शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

ज़िंदादिल इंसान अजय नाथ झा



 आज सुबह फेसबुक खोलते ही शेषनारायन सिंह की वॉल से ख़बर मिली कि अजय झा नहीं रहे, बहुत दुख हुआ, वह जेएनयू के साथियों का अज़ीज़ मित्र था। हम दोनों सतलज छात्रावास में कई साल एक साथ रहे, एक साथ खाना और घंटों बतियाना, लंबी बहसें करना रोज़ की आदत थी, अजय की रुचियाँ विलक्षण थी वह जेएनयू में सांगठनिक राजनीति में शामिल नहीं था लेकिन एसएफआई के साथ उसका स्वाभाविक लगाव हुआ करता था वह हम सबका कटु आलोचक भी था, मैं उन दिनों एसएफआई का अध्यक्ष हुआ करता था ,अजय आए दिन अपनी कटु से कटु आलोचनाएँ शेयर करता और गहरे मित्रतापूर्ण भाव को बनाए रखता था।
       अजय ने जेएनयू के चुनावआयोग अध्यक्ष के रुप में काम करके ख़ूब शोहरत हासिल की, यह उसका सबसे पसंदीदा काम था ,इसके अलावा तबला बजाना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन में उसे ख़ूब मज़ा आता था. विगत ढाई दशक से भी ज़्यादा समय से वह मीडिया में सक्रिय था और अंतराष्ट्रीय विषयों पर उसे महारत हासिल थी, जेएनयू के बहुत कम स्कालर हैं जो अंतरराष्ट्रीय विषयों पर मीडिया में निरंतर लिखते रहे हैं। 
     लंबे अंतराल के बाद अजय से फेसबुक के जरिए मुलाक़ात हुई और वह संपर्क में निरंतर बना रहा। अजय में सबसे अच्छी बात थी कि बहुत सुंदर स्टाइल से बातें करता था , उसकी आवाज़ बड़ी प्यारी थी, इस पर उसे भी गर्व था । अजय के जाने से हम सब जेएनयू के मित्रगण बेहद दुखी और आहत महसूस करते हैं। हम सबकी उसे विनम्र श्रद्धांजलि । 

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

''हैदर'' यानी कश्मीरियत की त्रासदी

     ''हैदर'' फिल्म पर बातें करते समय दो चीजें मन में उठ रही हैं। पहली बात यह कि कश्मीर के बारे में मीडिया में नियोजित हिन्दुत्ववादी प्रचार अभियान ने आम जनता में एक खास किस्म का स्टीरियोटाइप या अंधविचार बना दिया है। कश्मीर के बारे में सही जानकारी के अभाव में मीडिया का समूचा परिवेश हिन्दुत्ववादी कु-सूचनाओं और कु-धारणाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में कश्मीर की थीम पर रची गयी किसी भी रचना का आस्वाद सामान्य फिल्म की तरह नहीं हो सकता। किसी भी फिल्म को सामान्य दर्शक मिलें तब ही उसके असर का सही फैसला किया जा सकता है। दूसरी बात यह कि हिन्दी में फिल्म समीक्षकों का एक समूह है जो फिल्म के नियमों और ज्ञानशास्त्र से रहित होकर आधिकारिकतौर पर फिल्म समीक्षा लिखता रहता है। ये दोनों ही स्थितियां इस फिल्म को विश्लेषित करने में बड़ी बाधा हैं। फिल्म समीक्षा कहानी या अंतर्वस्तु समीक्षा नहीं है।

''हैदर'' फिल्म का समूचा फॉरमेट त्रासदीकेन्द्रित है। यह कश्मीरियों की अनखुली और अनसुलझी कहानी है। कश्मीर की समस्या के अनेक पक्ष हैं।फिल्ममेकर ने इसमें त्रासदी को चुना है।यहां राजनीतिक पहलु तकरीबन गायब हैं।इस फिल्म में राजनीति आटे में नमक की तरह मिली हुई है। यहां तक कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी इसके फॉरमेट में हाशिए पर है। मूल समस्या है कश्मीर जनता की आतंकी त्रासदी की । काफी अर्सा पहले कश्मीर के आतंकी पहलु पर गोविन्द निहलानी की फिल्म 'द्रोहकाल' आई थी,वहां आतंकी हिंसाचार को कलात्मक ढ़ंग से चित्रित किया गया था ,जबकि ''हैदर'' में आतंकी हिंसाजनित त्रासदी का चित्रण है,इस अर्थ में इस फिल्म को ''द्रोहकाल'' की अगली कड़ी के रुप में भी रखा जा सकता है।

''हैदर'' फिल्म में मूलपाठ त्रासदी है,लेकिन अनेक उप-पाठ भी हैं,जो अधूरे हैं,इस फिल्म की खूबी है कि इसमें राष्ट्रवाद कहीं पर नहीं है। साथ ही राजनीतिक संवाद बहुत कम है। इस अर्थ में यह ''द्रोहकाल'' से विकसित नजरिए को व्यक्त करने वाली फिल्म है। हिन्दी में कश्मीर पर राजनीतिक फिल्म बने और उसमें राष्ट्रवाद न हो यह हो नहीं सकता,हिन्दी में कश्मीर और आतंकी थीम पर बनी फिल्मों में राष्ट्रवाद और उसके भड़काऊ संवाद खूब आते रहे हैं। लेकिन ''हैदर'' इस मामले में अपवाद है। साथ ही मुसलमानों और कश्मीर को लेकर सचेत रुप से मीडिया में प्रचलित स्टीरियोटाइप को भी कलात्मक चुनौती दी गयी है। मसलन, इस फिल्म में मुसलमान कहीं नजर नहीं आते, कश्मीरी नजर आते। मस्जिद-नवाज-मौलवी आदि उनसे जुड़ा समूचा मीडिया स्टीरियोटाइप एकसिरे से गायब है। फिल्ममेकर सचेत रुप में कश्मीरियत को चित्रित करने में सफल रहा है। इस अर्थ में यह फिल्म कश्मीर की समस्या में पिस रहे कश्मीरियों की त्रासदी को सामने लाती है और इस समस्या के हिन्दू-मुसलमान के नाम पर चल रहे हिन्दुत्ववादी मीडिया प्रचार का कलात्मक निषेध करती है।

इसके अलावा इस फिल्म में बड़े ही संतुलन के साथ सेना और आतंकियों के मानवाधिकारहनन के रुपों के खिलाफ प्रतिवादी भावों और संवेदनाओं को उभारा गया है और उनको मानवाधिकार के फ्रेमवर्क में रखकर पेश किया गया है। त्रासदी यहां इवेंट की बजाय प्रक्रिया के रुप में चित्रित हुई है।त्रासदी जब प्रक्रिया के रुप में आती है तो वह मानवीय भावों-सरोकारों से जोड़ती है,स्मृति में स्पेस पैदा करती है।देश से जोड़ती है। इवेंट में ये संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। त्रासदी केन्द्रित होने के कारण समूची फिल्म में दर्शकों की सहानुभूति पीड़ितों के साथ है। वे इस प्रक्रिया में राजनीतिक पूर्वाग्रहों में बहते नहीं हैं,बल्कि फिल्म के अनेक अंश ऐसे हैं जो दर्शक को कश्मीर संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सोचने में मदद करते हैं। यह सच है कि कश्मीर में आतंकी हमलों और सेना की ज्यादती के कारण हजारों औरतें विधवा हुई हैं,हजारों बच्चे अनाथ हुए हैं,उनके कष्टों-पीडाओं को हमलोग बहुत कम जानते हैं। कश्मीर भारत का अंग है और कश्मीर में घट रही हिंसा से इस देश को सकारात्मक तौर पर परिचित कराने में ''हैदर'' जैसी अनेक फिल्मों की जरुरत है।

''हैदर'' फिल्म की खूबी है कि इसमें आतंकी त्रासदी को महज भावुक नहीं रहने दिया। त्रासदी में विवेक पर बल देकर फिल्ममेकर ने त्रासदी को भावुकता से अलग कर दिया। त्रासदी की इमेजों का हम जब भी आस्वाद लेते हैं अभिनेता बार-बार अपने एक्शन से विवेकपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक पात्र लोकतांत्रिक ढ़ंग से खुला है,वह कोई काम पर्दे के पीछे से नहीं करता,फिल्ममेकर दर्शक को कयास लगाने का मौका ही नहीं देता। सब कुछ दर्शक के सामने होता है। प्यार,चुम्बन,शैतानियां,मुखबरी,पक्षधरता आदि सबको सीधे दर्शकों के सामने खोलकर रखा गया है इसके चलते इस फिल्म में अंतराल में या प्रच्छन्न ढ़ंग से भावों को मेनीपुलेट करने की कोई संभावना नहीं है।

कश्मीर की त्रासदी ऐतिहासिक पीड़ा है। इसे नकली तर्कों के आधार पर न तो समझा जा सकता है और न पेश किया जा सकता है। यह सामान्य त्रासदी नहीं है। फिल्ममेकर ने इस ऐतिहासिक त्रासदी को फिल्म सौंदर्य के जरिए उदघाटित किया है। यहां कलात्मक-सौंदर्यात्मक भाषा का भरपूर इस्तेमाल किया है। इस भाषा के जरिए दर्शक के आस्वाद को फिल्ममेकर कॉमनसेंस या स्टीरियोटाइप के धरातल से ऊपर उठाकर ले जाता है। कश्मीर की समस्या को कश्मीरियत की त्रासदी के रुप में चित्रित करना स्वयं में मुश्किल काम है। कश्मीरियत को तो हमारा मीडिया और जनमानस एकसिरे से भूल चुका है,ऐसे में फिल्ममेकर एक काम यह करता है कि वह कश्मीरियत को अस्मिता का आधार बनाता है,वह कश्मीर की समस्या को हिन्दू-मुसलिम समस्या या धर्म के आधार बने भारत-पाक विभाजन का निषेध भी करता है। कश्मीर की त्रासदी को चित्रित करने का मकसद भविष्य में होने वाली त्रासदी को रोकना है। फिल्ममेकर संदेश देता है कि मानवाधिकार सबसे मूल्यवान हैं और उनके हनन का अर्थ है अनिवार्यतःत्रासदी।

यह फिल्म कश्मीर के नकली-विशेषज्ञों की भी प्रकारान्तर से पोल खोलती है। कश्मीर के मसले पर ज्योंही बातें होती हैं हमारे बीच में अचानक नकली कश्मीर विशेषज्ञ आ जा जाते हैं और कश्मीर पर वे नकली तर्कजाल से सारा माहौल घेर लेते हैं। इस तर्कजाल को वे तथ्य के नाम पर घेरना आरंभ करते हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति में सत्य-तथ्य दोनों महत्वपूर्ण होते हैं और इन दोनों से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है सर्जनात्मक संवेदनाएं। सर्जनात्मक संवेदनाओं के जरिए ''हैदर'' में कश्मीरियों की देशभक्ति पुख्ता रुप में सामने आई है। साथ ही कश्मीरी नागरिक की अनुभूतियां ,आकांक्षाएं और त्रासदी भी सामने आई है। यह फिल्म संदेश देती है कि यह अस्मिता की त्रासदी का दौर भी है। कलात्मक त्रासदी को महसूस करने की चीज है और यह काम फिल्म ने बड़ी सफलता के साथ किया है।



''हैदर'' फिल्म में कश्मीरियत को धर्मनिरपेक्ष शांतिमय संस्कृति के रुप में पेश किया गया है। साथ त्रासदी के प्रति आलोचनात्मक नजरिए को सम्प्रेषित करने में फिल्ममेकर सफल रहा है। कश्मीर की त्रासदी अन्य के बहाने से पेश नहीं की गयी है बल्कि सीधे पेश की गयी है। फिल्म में अतीत में लौटनेवाले क्षण बहुत कम हैं। सारी फिल्म सीधे वर्तमानकाल में चलती है और भविष्य की ओर सोचने के लिए मजबूर करती है । अस्मिता के कई आयाम हैं मसलन्, प्रतिस्पर्धा,हिंसा,बदला,बदलाव,राष्ट्रीयता,आतंकवाद आदि इनमें से ''हैदर' का जोर राष्ट्रीयता ,बदलाव और शांति पर है।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

धर्म आनंद और आराम की जुगलबंदी

         धर्ममंदिरों और संतों के आश्रमों का धार्मिकता से बुनियादी सम्बन्ध खत्म हो गया है। खासकर आजादी के बाद के वर्षों में धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र अब आनंद –आराम केन्द्र बन गए हैं। धर्मकेन्द्र और संतकेन्द्र आजादी के पहले धार्मिकता के प्रचार के केन्द्र हुआ करते थे लेकिन इन दिनों यह फिनोमिना बदल गया है। देशी पूंजीवाद के विकास और पूंजीसुख के बढ़ते संसार ने जीवनशैली को रुपान्तरित किया है,इसका धर्म पर भी असर पड़ा है। धर्म-संत केन्द्रों का सारे देश में नियोजित उद्योग की तरह विकास हुआ है। अब इन केन्द्रों पर आनंद-आराम –जीवनशैली और स्वास्थ्य का खासतौर पर ख्याल रखा जाता है।
     स्वातंत्र्योत्तर दौर में पैदा हुए धर्म-संत समाज ने मासकल्चर के साथ अपना सम्बन्ध विकसित किया है।इनके यहां धर्म के मासकल्चर रुपों पर खासतौर पर जोर है। पहले धर्म को साधना के रुप में देखा जाता था,लेकिन मासकल्चर के साथ सम्बन्ध बनाने के कारण अब यही धर्म-संतकेन्द्र 'उपभोग' पर जोर देते हैं। इस तरह वे पूंजीवादी बाजार का विस्तार और विकास भी करते हैं। पूजा-पाठ-उपासना आदि इनमें गौण है और आनंद-आराम प्रमुख चीज है। स्वामीनारायण मंदिर से लेकर श्रीश्रीरविशंकर तक,रजनीश से लेकर महर्षि महेश योगी तक हजारों संत हैं, और उनके हजारों नेटवर्क हैं, जो आनंद-आराम के नेटवर्क के तौर पर काम कर रहे हैं। इस समूचे जगत को आनंद-आराम उद्योग कहना समीचीन होगा। इन संत-धर्मस्थलों का प्रमुख लक्ष्य है आगंतुकों के खालीसमय को आनंद से भरना और आराम की अनुभूति देना। इनके केन्द्रों में जीवनशैली प्रबन्धन कला भी सिखायी जाती है।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

गऊमांस का सवाल और चरक संहिता


फेसबुक पर सक्रिय ''हिन्दू परंपरा ज्ञानी''मित्रों के लिए हम सुश्रुत रचित चरक संहिता से एक कहानी दे रहे हैं और यह कहानी बहुत कुछ कहती है।कहानी इस प्रकार है-
     
चरक संहिता में अतिसार यानी दस्त की बीमारी के प्रसंग में यह कहानी आई है- (अतिसार विषयक अग्निवेश की जिज्ञासा का उत्तर देते हुए भगवान पुनर्वसु आत्रेय कहते हैं कि हे अग्निवेश! सुनोः) आदिकाल में यज्ञों में पशु समालभनीय(यज्ञ में पशु आमंत्रित और पूजित करके छोड़ दिए जाते थे) होते थे किंतु यज्ञ में पशुओं का वध नहीं किया जाता था।इसके बाद दक्ष प्रजापति के बाद के समय में मनु के पुत्रों ने यज्ञों में पशुओं की हत्या करने की प्रथा शुरु की तथा पशुओं को आमंत्रित कर वधकिया जाने लगा ।पशुओं के वध की यह क्रिया वेदाज्ञा के अनुसार ही होती थी।इसके बाद के समय में राजा पृषध्र ने एक बहुत दिन चलने वाले यज्ञ का समारंभ किया। यज्ञ में निरंतर अन्य पशुओं का वध होता रहा।जब यज्ञ में बहुत अधिक पशुओं की हत्या हो जाने के कारण पशु नहीं मिलने लगे तो गौओं का वध आरंभ किया। यह देखकर जगत के प्राणी मात्र अत्यंत दुखी हुए।जब इन वध की गई गौओं का मांस खाया गया तो लोगों को अतिसार यानी दस्त की बीमारी हो गयी ।

सुश्रुत की चरक -संहिता में आहार के रुप में खाए जाने वाले पशु-पक्षियों की एक वर्गीकृत सूची दी गयी है और इसमें शामिल पशु-पक्षियों के आहार को स्वास्थ्यप्रद बताया गया है उस सूची में गौ मांस भी शामिल है। संदर्भ से यह भी पता चलता है कि हमारे आज के शिक्षित मध्ययवर्ग के फेसबुक भगवा बटुकों से सुश्रुत ज्यादा समझदार विद्वान थे। चरक संहिता में वर्णित गौ मांस सेवन के दो रुप हैं एक है आहार के रुप में और दूसरा है औषधि के रुप में।

चरक-संहिता के 'सूत्र स्थान' के सत्ताइसवें अध्याय में प्रसह पशु-पक्षी गण की सूची दी गयी है इस सूची में गाय भी शामिल है।जो प्राणी अपने भोजन को दूसरों से जबर्दस्ती छीनकर या फाड़कर खाते हैं उन्हें प्रसह-गण पशु-पक्षी की संज्ञा दी गयी है। ये हैं- गाय,गधा,ऊंट,घोड़ा,चीता,सिंह,भालू,बंदर,भेड़िया,बाघ,लकड़बग्घा,बिल्ली,कुत्ता,कौवा,बाज,गिद्ध आदि। इसके अलावा अन्यवर्ग के पशु-पक्षियों का भी उल्लेख है।ये हैं बिल में रहने वाले-तेरह जीव,दलदल में रहने वाले9जीव,जल में निवास करने वाले 10जीव,जल में चलने वाले 29जीव, इसके अलावा 17 जांगल पशु ,चोंच या पैर से कुरेदकर खाने वाले 19जीव ,इसके अलावा जो जीव चोंच या पैर से आघात करके आहार खाते हैं उनकी संख्या 30 बतायी गयी है। कुल मिलाकर आठ वर्गों में 156 पशु-पक्षियों की सूची सुश्रुत ने पेश की है जिनका मांस आहार के लिए उपयुक्त पाया गया है और इनमें से प्रत्येक के मास के बीमारी सम्बन्धी लाभों का भी जिक्र किया गया है। पोषक मांस आहार में गाय शामिल है।

चरक संहिता के अनुसार गौ मांस के विशिष्ट गुण क्या हैं ? आत्रेय के शब्दों में '' गौ मांस केवल वातजन्य रोगों में ,विषम ज्वर में,पीनस रोग में, सूखी खाँसी में,परिश्रमजन्य थकावट में,भस्मक रोग में और मांसक्षयजन्य रोगों में हितकारी होता है।'' इसके अलावा भी गौ मांस खाने अनेक फायदे चरक संहिता में गिनाए गए हैं। ये बातें लिखने का मकसद है हिन्दुत्ववादियों द्वारा किए जा रहे अनर्गल प्रचार का खण्डन करना। इस बात को रखने का मकसद गौमांस भक्षण को बढ़ावा देना नहीं है। हम यही चाहते हैं खान-पान के मामलों में न तो राजसत्ता और न राजनीतिक दल और न अन्य कोई हस्तक्षेप करे।खान-पान का मामला निजी मामला है और इस प्रसंग में स्वास्थ्यप्रद खान-पान को बढ़ावा देना चाहिए।



रविवार, 5 अक्टूबर 2014

आधुनिक गुलाम की हरकतें

      कलात्मक मीडिया पर्सुएशन कला आधुनिक दास समाज की कुंजी है। पहले गुलाम बनाए जाते थे अब गुलाम बने-बनाए मिलते हैं। पहले गुलामों पर मालिक का शारीरिक नियंत्रण होता था,इन दिनों गुलामों पर मालिक शारीरिक और मानसिक नियंत्रण रखते हैं। गुलाम भाव सबसे प्रियभाव है। यह ऐसा भाव है जिसका सामाजिक स्तर पर व्यापक उत्पादन और पुनर्रुत्पादन हो रहा है। नव्य- पूंजीवाद के मौजूदा दौर में मालिक का नौकर के शरीर और मन पर पूरा नियंत्रण रहता है। काम के घंटे अब आठ नहीं होते बल्कि 10,12,या 16 घंटे तक कर्मचारी से काम लिया जाता है। इस कर्मचारीवर्ग में एक बड़ा समूह ऐसे कर्मचारियों का है जिसकी नौकरी अस्थायी है ,जो ठेके पर काम करता है।जो चंचल मजदूर है। लेकिन गुलाम भाव में जीने वाले कर्मचारियों में एक बड़ा समूह उन लोगों का भी है जो पक्की नौकरी करते हैं , मोटी पगार पाते हैं। येन-केन प्रकारेण सत्ताधारी वर्ग से चिपके रहना इनके स्वभाव का अंग है। इस समूचे समुदाय में तानाशाही के प्रति स्वाभाविक रुझान है। यही वह वर्ग है जो जीवन में पोंगापंथ,अंधविश्वास और उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। इस वर्ग में परजीविता कूट-कूटकर भरी हुई है। खोखली बातें,खोखले जीवन मूल्य,खोखली राजनीति,खोखला कम्युनिकेशन इस वर्ग के मुख्य आदतें हैं।

इस वर्ग में गुलाम भाव के प्रति जबर्दस्त अपील है।यह बिना किसी दबाव के हमेशा सत्ताधारी वर्गों के दबाव और अनुकरण में रहता है। यह वर्ग विवेक से कम और मीडिया पर्सुएशन से ज्यादा प्रभावित होता है। मीडिया इस वर्ग का उस्ताद है और पर्सुएशनकला इसकी कमजोरी है। पर्सुएशन कला की महत्ता तब और नजर आती है जब किसी नए माल की बाजार में बिक्री सुनिश्चित करनी हो या किसी राजनीतिक प्रचार अभियान को सफल बनाना हो। इस पद्धति का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रभावशाली ढ़ंग से इस्तेमाल किया है। 'स्वच्छ भारत अभियान' इसका आदर्श नमूना है। मसलन् एक शिक्षक-कर्मचारी की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह नियत काम को नियत समय पर पूरा करे, लेकिन एक बड़ा अंश है जो परजीवी है और नियत समय पर काम न करने की मानसिकता में रहता है।यही निकम्मावर्ग है जिसको हांकने में नरेन्द्र मोदी को द्रविड़-प्राणायाम करना पड़ रहा है।यही वह वर्ग है जो समय पर दफ्तर नहीं जाता,समय पर कक्षाएं नहीं लेता,समय पर बाकी अकादमिक और गैर अकादमिक काम नहीं करता। यही वह वर्ग भी है जो मोदीभक्त भी है।इसमें ही बड़ी संख्या में मोदी के कर्मचारी मतदाता भी हैं,ये ही वे लोग हैं जिनको मोदी अपने मीडिया रुतबे से प्रभावित और सक्रिय कर रहे हैं।

आधुनिक गुलामभावबोध का दिलचस्प आलम यह है कि जो कर्मचारी कभी समय पर नहीं आता,अथवा जो विश्वविद्यालय शिक्षक कभी विभाग की मीटिंग में बार-बार बुलाने पर भी नहीं आता, समय पर कक्षाएं लेने नहीं आता, वह 'स्वच्छ भारत' अभियान के दिन नियत समय से काफी पहले विश्वविद्यालय प्रांगण में पहुँच गया और सफाई के फोटोशूट में शामिल होने के लिए बेताब नजर आ रहा था। इस पूरी समस्या के अनेक आयाम हैं लेकिन इसमें प्रमुख है परजीविता और गुलाम भावबोध। ये ही आधुनिक गुलाम की जीवनशैली की धुरी हैं। हम सोचें कि क्या शक्तिशाली देश का निर्माण गुलाम भावबोध से संभव है ? कोई भी देश अपने विवेक की शक्ति से महान बना है।गुलामी मानसिकता से महान नहीं बना है।

शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

संघ प्रमुख के डीडी प्रसारण और मोदी के ट्वीट से उठे सवाल

         आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के विजयादशमी सम्बोधन के दूरदर्शन से प्रसारण को लेकर काफी आलोचनाएं सामने आई हैं ,आलोचकों ने जो सवाल उठाए हैं वे सही हैं।लेकिन वे सभी प्रसारण को राजनीतिक पहलू से देख रहे हैं। समस्या प्रसारण की नहीं है समस्या दूरदर्शन की समाचार नीति या संहिता के उल्लंघन की है। समाचार संपादक ने समाचार संहिता का उल्लंघन करके अपराध किया है और उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।सवाल उठता है दूरदर्शन अब तक जो समाचार नीति अमल में लाता रहा है क्या वह बदल गयी ?यदि बदली है तो कब और उसमें क्या संशोधन लाए गए हैं ? दूरदर्शन के द्वारा जो समाचार नीति अमल में लायी जाती है उसमें साम्प्रदायिक-पृथकतावादी-धार्मिक संगठनों के लाइव प्रसारण के लिए कोई स्थान नहीं है। यह निर्विवाद तथ्य है कि संघ का चरित्र साम्प्रदायिक है और इस पर संसद से लेकर सड़कों तक अधिकांश राजनीतिकदल एकमत हैं। संघ के विजयादशमी जलसे का इससेपहले मेरी जानकारी में दूरदर्शन से लाइव प्रसारण कभी नहीं हुआ है। जबकि यह संगठन 90 साल पुराना है। यदि दूरदर्शन ने साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिक संगठनों के नेताओं के भाषणों के लाइव प्रसारण का फैसला ले ही लिया है तो इसके स्वाभाविक दुष्परिणामों के लिए देश को तैयार रहना होगा। संचार माध्यमो से इस तरह के प्रसारण सद्भाव और लोकतांत्रिक राजनीति का प्रसार नहीं करते अपितु समाजतोड़क संगठनों को वैधता प्रदान करते हैं।

टीवी चैनलों की खुली प्रतिस्पर्धा में इस तरह के नेताओं के प्रसारणों को रोकना संभव नहीं है। लेकिन सार्वजनिक प्रसारण सेवा होने के कारण दूरदर्शन की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिकनेताओं के लाइव प्रसारण से बचे। ये संगठन चाहे कितना ही देशभक्ति का दावा करें या इनके नेता अच्छी बातें कहें,इनके प्रसारण से विभाजक मानसिकता को वैधता मिलती है और इस काम में दूरदर्शन ने शिरकत करके अपनी ही बनायी समाचार नीति का उल्लंघन किया है। इस मामले में सभी दलों के सांसदों को दूरदर्शन के महानिदेशक को सीधे आपत्ति पत्र भेजना चाहिए।
    दूरदर्शन कोई निजी उपक्रम नहीं है जिसका मनमाने ढ़ंग से इस्तेमाल किया जाय। दूरदर्शन की देश की जनता ,संसद और संविधान के प्रति जबावदेही है। दूसरी बात यह कि दूरदर्शन के प्रसारण को सत्ता बदल के साथ देखना सही नहीं है। महानिदेशक और समाचार संपादक की यह जिम्मेदारी है कि वे सुनिश्चित करें कि समाचार नीति का वस्तुगत ढ़ंग से पालन हो। जो लोग सोनिया-राहुल आदि के प्रसारण के बारे में सवाल कर रहे हैं,वह एकदम गलत है। लोकतांत्रिक नेता के प्रसारण(चाहे वह किसी भी दल का हो) को दिखाने या न दिखाने का फैसला समाचार संपादक अपने विवेक से कर ही सकता है। लेकिन साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी-धार्मिक नेता के लाइव प्रसारण की उसे पेशेवर आजादी न तो नीति देती है और न परंपरा ही देती है। दूरदर्शन के समाचार संपादक ने सीधे समाचार नीति का उल्लंघन किया है और इसके लिए उसके फैसले की पहले जांच की जाय और तय किया जाय कि संघ प्रमुख के लाइव प्रसारण का फैसला किसने और क्यों लिया ? संघ को यदि सामाजिक संगठन मानकर फैसला लिया गया है तो अभी तक किसी सामाजिक संगठन के प्रसारण के बारे में पहल क्यों नहीं की गयी ? संघ को अदालतों से लेकर दर्जनों कमीशनों ने साम्प्रदायिक संगठन के रुप में चिह्नित किया है।यह भी खुलासा होना चाहिए कि क्या समाचार संपादक पर प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई दबाव रहा है ?प्रधानमंत्री मोदी ने समस्त परंपराएं तोड़कर संघ के इस कार्यक्रम के मौके पर अपना ट्वीट करके साफ कर दिया है कि वे भारत सरकार की संचारनीति को नहीं मानते और यह संविधान का अपमान भी है। मोदी को यह याद रखना होगा कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं और भारत संचारनीति के अनुपालन की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है यदि वे ही संचारनीति का उल्लंघन करेंगे तो फिर किसी अफसर या नागरिक से संचारनीति के उल्लंघन करने पर वे और उनके लगुए-भगुए आपत्ति नहीं कर सकते।मोदी ने ट्वीट करके साफ संदेश दिया है कि वे साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति नरम रुख रखते हैं और इस तरह के संगठन अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं।मजेदार बात है कि टीवी चैनलों पर मोहन भागवत के प्रसारण की आलोचना हो रही है लेकिन मोदी के अलोकतांत्रिक ट्वीट पर बातें बंद हैं।यानी पीएम सही और दूरदर्शन गलत के फार्मूले के तहत प्रसारण जारी है ,जो कि गलत है।असल में मोदी और समाचार संपादक दोनों ही समाचार नीति के उल्लंघन के लिए सीधे जिम्मेदार हैं।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

टीवी इवेंट के परे स्वच्छ भारत का सपना !


      प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता अभियान से किसी को मतभेद नहीं हो सकता। समस्या नीति और नज़रिए की है। इस अभियान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सारी सदइच्छाएं टीवी फ़ोटो कवरेज से आगे नहीं जा रही हैं । उनके इस मसले पर सभी भाषण और राजनीतिक आचरण में भी प्रदर्शनप्रियता ही प्रमुख है।
    स्वच्छता की समस्या सफ़ाई का नया सिस्टम बनाने, सफ़ाई के सिस्टम में लगे लोगों के हितों और माँगों पर ग़ौर करने से जुड़ी है। भारत में इससे मिलता जुलता अभियान कांग्रेस ने 'निर्मल भारत' के नाम से यूपीए सरकार के शासन में आरंभ किया था लेकिन वह फ़ाइलों में दबा रह गया। मोदी ने उसे इवेंट और स्टंट बना दिया है!
   सफ़ाई अभियान को टीवी फोटोशूट तक ले जाने में मोदी सफल रहे लेकिन 'स्वच्छता नीति 'की घोषणा नहीं कर पाए । इससे यह भी पता चलता है कि मोदी इस देश को किस तरह चलाना चाहते हैं ?  मोदी इवेंट और जलसे -मेले-ठेले की राजनीति के जरिए देश को चलाना चाहते हैं ,इनके लिए समय दे रहे हैं लेकिन कोई बनाने के लिए उनके पास कोई समय नहीं है। यदि सरकार के मंत्रियों के काम करने की गति देखें तो वहाँ पर भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आती। यानी मंत्रालयों में भी कोई पहलकदमी नजर नहीं आती! वरना  स्वच्छता अभियान को लेकर नीति तो होनी चाहिए बिना नीति के देश कैसे चलेगा ? राज्यों और नगरपालिकाओं को कैसे भागीदार बनाया जाएगा ? स्वच्छता अभियान में केन्द्र और राज्य कितना पैसा निवेश करेंगे ? सफ़ाई कर्मचारियों की समस्याओं और रिक्त पदों का समाधान किस तरह किया जाएगा ?नई जरुरतों के मुताबिक़ कितने लाख नए पद सृजित किए जाएँगे ? 
     सफ़ाई की समस्या एकदिन की समस्या नहीं है । यह दैनंदिन समस्या है और इसके लिए मुस्तैद सिस्टम चाहिए। ऐसा सिस्टम चाहिए जो वैज्ञानिक तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल करे। सफ़ाई का मोदी का नज़रिया हिन्दू -कारपोरेट नजरिया है। हिन्दू के लिए सफ़ाई  दीपावली की सफ़ाई योजना है जो घर, मंदिर, दुकान से बाहर नहीं निकलती।मोदी इसे कचडा परिशोधन परियोजना तक लेजाएँगे। 
      जबकि भारत में सफ़ाई कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग है जो आज भी अस्पृश्यता का शिकार है और दशकों से वे अपनी समस्याओं के लिए विभिन्न राज्य सरकारों और ज़िला प्रशासन के सामने अपनी माँगे रखते आए हैं ,आश्चर्य की बात है मोदी ने इन सफ़ाई कर्मचारियों और अछूत समस्या पर एक भी वाक्य नहीं बोला। सफ़ाई कर्मचारियों की बदहाल ज़िंदगी और भयावह गंदगी से भरे उनके रिहायशी इलाक़ों को दरकिनार करके मोदी सरकार प्रच्छन्न ढंग से बहुसंख्यकवाद के राजनीतिक लक्ष्य की दिशा में आगे बढ रही है। वरना मोदी को दलितों की बस्ती में जाकर सफ़ाई अभियान को केन्द्रित होकर चलाना चाहिए मोदी दलित मलिन बस्ती में न जाकर बाल्मीकिरामायण मंदिर गए जो हमेशा साफ़ रहता है। महात्मा गांधी ने स्वच्छता अभियान को सामाजिक सुधार कार्यक्रम के रुप में चलायाथा और सफ़ाई, दलितमुक्ति और अस्पृश्यता निवारण को लक्ष्य बनाया। गांधी के लिए स्वच्छता का मतलब इवेंट नहीं था वे स्वच्छता को समाजसुधार के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखते थे। सफ़ाई उनके लिए नैतिक या स्वास्थ्य तक सीमित नहीं थी। जबकि मोदी के लिए स्वच्छता के सामाजिक आधार का कोई मूल्य नहीं है। 
अस्वच्छता हमारे समाज के जातिप्रथा के कलंकित अध्याय से जुडी है। यही वजह है कि तमाम वैभव और संसाधनों के बावजूद धार्मिक शहर सबसे गंदे रहे हैं। हमारे समाज में आज़ादी के बाद जातिप्रथा बढी हैं ख़ासकर दलित जातियों पर ज़ुल्म बढे हैं ।हमने कभी ईमानदारी और सतत निगरानी के साथ दलितों और सफ़ाई कर्मचारियों की समस्याओं पर संसद में समग्रता में चर्चा नहीं की है।
    केन्द्र -राज्य सरकारोंके लिए दलित ,वोटबैंक से ज़्यादा महत्व नहीं रखते और हमेशा किश्तों या टुकड़ों में दलितों की समस्याओं पर संसद में तदर्थभाव से चर्चा हुई है।  हम चाहते हैं दलितों के प्रति तदर्थभाव ख़त्म हो और समग्रता में राष्ट्रीय एकता परिषद में खुलकर केन्द्र -राज्य मिलकर बातें करके स्वच्छता नीति बनाएँ और इसके लिए दलितों के सभी रंगत के संगठनों को भीबुलाकर सुझाव लिए जाएँ और उनकी राय को राष्ट्रीय एकता परिषद गंभीरता से सुने ।
            नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान की तुलना में अरविंद केजरीवाल का नजरिया ज़्यादा सही लगता है।मसलन् मोदी गए बाल्मीकि मंदिर जबकि केजरीवाल ने नाले की सफ़ाई में भाग लिया और दलित परिवार के घर जाकर खाना खाया।
   सफाई की समस्या हमारे हिन्दू संस्कारों और आदतों से मुक्ति से जुडी है। हम जब तक हिन्दू आदतों के शिकार रहेंगे समाज में अस्वच्छता रहेगी।सामाजिक अस्वच्छता का सम्बन्ध मन और मूल्यों की स्वच्छता से है। हमें देखना होगा मोदी जी स्वयं और उनके मंत्री-सांसद-विधायक कितनी जल्दी हिन्दूमन की आंतरिक सफाई करते हैं!
      समाज हमारे मन का आईना है यह कचडा साफ़ करने की समस्या मात्र नहीं है ,यह गंदगी फैलाने पर जुर्माने ठोक देने से सुलझनेवाली समस्या नहीं है।
   हमारे देश ने यूरोप से कपड़े लिए, शिक्षा ली,रहन-सहन लिया, बाथरुम लिया लेकिन हिन्दूमन नहीं बदला !जीवनशैली नहीं ली। यही वह प्रस्थान बिन्दु है जिस पर प्रहार करने की ज़रुरत है। हिन्दूमन की गंदगियों और जीवनशैली को निशाना बनाए बग़ैर स्वच्छता अभियान सफल नहीं होगा ।  सफ़ाई का सम्बन्ध आदतों से हैं और आदतें हिन्दूजीवनशैली से जुड़ी हैं और इनका समाज के ऊपर व्यापक असर है।हिन्दूजीवनशैली को मोदी सरकार को निशाना बनाना होगा। यह काम जब तक नहीं होता स्वच्छ भारत टीवी इवेंट से आगे नहीं जा पाएगा।




सोमवार, 29 सितंबर 2014

मेडिसन स्क्वेयर के चाक्षुष आनंद की मोदीधुन


        मोदी के भाषणों की सबसे बड़ी विशेषता है मेनीपुलेशन। मेनीपुलेशन के बिना वे भाषण नहीं देते। उनके भाषण की दूसरी विशेषता है फुटपाथशैली। इन दोनों शैलियों का मेडिसन स्केवयर गार्डन में दिए गए भाषण में उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया।मसलन् मोदी ने कहा गांधीजी को 'आज़ादी' और 'सफ़ाई' ये दो चीज़ें पसंद थीं। सच यह है गांधीजी को आजादी और साम्प्रदायिक सद्भाव पसंद था। स्वच्छता उनकी राजनीतिक जंग का अंग ही नहीं था। अस्पृश्यता निवारण उनके लक्ष्यों में से एक जरुर था। सवाल यह है मोदीजी यह सब बताना भूल गए अथवा उनकी संघ बुद्धि ने बताने नहीं दिया ?
    मोदी का अपने हर अभियान में महात्मा गांधी का इस्तेमाल बताता है कि आनेवाले दिनों में महात्मा गांधी के विचारों का वे जमकर दुरुपयोग करेंगे । इतिहासकारों की यह जिम्मेदारी है कि इस मामले में सजगता दिखाएं। मोदी जिस तरह विचारधाराहीन महात्मा गांधी पेश कर रहे हैं,इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वह भारत के लिए चिंता की बात है। मसलन् महात्मा गांधी का भारत आना,किसी आप्रवासी का भारत आना मात्र नहीं था,जैसाकि मोदी ने पेश किया।वे देश को साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराने के लक्ष्य के लिए आए थे। मोदी की इतिहासबुद्धि किस तरह कचड़े से भरी है इसका यह नमूनामात्र है। भारत के प्रधानमंत्री का राष्ट्रपिता के विचारों का इस तरह का दुरुपयोग और उनके विचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करना भारत की विश्व में इमेज को गिराने वाला है। इससे यह भी संदेश गया है कि मोदी ने महात्मा गांधी को न तो पढ़ा है और न सही रुप में समझा है। मीडिया के उन्मादी प्रचार अभियान के आड़ में भारत के राजनीतिक विचारों और लक्ष्यों के साथ किस तरह का मेनीपुलेशन चल रहा है उसकी ओर नजर रखने की जरुरत है। इसी प्रसंग में एक और उदाहरण लें,मोदी ने कहा मैं बहुत खुश होऊँगा यदि रोज एक कानून खारिज करके निकाला जाय़ । नव्य आर्थिक उदारीकरण की यह मूल मांग है कानूनों को धता बताओ।कानूनहीन लूट की व्यवस्था स्थापित करो। मनमोहन सिंह ने अपने तरीके से इस दिशा में बहुत कुछ ऐसा किया है जिसको 'क्रोनी कैपीटलिज्म'' के नाम से हम सब जानते हैं। कानूनहीन सरकार के फैसले कैसे होते हैं उसका आदर्श नमूना है कोयलाकांड! मोदी कानून निकालो का नारा देकर अपने विलायती आकाओं को खुश करने के साथ देशी आकाओं को भी खुश करने की कोशिश कर रहे थे,लेकिन कोयला खान आवंटन ने कानूनहीन शासन की पोल खोलकर रख दी है।
    कहने का अर्थ है मोदी अपने उन्मादी भाव में जो कुछ बोलते हैं उसका लक्ष्य सिस्टम बनाना नहीं है बल्कि उसका लक्ष्य है सिस्टम को तोड़ना। सिस्टम बनाने में समय लगता है तोड़ने में समय नहीं लगता। नव्य आर्थिक उदारीकरण की जन्मभूमि अमेरिका में 'कानून निकालो' का नारा ओबामा और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुश कर सकता है लेकिन हिन्दुस्तान की संघर्षशील जनता इस मनमानी की कभी इजाजत नहीं दे सकती। कानूनहीन शासन की मांग बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पुरानी मांग है। लेकिन देशभक्त जनता कानून का शासन,कानूनी व्यापार,कानूनी उद्योग आदि चाहती है।
     मोदी को मेडिसन स्क्वेयर में जो लोग बैठकर सुन रहे थे, वे मूलतःअमेरिकी नागरिक हैं।ये वे लोग हैं जो भारत से लाभ लेना चाहते हैं लेकिन भारत को इनसे कोई बड़ा लाभ अभी तक नहीं मिला है। ये वे लोग हैं जो वहां जाकर बस गए हैं।जलसे,मेले,इवेंट आदि इनकी दैनंदिन जिंदगी का अंग है। इनमें से अधिकांश देश के प्रति उत्सवधर्मीभाव रखते हैं। इस आयोजन के दौरान वे आनंद-उन्माद और कैमराभाव में डूबे हुए थे। उनके लिए न तो अमेरिका राष्ट्रगान और न भारतीय राष्ट्रगान अर्थपूर्ण था क्योंकि ऑडिएंस में सब अपने आनंद भाव की बार बार अभिव्यक्ति कर रहे थे। वे यह तक नहीं जानते कि राष्ट्रीय गान के समय किस मुद्रा में अपने भावों को प्रदर्शित करें। दर्शकों की इस तरह की उदासीनता से यह संदेश भी गया है आप्रवासी भारतीय अपने को राष्ट्रीयगान की गरिमा के अनुकूल भी अभी शिक्षित नहीं कर पाए हैं।उनकी फूहड़ता का आलम यह था कि राष्ट्रगान के बाद वे तालियां बजा रहे थे। मोदी को इस तरह की जनता में मजा आता है और यही फूहड़ जनता हर हर मोदी में मगन है।  
     मोदी की फुटपाथी विक्रयशैली के लिए देश और उसके लोग माल हैं। देश बिकाऊ है। मोदी ने जिन तीन चीजों को भारत की शक्ति के रुप में पेश किया वह उनके फुटपाथी नजरिए को दरशाता है । मोदी के अनुसार भारत के पास ३ चीज़ें हैं ,ये हैं- १. लोकतंत्र, २. डेमोग्राफिक डिवीडेंट ३.डिमांड ,ये तीनों शक्तियाँ आज कहीं नहीं है। भारत को इस तरह माल में रुपान्तरित करके पेश करना भारत का अपमान है।भारत सप्लायर देश नहीं है। हमें भारत को सप्लायर देश की मानसिकता से बाहर निकालना होगा। सप्लायर देश की बजाय उत्पादक देश के रुप में इमेज पेश करनी चाहिए। मोदी भूल गए कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है और ये तीनों चीजें वहां पर भी हैं लेकिन वे अपने देश की छवि सप्लायर के रुप में पेश नहीं करते। श्रमिक सप्लायर की दृष्टि देशज दृष्टि नहीं है। मोदी यह ध्यान रखें  सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक लोकतंत्र को पुख्ता नहीं बनाते। लोकतंत्र पुख्ता तब बनता है जब श्रमिकों को बेहतर पगार मिले।सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक देश में तानाशाही को पुख्ता बनाते हैं। यह सच है  मेडिसन स्क्वेयर में अनेक सेनेटर आए और यह उनकी भारत के प्रति गहरी मित्रता की निशानी है।लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजकों ने मंचपर प्रस्तुत विभिन्न कार्यक्रमों में सिर्फ भारत का ही झ़डा फहराया ,कायदे से दोनों देशों के झ़डे रहते तो अच्छा होता।इससे अंध राष्ट्रवादी भावों को अभिव्यक्ति मिली।इसी अंध राष्ट्रवादी भावबोध का परिणाम था कि आजतक टीवी चैनल के राजदीप सरदेसाई पर कुछ उन्मादियों के हमला करके उनकी जुबान बंद करने की कोशिश की।
     मोदी के मेडिसन स्क्वेयर इवेंट का अमेरिकी नीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा।इसका प्रधान कारण है कि अमेरिकी प्रशासन नियोजित इवेंट,नियोजित मीडिया उन्माद और नियोजित भीड़ की राजनीति का अभ्यस्त है। वे जानते हैं कि इसमें स्वतःस्फूर्त कुछ भी नहीं है। भुगतान के आधार पर जुटायी जनता और राजनीति का क्षणिक चाक्षुष आनंद होता है।इससे ज्यादा उसकी अहमियत नहीं होती।





सोमवार, 22 सितंबर 2014

जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन के बहाने नए बंगाल की तलाश



पश्चिम बंगाल में विगत कई सालों में जिस तरह की जड़ता,हताशा और पराजय भाव का जन्म हुआ है उसने सभी जागरुक लोगों को चिन्ताग्रस्त किया है। चिन्ताएं इसलिए भी बढ़ी हैं क्योंकि वामदलों की साख घटी है, जनसंघर्षों के प्रति संशय और संदेह का भाव बढ़ा है। मध्यवर्ग में कदाचार और हिंसाचार के प्रति सहिष्णुता बढ़ी है। विश्वविद्यालय-कॉलेजों में व्यापक आतंक और कदाचार बढ़ा है। शिक्षक-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मियों की इमेज धूमिल हुई है। उन पर हमले बढ़े हैं। शासकों में अन्याय-हिंसा –भ्रष्टाचार-बर्बरता की नग्न हिमायत ने जन्म लिया है। सभ्य बंगाल अब असभ्य और बर्बर प्रतीत होने लगा है !

सभ्य बंगाली अपने को बंगाली कहने में लज्जित महसूस करने लगे हैं। बंगाल में लंपटई,दबंगई,कु-संगति का आज जितना सम्मान है उतना सभ्यता का सम्मान नहीं रह गया है। बुद्धिजीवियों को कल तक ओपिनियनमेकर माना जाता था लेकिन आज उनकी आवाज को कोई सुन नहीं रहा। कल तक ज्ञानी-गुणी-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मी-कलाकार –शिक्षक आदि को गर्व की नजर से देखा जाता था लेकिन आज वह सब गायब हो चुका है। यही वह परिवेश है जिसमें राजनीति में वाम की पराजय हुई और ममता बनर्जी का उदय हुआ और उसके सत्तारुढ़ होते ही असभ्यता का चौतरफा विस्तार हुआ। ममता शासन की एक ही बड़ी देन असभ्यता-असभ्यता-असभ्यता।

ममता ने जिस समय वाम के खिलाफ मोर्चा संभाला था बंगाल असभ्यता के शिखर था। हर क्षेत्र में सभ्यता के मानक नष्ट करने का काम वाम ने किया और इसकी प्रक्रिया आंरंभ होती है ज्योति बसु के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ। मुख्यमंत्री के तौर पर बुद्धदेव भट्टाचार्य का शासन असभ्यता के विकास का शासन है। उसकी स्वाभाविक परिणति ममता विजय में हुई। ममता ने वाम को राजनीति में हरा दिया लेकिन असभ्यता की मीनारों को तोड़ने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं असभ्यता की मीनारों पर जाकर बैठ गयी। सभ्य बंगाल में असभ्यता की मीनारें किसने बनायीं और समूचा समाज असभ्यता के नागपाश में कैसे बंध गया यह अपने आपमें दिलचस्प है।

बंगाल में असभ्यता के आख्यान की नींव कांग्रेस ने 1972-77 के फासीवादी दौर में रखी,माओवादियों,कांग्रेस और माकपा ने उसमें पानी डाला,सींचा और पल्लवित किया। ममता ने उसकी समूची फसल को बेचा और खाया। ममता की भाषा,भंगिमा,राजनीति,सांगठनिक जनाधार आदि ने कुल मिलाकर असभ्यता के अनुकूल दिशा में राजकीय संरचनाओं को मोड़ दिया। आज असभ्यता से मुक्ति के नाम पर जो विकल्प आ रहा है वह है भाजपा जो असभ्यता का अजगर है। संक्षेप में देखें तो वाम असभ्यता का बिच्छू था,तृणमूल असभ्यता का साँप और भाजपा असभ्यता का अजगर है। जाहिर है कोई भी सभ्य विकल्प इन सबके परे जाकर ही निकल सकता है। यही वो परिदृश्य है जिसको केन्द्र में रखकर जादवपुर विश्वविद्यालय के मौजूदा छात्र आंदोलन को देखा जाना चाहिए। यह आंदोलन क्षयिष्णु वातावरण में आशा की किरण की तरह है। यह आंदोलन सफल होगा कि नहीं यह तो भविष्य में तय होगा । लेकिन एक बात तय है कि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने स्त्री के अपमान और उत्पीडन के मामले को जिस दृढ़ता और आस्था के साथ उठाया है उसने नए बंगाल के निर्माण की नींव डाल दी है। इस आंदोलन के साथ बंगाल ने असभ्यता के खिलाफ प्रतिवाद की शुरुआत कर दी है। इस आंदोलन की खूबी है कि इसके केन्द्र में स्त्री उत्पीडन का मुद्दा है। सभ्यता के नए आख्यान के निर्माण के लिए यह बिंदु बेहद महत्वपूर्ण है। आंदोलनकारी छात्र सरकार बनाने या गिराने के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं बल्कि स्त्री के सम्मान ,सुरक्षा और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। स्त्री का बंगाल की राजनीति में मुद्दे के तौर पर केन्द्र में आना अपने आपमें बहुत ही मूल्यवान परिवर्तन का संकेत है। इस बिंदु से नए सभ्य बंगाल की संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति आदि को हटाने की मांग तो इस मसले में ईंधन का काम कर रही है। जादवपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति द्वारा स्त्री उत्पीडन की घटना की उपेक्षा करना और उसे गंभीरता से न लेना एकसिरे गलत और निंदनीय कृत्य है। उपकुलपति यह भूल गए कि एक स्त्री के साथ उत्पीडन की घटना सामान्य रुटिन घटना नहीं है।उनका केजुअल और उपेक्षाभाव इस बात को भी दरशाता है कि बौद्धिकों में किस तरह की स्त्रीविरोधी मानसिकता घर कर गयी है। उपकुलपति के रवैय्ये को देखकर यही लगता है बंगाल का बौद्धिक वातावरण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। यहाँ के बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों में स्त्री के सम्मान और सुरक्षा के प्रति कोई सचेतनता नहीं बची है। दो सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका है लेकिन बंगाल के तथाकथित बुद्धिजीवीवर्ग की आवाज और प्रतिवाद को हमने कहीं पर भी नहीं देखा। आखिरकार वे चुप क्यों हैं ? उनके सामने वे कौन सी बाधाएं जिनके कारण अपने चारों ओर होनेवाली असभ्यता की घटनाओं को मूकदर्शक की तरह देख रहे हैं और उनको कभी सड़कों पर प्रतिवाद करने का मन नहीं होता ! स्त्री की अवमानना और उत्पीडन की विगत तीन साल में सैंकड़ों घटनाएं हुई हैं लेकिन बुद्धिजीवी लंबी तानकर सोए हुए हुए हैं। बौद्धिकता का इस तरह का बेसुधभाव तो बंगाल ने कभी नहीं देखा !

     आज जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र दोपहर 12बजे आमसभा करने जा रहे हैं और वे अपने आंदोलन की भावी योजना बनाएंगे। हमें उम्मीद है कि वे सही दिशा में कदम उठाएंगे।वे लंबे समय से कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं, उन्होंने उपकुलपति का घेराव किया और उनके घेराव को पुलिस हस्तक्षेप के जरिए तोड़ा गया, छात्रों को पुलिसवालों ने निर्ममता से पीटा अनेक छात्र घायल हुए और इसके प्रतिवाद में हजारों छात्रों ने विशाल जुलूस निकाला और राज्यपाल को जाकर ज्ञापन दिया। इस समस्या के सम्मानजनक समाधान की दिशा में राज्य सरकार कोई प्रयत्न करती नजर नहीं आ रही। उलटे शिक्षामंत्री ने सबसे असभ्य बयान दिया है। उन्होंने कहा है जिन छात्रों को वीसी पसंद नहीं है वे जादवपुर विश्वविद्यालय छोड़कर अन्यत्र चले जाएं। हम इस बयान की निंदा करते हैं। साथ ही कहना चाहते हैं विश्वविद्यालय राज्य सरकार के शिक्षामंत्री और वीसी की जागीर नहीं है, यह छात्रों और बंगाल की संपदा है। शिक्षामंत्री भूल रहे हैं कि यदि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र अपनी मांगों पर अड़ गए तो समूची ममता मंडली को बंगाल के बाहर भाड़े के घर खोजने होंगे। वे यह देख ही नहीं पा रहे हैं कि छात्रों के प्रतिवाद की अग्नि में बंगाल की असभ्यता धू धू करके जल रही है।

रविवार, 21 सितंबर 2014

कार्ल मार्क्स और सर्वहारा की तानाशाही

              इन दिनों फेसबुक पर अशिक्षितों का फैशन हो गया है कि वे मार्क्स को शैतान सिद्धांतकार और सर्वहारा की तानाशाही को गंदी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। इसमें सभी रंगत और विचारधारा के लोग हैं,यहां तक कि मार्क्स के अनुयायी होने का दावा करने वाले पूर्व मार्क्सवादियों में भी एक वर्ग है जो सर्वहारा की तानाशाही की गलत व्याख्या करता है।
       
      सर्वहारा की तानाशाही का मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही नहीं है। व्यवहार में अनेक पूर्व समाजवादी देशों में इस अवधारणा का इसी रुप में इस्तेमाल किया गया। पूर्व समाजवादी देशों में सर्वहारा की तानाशाही का जिस तरह दुरुपयोग हुआ उससे यह धारणा विकृत हुई और इसकी गलत समझ प्रचारित हुई। मुश्किल यह है कि एक तरफ बुर्जुआजी का कु-प्रचार और दूसरी ओर कम्युनिस्टों के द्वारा इस धारणा का भ्रष्टीकरण ये दो चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं। कार्ल मार्क्स की अनेक धारणाओं को इन दोनों ओर से गंभीर खतरा है। तीसरा खतरा सोशल मीडिया ने पैदा किया है। इसके यूजरों का एक बड़ा हिस्सा है जो मार्क्सवाद को एकदम नहीं जानता लेकिन मार्क्सवाद ,साम्यवाद और उससे जुड़ी धारणाओं के बारे में आए दिन फेक प्रतिक्रियाएं देते रहते हैं। यहां हम ''सर्वहारा की तानाशाही'' के बारे में मार्क्स के विचारों के विवेचन तक सीमित रखेंगे।

मौजूदा दौर में हमारे समाज पर विश्वव्यापी वित्तीय संस्थाओं ,बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों का नियंत्रण है। वे ही तय कर रहे हैं कि देश और दुनिया में क्या होगा ?किस तरह का विकास होगा और किस तरह के सामाजिक मूल्य और राजनीतिक संरचनाएं काम करेंगी? इन संस्थाओं के निदेशकों को जनता कभी नहीं चुनती,यानी आज दुनिया को वे लोग चला रहे हैं जिनका चयन जनता नहीं करती।जबकि इनके फैसलों से करोड़ों लोग सीधे प्रभावित होते हैं।ये ही वे लोग हैं जिन्होंने सत्तादास की नयी राजनीतिक श्रेणी निर्मित की है जो सरकार चलाती है।सतह पर सरकारें कभी –कभी अपने इन आकाओं के खिलाफ फैसले लेती हैं, टैक्सचोरी के आरोप लगाकर जुर्माना वसूलती हैं,किसी न किसी अपराध में उनके बड़े अफसरों को गिरफ्तार भी करती हैं। यहां तक कि उनके ऊपर असामाजिक आचरण का आरोप तक लगाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिनको मार्क्स में तानाशाही नजर आती है लेकिन उनको वित्तीय-संस्थाओं की तानाशाही नजर नहीं आती।बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों के मालिकों के आचरण में कहीं तानाशाही नजर नहीं आती।जबकि ये संस्थाएं खुलेआम अ-लोकतांत्रिक व्यक्तियों के निर्देशन में काम करती हैं। सच्चाई यह है कि मौजूदा पूंजीवादी समाज ने मानवता की अपूरणीय क्षति की है। इसके बावजूद हमारा पूंजीवाद के प्रति आकर्षण किसी भी तरह कम नहीं हो रहा। हम इस या उस पूंजीवादी दल के अनुयायी होने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमें कांग्रेस से नफरत है या भाजपा या बसपा या सपा आदि से नफरत है लेकिन अंततः हम यही चाहते हैं कि कोई न कोई पूंजीवादी दल सत्ता में आए। जबकि पूंजीवाद की जनविरोधी,लोकतंत्र विरोधी भूमिका के प्रमाण पग-पग पर बिखरे पड़े हैं।इनकी ओर हम कभी देखते तक नहीं हैं और आए दिन कम्युनिस्टों और मार्क्सवादियों पर हमले करते रहते हैं। मार्क्सवादियों पर किया गया प्रत्येक हमला बर्बर पूंजीवाद की सेवा ही माना जाएगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसे ध्यान रखें और मार्क्स प्रतिपादित ''सर्वहारा की तानाशाही'' की अवधारणा पर विचार करें।

मार्क्स ने 'फ्रांस में गृह-युद्ध' नामक कृति में विस्तार के साथ अपने लोकतांत्रिक नजरिए का प्रतिपादन किया है। मार्क्स ने रेखांकित किया है कि मजदूरवर्ग कभी भी राज्य की तैयारशुदा मशीनरी के साथ हाथ मिलाकर काम नहीं कर सकता।क्योंकि राज्य की मशीनरी का मकसद और मजदूरवर्ग के मकसद में अंतर है। दूसरा कारण यह कि राज्य मशीनरी में यथास्थितिवाद के प्रति पूर्वाग्रह भरे होते हैं। आज हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें अनेक अ-लोकतांत्रिक चीजें मुखौटे लगाकर सक्रिय हैं वे अलोकतांत्रिक हितों की खुलेआम रक्षा कर रहे हैं।

मार्क्स के लोकतांत्रिक स्व-शासन के मॉडल को देखना हो तो सन् 1871 के पेरिस कम्यून के शासन को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। यह वह दौर है जिसमें कुछ समय के लिए फ्रांस के मजदूरों और आम जनता ने शासन अपने हाथों में ले लिया था। 'फ्रांस में गृहयुद्ध' नामक कृति में मार्क्स ने बताया है कि कम्यून का अर्थ क्या है ? यह मूलतः नगरपालिका के स्थानीय कौंसलरों का शासन है, जिनमें अधिकतर कामकाजी लोग थे,ये लोकप्रिय मतदान के जरिए चुनकर आए थे और उनको जनता को वापस बुलाने का भी अधिकार था। यहां पर उनको मजदूरों की मजदूरी के बराबर काम करने के लिए वेतन मिलता था। कोई विशेषाधिकार या विशेष सुविधाएं उनके पास नहीं थीं। स्थायी सेना समाप्त कर दी गयी थी।पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया था।कम्यून आने के पहले फ्रांस के राज्य,कमाण्डरों और पादरियों के हाथों में सत्ता हुआ करती थी,कम्यून का शासन स्थापित होने के बाद ये सब सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। शिक्षा संस्थानों के दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए गए।शिक्षा को राज्य और चर्च के दखल से मुक्त कर दिया गया।मजिस्ट्रेट,जज और सार्वजनिक पदों पर काम करने वालों का जनता चुनाव करती थी। वे जनता प्रति जबावदेह थे और जनता को उनको वापस बुलाने हक भी था। कम्यून के शासन ने निजी संपत्ति को भी खत्म कर दिया था।उसकी जगह सामुदायिक उत्पादन ने ले ली थी। पूंजीवादी वर्गीय शोषण को खत्म करके सामाजिक जनतंत्र की नींव रखी गयी।स्थायी सेना को खत्म करके जनता को हथियारबंद कर दिया गया।

पेरिस कम्यून की स्थापना जनता के द्वारा चुने गए सभासदों के जरिए की गयी। मार्क्स ने लिखा है ''कम्यून नगर सभासदों को लेकर गठित हुआ था,जो नगर के वार्डों से सार्विक मताधिकार द्वारा चुने गए थे,जो उत्तरदायी थे और साथ ही किसी भी समय हटाये जा सकते थे।कम्यून के अधिकांश सदस्य स्वभाववतया मजदूर अथवा मजदूर वर्ग के जाने –माने प्रतिनिधि थे। कम्यून संसदीय नहीं ,बल्कि एक कार्यशील संगठन था,जो कार्यकारी और विधिकारी दोनों कार्य साथ-साथ करता था।''( का,मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स,पेरिल कम्यून,प्रगति प्रकाशन, 1980, पृ.84) पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया और यही काम प्रशासन के अन्य अंगों के बारे में भी किया गया। कम्यून के सदस्यों को वही मजदूरी मिलती थी जो मजदूरों को मिलती थी। विभिन्न किस्म के भत्तों का अंत कर दिया गया।किसी भी विभाग के पास कोई विशेषाधिकार नहीं थे, सब कुछ कम्यून के हवाले था।पादरियों को सार्वजनिक पदों से मुक्त करके एकांत में जीने के लिए भेज दिया गया। उन्हें धार्मिक महात्माओं की तरह जीवन-यापन करने के लिए कहा गया।इसी तरह विज्ञान को भी वर्गीय-पूर्वाग्रहों और सरकारी दबावों से मुक्त कर दिया गया। चर्च की संपत्ति जब्त कर ली गयी। बंद पड़े वर्कशाप और फैक्ट्रियों को मुआवजे की शर्त के साथ खोल दिया गया । वर्ग-संपत्ति को खत्म कर दिया गया।

कम्यून के संचालक यह नहीं मानते ते कि वे कभी गलती नहीं कर सकते। उनकी जानकारी में यदि कोई गलती लायी जाती थी तो वे उसे तुरंत दुरुस्त करते थे।उनकी कथनी और करनी में साम्य था। वे जो कहते थे वही करते थे। पेरिस कम्यून स्थापित होने के बाद पेरिस की शक्ल ही बदल गयी। भ्रष्ट आडंबरयुक्त पेरिस खत्म हो गया। मुर्दाखाने में लाशें न थीं,रात को चोरियां होना बंद हो गयीं,राहजनी बंद हो गयी।फरवरी 1848 के बाद पेरिस की सड़कें पहलीबार निरापद हुईं। सड़कों पर पुलिस का पहरा नहीं होता था।पेरिस की वेश्याएं गायब हो गयीं।हत्या,चोरी और व्यक्तियों पर हमले की घटनाएं एकदम बंद हो गयीं। यही वह शासन है जिसको उस समय ''सर्वहारा की तानाशाही'' का नाम दिया गया। उस समय इसका वह अर्थ नहीं था जो इन दिनों प्रचारित किया जाता है।

मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन ने लिखा है कि उस समय इस पदबंध का अर्थ था ''लोकप्रिय लोकतंत्र''। ''सर्वहारा की तानाशाही'' का सामान्य अर्थ था बहुमत का शासन। आज ''तानाशाही'' का जो अर्थ लिया जाता है वह अर्थ मार्क्स के जमाने में नहीं था। आजकल तानाशाही का अर्थ है संविधान का उल्लंघनकर्ता। असल में कार्ल मार्क्स ने ''सर्वहारा की तानाशाही''पदबंध लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी (1805-1881) से लिया। ब्लांकी फ्रांसीसी क्रांतिकारी थे और उन्होंने ही इस पदबंध को जन्म दिया। उनकी नजर में ''सर्वहारा की तानाशाही'' का अर्थ था साधारण जनता का स्व-शासन। मार्क्स ने भी इसी अर्थ में इस पदबंध का इस्तेमाल किया है। उल्लेखनीय है लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी बाद में पेरिस कम्यून के जनता के द्वारा चुने गए राष्ट्रपति बने लेकिन उस समय जेल में डाल दिए गए थे।





कार्ल मार्क्स और लोकतंत्र


       कार्ल मार्क्स के बारे में मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक अनेक मिथ प्रचलित हैं।इन मिथों में एक मिथ है कि मार्क्स का लोकतंत्र से कोई सम्बन्ध नहीं है,मार्क्स लोकतंत्र विरोधी हैं। फलश्रुति यह कि जो मार्क्स को मानते हैं वे लोकतंत्र विरोधी होते हैं। सच्चाई इसके एकदम विपरीत है।मार्क्स ने अपना जीवन रेडीकल या परिवर्तनकामी लोकतांत्रिक नागरिक के रुप में आरंभ किया। कालान्तर में वे इस मार्ग पर चलते हुए क्रांतिकारी बने। अपने व्यापक जीवनानुभवों के आधार पर मार्क्स ने तय किया कि लोकतंत्र को वास्तव लोकतंत्र में रुपान्तरित करना बेहद जरुरी है।

हममें से अधिकांश लोकतंत्र के प्रचलित रुप को मानते और जानते हैं। लेकिन जेनुइन लोकतंत्र को हम लोग नहीं जानते अथवा उसे पाने से परहेज करते हैं। कार्ल मार्क्स के समग्र लेखन और कर्म पर विचार करें तो पाएंगे कि वे राजसत्ता की परमसत्ता के विरोधी थे। प्रसिद्ध ब्रिटिश मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन के अनुसार मार्क्स जनता की लोकप्रिय संप्रभुता के पक्षधर थे। इसका एक रुप संसदीय लोकतंत्र है। वे सिद्धांततः संसद के विरोधी नहीं थे। वे मात्र संसद में ही लोकतंत्र के पक्षधर नहीं थे उसके आगे जाकर वे वास्तव अर्थों में स्थानीय,लोकप्रिय संप्रभु,स्वायत्त शासन के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि लोकतंत्र में सभी संस्थानों को स्वायत्तता प्राप्त हो। नागरिक समाज के सभी संस्थानों को स्वायत्तता मिले।मार्क्स चाहते थे कि इस स्वायत्तता को राजनीतिक से लेकर आर्थिक क्षेत्र तक विस्तार दिया जाय।इस अर्थ में वे आत्म निर्भर सरकार के पक्षधर थे।

टेरी इगिलटन ने लिखा है कि मार्क्स राजनीतिक अभिजात्यवर्ग तक सीमित मौजूदा लोकतांत्रिक सरकार के विरोधी थे।मार्क्स का मानना था नागरिक की स्वशासन में निर्णायक भूमिका होनी चहिए। वे अल्पमत पर बहुमत के शासन के मौजूदा सिद्धांत के विरोधी थे। वे मानते थे कि नागरिक स्वयं राज्य पर शासन करें न कि राज्य उन पर शासन करे। मार्क्स का मानना था लोकतंत्र में राज्य का नागरिक समाज से अलगाव हो गया है। इन दोनों के बीच में सीधे अन्तर्विरोध पैदा हो गया है। मसलन् राज्य की नजर में अमूर्त रुप में सभी नागरिक समान हैं। जबकि वे दैनंदिन जीवन में असमान हैं। नागरिकों का सामाजिक अस्तित्व अन्तर्विरोधों से ग्रस्त है। जबकि राज्य उन सबको समान मानता है। राज्य ऊपर से समाज को निर्मित करने वाले की इमेज संप्रेषित करता है।जबकि उसकी यह इमेज तो सामाजिक परिस्थितियों का प्रतिबिम्बन है। इगिलटन ने लिखा है राज्य पर समाज निर्भर नहीं है बल्कि समाज पर राज्य परजीवी की तरह निर्भर है। लोकतंत्र में सब उलटा –पुलटा हो जाता है। पूंजीवाद ऊपर आ जाता है और लोकतंत्र नीचे चला जाता है। कायदे से लोकतंत्र को ऊपर यानी राजसत्ता का संचालक होना चाहिए लेकिन उलटे पूंजीवाद राज्य का संचालक बन जाता है। इसका अर्थ है कि समस्त संस्थानों को संचालित लोकतंत्र नहीं करता बल्कि पूंजीवाद संचालित करने लगता है।



मार्क्स का लक्ष्य था राजसत्ता और समाज के बीच के अंतराल को कम किया जाय।राजनीति और दैनंदिन जीवन के बीच के अंतराल को कम किया जाय। वे चाहते थे कि लोकतांत्रिक ढ़ंग से राज्य और राजनीति दोनों की भूमिका को स्वशासन के जरिए खत्म किया जाय।मसलन् समाज के पक्ष में राजसत्ता का अंत किया जाय,दैनंदिन जीवन के सुखमय विकास के लिए राजनीति का अंत किया जाय।इसी को मार्क्सीय नजरिए से लोकतंत्र कहते हैं।दैनंदिन जीवन में स्त्री और पुरुष अपने हकों को प्राप्त करें यही उनकी कामना थी,मौजूदा लोकतंत्र में स्त्री-पुरुष के हकों को राजसत्ता ने हड़प लिया है।टेरी इगिलटन के अनुसार समाजवाद तो लोकतंत्र की पूर्णता है वह उसका नकार नहीं है। हमें सोचना चाहिए कि मार्क्स के इस नजरिए में आपत्तिजनक क्या है जिसके लिए उन पर तरह-तरह के हमले किए जाते हैं।

शनिवार, 20 सितंबर 2014

इमेजों के विभ्रम में कैद मोदी

       नरेन्द्र मोदी के लिए चीन के राष्ट्रपति की यात्रा काफी असुविधाजनक रही है। इस यात्रा के दौरान मोदी इमेज युद्ध में ढ़ीले पड़ गए। पराजित भी हुए। मोदी फोटो सचेत रहे जबकि चीन के राष्ट्रपति ने अपने को स्वाभाविक रखा।मोदी की नजर कैमरे पर थी लेकिन चीन के राष्ट्रपति की नजर मोदी पर थीं।लगता है मोदी के सलाहकारों ने ठीक से कैमरा अभ्यास नहीं कराया या फिर मोदी सही ढ़ंग से सीख नहीं पाए।
फोटोसचेत नेता निष्प्रभावी होता है। इमेज युद्ध में जीनेवाले की इमेजों में ही विदाई होती है। वह आनंदमय क्षण था कि मोदी जब चीन के राष्ट्रपति से मिल रहे थे! साथ ही वे अपना विलोम भी रच रहे थे! लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने इमेजों के जरिए "नायक" को रचा था!लेकिन चीन के राष्ट्रपति से मिलते हुए वे नायक कम फोटो सचेतक ज्यादा नजर आए। उनके कायिक इमेज संसार में सहजता-सरलता और स्वाभाविकता एकसिरे से नदारत थी और इसने मोदी की इमेज को नुकसान पहुँचाया है।इससे भारत की इमेज पर भी बुरा असर पड़ा है। हमें संदेह है कि मोदी के व्यक्तित्व से चीन के राष्ट्रपति प्रभावित हुए होंगे!
नेता कूटनीतिक क्षणों में मुसकराते हैं ,दांत नहीं दिखाते! मोदी भूल ही गए कि दाँत दिखाते हुए हँसना राजनयिक सभ्यता का उल्लंघन है।दूसरी भूल यह हुई कि वे बे-मौसम हँस रहे थे, कूटनीति गंभीर कार्यव्यापार है,यह बच्चों की हँसी -ठिटोली नहीं है!
मोदी को अपनी कायिक भाषा को रुपान्तरित करना होगा। उनका अनौपचारिक भाव इमेजों के जरिए विलोम रच रहा है। राजनयिक भावबोध के समय परंपरा ,सहजता ,नियम और सभ्यता का ख्याल रखा जाना चाहिए। भारत में इमेजों को लोग नहीं पढ़ते लेकिन चीन में पढ़ते हैं, चीन में मोदी का इमेज संदेश अच्छा नहीं गया है।मोदीजी आगे अमेरिका जाने वाले उनको कूटनीति के अनुरुप इमेज बनाने पर ध्यान देना होगा,वरना कैमरा उनको कहीं का नहीं छोड़ेगा।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

वृन्दावन की विधवाएं और नया बंगाली समाज

           वृन्दावन में विधवाओं की दीन दशा पर आज 'एबीपी न्यूज' टीवी चैनल पर मथुरा से भाजपा सांसद हेमामालिनी का साक्षात्कार सुनने को मिला। हेमामालिनी ने एक दर्शक के नजरिए से वृन्दावन की विधवाओं को देखा है,उन्होंने भाजपा के स्थानीय नेताओं की फीडबैक पर भरोसा किया है। वे इस समस्या की जड़ों में जाना नहीं चाहतीं,लेकिन उनकी एक बात से मैं सहमत हूँ कि विधवाओं को सम्मानजनक ढ़ंग से रहना चाहिए, सम्मानजनक ढ़ंग से वे रहें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। वे भीख न माँगे हमें यह भी देखना चाहिए। असल में औरतों के प्रति हेमामालिनी का 'चाहिएवादी' नजरिया समस्यामूलक है।यह दर्शकीय भाव से पैदा हुआ है और इसका समस्या की सतह से संबंध है।

वृन्दावन में विधवाएं क्यों आती हैं या भेज दी जाती हैं,इसके कारणों की ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है। इस प्रसंग में बंगाली समाज में विगत 100साल में जो आंतरिक परिवर्तन हुए हैं उनको ध्यान में रखें। बंगाली समाज में सबसे पहला परिवर्तन तो यह हुआ है कि परिवार की संरचना बदली है, परिवार में नए आधुनिक जीवन संबंधों का उदय हुआ है। इसने एक खास किस्म की स्थिति बूढ़ों और औरतों के प्रति पैदा की है। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि उनमें नकली आधुनिकचेतना का विकास हुआ है। नकली आधुनिकता में डूबे रहने के कारण बंगालियों का एक अंश अपने अंदर पुराने मूल्यों और मान्यताओं को छिपाकर जीता रहा है। इसके कारण एक खास किस्म के मिश्रित व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है ।

यह नया आधुनिक बंगाली उस बंगाली से भिन्न है जिसको रैनेसां ने रचा था। नया बंगाली उस परंपरा से अपने को जोड़ता है जो रैनेसांविरोधी है। नए बंगाली के पास मुखौटा रैनेसां का है लेकिन अधिकांश जीवनमूल्य और आदतें रैनेसां विरोधी हैं। मसलन् रैनेसां में सामाजिक और निजी संवेदनशीलता थी ,जबकि नए बंगाली में निजी संवेदनशीलता का अभाव है। रैनेसां और रैनेसांविरोधी बंगाली परंपरा में संवेदनशीलता में जो अंतर है उसने औरतों के प्रति मुखौटासंस्कृति पैदा की और इसी संस्कृति के गर्भ से निजी परिजनों के प्रति संवेदनहीनता हमें बार बार देखने को मिलती है। यह संवेदनहीनता उन लोगों में ज्यादा है जो मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग से आते हैं । यही वह वर्ग है जिसमें से सामयिक राजनीतिक नेतृत्व भी पैदा हुआ है। कम्युनिस्टों से लेकर ममतापंथियों तक इस संवेदनहीनता को प्रत्यक्ष रुप में देखा जा सकता है। यह संवेदनहीनता मध्ययुगीन भावबोध की देन है। हमें विचार करना चाहिए कि वे कौन से कारण हैं जिनके कारण मध्ययुगीन संवेदनहीनता या ग्राम्य बर्बरता फिर से बंगाल में इतनी ताकतवर हो गयी ? विधवाओं के वृन्दावन भेजे जाने का सम्बन्ध ग्राम्य बर्बरता से है। यह ग्राम्य बर्बरता नए रुपों में संगठित होकर काम कर रही है। इसका सबसे ज्यादा शिकार औरतें हो रही हैं।

नए बंगाली समाज की मानसिकता है 'अनुपयोगी को बाहर करो' , अनुपयोगी से दूर रहो, बात मत करो। परिवार में भी यही मानसिकता क्रमशःविस्तार पा रही है। परिवारीजनों में प्रयोजनमूलक संबंध बन रहे हैं। जिससे कोई प्रयोजन नहीं है उसको भूल जाओ, जीवन से निकाल दो। बूढे प्रयोजनहीन हैं उन्हें बाहर करो, घर से बाहर करो, प्रांत से बाहर करो,मन से बाहर करो। यह एक तरह का 'तिरस्कारवाद' है, जो पुराने 'अछूतभाव' का ही नया संस्करण है, जो दिनों दिन ताकतवर होकर उभरा है।

मध्ययुगीन भावबोध का शिकार होने के कारण नए बंगाली समाज में सामाजिक परिवर्तन और प्रतिवाद की मूलगामी आकांक्षा खत्म हो चुकी है और उसकी जगह राजनीतिक अवसरवाद ने ले ली है। इसे मध्ययुगीन वफादारी कहते हैं। इसके कारण समाज में अनालोचनात्मक नजरिए की बाढ़ आ गयी है। सभी किस्म के पुराने त्याज्य मूल्य और आदतें हठात प्रबल हो उठे हैं। फलतःचौतरफा औरतों पर हमले हो रहे हैं। बलात्कार,विधवा परित्याग,नियोजित वेश्यावृत्ति आदि में इजाफा हुआ है।

मध्ययुगीन भावबोध को कभी बंगाली जाति ने विगत पैंसठ सालों में कभी चुनौती नहीं दी। वे क्रांति करते रहे,वामएकता करते रहे ,लेकिन मध्ययुगीनता पर ध्यान नहीं दिया। मध्ययुगीन भावबोध वह वायरस है जो धीमी गति से समाज को खाता है और प्रत्येक विचारधारा के साथ सामंजस्य बिठा लेता है। बंगाली समाज की सबसे बड़ी बाधा यही मध्ययुगीनता है इससे चौतरफा संघर्ष करने की जरुरत है। बंगाली समाज से मध्ययुगीन भावबोध जाए इसके लिए जरुरी है कि सभी किस्म के त्याज्य मध्ययुगीन मूल्यों के खिलाफ सीधे संघर्ष किया जाय।

बंगाली बुद्धिजीवी नए सिरे से अपने समाज और परिवार के अंदर झाँकें और बार बार उन पहलुओं को रेखांकित करके बहस चलाएं जिनकी वजह है मध्ययुगीनता पुनर्ज्जीवित हो रही है। मध्ययुगीनता का सम्बन्ध भाजपा के उदय और विकास की प्रक्रियाओं के साथ भी है। अब मध्ययुगीन बर्बरता ने सामाजिक कैंसर का रुप ले लिया है और इससे तकरीबन प्रत्येक परिवार किसी न किसी रुप में प्रभावित है। मध्ययुगीनता के असर के कारण समाज में बुद्धिजीवीवर्ग ने बंगाली समाज की आंतरिक समस्याओं पर सार्वजनिक रुप में लिखना बंद कर दिया है। मैं नहीं जानता कि नामी बंगाली बुद्धिजीवियों ने अपने समाज के आंतरिक तंत्र की कमजोरियों को सार्वजनिक तौर पर कभी उजागर किया हो।जबकि रैनेसां के लोग यह काम बार बार करते थे।

मध्ययुगीन बर्बरता में इजाफे के कारण सबसे ज्यादा औरतें प्रभावित होती हैं,विधवाएं उनमें से एक हैं। विधवाओं की समस्या का एक पहलू है उनके पुनर्वास का,दूसरा पहलू है उनके प्रति सामाजिक नजरिया बदलने का,तीसरा पहलू है विधवाओं के पलायन को रोकने का। इन सभी पहलुओं पर तब बातें होंगी जब बंगाली बुद्धिजीवी इस मसले पर कोई सामूहिक पहल करें।

भारतीय मुसलमानों की बलिदानी परंपरा

मुसलमानों की देशभक्ति की बात उठते ही भारत-पाक मैच का संदर्भ बार-बार संघी लोग उठाते हैं और कहते हैं देखिए मुसलमान भारत की हार पर बल्ले बल्ले कर रहे हैं। इनको शर्म नहीं आती,ये देशद्रोही हैं,आदि किस्म के कुतर्कों की हम फेसबुक से लेकर मासमीडिया में आएदिन प्रतिक्रिया देखते हैं। हम साफ कहना चाहते हैं कि खेल को राष्ट्रवाद के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद कैंसर है इसे जिससे भी जोड़ेंगे वह चीज सड़ जाएगी। खेल से जोड़ेंगे खेल नष्ट हो जाएगा। रही बात पाक की जीत पर खुशी मनाने की तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

खेल के दर्शक को हम दर्शक की तरह देखें हिन्दू-मुसलमान के रुप में न देखें। खेल में धर्म,देश,छोटा-बड़ा नहीं होता। खेल तो सिर्फ खेल है।खेल में कोई जीतेगा और कोई हारेगा,कोई खुशी होगा तो कोई निराश होगा, खेल अंततःसर्जनात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। खेल को यदि राष्ट्रवाद से जोड़ा जाएगा या किसी भी किस्म की राजनीति से जोड़ा जाएगा तो उससे सामाजिक सर्जनात्मकता पर बुरा असर पड़ेगा।खेल का मकसद है जोड़ना।जबकि राष्ट्रवाद का मकसद है तोड़ना।भारत-पाक मैच के साथ संघी लोग राष्ट्रवाद को जोड़कर अपनी फूटसंस्कृति को खेल संस्कृति पर आरोपित करने की हमेशा कोशिश करते हैं और इस लक्ष्य में बुरी तरह पराजित होते हैं।इसका प्रधान कारण है खेल की आंतरिक शक्ति। खेल की आंतरिक शक्ति सर्जनात्मक और जोड़ने वाली है।

हमारे बहुत सारे संघी मित्र आए दिन क्रांतिकारियों को माला पहनाते रहते हैं लेकिन इन क्रांतिकारियों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मुसलमानों को भूल जाते हैं। मसलन् क्रांतिकारी खुदीराम बोस को ही लें।खुदाराम बोस को गिरफ्तारी के पहले एक मुसलिम महिला ने अपने घर में शरण दी थी,यह और कोई नहीं मौलवी अब्दुल वहीद की बहन थी। ये जनाब क्रांतिकारी भूपेन्द्र दत्त के गहरे मित्र थे।यही महिला थी जो फांसी के पहले निडर होकर खुदीराम बोस से मिलने जाया करती थी।जबकि उस समय अंग्रेजी शासन के आतंक के कारण अनेक लोग खुदीराम बोस से मिलने से डरते थे।

मुसलमानों के पक्ष में लिखने का यह मकसद नहीं है कि अन्य तबकों की भूमिका की अनदेखी की जाय,मूल मकसद है मुसलिम विरोधी घृणा से युवाओं को बचाना।एक बार यह घृणा मन में बैठ गयी तो फिर उसे दूर करने में पीढ़ियां गुजर जाएंगी। हमारे कई हिन्दू मित्र मुसलमानों की कुर्बानियों की परंपरा को जानते हुए भी फेसबुक पर आए दिन जहर उगलते रहते हैं,इसलिए भी जरुरी हो गया है कि मुसलमानों के सकारात्मक योगदान के बारे में सही नजरिए से ध्यान खींचा जाय। मुसलमान हमारे समाज का अंतर्ग्रथित हिस्सा हैं। उनकी कुर्बानियों के बिना हम आजाद हिन्दुस्तान की कल्पना नहीं कर सकते।

याद करें रायबरेली के मुसलमान फकीर सैयद अहमद को जिनके नेतृत्व में उत्तर भारत बहावी सम्प्रदाय के अनुयायियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांवों से लेकर शहरों तक पहाडों से मौदानों तक आधी शताब्दी तक संघर्ष चलाया। सन् 1871 में एक अन्य बहावी क्रांतिकारी अब्दुल्ला को जस्टिस नार्मन की हत्या के आरोप में फाँसी पर लटकाया गया। सन् 1872 में अंडमान में लार्ड मेयो की हत्या करने वाला बहावी वीर शेर अली था,वह इस हत्या के लिए फाँसी के फंदे पर झूल गया। सन् 1831 में नीलहे साहबों के विरुद्ध पहले विद्रोह के प्रवर्तक रफीक मंडल को कौन भूल सकता है। मुसलमानों में ऐसे अनेक नेता हुए हैं जिन्होंने अपने समुदाय के साम्प्रदायिक और रुढिवादी आग्रहों को तिलांजलि देकर आजादी की जंग में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।सन् 1905 के ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी बंग-भंग आंदोलन के बरीसाल अधिवेशन की अध्यक्षता कलकता के प्रसिद्ध मुसलमान वकील अब्दुल्ला रसूल ने की थी। बंग-भंग के विरुद्ध चले पहले विशाल स्वदेशी आंदोलन में भारी संख्या में मुसलिम बुद्धिजीवियों ने हिन्दुओं के साथ मिलकर संघर्ष किया था।

भारत के मुसलमान देशभक्त होते हैं,यह निर्विवाद सत्य है।इसे जानते हुए भी संघ और उसके लगुए-भगुए संगठन विभ्रम पैदा करते रहते हैं और युवाओं में मुसलिम विरोधी प्रचार करते रहते हैं। मुसलमानों की देशभक्ति की बार-बार स्वाधीनता संग्राम में परीक्षा हुई है और आजादी के बाद बार बार जनांदोलनों के समय परीक्षा हुई है। भारत के मुसलमानों की देशभक्ति ही है कि आज जम्मू-कश्मीर में आतंकी-पृथकतावादी संगठन पाक की अबाध मदद के बावजूद आम मुसलमानों के बीच अलग-थलग पड़े हैं। इस क्षेत्र के आम मुसलमानों का भारत के लोकतंत्र और संविधान मेें अटूट विश्वास है।मुश्किल यह है कि एक तरफ संघ के संगठन मुसलमानों पर देशद्रोही कहकर हमले करते हैं,मुसलमानों के प्रति संशय और संदेह पैदा करते हैं,वहीं दूसरी ओर आतंकी-पृथकतावादी संगठन भी उनको निशाना बनाते हैं। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों ने संघ और आतंकी-पृथकतावादी दोनों के ही नजरिए के खिलाफ संघर्ष किया है और तमाम तकलीफों के बावजूद उदारतावाद की बेहतरीन मिसाल कायम की है।



गुरुवार, 18 सितंबर 2014

वृन्दावन की विधवाएँ और पुंसवाद



हेमामालिनी ने वृन्दावन की विधवाओं के बारे में स्त्री विरोधी बयान देकर विधवाओं को आहत किया है।ये विधवाएँ हमारे समाज का आईना हैं और ये हमारी स्त्री विरोधी राजनीति का महाकाव्य भी हैं। वृन्दावन की विधवाएँ अभी तक बस नहीं पायी हैं। सोनिया गांधी से लेकर हेमामालिनी , इन्दिरा गांधी से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी, कांग्रेस से लेकर जनवादी महिला समिति तक का समूचा विधवा प्रलाप हमारी राजनीति में प्रच्छन्न और प्रत्यक्षतौर पर सक्रिय पितृसत्तात्मक विचारधारा के वर्चस्व की अभिव्यक्ति करता है। केन्द्र से लेकर राज्य तक कई सरकारें आई और गईं लेकिन विधवाओं की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। न तो किसी सांसद -विधायक विकासनिधि का इनके पुनर्वास के लिए इस्तेमाल हुआ और न विधवाओं तक विधवा पेंशन या बेकारीभत्ता का धन पहुँचा । 
   यह सोचने लायक बात है कि वृन्दावन में सैंकडों बेहद समृद्ध संत हैं लेकिन किसी ने दो मुट्ठी चावल से ज़्यादा की उनके लिए व्यवस्था नहीं की। आज़ादी के बाद लाखों लोगों को सरकार घर बनाकर दे चुकी है लेकिन इन विधवाओं के लिए घर बनाकर देने की किसी को चिन्ता नहीं है। यही हाल शैलानी पर्यटकों और नव-धनाढ्यवर्ग का है उसमें से भी कोई स्वयंसेवी सामने नहीं आया जो इन विधवाओं की हिफाज़त और ज़िन्दगी के बंदोबस्त के बारे में काम करता। कहने का अर्थ यह है कि विधवाएँ हमारे समाज में फ़ालतू और बेकार की चीज़ हैं। उनकी समाज हर स्तर पर उपेक्षा और अवहेलना करता रहा है,विधवाएँ बसायी जाएँ इसके लिए हमें स्त्री के प्रति अपना बुनियादी नज़रिया बदलने की ज़रुरत है। 
    राजनेताओं और मीडिया के लिए विधवाएँ इवेंट और बयान हैं।ये लोग भूल जाते हैं कि वे हाड़ -माँस की साक्षात स्त्री हैं, उनके पास दिलदिमाग है। वे नैतिकदृष्टि से बेहतरीन मानकों को जी रही हैं। वे स्वाभिमानी हैं। वे भिखारी और अनाथ नहीं हैं। वे संवेदनशील स्त्री हैं यह बात किसी के मन में क्यों नहीं आती? क्यों महिला संगठनों ने पहल करके इन विधवाओं के पुनर्वास के बारे में अभी तक कोई ठोस स्कीम लागू नहीं की ?
   विधवाएँ हमारे समाज की स्त्रीविरोधी तस्वीर का बर्बर पहलू है । इन औरतों की दुर्दशापूर्ण स्थिति को देखते हुए भी हम सब अनदेखी करते रहे हैं। विधवाओं को सहानुभूति की नहीं ठोस भौतिक मदद की ज़रुरत है। अधिकांश विधवाएँ बहुत ख़राब अवस्था में जीवन यापन कर रही हैं लेकिन केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक किसी का अभी तक ध्यान नहीं गया।इन विधवाओं की स्थिति यह है कि वे अपने दुखों को बोल नहीं सकतीं । अपने लिए हंगामा नहीं कर सकतीं।राजनीति नहीं कर सकतीं। वे जीवन से हार मानकर जिजीविषा के कारण किसी तरह जी रही हैं। उनको मदद करने वाले हाथ आगे क्यों नहीं आए यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। हम माँग करते हैं कि वृन्दावन की विधवाओं को तुरंत विधवापेंशन योजना के तहत पाँच हज़ार रुपया प्रतिमाह पेंशन दी जाय और मथुरा के सांसद और विधायक निधि फ़ण्ड और अन्य स्रोतों से मदद लेकर राज्य सरकार तुरंत उनके निवास के विधवा आश्रम बनाए। इन विधवाओं को मुफ़्त चिकित्सा ,बस और रेल से यात्रा के राष्ट्रीय पास उपलब्ध कराए जाएँ। 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

बर्बरता के प्रतिवाद में


भारत में सभ्यता विमर्श है लेकिन हमने कभी यह ठहरकर नहीं सोचा कि सभ्यता के पर्दे के पीछे बर्बरता के किस तरह के रुप समाज में विकसित हो रहे हैं । हम सभ्यता और धर्म की ऊँची मीनारों पर सवार हैं लेकिन  बर्बरता की भी ऊँची मीनारों का निर्माण किया है । हमने बर्बरता के लक्षणों की तफ़सील के साथ जाँच- पड़ताल नहीं की । 
     आज़ाद भारत की नींव भारत -विभाजन और तेलंगाना विद्रोह के दमन से पैदा हुई बर्बरता पर रखी गयी है । यह संयोग है कि भारत विभाजनजनित बर्बरता की तो कभी -कभार चर्चा सुनने को मिल जाती है लेकिन तेलंगाना के किसान आंदोलन के दमन और बर्बरता के रुपों की कभी चर्चा ही नहीं होती, यहाँ तक कि कम्युनिस्ट थिंकरों के यहाँ भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता ।
    भारत में लोकतंत्र का कम और बर्बरता का ज़्यादा विकास हुआ है । बर्बरता की जब भी बातें होती हैं तो हम वफ़ादारी के आधार पर पक्ष- विपक्ष तय करने लगते हैं या फिर राजनीतिक - सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर ।
   भारत में दो तरह की बर्बरता है , पहली बर्बरता घर के अंदर है ,दूसरी बर्बरता घर के बाहर समाज के विभिन्न स्तरों पर घट रही है। संक्षेप में , बर्बरता के दो बड़े एजेंट हैं परिवार और पुलिस ।
  बर्बरता के पारिवारिक तत्वों को हमने सामाजिक तौर पर चुनौती नहीं दी । लंबे समय तक पारिवारिक बर्बरता को हम छिपाते रहे। सन् 1970-71 के बाद से पारिवारिक बर्बरता के रुपों को धीरे धीरे हमने सार्वजनिक करना आरंभ किया लेकिन इसके बारे में कोई समग्र समझ नहीं बनायी ।
    पारिवारिक बर्बरता का प्रधान कारण है पारिवारिक सदस्यों में समानता , सद्भाव और एक- दूसरे के प्रति लगाव का अभाव । जीवनशैली के विभिन्न पारिवारिक रुपों में वर्चस्व की मौजूदगी । साथ ही परिवार को नए लोकतांत्रिक ढाँचे के अनुरूप परिवर्तित न कर पाना ।  

  लोकतंत्र में कोई भी चीज, वस्तु, विचार या जीवन मूल्य जब जन्म लेता है तो वह प्रसारित होता है । लोकतंत्र में प्रसार की क्षमता के कारण ही बुरी चीज़ें, बुरी आदतें और बुरे मूल्य तेज़ी से प्रसारित हुए ।बर्बरता का प्रसार उनमें से एक है । 
     त्रासदी की हमारे समाज में आँधी चल रही है।   इसमें पारिवारिक बर्बरता, जातिवादी, साम्प्रदायिक, पृथकतावादी ( उत्तर पूर्वी राज्यों , पंजाब और कश्मीर ), माओवादी -नक्सलवादी बर्बरता,आपातकालीन आतंकी बर्बरता के साथ पुलिसबलों की दैनंदिन बर्बरता शामिल है ।  हिंसा और बर्बरता के इन सभी क्षेत्रों के आँकड़े चौंकाने वाले हैं । 
        परिवार में दहेज- हत्या, स्त्री- उत्पीड़न , बच्चों और बूढ़ों का उत्पीड़न या उनके प्रति बर्बर व्यवहार हमें त्रासद नहीं लगता बल्कि इसे हम 'बुरा' कहकर हल्का बनाने की कोशिश करते हैं । इसी तरह की कोई घटना घटित होती है तो हमें बुरा लगता है । हम यही कहते हैं 'बुरा' हुआ। जबकि यह त्रासद है , दुखद है , लेकिन हम 'बुरा 'कहकर अपने भावों को व्यक्त करते हैं। 
    दैनन्दिन पारिवारिक जीवन की त्रासदियों में भय , शाॅक , चौंकाने वाला और उत्पीड़न सबसे बड़े तत्व हैं। आधुनिक त्रासदी को इन तत्वों के बिना परिभाषित ही नहीं कर सकते । त्रासदी को महज़ बुरे के रुप न देखा जाय।
    मार्क्सवादी आलोचक  टेरी इगिलटन के अनुसार त्रासदी को जब हम 'बुरा' या ' बहुत बुरा हुआ' कहते हैं तो इसमें निहित दर्द को महसूस नहीं करते । 
     टेरी इगिलटन के अनुसार शिक्षित और अशिक्षित संस्थानों के बीच में त्रासदी के अर्थ को लेकर बहुत बड़ा भेद है। इस प्रसंग में शिक्षितों के संस्थान तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा विश्वसनीय हैं। वे यह महसूस करते हैं कि त्रासदी का अर्थ ' बुरा' से बढ़कर होता है । वे दुख में निहित मूल्य की खोज करते हैं और उसे रेखांकित करते हैं । 
     त्रासदी को हमें दुख या बुरे के रुप से ज़्यादा व्यापक अर्थ में देखना चाहिए । त्रासदी का मतलब दुख मात्र नहीं है । 
     हमारे समाज में जो अनुदारवादी हैं वे त्रासदी को 'दुख'या 'बुरे ' के रुप में ही देखते हैं। वे इसमें निहित दर्द, पीड़ा, उत्पीड़न और भय की उपेक्षा करते हैं।
    मसलन् ,गुजरात के दंगों को मोदीपंथी दुखद या बुरा मानते हैं , त्रासद नहीं मानते हैं , त्रासदी और बर्बरता नहीं मानते । इसी तरह दहेज- हत्या को हम बुरा कहते हैं बर्बरता या त्रासदी नहीं कहते । इस तरह हमलोग जाने -अनजाने बर्बरता के साथ सहनीय संबंध बना लेते हैं। 
     पारिवारिक बर्बरता को कम करके आँकने और देखने का सबसे जनप्रिय मुहावरा है ,'चार बर्तन होंगे तो खनकेंगे।' पति-पत्नी  के बीच की बर्बरता को हम उपेक्षणीय मानते हैं । कहते हैं 'जहाँ प्यार होता है वहाँ झगड़ा भी होता है ।' 'पारिवारिक झगडा' कहकर बर्बरता को कम करके पेश किया जाता है और इस प्रक्रिया में घटित त्रासदी की अनदेखी की जाती है । यह त्रासदी लिंगमुक्त है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ महिलाओं के साथ त्रासद घटनाएँ घटित होती हैं , यह भी देखा गया है कि पुरुषों , बच्चों और बूढ़ों के साथ त्रासद घटनाएँ बढ़ी हैं ।
   त्रासदी में अपूरणीय मानवीय क्षति होती है । इसके दो छोर हैं , पहला , निजी, शारीरिक और मानसिक है तो दूसरा , सार्वजनिक, राजनीतिक और अन्य के प्रति जबावदेही  है । 
      सवाल यह है कि लोकतंत्र के विकास के साथ- साथ समाज में सभ्यता का विकास कम और बर्बरता का विकास ज़्यादा क्यों हुआ ? बर्बरता के साथ सामंजस्य बिठाने की मानसिकता का विकास क्यों हुआ ? बर्बरता का कैनवास दिनोंदिन क्यों बढा ? 
मेरे लेखे ,बर्बरता के विकास का प्रधान कारण है समाज में नई जीवन प्रणाली , सामाजिक संरचनाओं और नियमों के विकास की प्रक्रिया का अभाव। पुरानी प्रणाली का पूरी तरह बिखर जाना या ध्वस्त हो जाना और नियमन की नई प्रणाली का निर्मित न हो पाना । 
   एरिक हाॅब्सबाम के अनुसार ' नियमों और नैतिक आचरण ' की परंपरागत और सार्वभौम प्रणाली जब ध्वस्त हो जाती है तो बर्बरता पैदा होती है ।
    सामाजिक- राजनीतिक नियमन की  राजकीय प्रणाली को जब हम आधार बनाकर समाज को संचालित करने लगते हैं तब भी बर्बरता में इज़ाफ़ा होता है । 
    राजकीय नियमन बर्बरता के प्रति सहिष्णु बनाता है, राजकीय बर्बरता को वैध और स्वीकार्य बनाता है फलत: राजकीय बर्बरता की हम अनदेखी करते हैं ,पुलिस और सैन्यबलों की बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। 
      काम संतुष्टि के अभाव और  बंदूक़ की सभ्यता के विकास ने बर्बरता के क्षेत्र में लंबी छलाँग लगायी है। असहाय और मातहत लोगों के प्रति बर्बरता के ये दो बडे अस्त्र हैं। 
    हम बर्बरता की ओर जितना तेज़ी से बढ़े हैं उतनी ही तेज़ी से दक्षिणपंथी राजनीति का ग्राफ़ बढ़ा है ।  उदार राजनीति का ह्रास हुआ है । 
      भारतीय  समाज में एक तरफ़ निरंतर पुलिस बर्बरता है तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक दंगों , पृथकतावादी -आतंकी आंदोलनों का हिंसाचार है। इसके अलावा राजनीतिक हत्याओं का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ा है।   
    स्वाधीनता संग्राम और मध्यकाल की तुलना में स्वाधीन भारत में राजनीतिक हत्याएँ कई गुना ज़्यादा हुईं ।  जितने लोग युद्ध( 1962,1965,1971 ) में मारे गए उससे कई गुना ज़्यादा लोग पुलिस के हाथों थानों में मारे गए या पुलिसबलों से मुठभेड़ में मारे गए । 
     गाँवों में जातिगत बर्बरता को हमने सामान्य रुटिन मानकर आँखें बंद कर लीं। जातिगत बर्बरता के हमने सुंदर वैध तर्कों का परंपरागत कम्युनिकेशन के ज़रिए प्रचार किया और परंपरागत ग़ुलामी को वैध बनाने की कोशिश की । असल में यह वर्गयुद्ध है जो अपने ही देश के नागरिकों के ख़िलाफ़ जारी है । 
    जातिगत श्रेष्ठता को आधार बनाकर किए गए बर्बर हमलों ने भारत के सुंदर भविष्य की सभी संभावनाओं को दफ़न कर दिया । शैतान को हमने भगवान बना लिया और हर घर में जातिरुपी शैतान की पूजा-अर्चना, मान- मर्यादा बढ़ा दी ।
      इसी दौर में तमाम प्रगतिशीलों को पुरानी और नई जाति व्यवस्था में भेद करके पुरानी को बेहतर कहते सुना गया । पुरानी जाति व्यवस्था के 'अच्छे' गुणों की खोज खोजकर चर्चा की गयी और यह काम नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील आलोचक ने ख़ूब किया । 
     जाति व्यवस्था पुरानी हो या नई वह हमेशा से बर्बर रही है और उसका मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य के साथ सीधे अंतर्विरोध है उसकी किसी भी क़िस्म की हिमायत बर्बरता को वैधता प्रदान करती है । 
     यही हाल साम्प्रदायिक बर्बरता का है जिसके कारण हज़ारों दंगे हुए ,उनमें हज़ारों लोग बर्बरता की बलि चढ़ गए । भारत विभाजन से लेकर आज तक हुए दंगों के ग्राफ़ को देखें तो पाएँगे कि हमारे ज़ेहन में साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता के प्रति घृणा घटी है । तरह - तरह के घटिया तर्कों के ज़रिए हमने साम्प्रदायिक हिंसा को वैधता प्रदान की है । सतह पर साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता टुकड़ों में होती रही है लेकिन उसके बीच में एक बारीक कड़ी है जो सभी क़िस्म के बिखरे टुकड़ों को जोड़ती है ।
     साम्प्रदायिक बर्बरता का सबसे बड़ा योगदान है कि हमारे समाज में पहचान के आधुनिक वर्गीय और पेशेवर रुपों की बजाय धार्मिक रुपों की ओर रुझान बढा है । 
  साम्प्रदायिक बर्बरता ने देश की ' ब्रेनवाशिंग' की है । भारतीय मन को साम्प्रदायिक मन में रुपान्तरित किया है ।  बहिष्कार करने और साम्प्रदायिक समूह में रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है ।महानगरों या शहरों में मिश्रित बस्तियाँ या बसावट ग़ायब हो गयी है। 
    अल्पसंख्यकों और ख़ासकर मुसलमानों को समाज में वैध तरीक़ों के ज़रिए ठेलकर समूहबंद 'घेटो ' में बंद कर दिया है या फिर उनकी बस्तियाँ अलग बसा दी गयी हैं। इसने समाज में ' हम' और ' तुम' के आधार पर विभाजन को वैध बनाया है और यह बर्बरता का वह साइड इफ़ेक्ट है जो हिंसाचार के बाद भी जारी है । 
        बर्बरता के दो तरह के प्रभाव होते हैं ,पहला पतात्कालिक होता है और दूसरा प्रभाव दीर्घकालिक होता है । तात्कालिक प्रभाव पर हमारी तत्काल प्रतिक्रिया सुनने में आती है लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में हमारी कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आती ।
   बर्बरता का दीर्घकालिक प्रभाव बेहद ख़तरनाक होता है और मौन उत्पीडक का काम करता है । इसमें व्यक्ति हर स्तर पर बिखर जाता है, नष्ट हो जाता है । इससे समाज में बर्बरता को चुप सहने और देखने की बीमारी का जन्म होता है और हम फिर बर्बरता को देखते हैं और चुप रहने लगते हैं । अब बर्बरता हमारे ज़ेहन में रुटिन बनकर छा जाती है । वह रोज़मर्रा की चीज़ हो जाती है और हम उसे 'बुरा'भर कहकर मन के भावों को व्यक्त करने लगते हैं ।
     यही हाल पुलिस बर्बरता का है ,हम कभी नहीं सोचते कि पुलिस जब किसी अपराधी के प्रति असभ्य तरीक़ों का इस्तेमाल करती है या 'थर्ड डिग्री'उत्पीडन के तरीक़े अपनाती है तो वह राजकीय संस्थाओं को बर्बर बनाती है । राजकीय संस्थाएँ जब बर्बर हो जाती हैं तो समाज में सभ्यता को बचाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है । इससे समाज की नैतिक प्रगति बाधित होती है । 
     अपराधियों से सूचनाएँ हासिल करने के लिए पुलिस के बलप्रयोग ने जबरिया सूचना हासिल करने और जबरिया मुखबिर की तरह काम करने की पद्धति का विकास किया , इस पद्धति का कालांतर में साम्प्रदायिक -पृथकतावादी -माओवादी और आतंकी संगठनों ने भी इस्तेमाल किया । इन संगठनों से प्रभावित इलाक़ों में आतंक और प्रति आतंक    को बढ़ावा मिला जिसने राजकीय बर्बरता में इज़ाफ़ा किया ।मसलन पुलिस के बर्बर दमन से आतंकी संगठन ख़त्म हो जाते हैं , जैसा पंजाब में हुआ , तो लोग राजकीय बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। इसके चलते आमलोगों में यह धारणा भी बनी कि सभ्यता के मुक़ाबले बर्बरता ज़्यादा कारगर हथियार है । इसने हमेशा के लिए सभ्यता की सीमाओं को कमज़ोर कर दिया । 
      सभ्य तरीक़ों की बजाय हम जब बर्बर तरीक़ों को वैध मानने लगते हैं तो स्वयं को अमानवीय बना रहे होते हैं। अमानवीयता में मज़े लेना आरंभ कर देते हैं । फलत: हम अमानवीयता के आदी हो दाते हैं । इस समूची प्रक्रिया के वाहक युवा बनते हैं । वे असहनीय चीज़ों को, अमानवीय चीज़ों को सहन करने लगते हैं , उनमें मज़ा लेने लगते हैं। 
     आज बर्बरता के निशाने पर युवा हैं। बर्बरता युवाओं को विभिन्न रुपों में अपनी ओर आकर्षित कर रही है । साम्प्रदायिक-पृथकतावादी -माओवादी-आतंकी हिंसा के वाहक युवा हैं, वे अपने बर्बर हिंसा से रोमैंटिक संबंध बना रहे हैं । 
     परिवार से लेकर समाज तक बर्बरता के विभिन्न रुपों में युवाओं की बड़े पैमाने पर शिरकत चिन्ता की बात है । 
    युवाओं में बर्बरता के प्रति बढ़ते आकर्षण और बेगानेपन को हमें  जुड़वाँ पहलू की तरह देखना चाहिए । यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । मसलन युवाओं में दहेज के प्रति कोई घृणा नहीं है उलटे वे दहेज माँगने लगे हैं । 
    यही हाल साम्प्रदायिक -आतंकी-पृथकतावादी -माओवादी- नक्सल राजनीति का है ,उसकी धुरी भी युवा हैं। एक तरफ़ युवाओं का यह रुप और दूसरी ओर उनका 'अ- राजनीतिक 'रुप असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और ये दोनों मिलकर बर्बरता को महत्वहीन बनाते हैं। सच यह है बर्बरता महत्वहीन नहीं है वह एक सच्चाई है और इसने जीवनशैली से लेकर राजनीति तक, आदतों से लेकर आचार- व्यवहार और नैतिकता के विभिन्न स्तरों तक अपने पैर पसार लिए हैं ।
    अब बर्बरता एक नई ऊँचाई की ओर जा रही है और अब इसने युवाओं में येन-केन-प्रकारेण पैसा कमाने की अंधी होड़ पैदा कर दी है। अब बर्बरता महत्वहीन हो गयी है और पैसा कमाना महत्वपूर्ण हो गया है और यह बर्बरता का वह छोर है जहाँ पहुँचकर सभ्यता और मानवीय मूल्यों की खोज का काम और भी दूभर हो गया है । 
     
      
      
     


शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मुसलमानों की हिमायत में

        आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह प्रचार आरंभ किया है उसे देखते हुए सामयिक तौर पर मुसलमानों की इमेज की रक्षा के लिए सभी भारतवासियों को सामने आना चाहिए। मुसलमानों को देशद्रोही और आतंकी करार देने में इन दिनों मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय हो उठा है,ऐसे में मुसलमानों की भूमिका को जोरदार ढ़ंग से सामने लाने की जरुरत है। सबसे पहली बात यह कि भारत के अधिकांश मुसलमान लोकतांत्रिक हैं और देशभक्त हैं। वे किसी भी किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति का अंग नहीं रहे हैं। चाहे वह मुस्लिम साम्प्रदायिकता ही क्यों न हो। भारत के मुसलमानों ने आजादी के पहले और बाद में मिलकर देश के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी है और उनके योगदान की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

भारतीय मुसलमानों के बारे में जिस तरह का स्टीरियोटाइप प्रचार अभियान मीडिया ने आरंभ किया है कि मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं,अनुदार होते हैं,नवाजी होते हैं,गऊ का मांस खाते हैं,हिन्दुओं से नफरत करते हैं,चार शादी करते हैं,आतंकी या माफिया गतिविधियां करते हैं।इस तरह के स्टीरियोटाइप प्रचार जरिए मुसलमान को भारत मुख्यधारा से भिन्न दरशाने की कोशिशें की जाती हैं।जबकि सच यह है मुसलमानों या हिन्दुओं को स्टीरियोटाइप के आधार पर समझ ही नहीं सकते। हिन्दू का मतलब संघी नहीं होता।संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा अधिकांश हिन्दू नहीं मानते।भारत के अधिकांश हिन्दू- मुसलमान कुल मिलाकर भारत के संविधान के द्वारा परिभाषित संस्कृति और सभ्यता के दायरे में रहते हैं और उसके आधार पर दैनंदिन आचरण करते हैं।अधिकांश मुसलमानों की सबसे बड़ी किताब भारत का संविधान है और उस संविधान में जो हक उनके लिए तय किए गए हैं उनका वे उपयोग करते हैं।हमारा संविधान किसी भी समुदाय को कट्टरपंथी होने की अनुमति नहीं देता। भारत का संविधान मानने के कारण सभी भारतवासियों को उदारतावादी मूल्यों,संस्कारों और आदतों का विकास करना पड़ता है।

समाज में हिन्दू का संसार गीता या मनुस्मृति से संचालित नहीं होता बल्कि भारत के संविधान से संचालित होता है। उसी तरह मुसलमानों के जीवन के निर्धारक तत्व के रुप में भारत के संविधान की निर्णायक भूमिका। भारत में किसी भी विचारधारा की सरकार आए या जाए उससे भारत की प्रकृति तय नहीं होती,भारत की प्रकृति तो संविधान तय करता है। यह धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है और इसके सभी बाशिंदे धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं।संविधान में धार्मिक पहचान गौण है, नागरिक की पहचान प्रमुख है।इस नजरिए से मुसलमान नागरिक पहले हैं ,धार्मिक बाद में ।आरएसएस देश का ऐसा एकमात्र बड़ा संगठन है जिसकी स्वाधीनता संग्राम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही,यह अकेला ऐसा संगठन है जिसके किसी बड़े नेता को साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी हमले का शिकार नहीं होना पड़ा। उलटे इसकी विचारधारा के भारत की धर्मनिरपेक्ष -लोकतांत्रिक संस्कृति और सभ्यता विमर्र्श पर गहरे नकारात्मक असर देखे गए हैं। इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुसलिम नेताओं ने कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । ब्रिटिशशासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए। मसलन्, रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवालाबाग कांड में 70 से अधिक देशभक्त मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं।आरएसएस के प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनकी देशभक्ति और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं।हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शासद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे।

    आरएसएस के लोगों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनको देश के लिए कुर्बानी देने से किसने रोका था ?स्वाधीनता संग्राम में उनके कितने सदस्य शहीद हुए ? इसकी तुलना में यह भी देखें कितने मुसलमान नेता-कार्यकर्ता शहीद हुए ? देशप्रेम का मतलब हिन्दू-हिन्दू करना नहीं है। हिन्दू इस देश में रहते हैं तो उनकी रक्षा और विकास के लिए अंग्रेजों से मुक्ति और उसके लिए कुर्बानी की भावना आरएसएस के लोगों में क्यों नहीं थी ?जबकि अन्य उदार-क्रांतिकारी लोग जो हिन्दू परिवारों से आते थे, बढ़-चढ़कर कुर्बानियां दे रहे थे, शहीद हो रहे थे।संघ उस दौर में क्या कर रहा था ? यही कहना चाहते हैं संघ कम से कम कुर्बानी नहीं दे रहा था। दूसरी ओर सन् 1930-32 के नागरिक अवज्ञा आंदोलन में कम से कम 43मुसलमान नेता-कार्यकर्ता विभिन्न इलाकों में संघर्ष के दौरान पुलिस की गोलियों से घायल हुए और बाद में शहीद हुए। सवाल यह है संघ इस दौर में कहां सोया हुआ था ?

     कायदे से भारत के शहीद और क्रांतिकारी मुसलमानों की भूमिका को व्यापक रुप में उभारा गया होता तो आज नौबत ही न आती कि आरएसएस अपने मुस्लिम विरोधी मकसद में सफल हो जाता। मुसलमानों के प्रति वैमनस्य और भेदभावपूर्ण रवैय्ये को बल इसलिए भी मिला कि आजादी के बाद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने मुसलमानों की जमकर उपेक्षा की।इस उपेक्षा को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में साफ देख सकते हैं। संघ के प्रचार का कांग्रेस पर दबाव रहा है और कांग्रेस ने कभी मुसलमानों को लेकर दो-टूक रवैय्या नहीं अपनाया। इसका ही यह परिणाम है कि मुसलमान हाशिए पर हैं। संघ ने मुस्लिम तुष्टीकरण का झूठा हल्ला मचाकर कांग्रेस को मुसलमानों के हितों की उपेक्षा करने के लिए मजबूर किया और कांग्रेस ने संघ को जबाव देने के चक्कर में नरम हिन्दुत्व की दिशा ग्रहण की और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मुसलमानों को उठाना पड़ा।

बुधवार, 10 सितंबर 2014

मध्यवर्गीय जंगलीपन के प्रतिवाद में

भारत के मध्यवर्ग में जंगलीपन की आंधी चल रही है। मेरठ,मुजफ्फरनगर,कोलकाता,त्रिवेन्द्रम से लेकर लखनऊ तक इस आँधी के थपेड़े महसूस किए जा सकते हैं। कल कोलकाता के साल्टलेक इलाके में पुलिस अफसरों ने स्त्री विरोधी आदेश नेट पर जारी किया,उसके पहले सांसद तापस पाल ने स्त्री विरोधी बयान दिए,इसके पहले कई 'भद्र'नेता स्त्रीविरोधी बयान दे चुके हैं। इन 'भद्र' नेताओं में सभी रंगत के लोग शामिल हैं। यही हाल मेरठ-मुजफ्फरनगर में सक्रिय संघसेना का है । उनकी समूची मध्यवर्गीय भगवा सेना फेसबुक से लेकर अखबारों तक,यूपी में पंचायतों से लेकर कोर्ट-कचहरी तक सक्रिय है। यही हाल कमोबेश केरल का भी है। 'लव जेहाद' केरल से आया है। फेसबुक से लेकर दैनिक अखबारों तक इस मध्यवर्गीय जंगलीपन को सहज रुप में देखा जा सकता है। यह मध्यवर्गीय जंगली
आंधी है।

मध्यवर्गीय जंगलीपन का नया रुप है 'लव जेहाद' के नाम पर शुरु किया गया राजनीतिक प्रपंच। हमारे समाज में पहले से ही 'प्रेम' को निषिद्ध मानकर बहुत कुछ होता रहा है। मध्यवर्ग ने खाप पंचायतों और सलाशी पंचायतों के जरिए औरतों के ऊपर बेशुमार जुल्म किए हैं। परिवार और पिता की 'इज्जत' के नाम पर लड़कियों को दण्डित किया है, प्यार करने वाले लड़कों की हत्याएं की हैं। हाल ही में बिजनौर में भाजपा सांसद के खिलाफ घटिया किस्म के पोस्टर लगाए गए हैं,जिसमें उसे किसी लड़की के साथ वृन्दावन में घूमते दिखाया गया। संकेत यह है लड़की के साथ घूमना अपराध है!यह उसके अवैध संबंध का प्रतीक है!
चिन्ता की बात है कि 'ऑनरकिलिंग' से लेकर 'लव जेहाद' तक की समूची सांस्कृतिक –आपराधिक कवायद के निशाने पर औरतें और नागरिक स्वाधीनता है। हमारे समाज का मध्यवर्ग इन घटनाओं को मूकदर्शक की तरह देख रहा है या उसमें मजे ले रहा है। स्थिति इतनी भयावह है कि लड़कियों को तरह-तरह के रुपों,बहानों और प्रेरणाओं के नाम पर नए सिरे से बंदी बनाने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। अखबारों में इनके पक्ष में लेख प्रकाशित किए जा रहे हैं ,इन आपराधिक कृत्यों को वैध ठहराने का काम मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का एक तबका खुलेआम कर रहा है। मध्यवर्ग में इस तरह कीड़े-मकोड़े की मानसिकता वाले विचारक अचानक सक्रिय क्यों उठे हैं ? वे कौन से कारक हैं जिनके कारण संघ और उसके संगठन सीधे स्त्री स्वाधीनता पर हमला करने का साहस जुटाने की कोशिश कर रहे हैं ? सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश के सम्मानजनक अखबार संतुलन के नाम पर 'लव जेहाद' के पक्ष में लेख तक छाप रहे हैं। यह कौन सा संपादकीय संतुलन है जिसे वे निभा रहे हैं ? 'लव जेहाद' के पक्ष में लेखों को छापना या उसके प्रवक्ताओं को कवरेज में संतुलन के नाम पर टीवी में मंच देना सीधे स्वाधीनता के हमलावरों को स्थान देना है। हम यदि अभी नहीं संभले तो निकट भविष्य में जंगली मध्यवर्गीय संगठन हमारे घरों में घुसकर तय करेंगे कि घर में क्या पकेगा और क्या नहीं पकेगा ? कान पर किया बिकेगा और क्या नहीं बिकेगा ? अभी वे यह कह रहे हैं कि किससे शादी करोगे और किससे शादी नहीं करोगे? अभी वे कह रहे हैं कि किससे प्रेम करोगे ,किससे नहीं करोगे? ये वही लोग हैं जो कल तक खाप पंचायतों के जरिए हिन्दू युवाओं पर हमले कर रहे थे, ये ही वह इलाका है जहां पर 'लव जेहाद' के नाम समूची मशीनरी को फिर से सक्रिय कर दिया गया है। यही वे इलाके,शहर और कस्बे हैं जहां पर कल तक खाप पंचायतों के जरिए हमले किए गए,अब इन हमलों को 'लव जेहाद' के नाम संगठित किया जा रहा है। यह मध्यवर्गीय जंगलीपन है और इसका ग्राम्य बर्बरता से गहरा सम्बन्ध है।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता



आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो। 
       हिन्दूबोध वस्तुत: वायवीय है उसे संघी बंदे व्यक्ति की 'अच्छी' 'बुरी' आदतों के साथ नत्थी करके पेश करते हैं। इस तरह वे हिन्दूबोध को 'अच्छीआदत' के रुप में सम्प्रेषित करते हैं। इसमें व्यक्ति के ख़ास क़िस्म के एक्शन को उभारते हैं। इस प्रक्रिया में वे संघ की फ़ासिस्ट विचारधारा पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और संघ को मानवीय या सामाजिक संगठन के रुप में पेश करते हैं। सच यह है कि संघ की विचारधारा का मूलाधार हिन्दुत्व के रुप में फासिज्म है। हिन्दू तो आवरण है। 
  फासिज्म की लाक्षणिक विशेषता है अमीरों की खुलकर सेवा करना। ग़रीबों और हाशिए के लोगों के हकों पर खुलकर हमले करना। संसदीय संस्थाएँ और संवैधानिक मान-मर्यादाओं को न मानना। संवैधानिक संस्थाओं कोअर्थहीन बनाना। अपने हर एक्शन को क़ानूनी तौर पर वैध मानना। यहाँ तक कि दंगे करने को भी वैध मानना। जनसंहार को वैध मानना। जनप्रिय नेताओं के ज़रिए शिक्षा, स्वास्थ्य, मज़दूरी आदि मानवाधिकारों पर चालाकी के साथ हमले करना। मज़दूर क़ानूनों और काम के समय को निशाना बनाना। 
        फासीवाद का भारत में आगमन राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, संत समागमों, मुस्लिम विद्वेष ,जातिद्वेष ,धार्मिक श्रेष्ठता , स्त्री नियंत्रण के सवालों से होता है। दूसरी बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन कारपोरेट पूँजीवाद के बिना रह नहीं सकता। सतह पर देश की एकता का नारा लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिक या हिन्दू- मुस्लिम विभाजन बनाए रखने पर ज़ोर, कहने के लिए आर्थिक विकास पर ज़ोर लेकिन व्यवहार में कारपोरेट विकास पर ज़ोर ,कहने के लिए शांति बनाए रखने का नारा लेकिन व्यवहार में अहर्निश तनाव बनाए रखने वाले एक्शनों की श्रृंखला बनाए रखना । सतही तौर पर स्त्री के विकास की बातें करना लेकिन व्यवहार में स्त्री विरोधी आचरण करना, स्त्री उत्पीड़न और हिंसाचार को संरक्षण देना। उन तमाम रुढियों को मानना और मनवाना जिनसे स्त्री को परंपरागत रुढियों के खूँटे से बाँधकर रखा जा सके।अंधविश्वास और भाग्यवाद को बढ़ावा देना।  
        भारत में संघ और भाजपा ने अपने को लिबरल संस्कृति और विचारधारा के साथ कांग्रेस आदि लिबरल दलों के विकल्प के रुप में पेश किया है। सारी दुनिया में फासिज्म ने हमेशा उदारतावाद के विकल्प के रुप में पेश किया है। भारत में भी यही दशा है। वे जिस हिन्दुत्व की बातें करते हैं वह तो सभी क़िस्म के नवजागरणकालीन मूल्यों और मान्यताओं का निषेध है। वे नवजागरण के मूल्यों पर प्रतिदिन हमले करते हैं। धर्मनिरपेक्षता पर आए दिन होने वाले हमले फासीवादी नवजागरणविरोधी नज़रिए का एक नमूना मात्र हैं। वे सतीप्रथा का देवराला सतीकांड के समय समर्थन और हिमायत कर चुके हैं।इसी तरह स्त्री के आधुनिक रुपों और स्त्री स्वायत्तता को वे एक सिरे से ख़ारिज करते हैं।नवजागरण ने उदारतावादी विचारों को प्रवाहित किया जबकि संघ सभी क़िस्म के उदारतावादी  विचारों का हिन्दुत्व के नज़रिए से विरोध करता है। 
      संघ सिर्फ़ मार्क्सवाद विरोधी ही नहीं है वह उदारतावाद का भी विरोधी है। संघ को समझने के लिए हमें परंपरागत मार्क्सवादी व्याख्याओं से बहुत कम मदद मिलेगी । इसके वैचारिक तानेबाने में परंपरागत अविवेकवाद और ऊलजुलूल बातें भरी हुई हैं। संघ उन तमाम ताक़तों के साथ सहज ही संबंध बना लेता है जो ताकतें अविवेकवाद की हिमायत करती हैं। इसलिए संघ को सामाजिक- वैचारिक तौर पर अलग-थलग करने लिए अविवेकवाद की भारतीय परंपरा को चिह्नित करना और फिर उसके प्रति सचेतनता बढ़ाने की ज़रुरत है। 
   संघ के लोग शनिपूजा से लेकर हनुमानपूजा, लक्ष्मीपूजा से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा ,उत्सवों और पर्वों से अपने को सहज भाव से जोड़कर जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करते हैं और जनता में संपर्क- सम्बन्ध बनाते हैं। वे आधुनिकतावाद के अविवेकवादी आंदोलनों , तकनीकी रुपों और कलारुपों के साथ सहज रुप में जुड़ते हैं और मासकल्चर को ही संस्कृति बनाने या उसके ज़रिए संस्कृति का पाखंड रचते हैं। 
     संघ के जनाधार के निर्माण में हिन्दी सिनेमा के मर्दवादी सांस्कृतिक रुपों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह परंपरागत मर्दानगी का नवीकृत रुप भी है। समाज में एक तरफ़ दबे-कुचले लोगों की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा और दूसरी ओर संघर्ष में पराजयबोध ने आनंद के क्षणों में मर्दानगी को एक नया आनंददायक नुस्खा बनाया है। यह अचानक नहीं है कि मर्दानगी के अधिकाँश नायक भाजपा के साथ हैं या मोदी के साथ है। मोदी के साथ अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, सलमान खान आदि की मौजूदगी और मित्रता ने मर्दानगी के नायकों एवं संघ के संबंधों को मज़बूत बनाया है। शरीर का उपभोग ,शरीरचर्चा और शरीर का प्रदर्शन जितना बढ़ेगा या महिमामंडित होगा संघ उतना ही मज़बूत बनेगा।
    बम्बईया हिन्दी सिनेमा ने ऐसी कृत्रिम भाषा विकसित की है जो देश में कहीं नहीं बोली जाती ।जनाधाररहित भाषा और उसमें भी प्रतिवादी तेवरों की अभिव्यक्ति अपने आप में सुखद ख़बर है।ऐसे भाषिक प्रयोग संवादों मिलते हैं जो हिन्दीभाषी क्षेत्र में कहीं नज़र नहीं आते। इस तरह कृत्रिम भाषा का साइड इफ़ेक्ट यह है कि हम फेकभाषा में जीने लगते हैं, फेकभाषा में प्रतिवाद करते हैं, यही राजनीति में फेकभाषा को प्रतिवाद की भाषा बनाने में सहायक हुई है। प्रतिवाद की फेकभाषा को संघ ने जनप्रिय बनाया है और इसी फेकभाषा के ज़रिए हिन्दुत्व और हिन्दूभावबोध का प्रचार किया है ।