गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

ईमानदार पेशेवर शिक्षण और विचारधारा

          मुझे निजी तौर पर जिन शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिला वे सभी पेशेवर ईमानदार शिक्षक थे।मथुरा में नगरपालिका के प्राइमरी स्कूल जवाहर लाल स्कूल, माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय और अंत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में जिन शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिला वे अध्ययन-अध्यापन के प्रति एकदम पेशेवर नजरिया रखते थे,विद्यार्थियों के साथ बेहद मानवीय व्यवहार करते थे।फलतः मेरे मन में पेशेवर शिक्षक बनने की भावना पैदा हुई,एक ऐसा शिक्षक बनने की भावना पैदा हुई जो शिक्षा के प्रति ईमानदार रहे,पेशेवर तैयारी के साथ कक्षा में जाए,शिक्षा को धंधा न बनाए,मेरा कोई भी शिक्षक धंधेबाज नहीं था।दिलचस्प बात यह कि जितने भी शिक्षक मिले वे किसी न किसी विचारधारा को मानते और जानते थे,उनके पास राजनीतिक नजरिया था।एकमात्र आचार्य सवलकिशोर पाठक ऐसे थे जो कभी राजनीति पर नहीं बोलते थे, वे दर्शनशास्त्र के बहुत ही बेहतरीन विद्वान थे, व्यवहार में वे कांग्रेसी विचारधारा से प्रभावित थे,लेकिन आम बातचीत में छात्रों से राजनीति की कभी बातें नहीं करते थे।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि किसी भी शिक्षक ने राजनीति करने के लिए मेरे या अन्य के साथ बुरा व्यवहार नहीं किया।जेएनयू में पढ़ते समय तो अनेक मर्तबा गुरूजनों के खिलाफ ही आंदोलन करना पड़ा लेकिन कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि विचारधारा जहर है,विचारधारा के कारण शिक्षक परेशान कर रहे हैं।शिक्षकों से वैचारिक मतभेद सामान्य चीज थी,इससे शिक्षकों के साथ कभी टकराव पैदा नहीं हुआ,यह जमा पूंजी थी मेरे छात्र जीवन की जिसको लेकर मैं अध्यापकीय जीवन में दाखिल हुआ।मैंने निजी तौर पर अनेक शिक्षकों को जेएनयू ,डीयू आदि में देखा था जो छात्रों से राजनीतिक मतभेद के कारण दुर्व्यवहार करते थे।जेएनयू में कभी-कभी यह प्रवृत्ति नामवरजी के अंदर अभिव्यक्त होती थी,जिसके कारण छात्रों के साथ उनका टकराव होता था।इस पूरे अनुभव का निचोड़ यह कि शिक्षक को कभी विचारधारा के डंडे से अपने विद्यार्थियों को नहीं हांकना चाहिए।जो शिक्षक राजनीतिक विचारधारा के डंडे से हांकेगा वह छात्रों का अहित ही करेगा।

शिक्षा में राजनीति होगी,राजनीति होनी भी चाहिए,लेकिन श्रेष्ठ राजनीति करो,लेकिन पठन-पाठन को गौण न बनाओ। निकृष्ट राजनीति मत करो।छात्रों को राजनीति करने,अपनी विचारधारा,अपने मन का छात्र संगठन चुनने की आजादी हो,हर मसले पर उनकी राय लो,हर स्तर उनकी शिरकत को सुनिश्चित करो,शिक्षा को पेशेवर और ईमानदार आचरण का आईना बनाओ।यही मनोदशा थी जिसे लेकर मैंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में नौकरी ली,जब कोलकाता आया था तो बड़े सपने थे मन में,लेकिन कलकत्ता विश्वविद्यालय में काम करने के साथ ही चंद दिनों में सारे सपने दफ्न करने पड़े,इसका एकमात्र कारण वाम राजनीति थी, आयरनी यह कि वाम ने ही सपने पैदा किए,वाम ने ही सपने दफ्न किए।इसलिए मेरे अंदर सपनों के दफ्न हो जाने का दुख नहीं था।

कोलकाता में पढ़ाते हुए 27साल हो गए,इन वर्षों में जो कुछ देखा है वह त्रासद ज्यादा है, सुखद कम है। सुखद यह है कि मैंने सीमित संसाधनों और तमाम किस्म की प्रतिकूल अमानवीय परिस्थितियों के बावजूद कभी शिक्षक के रूप में कक्षा को कम करके नहीं लिया,कक्षा मेरे लिए आज भी सर्वोच्चसुख है,समय पर कक्षा में जाना और पूरा समय कक्षा में रहना यह मेरी आदत है।मेरे लिए कक्षा बहुत बड़ी प्रयोगशाला है,जिसमें मुझे सबसे ज्यादा सीखने को मिला।मैंने अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए जो सीखा वह बेहद मूल्यवान है और उसका मैंने अपने जीवन में तो लाभ उठाया ही अपनी किताबों के लेखन में भी लाभ उठाया। मेरी अधिकांश किताबें सबसे पहले बीज रूप में कक्षाओं में ही पैदा हुईं,पढ़ाते हुए नए विचारों की हवा कक्षा में ही मिली,मेरे लिए छात्र एक तरह से ईंधन का काम करते रहे हैं, मैं पढ़ाता नहीं तो संभवतः किताबें नहीं लिख पाता।मेरे अधिकतर विद्यार्थी नहीं जानते कि वे मुझे क्या दे रहे हैं,लेकिन मैं सचेत रूप से उनसे लेता रहा हूँ।पेशेवर ईमानदारी से जितना बन पड़ा कक्षा में किया,जो कक्षा में नहीं कर पाया वह किताबें लिखकर किया।जिससे भविष्य में ज्ञान का सही इस्तेमाल हो।दिलचस्प बात यह कि मैंने कभी किताबी ढ़ंग से नहीं पढ़ाया,इसका बड़ा कारण था कि मैं जिन शिक्षकों से पढ़कर आया था वे किताबी ढ़ंग से नहीं पढ़ाते थे। मेरा मानना है कि एक बेहतरीन शिक्षक वह जो कक्षा में पढ़ते समय घुल-मिल जाए,विषय में रमकर पढ़ाए,पढ़ाते समय दिमाग की बंद खिड़कियों को खोले,आलोचनात्मक विवेक पैदा करे।मेरे लिए कक्षा का मतलब क्लास नोटस लिखाना नहीं था।मैंने कभी नोटस नहीं लिखाए।मेरे लिए पढ़ाने का मतलब है विद्यार्थी में पढ़ने की दिलचस्पी पैदा करना,पढ़ने की ललक पैदा करना,ज्ञान के लिए बेचैनी पैदा करना,यह काम जिस तरह हो पेशेवर ढ़ंग से किया जाय।मैं नहीं जानता इसमें कहां तक सफल हुआ, कहां तक असफल हुआ,लेकिन मेरे पढ़ाने का रास्ता यही रहा है।



मैंने जब नौकरी आरंभ की तो कलकत्ता विश्वविद्यालय में आधुनिक आलोचना तकरीबन नहीं पढ़ाई जाती थी, परंपरागत पाश्चात्य समीक्षा और संस्कृत काव्यशास्त्र एक अतिथि अध्यापक पढ़ाते थे नाम था सदानंद सिंह,वे प्रेसीडेंसी में शिक्षक थे।मैंने उनसे एकदिन पूछा कि आप किस तरह पढ़ाते हैं,उन्होंने ईमानदारी से कहा रटकर आता हूँ कक्षा में जाकर उगल देता हूँ।मेरे लिए यह चौंकाने वाली चीज थी। इससे मुझे अंदाजा लगा कि रट्टूभाव से यदि शिक्षक पढ़ा रहा है तो वह आखिर किस तरह का वातावरण बना रहा है,रट्टूभाव से पढ़ाने का अर्थ है शिक्षा को सुला देना।कक्षा में जब गया तो और भी चौंकानेवाला अनुभव हुआ,हिन्दी साहित्य का इतिहास कोर्स में था, लेकिन विद्यार्थियों ने रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी का नाम तक नहीं सुना था। पूछा कि किसका लिखा इतिहास पढ़ते हो तो पता चला किसी शिवकुमार शर्मा नामक व्यक्ति का लिखा इतिहास पढ़ते हैं,खोजबीन की तो पता चला सारा कलकत्ता उनका इतिहास पढ़ता है,यानी पूरे शहर से रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी गायब थे,जबकि वे स्वयं मेरे विभाग में आ चुके थे,कोलकाता शहर तो वे और उनकी दूसरी परंपरा वाले लोग साल में कई बार आते थे,लेकिन साहित्य के विद्यार्थियों में उनका कोई असर नहीं था।पता चला यह शिवकुमार शर्मा नामक व्यक्ति कुंजीलेखक है,मैं मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र समझ रहा था.इससे यह भ्रम भी टूटा कि किसी शहर में बड़े प्रगतिशील साहित्यकार भाषण देने आते-जाते हैं तो उनसे साहित्य के विद्यार्थी प्रभावित नहीं होते, बल्कि वे कक्षा में पठन-पाठन से प्रभावित होते हैं।मुझे खुशी है कि मेरे आने के बाद पहलीबार कलकत्ते के छात्रों को रामचन्द्र शुक्ल-हजारीप्रसाद द्विवेदी के इतिहासग्रंथ पढ़ने की जरूरत महसूस हुई।पहलीबार इतिहास के कुंजीलेखक से छात्रों का संबंध टूटा।इसी तरह कलकत्ता वि.वि. में जयशंकर प्रसाद पर विशेषपत्र दसियों साल से पढ़ाया जा रहा था,लेकिन किसी ने मुक्तिबोध की किताब का जिक्र तक नहीं किया था, मुक्तिबोध की प्रसिद्ध किताब है ‘कामायनी एक पुनर्विचार’,इसका कोई जिक्र नहीं था, छात्र मुक्तिबोध का नाम तक नहीं जानते थे।क्योंकि वे पाठ्यक्रम में नहीं थे।पाठ्यक्रम में कोई सामयिक चीज,सामयिकलेखक नहीं पढ़ाया जाता था।मैंने पहलीबार जब पाठ्यक्रम बदलने पर जोर दिया , जिंदालेखकों को पढ़ाने पर जोर दिया तो इस पर बड़ी तीखी बहस हुई,कलकत्ता वि.वि. में उस समय जिंदा लेखक नहीं पढ़ाया जाता था और जिंदा लेखक पर शोध नहीं होता था।मैंने सबसे पहले अपने साथ पीएचडी करने के लिए जिंदालेखक चुनने में शोधार्थियों को मदद की तो बहुत तीखी बहस हुई,उसके बाद जिंदालेखक का प्रवेश हुआ।मेरे साथ रामविलाश शर्मा और नामवर सिंह ये दो जिंदा लेखक थे जिन पर शोध सबसे पहले हुए।इसके पहले कलकत्ता वि.वि. में जिंदालेखक को पढ़ाना और उस पर शोध कराना बंद था।आज पाठ्यक्रम में अनेक जिंदा लेखक पढाए जाते हैं,जिंदालेखकों पर शोध हो रहा है।यही तो सुख है।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कलकत्ते के खट्टे-मीठे अनुभव-


मैं सन्1989 में कोलकाता आया,जिस समय मेरी नियुक्ति कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हुई उस समय हिन्दी एम.ए. में तकरीबन 45 छात्र पढ़ते थे।आज प्रत्येक सेमिस्टर में 125 छात्र पढते हैं।एम.फिल् भी है।मेरी नियुक्ति के पहले तक कलकत्ता वि.वि. में एससी,एसटी, आरक्षण नहीं था।कॉलेज सर्विस कमीशन में भी आरक्षण के आधार पर पद नहीं भरे जाते थे। यह समस्या जब मेरी नजरों में पहलीबार सामने आई तो मैंने इसे माकपा के शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा और अंतमें काफी जद्दोजहद के बाद आरक्षण लागू हुआ। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हिन्दी एमए का पाठ्यक्रम तकरीबन30सालों से नहीं बदला गया था,उसमें निरंतर अपडेटिंग की प्रक्रिया आंरंभ हुई। इस काम में विभाग के अन्य शिक्षकों ने सहयोग किया,लेकिन पहल मैंने की। आज पश्चिम बंगाल हिन्दी के पठन-पाठन के लिहाज से बहुत विकास कर गया है,इसमें वाम सरकारों की बड़ी भूमिका रही है।अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जाती है।

कलकत्ते का सारा माहौल पुराने पैटर्न,आदतों,संस्कारों पर टिका है।नई दुनिया का उसमें प्रवेश बेहद धीमी गति से हो रहा है।चीजें बदल रही हैं लेकिन बेहद धीमी गति से। विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी समस्या है पुस्तकों की।जरूरत की पुस्तकों को पढ़ने-पढ़ाने का यहां रिवाज कम है।अधिकतर शिक्षक भी उससे अपरिचित हैं।इसके कारण विद्यार्थियों तक सही सूचनाएं ,पुस्तकों के नाम नहीं पहुँच पाते। स्थिति की गंभीरता समझने के लिए मैं अपना एक अनुभव साझा करना चाहता हूँ।हमलोगों ने एमफिल् का पाठ्यक्रम आरंभ किया। पहला बैच था,उसमें मुझे साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाना था,किताबें नहीं मिल रही थीं, मैंने स्व.विष्णुकांत शास्त्री,जो विभाग के वरिष्ठतम प्रोफेसर थे,बेहतरीन शिक्षक थे, से पूछा कि मुझे मिखाइल बाख्तिन पढ़ाना है,क्या आपके पास उनकी कोई किताब है,वे बोले मैंने तो नाम ही पहलीबार सुना है,मैं सुनकर चौंक गया।दूसरे दिन मैंने भाषाविज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर से पूछा कि क्या उनके पास बाख्तिन की कोई किताब है तो वे बोले, हां,वे बोले मेरे पास सब किताबें हैं,मैंने शास्त्रीजी से कहा कि देखिए कितना अंतर है ,हिन्दी के प्रोफेसर को नाम तक नहीं मालूम और भाषाविज्ञान के प्रोफेसर के पास किताबें तक हैं।इस एक घटना ने मेरी आंखें खोल दी साथ में यह भी मैसेज दिया कि हिन्दी के शिक्षक आधुनिक विचारकों के लेखन से परिचित होना तो दूर,उनका नाम तक नहीं जानते। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से मैंने काम आरंभ किया।

मैं जेएनयू से पढ़कर आया था,नए विषय,नए विचारक,सिद्धान्तकार आदि के बारे में गुरूमुख पढ़कर आया था अतःमेरे सामने वह संकट नहीं था जो यहां के शिक्षकों के सामने संकट था। कहने का आशय यह कि विद्यार्थी ज्ञान के नए स्रोतों से बाकिफ तब होगा जब शिक्षक बाकिफ होगा।कोलकाता जैसे महानगर में रहते हुए दुनिया के ज्ञान के बेखबर रहने वाला शिक्षक निश्चित रूप से तेजगति से अपना विकास नहीं कर सकता। पहले ज्ञान-विज्ञान के नए क्षितिज शिक्षक स्पर्श करे,बाद में वह अपने विद्यार्थियों को मौका दे,सारी समस्या की जड़ यहां पर है।



मैं जब कोलकाता आया तो मैंने पता किया कि यहां विदेशी किताबें कहां मिलती हैं ? पता चला कि विदेशी पुस्तक भंडार नाम से एक किताबों की दुकान है,मैं दुकानदार से मिला,उसने नई-नई किताबें दिखायीं,बात करने पर पता चला कि नामवरजी जब भी कलकत्ता आते हैं उस किताब वाले के यहां जरूर आते हैं, मैं नामवरजी से उस किताबवाले के बारे में जेएनयू में छात्रजीवन में सुन चुका था, नामवरजी जब भी कोलकाता आते सेमीनार आदि से जो भी रूपये मिलते उससे उस पुस्तक बिक्रेता से किताबें खरीदकर ले जाते।साल में कम से कम 3-4बार उनका कोलकाता आना होता था, मैंने किताब वाले से पूछा क्या कोई और हिन्दी का शिक्षक भी उससे किताबें खरीदने आता है तो उसने कहा कि हिन्दी का कोई शिक्षक कभी किताब खरीदने नहीं आया।यह वाकया इसलिए बताना जरूरी है कि हिन्दी शिक्षकों के दुनिया से संपर्क-संबंध को हम पहचान सकें।कलकत्ता वि.वि.की लाइब्रेरी से कभी किसी हिन्दी शिक्षक ने 1989 तक पश्चिमी समीक्षा की किताबें, आलोचना की नई किताबें निकलवाकर नहीं पढ़ीं,मैं पहला शिक्षक था जो किताबें निकालकर लाता और पढ़ता था।मेरे लिए यह सारी चीजें बेहद निराशा पैदा करने वाली थीं,जब आप नई किताबें नहीं पढ़ेंगे तो नई बहसों में शामिल कैसे होंगे, ज्ञान के समुद्र में दुनिया के साथ हिन्दीवालों को कैसे जोड़ेंगे? यह काम आशीर्वाद मात्र से नहीं हो सकता।

सोमवार, 25 जनवरी 2016

रोहित के सच को यहां से देखो

     हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र की आत्महत्या की घटना शर्मनाक है,सवाल यह है कि हमारा समाज उसे बचा क्यों नहीं पाया ?सिद्धांततः आत्महत्या प्रतिवाद का पॉजिटिव कदम नहीं है।लेकिन कवि केदारनाथ सिंह ने इसे आत्महत्या न कहकर शहादत कहा है,रोहित को शहीद का दर्जा दिया है।इसलिए रोहित को शहीद के रूप में देखें।मैं निजी तौर पर केदारनाथ सिंह के नजरिए से सहमत हूँ।केदारनाथ सिंह हाल ही में कलकत्ता वि.वि, में बिड़ला व्याख्यानमाला के तहत “तुलसीदास और आधुनिक हिन्दी कविता” विषय पर बोल रहे थे,उन्होंने यह भी कहा कि रोहित को दरकिनार करके कोई साहित्य-चर्चा संभव नहीं है।

जीवन सबसे मूल्यवान है,जीवन की कीमत पर कोई भी नकारात्मक कदम उठाना सही नहीं है। सारे प्रतिवाद और सहानुभूति के बाद भी रोहित को वापस हासिल नहीं कर सकते। कईबार विचारधारा जब विकल्पहीन हो जाती है तो अवसाद घेरता है,अथवा जनांदोलन में सफलता नहीं मिलती तो अवसाद घेरता है।कईबार विचारधारा की विकल्पहीनता अवसाद पैदा करती है।विचारधारा वही टिकती है जो अपने को अपडेट करे,विकल्प पैदा करे।

एक जमाना था जब आंदोलन करने से उदात्तभाव का विकास होता था ,कुर्बानी देकर खुशी होती थी, आंदोलनकारी को अवसाद नहीं घेरता था, मजदूर आंदोलन इसके प्रमाण हैं। मजदूर लंबी लड़ाईयां लड़ते हैं,नौकरियां चली जाती हैं,लेकिन वे आत्महत्या नहीं करते। लेकिन मध्यवर्ग औरकिसान पृष्ठभूमि से आने वालों में विगत चार दशकों से अवसाद का दायरा बढ़ा है, आम जीवन में हताशा बढ़ी है,आत्महत्याओं की संख्या बढ़ी है। इसका आंदोलनकारियों पर भी असर होने लगा है। जबकि पहले आंदोलनकारियों को अवसाद नहीं घेरता था। लेकिन अब आंदोलनकारी को भी हताशा और अवसाद घेरने लगे हैं,अवसाद से बचने का एक ही तरीका है कि हम वैचारिकतौर पर और भी मजबूत बनें,ज्यादा हमदर्द और मित्र बनाएं।

रोहित के प्रसंग में आत्महत्या का सवाल बेहद जटिल है। अनुमान कर सकते हैं कि रोहित ने आत्महत्या इसलिए की कि वि.वि.प्रशासन ने गलत फैसला लिया,समय रहते समस्या का पॉजिटिव समाधान नहीं किया।छात्रों के आंदोलन के प्रति नकारात्मक रूख अपनाया।लंबे समय तक आंदोलन करते हुए जब रोहित को कोई विकल्प नजर नहीं आया तो उसने प्रतिवादस्वरूप मरना बेहतर समझा।मोदी सरकार ने आंदोलनकारियों के प्रति जिस तरह का शत्रुतापूर्ण रूख अख्तियार किया है उसके चलते भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति हो सकती है।इसमें अप्रत्यक्ष तौर पर मीडिया की भी भूमिका है।

प्रशासन जब हठी ,बहरा और अविवेकपूर्ण रवैय्या अपनाता है तो आत्महत्या की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।खासकर उनलोगों में जो किसान पृष्ठभूमि और मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं। इस समूचे प्रसंग का एक अन्य पहलू है , “संघी” और “अन्य”,जो संघी नहीं है उसकी कोई सुनवाई नहीं है।नई संघी लाइन है जो संघी नहीं है ,वह देशद्रोही है।जो मोदी का विरोधी है वह देशद्रोही है।इस समझ ने केन्द्र के प्रशासन को वैचारिक तौर पर हिन्दुत्व का पक्षधर होकर काम करने को मजबूर किया है।बड़े पैमाने पर नौकरशाही का हिन्दूकरण चल रहा है। यही वजह है कि केन्द्र सरकार जल्द ही किसी आंदोलन पर सामान्यतौर पर राय नहीं देती,मंत्री,प्रधानमंत्री नहींबोलते,जब भी बोलते हैं हिन्दुत्व के संघी नजरिए से बोलते हैं। लेबल लगाकर बोलते हैं।जबकि केन्द्र सरकारको तटस्थ रहना चाहिए और जो भी समस्या आए उसका हर हालत में पॉजिटिव समाधान खोजना चाहिए।इसे सामाजिक अवसाद पैदा नहीं होगा।वरना मोदी सरकार का जो रूख है वह सामाजिक अवसाद में इजाफा करेगा।इसके लिए जरूरी है “अन्य” को केन्द्र सरकार माने।लेकिन पीएम के पास "अन्य" या "अदर" के दर्द को महसूस करने वाली फैकल्टी ही नहीं है। "अन्य " का दर्द तब महसूस होता है जब आप अपनों का दर्द महसूस करते हैं। जो अपने निजी दर्द को महसूस न कर सके,वह अन्य के दर्द को क्या महसूस करेगा !

सवाल यह है सन् 2002 के दंगों में मारे गए मासूम-निहत्थों की हत्या को लेकर मोदीजी कितना रोए ? कितनीबार दंगापीड़ितों के शिविऱों में गए ? दंगा पीड़ितों से कितनीबार मिले ? उनके दुख-दर्द को सुनने के लिए कितना समय खर्च किया ? "अन्य" का दर्द महसूस करने के लिए संघी मन नहीं चाहिए,मनुष्य का मन चाहिए।अन्य दर्द में रहता है,संघी दर्द को देखता है।संघियों को अन्य का दर्द देखकर संतोष मिलता है,वे दूर से देखकर दुख व्यक्त करते हैं,"बुरा हुआ",से ज्यादा न सोचते हैं ,न महसूस करते हैं।"अन्य" को समझने,उससे जुड़ने और उसे जीने के लिए हिन्दुत्व के दायरे के बाहर निकलने की जरूरत है। हिन्दुत्व की लक्ष्मणरेखा में रहकर अन्य का दर्द,रोहित की मौत या किसानों की आत्महत्या का अहसास पाना संभव नहीं है।इसके अलावा मोदी सरकार अपने को टीवी इमेजों के माध्यम से देखना बंद करे। टीवी पर तो सब प्रायोजित चल रहा है।वहीं दूसरी ओर आम लोगों को टेलीविजन इमेजों के माध्यम से मोदी सरकार को देखना बंद करना चाहिए, उसके कामों के माध्यम से देखो। टीवी इमेजों में मोदीजी जितने लुभावने लगते हैं,कामों के जरिए उतने ही डरावने लगते हैं।टीवी इमेजों ने मोदी की लुभावनी इमेज बनायी है। हम सबकी आदत है फोटो को ही सच मानने की , इसलिए हमारे अंदर रीयल मोदी से ज्यादा इमेजरी मोदी की अपील है।मोदी की रीयल इमेज वह है जिसे आरएसएस ने रचा है,आरएसएस जो कर रहा है वह मोदी का कर्म है।पीएम की फोटोजनित इमेज तो नकली है।

फोटोजनित इमेज विभ्रम है ,संघजनित इमेज य़थार्थ है,हमको फोटोजनित इमेज पसंद है,संघ को रीयल इमेज पसंद है।फोटोमोदी और रीयलमोदी में अंतर है। हम फोटोमोदी देखना बंद करके रीयल मोदी पर ध्यान केन्द्रित करें।रोता हुआ मोदी तो फोटोमोदी है,रीयलमोदी तो पत्थरदिल है।

मोदी जब रोहित के लिए दुख व्यक्त कर रहे थे तो असली दुख नहीं था वह,यदि असली दुख था तो रोहित की मौत की खबर पाते ही उसकी मां से मिलने क्यों नहीं गए ?तत्काल बयान क्यों नहीं दिया ? असल में मोदी के आंसू तो स्मृति ईरानी की असफलता के लिए निकल रहे थे,संघ की असफलता पर निकल रहे थे।असल में पराजयबोध की अवस्था में भी नायक रोते हैं।मोदी के दुख का रोहित के दुख से कोई संबंध नहीं है।यदि सच में रोहित के लिए रो रहे थे तो सात महिने में आपको पता ही नहीं चला कि रोहित किन कष्टों से गुजरा! कमाल के पत्थरदिल और बेखबर पीएम हैं !

रोहित की मौत के बाद उठे प्रतिवाद के कारण हैदराबाद वि.वि. ने 4दलित छात्रों का निलंबन वापस ले लिया है. लेकिन कारण नहीं बताया ,क्या ये लोग रोहित की मौत का इंतजार कर रहे थे या फिर निलंबन गलत था ? कायदे से वीसी को तुरंत हटाया जाना चाहिए और दलित छात्रो ने जो मांगें रखी हैं उन पर अकादमिक परिषद तुरंत फैसला करे।निलम्बन वापसी पहला कदम है।उल्लेखनीय है भारत में 1991-2014 के बीच में 13,750 दलितों की हत्या हुई है, 27,017दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है और 6,74,619 दलितों पर जुल्म के केस दायर हुए हैं।मोदी सरकार के दलित विरोधी चेहरे का एक अन्य पहलू है- एससी एसटी के लिए इस साल के बजट में आवंटित धनराशि में 19हजार करोड़ रूपये की कटौती और आम्बेडकर रचनावली न छापने का फैसला।

मोदी सरकार और उसके लगुआ-भगुआ तंत्र की विशेषता है कि वे जनांदोलन से नफरत करते हैं,मांग कर रहे आंदोलनकारियो की बातें सुनते नहीं हैं,सामान्य हमदर्दी से पेश नहीं आते,जब कोई संगठन मांग रखता है तो सीधे अड़ जाते हैं कि नहीं मानेंगे। इसी अमानवीयता का परिणाम है हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित स्कॉलर की आत्महत्या।तकरीबन यही अमानवीय व्यवहार पूर्व सैनिकों के साथ किया गया। बैंक कर्मचारियों के साथ किया गया। अमानवीय आचरण की सूची बहुत लंबी है।केन्द्र में इस तरह की अमानवीयता पहले कभी नहीं देखी गयी। यह दुखद है कि स्मृति ईरानी से लेकर संविद पात्रा तक सभी रोहित के आत्महत्या के पहले लिखे पत्र को हवाले के रूप में पेश कर रहे हैं,लेकिन उसकी आत्महत्या को नजरअंदाज कर रहे हैं।विगत छह महिने से रोहित जो कह रहा था उसका जिक्र तक नहीं कर रहे।आत्महत्या सबसे बड़ा प्रमाण है उसके सामने रोहित के लिखे सभी पत्र बेकार हैं।जाति,धर्म बेकार हैं।रोहित की मौत को न देख पाना अपने आपमें बर्बरता और असभ्यता का प्रतीक है।

रोहित की मौत के बाद मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रेस कॉंफ्रेस की। प्रेस कॉफ्रेंस में निर्लज्जता के साथ सफेद झूठ बोला।झूठ नम्बर 1- कांग्रेस सांसद हनुमंत राव ने कभी कोई पत्र हैदराबाद विश्वविद्यालय के बारे में दलित छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं की जांच के लिए नहीं लिखा,जिस पत्र का ईरानी जिक्र कर रही थीं, उस पत्र के सच को पेश किया सीएनएन के एंकर ने,उसने ईरानी के दावे को झूठा करार दिया।सांसद हनुमंतराव के पत्र में जो लिखा है उसका जिक्र करते हुए एंकर ने बताया कि सांसद ने दलितों की आत्महत्या को लेकर उस पत्र में कहीं पर एक वाक्य भी नहीं लिखा।ईरानी का दूसरा सफेद झूठ- हैदराबाद विश्वविद्यालय ने जो जांच कमेटी बनायी उसमें कोई दलित प्रोफेसर नहीं था।यह बात वि.वि. के एसी-एसटी फोरम के प्रवक्ता ने कही है।

असल में ,मंत्री गलती करे या वीसी गलती करे,मोदीराज में किसी को इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है।गलतियों को दुखद ,और दुखद को परपीडन में बदल दिया गया है। मोदी सरकार की इस मनोदशा ने बहुत कम समय में ही समूचे प्रशासन के कानों में तेल डाल दिया है।ध्यान रहे विश्वविद्यालय कैंपस में जुल्म होगा,कैंपस में प्रशासन राजनीति करेगा तो छात्रों के द्वारा कैंपस में प्रतिवाद होगा,कैंपस तो छात्रों का घर है,वे अपने घर में प्रतिवाद करने के लिए स्वतंत्र हैं। रोहित की आत्महत्या का प्रतिकार करने के लिए जरूरी है हैदराबाद विश्वविद्यालय के सभी छात्रों को एकजुट संघर्ष में बांधकर रखा जाए।छात्रों के बीच में इस आंदोलन का विस्तार किया जाए।छात्रों के आंदोलन को छात्र-आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में चलाया जाए वरना मूल मुद्दे हाथ से निकल जाएंगे।प्रतिवाद निरंतरता की मांग करता है,उत्तेजना तो विचलन है।













सुभाषचन्द्र बोस के नाम पर संघीखेल


हाल ही में सुभाषचन्द्र बोस की 100 गोपनीय फाइल मोदी सरकार ने सार्वजनिक की हैं, इसके पहले कुछ फाइल ममता सरकार ने सार्वजनिक की थीं, मोदी सरकार भी कुछ फाइल पहले सार्वजनिक कर चुकी है।लेकिन इन फाइलों से नया कोई तथ्य सामने नहीं आया, सवाल यह है जब नया कुछ नहीं है तो क्या तालियां सुनने –बजाने के लिए रद्दी गोपनीय फाइल सार्वजनिक की गयी हैं? सुभाषचन्द्र बोस और अन्य क्रांतिकारियों के गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक करने से पहले यदि इन क्रांतिकारियों की समस्त रचनाएं हिन्दी और अंग्रेजी में इंटरनेट पर मुफ्त में केन्द्र सरकार मुहैय्या करा देती तो बड़ा उपकार होता।

पीएम नरेन्द्र मोदी ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के सपने के साथ कैसे खिलवाड़ किया है,यह समझने के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण काफी है। पीएम मोदी ने सरकार बनाते ही योजना आयोग को खत्म कर दिया। यह एक्शन सीधे सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है। उल्लेखनीय है सुभाषचन्द्र बोस ने अगस्त1942 में एक लेख ‘फ्री इण्डिया एण्ड हर प्रॉब्लम्स’ शीर्षक से लिखा जो उनकी रचनावली में संकलित है।इस लेख में उन्होंने विस्तार के साथ आजाद भारत में आने वाली समस्याओं पर प्रकाश डाला है।इस लेख में एक जगह उन्होंने योजना समिति की महत्ता पर रोशनी डालते हुए कहा है कि भारत के निर्माण के लिए यह जरूरी कदम है। उन्होंने लिखा है कि मैं जब कांग्रेस का अध्यक्ष था तब मैंने राष्ट्रीय योजना समिति की बैठक का उद्घाटन किया था।यह भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कमेटी है।

उल्लेखनीय है बाद में इसी कमेटी के आधार पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने योजना आयोग का गठन किया और पंचवर्षीय योजना का शुभारंभ किया। लेकिन पीएम मोदी ने आते ही सबसे पहले योजना आयोग को ही खत्म कर दिया।यह प्रकारान्तर से सुभाषचन्द्र बोस के सपने की हत्या है।

इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि सुभाषचन्द्र बोस और हेडगेवार - गोलवलकर-मोहन भागवत के भारत में जमीन-आसमान का अंतर है।संघ के नेतागण भारत को हिन्दुत्व के नजरिए से और धर्म को आधार बनाकर संगठित करना चाहते हैं,उनके नायक पीएम के मन की बात भी यही है।लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का मकसद इससे भिन्न था,वे न्याय,समानता और बंधुत्व के आधार पर स्वतंत्र भारत का निर्माण करना चाहते थे।उनकी इस भावना को संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण का आधार बनाया।इसलिए सुभाष का वैचारिक अपहरण असंभव है।

असल में संघ एक घटिया हरकत कर रहा है ,वह सुभाष के गोपनीय दस्तावेजों के उद्घाटन के बहाने नेहरूविरोधी मुहिम चला रहा है, नेहरूविरोधी मुहिम के जरिए संघ एक तरफ कांग्रेस को नीचा दिखाना चाहता है ,दूसरी ओर धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम की वैचारिक मदद करना चाहता है,अफसोस की बात है कि संघ के ये दोनों मकसद सफल नहीं हो सकते। क्योंकि यह भारत है,संघियों का धार्मिकदेश नहीं है।

आरएसएस का मानना है स्वाधीनता संग्राम में मुसलमानों की देशद्रोही की भूमिका रही है,वे आजादी के पक्ष में नहीं थे।यही ब्रिटिश शासकों की भी समझ थी।सुभाष चन्द्र बोस ने इस नजरिए का खंडन करते हुए " फ्री इंडिया एंड हर प्राब्लम्स" लेख में लिखा है " मुसलमान भारत की आजादी के खिलाफ थे,यह प्रचार एकदम गलत है,बल्कि सच यह है कि वे राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ थे।आजकल तो एक मुसलमान कांग्रेस का सदर है।मुसलमानों का व्यापकतम तबका ब्रिटिश गुलामी से भारत को मुक्त कराने के पक्ष में था,वे ब्रिटिशविरोधी थे,सुभाष ने लिखा १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से हिन्दू और मुसलमान एक साथ ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लड़े हैं।मिलकर भारत की स्वाधीनता के लिए काम किया है।मुस्लिम समस्या कृत्रिम गढी गयी है।

इसी तरह स्वतंत्र भारत को लेकर आरएसएस और सुभाषचन्द्र बोस का नजरिया एकदम भिन्न है। सुभाषचन्द्र बोस का मानना था कि स्वतंत्र भारत में राजसत्त्ता की यह जिम्मेदारी है कि सभी नागरिकों को पूर्णत: धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता दी जाय,जबकि संघ इसके एकदम खिलाफ है।सुभाष यह भी मानते थे कि राज्य को पूरी तरह धर्ममुक्त होना चाहिए,संघ यह भी नहीं मानता।सुभाष का यह भी मानना था कि धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों में नागरिकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाय।संघ यह भी नहीं मानता,उसके नेताओं का मानना है कि मुसलमानों को दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखा जाए।

सुभाषचन्द्र बोस के बहाने संघ परिवार कुप्रचार तो कर सकता है, मीडियासंघी और फेसबुकसंघी कुतर्कों का जाल भी बुन सकते हैं,लेकिन सुभाष का सच नहीं बदल सकते।सुभाषचन्द्र बोस का सच यह है कि वह हिन्दुत्ववादी नहीं है,वह प्रतिक्रियावादी नहीं है,वह तो क्रांतिकारी है।वह कॉमरेड है और इसी सम्बोधन से अपने साथियों- सैनिकों को सम्बोधित करता है।संघ से लेकर पीएम मोदी तक किसी की जुबान में कॉमरेड पदबंध बोलने की शक्ति और विवेक नहीं है।संघी ध्यान रखें क्रांतिकारी हमेशा क्रांतिकारी रहता है।क्रांतिकारी पर अन्य कोई रंग नहीं चढ़ता।

आरएसएस मूलत: कारपोरेट घरानों द्वारा वित्तपोषित राजनीतिक संगठन है,इसके लिए राष्ट्रीय नायक (पटेल-सुभाष -आम्बेडकर-मालवीय आदि )पोस्टरबॉय से ज्यादा महत्व नहीं रखते,उसके लिए इनका मात्र विज्ञापन मूल्य है। इस संगठन का मूल मकसद है स्वाधीनता का अवमूल्यन करना,हिन्दुत्व के आधार पर समाज को संगठित करना,सामाजिक विभेद पैदा करना। आरएसएस का गुण है ये लोग पहले मीडिया के जरिए झूठ गढ़ते हैं,फिर कहते हैं यह सच्ची खबर है।फिर उसे सबको मानने के लिए मजबूर करते हैं।

संघ का नया नारा है (शायर इकबाल से क्षमा-याचना के साथ) ‘हो जाएं ख़ून लाखों लेकिन लहू न निकले।’

रविवार, 24 जनवरी 2016

मोहनमंडली का मोहनराग

          

    इन दिनों फेसबुक से लेकर मीडिया तक जिस तरह का हंगामा मोहनमंडली मचाए हुए है वह काबिलेगौर है।सारा नाटक सुभाषचन्द्र बोस के गोपनीय दस्तावेजों के सार्वजनिक किए जाने की आड़ में हो रहा है।इस समूचे प्रसंग को मोहनप्रसंग कहें तो अनुचित न होगा।मोहनमंडली जिस भाव और मंशा के साथ इतिहासनिर्माताओं को प्रदूषित करने के काम में लगी है उससे इतिहास में नए तथ्य और सूचनाएं कम जुड़ेंगे, इतिहास का विकृतिकरण ज्यादा होगा।क्योंकि इनकी पूरी मंशा इतिहास को विकृत करने और इतिहास के प्रति नफरत पैदा करने की है।भारत जैसे लोकतंत्र में साम्प्रदायिक ताकतें इतिहास के प्रति नफरत पैदा करके ही जिंदा रह सकती हैं।जबकि तालिबानी इलाके में इस तरह की ताकतें इतिहास का विध्वंस करती हैं।बाबरी मसजिद विध्वंस एक नमूना मात्र है,उनके पास भविष्य में विध्वंस करने वाली ऐतिहासिक इमारतों की लंबी सूची है।वे सिर्फ उचित माहौल की तलाश में हैं ,ज्योंही अनुकूल माहौल देखेंगे फिर से बाबरीयोजना कहीं पर भी लागू कर सकते हैं। इसका प्रधान कारण है उनका इतिहास के प्रति द्वेषभाव।इसलिए मोहनमंडली में इतिहासप्रेम खोजना चील के घोंसले में मांस का टुकड़ा खोजने के बराबर है।
इतिहास में नफरत पैदा करने के लिए जरूरी है कि पहले इतिहास निर्माता को मारो,हत्या करो।यह काम वे महात्मा गांधी की हत्या करके कर चुके हैं।उनके हत्यारे हाथों से जो बच गए हैं उनको ‘वे हमारे हैं वे हमारे हैं’ का राग अलाप करके मारने में लगे हैं।गांधीजी की हत्या के बाद उनको सबसे पहले दो लोग पसंद आए वे थे विवेकानन्द और भगतसिंह । इन दोनों ही विभूतियों के विचारों को लेकर मोडनमंडली ने जिस तरह का जहर युवाओं में भरा है उसकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता।
     बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मोहनमंडली के इतिहास विध्वंसक अभियान की राष्ट्रीय योजना में कई नए नाम नाम शिखर पर आए हैं इनमें महामना पंडित ,बल्लभभाई पटेल,मदनमोहन मालवीय,बाबासाहेब भीमराव आम्बेडकर और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस प्रमुख हैं। मोडनमंडली की पूरी योजना यह है कि युवापीढ़ी को इन विभूतियों के सकारात्मक वैचारिक मूल्यों से दूर रखा जाए। इनको डिजिटल इमेज मात्र बनाकर पेश किया जाय।वे इन विभूतियों को अपने साम्प्रदायिक राजनीतिक षडयंत्रों और दैनंदिन घृणित धर्मनिरपेक्षताविरोधी वैचारिक अभियान के पैकेज में पेश कर रहे हैं।
    आज जब हम मोहनमंडली के वैचारिक प्रदूषण पर विचार करें तो यह बात ध्यान रखें कि बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद इस मंडली का बुनियादी लक्ष्य रहा है धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को नष्ट करना।धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ युवाओं में नफरत के बीज बोना।इस काम में उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली है,उनकी सफलता के पीछे कई कारण रहे हैं, पहला बड़ा कारण है भारत के कारपोरेट घरानों का हिन्दुत्वप्रेम। दूसरा बड़ा कारण है धर्मनिरपेक्षदलों,खासकर कांग्रेस  का धर्मनिरपेक्षता को लेकर ढ़ुलमुल रवैय्या।कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को लेकर सख्त वैचारिक रवैय्या अपनाया होता तो आज धर्मनिरपेक्षता इस तरह कलंकित न होती।तीसरा बड़ा कारण मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां ,जिनके कारण धर्मनिरपेक्ष माहौल कमजोर हुआ और उपभोक्तावाद पुख्ता बना।इन तीन कारणों ने बुनियादी तौर पर आमलोगों को धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से दूर लेजाने में बड़ी भूमिका अदा की है।मोहनमंडली ने बड़े कौशल के साथ इन तीनों कारणों का लाभ उठाया है।
       मोहनमंडली के टुईंया से लोग आए दिन धर्मनिरपेक्षता पर हमले करते रहते हैं,तमाम मीडिया लगातार धर्मनिरपेक्षता विरोधी मुहिम में बाबरी मसजिद विध्वंस के लिए चलाए आंदोलन के समय से सक्रिय है और उसने जितनी बड़ी कु-सेवा सेवा समाज  की है उसकी लोकतंत्र में मिसाल मिलनी असंभव है। धर्मनिरपेक्षताविरोधी मुहिम के कारण समाज में जहां एक ओर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज हुआ है वहीं दूसरी ओर वाम ताकतें कमजोर हुई हैं।वाम ताकतों ने कभी सोचा ही नहीं कि सामान्य धर्मनिरपेक्ष माहौल जब नष्ट होगा तो उन पर इसका किस तरह का नकारात्मक असर होगा।
     बाबरी मसजिद विध्वंस के समय वाम विचारधारा ने वैचारिक तौर पर जिस ऊर्जा का प्रदर्शन किया था उसको यदि कांग्रेस ने सही ढ़ंग से समझा होता तो देश का नक्शा कुछ और होता।लेकिन वोटबैंक राजनीति के चलते कांग्रेस ने नरम हिन्दुत्व का मार्ग पकड़ा और अंततःवे समूचा मैदान मोहनमंडली को खैरात में सौंपकर मैदान से भाग खड़े हुए।यूपी से कांग्रेस का साफ होना सामान्य घटना नहीं है।बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद कांग्रेस के साफ होने का अर्थ है धर्मनिरपेक्ष माहौल का कमजोर होना। मोहनमंडली के धर्मनिरपेक्षताविरोधी प्रचार अभियान को जब तक एकजुट होकर धर्मनिरपेक्ष ताकतें वोट से लेकर विचारधारा के विभिन्न क्षेत्रों तक चुनौती नहीं देतीं तब तक धर्मनिरपेक्षताविरोधी माहौल को तोड़ना बहुत मुश्किल है।
     इस प्रसंग में यह भी ध्यान रहे बसपा और सपा सिर्फ वोटबैंक के मामले में भाजपा को यूपी में पीट सकते हैं,वैचारिक प्रचार के मामले में ये दोनों दल बेहद कमजोर हैं,बाबरी विध्वंस के बाद राज्य में भाजपा हारती रही है लेकिन लोकसभा में लगातार अपनी ताकत में इजाफा करती रही है। भाजपा के वोटबैंक में यूपी में स्थानीय स्तर पर इजाफा भले ही नहीं हुआ, लेकिन संसद के वोट में इजाफा हुआ है,इससे भी बड़ी बात यह है आम लोगों के मन में धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ जहर भरने में मोहनमंडली सफल रही है।यही वह परिप्रेक्ष्य है जिसमें हमें सुभाषचन्द्र बोस –आम्बेडकर आदि के प्रति मोहनराग के मर्म को उद्घाटित करने का काम करना चाहिए।

     उल्लेखनीय है मोहनमंडली में राष्ट्रीयनेताओं के प्रति वास्तव अर्थ में कोई श्रद्धा नहीं है। वह सिर्फ श्रद्धा का नाटक कर रहे हैं।मसलन्, सुभाषचन्द्र बोस को ही लें। आरएसएस ने कभी सुभाषचन्द्र बोस के जीते जी उनके विचारों और आदर्शों का समर्थन और स्वागत नहीं किया।यही दशा बाबासाहेब आम्बेडकर की थी। सवाल यह है जब ये दोनों नेता जिंदा थे तब आरएसएस के नेताओं को इनके गुण नजर क्यों नहीं आए ? अचानक बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद ही नजर क्यों आए ?भगतसिंह जब जिंदा थे तब उनके पक्ष में आरएसएस ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया ? क्यों आरएसएस लगातार स्वाधीनता संग्राम से भागता रहा,उसके साथ जुड़े तमाम नेता ब्रिटिश एजेंट का काम करते रहे ? आरएसएस ने ब्रिटिशदौर की भूमिका की आत्मालोचना तक नहीं की है।ऐसी स्थिति में उनके राजनीतिक लक्ष्य को समझने में भूल नहीं करनी चाहिए।

शनिवार, 23 जनवरी 2016

मुखौटे का सौंदर्य


अमा यार अपने ही हाथों कोई माला पहनता है ! माला वह शोभा देती है जब कोई और पहनाए ! जूते तब शोभा देते हैं जब अपने आप पहनो।तुम्हारा हाल बड़ा खराब है हर काम उलटा करते हो।जब सद्भाव रखना चाहिए,तब दंगा करते हो, जब बोलना चाहिए,तब चुप रहते हो,जब चुप रहना चाहिए,तब बढ़-चढ़कर बोलते हो।जब लेखक कह रहे थे निंदा करो,तब तुम्हारे भांड संस्था संचालक चुप थे,जब लेखक इनाम लौटा रहे थे,तब हेकड़ी में तुम गरिया रहे थे,अब कह रहे हो इनाम वापस लेने का नियम नहीं है,नियम बनाओ,डरते क्यों हो ?लेखक खा नहीं जाएंगे ! बुद्धिजीवियों का अपमान करना तुम्हारे खून में है,तुम यदि बुद्धिजीवियों का सम्मान करते तो लेखकों को बोलना न होता तुम खुद रीयल टाइम में बोलते।
रहते हो नेट पर बोलते हो पोस्टकार्टयुग की स्पीड से,यह तो पिछड़ेपन की निशानी है,इससे भारत का माथा ऊँचा नहीं होता।कल रोहित पर जब बोल रहे थे तो सच-सच बताओ इतनी देर क्यों लगी बोलने में,तुमको यह महसूस करने में इतनी देर क्यों लगी कि रोहित किसका बेटा है ? रोहित की माँ का दुख क्या है ? क्या किसी के आदेश की जरूरत थी ?
सच-सच बताओ तुम इतने बेखबर कब से रहने लगे,क्या तुमको नहीं मालूम कि देश निरंतर गैर जरूरी मसलों पर उलझता जा रहा है,समस्त कामकाज ठप्प है,समूचा मीडिया तुम्हारी मरी हुई धुन पर नाच रहा है।तुम्हारे मुखोटे लगातार बर्बर आचरण कर रहे हैं, नायक का मुखौटे इस कदर अपमान करें यह तो हमने कहीं नहीं देखा, मुखौटे तुमको रीयल रूप में और रीयल टाइम में जानते हैं,इसलिए वे तुम्हारे आंसुओं या गम पर दुखी नहीं होते,वे तो तुम्हारी रीयल अनुभूति में रहते हैं।तुम्हारा सच तो मुखौटे में व्यक्त होता है।तुम्हारी आत्मा तो मुखौटे में रहती है।तुम क्या सोच रहे हो यह तो तुम नहीं मुखौटे बताते हैं।क्योंकि तुम तो तुम नहीं हो मुखौटा हो। 
सच कहूँ,तुमसे ज्यादा ईमानदार तुम्हारे मुखौटे हैं।कम से कम वे निरंतर घृणा के भाव में रहते हैं,घृणा को खुशबू समझते हैं,गंदगी को उसूल समझते हैं।संविधान को कागज का टुकड़ा समझते हैं,दूसरों की भावनाओं-इच्छाओं और अनुभूतियों को पैरों तले कुचलने में विश्वास करते हैं।वे ही असली वंशधर हैं तुम्हारे।तुमको गलतफहमी है कि तुम रोहित के प्रति दुख व्यक्त करके जनता का दिल जीत लोगे,अरे यार, तुम पहले मुखौटों का दिल जीतकर दिखाओ,मुखौटे तो सरेआम तुम्हारे बयान पर पेशाब कर रहे हैं। यह सिर्फ हिन्दुत्व परंपरा में ही संभव है जहां मुखौटे असली से ज्यादा सुंदर होते हैं।


गुरुवार, 21 जनवरी 2016

रोहित की आत्महत्या से उठे सवाल

         हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित की आत्महत्या असामान्य – बर्बर घटना है।विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामान्य स्थानीय छात्र विवाद को असामान्य बनाकर बुद्धिहीनता और छात्रविरोधी नजरिए का परिचय दिया है। कल जिस तरह केन्द्रीय मानव संसाधनमंत्री ने इस घटना पर विस्तार से प्रेस कॉफ्रेंस की,उससे साफ जाहिर है कि इस घटना में आरएसएस नीचे से ऊपर तक शामिल है।मेरी जानकारी में किसी विश्वविद्यालय की घटना पर कभी किसी केन्द्रीयमंत्री ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में इस तरह कभी कोई प्रेस कॉफ्रेंस नहीं की।ईरानी का सबसे घटिया रूप इस कॉफ्रेस में सामने आया।वह निर्लज्जता से विश्वविद्यालय प्रशासन के बर्बर आचरण की हिमायत कर रही थीं।

केन्द्रीय मंत्री का काम हिमायत करना नहीं है। वह पक्षधर नहीं हो सकता,वह सबका होता है,उसका काम है समाधान खोजना ,सबकी मदद करना,न कि पक्षविशेष की हिमायत करना। लेकिन मोदी सरकार जब से आई है उसके मंत्री खुलेआम निचले स्तर पर संघियों की हरकतों की अंधी हिमायत करके मंत्री के तटस्थ आचरण के नियम का उल्लंघन कर रहे हैं। बेहतर तो यही होता कि स्मृति ईरानी की यह प्रेस कॉफ्रेस आज न होकर उसी दिन होती जिस दिन यह घटना हुई थी और वे संबंधित पक्षों को बुलाकर समझा-बुझाकर मामले का हल तलाश करतीं,केन्द्रीय मंत्री को बोलने में इतना लंबा समय क्यों लगा ?

केन्द्रीय मंत्री का काम निचले स्तर पर प्रशासन की खामियों पर पर्दा डालना या उसकी हिमायत करना नहीं है।मंत्री यदि पक्षधर होकर काम करेगा तब आम जनता न्याय मांगने कहां जाएगी ? ईरानी की प्रेस कॉफ्रेस से यह भी संदेश गया है कि संघ अब विश्वविद्यालय कैम्पसों में खुलेआम अलोकतांत्रिक और शिक्षाविरोधी और अ-सामाजिक कार्यकलापों को संरक्षण देगा,संघ का खुला संदेश है उसके सदस्यगण जो मन में आए करें ,उनको किसी भी किस्म के सभ्य आचरण की जरूरत नहीं है।लगता है मंत्रियों को संघ का आदेश है कि हर हालत में निचले स्तर पर काम कर रहे संघियों के पक्ष में खड़े रहो। इस तरह की संघी प्रशासनिक पक्षधरता शिक्षा संस्थानों को अपराध संस्थान बनाकर छोड़ेगी।उल्लेखनीय है पहले से ही हमारे शिक्षा संस्थानों में अनेक समस्याएं हैं ,ऐसे में संघी पक्षधरता के आधार पर प्रशासन का काम करने का तरीका अपने आपमें मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

रोहित को आत्महत्या न करनी पड़ती यदि संघियों ने हठधर्मिता से काम न लिया होता। इस समूचे प्रसंग में संघी हठधर्मिता के अलावा जो अन्य संदेश निकल रहा है वह यह कि छात्रों में बीच-बचाव करके मित्रतापूर्ण समाधान निकालने में स्थानीय स्तर पर छात्र-शिक्षक-कर्मचारी संगठन भी असफल रहे हैं। छात्रों के बीच में सामान्य मारपीट की घटना इस कदर विकराल रूप कैसे ले सकती है और उसमें आरएसएस के बड़े दिग्गज नेता इस कदर शामिल कैसे हो सकते हैं ?

सवाल यह है क्या छात्रों के निजी झगड़े या राजनीतिक विवाद इसी तरह हल किए जाएंगे या उनके समाधान के सभ्य तरीकों का हम पालन करना सीखेंगे?छात्र राजनीति में वैचारिक मतभेद होंगे,वैचारिक गरमी भी होगी,लेकिन बलप्रयोग,सत्ता का दुरूपयोग आदि की उसमें कोई जगह नहीं है। हम नहीं जानते कि रोहित प्रसंग में किसने किसको मारा-पीटा,अब वह मार-पीट उतनी प्रासंगिक भी नहीं रह गयी है ,रोहित की आत्महत्या के बाद समूचा प्रसंग और उसका संदर्भ एकदम बदल गया है। रोहित और पांच लड़कों के खिलाफ कायदे से विश्वविद्यालय प्रशासन को पक्षधर होकर बीच में पड़ने की जरूरत नहीं थी। विश्वविद्यालय प्रशासन पक्षधरता के आधार चलेगा तो कैम्पस में समस्याओं का अम्बार लग जाएगा। इससे विश्वविद्यालयों का समूचा वातावरण और अकादमिक सभ्यता का समूचा ढ़ांचा टूटेगा।

हैदराबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामान्य मारपीट की घटना पर जिस तरह का एक्शन लिया,जांच बिठायी और जिस तरह संघी राजनेता उसमें कूद गए उससे साफ है कि संघ के लोगों ने अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए सामान्य मारपीट की घटना का बहाने के रूप में इस्तेमाल किया है।इस चक्कर में जहां उन्होंने स्थानीय प्रशासन का दुरूपयोग किया वहीं दूसरी ओर शिक्षा प्रबंधन के सभ्य आचरण का उल्लंघन किया ।

उल्लेखनीय है जिन विश्वविद्यालयों में वाम राजनीति या वैकल्पिक राजनीति करने वाले छात्र संगठन सक्रिय हैं वहीं पर संघी छात्र संगठन सुनियोजित ढ़ंग से निजी पंगे ले रहे हैं और उनका राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।इसके बहाने वे कैम्पस से लोकतांत्रिक राजनीति को बाहर खदेड़ना चाहते हैं। वाम-लोकतांत्रिक राजनीति करने वालों को संघ के मंत्री से लेकर अदना से मीडियागुलाम तक राष्ट्रद्रोही की पदवी देकर अपमानित कर रहे हैं। जेएनयू से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक एक ही आख्यान चल रहा है कि विश्वविद्यालयों से वाम-लोकतांत्रिक राजनीति को बाहर करो,इसके लिए अपराधियों से लेकर वि.वि. प्रशासन तक,मोदी सरकार के मंत्रियों से लेकर राज्यपाल तक सभी का दुरूपयोग खुला दुरूपयोग किया जा रहा है। संघ की इस तरह की आक्रामकता पहले कभी देखी नहीं गयी।



संघ की विश्वविद्यालय कैम्पसों में बढ़ रही आक्रामकता का लक्ष्य है छात्र राजनीति का अपराधीकरण करना। उच्चशिक्षा के संस्थानों खासकर केन्द्र सरकार के अधीन चल रहे शिक्षा संस्थानों के समूचे तंत्र को तोड़ना। यह काम वे दो तरीके से कर रहे हैं।पहला,वे उन तमाम लोगों को विश्वविद्यालय के जिम्मेदार पदों पर बिठा रहे हैं जो लोग उन पदों के लायक नहीं हैं,जिनकी कोई अकादमिक साख नहीं है।वे विश्वविद्यालय की फैसलेकुन कमेटियों में उन लोगों को जिम्मेदारी दे रहे हैं जो अव्वलदर्जे के डफर हैं।धूर्त हैं।इससे प्रशासन को पूरी तरह प्रदूषित करने,वि.वि. की नीतियों को मनमाफिक ढ़ंग से तोड़ने-मरोड़ने का संघ को मौका मिल रहा है।दूसरी ओर संघ समर्थित छात्र-शिक्षक-कर्मचारी संगठनों के भ्रष्ट राजनीतिक कर्मकांड जगह-जगह विश्वविद्यालय की गरिमा को नष्ट कर रहे हैं, लोकतांत्रिक छात्र संगठनों और उनके साथ जुड़े छात्रों पर घटिया किस्म के राजनीतिक हमले हो रहे हैं और शारीरिक हमले भी हो रहे हैं।इस काम में मीडिया का संघ को खुला समर्थन मिल रहा है।

रविवार, 17 जनवरी 2016

मालदा,साम्प्रदायिकमीडिया और सच्चाई-

मेरा साफ मानना है फेसबुक आदि सोशलमीडिया में धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र पसंद ताकतों को खुलकर मुसलमानों के पक्ष में नियमित लिखना चाहिए।साथ ही मुसलमानों में यदि कोई साम्प्रदायिक हरकत नजर आए तो उसकी तीखी आलोचना भी करनी चाहिए। मालदा आदि की घटनाओं के बहाने मुसलमानों के हकों पर नए सिरे से भगवा ब्रिगेड सक्रिय हो उठा है।ये लोग सरेआम टीवी चैनलों पर सफेद झूठ बोल रहे हैं,गलत तथ्य दे रहे हैं। ऐसे में सोशलमीडिया पर हम अपने सीमित साधनों में मुसलमानों और उनके हकों के बारे में फैलाए जा रहे दुष्प्रचार को बेनकाब करें।मुसलमानों के बारे में छोटी से छोटी चीज पर भी रोज लिखें,मुसलमानों की सोशलमीडिया में उपस्थिति हम सबकी पोस्ट में लिखकर नजर आए,मुसलमान को आस्था से नहीं बचा सकते। फासिस्ट लोग जिस तरह का असत्य प्रचार कर रहे हैं वह बेहद खतरनाक है उसकी गंभीरता को आप समझें,एकजुट हों और मुसलमानों के पक्ष में रोज लिखें।

इलैक्ट्रोनिक मीडिया के नव्य-उदारीकरण के साथ जो वायदे टीवीपुरूषों ने किए थे वे सभी वायदे वे एक-एक करके तोड़ रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि टीवी न्यूज चैनलों में से अधिकांश संगठित ढ़ंग से साम्प्रदायिक ताकतों के मोहरे और प्रचारक की भूमिका में उतर आए हैं।इन चैनलों को साम्प्रदायिक कारसेवक कहना उचित होगा।इन चैनलों ने पहले संगठित ढ़ंग से खबर की हत्या की और अब ये चैनल नियोजित ढ़ंग से साम्प्रदायिक सद्भाव की हत्या करने पर उतर आए हैं।संभवतः इतने घृणिततम रूप में टीवी चैनलों की कभी कल्पना तक नहीं की थी। हम सावधान करना चाहते हैं कि टीवी चैनलों ने साम्प्रदायिक ताकतों को टॉकशो से बाहर नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब प्रत्येक न्यूज टीवी चैनल लोकतंत्र की हत्या में शरीक माना जाएगा।

मोदी सरकार के आने के बाद संघियों की वाचिक हिंसा अब नई ऊँचाईयों पर पहुँच गयी है,यह सिलसिला मनमोहन सरकार के जमाने से चल रहा है लेकिन इन दिनों तो यह चरम पर है,अब वाचिक हिंसाचार में टीवी चैनल सीधे भगवा ब्रिगेड के साथ हिंसा की भाषा को नियमित प्रसारित कर रहे हैं और यह माहौल बेहद खतरनाक दिशा की ओर जा रहा है।
न्यूज टीवी चैनलो का फासिस्टों की हिंसकभाषा को नियमित संयोजित और प्रसारित करना स्वयं में खतरा है ।यह सभ्यता के सभी मानकों का खुला उल्लंघन है। जो खबर नहीं है उसे खबर बना रहे हैं ,जो विमर्श का मुद्दा नहीं है उसे आम जनता के बेडरूम में जाकर जबर्दस्ती सुना रहे हैं।
टीवी न्यूज चैनलों का हिन्दुत्ववादी ताकतों के साथ इस तरह खुलकर उनके प्रत्येक सवाल पर सक्रिय होकर टॉक शो करना स्वयं में बड़ी मुसीबत है।कुछ साल पहले तक साम्प्रदायिकता कुछ सीमाओं में निचले स्तर पर सक्रिय थी लेकिन अब संघ के हर एजेण्डे के साथ संगठित ढ़ंग से टीवी टॉक शो प्रसारणों के जरिए समूचे देश पर थोपा जा रहा है यह टीवी न्यूज चैनलों का सबसे घृणित चरित्र है।यह वस्तुतः समाजविरोधी हरकत है।

भगवा सत्ताधारियों का नया नारा है मुसलमान का मुँह बंद करो,यदि भूल से कोई बोले,प्रतिवाद करे,उस पर सीधे हमले करो।अफसोस की बात है मुख्यधारा के कुछ टीवी चैनल इन भगवा फतवेबाजों के चक्कर में फंस गए हैं।सुखद बात यह है कि आम जनता का बड़ा हिस्सा इन सबके प्रति सजग है।दूसरी ओर अल्पसंख्यकों में काम कर रहे कठमुल्ला संगठनों का नारा है जैसे भगवा बोले उसी भाषा में बोलो।ये दोनों भगवा और कठमुल्ले मिलकर देस के शांति के वातावरण को बिगाड़ना चाहते हैं।इस प्रसंग में मालदा कांड को ही लें।

मालदा कांड पर मैंने गूगल पर जितनी वेबसाइट देखीं उनमें लिखने वाले अधिकांश साम्प्रदायिक नजरिए से लिख रहेहैं,सबमें एक ही जैसी बातें दोहराई गयी हैं,इससे यह बात साफ है कि इस तरह की वेबसाइट किसी एक ही किस्म के प्रचारतंत्र से जुड़ी हैं।इंटरनेट पर खबरें पढ़ते समय इस तरह की वेबसाइट पर प्रकाशित सामग्री को पढ़ने से बचें।यह भी ध्यान रहे इंटरनेट पर सब कुछ विवेकपूर्ण और तथ्यपूर्ण नहीं लिखा जा रहा।

सवाल उठा है कि देश की सभी एजेंसियां मोदी-ममता के कब्जे में हैं,लेकिन किसी को भनक नहीं लगी कि मालदा में क्या होने जा रहा है,कमाल की जुगलबंदी है मोदी-ममता की।किसी ने एलर्ट नहीं भेजा।मीडिया में मालदा इसलिए नहीं चमक रहा क्योंकि इससे मोदी सरकार का निकम्मापन उजागर होता है।गुलाम मीडिया इस समय मोदीजी की इज्जत बचाने में लगा है।

मालदा के दंगे को लेकर फेसबुक पर संघ के लोग अत्यधिक उत्साहित होकर सक्रिय हो उठे हैं और धर्मनिरपेक्ष ताकतों के खिलाफ हमले कर रहे हैं।मालदा की घटना की सारी जिम्मेदारी राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की है।
सवाल यह है कि मोदीजी की ताकतवर केन्द्र सरकार सीमावर्ती इलाकों से अवैध लोगों का आना क्यों नहीं रोक पाई है जबकि उसे दो साल होने को आए,यहां तक कि सीमापार से नोटों की स्मगलिंग बड़े पैमाने पर हो रही है और सीमा पर कोई बंदिश नजर नहीं आ रही।वहीं दूसरी ओर ममता सरकार इस तरह के तत्वों के प्रति नरम रूख अपनाए हुए है। इस पूरे प्रसंग में धर्मनिरपेक्ष ताकतें और वामदल खासतौर पर कहीं पर भी शामिल नहीं हैं और न उनकी जिम्मेदारी है,इसके बावजूद जहरीले प्रचार अभियान के लिए चर्चित लोग फेसबुक पर मालदा के बहाने जहर उगल रहे हैं और अपनी राष्ट्रद्रोही मानसिकता को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं।मोदी सरकार सीमा पर सख्ती करे चीजें अपने-आप दुरूस्त हो जाएंगी।लेकिन मोदीजी को अपने देश की समस्याओं को देखने,सीमाओं पर नजर डालने का समय ही नहीं मिला।उनकी प्राथमिकता में देश नहीं आता वरना वे वायदे के मुताबिक सीमाओं पर चौकसी बढ़ाते,सख्ती बढ़ाते। मालदा दंगे के जितने भी तथ्य सामने आ रहे हैं वे केन्द्र और राज्य सरकार के निकम्मेपन पर रोशनी डालते हैं।

मालदा के दंगाईयों में से गिरफ्तार 9लोगों में से 6को जमानत मिल गयी है और यह राज्य सरकार के नरम रूख का परिणाम है।उल्लेखनीय है सीमापार से होने वाली विभिन्न किस्म की घटनाओं के साथ टीएमसी किसी न किसी रूप में जुड़ी है।यह कई आपराधिक घटनाओं के प्रसंग में नोटिस किया गया है,लेकिन सीबीआई ने टीएमसी के संरक्षण देने वाले नेताओं को अपनी जांच में साफ छोड़ दिया है,हमने कुछ समय पहले इस मसले पर कई पोस्ट फेसबुक पर भी लिखी थीं।

मालदा के मामले पर मेल टुडे की रिपोर्ट यह बताती है कि वहां पर हुई हिंसा का संबंध जाली नोट रैकेट से हो सकता है।यह रैकेट सीमापार से संचालित है।सीमाओं की देखभाल केन्द्र का विषय है,केन्द्र ने विगत कुछ महिनों में सीमा पर सख्ती दिखाई भी है।इससे निहितस्वार्थी तत्व परेशान हैं और उनकी राष्ट्रविरोधी साजिश का यह दंगा परिणाम है। धर्म को इसमें आवरण के रुप में इस्तेमाल किया गया है। जाली नोट रैकेट के जरिए सीमापार से राष्ट्रविरोधी ताकतें हमारे देश की अर्थव्यवस्था को सीधे निशाना बनाना चाहती हैं।

मालदा में अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता ने जिस उग्र रुप में अपने को प्रदर्शित किया है,उसकी राजनीति को समझना बेहद जरूरी है।जो लोग धर्मनिरपेक्ष ताकतों को फेसबुक पर कोस रहे हैं,वे भोले हैं या मूर्ख हैं !
मालदा में ही नहीं समूचे पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता का तृणमूल कांग्रेस ने अपनी वोटबैंक राजनीति के लिए2007से जमकर दोहन किया है।खासकर नंदीग्राम मसले से लेकर आज तक राज्य में साम्प्रदायिक ताकतों की खुलकर टीएमसी ने मदद ली है।टीएमसी को इस मामले में भाजपा से मदद लेने में भी कोई परहेज नहीं रहा है।यह विलक्षण संयोग है कि टीएमसी बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनो ही किस्म की साम्प्रदायिक ताकतों की मदद लेती रही है।
पश्चिम बंगाल में मुसलमानों में खासकर यह फिनोमिना है कि वहां पर साम्प्रदायिक ताकतें बहुत सक्रिय हैं।दिलचस्प बात यह है कि जहां पर अल्पसंख्यक साम्प्रदायिक ताकतें सक्रिय हैं वहां पर भाजपा हिन्दुओं के वोट बड़ी मात्रा में पाने सफल रही है। मालदा प्रसंग में भी ये दोनों धड़े खूब सक्रिय हैं।जो लोग खुलकर वाममोर्चे को हराने के लिए आँख बंद करके ममता का समर्थन कर रहे थे वे यह भूल ही गए कि टीएमसी के पीछे अल्पसंख्यक साम्प्रदायिक ताकतों का भी समर्थन काम कर रहा था। आज भी वाम के खिलाफ टीएमसी,पृथकतावादी और साम्प्रदायिक ताकतें एकजुट हैं।स्वयं भाजपा इन ताकतों की मदद से दार्जिलिंग में संसद का चुनाव जीत चुकी है।इसलिए मालदा में अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता पर बात करते समय यह बात ध्यान रहे कि इन ताकतों को किनका समर्थन प्राप्त है। कम से कम वाममोर्चे ने साम्प्रदायिक ताकतों का कभी समर्थन नहीं किया,बल्कि हाल ही में सम्पन्न माकपा के प्लेनम में भी पश्चिम बंगाल में टीएमसी के साम्प्रदायिक ताकतों के साथ बन रहे रिश्तों पर रोशनी डाली गयी है और उसके खिलाफ आम जनता को गोलबंद करने का आह्वान किया गया।

मालदा कांड पर ‘इण्डियन एक्सप्रेस’(17जनवरी2016) ने बहुत महत्वपूर्ण रिपोर्ट छापी है यह रिपोर्ट हमने पहले जो कुछ फेसबुक पर लिखा था उसकी पुष्टि करती है।पूरी रिपोर्ट पढ़ें-

How did a protest against a Hindu leader’s inflammatory remark turn violent in Malda? Esha Roy visits the border district of West Bengal and finds the fault lines run deep — through poppy fields, a fake currency network and an underground arms market that thrives in Malda’s mango orchards

It took an entire month for Akhil Bharat Hindu Mahasabha leader Kamlesh Tiwari’s remarks against Islam to reach Bengal’s border district. It wasn’t from the news channels or from Tiwari’s arrest in Lucknow on December 2, 2015, that Muslim organisations that work in and around Malda town came to know of what happened. “It was through the internet,’’ says a member of a local youth club at Ghariyalichak, the Muslim colony that is now considered the epicentre of the January 3 violence that broke out in town.

On January 2, on the eve of the protest rally, small tempos fitted with mikes inched through Muslim colonies in and around Kaliachak, about 23 km from Malda town, calling people to attend the rally. A week earlier, the Edara-e-Shariya, the main organising body, had distributed pamphlets on the proposed rally in nearby villages — Sultanganj, Churiwala, Dariyapur, Kasimnagar, Sujapur and countless others.

“So we knew we had to assemble at the taxi stand at Kaliachak,’’ says the Ghariyalichak youth who participated in the rally. The state administration has said that there were at least 1.5 lakh protesters who had gathered that day.

The taxi stand, located on National Highway 34 that connects the town with the rest of Malda, is now packed with Kaliachak’s white Ambassador taxis. On the morning of January 3, a Sunday morning, the stand was cleared and empty. A stage was set up, a mike installed. From eight in the morning, hordes of protesters started streaming in to Kaliachak, some from far-flung villages, many carrying effigies and boards tied to rickety sticks, demanding Tiwari be hanged for his comments.

“I went around nine, a good hour after everything had started. People were still coming in. There were thousands and thousands of them. I was shocked. I don’t think the organisers expected so many people to turn up. That’s why, in the middle of their speeches, they kept making announcements to keep calm, kept reminding people that this was meant to be a peaceful rally and that there should be no violence or untoward incident,’’ says the youth.

Within the next hour, chaos descended on Kaliachak. The mob quickly became agitated and violent. Despite warnings from the organisers that the rally would be called off, effigies began to be burned. Sensing that things were about to go awry, a group of local boys surrounded the three Hindu temples inside Gharialichak, encircling them so that they could be protected.

And then, a BSF vehicle, a Bolero, sped into the crowd from nowhere. “The protesters got really angry then. People felt that the BSF had endangered their lives driving at such speed into the crowd. They surrounded the vehicle and started hitting it, breaking the windows,’’ says an eyewitness. The BSF refused to comment on the matter.

The vehicle moved forward and a BSF jawan fired into the air to disperse the crowd, he says. Hearing the firing, all hell broke lose. Thousands surrounded the car and forced the jawans off the vehicle, they were beaten up. “It was only after they apologised that they were allowed to go,’’ says the eyewitness.

Seeing that matters had gone completely out of hand, the organisers announced that the rally had been called off. They asked people to disperse and head home. But tempers had been fanned to a pitch by then and the mob headed toward the Kaliachak police station, a stone’s throw away from the protest site.

The Kaliachak police station faces a row of shops that form the heart of the town’s main bazaar. Being Sunday, the market was shut. The mob, armed with rods and guns and cans of kerosene and petrol, proceeded to burn down the police station compound. The police barracks were set on fire, as was the main building, the rooms for the Home Guards and most importantly, the maalkhana which housed records of the criminal activity and the criminals of the area. Many in Kaliachak and Malda say that it was these records that were the target of the mob. Subabrata Ghosh, the inspector in charge, was beaten up. Poppy seeds seized in various raids by the police and kept at the station were stolen, as were arms and ammunition.

“I’m sorry but I can’t talk about that incident,’’ says Ghosh, turning his face away. Eleven constables from the thana have since been transferred and another seven sub-inspectors have been placed in the reserve force. The police station now stands freshly painted in white and blue to cover the scars of that Sunday.

Work of repairing the station began the next day and was completed within 48 hours, say locals. Skeletons of burnt bikes have been hidden away in one corner of the compound, the bigger vehicles that had been burnt have been shifted to a border police station to keep them out of sight, tucking away memories of the humiliation of that day.

But 78-year-old Chittaranjan Saha has not forgotten. The double-glazed black glass windows which he had installed in his four-floor building, which serves both as a commercial establishment as well as his residence, remain broken.

He sold all his land to live in front of the Kaliachak police station, thinking the location would keep him safe. But it did not. The ground floor houses furniture shops run by two of his sons and clothing and utensil stores that he has rented out to others. He has rented out the first floor to a bank and other offices. He lives on the second with his family. The third he has rented out to three families, including a Muslim family.

“When the mob came, I pleaded with them with my hands folded to not damage my building. They kept asking if I was a Hindu. I told them yes, I am, but there are Muslims living and working here as well. But they did not listen. There were thousands of them. I was standing downstairs, watching people rush into the colony when this happened. Something like this has never happened in Kaliachak before. This has never been a communal town,’’ he says.

By 1 pm, it was all over. Residents had locked themselves inside their homes. From rooftops and windows, they say, spirals of thick black smoke rose to the sky. Near the Paanchtala masjid in Kaliachak, a three-storey building is home to the offices of the Edara-e-Shariyah, the organisation that held the rally. The office now has its shutters down. There is much speculation in Malda regarding the organisation and its members. “We hadn’t even heard of this organisation before this incident,” said the member of a political party who didn’t want his name or that of his party to be revealed.

Some say that CPM leader and retired school teacher, Abdur Rauf, is one of its leaders and the main organiser of the rally. Rauf’s is the first name in an FIR registered by the Malda police. He is now on the run. His wife Shefali Khatoon, herself a CPM leader, flatly denies that Rauf had anything to do with the Edara-e-Shariyah. “This is a conspiracy. He was not a member. He had gone to the rally out of curiosity,” she told The Sunday Express.

The town

The silt from the widening of NH-34 hangs in clouds, clinging onto buildings and cars in Kaliachak. Hills of large white sacks stand bound on either side of the national highway, filled with plastic and garbage waiting to be melted down and recycled in factories. Lines of trucks with West Bengal, UP, Andhra Pradesh and Jharkhand number-plates crawl past Kaliachak on their way to the Bangladesh border to deliver goods — onions, wood, chipped stones.



Kaliachak is notorious as the “criminal den’’ of this border district. “This is the centre of the ‘Fake Indian Currency Network’. Fake notes are printed in Bangladesh and then cross the border to Kaliachak from where it is distributed across Bengal and then across the country,’’ says Ambar Mitra, secretary of the CPM’s Malda district committee.

On December 12, police arrested 25-year-old Salim Sheikh. Sheikh, who dropped out of school, works as a labourer in a nearby brick kiln. Sheikh had agreed to carry Rs 1 lakh in fake Indian currency notes to Kaliachak and then to Farakka station, a major transit point in West Bengal for such notes. He was given Rs 5,000 to do the job.

A police officer in Malda who didn’t want to be named says that in recent months, the BSF has been recovering fake notes worth Rs 3-4 crore a day. Around 30 km from Kaliachak lies Golapganj. Golapganj falls under the jurisdiction of the Kaliachak police station. Even by Kaliachak’s abysmal standards, Golapganj has a notorious record. The road from Kaliachak to Golapganj is flanked by fields of sunshine-yellow mustard, gold-tipped corn and quiet villages. Today, 10 days after the January 3 attack, a cavalcade of officials — excise, police, BSF — accompanied by earth diggers, are on their way to raid poppy fields in Domaichak Mouja under the Shahbajpur gram panchayat.

“Last year, we destroyed 4,000 acres of poppy fields. We later came to know of another 8,000 acres but couldn’t conduct the raids on time,” says an inspector with the Malda police.

Heroin, made from the resin of poppy plants, sells here for Rs 70 lakh a kg. “Earlier, poppy cultivators would extract the resin and sell it to manufacturers or to middlemen. We have heard that the buyers are refusing to take the raw material now. They want the finished product. So heroin labs have started coming up — in Kaliachak, Malda, Nadia, Bahrampur. We have heard that the filters for making heroin are also being produced in Malda now,’’ says the inspector.

The villages here are abjectly poor. Poor farmers, who can’t afford to grow cash crops, rent or sell their lands to bigger poppy cultivators. “The poppy cultivators give the farmer anywhere between Rs 15,000 and 30,000. Sometimes the same farmers are employed to till the land. Most of the time, the land is not even properly demarcated and there are no records with the Bengal Land Revenue Office. Arrests then become extremely difficult,’’ says the inspector.



Officials both in the Malda administration and the police as well as the political parties, including even the BJP, point out that the January 3 incident was tied to Malda’s dark record. “It was an attempt to burn the records. Especially since the BSF had been coming down hard on smugglers over the past year and numerous arrests have been made. We know for a fact that there was nothing communal about Sunday’s rally. The violence was just a pretence to carry out their actual intention of destabilising efforts to clamp down on these illegal trades,’’ says Mitra.

Fear and anger

For the past ten days, the colony of Baliadanga has been cordoned off. Rusty tin sheets block two of the main entrances to the colony. According to the 2011 Census, Kaliachak Block I has 89.3 per cent Muslim population. In neighbouring Sujapur, the Muslims make up 98 per cent of the population. Baliadanga is one of its few Hindu-dominated colonies and was often used by many as a thoroughfare. It is located right behind the Kaliachak police station.

Subodh Singh Ray, 75, owns a paan shop at the entrance of Baliadanga. At 11 am, he had gone home for lunch. “Then I got a phone call from someone in the colony saying my shop had been burnt. I had goods worth over a lakh. I used to keep my bank books and other documents in the shop. It’s all gone. My wife and I are old. I don’t know why the Muslims did this. We never had any trouble before,’’ says Ray, who has now set up a kiosk selling cigarettes and gutka right next to his old shop.

A number of homes in Baliadanga have broken windows, shop entrances and boards have been broken and pulled down. “They came armed. They had guns and lathis. When we saw them enter the colony, all of us locked our gates and hid inside and waited for them to pass. Have you seen what they have done to the police station? And the police didn’t do a thing. This is because (Chief Minister) Mamata Banerjee has been protecting the Muslims. I was myself a member of the CPI(M) before but I will vote for the BJP this time — as a matter of fact, I will campaign for them. The Muslims here identify us (Hindus) with Modi whether we support him or not. If that is the case, then we might as well vote for him,’’ says a resident. He points out that a number of RSS supporters live in the colony — and the numbers are growing.

The atmosphere of fear and suspicion does not belong to Baliadanga alone. In Asirhaji, the police broke into the home of 40-year-old Ekhlasur Rahman and took him away in the middle of the night. Like most Muslim villages in the area, this one too is poor. Most villagers work as labourers, carpenters or sell scraps of timber. Rahman’s 60-year-old neighbour Rab Momin says the village now lives in constant fear. “We heard about the rally only the evening before. They told us that someone had insulted Islam. But we have nothing to do with that. We just want to earn our living. None of us, including Rahman, attended the rally. He was our village chief. So if they can take him, who knows who the police will take next,’’ says Momin. “It wasn’t us. It wasn’t anyone from the Muslim villages around. We are peaceful, law-abiding citizens. We think people from outside came and did this,’’

he says.

The fight for MaldaMalda is Bengal’s mango country. Mango orchards cover large swathes of the land. But these groves harbour another of Malda’s dark secrets — its illegal arms trade.

In the past three years, the Kaliachak police station has raided six arms factories. “These factories were hidden away in the mango groves. They were makeshift factories, shacks not larger than 10×10 feet where men were making country-made pistols and bombs,’’ says a police official.

With such a reputation, it has been difficult for Malda’s administration to attract investment. “There were a number of small industrialists who had initially wanted to invest in Malda. But they withdrew because of the law and order situation. The administration had set up a food processing complex which is now lying empty because no one wants to start manufacturing here. So it’s a vicious cycle — till the time employment is generated, the poor will keep getting sucked into criminal activities, but as long as crime exists, investors would not want to come,’’ says a government source.

The owner of Malda’s biggest hotel, Golden Park, has bought land to build the town’s first mall, but is hesitant to start, he says. But there has been a few positives. The West Bengal government has pumped money for the development of infrastructure in the district. Twenty nine new nursing homes have opened over the past few years. The Malda medical college was established in 2012 and its first batch of resident doctors are to graduate next year.

“We are trying to expand health facilities even more. We have a huge footfall at the medical college, which caters to patients and students not just from Bengal but also from Bihar and Jharkhand,” says Additional District Magistrate Malda Debatosh Mandal.



The Gour Banga post-graduate university was also set up in 2012, besides three new government colleges in south Malda, Manekchand and Gajour. A hundred new madrasas have been set up since 2012. The number of teachers and para-teachers in schools across the district have gone up. Besides, Mamata’s cycle scheme for girl students holds promise. With barely months to go before the elections, trucks full of cycles with the Trinamool symbol are being driven in.



Political insiders say the fight for Malda will be Mamata’s toughest. With the legacy of Congress leader and former Malda MP AB Ghani Khan Choudhry still running strong, the district remains a Congress stronghold. Choudhry, popularly known as Barkatda, was Malda MP for 26 years before he died in 2006. “There has been a number of defections to the Trinamool, including of Congress MLAs A N Khan Choudhry (Ghani Khan Choudhry’s younger brother) from Sujapur and Sushil Ray from Gajal and Forward Block MLA from Harishchandrapur Tajamul Hussain,’’ says Malda Trinamool Congress (TMC) president Moazzam Hossain.



But things don’t look good for the TMC just yet. While political analysts admit that the party has been gaining ground, a Congress-CPI(M) tie up, which is likely in Malda, may spoil the TMC’s plans. The factional disputes within the TMC don’t help the party either. TMC leader Bakul Sheikh was expelled from the party two months ago and another TMC leader, Surjan Sheikh, was taken into police custody after a police raid at his home recovered a huge cache of arms and ammunition.



While the BJP had gained ground in the last election, cornering a little over 19 per cent of the vote share, they have

since lost steam. “This is why they are raising the Kaliachak incident. They are desperate to regain some ground,’’ says a TMC worker.



BJP Malda district general secretary Ajoy Ganguly admits that the Kaliachak incident is important for the party.

“This is an important issue for us and will be our main platform for the elections. Of course, it was not a communal incident, everyone knows that. It was a criminal activity. But what on earth was Mamata Banerjee’s police doing? Why are their hands tied,’’ he asks

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कला और साम्प्रदायिकता-



हाल ही में अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता ने जिस तरह आक्रामक भाव से अपने को प्रदर्शित किया है वह निंदनीय है,हम सब धर्मनिरपेक्ष लोग उनकी हरकतों की निंदा करते हैं।यह रूप मालदा से बिहार तक दिख रहा है।इसे बहाना बनाकर बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता अपने को नए सिरे से बढ़-चढ़कर सजा-संवार रही है। फेसबुक पर बहुसंख्यक साम्प्रदायिक के पक्षधर मोदीभक्तों को जहरीला प्रचार करने का एक और मौका मिला है। साम्प्रदायिकता के ये दोनों रूप विषाक्त हैं,जो इनमें अमृतरस खोज रहे हैं वे भारत-विभाजन को भूल रहे हैं।ये दोनों ही साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे को जागृत-संगठित कर रही हैं और समाज का विभाजन कर रही हैं , धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर बना रही हैं। सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रकामी नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि इन दोनों ही किस्म की साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज बुलंद करें।

फेसबुक पर आमिर खान और शाहरूख खान के असहिष्णुता संबंधी बयानों को लेकर जिस तरह की भाषा का बेशर्मी और अभद्रता के साथ मोदीभक्तों ने इस्तेमाल किया गया है उससे सर्जनात्मक लोगों के मन को ठेस लगी है।
जो लोग यह सोचते हैं कि कलाकार-अभिनेता-लेखक का अपमान करके वे मोदी का दर्जा ऊँचा कर रहे हैं,वे गलतफहमी में हैं। जिस समाज में कलाकारों का अपमान होता है वहां सत्ता के मुखिया का सिर कभी इज्जत के साथ ऊँचा नहीं हो सकता।यह समूची मानव सभ्यता का अनुभव है।

फेसबुक पर मोधीभक्तों ने लगातार असहिष्णुता के मसले पर जिस तरह मेढ़कगान किया है उसने यह संदेश भी दिया है कि वे प्रतिवादी लेखकों के नजरिए को समझने में असफल रहे हैं।वे यह समझने को तैयार नहीं हैं कि एक लेखक-कलाकार-चित्रकार के दुनिया देखने और उसकी धड़कनों को महसूस करने और सामान्यजन के दुनिया को महसूस करने और देखने में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
यदि लेखक-कलाकार के नजरिए और आमजन के नजरिए में अंतर न होता तो हर आदमी लेखक होता,लेकिन वास्तविकता यह है हर आदमी लेखक नहीं होता।फेसबुक पर लिखना लेखक होने का प्रमाण नहीं है।एसएमएस करना लेखक होने का प्रमाण नहीं है।फेसबुक लिखकर या ह्वाटस-एप मैसेज तो रचना नहीं है। यह कम्युनिकेशन है लेकिन कला नहीं है।

दिलचस्प बात है कि इंटरनेट पर कुकुरमुत्तों की तरह साम्प्रदायिक वेबसाइट नजर आ रही हैं वहां पर अहर्निश साम्प्रदायिक लेखन हो रहा है और यह भारत का वह घिनौना चेहरा है जिसे देखकर कोई भी कह सकता है भारत अभी गुलामदशा में जी रहा है। साम्प्रदायिक नजरिया वस्तुतःगुलामी है।

एवार्ड लौटाने वाले लेखकों के प्रति घृणा अभियान जारी है। फेसबुक पर देश की सभी समस्याओं के लिए उनसे ही प्रतिवाद की मांग की जा रही है।
मित्रो कभी खुद भी प्रतिवाद कर लिया करो,प्रतिवाद के मामले में परजीविता यह तो कमाल का हिंदुत्व है!!
धर्मनिरपेक्ष लेखकों के खिलाफ फेसबुक पर वे लोग लिख रहे हैं जो संविधान वर्णित अधिकारों का सम्मान नहीं करते,लेखक का सम्मान नहीं करते,नागरिक अधिकारों का सम्मान नहीं करते,वे तो सिर्फ एक नायक की पूजा करते हैं ,जैसे हर शनिवार को शनि की करते हैं, ये लोग फेसबुक पर मोदीजी की आरती उतारते हुए लेखकनिंदा में मशगूल हैं,जो फेसबुक पर मोदी आरती उतार रहे हैं, वे इंतजार में परजीवियों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं कि मोदीजी बेड़ा पार लगाएंगे।ये मोदीभक्त ,घृणा और भक्ति का विलक्षण इंटरनेट संगम हैं।

मजेदार बात है सरकार चलाएं मोदीजी और जवाब दें धर्मनिरपेक्ष लेखक,यह कौन सी बुद्धि है जी।देशकी जिम्मेदारी नहीं ले सकते मोदीजी तो छोड़ दें सरकार को।

भाजपा का अधिकनायकवादी रवैय्या ही है कि उसने मराठी लेखक श्रीपाल सबनीस के बयान को लेकर उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज करायी है। कितना प्रमाण चाहिए,अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले का और भगवाईयों के असहिष्णु आचरण का। शर्म की बात है लेखकों के मन में भय पैदा किया जा रहा है कि वे खुलकर मोदी की आलोचना न करें।यह मानसिकता भाजपा के पतन का आरंभ है।

श्रीपाल सबनीस( मराठी साहित्य सम्मेलन के भावी सभापति) को मोदी की आलोचना करने कारण दो लोगों ने जान से मारने की धमकी दी है ,इनके खिलाफ लेखक ने एफआईआर दर्ज कराई है,ये दोनों भाजपा के हैं। इस घटना के बाद भी फेसबुक पर जाहिल लोग हल्ला कर रहे हैं कि असहिष्णुता कहां है ?

मराठी साहित्य सम्मेलन के मंच से अध्यक्ष श्रीपाल सबनीस कोई विवाद खड़े न करें।यह कहना है महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं का।
सवाल यह है साहित्य सम्मेलन में किन विषयों पर बहस होगी यह भी क्या भाजपा तय करेगी ?यदि ऐसा है तो भाजपा के अंतिम दौर की घंटी बज चुकी है।
लेखक अपने सम्मेलन में किन मसलों पर बहस करेंगे यह वे ही तय करेंगे,कोई राजनीतिक दल इसे तय नहीं कर सकता।देखना होगा कि सम्मेलन के दौरान किस तरह की बहस होती है,खासकर भाजपा समर्थित लेखक क्या रूख ग्रहण करते हैं। क्योंकि सम्मेलन में अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ रहे हमलों पर एक प्रस्ताव आना तय है और असहिष्णुता का सवाल भी केन्द्र में है।

मराठी साहित्य सम्मेलन के सदर श्रीपाल सबनीस ने पीएम मोदी को (5जनवरी2016)पत्र लिखकर अफसोस जताया है, लेकिन अपने बयान को वापस लेने या माफी मांगने से इंकार किया है। जबकि भाजपा उनसे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने की मांग कर रही थी,लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जो माफी मांगने लायक हो,आज कीकू शारदा नामक हास्य कलाकार को मीमिक्री करने और चुटकुला सुनाने के आरोप में हरियाणा की जेल में बंद कर दिया गया,यार टीवी बंद करो,सिनेमा बंद करो,नेट बंद करो,सिर्फ डिजिटल इंडिया जप करो और मंदिर- भगवान-गऊ- बैल मुर्गा और भक्तों के गा गा समारोह करो! भाड़ में गया वैविध्यपूर्ण भारत!सहिष्णु भारत!ताकतवर पहलवान भगवान भारत बनाओ!! नारा लगाओ भगवान महान तो देश महान! सिर्फ भगवान को डिजिटल करो !!

मिमिक्री क्राइम कब से हो गया ? कहां सोए हैं कानून के रखवाले! भारत में रोज अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले हो रहे हैं,इस पर तुर्रा यह कि कहां है असहिष्णुता ! शर्म करो,लोकतंत्र पर हमला करने वालों को कानून भी नहीं बचा सकता!!

ऊपर वाला भगवान ,मनुष्य की किसी हरकत से नहीं डरता,व्यंग्य करने या आलोचना करने या अस्वीकार करने से परेशान नहीं होता,अपमानित नहीं होता,उसकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती,लेकिन समाज में जी रहे धंधेखोरभगवान तो टुईंया से रिएक्शन से डरने लगते हैं,उनका रखवाला कु-कानून भी चिंता करने लगता है,कानून के रखवाले मुख्यमंत्री भी सीधे पुलिस को हरकत में ले आते हैं,अब खैर नहीं मजाकिया कलाकारों की।

भगवान से मत डरो,भगवान मानने वालों से भी मत डरो।निर्भीक रहो,संविधान मानो,नागरिकचेतना पैदा करो।निजी सुरक्षा का सबसे बड़ा मंत्र है नागरिक चेतना न कि भगवानचेतना।भगवानचेतना तो नागरिकचेतना का विलोम है।

देवी-देवता ब्रह्मचारी या अनैतिक नहीं होते,देवता का शरीर नहीं होता,फलत: उनके नैतिक मूल्य भी नहीं होसाहित्य संस्कारों और कला-आस्वाद से वंचित लोग साहित्यकार की पीड़ा और नजरिए को नहीं समझ सकते।इस तरह के कला शून्य मोदीभक्तों की फेसबुक पर संख्या बेशुमार है,यही वे लोग हैं जो लेखकों के द्वारा उठाए गए असहिष्णुता के सवाल को आज तक समझ नहीं पाए हैं। वे वोटबैंक राजनीति से आगे देख नहीं पाए हैं।लेखक के नजरिए का संबंध उसकी सामाजिक अवस्था में मच रही हलचलों,अशान्ति और असुरक्षा से है।हर साम्प्रदायिक घटना पर प्रतिवादी लेखकों से कैफियत मांगना असहिष्णुता का घृणिततम रूप है।समाज में घट रही हर साम्प्रदायिक घटना पर कैफियत देने का दायित्व सरकार का है ,खासकर केन्द्र सरकार और साम्प्रदायिक संगठनों का है।देवता तो मिथ है,कल्पना है।वह हमारा अतीत है।

हाल ही में अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता ने जिस तरह आक्रामक भाव से अपने को प्रदर्शित किया है वह निंदनीय है,हम सब धर्मनिरपेक्ष लोग उनकी हरकतों की निंदा करते हैं।यह रूप मालदा से बिहार तक दिख रहा है।इसे बहाना बनाकर बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता अपने को नए सिरे से बढ़-चढ़कर सजा-संवार रही है। फेसबुक पर बहुसंख्यक साम्प्रदायिक के पक्षधर मोदीभक्तों को जहरीला प्रचार करने का एक और मौका मिला है। साम्प्रदायिकता के ये दोनों रूप विषाक्त हैं,जो इनमें अमृतरस खोज रहे हैं वे भारत-विभाजन को भूल रहे हैं।ये दोनों ही साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे को जागृत-संगठित कर रही हैं और समाज का विभाजन कर रही हैं , धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर बना रही हैं। सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रकामी नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि इन दोनों ही किस्म की साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज बुलंद करें।





कला ,भाजपा और साम्प्रदायिकता-

     हाल ही में भाजपा का विरोध करने वाले कलाकारों पर भाजपा ने जिस तरह हमला करना आरंभ किया है वह शर्मनाक और निंदनीय है। आमिर खान के बोलने के बाद तो ये लोग बौखलाएहुए हैं।संघ के नेतागण सरेआम आमिर खान की फिल्म न चलने देने की धमकी दे रहे हैं।हम सब धर्मनिरपेक्ष लोग उनकी हरकतों की निंदा करते हैं। उल्लेखनीय है कि देश में संघियों से प्रेरणा लेकर अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता भी सक्रिय हो उठी है और विभिन्न बहानों के जरिए हमलावर हो उठी है।इसके कारण फेसबुक पर बहुसंख्यक साम्प्रदायिक के पक्षधर मोदीभक्तों को जहरीला प्रचार करने का एक और मौका मिला है। साम्प्रदायिकता के ये दोनों रूप विषाक्त हैं,जो लोग इनमें अमृतरस खोज रहे हैं वे भारत-विभाजन को भूल रहे हैं।ये दोनों ही साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे को जागृत-संगठित कर रही हैं, समाज का विभाजन कर रही हैं और धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर बना रही हैं। सभी धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्रकामी नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि दोनों ही किस्म की साम्प्रदायिकता के खिलाफ आवाज बुलंद करें।

फेसबुक पर आमिर खान और शाहरूख खान के असहिष्णुता संबंधी बयानों को लेकर जिस तरह की भाषा का बेशर्मी और अभद्रता के साथ मोदीभक्तों ने इस्तेमाल किया है उससे सर्जनात्मक लोगों के मन को ठेस लगी है।
जो लोग यह सोचते हैं कि कलाकार-अभिनेता-लेखक का अपमान करके वे मोदी का दर्जा ऊँचा कर रहे हैं,वे गलतफहमी में हैं।जिस समाज में कलाकारों का अपमान होता है वहां सत्ता के मुखिया का सिर कभी इज्जत के साथ ऊँचा नहीं हो सकता।यह समूची मानव सभ्यता का अनुभव है।

फेसबुक पर मोधीभक्तों ने लगातार असहिष्णुता के मसले पर जिस तरह मेढ़कगान किया है उसने यह संदेश भी दिया है कि वे प्रतिवादी लेखकों के नजरिए को समझने में असफल रहे हैं।वे यह समझने को तैयार नहीं हैं कि एक लेखक-कलाकार-चित्रकार के दुनिया देखने और उसकी धड़कनों को महसूस करने और सामान्यजन के दुनिया को महसूस करने और देखने में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
यदि लेखक-कलाकार के नजरिए और आमजन के नजरिए में अंतर न होता तो हर आदमी लेखक होता,लेकिन वास्तविकता यह है हर आदमी लेखक नहीं होता।फेसबुक पर लिखना लेखक होने का प्रमाण नहीं है।एसएमएस करना लेखक होने का प्रमाण नहीं है।फेसबुक लिखकर या ह्वाटस-एप मैसेज तो रचना नहीं है।यह कम्युनिकेशन है लेकिन कला नहीं है।प्रत्येक संप्रेषण कला नहीं होता।कला वह है जहां जीवन कोनए सिरे से रचा जाए।

दिलचस्प बात है कि इंटरनेट पर कुकुरमुत्तों की तरह साम्प्रदायिक वेबसाइट नजर आ रही हैं वहां पर अहर्निश साम्प्रदायिक लेखन हो रहा है और यह भारत का वह घिनौना चेहरा है जिसे देखकर कोई भी कह सकता है भारत अभी गुलामदशा में जी रहा है। साम्प्रदायिक नजरिया वस्तुतःगुलामी है। इन बेवसाइट के जरिए एवार्ड लौटाने वाले लेखकों के प्रति घृणा अभियान जारी है। फेसबुक पर देश की सभी समस्याओं के लिए उनसे ही प्रतिवाद की मांग की जा रही है। हम यही कहना चाहते हैं मित्रो कभी खुद भी प्रतिवाद कर लिया करो !

उल्लेखनीय है परजीवीपन के मामले में साम्प्रदायिकता सबसे आगे है।यह कारपोरेट पूंजी की दया-माया और भीख पर जिंदा है।
धर्मनिरपेक्ष लेखकों के खिलाफ फेसबुक पर वे लोग लिख रहे हैं जो संविधान वर्णित अधिकारों का सम्मान नहीं करते,लेखक का सम्मान नहीं करते,नागरिक अधिकारों का सम्मान नहीं करते,वे तो सिर्फ एक नायक की पूजा करते हैं ,जैसे हर शनिवार को शनि की करते हैं, ये लोग फेसबुक पर मोदीजी की आरती उतारते हुए लेखकनिंदा में मशगूल हैं,जो फेसबुक पर मोदी आरती उतार रहे हैं, वे इंतजार में परजीवियों की तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं कि मोदीजी बेड़ा पार लगाएंगे।ये मोदीभक्त ,घृणा और भक्ति का विलक्षण इंटरनेट संगम हैं।मजेदार बात है सरकार चलाएं मोदीजी और जवाब दें धर्मनिरपेक्ष लेखक,यह कौन सी बुद्धि है जी।देशकी जिम्मेदारी नहीं ले सकते मोदीजी तो छोड़ दें सरकार को। भाजपा के चरित्र को इस रूप में देखें।भाजपा का अधिकनायकवादी रवैय्या ही है कि उसने मराठी लेखक श्रीपाल सबनीस के बयान को लेकर उनके खिलाफ एक एफआईआर दर्ज करायी है। कितना प्रमाण चाहिए,अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले का और भाजपा-संघ के असहिष्णु आचरण का। शर्म की बात है लेखकों के मन में भय पैदा किया जा रहा है कि वे खुलकर मोदी की आलोचना न करें।यह मानसिकता भाजपा के पतन का आरंभ है।

श्रीपाल सबनीस( मराठी साहित्य सम्मेलन के भावी सभापति) को मोदी की आलोचना करने कारण दो लोगों ने जान से मारने की धमकी दी है ,इनके खिलाफ लेखक ने एफआईआर दर्ज कराई है,ये दोनों भाजपा के सदस्य हैं। इस घटना के बाद भी फेसबुक पर जाहिल लोग हल्ला कर रहे हैं कि असहिष्णुता कहां है ?

मराठी साहित्य सम्मेलन के मंच से अध्यक्ष श्रीपाल सबनीस कोई विवाद खड़े न करें।यह कहना है महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं का।सवाल यह है साहित्य सम्मेलन में किन विषयों पर बहस होगी यह भी क्या भाजपा तय करेगी ?यदि ऐसा है तो भाजपा के अंतिम दौर की घंटी बज चुकी है।लेखक अपने सम्मेलन में किन मसलों पर बहस करेंगे यह वे ही तय करेंगे,कोई राजनीतिक दल इसे तय नहीं कर सकता।देखना होगा कि सम्मेलन के दौरान किस तरह की बहस होती है,खासकर भाजपा समर्थित लेखक क्या रूख ग्रहण करते हैं। क्योंकि सम्मेलन में अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ रहे हमलों पर एक प्रस्ताव आना तय है और असहिष्णुता का सवाल भी केन्द्र में है। उल्लेखनीय है मराठी साहित्य सम्मेलन के सदर श्रीपाल सबनीस ने पीएम मोदी को (5जनवरी2016)पत्र लिखकर अफसोस जताया है, लेकिन अपने बयान को वापस लेने या माफी मांगने से इंकार किया है। जबकि भाजपा उनसे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने की मांग कर रही थी,लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जो माफी मांगने लायक हो,हरियाणा की भाजपा सरकार ने फासिस्ट नजरिए का एक अन्य उदाहरण पेश किया। हाल ही में कीकू शारदा नामक हास्य कलाकार को मीमिक्री करने और चुटकुला सुनाने के आरोप में हरियाणा की जेल में बंद कर दिया गया,उनके खिलाफ 3 जिलों में एफआईआर दर्ज करायी गयी है। सवाल यह है मिमिक्री क्राइम कब से हो गया ? कहां सोए हैं कानून के रखवाले! भारत में रोज अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले हो रहे हैं,इस पर तुर्रा यह कि कहां है असहिष्णुता !

ऊपर वाला भगवान ,मनुष्य की किसी हरकत से नहीं डरता,व्यंग्य करने या आलोचना करने या अस्वीकार करने से परेशान नहीं होता,अपमानित नहीं होता,उसकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती,लेकिन समाज में जी रहे धंधेखोर भगवान तो टुईंया से रिएक्शन से डरने लगते हैं,उनका रखवाला कु-कानून भी चिंता करने लगता है,कानून के रखवाले मुख्यमंत्री भी सीधे पुलिस को हरकत में ले आते हैं,अब खैर नहीं मजाकिया कलाकारों की।

हम तो यही कहेंगे भगवान से मत डरो,भगवान को मानने वालों से भी मत डरो।निर्भीक रहो,संविधान मानो, नागरिकचेतना पैदा करो।निजी सुरक्षा का सबसे बड़ा मंत्र है नागरिक चेतना न कि भगवानचेतना।भगवानचेतना तो नागरिकचेतना का विलोम है।

दूसरी बात यह कि देवी-देवता ब्रह्मचारी या अनैतिक नहीं होते,देवता का शरीर नहीं होता,फलत: उनके नैतिक मूल्य भी नहीं होसाहित्य संस्कारों और कला-आस्वाद से वंचित लोग साहित्यकार की पीड़ा और नजरिए को नहीं समझ सकते।इस तरह के कला शून्य मोदीभक्तों की फेसबुक पर संख्या बेशुमार है,यही वे लोग हैं जो लेखकों के द्वारा उठाए गए असहिष्णुता के सवाल को आज तक समझ नहीं पाए हैं। वे वोटबैंक राजनीति से आगे देख नहीं पाए हैं।लेखक के नजरिए का संबंध उसकी सामाजिक अवस्था में मच रही हलचलों,अशान्ति और असुरक्षा से है।हर साम्प्रदायिक घटना पर प्रतिवादी लेखकों से कैफियत मांगना असहिष्णुता का घृणिततम रूप है।समाज में घट रही हर साम्प्रदायिक घटना पर कैफियत देने का दायित्व सरकार का है ,खासकर केन्द्र सरकार और साम्प्रदायिक संगठनों का है।देवता तो मिथ है,कल्पना है।वह हमारा अतीत है।







सोमवार, 4 जनवरी 2016

जन सांस्कृतिक मंच के 40साल-लोकतांत्रिक विचारधाराओं का संगम है जन सांस्कृतिक मंच


                मथुरा में आज जन सांस्कृतिक मंच की स्थापना के 40 साल पूरे होने पर मित्रगण पूरे जोशोखरोश के साथ सांस्कृतिक आयोजन कर रहे हैं।मैं दुखी हूँ कि उनके बीच में नहीं हूँ। एक सांस्कृतिक संगठन के लिए 40साल बहुत छोटा समय है,लेकिन जन सांस्कृतिक मंच ने 40सालों में अपने सीमित संसाधनों के जरिए जिस तरह की सामाजिक भूमिका मथुरा के माहौल में निभायी है वह काबिलेगौर है। इस दौरान मंच को सैंकड़ों युवाओं को जन संस्कृति से जोड़ने में मदद मिली है।लोकतांत्रिक मूल्यों और मान्याताओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव पैदा करने,सामंती सोच और सामंती आदतों से लड़ने की भावनाओं को निर्मित करने में उसने बहुत बड़ी भूमिका निभायी है।

मथुरा का सामान्य परिवेश अ-लोकतांत्रिक मान्यताओं और सामंती सांस्कृतिक मूल्यों से भरा हुआ है। जनसांस्कृतिक मंच की जब स्थापना की गयी तो उस समय सामंती मूल्यों के खिलाफ लड़ने के साथ साथ आपातकाल में अधिनायकवादी राजनीतिक माहौल के खिलाफ लड़ने की भी गंभीर चुनौती थी।लोकतंत्रप्रेमी युवाओं और संस्कृतिकर्मियों ने मिलकर आपातकाल में जन सांस्कृतिक मंच की मथुरा में आज से 40साल पहले स्थापना की।संस्थापकों में प्रमुख थे- सव्यसाची,मनमोहन,हरिवंश चतुर्वेदी, भारतभूषण, (सम्प्रति इलाहाबाद उच्चन्यायालय के जज) अनिल चौधरी नाट्य निर्देशक,दिनेश अग्रवाल आदि। आरंभ में किसी ने सोचा भी नहीं था कि मंच इतनी बड़ी ताकत बनेगा,लेकिन धीरे-धीरे काम करते हुए मंच में सभी साथियों की सक्रिय भागीदारी ने मथुरा के युवाओं में व्यापक अपील पैदा की।मैं स्वयं भी आपातकाल में मंच के करीब आया और आज तक मंच से संबंध बना हुआ है।मंच ने मथुरा में वह सब किया जो सांस्कृतिक परिवर्तन के लिए आवश्यक था और यह काम सामान्य स्तर पर न्यूनतम चंदा वसूल करके किया गया।

आरंभ में मंच की जो परिकल्पना बनी उसमें लाइब्रेरी,फिल्म,सेमीनार और सोशलवर्क ये चार क्षेत्र रखे गए। प्रत्येक शनिवार को किसी न किसी सम-सामयिक विषय पर परिचर्चा होती थी जिसमें सभी सदस्य भाग लेते थे.यह अकेला ऐसे संगठन था जिसमें लड़कियों की भी व्यापक स्तर पर भागीदारी थी। चार लाइब्रेरी यूनिट बनाई गईं जिनमें प्रगतिशील साहित्यकारों की रचनाएं क्रमशःएकत्रित करके रखी गयीं,पुस्तकालय के लिए मात्र 1रूपया मासिक शुल्क लिया जाता था ,ये चारों यूनिट शहर के विभिन्न मोहल्लों में स्थापित की गयीं,और प्रत्येक पाठक से पढ़ी गयी किताब पर सदस्यों के द्वारा नियमित फीडबैक ली जाती थी और चर्चाएं होती थीं,देश के सभी प्रख्यात बुद्धिजीवी और लेखकों को मंच पर बोलने का अवसर मिला ,जिनमें सैंकडों श्रोता हुआ करते थे। फिल्म शो के नाम पर समानान्तर सिनेमा की फिल्में और फिल्म के प्रोजेक्टर के जरिए विश्व के विख्यात फिल्ममेकरों की फिल्मों के शो नियमित ढ़ंग से मंच पर,सिनेमा हॉल में और कईबार गलियों में भी आयोजित किए गए। शतरंज और कैरम टूर्नामेंट तो युवाओं के सबसे प्रिय खेल थे,जिनमें सैंकड़ों युवाओं ने शिरकत की है। हर बार फिल्म शो के बाद दिखाई गयी फिल्म पर दर्शकों से एक प्रश्नावली भरायी जाती थी और एक सेमीनार रखी जाती थी जिसमें फिल्म के किसी न किसी जानकार विद्वान का भाषण हुआ करता था। सामाजिक कार्य के तहत प्रति माह गरीबों की किसी न किसी बस्ती में सफाई अभियान,मेडीकल शिविर,मुफ्त दवाओं का वितरण आदि के काम किए जाते थे।यह सिलसिला इस गति से चला कि हम सबको समय का पता ही नहीं चला और इस सिलसिले में सैंकड़ों सक्रिय युवा हम सबके बीच जुड़ते चले गए। ये वे युवा थे जो लोकतांत्रिकचेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों से लैस थे। कालान्तर में सभी युवाओं ने नौकरियां और काम धंधे हासिल किए लेकिन मंच के साथ अपना लगाव कम नहीं किया। खासकर 1983-84 के बाद से उसकी काम करने की शैली बदल गयी,बीच में कुछ समय काम ठंड़ा पड़ा ,लेकिन कुछ साल विराम के बाद फिर से विगत कई सालों से मंच के पुराने मित्रगण सक्रिय होकर मैदान में आ गए और मंच ने अपनी पहचान को नए सिरे स्थापित करने का प्रयास आरंभ कर दिया है।

जन सांस्कृतिक मंच की खूबी है लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता।लक्ष्य है लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रसार करना। युवाओं को जन संस्कृति और वैकल्पिक संस्कृति से जोड़ना। इसमें सदस्यता लेने वाले अपने राजनीतिक विचारों के प्रति स्वतंत्र हैं। मंच ने कभी किसी विचारधारा विशेष के पक्ष में खड़े होने या मानने के लिए सदस्यों पर दवाब नहीं डाला,वहां सभी रंगत की विचारधाराओं के सदस्य हैं।इस अर्थ में जन सांस्कृतिक मंच विचारधाराओं का संगम है।सब एक-दूसरे के भिन्न विचारों और दलीय प्रतिबद्धताओं का सम्मान करते हैं और गहरे मित्र की तरह साथ में रहते हैं।