शनिवार, 4 जुलाई 2015

अव्यवस्थित लोकतंत्र और साहित्यिक पत्रकारिता

परिदृश्य-


आजादी के बाद का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य तकरीबन इकसार रहा है। पहले भी पत्रिकाओं का प्रकाशन निजी पहल पर निर्भर करता था, आज भी यही दशा है, पहले भी साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती और बंद होती थीं,यही सिलसिला आज भी जारी है।अनियतकालीन प्रकाशन इसकी नियति है। अधिकतर साहित्यिक पत्रिकाएं निजी अर्थव्यवस्था यानी संपादक के निजी निवेश पर निर्भर हैं, ये पत्रिकाएं संपादकीय जुनून का परिणाम हैं। साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्य का माहौल बनाती हैं। हिन्दी में पत्रिकाएं मूलतः गुट विशेष का प्रकाशन हैं,वे गुट विशेष के लेखकों को छापती हैं।

खासकर बुद्धिजीवीवर्ग में सन् 1970-71 के बाद सत्ता सुख का जो मोह पैदा हुआ उसने अधिकांश बड़े लेखकों को सत्ता के करीब पहुँचा दिया और इसका यह परिणाम निकला कि साहित्य और साहित्यकार की नई भूमिका का उदय हुआ। साहित्य अब परिवर्तनकामी कम और सत्ताकामी ज्यादा हो गया। आपातकाल इसका क्लासिक नग्नतम उदाहरण है। आपातकाल के बाद तो स्थितियां लगातार खराब ही हुई हैं। सत्ता के प्रतिष्ठानों के इर्दगिर्द साहित्यकारों को गोलबंद किया गया। कई व्यक्ति और संस्थान सत्ता के केन्द्र बनकर उभरे। इनके हस्तक्षेप के कारण साहित्य का स्वतंत्र विकास बाधित हुआ, साहित्यिक पत्रिकाएं मेनीपुलेशन और प्रमोशन का अस्त्र बन गयीं। चंद व्यक्ति महान बन गए,वे ही तय करने लगे कि कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है ! इस अर्थ में 1970-71 के बाद क्रमशः साहित्य की अवनति हुई ।

साहित्यिक विवेकवाद-

आज हमारे बीच में साहित्यिक पत्रिकाएं हैं,साहित्य भी है लेकिन संपादकीय विवेक नदारत है। विचारधारा है और उसके आधार पर धड़ेबंदी है,लेकिन साहित्यिक विवेकवाद गायब है। साहित्यिक पत्रिकाओं से संपादकीय विवेकवाद का नदारत होना बहुत बड़ी त्रासदी है। नियोजित बहसें हैं, प्रमोशन के लिए आलोचनाएं हैं, मांग-पूर्ति के आधार पर लिखा साहित्य है,किताबें हैं। स्वयं नामवर सिंह कह चुके हैं कि '' मैं फरमाइशी लेखक हूँ'' , वे यह भी रहस्य खोल चुके हैं कि उन्होंने '' कविता के नए प्रतिमान'' किताब को भारत भूषण अग्रवाल के कहने से साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखा था।

साहित्य में इनदिनों लेखन के आधार पर छोटे-बड़े लेखक का फैसला नहीं हो रहा, बल्कि रुतबा,संपदा,ओहदा और सरकारी रसूख के आधार पर फैसले हो रहे हैं। लेखक की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मूल्य नहीं है ,लेखक के सत्ता संबंध बड़ा मूल्य हो गया है,इसने साहित्यिक पत्रिकाओं में नए किस्म के नियोजित साहित्य विमर्श को प्रतिष्ठित किया है। जिसकी सत्ता में साख है ,वही बड़ा लेखक है। इसका परिणाम यह निकला कि लेखकों में सत्ता से जुड़ने की अंधी दौड़ शुरु हुई है। इसका सबसे बढ़िया केन्द्र बने अकादमिक संस्थान और लेखक संघ। इससे लेखक के कर्म और विचार में गहरी दरार पैदा हुई। लेखन का यथार्थ से संबंध खत्म हो गया। लेखन यानी शब्दों का उत्पादन इसका लक्ष्य है । आज लेखक है,साहित्यिक पत्रिकाएं हैं,संपादक भी है,लेकिन साहित्य का सामाजिक असर नहीं है, लेखक की कोई सामाजिक साख नहीं है। लेखक ने अपने सत्तासुख के कारण सभी किस्म के विमर्शों को प्रशंसा और प्रमोशन में संकुचित कर दिया, 'विचार मंथन' को'साहित्यिक इवेंट' में तब्दील कर दिया।

साहित्य उत्पादक या प्रकाशक -

हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता को अनेक लेखक प्रतिवादी पत्रकारिता मानते हैं, इस तरह की धारणा रखने वालों में सामान्य लेखक , दलित लेखक और स्त्री लेखिकाएं भी हैं। सामान्यतौर पर देखें तो हिन्दी का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य वैविध्यपूर्ण है और इसमें विधागत समृद्धि भी है। इसका स्वैच्छिक पहलकदमी के आधार पर प्रकाशन होता रहा है। वाल्टर बेंजामिन के अनुसार प्रतिवादी या परिवर्तनकामी पत्रकारिता या साहित्य में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है,महत्वपूर्ण है इसके उत्पादन की अवस्था। कईबार यह भी देखा गया है कि बेहतरीन क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को श्रेष्ठतम –व्यावसायिक कला रुपों में पिरोकर पेश किया जाता है। इससे क्रांतिकारी कला का स्वरुप प्रभावित होता है। इसलिए यह सवाल नहीं करना चाहिए कि पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ? या साहित्य की राजनीति क्या है,यह सवाल ही गलत है।सवाल यह होना चाहिए कला के उत्पादन की राजनीति क्या है ? ज्योंही इस सवाल पर विचार करेंगे सही रुप में प्रतिवादी संस्कृति को परिभाषित कर पाएंगे। बेंजामिन तर्क देते हैं कि सही अर्थ में प्रतिवादी संस्कृति उत्पादन की विशेषज्ञतापूर्ण प्रक्रिया का अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में प्रतिवादी संस्कृति कलाकार और दर्शक,निर्माता और उपभोक्ता के बीच की विभाजन रेखा को कम करती है। छोटे-बड़े या ऊँच-नीच,श्रेष्ठ और निकृष्ट के श्रम विभाजन को खत्म करती है। वह सबको सृजन के लिए प्रेरित करती है। हमें इस समूची बहस को प्रोडक्ट केन्द्रित न बनाकर प्रोडक्शनकेन्द्रित बनाना चाहिए। वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी पत्रिका संपादक साहित्य का उत्पादक नहीं बन पाया,लेकिन प्रकाशक बन गया।वह प्रोडक्ट बनाता है।

आधुनिककाल आने के साथ छापे की मशीन आई,लेखक की स्वायत्तता को सार्वजनिकतौर पर वैधता मिली,निजता और सार्वजनिकता के बीच में नए किस्म का वर्गीकरण हुआ जो पुराने वर्गीकरण से भिन्न था। पुराने जमाने में लेखक के अंदर निजी-सार्वजनिक का घल्लुघारा था। लेखक की स्वायत्तता पहलीबार नजर आई वह जो उचित समझे लिख सकता है ,इस अनुभूति को उसने प्रत्यक्ष वैधरुप में लागू किया। पहलीबार दो तथ्य सामने आए,इन दोनों तथ्यों की रोशनी में लेखन की परीक्षा होने लगी। पहला, लेखक का राजनीतिक नजरिया और दूसरा रचना की गुणवत्ता। लेखक के सही राजनीतिक नजरिए और साहित्यिक गुणवत्ता के बीच नए संबंध का जन्म हुआ। यह भी कही गयी कि जब राजनीति सही होगी तो अन्य चीजें भी दुरुस्त होंगी।

वाल्टर बेंजामिन का मानना है सामाजिक परिस्थितियां उत्पादन की अवस्था को तय करती हैं। और जब भौतिकवादी नजरिए से देखना आरंभ करते हैं तो विचार करते हैं कि सामाजिक संबंधों का तत्कालीन समय के साथ क्या संबंध था ? साहित्य के लिए यह महत्वपूर्ण सवाल है । वेंजामिन ने इसी प्रसंग में दो बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, पहला सवाल, साहित्य का अपने समय के उत्पादन संबंधों के साथ क्या संबंध है ? क्या वह उनको स्वीकार करता है ? क्या वह प्रतिक्रियावादी है ? अथवा उसका नजरिया परिवर्तनकामी है ? या वह क्रांतिकारी है ?इन सवालों पर विचार करने के पहले हम इस सवाल पर सोचें कि अपने समय के उत्पादन संबंधों के प्रति क्या एटीट्यूट है ? उनका नीतिगत नजरिया क्या है ? यह सवाल असल में सामयिक उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में साहित्य की भूमिका के जुड़ा है .इसका प्रकारान्तर से''तकनीक'' के सरोकारों से संबंध है.

वेंजामिन के अनुसार '' साहित्यिक तकनीक'' की अवधारणा के आधार पर देखेंगे तो पाएंगे कि साहित्यिक उत्पाद (प्रोडक्ट) सीधे सामाजिक या भौतिक मूल्यांकन के लिए उपलब्ध रहता है। साथ ही साहित्यिकतकनीक की अवधारणा के आधार द्वंद्वात्मक ढ़ंग से विवेचन को आरंभ किया जा सकता है। इसके जरिए साहित्य की रुप और अंतर्वस्तु की निरर्थक बहस से भी बचा जा सकता है।इसके अलावा प्रवृत्ति और गुणवत्ता के निर्धारकों की खोज की जा सकती है। बेंजामिन के अनुसार कृति की राजनीतिक प्रवृत्ति में साहित्यिक गुणवत्ता और साहित्य प्रवृत्ति शामिल है। साहित्य प्रवृत्ति में साहित्यिक तकनीक की प्रगति या प्रतिगामिता भी समाविष्ट है।

साहित्य के उत्पादन पर विचार करते समय इसकी अनिवार्य अवस्था पर भी सोचें । साहित्य किस तरह की अनिवार्य परिस्थितियों में पैदा हो रहा है। इससे लेखन की ठोस परिस्थितियों का पता चलेगा ,यह भी पता चलेगा कि लेखक के पास व्यवहार में कितनी स्वायत्तता है। इस समूची प्रक्रिया पर नजर रखते हुए सही राजनीति और प्रगतिशील साहित्यिक तकनीक के अन्तस्संबंध को समझने में मदद मिलेगी। मसलन्, साहित्यिक पत्रिकाएं लेखक –पाठक को सूचित कर रही हैं ,विवेचन पेश किया जा रहा है। लेखक परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर रहा है या दर्शक मात्र है ? हिन्दी पत्रिकाओं में लिखने वाले अधिकांश लेखक रुढ़िबद्ध नजरिए और रुढ़िबद्ध शैली के शिकार हैं। सवाल यह है कि क्या रुढ़िबद्ध लेखन के जरिए सामाजिक परिवर्तन संभव है ? इस तरह के लेखन का किस पर और कितना असर होता है ? इस तरह के लेखन ने लेखक और पाठ के बीच में अलगाव पैदा किया।

'एक्टविज्म ' या प्रतिगामिता -

साहित्यिक पत्रकारिता और खासकर वामपंथी साहित्यिक पत्रकारिता पर बुर्जुआ प्रेस के विकास का क्या असर हुआ है इस पर भी विचार करने की जरुरत है । मुश्किल यह है कि वाम पत्रिकाएं हस्तक्षेप के औजार की तरह इस्तेमाल होती रही हैं, यही काम इन दिनों दलित पत्रिकाएं भी कर रही हैं। इन पत्रिकाओं में बुर्जुआ अवस्था के स्वाभाविक रुझानों और प्रवृत्तियों को लेकर कोई गंभीर विवेचन नजर नहीं आता। ये सल में 'एक्टिविज्म' की पत्रिकाएं हैं,इनकी सतह पर दिखने वाली राजनीतिक प्रवृत्ति क्रांतिकारी लगती है लेकिन असल में वो प्रति-क्रांतिकारी भूमिका अदा करती है। मसलन् , दलित साहित्य पर हिन्दी पत्रिकाओं के अनेक विशेषांक आए हैं,तमाम दलित पत्रिकाएं छप रही हैं। इनकी समग्रता में क्या भूमिका उभरकर सामने आ रही है ? इनकी संस्कारगत सहानुभूति दलित के साथ है लेकिन वे इसके आगे उसे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनके पास दलितमुक्ति का कोई ब्लू-प्रिंट नहीं है। ये सभी पत्रिकाएं 'एक्टिविज्म' की केटेगरी में आती हैं। इनमें शाब्दिक जनतंत्र के सहारे दलित के प्रति सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की जा रही है।इसी शब्दकेन्दिकता (लोगोक्रेसी)के सहारे ही बुद्धिजीवियों का समूचा तंत्र खड़ा है। वे 'एक्टिविज्म' के जरिए साहित्य की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं। वेंजामिन के शब्दों में कहें तो इस तरह के लेखन की अंतर्वस्तु सामूहिक है लेकिन रुप प्रतिक्रियावादी है। फलतः ऐसी रचनाओं का असर क्रांतिकारी नहीं हो सकता।

अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं और लेखकों में सामूहिकताबोध बार-बार व्यक्त हुआ है। लेकिन पत्रिकाएं व्यक्तिगत प्रयासों से ही निकल रही हैं, सामूहिक प्रयासों से निकलने वाली पत्रिकाएं नगण्य हैं। राजनीतिक हालात की पार्टी नीति के अनुरुप व्याख्याएं करना या सत्ताधारी वर्गों के द्वारा प्रक्षेपित मसलों पर लिखना,क्रांतिकारी काम नहीं है,बल्कि प्रति-क्रांतिकारी कार्य है।

कायदे से हमें कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य में रुपान्तरण की प्रक्रिया और रुपान्तरण के क्रांतिकारी उपकरणों का पता होना चाहिए। हमें उत्पादक एपरेट्स और रुपान्तरण के रुपों का ज्ञान होना चाहिए। हमें इस बात का पता रहना चाहिए कि बुर्जुआ एपरेटस में क्रांतिकारी कलाओं और साहित्य रुपों को आत्मसात करके रुपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता होती। हम सोचें कि हमारे तमाम किस्म के क्रांतिकारी लेखकों-संगीतकारों आदि को फिल्मी दुनिया ने कैसे हजम कर लिया ? वाम लेखक मनोरंजन का साधन कैसे बन गया ?

राजनीतिक नजरिया-

हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में यह सवाल उठाया ही जा सकता है कि साहित्यिक पत्रिका का कोई राजनीतिक नजरिया है या नहीं, पत्रिका की राजनीतिक समझ के साथ उसमें प्रकाशित सामग्री का किस तरह का संबंध है ? सही राजनीति के तहत निकने वाली पत्रिकाओं की गुणवत्ता और खराब राजनीति या राजनीतिविहीन नजरिए से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं के चरित्र में किस तरह का फर्क होता है। हिन्दी में तीन तरह की पत्रिकाएं हैं पहली कोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका राजनीतिक नजरिया है,दूसरी कोटि में वे पत्रिकाएं आती है जिनका कोई राजनीतिक नजरिया नहीं है,जबकि तीसरीकोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका तदर्थवादी राजनीतिक स नजरिया है।

साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानी उनके मालिक-संपादक के आर्थिक पहलु के बिना पूरी नहीं होती, हमारे यहां कभी यह ध्यान ही नहीं दिया गया कि पत्रिका का आर्थिक बोझ संपादक कैसे उठाता है ? पत्रिकाओं में संपादक के आर्थिक संकट के विस्तृत ब्यौरे गायब हैं। हमने स्वतंत्र तौर पर भी कभी संपादक की आर्थिक बर्बादी को पत्रिकाओं में विषयवस्तु नहीं बनाया । पत्रिकाओं की आर्थिक बर्बादी की न तो दलों को चिंता है और न सरकार को ।

पत्रिकाओं के सर्कुलेशन का एक आयाम वितरण और डाक-व्यवस्था के मूल्य सिस्टम से जुड़ा है। सरकार ने कभी सोचा ही नहीं कि पोस्टल-चार्ज ज्यादा रहेगा तो साहित्य का सर्कुलेशन इससे प्रभावित हो सकता है। हमारे सांसदों ,लेखकों और प्रकाशकों ने भी कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया ।

साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन परिदृश्य की बुनियादी समस्या यह है कि संपादकों में अधिकतर पेशेवर नजरिया नहीं रखते । पेशेवर नजरिए के आधार पर पत्रिका का प्रकाशन नहीं करते। वे पूंजीवादी प्रकाशन प्रणाली के आदिम रुपों का इस्तेमाल करते हैं और आदिम वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं। इसके कारण वे बड़े पैमाने पर अपना विकास नहीं कर पाए हैं। दुखद यह है कि साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन की मददगार संरचनाएं समाज में एकसिरे से गायब हैं ।

साहित्यिक पत्रिकाएं ज्यादा से ज्यादा फलें-फूलें इसके लिए जरुरी है कि उनको सरकारी विज्ञापन प्राथमिकता के आधार पर राज्य और केन्द्र सरकार दे। साथ ही पत्रिकाओं को मिलनेवाले चंदे पर आयकर में राहत दी जाय। डीएवीपी और राज्य सरकारों के सरकारी विज्ञापनों के 25फीसदी विज्ञापन अनिवार्यतः साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। इसके अलावा विभिन्न मंत्रालयों से प्राथमिकता के आधार 25फीसदी विज्ञापन साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। पत्रिकाओं के पोस्टल वितरण के लिए सरल कानूनी व्यवस्था की जाय और पत्रिका वितरण को मुफ्त पोस्टल सुविधा दी जाय।

साहित्यिक पत्रिकाएं हमेशा से बड़े के खिलाफ छोटे की जंग रही है। बड़े कम्युनिकेशन या प्रतिष्ठानी कम्युनिकेशन और साहित्यिक कम्युनिकेशन के बीच में अंतर्विरोध रहा है, शासकवर्ग और साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच अंतर्विरोध रहा है। इस अंतर्विरोध को विस्तार देने की जरुरत है।

लेखक-

हिन्दी का साहित्यिक पत्रिकाओं ने लेखक की किस तरह की इमेज निर्मित की है और लेखक को वे किस रुप में देखते हैं,यह सवाल विचारणीय है। दुखद यह है कि आपातकाल के दौरान लेखक दायित्व पर अमूर्तन में बातें हो रही थीं, ''आलोचना'' ( जुलाई-दिसम्बर1975) को नमूने रुप में देख सकते हैं। आपात्काल के दौरान या उसके पहले या बाद में लेखक की सबसे बड़ी भूमिका है कि लेखक मात्र लेखक नहीं रहा बल्कि लेखक अब राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर सामने आता है, सत्ता का पुर्जा बनकर सामने आता है,साहित्य में राजनीति छा जाती है, यह सिलसिला 1960-61 के बाद से ही सामने आने लगा था,'प्रलेसं' की विरासत से इसका गहरा संबंध है।

साहित्य,साहित्यकार और राजनीति में संबंध का होना अच्छी बात है लेकिन इस क्रम में दलीय राजनीति का पक्षधर बन जाना लेखक की सबसे बुरी बात है। लेखक के लिए देश की जनता के हितों और अधिकारों से ज्यादा अपने दलीय आग्रहों से मोह पैदा हो गया, लोकतंत्र से बड़ा दल हो गया,राजनीति हो गयी, समाज के कटु-यथार्थ की बजाय उसने दलीय राजनीतिक यथार्थ को प्रमुखता देने का मन बना लिया ,न्याय की बजाय उसने सत्ता के हितों के इस या उस पहलू पर केन्द्रित होकर लिखना पसंद किया। इसने लेखक को पूरी तरह राजनीति के मातहत बना दिया।

मजेदार बात यह है कि लेखक आया था राजनीति को दिशा देने लेकिन व्यवहार में राजनीति ने लेखक को दिशा देना आरंभ कर दिया। इससे लेखक का राजनीतिक और नैतिक पतन हुआ। लेखक के इस तरह के पतन में राजनीतिक आग्रहों के अलावा आर्थिक कारणों की बड़ी भूमिका रही है। लेखक ने कभी गंभीरता से अपने आर्थिक कारणों की विवेचना ही नहीं की। लेखक के संकट का बुनियादी कारण आर्थिक है । यह संकट राजनीति का नहीं है यह साहित्य या विज्ञान का भी पैदा किया संकट नहीं है। इसके कारण हमारे समाज में लेखक का आकर्षण घटा है। दूसरी ओर तुलनात्मक तौर पर वैज्ञानिक,समाजविज्ञानी आदि के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

इस प्रसंग में मुझे उ.रा.अनन्तमूर्ति का ''भारतीय लेखकःअस्मिता की खोज'' नाम से दिया गया भाषण याद आ रहा है। यह भाषण उन्होंने अरविंद शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिया था और आपातकाल के दौरान ही ''आलोचना'' पत्रिका ने इसे छापा था। यह भाषण अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रोशनी डालता है। खासकर इस सवाल को बारीकी से उठाता है कि भारतीय लेखक की पहचान क्य़ा है ? लेखक की पहचान लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों से बनती है।जब लोकतंत्र पर हमले हो रहे हों,अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गयी हो, ऐसे में लेखक का सबसे पहला सवाल तो अभिव्यक्ति की आजादी के अपहरण से ही जुड़ा होगा , लेकिन अनंतमूर्ति को यह सवाल दिखाई ही नहीं दिया। इसी तरह आपातकाल में ''आलोचना'' पत्रिका ने कोई संपादकीय नहीं लिखा ,संपादक नामवर सिंह ने कोई निबंध इस प्रसंग में नहीं लिखा, मजेदार बात यह है लेखक आरिगपूड़ी का ''आलोचना '' ( अप्रैल-जून-1976) में '' लेखक का दायित्व'' शीर्षक से लेख छपा है लेकिन आपातकाल का कहीं जिक्र तक नहीं है। मैनेजर पांडेय का लेख छपा है शीर्षक है '' समकालीन इतिहास-विरोधी साहित्य-चिन्तन'', विजेन्द्र का '' समकालीन कविता और सामाजिक यथार्थ'' नामक लेख है, इस तरह के और भी कई लेख हैं लेकिन कहीं पर भी आपातकाल का कोई जिक्र तक नहीं है। गोया, आपातकाल कोई घटना ही न हो । सबसे रोचक बात यह कि जिस समय आपातकाल लगा यानी 25जून1975 के दिन उसके तत्काल बाद आलोचना ने धूमिल की स्मृति में विशेषांक निकाला ,धूमिल की मौत 10फरवरी 1975 को हुई थी,इस पूरे अंक में आपातकाल का जिक्र नहीं है, राजनीति से इस तरह की दूरी या अलगाव क्या किसी भी तर्क से स्वीकार्य है ? इस अंक में धूमिल की सात अप्रकाशित कविताएं छपी हैं,इनमें दो कविताएं ''प्रजातन्त्र के विरुद्ध'', और '' खेवली'' । ''खेवली '' कविता में कवि ने लिखा है- '' वहां न जंगल है न जनतंत्र / भाषा और गूंगेपन के बीच कोई /दूरी नहीं है/ ... और अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि सच को भी सबूत के बिना /बचा पाना मुश्किल है।'' ,इस अंक में धूमिल पर काशीनाथ सिंह,विनोद भारद्वाज,विश्वनाथ त्रिपाठी,गोविन्द उपाध्याय,रामकृपाल पाण्डेय,रामवक्ष,विष्णु चन्द्र शर्मा के लेख हैं ,लेकिन किसी में भी आपातकाल पदबंद तक का जिक्र नहीं है। यह अंक चूंकि आपातकाल के तत्काल बाद आया था,इसमें किसी भी रुप में आपातकाल का जिक्र न होना हमें सोचने को विवश करता है कि हम किस तरह की साहित्यिक पत्रकारिता विकसित करना चाहते हैं ? क्या साहित्यिक पत्रकारिता का सामयिक राजनीति से संबंध होना चाहिए ? क्या साहित्यिक पत्रकारिता को राजनीति से दूर रहना चाहिए ? क्या साहित्यिक पत्रिकाओं में सिर्फ साहित्य और उसके विधारुपों पर ही सामग्री होनी चाहिए या फिर उसमें इतिहास,संस्कृति,अर्थशास्त्र आदि विषयों पर भी सामग्री होनी चाहिए।

इस प्रसंग में सबसे बड़ा सवाल यह है कि साहित्यिक पत्रिकाओं ने किस तरह का लेखक निर्मित किया ? हमारा लेखक कैसा है ?उसकी मनोरचना और सामाजिक संरचना किस तरह की है ? आजादी के बाद पैदा हुए लेखक और पहले वाले लेखक में क्या अंतर है ? अनंतमूर्ति ने लिखा है आजादी के पहले के अनुभव से गुजरे लेखक '' आजादी की लड़ाई में शरीक थे और सोचते थे कि वे लोग भारत की आजादी की लड़ाई में शरीक थे और सोचते थे कि भारत की जनता के साथ उनका भाग्य भी जुड़ा है जबकि स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी भारत की जनता के साथ ऐसा कोई तादात्म्य महसूस नहीं करती है। वे स्वयं यह महसूस करते थे कि उन्होंने ऐसा बहुत कुछ लिखा है जो केवल लिजलिजा,भावुकताभरा और पुनर्जागरणवादी है। मुझे तो उनके हाथ से बुनी खादी के कपड़ों तक से ईर्ष्या है जो गाँधीजी के जमाने में एक समतावादी प्रतीक थे लेकिन आज ऐसा नहीं है क्योंकि वैसे कपड़े आज हमारे भ्रष्ट राजनेताओं द्वारा पहने जाते हैं। हम आज ऐसा आत्मविश्वास नहीं रखते कि हम एक साथ पूरी समग्रता से वैयक्तिक और सार्वजनीन हो सकते हैं। किसी भी महान कलासर्जना के लिए ऐसा आत्मविश्वास आवश्यक है। इसी का परिणाम है कि हम केवल'रीएक्ट' करते रहते हैं,'क्रीएट' नहीं करते हैं। हम निहायत असंगत चीजों की हिमायत करते हैं या फिर इसी की प्रतिक्रिया में उस अधिकारिक भारतीय ग्रामीण की प्रशंसा करते हैं –यह सब हमारी अपनी अनिश्चितताओं को मुखौटा पहनाने के लिए ।''(आलोचना,जुलाई-दिसम्बर,1975,)

यह सही है कि पुराने लेखक के पास स्वाधीनता संग्राम का अनुभव था, उस दौर की संवेदनाएं थीं जिनके आलोक में वह लोकतंत्र को देखता था, लेकिन मुश्किल यह है कि यह वह लेखक है जिसने अपने स्वभाव और नजरिए का पूरी तरह लोकतांत्रिकीकरण नहीं किया था। वह लोकतंत्र की चुनौतियों से अनभिज्ञ था। इस लेखक के पास गंभीर सामाजिक नजरिया था लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की जटिलता और उनके निर्माण की प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ था। वह लोकतंत्र में अपने पुराने उपनिवेशविरोधी वैचारिक नजरिए के साथ दाखिल हुआ और इस नजरिए के लेखकों को जल्द ही शीतयुद्धीय राजनीति ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। शीतयुद्धीय राजनीति की गिरफ्त से लेखक कैसे मुक्त हो इसे न तो रामविलास शर्मा जानते थे और न अज्ञेय ही जानते थे, जबकि दोनों के पास साम्राज्यविरोधी नजरिया था।फलतः लेखक के जीवन में लोकतंत्र को लेकर सही समझ पैदा होने की बजाय संशय और अनिश्चितता पैदा हुई । त्रासद यह पहलु था कि लेखक रह रहा था लोकतंत्र में लेकिन पुराने साम्राज्यवादविरोघी भावबोध के साथ ,साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को उसने लोकतांत्रिक भावबोध में रुपान्तरित नहीं किया।यही वह बिन्दु हैं जहां पर हम लोकतंत्र पर हमले के समय नामवर सिंह जैसे लेखक को असहाय पाते हैं,रामविलास शर्मा जैसे विचारक को गूंगा पाते हैं। एक अन्य समस्या यह है कि हमने लोकतंत्र और लेखक के रिश्ते की नये दौर और नई सामग्री के आलोक में ठीक से कभी मीमांसा ही नहीं की। लोकतंत्र-साहित्य और साहित्यकार के अंतस्संबंध पर विचार ही नहीं किया, उलटे लोकतंत्र को हिकारत,तिरस्कार और उपेक्षा के भाव से देखा। इसने लेखक को लोकतंत्र में रहने के बावजूद लोकतंत्र के प्रति बेगाना बना दिया ।

अनंतमूर्ति ने लिखा है '' नयी भारतीय अस्मिता का उभार नये और पुराने के मिश्रण से नहीं उठा है बल्कि दोनों के साथ जीने से जो द्वंद्व पैदा होता है उससे उठा है और यही द्वंद्व हमारी भाषाओं की प्रतिभा का बीज है !'' सवाल नए और पुराने के द्वंद्व का नहीं है, सवाल यह है कि लोकतंत्र में लेखक किस तरह की द्वंद्ववादी प्रक्रियाओं से गुजरता है ? द्वंद्ववादी प्रक्रियाएं किस तरह का लेखक निर्मित करती है ? क्या लेखक इस प्रक्रिया से बाकिफ है ?

अनंतमूर्ति ने दो साहित्यों के बीच तीन तरह के संबंधों की चर्चा की है। उन्होंने लिखा है '' पहला मालिक और नौकर का; दूसरा बराबरी का सम्बन्ध;तीसरा एक विकसित देश और विकासमान देश के बीच का सम्बन्ध जैसा पहले सम्बन्ध का उदाहरण गोरे लोगों का काले लोगों पर अपनी संस्कृति थोपने का तरीका,जैसाकि अमेरिका में हुआ है। फिर भी कोई भी आरोपण पूरी तरह से सफल से सफल नहीं हो सकता जैसे संगीत में,साहित्य में काले लोगों की अल्पसंख्यक संस्कृति ऐसे किसी रचनात्मक बिन्दु को सुरक्षित रख सकती है जिसका कि असर पूरे देश के साहित्य पर हो। अंग्रेजी और फ्रांसीसी साहित्य का मिलाप दूसरी तरह के सम्बन्ध का उदाहरण है। जब एक फ्रांसीसी इतिहासकार अंग्रेजी साहित्य का इतिहास लिखता है तो यह सम्भव है कि उसको प्रत्येक महत्वपूर्ण अंग्रेजी लेखक के पीछे कोई फ्रांसीसी लेखक नजर आये।''

''तीसरी तरह का सम्बन्ध पहले दो सम्बन्धों से कुछ ज्यादा जटिल है। मैं पूर्व-पश्चिम के सम्बन्ध जैसे जुमले का प्रयोग न करके आर्थिक विभाजनों के अन्तर्गत ऐसे सम्बन्धों को समझना चाहता हूँ क्योंकि उस तरह के जुमलों में जन्मी विचार पद्धतियाँ बहुधा सीधीसादी होती हैं। जैसाकि मेरी बात से स्पष्ट है इसका परिणाम या तो सीधी नकल है या कोरा कंजरवेटिज्म । क्योंकि मैं भारत में जन्मा हूं सिर्फ इसीलिए मैं यह सोचने से इन्कार करताहूँ कि टॉल्सटॉय या कि शेक्सपियर के बारे में सोचना कोई अपराध हैअथवा मेरी अपनी भाषा के महाकवि पम्प के बारे में सोचने में नहीं। जब मैं यह कहता हूँ तो मुझे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मेरी अपनी भाषा के उपन्यासकार कारन्थ के उपन्यास हालाँकि वे विश्वसाहित्य के समकक्ष नहीं रखे जा सकते जिनकी मैं प्रशंसा करता हूँ,लेकिन फिर भी मेरे लिए उनके उपन्यास ही मेरी संवेदना को निर्मित करने में ज्यादा प्रासंगिक हैं ।''

साहित्य में जिन तीन सम्बन्धों के बारे में अनंतमूर्ति ने लिखा है ,वे तीनों सम्बन्ध अपनी जगह सही हैं। लेकिन इसमें एक खास किस्म का स्थानीयतावाद भी है। साहित्य कम से कम स्थानीयतावादी नहीं होता। उसमें देशज भाषा की परंपराएं होती हैं और उनसे लेखक बनता है, प्रभाव ग्रहण करता है, यह सच है कि कारन्थ का उपन्याकार के रुप में अनंतमूर्ति पर असर ज्यादा होगा.लेकिन आधुनिककाल में साहित्य रुपों से लेकर नजरिए तक लेखक पर ग्लोबल परंपराएं और ग्लोबल वैचारिक संघर्ष असर डालते हैं। लेखक की संवेदना मात्र स्थानीय साहित्य से निर्मित नहीं होतीं,यह सही है कि स्थानीय ज्यादा प्रासंगिक होता है लेकिन लेखक के लिए स्थानीय वह भी है उसके युग का नहीं है। मसलन् ऐतिहासिक उपन्यास में लेखक मात्र स्थानीय तक सीमित नहीं रहता।उसे वर्तमान के आलोक में लंबी उड़ान भरनी पड़ती है।

अनंतमूर्ति ने सही कहा कि '' पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव या तो वस्तुस्थिति के साथ हमारी शिरकत को और भी मजबूत बना सकता है और या फिर हमारी समस्याओं की ओर से हमारे ध्यान और हमारी प्रासंगिकता को कहीं दूर उड़ा ले जा सकता है।यही समस्या की जड़ है-तब फिर अच्छे सम्बन्ध कैसे सण्भव हैं ? क्या कभी दो समान लोगों के प्रगाढ़ सम्बन्ध तब तक सम्भव हैं जबकि ऐसा प्रयास केवल इकतरफा हो ? अमेरिका को हमारे गुरुओं की जरुरत है,लेकिन क्या वह कभी हमारे कवियों और उपन्यासकारों की जरुरत महसूस करेगा और उनको उतना महत्त्व देगा जितना कि हम अमरीकी लेखकों को देते हैं ? उन्हें ऐसा महत्त्व देना भी जरुरत से ज्यादा है,और यह हमारी दूसरी समस्या है कि हम पाश्चात्य देशों की राय के प्रभाव में आकर बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टिकोण के अमरीकी लेखकों को स्वीकार लेते हैं। ''

भारतीय लेखकों में ''पीछे देखनेवाले,इधर-उधर देखने वाले अथवा आगे देखने वाले ' लेखक पाए जाते हैं। अनंतमूर्ति ने लिखा- '' पीछे देखनेवाले लोग इस भ्रान्ति को पालते हैं कि समस्याओं के समाधान भूतकाल को लौटाने में ही हैं।(लेकिन हमारे भूतकाल का कौन-सा पहलू ? ये पुनर्जागरणवादी लोग इस मामले में भी बहुत ही काइयां हैं; ये लोग हमारे भूतकाल के उस संशयवादी और विवेकवादी पहलू को बिलकुल अनदेखा कर देते हैं ।) अगर उच्चवर्गीय भारतीयों की यह स्थिति है तो कॉसमोपोलीटन लोग हमेशा इधर-उधर देखते हैं सोचते हैं,हम अमेरिका जैसे होंगे ? रुस जैसे होंगे ? ब्रिटेन जैसे ? याकि फ्रान्स जैसे ? वे लोग भी भारत के विरासती वैभव के बारे में बहुत बढ़-चढ़कर बोलते हैं,फिर भी अपना बौद्धिक भोजन पाश्चात्य देशों से प्राप्त करते हैं। वे लोग वियतनाम में अमरीकी अत्याचारों को लेकर चिन्तित हो सकते हैं लेकिन वे अपने ही प्रन्त में आंध्र प्रदेश के जमींदारों के द्वारा गरीब हरिजनों की झोपड़ियाँ जला देने पर कुछ नहीं बोलते हैं। वे गिसबर्ग के विरोध की सराहना करते हैं ,उनके सारे भद्दे तरीकों की सराहना करते हैं,लेकिन जब एक बहुत ही ईमानदार मगर उग्र विधानसभा सदस्य ने एक भ्रष्टमंत्री को चप्पलों से पीटा तो वे सहसा चौंक गए, इसलिए कि यह उनको असभ्य तरीका लगा। वे लोग हिप्पियों की पोशाक पहनते हैं मगर कपड़ा वह विदेशी टेरीलीन होता है। ''

लेखक को भारत के विकास के लिए क्या करना चाहिए या क्या सोचना चाहिए । अनंतमूर्ति ने लिखा है '' एक अग्रदर्शी भारतीय को मानवता के मेलजोल के लिए काम करना होगा जो केवल नयी वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों और नये राजनैतिक एवं आर्थिक ढ़ाँचे से ही सम्भव हो सकेगा,जोकि पुनःअंतःसंबंधित है। ''

अधीर लेखक और गुमशुदा पाठक-

मौजूदा दौर हम सबके लिए गंभीर समस्याएं लेकर आया है। साहित्यिक पत्रिकाएं छप रही हैं, साहित्य भी छप रहा है, लेकिन साहित्य का कोई असर समाज पर नजर नहीं दिख रहा।हम सोचें साहित्य क्यों प्रभावहीन हो गया ? पहले साहित्य या कलाओं में कोई चीज दाखिल होती थी तो अन्य कला रुपों में उसका असर दिखता था समाज में वैचारिक विमर्श में असर नजर आता था । विगत तीस सालों में तेजी से आमलोगों में अधीरता का विकास हुआ है। नया लेखक अधीर है। पाठक सोया हुआ है। दूसरी ओर साहित्य सृजन और आलोचना ,संस्कृति और राजनीति आदि के बीच में संबंध पूरी तरह कट चुका है । अखबारों की अंतर्वस्तु ने एक नए माहौल को जन्म दिया है,अब अखबार में जो छपा है वो सच है,इससे लेखन में यह भाव पैदा हुआ है कि मैंने जो लिखा है वह सच है। लेखक अपने लिखे को लेकर अधीर है, बेचैन है,बहुत जल्दी स्वीकृति चाहता है,यश चाहता है, इसे साहित्य की नई अग्नि कह सकते हैं। इसमें घी का काम किया है पाठक की सुप्तावस्था ने । बेचैन लेखक और सुप्त पाठक का नया संबंध उबरकर सामने आया है। आज के पाठक की सुप्त मानसिक अवस्था को निर्मित करने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। यह पाठक चाहता है कि अखबारों में उसके हितों का ख्याल रखा जाय। मीडिया का पाठक जब मीडिया का उपभोग करता है तो वह और कुछ नहीं करता बल्कि सिर्फ उपभोग करता है। अखबार के पाठक को रोज अपना भोजन चाहिए, उसे रोज अपने हितों की अभिव्यंजना पढ़ने या देखने की आदत हो गयी है और यही उसकी अधीरता का मूल स्रोत भी है। पाठक की अधीरता का अखबार के संपादकों ने नए स्तंभों का आरंभ करके खूब दोहन किया है। वे विभिन्न स्तंभों के जरिए पाठक की अधीरता,जिज्ञासाओं और सवालों के समाधान पेश करते रहते हैं। इस क्रम में अबाधित और लक्ष्यहीन ढ़ंग से सूचनाओं की बारिस हुई है और पाठक ने बिना सोचे बिचारे प्रक्षेपित सूचनाओं को हजम भी किया है। इस क्रम में पाठक में सामंजस्य और समझौते की भावना पैदा हुई है। हल्का और सतही लेखन क्रमशः पाठक की रुचि का अंग बन गया । फार्मूलाबद्ध लेखन पाठक का अंग बन गया और इसने गंभीर लेखन की अखबारों से छुट्टी कर दी।नए लेखन सिस्टम में शब्द तय हैं और स्थान तय है। अंतर्वस्तु को अब तयशुदा स्थान के लिहाज से पेश करना होता है । वे रचनाएं ज्यादा पढ़ी जा रही हैं जो गंभीर नहीं हैं। गंभीर रचना के पाठक क्रमशः कम होते जा रहे हैं। इसका असर साहित्य पर भी पडा है। साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक कम हुए हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में हलके लेखन की मांग बढ़ी है। साहित्य में हलके साहित्य की मांग बढ़ी है।

बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवी खासकर मीडियाजनित बुद्धिजीवी बेचैन आत्मा की तरह समाज में मंडराते दिखते हैं। आज लेखक की आत्मा, अंतरात्मा, ईमानदारी,निष्ठा,प्रतिबद्धता,साहित्यिकता आदि का कोई मूल्य नहीं है। आज ऐसा लेखक निर्मित हुआ है जो हर किस्म के समझौते करने को तैयार है। हर चीज के साथ समझौता करने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं इसे वह महसूस ही नहीं करता। इसलिए वह बार बार अपनी असफलता का रोना रोता रहता है वह नहीं जानता कि वह असफल क्यों हो रहा है ? सच यह है कि हमने साहित्य की महिमा और शक्ति को ठंड़े बस्ते में बंद करके विज्ञान,समाजविज्ञान,दर्शन आदि का महिमामंडन किया है। अब हम साहित्य में एक ही चीज खोजते हैं वह है पैसा,अफसोस यह है कि वह भी मिलता नहीं है! हमने साहित्य की खोज बंद कर दी है।

शुक्रवार, 12 जून 2015

ग़ज़ल के मर्म की तलाश में


   ग़ज़ल पर फ़िदा पाठकों की किल्लत नहीं है। सवाल यह है  ग़ज़ल पर इतने पाठक फ़िदा क्यों हैं ? भारत में जिस तरह श्रृंगार रस के चाहने वालों की परंपरा रही है, उसी तरह फारसी और उर्दू की परंपरा में ग़ज़ल के चाहने वालों की परंपरा भी रही है। नवरसों में जिस तरह श्रृंगार रस का वर्चस्व रहा है। उसी तरह उर्दू कविता में ग़ज़ल का वर्चस्व रहा है। ग़ज़ल की लोकप्रियता के कारण ही उसको अनेक स्तरों पर रचने वाले शायरों की जमात पैदा हुई। ग़ज़ल के बहुस्तरीय रुपों को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि ग़ज़ल दरबारी और बाजारु है।
      ग़ज़ल एक तरह की नहीं बल्कि अनेक किस्म की लिखी गयी है। फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि ग़ज़ल क्या है ? क्या वह स्थायी रुप में कायम है अथवा बदलती रही है ? लेकिन यह बात सच है कि ग़ज़ल पर श्रृंगार –रस का गहरा असर है। जिस तरह श्रृंगारवादी कवि स्त्रीकेन्द्रित पुंसवादी नजरिए का प्रतिपादन करते थे वैसे ही ग़ज़ल लेखक भी औरतों पर पुंसवादी नजरिए से लिखते थे।
     फारसी में 'ग़ज़ल' का अर्थ था औरतोंका जिक्र करना,उनके इश्क़का दम भरना और उनकी मुहब्बतमें मरना। दिलचस्प बात यह थी कि ग़ज़ल में शायर लोग इश्को-मुहब्बतमें इस तरह व्यस्त थे कि उनको परिवारके अन्य सदस्यों के साथ मुहब्बत का ख्याल ही नहीं आया। आरंभिक दौर में ग़ज़ल में काम-भावना से संबंधित विषयों की भरमार थी। इस दौर में कोमल और रसभरी भावनाओं पर केन्द्रित रचनाएं लिखी गयीं। लेकिन ग़ज़ल यहीं तक रुकी नहीं रही। उसमें कालान्तर में ईश्वर और दार्शनिक विषयों का समावेश होने लगा। इससे ग़ज़ल में मिश्रण की परंपरा शुरु हुई।
     आरंभिक दौर के प्रेमकेन्द्रित ग़ज़ल शायरों का हाल यह था कि वे विचारों की जंग तो लड़ना जानते थे लेकिन विचारों का जोखिम उठाना नहीं जानते थे, मसलन् , वे प्रेम या इश्क पर कविता लिखना जानते थे लेकिन सामाजिक बन्धनों से संघर्ष करना नहीं जानते थे। वे पारिवारिक मर्यादाओं को तोड़ना नहीं जानते थे। इनके अलावा इस तरह के शायरों में 'हकीकी ' और 'मजाज़ी ' दो किस्म के शायर थे। इनमें 'हकीकी' शायरों में निराकार ईश्वर का जलवा मिलता है । वे उसे इसी संसार में प्रेयसी के रुप में साकारभाव में देखना चाहते हैं। सूफी शायरों ने इस परंपरा का जमकर विकास किया। उनकी शायरी में मानवीय प्रेम खूब व्यक्त हुआ है।मसलन्, 'रियाज़' खैराबादीने लिखा-
  '' हम आँख बन्द किये तसव्वुरमें पड़े हैं।
    ऐसेमें कहीं छमसे वोह आ जाय तो क्या हो ??''
इसी भाव को इकबाल ने इसतरह व्ययक्त किया-
          '' कभी ऐ हक़ीक़ते -मुन्तजिर! नज़र आ लिबासे-मज़ाज़में।
           कि हजारों सजदे तड़प रहे हैं,मेरी जबीने-नियाजमें।।''
इश्क के सूफियाना अंदाज़ को 'मीर' ने लिखा -'' इश्क बिन यह –अदब नहीं आता।''
आधुनिककाल में इश्क पर लिखने वाले शायरों में दो तरह के शायर मिलते हैं एक वे हैं जो 'स्वानुभव' के आधारपर लिख रहे थे,दूसरे वे हैं  जिन्हें कभी तिरछी नजरसे न तो घायल होना नसीब हुआ , न कभी किसी की चौखट पर सर टेकना मयस्सर हुआ। इनमें अधिकतर नकली आशिक शायर हैं। ये वे शायर हैं जिनकी शायरी में आँसुओं का दरिया बहता नजर आएगा लेकिन जिन्दगी में आंसू की कभी इन शायरों ने एक बूँद भी नहीं गिरायी।
        ऐसे भी शायर रहे हैं जिन्होंने एकबार जिसे दिल दे दिया फिर दिल सारी जिन्दगी उसके नाम कर दिया। ये अनुभवहीन शायर हैं, ये लोग 'खुदा मुहब्बत है, और मुहब्बत खुदा है।'के नारे इर्द-गिर्द शायरी करते रहे हैं। 'मीर' संभवतः पहले शायर हैं जिनके यहां यह परंपरा आरंभ होती है ,'मीर' ने लिखा-
         '' चाहें तो तुमको चाहें,देखें तो तुमको देखें।
          ख़्बाहिश दिलोंकी तुम हो.आंखोंकी आरजू तुम।।''
        ''ज़ौक़'' ने लिखा
          '' मैं ऐसे साहिबे –अस्मत परी-पैकरै आशिक हूँ।
            नमाजैं पढ़ती हैं हूरें,हमेशा जिसके दामन पर।''  
इनमें ही दूसरी कोटि बाजारु शायरों की है।यह कामलोलुप,विषयासक्त लोगों की शायरी है।इस तरह की शायरी पर वेश्याओं के संपर्क और दरबारी संस्कृति का गहरा असर है। चंचल और खण्डिता नायिका का विचार इनके असर से ही आया है। इस तरह के शायरों को कामुक शायर कहना समीचीन होगा। बाजारी इश्क के अलावा बेवफ़ा माशूक आदि विषयों को शायरों ने दरबारों से ग्रहण किया।
     मुश्किल यह भी है कि दिल्ली के शायरों और लखनऊ के शायरों का अनेक विषयों पर नजरिया एक जैसा नहीं था। मसलन्, लखनऊ के शायरों में निराशा और असफलता की अभिव्यंजना बहुत कम मिलती है जबकि दिल्ली के शायरों में यह खूब है, इसका प्रधान कारण है लखनऊ में जिन दिनों अवधप्रांत के दरबारों चमक मार रही थी ,, इसके कारण अवध के शायरों में एक बड़ा अंश श्रृंगार रस और दरबारी संस्कृति से प्रभावित था। वहीं उस समय दिल्ली के शायरों ने कष्ट में जिन्दगी गुजारी। यह कष्ट उनकी शायरी के लिए वरदान साबित हुआ। इसलिए देहलवी शायरों ने दुख दर्द, पीड़ा,भरण-पोषण की चिन्ताएं,असफलता आदि विषयों पर जमकर लिखा।
  जोश मलाहाबादी ने लिखा- '' मेरे रोनेका जिसमें क़िस्सा है।
                          उम्रका बहतरीन हिस्सा है।।''    
जिगर मुरादाबादी ने लिखा - '' इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं ।
                          सब जुदा हो जायें,लेकिन ग़म जुदा होता नहीं ।।
कहने का आशय यह कि लखनऊ और दिल्ली के शायरों के परिवेशगत अंतर ने उनकी शायरी और नजरिए को गहरे प्रभावित किया। दिल्ली के शायरों की आपदाओं में जवानियाँ गुजरीं. वहीं दूसरी ओर लखनवी शायरोंने भोग-विलास में आँखें खोली थीं ।
        यह भी हकीकत है कि 'मीर' जब लखनऊ जाते तो उनको भी लखनऊ की रंगीन फ़िजा आकर्षित करती और कह बैठते-'' मिलो इन दिनों हमसे एकरात जानी। कहीँ हम कहाँ तुम कहाँ फिर जवानी।'

   सन् 1780 ई. के पूर्व 'हबीब' का तसव्वुर स्पष्ट नहीं था। उसके लिए संज्ञा,विशेषण,क्रिया,सम्बोधन आदि सब स्त्री लिंग के न होकर पुलिंग के व्यवहृत होते थे। हबीब का अर्थ है 'प्यारा' । यानी जिसे प्यार किया जाय वोह हबीब है। ग़ज़लमें सबसे पहले हसरत देहलवी (1772-1797 ई.) ने स्त्री को हबीब का दर्जा दिया। तबसे लखनवी शायरी में स्त्री के लिए हबीब का प्रयोग होने लगा।  धीरे धीरे यही शायरी जनानी शायरी होती चली गयी। उसमें श्रृंगार रस का वर्चस्व बढ़ता चला गया। 

मंगलवार, 9 जून 2015

ग़ज़ल के रुपान्तरण की प्रक्रिया


आधुनिककाल आने के बाद ग़ज़ल का रुप वही नहीं रह गया जो उसके पहले था। खासतौर पर उपन्यास विधा और अखबारों के उदय और प्रसार  ने ग़ज़ल के विधागत चरित्र को सीधे प्रभावित किया। प्रेस और उपन्यास ने आधुनिककाल में यथार्थवादी नजरिए ,विस्तीर्ण भाव से लिखने और समसामयिकता को साहित्य-सृजन का अनिवार्य अंग बनाया। इससे लेखक,लेखन और समाज के बीच में नए किस्म के रिश्ते, नए किस्म के लेखकीय संस्कारों की शुरुआत हुई। यही वजह थी कि गालिब को यह कहना पड़ा 'कुछ और चाहिए वुसअत मेरे बयाँ के लिए'
      गालिब पहले बड़े शायर हैं जिन्होंने ग़ज़ल को नई जिन्दगी दी,नए विषयों और नए नजरिए की ओर मोड़ा।ग़ज़ल को दैनन्दिन जीवन की घटनाओं और सामयिक राजनीतिक घटनाओं से जोड़ा। पहलीबार ग़ज़ल को आंदोलन और राजनीति से सीधे जोड़ने की परंपरा आरंभ हुई। गालिब ने जो सिलसिला आरंभ किया उसे पं.वृजनारायण चकबस्त ने नई बुलंदियों पर पहुँचाया। देशभक्ति और राजनीतिक आंदोलनों से ग़ज़ल को सीधे जोड़ा।
     उल्लेखनीय है ग़ज़ल लिखने वाले शायरों में कई विचारधाराओं के मानने वाले लोग थे।ग़ज़ल एक ही विचारधारा के दायरे में नहीं रही है। इसमें दलीय पक्षधरता भी रही है। नये और पुराने के बीच में वैचारिक और सर्जनात्मक जंग भी रही है।  लोग कहते हैं ग़ज़ल सूत्र है,नज्म भाष्य है।ग़ज़ल संकेत है,नज्म स्वीकृति।नज्म काव्य है,ग़ज़ल सूक्ति है। नज़्मों में समसामयिक घटनाओं और रीतिरिवाजों के बारे में जमकर लिखा गया। इससे नज़्म और राजनीति, नज़्म और आंदोलन,नज़्म और समसामयिकता का नया अंतस्संबंध सामने आया। खासकर राजनीतिक विषयों पर लिखी नज़्में  खूब जनप्रिय हुईं। इस तरह की रचनाओं का तात्कालिक असर खूब होता था,लेकिन तात्कालिक जरुरत खत्म होते ही ये बेकार हो जाती हैं, यह सिलसिला आज भी बरकरार है।
      नज़्म से विचारधारात्मक प्रौपेगैण्डा में बहुत मदद मिली।  आशय यह कि प्रचार खत्म तो नज़्म भी खत्म। इसके विपरीत ग़ज़ल में विधा के तौर पर दीर्घजीवी भाव रहा है। मजेदार बात है उर्दू के तमाम बड़े शायरों ने नज़्म और ग़ज़ल दोनों लिखी हैं। वे इन दोनों ही रुपों का समय देखकर इस्तेमाल करते थे। तमाम प्रगतिशील शायरों की जनप्रियता में नज़्म की भी  भूमिका रही है।
    ग़ज़ल में अप्रत्यक्ष और संकेतात्मक शैली प्रमुख रही है। एक शायर ने लिखा भी है कि ग़ज़लका वार पत्थरकी तरह सीधे न होकर दुशालेमें लिपटा हुआ होता है। ग़ज़ल में कहना है तो उसकी सीमाओं में रहकर ही कह सकते हैं । मसलन्, दानीसे शायर 'अदम' कह रहा है-
' शिकन न डाल जबींपर शराब देते हुए।
यह मुसकराती हुई चीज़ मुसकराके पिला।।'
अब यदि कोई कमअक्ल इसे मयखाने के लिए लिखी शायरी समझे तो हम क्या करें! इसीलिए कहा गया है  ग़ज़ल को जानने के लिए गहरे साहित्यबोध की जरुरत होती है। उसे साहित्यिक कॉमनसेंस या यांत्रिक ढ़ंग से नहीं समझा जा सकता।
मसलन्, व्यवस्था परिवर्तन के सवाल पर आनंदनारायण मुल्ला का यह शेर देखें-
'' निजामे-मैकदा साक़ी! बदलनेकी जरुरत है।
 हजारों हैं सफें जिनमें , न मैं आई, न जाम आया।। ''
ढोंगी और नेताओं पर 'मीर' ने लिखा-
    '' मसजिदमें इमाम आज हुआ,आके वहाँसे।
     कल तक तो यही 'मीर' ख़राबत नशीं था।।'
चेतावनी के प्रसंग में 'मीर' का शानदार शेर पढ़ें-
  '' ऐ वोह कोई जो आज पिये है शराबे-ऐश।
   ख़ातिरमें रखियो कलके भी रंजो-ख़ुमारको।।''

कहने का आशय यह कि ग़ज़लगो शायर हर बात इशारेमें और परदेमें बयान करता है। यही वजह है कि कभी वह विश्ववेदनाको अपनी वेदना बनाकर ग़मे-जानाँके परदे में पेश करता है। मसलन्, '' जो ग़म हुआ,उसे ग़मे –जानाँ बना लिया।।''      

शुक्रवार, 5 जून 2015

ग़ज़ल और सम-सामयिकता की समस्या

  
ग़ज़ल आज सबसे जनप्रिय विधा है। इसके पढ़ने-सुनने वाले बेशुमार हैं। इसके बारे में आमतौर पर सोशलमीडिया में बातें नहीं होतीं,लोग ग़ज़ल के अंश शेयर करते हैं. पूरी ग़ज़ल भी शेयर करते हैं, लेकिन उसकी समस्याओं पर भी कभी ठहरकर सोचना चाहिए। आमतौर पर ग़ज़ल सामयिक विषयों पर नहीं लिखी जाती। शायर का इस संदर्भ में विश्वास यह रहा है कि ग़ज़ल ऐसी हो जो सदाबहार हो,कालातीत हो। ग़ज़ल लेखक अपने सामने घटने वाली भयानक से भयानक घटनाओं को देखकर भी उन पर नहीं लिखते ,असल में शायर की कोशिश रहती है कि इस विधा को समसामयिकता से दूर रखा जाय और इसमें उन विषयों पर लिखा जाय जो चिरकाल तक इस विधा को बनाए रखें। कालातीत सार्वभौम प्रयोग की यह शानदार विधा है। इस विधा में रमने के लिए शायर के पास गम खाने,दुख सहने और व्यथा को काव्यात्मक रुपान्तरण की शक्ति अर्जित करनी पड़ती है।
     अमूमन दो तरह शायर मिलते हैं। एक हैं नज्म-गो शायर और दूसरे हैं ग़ज़ल-गो शायर। इन दोनों में अंतर है। नज्म –गो शायर आपदाओंको अतिरंजित भाव से देखता है, उससे प्रभावित होता है उसका अतिरंजित चित्रण करता है। जबकि ग़ज़ल-गो शायर आपदाओं को अपने अंदर ज़ज्ब कर लेता है,फिर जो जज़्बात उसके मुँहसे निकलते हैं वही ग़ज़ल कहलाते हैं। उर्दू में मीर,गालिब आदि ऐसे ही शायर हुए हैं। जिनके जीवनकाल में अनेक मूलगामी परिवर्तन आए,आपदाएं आईं,दिल्ली लुटी,इन्कलाब आए लेकिन वे अंदर ही अंदर घुटते रहे,मिटते रहे। मीर तो यह कहकर ही चुप हो गए-
                                   दीदनी है शिकस्तगी दिलकी।
                                    क्या इमारत ग़मोंने ढ़ाई है।।
गालिब ने लिखा – चिराग़े-मुर्दा हूँ मैं बे जबाँ गोरे-गरीबाँका-
ऐसा नहीं है कि ग़ज़ल-गो शायरों ने सामयिक घटनाओं पर नहीं लिखा.लेकिन संक्षिप्त और नपे-तुले शब्दों में लिखा है। 'मीर' के जीवनकाल में क़ादिर रहीलाने शाहआलम बादशाहकी आँखोंमें नीलकी सलाइयाँ फेरकर उन्हें ज्योतिहीन कर दिया था। इस दर्दनाक घटना को 'मीर' ने अपनी ग़ज़ल के एक शेरमें यूँ व्यक्त किया है-
          शहाँ कि कुहले-जवाहर थी खाके-पा जिनकी।
          उन्हींकी आँखोंमें फिरती सलाइयाँ देखी।।
इसी घटना को इकबाल ने नज्म में पेश किया है जिसमें काफी अशआर हैं। लेकिन आधुनिक जिंदगी के दवाबों के चलते इधर के वर्षों में ग़ज़ल पर समसामयिकता का दवाब बढ़ा है।
 मसलन् शायर यगाना के साम्प्रदायिकता पर लिखे चंद शेर पढ़ें -
'पढ़के दो कलमें अगर कोई मुसलमाँ हो जाय।
फिर तो हैवान भी दो रोज़में इन्साँ हो जाय!!  
सब तेरे सिवा खाफ़िर,आख़िर इसका मतलब क्या ?
सिर फिरा दे इन्साँ ऐसा खब्ते-मज़हब क्या ?
महराबोंमें सजदा वाजिब ,हुस्नके आगे सजदा हराम।
ऐसे गुनहगारोंपै खुदाकी मार नहीं तो कुछ भी नहीं।।
दुनियाके साथ दीनकी बेगार अलअमाँ ।
इन्सान आदमी न हुआ,जानवर हुआ।।
बस एक नुक़्त-ए-फ़र्जीका नाम है काबा।
किसीको मरकज़-तहकीक़का पता न चला।।
मज़हबसे दग़ा न कर,दग़ासे बाज़ आ।
किस कामका हज़! मकरो-रियासे बाज़ आ।।

ईमान तो कहता है कि इन्साँ बन जा।
बन्देकी मददको आ,खुदासे बाज़ आ।।

इसी तरह आनन्दनारायण मुल्ला ने लिखा- 
मैं फ़कत इन्सान हूँ ,हिन्दू-मुसलमाँ कुछ भी नहीं।
मेरे दिलके दर्दमें तफ़रीके-ईमाँ कुछ नहीं।।
असर लखनवी ने लिखा-
       मसजिदेवाजसे इक रिन्द यह कहते उट्ठा
       ''काफिर अच्छे हैं दिलाज़ार मुसलमानोंसे'' ।।

  

बुधवार, 3 जून 2015

मध्यकालीन पापुलर कल्चर है मुशायरा


पापुलर कल्चर के मध्यकालीन अरब रुपों में मुशायरा सबसे प्रसिद्ध है। मुशायरे की परंपरा का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है, इस्लाम धर्म के उदय के पहले से अरब देशों में मुशायरे हुआ करते थे। यह पुरानी पापुलर कल्चर का प्रभावशाली रुप है और आज भी इसकी साख बरकरार है।
अरब देशों में कबाइली समुदायों के मेले,जलसों आदि के समय सामान्य अशिक्षित जनता के मनोरंजन में मुशायरों की बड़ी भूमिका थी। इसके अनेक रुप हैं।एक है सीमित शायरों में शेरगोई ,दूसरा है विशाल जनसमूह में शेरगोई,तीसरा है शायरों में प्रतिद्वंद्विता। इसमें खास किस्म तुकबंदी की भी महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी।
मथुरा में इस परंपरा का बड़ा असर लावनी,झूलना,सवैया आदि कहनेवाले कवि दलों पर सहज ही देखा जा सकता है। इसे साहित्यिक अखाड़ेबाजी का मध्यकालीन रुप कहें तो समीचीन होगा। इसे कवियों ने शौकिया अपनाया। यह उनके पेशेवर लेखन का अंग नहीं था।
इस शौकिया शैली की खूबी यह थी कि इसके जरिए किसी को भी निशाना बनाया जा सकता था चाहे वह व्यक्ति कितना ही बड़ा हो। बारातों से लेकर अन्य जलसों में इसके शानदार प्रयोग देखने को मिलते थे। बारातियों को सम्बोधित कविता की परंपरा इससे ही निकली है जिसमें सभी बारातियों को कवित्तों के जरिए निशाने पर लाकर खड़ा किया।इससे बारातियों का मनोरंजन होता था। सामने जब कोई परिहास में कवित्त कहता था तो उसका सामने वाले को जवाब कवित्त में ही देना होता था, चौबों में शादी के समय शाखोच्चार और बाद में कवित्तगोई की परंपरा यहीं से निकली है। बारात जब खाने जाती तो छतों पर चढ़कर कवितों के जरिए औरतें बारातियों पर काव्य हमले किया करती थीं, अनेक जातियों में इसके भिन्न रुप भी देखने को मिलते थे।
असल बात यह कि बाराती और घराती एक-दूसरे पर कवित्तों के जरिए नहले पर दहला मारने की कोशिश किया करते। यही मुकाबलेबाजी मुशायरोंं में आम रही है। यही स्थिति लावनी कहने वाले दलों की काव्यभिड़ंत में भी नजर आती थी।
ईरान में मुशायरे 10वीं शताब्दी में सामने आते हैं जबकि भारत में 16वीं शताब्दी में मुशायरे का जन्म होता है। आरंभ में फारसी के मुशायरे होते थे क्योंकि विदेशों से फारसी के शायर बड़ी संख्या में भारत आने लगे थे। खासकर दिल्ली,गोलकुंडा,बीजापुर इसके बड़े केन्द्र थे। कालान्तर में मगलशासन के पतन के दौर में रेख्ते (उर्दू का पूर्व नाम) के मुशायरे होने लगे। फारसी रस्मी रह गयी थी और उसकी जगह रेख्ता ने ले ली थी। रेख्ता के मुशायरों को मुराख्ते कहा गया। आरंभ में मुराख्ते दरबार तक सीमित थे बाद में आम जनता के बीच होने लगे।कालान्तर में मुशायरे के नियम बनाए गए, कहने के तरीके तय किए गए, मसलन गजल कैसे कहें, सभ्यता और असभ्यता के दायरे तय किए गए.अध्यक्ष तय किया गया। नियमों के पालन न करने को बदतमीजी कहा गया। एक झलक देखें-
कमर बान्धे हुए चलनेको याँ सब यार बैठे हैं
बहुत आगे गये,बाकी जो हैं तैयार बैठे हैं ।।

सोमवार, 1 जून 2015

मथुरा के तीन कमाल के साथी

             
       
हम सबकी आदत है कि हम महान लोगों को खोजते हैं और महान लोगों की संगति में रहने का सपना देखते हैं,लेकिन महान लोग मिलते नहीं हैं,खासकर मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग के लोगों का जीवन सामान्य और साधारण किस्म के लोगों के बीच में ही आगे बढ़ता है। सामान्य लोगों में ही असामान्य मेधावी और परिश्रमी लोग पैदा होते हैं। मथुरा के अपने अनुभव ने बार-बार यह शिक्षा दी है कि अपने आसपास के लोगों को देखो और उनमें मित्र बनाओ,वहां आपको ऊर्जा मिलेगी,प्रेरणा मिलेगी। प्रेरणा कभी दूर के लोगों से नहीं मिलती,वह तो आसपास के लोगों से मिलती है। आसपास के लोगों में ही अच्छे विचार और अच्छे आचरण की खोज करो तो यथार्थपरक जीवनशैली निर्मित करने में मदद मिलेगी।

आपातकाल के दिनों में जिन तीन मित्रों से परिचय हुआ वे तीनों मेरी यादगार का अभिन्न हिस्सा हैं। इन तीनों से मैंने बहुत कुछ सीखा। ये तीन थे कॉमरेड सव्यसाची (श्यामलाल वशिष्ठ), कॉमरेड ऋषिकांत और कॉमरेड वीरेन्द्र सिंह। इन तीनों से एक साथ मुलाकात नहीं हुई ,सबसे पहले सव्यसाची मिले,बाद में इन दोनों से मुलाकात हुई और फिर तो हम चारों की रोज मुलाकात होती, कभी सव्यसाची के यहां, कभी पार्टी दफ्तर में,कभी पार्टी मीटिंग के दौरान,कभी वैसे ही। लेकिन हम चारों को रोज मिलना ही था। बाद में इस कड़ी में डा.हरीशंकर जुड़ गए,जिन पर मैं बाद में कभी लिखूँगा।

सामान्यतौर पर मित्रों को हम स्वार्थवश याद करते हैं लेकिन हम चारों रोज मिलते थे लेकिन हमारा कोई निजी स्वार्थ नहीं था, हम चारों में सव्यसाची बीएसए कॉलेज में राजनीतिविभाग में प्रवक्ता थे। बाकी हम तीनों छात्र थे। अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ते थे। सव्यसाची,वीरेन्द्र और ऋषि के पास साइकिल थी,मैं पैदलयात्री था। बाद में मुझे भी पिता की कृपा से साइकिल मिल गयी। हम चारों में एक-दूसरे की समस्याओं को सुनने और जानने की बेहद उत्सुकता हुआ करती थी, लेकिन कभी कोई एक-दूसरे की समस्याओं में हस्तक्षेप नहीं करता। हमने आपस में अघोषित तौर पर तय कर रखा था कि निजी समस्याओं से निजी तौर पर लड़ेंगे,लेकिन उन पर आपस में विचार-विनिमय जरुर करेंगे। इस तरह हमने निजी और सार्वजनिक जीवन में लक्ष्मणरेखा खींच ली थी।

मथुरा का माहौल बड़ा विलक्षण था वहां आम लोगों में सजगता तो बहुत थी, लेकिन दृष्टिगत सजगता का अभाव था। आम मध्यवर्गीय लोगों में राजनीतिक खबरों पर तीखी बहस करने की आदत थी,हर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर विभिन्न किस्म के राजनीतिक विषयों पर बहस करते लोग मिल जाते थे,चाय की दुकान, पार्क, मंदिर के बाहर अमूमन बहस करते लोग मिल जाते थे और इन बहसों में कोई अपरिचित भी शामिल हो सकता था । इससे पता चलता था कि आमलोगों में सजगता है, राजनीतिक सचेतनता है, लेकिन दृष्टिकोण का अभाव है। हमलोग रोज अपने तजुर्बों को एक-दूसरे के साथ साझा करते,विश्लेषित करते । इस प्रक्रिया में हमलोगों की समस्याओं पर खुलकर सोचने की बुद्धि का तेजी से विकास हुआ। संयोग की बात थी कि सव्यसाची,ऋषि और वीरेन्द्र पहले से माकपा के सदस्य थे,मैं भी जल्द पार्टी सदस्य बना लिया गया।

सव्यसाची की मथुरा शहर में एक आदर्शवादी कम्युनिस्ट के रुप में साख थी,आम मध्यवर्गके राजनेता, बुद्धिजीवी,शिक्षक,छात्र आदि में उनको बेहद सम्मान की नजर से देखा जाता था। वे ऋषि के घर में एक छोटे से कमरे मे भाड़े पर रहते थे। उनकी बेहद सरल और छोटी जीवनशैली थी। बमुश्किल उनके पास तीन-चार जोड़ी कुत्ता-पाजामा थे,एक चारपाई,एक स्टोव,एक साइकिल तीन मूड़ा यही कुल जमा उनकी संपत्ति थी। आरंभ में वे खाना बाजार से खरीदकर खाते थे। उन दिनों सव्यसाची रिक्शाचालक यूनियन के सचिव हुआ करते थे और डेम्पियर में जहां से रिक्शावाले खाना खाते थे वहीं से सव्यसाची एक रुपये की 6 रोटी दाल खरीदकर लाते और दिन में दोबार वही खाकर रहते, जिस दुकानदार से वह रोटी लाते थे वह भी रिक्शा चलाता था ,बाद में सव्यसाची ने उसे भी पार्टी मेम्बर बना लिया और रिक्शाचालक यूनियन का पदाधिकारी बना दिया।

सव्यसाची में मित्र बनाने और दिल जीतने की अद्भुत क्षमता थी,वे अपनी सादगी और विचारों से सहज ही प्रभावित कर लेते। सव्यसाची सहज,ईमानदार, निष्ठावान मनुष्य थे। वे गंभीर मार्क्सवादी साहित्य कम पढ़ते थे लेकिन दैनंदिन जीवन की घटनाओं को मार्क्सवादी ढ़ंग से कम्युनिकेट करने की उनमें विलक्षण क्षमता थी। सव्यसाची की पार्टीलाइफ की लाइफलाइन थे वीरेन्द्र और ऋषि। इन दोनों की मदद के बिना वे कोई काम नहीं कर पाते।

सव्यसाची का एक गुण यह भी था कि वे संस्कृति और उससे जुड़े सवालों पर स्वतंत्र रुप से संगठन बने,इसकी जरुरत को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। वे मानते थे कि कम्युनिस्ट पार्टी के सांगठनिक ढॉंचे में रहकर संस्कृति के कामों को करना संभव नहीं है,यही वजह थी कि मथुरा में उनकी प्रेरणा और युवामित्रों के सहयोग से लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रचार-प्रचार के लिए 'जन सांस्कृतिक मंच' नामक संगठन का निर्माण हुआ । इस संगठन का मकसद था बृहत्तर समाज में फैले युवाओं को अपने करीब लाना,उनमें लोकतांत्रिक मूल्यों का बोध पैदा करना । इस संगठन का मुख्य लक्ष्य था संस्कृति और समाजसेवा के सवालों पर युवाओं में सजगता पैदा करना। उन दिनों छात्रों के लिए एसएफआई जैसा संगठन था लेकिन युवाओं के लिए कोई संगठन नहीं था,इसके लिए प्रगतिशील युवा मोर्चा नामक संगठन बनाया गया। उल्लेखनीय है कि माकपा के पास उनदिनों युवाओं के लिए कोई संगठन नहीं था, डीवाईएफआई का गठन बहुत बाद में हुआ।

चौधरी वीरेन्द्र के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि वह बेइंतिहा मेहनती,निष्ठावान और मिलनसार था। वह इन दिनों यूपी पुलिस में उच्चपदस्थ पुलिस अधिकारी है। पुलिस में रहते हुए उसने कभी अपने व्यक्तित्व पर दाग नहीं लगने दिया। वह यूपी के उन चंद पुलिस अफसरों में है जो ईमानदारी से अपनी पगार में ही अपना गुजारा करते हैं,उसने कभी जीवन में रिश्वत नहीं ली। वीरेन्द्र के बारे में हम सभी यही मानकर चल रहे थे कि वह तो आगे चलकर होलटाइमर बनेगा,उसकी काम करने की अपार क्षमता हम सबको प्रभावित करती थी। खासकर सव्यसाची का जितना प्रकाशन का काम था,उसे वही संभालता था,उसकी मदद के बिना 'उत्तरार्द्ध' जैसी पत्रिका का सारे देश में पहुँचना संभव ही नहीं था। सव्यसाची के साहित्य को आम जनता में पहुँचाने की उन दिनों एकमात्र वीरेन्द्र पर जिम्मेदारी थी।

वीरेन्द्र,ऋषिकांत और मैं हर रोज कभी सुबह तो कभी शाम को लंबी बातचीत के लिए मिलते, हम तीनों के पास असंख्य राजनीतिक समस्याएं हुआ करतीं जिन पर हमें बहस करनी होती थी, सुबह मिलते तो होलीगेट पर पहलवान कचौड़ीवाले की दुकान पर पहले कचौड़ी-जलेबी का कलेवा करते, बाद में ,भाटिया रेस्टोरैंट में जाकर बैठकर कई कप चाय पीते और जमकर बहस करते। हम तीनों में ऋषिकांत उग्र मार्क्सवादी की तरह पेश आता,वीरेन्द्र शांत मार्क्सवादी की तरह पेश आता,ये दोनों किसी भी समस्या के अनंत विकल्प बनाकर सोचने में माहिर थे। विकल्पों में रखकर मार्क्सवाद को कैसे लागू करें शायद यह पद्धति इसी दौर में हमतीनों में विकसित हुई। हमने विकल्प की परिधि को बहुत ही लोचदार बनाया हुआ था। हम विकल्प को वहां तक रखते जहां तक आदमी हमारे हाथ में रहे,हमारे संपर्क में रहे।

सही विकल्प वह जो आदमी को साथ में बनाए रखे। अमूमन कॉमरेड विकल्प के चक्कर में आदमी को भगा देते हैं,लेकिन उनके पास विकल्प रह जाता था । कोरा विकल्प मार्क्सवाद की मौत है। मार्क्सवाद तब ही काम का है जब आदमी केन्द्र में रहे और विकल्प हाशिए पर रहे। वह विकल्प किसी काम का नहीं है जो आदमी को भगा दे। हमने आदमी को केन्द्र में रखा विकल्प को हाशिए पर रखा, इससे हमें सैंकड़ों युवाओं को मित्र बनाने में सफलता मिली। मथुरा जैसे शहर में इसी आधार पर मैं सैंकड़ों छात्राओं को एसएफआई में शामिल करने में सफल रहा। हमतीनों की रणनीति थी कि मित्र बनाओ,अपना दायरा बड़ा करो, इसके चाहे कुछ देर के लिए विचारों को स्थगित भी करना पड़े । हमारे लिए आदमी प्रधान था,विकल्प गौण था।

हमने जिन युवाओं को मित्र बनाया उनको कभी नहीं छोड़ा ,उनपर कभी कोई विचार नहीं थोपा ,साथ ही उनको कभी अपने विचारों की परिधि के बाहर जाने नहीं दिया। हमारे लिए विचार की परिधि वहां तक फैली हुई थी जहां तक हम मनुष्य को बांधे रख सकें। विचार का काम है मनुष्य को बांधना, विचार को हम वहां तक लचीला रखें जहां तक मनुष्य को आराम मिले,सहजता का अनुभव हो। हम तीनों यही सोचते थे विचार तो मनुष्यों की सेवा के लिए हैं,मार्क्सवाद तो मनुष्यों की सेवा के लिए।

हम मनुष्य को मार्क्सवादी बनाने की कोशिश नहीं करते बल्कि आदमी की जिंदगी के ढांचे में मार्क्सवाद को ढालने की कोशिश करते थे, और इससे हमें अनेक लाभ हुए,हमें सैंकड़ों दोस्त बनाने,उनका दिल जीतने का मौका मिला। विचारों में लचीलेपन की कला मथुरा में इन मित्रों के बीच में ही विकसित हुई। खासकर वीरेन्द्र और ऋषिकांत की बुद्धि विकल्पों की खोज में खूब चलती थी। हम तीनों ने मिलकर सैंकड़ों किताबें पढ़ीं,उन पर आपस में जमकर बहस की,हमारे बीच में किताबें ईंधन की तरह हुआ करती थीं। हम सबमें वीरेन्द्र बहुत ज्यादा किताबें पढ़ता था। दिलचस्प बात यह थी कि वीरेन्द्र और ऋषिकांत में होलटाइमर बनने की इच्छा थी, लेकिन संयोग की बात कि हंसी-हंसी में वीरेन्द्र ने यूपी में थानेदारी परीक्षा दी और वह पास होकर हमारे बीच सेअचानक गायब हो गया। वह मन ही मन किसी नौकरी की तलाश में था, यह बात कभी -कभी कहता था लेकिन कोई प्रयत्न नहीं करता था। पहलीबार प्रयास किया और वह सफल रहा। वह थानेदार हो गया। हम सब बड़े दुखी हुए,मास्साब तो एकदम टूट से गए,क्योंकि वीरेन्द्र उनकी नींव था। हम सब सोचने लगे कि क्या मार्क्सवाद की शिक्षा असफल रही ? कई लोग मानते थे कि मार्क्सवादी को पुलिस में नहीं जाना चाहिए, लेकिन मेरी और कई लोगों की राय थी कि नौकरी के लिए कहीं पर भी जाया जा सकता है। मार्क्सवादी होने का मतलब यह नहीं है कि होलटाइमर ही बना जाय।

एक नागरिक के नाते हम मार्क्सवाद से बहुत कुछ ऐसा सीखते हैं जिससे बेहतरीन नागरिक की भूमिका निभा सकें। मार्क्सवाद का मतलब है बेहतरीन नागरिक बनाना। मार्क्सवाद का मतलब सिर्फ क्रांतिकारी या होलटाइमर बनाना नहीं है। हम तीनों बार –बार इस सवाल पर बातें करते कि भारत जैसे समाज में मार्क्सवाद का लक्ष्य क्या हो सकता है ? कई बार लगता पेशेवर कम्युनिस्ट बनना ही महान कार्य है, लेकिन भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की दशा देखकर अंत में यही सोचते कि पेशेवर कम्युनिस्ट की जिंदगी संभालने लायक कम्युनिस्ट पार्टी के पास संसाधन ही नहीं हैं। एक बेहतर कम्युनिस्ट वह है जो आत्मनिर्भर हो, नौकरी करता हो,जो कम्युनिस्ट नौकरी नहीं करता ,वह न तो मार्क्सवाद को बचा सकता है और न अपने को बचा सकता है। आजीविका कमाने का काम छोड़कर सभी मार्क्सवादी यदि पेशेवर कम्युनिस्ट बन जाएं तो न तो कम्युनिस्ट पार्टी बनेगी और न समाज बनेगा। एक अवस्था के बाद आम लोग कम्युनिस्ट पार्टी में आना बंद कर देंगे। इसलिए बेहतर है कम्युनिस्ट समाज में घुलेमिले रहें,वैसे ही जिस तरह पानी में मछली रहती है। वीरेन्द्र के पुलिस में जाने के बाद मथुरा एसएफआई का महामंत्री मुझे बनाया गया।

ऋषिकांत की खूबी यह थी कि वह शानदार कार्यकर्ता के अलावा बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी भी था। के.आर. कॉलेज की ग्राउण्ड पर इसकी गेंदबाजी के कहर को मैंने कईबार देखा है, वह कम्युनिस्ट न बनता तो यह तय था नामी क्रिकेटर बनता,उसकी क्रिकेटर के रुप में मथुरा में धाक थी। ऋषिकांत बेहद संवेदनशील था। हम सबमें संवेदनशीलता के मामले में वह सबसे आगे था। उसने अनेक चीजें साथ में काम करते हुए विकसित कीं इनमें मूल्यवान चीज थी उसकी विलक्षण विश्लेषण क्षमता। वीरेन्द्र और ऋषिकांत में एक और गुण था कि वे दोनों बहुत सुंदर पोस्टर भी बनाते थे। उनके बनाए पोस्टरों से आए दिन मथुरा की दीवारें भरी रहती थीं। हमलोग हर छह महिने में कॉलेजों में दीवार रंगने , नारे लिखने आदि के काम करते थे। मथुरा में जब भी नुक्कड़ सभाओं का सिलसिला शुरु होता था,सव्यसाची,मैं,वीरेन्द्र और ऋषिकांत हमेशा साथ ही रहते। ऋषिकांत ने बाद में अपनी नौकरी की और कुछ समय बाद नौकरी छोड़कर कई सालों तक पार्टी होलटाइमर के रुप में दिल्ली और अंत में मथुरा में काम किया। कालांतर में उसकी परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि उसने होलटाइमरी छोड़ दी और आजीविका के कामों में व्यस्त हो गया।


रविवार, 31 मई 2015

आरएसएस संगठन नहीं दुकान है

                      
        आरएसएस के नायक और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की 125वीं जयन्ती को बड़े धूमधाम से मनाने का फैसला लिया गया है। मोटे तौर पर यह फैसला स्वागत योग्य है। हमारे स्वाधीनता सेनानियों के ऊपर सरकार कुछ भी करे हमें स्वागत तो कम से कम करना चाहिए। इस बहाने कुछ चर्चाएं होंगी, गोष्ठियां होंगी, प्रकाशन निकलेंगे,जलसे होंगे ,बाजार में सरकारी खजाने से पैसा निकलकर आएगा। कुछ बाबू,बुद्धिजीवी,राजनेता और स्वयंसेवी संस्थाएं खाएंगी-कमाएंगी,इस लिहाज से मुझे सरकारी जलसे हमेशा अच्छे लगते हैं। यह एक तरह का सरकार की ओर से सांस्कतिक पूंजी निवेश है।

समस्या जलसे की नहीं है, समस्या अम्बेडकर पर माला चढ़ाने और जलसे को लेकर नहीं है, यह तो कोई भी दल कर सकता है, सवाल यह है कि क्या अम्बेडकर के विचारों का आरएसएस और भाजपा पर कोई असर है ? क्या अम्बेडकर के विचारों से संघ के विचार से मेल खाते हैं या फिर अम्बेडकर पर जलसे करना एक खाना पूर्ति है, वोटबैंक राजनीति का अंग है ? हमें यही लगता है कि मोदी सरकार,संघ और भाजपा के लिए अम्बेडकर वोट बैंक राजनीति के प्रचार का अंग है। यह असल में दुकानदार की 'सेल-सेल' की मार्केटिंग रणनीति का अंग है।

उल्लेखनीय है आरएसएस अकेला ऐसा संगठन है जो कभी अपनी आत्मालोचना नहीं करता, अपने वैचारिक दृष्टिकोण को हमेशा सच और अपरिवर्तनीय मानता है। इन दिनों संघ के लोग सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं और हेकड़ी का आलम यह है कि टीवी टॉक शो तक में अन्य को बोलने में बाधाएं देते हैं, जानते हैं गलत बोल रहे हैं लेकिन अहंकार में डूबे हुए नेता की तरह प्रवक्ता बोलते रहते हैं। मनमोहन सिंह के अंतिम दो सालों में कांग्रेसी मंत्रियों में यही राजनीतिक अहंकार देखा गया था, आम जनता राजनीतिक अहंकार से नफरत करती है। लेकिन आरएसएस –भाजपा के लोग लगातार इस राजनीतिक अहंकार पर हिन्दुत्व की मालिश कर रहे हैं।

संघियों का मानना है देश में अब तक सबकुछ गलत हुआ है, शिक्षा से लेकर विज्ञान तक भारतीय परंपरा की उपेक्षा हुई है,अतःभारत की उपेक्षित परंपराओं और विश्वासों को नए सिरे से सत्ता के जरिए आम जनता पर थोपने की जरुरत है। वे यह भी मानकर चल रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता जहर है,जबकि अम्बेडकर ने धर्मनिरपेक्षता को भारत,भारतीय संविधान और भारतीय समाज की आत्मा के रुप में पेश किया।

संघ के संगठन लगातार धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहे हैं। आम जनता में धर्मनिरपेक्षता का मतलब मुस्लिम तुष्टीकरण कहकर साम्प्रदायिक घृणा भरते रहे हैं।इस चक्कर में संघ के विचारक आए दिन यही बताते रहते हैं कि वे तो देश का सुधार करने के लिए सरकार में आए हैं। संस्कृति से लेकर राजनीति तक उनको सुधार की चिन्ता इस कदर सताए हुए है कि वे यह मानने को तैयार ही नहीं है उनके अंदर जो वैचारिक खोट है, उसको भी दूर करने की जरुरत है ।

यह विलक्षण सत्य है कि संघ के विचारों में स्थापना से लेकर आजतक कोई मूलगामी वैचारिक बदलाव नहीं हुआ है। यानी वे यह मानकर चल रहे हैं कि उनकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा निष्कलंक और निर्दोष है। वे इन दिनों बल्लभभाई पटेल से लेकर अम्बेडकर तक सबका वैचारिक चीरहरण करने में लगे हैं। इस चक्कर में संघ और उसके नेतागण बार-बार वैचारिक गर्भपात के शिकार भी हुए हैं।

मोदी सरकार के आने के पहले से संघ कई दशकों से समाज में वैचारिक प्रदूषण फैलाने का काम करता रहा है। अम्बेडकर जयन्ती के आयोजन उसी कड़ी का अंग है। साथ ही वे पटेल-अम्बेडकर आदि के जरिए वोटबैंक की राजनीति कर रहे हैं और धर्मनिरपेक्ष विचारों की परंपरा को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे पटेल-अम्बेडकर के पास अपनी विचारधारा में परिवर्तन करने के लिए नहीं जा रहे ,बल्कि वे तो उनकी विचारधारा का विकृतभाष्य रचने के लिए जा रहे हैं। उनके अंदर धर्मनिरपेक्ष बनने की भावना अभी तक नहीं जगी है उलटे वे धर्मनिरपेक्ष नेताओं की विचारधारा को हिन्दुत्ववादी घोषित करने का प्रयास कर रहे हैं।

अम्बेडकर और आरएसएस में जमीन-आसमान का अंतर है। मसलन्, संघ के लोग कई दशकों से गऊ-हत्या बंद हो, का नारा लगा रहे हैं। उनके इस नारे का ही असर था कि भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने गऊहत्या पर उनके मत को मान लिया। अम्बेडकर आदि मनीषियों का इस मसले पर भिन्न नजरिया था। इसी तरह अस्पृश्यता के सवाल को अम्बेडकर जिस नजरिए से देखते हैं, संघ वैसे नहीं देखता। संघ के लिए जाति और वर्ण ईश्वरकृत हैं। अम्बेडकर यह नहीं मानते। वे अस्पृश्यता को गुलामी सभी बदतर मानते हैं।

अस्पृश्यता दूर करने के जितने तेज प्रयासों की समाज को ,खासकर हिन्दू समाज को जरुरत है ,उसे संघ महसूस नहीं करता। आज भी देश के बहुत बड़े हिस्से में समाज का एक वर्ग अस्पृश्यता का शिकार है। अस्पृश्य हमेशा अस्पृश्य रहता है। संविधान में तमाम हकों के बाद भी अस्पृश्यता के खिलाफ कोई संघर्ष संघ और उनके जैसे हिन्दू संगठनों ने नहीं चलाया। गऊ के लिए आंदोलन करने वालों को कभी अस्पृश्यता के खिलाफ एक वाक्य बोलते नहीं सुना।

सवाल उठता है कि संघ ने अस्पृश्यता के खिलाफ कोई आंदोलन क्यों नहीं किया ? समाज में जिसे अस्पृश्य घोषित कर दिया गया उसे हमेशा के लिए समाज,संस्थान और संस्कृति से बहिष्कृत कर दिया गया। अस्पृश्यता को तकदीर का खेल,पुनर्जन्म के पाप का परिणाम मानकर वैधता प्रदान की गयी, संयोग की बात है कि एकमात्र अम्बेडकर ने इस पहलु पर सबसे निर्मम ढ़ंग से रोशनी डाली। उन्होंने लिखा कि अस्पृश्यता तो गुलामी से भी बदतर व्यवस्था है। आज भी देश के विभिन्न इलाकों में अछूतों के मुहल्ले हैं और उनमें आना-जाना-रहना एकदम मुश्किल है। कोई भी सामान्य मनुष्य इन बस्तियों में रह नहीं सकता। इन बस्तियों में किसी भी किस्म की नागरिक सुविधाएं दूर-दूर तक नजर नहीं आतीं।

इन दिनों एक मुस्लिम लड़की को घर न मिलने पर मीडिया ने हंगामा खड़ा कर दिया लेकिन अस्पृश्य बस्तियों पर कभी कोई न्यूज आइटम तक नहीं आया। यही मीडिया कभी झांककर नहीं देखता कि सवर्णों की बस्तियों और हाउसिंग सोसायटी में दलितों को घर भाड़े पर मिलने में किस तरह की असुविधा का सामना करना पड़ता है। समाज में अस्पृश्य और पृश्य के रुप में घिनौना वर्गीकरण अभी भी जारी है। कहने का अर्थ है कि अस्पृश्यता को दूर करने के लिए भी यदि सामाजिक स्तर पर प्रयास किए जाएं तो देश में बहुत कुछ परिवर्तन हो सकता है। अस्पृश्यों के प्रति हिंसा, अलगाव,वर्जनाओं, और घृणा को हर स्तर पर चुनौती दी जाय। जो लोग चुनौती दे रहे हैं उनका साथ देने की मनोदशा तैयार करें। संघ की मुश्किल यह है कि वह अस्पृश्ता के उन्मूलन के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है वह तो हिन्दुत्व के लिए वचनवद्ध है। हिन्दुत्व के पैकेज में अस्पृश्यता निवारण के काम नहीं आते।

कुछ अर्सा पहले गुजरात के किसी शहर में ही अस्पृश्यों के लिए अलग श्मशान होने की बात सामने आई थी।यह स्थिति तब की है जब गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी थे। सवाल यह है यदि किसी महापुरुष की जयन्ती मना रहे हो तो कम से कम उसके विचारों को सामने रखकर अपने कर्म-दुष्कर्म और कुकर्म की मीमांसा तो कर लो ! संघ ,भाजपा और उनके लगुए-भगुए कभी महापुरुषों के विचारों कीरोशनी में अपनी आत्मालोचना नहीं करते , सवाल यह है कि वे क्यों नहीं करते ? कभी पलटकर बोलें तो सही कि आखिरकार अम्बेडकर के विचारों से वे इतने दूर क्यों हैं ? अम्बेडकर के कौन से विचार हैं जिनको वे अपने संगठन की विचारधारा में शामिल करना चाहते हैं ?

सवाल यह है कि संघ क्या धर्मनिरपेक्ष महापुरुषों की महिमा का गायन सिर्फ दिल बहलाने,जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए करता है या वह सच में कुछ उनसे सीखना भी चाहता है ? अब तक रवैय्या यह है संघ के लिए भारत के धर्मनिरपेक्ष महापुरुष तो किसी दुकानदार की मौसमी 'सेल -सेल' से ज्यादा महत्व नहीं रखते। जिस तरह दुकानदार हर किस्म का माल बेचता है, लेकिन उसकी किसी माल विशेष से मुहब्बत नहीं होती। उससे जुड़े विचार से मुहब्बत नहीं होती। उसकी तो मुनाफे और बिक्री में दिलचस्पी होती है। यही हास संघ और मोदी सरकार का है।

अधिकतर दुकानदार पुराने विचारों,मूल्यों आदर्शों को अपने जेहन में बनाए रखते हैं। जबकि वे नए युग के अनुरुप आई नयी वस्तु की बिक्री करते हैं, उसका उपभोग भी करते हैं, लेकिन उस वस्तु से जुड़े नए विचारों और आदतों को आत्मसात नहीं करते। यही हाल आरएसएस और उसके शाखामृगों और शाखा नायक का है। वरना विवेकानंद से लेकर महात्मा गांधी तक ,भगतसिंह से लेकर अम्बेडकर तक सबकी संघ के यहां जयन्ती मनायी जाती हैं लेकिन ये सभी जयन्तियां दुकानदार के भाव से मनायी जाती हैं। उत्सवधर्मी भाव से मनायी जाती हैं। जितनी देऱ उत्सव उतनी देर बातें,उसके बाद बातें बंद, इसलिए हम तो कहते हैं संघ एक दुकान है और संघी दुकानदार हैं, ये बेचें कुछ भी ,लेकिन रहेंगे हिन्दुत्ववादी ही।


मथुरा के चार हजार चौबे

       
          जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने मथुरा के चौबों के बारे में लिखकर बहस का मुद्दा खड़ा कर दिया। काटजू ने क्या कहा यह तो मैं नहीं पढ़ पाया लेकिन हमारे पुराने मित्र गंगानाथ चतुर्वेदी के सुपुत्र माधव चतुर्वेदी ने आज फोन करके जब चौबों के बारे में बात की तो मैंने सोचा कि क्यों न इस पहलू को लिख ही देते हैं। उल्लेखनीय है माधव जब बात कर रहा था तो मैंने परिचय पूछा तो उसने पिता का नाम बताया तो मैंने कहा वे तो हमारे यजमान हैं और तुम भी,मुझे बेहद खुशी हुई कि मैं गंगानाथजी के बारे में तकरीबन 4दशक बाद बातें कर रहा था. वे मथुरा में आकाशवाणी पर अधिकारी थे, हमारे घर नियमित आना जाना था, सतीघाट पर नियमित गप्पें होती थीं।बाद में दिल्ली ट्रांसफर होकर चले गए, वे जिंदा हैं और स्वस्थ हैं,यह
मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी की बात है। खैर गंगानाथ जी पर फिर कभी मौका लगा तो जरुर लिखूँगा।

मथुरा के चौबे देश में अन्यत्र रह रहे ब्राह्मणों जैसे नहीं हैं। उनके भिन्न होने के ऐतिहासिक और ऐतिहासिक परिस्थितियां रही हैं । मथुरा में चौबे कैसे और कब से हैं यह हम कभी बाद में विस्तार से विचार करेंगे। लेकिन कुछ सामान्य किंतु महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिनको जानना बेहद जरुरी है।

पहला, चौबों की जीवनशैली समूहबद्ध समुदाय यानी आदिवासी शैली है। अपनी ही जाति में खान-पान-रोटी-बेटी के संबंध रखने की लंबे समय से परंपरा चली आ रही है। यह समूची जाति शाकाहारी है। अंदर से जातिगत एकता,पवित्रता और निजता को बचाए रखने की इसमें प्रवृत्ति रही है। ये अन्य ब्राह्मणों से भिन्न क्यों हैं इसके कई महत्वपूर्ण कारण हैं। पहला कारण यह है कि यह जाति सैंकड़ों सालों से राजतंत्र से जुड़ी रही है। मुगलों के पहले ,मुगलों के शासन में और उसके बाद भी राजशाही से इस जाति का गहरा संबंध रहा है। देश के अधिकांश राजा इस जाति के यजमान रहे हैं। यहां तक कि सभी मुगल शासकों के ये प्रोहित रहे हैं। इसके कारण इनके पास कभी तंत्र से विच्छिन्न होकर जीने या सामाजिक अलगाव में रहने की प्रवृत्ति नहीं रही है। इसके अलावा सैंकड़ों सालों से देश के अधिकांश भागों में लाखों गांवों में इनके यजमान फैले हुए हैं। हाल के दशकों में यजमानी प्रवृत्ति में गिरावट आई है,लेकिन आज से चालीस –पचास साल पहले तक स्थिति यह रही है कि देश के अधिकांश बाशिंदों में इनकी यजमानी रही है।

मथुरा के चौबे यजमानों से संपर्क-संबंध रखने के मामले में बड़े कुशल रहे हैं। जिन चौबों के यहां यजमानी रही है वे लोग साल में एकबार अपने यजमान के घर जरुर जाते थे और उससे सालाना दक्षिणा वसूल करते थे, खाने-पीने का सामान एकत्रित करते थे, इसके कारण इनके गांव-गांव सभी जाति के लोगों से गहरे आत्मीय संबंध रहे हैं। मैंने देखा है कि मेरे पिता और ताऊ को हजारों गांवों के हजारों लोगों के नाम पते याद रहते थे। मसलन्, हमारे यहां कन्नौज,एटा,इटावा,फर्रूखाबाद ,फतेहगढ़,छपरा,आजमगढ़,देवरिया, छपरा आदि जिलों की यजमानी थी। इसके अलावा कई रजबाड़े भी यजमान थे, जिनमें शिवाजी का परिवार,ग्वालियर ,जयपुर आदि के रजवाड़े प्रमुख हैं। हमारे पूर्वज इन जिलों में गांव-गांव जाकर दक्षिणा वसूली करते थे, इन इलाकों से सावन,भादों के महिने में सैंकड़ों लोग मथुरा तीर्थयात्रा पर आते थे और हमारे घर पर ही रहते थे, कोई भी मथुरा आता था तो उसे स्टेशन से पकड़कर घर ले जाते ,उसके रहने की व्यवस्था करते थे, उसके घूमने की व्यवस्था करते थे और उसके लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। मेरा निजी तौर पर बचपन यजमानों को मंदिरों के दर्शन कराने में बीता है। यजमान को उसकी सुविधा के अनुसार दान कराना, उसकी सुविधा से दक्षिणा लेना, पैसे खत्म हो जाएं तो पैसा उधार देना, बाद में एक साल बाद जब यजमान के घर जाते थे तो उससे वसूल करना,यह वह तरीका था जिसने मथुरा के चौबों को विलक्षण जनसंपर्क में कुशल बना दिया था।

चौबों के विभिन्न जाति के यजमान होते थे, उनमें दलित और गैर दलित सभी रंगत के लोग यजमान होते थे, अधिकतर यजमान औसत स्तर के होते थे अतः उनसे सामान्य सी दक्षिणा ही मिलती थी, सामान्य सी दक्षिणा में जब तक मन हो बिना भाड़ा दिए अपने गुरु के घर रहने का जो सुख और सुविधा यजमानों को मिलती थी उसको यजमान कभी भूलता नहीं था, यदि किसी यजमान के पैसे खत्म हो जाते या जेब कट जाती या चोरी हो जाती तो उसे उधार में रुपये भी देते थे और उसके लिए वे कोई ब्याज आदि नहीं लेते थे, कई बार यह पैसा डूब भी जाता था। इस समूची प्रक्रिया ने मथुरा के चौबों का अपने यजमान से विलक्षण आंतरिक संबंध बना दिया था। चौबों के मथुरा में चार हजार परिवार रहते हैं,इन दिनों हो सकता है यह संख्या कुछ बढ़ गयी हो, लेकिन आम कहावत थी मथुरा के चार हजार चौबे।

मथुरा के चार हजार चौबे निजी पारिवारिक जीवन में शुद्धतावादी रहे हैं । वे अपनी जाति के अलावा किसी और के यहां खाते नहीं थे, बाद में यह स्थिति बदल गयी। लेकिन कमोबेश इसने उनके शुद्धतावादी रुझानों को बनाए रखा। मसलन् , मथुरा के चौबों के शादी आदि मथुरा के ही चौबों में होते रहे हैं। आज भी अधिकांश लोग मथुरा में ही अपनी जाति में ही शादी करते हैं। आजादी के बाद चौबों में अंतर्जातीय विवाह की प्रवृत्ति पैदा हुई।

चौबों की आर्थिक स्थिति अन्य जातियों की तुलना में बेहतर रही है। सभी चौबों के पास निजी जायदाद-संपत्ति रही है। वे कभी किराए के मकान में नहीं रहते थे। दूसरी बात यह कि उनके पास सालाना आय का जरिया यजमानी वृत्ति थी। वे बहुत अच्छे जनगणना अधिकारी भी रहे हैं। यजमानों की समूची वंशावली को लिखकर संयोजित करके रखना और उसको समय-समय पर अपडेट करते रहना उनका काम रहा है। भारत के अधिकांश राजाओं से उनको संपति आदि बड़ी मात्रा में दान में मिली थी। जो हिन्दुत्ववादी मुगल शासकों को आए दिन गरियाते रहते हैं उनको जानकार आश्चर्य होगा कि मुगलों के प्रोहित भी मथुरा बड़े चौबेजी हुआ करते थे। आज भी उनके पास मुगल शासकों और उनके अधीन रियासतों के राजाओं के दानपत्र-मानपत्र आदि मौजूद हैं। महमूद गजनवी से लेकर औरंगजेब तक सभी के प्रोहित वे रहे हैं। इसलिए चौबों में विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं के साथ संवाद,विमर्श आदि की दीर्घकालिक परंपरा रही है। निजी संस्कृति और सामाजिक बहुलतावाद का ये लोग बेहतर ढ़ंग से सैंकड़ों सालों से सामंजस्य बिठाकर अपना विकास करते रहे हैं। इनमें कम्युनिकेटर के बेहतरीन गुण भी रहे हैं। संभवतः प्रोहिताई करने वाली यह अकेली ऐसी जाति है जिसके घर पर सभी जाति के यजमान आकर ठहरते रहे हैं। मथुरा में दान के जरिए निर्मित धर्मशालाओं का बहुत बड़ा नेटवर्क इनके पास है जिसमें मुफ्त में रहने की व्यवस्था लंबे समय से चली आरही है। कुछ में नाममात्र का भाड़ा लेकर रहने के लिए कमरे दिए जाते हैं। विभिन्न किस्म की जातियों के संपर्क-संबंध में रहने के बावजूद कैसे यह जाति अपनी शुद्धता बचाए रख पायी यही हमारे लिए विस्मय की बात है।