रविवार, 24 मई 2015

अफसरसाहित्यकार के प्रतिवाद में


आजकल अफसरलेखक को हिन्दी साहित्यवाले सम्मान देते हैं। अफसरलेखक की भूमिका को वे गंभीरता से विश्लेषित नहीं करते,जन सरोकारों के संदर्भ में उसकी भूमिका को खोलकर नहीं देखते। इसने साहित्य के जन सरोकारों को प्रदूषित किया है, संघर्षशील कतारों को कमजोर किया है। 
एक जमाना था हिन्दी में जन सरोकारों से जुड़े साहित्यकार महत्वपूर्ण माने गए, बाद में ऐसा दौर आया कि अफसरसाहित्यकार ही साहित्य के सितारे बन गए। अशोक बाजपेयी को इस परंपरा को स्थापित करने का श्रेय जाता है।
आज साहित्यकारों में अफसरसाहित्यकारों के इर्दगिर्द जमघट लगा रहता है, ये अफसरसाहित्यकार साहित्य को कुछ नहीं दे पाए हैं,हां, एक काम जरुर हुआ है कि साहित्य में अफसरों की आदतें आ गयी हैं।
साहित्यकारों में वे सारी तिकड़में आ गयी हैं जो अफसर में होती हैं,तिकड़मी और ऊपर के कनेक्शनवाला मजेदार साहित्यकार पैदा हुआ है जो साहित्य में मजे ले रहा है और साहित्य को मजमे की तरह इस्तेमाल करके विनिमय कर रहा है।
अफसरसाहित्यकारों के पास एक अच्छी खासी जमात सरकारी तंत्र और राजनेताओं की है इसने साहित्य को सत्ता के तंत्र का पुर्जा बनाकर रख दिया है।
सवाल यह है कि साहित्यकार की भूमिका को समग्रता में देखें या अंश में देखें ? कहां से देखें ? साहित्यकार को समग्रता में देखना सही होगा इससे साहित्य में आए अफसरों और प्रशासनिक अधिकारियों ,कुलपति,कुलाधिपति आदि की बीमारियों से साहित्य को बचाने में मदद मिलेगी।
एक जमाना था लेखक हुआ करता था, बाद में कार्यकर्ता -लेखक आया, लेकिन इसके बाद अफसरलेखक ने साहित्य के क्षितिज को अपने कब्जे में ले लिया है। अफसरलेखक आज महान लेखक है! यह वह व्यक्ति है जिसके सामाजिक सरोकार सत्ता से अभिन्न रुप से जुड़े हैं और यह अपनी संगत,शोहरत,संपर्क आदि के जरिए साहित्य जगत को प्रभावित कर रहा है। इसे साहित्य में करप्शन का गोमुख भी कह सकते हैं। साहित्य की प्रतिवादी भूमिका,नागरिक की प्रतिवादी भूमिका आदि को विकृत करने में अफसरसाहित्यकार की विगत 40सालों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

शनिवार, 23 मई 2015

मूल्यहीन मोदी की बम बम बम


       प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन को एक साल हो गया।इस एक साल में मोदी की बहुत सारी खूबियां और खामियां सामने आई हैं। मोदी की सबसे बड़ी खामी यह है कि उसने कारपोरेट मीडिया में स्व-सेंसरशिप लागू कराकर अभिव्यक्ति के दायरे को ही सीमित कर दिया है। कायदे से प्रधानमंत्री बनने के बाद मीडिया कवरेज में कमी आनी चाहिए।
    कवरेज तब अच्छा लगता है जब पीएम या उनके मंत्री कोई नया काम कर रहे हों, नीतियां लागू कर रहे हों, खबर बना रहे हों। लेकिन अफसोस की बात यह है कि मोदी ने चुनाव अभियान में जो पद्धति अपनायी उसे पीएम बनने के बाद भी जारी रखा। चुनाव के पहले वे सत्ता के प्रत्याशी थे लेकिन पीएम बनने के बाद वे देश के प्रधानमंत्री हैं, देश का प्रधानमंत्री यदि बंधुआ मीडिया की परिकल्पना को साकार करने लगे तो यह तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी कु-सेवा है।
       पीएम मोदी को मीडिया को भांड़ और भोंपू बनाने के लिए कभी क्षमा नहीं किया जा सकता। कम से कम कांग्रेस पर विगत दस सालों में यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि मीडिया को पीएम ने बंधुआ बनाने की कोशिश की थी। इन दिनों मीडिया के मालिकों पर पीएम दफ्तर का दबाव इस कदर हावी है कि हर चैनल मोदी –मोदी की रट लगाए हुए है। यह मोदी की लोकतांत्रिक इमेज की नहीं बल्कि तानाशाह इमेज की ओर संकेत है। उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव के बाद मीडिया कमोबेश मोदी के प्रौपेगैण्डा से मुक्त होकर काम करेगा लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। अधिकांश मीडिया घराने मोदी की चाटुकारिता में आपातकाल के दौर को भी काफी पीछे छोड़ चुके हैं। इस नजरिए से देखें तो नरेन्द्र मोदी का पहला वर्ष मीडिया के एकवर्ग को बधिया बनाने का वर्ष कहा जाएगा। हमें देखना है कि मीडिया का कब मोदी से मोहभंग होता है।
       मीडिया के मोहपाश को यदि देखना हो तो मीडिया में मोदी के शारीरिक हाव-भाव पर आ रहे विवेचन और विश्लेषणों को पढ़ें। बॉडी लैंग्वेज के नाम पर जो विवेचन आ रहे हैं,वे कमोबेश उसी पैटर्न का अंग हैं जिसमें मीडिया को बंधुआ भाव में रहना है।
    सवाल यह है कि मोदी किस तरह के मूल्यों को प्रचारित –प्रसारित कर रहे हैं ? उनकी कायिक भंगिमाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं या उनकी मूल्यदृष्टि ? इस पर संपादकगण चुप क्यों हैं ? पहले हम देखें कि कायिक भंगिमाओं पर संपादक क्या सोच रहे हैं , मसलन्, बिजनेस स्टैंडर्ड के संपादक टी.एन.नाइनन ने (22मई2015 )  लिखा है
   '' यह बात जिज्ञासा जगाती है कि नरेंद्र मोदी जब स्वदेश में होते हैं तो वह शायद ही कभी मुस्कराते हों लेकिन जब वह विदेश में होते हैं तो कैमरा अक्सर उनको मुस्कराते, हंसते और दमकते हुए दर्ज करता है। देश में वह कठोर या भावशून्य नजर आते हैं। उनकी भाव भंगिमा में गंभीरता, अधिकार और गहन उद्देश्य नजर आता है। किसी वरिष्ठ  सहयोगी के साथ अभिवादन के दौरान भले ही वह मुस्कराते हुए दिख जाते हों लेकिन ज्यादातर समय वह यह भी नहीं करते।''  

''जब वह सार्वजनिक स्थानों पर चलते हैं या किसी समारोह में एकत्रित लोगों के बीच होते हैं तो उनके चेहरे पर न कोई रेखा नजर आती है न आंखों के इर्दगिर्द कोई झुर्री। अगर उनकी नजरें किसी से टकराती भी हैं तो वह केवल सामने वाले को घूर रहे होते हैं। सार्वजनिक सभाओं में उनकी शारीरिक भंगिमा आक्रामक होती है, आवाज में दबदबा और हावभाव पूरी तरह उन्मुक्त। उनकी तर्जनी अंगुली हमेशा संकेत कर रही होती है और जब वह अपनी बात कह रहे होते हैं तो आवाज में नाटकीय प्रभाव नजर आता है। वह अब तक के भारतीय प्रधानमंत्रियों में सबसे मुखर और दबदबे वाले साबित हो रहे हैं। ''
      ''स्तंभकार आकार पटेल ने मोदी के ट्विटर होम पेज पर लगी तस्वीर की सटीक व्याख्या की है। प्रधानमंत्री संसद भवन से बाहर आ रहे हैं। सुरक्षाकर्मी पीछे से घेरा बनाए हुए हैं और कुछ दूरी पर उनका एसयूवी वाहन खड़ा है। यह पूरा दृश्य सरकार में उनकी इकलौती कद्दावर हैसियत का सचित्र वर्णन करता है। परंतु यही प्रधानमंत्री विदेश जाते ही एकदम बदल जाते हैं। वह पुरलुत्फ नजर आते हैं। एकदम सुकून में और मुस्कराते हुए, सेल्फी लेते हुए। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की ठकुरसुहाती के बीच कई बार वह मगन होकर ऐसी बातें कह जाते हैं जो शायद उनको सोचनी भी नहीं चाहिए। ''

''बात केवल विदेशों की नहीं है। कई बार देश में भी जब वह किसी विदेशी नेता के सान्निध्य में होते हैं तो अपेक्षाकृत मुखर और सौहार्दपूर्ण छवि पेश करते हैं। बराक ओबामा के साथ उनका अतिउत्साही व्यवहार लगभग शर्मिंदा करने की हद तक चला गया। कुछ कुछ नेहरू और एडविना की तस्वीर की याद दिलाता हुआ जिसमें माउंटबेटन दूर नजर आ रहे हैं। लोगों को देश के प्रधानमंत्री से थोड़े और नियंत्रण की उम्मीद रही होगी। मोदी अपनी जो दो छवियां पेश करते हैं वे एक दूसरे से एकदम अलग हैं। इतनी कि लोगों के मन में सवाल पैदा होता है कि असली नरेंद्र मोदी कौन से हैं? ''

अधिकांश लोग नेताओं के निजी पक्ष से वाकिफ नहीं होते। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके बारे में जो थोड़ी बहुत जानकारी बाहर आई वह उनकी उस सत्ता से लगाव रखने वाली महिला की छवि से एकदम अलग थी जो आलोचक समझते रहे। एक बार खबर आई थी कि मोदी ने एक नेपाली बच्चे को गोद लिया था। पहले इसके बारे में कुछ नहीं सुना गया था, न इस खबर के बाद ही ऐसी कोई खबर आई। या फिर क्या उनकी जापान यात्रा के पहले कोई जानता था कि वह ड्रम पर भी हाथ आजमा सकते हैं? प्रधानमंत्री का काम अपने आप में एक दुष्कर कार्य है ऐसे में हर प्रधानमंत्री थोड़ी राहत की सांस चाहता है। नरसिंह राव शिखर वार्ताओं से लौटते वक्त उड़ान के दौरान स्पैनिश फिल्में देखा करते थे। राजीव गांधी हर बैठक के बाद तेज गति से गाड़ी चलाते थे और इस क्रम में अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ लुकाछिपी का खेल खेलते। कई बार तो वह लक्षद्वीप या अंडमान पर छुट्टियां बिताने चले जाते थे। मोदी के लिए यही काम आधिकारिक यात्राएं करती हैं। उनकी चीन यात्रा में यह बात अहम थी कि आधिकारिक बैठकों में सख्त लहजा अपनाने तथा पूरे आत्मविश्वास और नियंत्रण में नजर आने के बावजूद सार्वजनिक रूप से वह बहुत सहज नजर आए। सवाल यह है कि वह देश में ऐसे क्यों नहीं दिखते? पारिवारिक छवियों की मदद से अक्सर नेताओं की एक नरम तस्वीर पेश की जाती है। नेहरू की अपने नातियों के साथ बाघ के बच्चों से खेलने की तस्वीर और कैनेडी की ओवल कार्यालय में अपनी खूबसूरत पत्नी और नन्हे शिशु के साथ सामने आई तस्वीर इसका उदाहरण हैं। दुर्भाग्यवश मोदी के पास ऐसे विकल्प नहीं हैं। शायद उनको राजनीति और योग से इतर रुचियां सामने लाकर अपनी मानवीय छवि पेश करनी चाहिए। वह वाद्य यंत्र पर हाथ आजमाने को बतौर रुचि आगे बढ़ा सकते हैं।''  सवाल यह है कि व्यक्ति की भाव-भंगिमाएं क्या मूल्यहीन होती हैं ?

गुरुवार, 21 मई 2015

राजीव गांधी के बहाने



फ़ेसबुक पर जस्टिस मार्कण्डेय काटजू की राजीव गांधी पर पोस्ट पढ़कर लगा कि हमारे मध्यवर्ग में एक तबक़ा ऐसा पैदा हुआ है जो मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक संवेदनाओं के मामलों में एकसिरे से अमानवीय हो चुका है या जैसी करनी-वैसी भरनी की मनोदशा का शिकार है। 
      राजीव गांधी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई थी, वे लंकाई तमिल आतंकी संगठन लिट्टे के हाथों मारे गए , उनकी लिट्टे मरजीवडों ने हत्या की थी। इस हत्या की किसीभी रुप में हिमायत सही नहीं है। राजीव गांधी की मृत्यु सामान्य मृत्यु नहीं है। वह राजनीतिक हत्या है । हत्यारों ने ख़ास मंशा और उद्देश्य को ध्यान में रखकर हत्या की थी। यह भारत के प्रधानमंत्री की हत्या है। यह हत्या ऐसे समय में की गयी जब भारत लिट्टे की आतंकी मुहिम से श्रीलंका में जूझ रहा था। आतंकी गिरोह के हाथों हमारे प्रधानमंत्री का मारा ज़ाना मार्कण्डेय साहब को क्यों नहीं दिखा ? लिट्टे के ख़िलाफ़ भारत ने यदि श्रीलंका में अभियान न चलाया होता तो आज वह समूचे एशिया में वह सबसे ताक़तवर आतंकी संगठन होता । लिट्टे को नेस्तनाबूद करने बाद ही हम श्रीलंका में शांति स्थापित करने में मदद कर पाए। 
     हमारे देश के राजनेताओं की मुश्किल यह है कि वे आरंभ में आतंकी संगठनों की भावी रणनीतियाँ भाँप नहीं पाते। यही स्थिति भिण्डरावाले के संदर्भ हुई और यही स्थिति लिट्टे के संदर्भ में हुई। भारतीय राजनेता आतंकी या पृथकतावादियों की हर राजनीतिक गतिविधि को अपने तात्कालिक वोट बैंक के फ़ायदे और नुक़सान के आधार पर तय करते रहे हैं। फ़िलहाल जम्मू-कश्मीर में मोदी यही चाल चल रहे हैं। जबकि भिण्डरावाले और लिट्टे के प्रसंग में यह रणनीति पूरी तरह पिट चुकी है । इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक सभी का आरंभ में आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति सॉफ़्ट रवैय्या था । इसका ख़ामियाज़ा इन दोनों नेताओं को जान गँवाकर भुगतना पड़ा । इसका यह अर्थ नहीं है कि इन दोनों नेताओं की आतंकियों के द्वारा की गयी हत्या जायज़ है। 
             इसके विपरीत हमें देखना चाहिए कि राजीव की हत्या का मतलब क्या है ? राजीव की हत्या का मतलब है भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर हमला। आज का दिन राजीव गांधी से हिसाब माँगने का दिन नहीं है बल्कि राजीव गांधी के हत्यारों के ख़िलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ बुलंद करने का दिन है। काटजू साहब बाक़ी किसी दिन राजीव गांधी की करनी का हिसाब कांग्रेस से माँग लीजिए, लेकिन खुदा के वास्ते आज के दिन बख़्श दीजिए। 

      लोकतंत्र में प्रधान और हाशिए के अंतर्विरोध में अंतर करना चाहिए। हम यह देखें कि आतंकी संगठन लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुट हैं या नहीं ? लिट्टे के ख़िलाफ़ एकजुटता दिखाने की बजाय काटजू साहब तो राजीव गांधी पर हमले कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है संप्रभु राष्ट्र के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री की हत्या के पीछे कार्यरत  राजनीतिक मंशा को काटजू जैसा सुलझा हुआ व्यक्ति नहीं समझ पाया ! 
      हमें कारण खोजना चाहिए कि जस्टिस काटजू से चूक क्यों हुई ? असल में इन दिनों संकीर्ण फलक पर रखकर देखने की हवा चल रही है, हम अपनी पीड़ा और अपने नज़रिए को ही प्यार करते हैं उसके आगे देख ही नहीं पाते । इस तरह बम राजीव गांधी की हत्या को ठीक से समझ ही नहीं पाएँगे, इसे निजी या सामाजिक हानि लाभ के राजनीतिक व्यवहारवाद से भी समझ में नहीं आएगी । इसे लोकतांत्रिक नज़रिए से देखने की ज़रूरत है। 
       प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हमारे लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता पर किया गया हमला थी और सारे देश ने एकजुट होकर उसका प्रतिवाद किया था । आज हम यह सबक़ लें कि आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के प्रति नरम रुख़ नहीं अपनाएँगे । राजीव गांधी को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

रविवार, 10 मई 2015

माँ की सामाजिक ताकत

 माँ के बारे में लिखना बेहद मुश्किल काम है।सामने वो प्रशंसा सुनती नहीं थी, इस समय वो मौजूद नहीं है। जब तक रही अपार ऊर्जाका स्रोत बनी रही। हम सब भाई-बहन बेहद खुश रहते थे। कभी किसी चीज के बारे मेंमैंने निजी तौर पर कमी महसूस नहीं  की। वह हम सबकी सामाजिक ताकत थी। माँ का जन्म जिसपरिवार में हुआ वह  मथुरा के पढ़े-लिखे परिवारों में से एक बेहतरीन परिवारथा। उस परिवार के पास   बेहतरीनसांस्कृतिक और बौद्धिक परंपराएं थीं,नानाजी सोहनलाल चतुर्वेदी  संगीत के विद्वान थे, दोनों मामा पक्के खांटीमार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे। मथुरा के चौबों की पंडिताई-प्रोहिताई की परंपरा सेमुक्त इस परिवार में तमाम किस्म के आधुनिक संस्कार थे।  माँ बचपन में टाइफायडके कारण गूंगी-बहरी हो गई, इसके अलावा उसकी छोटी उम्र में ही शादी भी हो गयी,शादी तकरीबन 6-7साल की उम्र में हुई,सात साल बाद द्विरागमन हुआ, वह मुश्किल से15-16साल की रही होगी जब मेरा जन्म हुआ। वह जब तक जिंदा रही मैं अधिकांश समय छायाकी तरह उसके साथ रहा। वह पढ़ी लिखी नहीं थी, लेकिन शिक्षा की ताकत जानती थी, नएविचारों और खासकर प्रगतिशील विचारों को व्यवहार से पहचानती और मानती थी। प्रगतिशीलविचारों का संस्कार मुझे माँ से ही मिला।
         माँके अंदर विलक्षण शारीरिक क्षमता थी और वह इसका अपने परिवार के साथ ,अपनी माँ औरनानी की मदद के लिए जमकर इस्तेमाल करती थी, उसके पास कभी खाली समय नहीं होता था,वहबेहद संगठित थी और परिवार के दूसरे लोगों की मदद करने में उसकी गहरी रुचि थी। आजकललड़कियों में जिस तरह  घरेलू काम के प्रति अरुचि दिखती है,वह उसमें एकदम नहींथी।  हमलोगों का संयुक्त परिवार था,तीनआंगन का बड़ा घर था और उसमें नौ कमरे थे, मेरी दादी और माँ ये दोनों उस घर की एकतरह स्वामिनी थीं,ताई मस्त थी ,उसकी घरेलू कामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी, वहसुबह होते ही यमुना नहाने, मंदिरों में दर्शन करने चली जाती थी,वहां से समय बचतातो गप्प करने अपनी माँ के यहां चली जाती और दोपहर  खाने के वक्त घर लौटती । ऐसी अवस्था में संयुक्तपरिवार के समस्त घरेलू काम  माँ और दादी मिलकर करते थे, घर में कोई नौकर नहींथा।
    कालान्तर में परिवार मेंबंटबारा हो जाने बाद माँ ने घर के काम के साथ मंदिर की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लीऔर पिता को उस काम में मदद की, मंदिर का काम बहुत ही परिश्रम साध्य था,वह घर औरमंदिर के काम में सुंदर संतुलन बनाकर काम करती थी और धीरे धीरे उसने पिता को मंदिरसे तकरीबन मुक्त ही कर दिया था।
         माँ केअंदर यह भावबोध था कि वह जिस परिवार में जन्मी है वह बहुत पढ़ा लिखा सांस्कृतिक तौरपर समृद्ध परिवार है। इसलिए उसकी यह मंशा थी कि मैं खूब पढूँ । संयोग की बात थीमेरे तीन भाई-बहन कम उम्र में ही विभिन्न बीमारियों के कारण मर गए। बाद में हम दोभाई बच गए । मेरे छोटे भाई की पढ़ने में कोई रुचि नहीं थी। लेकिन मेरी रुचि थी, इसरुचि को बनाने में परिवार के अन्य सदस्यों जैसे माता-पिता के अलावा दोनों मामा कीभी भूमिका रही है। लेकिन मैं नियमित संगठित ढ़ंग से पढूँ इस भावबोध को निर्मितकरने में माँ की केन्द्रीय भूमिका थी। माँ के कारण ही यह संभव हो पाया किचौदह-पन्द्रह साल की उम्र में ही मेरे लिए अलग से कमरा बनवा दिया गया जिसमेंपढ़ने-सोने की व्यवस्था के साथ एक रेडियो भी लगवा दिया गया जिससे में अपडेट करकेरहूँ।
      मैं वैसे संस्कृत पाठशालामें पढ़ता था लेकिन माँ के संस्कारों के असर के कारण मुझे स्वतंत्र रुप सेकमरा मिला,इसने  मेरे अंदर आधुनिक भावबोध ने जगह बनाने में मदद की। मैंने अधिकांश आधुनिकबातें माँ से ही सीखीं। माँ के कारण मुझे स्वतंत्र कमरा मिला,यह मेरे जीवन की सबसेबड़ी घटना थी, मेरे किसी भी संगी-साथी के पास अपना निजी कमरा नहीं था। इसके अलावा मुझेरोज सुबह चार बजे जगाने का काम भी माँ करती थी। 
      मैं सुबह उठकर पढता था और माँ केसाथ में  एक कप चाय भी पीता था, चाय पिलाकरवह चली जाती थी, लेकिन नजर रखती थी कि मैं कहीं बाद सो न जाऊँ, यदि कभी सोने कीकोशिश करता तो आकर जगा देती थी, उसका मानना था  सुबह पढ़ने से चीजें जल्दी याद हो जाती हैं औरसारी जिन्दगी मन में रहती हैं। खैर, बचपन में सुबह चार बजे उठने की जो आदत उसनेडाली वह आज भी मेरी सबसे बड़ी ताकत है ।
      मित्रलोग पूछते हैं मैं लिखता-पढ़ता कब हूँ, मैंयही कहता हूँ सुबह चार बजे।बचपन में संस्कार बना कि सुबह चार बजे उठने का मतलब हैमाँ से जुड़े रहना।किताबें पढ़ने का मतलब है माँ से जुड़े रहना।
      बाद में 1967-68 में माँके दबाव के कारण ही मुझे एकदम नया जापानी टेपरिकॉर्डर मेरे पिता ने खरीदकर दिया।जो मेरे पास अभी तक सुरक्षित है। संभवतः कम्युनिकेशन के संस्कार बनाने और बाद मेंकम्युनिकेशन और मीडिया पर लिखने की आदत इससे ही पड़ी। मैं तो यही सोचता हूँ कि माँये कम्युनिकेशन और स्वाध्याय के संस्कार न बनाती तो मैं लिख ही नहीं पाता।
     माँ के लिए वह क्षण बड़ा ही महत्वपूर्ण होता थाजब मैं परीक्षा में पास होता था, वह श्रेणी नहीं समझती थी,पास-फेल समझती थी। मुझेयाद है मैंने जब शास्त्री की परीक्षा पास की,तो वह बेहद खुश हुई थी ,उसने पिता कोबुलाकर कहा ,आज मैं बहुत खुश हूं मेरा बेटा तुमसे ज्यादा पढ़ गया। मेरे पिताशास्त्री प्रथम वर्ष तक पढ़ाई कर पाए, धनाभाव और घरेलू जिम्मेदीरियों की वजह से वेआगे नहीं पढ़ पाए,मैंने जब शास्त्री द्वितीय वर्ष की परीक्षा पास की तो मैंने उसेसमझाया कि मैं पिता से पढाई में आगे निकल गया हूँ तो वह बेइंतहा खुश हुई, यह अजीबसंयोग ही था कि मेरा शास्त्री का परीक्षाफल  आने के चार दिन बाद ही सन् 1976 में उसकी अचानकहृदयाघात के कारण मौत हो गयी।   

शुक्रवार, 8 मई 2015

न्याय का अन्यायमुख


            कानून के खिलाफ बोलना या न्याय का विरोध करना अपने आपमें जोखिम का काम है,  आमतौर पर भारत में जो कानून के जानकार या विशेषज्ञ हैं वे कानून के दार्शनिक-वैचारिक पहलुओं पर कम  बोलते हैं । सामान्य तौर पर पूंजीवादी समाज में कानून के पास फरियाद लेकर जाओ तब कानून हस्तक्षेप करता है, अपनी पहल पर वह कभी हस्तक्षेप नहीं करता। इससे यह भी पता चलता है कि कानून में निजी पहलकदमी का अभाव है। कानून की धुरी न्याय नहीं है, बल्कि युक्तियां और फैसले हैं,न्याय की परंपरा है, फैसलों की परंपरा है।फलतःकानून किताबों और दलीलों का विशाल जंजाल है।
      न्यायालयों में वही नियम लागू होता है जो समाज में लागू होता है। समाज  जिस तरह बल प्रयोग के आधार पर चलता है, वैसे ही बल के आधार पर लोकतंत्र भी चलता है,उसी तरह न्यायालयों में भी बल के आधार पर ही फैसले होते हैं।  अदालत के अंदर बली होने के लिए जरुरी है कि आप जमकर पैसा फेंकें और अदालत में बल का प्रदर्शन करें। बड़े से बड़े वकील को खड़ा करें। बड़े वकील का मतलब ज्यादा फीस और मुकदमा लड़ने वाले की ताकत । इसीलिए यह कहते हैं कि कानून का समूचा दारोमदार न्यायिक बल -संतुलन पर टिका है। जिस तरह हिंसा में बल की भूमिका होती है ,उसी तरह कानून में भी बल की भूमिका होती है।
     कहने के लिए लोकतंत्र आम आदमी के ऊपर टिका है लेकिन वस्तुगत तौर पर देखें तो लोकतंत्र सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन पर टिका है। लोकतंत्र में वही सफल है जो अपने पक्ष में सामाजिक-आर्थिक शक्ति संतुलन एकत्रित करने में सफल हो जाता है। मसलन् नरेन्द्र मोदी की जीत के पीछे मात्र 31फीसदी वोटरों की भूमिका है 69फीसदी वोटर उनके खिलाफ हैं ,लेकिन आर्थिक शक्तियों का संतुलन वे अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल हो गए और पीएम बन गए।

      समग्रता में अदालतों में वही सफल होता है जिसके पास ताकत है,संसाधनों की शक्ति है। न्याय के आधार पर अदालतों में फैसले नहीं होते, अदालतों में फैसले तो न्यायबल के आधार पर होते हैं, न्यायबल में महत्वपूर्ण न्याय नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है 'बल' । पूंजीवादी न्याय में असमानता अन्तर्निहत है, वह सतह पर समानता का लाख जयगान करे लेकिन व्यवहार में वह असमानता को ही तरजीह देता है। असमानता का आचरण करता है। यह असमान व्यवहार चौतरफा सहज ही देख सकते हैं। भारतीय न्याय प्रणाली की मूलभूत अनुभवजन्य विशेषता है कि कानून स्वयं जिन बातों का दावा करता है उन बातों का पालन नहीं करता। मसलन् कानू यह दावा करता है कि वह करप्ट नहीं है लेकिन यह पाया गया कि भारत के सुप्रीमकोर्ट के 9 में से 7मुख्यन्यायाधीश करप्ट थे जिनके बारे में प्रसिद्ध कानूनविद शांतिभूषण ने सीधे आरोप लगाया था। कानून में करप्शन का स्रोत है नियमहीनता का सिद्धांत। मसलन्, न्यायालयों में वकीलों की फीस का कोई नियम नहीं है, वकील लोग मनमानी फीस लेते हैं,सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अलत तक हमें करप्शन के दर्शन सहज ही मिल जाएंगे। अदालत से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि वकीलों की फीस का मानक क्यों नहीं बनाया गया ? क्यों किसी वकील की फीस करोडों में होती है और किसी की हजारों में होती है ? क्या न्यायालय को पता नहीं है कि आम आदमी की आमदनी कितनी है ? सारी दुनिया को ईमानदारी,नियम,पारदर्शिता का उपदेश देने वाली न्यायपालिका में इतनी अंधेरगर्दी क्यों है ? प्रमाण और फैसलों के जंजाल में न्याय पाना आज सबसे मुश्किल काम है। कानून की किताबें सहज,सरल और छोटी क्यों नहीं होती ?       

गुरुवार, 7 मई 2015

सलमान,मध्यवर्गीय लंपटता और समाज सेवा


     सलमान के कवरेज ने एकबार फिर से हमें मध्यवर्ग के अपराधी मनोभावों पर सोचने के लिए विवश किया है। भारत का महान मध्यवर्ग का व्यापक अंश मूल्यों की दृष्टि से महान मूल्यों की ओर नहीं जा रहा,बल्कि अ-सामाजिक मूल्यों की ओर इसका स्वाभाविक रुझान देखने में आ रहा है। मध्यवर्ग के इस बड़े समूह की सामान्य विशेषता है अ-सामाजिक मूल्यों को वैधता प्रदान करना,उनका महिमा मंडन करना और उनके लिए सामाजिक समूहों और दवाब ग्रुपों का निर्माण करना ।इसे हम लंपट मध्यवर्ग कहें तो बेहतर होगा।
     स्वभाव से लंपट मध्यवर्ग अविवेकवादी और कानूनभंजक है।  यह हाशिए के लोगों से नफरत करता है,उनको कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं समझता, गायक अभिजीत का कल सलमान प्रसंग में आया बयान इस वर्ग में हाशिए के लोगों के प्रति व्याप्त घृणा का आदर्श नमूना है।
    मीडिया में बार-बार सलमान समर्थक लोग सलमान के सुधार कार्यों का उल्लेख करके मानवीय आबोहवा पैदा कर रहे थे, लेकिन सामाजिक जीवन में ऐसे समाजसुधार और मानवीय कार्यों का कोई स्वस्थ लक्ष्य नहीं है जो निहित स्वार्थ और सामाजिक जन समर्थन जुटाने के लिए किया जाय।  
     लंपट मध्यवर्ग-उच्चमध्यवर्ग के  कानूनभंजकों में माफिया और फंडामेंटलिस्ट भी आते हैं और वे लोग तमाम किस्म के असामाजिक,लोकतंत्रविरोधी,न्यायविरोधी कामों के साथ-साथ समाजसुधार के काम भी करते हैं । उनकी समाजसेवा का लक्ष्य है गुनाहों पर परदा डालना। वे चाहते हैं आम जनता उनके गुनाहों की अनदेखी करे और उनके लिए सामाजिक आधार का काम करे।
     लोकतांत्रिक समाज में समाजसुधार का मतलब है न्याय और समानता के भाव का कड़ाई से पालन। मानवाधिकारों के पक्ष में निष्ठा के साथ खड़े रहने की भावना। सलमान के मामले में ये सारी चीजें एकसिरे से नदारत हैं,उलटे सलमान पतंगबाजी के बहाने मानवाधिकार भंजकों के नायक के प्रचारक की भूमिका अदा करते नजर आए हैं।
    समाजसुधार का अर्थ किसी का ऑपरेशन कराना या पैसे देना या आर्थिक मदद कर देना मात्र नहीं है बल्कि इस मदद के साथ दानदाता किस तरह के मूल्यों का आचरण करता है यह भी देखना चाहिए। सामान्य सी बात है कि समाजसुधार का दावा करने वाला दारु पीकर ,बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाता है तो वह कानून तोड़ता है, गाड़ी से कुचलते हुए चला जाता है, लेकिन पीड़ितों को अस्पताल नहीं ले जाता, उनको आर्थिक मदद नहीं देता,बल्कि अदालत में सौदेबाजी करता है,सामाजिक सुधार को मानने का अर्थ है दण्ड को नतमस्तक होकर स्वीकार करना, न कि पैसे के बल पर,तिकड़मों के जरिए अपने पक्ष में करना। 
  सलमान टाइप चैरिटी या दान-पुण्य-मदद का लक्ष्य है अपने लिए जनाधार और जन-समर्थन तैयार करना, इसका लक्ष्य समाजसेवा नहीं है। इसका लक्ष्य है अपने लिए प्रशंसकों की भीड़ जुगाड़ करना, इसका लक्ष्य है सलमान के अमानवीय और कानूनभंजक रुप पर पर्दा डालना। इस तरह की समाजसेवा को लंपट समाज सेवा कहते हैं। जो लोग समाज सेवा करते हैं वे उसके जरिए जन-समर्थन या निजी स्वार्थों की पूर्ति नहीं करते। समाज सेवा का मतलब है कि सेवा करने वाला बदले में अपने लिए कुछनहीं चाहता, लेकिन सलमान के समाजसेवा कार्यों में खर्च हुए 42करोड़ रुपयों का बार-बार हवाला देकर यह मांग की जा रही है कि उसे कानून बरी कर दे, वह मानवीय है ,हत्यारा नहीं है । उसके समाजसेवा के तमगों के नाम पर यह भी कहा जा रहा है कि उसने कितने लोगों के हृदय के ऑपरेशन में मदद की ,कितने जरुरतमंदों के काम आया। यानी सलमान के लिए समाजसेवा का मतलब आम जनता को अपने पीछे गोलबंद करना है और यही वह बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए कि इस तरह की समाजसेवा क्या सच में समाजसेवा है या निजीसेवा है ?
     सलमान मार्का चैरिटी का सारा धंधा या इसी तरह की समाजसेवा करने वाले संगठन जब बदले में वोट मांगते हैं या राजनीतिक तौर पर साथ रहने की मांग करते हैं तो समाजसेवा को कलंकित करके उसे निहितस्वार्थ सेवा में तब्दील कर देते हैं। हमारे देश में अनेक संगठन हैं जो समाजसेवा के नाम पर शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में काम कर रहे हैं,साम्प्रदायिक विभाजन और घृणा का काम कर रहे हैं, लेकिन बदले में वोट की राजनीति भी कर रहे हैं या साम्प्रदायिक या फंडामेंटलिस्ट राजनीति कर रहे हैं। देश का सबसे बड़ा संगठन आरएसएस समाजसेवा ही कर रहा है।साथ में अन्य राजनीतिक लक्ष्यों में लगा है। यह समाजसेवा नहीं है यह समाज मेनीपुलेशन है।
     कहने का आशय यह है कि समाजसेवा को तब ही समाजसेवा कहते हैं जब आप अन्य की मदद करें और भूल जाएं,बदले में उससे कुछ न चाहें, समाजसेवा का ढोल बजाकर जिक्र न करें। मसलन् ,समाजसेवा का रामकृष्ण परमहंस मिशन का तरीका देखें तो यह बात सहज ही समझ में आ जाएगी। वह समाजसेवा किसी काम की नहीं है जो बदले में निहितस्वार्थों की पूर्ति की मांग करे, राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति की मांग करे।
      समाजसेवक न्यायप्रिय और सभ्य होता है। सलमान और उनके जैसे सामाजिक संगठन या समाजसेवक इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते। वे न तो न्यायप्रिय हैं और न सभ्य ही हैं। बल्कि स्थिति यह है कि वे लंपटता और मीडियाप्रेशर के जरिए सामाजिक माहौल को अपने अनुकूल बनाने की घृणिततम कोशिश कर रहे हैं. इन लोगों ने बड़े पैमाने पर लंपट मध्यवर्ग को अपने साथ गोलबंद कर लिया है। यह लंपट मध्यवर्ग आए दिन उन सभी नेताओं और अभिनेताओं के पीछे गोलबंद नजर आता है जिनकी नागरिक समाज में कोई आस्था नहीं है,जिनकी भारत के कानून में कोई आस्था नहीं है, वे समूह या भीड़ के दवाब के जरिए कानून से लेकर सरकार तक सबको प्रभावित करना जानते हैं। मीडिया को वे अपने प्रौपेगैण्डा अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।   

    

रविवार, 3 मई 2015

पंडित जवाहरलाल नेहरु और धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियाँ

                
         भारत जब आजाद हुआ तो उसकी नींव साम्प्रदायिक देश- विभाजन पर रखी गयी।फलतः साम्प्रदायिकता हमारे लोकतंत्र में अंतर्गृथित तत्व है। लोकतंत्र बचाना है तो इसके खिलाफ समझौताहीन रवैय्या रखना होगा। साम्प्रदायिकता के औजार हैं आक्रामकता और मेनीपुलेशन । इसने सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं को गंभीरता से प्रभावित किया है। त्रासद पक्ष यह है कि हाल के वर्षों में साम्प्रदायिकताविरोधी चेतना का ह्रास हुआ है।खासकर आपातकाल के बाद पैदा हुए नागरिकों में यह फिनोमिना व्यापक रुप में नजर आता है। साम्प्रदायिकता को हम तदर्थवादी और वोटवादी धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस नजरिए से देखते हैं।फलतः यह भी कहने लगे हैं सभी राजनीतिक दल एक जैसे होते हैं। इस धारणा ने साम्प्रदायिक और गैर-साम्प्रदायिकदल के बीच के भेद को खत्म करने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है। जबकि सच यह है साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता एक ही चीज नहीं है। साम्प्रदायिकदल और धर्मनिरपेक्षदल एक ही जैसे नहीं होते। हम इनमें समानताएं दरशाने के लिए राजनीतिक एक्शन के बीच समानताएं बताने लगते हैं। राजनीतिक एक्शनों में समानताओं के आधार पर कोई भी निर्णय सही नहीं हो सकता। सवाल विचारधारा का है। साम्प्रदायिक विचारधारा और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के नजरिए में समानता का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता बल्कि ये दोनों एक-दूसरे के अंतर्विरोधी हैं।
     साम्प्रदायिकता को  धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस के जरिए अपदस्थ नहीं किया जा सकता।पंडित नेहरु का 'विविधता में एकता' का नारा धर्मनिरपेक्ष कॉमनसेंस केन्द्रित नारा था, जिसके आधार पर हम साम्प्रदायिकता को हाशिए पर ठेलने की कोशिश करते रहे हैं। यह सबसे असफल नारा साबित हुआ है। कायदे से 'विविधता और लोकतंत्र' के आधार पर समाज को संगठित किया जाता तो बेहतर सामाजिक-सांस्कृतिक परिणाम हासिल किए जा सकते थे।
पंडित जवाहरलाल नेहरु ने आजादी के साथ ही 'विविधता में एकता' का नारा दिया। यह नारा सतह पर आकर्षक है लेकिन इसकी वैचारिक जड़ें खोखली हैं और इसमें राजनीतिक अवसरवाद की अनंत संभावनाएं  हैं। आमतौर पर यह मान लिया गया कि पंडित नेहरु सही कह रहे हैं। लेकिन सच यह है 'विविधता में एकता' के नाम पर देश में समय –समय पर साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति नरम रुख की कांग्रेस के अंदर से ही शुरुआत हुई। मसलन्, महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर जब प्रतिबंध लगा दिया गया तो कायदे से यह प्रतिबंध हटाने की जरुरत नहीं थी, लेकिन यह जानते हुए भी कि संघ की विचारधारा क्या है उस पर से प्रतिबंध हटा लिया गया,उसे खुलकर काम करने का मौका दिया गया। सवाल यह है क्या साम्प्रदायिक संगठन को लोकतंत्र में काम करने की अनुमति देनी चाहिए ? लोकतंत्र में उन संगठनों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए जो लोकतंत्रविरोधी आचरण करते हैं। साम्प्रदायिकता वस्तुतःलोकतंत्रविरोधी विचारधारा है और इसे हमने फलने-फूलने का अवसर देकर यह भावना पैदा की कि लोकतंत्र में सबके लिए समान अधिकार हैं यानी उन विचारधाराओं के लिए भी समान अधिकार हैं जो लोकतंत्र को नहीं मानतीं और लोकतंत्र विरोधी आचरण करती हैं। सामाजिक कार्य हो या राजनीतिक कार्य हो, यदि उससे साम्प्रदायिकता फैलती है तो हमें उसे हर स्तर पर राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर रोकने के बारे में सोचना होगा।
      पंडित नेहरु साध्य और साधन की एकता में गहरा विश्वास करते थे लेकिन आचरण करते समय साध्य-साधन के बीच में सामंजस्य रखने में एकसिरे से असफल रहे। मसलन् 1962 में भारत- चीन युद्ध के समय रास्ता वे रास्ता चूक गए और आरएसएस से मदद मांग बैठे,उनके जमाने में ही गणतंत्र दिवस की परेड में संघ की टुकड़ी मार्च करते हुए दिल्ली में राजपथ पर निकली थी । कहने का आशय यह है कि धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष पहली शर्त है। इसी तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक आदेशों का ईमानदारी से पालन करना दूसरी शर्त है। पंडित नेहरु में शासन में आने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अ-सम्मान का भाव सबसे पहले पैदा हुआ। केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को जो 1957 में चुनकर आई थी उसे 1959 में एक आंदोलन के बहाने  उन्होंने गिरा दिया गया।जबकि यह सरकार पांच साल के लिए चुनकर आई थी।  बाद के वर्षों में कांग्रेस ने इस तरह की अनेक गलतियां लगातार कीं। 
    कहने का तात्पर्य यह कि धर्मनिरपेक्षता का भविष्य दो बातों पर टिका है ,पहला, साम्प्रदायिकता के खिलाफ समझौताहीन संघर्ष,दूसरा लोकतांत्रिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक आदेशों का अडिगभाव से पालन। भारत में साम्प्रदायिकता पर विचार करते समय यह भी ख्याल रखें कि साम्प्रदायिकता कभी भी पृथकतावाद या क्षेत्रीयतावाद में रुपान्तरित हो सकती है। यही बात पृथकतावाद और क्षेत्रीयतावाद पर लागू होती है वे कभी भी साम्प्रदायिक रंग में रुपान्तरित हो सकते हैं। इसी तरह राजनीति,राज्यसत्ता को धर्म और धार्मिकता से पूरी तरह विच्छिन्न किया जाय। धर्म और धार्मिकता के साथ इनका संबंध साम्प्रदायिकता के प्रचार-प्रसार में मदद करता है।
       लोकतंत्र का स्वस्थ व्यवस्था के तौर पर विकास करने के लिए जरुरी है कि राजनीति से लेकर समाज तक सबको अतीत के बोझ से मुक्त करें। अतीत के मलबे के जरिए जनता में एकता कायम करने से साम्प्रदायिकता तात्कालिक तौर पर कमजोर होती दिखती है लेकिन वह कमजोर नहीं होती। अतीत का मलबा साम्प्रदायिकता को ईंधन देता है ,उसे दीर्घजीवी बनाता है। लोकतंत्र में अतीत प्रेम कैंसर है। इससे आप टाइमपास कर सकते हैं लेकिन सामाजिक विकास नहीं कर सकते। लोकतंत्र में अतीत को जानना चाहिए लेकिन अतीत को पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने विकास के लिए अतीत के मसलों को औजार की तरह इस्तेमाल किया है। पंडित नेहरु ने लिखा है '' गुजरे जमाने का- उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही- बोझ एक दबा देनेवाला
और कभी –कभी दम घुटानेवाला बोझ है,खासकर हम लोगों के लिए,जो ऐसी पुरानी सभ्यता में पले हैं,जैसी चीन या हिंदुस्तान की है। जैसा कि नीत्शे ने कहा है -'' न केवल सदियों का ज्ञान ,बल्कि सदियों का पागलपन भी हममें फूट निकलता है। वारिस होना खतरनाक है।'' 
        हमारी मुश्किल है कि हमने विरासत के नाम पर बहुत सारी चीजों का बोझ अपने लोकतंत्र पर लाद दिया है। लोकतंत्र को पुरानी चीजों का वारिस न बनाया जाया।लोकतांत्रिक मनुष्य को पुराने लबादों में न बांधा जाय, लोकतंत्र पर अतीत की विरासत का एक ही असर है और एक ही मूल्यवान चीज है जो हमें विरासत मिली है वह है शिरकत। लोकतंत्र शिरकत के जरिए विकास करता है। अतीत की चीजें भी मानवीय शिरकत से बनी थीं, हमें बाकी अतीत को उसके हाल पर छोड़कर आगे निकल जाना चाहिए।
    पंडित नेहरु पर महात्मा गांधी का गहरा असर था और उन्होंने गांधी को 'हिंदुस्तान की कहानी' में उद्धृत किया है ,लिखा ,' मुझे गांधीजी के वे लफ्ज याद हैं,जो उन्होंने 7अगस्त,1942 की भविष्य –सूचक शाम को कहे थे-

'' दुनिया की आंखें अगरचे आज खून से लाल हैं,फिर भी हमें दुनिया का सामना शांत और साफ़ नज़रों से करना चाहिए। ''

शनिवार, 2 मई 2015

नामवर सिंह सिर्फ 'देह' हैं

        साहित्य इन दिनों भेडों से घिर चुका है। आप भेड़ नहीं हैं तो साहित्यकार नहीं हैं। सत्ता ने साहित्यकार को सम्मान दिया,पुरस्कार दिए लेकिन भेड़ का दर्जा भी दिया। हम खुश हैं कि हम भेड़ हैं। भेड़ की तरह रहते हैं,जीते हैं, लिखते हैं,भेड़ होना बुरी बात नहीं है लेकिन साहित्यकार का भेड़ होना बुरी बात है। साहित्यकार जब भेड़ बन जाता है तो यह साहित्य के लिए अशुभ-संकेत है। हम असमर्थ हैं कि साहित्यकार को भेड़ बनने से रोक नहीं रोक पा रहे,साहित्य में भेडों का उत्पादन जितनी तेजी से बड़ा है उतनी तेजी से साहित्य का उत्पादन नहीं बढ़ा।
        एक जमाना था साहित्यकार का दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता था लेकिन इन दिनों 'दृष्टिकोण' की जगह 'कोण' ने लेली है। 'दृष्टि' बेमानी हो गयी है। साहित्यकार का 'कोण' उसकी पहचान का आधार बन गया है । साहित्यकार के दृष्टिलोप की सटीक जन्मतिथि हम नहीं जानते,लेकिन एक बात जरुर जानते हैं कि विवेक जब मर जाता है तब 'कोण' पैदा है। विवेक जब तक जिंदा रहता है दृष्टिकोण बना रहता है लेकिन जब विवेक मर जाता है तो सिर्फ 'कोण' रह जाता है।
       विवेक  मर जाने पर साहित्यकार मात्र सिर्फ देह रह जाता है। यानी वह मंच पर ,सभा में, गोष्ठी में ,लोकार्पण में,समीक्षा में बैठा हुआ शरीर मात्र रह जाता है। साहित्यकार का 'देह' में रुपान्तरण स्वयं में लेखक के लिए चिन्ता की बात नहीं है, यह इन दिनों साहित्यिक जगत में भी चिन्ता की बात नहीं है,क्योंकि साहित्यिक जगत तो 'देह' से काम चलाता रहा है, उसके लिए तो 'देह' ही प्रधान है । साहित्यकार का 'देह' में रुपान्तरण एकदम नई समस्या है और इस समस्या पर हमें गंभीरता से सोचना चाहिए। सवाल यह है कि साहित्यकार क्या मात्र 'देह' है ? खासकर नामवर सिंह के प्रसंग में यह सवाल मेरे दिमाग में कौंधा है।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक आयाम हैं। उनमें से एक आयाम यह भी है कि उनके यहां साहित्यकार का 'शरीर' में रुपान्तरण हो चुका है। वे सशरीर किसी भी कार्यक्रम में चले जाते हैं, लेकिन वे दसियों वर्ष पहले अपने को साहित्यकार के नजरिए से मुक्त कर चुके हैं। मेरे लिए यह इसलिए भी त्रासद है क्योंकि वे मेरे शिक्षक रहे हैं, हमने उनसे पढ़ा है। अपना शिक्षक जब विवेक को त्याग दे तो बड़ी पीड़ा होती है। मैं नहीं जानता नामवर सिंह को विवेक त्यागने पर कोई पीड़ा होती है या नहीं ? पर मुझे होती है।
     नामवर सिंह के व्यक्तित्व मूल्यांकन में यह प्रश्न विचारणीय है कि साहित्यकार का नजरिया महत्वपूर्ण है या शरीर महत्वपूर्ण है ? साहित्यकार का लिखा महत्वपूर्ण है या उसके लिंक ,सत्ताधारियों के प्रति भक्ति महत्वपूर्ण है ? क्या साहित्यकार प्रतीकात्मक तौर पर कहीं पर कुछ भी विवेकहीन बोल सकता है ? कर सकता है ? क्या लेखक के लिए विवेकवाद का कोई मूल्य नहीं रह गया  ?
    नामवर सिंह के चाहने वाले असंख्य हैं , ये चाहने वाले वैसे ही हैं जैसे माधुरी दीक्षित के होते हैं। माधुरी दीक्षित के चाहने वाले उसके 'देह' और उससे जुड़े कलाप्रदर्शन पर मुग्ध हैं, इस समूची प्रक्रिया में माधुरी दीक्षित वही सब करती है जो उसे फिल्म निर्देशक करने के लिए कहता है। वह महज 'देह' के तौर पर उपलब्ध रहती है, निर्देशक जैसे नचाता है वह नाचती है, जैसे कहता है वैसे ही अभिनय करती है। इस अभिनय में  सब कुछ निर्देशित है, सब कुछ निर्मित है,  कुछ भी स्वाभाविक नहीं है, सामान्य नहीं है,यहां तक कि उसके व्यक्तित्व की मार्केटिंग भी निर्देशक और संस्कृति उद्योग करता है। यही वह बिंदु है जहां से नामवर सिंह को देखना चाहिए। वे साहित्य में साहित्यकार की देह हैं। संभवतः यही बात दिमाग में रखकर उन्होंने ज्ञानपीठ के एक कार्यक्रम में साफ कहा मैं फरमाइशी लेखक हूँ।  

         

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस , साम्प्रदायिकता और संघी मासूमियत

       इन दिनों वाम राजनीति हाशिए पर है और संघी राजनीति सत्ता,समाज और मीडिया के केन्द्र में है। खासकर मोदी सरकार बनने के बाद से सारा परिदृश्य बदल गया है। अचानक स्वाधीनता सेनानियों को हड़प लेने की कोशिशें हो रही हैं,  मासूम तर्क दिए जा रहे हैं। संघी लोग जानते हैं कि मासूम तर्कों से इतिहास नहीं रचा जाता। मासूम तर्क यह है कि स्वाधीनता सेनानी सबके हैं, इसलिए वे हमारे भी हैं, उनको दलीय राजनीति में बांधकर या किसी विचारधारा विशेष के परिप्रेक्ष्य में मत देखो, खासकर स्वाधीनता सेनानियों पर जब भी बातें करो, फूलमालाएं चढ़ा कर प्रणाम करो, विचार-विनिमय मत करो, आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल मत करो।
   संघ की रणनीति है स्वाधीनता सेनानियों के विचार,राजनीति,संघर्ष आदि में निहित विचारधारा की चर्चा मत करो, उन्हीं पहलुओं की चर्चा करो जो हिन्दुत्व के फ्रेमवर्क में फिट बैठते हैं। इस तरह के तर्कशास्त्र के जरिए संघ और उसके संगठन संगठित ढ़ंग से स्वाधीनता संग्राम की विरासत को विकृत कर रहे हैं। उसे युवाओं में गलत ढ़ंग से पेश कर रहे हैं, साथ ही यह भी संदेश दे रहे हैं कि स्वाधीनता आंदोलन की परंपरा राष्ट्रवाद की परंपरा है, धर्मनिरपेक्षतारहित हिन्दुत्व की परंपरा है। उनके लिए स्वाधीता सेनानी का बलिदान तो स्वीकार्य है लेकिन बलिदान के साथ जुड़ा विचार स्वीकार्य नहीं,संघ को स्वाधीनता सेनानी की वोट के लिए और अपने कलंकों को छिपाने के लिए इमेज चाहिए,फोटो चाहिए। संघ के लिए स्वाधीनता सेनानी महज फोटोग्राफ है । यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसकी रोशनी में सुभाषचन्द्र बोस के बारे में चल रही मौजूदा बहस को भी देखें।
    सुभाष चन्द्र बोस महज राजनेता,स्वाधीनता सेनानी नहीं थे, बल्कि उच्चकोटि के विचारक भी थे। वे स्वभाव से आमूल-चूल परिवर्तनकामी थे। उनका साम्प्रदायिकता को लेकर सुनिश्चित नजरिया था ।
     लोकतंत्र में कोई चीज,विचार या संगठन अछूत नहीं हैं और हमें अछूत मनोवृत्ति के प्रचार-प्रसार से बचना चाहिए। साम्प्रदायिक एकता सामाजिक विकास के लिए बेहद जरुरी है। सुभाष चन्द्र बोस ने 4मई1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' के संपादकीय में लिखा  हमें साम्प्रदायिक संगठनों के प्रति अछूत भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। हमें राजनैतिक अछूतभाव से बचना चाहिए। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को राजनैतिक अछूत मानकर दूर नहीं रखना चाहिए। 
    24फरवरी 1940 को 'फार्वर्ड ब्लॉक' में लिखे संपादकीय में सुभाष ने साफ लिखा  आम जनता में स्वाधीनता की भावना पैदा करने के लिए नए नजरिए,नए भावबोध,स्प्रिट,परिप्रेक्ष्य और नए विज़न की जरुरत है।
    सवाल यह है कि संघ ने क्या नया विज़न पैदा किया? लोकतंत्र के अनुरुप नई स्प्रिट पैदा की ? कम्युनिस्टों ,समाजवादियों और कांग्रेसियों पर सुभाष की अपील का असर हुआ लेकिन संघ पर कोई असर नहीं हुआ। संघ के साम्प्रदायिक नजरिए से मुक्त नहीं किया। अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा से मुक्त नहीं किया,दंगे की राजनीति से मुक्त नहीं किया, गपोड़ी इतिहास से मुक्त नहीं किया, ऐसी स्थिति में सुभाष की विरासत के बारिस बनने की उनकी कोशिश हास्यास्पद ही कही जाएगी।
       सुभाष का मानना था  हमें आज अपने चारों ओर फैली साम्प्रदायिकता पर हमला करना चाहिए और आम जनता में राष्ट्रवाद की भावना पैदा करनी चाहिए। इस काम के लिए क्रांतिकारी मनोदशा बनाने की जरुरत है,उससे ही यह लक्ष्य हासिल करना आसान होगा। साम्प्रदायिकता तब ही खत्म होगी जब साम्प्रदायिक मनोदशा खत्म होगी। अतः सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है कि वे साम्प्रदायिकता-मुस्लिम,सिख,हिन्दू,ईसाई - को नष्ट करें।  हमें कोशिश करनी चाहिए कि ये समुदाय साम्प्रदायिकता का अतिक्रमण करके वास्तव अर्थ में राष्ट्रवादी मानसिकता विकसित करें। सेना के अग्रणी दस्तों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष करें। (इसके विपरीत संघ हमारे पूर्व सैनिकों में हिन्दुत्व का प्रचार करता रहा है ) ,सेना की यह भी जिम्मेदारी है कि वह सभी सम्प्रदायों के बीच में सद्भाव और राष्ट्रीय एकता पैदा करे। हिन्दू-मुस्लिम,सिख,ईसाईयों के बीच में एकता पैदा करने का काम करे। साम्प्रदायिक समस्या का समाधान करे। इससे समूचा वातावरण स्वतः बदल जाएगा। साथ ही साम्प्रदायिकता का अंत भी होगा। हमारी सेना के अग्रणी दस्तों को इस मामले में आदर्श भूमिका अदा करनी चाहिए।
            


रविवार, 26 अप्रैल 2015

सुभाषचन्द्र बोस और जनसंघर्ष


      सुभाष चन्द्र बोस के बारे में इन दिनों मीडिया में जिस तरह से सनसनी पैदा की जा रही है उससे यह खतरा पैदा हो गया है कि कहीं उनके नजरिए को प्रदूषित न कर दिया जाय। सुभाष के नजरिए की आधारभूमि है भारत की मुक्ति। वे आजीवन वामपंथी रहे और उनकी वामपंथी विचारधारा में गहरी आस्थाएं थीं। हमारे देश में अनेक किस्म के समाजवादी पहले भी थे और आज भी हैं, पहले वाले समाजवादी ऐसे थे जो दक्षिणपंथी राजनेताओं के साथ काम करते थे या फिर किताबी समाजवादी थे। सुभाष का नजरिया इन दोनों से भिन्न था।
     सुभाष आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर थे, वे संविधानवादी और सुधारवादी नजरिए से सामाजिक बदलाव की बहुत कम संभावनाएं देख रहे थे, इसलिए उन्होंने संविधानवाद और सुधारवाद से बचने की सलाह दी थी। कांग्रेस में ये दोनों ही दृष्टियों के मानने वाले लोग बड़ी संख्या में थे।
    सवाल यह है  क्या संविधानवादी और पूंजीवादी सुधारवादी मार्ग के सहारे हम समाज में आमूलचूल परिवर्तन कर पाए हैं ? सच यह है कि ये दोनों ही नजरिए 65साल में अभीप्सित परिणाम पैदा करने में असमर्थ रहे हैं। यह तब हुआ है जबकि देश का शासन पांच दशकों तक कांग्रेस के पास रहा बाद में आए शासकों ने मूलतः कांग्रेस की बनायी नीतियों का ही पालन किया। मोदी भी कांग्रेस की बनायी नीतियों पर चल रहे हैं।
      सुभाष ने संविधानवाद और जनसंघर्ष के बीच में अंतर्विरोध की तरफ 19अगस्त सन् 1939 में ध्यान खींचाथा, लेकिन इस अंतर्विरोध की अनदेखी की गयी। आज यही अंतर्विरोध अपने चरम पर है। एक तरह से सभी रंगत की गैर-वाम विचारधाराएं संविधानवाद की आड़ में एकजुट हैं और जनसंघर्षों का खुलकर विरोध कर रही हैं। पहले यही काम कांग्रेस ने किया अब यही काम मोदी सरकार कर रही है। जब हमारे सामने जनसंघर्षों को कुचलने के लिए संविधानवाद का खतरा हो तो हमें गंभीरता से देखना होगा कि आखिरकार सुभाष चन्द्र बोस की हमारे लिए आज किस रुप में प्रासंगिकता बची है।
   देश के आजाद होने के बाद संविधानवाद पर जोर दिया गया और तमाम किस्म के जनसंघर्षों और आंदोलनों पर संविधान के तहत ही हमले किए गए। यही वह संविधान है जो तमाम किस्म की पवित्र घोषणाओं की जनसंघर्षों के संदर्भ में घनघोर और नंगी अवहेलना करता  है। संविधान के नाम पर आपातकाल आया और संविधान के नाम पर ही अब तक सेज के लिए दस लाख एकड़ जमीन ले ली गयी और अब नग्नतम रुप में भूमि अधिग्रहण बिल पेश है, जिसे हर हालत में संसद से पास कराकर परम पवित्र वाक्य में तब्दील कर दिया जाएगा।
   कायदे से हमें सुभाष चन्द्र बोस को जनसंघर्षों के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना चाहिए। लेकिन हो यह रहा है हमारे इतिहासकार बंधु सुभाष को इतिहास की घटना विशेष के संदर्भ में रंग-बिरंगे रुप में पेश कर रहे हैं इससे सुभाष के बारे में विकृत समझ बन रही है।
    'जनसंघर्ष बनाम संविधानवाद' के संदर्भ में यदि सुभाष को देखें तो पाएंगे कि सुभाष जनसंघर्षों के साथ खड़े हैं। सुभाष ने माना कि उन्होंने 'संविधानवाद का विरोध करके 'अपराध' किया है और मैं उसकी कीमत अदा कर रहा हूँ।' वह मानते थे 'संविधानवाद बनाम जनसंघर्ष' का अंतर्विरोध इस दौर का मूल अंतर्विरोध है और इसकी रोशनी में ही राजनीतिक प्रक्रिया का विकास होगा। सुभाष की यह समझ इतिहास के अब तक के अनुभव से सही साबित हुई है।   

      

हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य



       जो लोग फेसबुक से लेकर मोदी की रैलियों तक मोदी-मोदी का नारा लगाते रहते हैं वे सोचें कि मोदी में नारे के अलावा क्या है ,वह जब बोलता है तो स्कूली बच्चों की तरह बोलता है,कपड़े पहनता है फैशन डिजायनरों के मॉडल की तरह, दावे करता है तो भोंदुओं की तरह, इतिहास पर बोलता है तो इतिहासअज्ञानी की तरह ।
मोदी में अभी तक पीएम के सामान्य लक्षणों ,संस्कारों, आदतों और भाषण की भाषा का बोध पैदा नहीं हुआ है। मसलन् पीएम को दिल्ली मेट्रो में सैर करने की क्या जरुरत थी ? वे क्या मेट्रो से कहीं रैली में जा रहे थे ?मेट्रो सफर करने का साधन है, सैर-सपाटे का नहीं।
मोदी सरकार के लिए भारत की धर्मनिरपेक्ष परंपराएं बेकार की चीज है। असल है देश की महानता का नकली नशा। उसके लिए शांति,सद्भाव महत्वपूर्ण नहीं है ,उसके लिए तो विकास महत्वपूर्ण है, वह मानती है शांति खोकर,सामाजिक तानेबाने को नष्ट करके भी विकास को पैदा किया जाय। जाहिर है इससे अशांति फैलेगी और यही चीज मोदी को अशांति का नायक बनाती है।
मोदी की समझ है स्वतंत्रता महत्वपूर्ण नहीं है, विकास महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता और उससे जुड़े सभी पैरामीटरों को मोदी सरकार एकसिरे से ठुकरा रही है और यही वह बिंदु है जहां से उसके अंदर मौजूद फासिज्म की पोल खुलती है।
फासिस्ट विचारकों की तरह संघियों का मानना है नागरिकों को अपनी आत्मा को स्वतंत्रता और नागरिकचेतना के हवाले नहीं करना चाहिए, बल्कि कुटुम्ब,राज्य और ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए. संघी लोग नागरिकचेतना और लोकतंत्र की शक्ति में विश्वास नहीं करते बल्कि थोथी नैतिकता और लाठी की ताकत में विश्वास करते हैं।
पीएम मोदी की अधिनायकवादी खूबी है- तर्कवितर्क नहीं आज्ञा पालन करो। इस मनोदशा के कारण समूचे मंत्रीमंडल और सांसदों को भेड़-बकरी की तरह आज्ञापालन करने की दिशा में ठेल दिया गया है, क्रमशःमोदीभक्तों और संघियों में यह भावना पैदा कर दी गयी है कि मोदी जो कहता है सही कहता है, आंख बंद करके मानो। तर्क-वितर्क मत करो। लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं विकास में बाधक है,तेजगति से काम करने में बाधक हैं,अतः उनको मत मानो। सोचो मत काम करो। धर्मनिरपेक्ष दलों-व्यक्तियों की अनदेखी करो, उन पर हो रहे हमलों की अनदेखी करो।राफेल डील से लेकर लैंड बिल तक मोदी का यह नजरिया साफतौर पर दिखाई दे रहा है।
हिन्दुत्ववादी तानाशाही के 15 लक्ष्य -

-1- पूर्व शासकों को कलंकित करो, 2.स्वाधीनता आंदोलन की विरासत को करप्ट बनाओ,3.हमेशा अतिरंजित बोलो,4. विज्ञान की बजाय पोंगापंथियों के ज्ञान को प्रतिष्ठित करो,5. भ्रष्टाचार में लिप्त अफसरों को संरक्षण दो, 6.सार्वजनिकतंत्र का तेजी से निजीकरण करो,7. विपक्ष को नेस्तनाबूद करो,8.विपक्ष के बारे में का हमेशा बाजार गर्म रखो,9.अल्पसंख्यकों पर वैचारिक-राजनीतिक -आर्थिक और सांस्कृतिक हमले तेज करो,10.मतदान को मखौल बनाओ. 11.युवाओं को उन्मादी नारों में मशगूल रखो,12. खबरों और सूचनाओं को आरोपों-प्रत्यारोपों के जरिए अपदस्थ करो,13.भ्रमित करने के लिए रंग-बिरंगी भीड़ जमा रखो,लेकिन मूल लक्ष्य सामने रखो,बार-बार कहो हिन्दुत्व महान है,जो इसका विरोध करे उस पर कानूनी -राजनीतिक-सामाजिक और नेट हमले तेज करो,14.धनवानों से चंदे वसूलो,व्यापारियों को मुनाफाखोरी की खुली छूट दो।15.पालतू न्यायपालिका का निर्माण करो।

भाषण ,पिता और पिटाई


              यह घटना उस समय की है जब मैं मथुरा के माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में उत्तरमध्यमा के अंतिम वर्ष का छात्र था सबसे कम उम्र और सबसे छोटी कक्षा का पहलीबार छात्रसंघ का महामंत्री चुना गया था,यह घटना सन् 1974 की है। संस्कृत पाठशाला में आम सभा के जरिए छात्रसंघ का चुनाव होता । उस चुनाव में मैं जीत गया,जीतने के साथ महासचिव होने के नाते मुझे भाषण देना था, छात्रसंघ की परंपरा थी कि जो महासचिव चुना जाता था वह भाषण देता था,मैं भाषण देने से हमेशा बचता था, बल्कि यह कहें तो बेहतर होगा कि मुझे भाषण देना पसंद ही नहीं था। लेकिन छात्रसंघ की परंपरा का निर्वाह करते हुए मैंने अपने गुरुजनों के आदेश पर भाषण देना आरंभ दिया, भाषण संस्कृत में देना था , छात्रसंघ की समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी, संस्कृत में मिनट्स लिखे जाते थे और संस्कृत में संचालन होता था ,छात्रों और शिक्षकों को संस्कृत में ही बोलने का अघोषित निर्देश था, वैसे छात्र हिन्दी में भी बोल सकते थे, लेकिन एक परंपरा चली आ रही थी जिसके कारण समूची कार्यवाही संस्कृत में होती थी।
      मैंने पहलीबार भाषण दिया वह भी संस्कृत में और भाषण देते समय मेरी आंखों से लगातार आँसू टपक रहे थे। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैं क्यों रो रहा हूँ,मेरी गुरुजन भी परेशान थे, संयोग की बात थी कि मेरा भाषण  भाषा और शैली के लिहाज से अच्छा रहा, मेरे गुरुजनों ने मेरी खूब प्रशंसा की और एक सवाल किया कि तुम बोलते हुए रो क्यों रहे थे ? यह सवाल मेरे लिए आज भी अनुत्तरित है।
    संस्कृत कॉलेज में पढ़ते समय दूसरा महत्वपूर्ण भाषण सन् 1976 में छात्रसंघ के अध्यक्ष के रुप में दिया, यह आपातकाल का दौर था और संभवतः मेरा कॉलेज अकेला कॉलेज था जिसमें कानून तोड़कर छात्रसंघ का चुनाव हुआ और छात्रसंघ का सालाना जलसा भी हुआ जिसमें 'कौत्स की गुरु दक्षिणा' संस्कृत नाटक का मंचन हुआ और मेरा अध्यक्षीय भाषण हुआ। परंपरा के अनुसार यह में मेरा पहला लिखित संस्कृत भाषण था।
         आपातकाल में ही माकपा नेता सव्यसाची से संपर्क हुआ और आपातकाल के बाद उनके साथ पहलीबार होलीगेट पर तांगा स्टैंड पर सन् 1977 में नुक्कड़सभा में भाषण दिया। सव्यसाची का उन दिनों रिक्शा-तांगेवालों पर गहरा असर था, इसलिए सुनने वालों में वे ही ज्यादा था, संयोग की बात थी मेरे पिता ने मुझे भाषण देते देख लिया और उन्होंने मेरा भाषण सुना और चुपचाप गुस्से में घर चले आए, मैं बाद में जब घर पहुँचा तो उन्होंने कम्युनिस्टों को जीभर कर गालियां दीं, सव्यसाची को गालियां दीं, साथ भी मुझे पीटा भी और कहा कि तुम्हारा इतना पतन होगा मैंने यह तो सोचा ही नहीं था ,तुम पंडित हो,शास्त्री हो, तुमको कथा कहनी चाहिए, प्रवचन करना चाहिए, शास्त्रार्थ करना चाहिए, यह क्या तांगेवालों-रिक्शावालों में भाषण देते घूम रहे हो, यह तुम्हारे सम्मान के अनुरुप नहीं है अगलीबार यदि मैंने तुमको कम्युनिस्टों के साथ देखा तो डंडों से पीटूँगा।
      लेकिन मैं लाचार था, मेरे दोस्त लगातार बढ़ रहे थे और सभी पर साम्यवाद का गहरा असर था और सभी अच्छे परिवारों से आते थे,धीरे धीरे मेरे मंदिर पर आने वाले लोगों ने भी पिता से शिकायत की कि पंडितजी आपका बेटा तो बिगड़ गया है, आज वहां बोलते देखा,फलां जगह भाषण दे रहा था। मैं भाषण देकर जब भी लौटकर आता तो पिता पूछते  तुम फलां जगह भाषण देने गए थे आज, मैं सच बोल देता,बस,उसके बाद मेरी कसकर पिटाई होती, बाद में मैंने सच बोलना बंद कर दिया, उसके बाद मेरे पिता जब भी पूछते थे मैं साफ कह देता कि मैं भाषण देकर नहीं आ रहा,तो वे कहते कि फलां आदमी फिर तुम्हारा नाम क्यों ले रहा था, मैं कहता वे लोग चिढ़ते हैं,इसलिए झूठी शिकायतें करते रहते हैं।
उस दौर के भाषण और आंदोलनकर्म की एक दुर्घटनाबड़ी ही दिलचस्प है। किशोरी रमण गर्ल्स डिग्री कॉलेज में छात्राओं का शानदार आंदोलन हुआ,तकरीबन 15दिन तक हड़ताल के कारण कॉलेज बंद रहा। एक दिन इस आंदोलन के दौरान में चार सौ छात्राओं का जुलूस लेकर मथुरा के जिलाधीश के घर पर गया था, जुलूस में मैं अकेला लड़का था ,बाकी चार सौ लड़कियां थीं, उन दिनों मैं मथुरा में एसएफआई का जिलामंत्री था।यह वाकया सन् 1978 का है। उस समय डीएम एस.डी. बागला थे। संयोग की बात थी गर्मी का दिन था हम सीधे  उनके बंगले पर पहुँचे लेकिन वे बंगले पर नहीं थे, लड़कियां भूखी- प्यासी थीं, पानी आदि की बंगले के बाहर कोई व्यवस्था नहीं थी। मैंने चौकीदार से पानी देने को कहा उसने मना कर दिया, मैंने लड़कियों से कहा डीएम के घर के अंदर जाओ और जबर्दस्ती पानी पीओ और जो मिले खा-पी लो, बाकी जो होगा मैं देख लूँगा। मेरे बोलते ही 400लड़कियों ने बंगले के अंदर धावा बोल दिया और पूरा बंगला हमारे कब्जे में था, आराम से खाया-पिया,डेढ़ घंटे बाद डीएम आए,बंगले का अस्त-व्यस्त सीन देखकर घबड़ाए और बोले बंद करवा दूँगा ,लड़कियां बिफरी हुईं थीं और इतनी लड़कियों को देखकर डीएम के होश उड़े हुए थे, मैंने कहा आपने यदि भूल से गलती कि तो ये लड़कियां आपको पीटेंगी, डीएम शांत हो गए, उन्होंने हमारी मांगे ध्यान से सुनीं और हमें कार्रवाई का आश्वासन देकर विदा किया। लेकिन डीएम ने मेरे पिता को संदेशा भिजवा दिया कि पंडितजी अपने बेटे को संभालिए वरना हाथ से निकल जाएगा, एक साथ इतनी लड़कियों के साथ उसका जुलूस में आना अच्छा लक्षण नहीं है। मैं शाम को घर लौटा तो पिता ने पूछा कहां गए थे मैंने झूठ बोला कि कहीं नहीं कॉलेज से आ रहा हूँ, बस फिर क्या था जमकर पिटाई हुई और कमरे में बंद कर दिया गया, (दिलचस्प बात यह थी कि डीएम मेरे मंदिर पर हर रविवार आते थे, वे पिता और मुझे जानते थे। वे अंदर से दुखी थे कि मैं कम्युनिस्ट क्यों हूँ !) लड़कियों का  आंदोलन चरम था पर मैं घर में कैद था, पिता कहीं बाहर जाने ही न दे रहे थे, बाहर सारे मित्र और कॉमरेड परेशान थे, कोई संपर्क नहीं कर पा रहा था , खैर किसी तरह दो दिन बाद में पिता को यह वचन देकर बाहर निकला कि किसी आंदोलन-जुलूस में नहीं जाऊँगा और कहीं पर भाषण नहीं दूँगा।कॉमरेडों से नहीं मिलूँगा। लेकिन मैं क्या करूँ मैं अपनी आदत से लाचार था,बाहर भाषण देता था और घर पर आए दिन पिता से पिटता था, सन् 1979 में जेएनयू जाने बाद ही पिता की पिटाई से मुक्ति मिला।