शनिवार, 31 जनवरी 2015

लोकतंत्र के कु-संवादी और पाँच सवाल का झुनझुना

        आज (30जनवरी ) गांधी की हत्या की गयी थी।यह हत्या उस विचार ने की जिसके हिमायती इन दिनों दिल्ली में घर –घर जाकर वोट मांग रहे हैं। गांधी से बड़ा कोई संवादी नहीं था,लेकिन संवाद करने की बजाय हत्यारे ने उनकी ह्त्या कर दी। गांधी की हत्या में जिस संगठन के विचारों की भूमिका थी उसे सारा देश जानता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गांधी के हत्यारे को नायक बनाकर पेश किया जा रहा है। हत्यारे के पूजकों के खिलाफ मोदी सरकार के किसी भी मंत्री या प्रधानमंत्री ने एक बयान तक जारी नहीं किया। सवाल यह है गांधी के हत्यारे का महिमामंडन करने वालों की संघ प्रमुख और प्रधानमंत्री ने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? यह क्यों नहीं कहा कि देश में हम कहीं पर भी गोडसे की मूर्ति नहीं लगने देंगे।

दिल्ली में गांधी मारे गए और दिल्ली में ही गांधी के हत्यारे का मंदिर बनाने की तैयारियां हो रही हैं। किरनबेदी साफतौर पर जबाव दें कि यदि वे मुख्यमंत्री बनती हैं तो गांधी के हत्यारे का मंदिर बनेगा या नहीं ? मंदिर बनाने वालों की उन्होंने अभी तक निंदा क्यों नहीं की ? क्या इस उत्तर से काम चलेगा कि कानून अपना काम करेगा ! संघ के नेताओं-सांसदों-मंत्रियों और किरनबेदी से दिल्ली की हर गली में गोड़से के मंदिर बनाए जाने पर सवाल किया जाना चाहिए। संघ परिवार दो-टूक ढ़ंग से गोड़से पूजकों की निंदा करने में असफल रहा है,संघ की चुप्पी का अर्थ यह भी हो सकता है कि संघ उनका समर्थन कर रहा हो ? क्या गोड़से समर्थकों को लोकतंत्र की चौखट(दिल्ली सरकार) में प्रवेश करने की अनुमति दी जा सकती है ?

लोकतंत्र संवाद से समृद्ध होता है। नेता-मंत्री-सांसद या पीएम के भाषण से नहीं। नेता के शामिल होने से दलबल समृद्ध होता है,मीडिया समृद्ध होता है। संवाद के लिए लोकतांत्रिक विवेक और लोकतांत्रिक आचरण का होना पहली शर्त्त है। जिस नेता को संवाद करना है उसके पास लोकतांत्रिक विवेक न हो तो संवाद संभव ही नहीं है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जहां से लोकतंत्र में संवाद-विवाद और विचारधारात्मक संघर्षों को देखा जाना चाहिए। संवाद की दूसरी शर्त है सहिष्णुता और जिम्मेदारी। संवाद करने वाला या सवाल करने वाला कितनी जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाता है ? अपने विचारों के प्रति वह कितना गंभीर है। कितना हास्यास्पद है कि मोदी सरकार एक तरह कारपोरेट घरानों की मदद लेकर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने में लगी है,लेखकों –कलाकारों को संघी बंदे निशाना बना रहे हैं,ऐसे में भाजपा सवाल पूछने का नाटक कर रही है !

भाजपा और संघ का समूचा आचरण कु-संवादी का है। वे संवाद में विश्वास नहीं करते,संसद में विश्वास नहीं करते, संवाद के नाम पर नॉनसेंस या कु-संवाद करते हैं। यह हास्यास्पद है कि वे सत्ता पाने के बाद सवाल कर रहे हैं ! देश की समस्याओं के समाधान और उन पर संवाद का सिलसिला आरंभ करने की बजाय एक ऐसी पार्टी से सवाल कर रहे हैं जिसका जन्म कुछ साल पहले हुआ है।

सवाल यह है मोदी सरकार-भाजपा ने उन सवालों के समाधान क्यों नहीं खोजे या सुझाए जिनसे दिल्ली की जनता परेशान है? दिल्ली की जनता के प्रति भाजपा और मोदी सरकार जिम्मेदार भाव से पेश आती तो दिल्ली की जनता को एक साल बाद तमाम फजीहत के बाद चुनाव की बजाय तत्काल चुनाव कराके सरकार दी जा सकती थी ! मोदी-भाजपा-संघ जानते थे कि उनके पास सरकार बनाने का बहुमंत नहीं था इसके बावजूद वे एक साल तक जोड़तोड़ में लगे रहे।अंत में झकमारकर उनको चुनाव कराना पड़ा। लोकतंत्र में झकमारकर काम करने वाले नेता या दल को जनविरोधी कहा जाता है। मोदी इस अर्थ में जनविरोधी हैं कि वे दिल्ली की जनता के लिए आठ महिने में कोई कदम नहीं उठा पाए।

भाजपा संभवतः देश का पहला बड़ा दल है जो समग्रता में अविवेकवादी या इरेशनल है। इरेशनल से क्या संवाद संभव है ? भाजपा और मोदी के इरेशनल नजरिए का आदर्श उदाहरण है भाजपा का परमाणु संधि पर यू-टर्न। भाजपा और उसके सभी नेता एकसिरे से संसद के मंच पर परमाणु संधि का विरोध करते रहे और हठात सत्ता में आते ही परमाणु संधि के पक्ष में बयान देने लगे,सबसे बड़ा उपहास तो यह है कि वे उसे अपनी उपलब्धि बता रहे हैं ! संभवतः भारत में इससे बड़ा इरेशनल रुप किसी दल का देश ने नहीं देखा। जिस दल के नेता ने संसद में साफ कहा हो कि वे सत्ता में आएंगे तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेंगे, लेकिन वे तो उसी विचार की गोद में चले गए जिसका वे विरोध कर रहे थे। इस तरह के इरेशनल दल के साथ संवाद कैसे संभव है ? क्या भाजपानेता दिल्ली चुनाव में जो वायदे कर रहे हैं उनको पूरा करेंगे? विगत लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो वायदे किए थे उनमें से एक भी वायदा अभी तक पूरा नहीं किया है। संवाद की मांग है कि संवादी असत्यवादी न हो।

नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तेजी से साम्प्रदायिक हमले हो रहे हैं,संघ के संगठनों के नेताओं के घटिया-जनविरोधी-असामाजिक बयानों की मीडिया में बाढ़ आई हुई है। प्रशासन को साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति नरम बर्ताब करने,मित्रवत व्यवहार करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्थिति उस कदर खराब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा सरेआम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर संघ द्वारा किए जा रहे हमलों के खिलाफ बोलकर गए हैं। वे एक तरह से इन हमलों की निंदा करके गए हैं। लेकिन संघ अपने नजरिए पर अड़ा हुआ है। संघ का इस तरह का रुख देश को विभाजित करने वाला है। देश में और दिल्ली में गिरिजाघरों पर हमले बढ़े हैं लेकिन मोदी सरकार ने इन हमलों की कभी निंदा नहीं की। किरनबेदी ने इन हमलों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। सवाल यह है दिल्ली की जनता क्या ऐसे नेता और दल को वोट देगी जो सरेआम धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की निन्दा तक न करे।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह है कि सीबीआई जैसी संस्था का दंगाईयों को बचाने के लिए खुला दुरुपयोग किया जा रहा है। अमितशाह के मामले में सीबीआई दुरपयोग करती नजर आई है। यह लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है। इस दुरुपयोग के खिलाफ किरनबेदी ने कोई राय व्यक्त नहीं की। जबकि वे सीबीआई को निष्पक्ष बनाने की मांग करती रही हैं लेकिन अवसरवादी नजरिए के चलते ऐसे दल में शामिल हो गयी हैं जिसका नाम सीबीआई के दुरुपयोग में शामिल है।



सच्चाई यह है लोकतंत्र में सु-संवाद आने बंद हो गए हैं। लोकतंत्र के लिए यह कु-संवाद है कितने सांसद या मंत्री प्रचार करने आ रहे हैं, पीएम प्रचार करने आ रहे हैं। सांसदों-मंत्रियों और प्रधानमंत्री की भूमिका सु-संवाद की रही होती तो उनको जनता में आने की जरुरत ही नहीं पड़ती।जनता के पास कान हैं,आँखें हैं और बहुत बड़ा दिल है। जनता जिस उदारता के साथ नेताओं के साथ पेश आती है हमारे नेता उस उदारता के साथ पेश नहीं आते। अंतमें, सवाल पूछने का हक उसको है जो सत्य के पक्ष में खड़ा है। कम से कम भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

किरनबेदी जी ! पुंसवाद का हिमालय है आरएसएस !!

  
    कल भाजपानेत्री-मंत्री और पूर्व जेएनयू छात्रा निर्मला सीतारामन प्रेस को सम्बोधित करके औरतों के सवाल पर अरविंद केजरीवाल को कोस रही थीं तो अजीब और बेतुका लग रहा था। अरविंद केजरीवाल की औरतों के सवालों पर आलोचना आधारहीन है। यह भाजपा के राजनीतिक दिवालिएपन का प्रमाण है। मैं निजी तौर पर निर्मला सीतारामन को छात्र जीवन से जानता हूँ वे भी किरनबेदी की तरह अ-राजनीति की राजनीति किया करती थीं और मुक्तचिंतकों (फ्रीथिंकर संगठन) के दल में थीं,यह बताने की जरुरत नहीं है कि वे क्या नजरिया रखती थीं। उस दौर के सभी जेएनयू मित्र जानते हैं कि उनकी राजनीति में कोई खास रुचि नहीं होती थी। आमतौर पर महिलाओं के सवालों से जुड़े संघर्षों से वे दूर रहती थीं । इस व्यक्तिगत अवगुण के अलावा हम उस समस्या की ओर आएं जिसकी ओर उन्होंने ध्यान खींचा है।

दिल्ली में भाजपा नया दल नहीं है।संघ का सबसे ताकतवर संगठन इस शहर में है ,इसके बावजूद दिल्ली में औरतों के प्रति सामान्य शिष्ट संस्कृति नहीं बची है। संघ के अलावा कांग्रेस का व्यापक जनाधार है। सवाल यह है दिल्ली में औरत के लिए असुरक्षित माहौल बनाने में इन दोनों दलों की कोई भूमिका है या नहीं ? वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से दिल्ली में औरतें सुरक्षित महसूस नहीं करतीं ? दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा की ही सरकारें रही हैं, केजरीवाल की तो मात्र49दिन सरकार रही है। आम आदमी पार्टी की उम्र भी बहुत ज्यादा नहीं है। केजरीवाल को राजनीति में आए कुछ साल ही हुए हैं। इसके अलावा यह भी देखें कि दिल्ली की पुलिस व्यवस्था केन्द्र के तहत रही है। दिल्ली में महिला आंदोलन बेहद कमजोर है। लेकिन दिल्ली राजनीति का केन्द्र है।

निर्मला सीतारामन का राजनीतिक अनुभव भी बहुत ज्यादा नहीं है,भाजपा में आने के बाद ही वे राजनीति में सक्रिय हुई हैं, यही हाल किरनबेदी का है, वे चार दशकों से दिल्ली में रह रही हैं,लेकिन राजनीति में आने की उनकी कभी इच्छा नहीं हुई ,वे राजनीति में क्यों नहीं आईं ? भाजपा तो पहले भी थी ,संघ भी था फिर वे राजनीति में शामिल क्यों नहीं हुईं ? आज जब राजनीति में शामिल हुई हैं तो उनको इसका स्पष्टीकरण देना ही चाहिए कि वे राजनीतिक दलों से और खासकर भाजपा से दूर क्यों थीं ? किरनबेदी को भाजपा में शामिल होने में इतना समय क्यों लगा ? किसने रोका था ?

राजनीति में कोई औरत क्यों शामिल होती है यह वही बेहतर ढ़ंग से बता सकती है। लेकिन एक बात सच है किरनबेदी अबोध और अज्ञानी नहीं हैं । वे जब भाजपा में शामिल हुई हैं तो उनके ज़ेहन में साफ लक्ष्य है कि वे मुख्यमंत्री बनने के लिए शामिल हुई हैं, एक साल पहले भाजपा उनको इस पद का प्रस्ताव देती तो वे भाजपा में चली जातीं,खैर,भाजपा को एक साल लगा तय करने में ! भाजपा भी मजेदार दल है वे किरनबेदी की ईमानदार -कर्मठ छवि को इतने लंबे समय के बाद पहचान पाए ! किरनबेदी और भाजपा के मेल-मुलाकात-संबंध बनाने में हुई देरी से एक बात साफ है कि भाजपा किसी पवित्र लक्ष्य के तहत किरनबेदी को चुनाव नहीं लड़ा रही है और किरनबेदी भी किसी पुण्य कार्य के लिए चुनाव नहीं लड़ रही हैं वे अवसरवादी राजनीति के कारण मिले फायदे का लाभ उठाने के लिए चुनाव लड़ रही हैं। चूँकि मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मिला है इसलिए लड़ रही हैं, औरतों के हितों की रक्षा का सवाल तो कहीं पर भी सामने नहीं है। बुर्जुआदलों में अधिकतर औरतें अवसर के कारण,पद के कारण या पारिवारिक कारणों से शामिल होती हैं। औरतों के हकों के संघर्ष के लिए वे शामिल नहीं होतीं।

औरतों के हितों के लिए संघर्ष करने का न तो किरनबेदी और न निर्मला सीतारामन का कोई इतिहास है।संघ में औरतों के हितों के लिए लड़ने वाली कोई नेत्री नहीं है। इससे भी बड़ा सवाल यह है औरतों के लिए कौन सी राजनीति करनी चाहिए ? क्या औरतों को ग्लैमर या नेतापद की राजनीति करनी चाहिए? औरतों को वह राजनीति करनी चाहिए जिससे पुंसवाद कमजोर हो और स्त्री ताकतवर बने। भाजपा और संघ तो पुंसवाद के हिमालय पर्वत हैं ।किरनबेदी उसकी पुत्री हैं !

स्त्री की चुनौती है पुंसवाद और पुंसवादी राजनीतिक नजरिया। स्त्री तब तक दिल्ली में या देश में असुरक्षित है जब तक वह पुंसवाद से लड़ने को अपना प्रधान लक्ष्य नहीं बनाती । भाजपा या कांग्रेस में शामिल होने से कोई भी औरत ताकतवर और सुरक्षित नहीं बनती। तंदूरकांड से लेकर सोनिया गांधी तक औरत की अवस्था काफी शोचनीय है। इंदिरा गांधी से ज्यादातर ताकतवर कोई महिला नहीं हो सकती। लेकिन वे भी पुंसवाद से जंग को मुख्य़ जंग नहीं बना पायीं। औरतों पर हमले नहीं रोक पायीं। गुजरात में दंगों में हजारों औरतें ही विधवा हुई हैं या यातना की शिकार हुई हैं,1984 के दंगों में भी औरतें ही हमले के केन्द्र में रही हैं। हत्यारे औरतों को ही विधवा बनाकर गए हैं। औरतों के लिए सुरक्षित विकल्प कम से कम भाजपा और कांग्रेस तो नहीं हो सकते। आपातकालीन अनुभव औरतों के लिए नारकीय अनुभव रहा है, उस दौर में संघ ने आपातकाल का समर्थन किया और संघ प्रमुख ने औरतों पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ कोई बयान तक नहीं दिया। यहां तक कि देवराला सतीकांड के समय संघ और उसके संगठनों ने खुलेआम सतीप्रथा की हिमायत की। हम नहीं जानते किरनबेदी ने उस समय क्या किया था ? क्या संघ की निंदा की थी ? वे थीं लेकिन संघ के खिलाफ कुछ नहीं बोलीं ! एक जागरुक औरत वह है जो औरतों के हकों के लिए हमेशा सचेत रहे। किरनबेदी-निर्मला सीतारामन आदि पदासीन औरतें पुंसवाद का औजार हैं वैसे ही जैसे संघ के दुर्गावाहिनी टाइप संगठनों में काम करने वाली औरतें पुंसवाद की औजार हैं।पुंसवाद का औजार बनकर औरत बेहद खतरनाक भूमिका अदा करती है वह अधिनायकवाद की हद तक जा सकती है । इंदिरा गांधी इसका साक्षात प्रमाण है। दुनिया में और भी उदाहरण हैं।

औरतों के हकों को वे ही संगठन सुरक्षित रख सकते हैं जो उसके लिए समझौताहीन वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष करते रहे हों। औरतों को इसी तरह के संगठनों में शामिल होकर सक्रिय राजनीति करनी चाहिए। इसी प्रसंग में यह भी ध्यान रहे कि भाजपा आदि दलों के लिए औरतें सिर्फ मतदाता हैं और इससे ज्यादा उनका कोई महत्व नहीं है। हां, इस प्रसंग मे कांग्रेस को यह श्रेय जाता है कि उसने औरतों की रक्षा के तमाम बेहतरीन कानून बनाने में पहल की, औरतों के संगठनों की मांगों पर समय-समय पर सकारात्मक कदम उठाए, हाल ही में निर्भयाकांड के समय भी कांग्रेस ने बलात्कार विरोधी कानून में सही परिवर्तन किया। कांग्रेस को भाजपा की तुलना में स्त्री पक्षधर दल कह सकते हैं, कम से कम औरतों के लिए इसने लिबरल स्पेस,लिबरल शिक्षा और लिबरल माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। औरतों की रक्षा के जितने भी कानून बने हैं वे सब कांग्रेस ने बनाए हैं। कांग्रेस का यह गुण है कि वह जन-आंदोलन,महिला आंदोलन की आवाज को सुनती रही है और उससे उठे सवालों के ईमानदारी के साथ समाधान खोजती रही है। गर्भपात के अधिकार से लेकर, छेड़खानी,दहेजप्रथा विरोधी तमाम कानूनों को कांग्रेस ने महिला आंदोलन के दबाव में बनाया। इसके विपरीत संघ और भाजपा ने हमेशा औरतों के लिबरल स्पेस और माहौल का विरोध किया है औरतों पर हमले किए हैं। गुजरात से लेकर दिल्ली तक इसके सैंकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं।

अरविंद केजरीवाल का महत्व यह नहीं है कि उसके पास कोई नई बातें हैं,नया विचार है, नया नजरिया है । केजरीवाल का महत्व इसमें है कि उसने ईमानदारी को मूल्यवान बनाया है। वह निर्विवाद रुप से ईमानदार है। वह ईमानदारी के साथ औरतों की रक्षा में खड़ा है,औरतों के ऊपर जुल्म के खिलाफ खडे होने के कारण ही उसको आलोचनाएं झेलनी पड़ रही हैं । यह भी सच है केजरीवाल के जीतने से दिल्ली से औरतों के पक्ष में सजगता बढ़ेगी,भाजपा जीतती है तो औरतों पर हमले बढ़ेगे। औरतों को बचाना है तो हमें दिल्ली के लिबरल स्पेस को बचाना है। भाजपा खुलकर लिबरल स्पेस खत्म कर रही है। इससे औरत और भी कमजोर बनेगी।

औरतें दिल्ली में जमकर वोट करें ,हर उम्मीदवार से औरतों के सवालों पर सवाल करें और देखें कि वो औरतों के बारे में कितना जानता है। औरतों के सवाल मात्र बलात्कार के सवाल नहीं हैं, विकास और सांस्कृतिक सुरक्षा के सवाल भी हैं जिन पर औरतें ,स्त्री पक्षधरता की मांग कर रही हैं । अफसोस की बात है सभी राजनीतिक दल इस पहलू पर चुप हैं , सबने मिलकर औरतों के सवालों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। कायदे से कांग्रेस,भाजपा और आप तीनों से औरतों के सवालों पर लिखित में आश्वासन देने के लिए दबाव पैदा करने की जरुरत है ।





गुरुवार, 29 जनवरी 2015

लोकतंत्र ,कुर्सी संघ और रसमलाई !



        लोकतंत्र में कुर्सीसंघ का जन्म हुआ है। कुर्सीसंघ का नया नारा है डिलीवरी और डिलीवरी ! कुर्सीसंघ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 11 केन्द्रीय मंत्री, 70 सांसद, प्रधानमंत्री, 1 सुपरकॉप, डेढ़ लाख संघ के तोते मैदान में उतारे हैं। कमाल का सीन बन रहा है ! दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में तोते और  बिल्लियां कभी मैदान में नहीं उतरी थीं। जहाँ देखो तोता जहाँ देखो बिल्ली ! तोते बोलते कम हैं और बिल्लियों का स्वभाव है डिलीवरी ! तोते कह रहे हैं हम न हिन्दू हैं न मुसलमान हैं ! चमार हैं न कुम्हार हैं! हम तो बस तोते हैं! तोते आठ महिने में ख़ूब मोटे हुए हैं! उडते हैं तो सुंदर लगते हैं! बोलते हैं तो ध्यान खींचते हैं! वे कह रहे हैं कलरव ही जीवन है! 
       कुर्सीसंघ के सर्जक ने कहा है लोकतंत्र  के लिए तोते- बिल्लियाँ सबसे उपयुक्त पात्र हैं! लोकतंत्र लाना है तो तोते और बिल्लियों की मानो और मजे में रहो ! कुर्सी संघ का नारा है  डिलीवरी -डिलीवरी - डिलीवरी! टीवी टॉकशो -टॉक शो ! 
     दिल्ली में तोते - बिल्लियाँ और टीवीवाले समझा रहे हैं लोकतंत्र लाना है तो धरना मत दो, आंदोलन मत करो, नारे मत लगाओ,हडताल मत करो,  इंक़लाब की बातें मत करो, संविधान की बातें मत करो, संविधान में जो लिखा है वो रद्दी है !  दूध पियो और अमरूद खाओ!  महँगाई, ग़रीबी,बेकारी , कुपोषण, अज्ञानता, बलात्कार ,लोकतंत्र और संविधान की चेतना ये सब फ़ालतू चीज़ें हैं, असल चीज है टीवी टॉक शो  और रसमलाई !
          तोते कह रहे हैं बड़ी गद्दी परम सत्य! बड़ा तोता परम सत्य!  कुर्सी ही सत्य है !कुर्सी ही शिव है ! कुर्सी ही सुंदर है! कुर्सी ही सडक है! कुर्सी ही जीवन है! कुर्सी ही जलेबी है! कुर्सी ही रसमलाई है! कुर्सी पर बैठना है तो रसमलाई की चेतना पैदा करो! आंदोलन, धरना,माँगें, हडताल, कामगारों के हक, झुग्गी-झोंपड़ी वालों के हक , छात्रों के हक, औरतों के हक , ये सब बेमानी हैं !रसमलाई खाओ संघ के गुन गाओ!लोकतंत्र को समृद्ध बनाओ! बड़े तोते ने कहा लोकतंत्र में कुर्सी हो, तोते हों और बिल्लियाँ हों और रसमलाई हो! रसमलाई  बनानेवाले हों ! रसमलाई खानेवाले हों! लोकतंत्र में रसमलाई का ही तो कमाल है कि टाटा पैदा हुआ, अम्बानी पैदा हुआ, अदानी पैदा हुआ! रसमलाई की ही महिमा है कि ओबामा अमेरिका से दौडा चला आया और कहने लगा रसमलाई दो रसमलाई दो! सारी दुनिया मुग्ध है कुर्सीसंघ के इस कौशल पर कि उसने रसमलाई को राष्ट्रीय माल बना दिया! कल तक रसमलाई दुकान तक ही सीमित थी अब रसमलाई चुनाव मेनीफेस्टो तक फैल गयी है। रसमलाई का यह विस्तृत कैनवास एक ही माँग पैदा कर रहा है रसमलाई - रसमलाई! 




बुधवार, 28 जनवरी 2015

कैमरा और जनतंत्र


       कैमरे ने नेताओं के होश उडाए हुए हैं। कैमरे की खूबी है आप उसके बिना रह भी नहीं सकते,राजनीतिज्ञ की मुश्किल है वे कैमरे में जी नहीं सकते। कैमरे के प्रबंधन के कौशल में जो माहिर हैं उनको राजनीति प्रबंधन सीखने की जरुरत है। हमारे अधिकांश नेता न तो ठीक से कैमरा प्रबंधन जानते हैं और नहीं राजनीति प्रबंधन कला के उस्ताद हैं। वे कैमरे के सामने खड़ा होना भर जानते हैं। नेताओं के लिए कैमरे के तदर्थ है, जबकि राजनीति के वे होलटाइमर का रवैय्या है। राजनीति में वे पेशेवर नहीं हैं। राजनीति में होलटाइमर बहुत खराब होता है। यह राजनीति का निष्क्रिय तत्व है।राजनीति और कैमरा दोनों ही राजनेताओं से पेशेवर और नाटकीय रवैय्ये की मांग करते हैं।

किरनबेदी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे कैमरा और राजनीति दोनों में तदर्थभाव से काम कर रही हैं। पहले वे स्वयंसेवी राजनीति करती थीं,फिलहाल भाजपा की होलटाइमर हैं। राजनीति और कैमरे के लिहाज से ये दोनों रुप निरर्थक हैं। अप्रासंगिक हैं। कैमरा तब अपील करता है जब आप नाटकीय हों और जनता में हों। कैमरा तब अपील नहीं करता जब आप कैमरे के फ्रेम में हों। किरनबेदी की सारी मुश्किलें यहीं पर हैं। वे पहले कैमरे के फ्रेम में थी,फ्रेम से फ्रेम में उनरा रुपान्तरण निष्क्रिय इमेज का रुपान्तरण है। किरनहेदी तब अपील कर रही थीं, जब वे लोकपाल बिल के समय नाटक कर रही थीं। नाटकीयता ने उनको जनप्रिय बनाया,आंदोलन ने नहीं। लालू को देखें और सीखें। लालू नाटकीयता और भाषिकखेल में मास्टर है,इसलिए कैमरे में वह सबसे सुंदर लगता है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह अपील नहीं करते,क्योंकि ये न तो नाटकीय हैं और न ही भाषिकखेल खेलते हैं। इनकी तुलना में मोदी ने नाटकीयता और भाषिकखेल का जमकर इस्तेमाल किया और कैमरे में जगह बना ली।

नरेन्द्र मोदी ने लंबी राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद कैमरे के फ्रेम में अपने को फिट किया।मोदी ने इस अवस्था तक पहुँचने के लिए आरएसएस की सालों होलटाइमरी की,झूठ बोलने की कला सीखी,परिवार छोड़ा,पत्नी के बारे में झूठ कहा,फिर पेशवर राजनीति आरंभ की,बादमें पेशेवर राजनेता की तरह राजनीति और कैमरे के प्रबंधन में दक्षता प्राप्त की। पेशेवर होने की पूर्व शर्त्त है वैचारिक ,नाटकीयता,भाषायी कौशल और प्रतिबद्धता।कैमरे को ये चीजें पसंद हैं। जो प्रतिबद्ध है कैमरा उसके साथ खेलने में मजा लेता है खेल ही खेल में खलनायक को नायक और नायक को खलनायक बनाता है।

कैमरे में नायक-खलनायक का खेल थमता नहीं है,बल्कि यह खेल तब ही थमता है जब नेता को कैमरा ,नायक-खलनायक की अवस्था से निकालकर डिजिटल फोटो कब्रिस्तान में ले जाकर महज एक फोटो में रुपान्तरित कर देता है। इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा कोई नहीं कह सकता। यही वह परिप्रेक्ष्य जिसमें केजरीवाल-किरनबेदी के कैमराखेल को देखें।

दिल्ली विधान चुनाव में विगत एक साल में दो चुनाव हुए हैं, एक हो चुका है ,दूसरा होने जा रहा है। कैमरे की मुश्किल यह है कि पुलिस आइकॉन उसमें मृत होते हैं।निष्प्रभावी होते हैं। किरनबेदी कितनी सख्त अफसर रही हैं इससे कैमरा आश्चर्य या रोमांच पैदा नहीं कर सकता। कैमरे के रोमांच के लिए किरनबेदी के पास कोई नौटंकी या नाटकीयता नहीं है। कैमरे का दिल जीतने के लिए नाटकीयता का होना जरुरी है । कैमरे के सामने नए कौशल, नयी भाव-भंगिमा और नए नारे के साथ जब तक आप नहीं जाएंगे कैमरा अपना खेल आरंभ नहीं करता। असल में तो कैमरे के सामने नेता को ही खेलना होता है, मोदी को नायक से महानायक बनाने में नाटकीयता और भाषिकखेल की बड़ी भूमिका रही है। तकरीबन यही पद्धति केजरीवाल की भी है।

केजरीवाल ने अपने फोटो के साथ पहले जगदीशमुखी का फोटो लगाकर प्रचार किया और इमेज युद्ध में जगदीशमुखी को आउट कर दिया। यह स्टायल उसने किरनबेदी के फोटो पर लागू की है। अब दिल्ली में प्रत्येक ऑटो पर केजरीवाल-किरनबेदी का फोटो एक साथ लगा है। आम जनता देख रही है और संदेश ग्रहण कर रही है। इमेज युद्ध की यह कला बेहद आकर्षक और मारक है। इस कला में केजरीवाल ने पहल करके दो काम किए पहला अपना प्रतिद्वंद्वी तय किया दूसरा अपना और विरोधी का वनलाइनर प्रचार आरंभ किया, राजनीति में वनलाइनर जल्दी कम्युनिकेट करता है। सड़क पर चलते वाहन में वनलाइनर नारा यदि फोटो के साथ हो तो वह किसी भी टीवी कवरेज से ज्यादा मारक होता है।

किरन बेदी की दूसरी बड़ी मुश्किल है कि वह टीवी कैमरा देखते ही अपना मुखारबिंद ठीक नहीं रख पाती है। उसकी अति-सजगता उसका विलोम बनाती है। इसके विपरीत केजरीवाल सामान्य बने रहते हैं,व्यंग्यात्मक बने रहते हैं,नाटकीय बने रहते हैं। यही वजह है केजरीवाल का हर फोटो कुछ नया कहता है। राजनेता की नाटकीयता कैमरे को जीवंत बनाती है।

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

ओबामा -मोदी विज़न का लक्ष्य असुरक्षित भारत




अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत से जा चुके हैं। उनकी तीन दिन की यात्रा कई मायनों में उल्लेखनीय रही। इसमें सबसे उल्लेखनीय है भाजपा का परमाणु शांति संधि पर यू-टर्न। भाजपा जब विपक्ष में थी तो उसने इस संधि का हर स्तर पर वाम के साथ विरोध किया था और कहा था कि भाजपा जब सत्ता में आएगी तो परमाणु संधि पर पुनर्विचार करेगी,लेकिन हुआ उल्टा,भाजपा ने भारत की शर्तों को लागू कराने की बजाय संधि के प्रसंग में अमेरिकी बातों को मान लिया । इसका अर्थ है कि परमाणु संधि पर भाजपा को मनाने में मनमोहन सिंह की बजाय ओबामा सफल रहे।

भाजपा को परमाणु संधि पर यदि अपना नीतिगत मंतव्य बदलना ही था तो उसे कम से कम आम जनता के सामने उसके कारणों पर रोशनी डालनी चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि लायबिलटी बिल पर संसद से पारित प्रावधानों में कोई कतर-ब्योंत करने का प्रधानमंत्री को अधिकार नहीं है। सच्चाई यह है भारतीय कंपनियां इस बिल के प्रावधानों को एकसिरे से खारिज करती रही हैं और यही काम भिन्न तरीके मोदी ने किया है। लायबिलटी बिल में कोई संशोधन किए बिना परमाणु समझौते को लागू करना संभव नहीं होगा। तीसरी बात यह कि दुर्धटना की स्थिति में भारतीय कंपनियां या विदेशी कंपनियों की इसमें कोई जिम्मेदारी तय नहीं की गयी है। उनको सभी किस्म की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया है जबकि अन्य देशों में ऐसा नहीं है। भोपाल गैस त्रासदी का अनुभव हमारे सामने है,भोपाल के गैस पीड़ित आज तक परेशान और पीड़ित दर-दर भटक रहे हैं। लायबिलटी संबंधी अनुच्छेदों पर 'बिजनेस लाइन '(26जनवरी2015) अखबार में एम.रमेश ने लिखा है ''First is the Section 17 (b), which in effect confers on the plant owner—the Nuclear Power Corporation of India—the right to be indemnified (right to recourse) by the supplier (such as GE, Westinghouse), even if there is no specific provision granting such a right in the commercial agreements between the owner and the supplier. The section uses the words “shall have the right to recourse”.

The right to recourse is a commercial issue, so why make it automatic under law, ask the foreign suppliers. After the Bhopal gas leak experience, where the victims were paid paltry sums as compensation, what else would one expect the Indian legislators to do?

The Second objection has been on Section 46 which says the supplier can be sued under any Indian law, not just under CLND.

However, it has always been clear that neither of these sections could possibly be a deal-breaker. First of all, there is a cap on the liability. If any nuclear accident happens, it is the duty of the owner of the nuclear plant to compensate the victims. In India, the owner can only be the public sector Nuclear Power Corporation of India Ltd.

Now, the Rule 24 of the Civil Liability for Nuclear Damage Rules, 2011, which mandates the owner to restrict the liability of the supplier to the owner’s liability or the value of the contract, whichever less. NPCIL’s liability has been capped at Rs 1,500 crore. Therefore, the maximum liability of a supplier of a nuclear reactor, such as GE or Westinghouse or Rosatom, cannot exceed Rs 1,500 crore, about $ 250 million. A quarter billon dollar is nothing very big. The $40+ billion that BP is having to pay for its Gulf of Mexico OIL spill (11 people died in the accident), puts this in the perspective.

“The cap of Rs. 1,500 crore appears atypically lower in comparison with liability amounts in other countries which can run into billions of dollars for a single accident. Similarly, a cap based on the ‘value of the contract’ risks being lower than even this amount,” notes a study of the nuclear liability law made by the legal think-tank, Vidhi Centre for Legal Policy.

NPCIL further has a right to waive its right to be compensated by incorporating a specific provision to that effect in its contracts, though it is doubtful if it would get away with it if it does.

Second, the supplier is liable only if the defect of the product is traced back to it, which, as any nuclear expert will tell you, is next to impossible.

The Americans have been more worried about the Section 46, than Section 17 (b), because a group of victims could sue the reactor supplier directly under some other legislation, such as law of torts. But then, this right is always there as a principle of natural justice and Section 46 does nothing more than to highlight that right.

Besides, the Russians and the French have shrugged off these issues and are getting down to business. Would the US have sat on legal technicalities and watched all the business slip from its hands?

इसके अलावा दोनों देशों के संयुक्त बयान में जिस तरह की बातों की ओर संकेत किया गया है उससे एक बात साफ है कि भारत अगले पांच सालों में एशिया में अमेरिकी राह आसान बनाने का काम करेगा और अमेरिकी हितों के विस्तार के लिए काम करेगा। इसका पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंध सामान्य बनाने की प्रक्रियाओं पर सीधे असर पड़ेगा। मोदी सरकार के आने के बाद से पाकिस्तान से हमारे संबंध खराब हो चुके हैं। सार्क के मंच को मोदी अपने अहंकार और कूटनीतिक अज्ञान से अधमरा बना चुके हैं। यदि इस दस्तावेज का विज़न एशिया में दुर्भाग्य से मोदी ने लागू करने की कोशिश की तो भारत सीधे अमेरिकी नियंत्रण में काम करेगा।इससे एशिया और पड़ोसी मुल्कों के साथ तनाव बढ़ने के साथ सैन्य प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। चीन के साथ हमारे संबंध खराब होंगे। इस दस्तावेज के अनुसार एशिया में आतंकवाद की नई लहर आने की संभावनाएं भी बनती हैं। क्योंकि अमेरिका चाहता है कि एशिया में उसकी दादागिरी चले। अमेरिकी दादागिरी का अर्थ है पृथकतावादी,फंटामेंटलिस्ट और आतंकवादी संगठनों की आंधी। पहले से ही अमेरिका तालिबान को खुला संरक्षण दे रहा है और अफगानिस्तान में तालिबान को सरकार में शामिल करने के लिए दबाव डाल रहा है। तालिबान, अलकायदा,हक्कानी,दाऊद इब्राहीम आदि के अलावा अनेक संगठन हैं जिनकी अमेरिकी एजेंसियां खुलेआम मदद करती रही हैं। इसके अलावा पाकिस्तान को सैन्य साजो-सामान की सप्लाई को वह बरकरार रखे हुए है और विभिन्न किस्म के आतंकी संगठनों को पाक संस्था आईएसआई प्रशिक्षित करती रही है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप में अस्थिरता बनी हुई है। यह सब अमेरिकी नीति के तहत हो रहा है। कायदे से अमेरिका संचालित आतंकवाद विरोधी मुहिम से दूर रहने की जरुरत है लेकिन मोदी सरकार तो एशिया में उसी मुहिम का हिस्सा बनने जा रही है । इसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए।अमेरिका की आतंकवादविरोधी मुहिम राष्ट्रीय अस्थिरता और जातीय संघर्षों को जन्म देने वाली रही है। अफगानिस्तान,पाकिस्तान,इराक, सीरिया, लीबिया आदि के अनुभव यही बताते हैं। मोदी सरकार ने अमेरिकी रणनीतिक साझेदारी में शामिल होकर भारत की संप्रभुता के साथ समझौता किया है। कायदे से विपक्ष को संसद के आगामी अधिवेशन में इन सभी मसलों को लेकर मोदी सरकार ने खिलाफ मोर्चा खोलना चाहिए।



शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

नामवर सिंह और अस्मिता विमर्श


        अस्मिता का सवाल तदर्थ सवाल नहीं है। इसे चलताऊ ढ़ंग से नहीं देखना चाहिए । अस्मिता की पेचीदगियों और वैचारिक सरणियों पर हिन्दी में संवाद कम हो रहा है। खासकर मार्क्सवादी आलोचना ने अस्मिता से जुड़े साहित्यिक सवालों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। अस्मिता पर चलताऊ नजरिए को देखने के लिहाज से नामवरजी के अस्मिता सम्बन्धी विचारों को विश्लेषित करना समीचीन होगा। नामवर सिंह ने लिखा है ,' भारतीय नवजागरण की मूल समस्या है भारतेन्दु के शब्दों में 'स्वत्व निज भारत गहै।' यह 'स्वत्व' वही है जिसे आजकल 'अस्मिता' कहते हैं। राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व-प्राप्ति की पहली शर्त है। नवजागरण के उन्नायक इस आवश्यकता का अनुभव न करते रहे होंगे, यह सोचना कठिन है, फिर भी तथ्य यही है कि नवजागरणकालीन प्रकाशित साहित्य में राजनीतिक स्वाधीनता का स्पष्ट स्वर कम ही सुनाई पड़ता है।' ( हिन्दी का गद्यपर्व, 2010, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.87) यह ‘स्वत्व’ भाषायी अस्मिता के संदर्भ में आया है। इसका अस्मिता के विराट फलक के साथ घालमेल नहीं कर सकते। 'स्वत्व' का अर्थ अस्मिता है तो इसका अर्थ यह भी है कि आधुनिककाल के इतिहास का आरंभ 'अस्मिता की राजनीति' से होता है। इतिहासलेखन का यह नया आयाम है। उल्लेखनीय है 'अस्मिता की राजनीति' का पूंजीवाद से माँ-बेटी का रिश्ता है। अस्मिता को पूंजीवाद से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 'अस्मिता की राजनीति' और पूंजीवाद अन्तर्ग्रथित हैं। साहित्येतिहास में इसके आयाम अलग होंगे। अस्मिता को इतिहास का हिस्सा बनाने से वे सारे वर्गीकरण समस्यामूलक बन जाते हैं जो अब तक प्रचलन में हैं। अस्मिता के आधार पर देखने का अर्थ है कि हमें इतिहास के लिए नए किस्म के वर्गीकरण बनाने होंगे। नए वर्गीकरण क्या होंगे? इस पर नामवर सिंह चुप हैं । 'अस्मिता' को आधार बनाने से नवजागरण भी समस्यामूलक बन जाता है। 'अस्मिता की राजनीति' के परिप्रेक्ष्य के लिए नवजागरण अप्रासंगिक है। मसलन् स्त्री-साहित्य और दलित-साहित्य के आलोचक नवजागरण की परंपरा से इन साहित्य रुपों को जोड़कर नहीं देखते। भारतेन्दु ने 'स्वत्व' के बहाने जिस अस्मिता की बात कही है वह 'सामुदायिक अस्मिता' है। वह निजी अस्मिता नहीं है। भाषायी अस्मिता का सवाल 'सामुदायिक अस्मिता' से जुडा है। 'सामुदायिक अस्मिता' को आधार बनाकर हमने कभी साहित्य-चर्चा नहीं की है। 

हिंदी नवजागरण में सामाजिक-सांस्कृतिक और भाषायी विविधताओं के लिए कोई स्थान नहीं है । निजभाषा के नाम पर सिर्फ खड़ीबोली हिंदी पर जोर दिया गया। हिंदीभाषीक्षेत्र में बोली जाने वाली अन्य भाषाओं और बोलियों के साहित्य को इस विमर्श का अंग नहीं बनाया गया । साथ ही अन्य भाषाओं की उपेक्षा हुई । साथ ही दलितों और अल्पसंख्यकों के लेखन और जीवन की उपेक्षा हुई । इस नजरिए से देखें तो हिंदी नवजागरण पर बंगला नवजागरण का असर नजर आता है। बंगला नवजागरण ने दलितों और अल्पसंख्यकों को सम्बोधित नहीं किया उसके केन्द्र में सवर्ण थे। बंगला नवजागरण में दलितलेखन गायब है ,हिन्दी नवजागरण में भी दलित और अल्पसंख्यकों का लेखन नदारत है। उर्दू के प्रति बेगानापन है। अलीगढ़ आंदोलन के बारे में बेरूखी है। हिन्दीभाषी क्षेत्र की खड़ीबोली हिन्दी के अलावा अन्य बोलियों और भाषाओं के विकास की चिन्ता नदारत है।

नामवर सिंह की 'स्वत्व' की धारणा अमूर्त है। अमूर्तता का दुरूपयोग हो सकता है। 'स्वत्व' को सब पर लागू किया जा सकता है। लेकिन मामला सबका नहीं है। 'स्वत्व' का संबंध खड़ीबोली हिन्दी के विकास से है। मजेदार बात यह है कि जातीयभाषा और जातीयसाहित्य की अवधारणा के बहाने भी खड़ीबोली हिन्दी के साहित्य को लेकर ही लिखा गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दीभाषी क्षेत्र में पूंजीवाद का असमान विकास हुआ है। इसके कारण अस्मिता की राजनीति और अस्मिताओं का भी असमान विकास हुआ है। भाषायी अस्मिता एक अवस्था के बाद बिखरनी आरंभ हो जाती है। उसे सत्तातंत्र, बाजार, विज्ञापन, प्रलोभन, प्रमोशन आदि के आधार पर टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता।

भाषायी अस्मिता का मॉडल वर्चस्ववादी मॉडल है। इसके आधार पर राष्ट्र-राज्य का निर्माण संभव है लेकिन यह मॉडल टिकाऊ नहीं है। इस मॉडल में भाषायी समानता का अभाव है । पूंजीवाद अपने स्वाभाविक विकास क्रम में भाषायी वैषम्य को हवा देता है और यह काम मीडिया, विज्ञापन, संपर्क भाषा, राजभाषा आदि के जरिए करता है । हिन्दीभाषी क्षेत्र में खड़ीबोली हिन्दी को लेकर जो प्रतिवादी स्वर सुनाई दे रहे हैं वे इस धारणा की पुष्टि करते हैं।

'स्वत्व' तो हिन्दी जातीयता है। यह सांस्कृतिक वर्चस्व का नया रुप है । यह सांस्कृतिक असमानता को वैधता प्रदान करता है । जातीयता में वर्चस्व बना रहता है। वर्चस्व खत्म हो इसके लिए जरूरी है कि सभी भाषाओं और बोलियों के समान विकास की बात की जाय । एक नहीं अनेक भाषाओं के इतिहास की बात की जाय। हिन्दी में खड़ीबोली हिन्दी का साहित्य ही इतिहास का अंग है। इस क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों का साहित्य इसमें शामिल नहीं है । फलत: इस क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों के विकास की आधुनिक संरचनाओं का विकास नहीं हो पाया। भाषायी समानता के लिए यह ज़रुरी है कि प्रत्येक भाषा और साहित्य अपना स्वतंत्र इतिहास हो, उनके विकास की स्वतंत्र और स्वायत्त संरचनाएं निर्मित की जाएं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि जातीयता के आधार पर प्रशासनिक संरचनाएं न बनायी जाएं। मसलन् जातीयता के आधार पर राज्यों का गठन अब स्वयं में दिक्कतें खड़ी कर रहा है। जातीयता के आधार की बजाय उदार-व्यावहारिक -प्रशासनिक राज्य संरचनाएं विकसित की जाएं।

नामवर सिंह का सबसे बड़ा अंतर्विरोध है कि वे घोषित करते हैं कि 'स्वत्व' का अर्थ है-अस्मिता और परिभाषा देते हैं नवजागरण की। सवाल यह है अस्मिता की परिभाषा देने में परेशानी क्या थी ? क्यों नामवर सिंह ने नवजागरण की परिभाषा पर ही केन्द्रित किया ? नवजागरण की परिभाषा के साथ अस्मिता की परिभाषा भी यदि दे दी जाती तो अंततः नवजागरण का सारा विचारतंत्र धराशायी हो जाता। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब भारतेन्दु ने अस्मिता के सवाल से अपने साहित्य और आधुनिककाल के साहित्य का आरंभ किया है तो अस्मिता की अवधारणा पर बहस होनी चाहिए थी लेकिन जैसाकि हिन्दी की परंपरा है मुद्दा कुछ होता है और बहस किसी और मुद्दे पर होती है।

नामवर सिंह जानते हैं नवजागरण की धारणा पर बहस होगी तो परिणाम कुछ और निकलेंगे और अस्मिता की धारणा पर बहस होगी तो परिणाम एकदम भिन्न आएंगे। यहां तक कि आधुनिक आलोचना के समूचे पैराडाइम को ही बदलना पड़ेगा। लेकिन नामवर सिंह ने नवजागरण का मार्ग चुना। अस्मिता का जिक्रभर करके छोड़ दिया। नामवर सिंह की यह शैली है 'ज़िक्र करो और छोड़ दो', जबकि एक आलोचक के नाते उनको अस्मिता के सवाल को गंभीरता के साथ विस्तार में जाकर विश्लेषित करना चाहिए।

नवजागरण की प्रथम शर्त्त है पुराने सामाजिक भेदों और रूढ़ियों का खात्मा और उनकी जगह नए पूंजीवादी भेदों और रूढ़ियों का जन्म। सवाल यह है अस्मिता पुराने किस रूप, रुढ़ि या सामाजिक संबंध का विकल्प है? भारत में पुराने सामाजिक-सांस्कृतिक भेद बने रहते हैं और नए भेदों और रूढ़ियों का पूंजीवादी असमान विकास के साथ असमान विकास होता है। यहां अनेक क्षेत्रों में नया मूल्य पुराने मूल्य को नष्ट करके जन्म नहीं लेता, बल्कि पुराने के साथ सामंजस्य पैदा करके विकास करता है। इसके कारण विद्रूप सामाजिक जीवनमूल्यों का विकास होता है। यही वजह है हिन्दी में एक ओर नवजागरण है तो दूसरी ओर साहित्यिक भेदभाव भी है। साहित्यिक भेदभाव का आदर्श उदाहरण है स्त्री-साहित्य और दलित-साहित्य की आधुनिककाल के इतिहास लेखन में उपेक्षा। सन् 1980 के पहले साहित्य समीक्षा के मुख्यधारा विमर्श से ये दोनों साहित्य रूप गायब हैं। इस नजरिए का दूसरा आदर्श नमूना है प्रधान और गौण प्रवृत्ति के आधार पर साहित्यिक प्रवृत्तियों का साहित्य के इतिहास और आलोचना में वर्गीकरण । 'स्वत्व' के पर्याय के रूप में खड़ीबोली हिन्दी के साहित्य को समूचे हिन्दीभाषी क्षेत्र की अभिव्यंजना के रूप में व्याख्यायित किया गया। लेकिन खड़ीबोली हिन्दी समूचे हिन्दीक्षेत्र की भाषाओं और बोलियों को प्रतिबिम्बित नहीं करती। खड़ीबोली हिन्दी कॉमन कम्युनिकेशन की भाषा है लेकिन यह हिन्दीभाषी क्षेत्र के वैविध्य को प्रतिबिम्बित नहीं करती। अपने सामाजिक आधार के विकास के लिए इस भाषा के पक्षधरों ने हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्य भाषाओं और बोलियों की घनघोर उपेक्षा की है। इसके कारण भीतर ही भीतर भाषायी विद्वेष पैदा हुआ है। इसके दर्शन हमें झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखण्ड में साफ देखने को मिल रहे हैं वहां पर राज्य प्रशासन ने राज्य की प्रथमभाषा के रूप में खड़ीबोली हिन्दी को मानने से साफ इंकार कर दिया है।

भाषायी विकास की समान समझ के आधार पर हिन्दीभाषी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के विकास की ओर राज्य और केन्द्र सरकार ने ध्यान ही नहीं दिया। यहां तक कि लेखक संगठनों और निजी तौर पर लेखकों ने भी ध्यान नहीं दिया। अस्मिता के आधार पर भोजपुरी, अवधी, मैथिली, ब्रजभाषा आदि को हमने कभी नहीं देखा। हिंदी-उर्दू के लेखकों के लिए 'प्रलेसं' और 'जलेसं' बनाए गए। लेकिन अवधी, भोजपुरी आदि के लेखकों और उनके साहित्य के सवालों को लेखक संगठनों के घोषणापत्रों में कभी नहीं उठाया गया । इससे पता चलता है कि लेखकों के मन में राजनीतिक आग्रहों के कारण हिन्दी- उर्दू के सवाल बहसतलब रहे । साथ ही यह भी संदेश निकलता है कि लेखक संगठन भाषायी समानता के आधार पर नहीं सोच रहे हैं।

यदि नवजागरण के पैमाने से भाषा और उसके साहित्य को देखेंगे तो एक भाषा प्रमुख होगी, बाकी हाशिए पर रहेंगी। सवाल यह भी है कि नवजागरण के जिन पैमानों को खड़ीबोली हिन्दी में लागू किया जाता है वे पैमाने हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्यभाषाओं पर लागू क्यों नहीं किए गए? जबकि अस्मिता के पैमाने समान रूप से सभी भाषाओं और बोलियों पर लागू किए जा सकते हैं। मसलन् अस्मिता में सभी भाषायी अस्मिताएं समान हैं, चाहे उनके बोलने वालों की संख्या कम हो या ज्यादा। सभी भाषाओं और बोलियों का साहित्य समान है। इसमें प्राथमिक और गौण, केन्द्र और हाशिए की धारणा लागू नहीं की जा सकती। किसी भाषा विशेष को खास सुविधाएं नहीं दी जा सकतीं। लेकिन व्यवहार में यही हुआ ।

अस्मिता के आधार पर सभी भाषाओं को समान मानकर मूल्यांकन करेंगे तो एक ही क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषाओं के बीच के भेद, विकास की प्रक्रिया में भेद, भाषायी संरचनाओं में भेद और आम नागरिकों के संस्कार और आदतों में भेद सामने आएंगे। यह धारणा टूटेगी कि हिन्दीभाषी एक जैसे होते हैं। जिस तरह भाषा अस्मिता का अंग है, वैसे ही धर्म और जाति भी अस्मिता का अंग हैं। साम्प्रदायिकता, उपभोक्तावाद, फंडामेंटलिज्म, पुनरूत्थानवाद, युद्ध और पृथकतावाद भी अस्मिता का अंग है। इनमें कौन सी अस्मिता कब प्रमुखता अर्जित कर लेगी कहना मुश्किल है।

पूंजीवादी आर्थिक विकास की प्रक्रिया अस्मिता को व्यापक अभिव्यक्ति देती है। अस्मिताएं एक-दूसरे में अन्तर्ग्रथित रहती हैं। भाषायी अस्मिता कब धार्मिक पहचान में रुपान्तरित हो जाए कहना मुश्किल है, इसी तरह धार्मिक अस्मिता कब साम्प्रदायिक या पुनर्रुत्थानवादी पहचान में रुपान्तरित हो जाय यह तय करना संभव नहीं है। हिंदी के साथ यह घटा है। हिंदी और उर्दू को धार्मिक पहचान के साथ नत्थी करने में अंग्रेजों को सफलता मिली । हिंदी को हिंदुओं और उर्दू को मुसलमानों की अस्मिता के साथ जोड़ा दिया गया । भाषा को यदि धर्म से जोड़ा जाएगा तो इससे सामाजिक विभाजन का खतरा पैदा हो सकता है ।

सामाजिक विभाजन के कई राजनीतिक रुप हैं जैसे साम्प्रदायिकता, अंध क्षेत्रीयतावाद, स्थानीयतावाद आदि । कहने का तात्पर्य है कि भाषाभेद के सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिकभेद में रुपान्तरित होने की संभावनाएं रहती हैं । मूल बात यह कि अस्मिता रपटन है। इस पर स्थिर होकर खड़े नहीं हो सकते। यह अल्पकालिक है इस पर दीर्घकालिक समझ नहीं बनायी जा सकती। भाषा के आधार पर सामाजिक एकीकरण टिकाऊ कम और समस्यामूलक ज़्यादा है । नामवर सिंह जब भारतेन्दु के कथन के आधार पर अस्मिता की बात कहते हैं तो वे सरलीकरणों का सहारा लेते हैं और अस्मिता में निहित अंतर्विरोधों और वर्चस्व की अनदेखी करते हैं ।

अस्मिता का बुनियादी तौर पर बुर्जुआ विचारधारा से अन्तर्विरोध नहीं है बल्कि वह तो उसका अंग है । जो अंतर्विरोध नजर आता है वह सत्ताधारी विचारधारा के पैराडाइम में ही अपना विकास करता है। नामवर सिंह और रामविलास शर्मा में अस्मिता को लेकर मतभेद नहीं है। मतभेद है अस्मिता की प्राथमिकता को लेकर। नामवरसिंह के लिए निजभाषा की अस्मिता प्रमुख है तो रामविलास शर्मा के लिए 1857 का संग्राम प्रमुख है। लेकिन भाषा और युद्ध तो दोनों ही अस्मिता के अंग हैं और दोनों का परिणाम है बुर्जुआ वर्ग और विचारधारा के वर्चस्व का निर्माण करना ।

किसी भी अवधारणा या फिनोमिना पर विचार करते समय उसके सामाजिक-राजनीति-आर्थिक विचारधारात्मक परिणामों को देखा जाना चाहिए । 'स्वत्व' या भाषायी अस्मिता की परिणति या 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की परिणति किसमें होती है, यह देखें। या यों कह सकते हैं कि अस्मिता पर विचार करते हुए हम जाना कहां चाहते हैं और पहुँच कहां रहे हैं, इन दोनों पहलुओं पर विचार करना चाहिए। नवजागरण बंगाल का हो या हिन्दी का वह बुर्जुआ विचारधारा के पैराडाइम का अतिक्रमण नहीं करता। साथ ही अस्मिता के दायरे के बाहर नहीं निकल पाता। अस्मिता के बाहर साहित्य, कला, राजनीति को लाने के प्रयास 20वीं शताब्दी में ही सामने आते हैं।

सन् 1857 का संग्राम जो अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध था, उस युद्ध की साहित्यिक अभिव्यक्तियों पर खूब चर्चा हुई है लेकिन युद्ध की तबाही और युद्धजनित सामाजिक अवस्था पर नामवर सिंह एकदम चुप हैं। 1857 से लेखक प्रभावित थे या नहीं, इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है युद्ध का व्यापक दीर्घकालिक प्रभाव हमारे साहित्यकारों की नजरों से ओझल क्यों रहा और समीक्षकों ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया? सन् सत्तावन के युद्ध में हम अंग्रेजों से हारे थे। इस युद्ध ने भारतीय सामंती राजतंत्र की कमर तोडकर रख दी थी। इसके अलावा महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उस समय की हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में या कालान्तर में आए भारतेन्दुमंडल के लेखन में इस युद्ध के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर कोई खास सामग्री नहीं मिलती। भारतेन्दुयुगीन या उसके पहले का हिंदी मीडिया, इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे पाया ? इस युद्ध में भारत की पराजय के बाद भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ गया। इस युद्ध से उनलोगों को लाभ हुआ जो अंग्रेजों के साथ थे बल्कि आम हिन्दुस्तान के लिए यह गुलामी लेकर आया। नए वर्ग के रूप में पैदा हुए मध्यवर्ग और रैनेसांपंथियों या धार्मिक-समाजसुधारकों के बीच में इस युद्ध में भारत की पराजय को लेकर अंग्रेजों के प्रति घृणा कम नजर आती है। बल्कि यह देखने में आता है कि मध्यवर्ग के अधिकांश बुद्धिजीवी आंखें बंद करके अंग्रेजों की प्रशंसा में लगे थे और युद्ध के बाद जो भारत उभरकर सामने आ रहा था उसकी ओर इनका कम ध्यान था। युद्ध के बाद जो भारत सामने आया उसमें बड़े पैमाने पर गरीबी नजर आती है। अकाल और महामारियां नजर आती हैं। 19वीं सदी में कोलकाता में बड़े पैमाने पर वेश्याओं के कोठे पैदा होते हैं।

अकाल और वेश्यावृत्ति इस दौर के दो बड़े फिनोमिना हैं। जिन पर लेखकों-आलोचकों का ध्यान नहीं गया । वेश्याओं और अकाल पीडितों के सवाल नवजागरण विमर्श से गायब क्यों हैं ? 19वीं सदी में भारतेन्दुमंडल के लेखक किस तरह की स्त्री इमेज पेश कर रहे थे ? क्या वह सामंती या बुर्जुआ स्त्री के रुपों से भिन्न स्त्री इमेज है ?

सन् 1857 का संग्राम सामान्य संग्राम नहीं था इसने व्यापक तौर पर समाज को प्रभावित किया था। मनुष्य और प्रकृति और ईश्वर के बीच में इसने विशाल खाई पैदा कर दी। कायदे से युद्ध और मनुष्य के संबंध पर बहस होनी चाहिए थी, लेकिन बहस हुई समाजसुधारों पर, ईश्वर और धर्म के सुधारवादी रूपों पर। इसके कारण बृहत्तर जनता के जीवनयथार्थ में जो घट रहा था वह साहित्य के केन्द्र में कम है । मध्यवर्ग के जीवन का चित्रण ज्यादा है। उल्लेखनीय है यह वर्ग उस समय जनसंख्या के लिहाज से बहुत छोटा सामाजिक वर्ग है। इसका भारत के किसानों के साथ संबंध कम और अंग्रेजियत से संबंध ज्यादा है ।

अंग्रेजों की सामाजिक नीति का सबसे भयानक परिणाम था नवोदित मध्यवर्ग और किसानों में अलगाव। यह अलगाव आज भी खत्म नहीं हुआ है। किसान के जीवन में ब्रिटिश शासन के आने साथ जो तबाही आई उस पर कम ध्यान गया । साहित्य रुपों और हिंदी भाषा पर ज्यादा ध्यान गया। इतिहास और भाषा की दुनिया एक ऐसी दुनिया थी जिसमें नए सवालों की चुनौतियों से सीधे खतरा कम महसूस हो रहा था। उन प्रकाशनों से ज्यादा खतरा था जो सामाजिक यथार्थ को उदघाटित कर रहे थे। नए मनुष्य की खोज के लिए नई व्याख्याओं का उदय हुआ, पुराने पाठ की नई व्याख्याएं लिखी गयीं। यहां तक कि धार्मिक और सामाजिक सुधार के आंदोलनों में पुराने पाठ के नए भाष्यों को जन्म दिया। असल में ‘क्षमता’ और ‘संभावना’ इन दो की खोज पर समूचा नवजागरण जुट गया। हर क्षेत्र में व्यक्ति की ‘क्षमता’ और ‘संभावनाओं’ की खोज होने लगी। इसके आधार पर लिखी गयी व्याख्याओं के कारण नवोदित आधुनिक संसार अर्थपूर्ण और प्रासंगिक नजर आने लगा। व्याख्याओं को लेकर भी विचारों की टकराहट होने लगी जिसने सरसता और सजीवता पैदा कर दी। व्याख्याओं के नए संसार ने जो विचार पैदा किए वे विचार आज भी हमें प्रासंगिक लगते हैं। यही वजह है कि नवजागरण के विचार हमेशा प्रासंगिक लगते हैं। किसी को जातीय भाषा, किसी को जातीय साहित्य और किसी को नवजागरण और किसी को 1857 की व्याख्याएं आज भी प्रासंगिक लगती हैं। इस क्रम में हम भूल गए कि युद्ध हमेशा व्याख्या की संभावनाएं पैदा करते हैं। नामवरसिंह जब 1857 की भूमिका को स्वीकार नहीं करते तो उनके ज़ेहन में रामविलास शर्मा हैं, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि युद्ध नए भाष्यऔर नए वर्गों के उदय या विकास की संभावनाओं को पैदा करते हैं।

सन् 1857 के संग्राम को हमने प्रथम स्वाधीनता संग्राम के रूप में देखा है। इसके कारण उसकी व्याख्या और दिशा अलग रही है। हमने उसे कभी युद्ध के रूप में देखा ही नहीं। 1857 का संग्राम अंततः युद्ध है। युद्ध के बाद हमेशा अस्मिता के सवाल उठे हैं, भारतेन्दु हों या अन्य कोई लेखक हों वे सभी पहचान के सवाल उठाते हैं। यह भी देखा गया है कि हर युद्ध के बाद अस्मिता की नए सिरे से परिभाषा तय करने का काम आरंभ हो जाता है। यह अचानक नहीं है कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भी अस्मिता के सवाल नए रूप में सामने आते हैं। काव्यभाषा के तौर पर ब्रजभाषा का अंत होता है और खड़ीबोली हिन्दी का एकछत्र राज्य स्थापित होता है।

युद्ध के प्रसंग में राममनोहर लोहिया का उल्लेख करना समीचीन होगा। उन्होंने लिखा है, ‘ युद्ध राजनीति का सबसे खराब और अवांछनीय उपकरण होता है किंतु जब राज्य पर लादा जाता है तो इसका एकमात्र प्रयोजन राजनैतिक होता है।’ भारत में 1857 के युद्ध का मकसद था समस्त भारत पर ब्रिटिश शासन की स्थापना करना। नवजागरण पर नामवर सिंह ने जिस तरह लिखा है उससे नवजागरण की चेतना पैदा करने वाली एजेंसियों का अता-पता नहीं चलता। नवजागरणचेतना पैदा करने वाली एजेंसियों की भूमिका को विश्लेषित किए बिना नवजागरण विमर्श वस्तुतः सारतत्ववादी रणनीतियों में फंसकर रह गया है। सारतत्ववादी होने का अर्थ है अंतर्वस्तुवादी होना, इससे चीजें सही परिप्रेक्ष्य में नजर नहीं आतीं। यह नवजागरण को देखने का सीमित नजरिया है।

नामवर सिंह जब नवजागरण की बात करते हैं तो नवजागरण के निर्माण में तत्कालीन एजेंसियों की भूमिका को खोलते नहीं हैं। उन संस्थानों की भूमिका पर रोशनी नहीं डालते जिनकी नवजागरण के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका थी। नवजागरण के निर्माण में तत्कालीन संस्थानों की मंशा क्या थी और परिणाम क्या निकले, इसकी मीमांसा नहीं करते। वे सामान्यीकरणों और सरलीकरणों का इस्तेमाल करते हैं। नवजागरण की चेतना क्यों आई? उसकी प्रक्रिया क्या थी? संस्थानों की भूमिका क्या थी? बाद में नवजागरणचेतना क्यों खत्म हो गई? और इसमें संस्थानों ने क्या भूमिका अदा की? ये सब सवाल नामवर सिंह की आंखों से ओझल रहते हैं। नवजागरण के कारण किस तरह की नीतियों का जन्म हुआ और किस तरह के सामाजिक-आर्थिक संबंध पैदा हुए, किस तरह का परिवार पैदा हुआ और किस तरह की राजसत्ता का उदय हुआ, किस तरह का नागरिक बना आदि महत्वपूर्ण सवाल हैं। न्यायपालिका, राजसत्ता, प्रेस आदि की क्या भूमिका थी इत्यादि सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर खोले बिना संभव ही नहीं है कि आप नवजागरण को विश्लेषित कर पाएं। इसके अलावा नवजागरण के साथ ज्ञान, शिक्षा, साहित्य और स्त्री के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया भी जुड़ी है।

नवजागरण ने जिस प्रक्रिया को जन्म दिया वह है लोकतांत्रिकीकरण। जिस मनुष्य को जन्म दिया है वह है लोकतांत्रिक मनुष्य । विभिन्न क्षेत्रों में लोकतांत्रिकीकरण किस रूप में रूप में हुआ, क्या सारे देश में या हिन्दीभाषी राज्यों में शिक्षा, स्त्री और ज्ञान के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया इकसार ढ़ंग से चली है? यदि इस प्रक्रिया में अंतर हैं तो क्यों और किस रूप में? नामवरसिंह ने इन सभी सवालों की एकसिरे से अनदेखी की है। नवजागरण विमर्श की बहस 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के इर्द-गिर्द घूमती है जबकि उसी दौर के कई संग्रामों का हमारे समीक्षकों ने नोटिस ही नहीं लिया। इस प्रसंग में राज्यवार विद्रोह (1857-58) उल्लेखनीय है।

उल्लेखनीय है कि अस्मिता संबंधी झगड़ों में हिन्दीभाषी क्षेत्र ही नहीं समूचा भारत आजादी के बाद अपनी बहुत ज्यादा ऊर्जा बर्बाद कर चुका है। पहले लोग यह सोचते थे भारत आजाद हो जाएगा तो शांति लौट आएगी, लेकिन भाषायी आधार पर राज्यों का गठन, अंग्रेजी हटाओ हिन्दी लाओ, तमिलनाडु का हिन्दी विरोधी आंदोलन, विभिन्न इलाकों में पैदा हुए पृथकतावादी आंदोलन, राममंदिर आंदोलन, पिछडों के आरक्षण का आंदोलन आदि सभी आंदोलन अस्मिता से ही जुड़े आंदोलन हैं। इसके अलावा 1962, 1965 और 1971 का युद्ध भी इसी कोटि में आता है। यही वो अस्मिता विमर्श का वातावरण है जिसमें हिन्दी साहित्य समीक्षा में हिन्दीजाति, हिन्दी जातीयता की बहस जन्म लेती है। हिन्दी में हिन्दीजाति की बहस सबसे पहले विस्तार के साथ सिर्फ रामविलास शर्मा उठाते हैं और यह बहस उनके साथ ही खत्म हो जाती है। एक अवधि के बाद वे भी इस बहस को आगे नहीं ले जा पाते। अन्य हिन्दीभाषी बुद्धिजीवी उनकी इस बहस में हिस्सा तक नहीं लेते। तकरीबन यही स्थिति नवजागरण संबंधी विमर्श की है।

विगत 40सालों में नवजागरण संबंधी विमर्श लगातार कम होता चला गया है। सन् 1977 के बाद तकरीबन नवजागरण संबंधी बहस समाप्त हो गयी है। किसी भी भारतीय भाषा में नवजागरण को लेकर बहस नहीं हो रही। नवजागरण विमर्श के अवसान का बड़ा कारण है नवजागरण पर नए परिप्रेक्ष्य में सोचने का अभाव और नवजागरण संबंधी नई सामग्री का अभाव। ऐसी अवस्था में हिन्दी में चंद आलोचकों में नवजागरण और हिन्दीजाति पर बहस होती रही है। इन चंद आलोचकों में नामवर सिंह प्रमुख हैं।

अस्मिता विवादों में राजनीतिक आयाम प्रमुख रहा है। ऊपर हमने जो सूची दी है उसे देखकर सहज ही समझा जा सकता है कि अस्मिता का सवाल हमारे यहां सांस्कृतिक की तुलना में राजनीतिक ज्यादा है। अस्मिता की जब भी बातें होती हैं तो उसके पक्ष और विपक्ष में राजनीतिक तर्क ज्यादा दिए जाते हैं, सांस्कृतिक उत्कर्ष या उपलब्धियों के बिंदुओं की चर्चा कम होती है। उल्लेखनीय है भारत में ऊपर बताए सभी अस्मिता आंदोलन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शीतयुद्धीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में जन्म लेते हैं। सारी दुनिया में शीतयुद्ध के दौरान अस्मिता के आंदोलन बड़े आंदोलन रहे हैं और इनका किसी न किसी रूप में एक अंतर्राष्ट्रीय सिरा भी है। हर जाति या समूह अपनी अस्मिता को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है और बार बार ‘मैं’ हूँ, का बोध पैदा किया जा रहा है। इधर के 30 सालों में स्थानीय अस्मिता ने विकास और पिछड़ेपन के सवालों के साथ एकीकृत करके समस्याएं खड़ी की हैं। अस्मिता को पिछड़ेपन से जोड़कर व्याख्यायित करने के कारण हिन्दीभाषी प्रान्तों -यूपी, बिहार और मध्यप्रदेश- का विभाजन हो गया।

अस्मिता के साथ जातीय विद्वेष भी पृथकतावादी आंदोलनों के साथ उभरा है। खासकर उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह स्थिति आज भी बनी हुई है। अस्मिता के साथ जातीय विद्वेष की भावना का परिप्रेक्ष्य हमारे समाज में 1936 के बाद पैदा होता है। मुस्लिम अस्मिता का सवाल पाकिस्तान बनाने की मांग के साथ सामने आता है। अस्मिता के साथ मुस्लिम विद्वेष के आने साथ जितने भी पृथकतावादी आंदोलन पैदा हुए हैं उनमें एक ही इलाके में रहने वाली अन्य जाति, धर्म और भाषा के मानने वालों के ऊपर हिंसक हमले हुए और सामूहिक हिंसाचार हुआ। अस्मिता का एक रूप जातीय, धार्मिक और लैंगिक हिंसा के रूप में सामने आया है। अस्मिता और हिंसा की यह जुगलबंदी अपने आपमें चिन्ता की बात है। स्थिति यह है कि स्त्रीअस्मिता के साथ भी हिंसाचार जुड़ा है। पुरूषों के हिंसाचार ने स्त्री अस्मिता के सवाल को तेजी से उभारने में मदद की। स्त्री अस्मिता की कोई भी बात आज पुंसहिंसा के बिना संभव नहीं है। अस्मिता और हिंसा का यह सहमेल शीतयुद्ध में चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। इसमें खास किस्म की धारावाहिकता है। समाजवाद के पराभव के बाद भी अस्मिताजनित हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही।

एक और आयाम है जिसे ध्यान में रखें, वह है 1857 का संग्राम या युद्ध। इस संग्राम के साथ अस्मिता के सवालों का जन्म होता है लेकिन इसके साथ जुड़ी हिंसा को हमने कभी गंभीरता से नहीं देखा। कहने का आशय यह कि भारत में अस्मिता और हिंसा में चोली-दामन का साथ है। अस्मिता के साथ संस्कृति का विकास कम होता है हिंसा का विकास ज्यादा होता है। यह संयोग की बात है कि सतीप्रथा के विरोध के साथ भारत में स्त्री अस्मिता का सवाल सबसे पहले उठता है लेकिन इस सवाल के साथ जो हिंसाचार जुड़ा था उसकी हमने कभी पड़ताल ही नहीं की। सतीप्रथा में स्त्री के प्रति जो हिंसा निहित है, वह हमारे लिए चिंता नहीं बनी। अस्मिता के सवाल उठेंगे तो हिंसा होगी। यह हिंसा पहले हो या बाद में लेकिन हिंसा होगी।

अस्मिता के बारे में बहस करते समय हिंसा के आयाम को हमारे आलोचकों ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। यही दशा जातिप्रथा और दलितसाहित्य की है। जातिप्रथा, दलितसाहित्य और अस्मिता के अन्तस्संबंध में जो भी बहस चल रही है उसमें जाति हिंसाचार को लेकर गंभीर भाव नहीं है। अस्मिता के साथ हिंसा की जुगलबंदी देखनी हो तो श्रीलंका को देखें जहां महात्मा बुद्ध के अनुयायी सिंघलियों ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए जातीयहिंसा के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। हजारों तमिलों की हत्या कर दी। इसी तरह इस्लाम मानने वाले पाक में बंगालियों पर जमकर हमले किए और अंत में बंगलादेश का जन्म हुआ। आज धर्मप्रधान देशों में हिंसाचार कॉमन फिनोमिना है। एक बात और देखने की है अस्मिता की हिंसा में मरनेवालों की संख्या क्रमशः बढ़ी है। अस्मिता को हिंसा से पृथक करने के लिए जरूरी है कि अस्मिताओं का लोकतांत्रिकीकरण किया जाय और उनकी एक-दूसरे पर निर्भरता को बढ़ाया जाय। स्वायत्तता और परनिर्भरता में संतुलन पैदा किया जाय।

मजेदार बात यह है कि भारत में लोकतंत्र है और अस्मिता में अ-लोकतंत्र है। फलतः अस्मिता जब भी लोकतंत्र में आवाज उठाती है तो इन दोनों का संघर्ष लोकतंत्र बनाम अ-लोकतंत्र की जंग में तब्दील हो जाता है। लोकतंत्र बनाम अ-लोकतंत्र की जंग से बचने का सबसे सही मार्ग यह है कि अस्मिताएं आत्मनिर्भर बनें। अस्मिताएं आत्मनिर्भर तब ही बन सकती हैं जब वे अन्य की कीमत पर जिंदा रहने का ख्याल त्याग दें। मसलन् हिन्दी आत्मनिर्भर बने लेकिन अंग्रेजी के खिलाफ संघर्ष करके नहीं। अन्य रहेगा, अन्य को खत्म करके अस्मिता को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह स्त्री आत्मनिर्भर बने लेकिन अपनी कीमत और शक्ति के आधार पर। पुरूष की शक्ति और कीमत के आधार पर नहीं। अस्मिता बनाम अन्य के संघर्ष और तनावों से बचा जाना चाहिए। इस क्रम में हमें अस्मिता के लिए शांति की भावना से जुड़े नए विचारों को निर्मित करना होगा। उन विचारों को त्यागना होगा जो अशांति पैदा करते हैं। इस क्रम में अस्मिता के सकारात्मक पहलुओं को उभारना होगा, उन पक्षों की चर्चा ज्यादा करनी होगी जो अस्मिताबोध में इजाफा करें। इस क्रम में अस्मिता में निहित प्रतिस्पर्धी भाव को खत्म करना होगा। अस्मिता का प्रतिस्पर्धीभाव अंततः तनाव और संघर्ष पैदा करता है। उन क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए जहां पर तनाव है या हो सकता है। फिर उन उपायों के बारे में सोचना चाहिए जिनसे तनाव कम किए जा सकें।

अस्मिता में एक नहीं अनेक किस्म के तनाव एक ही साथ रहते हैं। अस्मिता को उन्मादी भाषा से सबसे पहले बचाने की जरूरत है। उन्मादी भाषा और विज्ञापन की भाषा अंततः हंगामे से आगे चीजों को विकसित होने नहीं देती। दूसरा, अस्मिता को अन्य की नैतिकता के सवालों से बचाने की जरूरत है। अस्मिता पर जब भी बातें होती हैं नैतिक प्रश्न सामने आकर खड़े हो जाते हैं। अस्मिता के सवाल नैतिकता के सवाल नहीं है। इसे न्यायपूर्ण सामाजिक विकास के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

अस्मिता में हिंसाचार तब दाखिल होता है जब हम न्यायपूर्ण तरीकों और विवेकवादी नज़रिए को मानना बंद कर देते हैं या फिर रेशनल सांस्थानिक फैसलों को नहीं मानते। मसलन् युद्ध से लेकर स्त्री-अस्मिता तक सभी सवालों पर हमें अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय न्यायपूर्ण उपायों और संस्थानों के फैसलों को शांतिपूर्ण ढ़ंग से मान लेना चाहिए। न्यायपूर्ण सांस्थानिक फैसलों के उल्लंघन से भी अस्मिता में तनाव पैदा होता है। इसके अलावा अस्मिताधारियों में शांतिपूर्ण समाधान की ललक हो। शांतिपूर्ण समाधान समय खाते हैं। इस पद्धति से काम करने में समय ज्यादा खर्च होता है।

अस्मिता के सवालों को शार्टकट के जरिए हल नहीं करना चाहिए। इस क्रम में हमें ‘स्व’ की चिन्ताओं के साथ ‘अन्य’ की समस्याओं के प्रति भी हमदर्दी होनी चाहिए। ‘स्व’ की शांति तब ही संभव है जब ‘अन्य’ भी शांति से रहे। ‘अन्य’ को अशांत करके ‘स्व’ को शांति नहीं मिल सकती। मसलन् नामवरसिंह ने ‘स्वत्व’ के बहाने खड़ीबोली हिंदी की समस्याओं को तो सामने रखा और उन पर विचार किया, लेकिन अवधी, भोजपुरी आदि भाषाओं की समस्याओं की उपेक्षा की, इससे समस्या का समाधान कम हुआ। हिन्दी भाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही खड़ीबोली हिन्दी आत्मनिर्भर बन सकती है। यह संभव नहीं है हिन्दीभाषी क्षेत्र की अन्यभाषाएं पिछड़ी रह जाएं और खड़ीबोली हिन्दी तरक्की कर जाय। वही अस्मिता अपना विकास करती है जो अन्य की उपेक्षा न करे। अन्य के प्रति समानता और संतुलन के नजरिए से पेश आए।

हिंसा के बिना अस्मिता का विमर्श लिखा नहीं गया है। हालत इस कदर बदतर रहे हैं कि अस्मिता के नाम पर जनसंहार से लेकर साम्प्रदायिक हिंसा तक होती रही हैं। अस्मिता में जो लोग आनंद की खोज कर रहे हैं ,विकल्प खोज रहे हैं। वे असल में अस्मिता में निहित संभावित खतरों की अनदेखी करते हैं और अंत में खतरों में फंसते हैं। अस्मिता का प्रत्येक विवाद संदर्भ विशेष से जुड़ा है। लेकिन उसकी परिस्थितियां हमेशा बहुआयामी ख़तरों से भरी होती हैं। ये परिस्थितियां राजनीतिक-आर्थिक सांस्कृतिक और व्यक्तिगत कारणों से जुड़ी हुई हैं। अस्मिता के सवाल जब भी उठते हैं उनसे व्यक्तिगत और सामाजिक हिंसा किसी न किसी रूप में जुड़ी नजर आती है। स्त्री, दलित, हिन्दू, प्रान्तीयता, साम्प्रदायिकता और पृथकतावाद आदि के प्रसंग में यह बात एकदम खरी साबित हुई है।

एक अन्य पहलू है जिसे ध्यान में रखना होगा वह है- अस्मिता की अंतर्राष्ट्रीयता। अस्मिता के स्त्री, दलित, भाषा, जातीयता, नवजागरण आदि के जितने भी विवाद हैं वे स्थानीय के साथ अंतर्राष्ट्रीय हैं। मसलन् नवजागरण और जाति (नेशनेलिटी) का विवाद अंतर्राष्ट्रीय है। यही हाल बाकी विवादों का भी है। इस विवाद में अस्मिता को समुदाय के रूप में देखना और समुदाय को सुपर पावर के रूप में पेश करने का प्रबल भाव है। हिन्दीजाति को समुदाय के रूप में रामविलास शर्मा ने पेश किया और फिर उसकी शक्तियों का विस्तार के साथ खुलासा किया है। साथ ही हिन्दीजाति को अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर घट रहे परिवर्तनों से जोड़ा। फलतः वे हिन्दीसमुदाय की रूपान्तरण की क्षमता को रेखांकित करने में सफल रहे। यही हाल नवजागरण का है। इसे भी स्थानीय रूप में खोलते हुए अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रियाओं के साथ जोड़ने की पद्धति का नामवरसिंह-रामविलास शर्मा ने विकास किया है। स्त्रियों पर लिखते समय तो यह काम इन दिनों धडल्ले से हो रहा है।

अस्मिता का सवाल मानवाधिकारों के दायरे में आता है। यह अस्मिता की स्वतंत्रता और स्वायत्तता का सवाल भी है। इस क्रम में हमें मूलभूत संवैधानिक स्वतंत्रताओं को सुनिश्चित बनाना होगा। न्याय और समानता के आधार पर मसलों के शांतिपूर्ण ढ़ंग से समाधान खोजने होंगे। सहअस्तित्व, सद्भावना और सहमेल को बढ़ावा देना होगा। सन्1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में सैनिकों में अभूतपूर्व एकता नजर आई। इस एकता की तरह तरह से व्याख्या की गयी लेकिन उल्लेखनीय बात यह है कि 57 के संग्राम में जो एकता है वह हमेशा युद्ध के समय ट्राइवल यूनिटी के रूप में व्यक्त होती है। इसी तरह की एकता सन्1914 के प्रथम विश्वयुद्ध के समय भी देखने को मिली थी।

युद्ध के समय राष्ट्रीयएकता की तुलना में सामुदायिक एकता ज्यादा नजर आती है। हिन्दीभाषी क्षेत्र की जनता इस संग्राम पर एकजुट थी, इसके विपरीत बंगाल के बुद्धिजीवी एकदम भिन्न ढ़ंग से सोच रहे थे। युद्ध के दौरान अस्मिता की राजनीति का यह विशिष्ट लक्षण है कि वहां सामुदायिकचेतना ज्यादा मुखर रूप में व्यक्त होती है। इस तरह के युद्ध में सामुदायिक एकता और सामुदायिक कुर्बानी को रेखांकित करने की जरूरत है। यहां पर राष्ट्र अपने को समुदाय के रूप में व्यक्त करता है। सिपाही विद्रोह की खासियत यह थी कि यह आरंभ हुआ सिपाही विद्रोह से लेकिन इसने जल्द ही हिन्दू-मुस्लिम एकता की शक्ल अर्जित कर ली और कालान्तर में इस सीमा का भी अतिक्रमण कर गया। यह सामान्य मानवीय इच्छा होती है कि वह सीमाओं का अतिक्रमण करे और सन्1857 का संग्राम भी यही करता है। यह महज सिपाही विद्रोह नहीं रहता और प्रथम स्वाधीनता संग्राम में तब्दील हो जाता है। यह चंद सैनिकों की समस्या की अभिव्यक्ति न रहकर प्रथम मुक्ति संग्राम बन जाता है। यह सैनिकों का व्यक्तिगत मसला नहीं रह जाता। जबकि यह आरंभ हुआ था सैनिकों की व्यक्तिगत समस्या से। इस प्रक्रिया में कालांतर में प्रत्येक सैनिक एक बड़ी राष्ट्रीय इकाई का अंग नजर आने लगा। उनमें यह सचेतनता स्वतःस्फूर्त ढ़ंग से पैदा हुई। आरंभ में यह सैनिक समस्या के रूप में सामने आया, बाद में यह समस्या समुदाय और राष्ट्र की समस्या बन गयी।

आरंभ में गाय के चमड़े के कारतूस के इस्तेमाल के खिलाफ सैनिकों ने प्रतिवाद किया। इस प्रथम मुक्ति संग्राम के आरंभ और एकता की अभिव्यक्ति के केन्द्र में पशु (गाय) आया। समाजशास्त्री दुर्खीम ने इस पक्ष की ओर ध्यान खींचा है कि सामुदायिक (ट्राइवल यूनिटी) एकता पशु, पेड़-पौधे, पृथ्वी, स्वर्ग आदि के रूप में व्यक्त होती है। वहीं दूसरी ओर सैनिकों में एक खास किस्म का बागी भाव नजर आता है। वे अपने आत्मविश्वास को खोते नहीं हैं। बल्कि पूरे जोशो-खरोश के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं और अन्य बटालियनों से भी मदद लेते हैं। अपनी छावनी के संघर्ष को बाहर की छावनियों तक फैला देते हैं। एक तरफ ये सैनिक बाहर के सैनिकों से जोड़कर अपना अलगाव कम करते हैं, वहीं दूसरी ओर भगवान से भी अपना संबंध-संपर्क जोड़ते हैं। इस तरह वे आधुनिकता के साथ आए अलगाव का एक समाधान निकाल लेते हैं और व्यापक एकता निर्मित करने में सफल हो जाते हैं। सीमित समस्या से आरंभ हुए विद्रोह को व्यापक अनंत संग्राम से जोड़ देते हैं। कालान्तर में इस संग्राम को लेकर तरह-तरह के नाम रखे गए लेकिन उनकी मंशा एकदम साफ थी।

सन् 57 के संग्राम ने सामाजिक एकता पैदा करने, विचारधारा के आधार पर एकजुट होने का संदेश दिया। इस क्रम ने व्यक्ति और समाज के बीच में नए किस्म की एकता को जन्म दिया। साथ ही इसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध थी। प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने सामाजिक लगाव और हिन्दीभाषी बौद्धिकों में आवयविक एकता पैदा की। समाज में सामंती चेतना के खिलाफ पूंजीवादी सचेतनता पैदा की। पहली बार धर्म और ईश्वर के विकल्प के तौर पर राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। संस्कृति के क्षेत्र में विकल्प की संस्कृति के साथ, बुर्जुआ संस्कृति ने जन्म लिया।



उल्लेखनीय है प्रत्येक युद्ध अंततः सांस्कृतिक परिवर्तनों को जन्म देता है। सांस्कृतिक परिवर्तन के जरिए सत्ताधारी वर्ग अपना वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश करते हैं। शिक्षा में खासकर नए परिवर्तन जन्मलेते हैं। प्रेस में नई संस्कृति व्यापक तौर पर अभिव्यक्ति पाती है और नए विधारूप के तौर पर उपन्यास का जन्म होता है। हिन्दी का 'परीक्षागुरू' अंग्रेजी के नॉवेल के पैटर्न का उपन्यास है यह बात आचार्य शुक्ल की तरह नामवर सिंह ने भी रेखांकित की है। ब्रिटिश शासकों की ओर से सचेतढंग से संस्कृति, परंपरा, भाषा और साहित्य की नई बुर्जुआ व्याख्याओं का जन्म होता है, प्राच्यवाद का स्कूल पैदा होता है जिसका प्रधान लक्ष्य था प्राचीन-मध्यकालीन संस्कृति की व्याख्या करना। इस समूची प्रक्रिया में नए किस्म की ब्रिटिशपरस्त अनुभूति और संवेदनशीलता पैदा होती है।

सन् 57 को लेकर हिन्दी में उत्सवधर्मी भाव है ,इसके बहाने बार बार जनता की साझा विरासत, साझा कुर्बानी और साझा समस्याओं पर खूब लिखा गया है। अधिकांश लेखकों और आलोचकों का इस घटना की ओर लौटना इस बात का संकेत है कि इस घटना से कम से कम सामुदायिक एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश जरूर मिलता है। इसी प्रसंग में उल्लेखनीय है कि युद्ध को जब भी याद करते हैं तो सामुदायिकता की भावना, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की बातें खूब करते हैं। युद्ध की निंदा करते हैं। इस अर्थ में युद्ध हमेशा प्रेरक ऊर्जा का काम भी करता है। कुछ आलोचकों का मानना है शांति की तुलना में युद्ध ने हमेशा सर्जनात्मक प्रेरक की भूमिका अदा की है। सृजन के जरिए युद्ध की पीड़ा से मुक्ति पाते हैं। युद्ध के बाद हमेशा समाज को नए सिरे से ऊर्जस्वित करने में मदद मिलती है। इस संदर्भ को ध्यान में रखकर यदि सन् 57 के युद्ध को देखा जाय तो युद्धजनित परिस्थितियां ज्यादा सर्जनात्मक नजर आएंगी।

पूंजीवाद ने जब से अपने को साम्राज्यवाद के रूप में स्थापित किया और महाशक्ति बनाया उसका एक असर यह हुआ कि महाशक्ति कहलाने वाले देशों में जो भी कुछ घटता था उसका सीधा असर गुलाम दुनिया पर पड़ता था। यह बात 19वीं सदी में जितनी सच थी, आज 21वीं सदी में भी उतनी ही सच है। इसके अलावा धर्म और धार्मिक तत्ववाद का इस्तेमाल करने की परंपरा भी सबसे पहले महाशक्ति कहे जाने वाले देशों में ही दिखाई देती है। खासकर ईसाई फंडामेंटलिज्म का जमकर प्रचार –प्रसार हुआ। ब्रिटेन में उस जमाने में ईसाई कठमुल्लों को विभिन्न तरीकों से सत्ता का संरक्षण प्राप्त था। बाद में यह संरक्षण अन्य धार्मिक संकीर्णतावादियों को भी दिया गया। धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों को ब्रिटिश शासकों ने खुला संरक्षण दिया। इसके गर्भ से ही 19वीं सदी में पुनरूत्थानवाद और कालान्तर में साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले संगठनों का जन्म होता है। यह समूची प्रक्रिया हिन्दू-मुस्लिम विभाजन और भारत-पाक विभाजन तक ले जाती है। ताकतवर पश्चिमी देशों का स्वाभाविक रूझान मुस्लिम फंडामेंटलिस्टों की ओर रहा है। ब्रिटेन ने सन् 57 के संग्राम के बाद सचेत रूप से सामाजिक सुधारों की प्रक्रिया को भारत में तिलांजलि दे दी। नवजागरण पर विचार करते समय उसके पुनरूत्थानवादी आयाम को समग्रता में समझने की जरूरत है।

इसी तरह नामवर सिंह ने भारतेन्दु साहित्य के बहाने जिस अस्मिता की बात कही है वह व्यक्तिगत अस्मिता नहीं है बल्कि सामुदायिक अस्मिता है। इसे व्यक्तिगत अस्मिता के सवालों के साथ गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए। रामविलास शर्मा ने जिस तरह हिन्दीजाति को पहचान के परम या अंतिम रुप में पेश किया है। पहचान का यह रुप स्वीकार्य नहीं है। अस्मिता में परम या अंतिम पहचान जैसी चीज नहीं होती । हिन्दीजाति को या भाषा को आधार बनाकर अस्मिता की बात जब भी की जाएगी तो उसके गर्भ में से क्या निकलता है यह देखने की जरूरत है। अस्मिता पर बहस करते हुए यदि अस्मिता पर ही पहुँचते हैं तो अस्मिता की यह चक्राकार परिक्रमा अंततः हमें कहीं नहीं ले जाएगी। इसमें एक ही वृत्त में घूमते रहने की संभावनाएं ज्यादा हैं। जैसाकि रामविलास शर्मा ने किया है और नामवर सिंह भी ‘स्वत्व’ के नाम पर जिस अस्मिता की बात करते हैं वह चक्राकार है। वह भाषायी अस्मिता से आरंभ होती है और उसी पर खत्म होती है । यह भी कह सकते हैं कि वह एक ही संदर्भ में एक स्थिर रूप में भाषायी अस्मिता को देखते हैं। जबकि अस्मिता कभी स्थिर नहीं रहती, वह संदर्भ के साथ बदलती रहती है। वह धुरी पर नहीं घूमती। वह एक ही विषय या लक्ष्य पर केन्द्रित नहीं रहती। अस्मिता में एक अवधि के बाद अन्य की अस्मिता में घुलमिल जाने की प्रवृत्ति होती है। अस्मिता हमेशा कनवर्जन करती है। हिन्दीजाति की अस्मिता 19वीं सदी से लेकर आज तक एक ही स्थिर अवस्था में बरकरार नहीं रही है।

सवाल यह है कि हिन्दीजाति की अस्मिता का किन अस्मिताओं में रूपान्तरण हुआ है ? इसे तुलनात्मक तौर पर हमेशा अन्य अस्मिता रूपों के संदर्भ में देखना चाहिए। मसलन् 19वीं सदी के संदर्भ में स्त्री अस्मिता को भारतेन्दु महत्वपूर्ण नहीं मानते, वे भाषा की अस्मिता को महत्वपूर्ण मानते हैं। लेकिन आज भाषायी अस्मिता महत्वपूर्ण नहीं है। स्त्री अस्मिता महत्वपूर्ण है। आधुनिक पूंजीवादी विकास और जनमाध्यमों के विकास के कारण भाषायी अस्मिता धीरे धीरे गौण बन जाती है और अन्य अस्मिताएं उभरकर केन्द्र में आ जाती हैं। यहां तक कि प्रगतिशील आंदोलन के दौरान भाषायी अस्मिता की बजाय वर्गीय अस्मिता को प्रधान माना गया। इसका अर्थ यह भी है कि अस्मिताओं में समानता स्थापित नहीं की जा सकती। एक अस्मिता से दूसरी अस्मिता में भेद है, इनके दायरे अलग हैं, प्रभावक्षेत्र अलग हैं। मसलन् स्त्री के सवालों पर बंगाल के संदर्भ में जो तर्क दिए गए और संघर्ष हुए वैसे संघर्ष हिन्दीभाषी क्षेत्र में नहीं हुए। यही हाल महाराष्ट्र के रैनेसां का है। उसके तर्क और संघर्षों के साथ हिन्दीभाषी क्षेत्र की तुलना नहीं की जा सकती।

हिन्दी की आलोचना में सबसे बड़ी कमी यह है कि यहां विचारों से विचारों की तुलना की जाती है। मसलन्, यह संभव है एक समान विचार हों लेकिन समाज एक जैसा न हो। यह बात बंगाल और हिंदीभाषी क्षेत्र को देखकर आसानी से समझ सकते हैं । नवजागरण मात्र विचार नहीं है बल्कि नया समाज है । एक क्षेत्र में रैनेसां के विचार जो हैं. वे हो सकता है अन्य जातीयक्षेत्र में भी मिल जाएं लेकिन वहां रैनेसां न हो। रैनेसां कोई विचारों का खेलभर नहीं है। रैनेसां एक खास भौतिक परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संघर्ष के साथ नए वर्गों की सामाजिक भूमिका की भी मांग करता है।

नामवर सिंह ने अपने नवजागरण के खेल में विचारों के साम्य के आधार पर नवजागरण की परिभाषा और स्थितियों को देखा है। विचार के आधार पर स्थितियों को देखना भाववादी तरीका है इससे मार्क्सवादी नजरिए का कोई संबंध नहीं है। हिन्दीभाषी क्षेत्र की 19वीं सदी की परिस्थितियां बंगाल और महाराष्ट्र से एकदम भिन्न थीं। यहां न तो फुले जैसा आंदोलन था और न राजाराममोहन राय के नेतृत्व जैसा सतीप्रथा विरोधी आंदोलन था। अतःयहां के बुद्धिजीवियों में वैसी चेतना और उस चेतना के सामाजिक संप्रसार की भी संभावनाएं नहीं थीं। इसके अलावा हिन्दी में पूंजीवाद और मध्यवर्ग का उस तरह विकास नहीं हुआ जिस तरह बंगाल में हुआ था। हिन्दी जातीय क्षेत्र की बौद्धिक और भौतिक परिस्थितियां बंगाल और महाराष्ट्र से एकदम भिन्न थीं। महज विचारों की तुलना के आधार पर नवजागरण का आधार नहीं बनता। एक जैसे विचार यह संकेत देते हैं कि बहुत सीमित दायरे में बंगाल-महाराष्ट्र के नवजागरण के विचारों का असर था। यह असर व्यक्तिगत ज्यादा है, सामाजिक तो एकदम नहीं है। इस नजरिए से देखें तो भारतेन्दुमंडल के लेखकों के यहां जो भी नवजागरण संबंधी विचार मिलते हैं वे लेखकों के व्यक्तिगत विचार हैं और उनका हिन्दीक्षेत्र की परिस्थितियों के साथ बहुत कम संबंध है।

इसी प्रसंग में निजभाषा की उन्नति और ‘स्वत्व’ या अस्मिता के सवाल को ही गंभीरता से लें और देखें कि निजभाषा को लेकर हिन्दीभाषी बुद्धिजीवी और समाज का रवैय्या क्या बंगाल के बुद्धिजीवी और समाज की तरह ही है? बंगाल,महाराष्ट्र और तमिलनाडु में जातीय भाषाई अस्मिता को लेकर जो सामाजिक संघर्ष चला है वैसा कोई भी आंदोलन हिन्दीभाषी क्षेत्र में न तो 19वीं सदी में चला और नहीं 20वीं सदी में चला। 20वीं सदी में हिन्दीभाषी क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग ने सचेत रूप से हिन्दी से अपने को अलगाया है और अंग्रेजी भाषा के साथ जोड़ा है। जबकि बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बंगाल में मध्यवर्ग ने सचेत रूप से बंगलाभाषा का सामाजिक आधार बनाया। इस तरह का आधार हिन्दीक्षेत्र में नहीं बन पाया। बंगाली मध्यवर्ग ने सचेत रूप से बंगाली भद्रजन की भाषा को आम जनता की भाषा में रूपान्तरित किया लेकिन हिन्दीक्षेत्र में अभिजन की भाषा को हम जनभाषा में रूपान्तरित नहीं कर पाए हैं। आज भी हिन्दीभाषी क्षेत्र में स्थानीय बोलियों का बोलबाला है। खड़ीबोली हिन्दी और उससे जुड़ी शिक्षित वर्ग की संस्कृति और सभ्यता को आमजन की संपदा में रूपान्तरित नहीं कर पाए हैं।

मसलन् दिल्ली से 60किलोमीटर दूर हरियाणा में हिन्दी की अभिजन संस्कृति का कोई असर दूर-दूर तक नजर नहीं आएगा, इसके विपरीत बंगाल में एक अभिजन जिस भाषा को बोलता है वही भाषा एक झोंपडपट्टी में रहने वाला गरीब बंगाली भी बोलता नजर आएगा।

आम अभिजन जिस तरह भाषा में गालियां अथवा असभ्य शब्दों के प्रयोग से नफरत करता है वैसी ही ऩफरत आपको आम गरीब बंगाली के यहां भी देखने को मिलेगी। लेकिन हिन्दी में ऐसा आज तक नहीं हो पाया है। भाषा में ‘स्वत्व’ हासिल करें इसके लिए जरूरी है कि अभिजन की भाषा को आमजन की भाषा में तब्दील किया जाय। अभिजन की भाषा के संस्कार, मूल्य और आदतें आमजन में पैदा किए जाएं। लेकिन हिन्दी में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। उसका सामाजिक वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। भाषायी अस्मिता की लडाई यहां के इलाकों में कभी लड़ी ही नहीं गयी। इसके कारण यहां के मध्यवर्ग में अंग्रेजी के प्रति स्वाभाविक आकर्षण नजर आता है। वह अपनी भाषा, उसके मूल्य, साहित्य आदि को लेकर वैसा दीवानापन नहीं है जैसा दीवानापन बंगाली या मराठी या तमिल में है।

यह कहना ज्यादा सही होगा कि हिन्दी में नवजागरण नहीं हुआ। नवजागरण हुआ होता तो बहस के मुद्दे कुछ और होते। मसलन् नवजागरण के साथ पूंजीवादी मूल्यों और आर्थिक विकास के सवाल इन इलाकों में बहस के केन्द्र में होते। बंगाली और मराठी बुद्धिजीवियों ने नवजागरण के दौरान पूंजीवादी विकास को लेकर जिस तरह की गंभीर बहसें चलायी हैं और अर्थव्यवस्था पर लिखा है वैसा लेखन 19वीं सदी में हिन्दी में दूर-दूर तक नजर नहीं आता। नवजागरण कोई साहित्य-कला मूल्य नहीं है, उसका अर्थशास्त्र और विज्ञान भी है। हिन्दी में कभी पूंजीवादी अर्थशास्त्र को खोलकर विश्लेषित करने की व्यापक कोशिश नजर नहीं आती। यही हाल विज्ञान के क्षेत्र में नजर आता है। इसके अलावा सबसे बड़ी कमी नजर आती है वह है शिक्षित भाषायी मध्यवर्ग का विकसित न हो पाना। हिन्दीभाषीक्षेत्र में शिक्षित मध्यवर्ग का विकास एकदम भिन्न ढ़ंग से होता है।

हिन्दी आलोचना के नवजागरण संबंधी विमर्श को गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि यहां पर आलोचक पहले एक हाइपोथीसिस बनाता है और फिर उसके आधार पर तर्कों का पहाड़ खड़ा करता है और अनुकूल विचारों और मूल्यों को क्रमशः रखता चला जाता है। वह यह परखने की कोशिश ही नहीं करता कि क्या उसके बताए विचार सामाजिक वास्तविकता से मेल खाते हैं ? इस तरह वह आलोचना को विचारों के अनुमान के आधार पर विकसित करने लगता है। इस क्रम में हम भूल ही गए हैं कि आलोचना कोई हाइपोथीसिस नहीं है। हाइपोथीसिस से बात आरंभ हो सकती है लेकिन अंततः तो सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर हाइपोथीसिस की परीक्षा की जानी चाहिए। भाषा के ‘स्वत्व’ का सवाल बड़ा सवाल है लेकिन देखना होगा कि इसकी वास्तव जमीन किस तरह की है। मजेदार बात यह है कि हिन्दी आलोचकों ने नवजागरण के समय के साहित्य के आधार पर भाषासंबंधी निष्कर्ष निकाले हैं लेकिन समाचारपत्र और पत्रिकाओं में छप रही हिन्दीभाषा को विचार के केन्द्र में नहीं रखा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि प्रेस (मीडिया) को एक संस्थान के रूप में कभी विश्लेषित करने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत यह देखा गया कि लोकप्रिय प्रेस को हिकारत की नजर से देखा गया। मुश्किल यह है कि लोकप्रिय प्रेस को खोले बगैर नवजागरण समझ में नहीं आएगा।

नवजागरण विमर्श मात्र साहित्यविमर्श नहीं है बल्कि उसमें मीडिया और दूरसंचार की भी बड़ी भूमिका है। हिन्दी आलोचक न तो शिक्षा की स्थिति का आकलन करता है और न पूंजीवाद का आकलन करता है, न प्रेस और दूरसंचार का आकलन करता है ऐसी स्थिति में वह बहुत कम सामग्री के साथ नवजागरण के प्रसंग में सिर्फ साहित्य के एक दायरे को खोलता है। यहां पर भी बाजारू साहित्य और श्रेष्ठ साहित्य का भेद साफ नजर आता है। श्रेष्ठ साहित्य में भी उसका दायरा भारतेन्दुमंडल के लेखकों तक ही सीमित है। वे भारतेन्दु के पहले के हिन्दीप्रेस में प्रकाशित साहित्य और गद्य पर बातें नहीं करते। ‘परीक्षागुरु’ उपन्यास पर बातें करते हैं लेकिन देवकीनंदन खत्री के उपन्यासों पर बात नहीं करते। कहने का अर्थ यह है कि लोकप्रिय उपन्यास, लोकप्रिय कम्युनिकेशन, लोकप्रिय प्रेस के बिना नवजागरण की प्रकृति समझ में नहीं आ सकती। नामवर सिंह के नवजागरण विमर्श में ये सब क्षेत्र कहीं पर भी उल्लेख योग्य स्थान नहीं पाते। सवाल यह है कि अस्मिता का निर्माण क्या पॉपुलर की उपेक्षा करके संभव है ?

कल्चर और पॉपुलरकल्चर के बिना नवजागरण की परतें नहीं खुल सकतीं। हिन्दी समीक्षक को कल्चर पसंद है, पॉपुलरकल्चर नहीं। साहित्य आज भी हिन्दी में कल्चर का हिस्सा है, पॉपुलरकल्चर का हिस्सा नहीं है। पॉपुलर कल्चर से आज भी हिन्दी समीक्षक दूरी बनाए हुए है और पॉपुलर कल्चर को हेय दृष्टि से देखता है। जबकि सच यह है कि वह दैनंदिन जिंदगी तो पॉपुलरकल्चर में जीता है। यह संस्कृति उसके दिलो-दिमाग पर गहरा असर डालती है। नवजागरण के लेखकों की अधिकतर आदतें पॉपुलरकल्चर से जुड़ी हैं और उन आदतों का उनके व्यक्तित्व से गहरा संबंध है। नामवर सिंह से सवाल किया जाना चाहिए क्या लेखक की आदतें उसके भाषा और साहित्य संबंधी संस्कार बनाती हैं या नहीं ? भारतेन्दुमंडल के लेखकों की आदतें पूंजीवादी थीं या सामंती ? या उनके व्यक्तित्व में उन दोनों का मिला-जुला रूप था? क्या इसका उनके साहित्य और समाज पर कोई असर था ?
       

नवजागरण बुर्जुआ खेल है। बुर्जुआ विचारों और मूल्यों के सृजन में इसकी केन्द्रीय भूमिका रही है। हिन्दी में जो आलोचक नवजागरण के दीवाने हैं और इसे परम पुण्य-साहित्य-सलिला के रूप में देखते हैं, उनके यहां नवजागरण परम सत्य है। हिन्दी आलोचकों में जिनलोगों ने नवजागरण पर विचार किया है उनमें मार्क्सवादी समीक्षकों की बड़ी भूमिका है। सवाल यह है कि नवजागरण की परंपरा बुर्जुआ साहित्य परंपरा है तो फिर उसमें समाजवादी या अन्य रेडीकल साहित्यलेखकों को रखने की कोशिश क्यों की जाती है? नवजागरण का प्रकल्प समाजवादी प्रकल्प नहीं है। वे लेखक जो समाजवाद की परंपरा में आते हैं उनको नवजागरण की परंपरा में रखना सही नहीं है। नवजागरण यदि बुर्जुआ प्रकल्प है तो भारतेन्दुमंडल के लेखकों का लेखन भी बुर्जुआलेखन की कोटि में आता है। भारतेन्दु उदार पूंजीवादी विचारों और मूल्यों के सर्जक के रूप में हिन्दी साहित्य में अवतरित होते हैं। फलतः भारतेन्दु की परंपरा में उन लेखकों को नहीं रखा जा सकता जिन लेखकों ने बुर्जुआ मूल्यों से भिन्न विकल्प का रास्ता चुना है। मसलन् भारतेन्दु की परंपरा में प्रेमचन्द, निराला, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि को नहीं रखा जा सकता।

इसी तरह हिन्दी आलोचना में रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना परंपरा बुर्जुआ आलोचना परंपरा है। उसमें रामविलास शर्मा और नामवर सिंह को नहीं रखा जा सकता। हमें बुर्जुआ आलोचना और मार्क्सवादी आलोचना परंपरा में अंतर करना होगा। पहली परंपरा और दूसरी परंपरा के नाम पर जो विभाजन किया गया है वह अवैज्ञानिक है। सवाल यह है कि परंपरा का नामकरण विचारधारा के आधार पर होना चाहिए या अवधारणा या प्रवृत्ति के आधार पर? आलोचकों से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या रामविलास शर्मा सच में रामचन्द्र शुक्ल की परंपरा में आते हैं? क्या नामवर सिंह को हजारीप्रसाद द्विवेदी की परंपरा में रख सकते हैं?

हिन्दी आलोचना में इकहरे ढ़ंग से सोचने की आदत है। भारतेन्दुयुग, महावीरप्रसाद द्विवेदी युग आदि के नामकरण के पीछे सब कुछ को एक ही परंपरा या एक ही नजरिए की श्रृंखला में पिरोकर देखने की आदत रही है। सच है कि हिन्दी में एक नहीं कई साहित्य परंपराएं हैं। एक नहीं अनेक दृष्टिकोण हैं। मसलन् भारतेन्दु की परंपरा में दलितसाहित्य या स्त्रीसाहित्य की परंपरा को नहीं रखा जा सकता। साथ ही ये दोनों परंपराएं नवजागरण के प्रति मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी आलोचकों के नजरिए से अपने को अलगाती हैं। इन दोनों साहित्य परंपराओं का सामाजिक आधार भी भारतेन्दुमंडल के लेखकों से भिन्न है।

हिन्दी आलोचना में नवजागरण की खोज और विमर्श में नवजागरण की खोज पर जितना जोर दिया गया उससे ज्यादा नवजागरण की परंपरा के साथ जुड़ने और नवजागरण के असली वारिस बनने पर जोर दिया गया। इसके कारण मार्क्सवादी आलोचना अपने को बुर्जुआ आलोचनादृष्टि से अलगाने की बजाय बुर्जुआजी के वैचारिक खेल में फंसकर रह गयी। आलोचना के बुर्जुआ खेल में फंसने के कारण मार्क्सवादी आलोचना अपना स्वतंत्र वैचारिक अवधारणात्मक आधार निर्मित नहीं कर पायी।

मार्क्सवादी आलोचना में बुर्जुआ खेल किस तरह चलता रहा है उसका आदर्श नमूना है नामवरसिंह का आलोचना लेखन। नामवरसिंह ने आलोचना में नवजागरण के बारे में अपने विचार ऐसे समय व्यक्त किए जब हिन्दी आलोचना में नवजागरण की चर्चा तकरीबन बंद हो गई थी। इस चर्चा को नए सिरे से उठाते हुए उन्होंने नवजागरण के प्रसंग में अस्मिता की अवधारणा पर जोर दिया, भारतेन्दु के प्रसंग में निजभाषा के सवाल को ‘स्वत्व’ और अस्मिता का सवाल बनाया। अस्मिता का सवाल बुर्जुआ विचारधारा का शीतयुद्धीय राजनीति का सबसे प्रिय सवाल है। अस्मिता के सवाल को उठाते हुए वे परंपरागत आलोचना के दायरे से बाहर नहीं निकल पाते। अस्मिता को राजनीतिक स्वाधीनता या स्वाधीनता से जोड़ते हैं।

उल्लेखनीय है अस्मिता का सवाल आज जिस रूप में उठ रहा है नवजागरण के दौरान उसी रूप में नहीं उठा था। नवजागरण के समय अस्मिता को सामाजिक पहचान के रूप में उठाया गया था। वहां व्यक्ति की निजता, स्वायत्तता और स्वतंत्रता को प्रमुखता नहीं मिल पायी थी। व्यक्ति की स्वायत्तता को नवजागरण के दौर में बहसतलब ही नहीं समझा गया। व्यक्ति की निजता और स्वायत्तता को परिवार के ढांचे के साथ बांधकर रखा गया था। इसी तरह भाषा की स्वायत्तता और विकास को समानता के नजरिए से नहीं देखा गया। निजभाषा के विकास की बातें अमूर्त रूप में ही सामने आती हैं। निजभाषा के विकास का कोई राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य उस समय स्पष्ट रुप में सामने नहीं था। अस्मिता की अवधारणा को व्याख्यायित करते हुए सबसे प्रमुख हिन्दी समीक्षकों ने अंतर्वस्तु समीक्षा को आधार बनाया है। साथ ही पूंजीवाद की प्रकृति की भी समीक्षा की है। इस क्रम में कई जगह तुलना से काम लिया है। तुलना करके इकसार अंतर्वस्तु को स्थापित करना और उसके आधार पर अवधारणा बनाना सही पैमाना नहीं कहा जा सकता। मसलन् इटली के रैनेसां के साथ आए बुद्धिवाद और भारत के बुद्धिवाद के बीच तुलना करना सही नहीं होगा। इसी तरह यूरोप के नवजागरण के साथ भारत की तुलना करना भी सही नहीं है। अवधारणा तय करते समय तुलना की अवधारणा का इस्तेमाल करना सही नहीं होगा। इसी प्रकार जातीयभाषाओं के बीच में तुलना के आधार पर निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं है। प्रत्येक भाषा के विकास की प्रक्रिया अलग है और उसकी समस्याएं भी एक जैसी नहीं हैं। भाषा की अस्मिता के आधार पर तुलनात्मकतौर पर अस्मिता को स्थिर करने का काम हिन्दी में ज्यादा हुआ है और उसमें जातीयता और जातीयभाषा की अवधारणा का इस्तेमाल तुलनात्मक तौर पर किया गया है।

जातीयभाषा को आधार बनाकर दिए गए तर्क अपने आपमें मुश्किलें खड़ी करते हैं। इसमें पहली मुश्किल है भाषा को परम तत्व मान लेने की। कोई भी भाषा परम नहीं है। निष्पन्न नहीं है। प्रत्येकभाषा की विकास परंपरा और सामाजिक आधार या बोलने वाली जनता के साथ उसका रिश्ता भिन्न रुप में निर्मित होता है। यह बोलने वाले की चेतना, सामाजिक संबंधों की स्थिति, कम्युनिकेशन के स्तर और कम्युनिकेशन संस्थानों की अवस्था आदि पर निर्भर होती है जो प्रत्येक समाज में एक जैसी नहीं होती। मसलन् तमिल और बंगला भाषा की तरह खड़ीबोली हिन्दी का विकास नहीं हुआ है। इनके बोलने वाले और संस्थान भिन्न रहे हैं फलतः तमिल या बंगला जातिभाषा की तरह खड़ीबोली हिन्दी के विकास को देखना सही नहीं होगा। उसी तरह यूरोप या सोवियत संघ की जातीयभाषा और जातीयता की अंतर्वस्तु के साथ जोड़कर देखना भी सही नहीं होगा। हमारे यहां सामाजिक समूहों की संरचना जातिप्रथा पर आधारित है और इसके कारण भाषा और उसका विकास भी प्रभावित हुआ है। यहां के जातिसमूहों को यूरोप के सामाजिक समूहों की तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता। भारत में शूद्रों को परिभाषित करते समय ब्राह्मणों को परिभाषित करना जरूरी है। सवर्ण के बिना असवर्ण की पहचान तय नहीं कर सकते। इसी तरह इन दोनों की शैक्षणिक स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा।

जिनलोगों की अभिव्यक्ति का माध्यम जनभाषा है वे लोग और जिनकी अभिव्यक्ति की भाषा स्टैंडर्ड या सत्ताधारियों की भाषा है, उनके बीच में भाषिक तुलनाएं करना सही नहीं होगा। यह एक सच्चाई है खड़ीबोली हिन्दी शिक्षितों की भाषा थी और व्यापारियों (खत्री व्यापारियों) के यहां इसका उपयोग होता था। इसके विपरीत मैथिली, अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा आदि की स्थिति एकदम भिन्न थी, ये जनभाषाएं थीं। इसी तरह हिन्दीक्षेत्र में अभिजन और आम आदमी के भाषिक संसाधन अलग-अलग थे। इसके कारण भाषा के स्तर पर सत्य को समझना और व्याख्यायित करने का रूप भिन्न था। एक ही सत्य को खड़ीबोली हिन्दी बोलने वाला जिस रूप में देख रहा था जरूरी नहीं है जनभाषा बोलने वाला व्यक्ति भी वैसे ही देखे ? क्योंकि सत्य के वाक्य-विन्यास की स्थितियां एक जैसी नहीं रहेंगी। यह भी संभव है जो सत्य खड़ीबोली हिन्दी लेखक को नजर आ रहा हो वह जनभाषी को नजर ही न आए।

दो भाषाओं में तुलना करते समय यदि सत्य को व्यक्त करने की भाषा एक जैसी है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उसकी ज्ञानमीमांसात्मक चेतना भी एक जैसी होगी। मसलन् स्त्री के आधुनिकरूप की बात भारतेन्दुमंडल के यहां भी है और बंगला लेखकों और विचारकों के यहां भी है लेकिन क्या सामाजिक स्तर एक जैसा है? आज भी बंगलाभाषी स्त्री और हिन्दीभाषी स्त्री का यथार्थ एक जैसा नहीं है। चेतना का स्तर एक जैसा नहीं है। 19वीं सदी के बंगाली बुद्धिजीवी और हिन्दी बुद्धिजीवी के विचार अनेक मामलों में मिलते हैं लेकिन सामाजिक धरातल पर, सत्य के धरातल पर विराट अंतराल है। बंगला बुद्धिजीवी के लिए सतीप्रथा एक समस्या है लेकिन हिन्दीप्रान्तों में यह समस्या नहीं है। इस समस्या को लेकर कोई सामाजिक हलचल नहीं है। यह संभव है दो जातीयभाषाओं में किसी विषय पर एक जैसे विचार व्यक्त किए गए हों लेकिन सामाजिकस्तर पर चेतना और सत्य को लेकर व्यापक अंतर हो। कुछ लोगों के लिए जातिसूचक नामों का प्रयोग करना जातिवाद प्रतीत हो सकता है लेकिन किसी अन्य जाति में यह भावना ही न हो। मसलन् हिन्दीभाषी क्षेत्र में जातिसूचक नाम के प्रयोग जातिभेद को व्यक्त करते हैं लेकिन बंगला में यह भेद नवजागरण के दौरान ही खत्म हो गया ।

अंतर्वस्तु समान होने से अवधारणा नहीं बनती। इसके समानान्तर अर्थ के आधार पर भी अर्थ सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। सवाल यह है कि नवजागरण के संदर्भ में जिन अवधारणाओं की बात की जाती रही है वे क्या सामाजिक यथार्थ से मेल खाती हैं ? हिन्दी में सामाजिक यथार्थ (शिक्षित-अशिक्षित दोनों का) के साथ अवधारणा का व्यापक अंतराल है। कोई भी अवधारणा वैज्ञानिक रूप में तब ही स्थापित होती है जब उसका सामाजिक ऑब्जेक्ट के साथ साम्य हो।

नवजागरण में विवेकवाद और बुद्धिवाद है लेकिन क्या वास्तव में हिन्दी के शिक्षितवर्ग की उस दौर की चेतना और व्यवहार के साथ ये तत्व मेल खाते हैं ? अवधारणा तब तक नहीं बनती जब तक विचार विशेष और ऑब्जेक्ट के बीच में साम्य स्थापित न हो जाय ।

अस्मिता में समत्व के विचार के आधार पर जब भी अस्मिता बनायी जाएगी उसमें समस्याएं रहेंगी। समत्व के आधार पर बनायी गयी अधिकांश धारणाएं ऑब्जेक्ट के साथ मेल नहीं खातीं। फलतः अवधारणा और ​यथार्थ में मेल नजर नहीं आता। सामाजिक चेतना और सामाजिक विकास के बीच में फांक नजर आती है। भाषा और उसके सामाजिक आधार के बीच में अंतराल नजर आता है। भाषा के बारे में सचेतनता जितनी बढती जाती है उसी अनुपात में वैचारिक समझ भी बढ़ती जाती है। हमारे अनुमान करने की क्षमता में भी इजाफा होता जाता है। साथ ही भाषा की ज्ञानमीमांसा और व्याख्या में भी बदलाव आता है। इसके अलावा भाषा की व्याख्या बार बार बदलती है। कल तक जिसे जातीयभाषा कहते थे जरूरी नही है वह आज जातीय भाषा के रूप में न जानी जाती हो। हिन्दी आज कॉमन कम्युनिकेशन की राष्ट्रीय –ग्लोबल भाषा है। मूल बात यह है कि भाषा में व्याख्या के स्तर पर फ्रैगमेंटेशन स्वाभाविक चीज है। भाषा में सम्मिश्रण स्वाभाविक चीज है। यदि अस्मिता की अवधारणा का सामाजिक यथार्थ से मेल नहीं हो पाता है तो वैसी स्थिति में अवधारणा के असफल हो जाने या अप्रासंगिक हो जाने का खतरा रहता है। हिन्दी में नवजागरण की अवधारणा की तकरीबन यही स्थिति है।

हिन्दी नवजागरण की सबसे बड़ी मुश्किल है कि हमने हिन्दीभाषी क्षेत्र के अन्य हिस्सों को विस्तार के साथ कभी खोलने की कोशिश ही नहीं की। नवजागरण हो तो इसके लिए जरूरी है कि उसके समूचे क्षेत्र को विस्तार से खोला जाय। हिन्दी नवजागरण तब ही संभव है जब हम हिन्दी अस्मिता को मानें और हिन्दी अस्मिता पूरी तरह निर्मित तब ही होती है जब हिन्दीक्षेत्र के बृहत्तर हिस्सों को खोला जाए। हिन्दी जाति और अन्यजातियों के बीच के संबंध को भी रेखांकित किया जाय। अस्मिता जहां एक ओर अपने को विवेचित करती है वहीं दूसरी ओर अन्य को जन्म भी देती है। अतः पहले हमें यह देखना चाहिए कि हिन्दीजाति अपना वर्णन कैसे करती है और किस तरह अन्य सामाजिक इकाइयों के प्रति रिएक्ट करती है।

अस्मिता विमर्श को जिन लोगों ने निर्मित या प्रचारित किया है उनकी अन्य अस्मिताओं के विमर्श में कोई खास दिलचस्पी नहीं देखी गयी। मसलन् भाषा की अस्मिता पर नामवर सिंह ने जोर दिया लेकिन स्त्री और दलित अस्मिता के सवाल उनके लिए हाशिए के सवाल भी नहीं रहे हैं। यही हाल रामविलास शर्मा का है। उनके लिए अस्मिता के रुप में हिन्दीजाति का सवाल प्रमुख है लेकिन उन्होंने कभी अन्य अस्मिताओं के सवालों पर विचार ही नहीं किया। रामविलास शर्मा ने समूचे लेखन से यह आभास मिलता है कि हिन्दीजाति का सवाल मार्क्सवादी चिंतन का हिस्सा है और स्त्री या दलित अस्मिता के सवाल उसका हिस्सा नहीं हैं। सच यह है कि अस्मिता विमर्श अंततः परंपरागत मार्क्सवादी पैराडाइम का अंग नहीं है। यह कम्युनिस्ट पार्टियों के विमर्श का हिस्सा भी नहीं है। अस्मिता के रुप में हिन्दीभाषा को आधार बनाकर आज हम जब बहस करते हैं और 19वीं सदी को याद करते हैं और उसकी स्मृतियों में डूबकर गोते लगाते हैं तो यह भूल ही जाते हैं कि हिन्दीभाषी जनता में अस्मिता के रूप में भाषा को आधार बनाएंगे तो इसमें अनेक उलझनों में फंस सकते हैं। मसलन् जो खड़ीबोली हिन्दी को अपनी अस्मिता मान रहे हैं उनकी भाषायी अस्मिता किसी अन्य भाषा से जुड़ी हो सकती है। हिन्दीभाषी क्षेत्र में एक व्यापक मध्यवर्ग पैदा हुआ है वो अपनी भाषायी अस्मिता को हिन्दी से नहीं अंग्रेजी से जोड़ता है। अन्य ऐसे भी लोग हैं जो अन्य भाषायी अस्मिताओं से अपने को जोड़ते हैं।

अस्मिता पर बात करते समय एक ही अस्मिता को एक समय में निर्धारक बनाया जा सकता है। अन्य अस्मिताएं गौण हो जाती हैं।लेकिन समय और परिस्थितियां बदलने के साथ अस्मिता भी बदलती है। यह संभव है जो अस्मिता पहले गौण नजर आ रही हो वह आज सक्रिय और प्रधान अस्मिता बन जाए। हिन्दीजाति की बहस में असल समस्या यह है कि हिन्दीजाति अमूर्त नजर आती है। हिन्दीजाति की अमूर्तता का प्रधान रूप तब सामने आता है जब हिन्दीजाति की अन्य जातियों के साथ तुलना की जाती है। जब आप एक जाति के साथ दूसरी जाति की तुलना करते हैं तो अमूर्त अस्मिता बनाते हैं। लक्षणों के आधार पर साम्य स्थापित जब भी करेंगे तो अमूर्तता पैदा होगी। मसलन्, रामलाल की रामलाल वर्मा के साथ तुलना करके एक जैसा अर्थ व्यंजित करने या एक जैसा अर्थ खोजने की जब भी कोशिश की जाएगी अस्मिता अमूर्त शक्ल ग्रहण कर लेगी। एक प्रोफेसर की दूसरे प्रोफेसर के साथ पद के आधार पर तुलना की जाएगी तो अमूर्त अस्मिता जन्म लेगी। इसी तरह एक भाषा की दूसरी भाषा के साथ एक जाति की दूसरी जाति के साथ लक्षणों के आधार पर तुलना मुश्किलें खड़ी करती है और इससे अमूर्त अस्मिता का जन्म होता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि भाषा के आधार पर जब भी अस्मिता बनेगी वह अमूर्त ही होगी। अमूर्त अस्मिता का खतरा अन्य अस्मिता-रूपों के साथ भी हो सकता है। मसलन् ज्योंही हिन्दीभाषी औरत और बंगाली औरत की तुलना करते हुए लक्षण साम्य खोजने की कोशिश की जाएगी तो अमूर्तन पैदा होगा।

नामवरसिंह ने ‘स्वत्व’ के बहाने जिस अस्मिता की बात की है उसे वे मानवाधिकारों से जोड़कर नहीं देखते। भाषायी अस्मिता का सवाल हो या निजी या सामाजिक अस्मिता के सवाल हों-- ये सभी सवाल मानवाधिकार के दायरे में आते हैं। सवाल यह है कि नामवरसिंह मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में रखकर क्यों नहीं सोचते ? वे जानते हैं कि अस्मिता को मानवाधिकार के दायरे में रखकर देखा जाना चाहिए। लेकिन वे मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं सोचते फलतः वे जिस अस्मिता की बात करते हैं उसकी राजनीति और विचारधारा दोनों के अतर्विरोधों को छिपाते हैं। अस्मिता का सवाल मानवाधिकार का सवाल है। यह महज साहित्य-प्रपंच नहीं है। भारतेन्दु के दौर में मानवाधिकार की समझ नहीं थी लेकिन आज तो है। भारतेन्दु नहीं जानते थे, लेकिन नामवर सिंह जानते हैं। आलोचना में मानवाधिकारों की प्रतिष्ठा के बिना आलोचना का लोकतांत्रिकीकरण संभव नहीं है। आलोचना की आंतरिक प्रक्रिया पारदर्शी नहीं बनती।

नामवर सिंह को आलोचना में फतवे देने में मजा आता है। आलोचना में फतवेबाजी वस्तुतः आलोचना का अंत है। आलोचना में सरलीकरण करना भी आलोचना का अंत है। दुर्भाग्य से नामवर सिंह ने अपने नवजागरण लेखन में यही किया है। वे फतवे देते हैं। निष्कर्ष देते हैं। वे कभी किसी मुद्दे को गंभीरता के साथ विश्लेषित नहीं करते। ‘स्वत्व’ को यदि वे अस्मिता से जोड़ते हैं तो यह भी देखें कि क्या खड़ीबोली हिन्दी का हिन्दीभाषी क्षेत्र की बोलियों और भाषाओं के साथ भाईचारा और आंतरिकता बढ़ी है या घटी है? क्योंकि अस्मिता की राजनीति भावनात्मक बंधनों को मजबूत करती है। लेकिन विगत 65सालों का अनुभव बताता है कि हिन्दीभाषी क्षेत्र की भाषाओं और बोलियों के साथ खड़ीबोली की दूरी बढ़ी है। हिन्दीभाषी क्षेत्र में खड़ीबोली के अलावा अन्य भाषाओं और बोलियों के पठन-पाठन और प्रकाशन में ह्रास आया है। खासकर अकादमिक स्तर पर यह खाई व्यापक रूप में नजर आती है। यह अचानक नहीं है कि नामवरसिंह ने हिन्दी भाषीक्षेत्र की खड़ीबोली से इतरभाषाओं और बोलियों के साहित्य पर कुछ भी नहीं लिखा।

अस्मिता की पहचान हमेशा अपने सामाजिक समूह से भावनात्मक तौर पर जुड़ी रहती है। उसके दमित, वंचित सामाजिक समूहों को अभिव्यक्ति देती है। हिन्दी में यह देखना मजेदार होगा कि किसानों और मजदूरों पर कितना कथासाहित्य या काव्य लिखा गया? ये वे वर्ग हैं जो बृहत्तर सामाजिक समुदाय और भाषाओं के दायरे को समेटते हैं। हिन्दी का अधिकांश साहित्य मध्यवर्गकेन्द्रित रहा है। यह वर्ग हिन्दी का बड़ा भोक्ता भी है। यहां तक कि दलितों और स्त्रियों का भी अधिकांश लेखन मध्यवर्ग केन्द्रित है। इस वर्ग के चित्रण में एक खास फिनोमिना नजर आता है कि वहां पर बार बार यह दरशाने की कोशिश की जा रही है मध्यवर्ग बदल रहा है, वह पहले जैसा था अब वैसा नहीं है। यानी मध्यवर्ग के रूपान्तरित रूपों की चर्चा खूब हो रही है। यह भी चर्चा खूब हो रही है कि एक अस्मिता का दूसरी अस्मिता किस तरह शोषण कर रही है। किस तरह का सांस्कृतिक वर्चस्व एक-दूसरे पर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। दलित और स्त्रीसाहित्य के संदर्भ में खूब लिखा जा रहा है। इस क्रम में अस्मिता पर हो रहे हिंसाचार, शारीरिक शोषण, उत्पीडन, अलगाव, शक्तिहीनता आदि के सवालों पर जमकर बहस हो रही है। यह भी कहा जा रहा है कि अस्मिता के सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं जिससे संबंधित अस्मिता की चेतना को ऊँचा उठाया जाय, उसे अभिव्यक्ति मिले।

नामवरसिंह के ‘स्वत्व’मॉडल की एक अन्य मुश्किल यह है कि उसमें लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं है। वे स्वाधीनता के भावबोध के अभाव की भारतेन्दुयुग में चर्चा करते हैं। लेकिन लोकतंत्र की नहीं। लोकतंत्र के बिना अस्मिता नहीं बनती और स्वाधीनता की भावना भी पैदा नहीं होती। अस्मिता और लोकतंत्र अन्योन्याश्रित हैं। लोकतंत्र जितना समृद्ध होगा अस्मिताचेतना भी उतनी ही समृद्ध होती जाएगी। लोकतंत्र का जिन क्षेत्रों में विस्तार होगा उन क्षेत्रों में अस्मिता के सवाल तेजी से सामने आएंगे। लोकतांत्रिकचेतना के कारण अस्मिताचेतना और अस्मिता की राजनीति का विकास होता है। लोकतंत्र के विकास के कारण साझा भावबोध की धारणा फैलती है। शिरकत की भावना का विकास होता है। अस्मिता के प्रसार के लिए ये दोनों चीजें बेहद जरूरी हैं। अस्मिता के विकास के कारण विभिन्न जातियों, समुदायों, हाशिए के समूहों के आत्मनिर्भर होकर विकास करने की संभावनाओं के द्वार खुलते हैं। अस्मिता के आधार पर जब देखना आरंभ करते हैं तो साहित्य के आधार के रूप में मनुष्य पदबंध अपदस्थ हो जाता है। पहले मनुष्य के रूप में देखते थे।

भारतेन्दुयुग में मनुष्य की प्रतिष्ठा हुई है, अस्मिता की नहीं। अस्मिता की धारणा कालांतर में जन्म लेती है और बहस के केन्द्र में आती है। पहले ‘मनुष्य’ की मांगें थीं अब अस्मिता के आधार पर मांगे पेश की जा रही हैं। पहले सार्वभौम मनुष्य के आधार पर सोचने और चित्रित करने का रिवाज था नया अस्मितायुग लिंग, जाति, धर्म, भाषा, सम्प्रदाय, नस्ल, जातीयता आदि अस्मिता रूपों के आधार पर चित्रण और मांगें पेश कर रहा है। भारतेन्दुयुग में खड़ीबोली हिन्दी के विकास के साथ भाषा के ‘स्वत्व’ की बात उठी जरूर है लेकिन वे ‘स्वत्व’ को मनुष्य के पैराडाइम पर रखकर देखते हैं, अस्मिता के पैराडाइम पर रखकर नहीं देखते ।


















युवाओं का नरक और मोदी का कौशल



   हाल ही में 11शहरों के स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले दस हज़ार युवाओं में बंगलौर स्थित " चिल्ड्रन्स मूवमेंट्स फ़ॉर सिविल एवेयरनेस " नामक संस्था ने एक सर्वे किया जिसमें यह तथ्य सामने आया है कि आधे से ज्यादा युवा यह मानते हैं कि लोकतंत्र की तुलना में फौजीशासन अच्छा होता है, पैंसठ फ़ीसदी युवा मानते हैं कि विभिन्न धर्मों के लड़के- लड़कियों में मिश्रण नहीं होना चाहिए। आधे से ज्यादा युवा यह मानते हैं कि लड़कियां उत्तेजक कपड़ों के जरिए पुरुषों को उत्तेजित करती हैं। आधे से ज्यादा युवा मानते हैं औरतों के पास हिंसा स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। सर्वे में आधे से ज्यादा युवाओं की राय है कि देश को तानाशाह नेता की ज़रुरत है । 
          यह सर्वे इस बात का प्रतीक है कि हमारे देश में लोकतंत्र की चेतना कितनी कमज़ोर है और लोकतांत्रिक भावबोध और लोकतांत्रिक मूल्यों से रहित किस तरह का युवावर्ग हमारे समाज में निर्मित हो रहा है। ये वे युवा हैं जो शिक्षित हैं और जिन तक लोकतंत्र के फ़ायदे पहुँचे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि हमारी आधुनिक शिक्षा और मीडिया की समस्त प्रस्तुतियाँ किस तरह का अ-लोकतांत्रिक युवा पैदा कर रही हैं। इससे यह भी पता चलता है कि जो संगठन  युवाओं में अ-राजनीति की राजनीति कर रहे हैं वे किस तरह सफल हो रहे हैं और जो संगठन छात्रों और युवाओं में लोकतांत्रिक और परिवर्तनकामी राजनीति करते रहे हैं वे किस तरह असफल हैं। 
               लोकतंत्र के आचरण, आदर्श और नेतागण युवावर्ग में लोकतांत्रिक आस्थाएँ पैदा करने में एकदम असफल रहे हैं। ये वे युवा हैं जो लोकतंत्र,फौजीशासन और तानाशाही को आलोचनात्मक ढंग से नहीं जानते। इनके लिए लोकतंत्र का मतलब वोट डालना मात्र है। लोकतंत्र महज़ वोट नहीं है । यह जीवन मूल्य और आचरण भी है। दुर्भाग्य की बात है कि हमारे अधिकतर नेताओं, सांसदों, विधायकों का आचरण लोकतंत्र के अनुरूप नहीं दिखता , आचरण में वे अ-लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुसरण करते हैँ। लोकतंत्र के सुफल लेने और बदले में अलोकतांत्रिक आचरण करने के कारण ही युवाओं में लोकतंत्र के प्रति संशय और संदेह का भाव है। हमारे लोकतांत्रिक प्रतिनिधियों ने यदि लोकतांत्रिक आचरण करके मिसाल क़ायम की होती तो युवाओं में लोकतंत्र के प्रति क्रेज़ होता, नेताओं और राजनीतिक दलों के अ-लोकतांत्रिक आचरण के साथ -साथ युवाओं को मीडिया और विज्ञापन जगत के अ-लोकतांत्रिक व्यवहार और संरचनाओं ने प्रभावित किया है। 
     मीडिया और विज्ञापन जगत के सर्जनात्मक लोग अपने भावों-विचारों और माल की अभिव्यक्ति के लिए जमकर लोकतंत्रविरोधी रणनीतियों का संप्रेषण के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं इससे युवाओं में लोकतंत्र विरोधी भावबोध का तेज़ी से प्रचार प्रसार हुआ है। 
     युवाओं में अलोकतांत्रिक भावबोध पैदा करने के दो बडे संस्थान हैं पहला है परिवार और दूसरी है हमारी शिक्षा व्यवस्था। देश आजाद हुआ, समाज इक्कीसवीं सदी में गया, लेकिन परिवार का समूचा तानाबाना अभी तक अ-लोकतांत्रिक और पुंसवादी बना हुआ है , युवाओं के लोकतंत्र विरोधी संस्कारों को सबसे बड़ी खुराक यहीं से मिलती है। यही युवा जब स्कूल-  कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाता है तो वहाँ पर भी शिक्षकों और पाठ्यक्रमों के जिस तंत्र से दो-चार होता है , वह भी उसके अंदर लोकतांत्रिक विवेक पैदा नहीं करता। हमारे अधिकांश शिक्षक कक्षा से लेकर आम जीवन तक अ-लोकतांत्रिक आचरण करते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनमें कोई निश्चित विवेक और नजरिया देखने को नहीं मिलता। सबसे सफल शिक्षक वह माना जाता है जो ख़ूब पैसा कमाता हो, नौकरी दिलाने में सफल हो, हर क़िस्म के छल-छद्म में उस्ताद हो,प्रयोजनमूलक कामों में युवाओं की प्रयोजनमूलक मदद करे। ज्ञानी, खोजी,आलोचनात्मक विवेक पैदा करने वाले शिक्षक को आजकल के युवा असफल शिक्षक मानते हैं, इस तरह के शिक्षक से वे दूर रहते हैं, इस तरह के शिक्षक की उनके मन पर कोई चीज असर नहीं करती। क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने शिक्षा का मतलब नौकरी तय कर दिया है। बढ़िया शिक्षक वह जो नौकरी दिलाने के प्रयोजनमूलक गुर सिखाए, नौकरी दिलाए। 
                 युवाओं में लोकतंत्रविरोधी भावबोध पैदा हो इसके लिए जरुरी है कि सबसे पहले परिवार को लोकतांत्रिक बनाओ। परिवार के सदस्यों में समानता पैदा की जाय। परिवार के प्रत्येक सदस्य की बातें ध्यान से और विश्वास के साथ सुनी और मानी जाय। संदेह और निगरानी की बजाय शिरकत और ज़िम्मेदारी का भावबोध पैदा किया जाय, परिवार को मौजूदा युग के अनुकूल रुपान्तरित किया जाय।
      इसी तरह शिक्षा को स्किल डवलपमेंट की बजाय ज्ञान ,आलोचनात्मक विवेक और खोज के प्रति उन्मुख किया जाय। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्किल डवलपमेंट का नारा वस्तुत: ज्ञानविरोधी और खोजविरोधी नारा है। यह कामकाजी कौशल सिखाने वाला नारा है। कामकाजी कौशल से युक्त व्यक्ति यदि ज्ञानशून्य है तो उसके एक अच्छे ग़ुलाम में तब्दील होने की संभावनाएँ होती हैं। मोदी सरकार चाहती है हमारा देश सारी दुनिया को ज्ञानी नहीं ग़ुलामी के कौशल से युक्त लोग ग़ुलाम सप्लाई करे। ऐसे लोग बनाएँ जो कामकाजी कौशल में सक्षम हों लेकिन अनालोचनात्मक विवेक से लैस हों। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ पर मोदी नए युवाओं को अपील कर रहा है और तदनुरूप अ-लोकतांत्रिक आचरण करके भी " मोदी मोदी" के जयकारे लगवा रहा है। 

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

जयपुर-बड़ौदा के साहित्य- कला उत्सव और वामलेखक संगठनों की चुनौतियाँ



   जयपुर साहित्य मेला आरंभ हो गया है और बड़ौदा का कला - संगीत उत्सव आरंभ होने वाला है। इन दोनों आयोजनों से भाजपा की राज्य सरकारें जुड़ी हैं। भारत के वामलेखकों को इस तरह के आयोजनों को ध्यान से देखना और सीखना चाहिए । वामलेखकों के संगठनों जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और अन्य सांस्कृतिक संगठनों को भी इस तरह के आयोजनों के बारे में गंभीरता से लेखकों में संवाद चलाने की ज़रुरत है। इस तरह के आयोजन स्वागतयोग्य हैं। इस तरह के आयोजन जहाँ एक ओर साहित्य और कलाओं को लोकप्रिय बनाते हैं , वहीं मध्यवर्गीय युवाओं में साहित्य और कलाओं के प्रति नयी उमंग और कला संस्कार पैदा करने में मदद करते हैं। हमारे वाम लेखक संगठनों के आयोजन बंद दायरों में कैद होकर रह गए हैं और वे युवाओं के बृहत्तर तबक़ों और मीडिया को आकर्षित नहीं कर पाते हैं। वे गिनतीभर लोगों के आयोजनमात्र होकर रह गए हैं। 
       नए दौर की माँग है कि साहित्य और कलाओं को आम जनता के बृहत्तर मध्यवर्गीय युवा समूहों से जोड़ा जाय। साहित्य और कलाओं को सैलीब्रिटी बनाकर यह काम किया जा रहा है। इसमें साहित्य और कला के संस्कार या आदतों के निर्माण पर मुख्य रुप से ज़ोर दिया जा रहा है। हमारे वाम लेखक संगठनों के साहित्यिक आयोजनों को विचारधारात्मक मूल्याँकन  या वैचारिक मुठभेड़ के मंच के रुप में विकसित किया और इसका यह परिणाम निकला है कि साहित्य का दायरा सिकुड़कर चंद लेखकों तक सीमित होकर रह गया है। वामलेखक संगठनों की दूसरी मुश्किल यह रही है कि वे वाम राजनीति के पूरक के तौर पर काम करते रहे हैं इसने साहित्य के दायरे का विस्तार नहीं किया। बल्कि उलटे साहित्य और साहित्यकार तयशुदा समूहों में सीमित होकर रह गया , फलत:  हिन्दी की साहित्यिक किताबों का सर्कुलेशन गिरा और पाठकों की संख्या कम हुई। जयपुर साहित्य मेला में निरंतर पाठकों और श्रोताओं की संख्या बढ रही है, साहित्य की बिक्री भी बढ रही है। हम सोचें कि इस तरह का रेस्पांस किसी भी वाम लेखक संगठन के साहित्य सम्मेलन को क्यों नही मिला ? 
                   जयपुर-बड़ौदा जैसे उत्सवों का लक्ष्य है कलात्मक कम्युनिकेशन के जरिए कलाओं के आस्वाद और संस्कार पैदा करना। यह काम वे विशुद्ध रुप से पापुलर कल्चर प्रमोशन के फ़्रेमवर्क में कर रहे हैं। पापुलर कल्चर प्रमोशन का फ़्रेमवर्क मूलत: दर्शक को विभिन्न रणनीतियों , विज्ञापन,व्यापक प्रचार और मीडिया कवरेज के जरिए आकर्षित करता है। यह नायकों का संगम है,इसका लक्ष्य है मित्रभाव से कलात्मक इच्छाओं को जगाना। इस तरह के आयोजनों में प्रिफार्मेंस पर ज़ोर है। जो लेखक प्रिफार्म कर रहा है , वह चमक रहा है , जो चमक रहा है वह मीडिया में दिख रहा है,साहित्यकार और कलाकार इस तरह के आयोजनों में अपने बयानों और प्रस्तुतियों के जरिए कम्युनिकेट करते हैं और दर्शक के भावबोध को विभिन्न तरीक़ों से स्पर्श करने की कोशिश करते हैं। इससे कला, कलाकार और पाठकों के बीच टूटे संबंध और संपर्क को जोड़ने में मदद मिलती है। कलाएँ अनजान पाठकों से जुड़ती हैं। यह साहित्य और कलाओं के लोकतांत्रिकीकरण की प्रक्रिया भी है। इस तरह के आयोजनों में कारपोरेट घरानों का जुड़ना अच्छी बात है। इससे कला और साहित्य के व्यापक प्रसार में मदद मिलती है। इस तरह के आयोजन इवेंट की तरह होते हैं और सेंट की ख़ुशबू की तरह तब तक बातें होती हैं जब तक इवेंट चलता है इवेंट ख़त्म विचार का असर ख़त्म । लेकिन संस्कार रह जाता है। पाठक में आशाएँ रह जाती हैं। इसलिए इस तरह के कार्यक्रम ,मेले का रुप लेते जा रहे हैं। जिस तरह मेले मे लोग बिना बुलाए बड़ी संख्या आते हैं, वही रेस्पांस इस तरह के आयोजनों को मिल रहा है। 
              

बुधवार, 21 जनवरी 2015

टीवी डिबेट:लोकतंत्र में टीवी संपन्न और सूचना विपन्न



राजनीति के लिए टीवी युग कलियुग है। जो टीवी में गया वह वहीं का होकर रह गया। टीवी में दाखिल होना जितना मुश्किल है उससे जान बचाकर निकलना उससे भी ज्यादा मुश्किल है। सामान्य दर्शक ,टीवी ज्ञान का भूखा होता है। यह वह दर्शक है जो ज्ञान और सूचना से वंचित है और टीवी के जरिए अपने दिमाग़ के स्तर को "ऊँचा "उठाना चाहता है। समाचार टीवी चैनल यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे सूचना संपन्न बनाते हैं ,टीवी दर्शक सूचना संपन्न नागरिक है, वे सच के रखवाले हैं! 
    भारत में टीवी ने लोकतंत्र को ताक़तवर बनाया है लेकिन लोकतांत्रिक मनुष्य को न्यूज़ कंगाल बनाया है। टीवी के टॉकशो हों या धर्म शो हों या इवेंट शो हों वे मन को संतोष देने का , तुरंता प्रचार का काम करते हैं। टीवी शो वस्तुत: "सेल-सेल"की रणनीति की साझा परिणति है। आमतौर पर नेतागण टीवी का इमेज निर्माण के लिए इस्तेमाल करते हैं लेकिन टीवी टॉकशो इमेज नहीं बनाते बल्कि इमेज बिगाड़ते हैं, यही वजह है टीवी टॉकशो में दलीय प्रतिनिधि के तौर पर वे नेता या प्रवक्ता बैठे रहते हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है, मसलन् जिनकी संगठन में फ़ोटो से ज्यादा हैसियत नहीं है। ये लोग बुनियादी तौर पर दलीय डमी नेता हैं। जो पिटते और पीटते हैं। लेकिन इनकी वास्तविक हैसियत " सेल- सेल" के बैनर से जैसी होती है।  टीवी बहसों में आमतौर पर रीयल दलीयनेता ग़ायब रहता है। क्योंकि वह रीयल है और वह यदि टॉक शो में पिट गया तो बस जनता के हाथों उसके धुने जाने का भी चांस है।
              कल से टीवी पर बहस हो रही है केजरीवाल और किरनबेदी एक ही मंच पर आएँ बहस करें, कांग्रेस के अजय माकन भी साथ में आने को तैयार हैं। क्या इस तरह की बहस लोकतंत्र के लिए शुभ होगी ?रेटिंग और राजनीतिक गर्मी पैदा करने के लिहाज़ से ऐसी बहस उपयोगी होती है। इसकी मुश्किल यही है कि इसमें वक़्ता का अहंकार बहुत जल्दी नष्ट होता है। इस तरह का कम्युनिकेशन  अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित मध्यवर्ग को जल्दी अपील करता है। दुविधाग्रस्त और तटस्थ शिक्षित मतदाताओं को इस तरह की बहस तेज़ी से नेता विशेष के प्रति आकृष्ट करने में सफल रहती है। 
      दिलचस्प बात यह है कि टीवी पर बहस हो रही है लेकिन रीयल मसलों पर नहीं । रीयल मसलों पर बहस करने में न तो टीवीएंकर की और न नेताओं की दिलचस्पी है। बहस में गैर- जरुरी सवाल वर्चस्व बनाए हुए हैं। मसलन् ,भाजपा में बग़ावत, किरनबेदी को क्यों लाया गया, केजरीवाल ने बनिया क्यों कहा?,इसे टिकट मिला और उसका टिकट कटा, इस नेता ने दल बदला, वह नेता छोड़कर गया, इसका रोड शो या उसका रोड शो। यह सच है कि इस तरह की ख़बरों का समाचार मूल्य है लेकिन चुनाव के असली मुद्दों पर भी तो  बातें हों ! 
     मसलन् , दिल्ली में विगत एक साल में क़ानून - व्यवस्था के हालात क्या थे ? , कितने कारख़ाने खुले या बंद हुए ? कितने नए रोज़गारों का जन्म हुआ ? बिजली उत्पादन और सप्लाई में सुधार आया कि गिरावट आई ?दिल्ली के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कितनी नई नियुक्तियाँ हुईं और दाख़िले में कितनी नई सीटें बढी ? दिल्ली में सड़कों की दशा क्या है और कितनी नई सड़कें बनीं ? नए स्वास्थ्य केन्द्र, स्कूल, कॉलेज कितने खुले ? प्रत्येक क्षेत्र के विधायक के विधायक फंड  की क्या स्थिति है ? कहाँ और किन क्षेत्रों में विधायक निधि से धन खर्च किया गया ?महंगाई की अवस्था क्या ? दिल्ली पुलिस में नई भर्तियाँ कितनी हुईं ? दिल्ली के पर्यावरण में गिरावट आई या सुधार हुआ ? बिजली और पानी का बिल तो बहस में है लेकिन विगत एक साल की तथ्यपूर्ण सूचनाएँ और आंकडे कहाँ हैं? उन पर बहस होनी चाहिए। दिल्ली की अदालतों की दशा पर बहस हो, उनके इंफ़्रास्ट्रक्चर की समस्याओं पर बहस हो तब ही दिल्ली का असली चेहरा सामने आएगा। 
           दिल्ली राजधानी है और सारे बडे चैनलों का गढ़ है लेकिन दिल्ली की जनता सबसे ज्यादा सूचना विपन्न है। यह स्थिति कैसे बदले इस दिशा में कौन से कदम जरुरी हैं ? क्या मीडिया घरानों की पेडन्यूज और राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर कोई नीति  है? 
      हम दिल्ली में रहते हैं , नेताओं और मीडिया से घिरे रहते हैं, सचेतनता के विभ्रम में रहते हैं लेकिन न्यूनतम सत्य भी नहीं जानते ऐसे मे हम सोचें हम सूचना विपन्न क्यों हैं ? सूचना विपन्नता टीवी सम्पन्नता से दूर नहीं होगी, सूचना संपन्न हम तब बनेंगे जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता बनाएँगे। परंपरागत कम्युनिकेशन बंद करके हम कभी भी सूचना संपन्न नहीं बन सकते। हम सोचें कि कैसे बिना विज्ञापन के आम लोग लाखों की संख्या में किसी तिथि विशेष पर गंगा स्नान करने चले जाते हैं? करोड़ों लोग कुंभ में चले जाते हैं! लेकिन मतदान केन्द्रों तक हम इतने व्यापक प्रचार के बावजूद कुंभ मेले जैसी लामबंदी नहीं कर पाते ! 
कहने का आशय यह है कि परंपरागत कम्युनिकेशन जितना ज्यादा होगा लोकतंत्र उतना ही सूचना संपन्न होगा। अमेरिका में देखें वहाँ मीडिया कम्युनिकेशन ख़ूब है, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टीवी बहसें करते हैं लेकिन आम जनता में आधी आबादी वोट डालने तक नहीं जाती । आमलोगों को विभिन्न मसलों पर कोई जानकारी नहीं होती। समग्रता मे देखें तो पाएँगे कि मीडिया कम्युनिकेशन तब ही प्रभावशाली होता है जब परंपरागत कम्युनिकेशन पुख़्ता हो। परंपरागत कम्युनिकेशन के अभाव में मीडिया कम्युनिकेशन प्रभावहीन होता है।