सोमवार, 29 सितंबर 2014

मेडिसन स्क्वेयर के चाक्षुष आनंद की मोदीधुन


        मोदी के भाषणों की सबसे बड़ी विशेषता है मेनीपुलेशन। मेनीपुलेशन के बिना वे भाषण नहीं देते। उनके भाषण की दूसरी विशेषता है फुटपाथशैली। इन दोनों शैलियों का मेडिसन स्केवयर गार्डन में दिए गए भाषण में उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया।मसलन् मोदी ने कहा गांधीजी को 'आज़ादी' और 'सफ़ाई' ये दो चीज़ें पसंद थीं। सच यह है गांधीजी को आजादी और साम्प्रदायिक सद्भाव पसंद था। स्वच्छता उनकी राजनीतिक जंग का अंग ही नहीं था। अस्पृश्यता निवारण उनके लक्ष्यों में से एक जरुर था। सवाल यह है मोदीजी यह सब बताना भूल गए अथवा उनकी संघ बुद्धि ने बताने नहीं दिया ?
    मोदी का अपने हर अभियान में महात्मा गांधी का इस्तेमाल बताता है कि आनेवाले दिनों में महात्मा गांधी के विचारों का वे जमकर दुरुपयोग करेंगे । इतिहासकारों की यह जिम्मेदारी है कि इस मामले में सजगता दिखाएं। मोदी जिस तरह विचारधाराहीन महात्मा गांधी पेश कर रहे हैं,इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वह भारत के लिए चिंता की बात है। मसलन् महात्मा गांधी का भारत आना,किसी आप्रवासी का भारत आना मात्र नहीं था,जैसाकि मोदी ने पेश किया।वे देश को साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराने के लक्ष्य के लिए आए थे। मोदी की इतिहासबुद्धि किस तरह कचड़े से भरी है इसका यह नमूनामात्र है। भारत के प्रधानमंत्री का राष्ट्रपिता के विचारों का इस तरह का दुरुपयोग और उनके विचारों को तोड़-मरोड़कर पेश करना भारत की विश्व में इमेज को गिराने वाला है। इससे यह भी संदेश गया है कि मोदी ने महात्मा गांधी को न तो पढ़ा है और न सही रुप में समझा है। मीडिया के उन्मादी प्रचार अभियान के आड़ में भारत के राजनीतिक विचारों और लक्ष्यों के साथ किस तरह का मेनीपुलेशन चल रहा है उसकी ओर नजर रखने की जरुरत है। इसी प्रसंग में एक और उदाहरण लें,मोदी ने कहा मैं बहुत खुश होऊँगा यदि रोज एक कानून खारिज करके निकाला जाय़ । नव्य आर्थिक उदारीकरण की यह मूल मांग है कानूनों को धता बताओ।कानूनहीन लूट की व्यवस्था स्थापित करो। मनमोहन सिंह ने अपने तरीके से इस दिशा में बहुत कुछ ऐसा किया है जिसको 'क्रोनी कैपीटलिज्म'' के नाम से हम सब जानते हैं। कानूनहीन सरकार के फैसले कैसे होते हैं उसका आदर्श नमूना है कोयलाकांड! मोदी कानून निकालो का नारा देकर अपने विलायती आकाओं को खुश करने के साथ देशी आकाओं को भी खुश करने की कोशिश कर रहे थे,लेकिन कोयला खान आवंटन ने कानूनहीन शासन की पोल खोलकर रख दी है।
    कहने का अर्थ है मोदी अपने उन्मादी भाव में जो कुछ बोलते हैं उसका लक्ष्य सिस्टम बनाना नहीं है बल्कि उसका लक्ष्य है सिस्टम को तोड़ना। सिस्टम बनाने में समय लगता है तोड़ने में समय नहीं लगता। नव्य आर्थिक उदारीकरण की जन्मभूमि अमेरिका में 'कानून निकालो' का नारा ओबामा और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुश कर सकता है लेकिन हिन्दुस्तान की संघर्षशील जनता इस मनमानी की कभी इजाजत नहीं दे सकती। कानूनहीन शासन की मांग बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पुरानी मांग है। लेकिन देशभक्त जनता कानून का शासन,कानूनी व्यापार,कानूनी उद्योग आदि चाहती है।
     मोदी को मेडिसन स्क्वेयर में जो लोग बैठकर सुन रहे थे, वे मूलतःअमेरिकी नागरिक हैं।ये वे लोग हैं जो भारत से लाभ लेना चाहते हैं लेकिन भारत को इनसे कोई बड़ा लाभ अभी तक नहीं मिला है। ये वे लोग हैं जो वहां जाकर बस गए हैं।जलसे,मेले,इवेंट आदि इनकी दैनंदिन जिंदगी का अंग है। इनमें से अधिकांश देश के प्रति उत्सवधर्मीभाव रखते हैं। इस आयोजन के दौरान वे आनंद-उन्माद और कैमराभाव में डूबे हुए थे। उनके लिए न तो अमेरिका राष्ट्रगान और न भारतीय राष्ट्रगान अर्थपूर्ण था क्योंकि ऑडिएंस में सब अपने आनंद भाव की बार बार अभिव्यक्ति कर रहे थे। वे यह तक नहीं जानते कि राष्ट्रीय गान के समय किस मुद्रा में अपने भावों को प्रदर्शित करें। दर्शकों की इस तरह की उदासीनता से यह संदेश भी गया है आप्रवासी भारतीय अपने को राष्ट्रीयगान की गरिमा के अनुकूल भी अभी शिक्षित नहीं कर पाए हैं।उनकी फूहड़ता का आलम यह था कि राष्ट्रगान के बाद वे तालियां बजा रहे थे। मोदी को इस तरह की जनता में मजा आता है और यही फूहड़ जनता हर हर मोदी में मगन है।  
     मोदी की फुटपाथी विक्रयशैली के लिए देश और उसके लोग माल हैं। देश बिकाऊ है। मोदी ने जिन तीन चीजों को भारत की शक्ति के रुप में पेश किया वह उनके फुटपाथी नजरिए को दरशाता है । मोदी के अनुसार भारत के पास ३ चीज़ें हैं ,ये हैं- १. लोकतंत्र, २. डेमोग्राफिक डिवीडेंट ३.डिमांड ,ये तीनों शक्तियाँ आज कहीं नहीं है। भारत को इस तरह माल में रुपान्तरित करके पेश करना भारत का अपमान है।भारत सप्लायर देश नहीं है। हमें भारत को सप्लायर देश की मानसिकता से बाहर निकालना होगा। सप्लायर देश की बजाय उत्पादक देश के रुप में इमेज पेश करनी चाहिए। मोदी भूल गए कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है और ये तीनों चीजें वहां पर भी हैं लेकिन वे अपने देश की छवि सप्लायर के रुप में पेश नहीं करते। श्रमिक सप्लायर की दृष्टि देशज दृष्टि नहीं है। मोदी यह ध्यान रखें  सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक लोकतंत्र को पुख्ता नहीं बनाते। लोकतंत्र पुख्ता तब बनता है जब श्रमिकों को बेहतर पगार मिले।सस्ता श्रम और सस्ता श्रमिक देश में तानाशाही को पुख्ता बनाते हैं। यह सच है  मेडिसन स्क्वेयर में अनेक सेनेटर आए और यह उनकी भारत के प्रति गहरी मित्रता की निशानी है।लेकिन इस कार्यक्रम के आयोजकों ने मंचपर प्रस्तुत विभिन्न कार्यक्रमों में सिर्फ भारत का ही झ़डा फहराया ,कायदे से दोनों देशों के झ़डे रहते तो अच्छा होता।इससे अंध राष्ट्रवादी भावों को अभिव्यक्ति मिली।इसी अंध राष्ट्रवादी भावबोध का परिणाम था कि आजतक टीवी चैनल के राजदीप सरदेसाई पर कुछ उन्मादियों के हमला करके उनकी जुबान बंद करने की कोशिश की।
     मोदी के मेडिसन स्क्वेयर इवेंट का अमेरिकी नीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा।इसका प्रधान कारण है कि अमेरिकी प्रशासन नियोजित इवेंट,नियोजित मीडिया उन्माद और नियोजित भीड़ की राजनीति का अभ्यस्त है। वे जानते हैं कि इसमें स्वतःस्फूर्त कुछ भी नहीं है। भुगतान के आधार पर जुटायी जनता और राजनीति का क्षणिक चाक्षुष आनंद होता है।इससे ज्यादा उसकी अहमियत नहीं होती।





सोमवार, 22 सितंबर 2014

जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन के बहाने नए बंगाल की तलाश



पश्चिम बंगाल में विगत कई सालों में जिस तरह की जड़ता,हताशा और पराजय भाव का जन्म हुआ है उसने सभी जागरुक लोगों को चिन्ताग्रस्त किया है। चिन्ताएं इसलिए भी बढ़ी हैं क्योंकि वामदलों की साख घटी है, जनसंघर्षों के प्रति संशय और संदेह का भाव बढ़ा है। मध्यवर्ग में कदाचार और हिंसाचार के प्रति सहिष्णुता बढ़ी है। विश्वविद्यालय-कॉलेजों में व्यापक आतंक और कदाचार बढ़ा है। शिक्षक-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मियों की इमेज धूमिल हुई है। उन पर हमले बढ़े हैं। शासकों में अन्याय-हिंसा –भ्रष्टाचार-बर्बरता की नग्न हिमायत ने जन्म लिया है। सभ्य बंगाल अब असभ्य और बर्बर प्रतीत होने लगा है !

सभ्य बंगाली अपने को बंगाली कहने में लज्जित महसूस करने लगे हैं। बंगाल में लंपटई,दबंगई,कु-संगति का आज जितना सम्मान है उतना सभ्यता का सम्मान नहीं रह गया है। बुद्धिजीवियों को कल तक ओपिनियनमेकर माना जाता था लेकिन आज उनकी आवाज को कोई सुन नहीं रहा। कल तक ज्ञानी-गुणी-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मी-कलाकार –शिक्षक आदि को गर्व की नजर से देखा जाता था लेकिन आज वह सब गायब हो चुका है। यही वह परिवेश है जिसमें राजनीति में वाम की पराजय हुई और ममता बनर्जी का उदय हुआ और उसके सत्तारुढ़ होते ही असभ्यता का चौतरफा विस्तार हुआ। ममता शासन की एक ही बड़ी देन असभ्यता-असभ्यता-असभ्यता।

ममता ने जिस समय वाम के खिलाफ मोर्चा संभाला था बंगाल असभ्यता के शिखर था। हर क्षेत्र में सभ्यता के मानक नष्ट करने का काम वाम ने किया और इसकी प्रक्रिया आंरंभ होती है ज्योति बसु के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के साथ। मुख्यमंत्री के तौर पर बुद्धदेव भट्टाचार्य का शासन असभ्यता के विकास का शासन है। उसकी स्वाभाविक परिणति ममता विजय में हुई। ममता ने वाम को राजनीति में हरा दिया लेकिन असभ्यता की मीनारों को तोड़ने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि स्वयं असभ्यता की मीनारों पर जाकर बैठ गयी। सभ्य बंगाल में असभ्यता की मीनारें किसने बनायीं और समूचा समाज असभ्यता के नागपाश में कैसे बंध गया यह अपने आपमें दिलचस्प है।

बंगाल में असभ्यता के आख्यान की नींव कांग्रेस ने 1972-77 के फासीवादी दौर में रखी,माओवादियों,कांग्रेस और माकपा ने उसमें पानी डाला,सींचा और पल्लवित किया। ममता ने उसकी समूची फसल को बेचा और खाया। ममता की भाषा,भंगिमा,राजनीति,सांगठनिक जनाधार आदि ने कुल मिलाकर असभ्यता के अनुकूल दिशा में राजकीय संरचनाओं को मोड़ दिया। आज असभ्यता से मुक्ति के नाम पर जो विकल्प आ रहा है वह है भाजपा जो असभ्यता का अजगर है। संक्षेप में देखें तो वाम असभ्यता का बिच्छू था,तृणमूल असभ्यता का साँप और भाजपा असभ्यता का अजगर है। जाहिर है कोई भी सभ्य विकल्प इन सबके परे जाकर ही निकल सकता है। यही वो परिदृश्य है जिसको केन्द्र में रखकर जादवपुर विश्वविद्यालय के मौजूदा छात्र आंदोलन को देखा जाना चाहिए। यह आंदोलन क्षयिष्णु वातावरण में आशा की किरण की तरह है। यह आंदोलन सफल होगा कि नहीं यह तो भविष्य में तय होगा । लेकिन एक बात तय है कि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने स्त्री के अपमान और उत्पीडन के मामले को जिस दृढ़ता और आस्था के साथ उठाया है उसने नए बंगाल के निर्माण की नींव डाल दी है। इस आंदोलन के साथ बंगाल ने असभ्यता के खिलाफ प्रतिवाद की शुरुआत कर दी है। इस आंदोलन की खूबी है कि इसके केन्द्र में स्त्री उत्पीडन का मुद्दा है। सभ्यता के नए आख्यान के निर्माण के लिए यह बिंदु बेहद महत्वपूर्ण है। आंदोलनकारी छात्र सरकार बनाने या गिराने के लिए आंदोलन नहीं कर रहे हैं बल्कि स्त्री के सम्मान ,सुरक्षा और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। स्त्री का बंगाल की राजनीति में मुद्दे के तौर पर केन्द्र में आना अपने आपमें बहुत ही मूल्यवान परिवर्तन का संकेत है। इस बिंदु से नए सभ्य बंगाल की संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। जादवपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति आदि को हटाने की मांग तो इस मसले में ईंधन का काम कर रही है। जादवपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति द्वारा स्त्री उत्पीडन की घटना की उपेक्षा करना और उसे गंभीरता से न लेना एकसिरे गलत और निंदनीय कृत्य है। उपकुलपति यह भूल गए कि एक स्त्री के साथ उत्पीडन की घटना सामान्य रुटिन घटना नहीं है।उनका केजुअल और उपेक्षाभाव इस बात को भी दरशाता है कि बौद्धिकों में किस तरह की स्त्रीविरोधी मानसिकता घर कर गयी है। उपकुलपति के रवैय्ये को देखकर यही लगता है बंगाल का बौद्धिक वातावरण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। यहाँ के बुद्धिजीवियों-संस्कृतिकर्मियों में स्त्री के सम्मान और सुरक्षा के प्रति कोई सचेतनता नहीं बची है। दो सप्ताह से ज्यादा समय हो चुका है लेकिन बंगाल के तथाकथित बुद्धिजीवीवर्ग की आवाज और प्रतिवाद को हमने कहीं पर भी नहीं देखा। आखिरकार वे चुप क्यों हैं ? उनके सामने वे कौन सी बाधाएं जिनके कारण अपने चारों ओर होनेवाली असभ्यता की घटनाओं को मूकदर्शक की तरह देख रहे हैं और उनको कभी सड़कों पर प्रतिवाद करने का मन नहीं होता ! स्त्री की अवमानना और उत्पीडन की विगत तीन साल में सैंकड़ों घटनाएं हुई हैं लेकिन बुद्धिजीवी लंबी तानकर सोए हुए हुए हैं। बौद्धिकता का इस तरह का बेसुधभाव तो बंगाल ने कभी नहीं देखा !

     आज जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र दोपहर 12बजे आमसभा करने जा रहे हैं और वे अपने आंदोलन की भावी योजना बनाएंगे। हमें उम्मीद है कि वे सही दिशा में कदम उठाएंगे।वे लंबे समय से कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं, उन्होंने उपकुलपति का घेराव किया और उनके घेराव को पुलिस हस्तक्षेप के जरिए तोड़ा गया, छात्रों को पुलिसवालों ने निर्ममता से पीटा अनेक छात्र घायल हुए और इसके प्रतिवाद में हजारों छात्रों ने विशाल जुलूस निकाला और राज्यपाल को जाकर ज्ञापन दिया। इस समस्या के सम्मानजनक समाधान की दिशा में राज्य सरकार कोई प्रयत्न करती नजर नहीं आ रही। उलटे शिक्षामंत्री ने सबसे असभ्य बयान दिया है। उन्होंने कहा है जिन छात्रों को वीसी पसंद नहीं है वे जादवपुर विश्वविद्यालय छोड़कर अन्यत्र चले जाएं। हम इस बयान की निंदा करते हैं। साथ ही कहना चाहते हैं विश्वविद्यालय राज्य सरकार के शिक्षामंत्री और वीसी की जागीर नहीं है, यह छात्रों और बंगाल की संपदा है। शिक्षामंत्री भूल रहे हैं कि यदि जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र अपनी मांगों पर अड़ गए तो समूची ममता मंडली को बंगाल के बाहर भाड़े के घर खोजने होंगे। वे यह देख ही नहीं पा रहे हैं कि छात्रों के प्रतिवाद की अग्नि में बंगाल की असभ्यता धू धू करके जल रही है।

रविवार, 21 सितंबर 2014

कार्ल मार्क्स और सर्वहारा की तानाशाही

              इन दिनों फेसबुक पर अशिक्षितों का फैशन हो गया है कि वे मार्क्स को शैतान सिद्धांतकार और सर्वहारा की तानाशाही को गंदी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। इसमें सभी रंगत और विचारधारा के लोग हैं,यहां तक कि मार्क्स के अनुयायी होने का दावा करने वाले पूर्व मार्क्सवादियों में भी एक वर्ग है जो सर्वहारा की तानाशाही की गलत व्याख्या करता है।
       
      सर्वहारा की तानाशाही का मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही नहीं है। व्यवहार में अनेक पूर्व समाजवादी देशों में इस अवधारणा का इसी रुप में इस्तेमाल किया गया। पूर्व समाजवादी देशों में सर्वहारा की तानाशाही का जिस तरह दुरुपयोग हुआ उससे यह धारणा विकृत हुई और इसकी गलत समझ प्रचारित हुई। मुश्किल यह है कि एक तरफ बुर्जुआजी का कु-प्रचार और दूसरी ओर कम्युनिस्टों के द्वारा इस धारणा का भ्रष्टीकरण ये दो चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं। कार्ल मार्क्स की अनेक धारणाओं को इन दोनों ओर से गंभीर खतरा है। तीसरा खतरा सोशल मीडिया ने पैदा किया है। इसके यूजरों का एक बड़ा हिस्सा है जो मार्क्सवाद को एकदम नहीं जानता लेकिन मार्क्सवाद ,साम्यवाद और उससे जुड़ी धारणाओं के बारे में आए दिन फेक प्रतिक्रियाएं देते रहते हैं। यहां हम ''सर्वहारा की तानाशाही'' के बारे में मार्क्स के विचारों के विवेचन तक सीमित रखेंगे।

मौजूदा दौर में हमारे समाज पर विश्वव्यापी वित्तीय संस्थाओं ,बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों का नियंत्रण है। वे ही तय कर रहे हैं कि देश और दुनिया में क्या होगा ?किस तरह का विकास होगा और किस तरह के सामाजिक मूल्य और राजनीतिक संरचनाएं काम करेंगी? इन संस्थाओं के निदेशकों को जनता कभी नहीं चुनती,यानी आज दुनिया को वे लोग चला रहे हैं जिनका चयन जनता नहीं करती।जबकि इनके फैसलों से करोड़ों लोग सीधे प्रभावित होते हैं।ये ही वे लोग हैं जिन्होंने सत्तादास की नयी राजनीतिक श्रेणी निर्मित की है जो सरकार चलाती है।सतह पर सरकारें कभी –कभी अपने इन आकाओं के खिलाफ फैसले लेती हैं, टैक्सचोरी के आरोप लगाकर जुर्माना वसूलती हैं,किसी न किसी अपराध में उनके बड़े अफसरों को गिरफ्तार भी करती हैं। यहां तक कि उनके ऊपर असामाजिक आचरण का आरोप तक लगाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि जिनको मार्क्स में तानाशाही नजर आती है लेकिन उनको वित्तीय-संस्थाओं की तानाशाही नजर नहीं आती।बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बैंकों के मालिकों के आचरण में कहीं तानाशाही नजर नहीं आती।जबकि ये संस्थाएं खुलेआम अ-लोकतांत्रिक व्यक्तियों के निर्देशन में काम करती हैं। सच्चाई यह है कि मौजूदा पूंजीवादी समाज ने मानवता की अपूरणीय क्षति की है। इसके बावजूद हमारा पूंजीवाद के प्रति आकर्षण किसी भी तरह कम नहीं हो रहा। हम इस या उस पूंजीवादी दल के अनुयायी होने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। हमें कांग्रेस से नफरत है या भाजपा या बसपा या सपा आदि से नफरत है लेकिन अंततः हम यही चाहते हैं कि कोई न कोई पूंजीवादी दल सत्ता में आए। जबकि पूंजीवाद की जनविरोधी,लोकतंत्र विरोधी भूमिका के प्रमाण पग-पग पर बिखरे पड़े हैं।इनकी ओर हम कभी देखते तक नहीं हैं और आए दिन कम्युनिस्टों और मार्क्सवादियों पर हमले करते रहते हैं। मार्क्सवादियों पर किया गया प्रत्येक हमला बर्बर पूंजीवाद की सेवा ही माना जाएगा। यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसे ध्यान रखें और मार्क्स प्रतिपादित ''सर्वहारा की तानाशाही'' की अवधारणा पर विचार करें।

मार्क्स ने 'फ्रांस में गृह-युद्ध' नामक कृति में विस्तार के साथ अपने लोकतांत्रिक नजरिए का प्रतिपादन किया है। मार्क्स ने रेखांकित किया है कि मजदूरवर्ग कभी भी राज्य की तैयारशुदा मशीनरी के साथ हाथ मिलाकर काम नहीं कर सकता।क्योंकि राज्य की मशीनरी का मकसद और मजदूरवर्ग के मकसद में अंतर है। दूसरा कारण यह कि राज्य मशीनरी में यथास्थितिवाद के प्रति पूर्वाग्रह भरे होते हैं। आज हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें अनेक अ-लोकतांत्रिक चीजें मुखौटे लगाकर सक्रिय हैं वे अलोकतांत्रिक हितों की खुलेआम रक्षा कर रहे हैं।

मार्क्स के लोकतांत्रिक स्व-शासन के मॉडल को देखना हो तो सन् 1871 के पेरिस कम्यून के शासन को गंभीरता से देखा जाना चाहिए। यह वह दौर है जिसमें कुछ समय के लिए फ्रांस के मजदूरों और आम जनता ने शासन अपने हाथों में ले लिया था। 'फ्रांस में गृहयुद्ध' नामक कृति में मार्क्स ने बताया है कि कम्यून का अर्थ क्या है ? यह मूलतः नगरपालिका के स्थानीय कौंसलरों का शासन है, जिनमें अधिकतर कामकाजी लोग थे,ये लोकप्रिय मतदान के जरिए चुनकर आए थे और उनको जनता को वापस बुलाने का भी अधिकार था। यहां पर उनको मजदूरों की मजदूरी के बराबर काम करने के लिए वेतन मिलता था। कोई विशेषाधिकार या विशेष सुविधाएं उनके पास नहीं थीं। स्थायी सेना समाप्त कर दी गयी थी।पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया था।कम्यून आने के पहले फ्रांस के राज्य,कमाण्डरों और पादरियों के हाथों में सत्ता हुआ करती थी,कम्यून का शासन स्थापित होने के बाद ये सब सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए। शिक्षा संस्थानों के दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए गए।शिक्षा को राज्य और चर्च के दखल से मुक्त कर दिया गया।मजिस्ट्रेट,जज और सार्वजनिक पदों पर काम करने वालों का जनता चुनाव करती थी। वे जनता प्रति जबावदेह थे और जनता को उनको वापस बुलाने हक भी था। कम्यून के शासन ने निजी संपत्ति को भी खत्म कर दिया था।उसकी जगह सामुदायिक उत्पादन ने ले ली थी। पूंजीवादी वर्गीय शोषण को खत्म करके सामाजिक जनतंत्र की नींव रखी गयी।स्थायी सेना को खत्म करके जनता को हथियारबंद कर दिया गया।

पेरिस कम्यून की स्थापना जनता के द्वारा चुने गए सभासदों के जरिए की गयी। मार्क्स ने लिखा है ''कम्यून नगर सभासदों को लेकर गठित हुआ था,जो नगर के वार्डों से सार्विक मताधिकार द्वारा चुने गए थे,जो उत्तरदायी थे और साथ ही किसी भी समय हटाये जा सकते थे।कम्यून के अधिकांश सदस्य स्वभाववतया मजदूर अथवा मजदूर वर्ग के जाने –माने प्रतिनिधि थे। कम्यून संसदीय नहीं ,बल्कि एक कार्यशील संगठन था,जो कार्यकारी और विधिकारी दोनों कार्य साथ-साथ करता था।''( का,मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स,पेरिल कम्यून,प्रगति प्रकाशन, 1980, पृ.84) पुलिस को कम्यून के प्रति जबावदेह बनाया गया और यही काम प्रशासन के अन्य अंगों के बारे में भी किया गया। कम्यून के सदस्यों को वही मजदूरी मिलती थी जो मजदूरों को मिलती थी। विभिन्न किस्म के भत्तों का अंत कर दिया गया।किसी भी विभाग के पास कोई विशेषाधिकार नहीं थे, सब कुछ कम्यून के हवाले था।पादरियों को सार्वजनिक पदों से मुक्त करके एकांत में जीने के लिए भेज दिया गया। उन्हें धार्मिक महात्माओं की तरह जीवन-यापन करने के लिए कहा गया।इसी तरह विज्ञान को भी वर्गीय-पूर्वाग्रहों और सरकारी दबावों से मुक्त कर दिया गया। चर्च की संपत्ति जब्त कर ली गयी। बंद पड़े वर्कशाप और फैक्ट्रियों को मुआवजे की शर्त के साथ खोल दिया गया । वर्ग-संपत्ति को खत्म कर दिया गया।

कम्यून के संचालक यह नहीं मानते ते कि वे कभी गलती नहीं कर सकते। उनकी जानकारी में यदि कोई गलती लायी जाती थी तो वे उसे तुरंत दुरुस्त करते थे।उनकी कथनी और करनी में साम्य था। वे जो कहते थे वही करते थे। पेरिस कम्यून स्थापित होने के बाद पेरिस की शक्ल ही बदल गयी। भ्रष्ट आडंबरयुक्त पेरिस खत्म हो गया। मुर्दाखाने में लाशें न थीं,रात को चोरियां होना बंद हो गयीं,राहजनी बंद हो गयी।फरवरी 1848 के बाद पेरिस की सड़कें पहलीबार निरापद हुईं। सड़कों पर पुलिस का पहरा नहीं होता था।पेरिस की वेश्याएं गायब हो गयीं।हत्या,चोरी और व्यक्तियों पर हमले की घटनाएं एकदम बंद हो गयीं। यही वह शासन है जिसको उस समय ''सर्वहारा की तानाशाही'' का नाम दिया गया। उस समय इसका वह अर्थ नहीं था जो इन दिनों प्रचारित किया जाता है।

मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन ने लिखा है कि उस समय इस पदबंध का अर्थ था ''लोकप्रिय लोकतंत्र''। ''सर्वहारा की तानाशाही'' का सामान्य अर्थ था बहुमत का शासन। आज ''तानाशाही'' का जो अर्थ लिया जाता है वह अर्थ मार्क्स के जमाने में नहीं था। आजकल तानाशाही का अर्थ है संविधान का उल्लंघनकर्ता। असल में कार्ल मार्क्स ने ''सर्वहारा की तानाशाही''पदबंध लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी (1805-1881) से लिया। ब्लांकी फ्रांसीसी क्रांतिकारी थे और उन्होंने ही इस पदबंध को जन्म दिया। उनकी नजर में ''सर्वहारा की तानाशाही'' का अर्थ था साधारण जनता का स्व-शासन। मार्क्स ने भी इसी अर्थ में इस पदबंध का इस्तेमाल किया है। उल्लेखनीय है लूइ ओग्यूस्त ब्लांकी बाद में पेरिस कम्यून के जनता के द्वारा चुने गए राष्ट्रपति बने लेकिन उस समय जेल में डाल दिए गए थे।





कार्ल मार्क्स और लोकतंत्र


       कार्ल मार्क्स के बारे में मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक अनेक मिथ प्रचलित हैं।इन मिथों में एक मिथ है कि मार्क्स का लोकतंत्र से कोई सम्बन्ध नहीं है,मार्क्स लोकतंत्र विरोधी हैं। फलश्रुति यह कि जो मार्क्स को मानते हैं वे लोकतंत्र विरोधी होते हैं। सच्चाई इसके एकदम विपरीत है।मार्क्स ने अपना जीवन रेडीकल या परिवर्तनकामी लोकतांत्रिक नागरिक के रुप में आरंभ किया। कालान्तर में वे इस मार्ग पर चलते हुए क्रांतिकारी बने। अपने व्यापक जीवनानुभवों के आधार पर मार्क्स ने तय किया कि लोकतंत्र को वास्तव लोकतंत्र में रुपान्तरित करना बेहद जरुरी है।

हममें से अधिकांश लोकतंत्र के प्रचलित रुप को मानते और जानते हैं। लेकिन जेनुइन लोकतंत्र को हम लोग नहीं जानते अथवा उसे पाने से परहेज करते हैं। कार्ल मार्क्स के समग्र लेखन और कर्म पर विचार करें तो पाएंगे कि वे राजसत्ता की परमसत्ता के विरोधी थे। प्रसिद्ध ब्रिटिश मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन के अनुसार मार्क्स जनता की लोकप्रिय संप्रभुता के पक्षधर थे। इसका एक रुप संसदीय लोकतंत्र है। वे सिद्धांततः संसद के विरोधी नहीं थे। वे मात्र संसद में ही लोकतंत्र के पक्षधर नहीं थे उसके आगे जाकर वे वास्तव अर्थों में स्थानीय,लोकप्रिय संप्रभु,स्वायत्त शासन के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि लोकतंत्र में सभी संस्थानों को स्वायत्तता प्राप्त हो। नागरिक समाज के सभी संस्थानों को स्वायत्तता मिले।मार्क्स चाहते थे कि इस स्वायत्तता को राजनीतिक से लेकर आर्थिक क्षेत्र तक विस्तार दिया जाय।इस अर्थ में वे आत्म निर्भर सरकार के पक्षधर थे।

टेरी इगिलटन ने लिखा है कि मार्क्स राजनीतिक अभिजात्यवर्ग तक सीमित मौजूदा लोकतांत्रिक सरकार के विरोधी थे।मार्क्स का मानना था नागरिक की स्वशासन में निर्णायक भूमिका होनी चहिए। वे अल्पमत पर बहुमत के शासन के मौजूदा सिद्धांत के विरोधी थे। वे मानते थे कि नागरिक स्वयं राज्य पर शासन करें न कि राज्य उन पर शासन करे। मार्क्स का मानना था लोकतंत्र में राज्य का नागरिक समाज से अलगाव हो गया है। इन दोनों के बीच में सीधे अन्तर्विरोध पैदा हो गया है। मसलन् राज्य की नजर में अमूर्त रुप में सभी नागरिक समान हैं। जबकि वे दैनंदिन जीवन में असमान हैं। नागरिकों का सामाजिक अस्तित्व अन्तर्विरोधों से ग्रस्त है। जबकि राज्य उन सबको समान मानता है। राज्य ऊपर से समाज को निर्मित करने वाले की इमेज संप्रेषित करता है।जबकि उसकी यह इमेज तो सामाजिक परिस्थितियों का प्रतिबिम्बन है। इगिलटन ने लिखा है राज्य पर समाज निर्भर नहीं है बल्कि समाज पर राज्य परजीवी की तरह निर्भर है। लोकतंत्र में सब उलटा –पुलटा हो जाता है। पूंजीवाद ऊपर आ जाता है और लोकतंत्र नीचे चला जाता है। कायदे से लोकतंत्र को ऊपर यानी राजसत्ता का संचालक होना चाहिए लेकिन उलटे पूंजीवाद राज्य का संचालक बन जाता है। इसका अर्थ है कि समस्त संस्थानों को संचालित लोकतंत्र नहीं करता बल्कि पूंजीवाद संचालित करने लगता है।



मार्क्स का लक्ष्य था राजसत्ता और समाज के बीच के अंतराल को कम किया जाय।राजनीति और दैनंदिन जीवन के बीच के अंतराल को कम किया जाय। वे चाहते थे कि लोकतांत्रिक ढ़ंग से राज्य और राजनीति दोनों की भूमिका को स्वशासन के जरिए खत्म किया जाय।मसलन् समाज के पक्ष में राजसत्ता का अंत किया जाय,दैनंदिन जीवन के सुखमय विकास के लिए राजनीति का अंत किया जाय।इसी को मार्क्सीय नजरिए से लोकतंत्र कहते हैं।दैनंदिन जीवन में स्त्री और पुरुष अपने हकों को प्राप्त करें यही उनकी कामना थी,मौजूदा लोकतंत्र में स्त्री-पुरुष के हकों को राजसत्ता ने हड़प लिया है।टेरी इगिलटन के अनुसार समाजवाद तो लोकतंत्र की पूर्णता है वह उसका नकार नहीं है। हमें सोचना चाहिए कि मार्क्स के इस नजरिए में आपत्तिजनक क्या है जिसके लिए उन पर तरह-तरह के हमले किए जाते हैं।

शनिवार, 20 सितंबर 2014

इमेजों के विभ्रम में कैद मोदी

       नरेन्द्र मोदी के लिए चीन के राष्ट्रपति की यात्रा काफी असुविधाजनक रही है। इस यात्रा के दौरान मोदी इमेज युद्ध में ढ़ीले पड़ गए। पराजित भी हुए। मोदी फोटो सचेत रहे जबकि चीन के राष्ट्रपति ने अपने को स्वाभाविक रखा।मोदी की नजर कैमरे पर थी लेकिन चीन के राष्ट्रपति की नजर मोदी पर थीं।लगता है मोदी के सलाहकारों ने ठीक से कैमरा अभ्यास नहीं कराया या फिर मोदी सही ढ़ंग से सीख नहीं पाए।
फोटोसचेत नेता निष्प्रभावी होता है। इमेज युद्ध में जीनेवाले की इमेजों में ही विदाई होती है। वह आनंदमय क्षण था कि मोदी जब चीन के राष्ट्रपति से मिल रहे थे! साथ ही वे अपना विलोम भी रच रहे थे! लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने इमेजों के जरिए "नायक" को रचा था!लेकिन चीन के राष्ट्रपति से मिलते हुए वे नायक कम फोटो सचेतक ज्यादा नजर आए। उनके कायिक इमेज संसार में सहजता-सरलता और स्वाभाविकता एकसिरे से नदारत थी और इसने मोदी की इमेज को नुकसान पहुँचाया है।इससे भारत की इमेज पर भी बुरा असर पड़ा है। हमें संदेह है कि मोदी के व्यक्तित्व से चीन के राष्ट्रपति प्रभावित हुए होंगे!
नेता कूटनीतिक क्षणों में मुसकराते हैं ,दांत नहीं दिखाते! मोदी भूल ही गए कि दाँत दिखाते हुए हँसना राजनयिक सभ्यता का उल्लंघन है।दूसरी भूल यह हुई कि वे बे-मौसम हँस रहे थे, कूटनीति गंभीर कार्यव्यापार है,यह बच्चों की हँसी -ठिटोली नहीं है!
मोदी को अपनी कायिक भाषा को रुपान्तरित करना होगा। उनका अनौपचारिक भाव इमेजों के जरिए विलोम रच रहा है। राजनयिक भावबोध के समय परंपरा ,सहजता ,नियम और सभ्यता का ख्याल रखा जाना चाहिए। भारत में इमेजों को लोग नहीं पढ़ते लेकिन चीन में पढ़ते हैं, चीन में मोदी का इमेज संदेश अच्छा नहीं गया है।मोदीजी आगे अमेरिका जाने वाले उनको कूटनीति के अनुरुप इमेज बनाने पर ध्यान देना होगा,वरना कैमरा उनको कहीं का नहीं छोड़ेगा।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

वृन्दावन की विधवाएं और नया बंगाली समाज

           वृन्दावन में विधवाओं की दीन दशा पर आज 'एबीपी न्यूज' टीवी चैनल पर मथुरा से भाजपा सांसद हेमामालिनी का साक्षात्कार सुनने को मिला। हेमामालिनी ने एक दर्शक के नजरिए से वृन्दावन की विधवाओं को देखा है,उन्होंने भाजपा के स्थानीय नेताओं की फीडबैक पर भरोसा किया है। वे इस समस्या की जड़ों में जाना नहीं चाहतीं,लेकिन उनकी एक बात से मैं सहमत हूँ कि विधवाओं को सम्मानजनक ढ़ंग से रहना चाहिए, सम्मानजनक ढ़ंग से वे रहें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। वे भीख न माँगे हमें यह भी देखना चाहिए। असल में औरतों के प्रति हेमामालिनी का 'चाहिएवादी' नजरिया समस्यामूलक है।यह दर्शकीय भाव से पैदा हुआ है और इसका समस्या की सतह से संबंध है।

वृन्दावन में विधवाएं क्यों आती हैं या भेज दी जाती हैं,इसके कारणों की ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है। इस प्रसंग में बंगाली समाज में विगत 100साल में जो आंतरिक परिवर्तन हुए हैं उनको ध्यान में रखें। बंगाली समाज में सबसे पहला परिवर्तन तो यह हुआ है कि परिवार की संरचना बदली है, परिवार में नए आधुनिक जीवन संबंधों का उदय हुआ है। इसने एक खास किस्म की स्थिति बूढ़ों और औरतों के प्रति पैदा की है। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि उनमें नकली आधुनिकचेतना का विकास हुआ है। नकली आधुनिकता में डूबे रहने के कारण बंगालियों का एक अंश अपने अंदर पुराने मूल्यों और मान्यताओं को छिपाकर जीता रहा है। इसके कारण एक खास किस्म के मिश्रित व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है ।

यह नया आधुनिक बंगाली उस बंगाली से भिन्न है जिसको रैनेसां ने रचा था। नया बंगाली उस परंपरा से अपने को जोड़ता है जो रैनेसांविरोधी है। नए बंगाली के पास मुखौटा रैनेसां का है लेकिन अधिकांश जीवनमूल्य और आदतें रैनेसां विरोधी हैं। मसलन् रैनेसां में सामाजिक और निजी संवेदनशीलता थी ,जबकि नए बंगाली में निजी संवेदनशीलता का अभाव है। रैनेसां और रैनेसांविरोधी बंगाली परंपरा में संवेदनशीलता में जो अंतर है उसने औरतों के प्रति मुखौटासंस्कृति पैदा की और इसी संस्कृति के गर्भ से निजी परिजनों के प्रति संवेदनहीनता हमें बार बार देखने को मिलती है। यह संवेदनहीनता उन लोगों में ज्यादा है जो मध्यवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग से आते हैं । यही वह वर्ग है जिसमें से सामयिक राजनीतिक नेतृत्व भी पैदा हुआ है। कम्युनिस्टों से लेकर ममतापंथियों तक इस संवेदनहीनता को प्रत्यक्ष रुप में देखा जा सकता है। यह संवेदनहीनता मध्ययुगीन भावबोध की देन है। हमें विचार करना चाहिए कि वे कौन से कारण हैं जिनके कारण मध्ययुगीन संवेदनहीनता या ग्राम्य बर्बरता फिर से बंगाल में इतनी ताकतवर हो गयी ? विधवाओं के वृन्दावन भेजे जाने का सम्बन्ध ग्राम्य बर्बरता से है। यह ग्राम्य बर्बरता नए रुपों में संगठित होकर काम कर रही है। इसका सबसे ज्यादा शिकार औरतें हो रही हैं।

नए बंगाली समाज की मानसिकता है 'अनुपयोगी को बाहर करो' , अनुपयोगी से दूर रहो, बात मत करो। परिवार में भी यही मानसिकता क्रमशःविस्तार पा रही है। परिवारीजनों में प्रयोजनमूलक संबंध बन रहे हैं। जिससे कोई प्रयोजन नहीं है उसको भूल जाओ, जीवन से निकाल दो। बूढे प्रयोजनहीन हैं उन्हें बाहर करो, घर से बाहर करो, प्रांत से बाहर करो,मन से बाहर करो। यह एक तरह का 'तिरस्कारवाद' है, जो पुराने 'अछूतभाव' का ही नया संस्करण है, जो दिनों दिन ताकतवर होकर उभरा है।

मध्ययुगीन भावबोध का शिकार होने के कारण नए बंगाली समाज में सामाजिक परिवर्तन और प्रतिवाद की मूलगामी आकांक्षा खत्म हो चुकी है और उसकी जगह राजनीतिक अवसरवाद ने ले ली है। इसे मध्ययुगीन वफादारी कहते हैं। इसके कारण समाज में अनालोचनात्मक नजरिए की बाढ़ आ गयी है। सभी किस्म के पुराने त्याज्य मूल्य और आदतें हठात प्रबल हो उठे हैं। फलतःचौतरफा औरतों पर हमले हो रहे हैं। बलात्कार,विधवा परित्याग,नियोजित वेश्यावृत्ति आदि में इजाफा हुआ है।

मध्ययुगीन भावबोध को कभी बंगाली जाति ने विगत पैंसठ सालों में कभी चुनौती नहीं दी। वे क्रांति करते रहे,वामएकता करते रहे ,लेकिन मध्ययुगीनता पर ध्यान नहीं दिया। मध्ययुगीन भावबोध वह वायरस है जो धीमी गति से समाज को खाता है और प्रत्येक विचारधारा के साथ सामंजस्य बिठा लेता है। बंगाली समाज की सबसे बड़ी बाधा यही मध्ययुगीनता है इससे चौतरफा संघर्ष करने की जरुरत है। बंगाली समाज से मध्ययुगीन भावबोध जाए इसके लिए जरुरी है कि सभी किस्म के त्याज्य मध्ययुगीन मूल्यों के खिलाफ सीधे संघर्ष किया जाय।

बंगाली बुद्धिजीवी नए सिरे से अपने समाज और परिवार के अंदर झाँकें और बार बार उन पहलुओं को रेखांकित करके बहस चलाएं जिनकी वजह है मध्ययुगीनता पुनर्ज्जीवित हो रही है। मध्ययुगीनता का सम्बन्ध भाजपा के उदय और विकास की प्रक्रियाओं के साथ भी है। अब मध्ययुगीन बर्बरता ने सामाजिक कैंसर का रुप ले लिया है और इससे तकरीबन प्रत्येक परिवार किसी न किसी रुप में प्रभावित है। मध्ययुगीनता के असर के कारण समाज में बुद्धिजीवीवर्ग ने बंगाली समाज की आंतरिक समस्याओं पर सार्वजनिक रुप में लिखना बंद कर दिया है। मैं नहीं जानता कि नामी बंगाली बुद्धिजीवियों ने अपने समाज के आंतरिक तंत्र की कमजोरियों को सार्वजनिक तौर पर कभी उजागर किया हो।जबकि रैनेसां के लोग यह काम बार बार करते थे।

मध्ययुगीन बर्बरता में इजाफे के कारण सबसे ज्यादा औरतें प्रभावित होती हैं,विधवाएं उनमें से एक हैं। विधवाओं की समस्या का एक पहलू है उनके पुनर्वास का,दूसरा पहलू है उनके प्रति सामाजिक नजरिया बदलने का,तीसरा पहलू है विधवाओं के पलायन को रोकने का। इन सभी पहलुओं पर तब बातें होंगी जब बंगाली बुद्धिजीवी इस मसले पर कोई सामूहिक पहल करें।

भारतीय मुसलमानों की बलिदानी परंपरा

मुसलमानों की देशभक्ति की बात उठते ही भारत-पाक मैच का संदर्भ बार-बार संघी लोग उठाते हैं और कहते हैं देखिए मुसलमान भारत की हार पर बल्ले बल्ले कर रहे हैं। इनको शर्म नहीं आती,ये देशद्रोही हैं,आदि किस्म के कुतर्कों की हम फेसबुक से लेकर मासमीडिया में आएदिन प्रतिक्रिया देखते हैं। हम साफ कहना चाहते हैं कि खेल को राष्ट्रवाद के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद कैंसर है इसे जिससे भी जोड़ेंगे वह चीज सड़ जाएगी। खेल से जोड़ेंगे खेल नष्ट हो जाएगा। रही बात पाक की जीत पर खुशी मनाने की तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

खेल के दर्शक को हम दर्शक की तरह देखें हिन्दू-मुसलमान के रुप में न देखें। खेल में धर्म,देश,छोटा-बड़ा नहीं होता। खेल तो सिर्फ खेल है।खेल में कोई जीतेगा और कोई हारेगा,कोई खुशी होगा तो कोई निराश होगा, खेल अंततःसर्जनात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। खेल को यदि राष्ट्रवाद से जोड़ा जाएगा या किसी भी किस्म की राजनीति से जोड़ा जाएगा तो उससे सामाजिक सर्जनात्मकता पर बुरा असर पड़ेगा।खेल का मकसद है जोड़ना।जबकि राष्ट्रवाद का मकसद है तोड़ना।भारत-पाक मैच के साथ संघी लोग राष्ट्रवाद को जोड़कर अपनी फूटसंस्कृति को खेल संस्कृति पर आरोपित करने की हमेशा कोशिश करते हैं और इस लक्ष्य में बुरी तरह पराजित होते हैं।इसका प्रधान कारण है खेल की आंतरिक शक्ति। खेल की आंतरिक शक्ति सर्जनात्मक और जोड़ने वाली है।

हमारे बहुत सारे संघी मित्र आए दिन क्रांतिकारियों को माला पहनाते रहते हैं लेकिन इन क्रांतिकारियों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले मुसलमानों को भूल जाते हैं। मसलन् क्रांतिकारी खुदीराम बोस को ही लें।खुदाराम बोस को गिरफ्तारी के पहले एक मुसलिम महिला ने अपने घर में शरण दी थी,यह और कोई नहीं मौलवी अब्दुल वहीद की बहन थी। ये जनाब क्रांतिकारी भूपेन्द्र दत्त के गहरे मित्र थे।यही महिला थी जो फांसी के पहले निडर होकर खुदीराम बोस से मिलने जाया करती थी।जबकि उस समय अंग्रेजी शासन के आतंक के कारण अनेक लोग खुदीराम बोस से मिलने से डरते थे।

मुसलमानों के पक्ष में लिखने का यह मकसद नहीं है कि अन्य तबकों की भूमिका की अनदेखी की जाय,मूल मकसद है मुसलिम विरोधी घृणा से युवाओं को बचाना।एक बार यह घृणा मन में बैठ गयी तो फिर उसे दूर करने में पीढ़ियां गुजर जाएंगी। हमारे कई हिन्दू मित्र मुसलमानों की कुर्बानियों की परंपरा को जानते हुए भी फेसबुक पर आए दिन जहर उगलते रहते हैं,इसलिए भी जरुरी हो गया है कि मुसलमानों के सकारात्मक योगदान के बारे में सही नजरिए से ध्यान खींचा जाय। मुसलमान हमारे समाज का अंतर्ग्रथित हिस्सा हैं। उनकी कुर्बानियों के बिना हम आजाद हिन्दुस्तान की कल्पना नहीं कर सकते।

याद करें रायबरेली के मुसलमान फकीर सैयद अहमद को जिनके नेतृत्व में उत्तर भारत बहावी सम्प्रदाय के अनुयायियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांवों से लेकर शहरों तक पहाडों से मौदानों तक आधी शताब्दी तक संघर्ष चलाया। सन् 1871 में एक अन्य बहावी क्रांतिकारी अब्दुल्ला को जस्टिस नार्मन की हत्या के आरोप में फाँसी पर लटकाया गया। सन् 1872 में अंडमान में लार्ड मेयो की हत्या करने वाला बहावी वीर शेर अली था,वह इस हत्या के लिए फाँसी के फंदे पर झूल गया। सन् 1831 में नीलहे साहबों के विरुद्ध पहले विद्रोह के प्रवर्तक रफीक मंडल को कौन भूल सकता है। मुसलमानों में ऐसे अनेक नेता हुए हैं जिन्होंने अपने समुदाय के साम्प्रदायिक और रुढिवादी आग्रहों को तिलांजलि देकर आजादी की जंग में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।सन् 1905 के ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी बंग-भंग आंदोलन के बरीसाल अधिवेशन की अध्यक्षता कलकता के प्रसिद्ध मुसलमान वकील अब्दुल्ला रसूल ने की थी। बंग-भंग के विरुद्ध चले पहले विशाल स्वदेशी आंदोलन में भारी संख्या में मुसलिम बुद्धिजीवियों ने हिन्दुओं के साथ मिलकर संघर्ष किया था।

भारत के मुसलमान देशभक्त होते हैं,यह निर्विवाद सत्य है।इसे जानते हुए भी संघ और उसके लगुए-भगुए संगठन विभ्रम पैदा करते रहते हैं और युवाओं में मुसलिम विरोधी प्रचार करते रहते हैं। मुसलमानों की देशभक्ति की बार-बार स्वाधीनता संग्राम में परीक्षा हुई है और आजादी के बाद बार बार जनांदोलनों के समय परीक्षा हुई है। भारत के मुसलमानों की देशभक्ति ही है कि आज जम्मू-कश्मीर में आतंकी-पृथकतावादी संगठन पाक की अबाध मदद के बावजूद आम मुसलमानों के बीच अलग-थलग पड़े हैं। इस क्षेत्र के आम मुसलमानों का भारत के लोकतंत्र और संविधान मेें अटूट विश्वास है।मुश्किल यह है कि एक तरफ संघ के संगठन मुसलमानों पर देशद्रोही कहकर हमले करते हैं,मुसलमानों के प्रति संशय और संदेह पैदा करते हैं,वहीं दूसरी ओर आतंकी-पृथकतावादी संगठन भी उनको निशाना बनाते हैं। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों ने संघ और आतंकी-पृथकतावादी दोनों के ही नजरिए के खिलाफ संघर्ष किया है और तमाम तकलीफों के बावजूद उदारतावाद की बेहतरीन मिसाल कायम की है।



गुरुवार, 18 सितंबर 2014

वृन्दावन की विधवाएँ और पुंसवाद



हेमामालिनी ने वृन्दावन की विधवाओं के बारे में स्त्री विरोधी बयान देकर विधवाओं को आहत किया है।ये विधवाएँ हमारे समाज का आईना हैं और ये हमारी स्त्री विरोधी राजनीति का महाकाव्य भी हैं। वृन्दावन की विधवाएँ अभी तक बस नहीं पायी हैं। सोनिया गांधी से लेकर हेमामालिनी , इन्दिरा गांधी से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी, कांग्रेस से लेकर जनवादी महिला समिति तक का समूचा विधवा प्रलाप हमारी राजनीति में प्रच्छन्न और प्रत्यक्षतौर पर सक्रिय पितृसत्तात्मक विचारधारा के वर्चस्व की अभिव्यक्ति करता है। केन्द्र से लेकर राज्य तक कई सरकारें आई और गईं लेकिन विधवाओं की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। न तो किसी सांसद -विधायक विकासनिधि का इनके पुनर्वास के लिए इस्तेमाल हुआ और न विधवाओं तक विधवा पेंशन या बेकारीभत्ता का धन पहुँचा । 
   यह सोचने लायक बात है कि वृन्दावन में सैंकडों बेहद समृद्ध संत हैं लेकिन किसी ने दो मुट्ठी चावल से ज़्यादा की उनके लिए व्यवस्था नहीं की। आज़ादी के बाद लाखों लोगों को सरकार घर बनाकर दे चुकी है लेकिन इन विधवाओं के लिए घर बनाकर देने की किसी को चिन्ता नहीं है। यही हाल शैलानी पर्यटकों और नव-धनाढ्यवर्ग का है उसमें से भी कोई स्वयंसेवी सामने नहीं आया जो इन विधवाओं की हिफाज़त और ज़िन्दगी के बंदोबस्त के बारे में काम करता। कहने का अर्थ यह है कि विधवाएँ हमारे समाज में फ़ालतू और बेकार की चीज़ हैं। उनकी समाज हर स्तर पर उपेक्षा और अवहेलना करता रहा है,विधवाएँ बसायी जाएँ इसके लिए हमें स्त्री के प्रति अपना बुनियादी नज़रिया बदलने की ज़रुरत है। 
    राजनेताओं और मीडिया के लिए विधवाएँ इवेंट और बयान हैं।ये लोग भूल जाते हैं कि वे हाड़ -माँस की साक्षात स्त्री हैं, उनके पास दिलदिमाग है। वे नैतिकदृष्टि से बेहतरीन मानकों को जी रही हैं। वे स्वाभिमानी हैं। वे भिखारी और अनाथ नहीं हैं। वे संवेदनशील स्त्री हैं यह बात किसी के मन में क्यों नहीं आती? क्यों महिला संगठनों ने पहल करके इन विधवाओं के पुनर्वास के बारे में अभी तक कोई ठोस स्कीम लागू नहीं की ?
   विधवाएँ हमारे समाज की स्त्रीविरोधी तस्वीर का बर्बर पहलू है । इन औरतों की दुर्दशापूर्ण स्थिति को देखते हुए भी हम सब अनदेखी करते रहे हैं। विधवाओं को सहानुभूति की नहीं ठोस भौतिक मदद की ज़रुरत है। अधिकांश विधवाएँ बहुत ख़राब अवस्था में जीवन यापन कर रही हैं लेकिन केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक किसी का अभी तक ध्यान नहीं गया।इन विधवाओं की स्थिति यह है कि वे अपने दुखों को बोल नहीं सकतीं । अपने लिए हंगामा नहीं कर सकतीं।राजनीति नहीं कर सकतीं। वे जीवन से हार मानकर जिजीविषा के कारण किसी तरह जी रही हैं। उनको मदद करने वाले हाथ आगे क्यों नहीं आए यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। हम माँग करते हैं कि वृन्दावन की विधवाओं को तुरंत विधवापेंशन योजना के तहत पाँच हज़ार रुपया प्रतिमाह पेंशन दी जाय और मथुरा के सांसद और विधायक निधि फ़ण्ड और अन्य स्रोतों से मदद लेकर राज्य सरकार तुरंत उनके निवास के विधवा आश्रम बनाए। इन विधवाओं को मुफ़्त चिकित्सा ,बस और रेल से यात्रा के राष्ट्रीय पास उपलब्ध कराए जाएँ। 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

बर्बरता के प्रतिवाद में


भारत में सभ्यता विमर्श है लेकिन हमने कभी यह ठहरकर नहीं सोचा कि सभ्यता के पर्दे के पीछे बर्बरता के किस तरह के रुप समाज में विकसित हो रहे हैं । हम सभ्यता और धर्म की ऊँची मीनारों पर सवार हैं लेकिन  बर्बरता की भी ऊँची मीनारों का निर्माण किया है । हमने बर्बरता के लक्षणों की तफ़सील के साथ जाँच- पड़ताल नहीं की । 
     आज़ाद भारत की नींव भारत -विभाजन और तेलंगाना विद्रोह के दमन से पैदा हुई बर्बरता पर रखी गयी है । यह संयोग है कि भारत विभाजनजनित बर्बरता की तो कभी -कभार चर्चा सुनने को मिल जाती है लेकिन तेलंगाना के किसान आंदोलन के दमन और बर्बरता के रुपों की कभी चर्चा ही नहीं होती, यहाँ तक कि कम्युनिस्ट थिंकरों के यहाँ भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता ।
    भारत में लोकतंत्र का कम और बर्बरता का ज़्यादा विकास हुआ है । बर्बरता की जब भी बातें होती हैं तो हम वफ़ादारी के आधार पर पक्ष- विपक्ष तय करने लगते हैं या फिर राजनीतिक - सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर ।
   भारत में दो तरह की बर्बरता है , पहली बर्बरता घर के अंदर है ,दूसरी बर्बरता घर के बाहर समाज के विभिन्न स्तरों पर घट रही है। संक्षेप में , बर्बरता के दो बड़े एजेंट हैं परिवार और पुलिस ।
  बर्बरता के पारिवारिक तत्वों को हमने सामाजिक तौर पर चुनौती नहीं दी । लंबे समय तक पारिवारिक बर्बरता को हम छिपाते रहे। सन् 1970-71 के बाद से पारिवारिक बर्बरता के रुपों को धीरे धीरे हमने सार्वजनिक करना आरंभ किया लेकिन इसके बारे में कोई समग्र समझ नहीं बनायी ।
    पारिवारिक बर्बरता का प्रधान कारण है पारिवारिक सदस्यों में समानता , सद्भाव और एक- दूसरे के प्रति लगाव का अभाव । जीवनशैली के विभिन्न पारिवारिक रुपों में वर्चस्व की मौजूदगी । साथ ही परिवार को नए लोकतांत्रिक ढाँचे के अनुरूप परिवर्तित न कर पाना ।  

  लोकतंत्र में कोई भी चीज, वस्तु, विचार या जीवन मूल्य जब जन्म लेता है तो वह प्रसारित होता है । लोकतंत्र में प्रसार की क्षमता के कारण ही बुरी चीज़ें, बुरी आदतें और बुरे मूल्य तेज़ी से प्रसारित हुए ।बर्बरता का प्रसार उनमें से एक है । 
     त्रासदी की हमारे समाज में आँधी चल रही है।   इसमें पारिवारिक बर्बरता, जातिवादी, साम्प्रदायिक, पृथकतावादी ( उत्तर पूर्वी राज्यों , पंजाब और कश्मीर ), माओवादी -नक्सलवादी बर्बरता,आपातकालीन आतंकी बर्बरता के साथ पुलिसबलों की दैनंदिन बर्बरता शामिल है ।  हिंसा और बर्बरता के इन सभी क्षेत्रों के आँकड़े चौंकाने वाले हैं । 
        परिवार में दहेज- हत्या, स्त्री- उत्पीड़न , बच्चों और बूढ़ों का उत्पीड़न या उनके प्रति बर्बर व्यवहार हमें त्रासद नहीं लगता बल्कि इसे हम 'बुरा' कहकर हल्का बनाने की कोशिश करते हैं । इसी तरह की कोई घटना घटित होती है तो हमें बुरा लगता है । हम यही कहते हैं 'बुरा' हुआ। जबकि यह त्रासद है , दुखद है , लेकिन हम 'बुरा 'कहकर अपने भावों को व्यक्त करते हैं। 
    दैनन्दिन पारिवारिक जीवन की त्रासदियों में भय , शाॅक , चौंकाने वाला और उत्पीड़न सबसे बड़े तत्व हैं। आधुनिक त्रासदी को इन तत्वों के बिना परिभाषित ही नहीं कर सकते । त्रासदी को महज़ बुरे के रुप न देखा जाय।
    मार्क्सवादी आलोचक  टेरी इगिलटन के अनुसार त्रासदी को जब हम 'बुरा' या ' बहुत बुरा हुआ' कहते हैं तो इसमें निहित दर्द को महसूस नहीं करते । 
     टेरी इगिलटन के अनुसार शिक्षित और अशिक्षित संस्थानों के बीच में त्रासदी के अर्थ को लेकर बहुत बड़ा भेद है। इस प्रसंग में शिक्षितों के संस्थान तुलनात्मक तौर पर ज़्यादा विश्वसनीय हैं। वे यह महसूस करते हैं कि त्रासदी का अर्थ ' बुरा' से बढ़कर होता है । वे दुख में निहित मूल्य की खोज करते हैं और उसे रेखांकित करते हैं । 
     त्रासदी को हमें दुख या बुरे के रुप से ज़्यादा व्यापक अर्थ में देखना चाहिए । त्रासदी का मतलब दुख मात्र नहीं है । 
     हमारे समाज में जो अनुदारवादी हैं वे त्रासदी को 'दुख'या 'बुरे ' के रुप में ही देखते हैं। वे इसमें निहित दर्द, पीड़ा, उत्पीड़न और भय की उपेक्षा करते हैं।
    मसलन् ,गुजरात के दंगों को मोदीपंथी दुखद या बुरा मानते हैं , त्रासद नहीं मानते हैं , त्रासदी और बर्बरता नहीं मानते । इसी तरह दहेज- हत्या को हम बुरा कहते हैं बर्बरता या त्रासदी नहीं कहते । इस तरह हमलोग जाने -अनजाने बर्बरता के साथ सहनीय संबंध बना लेते हैं। 
     पारिवारिक बर्बरता को कम करके आँकने और देखने का सबसे जनप्रिय मुहावरा है ,'चार बर्तन होंगे तो खनकेंगे।' पति-पत्नी  के बीच की बर्बरता को हम उपेक्षणीय मानते हैं । कहते हैं 'जहाँ प्यार होता है वहाँ झगड़ा भी होता है ।' 'पारिवारिक झगडा' कहकर बर्बरता को कम करके पेश किया जाता है और इस प्रक्रिया में घटित त्रासदी की अनदेखी की जाती है । यह त्रासदी लिंगमुक्त है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ महिलाओं के साथ त्रासद घटनाएँ घटित होती हैं , यह भी देखा गया है कि पुरुषों , बच्चों और बूढ़ों के साथ त्रासद घटनाएँ बढ़ी हैं ।
   त्रासदी में अपूरणीय मानवीय क्षति होती है । इसके दो छोर हैं , पहला , निजी, शारीरिक और मानसिक है तो दूसरा , सार्वजनिक, राजनीतिक और अन्य के प्रति जबावदेही  है । 
      सवाल यह है कि लोकतंत्र के विकास के साथ- साथ समाज में सभ्यता का विकास कम और बर्बरता का विकास ज़्यादा क्यों हुआ ? बर्बरता के साथ सामंजस्य बिठाने की मानसिकता का विकास क्यों हुआ ? बर्बरता का कैनवास दिनोंदिन क्यों बढा ? 
मेरे लेखे ,बर्बरता के विकास का प्रधान कारण है समाज में नई जीवन प्रणाली , सामाजिक संरचनाओं और नियमों के विकास की प्रक्रिया का अभाव। पुरानी प्रणाली का पूरी तरह बिखर जाना या ध्वस्त हो जाना और नियमन की नई प्रणाली का निर्मित न हो पाना । 
   एरिक हाॅब्सबाम के अनुसार ' नियमों और नैतिक आचरण ' की परंपरागत और सार्वभौम प्रणाली जब ध्वस्त हो जाती है तो बर्बरता पैदा होती है ।
    सामाजिक- राजनीतिक नियमन की  राजकीय प्रणाली को जब हम आधार बनाकर समाज को संचालित करने लगते हैं तब भी बर्बरता में इज़ाफ़ा होता है । 
    राजकीय नियमन बर्बरता के प्रति सहिष्णु बनाता है, राजकीय बर्बरता को वैध और स्वीकार्य बनाता है फलत: राजकीय बर्बरता की हम अनदेखी करते हैं ,पुलिस और सैन्यबलों की बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। 
      काम संतुष्टि के अभाव और  बंदूक़ की सभ्यता के विकास ने बर्बरता के क्षेत्र में लंबी छलाँग लगायी है। असहाय और मातहत लोगों के प्रति बर्बरता के ये दो बडे अस्त्र हैं। 
    हम बर्बरता की ओर जितना तेज़ी से बढ़े हैं उतनी ही तेज़ी से दक्षिणपंथी राजनीति का ग्राफ़ बढ़ा है ।  उदार राजनीति का ह्रास हुआ है । 
      भारतीय  समाज में एक तरफ़ निरंतर पुलिस बर्बरता है तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक दंगों , पृथकतावादी -आतंकी आंदोलनों का हिंसाचार है। इसके अलावा राजनीतिक हत्याओं का ग्राफ़ तेज़ी से बढ़ा है।   
    स्वाधीनता संग्राम और मध्यकाल की तुलना में स्वाधीन भारत में राजनीतिक हत्याएँ कई गुना ज़्यादा हुईं ।  जितने लोग युद्ध( 1962,1965,1971 ) में मारे गए उससे कई गुना ज़्यादा लोग पुलिस के हाथों थानों में मारे गए या पुलिसबलों से मुठभेड़ में मारे गए । 
     गाँवों में जातिगत बर्बरता को हमने सामान्य रुटिन मानकर आँखें बंद कर लीं। जातिगत बर्बरता के हमने सुंदर वैध तर्कों का परंपरागत कम्युनिकेशन के ज़रिए प्रचार किया और परंपरागत ग़ुलामी को वैध बनाने की कोशिश की । असल में यह वर्गयुद्ध है जो अपने ही देश के नागरिकों के ख़िलाफ़ जारी है । 
    जातिगत श्रेष्ठता को आधार बनाकर किए गए बर्बर हमलों ने भारत के सुंदर भविष्य की सभी संभावनाओं को दफ़न कर दिया । शैतान को हमने भगवान बना लिया और हर घर में जातिरुपी शैतान की पूजा-अर्चना, मान- मर्यादा बढ़ा दी ।
      इसी दौर में तमाम प्रगतिशीलों को पुरानी और नई जाति व्यवस्था में भेद करके पुरानी को बेहतर कहते सुना गया । पुरानी जाति व्यवस्था के 'अच्छे' गुणों की खोज खोजकर चर्चा की गयी और यह काम नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील आलोचक ने ख़ूब किया । 
     जाति व्यवस्था पुरानी हो या नई वह हमेशा से बर्बर रही है और उसका मानवाधिकार परिप्रेक्ष्य के साथ सीधे अंतर्विरोध है उसकी किसी भी क़िस्म की हिमायत बर्बरता को वैधता प्रदान करती है । 
     यही हाल साम्प्रदायिक बर्बरता का है जिसके कारण हज़ारों दंगे हुए ,उनमें हज़ारों लोग बर्बरता की बलि चढ़ गए । भारत विभाजन से लेकर आज तक हुए दंगों के ग्राफ़ को देखें तो पाएँगे कि हमारे ज़ेहन में साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता के प्रति घृणा घटी है । तरह - तरह के घटिया तर्कों के ज़रिए हमने साम्प्रदायिक हिंसा को वैधता प्रदान की है । सतह पर साम्प्रदायिक हिंसा और बर्बरता टुकड़ों में होती रही है लेकिन उसके बीच में एक बारीक कड़ी है जो सभी क़िस्म के बिखरे टुकड़ों को जोड़ती है ।
     साम्प्रदायिक बर्बरता का सबसे बड़ा योगदान है कि हमारे समाज में पहचान के आधुनिक वर्गीय और पेशेवर रुपों की बजाय धार्मिक रुपों की ओर रुझान बढा है । 
  साम्प्रदायिक बर्बरता ने देश की ' ब्रेनवाशिंग' की है । भारतीय मन को साम्प्रदायिक मन में रुपान्तरित किया है ।  बहिष्कार करने और साम्प्रदायिक समूह में रहने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है ।महानगरों या शहरों में मिश्रित बस्तियाँ या बसावट ग़ायब हो गयी है। 
    अल्पसंख्यकों और ख़ासकर मुसलमानों को समाज में वैध तरीक़ों के ज़रिए ठेलकर समूहबंद 'घेटो ' में बंद कर दिया है या फिर उनकी बस्तियाँ अलग बसा दी गयी हैं। इसने समाज में ' हम' और ' तुम' के आधार पर विभाजन को वैध बनाया है और यह बर्बरता का वह साइड इफ़ेक्ट है जो हिंसाचार के बाद भी जारी है । 
        बर्बरता के दो तरह के प्रभाव होते हैं ,पहला पतात्कालिक होता है और दूसरा प्रभाव दीर्घकालिक होता है । तात्कालिक प्रभाव पर हमारी तत्काल प्रतिक्रिया सुनने में आती है लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव के बारे में हमारी कोई प्रतिक्रिया नज़र नहीं आती ।
   बर्बरता का दीर्घकालिक प्रभाव बेहद ख़तरनाक होता है और मौन उत्पीडक का काम करता है । इसमें व्यक्ति हर स्तर पर बिखर जाता है, नष्ट हो जाता है । इससे समाज में बर्बरता को चुप सहने और देखने की बीमारी का जन्म होता है और हम फिर बर्बरता को देखते हैं और चुप रहने लगते हैं । अब बर्बरता हमारे ज़ेहन में रुटिन बनकर छा जाती है । वह रोज़मर्रा की चीज़ हो जाती है और हम उसे 'बुरा'भर कहकर मन के भावों को व्यक्त करने लगते हैं ।
     यही हाल पुलिस बर्बरता का है ,हम कभी नहीं सोचते कि पुलिस जब किसी अपराधी के प्रति असभ्य तरीक़ों का इस्तेमाल करती है या 'थर्ड डिग्री'उत्पीडन के तरीक़े अपनाती है तो वह राजकीय संस्थाओं को बर्बर बनाती है । राजकीय संस्थाएँ जब बर्बर हो जाती हैं तो समाज में सभ्यता को बचाना बहुत ही मुश्किल काम हो जाता है । इससे समाज की नैतिक प्रगति बाधित होती है । 
     अपराधियों से सूचनाएँ हासिल करने के लिए पुलिस के बलप्रयोग ने जबरिया सूचना हासिल करने और जबरिया मुखबिर की तरह काम करने की पद्धति का विकास किया , इस पद्धति का कालांतर में साम्प्रदायिक -पृथकतावादी -माओवादी और आतंकी संगठनों ने भी इस्तेमाल किया । इन संगठनों से प्रभावित इलाक़ों में आतंक और प्रति आतंक    को बढ़ावा मिला जिसने राजकीय बर्बरता में इज़ाफ़ा किया ।मसलन पुलिस के बर्बर दमन से आतंकी संगठन ख़त्म हो जाते हैं , जैसा पंजाब में हुआ , तो लोग राजकीय बर्बरता को वैध मानने लगते हैं। इसके चलते आमलोगों में यह धारणा भी बनी कि सभ्यता के मुक़ाबले बर्बरता ज़्यादा कारगर हथियार है । इसने हमेशा के लिए सभ्यता की सीमाओं को कमज़ोर कर दिया । 
      सभ्य तरीक़ों की बजाय हम जब बर्बर तरीक़ों को वैध मानने लगते हैं तो स्वयं को अमानवीय बना रहे होते हैं। अमानवीयता में मज़े लेना आरंभ कर देते हैं । फलत: हम अमानवीयता के आदी हो दाते हैं । इस समूची प्रक्रिया के वाहक युवा बनते हैं । वे असहनीय चीज़ों को, अमानवीय चीज़ों को सहन करने लगते हैं , उनमें मज़ा लेने लगते हैं। 
     आज बर्बरता के निशाने पर युवा हैं। बर्बरता युवाओं को विभिन्न रुपों में अपनी ओर आकर्षित कर रही है । साम्प्रदायिक-पृथकतावादी -माओवादी-आतंकी हिंसा के वाहक युवा हैं, वे अपने बर्बर हिंसा से रोमैंटिक संबंध बना रहे हैं । 
     परिवार से लेकर समाज तक बर्बरता के विभिन्न रुपों में युवाओं की बड़े पैमाने पर शिरकत चिन्ता की बात है । 
    युवाओं में बर्बरता के प्रति बढ़ते आकर्षण और बेगानेपन को हमें  जुड़वाँ पहलू की तरह देखना चाहिए । यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । मसलन युवाओं में दहेज के प्रति कोई घृणा नहीं है उलटे वे दहेज माँगने लगे हैं । 
    यही हाल साम्प्रदायिक -आतंकी-पृथकतावादी -माओवादी- नक्सल राजनीति का है ,उसकी धुरी भी युवा हैं। एक तरफ़ युवाओं का यह रुप और दूसरी ओर उनका 'अ- राजनीतिक 'रुप असल में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और ये दोनों मिलकर बर्बरता को महत्वहीन बनाते हैं। सच यह है बर्बरता महत्वहीन नहीं है वह एक सच्चाई है और इसने जीवनशैली से लेकर राजनीति तक, आदतों से लेकर आचार- व्यवहार और नैतिकता के विभिन्न स्तरों तक अपने पैर पसार लिए हैं ।
    अब बर्बरता एक नई ऊँचाई की ओर जा रही है और अब इसने युवाओं में येन-केन-प्रकारेण पैसा कमाने की अंधी होड़ पैदा कर दी है। अब बर्बरता महत्वहीन हो गयी है और पैसा कमाना महत्वपूर्ण हो गया है और यह बर्बरता का वह छोर है जहाँ पहुँचकर सभ्यता और मानवीय मूल्यों की खोज का काम और भी दूभर हो गया है । 
     
      
      
     


शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

मुसलमानों की हिमायत में

        आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह प्रचार आरंभ किया है उसे देखते हुए सामयिक तौर पर मुसलमानों की इमेज की रक्षा के लिए सभी भारतवासियों को सामने आना चाहिए। मुसलमानों को देशद्रोही और आतंकी करार देने में इन दिनों मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय हो उठा है,ऐसे में मुसलमानों की भूमिका को जोरदार ढ़ंग से सामने लाने की जरुरत है। सबसे पहली बात यह कि भारत के अधिकांश मुसलमान लोकतांत्रिक हैं और देशभक्त हैं। वे किसी भी किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति का अंग नहीं रहे हैं। चाहे वह मुस्लिम साम्प्रदायिकता ही क्यों न हो। भारत के मुसलमानों ने आजादी के पहले और बाद में मिलकर देश के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी है और उनके योगदान की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

भारतीय मुसलमानों के बारे में जिस तरह का स्टीरियोटाइप प्रचार अभियान मीडिया ने आरंभ किया है कि मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं,अनुदार होते हैं,नवाजी होते हैं,गऊ का मांस खाते हैं,हिन्दुओं से नफरत करते हैं,चार शादी करते हैं,आतंकी या माफिया गतिविधियां करते हैं।इस तरह के स्टीरियोटाइप प्रचार जरिए मुसलमान को भारत मुख्यधारा से भिन्न दरशाने की कोशिशें की जाती हैं।जबकि सच यह है मुसलमानों या हिन्दुओं को स्टीरियोटाइप के आधार पर समझ ही नहीं सकते। हिन्दू का मतलब संघी नहीं होता।संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा अधिकांश हिन्दू नहीं मानते।भारत के अधिकांश हिन्दू- मुसलमान कुल मिलाकर भारत के संविधान के द्वारा परिभाषित संस्कृति और सभ्यता के दायरे में रहते हैं और उसके आधार पर दैनंदिन आचरण करते हैं।अधिकांश मुसलमानों की सबसे बड़ी किताब भारत का संविधान है और उस संविधान में जो हक उनके लिए तय किए गए हैं उनका वे उपयोग करते हैं।हमारा संविधान किसी भी समुदाय को कट्टरपंथी होने की अनुमति नहीं देता। भारत का संविधान मानने के कारण सभी भारतवासियों को उदारतावादी मूल्यों,संस्कारों और आदतों का विकास करना पड़ता है।

समाज में हिन्दू का संसार गीता या मनुस्मृति से संचालित नहीं होता बल्कि भारत के संविधान से संचालित होता है। उसी तरह मुसलमानों के जीवन के निर्धारक तत्व के रुप में भारत के संविधान की निर्णायक भूमिका। भारत में किसी भी विचारधारा की सरकार आए या जाए उससे भारत की प्रकृति तय नहीं होती,भारत की प्रकृति तो संविधान तय करता है। यह धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक देश है और इसके सभी बाशिंदे धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक हैं।संविधान में धार्मिक पहचान गौण है, नागरिक की पहचान प्रमुख है।इस नजरिए से मुसलमान नागरिक पहले हैं ,धार्मिक बाद में ।आरएसएस देश का ऐसा एकमात्र बड़ा संगठन है जिसकी स्वाधीनता संग्राम में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही,यह अकेला ऐसा संगठन है जिसके किसी बड़े नेता को साम्प्रदायिक-आतंकी-पृथकतावादी हमले का शिकार नहीं होना पड़ा। उलटे इसकी विचारधारा के भारत की धर्मनिरपेक्ष -लोकतांत्रिक संस्कृति और सभ्यता विमर्र्श पर गहरे नकारात्मक असर देखे गए हैं। इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुसलिम नेताओं ने कम्युनिस्ट आंदोलन और क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी । ब्रिटिशशासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए। मसलन्, रौलट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवालाबाग कांड में 70 से अधिक देशभक्त मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं।आरएसएस के प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनकी देशभक्ति और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं।हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शासद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे।

    आरएसएस के लोगों से सवाल किया जाना चाहिए कि उनको देश के लिए कुर्बानी देने से किसने रोका था ?स्वाधीनता संग्राम में उनके कितने सदस्य शहीद हुए ? इसकी तुलना में यह भी देखें कितने मुसलमान नेता-कार्यकर्ता शहीद हुए ? देशप्रेम का मतलब हिन्दू-हिन्दू करना नहीं है। हिन्दू इस देश में रहते हैं तो उनकी रक्षा और विकास के लिए अंग्रेजों से मुक्ति और उसके लिए कुर्बानी की भावना आरएसएस के लोगों में क्यों नहीं थी ?जबकि अन्य उदार-क्रांतिकारी लोग जो हिन्दू परिवारों से आते थे, बढ़-चढ़कर कुर्बानियां दे रहे थे, शहीद हो रहे थे।संघ उस दौर में क्या कर रहा था ? यही कहना चाहते हैं संघ कम से कम कुर्बानी नहीं दे रहा था। दूसरी ओर सन् 1930-32 के नागरिक अवज्ञा आंदोलन में कम से कम 43मुसलमान नेता-कार्यकर्ता विभिन्न इलाकों में संघर्ष के दौरान पुलिस की गोलियों से घायल हुए और बाद में शहीद हुए। सवाल यह है संघ इस दौर में कहां सोया हुआ था ?

     कायदे से भारत के शहीद और क्रांतिकारी मुसलमानों की भूमिका को व्यापक रुप में उभारा गया होता तो आज नौबत ही न आती कि आरएसएस अपने मुस्लिम विरोधी मकसद में सफल हो जाता। मुसलमानों के प्रति वैमनस्य और भेदभावपूर्ण रवैय्ये को बल इसलिए भी मिला कि आजादी के बाद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने मुसलमानों की जमकर उपेक्षा की।इस उपेक्षा को सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में साफ देख सकते हैं। संघ के प्रचार का कांग्रेस पर दबाव रहा है और कांग्रेस ने कभी मुसलमानों को लेकर दो-टूक रवैय्या नहीं अपनाया। इसका ही यह परिणाम है कि मुसलमान हाशिए पर हैं। संघ ने मुस्लिम तुष्टीकरण का झूठा हल्ला मचाकर कांग्रेस को मुसलमानों के हितों की उपेक्षा करने के लिए मजबूर किया और कांग्रेस ने संघ को जबाव देने के चक्कर में नरम हिन्दुत्व की दिशा ग्रहण की और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा मुसलमानों को उठाना पड़ा।

बुधवार, 10 सितंबर 2014

मध्यवर्गीय जंगलीपन के प्रतिवाद में

भारत के मध्यवर्ग में जंगलीपन की आंधी चल रही है। मेरठ,मुजफ्फरनगर,कोलकाता,त्रिवेन्द्रम से लेकर लखनऊ तक इस आँधी के थपेड़े महसूस किए जा सकते हैं। कल कोलकाता के साल्टलेक इलाके में पुलिस अफसरों ने स्त्री विरोधी आदेश नेट पर जारी किया,उसके पहले सांसद तापस पाल ने स्त्री विरोधी बयान दिए,इसके पहले कई 'भद्र'नेता स्त्रीविरोधी बयान दे चुके हैं। इन 'भद्र' नेताओं में सभी रंगत के लोग शामिल हैं। यही हाल मेरठ-मुजफ्फरनगर में सक्रिय संघसेना का है । उनकी समूची मध्यवर्गीय भगवा सेना फेसबुक से लेकर अखबारों तक,यूपी में पंचायतों से लेकर कोर्ट-कचहरी तक सक्रिय है। यही हाल कमोबेश केरल का भी है। 'लव जेहाद' केरल से आया है। फेसबुक से लेकर दैनिक अखबारों तक इस मध्यवर्गीय जंगलीपन को सहज रुप में देखा जा सकता है। यह मध्यवर्गीय जंगली
आंधी है।

मध्यवर्गीय जंगलीपन का नया रुप है 'लव जेहाद' के नाम पर शुरु किया गया राजनीतिक प्रपंच। हमारे समाज में पहले से ही 'प्रेम' को निषिद्ध मानकर बहुत कुछ होता रहा है। मध्यवर्ग ने खाप पंचायतों और सलाशी पंचायतों के जरिए औरतों के ऊपर बेशुमार जुल्म किए हैं। परिवार और पिता की 'इज्जत' के नाम पर लड़कियों को दण्डित किया है, प्यार करने वाले लड़कों की हत्याएं की हैं। हाल ही में बिजनौर में भाजपा सांसद के खिलाफ घटिया किस्म के पोस्टर लगाए गए हैं,जिसमें उसे किसी लड़की के साथ वृन्दावन में घूमते दिखाया गया। संकेत यह है लड़की के साथ घूमना अपराध है!यह उसके अवैध संबंध का प्रतीक है!
चिन्ता की बात है कि 'ऑनरकिलिंग' से लेकर 'लव जेहाद' तक की समूची सांस्कृतिक –आपराधिक कवायद के निशाने पर औरतें और नागरिक स्वाधीनता है। हमारे समाज का मध्यवर्ग इन घटनाओं को मूकदर्शक की तरह देख रहा है या उसमें मजे ले रहा है। स्थिति इतनी भयावह है कि लड़कियों को तरह-तरह के रुपों,बहानों और प्रेरणाओं के नाम पर नए सिरे से बंदी बनाने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। अखबारों में इनके पक्ष में लेख प्रकाशित किए जा रहे हैं ,इन आपराधिक कृत्यों को वैध ठहराने का काम मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का एक तबका खुलेआम कर रहा है। मध्यवर्ग में इस तरह कीड़े-मकोड़े की मानसिकता वाले विचारक अचानक सक्रिय क्यों उठे हैं ? वे कौन से कारक हैं जिनके कारण संघ और उसके संगठन सीधे स्त्री स्वाधीनता पर हमला करने का साहस जुटाने की कोशिश कर रहे हैं ? सबसे शर्मनाक बात यह है कि देश के सम्मानजनक अखबार संतुलन के नाम पर 'लव जेहाद' के पक्ष में लेख तक छाप रहे हैं। यह कौन सा संपादकीय संतुलन है जिसे वे निभा रहे हैं ? 'लव जेहाद' के पक्ष में लेखों को छापना या उसके प्रवक्ताओं को कवरेज में संतुलन के नाम पर टीवी में मंच देना सीधे स्वाधीनता के हमलावरों को स्थान देना है। हम यदि अभी नहीं संभले तो निकट भविष्य में जंगली मध्यवर्गीय संगठन हमारे घरों में घुसकर तय करेंगे कि घर में क्या पकेगा और क्या नहीं पकेगा ? कान पर किया बिकेगा और क्या नहीं बिकेगा ? अभी वे यह कह रहे हैं कि किससे शादी करोगे और किससे शादी नहीं करोगे? अभी वे कह रहे हैं कि किससे प्रेम करोगे ,किससे नहीं करोगे? ये वही लोग हैं जो कल तक खाप पंचायतों के जरिए हिन्दू युवाओं पर हमले कर रहे थे, ये ही वह इलाका है जहां पर 'लव जेहाद' के नाम समूची मशीनरी को फिर से सक्रिय कर दिया गया है। यही वे इलाके,शहर और कस्बे हैं जहां पर कल तक खाप पंचायतों के जरिए हमले किए गए,अब इन हमलों को 'लव जेहाद' के नाम संगठित किया जा रहा है। यह मध्यवर्गीय जंगलीपन है और इसका ग्राम्य बर्बरता से गहरा सम्बन्ध है।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता



आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो। 
       हिन्दूबोध वस्तुत: वायवीय है उसे संघी बंदे व्यक्ति की 'अच्छी' 'बुरी' आदतों के साथ नत्थी करके पेश करते हैं। इस तरह वे हिन्दूबोध को 'अच्छीआदत' के रुप में सम्प्रेषित करते हैं। इसमें व्यक्ति के ख़ास क़िस्म के एक्शन को उभारते हैं। इस प्रक्रिया में वे संघ की फ़ासिस्ट विचारधारा पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और संघ को मानवीय या सामाजिक संगठन के रुप में पेश करते हैं। सच यह है कि संघ की विचारधारा का मूलाधार हिन्दुत्व के रुप में फासिज्म है। हिन्दू तो आवरण है। 
  फासिज्म की लाक्षणिक विशेषता है अमीरों की खुलकर सेवा करना। ग़रीबों और हाशिए के लोगों के हकों पर खुलकर हमले करना। संसदीय संस्थाएँ और संवैधानिक मान-मर्यादाओं को न मानना। संवैधानिक संस्थाओं कोअर्थहीन बनाना। अपने हर एक्शन को क़ानूनी तौर पर वैध मानना। यहाँ तक कि दंगे करने को भी वैध मानना। जनसंहार को वैध मानना। जनप्रिय नेताओं के ज़रिए शिक्षा, स्वास्थ्य, मज़दूरी आदि मानवाधिकारों पर चालाकी के साथ हमले करना। मज़दूर क़ानूनों और काम के समय को निशाना बनाना। 
        फासीवाद का भारत में आगमन राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, संत समागमों, मुस्लिम विद्वेष ,जातिद्वेष ,धार्मिक श्रेष्ठता , स्त्री नियंत्रण के सवालों से होता है। दूसरी बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन कारपोरेट पूँजीवाद के बिना रह नहीं सकता। सतह पर देश की एकता का नारा लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिक या हिन्दू- मुस्लिम विभाजन बनाए रखने पर ज़ोर, कहने के लिए आर्थिक विकास पर ज़ोर लेकिन व्यवहार में कारपोरेट विकास पर ज़ोर ,कहने के लिए शांति बनाए रखने का नारा लेकिन व्यवहार में अहर्निश तनाव बनाए रखने वाले एक्शनों की श्रृंखला बनाए रखना । सतही तौर पर स्त्री के विकास की बातें करना लेकिन व्यवहार में स्त्री विरोधी आचरण करना, स्त्री उत्पीड़न और हिंसाचार को संरक्षण देना। उन तमाम रुढियों को मानना और मनवाना जिनसे स्त्री को परंपरागत रुढियों के खूँटे से बाँधकर रखा जा सके।अंधविश्वास और भाग्यवाद को बढ़ावा देना।  
        भारत में संघ और भाजपा ने अपने को लिबरल संस्कृति और विचारधारा के साथ कांग्रेस आदि लिबरल दलों के विकल्प के रुप में पेश किया है। सारी दुनिया में फासिज्म ने हमेशा उदारतावाद के विकल्प के रुप में पेश किया है। भारत में भी यही दशा है। वे जिस हिन्दुत्व की बातें करते हैं वह तो सभी क़िस्म के नवजागरणकालीन मूल्यों और मान्यताओं का निषेध है। वे नवजागरण के मूल्यों पर प्रतिदिन हमले करते हैं। धर्मनिरपेक्षता पर आए दिन होने वाले हमले फासीवादी नवजागरणविरोधी नज़रिए का एक नमूना मात्र हैं। वे सतीप्रथा का देवराला सतीकांड के समय समर्थन और हिमायत कर चुके हैं।इसी तरह स्त्री के आधुनिक रुपों और स्त्री स्वायत्तता को वे एक सिरे से ख़ारिज करते हैं।नवजागरण ने उदारतावादी विचारों को प्रवाहित किया जबकि संघ सभी क़िस्म के उदारतावादी  विचारों का हिन्दुत्व के नज़रिए से विरोध करता है। 
      संघ सिर्फ़ मार्क्सवाद विरोधी ही नहीं है वह उदारतावाद का भी विरोधी है। संघ को समझने के लिए हमें परंपरागत मार्क्सवादी व्याख्याओं से बहुत कम मदद मिलेगी । इसके वैचारिक तानेबाने में परंपरागत अविवेकवाद और ऊलजुलूल बातें भरी हुई हैं। संघ उन तमाम ताक़तों के साथ सहज ही संबंध बना लेता है जो ताकतें अविवेकवाद की हिमायत करती हैं। इसलिए संघ को सामाजिक- वैचारिक तौर पर अलग-थलग करने लिए अविवेकवाद की भारतीय परंपरा को चिह्नित करना और फिर उसके प्रति सचेतनता बढ़ाने की ज़रुरत है। 
   संघ के लोग शनिपूजा से लेकर हनुमानपूजा, लक्ष्मीपूजा से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा ,उत्सवों और पर्वों से अपने को सहज भाव से जोड़कर जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करते हैं और जनता में संपर्क- सम्बन्ध बनाते हैं। वे आधुनिकतावाद के अविवेकवादी आंदोलनों , तकनीकी रुपों और कलारुपों के साथ सहज रुप में जुड़ते हैं और मासकल्चर को ही संस्कृति बनाने या उसके ज़रिए संस्कृति का पाखंड रचते हैं। 
     संघ के जनाधार के निर्माण में हिन्दी सिनेमा के मर्दवादी सांस्कृतिक रुपों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह परंपरागत मर्दानगी का नवीकृत रुप भी है। समाज में एक तरफ़ दबे-कुचले लोगों की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा और दूसरी ओर संघर्ष में पराजयबोध ने आनंद के क्षणों में मर्दानगी को एक नया आनंददायक नुस्खा बनाया है। यह अचानक नहीं है कि मर्दानगी के अधिकाँश नायक भाजपा के साथ हैं या मोदी के साथ है। मोदी के साथ अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, सलमान खान आदि की मौजूदगी और मित्रता ने मर्दानगी के नायकों एवं संघ के संबंधों को मज़बूत बनाया है। शरीर का उपभोग ,शरीरचर्चा और शरीर का प्रदर्शन जितना बढ़ेगा या महिमामंडित होगा संघ उतना ही मज़बूत बनेगा।
    बम्बईया हिन्दी सिनेमा ने ऐसी कृत्रिम भाषा विकसित की है जो देश में कहीं नहीं बोली जाती ।जनाधाररहित भाषा और उसमें भी प्रतिवादी तेवरों की अभिव्यक्ति अपने आप में सुखद ख़बर है।ऐसे भाषिक प्रयोग संवादों मिलते हैं जो हिन्दीभाषी क्षेत्र में कहीं नज़र नहीं आते। इस तरह कृत्रिम भाषा का साइड इफ़ेक्ट यह है कि हम फेकभाषा में जीने लगते हैं, फेकभाषा में प्रतिवाद करते हैं, यही राजनीति में फेकभाषा को प्रतिवाद की भाषा बनाने में सहायक हुई है। प्रतिवाद की फेकभाषा को संघ ने जनप्रिय बनाया है और इसी फेकभाषा के ज़रिए हिन्दुत्व और हिन्दूभावबोध का प्रचार किया है । 


आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता



आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो। 
       हिन्दूबोध वस्तुत: वायवीय है उसे संघी बंदे व्यक्ति की 'अच्छी' 'बुरी' आदतों के साथ नत्थी करके पेश करते हैं। इस तरह वे हिन्दूबोध को 'अच्छीआदत' के रुप में सम्प्रेषित करते हैं। इसमें व्यक्ति के ख़ास क़िस्म के एक्शन को उभारते हैं। इस प्रक्रिया में वे संघ की फ़ासिस्ट विचारधारा पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं और संघ को मानवीय या सामाजिक संगठन के रुप में पेश करते हैं। सच यह है कि संघ की विचारधारा का मूलाधार हिन्दुत्व के रुप में फासिज्म है। हिन्दू तो आवरण है। 
  फासिज्म की लाक्षणिक विशेषता है अमीरों की खुलकर सेवा करना। ग़रीबों और हाशिए के लोगों के हकों पर खुलकर हमले करना। संसदीय संस्थाएँ और संवैधानिक मान-मर्यादाओं को न मानना। संवैधानिक संस्थाओं कोअर्थहीन बनाना। अपने हर एक्शन को क़ानूनी तौर पर वैध मानना। यहाँ तक कि दंगे करने को भी वैध मानना। जनसंहार को वैध मानना। जनप्रिय नेताओं के ज़रिए शिक्षा, स्वास्थ्य, मज़दूरी आदि मानवाधिकारों पर चालाकी के साथ हमले करना। मज़दूर क़ानूनों और काम के समय को निशाना बनाना। 
        फासीवाद का भारत में आगमन राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता, संत समागमों, मुस्लिम विद्वेष ,जातिद्वेष ,धार्मिक श्रेष्ठता , स्त्री नियंत्रण के सवालों से होता है। दूसरी बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसा संगठन कारपोरेट पूँजीवाद के बिना रह नहीं सकता। सतह पर देश की एकता का नारा लेकिन व्यवहार में साम्प्रदायिक या हिन्दू- मुस्लिम विभाजन बनाए रखने पर ज़ोर, कहने के लिए आर्थिक विकास पर ज़ोर लेकिन व्यवहार में कारपोरेट विकास पर ज़ोर ,कहने के लिए शांति बनाए रखने का नारा लेकिन व्यवहार में अहर्निश तनाव बनाए रखने वाले एक्शनों की श्रृंखला बनाए रखना । सतही तौर पर स्त्री के विकास की बातें करना लेकिन व्यवहार में स्त्री विरोधी आचरण करना, स्त्री उत्पीड़न और हिंसाचार को संरक्षण देना। उन तमाम रुढियों को मानना और मनवाना जिनसे स्त्री को परंपरागत रुढियों के खूँटे से बाँधकर रखा जा सके।अंधविश्वास और भाग्यवाद को बढ़ावा देना।  
        भारत में संघ और भाजपा ने अपने को लिबरल संस्कृति और विचारधारा के साथ कांग्रेस आदि लिबरल दलों के विकल्प के रुप में पेश किया है। सारी दुनिया में फासिज्म ने हमेशा उदारतावाद के विकल्प के रुप में पेश किया है। भारत में भी यही दशा है। वे जिस हिन्दुत्व की बातें करते हैं वह तो सभी क़िस्म के नवजागरणकालीन मूल्यों और मान्यताओं का निषेध है। वे नवजागरण के मूल्यों पर प्रतिदिन हमले करते हैं। धर्मनिरपेक्षता पर आए दिन होने वाले हमले फासीवादी नवजागरणविरोधी नज़रिए का एक नमूना मात्र हैं। वे सतीप्रथा का देवराला सतीकांड के समय समर्थन और हिमायत कर चुके हैं।इसी तरह स्त्री के आधुनिक रुपों और स्त्री स्वायत्तता को वे एक सिरे से ख़ारिज करते हैं।नवजागरण ने उदारतावादी विचारों को प्रवाहित किया जबकि संघ सभी क़िस्म के उदारतावादी  विचारों का हिन्दुत्व के नज़रिए से विरोध करता है। 
      संघ सिर्फ़ मार्क्सवाद विरोधी ही नहीं है वह उदारतावाद का भी विरोधी है। संघ को समझने के लिए हमें परंपरागत मार्क्सवादी व्याख्याओं से बहुत कम मदद मिलेगी । इसके वैचारिक तानेबाने में परंपरागत अविवेकवाद और ऊलजुलूल बातें भरी हुई हैं। संघ उन तमाम ताक़तों के साथ सहज ही संबंध बना लेता है जो ताकतें अविवेकवाद की हिमायत करती हैं। इसलिए संघ को सामाजिक- वैचारिक तौर पर अलग-थलग करने लिए अविवेकवाद की भारतीय परंपरा को चिह्नित करना और फिर उसके प्रति सचेतनता बढ़ाने की ज़रुरत है। 
   संघ के लोग शनिपूजा से लेकर हनुमानपूजा, लक्ष्मीपूजा से लेकर अन्य देवी-देवताओं की पूजा ,उत्सवों और पर्वों से अपने को सहज भाव से जोड़कर जनता की पिछड़ी चेतना का दोहन करते हैं और जनता में संपर्क- सम्बन्ध बनाते हैं। वे आधुनिकतावाद के अविवेकवादी आंदोलनों , तकनीकी रुपों और कलारुपों के साथ सहज रुप में जुड़ते हैं और मासकल्चर को ही संस्कृति बनाने या उसके ज़रिए संस्कृति का पाखंड रचते हैं। 
     संघ के जनाधार के निर्माण में हिन्दी सिनेमा के मर्दवादी सांस्कृतिक रुपों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह परंपरागत मर्दानगी का नवीकृत रुप भी है। समाज में एक तरफ़ दबे-कुचले लोगों की संख्या में निरंतर इज़ाफ़ा और दूसरी ओर संघर्ष में पराजयबोध ने आनंद के क्षणों में मर्दानगी को एक नया आनंददायक नुस्खा बनाया है। यह अचानक नहीं है कि मर्दानगी के अधिकाँश नायक भाजपा के साथ हैं या मोदी के साथ है। मोदी के साथ अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, सलमान खान आदि की मौजूदगी और मित्रता ने मर्दानगी के नायकों एवं संघ के संबंधों को मज़बूत बनाया है। शरीर का उपभोग ,शरीरचर्चा और शरीर का प्रदर्शन जितना बढ़ेगा या महिमामंडित होगा संघ उतना ही मज़बूत बनेगा।
    बम्बईया हिन्दी सिनेमा ने ऐसी कृत्रिम भाषा विकसित की है जो देश में कहीं नहीं बोली जाती ।जनाधाररहित भाषा और उसमें भी प्रतिवादी तेवरों की अभिव्यक्ति अपने आप में सुखद ख़बर है।ऐसे भाषिक प्रयोग संवादों मिलते हैं जो हिन्दीभाषी क्षेत्र में कहीं नज़र नहीं आते। इस तरह कृत्रिम भाषा का साइड इफ़ेक्ट यह है कि हम फेकभाषा में जीने लगते हैं, फेकभाषा में प्रतिवाद करते हैं, यही राजनीति में फेकभाषा को प्रतिवाद की भाषा बनाने में सहायक हुई है। प्रतिवाद की फेकभाषा को संघ ने जनप्रिय बनाया है और इसी फेकभाषा के ज़रिए हिन्दुत्व और हिन्दूभावबोध का प्रचार किया है । 


रविवार, 7 सितंबर 2014

इंटरनेट पर वाम-वाम को राम राम



इंटरनेट और उससे जुड़े माध्यमों और विधा रुपों के आने के बाद से संचार की दुनिया में मूलगामी बदलाव आया है। वैचारिक संघर्ष पहले की तुलना में और भी ज़्यादा जटिल और तीव्र हो गया है। जनसंपर्क और जनसंवाद पहले की तुलना में कम खर्चीला और प्रभावशाली हो गया है। लेकिन वामदलों और ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टियों में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती। यह सच है कि वामदलों के पास बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा है और ज्ञान के मामले में ये लोग विभिन्न क्षेत्र में बेजोड़ हैं। आज भी भारत की बेहतरीन समझ के विभिन्न क्षेत्रों में मानक इन्होंने ही बनाए हैं। लेकिन इंटरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम के आने के बाद वामदलों के रवैय्ये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है। 
     वामदल जानते हैं कि नेट कम्युनिकेशन न्यूनतम खर्चे पर चलने वाला कम्युनिकेशन है। यह ऐसा कम्युनिकेशन है जो लोकतांत्रिक होने के लिए मजबूर करता है। यह दुतरफ़ा कम्युनिकेशन है। यहाँ दाता और गृहीता एक ही धरातल पर रहते हैं और रीयल टाइम में  मिलते हैं। यहाँ आप अपनी-अपनी कहने के लिए स्वतंत्र हैं साथ ही अन्य की रीयल टाइम में सुनने ,सीखने और बदलने के लिए भी मजबूर हैं। विचारों में साझेदारी और उदारता इसका बुनियादी आधार है। 
     वामदलों की नियोजित नेट गतिविधियाँ इकतरफ़ा कम्युनिकेशन की हैं और इसे बदलना चाहिए। दुतरफ़ा कम्युनिकेशन की पद्धति अपनानी चाहिए। वामदलों की वेबसाइट हैं लेकिन वहाँ यूजरों के लिए संवाद की कोई खुली जगह नहीं है।वामदलों के बुद्धिजीवियों- लेखकों आदि को कम्युनिकेशन के प्रति अपने पुराने संस्कारों को नष्ट करना होगा। 'हम कहेंगे वे सुनेंगे', ' हम लिखेंगे वे पढेंगे' , 'हम देंगे वे लेंगे' इस सोच के ढाँचे को पूरी तरह नष्ट करने की ज़रुरत है। नये दौर का नारा है 'हम कहेंगे और सीखेंगे',' हम कहेंगे और बदलेंगे'। 
     इंटरनेट कम्युनिकेशन आत्मनिर्भर संचार पर ज़ोर देता है । वामदलों के लोग परनिर्भर संचार में जीते रहे हैं। नए दौर की माँग है आत्मनिर्भर बनो। रीयल टाइम में बोलो। बिना किसी की इजाज़त के बोलो।पार्टी की लक्ष्मणरेखा के बाहर निकलकर लोकतान्त्रिक कम्युनिकेशन में शामिल हो और लोकतांत्रिक ढंग से कम्युनिकेट करो। पार्टी में नेता को हक़ है बोलने का , नेता को हक़ है लाइन देने का, पार्टी अख़बार में नेता को हक़ है लिखने का। लेकिन इंटरनेट में प्रत्येक पार्टी सदस्य और हमदर्द को हक़ है बोलने, लिखने और अपनी राय ज़ाहिर करने का। यह राय ज़ाहिर करने का वैध और लोकतांत्रिक मीडियम है । यह प्रौपेगैण्डा का भी प्रभावशाली मीडियम है। यह कम खर्चीला मीडियम है और इसमें शामिल होकर सक्रिय रहने से संचार की रुढियों से मुक्ति मिलने की भी संभावनाएँ हैं। अभी स्थिति यह है कि फ़ेसबुक पर वाम मित्र लाइक करने, एकाध पोस्ट लिखने, फ़ोटो शेयर करने से आगे बढ़ नहीं पाए हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और वामदलों को सुनियोजित ढंग से अपने सदस्यों को खुलकर इंटरनेट माध्यमों पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए प्रेरित करना चाहिए इससे पार्टी नेता की जड़ता, मूर्खता,कूपमंडूकता आदि से मुक्ति मिलेगी। 
     

शनिवार, 6 सितंबर 2014

बेमिसाल सुनील गुप्ता

 
         सुनील गुप्ता के अकस्मात हमारे बीच से चले जाने की ख़बर फ़ेसबुक पर पढ़ी । मन को बेहद दुख हुआ।मैं सुनील को तब से जानता हूँ जब वह जेएनयू पढ़ने आए थे। हम दोनों सतलज में रहते थे। रोज़ का मिलना और तरह - तरह के विषयों पर आदान प्रदान आदत बन गयी थी। सुनील मेरे साथ 1980-81 में छात्रसंघ में कौंसलर रहे। सुनील के जीवन का हिंदीप्रेम मुझे बेहद अपील करता था साथ ही उनकी सादगी को मैं मन ही मन सराहता था और उनको अनेकबार कहता भी था कि आपके समाजवादी विचार और सादगी को हर नागरिक को सीखना चाहिए।
सुनील अपने समाजवादी आदर्शों और ग़रीबों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता के लिए हम सभी मित्रों में सम्मान की नज़र से देखे जाते थे। शानदार अकादमिक रिकॉर्ड के बावजूद सुनील ने ग़रीबों की सेवा करने का फ़ैसला करके युवाओं में मिसाल क़ायम की थी और उसका यह त्याग हमलोगों में ईर्ष्या की चीज़ था।
सुनील से मेरी लंबे समय से मुलाक़ात नहीं हो पायी लेकिन मैं उसके लिखे को खोजकर पढ़ता रहा हूँ। सुनील का अकस्मात निधन भारत के समाजवादी आंदोलन की अपूरणीय क्षति है ।
     सुनील जब जेएनयू आए तो उस समय उसका कैम्पस बदल रहा था। पहले जेनयू कैम्पस में जो कुछ होता था वह भारत के किसी भी विश्वविद्यालय से मेल नहीं खाता था। लेकिन 1978-79 से कैम्पस ने नई अँगडाई लेनी शुरु की और देश के छात्र आंदोलन की बयार यहां पर भी आने लगी। देश में जो घट रहा था उसकी अभिव्यंजना जब कैम्पस में होने लगे तो लोग कहते हैं कि अब यह कैम्पस देश की मुख्यधारा से जुड़ गया है।
     कैम्पस में आरक्षण,अल्पसंख्यक,दलित राजनीति ,जातिवाद , साम्प्रदायिकता आदि प्रवृत्तियों का असर दिखने लगा। इससे कैम्पस में नए किस्म की अस्मिता राजनीति का दौर शुरु हुआ। यही वह परिवेश था जिसमें छात्र राजनीति में नया छात्र समीकरण बनकर सामने आया। पहलीबार यह देखा गया कि सोशियोलॉजी विभाग में जाति के आधार एक ही जाति के भूमिहार छात्रों के दाखिले हुए और बड़े पैमाने पर उसके खिलाफ आंदोलन हुआ और उस आंदोलन में फ्री-थिकरों और एसएफआई की बड़ी भूमिका थी। यह संयोग कि बात थी कि उस समय हमारे समाजवादी मित्रगण जातिवादी दाखिले के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। समाजवादियों और फ्रीथिंकरों का एलायंस हुआ करता था वह टूट गया। यही वह परिवेश है जिसमें नए सिरे से समाजवादी युवजनसभा ने अपने को संगठित किया ।
      जेएनयू कैम्पस में सुनील गुप्ता समाजवादी युवजनसभा के नेता थे और सभी छात्र उनका सम्मान करते थे। वे पढ़ने में बेहतरीन थे और हिन्दी के अनन्य भक्त थे। वे मुख्यभाषा के रुप में हिन्दी का अपने भाषणों में इस्तेमाल करते थे। दिलचस्प बात यह थी कि वे समाजविज्ञान के स्कूल में अर्थशास्त्र पढ़ते थे। इस स्कूल में हिन्दीभाषी क्षेत्र से आने वाले छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा थी लेकिन अधिकतर छात्र हिन्दी से परहेज करते थे। हिन्दी में भाषण सुनना पसंद नहीं करते थे।
   सन् 1980-81 में मैंने एसएफआई के पैनल से कौंसलर का चुनाव लड़ा था। उस समय तक छात्रसंघ चुनाव में यह परंपरा थी कि एसएफआई पैनल में मुख्य वक्ता के रुप में पदाधिकारी उम्मीदवार ही बोला करते थे। साथ में अतिथि नेता बोलते थे। सभी अंग्रेजी में बोलते थे । स्थिति यह थी कि सभी छात्र संगठनों के चुनाव पैनल में प्रधानवक्ता पुराने अनुभवी कैम्पसनेता या बाहर के नेता रहते थे और सबको अंग्रेजी में बोलने की आदत थी। यहां तक कि समाजवादी नेता भी अंग्रेजी-हिन्दी में मिलाकर बोलते थे। मसलन् यदि समाजवादियों की मीटिंग 3 घंटे चली तो मुश्किल से 15-20 मिनट समय हिन्दी को मिल पाता था। मैं निजी तौर पर इस स्थिति बेहद दुखी था और तय कर चुका था कि हिन्दी को भाषणकला की मुख्य भाषा बनाना होगा।
      मैंने एसएफआई की मीटिंग में यह प्रस्ताव रखा कि मुख्यवक्ताओं के साथ मैं हिन्दी में बोलूँगा। पहले इसको किसी ने नहीं माना बाद में  काफी जोर देकर अपनी बात कही तो सभी मान गए और यह हिन्दी के लिए शुभ खबर थी। मेरा मानना था  कैम्पस में हिन्दी को मुख्य भाषणभाषा बनना है तो एसएफआई को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। क्योंकि वह कैंपस में सबसे बड़ा छात्र संगठन है। कैम्पस की राजनीति हिन्दी उस समय अस्तित्वहीन थी। उन दिनों हिन्दी वहां सिर्फ भारतीय भाषा संस्थान (हिन्दी-उर्दू दो ही भाषाएं इसमें थीं) की भाषा थी। समाजवादी हिन्दी के पक्षधर थे लेकिन वे अंग्रेजी दां फ्रीथिंकरों के  मित्र थे इसके कारण फ्रीथिंकरों और समाजवादियों के संयुक्त मोर्चे में अंग्रेजी का वर्चस्व हुआ करता था,चुनाव सभाओं में इस मोर्चे के अधिकांश वक्ता फ्रीथिंकर हुआ करते थे जो अंग्रेजी में ही बोलते थे।
        हिन्दी के लिहाज से 1980-81 का छात्रसंघ चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था। एसएफआई का एआईएसएफ से संयुक्त मोर्चा  नहीं बना।  वहीं पर अन्य मोर्चे भी मैदान में थे। इसबार के चुनाव की पहली मीटिंग पेरियार होस्टल में हुई उसमें मुख्यवक्ता थे-प्रकाश कारात,सीताराम येचुरी,डी.रघुनंदन,अनिल चौधरी,अध्यक्षपद  के प्रत्याशी वी.भास्कर और जगदीश्वर चतुर्वेदी। मेरे अलावा सभी ने अंग्रेजी में बेहतरीन भाषण दिया था। लेकिन संयोग की बात थी कि इस मीटिंग में मेरा भाषण सबसे अच्छा हुआ और यह पहलीबार था कि कोई वक्ता पूरे समय हिन्दी में एसएफआई के मंच से तकरीबन 40-50 मिनट बोला हो।इस भाषण का असर यह हुआ कि एसएफआई ने तय किया कि मैं प्रत्येक चुनावसभा में भाषण दूँ। उस रात पहलीबार जब मैं भाषण देकर अपने छात्रावास आया तो सुनीलजी ने गरमजोशी के साथ मेरे भाषण की प्रशंसा की और कहा कि आपने तो एसएफआई को ही बदल दिया। वे इतनी देर हिन्दी कहां सुनते हैं और कैम्पस में चुनावसभा में इतनी देर हिन्दी कौन सुनता है। यह भी कहा आप हमारे साथ होते तो और भी मजा आता। लेकिन यह हिन्दी की शुरुआत थी। मैंने उस समय सुनील से कहा कि आप हिन्दी को कैम्पस में लाना चाहते हैं तो जिद करके भाषण दें लोगों को हिन्दी सुनने को मजबूर करें और वे मेरे इस सुझाव से सहमत थे। मेरे और सुनील या अन्य किसी छात्रनेता में एक बुनियादी अंतर यह था कि ये सब बहुभाषी वक्ता थे। मैं हिन्दी के अलावा और कोई भाषा नहीं जानता था और यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी भी थी। सारा कैम्पस जानता था कि मैं अंग्रेजी नहीं जानता। लेकिन इससे मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। मुझे याद है कि पहली चुनावसभा के तत्काल बाद नीलगिरि ढाबे पर समाजवादी छात्रनेता स्व. दिग्विजय सिंह ने कहा था  तुम यह बताओ तुमने पार्टी को राजी कैसे किया ? मैं हँसने लगा।  मैंने कहा दादा कैम्पस बदल रहा है। भविष्य की मुख्य वक्तृताभाषा यहां हिन्दी ही होगी। इसी चुनाव में आखिरी चुनावसभा गोदावरी होस्टल में हुई जिसमें प्रकाश कारात ने साफ कहा कि मैं आगे से छात्रसंघ के चुनावों में भाषण देने नहीं आऊँगा, क्योंकि नई लीडरशिप आ गयी है और ये इतना सुंदर बोलते हैं कि अब मेरे आने की जरुरत ही नहीं है। खासतौर पर उसने मेरे भाषण का जिक्र किया और कहा कि हिन्दी को जिस तरह यहां सम्प्रेषणीय और बाँधे रखने की भाषा के रुप में जगदीश्वर ने पेश किया है उसे मैं इस चुनाव की बड़ी उपलब्धि मानता हूँ।  यह संस्मरण बताने का बडा कारण है कि जेएनयू में सुनील जब आए तो परिवेश बदल रहा था और अंग्रेजी का वर्चस्व टूट रहा था। यही वह परिवेश था जिसमें समाजवादी युवजन सभा ताकतवर संगठन के रुप में उभरी। हिन्दीभाषी छात्र अपने को समाजवादी युवजन सभा में अभिव्यंजित होते देख रहे थे। इस चुनाव में सुनील और मैं दोनों कौंसलर बने और दोनों हिन्दी में बोलकर चुनाव जीते।
देखते ही देखते सुनील और उनके साथियों की मेहनत रंग लाई और 1982-83 में समाजवादी युवजनसभा समूचा चुनाव जीत गयी,नलिनीरंजन मोहन्ती(समाजवादी युवजन सभा) छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। वे विशुद्ध अंग्रेजी भाषी थे। लोग अचम्भित थे कि जो समाजवादी हिन्दी की हिमायत करते थे उनका उम्मीदवार ऐसा व्यक्ति था जो हिन्दी नहीं बोलता था। खैर, यह अनुभव कई मायनों में मूल्यवान था। उसमें सुनील के साथ-साथ समाजवादी मित्रों के राजनीतिक मनोभावों को जानने –समझने का मौका मिला।
     इस अनुभव का सबक यह मिला कि सुनील और उनके साथ के समाजवादी मित्र हठी लोग हैं। कैम्पस में प्रतिबद्ध राजनीति थी और उसके अनेक मानक देखे गए लेकिन समाजवादी राजनीति में नया फिनोमिना देखा गया जिसमें प्रतिबद्धता के साथ हठीभाव भी था। समाजवादी टूट जाने के लिए तैयार थे लेकिन अपने हठ को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। इसने कैम्पस में अतिवादी रुझानों को जन्म दिया। संघर्ष होते थे लेकिन समझौते नहीं हो पाए।  राजनीति में एक खास किस्म की कट्टरता का जन्म हुआ और उसने समूचे कैम्पसके चरित्र को ही बदल दिया।
     प्रतिबद्ध राजनीति में छात्रों की मांगें होती हैं.उनके लिए संघर्ष होता है, लेकिन अधिकारियों के साथ संवाद और समझौते का रास्ता खुला रखना पड़ता है और लक्ष्मणरेखाएं खींचकर आंदोलन नहीं किए जाते। सुनील के कैम्पस में आने के पहले समाजवादियों में वैचारिक लचीलापन था जो सुनील के सक्रिय होने के बाद खत्म हो गया। सुनील की लीडरशिप का यह कमाल था कि समाजवादी पहलीबार छात्रसंघ का चुनाव जीते और मीलिटेंट भाव से राजनीति की कैम्पस में शुरुआत हुई। इस राजनीति का मूल संस्कार हठवादी था। यह हठवाद छात्रों को काफी अपील करता था। जबकि सच यह है कि छात्र राजनीति अनमनीय भाव से नहीं की जा सकती । लेकिन कैम्पस में समाजवादी हठवाद का श्रीगणेश हुआ और इसका परिणाम कैम्पस और स्वयं समाजवादी युवजन सभा के लिए आत्मघाती साबित हुआ। समाजवादी युवजन सभा जिस लहर के साथ उभरकर सामने आई मात्र 1982-83 के एक साल के छात्रसंघ के लीडरशिप के दौरान हाशिए पर चली गयी। यहां तक कि अधिकांश छात्रों का समाजवादी युवजन सभा से मोहभंग हो गया। कैम्पस भायानक अराजकता के दौर से गुजरा, जेएनयू में एक साल दाखिले नहीं हुए। सैंकड़ों छात्र निष्कासित हुए।
      समाजवादी हठवाद का लक्षण है कि हम जो मानते हैं उसे हूबहू लागू करेंगे चाहे जो हो। इस समझ के कारण समूचे हिन्दीभाषी क्षेत्र में समाजवादी उफान की तरह आए और फिर उसी तरह भुला दिए गए। सन् 1983 में किसी समस्या पर विवाद यह था कि प्रतिवाद करना है और वीसी का घेराव करना है। हमारा (एसएफआई) प्रस्ताव यह था कि घेराव करो लेकिन आफिस में करो। समाजवादियों का कहना था घर पर घेराव करेंगे। हमने इसका प्रतिवाद किया लेकिन वे नहीं माने, छात्रों ने उनका समर्थन किया हमारी बात नहीं मानी। परिणाम सामने था, समूचा छात्र आंदोलन दमन के जरिए तोड़ दिया गया। जेएनयू की तमाम नीतियां बदल दी गयीं।छात्रसंघ को अप्रासंगिक बना दिया गया।सैंकड़ों छात्र निष्कासित हुए और सैंकड़ों छात्रों पर 18 से ज्यादा धाराओं में मुकदमे ठोक दिए गए 400से ज्यादा छात्र 15 दिनों तक तिहाड़ जेल में बंद रहे। जेएनयू में अभूतपूर्व दमन हुआ। समूचा समाजवादी नेतृत्व छात्रों में अलग-थलग पड़ गया। जो छात्र एक साल पहले समाजवादी युवजनसभा पर जान छिड़कते थे वे ही नफरत करने लगे।यह समाजवादी हठ की स्वाभाविक परिणति थी।
    समाजवादी हठ एक तरह की वैचारिक कट्टरता है जिसको सुनील ने अपनी सादगी,त्याग और ईमानदारी के जरिए आकर्षित बना लिया और वे बाद में इसके जरिए गरीबों के बीच में काम करने कैम्पस के बाहर म.प्र. में चले गए। मेरा निजी तौर पर उनसे कैम्पस में नियमित संपर्क था लेकिन उनके कैम्पस के बाहर जाने के बाद कोई सम्पर्क नहीं रहा। इसका प्रधान दोषी मैं ही हूँ। मैं उतना मिलनसार नहीं हूँ। कम मिलता हूँ। जबकि सुनील जमीनी कार्यकर्ता होने के नाते मिलनसारिता में बेमिसाल था। वह मित्रों का ख्याल भी रखता था। उसके अचानक जाने से समाजवादी आंदोलन की बड़ी क्षति हुई है।  (सामयिक वार्ता, जुलाई 2014 में प्रकाशित)
     

नरेन्द्र मोदी का डिजिटल टाइमपास



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कल टीवी पर शिक्षक दिवस के बहाने बोल रहे थे तो वे सामान्यबोध के धरातल से सम्बोधित कर रहे थे। सामान्यबोध ने उनके राजनीतिकबोध को दबाए रखा । असल में वे बच्चों की चेतना के दबाव में थे। जैसा उम्मीद थी सब कुछ नियोजित था और नियोजन में कोई ऐसी बात नहीं घटती कि वक़्ता को परेशानी हो या उलझन हो। बच्चों में मोदी को लेकर कुतूहल था और मोदी अपनी शैली से उसे उभारने की कोशिश कर रहे थे । बच्चों के सवाल बच्चों जैसे थे लेकिन मोदी के जबाव बच्चों के अनुकूल नहीं थे बल्कि पीएम के अनुकूल थे। 
    प्रधानमंत्री का काॅमनसेंसभाषण मीडिया के पैरामीटर के अनुसार तय किया गया था और उसमें उन बातों को ही कहने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया जो बातें बच्चे आए दिन अपने स्कूलों में शिक्षकों या माता-पिता से सुनते हैं। सुनें हुए को सुनना कोई असर नहीं छोड़ता , हाँ, उससे टाइमपास जरुर होता है।फलत:बच्चों के साथ मोदी सत्र टाइमपास का डिजिटल रुप था। 
    डिजिटल टाइमपास की यह ख़ूबी है वहाँ पर कहीं गयी बातें तेजगति से आती हैं और जाती हैं। चूँकि टाइमपास में रुढिबद्ध सम्प्रेषण के रुपों का प्रयोग करते हैं अत: कम्युनिकेशन बड़ा सरल- सहज लगता है। सरल- सहज कम्युनिकेशन का मतलब यह नहीं है कि सम्प्रेषक सरल - सहज है। असल में भाषायी रुढियों का प्रयोग सरल का विभ्रम खड़ा करता है लेकिन यह विभ्रम क्षणिक होता है। डिजिटल कम्युनिकेशन जितने देर चलता है उतनी देर असर रहता है बाद में उसका असर नदारत हो जाता है, जैसे पोर्न फ़िल्म का असर जब तक चलती है तब तक असर रहता है बंद हुई ,असर ग़ायब। कम्प्यूटर चल रहा है तो आप सक्रिय हैं यदि बंद कर दिया तो कम्प्यूटर असरहीन होता है। यही हाल मोदी के डिजिटल भाषणों का है। चल रहे थे तो असर था ,बंद हैं तो असर ख़त्म।यही वजह थी कि मोदी के भाषणों को तक़रीबन १साल अहर्निश चलाया गया।
       शिक्षक दिवस पर मोदी कम्युनिकेशन की मूल चिन्ता थी 'हज़म 'करने की। वे चाहते थे शिक्षक दिवस के प्रतीक पुरुष के रुप में जाने जाएँ या फिर महान विचारक के रुप जाने जाएँ! लेकिन यह सब संभव नहीं हो पाया। क्योंकि 'शिक्षक'को हज़म करना संभव नहीं है । उसकी सत्ता-महत्ता तो राज्यसत्ता से स्वायत्त है और यह स्थिति उसने सैंकडों सालों में अर्जित की है। शिक्षक संस्थान है उसे डिजिटल क्रांति से अपदस्थ नहीं कर सकते। शिक्षक -छात्र के सम्बन्ध का कोई विकल्प नहीं है। अमेरिका में डिजिटल क्रांति आज तक शिक्षक को अपदस्थ नहीं कर पायी है। 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

'गुरु' के नए 'कू-भाषी' कॉमेडियन


        बेवकूफियों से हास्य पैदा करना,ऊल-जलूल बातों से हास्य पैदा करना, कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है। इस कार्यक्रम से बबूल संघ ,उसके साइबर बटुक और मोदी सरकार बहुत प्रभावित है। वे कपिल के कॉमेडी शो को भारत का राजनीतिक कंटेंट बना रहे हैं। देश के हर जलसे,दिवस,नायक,अच्छे नाम,अच्छे गुण आदि को राजनीतिक 'कू-भाषा' से अपदस्थ कर रहे हैं। वे हर अच्छे दिन और अच्छे त्यागी पुरुष को टीवी इवेंट बना रहे हैं ! 'कू' कर रहे हैं।। इस 'कू -कल्चर' के नए नायक इन दिनों टीवी टॉक शो पर आए दिन दिख जाएंगे। फेसबुक में दिख जाएंगे!   कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है ' कू-भाषा' का हास्य के लिए दुरुपयोग ,वहां हास्य कम और 'कू-भाषा' का दुरुपयोग ज्यादा होता है और यही भाषिक दुरुपयोग सांस्कृतिक भ्रष्टाचार की नई खाद है और इससे आमलोगों में भाषायी कुरुपता पैदा होती। 'कू-भाषा' की संस्कृति का विस्तार होता है।नव्य-आर्थिक उदारीकरण ने सारी दुनिया में 'कू-भाषा' को नए-नए रुपों में प्रसारित किया है।इसके भाषिक प्रयोगों को हम आए दिन युवाओं से लेकर फेसबुक तक देख सकते हैं। 'कू-भाषा' का नया प्रयोग है 'शेल्फी'!

कपिल के कॉमेडी शो का मूलाधार है 'कू-भाषा'। यही वह बिंदु है जहां पर बबूल संघ का कपिल शो के साथ मेल बैठता है। संघ की दीर्घकालिक सांस्कृतिक रणनीति है भारत को सांस्कृतिक रुप से विद्रूप बनाओ। भाषा ,व्यवहार और राजनीति में अंतर पैदा करो। विलोम की सृष्टि करो। जिस भाषा को बोलो,जिस नायक की जय-जयकार करो उसके कंटेट को पूरी तरह बदलो ! यह काम वे पहले छोटे स्केल पर करते थे, अपनी गोष्ठियों-सभाओं-शाखाओं में करते थे लेकिन इधर के वर्षों में वे बृहत्तर तौर पर करने लगे हैं। राजनीतिक एजेण्डे के तौर पर,साइबर एजेण्डे के तौर पर,टीवी टॉकशो के तौर पर,मंत्रालय के कार्यक्रम के अंग के तौर पर कर रहे हैं,इसलिए संस्कृति में वे 'कू' कर रहे हैं और इसके लिए 'कू-भाषा' और केरीकेचर की शैली का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका नया 'कू' है 'गुरु दिवस' मनाओ का नारा। बबूल संघ की सांस्कृतिक हेकड़ी का आलम यह है कि वे अपनी 'कू-भाषा'की आलोचना सुनने को तैयार नहीं होते, जो आलोचना करता है उस पर निजी हमले आरंभ कर देते हैं।मसलन् आपने कहा कि शिक्षक दिवस को 'गुरु दिवस' कहना सही नहीं है तो पलटकर हमला शुरु ! क्या तुम्हारा कोई गुरु नहीं है ? क्या राहुल ने मनमोहन सिंह को 'गुरु' नहीं कहा! गांधीजी ने 'गुरु' नहीं कहा ! 'गुरु' कहना और 'गुरु' मानना और 'गुरु' के अनुरुप या बतायी दिशा में आचरण करना एकदम भिन्न चीजें हैं। जब आप किसी को गुरु कहते हैं तो यह आपका निजी मामला है। लेकिन ज्योंही इसे सार्वजनिक करते हैं तो 'गुरु' का मामला निजी नहीं रह जाता,'गुरु' निजी नहीं रह जाता। 'गुरु' सार्वजनिक मूल्यांकन के दायरे में आ जाता है।लेकिन बबूल संघ और मोदी सरकार की ज्ञानी 'गुरु' में नहीं ,फिल्मी 'गुरु' में दिलचस्पी है! आप सब जानते हैं फिल्मों में कई किस्म के 'गुरु' चित्रित हुए हैं। इनका गुरु ज्ञान का प्रतीक नहीं है बल्कि इनका 'गुरु' तो उन सभी लक्ष्यों को समर्पित है जिनको 'गुरु गोलवलकर' बता गए हैं। इनके नए गुरु तो 'जन-संपर्क विशेषज्ञ' हैं जो बता रहे हैं कि भाषा में उलझाओ,भाषिक पदबंधों में सांस्कृतिक उत्पाद मचाओ। भाषिक उपद्रव यानी 'कू-भाषा' से मीडिया कवरेज बनाने में मदद मिलती है,वाक्य को इवेंट बनाने में मदद मिलती है। इसलिए बबूल संघ को आदित्यनाथ से लेकर तोगड़िया,मोदी से लेकर साइबर बटुक जैसी मीडिया इवेंट या हेडलाइन बनाने वाली भाषा चाहिए। वे भाषिक प्रयोगों के जरिए सांस्कृतिक 'कू' करने में लगे हैं। उनकी दिलचस्पी संस्कृति को अपदस्थ करने में हैं।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

सोशल मीडिया और बर्बरता

        सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बर्बरता का महाख्यान चल रहा है। जिस तरह आईएसआईएस की पोस्ट अबाधित रुप में पेश की जा रही हैं, बर्बर संगठनों के पक्ष में निरंतर लिखा जा रहा है। उससे यह संकेत जा रहा है कि सोशल मीडिया के लिए बर्बरता सबसे बड़ी खबर है और राजनीतिक आंदोलन, प्रतिवाद और लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई मूल्य नहीं है।अधिकांश मीडिया, बर्बरता की प्रस्तुतियों में इस कदर व्यस्त है कि उनको जनांदोलनों की किसी खबर या समस्या के कवरेज की कोई चिंता ही नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बर्बरता का नाटक चल रहा है और हम सब उसके मूकदर्शक बन गए हैं।बर्बरता का जितने बड़े रुप में प्रसारण हो रहा है जनांदोलनों का उतने बड़े रुप में प्रसारण नहीं हो रहा। यानी मीडिया की नजर में बर्बरता प्रासंगिक है,मोहन भागवत के नॉनशेंस बयान,बत्रा पंडित का पोंगापंथ और भगवापंथ की इरेशनल खबरें प्रासंगिक हैं, लेकिन अन्य लोकतांत्रिक खबरें और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष विचार प्रासंगिक नहीं हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया का यह बर्बरता प्रेम , बर्बरता का मित्र बना रहा है और लोकतंत्र से दूसरी बढ़ा रहा है। बर्बरता प्रेम का ही परिणाम है कि अनंतमूर्ति से लेकर विपनचन्द्र तक की मौत पर बर्बरता प्रेमी खुशी का इजहार कर रहे हैं। इस तरह का बर्बरता प्रेम गुलाम युग में देखा गया था।सोशलमीडिया -मीडिया कवरेज ने नार्सीसिस्ट भावबोध की सृष्टि की है। इसके कारण मीडिया ने करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाया है। इसने जहां एक ओर परपीड़क आनंद और उसके भोक्ताओं का बर्बर समाज पैदा किया है वहीं दूसरी ओर मूल्याधारित राजनीति को पूरी तरह निम्नस्तर पर उतार दिया है। मुनाफेखोर मीडिया घराने खुश हैं कि उनकी रेटिंग और मुनाफों में उछाल आया है वहीं दूसरी ओर वे मीडिया -सोशलमीडिया के जरिए लोगों की वधलीला भी कर रहे हैं। आज सोशलमीडिया में किसी के हत्या की तस्वीर लगाइए और खूब कवरेज पाइए। नैतिकता,सभ्यता और भद्रता के जितने ज्यादा परखच्चे उड़ाएंगे उतना ही दावे के साथ ज्यादा मुनाफा कमाएंगे।

पी साईनाथ ने कहा-' मीडिया में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर...हिरोशिमा-नगासाकी पर बम गिराए जाने के बाद The Times of India ने अपने 11 नंबर पेज पर शीर्षक लगाया था, "Excellent results in raid on Nagasaki" और इसके नीचे एक और ख़बर थी जिसका शीर्षक था, "Uranium shares go up 90 points after Hiroshima.'' इस घटना पर पूरी दुनिया में वाइट हाउस से जारी प्रेस रिलीज़ आधारित जो पत्रकारिता की गई, उसने पत्रकारिता में उसी वक्‍त दो स्‍कूल बना दिए- एक पत्रकारों का और दूसरा स्‍टेनोग्राफरों का। आज पत्रकारिता में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर हैं जो धीरे-धीरे कॉरपोरेट स्‍टेनोग्राफर होते जा रहे हैं। ये कहना है जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ का।'

'दिल्ली के कॉन्‍सटिट्यूशन क्‍लब में आयोजित एक समारोह में अपने संबोधन के दौरान पी. साईनाथ ने पत्रकारिता को लेकर कई अन्य बातें भी बताईं, जिसमें से एक यूं हैं.... हिरोशिमा-नगासाकी पर अमेरिकी बमबारी का जश्‍न मनाते हुए जब न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के (अमेरिकी सैन्‍य विभाग प्रायोजित) पत्रकार विलियम लॉरेन्‍स 'बम के सौंदर्य की तुलना बीथोवन की सिम्‍फनी के ग्रैंड फिनाले' से और बमबारी से पैदा हुए 'मशरूम की आकृति के धुएं के गुबार की तुलना स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी' से कर रहे थे, ठीक उस वक्‍त सिर्फ एक फ्रीलांसर पत्रकार था जिसने इस घटना का सच सामने लाने के लिए अपने खर्च पर हिरोशिमा जाने का फैसला किया। ऑस्‍ट्रेलिया के इस पत्रकार का नाम था विल्‍फ्रेड बर्चेट। उसकी बेहतरीन रिपोर्टिंग 'द डेली एक्‍सप्रेस' में छपी।'

'विल्‍फ्रेड बर्चेट की रिपोर्टिंग का वैश्विक मीडिया के समक्ष खण्‍डन करने के लिए टोक्‍यो में अमेरिकी मैनहैटन प्रोजेक्‍ट के ब्रिगेडियर जनरल थॉमस फैरेल ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स रखी। बर्चेट को पता चला कि प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स उसी के ऊपर है, तो वह वहां पहुंच गया। उसने ब्रिगेडियर से कुछ सवाल किए। सवालों से असहज होकर ब्रिगेडियर ने उससे कहा कि वह जापान के साम्राज्‍यवादी प्रोपेगेंडा का शिकार हो गया है। बाहर निकलते ही एलाइड ताकतों के प्रमुख के निर्देश पर उसका पासपोर्ट ज़ब्‍त कर लिया गया, उसे हिरासत में ले लिया गया और हिरोशिमा-नगासाकी बमबारी की रिपोर्टिंग पर प्री-सेंसरशिप लगा दी गई।छूटने के बाद दोबारा जब बर्चेट ने पासपोर्ट बनवाया तो फिर से गुप्‍तचर एजेंसियों ने उसे चुरा लिया। इसके बाद वह आजीवन बिना पासपोर्ट के रहा। बर्चेट ने अपनी आत्‍मकथा 'पासपोर्ट' के नाम से लिखी और हिरोशिमा में लगे विकिरण के असर से बेहद गरीबी में जीते हुए बगैर किसी नागरिकता के उसका निधन हुआ। उधर, अमेरिकी सैन्‍य विभाग द्वारा प्रायोजित न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के पत्रकार को दुनिया के सामने बम का सौंदर्य बखान करने के लिए पुलित्‍ज़र पुरस्‍कार से नवाज़ा गया। तभी से दुनिया भर की पत्रकारिता में दो ध्रुव कायम हो गए- लॉरेन्‍स की और बर्चेट की पत्रकारिता। अब आपको तय करना है कि आप क्‍या बनना चाहेंगे- विलियम लॉरेन्‍स या विल्‍फ्रेड बर्चेट?'

(पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के वॉल से)