रविवार, 28 अगस्त 2016

श्रीश्री और बुरहान वानी के पिता की मुलाकात के मायने ॽ

दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और पीडीपी-भाजपा सरकार के जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ होने के बाद कश्मीर के परिदृश्य में बुनियादी बदलाव आया है।मोदी के सत्तारूढ़ होने के पहले तक केन्द्र और राज्य सरकार का कश्मीर के आतंकवाद-पृथकतावाद को लेकर यह नजरिया था कि पृथकतावादी मांग करने वालों में कुछ कश्मीरी हैं लेकिन आतंकी तो पाक के भेजे लोग ही हैं।लेकिन बुरहान वानी की हत्या के बाद जुलाई से मीडिया में इस तरह की इमेज बनायी गयी कि कश्मीर की जनता में ही आतंकी तत्व छिपे हैं,पहले कश्मीर की जनता और आतंकी के बीच,आतंकी और पृथकतावादी के बीच में केन्द्र अंतर करके चलता था,स्वयं अटलजी की सरकार ने यह अंतर किया था,लेकिन इसबार बुरहान वानी की सैन्यबलों के हाथों हत्या होने के बाद समूचा परिदृश्य बदल चुका है।अब मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती तक कह रही हैं कि पांच प्रतिशत लोग हैं जो अमन-चैन नहीं चाहते।सवाल यह है इस तरह का बयान देकर अप्रत्यक्ष तौर पर केन्द्र और राज्य सरकार ने यह मान लिया है कि ´पत्थरबाज आतंकी´ हैं और ´उनके साथ की जनता है आतंकी´ है,बतर्ज महबूबा कुल मिलाकर ये लोग कश्मीर की जनसंख्या के पांच फीसदी हैं।इस तरह की धारणाओं के प्रचार ने कश्मीर में जल रही आग में घी का काम किया है।अब यदि कश्मीर में पांच फीसदी जनता अशांति में शामिल है तो पहले तो यह बयान ही गलत है,जनविरोधी है।यह कश्मीर की जनता का अपमान करने वाला बयान है।इस तरह के बयान सामान्य स्थिति को बहाल करने में सबसे बड़ी बाधा हैं।

कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करने में दूसरी सबसे बड़ी बाधा है राज्य प्रशासन के द्वारा उपद्वियों को जनहित में गिरफ्तार न करना। मसलन् राज्य सरकार ने 1000लोगों की सूची बनायी है,जिसमें सबसे खतरनाक 169 लोग हैं, इन लोगों को अशांति पैदा करने वाला,जनता को भड़काने वाले के तौर पर रेखांकित किया गया है। सवाल यह है इस तरह के लोगों की पहले से ही गिरफ्तारी क्यों नहीं की गयी ॽविगत 50दिनों में इनमें किसी भी नेता को क्यों नहीं पकड़ा गया ॽ इन लोगों की गिरफ्तारी न हो पाने का प्रधान कारण है उपद्रवियों के प्रति मोदी सरकार का नरम रूख।

केन्द्र सरकार और उसकी एजेंसियां जानती हैं कश्मीर में कौन लोग हैं जो जनता को भड़का रहे हैं ,उनको यदि समय रहते गिरफ्तार कर लिया गया होता तो परिस्थितियां इतनी खराब न होतीं।केन्द्र सरकार के द्वारा सबसे बड़ी चूक हुई है बुरहान वानी को लेकर।बुरहान वानी के बारे में यह सच है कि वह आतंकी संगठन का सदस्य था लेकिन उसने कोई हिंसक वारदात में हिस्सा नहीं लिया था।वह स्थानीय पुलिस का एजेंट भी था,वह सोशलमीडिया के जरिए प्रचार करता था।उसकी गतिविधि में कहीं पर कोई हिंसा का तत्व पुलिस-सेना किसी को भी नहीं मिला,अचानक उसको मार देने का फैसला करके शांत कश्मीर को नियोजित ढ़ंग से अशान्त किया गया।यह फैसला किसी पुलिस अफसर या सेना के अधिकारी नहीं हो सकता। अब सारी बातें बुरहान पर आकर रूक गयी हैं।

कल बुरहान वानी के पिता से आरएसएस के समर्थक संत श्रीश्री रविशंकर मिले हैं,यह अपने आपमें विलक्षण घटना है।उल्लेखनीय है श्रीश्री रविशंकर का मोदी की पिछबाड़े की कूटनीति में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है।श्रीश्री से बुरहान के पिता का मिलना और उसी दिन महबूबा मुफ्ती का पीएम नरेन्द्र मोदी से मिलना, बताता है कि केन्द्र सरकार अन्दर से मान चुकी है बुरहान वानी की हत्या करना भूल थी,मुश्किल यह है कि इससे बाहर कैसे निकला जाय,आतंकी-पृथकतावादी बुरहान वानी को शहीद मान रहे हैं,स्वयं महबूबा मुफ्ती उसकी हत्या पर अफसोस का इजहार कर चुकी हैं,लेकिन राजनाथ सिंह ने अफसोस जाहिर नहीं किया है।

इसके विपरीत समूची मोदी सरकार,उनका समर्थक भोंपू मीडिया और आरएसएस के लोग इंटरनेट पर बुरहान वानी को आतंकी करार दे चुके हैं,बार-बार उसकी हत्या को जायज ठहरा चुके हैं,अब अचानक बुरहान वानी के पिता से मुलाकात के जरिए कश्मीरी जनता के आक्रोश को शांत करने की कोशिश की जा रही है।जिस तरह घटनाएं घट रही हैं उसमें लग यही रहा है कि हुर्रियत के नेतागण बुरहान वानी की हत्या के लिए केन्द्र सरकार को घेरना बंद नहीं करेंगे,वे चाहते हैं केन्द्र सरकार बुरहान वानी की हत्या के मामले में अपनी गलती माने,केन्द्र मन भी बना चुका है लेकिन कैसे कहे ,समस्या यहां आकर अटक गयी है।

सवाल यह है कल तक मोदी सरकार बुरहान वानी के परिवार को आतंकी मानकर चल रहे थे,अब अचानक बुरहान के पिता से श्रीश्री रविशंकर मिले हैं,उन्होंने अपनी मीटिंग के बाद बुरहान के पिता के साथ फोटो ट्विट भी किया है।यह सीधे घोषणा है बुरहान का परिवार आतंकी नहीं है,बुरहान आतंकी नहीं था,यह कूटनीति की नई भाषा है जिसे संघ परिवार संतों के इमेज संसार के जरिए रच रहा है।



श्रीश्री रविशंकर और बुरहान के पिता का फोटो स्वयं श्रीश्री द्वारा ट्विटर पर जारी करना महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है बुरहान को सोशलमीडिया के पोस्ट के जरिए ही आतंकी की परिभाषा में डाला गया,अब सोशलमीडिया के फोटो इमेजों और संदेशों के जरिए ही बुरहान की हत्या के पाप से मोदी –महबूबा सरकार मुक्त होना चाहते हैं।सवाल यह है कर्फ्यू ग्रस्त कश्मीर में से बुरहान के पिता श्रीश्री रविशंकर से मिलने बंगलौर कैसे पहुँचे ॽकिसने उनके आने-जाने की व्यवस्था की ॽकौन हैं वे लोग जो राजनाथ सिंह या मोदी से मुलाकात न कराकर सीधे श्रीश्री के पास बुरहान के पिता को ले गए ॽक्या बुरहान के पिता की श्रीश्री के साथ बैठक राजनाथ सिंह की कश्मीर यात्रा के दौरान तय हुई ॽ हाल ही में राजनाथ सिंह श्रीनगर में किनसे मिले ॽ उनके नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए ॽये कुछ सवाल है जो लगातार कश्मीर की समस्या को और भी जटिल बना रहे हैं।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

कश्मीरी पंडितों से क्यों नहीं मिले राजनाथ सिंह

        हाल ही में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर की दो दिवसीय यात्रा खत्म करके लौटे हैं।इस यात्रा की शुरूआत के साथ ही उन्होंने यह घोषणा की थी उनसे जो भी मिलना चाहे मिल सकता है,वे निजी तौर पर भी कश्मीर के विभिन्न समुदायों,संगठनों,राजनीतिक दलों आदि से मिलने का मन बनाकर श्रीनगर पहुँचे थे।वे किस तरह के लोगों से मिले और उनकी क्या बातें हुईं इसका कोई विवरण अभी तक अखबारों में नहीं आया है।लेकिन जो खबरें अखबारों में आई हैं उनसे साफ पता चलता है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ तनाव बना हुआ है।महबूबा स्वयं राजनाथ सिंह से मिलने गेस्ट हाउस नहीं गयीं अंत में मजबूरन राजनाथ सिंह उनके घर जाकर उनसे मिले,प्रेस कॉंफ्रेंस के दौरान में भी दोनों नेताओं की भाव-भंगिमा तनावपूर्ण थी,महबूबा मुफ्ती तो एस कदर परेशान थीं कि प्रेस काँफ्रेस बीच में ही अचानक खत्म करके उठ खड़ी हुईं,जबकि राजनाथ सिंह बैठे हुए थे।इससे इन दोनों नेताओं के बीच का तनाव सामने आ गया।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अब तक दो कश्मीर यात्राएं हुई हैं और दोनों असफल रही हैं।यहां तक कि व्यापारिक संगठनों ने दोनों बार उनसे मुलाकात करने से साफ मना कर दिया। वहीं दूसरी ओर कश्मीरी पंडितों के सरकारी कर्मचारियों के संगठन के प्रतिनिधि राजनाथ सिंह से मिलने के लिए समय मांगते रहे,मिलने के लिए चक्कर काटते रहे ,लेकिन कश्मीरी पंडितों के संगठन को मिलने का समय नहीं दिया गया।जबकि मौजूदा अशांति की अवस्था में कश्मीरी पंडित बहुत परेशान हैं।इन परेशान पंडितों के बारे में किसी भी भाजपानेता या अनुपम खेर टाइप फिल्म अभिनेता तक ने अभी तक बयान नहीं दिया।



उल्लेखनीय है सन् 2010 के प्रधानमंत्री पुनर्रोजगार कार्यक्रम के तहत दो हजार कश्मीरी युवा कश्मीर घाटी में अपने घर वापस लौटे और काम-धंधा कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनको 1990 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था,लेकिन बुरहान वानी कांड के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के कारण इन लोगों को फिर से अपना घर-द्वार छोड़ना पड़ा ,और वे जम्मू में शरण लेकर रह रहे हैं।ये लोग राजनाथ सिंह से मिलना चाहते थे लेकिन राजनाथ सिंह ने इन लोगों से मिलने से मना कर दिया।इन लोगों के घर अनंतनाग और पुलवामा में हैं,वहां पर वे ट्रांजिट कैंपों में छह साल से रह रहे थे,हाल के घटनाक्रम के दौरान उपद्रवियों की भीड़ ने उनके कैंपों पर हमले किए जिसके कारण ये लोग जान बचाकर भागने को मजबूर हुए।ये लोग 2010 से इन इलाकों में शांति से रह रहे थे। उल्लेखनीय है कश्मीरी पंडितों के सवाल पर सभी टीवी चैनल फिलहाल चुप है,जबकि एक साल पहले कश्मीरी पंडितों के लिए ये ही चैनल घडियाली आँसू बहा रहे थे। स्थिति यह है कि स्थानीय कश्मीरी अखबारों को छोड़कर इन पीड़ितों की खबर कहीं पर नजर नहीं आएगी,यहां तक कि फेसबुक आदि पर सक्रिय मोदीभक्तों ने भी इन कश्मीरी पंडितों के बारे में कुछ भी नहीं लिखा। इससे कश्मीरी पंडितों के प्रति आरएसएस के पाखंड की पोल खुलती है।

टीवी टॉक शो में संघी


पहले यह सोचा गया समाचार टीवी चैनल आएंगे तो समाचारों की बाढ़ आएगी,विभिन्न रंगत के न्यूज चैनलों के जरिए खबरों को व्यापक स्थान मिलेगा, नए किस्म का टीवी विमर्श जन्म लेगा। शुरू के वर्षों में कुछ उम्मीदें बंधी थीं,लेकिन जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है टीवी न्यूज चैनलों का समूचा चरित्र गुणात्मक तौर बदल गया है। खबरों की स्वायत्तता ,व्यापार की स्वायत्तता में बदल गयी है। न्यूज चैनलों में इरेशनल,अप्रासंगिक और बंधुआ विचारों ने स्थायी संप्रेषण की जगह बना ली है।इस तरह की खबरें और विचार ज्यादा प्रसारित हो रहे हैं जो अप्रासंगिक है या सामाजिक विभाजन को तेज करने वाले हैं।इनमें आरएसएस के प्रवक्ता या उसकी विचारधारा के पक्षधर की नियमित मौजूदगी को सहज ही देख सकते हैं।

सवाल उठता है आरएसएस के प्रवक्ता को टीवी टॉक शो में क्यों बुलाया जाता है और किन विषयों पर बुलाया जाता है ॽ मोदी सरकार आने के बाद से इस तरह के कार्यक्रमों में आरएसएस के प्रवक्ता ज्यादा नजर आते हैं जो सवाल हिन्दुत्व या हिन्दूधर्म से जुड़े हैं।भारत में हजारों सामाजिक-धार्मिक संगठन हैं,इनमें अनेक प्रतिष्ठित संगठन हैं जिनके लाखों अनुयायी हैं,लेकिन उनमें से किसी भी संगठन के प्रवक्ता को आप नियमित रूप में टीवी टॉक शो में नहीं देखेंगे। लेकिन आरएसएस के प्रवक्ता को जरूर देखेंगे।यहां तक कि नियमित तौर पर वामदलों के प्रवक्ता को अनुपस्थिति देखेंगे।

सवाल यह है आरएसएस के प्रवक्ता को प्रतिदिन टीवी चैनलों पर स्थान क्यों दिया जा रहा है ॽवह कौन सी मजबूरी है जिसके कारण न्यूज चैनल यह काम कर रहे हैं ॽ आरएसएस पहले भी था लेकिन मोदी सरकार बनने के पहले तक टीवी टॉक शो में आरएसएस के प्रवक्ता की यदा-कदा उपस्थिति होती थी लेकिन इन दिनों राजनीतिक मसलों पर रोज उपस्थिति रहती है।जबकि आरएसएस यह दावा करता है कि वह सामाजिक संगठन है।इसके बावजूद उसके प्रवक्ता को बुलाने का मकसद क्या है ॽ

जो संगठन जमीनी स्तर पर हिन्दुत्व के एजेण्डे का विरोध कर रहे हैं ,प्रतिवाद की भाषा बोलते हैं,संघर्ष कर रहे हैं उन संगठनों के प्रतिनिधियों टीवी टॉक शो में नियमित अनुपस्थिति और आरएसएस के प्रवक्ता की नियमित उपस्थिति दर्शकों के मन में यह धारणा पैदा कर रही है कि आरएसएस ऐसा संगठन है जिसकी विचारधारा को देश में चुनौती देने वाला कोई नहीं है।संघ के विचार सर्वग्राह्य विचार हैं। इस तरह के कम्युनिकेशन से वे लोग ज्यादा प्रभावित होते हैं जो राजनीति कम जानते हैं और सामाजिक तौर पर निष्क्रिय हैं।खासकर औरतें और युवावर्ग इस तरह के अहर्निश कम्युनिकेशन से बड़ी मात्रा में प्रभावित हो रहे हैं।



असल में मौजूदा दौर ´पृष्ठभूमि´ की विचारधाराओं के उद्घाटन या उनके क्षितिज पर आ जाने का दौर है।संघ लंबे समय से ´पृष्ठभूमि´ के विचारधारात्मक संगठन के रूप में काम करता रहा है लेकिन इधर अचानक हिन्दुत्व के हिंसाचार और अपराध की खबरों के टीवी में तेजी से आने के कारण यह संगठन चमत्कृत ढ़ंग से सामने आ गया है और अब रोज ही उसके प्रवक्ता टीवी चैनलों पर बैठे रहते हैं।इस समय जितने भी राजनैतिक मसले हैं उन पर संघ की विचारधारात्मक राय को महत्व दिया जा रहा है । मोदी सरकार आने के पहले तक संघ और केन्द्र सरकार को अलग -पृथक –प्रच्छन्न दिखाया जाता था लेकिन मोदी सरकार आने के बाद अब हर राजनीतिक घटना पर प्रत्यक्ष और सीधे हस्तक्षेप करता,केन्द्र सरकार से संबंध जोड़ता दिखाया जा रहा है। भाजपा की सरकारों के साथ इस तरह का गाँठ बांधकर प्रचार करना अपने आपमें नया फिनोमिना है।पहले घटनाक्रम पर सरकार नियंत्रक नजर आती थी अब संघ नियंत्रक नजर आता है,संघ के प्रवक्ता जो कहते हैं वह पत्थर की लकीर होता है,सरकार के प्रवक्ता या भाजपा के प्रवक्ता हमेशा संघ के प्रवक्ता के पूरक होते हैं,कभी –कभी संघ प्रवक्ता पूरक नजर आता है।लेकिन नियंत्रक और पूरक का यह वैचारिक संबंध नई विचारधारात्मक परिघटना है।इस पूरे प्रसंग में किसी भी टॉक शो के अंदर संघ के लोग एंकर के साथ मिलकर बहस के नियंत्रक के रूप में पेश किए जाते हैं। अन्य नियंत्रित के रूप में पेश किए जाते हैं,इससे दर्शकों के मन में यह भाव संप्रेषित हो रहा है कि संघ नियंत्रक है और बकी नियंत्रित हैं।इसमें तर्क बनाम अंधश्रद्धा की टीवी जंग भी है,इसमें तर्क को अंधश्रद्धा नियंत्रण करती नजर आती है। इस फॉरमेट में एक तरफ ज्ञान और सूचनाएं पिटती नजर आती हैं तो दूसरी ओर अज्ञान ,कठमुल्लापन-कु-सूचना जीतती दिखायी जा रही है।

राष्ट्रवाद के अन्तर्विरोधों में फंसा अशांत कश्मीर

         कश्मीर को देखने के लिए राष्ट्रवाद की नहीं लोकतांत्रिक नजरिए की जरूरत है।भाजपा ऊपर से नाम संविधान का ले रही है लेकिन कश्मीर की समस्या को राष्ट्रवादी नजरिए से हल करना चाहती है। राष्ट्रवाद के पास जातीय समस्या का कोई समाधान नहीं है।दिलचस्प बात यह है कि भाजपा-आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद के पैमाने से समाधान खोज रहे हैं वहीं आतंकी संगठन कश्मीरी राष्ट्रवाद के जरिए समाधान खोज रहे हैं लेकिन ये दोनों ही नजरिए अंततःहिंसा और अशांति की ओर जाते हैं। सारी दुनिया का अनुभव है कि उत्तर –औपनिवेशिक दौर में राष्ट्रवाद आत्मघाती मार्ग है।

कश्मीर की जनता के इस समय दो शत्रु हैं पहला है कश्मीरी राष्ट्रवाद और दूसरा है हिन्दू राष्ट्रवाद।राष्ट्रवाद बुनियादी तौर पर हिंसा और घृणा की विचारधारा है।इसका चाहे जो इस्तेमाल करे उसे अंततःहिंसा की गोद में उसे शरण लेनी पड़ती है। राष्ट्रवाद को उन्मादी नारे और हथियारों के अलावा और कोई चीज नजर नहीं आती।कश्मीर की आजादी के नाम पर जो लोग लड़ रहे हैं वे आजादी के नाम पर कश्मीर को जहन्नुम के हवाले कर देना चाहते हैं।जमीनी हकीकत यह है कि अधिकतर युवाओं को कश्मीरी की आजादी का सही अर्थ तक नहीं मालूम ,यही हाल नेताओं का है।

विगत 70 सालों में हजारों मीटिंगें हुई हैं लेकिन कश्मीर की आजादी का अर्थ समझाते हुए कभी किसी दल ने कोई दस्तावेज आज तक भारत की जनता के सामने,संसद में पेश नहीं किया।कश्मीर की आजादी को कश्मीरी राष्ट्रवाद के हिंसक और अंतर्विरोधी फ्रेमवर्क में रखकर ही हमेशा पेश किया गया, इसके बहाने कश्मीर के अंदर जो धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकते हैं उनके खिलाफ माहौल बनाने की लगातार कोशिशें हुई हैं।दिलचस्प बात यह है कि कश्मीरी राष्ट्रवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का संयुक्त मोर्चा मौजूदा राज्य सरकार को संचालित कर रहा है और सारी समस्या की जड़ यही मोर्चा है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी के नारे ´जम्हूरियत कश्मीरियत और इंसानियत´में भी कश्मीरी राष्ट्रवाद को कश्मीरियत के नाम पर शामिल कर लिया गया है और मौजूदा प्रधानमंत्री उस नारे को बार-बार दोहरा रहे हैं,जबकि समस्या इसी समझ में है।कश्मीर की समस्या को यदि मोदीजी राष्ट्रवाद के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो समाधान कम और टकराव ज्यादा पैदा होंगे, अटलजी के फ्रेमवर्क से देखेंगे तो वहां से भी हिंसक रास्ते ही खुलते हैं।इस दौर में जब भी जातीयता और राष्ट्रवाद को आधार बनाकर राजनीतिक समस्याओं के समाधान खोजे गए हिंसा और टकराव ही पैदा हुआ।खालिस्तान के दौर में ´पंजाबियत´का हश्र हम हिंसा में रूपान्तरित होते देख चुके हैं।

कश्मीर को लोकतंत्र चाहिए ´कश्मीरियत´नहीं।कश्मीर को ´नागरिक´ भावबोध चाहिए ´कश्मीरी´भावबोध नहीं।जो लोग´कश्मीरियत´के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं वे पुराने अ-प्रासंगिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं।कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है,इसमें वह इलाका भी आता है जो पाक अधिकृत कश्मीर के नाम से जाना जाता है। कश्मीर की स्थानीय राजनीति में धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी कश्मीरियत को भुनाती रही हैं,इससे भी समस्याएं पैदा हुई हैं।

मूल प्रश्न यह है कि कश्मीर को लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य से देखें या राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य से ।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य ,चाहे वह देशभक्त हो या विभाजनकारी,अंततःजनता को अंधी भीड़ में तब्दील करता है। लोकतंत्र का परिप्रेक्ष्य कश्मीरी जनता के स्वायत्त और आत्मनिर्भर संसार को सृजित करता है।कश्मीर की समस्या पर संविधान के दायरे में कोई भी बातचीत होगी तो लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में ही होगी।हमारा संविधान राष्ट्रवाद को मंजूरी नहीं देता।राष्ट्रवाद का परिप्रेक्ष्य अ-संवैधानिक है।

कश्मीर पर जब भी बातें होती हैं तो हिन्दू बनाम मुसलमान,पाक बनाम भारत,आतंकी बनाम राष्ट्रवादी,मुसलिम बहुसंख्यक बनाम हिन्दू अल्पसंख्यक या कश्मीरी पंडित आदि वर्गीकरण में रखकर देखते हैं।फलतः कश्मीर के बाशिंदों को हम नागरिक के रूप में देख ही नहीं पाते।बार-बार यही कहा जाता है कश्मीर में तो बहुसंख्यक मुसलमान हैं ,फलतः वहां आतंकी-पृथकतावादी संगठनों का राजनीतिक रूतबा है। कायदे से हमें इस तरह के विभाजनकारी वर्गीकरण में रखकर कश्मीर को,वहां की जनता को नहीं देखना चाहिए.कश्मीर में भी भारत के अन्य इलाके की तरह मनुष्य रहते हैं,वे हमारे देश के नागरिक हैं,उनको धर्म ,जातीयता और राष्ट्रवाद के नाम पर वर्गीकृत करके नहीं देखें।

कश्मीर की जनता को भीड़ में तब्दील करने में राष्ट्रवादी नजरिए की बड़ी भूमिका है।राष्ट्रवादी-आतंकी नजरिए का परिणाम है कि वहां पर आज जनता भीड़ की तरह आगे चल रही है और नेता उसके पीछे चल रहे हैं।लोकतंत्र में नेता जनता का नेतृत्व करते हैं लेकिन राष्ट्रवादी फ्रेमवर्क में भीड़ नेताओं का नेतृत्व करती है।यही वह आयरनी है जिससे निकलने की जरूरत है।



कश्मीर के निवासियों को हम अपने ही देश का नागरिक समझें,उनके दुख-दर्द को अपना दुख-दर्द समझें,पराए के रूप में देखना बंद करें।कश्मीर को पराए के रूप में देखने के कारण ही आज हालात यह हैं कि हमारी संसद भी ठीक से नहीं जानती कि कश्मीरियों की फिलहाल असल समस्याएं क्या हैं।हाल ही में संसद में कश्मीर के मौजूदा हालत पर जो बहस हुई उसमें विभिन्न दलों के नेताओं ने भाषण दिए,उन भाषणों में कश्मीरी जनता की अनुभूतियां,दुख-दर्द गायब थे,सिर्फ नारे थे,रेटोरिक था,लेकिन मर्मस्पर्शी भावबोध गायब था।इससे पता चलता है राजनीतिक नेतृत्व कश्मीर की जमीनी हकीकत से एकदम अनभिज्ञ है।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

मनुष्य के दस गुण और आम्बेडकर -

"(1) पन्न, (2) शील, (3) नेक्खम, (4) दान, (5) वीर्य, (6) खांति (शांति) , (7) सच्च, (8) अधित्थान, (9) मेत्त और (10) उपेक्खा।

पन्न या बुद्धि वह प्रकाश है, जो अविद्या, मोह या अज्ञान के अंधकार को हटाता है। पन्न के लिए यह अपेक्षित है कि व्यक्ति अपने से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से पूछकर अपनी सभी शंकाओं का समाधान कर ले, बुद्धिमान लोगों से संबंध रखे और विभिन्न कलाओं और विज्ञान का अर्जन करे, जो उसकी बुद्धि विकसित होने मे सहायक हों। शील नैतिक मनोवृत्ति अर्थात बुरा न करने और अच्छा करने की मनोवृत्ति, गलत काम करने पर लज्जित होना है। दंड के भय से बुरा काम न करना शील है। शील का अर्थ है, गलत काम करने का भय। नेक्खम संसार के सुखों का परित्याग है।


दान का अर्थ अपनी संपत्ति, रक्त तथा अंग का उसके बदले में किसी चीज की आशा किए बिना, दूसरों के हित व भलाई के लिए अपने जीवन तक को भी उत्सर्ग करना है।

वीर्य का अर्थ है, सम्यक प्रयास। आपने जो कार्य करने का निश्चय कर लिया है, उसे पूरी शक्ति से कभी भी पीछे मुड़कर देखे बिना करना है।

खांति (शांति) का अभिप्राय सहिष्णुता है। इसका सार है कि घृणा का मुकाबला घृणा से नहीं करना चाहिए, क्योंकि घृणा, घृणा से शांत नहीं होती। इसे केवल सहिष्णुता द्वारा ही शांत किया जाता है।

सच्च (सत्य) सच्चाई है। बुद्ध बनने का आकांक्षी कभी भी झूठ नहीं बोलता। उसका वचन सत्य होता है। सत्य के अलावा कुछ नहीं होता।

अधित्थान अपने लक्ष्य तक पहुंचने के दृढ़ संकल्प को कहते हैं।

मेत्त (मैत्री) सभी प्राणियों के प्रति सहानुभूति की भावना है, चाहे कोई शत्रु हो या मित्र, पशु हो या मनुष्य, सभी के प्रति होती है।

उपेक्खा अनासक्ति है, जो उदासीनता से भिन्न होती है। यह मन की वह अवस्था है, जिसमें न तो किसी वस्तु के प्रति रुचि होती है, परिणाम से विचलित व अनुत्तेजित हुए बिना उसकी खोज व प्राप्ति में लगे रहना ही उपेक्खा है।

प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इन गुणों को अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ अपने व्यवहार में अपनाए। इन पर आचरण करे। यही कारण है कि इन्हें परिमिता (पूर्णता की स्थिति) कहा जाता है। यही वह सिद्धांत है, जिसे बुद्ध ने संसार में दुःख तथा क्लेश की समाप्ति के लिए अपने बोध व ज्ञान के परिणामस्वरूप प्रतिपादित किया है।"

(बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स,निबंध से)

दस मुख्य कठिनाईयां और आम्बेडकर-

       "प्रथम बाधा अहम् का मोह है, जब तक व्यक्ति पूर्णतया अपने अहम् में रहता है, प्रत्येक भड़कीली चीज का पीछा करता है, जिनके विषय में वह व्यर्थ ही यह सोचता है कि वे उसके हृदय की अभिलाषा की तृप्ति व संतुष्टि कर देंगी, तब तक उसको आर्य मार्ग नहीं मिलता। जब उसकी आंखें इस तथ्य को देखकर खुलती हैं कि वह इस असीम व अनंत का एक बहुत छोटा सा अंश है, तब वह यह अनुभूति करने लगता है कि उसका व्यक्तिगत अस्तित्व कितना नश्वर है, तभी वह इस संकीर्ण मार्ग में प्रवेश कर सकता है।


दूसरी बाधा संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति है। जब मनुष्य अस्तित्व के महान रहस्य, व्यक्तित्व की नश्वरता को देखता है तो उसके अपने कार्य में भी संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति की संभावना होती है, अमुक कार्य किया जाए या न किया जाए, फिर भी मेरा व्यक्तित्व अस्थाई नश्वर है, ऐसी कोई चीज प्रश्न क्यों बन जाती है, जो उसे अनिर्णायक, संदेही या निष्क्रिय बना देती है, परंतु वह चीज जीवन मंर काम नहीं आएगी। उसे अपने शिक्षक का अनुसरण करने, सत्य को स्वीकार करने तथा संघर्ष की शुरुआत करने का निश्चय कर लेना चाहिए अन्यथा उसे और आगे कुछ नहीं मिलेगा।

तीसरी बाधा संस्कारों तथा धर्मानुष्ठानों की क्षमता पर निर्भर करती है। किसी भी उत्तम संकल्प से वह चाहे जितना दृढ़ हो, किसी चीज की प्राप्ति उस समय तक नहीं होगी, जब तक मनुष्य कर्मकांड से छुटकारा नहीं पाएगा, जब तक वह इस विश्वास से मुक्त नहीं होगा कि कोई बाह्य कार्य, पुरोहिती शक्ति तथा पवित्र धर्मानुष्ठान से उसे हर प्रकार की सहायता मिल सकती है। जब मनुष्य इस बाधा पर काबू पा लेता है, केवल तभी यह कहा जा सकता है कि वह ठीक धारा में आ गया है और अब देर-सवेर विजय प्राप्त कर सकता है।

चौथी बाधा शारीरिक वासनाएं हैं। पांचवीं बाधा दूसरे व्यक्तियों के प्रति द्वेष व वैमनस्य की भावना है छठी भौतिक वस्तुओं से मुक्त भावी जीवन के प्रति इच्छा का दमन है और सातवीं भौतिकता से मुक्त संसार में भावी जीवन के प्रति इच्छा का होना है। आठवी बाधा अभिमान है और नौवीं दंभ है। ये वे कमजोरियां हैं, जिन पर मनुष्य के लिए विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है और जिनके लिए विशेष रूप से श्रेष्ठ व्यक्ति उत्तरदायी हैं। यह उन लोगों के लिए निंदा की बात है, जो अपने आप से कम योग्य तथा कम पवित्र हैं।दसवीं बाधा अज्ञानता है। यद्यपि अन्य सब कठिनाइयों व बाधाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है, फिर भी यह बनी ही रहेगी, बुद्धिमान तथा अच्छे व्यक्ति के शरीर में कांटे के समान चुभती रहेगी। यह मनुष्य की अंतिम तथा सबसे बड़ी शत्रु है।"(बुद्ध अथवा मार्क्स,निबंध से) 

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और फेसबुक

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों से मूर्ति औरउत्सव की इमेज वर्षा जिस तरह हो रही है, उसने श्रीकृष्ण को डिजिटल कृष्ण बना दिया है। डिजिटल होने का मतलब आभासी है। आभासी कृष्ण अंतत: जो संदेश देता है - जो डिजिटल है वह अनुपस्थित है। इस तरह की इमेज वर्षा अपील करती है ,जनता को एक्टिव करती है, लेकिन कृष्ण को ज़ीरो बनाती है। कृष्ण का ज़ीरो बन जाना भगवान की डिजिटल त्रासदी है।यह पूँजीवाद की परम विजय की अवस्था है।

श्री कृष्ण को गोपियों में जनप्रिय नायक क्यों बनाया गया ? गोपियों का नायक बनाकर सर्जक असल में किसे चुनौती देता है ?

कृष्ण के साथ गोपियों का संसार सामंतकाल में जुड़ता है। श्रीकृष्ण और गोपियों का प्रेम वस्तुत: सामंती बंदिशें और नियमों का निषेध है।

सवाल यह है इतने ताक़तवर आख्यान को रचने के बाद भी ब्रज के इलाक़े में सामंती मूल्य ध्वस्त क्यों नहीं हुए? आज भी जो जय हो जय हो कर रहे हैं वे सामंती मूल्यों के मोह में क्यों बँधे हैं? यह भक्ति का ग़ैर -यथार्थवादी रूप है।



श्रीकृष्ण कल्पना है ,कल्पना को सत्य बनाने में हमारा समाज महान है।फिर श्रीकृष्ण की कल्पना मनोहर,मनोरंजक और ज्ञान से भरी है।संभवतः खृष्म पहले ऐसे विचारक हैं जो गीता के जरिए विकसित समाज व्यवस्था की परिकल्पना पेश करते हैं।गीता जब लिखी गयी तो उसमें वर्गहीन,आदिम समाज व्यवस्था से आगे बढ़ी हुई नई चातुर्वण्य व्यवस्था की ओर ले जाने का सपना पेश किया गया।यानि आने वाला व्यवस्था के प्रति ऐतिहासिक आकांक्षा व्यक्त की गयी।यह वर्गहीन समाज से वर्गों वाले समाज के रूपान्तरण की दिशा में बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन था।

कृष्ण का चरित्र ग़ैर-परंपरागत है। ग़ैर- परंपरागत चरित्र और आचरण किस तरह सिस्टम में तनाव पैदा कर सकता है , आनंद, प्रेम और युद्ध का नायक बन सकता है यह सीखना चाहिए कृष्ण से।

श्रीकृष्ण पहले विचारकों में हैं जो संसार मिथ्या है ,इस धारणा का खंडन करते हैं,वे कहते है संसार विमुख होकर कोई पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता।निष्काम कर्मयोग उनकी ही देन है,जिसका कालांतर में शासकवर्गों ने जमकर उपयोग किया।लेकिन इस धारणा का प्रगतिशील ताकतों ने नए समाज के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया।

श्रीकृष्ण ऐसा चरित्र है जो भगवान के रूप में कम चरित्र रूप में ज़्यादा लोकप्रिय है।लोकप्रिय कहानियों के ज़रिए सबसे ज्यादा जनप्रिय है।



आरएसएस, बुद्धिजीवी और मीडिया का झूठ

        हाल ही में आरएसएस के लेखकों-बुद्धिजीवियों की एक बैठक संपन्न हुई ,जिसमें आरएसएस के नेताओं ने लेखकों-बुद्धिजीवियों को यह आदेश दिया कि वामपंथी लेखकों की तरह ज्यादा से ज्यादा लेखकों को प्रभावित करो,ऐसा साहित्य लिखो जिससे आम जनता हमारे करीब आए और युवा लेखक पैदा हों जो संघ की विचारधारा का प्रचार करें।

संघी नेता जानते हैं कि संघ की विचारधारा में लेखक-बुद्धिजीवी पैदा करने की क्षमता नहीं है।यह मूलतःबांझ विचारधारा है।संघ सत्ता पा सकता है,लेकिन लेखक तैयार नहीं कर सकता।लेखन के लिए स्वतंत्र दिमाग,स्वतंत्र विचार और लेखक के पास जोखिम उठाने की मनोदशा का होना बेहद जरूरी है।संघ के साथ जुड़कर कोई भी लेखक स्वाभाविक स्वतंत्र लेखन नहीं कर सकता।संघ में रहकर स्वतंत्र चिंतन-मनन,सवाल खड़े करना और रोज नए वैचारिक संघर्षों में शामिल होना संभव नहीं है।

हिन्दुत्व बंद प्रकृति की विचारधारा है,यह स्वतंत्रता के निषेध पर आधारित है।स्वतंत्रता के बिना बेहतरीन लेखन संभव नहीं है।अनेक वाम संगठनों में भी यह समस्या है कि वे लेखक के स्वतंत्र चिंतन से परेशान होते हैं,वे स चिंतन से जरूर परेशान होते हैं जो उनकी सांगठनिक विचारधारा के विरोध में हो।इसलिए वाम संगठनों के साथ भी लेखक का कभी-कभार पंगा हो जाता है।वाम संगठनों में तुलनात्मक तौर पर लेखक के पंगे कम होते हैं,क्योंकि वाम संगठन बड़े फलक में लेखक को सोचने और लिखने की स्वतंत्रता देते हैं।यही वजह है कि सांगठनिक विचारधारा और लेखकीय स्वातंत्र्य में जब अंतर्विरोध पैदा होता है तो वाम संगठन अपने लेखक को त्याग देते हैं।लेकिन आरएसएस जैसे संगठन की तो समस्या और भी गहरी है।वे तो हर चीज को हिन्दुत्व के नजरिए से देखते हैं।यह अपने-आपमें समस्यामूलक है।अच्छा वामपंथी उसे माना जाता है जो पार्टीलाइन से बंधा रहे।इसी तरह अच्छा संघी लेखक वह है जो संघी लाइन से बंधा रहे।यह सांगठनिक लाइन से बंधने का अर्थ है लेखन की मौत,स्वतंत्र लेखन का अंत।

इस समय हालात यह हैं कि आरएसएस के पक्ष में जो लोग लिख रहे हैं उनको सत्ता की ओर से व्यापक सम्मान-सत्कार मिल रहा है।इनाम-पद आदि भी मिल रहे हैं।इस समय जिस तरह के वैचारिक हमले हो रहे हैं उनके खिलाफ बुद्धिजीवियों –लेखकों और शिक्षकों की ओर से सबसे कम बोला जा रहा है। खासकर शिक्षकों में सन्नाटा पसरा हुआ है, वे पद और इनाम का लालच देकर लेखकों-शिक्षकों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज शिक्षकों में हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रति आकर्षण साफ दिखाई दे रहा है।अधिकांश शिक्षक उनके द्वारा उठाए मसलों के खिलाफ बोलने से कतरा रहे हैं।संघ के हिंसाचार के खिलाफ उनमें कहीं पर भी आक्रोश नजर नहीं आता,उलटे संघ के साथ जुड़ने का भाव साफ नजर आता है।

शिक्षकों- बुद्धिजीवियों में अपने-आसपास के मसलों पर चुप्पी बेहद चिंतित करने वाला फिनोमिना है।इसके विपरीत संघ के संगठन अ-वास्तिवक घटना को खबर बनाने में मशगूल रहते हैं या फिर गलत सूचनाएं प्रसारित करते रहते हैं। इनका टीवी से लगातार प्रसारण हो रहा है।शिक्षक-लेखक टीवी द्वारा प्रक्षेपित सूचनाओं से अभिभूत हैं और उनको सही मानकर चल रहे हैं।यह भी कह सकते हैं जनता की बुद्धि को अपहृत करने लिए टीवी का संघ दुरूपयोग कर रहा है। बुद्धिजीवियों और शिक्षकों का अपने आसपास के घटनाक्रम पर चुप रहना अंततःआरएसएस को वैचारिक मदद कर रहा है।

संघ नियंत्रित मीडिया जिस तरह का डिस-इनफॉर्मेशन प्रचार चला रहा है वह अपने आपमें गंभीर चिंता का विषय है।इस प्रचार का चौतरफा असर देखने को मिल रहा है।यह प्रचार अभियान पंक्चर हो सकता है बशर्ते बुद्धिजीवी -शिक्षक अपने आसपास घटने वाली घटनाओं पर बोलें,लिखें।इस दौरान संघ ने जो मसले उठाएं हैं वे बेहद गंभीर हैं।

आरएसएस की नई रणनीति है ´अघटित घटना´को खबर बनाओ। उसके बाद गलत- सलत सूचनाएं मीडिया में प्रसारित करो।गोरक्षकों के हमले और गोमांस के बहाने अखलाक की हत्या और उसके प्रसंग में चलाया गया समूचा हंगामा,मीडिया मुहिम इसका ताजा उदाहरण है।इस सबका परिणाम यह निकला है कि मीडिया में घटना से संबंधित सत्य एकसिरे से गायब हो गया है।इसी तरह संघ के लोग मीडिया में इतिहास के नाम पर मनमानी बातें कह रहे हैं,मनगढ़ंत बातें बोल रहे हैं,कपोल कल्पित इतिहास पेश कर रहे हैं। इन सबको कायदे से मीडिया को सेंसर करना चाहिए,यह मीडिया आचार संहिता का खुला उल्लंघन है।लेकिन मीडिया उनको सेंसर नहीं कर रहा बल्कि अबाध रूप में प्रसारित कर रहा है, इस तरह के काल्पनिक इतिहास के खिलाफ शिक्षकों का हस्तक्षेप बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन मीडिया से लेकर शिक्षा संस्थानों तक संघ के विचारों के खिलाफ प्रतिवाद नजर ही नहीं आ रहा।संघ ने बड़ी खूबी के साथ समूचे विवाद को धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मुहिम की आड़ में छिपा दिया है। सत्य बताने के नाम पर आरएसएस ऐसी चीजों का प्रचार कर रहा है जो कभी घटित ही नहीं हुई हैं।इसने खबरों की प्रामणिकता को खत्म कर दिया है,हर चीज को लेकर भावुकताभरे हमले किए जा रहे हैं।जो संघ के विचारों का विरोध करता है उसे देशद्रोही कहा जा रहा है।असहमत होना राष्ट्रद्रोह की केटेगरी में शामिल कर दिया गया है।इसने बुद्धिजीवियों और शिक्षकों के मन में डर पैदा कर दिया है।इस डर से निकलने की जरूरतहै।टीवी एंकरों से लेकर प्रवक्ताओं तक झूठ को दोहराया जा रहा है,इन सबके खिलाफ रीयल टाइम में हस्तक्षेप करने की जरूरत है।



गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाड़ा - अंधविश्वास और मार्क्सवाद

              अंधविश्वास सामाजिक कैंसर है। अंधविश्वास ने सत्ता और संपत्ति के हितों को सामाजिक स्वीकृति दिलाने में अग्रणी भूमिका अदा की है। आधुनिक विमर्श का माहौल बनाने के लिए अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता बेहद जरूरी है। आमतौर पर साधारण जनता के जीवन में अंधविश्वास घुले-मिले होते हैं।

अंधविश्वासों को संस्कार और एटीटयूट्स का रूप देने में सत्ता और सत्ताधारी वर्गों को सैकड़ों वर्ष लगे हैं। अंधविश्वासों की शुरुआत कब से हुई इसका आरंभ वर्ष तय करना मुश्किल है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सामाजिक विकास के क्रम में जब राजसत्ता का निर्माण कार्य शुरू हुआ था उस समय साधारण लोग किसी से डरते नहीं थे। किसी भी किस्म का अनुशासन मानने के लिए तैयार नहीं थे, राजा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते थे। सत्ता के दंड का भय नहीं था। यही वह ऐतिहासिक संदर्भ है जब अंधविश्वासों की सृष्टि की गई।

आरंभिक दौर में अंधविश्वासों को संस्कार और जीवन मूल्य से स्वतंत्र रूप में रखकर देखा जाता था। कालांतर में अंधविश्वासों ने सामाजिक जीवन में अपनी जड़ें इस कदर मजबूत कर लीं कि अंधविश्वासों को हम सच मानने लगे।

अंधविश्वास का दायरा बहुत बड़ा है। इसके दायरे में सामाजिक मान्यताएं, सामाजिक आचार-व्यवहार से लेकर कला, ललित कला, साहित्य, राजनीति, व्यापार तक आता है। इसके कारण सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बाधित हुई है।

भारत में विगत दो हजार वर्षों में किसी भी किस्म की सामाजिक क्रांति नहीं हुई। हम लोगों ने कभी भी इस सवाल पर सोचा नहीं कि हमारे समाज में विगत दो हजार वर्षों में सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? तमाम किस्म की कुर्बानियों के बावजूद आधुनिक भारत में कोई सामाजिक क्रांति क्यों नहीं हुई? यदि गंभीरता से भारतीय समाज पर नजर डालें तो पाएंगे कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के जिन कारणों की ओर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ध्यान खींचा था उनकी तरह हमारे समाज ने पूरी तरह ध्यान नहीं दिया।

हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना था कि भारत में सामाजिक क्रांति न होने के तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, अंधविश्वास, दूसरा, पुनर्जन्म की धारणा और तीसरा कर्मफल का सिध्दांत। हमारी समूची चेतना इन तीन सिद्धांतों से परिचालित रही है। अंधविश्वास के कारण ही रूढ़ियों ने जन्म लिया। साहित्य एवं कलारूपों में रूढ़ियां और सामाजिक जीवन में रूढ़ियां अंधविश्वास की ही देन हैं।
आधुनिककाल आने के बाद साहित्य से रूढ़ियों का खात्मा हुआ बल्कि सामाजिक जीवन में रूढ़ियां बनी रहीं , अंधविश्वासों के खिलाफ सामाजिक संघर्ष लड़ा नहीं गया। वहीं दूसरी ओर, पूंजीवाद ने बड़े कौशल के साथ अंधविश्वास को अपनी मासकल्चर, विज्ञापन रणनीति और मार्केटिंग का अंग बनाकर नई शक्ल दे दी।

आज बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने बाजार के विकास के लिए जिन दो तत्वों का प्रचार रणनीति में सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं वह है धार्मिक संप्रेषण की पध्दति और दूसरा है अंधविश्वास। इन दो के जरिए जहां एक ओर उपभोक्तावाद का तेजी से विकास हो रहा है वहीं दूसरी ओर अंधविश्वासों के प्रति भी आस्था बढ़ रही है।

जो लोग सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं उन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की धार्मिक संप्रेषण की रणनीति और अंधविश्वास की जुगलबंदी को तोड़ना होगा। उन तमाम क्षेत्रों में हमले तेज करने होंगे जिनसे इन दो तत्वों को संजीवनी मिलती है। इसके अलावा पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत के प्रति आम जनता में आलोचनात्मक रवैय्या पैदा करना होगा। आज अंधविश्वास संस्कृति उद्योग का अनिवार्य तत्व बन गया है। संभवत: कुछ लोगों को यह बात समझ में न आए और कुछ लोगों की भावनाएं भी आहत हों। किंतु इस डर से अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता पैदा करने के काम को छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रश्न उठता है अंधविश्वास क्या है? इसे किन तत्वों से मदद मिलती है? इसका सामाजिक आधार कौन सा है? इससे किस तरह का समाज निर्मित होता है? किस तरह के कला रूप जन्म लेते हैं? और इसका विकल्प क्या है? ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो पाएंगे कि अंधविश्वास की धारणा का बुनियादी सारतत्व एक जैसा रहा है। मिस्र, यूनान और भारत में अंधविश्वासों की शुरुआत तकरीबन एक ही तरह हुई।

अंधविश्वास की बुनियादी विशेषता है अंधानुकरण, वैज्ञानिक विवेक का त्याग और स्वतंत्र चिंतन का विरोध। सामाजिक जीवन में इसका लक्ष्य था आम लोगों को अपने श्रेष्ठजनों के किसी भी आदेश के पालन का अभ्यस्त बनाया जाए। दूसरा , वे उन्हीं पर भरोसा करना सीखें जो हर मामले में समान भाव से धार्मिक विधि-विधानों का पालन करते हों। कलाओं की दुनिया में इसने नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीतों की सृष्टि की। नयनाभिराम चित्रों और मधुर गीत-संगीत को मंदिरों में मानदंड के रूप में स्थापित किया गया। कला के क्षेत्र में किसी को यह इजाजत नहीं थी कि उनमें परिवर्तन करे। इसके कारण कलाओं के रूप सैकड़ों वर्षों तक अपरिवर्तित रहे। किसी ने यह साहस नहीं दिखाया कि कलाओं और मधुर गीतों में परिवर्तन करे। ये कलारूप सैकड़ों वर्षों से एक जैसे हैं। मिस्र के कलारूप इस अंधानुकरण के आदर्श उदाहरण हैं। विगत दस हजार साल से उनकी शैली में किसी तरह का परिवर्तन नहीं हुआ है। इस दौरान वे न तो बेहतर बन पाए और न बदतर ही बन पाए।
इसी तरह अंधविश्वास को जनप्रिय बनाने में झूठ खासकर इष्टकर झूठ की बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक ऐसा झूठ, उदात्त झूठ जिसके सहारे संपूर्ण समुदाय को, संभव हो सके तो शासकों को भी स्वीकार करने के लिए राजी किया जा सके।

इस तरह के झूठ के आदर्श उदाहरण हैं हमारे रीति-रिवाज और संस्कार जिनकी प्रशंसा करते हुए हमारे शास्त्र थकते नहीं हैं। रीति-रिवाज और संस्कारों की प्रशंसा के क्रम में सबसे ज्यादा हमला स्वतंत्र चिंतन पर किया गया, उन लोगों पर हमले किए गए जो स्वतंत्र चिंतन के हिमायती थे। जो प्रत्येक बात पर शंका करते थे। प्रश्न करते थे।
आज हम रोम की महानता के गुण गाते हैं किंतु यह भूल जाते हैं कि रोम की महानता का आधार अंधविश्वास था। रोम की महानता के बारे में पोलिबियस ने लिखा कि मैं साहसपूर्वक यह बात कहूंगा कि संसार के शेष लोग जिस चीज का उपहास करते हैं, वह रोम की महानता का आधार है और उस चीज का नाम अंधविश्वास है। इस तत्व का उसके निजी और सार्वजनिक जीवन के सभी अंगों में समावेश कराया गया है और इसने ऐसी खूबी से उनकी कल्पनाशक्ति को आक्रांत कर लिया है कि उस खूबी को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। संभवत: बहुत से लोग इसकी विशेषता समझ नहीं पाएंगे, लेकिन मेरा मत है कि ऐसा लोगों को प्रभावित करने के लिए किया गया है। यदि किसी ऐसे राज्य की संभावना होती, जिसके सभी नागरिक तत्वज्ञ होते तो इस तरह की चीज से हम बचे रह सकते थे। लेकिन सभी राज्यों में जनता अस्थिर है, निरंकुश भावनाओं, अकारण क्रोध और हिंसक आवेगों से ग्रस्त है। इसलिए केवल यही किया जा सकता है कि जनता को अदृश्य के भय से, और इसी किस्म के पाखंडों से काबू में रखा जाए। यह अकारण नहीं, बल्कि सुविचारित चाल थी कि पुराने जमाने के लोगों ने जनता के दिमाग में देवताओं और मृत्यु के बाद के जीवन की बातें बैठाईं। हमारी मूर्खता और विवेकहीनता यह है कि हम इस प्रकार की भ्रांतियों को दूर करना चाहते हैं।
इसके अलावा जिस विधा का निर्माण किया गया वह है चमत्कारवर्णन और दंतकथा। चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं ने अंधविश्वासों को आम जनता के जीवन में उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। किसी भी दर्शनवेत्ता और धर्मशास्त्री के उपदेशों के द्वारा पुरुषों और औरतों के समूहों को श्रध्दा, भक्ति और विश्वास की ओर नहीं मोड़ा जा सकता था। इनको प्रभावित करने के लिए अंधविश्वास का लाभ उठाना पड़ता था। यह कार्य चमत्कारवर्णन और दंतकथाओं के बिना संभव नहीं था। कालांतर में इसने नागरिक जीवन की प्राचीन व्यवस्था और साथ ही, वास्तविक सृष्टि संबंधी स्थापनाओं में मिथकशास्त्र के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया।
कौटिल्य का अंधविश्वास में विश्वास नहीं था किंतु उन्होंने राज्य के कौशल के तौर पर अर्थशास्त्र में अंधविश्वास की चर्चा की है। उनका न तो राजा के दैवी अधिकार और उसकी सर्वज्ञता की सच्चाई में विश्वास था और न वे यह चाहते थे कि स्वयं शासक इस तरह की वाहियात बात को सच मानें। वे सुझाव देते हैं कि राज्य को अपनी आंतरिक और बाह्य स्थितियों को सुदृढ़ करने के लिए सामान्य लोगों की अंधमान्यताओं का लाभ उठाना चाहिए।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में अनेक ऐसे सुझाव देते हैं जो अंधविश्वासों पर आधारित हैं। संयोग से जिन उपायों को सुझाया गया है वे थोड़े फेरबदल के साथ अब भी लागू किए जाते हैं। कौटिल्य ने कुछ ऐसे साधनों को अपनाने की सलाह दी जो बहुत ही भद्दे थे और जिनका दोहरा उद्देश्य था। वे न केवल जनता के बीच अंधविश्वासमूलक भय उत्पन्न करते थे, बल्कि अंधविश्वास के विरोध में यथार्थ और ठोस कदम उठाने वाले प्रचारकों का शारीरिक रूप से सफाया करने की ओर भी लक्षित थे।

अंधविश्वास के साथ-साथ पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति की धारणा का भी व्यापक पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। इसका साहित्य पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार साहित्य में काव्य-रूढ़ियों का चलन शुरू हुआ।

यह मान लिया गया कि जो कुछ हो रहा है उसका उचित कारण है ज़िस कार्य में असामंजस्य है, वह अवश्य भविष्य में करने वाले को दंड देने का साधन बनेगा। इस विचार ने भारतीय साहित्य में सामंजस्यवादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा की है। समाज की विषमताओं और अनमेल परिस्थितियों को कभी विद्रोही दृष्टि से नहीं देखा गया।

यह मान लिया गया नाटक दुखांत नहीं होना चाहिए। असंतोष और विद्रोह के अभाव में कवि की बुध्दि अधिकाधिक सूक्तियों और चमत्कारों में उलझती गई। साहित्य में सिर्फ रस और रस में भी सिर्फ श्रृंगार रस की रचनाओं का बाहुल्य इस मार्ग के अनुसरण का स्वाभाविक परिणाम था।
उल्लेखनीय है रस की अवधारणा की उत्पत्ति का समय तकरीबन वही है जब अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल की प्राप्ति के सिध्दांत का जन्म हुआ। रसों में हमारे प्राचीन लेखकों ने सिर्फ श्रृंगार रस पर ही मुख्यत: जोर दिया और अन्य रसों की उपेक्षा की।

तात्पर्य यह है कि अंधविश्वास के साथ आनंदमूलक मनोरंजन, कामुकता, स्त्री के सौंदर्यमूलक हाव-भावों का गहरा संबंध है। यह संबंध मध्यकाल से विकसित हुआ और आधुनिक काल तक चला आया है। अंधविश्वास के समूचे कार्य-व्यापार को यदि इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पाएंगे कि समाज में कलाओं में नकल की प्रवृत्ति वस्तुत: अंधविश्वास के प्रति सहिष्णु भाव पैदा करती है।
नकल की प्रवृत्ति को पूंजीवाद का प्रधान गुण माना जाता है। इस अर्थ में पूंजीवाद अपने विकास के साथ-साथ सामंती और पूर्व सामंती कला रूपों और मूल्यबोध को बरकरार रखता है।कलाओं में अंधानुकरण आधुनिक काल में नकल में रूपांतरित कर लेता है। इससे जहां कभी न खत्म होने वाले मनोरंजन की सृष्टि करने में मदद मिलती है वहीं दूसरी ओर अंधानुकरण के एटीटयूट्स, रवैए और संस्कार का विकास होता है। कलाओं से यथार्थ गायब हो जाता है। उसकी जगह काल्पनिक यथार्थ या आभासी यथार्थ ले लेता है।

इसी तरह अंधविश्वास या नकल की संस्कृति का परजीवीपन और पेटूपन की संस्कृति से गहरा संबंध है। इसका स्वतंत्राता के विचार से विरोध है, यह उन तमाम विचारों को अस्वीकार करती है जो नकल या अंधानुकरण के विरोधी हैं।

पूंजीवाद अपनी सामान्य प्रकृति के अनुसार अंधविश्वासों को भी वस्तु के रूप में बदल देता है, उन्हें संस्थागत रूप दे देता है। अंधविश्वासों को कामुकता एवं रोमांस के साथ प्रस्तुत करता है और यह कार्य फिल्म, टी.वी. और वीडियो फिल्मों के संगठित औद्योगिक माल के उत्पादन के रूप में करता है।

कामुकता, पोर्नोग्राफी, अतिलयात्मक गीत और संगीत तथा नकल के आधार पर निर्मित कलाएं जितनी ज्यादा बनेंगी उतना ही ज्यादा अंधविश्वास भी बढ़ेगा। उतनी ही ज्यादा सामाजिक असुरक्षा, भेदभाव और तनाव की सृष्टि होगी। इसका प्रधान कारण यह है कि आज अंधविश्वास को मासकल्चर ने अपना सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया है।

अंधविश्वास की रणनीति और धार्मिक संप्रेषण की शैलियों को अपनाकर विज्ञापन, फिल्म और टी.वी. उद्योग तेजी से अपना विकास कर रहा है। पहले अंधविश्वास के माध्यम से राज्य अपने लिए जहां एक ओर धन जुटाता था वहीं दूसरी ओर जनता के दिलो-दिमाग पर शासन करता था। आज भी इस स्थिति में बुनियादी फर्क नहीं आया है। सिर्फ तरीका बदला है और इस कार्य में परंपरागत अंधविश्वास प्रचारकों के अलावा जो नया तत्व आकर जुड़ा वह है पूंजीपति वर्ग, बाजार और संस्कृति उद्योग।

अब अंधानुकरण की प्रवृत्ति का बाजार की शक्तियां खुलकर अपने मुनाफों के विस्तार के लिए इस्तेमाल कर रही हैं। अंधानुकरण के लिए जरूरी है कि स्टीरियोटाइप प्रस्तुतियों पर जोर दिया जाए। इनमें खर्च कम और मुनाफा ज्यादा होता है और प्रस्तुतियां जल्दी ही समझ में आ जाती हैं। इस तरह की प्रस्तुतियां यथार्थ के निषेध और स्वतंत्र सृजन या मौलिक सृजन के निषेध को व्यक्त करती हैं।

वे ऐसे उन्माद, आनंद और मनोरंजन की सृष्टि करती हैं जो प्रभेदों का सृजन करता है। ध्यान रहे, प्रभेद वहीं पैदा होते हैं जहां भय हो, अंधविश्वास हो या जहां एक-दूसरे को धोखा देकर हराने का प्रयत्न किया जाता है। वहां परस्पर व्यवहार में सहज भाव नहीं होता।

अंधविश्वास मूलत: ऐसी स्वाधीनता की हिमायत करते हैं जो मनुष्य को पीड़ित करती है। यह संबंधहीन स्वाधीनता है। यह बुनियादी तौर पर नकारात्मक स्वाधीनता है। अंधविश्वास तरह-तरह के धार्मिक उपकरणों को जमा करने और धार्मिक उपकरणों के माध्यम से अंधविश्वासों से राहत पाने का रास्ता सुझाते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में, 'मानव जीवन में जहां अभाव है वहीं उपकरण जमा होते हैं। ... इस अभाव और उपकरण के पक्ष मेंर् ईष्या है, द्वेष है, वहां दीवार है, पहरेदार है, वहां व्यक्ति अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है और दूसरों पर आघात करना चाहता है।'

अंधविश्वास, पुनर्जन्म और कर्मफल के सिध्दांत से मुक्ति पाने के लिए जरूरी है कि तर्क और विमर्श के पुराने पैराडाइम को बदलें। पुराने पैराडाइम से जुड़े होने के कारण हम प्रभावी ढंग से अंधविश्वास का विरोध नहीं कर पा रहे हैं। तर्क के पैराडाइम को बदलते ही हम विकल्प की दिशा में बढ़ जाएंगे। पैराडाइम को बदलते ही विचारों में मूलगामी परिवर्तन आने लगेगा।

आम तौर पर हमारे बहुत से बुध्दिजीवी पुराने पैराडाइम को बनाए रखकर तर्कों में परिवर्तन कर लेते हैं। ध्यान रहे, अंधविश्वास को तर्क और विवेक से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। जब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर नया पैराडाइम निर्मित नहीं किया जाता तब तक अंधविश्वास को अपदस्थ करना मुश्किल है।

अंधविश्वास का जबाव तर्क नहीं विज्ञान है। जो लोक तर्क में विश्वास करते हैं वे पैराडाइम बदलते ही असली शक्ल में सामने आ जाते हैं। ध्यान रहे, जब पैराडाइम बदलते हैं तो उसके साथ ही, सारी दुनिया भी बदल जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि पैराडाइम बदलते ही हमारा विश्व दृष्टिकोण बदल जाता है, नए का जन्म होता है, वैज्ञानिक चेतना के विकास की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। यही वह बिंदु है जिस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

अंधविश्वास का जबाव तर्क से देंगे तो अंतत: पराजय हाथ लगेगी यदि पैराडाइम बदलकर विज्ञानसम्मत चेतना से इसका जबाव देंगे तो अंधविश्वास को अपदस्थ कर पाएंगे। हमारे रैनेसां के चिंतकों ने अंधविश्वास का प्रत्युत्तर तर्क से देने की चेष्टा की और इसका अंतत: परिणाम यह निकला कि हम आज अंधविश्वास से संघर्ष में बहुत पीछे चले गए हैं। तर्क को आज अंधविश्वास ने आत्मसात कर लिया है। अंधविश्वास का तर्क से बैर नहीं है उसकी लड़ाई तो विज्ञानसम्मत चेतना के साथ है।

अंधविश्वास के कारण बौध्दिक अधकचरापन पैदा होता है। इन दिनों विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के बजाय मिथकीय चेतना पर जोर दिया जा रहा है। आज विज्ञान को सत्य की खोज के काम से हटाकर व्यावहारिक उपयोग, उद्योग और युध्द के साजो-सामान के निर्माण में लगा दिया गया है। यहां तक कि धर्म और विज्ञान में सहसंबंध स्थापित करने की कोशिशें चल रही हैं। अब विज्ञान को पूंजीवाद ने महज एक चिंतन का रूप या शुध्द विज्ञान बना दिया है या उपयोगी रूप तक सीमित कर दिया है।

एक जमाना था विज्ञान पर विश्वास था। किंतु एक अर्से के बाद विज्ञान के प्रति संशय का भाव पैदा हुआ। शुरू में विज्ञान के प्रति प्रशंसाभाव था। बाद में मोहभंग हुआ और विज्ञान के प्रति संशय भाव पैदा हुआ। आज पूंजीवादी वैज्ञानिक निराश और हताश हैं कि क्या करें? वे पीछे मुड़ नहीं सकते। आगे किस तरह बढ़ना है? बढ़ गए तो कहां पहुचेंगे? आज विज्ञान के पूंजीवादी पक्षधर परेशान हैं कि विज्ञान के इतने विराट जुलूस को कहां ले जाएं? इसके कारण विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है।

आम लोगों से लेकर बुध्दिजीवियों तक संशयवाद बढ़ा है। इसके कारण पुन: एकसिरे से अंधविश्वास और आध्यात्मिकता की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग मानव स्वभाव की उन्नतिशीलता को लेकर कुछ भी होता न देखकर हताशा में डूबे जा रहे हैं और विज्ञान को तिलांजलि दे रहे हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पहले से ही यह मानकर चल रहे हैं कि विज्ञान की सामाजिक परिणतियों पर कोई भी विचार-विमर्श हानिकर होने को बाध्य है।

कुछ ऐसे लोग भी हैं जो विज्ञान के व्यावहारिक उपयोग के अलावा और किसी भूमिका पर सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ लोगों के लिए विज्ञान का विनाश के अलावा और किसी काम में उपयोग संभव नहीं है। कुछ के लिए यह संपत्तिा और मुनाफों के अंबार खड़ा कर देने का साधन मात्रा है। यह सही है कि पूंजीवाद समाजों में विज्ञान का सही उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। यह भी सच है कि वैज्ञानिक वेतनभोगी कर्मचारी होकर रह गए हैं।

आज वैज्ञानिक या तो किसी विश्वविद्यालय में काम करता है या किसी उद्योग या संस्था में काम करता है। निजी साधनों से वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक अब दुर्लभ हो गए हैं। जाहिरा तौर पर वैज्ञानिक जहां काम करता है वहां के हितों की उसे सबसे पहले पूर्ति करनी होगी। यही ्रूबदु है जहां पर हमें विज्ञान की सामाजिक भूमिका पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि विज्ञान बंदी है और वैज्ञानिक खरीदा जा चुका है तब अंधविश्वास के खिलाफ विज्ञान और विज्ञानसम्मत चेतना की भूमिका शून्य के बराबर होगी।

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र


           बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर का प्रसिद्ध निबंध है ´बुद्ध और कार्ल मार्क्स´,इसमें आम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों के बहाने धर्म की 25 सूत्रों में व्याख्या पेश की है। ये सूत्र अब तक विचार विमर्श के केन्द्र में नहीं आए हैं,इन सूत्रों पर वाद-विवाद-संवाद होना चाहिए।

ये 25 सूत्र हैं-´´1. मुक्त समाज के लिए धर्म आवश्यक है।2. प्रत्येक धर्म अंगीकार करने योग्य नहीं होता।3. धर्म का संबंध जीवन के तथ्यों व वास्तविकताओं से होना चाहिए, ईश्वर या परमात्मा या स्वर्ग या पृथ्वी के संबंध में सिद्धांतों तथा अनुमान मात्र निराधार कल्पना से नहीं होना चाहिए।4. ईश्वर को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।5. आत्मा की मुक्ति या मोक्ष को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।6. पशुबलि को धर्म का केंद्र बनाना अनुचित है।7. वास्तविक धर्म का वास मनुष्य के हृदय में होता है, शास्त्रों में नहीं।8. धर्म के केंद्र मनुष्य तथा नैतिकता होने चाहिए। यदि नहीं, तो धर्म एक क्रूर अंधविश्वास है।9. नैतिकता के लिए जीवन का आदर्श होना ही पर्याप्त नहीं है। चूंकि ईश्वर नहीं है, अतः इसे जीवन का नियम या कानून होना चाहिए।10. धर्म का कार्य विश्व का पुनर्निर्माण करना तथा उसे प्रसन्न रखना है, उसकी उत्पत्ति या उसके अंत की व्याख्या करना नहीं।11. कि संसार में दुःख स्वार्थों के टकराव के कारण होता है और इसके समाधान का एकमात्र तरीका अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना है।12. कि संपत्ति के निजी स्वामित्व से अधिकार व शक्ति एक वर्ग के हाथ में आ जाती है और दूसरे वर्ग को दुःख मिलता है।13. कि समाज के हित के लिए यह आवश्यक है कि इस दुःख का निदान इसके कारण का निरोध करके किया जाए।14. सभी मानव प्राणी समान हैं।15. मनुष्य का मापदंड उसका गुण होता है, जन्म नहीं।16. जो चीज महत्त्वपूर्ण है, वह है उच्च आदर्श, न कि उच्च कुल में जन्म।17. सबके प्रति मैत्री का साहचर्य व भाईचारे का कभी भी परित्याग नहीं करना चाहिए।18. प्रत्येक व्यक्ति को विद्या प्राप्त करने का अधिकार है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए ज्ञान विद्या की उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भोजन की।19. अच्छा आचारणविहीन ज्ञान खतरनाक होता है।20. कोई भी चीज भ्रमातीत व अचूक नहीं होती। कोई भी चीज सर्वदा बाध्यकारी नहीं होती। प्रत्येक वस्तु छानबीन तथा परीक्षा के अध्यधीन होती है।21. कोई वस्तु सुनिश्चित तथा अंतिम नहीं होती।22. प्रत्येक वस्तु कारण-कार्य संबंध के नियम के अधीन होती है।23. कोई भी वस्तु स्थाई या सनातन नहीं है। प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील होती है। सदैव वस्तुओं में होने का क्रम चलता रहता है।24. युद्ध यदि सत्य तथा न्याय के लिए न हो, तो वह अनुचित है।25. पराजित के प्रति विजेता के कर्तव्य होते हैं।´´

यानी हर धर्म स्वीकार करने योग्य नहीं होता।धर्म को चुनते समय क्या देखें यह आम्बेडकर ने उपरोक्त 25 सूत्रों में रेखांकित किया है।धर्म कोई बनी-बनायी व्यवस्था नहीं है,बल्कि उसे हर बार नए सिरे से अर्जित करना पड़ता है।धर्म को अर्जित करने के लिए धार्मिक होने की जरूरत नहीं है,बल्कि धर्म को देखने का वैज्ञानिक नजरिया अर्जित करने की जरूरत है। आम्बेडकर ने धर्म के जिन 25सूत्रों का जिक्र किया है उनमें धर्म को शाश्वत न मानने वाली बात बेहद रोचक है।धर्म के जितने भी रूप प्रचलन में हैं वे धर्म को शाश्वत मानकर चलते हैं।जबकि धर्म शाश्वत नहीं बल्कि परिवर्तनशील है।धर्म को परिवर्तनशील मानना अपने आपमें भौतिक जगत की सत्ता को महत्व देना है। धर्म का प्रमुख काम है मनुष्य को प्रसन्न रखना और स्वतंत्र रखना।जो धर्म यह काम करे वह स्वीकार्य है जो यह काम न करे वह अस्वीकार्य है। इन दिनों धर्म के नाम पर प्रतिस्पर्धा और घृणा का जमकर प्रचार हो रहा है।आम्बेडकर ने धर्म की इस भूमिका का निषेध किया है और रेखांकित किया है धर्म का मुख्य कार्य है मैत्री स्थापित करना।

धर्म पूजा या उपासना की चीज नहीं है बल्कि आचरण की चीज है।जो लोग धर्म को पूजा-उपासना की चीज मानते हैं उनके जीवन में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती,वे धर्म को प्रचार प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।धर्म , प्रचार की नहीं ,आचरण की चीज है।धर्म आचरण में मिलता है।आचरण में ढालने का अर्थ है कि धर्म का कायाकल्प करना।



यह सवाल भी उठा है धर्म के केन्द्र में कौन है ॽ इन दिनों धर्म के केन्द्र में उपदेश हैं,राजनीति है,हिंसा है,अंधविश्वास हैं, मुनाफेखोरी है,संपत्ति संचय करने की प्रवृत्ति है,इन सभी चीजों का धर्म से कोई संबंध नहीं है। धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रहना चाहिए।मनुष्य को केन्द्र में रखे बिना धर्म बेहद खतरनाक भूमिका अदा करता है।धर्म के बर्बर होने के चांस बढ़ जाते हैं।धर्मनिरपेक्षता की भी यही मांग है कि धर्म के केन्द्र में मनुष्य को रखा जाय।धर्म को मानवीय रूप दिया जाय। धर्म का ईश्वर या उपासना से कोई संबंध नहीं है।धर्म का मूलाधार तो मनुष्य है,लेकिन अधिकांश लोग धर्म का आधार ईश्वर को मानते हैं।ईश्वर दासता की मनोदशा में बांधता है, जबकि मनुष्य दासता की मनोदशा से मुक्त करता है।धर्म को मानो लेकिन मनुष्य को उसके केन्द्र में प्रतिष्ठित करो।ईश्वर को केन्द्र से अपदस्थ करो।धर्म के केन्द्र में ईश्वर का होना बंधन है।मानसिक गुलामी है।जबकि मनुष्य को धर्म के केन्द्र में रखेंगे तो धर्म की भूमिका और चरित्र बदल जाएगा,धर्म मुक्ति और स्वतंत्रता का रूप ग्रहण कर लेगा।

बुधवार, 24 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- नव्य उदार यथार्थ और मार्क्सवादी असफलताएं


             
मार्क्सवादी आलोचक फ्रेडरिक जेम्सन ने मौजूदा दौर के संदर्भ में मार्क्सवाद की पांच थीसिस प्रतिपादित की हैं। इनमें दूसरी थीसिस में उन्होंने उन खतरों की ओर ध्यान खींचा है जो मार्क्सवाद के लिए आ सकते हैं या आए हैं और जिनसे मार्क्सवादी आंदोलन को धक्का लगा है। उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के आने के साथ मार्क्सवादी चिंतन को नव्य उदार आर्थिक नीतियों और उसके गर्भ से पैदा हुए बाजार ने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया है।नव्य उदारतावाद के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष में मार्क्सवादी आम लोगों का दिल जीतने ,उन्हें इसके परिणामों के बारे में समझाने में असमर्थ रहे। इस समस्या के दो स्तर थे, पहला स्तर स्वयं मार्क्सवादियों के लिए था वे खुद समझ ही नहीं पाए कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों का क्या परिणाम निकलेगा। उनका इन नीतियों के प्रति तदर्थ रवैय्या था। जब वे स्वयं दुविधाग्रस्त थे तो वे अन्य को कैसे समझाते ? इससे संकट और भी गहरा हो गया।
दूसरी समस्या यह आयी कि नव्य उदार परिवर्तनों के गर्भ से जो परिवर्तन पैदा हुए उनसे मार्क्सवादी लाभ नहीं उठा पाए। वे उस यथार्थ को पकड़ ही नहीं पाए जो नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से जन्मा है। उन्हें यह सामान्य सी बात समझ में नहीं आई कि कम्यूटर आज के मनुष्य की अपरिहार्य जरूरत है। भारत में लंबे समय तक अनेक मार्क्सवादी कम्प्यूटरीकरण के पक्ष में नहीं थे। लंबे अर्से के बाद उन्होंने हथियार डाले। इस चक्कर में मजदूरवर्ग को उन्होंने पिछड़ी कठमुल्ला चेतना के हवाले कर दिया। पश्चिम बंगाल और केरल कम्प्यूटर क्रांति में पिछड गए और बाकी देश आगे निकल गया। समूचा सोवियत संघ और पुराना समाजवादी देशों का समूह इस परिवर्तन को नहीं समझने के कारण तबाह हो गया। सोचिए 18 साल तक सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी ने पार्टी कॉमरेड वैज्ञानिकों को काफ्रेंस में कम्प्यूटर की उपयोगिता पर बहस करने की अनुमति नहीं दी।
उत्तर आधुनिकतावाद के संदर्भ में मार्क्सवादियों की सफलताएं कम हैं असफलताएं ज्यादा हैं। सबसे बड़ी असफलता है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के गर्भ से पैदा हुई असुरक्षा, अव्यवस्था,विस्थापन और भय को संगठनबद्ध न कर पाना। नव्य उदार दौर में मजदूरवर्ग के क्षय को वे रोक नहीं पाए और असंगठित मजदूरवर्ग की तबाही को अपने संगठनों के जरिए एकजुट नहीं कर पाए। आज महानगरों में लाखों असंगठित मजदूर हैं जो किसी भी वाम संगठन में संगठित नहीं हैं।
मजदूरवर्ग के अंदर नव्य उदारतावाद ने जो भय पैदा किया उसे भी प्रभावशाली ढ़ंग से मार्क्सवादी लिपिबद्ध नहीं कर पाए। इसका व्यापक दुष्परिणाम निकला है,मजदूरों की आवाज सामान्य वातावरण से गायब हो गयी है। दूसरी ओर नव्य उदारपंथी एजेण्डा वाम संगठनों में आ घुसा है। वे इससे बचने की युक्ति वे नहीं जानते।
इसी प्रसंग में फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा, तर्कमूलक संघर्ष (जैसा कि यह सीधी वैचारिक लड़ाई के विरुध्द है) अपने विकल्पों की साख समाप्त करके और थीमैटिक प्रसंगों की एक पूरी श्रृंखला को अनुल्लेखनीय घोषित करके सफलता हासिल करता है। यह राष्ट्रीकरण, विनियमन, घाटा व्यय, कीन्सवाद, नियोजन, राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा, सुरक्षा नेट, तथा अंतत: स्वयं कल्याणकारी राज्य जैसी पूर्ववर्ती गंभीर संभावनाओं को निर्णायक रूप में अवैध घोषित करने के लिए क्षुद्रीकरण, निष्कपटता, भौतिकस्वार्थ, 'अनुभव', राजनीतिक भय ऐतिहासिक सबक को 'आधार' मानने का आग्रह करता है। कल्याणकारी राज्य को समाजवाद बताना बाजारवाद का उदारवादियों (अमरीकी प्रयोग में जैसा कि 'न्यू डील लिबरल्स' में किया गया है) तथा वामपंथियों दोनों पर दोहरी जीत दिलाता है। इस प्रकार आज वामपंथ ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे बड़ी सरकारों या कल्याणकारी राज्यों का समर्थन करना पड़ रहा है। सामाजिक प्रजातंत्र की समीक्षा करने की जो वामपंथियों की विस्तृत और परिष्कृत परंपरा रही है, उसके लिए यह कार्य खासकर वामपंथियों को इतिहास की द्वंद्वात्मक समझ जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं होने के कारण बेहद लज्जित करने वाला है।
मार्क्सवादी फ्रेडरिक जेम्सन ने आगे लिखा है इसी बीच मनोराज्य (यूटोपिया) से जुड़ी चिंताएं जो इस भय से उत्पन्न होती हैं कि हमारी वर्तमान पहचान, हमारी आदतें और आकांक्षा पूर्ति के तरीकों का निर्माण करने वाली चीज कतिपय नई सामाजिक व्यवस्था में समाप्त हो जाएगी तथा सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आज कुछ समय पहले की तुलना में अधिक संभव है। स्पष्टतया दुनिया के आधे से अधिक भाग में और न केवल प्रभावशाली वर्गों में आज निस्सहाय लोगों के जीवन में परिवर्तन की आशा का स्थान 'नष्ट हो जाने के भय' ने ले लिया है। इस प्रकार की मनोराज्य-विरोधी (एंटी-यूटोपियन) चिंताओं को दूर करना अनिवार्य है जो कि सांस्कृतिक निदान और उपचार के रूप में किया जाना चाहिए न कि बाजार के सामान्य बहस और अलंकार की इस या उस विशेषता से सहमति जताकर इससे बचना चाहिए।
मानव-स्वभाव मूल रूप से अच्छा और सहयोगी है या फिर बुरा और आक्रामक। यदि यह सर्वसत्तात्मक राज्य (लेवियाथन) को नहीं तो कम से कम बाजार को वश में रखने की अपेक्षा करता है, ये सारे तर्क वास्तव में मानवतावादी और विचारधारात्मक हैं (जैसा कि अल्थूसर ने कहा है) और इसके स्थान पर रैडिकल परिवर्तन और सामूहिक परियोजना का परिप्रेक्ष्य लाना चाहिए। साथ ही वामपंथियों को बड़ी सरकारों या फिर कल्याणकारी राज्यों का आक्रामक रूप से बचाव करना चाहिए तथा मुक्त बाजार के ऐतिहासिक ध्वंसात्मक रिकार्ड को देखते हुए बाजारवाद पर लगातार प्रहार करते रहना चाहिए ।
मार्क्सवादी के लिए साम्यवाद या कम्युनिस्ट पार्टी पूजा की चीज नहीं है। मार्क्सवादी के लिए वैज्ञानिक ढ़ंग से इस समाज को समझना और उस परिवर्तन के तर्क को समझना जरूरी होता है जिसके कारण परिवर्तन घट रहे हैं। पुराने साम्राज्यवाद के दौर में पूंजीवाद का केन्द्र था इंग्लैण्ड,बाद में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर में अमेरिका केन्द्र बना।नव्य उदारतावाद के आरंभ में अमेरिका ही पूंजीवाद का गोमुख था। लेकिन नव्य उदारतावाद के अगले चरण में यानी मौजूदा दौर में पूंजीवाद का केन्द्र चीन है,अमेरिका नहीं। कारपोरेट और लंपट पूंजीवाद की इसमें सभी खूबियां हैं। सब कुछ हजम कर जाने का इसमें भाव है। विश्व बाजार में छा जाने ,सब कुछ बनाने और सस्ता उपलब्ध कराने का नजरिया है। इस समाविष्टकारी भाव से सारी दुनिया में देशज उद्योगों के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है।
एक जमाना था चीन में कम से कम चीजें पैदा होती थीं। सारा देश पांच किस्म के कपड़े पहनता था। सारा देश साइकिल पर चलता था। लेकिन विगत 30 सालों में उसने सब कुछ बदल दिया है। उत्पादन और जिन्सों के उत्पादन में तो उसने क्रांति की है। किसी वस्तु को सस्ते में बनाना,बाजार में इफ़रात में उपलब्ध कराना और बाजार को घेरे रखना। बड़ी पूंजी को आकर्षित करना,श्रम और श्रमिक को सस्ते माल में लब्दील करना। मैन्यूफेक्चरिंग की ताकत को ऐसे समय में स्थापित करना जब सारी दुनिया मैन्यूफैक्चरिंग छोड़कर सेवाक्षेत्र की ओर आंखें बंद करके भाग रही थी।अपने आप में महान उपलब्धि है।
उत्पादन और खूब उत्पादन का नारा लगाकर चीन ने उत्पादन और उत्पादकों की महत्ता स्थापित की है। तंत्रगत संकटों को उसने अभिनव परिवर्तनों और प्रौद्योगिक क्रांति के जरिए संभाला है। विकास की तेजगति को बरकरार रखा है। साथ ही उत्पादन की गति को बनाए रखकर कारपोरेट पूंजीवाद को नए सिरे से पुनर्गठित किया है। इन परिवर्तनों को उत्तर मार्क्सवाद के आधार पर ही परखा जा सकता है। चीन और अमेरिका के नव्य उदार आर्थिक परिवर्तन पुराने मार्क्सवाद से नहीं उत्तर मार्क्सवाद से ही समझ में आ सकते हैं।
नव्य उदार परिवर्तनों का विश्व में सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यहां पर हम वामपंथ पर जो प्रभाव पड़ा है उसकी समीक्षा तक ही फिलहाल सीमित रखेंगे। वामपंथ पर नव्य उदारतावाद के प्रभाव को हम इस रूप में देख तकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां अब अपने बुनियादी मसलों पर विचारधारात्मक संघर्ष नहीं कर रही हैं बल्कि उन मसलों पर संघर्ष कर रही हैं जो पूंजीवादी मसले हैं। पूंजीवादी विचारधारा के द्वारा निर्मित मसले हैं।
इन दिनों कम्युनिस्टों का संघर्ष समाजवाद के लिए नहीं चल रहा बल्कि कल्याणकारी राज्य को बचाने के लिए चल रहा है। भारत से लेकर अमेरिका तक सभी जगह कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य को बचाने के एजेण्डे में फंस गयी हैं।कल्याणकारी राज्य आंतरिक गुलामी का परिवेश तैयार करता है।
नव्य उदारतावाद के आने के साथ ही अनेक समाजवादी देशों ने समाजवाद को त्यागकर कारपोरेट पूंजीवाद का मार्ग पकड़ लिया। यह काम अकारण सभी किस्म के मार्क्सवादी मूल्यों और मान्यताओं को त्यागकर किया गया। भारत में आज कम्युनिस्ट पार्टियां कल्याणकारी राज्य के एजेण्डे को लेकर ही हल्ला मचा रही हैं। जबकि पूंजीपतिवर्ग ने कल्याणकारी पूंजीवाद के मार्ग को तिलांजलि दे दी है और नव्य उदार आर्थिक कारपोरेट पूंजीवादी विकास का मार्ग ग्रहण कर लिया है। अनेक अवसरों पर कम्युनिस्टों में भी वे तमाम विकृतियां देखने को मिलती हैं जो कल तक पूंजीवादी दलों में हुआ करती थीं। वे पूंजीवादी विकृतियों को समझने और उनके खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने में असमर्थ रहे हैं।
पहले लोग बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवालों को पसंद करते थे। उनके लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन नव्य उदार प्रचार अभियान के कारण आम आदमी बुनियादी सामाजिक परिवर्तनो से डरने लगा है। जोखिम उठाने से डरने लगा है। बहस करने से बचने लगा है। वह इस या उसकी हां में हां मिलाकर सामंजस्य बिठाकर यथास्थितिवाद के सामने समर्पण कर चुका है। अब हमारे बीच में बुनियादी मसलों पर बहसें कम हो रही हैं,कचरा विषयो पर बहसें ज्यादा हो रही हैं।
मसलन हाल ही में उठे 2जी घोटाले को ही लें। मीडिया और संसद बहस कर रही है पूर्व संचारमंत्री ए.राजा ने 1 लाख 75 हजार करोड़ का देश को चूना लगा दिया। नियम तोड़े। घूस ली बगैरह-बगैरह। इस प्रसंग में आम लोग,मीडिया और सांसद यह बात नहीं कर रहे कि आखिरकार ये रेडियो तरंगें किसकी हैं ? क्या इन्हें बेचा जा सकता था ? क्या रेडियो तरंगे कारपोरेट पूंजी की सेवा के लिए आवंटित की जाती हैं ? रेडियो तरंगे राष्ट्र की संपदा हैं और इन्हें हमारा देश अंतर्राष्ट्रीय संचार समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय संस्था के जरिए आवंटन के माध्यम से प्राप्त करता है। इन्हें बेचा नहीं जा सकता। क्योंकि ये राष्ट्र की संपत्ति हैं। वैसे ही जैसे भारत के ऊपर का आकाश भारत का है उसे बेचा नहीं जा सकता। समुद्र को बेचा नहीं जा सकता। संसद भवन बेचा नहीं जा सकता।ताजमहल बेचा नहीं जा सकता। बजट घाटे को कम करने के नाम पर रेडियो तरंगों का कारपोरेट घरानों को आवंटन देशद्रोह है,देशभक्ति नहीं है। सवाल उठता है देशद्रोह बड़ा अपराध है या भ्रष्टाचार ?कायदे से रेडियो तरंगे बेची नहीं जानी चाहिए। लेकिन संसद में कभी भी किसी भी दल के सांसदों ने रेडियो तरंगों के निजी हाथों बेचे जाने का विरोध नहीं किया,आज भी वे विरोध नहीं कर रहे बल्कि यह कह रहे हैं कि नए सिरे से इनका आवंटन बाजार दर पर करवा दो और राष्ट्र को 1लाख 75 हजार करोड़ रूपये दिलवा दो। उनकी रूचि राष्ट्र को पैसा दिलवाने में हैं तरंगों को राष्ट्र के खाते में बचाने में नहीं है। यहीं पर उत्तर आधुनिक समाज की आयरनी छिपी है। हम जानते ही नही हैं कि राष्ट्र हित क्या हैं ? कारपोरेट हितों को राष्ट्रहित समझ रहे हैं और यही नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है।बजट घाटे को कम करना देशसेवा है चाहे रेडियो तरंगें बेचनी पड़ें। धन्य हैं ये देशभक्त जो देश की संपदा (रेडियो तरंगें) बेचकर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे हैं। यह नव्य उदार प्रौपेगैण्डा की जीत है । आज मीडिया में सारे राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी बहस के उन मसलों पर उलझे हैं जो बाजार के मसले हैं,सतही मसले हैं। बहस-मुबाहिसे में बाजार का लक्ष्य प्रधान हो गया है और बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के सवाल बहस से गायब हो गए हैं। उपभोग के सवालों पर बहस कर रहे हैं ,उत्पादन के सवालों पर नहीं। भ्रष्टाचार पर बहस कर रहे हैं भूख पर नहीं। नरेगा के कार्यान्वयन पर उलझे हैं गांव की गरीबी पर नहीं। यह विचारधारात्मक अवमूल्यन है।

कार्ल मार्क्स पखवाडा- सूचना समाज की नयी भाषा को पहचानो

         सोवियत संघ के पराभव के बाद सारी दुनिया में मार्क्सवादी चिंतकों को करारे वैचारिक सदमे और अनिश्चितता से गुजरना पड़ा है। सूचना समाज किस तरह वैचारिक विपर्यय पैदा कर सकता है इसके बारे में कभी विचार ही नहीं किया गया। अधिकांश समाजवादी विचारक इसे सामान्य और एक रूटिन परिवर्तन मानकर चल रहे थे। वे यह भी देखने में असमर्थ रहे कि परवर्ती पूंजीवादी मॉडल को लागू किए जाने के बाद मार्क्सवाद का भी रूप बदलेगा। पुराने किस्म का मार्क्सवाद चलने वाला नहीं है। लेकिन अनेक विचारकों के यह बात गले नहीं उतर रही है। एक तरफ मीडिया में समाजवाद विरोधी उन्माद और दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की धड़कनों का हाथ में न आना, यही वह बिडम्वना थी जिसने मार्क्सवादियों को हतप्रभ अवस्था में पहुँचा दिया। सूचना समाज में मार्क्सवाद की प्रकृति और भूमिका एकदम बदल गयी है। राजनीतिक प्रतिवाद की शक्ल बदल गयी है। लोगों को जोड़ने और उनसे संवाद करने और संपर्क करने के तरीके बदल गए। सूचना समाज आने के पहले राजनीतिक मुहावरे,पदबंध आदि संचार के हथकंड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। सूचना समाज के जन्म के साथ ही राजनीतिक पदबंधों और मुहावरों की जगह सांस्कृतिक पदबंधों और मुहावरों ने ले ली। अब सारी चीजें वस्तुओं और उपभोक्तावादी तत्वों के जरिए व्याख्यायित होने लगीं। साहित्य से लेकर राजनीति तक सब जगह उपभोक्तावाद की भाषा और मुहावरे चले आए। मसलन पहले नामवर सिंह की तुलना आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ की जाती थी नए दौर में उनकी तुलना अमिताभबच्चन से होने लगी। प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी ने उन्हें हिन्दी के अमिताभ बच्चन के नाम से पुकारा। कहने का अर्थ यह है कि सूचना समाज अपने साथ नया यथार्थ और नयी भाषा लेकर आया है और इस नए यथार्थ को पढ़ने के लिए नए किस्म की सैद्धांतिकी की भी जरूरत है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक फ्रेडरिक जेम्सन ने मार्क्सवाद की पांचवी थीसिस में लिखा ‘‘राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों क्षेत्रों के लिए संस्कृति का बढ़ता हुआ महत्व इन क्षेत्रों के सोद्देश्यमूलक अलगाव या विभेदीकरण का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं जिन्सीकरण (कोमोडिफिकेशन) की अपेक्षाकृत अधिक विश्वव्यापी संतृप्ति और प्रवेश है। जिन्सीकरण अब उस सांस्कृतिक क्षेत्र के उन विशाल क्षेत्रों को अपना उपनिवेश बनाने में सक्षम हो गया है, जो क्षेत्र अब तक इससे बचे थे और सचमुच इसके विरुध्द या इसके तर्क से असहमत थे। यह तथ्य कि संस्कृति आज अधिकांशतया व्यवसाय में बदल गई है, इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश चीजें जो पहले विशिष्ट रूप से आर्थिक और वाणिज्यिक समझी जाती थी, वे भी अब सांस्कृतिक बन गई हैं, यह ऐसी व्याख्या है जिसमें इमेज सोसायटी या उपभोक्तावाद के विभिन्न निदानों को शामिल करने की आवश्यकता है।’’
‘‘इस प्रकार के विश्लेषण, मसलन जिन्सीकरण (कामोडिफिकेशन) की अवधारणा संरचनात्मक और गैर-उपदेशात्मक, में अपेक्षाकृत अधिक सामान्य रूप में मार्क्सवाद को सैध्दांतिक बढ़त हासिल है। नैतिक मनोवेग राजनीतिक कार्रवाई उत्पन्न करता है लेकिन यह बहुत ही क्षणिक होती है जो शीघ्र ही पुनर्समाहित और पुनर्शमित हो जाती है। यह अपने विशिष्ट विषयों को अन्य आंदोलनों के साथ बांटने के लिए शायद ही प्रवृत्त होती है। लेकिन केवल इस प्रकार के संलयन और निर्माण द्वारा ही राजनीतिक आंदोलनों का विकास और विस्तार संभव है। सचमुच मैं इस मुद्दे को दूसरी तरह से कहना चाहूंगा कि उपदेशपरक राजनीति में वहीं विकसित होने की प्रवृत्ति होती है जहां संरचनात्मक संज्ञान और समाज का मानचित्रण (मैपिंग) अवरुध्द होता है। समाजवाद के असफल होने का बोध होने पर उत्पन्न आक्रोश को आज के संजातीय और धार्मिक प्रभुत्व के रूप में, उस शून्य को नए अभिप्रेरकों से भरने के एक हताश अंध प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।’’
‘‘जहां तक उपभोक्तावाद का संबंध है, यह आशा की जा सकती है कि यदि इसके स्थान पर जान बूझकर कुछ और बिलकुल भिन्न चीज चुनना हो तो यह ऐतिहासिक रूप में उतना ही महत्वपूर्ण सिध्द होगा जितना कि मानव समाज को एक जीवन शैली के रूप में उपभोक्तावाद के अनुभवों से गुजरना। लेकिन विश्व के अधिकांश के लिए उपभोक्तावाद के व्यसन वस्तुनिष्ठ रूप में उपलब्ध नहीं होंगे, तब यह संभव प्रतीत होता है कि 1960 के दशक की रैडिकल थ्योरी का दूरदर्शितापूर्ण निदान : कि पूजीवाद स्वयं ठीक उसी रूप में एक क्रांतिकारी शक्ति है जिस रूप में यह नई आवश्यकताओं और इच्छाओं को जन्म देता है लेकिन जिनकी पूर्ति यह नहीं कर सकता है : नई विश्व व्यवस्था के विश्व स्तर पर प्राप्त होगा।’’
‘‘सैध्दांतिक स्तर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में स्थायी संरचनात्मक बेरोजगारी, वित्तीय सट्टेबाजी और अनियंत्रणीय पूंजी संचलन, इमेज सोसाइटी के ज्वलंत मुद्दे व्यापक रूप में उस स्तर पर एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं जिसे उनकी अंतर्वस्तु, उनके अमूर्तन का अभाव (ठीक उसके विपरीत जिसे किसी अन्य काल में उनका 'आत्मनिर्वासन' (एलीनेशन) कहा जाता) कहा जा सकता है। जब हम विश्वीकरण एवं सूचनाकरण (इनफार्मेटाइजेशन) जैसे मुद्दों को जोड़ने का प्रयास करते हैं तो द्वंद्वात्मकता का और भी विरोधाभासी स्तर मिलता है। जब नए विश्व नेटवर्कों (वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों) की राजनीतिक और विचारधारात्मक संभावनाओं को आज के विश्व तंत्र की स्वायत्तता के लोप तथा किसी राष्ट्र या क्षेत्र की अपनी स्वायत्तता और अस्तित्व प्राप्त करने की असंभावना या स्वयं को विश्व बाजार से अलग करने की असंभावना के साथ जोड़ा जाता है तो प्रतीयमानत: जबरदस्त असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है। किसी एक विचार को अपना लेने मात्र से बुध्दिजीवी इस गलियारे से रास्ता नहीं निकाल सकते। वास्तव में संरचनात्मक विरोधाभासों के परिपक्व होने से ही नई संभावनाओं का विहान होता है। पुनश्च: जैसा कि हीगेल ने कहा होता; हम कम से कम इस असमंजस को 'नकारात्मक से चिपके रहकर' बरकरार रख सकते हैं, उस स्थान को जीवित रखकर जहां से नव्य की अप्रत्याशित रूप से उत्पत्ति की आशा की जा सकती है।’’

सोमवार, 22 अगस्त 2016

मुस्लिम विद्वेष के खतरे-

मुस्लिम विद्वेष देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है,हमारे देश में मुस्लिम विद्वेष हिन्दुत्ववादियों में रहा है तो मुसलमानों के हितों के पक्षधर मुसलिम लीग-पीडीपी टाइप दलों में भी है।यह विलक्षण संयोग है कि भाजपा-पीडीपी दोनों जम्मू-कश्मीर में संयुक्त सरकार चला रहे हैं,क्योंकि दोनों की विचारधारा है मुस्लिम विद्वेष।भाजपा अपने कारणों से मुसलिम विरोधी आचरण कर रही है, पीडीपी अपने पृथकतावादी-आतंकी प्रेम के कारण मुस्लिम विद्वेष का प्रदर्शन कर रही है।इस मुस्लिम विद्वेष के कारण ही लंबे समय से कश्मीर का मुसलिम समाज तबाह पड़ा हुआ है।
देश के अन्य इलाकों में विभिन्न बहाने बनाकर मुसलमानों पर ही हमले हो रहे हैं और इन हमलों के आयोजक और हमलावर हिन्दुत्व ब्रिगेड है।भारत को एक रखना है तो मुसलिम विद्वेष को खत्म करना जरूरी है।मुसलमानों के प्रति विद्वेष जहां एक ओर हिन्दुत्ववादी नेताओं के जरिए आ रहा है वहीं पर मुसलिम फंडामेंटलिस्ट भी यही काम कर रहे हैं।वे मुसलिमप्रेम की आड़ में मुसलमानों के लोकतांत्रिक हकों पर हमले कर रहे हैं।
देश में अमन-चैन कायम करने लिए मुसलिम विद्वेष को आम जनता के मन में से निकालने की जरूरत है।मुसलमानों को किसी भी तरह की मदद नहीं चाहिए,वे अपना विकास कर लेंगे,लेकिन कम से कम कृपा करके मुसलमानों के खिलाफ विद्वेष फैलाना बंद करो।
मुसलिम विद्वेष को वैचारिक खाद-पानी हिन्दी का सिनेमा देता है,उसमें मुसलमानों का स्टीरियोटाइप चित्रण सबसे बड़ा वैचारिक शत्रु है । इसने मुसलमानों की सामान्य मनष्य की इमेज को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। हिन्दी फिल्मों ने मुसलमानों की जो इमेज हमारे जे़हन में उतारी है उसके कारण ही हम मुसलमानों से सहज ही नफरत करने लगते हैं,उनसे दूरी रखते हैं,संदेह करते हैं।
हमें मुसलमानों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा,उनको स्टीरियोटाइप ढ़ंग से,मीडियादृष्टि से देखना बंद करना होगा। हम याद रखें मुसलमानों को अशांत रखकर,उत्पीड़िित करके देश को शांत नहीं रखा जा सकता।मुसलमान के दर्द होगा तो सारे देश के दर्द होगा।मुसलमान हमारे देश का अभिन्न अंग हैं।हम उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह देखें और उनके साथ सामान्य आचरण करें।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

कलकत्ते के वे दिन

      मैं 1989 में जब कलकत्ता आया तो आने के कुछ ही दिन बाद रोज ´स्वाधीनता´अखबार के दफ्तर जाता था वहां अयोध्या सिंह,महादेव साहा,इजरायल, अरूण माहेश्वरी,सरला माहेश्वरी के साथ घंटों बैठना होता। तरह –तरह की बातें होतीं।हमलोगों का रोज शाम को चार बजे लेकर 8बजे तक का समय बहुत ही मस्ती और आनंद में कटता, इस दौरान देश-दुनिया की तमाम खबरों के साथ –साथ कम्युनिस्ट आंदोलन की समस्याओं,कम्युनिस्ट नेताओं के आचरण और उनमें आ रहे परिवर्तनों पर भी लंबी बातचीत होती थी।लंबे समय तक यही मेरी दिनचर्या थी , मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय से कक्षाएं करके ´स्वाधीनता´चला आता,वहां 3-4घंटे रहता और अंत में लौटते समय अरूण माहेश्वरी अपनी गाड़ी से उलटा डांगा छोड़ देते और वहां से बस लेकर मैं अपने घर चला आता,अरूण जब ´स्वाधीनता´नहीं आता तब मैं जोडागिरजा से बस लेकर अकेले घर लौटता।इसी क्रम में धीरे –धीरे ´स्वाधीनता´ अखबार में कई साल मैंने जमकर लिखा। क्या लिखा और किस तरह की समस्याओं का सामना किया इस पर बाद में फिर कभी लिखूँगा। महादेव साहा चलते-फिरते इनसाइक्लोपीडिया थे। वहीं दूसरी ओर अयोध्या सिंह की इतिहास और कम्युनिस्ट आंदोलन को लेकर बहुत गहरी समझ थी।इनके बीच में शाम गुजारने के कई लाभ थे,पार्टी भी उनसे लाभान्वित होती थी,हमसब भी।

हम सबकी शाम का मुख्य नाश्ता मूडी(मुरमुरा),चना,मूंगफली,कभी -कभी पकौड़े या चॉप या समौसा हुआ करता,साथ में ब्लैक टी।हालत यह थी कि हम सब शाम को मिलने के आदी हो गए थे।रोज शाम मिलने के लिए बुरी तरह झटपटाते थे,किसी को देर भी हो जाए तब भी मिलने जरूर आते थे।इस मेल-मुलाकात में कॉमरेडशिप तो थी साथ ही बात करने का सुख था जिसके कारण हम सब एक-दूसरे के आने का बेसब्री से इंतजार करते रहते।इजरायल साहब का हाल यह था उनकी अरूण-सरला के साथ बातें रोज रात साढ़े दस बजे के पहले खत्म नहीं होती थीं।इजरायल,अरूण,सरला और मैं एक साथ अरूण की गाड़ी से निकलते,मैं बीच में उलटाडांगा उतर जाता ,वे तीनों अरूण के घर चले जाते।

इस दैनंदिन मेल-मुलाकात के कारण अनेक काम हुए,जमकर बेशुमार लिखना हुआ।सरला जब सांसद बनकर दिल्ली चली गयी तो अरूण भी साथ चला गया,लेकिन वो हर सप्ताह शनिवार को जरूर कोलकाता आ जाती और हम लोग फिर मिलकर बातें करते। बीच-बीच में महादेव साहा भी दिल्ली चले जाते लेकिन कुछ दिन वहां रहकर लौट आते।



मैं जेएनयू से जब कोलकाता आया तो बेहद परेशान था ,कोलकाता में शाम की संगत ,सुंदर बातचीत आदि के लिए सही साथी नहीं दीखे,हिन्दी के शिक्षकों की सीमाओं और सीमित दुनिया से मैं वाकिफ था इसलिए उसमें समय गुजारना बहुत मुश्किल था,हिन्दी शिक्षकों से विचारयुक्त मित्रता कोलकाता में संभव नहीं दिखी,ऐसी स्थिति में ´स्वाधीनता´में उपरोक्त कॉमरेडों का साथ बहुत सुखकारी साबित हुआ।

15अगस्त की आत्मा है लोकतंत्र -

        आज 15अगस्त है और इसे हम स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाते हैं।यह स्वाधीनता बहुत बड़ी कुर्बानियां देकर मिली है,इतिहास के तमाम दुर्गम पहाडों से गुजरकर मिली है,अनेक बुरे फैसले लेने के बाद मिली है।

अधिकांश नेता भारत-विभाजन से दुखी थे,लेकिन वह मजबूरी थी,देश विभाजन न होता तो देश नष्ट होता , आजादी न मिलती।यह भी सच है देश विभाजन की बहुत बड़ी कीमत अदा की है जनता ने।देश की जनता देश विभाजन के पक्ष में नहीं थी,मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच उस समय जो स्थिति थी उसमें देश विभाजन से बेहतर फैसला संभव ही नहीं था,इससे भारत को बड़ी क्षति को बचाने में मदद मिली,इसका अर्थ यह नहीं है कि देश विभाजन से भारत की कोई क्षति नहीं हुई,देश विभाजन से भारत को बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ी।विभाजन की पीड़ा को हम आज भी झेल रहे हैं।लेकिन समग्रता में देखें तो विभाजन और सम्पूर्ण देश विनाश में से विभाजन को चुनकर कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व ने सही फैसला लिय़ा था।

संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत का जन्म हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि है।इसके कारण हम लोकतंत्र ,स्वाधीनता और समानता के सपनों के लिए संघर्ष का बुनियादी आधार बनाने में सफल रहे।आज भी लोकतंत्र,समानता और बंधुत्व हम सबके लिए सपने की तरह है।इनके सपनों में जीना और सपनों को पाने के लिए निरन्तर जद्दोजहद करना हमारी दैनंदिन जिन्दगी है।

लोकतंत्र आज हमारी प्राणवायु है,इसके बिना हम जिन्दा नहीं रह सकते।लोकतंत्र पर कोई समझौता नहीं कर सकते,क्योंकि भारत विभाजन जैसी बड़ी कीमत अदा करके हमने इसे पाया है।लोकतंत्र हम सबके लिए बेहद कीमती मूल्य है,जीवनशैली है,हमारे समाज की आत्मा है और आत्मा को बेचकर,आत्मा पर हमले करके कोई समाज सुख से नहीं रह सकता।



स्वाधीनता का अर्थ है लोकतंत्र। वह हमारे देश की प्राणवायु है,यह झूठा लोकतंत्र नहीं है अधूरा लोकतंत्र है,इसे संपूर्ण बनाने के लिए निरंतर संघर्ष और लोकतांत्रिक आंदोलनों की जरूरत है।स्वाधीनता आंदोलन की यह महानतम उपलब्धि है।हमें इस पर गर्व है।

विभाजन की पीड़ा और कोलकाता

     कोलकाता कुछ मामले में असामान्य शहर है।इस शहर ने जितनी राजनीतिक उथल-पुथल झेली है वैसी अन्य किसी शहर ने नहीं झेली।यह अकेला शहर है जिसने दो बार भारत विभाजन की पीड़ा को महसूस किया है।यह असामान्य पीड़ा थी।मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं कि बंगाली समाज के मनोविज्ञान पर इन दोनों विभाजन की घटनाओं के किस तरह के असर रहे हैं।मैं स शहर के विभिन्न इलाकों में कईबार घूमा हूँ,अनेक रंगत के लोगों से मिला हूँ,लेकिन कहीं पर भी हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की अनुभूति नहीं हुई ।दिलचस्प बात यह है पहले भारत विभाजन के समय कई साल आंदोलन चला । यह बंग-भंग के नाम से चला आंदोलन था।यह पहला सबसे बड़ा आंदोलन था जिसने राष्ट्रवाद की परिकल्पना को सड़कों पर साकार होते देखा।इस दौर के राष्ट्रवाद के हीरो थे सुरेन्द्र नाथ बनर्जी। सांस्कृतिक भिन्नता के बावजूद हम सब एक हैं का नारा,इसकी धुरी था। इस आंदोलन ने संस्कृति के भेदों और अंतरों को बीच में आने ही नहीं दिया।उल्लेखनीय है उस समय बंगाल समूचा राष्ट्रवादी नेतृत्व उच्च जाति के हिन्दुओं के हाथ में था,लेकिन हम सब एक हैं,का नारा प्रमुख रहा।राष्ट्रवाद के साथ धर्म को किसी ने नहीं जोड़ा।लेकिन दुखद है कि इधर के वर्षों में आरएसएस ने राष्ट्रवाद के साथ धर्म को जोड़ दिया है।कालांतर में चित्तरंजन दास ने सभी धर्मों की एकता को ´जन राष्ट्रवाद´ की शक्ल में रूपान्तरित कर दिया।इसका आधार उन्होंने हिन्दू-मुसलिम एकता को बनाया।

बंग-भंग आंदोलन के मुझे दो प्रसंग याद आ रहे हैं जिनसे हम आज भी बहुत कुछ सीख सकते हैं। 28सितंबर1905 को महालया अर्थात् पितृविसर्जन का दिन था।उस दिन के कलकत्ता के प्रसिद्ध कालीघाट के काली मंदिर में अनोखी विराट पूजा हुई।उसका वर्णन करते हुए अंग्रेजी दैनिक ´अमृत बाजार पत्रिका´ ने 29सितंबर को लिखा , ´सबेरे से ही नंगे पैर लोगों के जुलूस चितपुर रोड़ और कार्नवालिस स्ट्रीट में कालीघाट की तरफ चलने लगे।दोपहर 2बजे तक मंदिर के सामने 50हजार से ज्यादा विशाल जनसमुदाय जमा हो गया।कीर्तन पाटियां राष्ट्रीय गाने गा रही थीं।विराट पूजा के बाद मंदिर के ब्राह्मणों ने संस्कृत में आह्वान कियाः ´सब देवताओं से पहले मातृभूमि की पूजा करो; संकीर्णता,सारे धार्मिक मतभेदों,कटुता और स्वार्थपरता को छोड़ दो,सब लोग मातृभूमि की सेवा करने की सौगंध लो और उसके कष्ट दूर करने में अपना जीवन लगा दो ।´

इसके बाद लोग बड़े बड़े जत्थों में मंदिर के अंदर गए और निम्नलिखित सौगंध लीः

´मां इस पवित्र दिन आपके सामने और इस पवित्र स्थान में खड़े होकर मैं गंभीरता से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं भरसक विदेशी वस्तुओं का कभी इस्तेमाल कभी न करूँगा,कि मैं ऐसी वस्तुओं को विदेशी दुकानों से न खरीदूँगा जो भारतीय दुकानों में मिलती हैं,कि मैं ऐसे काम के लिए विदेशियों को नियुक्त नहीं करूँगा जिसे मेरे देशवासी कर सकते हैं।´

दूसरा वाकया रवीन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ा है।16अक्टूबर 1905 को ,जिस दिन भारत सरकार बंगाल के दो टुकड़े करने जा रही थी उस दिन उन्होंने ´राखी दिवस´मनाने का आह्वान किया और कहा ´यह दिन पूर्व बंगाल के लोगों और पश्चिम बंगाल के लोगों के बीच,धनियों और गरीबों के बीच,इस भूमि में पैदा हुए ईसाइयों,मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच अटूट भातृत्व को सूचित करने के दिवस के रूप में मनाया जाए।´

इन दो घटनाओं ने आम जनता में अटूट एकता और साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका अदा की।इसके विपरीत इन दिनों जितने भी आंदोलन हो रहे हैं उनमें आरएसएस खुलकर धर्म का राजनीतिक दुरूपयोग करके आम जनता की एकता तोड़ने,मुसलमानों और हिन्दुओं में भाईचारा नष्ट करने का प्रयास करता रहा है।इससे स्वतंत्र भारत, विषाक्त भारत की अनुभूति देने लगा है।बंग-भंग जैसी महान दुर्घटना के बावजूद नेताओं ने जनता की एकता बनाए रखने की भरपूर कोशिश की।यही वह मुख्य बिन्दु है जहां से हमें अपनी सभी किस्म की राजनीतिक गतिविधियों,लेखन,सांस्कृतिक कार्यों आदि को देखना चाहिए।जनता में एकता रहे,साम्प्रदायिक सद्भाव रहे चाहे जितनी कठिन परिस्थिति हो हम इस मार्ग से विचलित न हों।



रविवार, 14 अगस्त 2016

धर्मनिरपेक्षता के बिना संघ-

      मोदीजी जब भाषण देते हैं तो उनके बोलने का ढ़ंग कुछ ऐसा होता है कि उनकी बात न मंजूर हो और न नामंजूर हो।उन्हें केवल छोड़ दिया जाय। हाल ही में कश्मीर पर वे कुछ इसी भाव से बोले हैं।यह क्रियाहीन भाषण का आदर्श नमूना है।भाषण उनके कार्य का वाहक नहीं है,लेकिन कार्य के ढोंग से उन्हें भाषण का बहाना मिल जाता है।

अरस्तू ने कहा था नाटक का निर्णायक नियम क्रिया है।राजनीतिक भाषण-कला का भी यही नियम है।मोदी के भाषण का हम 15अगस्त को इंतजार कर रहे हैं,जरा उनके पहले वाले इसी दिन दिए गए भाषण देख लें।ये सभी भाषण विलक्षण क्रियाहीनता,तटस्थता और झूठ के सहमेल से तैयार किए गए हैं।ये भाषण न तो देश के उपयुक्त हैं,न काल के और न ही अवसर के। मोदी अपने भाषण में शब्दों को पीस-पीसकर बोलते हैं।यह संवेदनाहीन भाषा है।
          मेरी सहानुभूति आरएसएस के उन कार्यकर्ताओं के साथ है जो तिरंगा यात्रा के लिए कमर कसकर निकल चुके हैं ! हे भगवान इनकी रक्षा करना ! तिरंगा उठाने की जब जरूरत थी तब यह संगठन तिरंगा झुकाने वालों,तिरंगा का अपमान करने वालों की चिलम भरता रहा,लेकिन इधर अचानक इसके अंदर तिरंगा "प्रेम " उमड़ पड़ा है ! यह कैसे संभव है जिन संघी कार्यकर्ताओं को धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ,गांधी के विचारों के खिलाफ,संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष -लोकतांत्रिक नजरिए के खिलाफ सालों-साल जहर पिलाया गया हो,जिनके मन को कलुषित करके रखा गया हो और आज अचानक कहा जा रहा है कि चलो तिरंगा यात्रा करो,यह तो नाइंसाफी है !!

तिरंगा महज देश का झंडा या झंडा मात्र नहीं है,यह कोई कपड़े का टुकड़ा नहीं है कि उसे डंडे में लगाओ और जोर जोर से हिलाओ।तिरंगा के साथ विचारधारा भी जुड़ी है,उस विचारधारा से हर संघी नफरत करता है।

मसलन् हर संघी के मन में मुसलमानों और ईसाईयों के प्रति प्रेम का अभाव है बल्कि अनेक मामलों में गहरी घृणा देखी गयी है।जबकि तिरंगा से सच में प्यार करने वाले के मन में मुसलमान-ईसाई आदि अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत नहीं होनी चाहिए।

जिनको धर्मनिरपेक्षता-लोकतंत्र का वैचारिक अभ्यास नहीं है वे तिरंगा को संभालेंगे किस मन से ! क्योंकि तिरंगे के साथ हाथ ही नहीं धर्मनिरपेक्ष मन और हृदय भी होना चाहिए।मुश्किल यह है आरएसएस के लोगों के पास तिरंगा लायक न तो मन है और न हृदय है,ऐसे में तिरंगा सिर्फ नकली प्रचार का साधन मात्र बनकर रह जाएगा।

इससे भी बड़ी एक बात और मसलन् कोई व्यक्ति खेती नहीं जाने,शारीरिक श्रम का अभ्यस्त न हो और उसे हठात् किसानी के काम में लगा देंगे तो बेचारा परिश्रम करते करते मर जाएगा। या फिर किसान को सीधे खेत से उठाकर विश्वविद्यालय में पढाने के काम में लगा दो तो वह ढेर हो जाएगा।अभ्यास का बन्धन सबसे बड़ा बन्धन है,जिसे जिस चीज के अभ्यास में जीने की आदत होती है वह उस बन्धन से सहज ही मुक्त नहीं हो पाता।बेचारे आरएसएस वाले हिन्दूवाद के बन्धन में बंधकर धर्मनिरपेक्षता का तिरंगा उठा रहे हैं,बेचारे कही धर्मनिरपेक्षता के बोझ में मर न जाएं !

15 अगस्त महज एक तारीख या जश्न का दिन या इवेंट नहीं है बल्कि इतिहास है।यह इतिहास उन लोगों का जिन्होंने इसको रचा है।जिन लोगों ने रचा है उनमें नेता भी हैं जनता भी है,इसमें अनेक रंगत के क्रांतिकारी और उदार विचार भी हैं।लेकिन जो इस इतिहास के निर्माण के विरूद्ध खड़े थे उनको इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता।15अगस्त का इतिहास जब भी पढा जाएगा,या इस दिन को याद किया जाएगा तो उन लोगों और उन विचारधाराओं पर नजर रखने की जरूरत है जिनके कारण देश टूटा,सामाजिक सद्भाव नष्ट हुआ,जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी की और स्वतंत्रता के मार्ग में बाधाएं खड़ी कीं।

ज्यों ही 15 अगस्त आने को हुआ आरएसएस वालों का सालों-साल चलने वाला हिन्दूवादी राष्ट्रवाद धूम-धड़ाके साथ चरमोत्कर्ष तक पहुँच गया है। मोदी सरकार आने के पहले तक संघ ने कभी तिरंगा को लेकर राष्ट्रीय पदयात्रा नहीं निकाली।

तिरंगा देश भक्ति का प्रतीक है, ये लोग इसे हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रतीक में,उन्माद के प्रतीक में तब्दील करना चाहते हैं।हम सिर्फ यह जानना चाहते हैं आरएसएस ने क्या अपने पूर्व नेताओं के तिरंगा के बारे में व्यक्त विचारों को अस्वीकार कर दिया है ?क्या कभी भारत की जनता के सामने इस तरह की कोई घोषणा की गयी कि वे अपने तिरंगा के बारे में घोषित विचारों को खारिज करते हैं ?

एक हाथ में तिरंगा और दूसरे हाथ हिन्दुत्व ये दो चीजें नहीं चल सकतीं।तिरंगा का अर्थ है हिन्दुत्व का त्याग,संविधान की सभी धारणाओं को नतमस्तक होकर मानना,संविधान की अब तक जो अवमानना संघ के नेताओं ने लेख लिखकर या भाषण देकर की है उसके लिए भारत की जनता से वे पहले माफी मांगे,वरना उनकी तिरंगा यात्रा मात्र नाटक है और तिरंगा के रीयल अर्थ को विकृत करने की साजिश है।



जीवन में माधुर्य की तलाश में-

              मैं पेशे से प्रोफेसर हूँ,कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढाता हूं,कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट में हमारा विश्वविद्यालय है,यह मेरे घर से मुश्किल से पांच किलोमीटर दूर है।मैं अपने घर से कुछ दूर पैदल चलकर काकुरगाछी चौराहे तक जाता हूँ,वहां से शेयर का ऑटो लेता हूँ और फूलबागान उतरता हूँ फिर फूलबागान से कॉलेज स्ट्रीट बाटा के लिए ऑटो लेता हूँ,वहां उतरकर एक फर्लांग के करीब पैदल चलकर विश्वविद्यालय पहुँचता हूँ।मात्र 30 रूपये में आना जाना।कभी कभार टैक्सी से जाताहूँ। आमतौर पर सामान्य अवस्था में मात्र 20 मिनट में मैं विश्वविद्यालय पहुँच जाता हूँ।इसके बाद बमुश्किल पांच-दस मिनट शिक्षक मित्रों से गप होती है और उसके बाद कक्षा में और वहां मुझे दो पूीरियड पढ़ाने होते हैं,कभी एमए,कभी एमफिल और कभी पीएचडी की कक्षा में भी जाना होता है।लेकिन कुल मिलाकर दो घंटे की नौकरी है लेकिन इन दो घंटों के लिए घर पर मेहनत बहुत करनी पड़ती है।पहले समय बहुत खर्च होता था इधर कम,लेकिन कोई नई रिसर्च या नई किताब सामने आती है तो तैयारी में समय बहुत लगता है।

इस समूची प्रक्रिया में किताबें मेरी सबसे बड़ी मित्र हैं।वे मुझे सभी किस्म की तकलीफों से दूर रखने में मदद करती हैं।मान-अपमान के कष्ट से मुक्त करने का काम करती हैं।कमीने किस्म के लोगों की संगत और प्रतिक्रियाओं से मुक्त रखने का काम करती हैं।मुझे कभी -कभी लगता है किताबें न हों तो बुद्धिमान लोग अकालग्रस्त होकर मर जाएं।किताबें हमारे समाज की वह भूख मिटाती हैं जिसे आप अन्य तरीकों से नहीं मिटा सकते।

मेरी तमाम कठिनाईयों में किताबों ने सबसे ज्यादा मदद की है,आप यह भी कह सकते हैं कि मैं कायर हूँ इसलिए किताबों में सिर गढ़ाए बैठा रहता हूँ।लेकिन यह हकीकत है किताबें न होतीं तो जालिम लोग जीने न देते।मैं बार बार जालिमों से कहता हूं तुम अपना काम करो ,हम अपना काम करते हैं,देखते हैं समाज में कौन सी चीज बचती है,जालिमाना हरकतें या किताबों के पाठक-लेखक।

मैंने काफी गणित लगाया और पाया कि मुझे विश्वविद्यालय में पूरे महिने में मात्र 24घंटे से ज्यादा का काम नहीं है।इसलिए बाकी समय मैंने किताबों के हवाले कर दिया।मेरे कोलकता में बहुत कम मित्र हैं। उनकी संख्या न बताऊं तो ही अच्छा है।लेकिन हजारों लोग मुझे जानते हैं,मैं आमतौर पर आवारागर्दी नहीं करता,हां कभी कभी माल में जाकर नेत्रसुख जरूर लेता हूँ।आईसक्रीम खा लेता हूँ,कभी सिनेमा देख लेता हूँ,चाय पी लेता हूँ।लेकिन यह भी बहुत कम।

लेकिन बाजार में चलते लोग,बंगलाभाषा बोलते लोग,खासकर बंगाली औरतों की भाषा मुझे बहुत अच्छी लगती है।वे आमतौर बहुत सुंदर भाषा में बोलती हैं,वह माधुर्य हिन्दीभाषी औरतों में कम है।

आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं,जेएनयूवाले -मथुरावाले पंडितजी कहते हैं,कुछ लोग कॉमरेड कहते हैं,कुछ मानते हैं मैं मोदी का भक्त हूँ,कुछ का मानना है मैं मार्क्सवादी हूँ,कुछ देवीवाले के नाम से जानते हैं,कुछ भाईसाहब कहकर काम चला लेते,छात्र-छात्राओं के लिए जेसी हूँ,कुछ प्यार करते हैं तो कुछ बेइंतिहा नफरत करते हैं। कुछ मेरी किताबें पढ़ते हैं,खरीदते हैं,कुछ हैं जो किताबों को नफरतभरी निगाहों से देखते हैं।कुछ का मानना है मेरा लेखन कचरा है,कुछ को काम का लगता है।

कुछ की नजर में मैं बहुत खराब इंसान हूँ,कहने का आशय यह कि मेरे अंदर इंसान के अच्छे-बुरे दोनों ही किस्म के गुण हैं।मैं अनेकबार झूठ भी बोलता हूँ,मंदिर जाता हूँ लेकिन भगवान को नहीं मानता ,भगवान के नाम पर चढावा पाता हूँ लेकिन मैं कभी किसी का अपमान नहीं करता,गाली भी देता हूँ,लेकिन गालियों को नापसंद करता हूँ।शराब नहीं पीता लेकिन पीने वालों से मित्रता रखता हूं,पीने को बुरा नहीं मानता,मांसहारी नहीं हूँ लेकिन मांसाहारी मित्रों के साथ बैठकर खाना खाता हूँ।मैं पैदाइशी हिन्दू हूँ लेकिन हिन्दुओं के कोई गुण-अवगुण मेरे अंदर नहीं हैं।

घंटों सोचता रहता हूँ,समाज की समस्याओं से परेशान रहता हूँ,उन पर अपने विचार जाहिर करता रहता हूं,लेकिन अपनी निजी समस्याएं कभी सार्वजनिक नहीं करता,दुख अपने अंदर रखता हूँ,मुझे गम खाने की आदत है।सपने देखकर गुजारा करता हूँ।हकीकत से डरता हूँ।हकीकत हमेशा खौफनाक नजर आती है।अकेले में रोता हूँ,केले-अमरूद-पपीता आदि खाता हूँ,कम अक्ली पर गुस्सा आता है,अक्लवालों पर फिदा रहता हूँ.शिक्षित हूँ,लेकिन बीच-बीच में झुंझला जाता हूँ.सरकार और नेताओं से कभी डर नहीं लगता,लेकिन सामान्य सी गलती करके डरने लगता हूँ।मजदूर और किसान और उनकी राजनीति अच्छी लगती है,इंकलाबी जोश अच्छा लगता है लेकिन भजनों में रस पाता हूँ।पता नहीं मैं ऐसा क्यों हूं ?



मेरे अनेक मित्र सलाह देते हैं मैं सब कुछ फेसबुक पर न लिखा करूँ। लोग तुम्हारे विचार चुरा लेते हैं और तुम्हारा जिक्र तक नहीं करते,मैं हंसता हूूं और कहता हूूं विचार ही तो चुरा रहे हैं,चुराने दो समाज के काम आएंगे,हमारा मकसद भी तो यही है कि हमारे विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचें।एक दूसरे मित्र ने कहा इतना कैसे लिख लेते हो भाई, मैंने कहां बस कम्प्यूटर खोला,बटन दबाया और विचार चालू।मित्र बोला यार हम भी कम्प्यूटर खोलते हैं,फेसबुक पर जाते हैं लेकिन दिमाग में विचार ही नहीं आते,तुम इतना जल्दी कैसे लिख लेते हो,मैंने कहा विचार तो मेरे जेब में सब समय पड़े रहते हैं।मंटोकी भाषा में कहूूँ कि मैं फेसबुक पर अपनी ही जेब काटता रहता हूँ।अपनी जेब काटता हूूँ और फेसबुक मित्रों के हवाले कर देता हूँ।

तर्कवाद और मंदिर की प्रतिस्पर्धा का केन्द्र है कोलकाता

         कोलकाता में रहते मुझे 27साल हो गए,इस दौरान कोलकाता में बहुत कुछ बदलते देखा है।कोलकाता में अनेक किस्म की विचारधारात्मक लड़ाईयां देखीं,नए किस्म के जनांदोलन देखे।लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन यह देखा कि हठात् मंदिर संस्कृति चारों ओर छा गयी।कोलकाता में पहले इतने मंदिर नहीं थे, लेकिन मेरे देखते ही देखते हर गली के मुहाने पर,हर पेड़ के आसपास कोई न कोई मंदिर आ गया,मंदिर बनाने वालों का यहां संगठित गिरोह है.ये मंदिर स्वतःस्फूर्त्त नहीं हैं।मैं जिस इलाके (काकुरगाछी) में रहता हूँ वहां देखते ही देखते कई छोटे-छोटे मंदिर जन्म ले चुके हैं।

कोलकाता सबसे जागृत राजनीतिक धर्मनिरपेक्ष शहर है,लेकिन हजारों छोटे-छोटे मंदिरों का शहर है। इस शहर में जिस तरह हर व्यक्ति ´तर्कवादी´,´विवेकवादी´है ,उसी तरह हर व्यक्ति के सामने मंदिरों का नए सिरे से हर मुहल्ले में उभरकर आना भी एक चुनौती है।´तर्कवाद´ और´मंदिर´का यह द्वंद्व इस शहर की जान है।इस शहर को जानना है तो इस द्वंद्व को समझना होगा,इस द्वंद्व में ही पश्चिम बंगाल की आत्मा नजर आएगी और भारत की आत्मा भी नजर आएगी।

कोलकाता ही अकेला शहर नहीं है जहां मंदिरों की बाढ़ आई हो,देश के विभिन्न शहरों में विगत 40 सालों में मंदिरों की बाढ़ को सहज ही देखा जा सकता है। कोलकाता तो इस देश के वैचारिक द्वंद्वों की आत्मा है। भारत के वैचारिक संघर्षों का अध्ययन करना है तो कोलकाता को गहराई के साथ जानना बहुत जरूरी है।कहने के लिए कोलकाता मुख्यधारा से दूर,कटा हुआ,अलग-थलग नजर आता है,लेकिन असल में ऐसा नहीं है।

कोलकाता पहला शहर है जिसमें आधुनिककाल में ´तर्कवाद´ और ´विवेकवाद´ ने ´ईश्वर´के खिलाफ वैचारिक जंग सुनियोजित ढ़ंग से लड़ी।जो लोग ´विवेकवाद´के लिए संघर्ष कर रहे थे वे अपने लिए कच्चा माल परंपरा से बटोरकर ला रहे थे।वे जाना चाहते थे भविष्य में लेकिन उनका कच्चा माल था अतीत का।यह ऐसा द्वंद्व था जो अभी भी बना हुआ है,हमारा समाज जाना चाहता है अंतरिक्ष युग में लेकिन हनुमान की पूजा करते हुए! पहले तमाम संस्थाओं,रीति-रिवाजों और मूल्यों को तर्क की कसौटी और सामाजिक प्रासंगिकता के आधार पर परखा गया फिर उसमें से बहुत कुछ को छोड़ दिया गया और उसके कारण जो अभाव पैदा हुआ उसके लिए पश्चिम से मूल्य,मान्यताएं और परंपराएं ग्रहण कर ली गयीं।यही वह प्रस्थान बिंदु था जिसने भारतीय जनमानस में नए सिरे से ´तर्कवाद´को पैदा किया,आज इसी ´तर्कवाद´को कोलकाता से लेकर पश्चिम बंगाल के सुदूरवर्ती इलाकों में पैर पसारे देख सकते हैं,आम जनता में कभी-कभी यह तर्कवाद सोने भी लगता है,लेकिन फिर अचानक किसी शॉक के झटके खाकर उठ बैठता है।

कोलकाता में पैदा हुए ´तर्कवाद´ बनाम ´मंदिर´ (ईश्वर भी कह सकते हैं )के द्वंद्व ने सबसे मूल्यवान चीज विकसित की वाद-विवाद में अहिंसा।कोलकाता में वैचारिक विवाद हिंसक,अपमानजनक, गाली-गलौज से भरा नहीं होता। कोलकाता के इसी सहिष्णु रूप ने आधुनिक भारत के सहिष्णु चरित्र को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । 19वीं सदी से लेकर आज तक जितने ज्यादा वैचारिक संघर्ष और परिवर्तन कोलकाता ने देखे हैं उतने संभवतः भारत के किसी शहर ने नहीं देखे ।

शहर की नई परिभाषा गढ़ने में कोलकाता सबसे आगे है,यह इच्छाओं का शहर है।यहां ´तर्कवादी´इच्छाओं को जितना मान-सम्मान मिलता है आम लोग उतना ही धार्मिक इच्छाओं को भी सम्मान देते हैं।इस शहर में भगवान जितना जरूरी है उतना ही जरूरी मनुष्य और विवेकवाद भी है।भगवान और विवेकवाद के द्वंद्व को इस शहर ने बड़े ही कौशल के साथ हल किया है।विभिन्न धर्म हैं, उनके मानने वाले हैं,लेकिन अधिकांश धर्मनिरपेक्ष हैं।धर्म को राजनीति और सरकार के साथ घालमेल करके जनता नहीं देखती और राजनीतिकदल भी इस घालमेल से बचते हैं।यहां साम्प्रदायिक संगठन हैं लेकिन लोग उनके प्रति भी अहिंसक भाव से पेश आते हैं।इस शहर में सभी किस्म की विचारधाराओं के लिए समान रूप से जगह है। ´तर्कवाद´बनाम ´मंदिर´के द्वंद्वं को सामंजस्य और सहिष्णुता के पैमाने देखने की परंपरा यहां इतनी पुख्ता है कि हर तरह के विचार के व्यक्ति को यहां सुरक्षा महसूस होगी।इस समूची प्रक्रिया में कोलकाता से लेकर समूचे पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों को लेकर देश के अन्य इलाकों से बेहतर सचेतनता है। यहां विज्ञान की जितनी मान्यता है परम्परा का भी उतना ही सम्मान है।यहां परंपरावादी भी तर्कवाद का सहारा लेकर परम्पराओं को तरासते रहे।यहां जाग्रत आधुनिक समाज है तो ऐसा समाज भी है जो हिन्दू होने में गौरव का अनुभव करता है।अ-हिन्दू और हिन्दू में यहां कटुता नहीं है,लेकिन सामाजिक विकास के क्रम में दूरी बढ़ी है।सामाजिक सद्भाव है लेकिन संशय बढ़ा है।बड़े पैमाने पर मुसलिम समाज है जो अपने जलसे-त्यौहार आदि बड़ी तैयारियों के साथ मनाता है और सारा शहर उसमें सहयोग करता है,उसके साथ सामंजस्य बिठाता है,कभी कटुता नजर नहीं आती,उसी तरह हिन्दुओं के बड़े त्यौहार बड़े शान से मनाए जाते हैं और मुसलमान उनमें सहयोग करते हैं।शहर की पूरी अर्थव्यवस्था मिश्रित संस्कृति, मिश्रित खान-पान,मिश्रित भावनाओं पर टिकी है।



कोलकाता में आज भी सघन हिन्दू इलाकों में मुसलमानों की दुकानें,सघन मुसलिम इलाकों में हिन्दुओं की दुकानें मिल जाएंगी।एक ही मार्केट में हिन्दू-मुसलमानों की एक साथ दुकानें मिल जाएंगी।इसने इस शहर में साम्प्रदायिक कटुता को कभी पैदा ही नहीं होने दिया,जबकि कोलकाता पर भारत-विभाजन से लेकर बंगलादेश से आए शरणार्थियों तक का बहुत दबाव रहा है,लेकिन ´तर्कवाद´के आधार पर उसने इस तरह के संकटों का समाधान अहिंसक ढ़ंग से खोज लिया है।इस शहर में एक करोड़ से ज्यादा लोग रहते है लेकिन इसकी चाल एकदम कस्बे जैसी है।इसमें कहीं पर भी महानगर जैसी बेचैनी और असंतोष नहीं है।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कार्ल मार्क्स पखवाडा- धर्म और मार्क्स –


     आधुनिककाल में धर्म का उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम सबसे बड़ा ईंधन है। इन दोनों के बिना धर्म जी नहीं सकता। धर्म वैचारिक और भौतिक दोनों ही स्तरों पर उपभोक्तावाद और पूंजी की मदद करता है यही वजह है धर्म की जड़ें उन वर्गों में ज्यादा गहरी हैं जहां उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम खूब फल-फूल रहा है।जिस तरह धर्म जनता के लिए ´आत्मिक शराब है´ठीक उसी तरह उपभोक्तावाद और पूंजीप्रेम लत है। दोनों में मातहत बनाने की प्रवृत्ति है।
      धर्म कोई विचार मात्र नहीं है,उसकी सामाजिक जड़ें हैं,धर्म की समाजिक जड़ों को सामाजिक संघर्षों में जनता की शिरकत बढ़ाकर ही काट सकते हैं।धर्म के खिलाफ संघर्ष यदि मात्र वैचारिक होगा तो वह भाववादी संघर्ष होगा,धर्म भाववाद नहीं है,वह तो भौतिक शक्ति है।उसे अमूर्त्त विचारधारात्मक उपदेशों के जरिए नष्ट नहीं किया जा सकता। एक मार्क्सवादी को यह पता होना चाहिए कि धर्म का मुकाबला कैसे करें इस मामले में उनको बुर्जुआ भौतिकवादियों से अलगाना चाहिए।बुर्जुआ भौतिकवादियों के लिए ´धर्म का नाश हो´,´अनीश्वरवाद चिरंजीवी हो´´नास्तिकता अमर रहे´ का नारा प्रमुख है,वे आमतौर पर अनीश्वरवाद का ही जमकर प्रचार करते हैं,इस तरह के नजरिए की लेनिन ने  तीखी आलोचना की है और उसे ´छिछला दृष्टिकोण´ कहा है।
    लेनिन के शब्दों में यह बुर्जुआ जागृति का ´संकीर्ण नजरिया है। इससे धर्म की जड़ों के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती।इस तरह की धर्म की व्याख्याएं भाववादी हैं,इनका भौतिकवाद से कोई लेना-देना नहीं है।लेनिन ने धर्म के बारे में लिखा है ´आधुनिक पूंजीवादी देशों में इसकी जड़ें मुख्यतःसामाजिक हैं। पूंजी की अंधी ताकत का भय-अंधी इसलिए क्योंकि व्यापक जनसमुदाय इसका पूर्वानुमान नहीं कर सकता-एक ऐसी शक्ति जो सर्वहारा और छोटे मालिकों के जीवन के हर चरण में प्रहार का खतरा पैदा करती तथा ´औचक´,´अनपेक्षित´,´आकस्मिक´,तबाही ,बर्बादी,गरीबी,वेश्यावृत्ति,भुखमरी का हमला करती है.आधुनिक धर्म की जड़ यहां है।इसे भौतिकवादियों को सर्वप्रथम अपने दिमाग में रखना चाहिए.

     जनता के दिमाग से धर्म को मिटाने के लिए जरूरी है उसे जनसंघर्षों के लिए तैयार किया जाए,जनता खुद धर्म की जड़ें खोदना सीखे,संगठित हो,सचेत रूप में पूंजी के शासन के तमाम रूपों से लड़ना सीखे।जबतक वह ऐसा नहीं करती तबतक जनता के मन से धर्म को मिटाना संभव नहीं है।