आदेश का इंतजार है मैडम।

हमारे पुराने जेएनयू के मित्र अमिताभ मट्टू इन दिनों जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं ,दिलचस्प बात यह है कि कोई नहीं जानता कि बुरहान वानी को मारने का आदेश किसने दिया। जबकि महबूबा मुख्यमंत्री होने के साथ राज्य की गृहमंत्री भी हैं।कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है,फिर वानी के बारे में आदेश किसने दिए ?

भाजपा ने पीडीपी के साथ जो साझा कार्यक्रम बनाया था उसमें हुर्रियत से बात करने का वायदा किया था, आज टीवी पर भाजपा नेता कह रहे हैं हुर्रियत से बात नहीं करेंगे क्योंकि वह पृथकतावादी संगठन है। सवाल यह है जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय भी वह पृथकतावादी संगठन था , उस समय उससे समझौता करके चुनाव में वोट क्यों लिए ? बातचीत करने का वायदा क्यों किया ?

कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत का मोदीजी ने जम्मू-कश्मीर के चुनाव में वोट के लिए दिया नारा है, आज यही नारा मोदीजी और महबूबा ने अंगारों की भेंट चढ़ा दिया है।

यह है भाजपा पीडीपी समझौते का आधारभूत कार्यक्रम जिसमें १५ सूत्र रखे गए हैं आज इस न्यूनतम साझा कार्यक्रम को मोदीजी ने अंगारों के हवाले कर दिया है,जम्मू-कश्मीर की जनता के साथ यह धोखाधडी है-

The PDP and the BJP on Sunday released their common minimum programme (CMP) for running the coalition government in Jammu and Kashmir.

Here are the 15 highlights of the CMP:

1) To meet the political and economic objectives of the alliance, it is important to create an environment of peace, certainty and stability.

2) The government will be transformed into a 'smart government' which will be pro-active, transparent and accountable.

3) It shall be the mission of the government to be the most ethical state in the country from the present day position of being the most corrupt state.

4) The overall economic policy will align the economic structure of Jammu and Kashmir with its own resources, skills and society.

5) The government will ensure genuine autonomy of institutions of probity which include the state accountability commission, vigilance commission, which will be re-designated as transparency commission and an organisation which deals with the Right to Information Act.

6) Following the principles of "Insaniyat, Kashmiriyat and Jamhooriyat" of the earlier NDA government led by Atal Bihari Vajpayee, the state government will facilitate and help initiate a sustained and meaningful dialogue with all internal stakeholders which include political groups irrespective of their ideological views and predilections.

The dialogue will seek to build a broad based consensus on resolution of all outstanding issues of the state.

7) The government will examine the need for de-notifying disturbed areas which will as a consequence enable the union government to take a final view on the continuation of the Armed Forces Special Powers Act (AFSPA) in these areas.

8) Article 370: The present position will be maintained on all constitutional provisions including special status.

9) Dialogue with Hurriyat Conference: The coalition government will facilitate sustained dialogue with all stakeholders irrespective of their ideological views.

10) All the land other than those given to the security forces on the basis of lease, licenses and acquisition under the provision of the land acquisition act shall be returned to the rightful owners except in a situation where retaining the land is absolutely imperative in view of a specific security requirement.

11) The government will work out a one-time settlement for refugees from Pakistan occupied Kashmir of 1947, 1965 and 1971.

12) The government will take measures for sustenance and livelihood of the West Pakistan refugees.

13) It will extend all benefits accruing to the people living on the Line of Control (LoC) to the people living on the international border.

14) It will secure a share in the profits of NHPC emanating from Jammu and Kashmir's waters to the state government.

15) It will reverse all royalty agreements with NHPC.

हुर्रियत नेता सैय्यद अली शाह जिलानी ने कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए विश्वसमुदाय को जो पत्र लिखा है वह निंदनीय है।यह पत्र भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है।

जो संगठन समाज में हिन्दू बनाम मुसलमान ,भारत बनाम पाक का गंदा खेल खेल रहे हैं वे स्टीरियोटाइप विचारों,इमेजों और तर्कों के आधार पर बातें कर रहे हैं।किसी भी किस्म का स्टीरियोटाइप विमर्श अंततःज्ञानहीन बनाता है,सही समझ नष्ट करता है।

आरएसएस और आतंकियों में राष्ट्रवाद महान है,एक को हिन्दू राष्ट्र चाहिए,दूसरे को मुस्लिम राष्ट्र चाहिए,दोनों कश्मीरमें राष्ट्रवाद का ढोल पीटते रहते हैं,आतंकी बंदूक और बारूद के जरिए राष्ट्रवाद लाना चाहते हैं, मोदी सरकार को सेना के जरिए राष्ट्रवाद की रक्षा करनी पड़ रही है,सच्चाई यह है कश्मीर को किसी भी रंगत का राष्ट्रवाद नहीं चाहिए,वहां की जनता मानवतावाद चाहती है।जो संगठन राष्ट्रवाद को महान बनाने में लगे हैं वे वस्तुतःमानवता और कश्मीरी जनता के दुश्मन हैं।कश्मीर की जनता को राष्ट्रवाद नहीं मानवतावाद चाहिए।सेना नहीं सहयोग चाहिए।

कश्मीर के सभी अखबारों के संपादकों ने अखबारों के प्रकाशन पर लगी पाबंदी को अनुचित बताया है और उसकी कड़े शब्दों निंदा की है और मांग की है कि राज्य सरकार यह पाबंदी तुरंत हटाए। दिलचस्प बात यह है कि राज्य सरकार खुलेआम पृथकतावादी संगठनों के प्रति हमदर्दी दिखाती रही है,उनको नियंत्रित करने के लिए उसने कोई कदम नहीं उठाए,लेकिन प्रेस पर हमला करने के लिए तुरंत कदम उठा लिए,यदि राज्य सरकार को किसी अखबार की किसी रिपोर्ट,तथ्य आदि को लेकर आपत्ति थी तो उसे संपादक को बुलाकर पूछना चाहिए,बात करनी चाहिए,कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए,लेकिन यह सब न करके सीधे सभी अखबारों के प्रकाशन पर पाबंदी लगाकर यह संदेश दिया है कि कश्मीर का प्रेस आग भड़का रहा था।वास्तविकता यह है कि आग भड़काने का काम किसी और ने किया,आग भड़काने वाले को राज्य सरकार कुछ नहीं बोल रही।

कश्मीर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रहीं।जो लोग सोच रहे हैं कि मीडिया को बंद करके हालात सुधारे जा सकते हैं,वे गलतफहमी के शिकार हैं।इस समय कश्मीर में अघोषित आपातकाल है।राज्य सरकार ने सभी अखबारों पर पाबंदी लगा दी है।मोबाइल बंद हैं,इंटरनेट बंद है।सड़कों पर कर्फ्यू है।आम नागरिक किस तरह गुजर बसर कर रहा होगा,रोज खाने-कमाने वाले कैसे जी रहे होंगे,इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।जम्मू-कश्मीर सरकार तुरंत अखबारों पर लगी पाबंदी हटाए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल करे।

कश्मीर को शांति नहीं सहानुभूति और सही समझ की जरूरत है। जो लोग कश्मीर को भारत के साथ देखना चाहते हैं वे शांति स्थापित करने तक न देखें। इससे समस्या सुलझने वाली नहीं है। कश्मीर को सहानुभूति और सही समझदारी के साथ देखो।


केजरीवाल के पंजाबीगेम

केजरीवाल ने पंजाब विधानसभा चुनाव के मीडियागेम और माइंडगेम में भाजपा-अकाली और कांग्रेस तीनों की नींद उडाकर रख दी है,आम आदमी पार्टी जीतेगी या हारेगी यह भविष्य बताएगा लेकिन फिलहाल ´आप´ जैसा छोटा नवोदित दल मैदान में है और इन सभी दलों को अपने नेताओं पर संदेह हो रहा है कहीं वो वहां न चला जाए !

मोदीजी की जमा पूंजी है टीवी और साइबर प्रचार,मजेदार बात यह है केजरीवाल इस मामले में मोदीजी से बहुत आगे है।मोदीजी साइबर के नवोदित नेता हैं जबकि केजरीवाल साइबर हीरो है।यह बात दिल्ली की पराजय के बाद से मोदीजी भूले नहीं हैं।पंजाब में सिद्धू को सामने करके मोदीजी की टीवी इमेज से ज्यादा वजन का टीवी नायक मैदान में लाकर केजरीवाल ने मोदीजी का खर्चा और ब्लडप्रेशर बढ़ा दिया है।मोदीजी की तरह ही तुकबंदी भाषण देने में सिद्धू सिद्दहस्त है,सच में पंजाब विधानसभा चुनाव बेहद रंगीन होने जा रहा है।

पंजाब विधानसभा चुनाव में क्या होगा यह तो भविष्य बताएगा लेकिन भाजपा को छोड़कर जाने वालों का सिलसिला केजरीवाल ने आरंभ करके मोदीजी के आभामंडल के प्रभाव को क्षीण जरूर कर दिया है,केजरीवाल के भाजपा पर पड रहे छापे सीबीआई के आप पर पड़े छापे से ज्यादा कष्टदायक हैं मोदीजी के लिए।

पंजाब महत्वपूर्ण राज्य है आम आदमी पार्टी को वहाँ यदि विधानसभा चुनाव गंभीरता ,स्वच्छता और ईमानदारी से लड़ना है तो नवजात सिंह सिद्धू को अपना नायक नहीं बनाना चाहिए। टीम का नायक किसी निष्ठावान राजनीतिक व्यक्ति को बनाना चाहिए। सिद्धू को नायक बनाने का अर्थ है आम आदमी पार्टी का पत्तागोल !अराजनीतिक व्यक्ति को नायक बनाकर राजनीति नहीं कर सकते केजरीवाल!

कल तक अरुणाचल में जो कांग्रेसी विधायक मोदीजी के साथ थे वे भी उनको छोडकर फिर कांग्रेस में लौट गए। मोदीजी दलदल कराकर कितना मूर्ख बनाओगे जनता को!अरूणाचल से चली हवा पंजाब में पहुँच गयी! मोदीजी यह आपके पतन की शुरूआत है। आपकी उलटी गिनती शुरू हो चुकी हैं।

पंजाब में तो विधानसभा चुनाव के पहले ही भाजपा का रथ पंक्चर ! सिद्धू का जाना अपशकुन है मोदीजी! हवन करेंगे हवन करेंगे!!

मेरे पहले शिक्षक

      मेरे पहले शिक्षक परमानन्द शर्मा थे,वे मथुरा नगरपालिका के स्कूल में पढाते थे,स्कूल मास्टरों का उन दिनों ट्रांसफर होता रहता था।मैंने कक्षा एक में आज के ही दिन (1962)मथुरा के सतघड़ा मुहल्ले में जवाहर विद्यालय में दाखिला लिया ।स्कूल शिक्षकों को दाखिले के समय आम भेंट करके पिता ने दाखिला दिलाया ,बाद में प्रत्येक गुरूपूर्णिमा पर आम देकर गुरूओं को प्रणाम करने की आदत पड़ गयी।मुझे याद है स्कूल में परमान्द शर्मा प्रिंसिपल थे वे हमारे घर के पास ही भैंरोमंदिर के बराबर वाली गली में भाड़े का कमरा लेकर रहते थे और मेरे मंदिर पर सुबह छह बजे दर्शन करने आते थे। स्कूल में दाखिले के साथ ही परमानंदजी के यहां ट्यूशन पढ़ने का बंदोबस्त कर दिया गया।
परमानन्द शर्मा सादगी,ईमानदारी और सख्त मिजाज के शिक्षक के रूप में सारे शहर में मशहूर थे,उनके पढाए छात्र कभी फिसड्डी नहीं रहे,वे लिखने-पढ़ने के साथ तर्क-वितर्क में भी बेहतर बन जाते थे।परमानन्दजी की सबसे अच्छी बात थी कि वे जो पाठ पढाते थे उसे अपने ही सामने याद कराकर घर भेजते थे,फलतःहोमवर्क जैसी कोई चीज नहीं थी। हमसे बचपन में जब भी कोई शिक्षक का नाम पूछता हम परमानन्द जी का नाम लेते,उसके बाद पूछने वाले के पास परमानन्दजी की प्रशंसा के अलावा कोई शब्द नहीं होते थे।परमानन्दजी से पढ़ना गौरव की बात मानी जाती थी,क्योंकि वे सबसे ज्यादा जनप्रिय ईमानदार शिक्षक थे।

आज गुरू पूर्णिमा है।मुझे यह दिन विशेष प्रिय है।यह सबका दिन है।हम जीवन में किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखते हैं,जिससे सीखते हैं वही गुरू है।सीखने का काम बिना निष्ठा और लगन के संभव नहीं है।पूंजीवाद में पढ़ने-लिखने के कारण हम सबका दिलो -दिमाग सीखने पर तो केन्द्रित रहा लेकिन सिखाने वाले के साथ हमने किसी भी किस्म का सामाजिक संबंध नहीं रखा,हम शिक्षक से पढ़ लेते हैं,लेकिन हमारा कोई सामाजिक संबंध नहीं रहता,जिस तरह हम उपयोग करके मोबाइल फेंक देते हैं,वैसे ही शिक्षक से भी पढ़कर उसे भूल जाते हैं,उसके साथ कोई सामाजिक संबंध नहीं रखते।

शिक्षक-छात्र के संबंध में इसने विलक्षण किस्म का अलगाव पैदा किया है।हमने कभी सोचा ही नहीं कि जिस शिक्षक ने हमको बचपन में पढाया,कॉलेज या विश्वविद्यालय में पढाया उसके साथ हमारा सामाजिक संपर्क- संबंध क्यों खत्म हो गया? हमने डिग्री ली और भूल गए।गुरूपूर्णिमा असल में शिक्षक के साथ लिंक स्थापित करने का दिन है।गुरू को याद करने का दिन है। कम से कम कुछ न कर सकें तो फेसबुक पर अपने गुरू के ऊपर कुछ पंक्तियां ही लिखकर याद करें।गुरू यानी शिक्षक से हमने कुछ न कुछ लिया है,सवाल यह है क्या छात्र के नाते उससे प्राप्त ज्ञान का कभी जीवन में क्या असर हुआ है इस पर सोचा है ?



हम इतने खुदगर्ज कैसे हो सकते हैं कि अपने शिक्षक याद न आएं,गुरूपूर्णिमा याद न आए।हमें इस खुदगर्जी के भाव से निकलकर कृतज्ञता के साथ अपने शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।गुरू के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना मनुष्यता का बेहतर लक्षण है।

मेरे साइबर शत्रु

       कुछ दिन पहले एक पुराने शत्रु से मुलाकात हुई,देखते ही मैंने पूछा कैसे हो,गुस्से में बोले ठीक हूं,मैंने कहा कम से कम यह बात तो हंसकर कह दो,बोले तुम्हारी शक्ल देखते ही घृणा होती है,मैंने कहा शक्ल नहीं चरण देखो,घुटना देखो,शक्ल ही क्यों देखते हो ,बोले ,पता नहीं क्यों बार -बार तुम्हारे चेहरे पर ही नजर जाकर टिक जाती है,मैंने कहा तो मन लगाकर चेहरा देखो,बोले फेसबुक में यही करता रहता हूँ,तुम्हारी वॉल पर जाता हूँ और निहारता रहता हूँ,कुछ फोटो भी प्रिंट करा लिए हैं, मैं सब समय तुम्हारे बारे में बुरा सोचता हूँ लेकिन तुम्हारी शक्ल भूल नहीं पाता ,मैंने कहा चलो चाय पी लेते हैं,फिर बढ़िया पान खाते हैं,वे बोले तुम्हारे साथ अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा,तुम शैतान हो,कमीने हो,मैंने कहा सब सुनूँगा लेकिन यह बताओ क्या पीछे से फेसबुक फोटो को भी गालियां देते हो,बोले नहीं,वहां मेरी आवाज ही नहीं निकलती,बल्कि नींद आ जाती है।मैंने कहा तुम बहुत भले हो।आनंद लो फेसबुक में ही मिलते हैं,वहीं वर्चुअल चाय पिलाएंगे,एक कप तुम्हारा होगा और दूसरा कप हमारा होगा।

फेसबुक का मजा यह है कि इसमें दुश्मन को खोजकर पढ़ते हैं,दुश्मन की खबर रखते हैं,उसके विचारों को सहेजकर रखते हैं,जो बेगाने हैं ,वे बेगाने रहते हैं लेकिन मिलते हैं,छुपकर पढ़ते हैं,गजब मजा है,जिसकी शक्ल देखनी पसंद नहीं है उसकी वॉल पर रोज जा रहे हैं,जिसको गाली देते हैं,उसको रोज पढ़ रहे हैं।फेसबुक बंधनहीन आदत है।



सोमवार, 18 जुलाई 2016

मुझे भारत चाहिए-

          कश्मीर में तनाव इसलिए है क्योकि हम सबकी कश्मीर को लेकर समझ साफ नहीं है,पूरे देश में हिन्दू-मुसलमान संबंधों को लेकर तनाव इसलिए है क्योंकि हमारे देश में एक बहुत बड़ा अंश है जिसकी हिन्दू-मुसलमानो के संबंधों को लेकर सही और साफ समझ नहीं है।

मुसलमान भी भारतीय हैं,कश्मीरी भी भारतीय हैं,हम इस सामान्य किंतु बहुत महत्वपूर्ण बात को समझने से कन्नी क्यो काट रहे हैं ?मुसलमानो को कष्ट मिले या हिन्दुओं को कष्ट मिले,अंततःयह भारतीय समाज का कष्ट है।

हमने गलत किस्म का सामाजिक विभाजन मन में बिठा लिया है।हम भारतीय को भूल गए और अपने -अपने धर्म की पहचान में व्यस्त कर दिए गए हैं।आरएसएस और मुस्लिम तत्ववादी संगठन अपने-अपने तरीके से यह काम खुलकर कर रहे हैं और हम सब उनकी इन हरकतों की उपेक्षा करते रहे हैं,आज स्थिति यह है कि ये दोनों ही किस्म के संगठन आम जनता और मीडिया में हिन्दू-मुसलमान के जहर को सतह पर ले आए हैं।हम भारतीय समाज की बातें नहीं कर रहे हिन्दू समाज,मुस्लिम समाज आदि कोटियों में बांटकर बातें कर रहे हैं,एक-दूसरे को जलील करके तीसमार खाँ बनने की कोशिश करके अंततःदेश को बांट रहे हैं।

आज जो कश्मीर में सुलगता अंगारा दिखाई दे रहा है,वह कभी भी पूरे देश में सुलगता नजर आ सकता है।इसका प्रधान कारण है हमारे प्रमुख राजनीतिकदलों ने गंभीरता के साथ देश को धर्म के आधार पर हमारे दिलों में बांट दिया है।दिलचस्प बात यह है ये सभी दल खासकर कांग्रेस,भाजपा,आरएसएस आदि ऊपर से सद्भाव का नाटक करते रहे हैं लेकिन वैचारिक प्रचार में हिन्दू-मुसलमान की कोटियों में बांटकर अपने नजरिए को परोसते रहे हैं।कांग्रेस ने यह काम बारीकी से किया है,धर्मनिरपेक्षता की आड़ में किया है,आरएसएस के लोग बिना किसी आड़ के सीधे कर रहे हैं।एक कमरे में नंगा घूम रहा है,दूसरा सड़कों पर नंगा घूम रहा है,लेकिन हैं दोनों नंगे।इन दोनों के इस विभाजनकारी खेल से बचने की जरूरत है।

भारतवासी होने के नाते हमें धार्मिक पहचान के आधार पर सोचने से बचना चाहिए।धार्मिक पहचान के आधार पर सोचना अंततःभारत को सामाजिक तौर पर विभाजित करता है।



इस समय सारा मीडिया ,पुलिस, सरकारी तंत्र और सोशलमीडिया का बड़ा हिस्सा धार्मिक पहचान के आधार पर ही सोच रहा है और यह खतरनाक स्थिति है इससे बचने की जरूरत है।इन दिनों हिन्दू-मुसलमानों के भेद बताने पर जोर दिया जा रहा है,जबकि होना यह चाहिए कि हम समानताएं खोजें।हिन्दू-मुसलमानों के प्रति उन्मादी भाषण देने,बयान देने.फेसबुक पोस्ट लिखने से बचें।हमें भारत को बचाना है,हम यह हिन्दू-मुसलमान बचाने के नाम पर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से बाहर निकलकर सोचें,मनुष्य को पहचान का आधार बनाएं,मनुष्य के रूप में भारतवासियों के साझा सुख-दुख रेखांकित करें।

रविवार, 17 जुलाई 2016

खान ड्रेस ,पेंट शर्ट और सेना

            पाक समर्थित आतंकियों की कश्मीर में भूमिका को कम करके नहीं देखना चाहिए।खासकर पीडीपी-भाजपा सरकार आने के बाद नए सिरे से आतंकियों को जनता में फैलने का मौका मिला है, इनमें से अनेक ग्रुपों ने पीडीपी-भाजपा के लिए चुनावों में काम किया है।ऐसी स्थिति में वहां सामान्य स्थिति बहाल करने में सेना को कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। आतंकियों के जनाधार बनाने के नए नए तरीके सामने आ रहे हैं,उनमें से एक है साइबर मंच।साइबर मंचों के जरिए युवाओं को आतंकी विभिन्न रूपों में गोलबंद कर रहे हैं,लेकिन सरकार ने इसको रोकने के लिए कोई मैकेनिज्म विकसित नहीं किया। उल्लेखनीय है आतंकी –साम्प्रदायिक –पृथकतावादी संगठन सब समय हथियारबंद जंग ही नहीं लड़ते,वे विभिन्न छद्म रूपों में युवाओं को अपने इर्द-गिर्द गोलबंद करते हैं। यहां एक पुराना वाकया याद आ रहा।

सन् 1989-90 के बाद कश्मीर में जो आतंकी उभार आया था उसमें एक बार आतंकियों ने सारे पुरूषों को खान ड्रेस पहनने का आदेश दे दिया,उन दिनों घाटी में आतंकियो का भय इस कदर व्याप्त था कि कोई व्यक्ति उनके आदेस की अवहेलना नहीं कर सकता था।

खान ड्रेस (पठान ड्रेस) पहनने का आदेश निकलते ही देखते ही देखते एक सप्ताह में सभी पुरूषों ने पठान ड्रेस बनवाए और फिर पहनने लगे,यहां तक कि पुरूष पठान ड्रेस पहनकर ऑफिस भी जाते थे,यह सिलसिला दो महिने तक चला।एक दिन सेना ने तय किया कि पठान ड्रेस के खिलाफ मुहिम चलायी जाय। सेना को तुरंत एक्शन में जाने के आदेश दिए गए,सेना ने सड़कों-गलियों-मुहल्लों में खान ड्रेस पहने पुरूषों को पकडकर उनके चूतड़ पर कसकर आठ-दस डंडे लगाने शुरू किए,जो भी खान ड्रेस पहने दिखता उसकी खबर ली जाती,लोग घरों में जाकर अपने चूतडो की सिकाई कर रहे थे और परेशान होकर दर्द से कराह रहे थे,कुछ सप्ताह चले इस अभियान के कारण समूची घाटी में पुरूषों ने पठान ड्रेस पहननी बंद कर दी।सेना जिसे भी पठान ड्रेस पहने देखती सीधे सवाल करती ,चूतड पर डंडे लगाती और कहती कि कल से पैंट-शर्ट में दिखाई दो,इस तरह पठान ड्रेस से कश्मीर को मुक्ति मिली।जबकि आतंकियों ने दो माह तक सारे कश्मीर के पुरूषों को पठान ड्रेस बंदूक की नोंक पर पहनाकर अपना वैचारिक-सामाजिक वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश की जिसे सेना ने नाकाम कर दिया।



इस कहानी को कहने का आशय यह है कि आतंकी-साम्प्रदायिक संगठन आम जनता की जीवनशैली पर हमला बोलते हैं और अपना ड्रेसकोड थोपते हैं।इसलिए इन संगठनों से सिर्फ राजनीतिक संघर्ष ही नहीं जीवनशैली के स्तर पर भी संघर्ष करना पड़ता है।

आतंकी टीपू सुल्तान की मौत और हमारी सेना

         यह वाकया 1992-93 का जब कश्मीर में संकट गहरा था।आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का उभार चरम पर था,घर –घर तलाशी हो रही थी।हर आदमी पर पुलिस नजर रखे हुए थी,ऐसे हालात में पाक स्थित आतंकियों ने कश्मीर के क इलाके के सरगना के तौर पर टीपू सुल्तान का नाम मीडिया में उछाल दिया,टीपू सुल्तान ने भी खुशी-खुशी इलाके के कमांडर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। यह वाकया कश्मीर के किसी छोटे इलाके का है, आतंकी कमांडर बनाए जाने की घोषणा के बाद टीपू सुल्तान बड़े अहंकारी भाव में रहने लगा,दिन में एक-दोबार बाजार में एके47 लेकर घूम आता था।इलाके के लोग घरे रहते लेकिन जानते थे कि वह आतंकी नहीं है गरीबी का मारा चिरकुट किस्म का आदमी है।

टीपू सुल्तान खुश था कि उसको आतंकियों ने इलाके का कमांडर बना दिया, वास्तविकता यह थी कि टीपू सुल्तान ढाई पसली का आदमी था,एकदम सूखा हुआ शरीर, लेकिन साढ़े छह फुट लंबा। खाने और सोने का कोई ठिकाना नहीं ,उसके परिवार में कोई नहीं था,वह एक छोटे से कमरे के घर में रहता था। मीडिया में ज्योंही टीपू सुल्तान का नाम आतंकियों ने उछाला उस मुहल्ले को पुलिस ने कुछ ही दिन बाद आकर उसे घेर लिया।उसके नाम की घोषणा के बाद उस पर इनाम भी घोषित कर दिया गया।लेकिन मुश्किल यह थी पुलिस और सेना के पास उसका कोई फोटो नहीं था,यहां तक कि आतंकियों के पास भी फोटो नहीं था। दस-पन्द्रह दिन बाद कश्मीर के डाउन टाउन इलाके को तकरीबन 11सौ सैनिकों ने घेर लिया,मुहल्ले के सारे लोगों को कहा गया कि वे टीपू सुल्तान को सेना को सौंप दें,दिल्लगी यह कि टीपू सुल्तान की सेना में फोटो किसी ने देखी नहीं थी,मुहल्ले के लोगों के अलावा उसे कोई जानता नहीं था,सेना के पास उसकी कोई फोटो नहीं थी, ऊपर के अफसरों का आदेश था जाओ और टीपू को पकड़कर लाओ, लेकिन 1500सैनिकों में से कोई भी उसे पहचानता नहीं था।



टीपू आतंकियों का इलाका कमांडर था इसलिए मुहल्ले के लोग उससे डरने लगे थे,मजेदार बात यह कि कमांडर घोषित होने के पहले टीपू सुल्तान को किसी ने किसी भी किस्म की बदमाशी,शरारत,गुंडागर्दी आदि करते नहीं देखा,लेकिन अचानक एक रात वह कमांडर बन गया,उसके हाथ में एके 47 बंदूक आ गयी और उसने भी बंदूक के साथ मुहल्ले में प्रदर्शन करके सूचना देदी कि वह आतंकी संगठन का इलाके का कमांडर है। लेकिन ज्योंही सेना ने मुहल्ले को घेरा तो बाहर जीप से लाउडस्पीकर लगाकर सेना का कमांडर टीपू सुल्तान को समर्पण करने की अपील कर रहा था, घरों में तलाशी शुरू हो गयी,लेकिन टीपू सुल्तान तो अपने कमरे से निकलकर सीधे कमांडर के पास कर खड़ा हो गया,कमांडर को उसकी कद-काठी देखकर नहीं लगा कि यह कोई आतंकी है।वह कमांडर के पास सहज भाव से खड़ा,घरों में दहशत थी,कई घंटे तलाशी अभियान चला ,सेना को टीपू नहीं मिला,जबकि टीपू तो बाहर सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था। सेना के जाने के बाद टीपू ने मुहल्ले के लोगों में बढ़-चढ़कर बातें कहीं और अपनी वीरता के किस्से सुनाए,लोगों को आश्चर्य था कि टीपू तो सेना के कमांडर के पास ही खड़ा था फिर सेना ने उसको पकड़ा क्यों नहीं। कुछ दिन तक टीपू के किस्से चलते रहे, अंत में एक दिन टीपू को अपनी बंदूक से पुलिस पर गोली चलाने का शौक चर्राया और उसने सीधे बंदूक करके फायरिंग शुरू कर दी,वह जानता नहीं था कि एक47 गन से फायरिंग के साथ ही पीछे तेजी से झटका लगता है,वह बेहद दुबला-पतला था, उसने ज्योंही फायरिंग शुरू की बंदूक की दिशा पलटकर उसकी ओर हो गयी और वह अपनी ही गोली से ढेर हो गया,बाद में आतंकियों ने खबर फैला दी कि एरिया कमांडर टीपू सुल्तान सेना से मुठभेड़ करते मारा गया।

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

कश्मीर को यहां से देखो-

                  आतंकवादी वहां की जनता की आवाज नहीं हैं, वहां की लोकतांत्रिक ताकतें हैं जो सही आवाज हैं।मुश्किल यह है पीडीपी को महत्ता देकर सिरबिठा दिया है मोदी ने,वे ही उनको महत्व दे रहे हैं।राज्य और केन्द्र सरकार तुरंत निचले स्तर पर सर्वदलीय बैठक क्यों नहीं बुला रहे,किसने रोका है।पीडीपी चाहती है आतंकी विपक्ष में रहें।जबकि सब जानते हैं नेशनल कांफ्रेस के बिना कश्मीर में लोकतंत्र बचाने वाला और कोई दल नहीं है। उल्लेखनीय है विधानसभा –लोकसभा चुनाव में भाजपा- पीडीपी ने प्रति वोट एक हजार रूपया नीचे सप्लाई देकर बड़े पैमाने पर पैसा खर्च किया है,पता करो यह पैसा किसने दिया। करोडों रूपया बांटा गया था,हर वोट पर एक हजार रूपया दिया गया है, लेकिन मीडिया में खबर तक नहीं है।हमारा अनुमान है भाजपा को यह पैसा बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों ने दिया था उसके बाद मोदीजी ने बड़े पैमाने शस्त्र समझौते ही किए हैं।

कश्मीर की जनता आजादी नहीं विकास और शांति चाहती है,आजादी तो आतंकी चाहते हैं।भाजपा वाले उसे हवा दे रहे हैं।मोदीजी के साथ पीडीपी ने विकास पर चुनाव लडा है वे जीते हैं विकास पर,हुर्रियत चुनाव नहीं जीती है।इसलिए हुर्रियत को न उछालें।विधानसभा चुनाव कौन जीता है इस पर सोचो,जीतने वाले ने क्या वायदे किए हैं,हुर्रियत ने चुनाव नहीं लड़ा,इसके अलावा आम जनता और आतंकियों में अंतर करो, जनता का एजेण्डा वह नहीं है जो आतंकियों का है। जनता ने कभी वोट का बहिष्कार नहीं किया,इससे समझ लो कि जनता लोकतंत्र और भारत चाहती है।

पृथकतावाद अपने एक्शन से खुद को तो नंगा करता है अन्य को भी खासकर साम्प्रदायिक ताकतों को भी नंगा कर देता है।कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के दिन से हम भाजपा की आलोचना कर रहे हैं।भाजपा का मानना है कि वे अपनी साम्प्रदायिक नीतियों के प्रभाव से पीडीपी को बदल देंगे, लेकिन हो उलटा रहा है,भाजपा लगातार पीडीपी के प्रभाव में काम कर रही है,उसके इशारों पर मोदी नाच रहे हैं।साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद के इस संयुक्त मोर्चे का कुफल कश्मीर की जनता भोग रही है।36निर्दोष मारे गए हैं,1500से ज्यादा घायल पड़े हैं।150 से ज्यादा की आँखें खतरे में हैं।समूचा पर्यटन का धंधा चौपट हो गया है।

मीडिया में लंबे समय से सेना को लेकर परम पवित्र भाव की आंधी चलायी जा रही है,यह बेहद खतरनाक चीज है। लोकतंत्र में सेना की भी समीक्षा होती है,आलोचना होती है,सेना को भी दण्डित किया जा सकता है। संघी मीडिया आंधी के बहाने सेना को विचारधारा विशेष की सेवा करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जा रहा है।

सेना की लोकतंत्र में राजनीतिक भूमिका जीरो होती है।सेना की भूमिका देश की सरहदों पर है या विशेष अशांति की स्थिति में है,लेकिन इन सभी हालातों में सेना को राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।यह दुखद है कि सेना का किसी न किसी रूप में राजनीतिक असफलताओं को छिपाने या राजनीतिक समाधानों को स्थगित करने के लिए सत्ताधारीदलों ने निहित स्वार्थी ढ़ंग से हमेशा इस्तेमाल किया है।

इधर मीडिया में सेना को हिन्दू राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश करने की प्रतिस्पर्धा छिड़ी हुई है।सेना पूर्व अधिकारी और इन दिनों संघ के संघी फाउंडेशन से जुडे बड़े पूर्व सैन्य अधिकारी सबसे घटिया ढ़ंग से राष्ट्रोन्माद पैदा कर रहे हैं,सेना को राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश कर रहे हैं और यह बेहद खतरनाक काम है,खासकर टीवी टॉक शो में सेना के पूर्व अफसरों के जरिए सेना को वैचारिक कवच पहनाने की ये गंदी हरकतें बंद होनी चाहिए।

सेना के पूर्व अधिकारियों का इराक-अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप को वैध ठहराने के लिए मीडिया के जरिए अमेरिका-ब्रिटेन और नाटो ने जमकर दुरूपयोग किया,ये पूर्व सैन्य अधिकारी अमूमन सफेद झूठ बोलते रहते हैं जिनको इन सैन्य अधिकारियों में सत्य दिखता है उनको इराक हमले पर हाल ही में आई ब्रिटिश जांच रिपोर्ट को पढ़ना चाहिए।पूर्व संघी सैन्य अधिकारी आमतौर पर मीडिया में उत्तेजक भाषा बोलते हैं,अशांति और झूठ के वक्ता के रूप में पेश आते हैं।इन सबको कायदे से बेनकाब करने की जरूरत है।

कश्मीर के सच को आतंकियों ,संघियों और बहुराष्ट्रीय शस्त्र निर्माता कंपनियों और कारपोरेट मीडिया की नजर से देखना बंद करें।ये चारों तत्व मिलकर इस इलाके में अशांति बनाए रखना चाहते हैं।आतंकियों की सबसे ज्यादा मदद कौन कर रहा है ? पाक तो बहाना है ,असल में शस्त्र निर्माता कंपनियां कश्मीर को सुलगाए रखना चाहती हैं जिससे भारत में हथियारों की अबाध सप्लाई बनी रहे।इन कंपनियों के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों के गहरे संबंध हैं।इन दोनों दलों को इन कंपनियों से गुपचुप पैसा मिलता रहा है।कश्मीर में विगत विधानसभा-लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने वोटरों को खरीदने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया था,यह पैसा कंपनियों ने शांति स्थापित करने के लिए नहीं दिया है।कश्मीर पर हो रही सारी बहस शस्त्र निर्माता कंपनियों की भूमिका की अनदेखी करके चल रही है,दिलचस्प बात है इन कंपनियों का पैसा अनेक स्तरों पर बंट रहा है।





बुधवार, 13 जुलाई 2016

मथुरा के दूधवालों की रौनक और ईमानदारी-

        मथुरा पर जब भी बात होती है आमतौर पर जीवनशैली में रचे-बसे पहलुओं पर बातें नहीं होतीं,मथुरा की जीवनशैली में दूध और दूधवाले गहरे तक रचे बसे थे।इधर 35साल में बहुत कुछ बदला, उसकी चर्चा मैं कभी फुर्सत से करूँगा।लेकिन मैं 1979 के पहले के समय को आज याद करता हूँ तो पाता हूँ शहर के विभिन्न गली-मुहल्लों के नुक्कड़ ,गली या मुख्य बाजार में कई दूधवालों की दुकानें थीं इनके ग्राहक बंधे हुए थे,इनमें हरेक के दूध का स्वाद भी अलग हुआ करता था।ऐसी भी दुकाने थीं जो मिलावटी दूध बेचती थीं ,इनकी गिनती कम थी।लेकिन असली दूध बेचने वालों की दुकानें बहुत ज्यादा हुआ करती थीं।

मथुरा के सांस्कृतिक और व्यापारिक विकास को समझने के लिए इन दूध वालों का कायदे से अध्ययन किया जाना चाहिए।यह देखें कि इनमें से कितने व्यापार में आगे गए और कितने पीछे खिसकते चले गए या शहर छोड़कर चले गए। इन दूधवाले दुकानदारों द्वारा सृजित व्यापारिक संस्कृति का अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए।इन दूधवालों की शहर में व्यापारिक ईमानदारी और निष्ठा ने ईमानदार संस्कृति को बनाने में बहुत मदद की।ऐसा नहीं है कि ये दूधवाले व्यापार करके मुनाफा नहीं कमाते थे,मुनाफा कमाते थे,लेकिन ईमानदारी के साथ।दूध के व्यापार में मुनाफे और ईमानदारी में संतुलन की कला के दर्शन मैंने इन दूधवालों के यहां किए।

दिलचस्प बात है कि हमारे मंदिर (चर्चिका देवी) पर तकरीबन सभी दूधवाले दर्शन करने आते थे।इनमें से सभी लोग बेइंतहा शरीफ और मधुरभाषी थे।इस तरह के जनप्रिय दुकानदारों में चौक में भरतपुरिया,द्वराकाधीश की गली में गोपाल पारूआ.छत्ता बाजार में भानु पहलवान आदि कुछ नाम ही फिलहाल याद आ रहे हैं।इन दूध वालों के यहाँ दूध का मजा असल में रात को आता था।जब आप गरम-गरम दूध कुल्हड़ में ऊपर से मलाई डालकर बाजार में खड़े होकर पीते थे।यह मथुरा के लोगों की खानपान की रात्रि संस्कृति का एक जरूर हिस्सा था। इधर वर्षों से यह दृश्य में उपभोग करने से वंचित रहा हूँ।जितनीबार में चौक या द्वारकाधीश की गली या छत्ता बाजार से निकला हूँ,दूध की पुरानी बड़ी कडाही नजर नहीं आतीं,रात की वह रौनक नजर नहीं आती।

मथुरा के मायने-

     आपकी दशा मैं नहीं जानता,लेकिन अपनी तकलीफ का एहसास मुझे है और यह एहसास ही मुझे बार-बार मथुरा की ओर खींचता है।आमतौर पर शिक्षा के बाद आदत है कि जहां पैदा हुए,पले-बड़े हुए वहां पर नौकरी करना नहीं चाहते,बाहर जाना चाहते हैं।लेकिन मेरा मन हमेशा इस बात से परेशान रहा कि मुझे मथुरा में उपयुक्त काम ही नहीं मिला वरना मैं जेएनयू से पढ़कर मथुरा लौट आता। मुझसे पूछें तो यही कहूँगा कि नौकरी दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी है।नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है।अपने लोग, परिवेश, भाषा,चिर-परिचित संस्कृति आदि आपके हाथ से एक ही झटके में निकल जाते हैं।अधिकतर नौकरीपेशा लोग अपने काम-धंधे में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि इस सांस्कृतिक जमा पूँजी के हाथ से निकल जाने से होने वाली सांस्कृतिक क्षति से अनभिज्ञ रहते हैं।लेकिन आजीविका की तलाश में इस सांस्कृतिक क्षति को हम सबको उठाना पड़ता है।हमारे पास कोई शॉर्टकट नहीं है कि इस क्षति से बच सकें।जन्मस्थान से पलायन एक स्थायी नियति है जिससे आधुनिककाल में पूरा समाज गुजरता है।

मैं मथुरा से जेएनयू पढ़ने के लिए 1979 में निकला तो जानता ही नहीं था कि कभी वापस नहीं लौट पाऊंगा।पढ़ते हुए मन में यही आशा थी कि कहीं मथुरा के आसपास ही नौकरी लग जाएगी और मथुरा से संपर्क-संबंध बना रहेगा।लेकिन बिडम्बना यह कि जैसा चाहा वैसा नहीं घटा।नौकरी की तलाश में ढाई साल तक इधर-उधर दसियों विश्वविद्यालयों में इंटरव्यू दिए।जेएनयू से पढाई खत्म करके निकलने के बाद दि.वि.वि. के दो कॉलेजों में इंटरव्यू देने के बाद तय किया कि कॉलेज में इंटरव्यू नहीं दूँगा और न नौकरी करूँगा।यही वजह थी कि विश्वविद्यालय में ही नौकरी के आवेदन करता रहा,परिचितों से खारिज होता रहा और अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नौकरी मिल गयी।

कोलकाता अप्रैल1989 में आया और तबसे यहीं पर हूँ।यहां आने के पहले दिल्ली में था तो मथुरा जल्दी-जल्दी जाता था लेकिन कोलकाता आने के बाद मथुरा आने-जाने का सिलसिला टूट गया।अब साल-छह महिने में आना जाना होता है।इसके कारण मथुरा में नए दोस्त नहीं बने।पुराने दोस्त लगातार उम्रदराज होते गए और उनमें से अनेक थक भी गए हैं।मथुरा से दूर हुआ तो सबसे बड़ा अभाव मुझे का. सव्यसाची का महसूस हुआ।सव्यसाची सही मायने में मथुरा में रचे-बसे थे,वहां के लोगों से घुले-मिले थे,उनसे मिलकर हमेशा मजा आता था,उनकी अनौपचारिक बोलने की शैली और तीखी भाषा हमेशा अपील करती थी,वे मुझे कभी कॉमरेड नहीं कहते ”पंडितजी´´ कहकर बुलाते थे।पता नहीं क्यों उन्होंने मेरे लिए पंडितजी सम्बोधन चुन लिया,मैं नहीं जानता,जबकि मुझे कोई और पंडितजी नहीं कहता था।सव्यसाची के पंडितजी कहने का असर अन्य लोगों पर भी हुआ,इसके कारण और भी कई मित्र पंडितजी कहने लगे। लेकिन इन चंद मित्रों को अलावा सब नाम से ही बुलाते रहे हैं।मेरे मित्रों का सीधे नाम से पुकारना और सव्यसाची जी का पंडितजी कहकर पुकारना अपने आपमें मेरे व्यक्तित्व के उन पहलुओं को अभिव्यंजित करता है जो मुझे सामाजिक विकास के क्रम में मिले हैं,मेरे व्यक्तित्व में दो किस्म के व्यक्ति हैं।एक वह व्यक्ति है जो पिता और संस्कृत पाठशाला ने बनाया,दूसरा वह व्यक्ति जिसे मथुरा –जेएनयू के मित्रों और जेएनयू की शिक्षा ने बनाया।मजेदार बात है कि मैं इन दोनों को आज भी जीता हूँ।मुझे अपने बचपन के संस्कृत के सहपाठी और अग्रज जितने अच्छे लगते हैं उतने ही जेएनयू के मित्र और कॉमरेड भी अच्छे लगते हैं।



मुझे मथुरा का अतीत बार-बार अपनी ओर खींचता है,लेकिन जेएनयू नहीं खींच पाता।जेएनयू से पढ़कर निकलने के बाद 1989 से लेकर आज तक में मात्र 4बार ही जेएनयू गया हूँ।लेकिन इस बीच मथुरा बार-बार गया,उन पुराने स्थानों पर बार- बार जाता हूँ जो मेरी बचपन की स्मृति का अंग हैं,या मेरी फैंटेसी का अंग हैं।अपने जीवन के तजुर्बे से यही सीखा है कि जन्मस्थान का मतलब कुछ और ही होता है,जन्मस्थान आपके रगों में,इच्छाओं और आस्थाओं में रचा-बसा होता है,वह आपके व्यक्तित्व के निर्माण में बुनियादी रूप से भूमिका निभाता है।वह कभी पीछा नहीं छोड़ता।