सोमवार, 2 जनवरी 2017

नोटबंदी का सच और मोदी सरकार के झूठ-

मोदी सरकार झूठ बोलने में अव्वल है,उनके झूठ को दोहराने के मामले में मोदीभक्त परम अव्वल है ! नोटबंदी के समापन पर वित्तमंत्री अरूण जेटली ने जिस तरह के दावे किए जरा उनकी हकीकत को देखें।

´फाइनेंशियल एक्सप्रेस´(2जनवरी2017) ने मोदी सरकार के आंकड़ों का सच उजागर किया है।मसलन् वित्तमंत्री अरूण जेटली ने अप्रत्यक्ष करों में 26.2 फीसदी बढोतरी की बात कही,उन्होंने यह भी कहा कि सर्दी की फसल बुआई में 6फीसदी की बढोत्तरी हुई,नवम्बर माह में एक्साइज करों की वसूली में 32 फीसदी इजाफा हुआ,लेकिन सच यह है अक्टूबर माह में 41फीसदी की एक्साइज करों की वसूली हुई थी,नवम्बर में तो गिरावट आई।इसी तरह सेवा करों में 13.3फीसदी बढोत्तरी हुई थी लेकिन अक्टूबर माह मेंसेवा करों की वसूली 68.8फीसदी रही।एक्साइज ड्यूटी की वसूली में गिरावट इसके बावजूद आई कि इस दौरान एकबार पेट्रोलियम पदार्थों के करों की दर में इजाफा हो चुका था।यही हाल रवि की फसल के बुआई के आंकड़ों का है,इन आंकड़ों के संदर्भ में भी अरूण जेटली और पीएम मोदी सफेद झूठ बोल रहे हैं।रवि की बुआई में तेज गिरावट आई है।य का है।यही हाल विकासदर के बारे में किए जा रहे दावों का है,अखबार ने विस्तार के साथ अनेक वित्तीय एजेंसियों और आरबीआई के दावों की रोशनी में रेखांकित किया है कि विकासदर में निश्चित रूप से गिरावट आएगी।विस्तार से यह रिपोर्ट यहां पढ़ें-

With no clear estimates forthcoming from the government on the extent of black money unearthed by demonetisation, about a dozen agencies have trimmed their forecasts for India’s GDP growth for the current fiscal in the range of 40-330 basis points, reports fe Bureau in New Delhi. And many have cast shadow over the growth projections for 2017-18 as well. Finance minister Arun Jaitley last week cited a 26.2% annual jump in indirect tax collection and a 6% rise in winter crop sowing to suggest demonetisation didn’t hurt the economy as much as assumed by some commentators critical of the government’s unprecedented decision. However, data showed excise duty collections rose an annual 32% in November, down from 41% in October, and the growth in service tax mop-up slowed to just 13.3% in November from as much as 68.8% in the previous month. The slowdown in excise revenue growth in November was despite another round of hike in the excise duty on petroleum products in the month. Also, the increase in Rabi crop area seems rather muted at 2.8% if compared with the normal acreage by this time of year.

While the note ban put spokes in the wheels of the economy when it was struggling to accelerate (although Q2 GDP growth was 7.3% against 7.1% in Q1, investment in fixed capital contracted 5.6% in Q2, recoding third straight quarter of fall). Banks’ credit growth, at multi-year lows for quite some time, too touched a new low of 5.8% in the fortnight through December 9 from a year before even though banks were flush with funds post demonetisation.

The Reserve Bank Of India had projected only a 50-basis point drop in gross value addition in the economy in 2016-17 due to demonetisation.

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With private consumption–a key driver of GDP growth for close to two years now–hit by demonetisation, it is more incumbent on the government to continue to stir demand through its own spending. The government is relying on the expected jump in tax revenue (by an estimated Rs 1 lakh crore) from the new income disclosure scheme PMGKY to step up spending. Additionally, banks could enhance fresh lending as demonetisation has dramatically increased their liquidity (leading lenders have already announced steep rate cuts in their benchmark lending rates).

According to Nomura, demonetisation has hit rural consumption demand harder than urban demand, services more than manufacturing, and exports more than imports.Market research firm Nielsen says that the Rs 2.5-lakh crore FMCG sector witnessed a 1.2% net negative impact on consumer sales in value terms in November, with one in every five housewives surveyed said she cut spending by 50% or more. Auto sales, too, hit a 44-month low in November.

PMI for services for November witnessed the sharpest monthly decline since November 2008 (just after the Lehman crisis) and manufacturing PMI, too, slowed down. In signs that the impact of demonetisation will continue into the next fiscal, the Composite Leading Index of Nomura, which tracks non-farm GDP growth with a two-quarter lead, for early 2017 has slumped to the lowest level since the series started in 1996. Even SBI’s near-term composite index that predicts industrial activity hit a record low of 45.5 year-on-year, down from the revised level of 50 in the previous month.

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

कर्णसिंह चौहान के कुतर्क और पलायन

       मोदी भक्ति का सबसे प्रचलित मुहावरा है विपक्ष को गाली दो !कीचड़ उछालने वाले कहो ! पंडितों –विशेषज्ञों को खराब भाषा में चित्रित करो ! तकरीबन यही पद्धति हिंदी आलोचक कर्णसिंह चौहान ने अपनायी है।समस्या है नोट नीति, चौहान साहब उस पर एक भी वाक्य बोलना नहीं चाहते,वे क्यों नहीं बोलना चाहते यह उनका सिरदर्द है,लेकिन बहस जब इस मसले पर हो रही है तो उनको बोलना चाहिए,वरना बहस न करें।बहस में शामिल भी होंगे लेकिन मूल सवाल पर नहीं बोलेंगे यह हो नहीं सकता।

नरेन्द्र मोदी के साथ जुड़ने के लिए जरूरी है कि आप अपना अतीत भूल जाएं,अपने को ज्ञानी नहीं अनुयायी बना लें,गैर-राजनीतिक लिखें,गैर-राजनीतिक दिखें,यहां तक कि अपने राजनीतिक कॉमनसेंस को भी भूल जाएं,यह दशा उनकी है जिन्होंने मार्क्सवाद के प्रमुख विचारकों को पढ़ा है,नाम है कर्णसिंह चौहान !

हम चाहते हैं चौहानजी सब समय व्यस्त रहें ! इतने व्यस्त भी न रहें कि नोट नीति पर लिखने के लिए कुछ शब्द भी न हों ! लेकिन नोट नीति की आलोचना करने वालों के खिलाफ ढेरों शब्द हों ! इसे मोदी भक्ति कहते हैं! यह मोदी पक्षधरता है!

चौहान साहब की फेसबुक वॉल पर मोदी सरकार की नीतियों को लेकर एकदम सन्नाटा पसरा पड़ा है ! चौहानजी ,यह सन्नाटा टूटना चाहिए! यदि आपसे कहा जाए कि स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों के लिखे को पढो तो तुरंत आप उनको छोटा-तुच्छ-हेय-बोगस साबित करने के लिए जल्द ही मूल्य-निर्णय दे देते हैं,मसलन् मैंने जब टीएन नाइनन से लेकर इकोनोमिस्ट के अर्थशास्त्रियों के नाम सुझाए तो कह दिया कि वे ´´ वे खुद अँधेरे में रास्ता खोज रहे हैं या अपनी जड़ता पर मुग्ध और परम संतुष्ट हैं ।´´इसे कहते हैं मोदी भक्ति में डूबा निर्मल मन !

चौहानजी,कमाल की बात यह कि आपने मोदी की नोट नीति के अर्थशास्त्री आलोचकों को कहा ´जैसे सारी जनता के लिए आध्यात्मिकता और ईश्वर के प्रतिनिधि बने महात्माओं की असलियत होती है, कुछ वही अपने विशेषज्ञों के बारे में भी सच है ।´ कम से कम इतनी घटिया टिप्पणी की आपसे उम्मीद न थी ! लेकिन जैसी कि इन दिनों बयार बह रही है कि मोदी के आलोचकों को निकृष्ट कोटि का सिद्ध करो,अफसोस है आप भी उनमें शामिल हो गए !

कर्णसिंहजी आपने कमाल की मोदी डिफेंस तैयार की है,आपके अनुसार मोदीजी की आलोचना करने वाले किताबी ज्ञानधारी हैं ! मोदी न तो गांधी हैं और न श्यामाप्रसाद मुखर्जी हैं,मोदी के पापों पर खासकर उसकी नोट नीति के पापों पर पर्दा डालने के लिए आपने जो तर्क बनाए हैं उनको देखकर यह बात पक्की है कि आपने सम-सामयिक राजनीति के सामाजिक प्रभावों को न देखने का मन बना लिया है,इसका प्रधान कारण तो आप ही जानें लेकिन अब यह बात तय है कि मोदीजी के पक्ष में बड़े ही कौशल के साथ तर्क निर्मित कर रहे हैं।

आज समस्या क्रांति,समाजवाद,वाम नहीं है,समस्या है नोट नीति लेकिन नोट नीति पर आप एक भी वाक्य बोलने को तैयार नहीं हैं।ऐसा क्या है जो आप बोलने को तैयार नहीं!बुद्धिजीवी के नाते विषय चुनने,अपने नजरिए से बोलने का आपको हक है लेकिन नोट नीति तो हम सबका विषय है,आपकी इस विषय को लेकर राय है जिसे हम देख रहे हैं कि आप नोट नीति के खिलाफ लिखे को बेहद घटिया मान रहे हैं,मेरे लिखे को स्वयं के खिलाफ जिहाद कह रहे हैं, क्या मैं मोदी की डिफेंस में लिखे आपके लेखन को जिहाद कहूँ ॽ आप मोदी के पक्के ज्ञानी अनुयायी हैं,आप मोदीभक्त या मोदी जिहादी नहीं हैं,लेकिन नोट नीति के पक्के समर्थक हैं!

कर्णसिंह चौहान ने लिखा है ´ आप लोग भी जब उसी दलदल में कीचड़ उछालू शैली में बहस करते हैं और आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं तो दुख होता है ।´यह तथ्य की दृष्टि से गलत है।हमने कभी कीचड़ नहीं उछाली, ऩ उस शैली में बहस की है।हमने आरोप-प्रत्यारोप भी नहीं लगाए हैं।चौहानजी, आप नोट नीति के पक्ष में हैं तो गंभीरता से अपना पक्ष क्यों नहीं रखते,आपको किसने रोका है,आपको यह हक किसने दिया है कि हमारे लेखन को कीचड़ उछालू लेखन कहें ! इस तरह का निष्कर्ष निंदनीय ही कहा जाएगा।मैंने आपके लेखन को कभी कीचड़ नहीं कहा,मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप इतने नीचे गिरकर इस तरह की घटिया भाषा का इस्तेमाल करेंगे।

हमने फेसबुक पर नोटनीति के विरोध में जिन पत्र-पत्रिकाओं,अर्थशास्त्रियों को पेश किया है उनकी आम लोगों में,मीडिया में,अकादमिक जगत में पेशेवर साख है,वे सरकार या विपक्ष के भोंपू नहीं हैं,आप मेरी फेसबुक वॉल पर नोट नीति पर लिखी पोस्ट देखें और बताएं कि कहां पर कीचड़ उछालू बहस चलायी गयी है।

चौहानजी ! फेसबुक कोई किताब नहीं है ,यह तुरंत कमेंटस करने और तुरंत संवाद का मीडियम है,आप इस मीडियम पर लिखेंगे तो इसके अनुरूप ही लिखेंगे,इस पर किताब के अनुरूप या पत्रिका के अनुरूप नहीं लिखा जा सकता,हां किताब या पत्रिका के लिखे को शेयर कर सकते हैं।

मैं उम्मीद लगाए बैठा हूँ कि नोट नीति के 50 दिन गुजर गए हैं आप इस समस्या पर जरूर लिखेंगे,आप यह भूल जाएं कि मैंने क्या लिखा है,मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ,मैं आपके जैसा विद्वान और ज्ञानी भी नहीं हूँ।मैं नागरिक के नाते लिखता हूँ और नागरिक के नाते ही यहां संवाद करता हूँ।नागरिक के नाते आपके कुछ सरोकार भी बनते हैं जिनको आप मुझसे बेहतर जानते हैं,आप नागरिक के रूप में यहां लिखें !

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

हिन्दू धर्म महान!कालाधन महान !

पीएम नरेन्द्र मोदी की जनविरोधी इमेज क्रमशः बेनकाब हो रही है।लेकिन वे अभी भी मीडिया में बादशाह हैं!उनका जलवा देखने लायक है,हर चैनल उनके हर भाषण को लाइव टेलीकास्ट करता है,वे जब तक बोलें लाइव प्रसारण अबाधित चलता रहता है।यह सुविधा अभी किसी भी नेता के पास नहीं है।राहुल गांधी-केजरीवाल-ममता बनर्जी –सीताराम येचुरी इनका किसी का भी कवरेज मोदी के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।सं
चार के इस वैषम्य का लाभ मोदीजी को मिल रहा है ।
    आरएसएस और भाजपा के टीवी कवरेज का अधिकतर समय घेरा हुआ है।टीवी कवरेज ने ही मोदी का कद सामान्य से असामान्य बनाया है।जब तक टीवी कवरेज के अ-संतुलन को विपक्ष दुरूस्त नहीं करता,जमीनी हकीकत में कोई अंतर नहीं आएगा।यह सच है जमीनी स्तर पर जनता परेशान है और बड़े पैमाने पर गरीबों और मजदूरों को नोट नीति ने आर्थिक नुकसान पहुँचाया है।हम सब मध्यवर्ग के लोग इस नुकसान को देखने और सुनने को तैयार नहीं हैं,इसने मध्यवर्ग के मन में गरीबों और मजदूरों के प्रति बैठी नफरत और दूरी को एकबार फिर से उजागर कर दिया है,इससे वे लेखक और बुद्धिजीवी भी बेनकाब हुए हैं जो बातें जनता की करते हैं लेकिन संकट की इस अवस्था में उनको परेशान आदमी जनता नजर ही नहीं आ रहा !

इसके विपरीत उनको कालेधन ,मोदी की महानता,कांग्रेस के 70साल के दुष्कर्म और वाम की कमजोरियां ही याद आ रही हैं।जबकि हकीकत यह है नोट नीति के कारण आम जनता की परेशानियों को पहले हल करने पर ,उन समस्याओं को सामने लाने पर जोर होना चाहिए,लेकिन हम सब इधर-उधर भाग रहे हैं।

मोदीभक्त इस बात से भी परेशान हैं कि हमारे जैसे लोग अहर्निश मोदी के खिलाफ क्यों लिखते रहते हैं ॽअथवा विपक्ष मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार क्यों कर रहा है ॽमोदीजी तो सही काम कर रहे हैं ॽआज समस्या यह नहीं है कि मोदीजी के खिलाफ कौन क्या बोल रहा है ,समस्या यह है नोट नीति के भंवर में से देश कैसे निकलेगा ॽ पहले ही इस भंवर में लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी को पामाली की ओर ठेल दिया गया है।देश के हर नागरिक को नोट नीति ने परेशान किया है,कष्ट दिए हैं,ये ऐसे कष्ट हैं जो जनता को मिलने नहीं चाहिए लेकिन मिले हैं,जिनको कष्ट मिले हैं या जिनकी नौकरी चली गयी ये वे लोग हैं जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया,टैक्सचोरी नहीं की,कालाबाजारी नहीं की,कालेधन को हाथ तक नहीं लगया,बेइंतहा ईमानदार थे फिर भी उनको तकलीफें उठानी पड़ रही हैं।

मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूँ , आज तक मेरे विश्वविद्यालय की एसबीआई ब्रांच मुझे नियमानुसार एक भी बार 24 हजार रूपये नहीं दे पाई है,मैं कईबार जाकर लौट आया,जितनीबार गया काउंटर पर यही कहा गया 24 हजार नहीं मिलेंगे,मैंने प्रतिवाद में पांच हजार ,सात हजार लेने से इंकार किया,मैं हर महिने 30हजार रूपया आयकर देता हूं,मेरे पास कोई कालाधन नहीं है,भाड़े के घर में रहता हूँ,कार नहीं है,सामान्य मध्यवर्गीय जिन्दगी जीता हूँ।लिखने-पढ़ने की आदत है।इसके बावजूद यदि मैं अपना पैसा बैंक से नहीं निकाल सकता तो आप कल्पना करें आम आदमी को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा,मैं नौकरी करता हूँ,लेकिन पैसा नहीं है,वे लोग जिनकी नौकरी चली गयी ,वे कैसे गुजारा करेंगे ॽयह सामान्य सच है कि भयानक सच है,यदि इस सच को देखकर आपको बेचैनी नहीं होती तो मैं यही कहूँगा आपकी नागरिकचेतना मर गयी है।आपका नागरिक व्यक्तित्व खत्म होगया है,आप गुलाम हैं और गुलामी को आप मौज में गुजारें, गुलामी में आपको कोई बेचैनी नहीं होगी।

आज यह बेमानी है कि मोदी फासिस्ट हैं या अति-राष्ट्रवादी हैं,घृणा के प्रचारक हैं या सौजन्य के प्रतीक हैं,मोदीजी सभ्य हैं या असभ्य हैं ! क्योंकि आपने गुलामी को अपनी आदत,संस्कार बना लिया है।आपका हिन्दूमन आपको कभी नागरिक की तरह सोचने नहीं देता,अन्य के कष्टों को देखकर मन में कभी प्रतिवाद करने की इच्छा नहीं होती,आपके पास बुद्धि है,डिग्री है,शोहरत है,पद है,सुविधा है,मोदीभक्ति का तमगा है,तुम कार में चलते हो,कार्ड से पेमेंट देते हो,बैंक से लेकर बिग बाजार तक तुमको कहीं पर भी दो हजार रूपये मिल जाते हैं और तुम खुश हो,क्योंकि तुम सुरक्षित जीवन जी रहे हो ! ध्यान रहे गुलाम को भी यही सब चाहिए,गुलाम मानसिकता अन्य को देख नहीं पाती !

मैंने जब हिन्दूमन से नोट नीति को जोड़ा तो अनेक हिन्दुओं को कष्ट हुआ,मैं साफ कह दूँ ,मैं हिन्दूमन,हिन्दू संस्कार,हिन्दू आदतें आदि को मानसिक गुलामी की जंजीरें मानता हूँ।मोदीजी बड़े ही कौशल के साथ इन जंजीरों का अपने पक्ष में दुरूपयोग कर रहे हैं,वे नोट नीति की आड़ में,तथाकथित कालेधन और बेनामी संपत्ति के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम की आड़ में हिन्दुओं को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं। वे फासिस्ट हैं या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण है उनका जनविरोधी चेहरा जो नोट नीति की आड़ में छिपा हुआ है।

अब तक जितने लोगों के यहां छापे पड़े हैं ये वे लोग हैं जिनको आयकर वाले पहले से जानते थे,इनमें कोई भी नया आदमी नहीं है।कालेधन का न मिलना,नए कालेधन के मालिक का मिलना ,लेकिन कालेधन का धुंआधार प्रचार करते रहना,सिर्फ हिन्दू मन से ही संभव है,धार्मिक मन भगवान की जितनी सेवा करता है भगवान के विपरीत उतना ही आचरण करता है।दिलचस्प बात है अब तक पकड़े गए कालेधन के मालिक अधिकांश हिन्दू हैं!सवाल यह है जैन मतावलम्बी कालेधन वाले कितने अमीर पकड़े गए ॽ जबकि धंधे में जैनियों का वर्चस्व है।

उल्लेखनीय है धर्म के प्रसार के साथ पाप का प्रसार तेजी से होता है।जितना धर्म रहेगा पाप उससे ज्यादा रहेगा।धर्म की महत्ता तब तक है जब तक समाज में पाप और दुष्कर्मों का साम्राज्य बना रहे,जिन समाजों में पाप और दुष्कर्म नहीं हैं वहां धर्म भी नहीं है।धर्म का उद्घोष पाप की सत्ता-महत्ता का जयघोष है,इसी तरह कालेधन के खिलाफ मोदीजी का जयघोष इस बात का संकेत है कालाधन महान है,अजेय है।

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

मोदी का नशा और कर्णसिंह चौहान

          हिंदी के प्रमुख आलोचक कर्णसिंह चौहान का नोट नीति पर पक्ष देखकर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ,असल में अधिकतर हिंदी बुद्धिजीवी और मध्यवर्ग के लोग वैसे ही सोचते हैं जैसे कर्णसिंहजी सोचते हैं।मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ कि कर्णसिंह चौहान हमेशा परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखने के पक्षधर रहे हैं लेकिन मोदीजी की नोट नीति को लेकर उनके पास कोई परिप्रेक्ष्य ही नहीं है।मैं इस पोस्ट में मोदी सरकार ने विगत ढाई साल में क्या किया उसका लेखा-जोखा पेश नहीं करने जा रहा।यहां पर सिर्फ चौहानजी की टिप्पणी और उससे जुड़ी समस्याओं तक ही सीमित रखूँगा।

नोट नीति के संदर्भ में पहली बात यह है कि यह नीति सभी किस्म की सामान्य संवैधानिक मान्यताओं और प्रतिवद्धताओं को ताक पर रखकर लागू की गयी है।इसका सबसे खतरनाक पहलू है कि इस पर सरकार ने खुलकर न तो मंत्रीमंडल में विचार किया और न ही रिजर्व बैंक ने व्यापक पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला लिया।जिस दिन रिजर्व बैंक ने फैसला लिया उसी दिन बिना किसी बहस मुबाहिसे के मंत्रीमंडल ने पास कर दिया,अब तक के उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि रिजर्व बैंक के मात्र 8 अधिकारियों ने इसका फैसला लिया।जबकि 24 अधिकारी पूरे बोर्ड में हैं,अधिकांश के पद खाली रखे हुए हैं,मैं उन अधिकारियों के विवरण और ब्यौरों में नहीं जाना चाहता।

बुनियादी बात यह है कि नोट नीति सीधे नागरिक के संविधान प्रदत्त हकों पर हमला है ,साथ ही रिजर्व बैंक की जो नागरिकों को दी गयी प्रतिज्ञा है उसका उल्लंघन है।अब तक मोदी सरकार, सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं बता पायी है कि उसने यह फैसला कैसे लिया या फिर किन लोगों ने यह फैसला लिया,यहां तक कि वित्त मंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक में रिजर्व बैंक के गवर्नर हाजिर नहीं हुए हैं।संसद में भी सरकार ने फैसले के आधिकारिक दस्तावेज पेश नहीं किए हैं,स्वयं प्रधानमंत्री संसद से भागते रहे हैं।आश्चर्य की बात है कि कर्णसिंह चौहान को इनमें से कोई भी समस्या बहस योग्य नहीं लगती ! यही है हिंदी का आलोचनात्मक विवेक!

चौहानजी, हम गाली नहीं लिखते,व्यंग्य भी नहीं लिखते,सच है जो लिखा है,हम जो भी लिखते हैं अपने विवेक से लिखते हैं,यह संयोग की बात है कि माकपा से मेरा भी संबंध रहा है और आपका भी।मैं माकपा के कामकाज और नीतियों को लेकर माकपा के सदस्य रहते हुए आलोचनात्मक नजरिया रखता था और मैंने जमकर उनकी लिखकर मुखालफत की है,लेकिन मैंने आपके उस तरह के लेखन को नहीं देखा है।माकपा के प्रति मेरा आलोचनात्मक रूख जगजाहिर है,सैंकड़ों लेख लिखे हैं,यहां तक कि पूरी किताब लिखी है,लेकिन आप हमेशा कन्नी काटते रहे हैं !

चौहानजी, मोदीजी कोई साधारण नेता नहीं है,वह सामान्य पीएम नहीं है, यह मेरी मोदी के उदय से ही समझ रही है,लेकिन मैंने गालियां नहीं लिखीं।मैं वामपंथियों की हिमायत नहीं करना चाहता वे अपनी हिमायत करने में सक्षम हैं , लेकिन आपने नोट नीति के पक्ष या विपक्ष में सीधे लिखने से हमेशा परहेज करके अपने मोदीप्रेम को ही व्यक्त किया है,आप समझदार हैं,आपका इस तरह प्रच्छन्न मोदीप्रेम हमारे गले नहीं उतरता ! हम तो चाहेंगे आप खुलकर लिखें,प्रच्छन्न रूप में न लिखें ! खुलकर जैसे मेरे ऊपर हमला करते हैं वैसे ही खुलकर मोदी के पक्ष में लिखकर मोदी विरोधियों पर हमले करें ! हम देखें तो सही आप किस तरह सोचते हैं !

अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है मोदीजी के पक्ष में आपके पास कोई तर्क नहीं है,हमसब क्या कह रहे हैं इस सबको गोली मारिए ! कम से कम जनता की जो क्षति हो रही है उसकी ओर ही आँखें उठाकर देख लेते ! बैंकों की जो क्षति हो रही है उसे ही देख लिया होता !

लेकिन आपने 8नवम्बर के बाद से अपनी वॉल पर इन सब पर कुछ नहीं लिखा,हां,मेरे ऊपर दो पोस्ट जरूर लिखीं,मैं जानता हूँ आप मुझे सच में प्यार करते हैं ! आपको मैं लिख-लिखकर परेशान करता रहता हूँ,मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ,आप थोड़ा नाराज तो होंगे लेकिन मैं क्या करूँ मोदी सरकार लगातार जनविरोधी फैसले ले रही है और आप जैसे लोग चुप तमाशा देख रहे हैं!

चौहानजी, नोट नीति सफल रही है,आपकी आशंकाएं गलत हैं,मोदीजी जो चाहते थे वह हो चुका है,जो मुद्रा जनता के पास थी वह खींचकर बैंकों में आ चुकी है।इसलिए इस नीति की असफलता का तो सवाल ही बेमानी है।

नोट नीति का लक्ष्य था नोटों को बटोरकर बैंकों में लाना,यह काम हो गया है। इसका लक्ष्य कालाधन खत्म करना नहीं था,इससे आतंकियों की रसद पर भी कोई असर नहीं पड़ा,इससे चुनावों में कालेधन के इस्तेमाल पर भी कोई खास असर नहीं पड़ेगा,हां,एक काम जरूर हुआ है,बैंकों का प्रतिदिन का तीन हजार करोड़ रूपये का नुकसान हो रहा है,वे धंधा नहीं कर पा रही हैं,बाजार का प्रतिदिन का एक लाख तीस हजार करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है,लाखों मजदूरों की नौकरी चली गयी है।सौ से ज्यादा लोग मारे गए हैं।एक भी कालेधन का मालिक पकड़ा नहीं गया है और न उसने आत्महत्या की है न उसे हार्ट अटैक हुआ है।बाजार से लेकर कल –कारखानों तक नोट नीति ने जो तबाही मचायी है वह हम सबके लिए चिंता की बात है लेकिन आपके लिए ये कोई समस्याएं ही नहीं हैं,आप इतने भोले या अनजान तो नहीं हैं कि यह सब न जानते हों,मैंने इन सब पर लगातार लिखकर वही किया है जो एक सचेत नागरिक को करना चाहिए।लेकिन आपकी इन सब सवालों पर चुप्पी स्तब्ध करने वाली है ! मैं नहीं कहूँगा आप मोदी भक्त हैं,भाजपा के साथ हैं,लेकिन आप चुप हैं और यह चुप्पी सिर्फ आपको ही नहीं हिंदी के आलोचकों को कठघरे में खड़ा कर रही है आप हिंदी आलोचना के प्रतिनिधि पात्र हैं!

चौहानजी,आपकी फेसबुक जैसे माध्यमों को लेकर बुनियादी समझ ही गलत है।फेसबुक का उदय ही हुआ है रीयलसटाइम संप्रेषण के लिए,इसमें लिखा अजर -अमर नहीं है,यह सामान्य संचार है जिसे हम सब अनौपचारिक बातचीत में करते हैं।यहां लिखे का ऐतिहासिक महत्व नहीं है,यहां तो सिर्फ संचार है और संप्रेषण है,यहां विचारधारा गौण है।फेसबुक पर अभियान नहीं चलाए जाते।संचार का प्रवाह रहता है इसमें एक नहीं अनेक किस्म के प्रवाह हैं।यह एकदम खुला संचार है,यहां हर बात परिवर्तन के दवाब में है,कोई चीज स्थिर नहीं है,स्थिर और टिकाऊ कोई चीज है तो परिप्रेक्ष्य,परिप्रेक्ष्य यहां पर धीमी गति से बदलता है,लेकिन आप तो नोट नीति पर परिप्रेक्ष्य के बिना फुटकल ढ़ंग से सोचते हैं जो कम से कम एक बड़े आलोचक के लिए सही नहीं लगता।

कर्णसिंह चौहान की मूल पोस्ट -

[ यह टिप्पणी जगदीश्वर जी की पोस्ट पर की गई जो ८ नवंबर की विमुद्रीकरण-पुनर्मुद्रीकरण की घोषणा के बाद विपक्षी दलों की तर्ज पर वामपंथी-सैक्युलर बुद्धिजीवियों की तरफ से इसके खिलाफ छेड़े अभियान का हिस्सा है । इस तरह के अभियान में न केवल भाषा की शिष्टता का विनाश हुआ है, तमाम तरह की मर्यादाओं का विनाश हुआ है । यह विमर्श की भाषा न होकर हिंसक भाषा है जो किसी चीज का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकती । इस अंध-विरोध ने न केवल विरोधी का मजाक उड़ाया है बल्कि जनचेतना को भी उपहास की वस्तु बना दिया है । विमुद्रीकरण की पैरोकार सरकार को इस विरोध से जितना बल मिला है शायद उतना उसके तमाम प्रचारतंत्र से नहीं । यह विरोध प्रकारांतर से भ्रष्टाचार और कालेधना का हिमायती नजर आता है और उसके विरुद्ध जनता की भावना को विरूपित करता है । इस पोस्ट में उन्होंने एक व्यंग्य बनाने की कोशिश की है जिसमें प्रधानमंत्री को हिंदू का प्रतीक, उन्हें मिल रहे जन-समर्थन को हिंदू जनता के पुनर्जन्म में विश्वास से जोड़ने आदि की कोशिश की गई है । ]

जगदीश्वर जी,

अब तक इस विषय पर लिखी सबसे खराब और भ्रांत पोस्ट है यह । विमुद्रीकरण-मुद्रीकरण, मोदी, हिंदू, पुनर्जन्म को लेकर आपने जो व्यंग्यनुमा कुछ बनाने की कोशिश की है, वह न व्यंग्य है न विचार । आपका और आपकी तरह अभियान में लगे तमाम लोगों का संपूर्ण विरोध क्यों जनता के सामने हताशा-निराशा पर बार-बार टूट रहा है ! आप इसे न समझने की कोशिश करते हैं, न स्वीकारने की । बस रात-दिन गाली-गलौज में लगे हैं ।

इसे समझने के लिए जनता पर इस या उस बहाने दोषारोपण करने की जगह अगर केवल इतना समझ लेते कि जनता, इसे सही या गलत जिस रूप में आप लें, भ्रष्टाचार, कालेधन से मुक्ति का अभियान समझ रही है । यह भी कि जनता ने इस रोग को ७० साल फलते-फूलते देखा है और इससे मुक्ति उसके लिए सर्वोपरि है । जब-जब उसे इसके विरुद्ध आवाज बुलंद करने या आक्रोश जाहिर करने का अवसर मिला उसने भरपूर साथ दिया । विरोधी दल या आप सब जब रात-दिन उसके खिलाफ गाली-गलौज करते हैं तो वह सही-गलत रूप में आपको भ्रष्टाचारियों, कालाधनधारियों का हितैषी समझती है ।

अगर यह मुहिम विरोध पक्ष या बुद्धिजीवियों के अभियान से या इसे चलाने वालों की बदनीयती या बद-इंतजामी की वजह से असफल रही तो यह जन-आकांक्षा उसी तरह पछाड़ खाकर गिरेगी जैसे पहले कई बार जे.पी. आंदोलन या अन्ना आंदोलन में गिरी है । यह गिरना कई दशकों का गैप बना जाता है ।

वैसे फिलहाल आपने जो मजमा जमा रखा है उसमें कुछ भी कहना बेकार ही है । आप लोग किसी भी अलग राय को कुछ भी ब्रांड करने में पीछे नहीं रहने वाले हैं । धीरे-धीरे असहिष्णुता की ऐतिहासिक कमी को थोड़े से समय में पूरा करना जो है । फिर भी आपके अभियान के लिए शुभकामनाएँ ।

प्रतिवाद का छंद, मीडिया और राहुल देव

     पीएम नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने और अब नोट नीति के लागू होने के बाद फेसबुक से लेकर सामान्य मध्यवर्गीय-निम्न मध्यवर्गीय लोगों में उनकी जय-जयकार सुनने के बाद अनेक लोग परेशान हैं,अनेक लोग मोदी पर फिदा है,अनेक जुदा हैं और वफादार हैं!

कुछ लोग हैं जो मोदी की इमेज के बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को देख रहे हैं,कुछ किं-कर्त्तव्य विमूढ़ हैं ! मोदी के सत्ता में आने का सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा है कि उसने प्रतिवाद के छंद को ही तोड़ दिया है,अब लोग प्रतिवाद की भाषा में नहीं सहमति की भाषा में हर चीज को देखने लगे हैं ,यह परिवर्तन बहुत ही खतरनाक और त्रासद है ! इस परिवर्तन के अनेक जागरूक बुद्धिजीवी भी शिकार हैं।

मोदी का सत्ता में आना,कोई अनहोनी घटना नहीं है,अनहोनी घटना है प्रतिवाद के छंद का टूट जाना। इसने प्रतिवाद का अभाव पैदा किया है।इस स्थिति से कैसे निकलें इस पर ध्यान देने की जरूरत है।मोदीजी को कप्यूटर की क्लिक ने ही महान बनाया है, एक ही क्लिक में जानने और हजम करने की अनक्रिटिकल मानसिकता ने प्रतिवाद के छंद को तोड़ा है।क्लिक करके जानने की आदत ने ही हमारे अंदर छिपे परपीड़क आनंद को हवा दी है।

आज वास्तविकता सामने घट रही है लेकिन हम उसे जानने की कोशिश नहीं करते।इसका प्रधान कारण है टीवी पर उसका अदृश्य हो जाना।टीवी स्क्रीन से हम अपनी राय बना रहे हैं।मीडिया में हम जब चीजें देखते हैं तो हमें यही बताया जाता है कि मीडिया तो वही दिखाता है जो घट रहा है या जो हम देखना चाहते हैं।आज एक पत्रकार चिंतक राहुल देव ने फेसबुक पर तकरीबन इसी तरह की बातें लिखी हैं।ये जनाब लंबे समय से मीडिया से जुड़े रहे हैं। राहुलजी की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के बारे में नहीं बोलना चाहता।वे मोदीजी के साथ हैं।मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं। लेकिन उन्होंने मीडिया के बारे में फेसबुक पर जो लिखा है वह बुनियादी तौर पर गलत है।

मीडिया में आमतौर पर जिस चीज को पेश किया जाता है वह है अनुपस्थित ।यह वह अनुपस्थित है जो आमतौर पर क्षितिज से गायब है,यह खाली स्पेस या स्थान या समय को भरने का सामान है,वस्तु है।इसकी कला की तरह कोई सौंदर्यबोधीय अपील नहीं होती।कला की तरह इसमें यथार्थ की अभिव्यंजना नहीं होती।इसे यथार्थ के साथ जोड़कर भ्रमित नहीं होना चाहिए।राहुलदेव और उनके जैसे तमाम मीडियाकर्मी चाहें तो बौद्रिलार्द के मीडिया संबंधी दार्शनिक विवेचन को पढ़कर ज्ञान लाभ कर सकते हैं।मीडिया प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह यथार्थ को ही ध्वस्त कर देता है।यथार्थ का केरीकेचर करता है।वह अपने को यथार्थ की तरह पेश करता है।मीडिया प्रस्तुतियों में यथार्थ को एक भिन्न आयाम में ले जाता है जिसे थर्ड डायमेंशन कहते हैं।इसके जरिए वह जहां एक ओर यथार्थ को हजम कर जाता है वहीं यथार्थ के सिद्धांतों के बारे में ही सवाल खड़े कर देता है।वहां यथार्थ नहीं होता.बल्कि खाली स्थान होता है।

मोदी के प्रचार की खूबी यह नहीं है कि वे यथार्थ को पेश कर रहे हैं ,बल्कि इसके उलट वे यथार्थ को तो पेश ही नहीं कर रहे,यही काम मीडिया कर रहा है।मीडिया प्रस्तुतियों में यथार्थ का गायब हो जाना सामान्य घटना नहीं है। मीडिया में प्रस्तुत या मोदी के भाषणों मे प्रस्तुत यथार्थ में सम-सामयिकता तो है लेकिन यथार्थ नहीं है,यथार्थ की गंभीरता नहीं है।मोदी की समूची प्रस्तुति के निशाने पर प्रतिवाद का छंद रहा है।वे शुरू से प्रतिवाद के छंद पर हमला करते रहे हैं।नोट नीति के साथ भी उन्होंने प्रतिवाद के छंद को ही निशाना बनाया है,वे लगातार प्रतिवाद पर हमला कर रहे हैं।प्रतिवाद के प्रति उनका एकदम असहिष्णु भाव है।

भारत में प्रतिवाद के रूप एक नहीं अनेक हैं लेकिन मोदीजी ने सभी प्रतिवादी रूपों को एक ही बंडल में बांध दिया है।हम सब जानते हैं कि देश में साम्प्रदायिकता-आरएसएस-भाजपा आदि का विरोध करने वाले विभिन्न रंगत के राजनीतिक दल और स्वयंसेवी संगठन हैं इनमें कोई विचार साम्य नहीं है,लेकिन मोदीजी ने पक्ष और विपक्ष में इस तरह वर्गीकरण किया है कि प्रतिवाद की विविधता ही खत्म हो गयी है।अब सामूहिक तौर पर मोदी के साथ हो या मोदी के विरोध में हो।इस बुनियादी धारणा का व्यापक असर देखने में आ रहा है।

मोदीजी के खिलाफ बोलने वाले संगठन और विचारधाराएं अनेक हैं।उनके अपने स्वतंत्र राजनीतिक कार्यक्रम हैं।मोदी और मीडिया जब पक्ष-विपक्ष में वर्गीकरण करते हैं तो प्रतिवाद के छंद को ही तोड़ देते हैं। प्रतिवाद का छंद तब ही अच्छा लगता है जब वह अपनी मूल भावना और विचारधारा के साथ राजनीति में व्यक्त हो। प्रतिवाद के वैविध्य को मीडिया ने विपक्ष में फूट के नाम से उछाला है। यहां तक कि गूगल में भी मोदी के नाम से क्लिक करके पक्ष -विपक्ष में चीजें खोजने की आदत पड़ गयी है।गूगल या इंटरनेट पर मोदी का शोर वैसे ही है जैसा वह टीवी या अखबार में है।इसी वर्गीकरण के पक्ष -विपक्ष में गूगल पर आंकडों की जमकर खेती हो रही है।

मोदी की प्रस्तुतियों ने मोदी के साथ जनता के अंतर को खत्म कर दिया है।मीडिया में मोदीजी पूरी तरह जनता के साथ एकाकार हो गए हैं।जबकि यथार्थ में ऐसा नहीं है,उनको मात्र 31फीसदी जनता का समर्थन मिला था।इस अंतर को उनकी मीडिया प्रस्तुतियों में सहज ही देख सकते हैं।इसे मीडिया मेनीपुलेशन भी कह सकते हैं।मोदी को महान बनाने के लिए मीडिया ने पहले भाजपा में मोदीजी के साथ उठे मतभेदों और अंतरों को छिपाया ,भाजपा और मोदी को एकाकार करके पेश किया।इसके बाद मोदी और जनता के बीच के अंतर को खत्म किया।मीडिया में गंभीरता से देखेंगे तो मोदी और जनता के बीच में कोई अंतर दिखाई नहीं देता।जबकि जीवन में अंतर हैं,राजनीति में फर्क है।
       मोदीजी के नजरिए को सिद्धांततः ´निषेध का निषेध´ के नजरिए से देखें।वे पहले कांग्रेस ने जो कहा उसका निषेध करते हैं,फिर स्वयं जो कहते हैं,कुछ समय बाद उसका निषेध करते हैं,इन सब निषेधों का तीव्र गति से प्रचार,अति -प्रचार करते हैं और यही वह अति -संप्रेषण की कला है जिसके जरिए वे विभिन्न रंगत के प्रतिवाद और अंतरों को निशाना बनाते हैं,इस समूची प्रक्रिया में जो चीज नष्ट हुई है वह है भारत का यथार्थ ।
     आज आम आदमी का मोदी से संपर्क है लेकिन भारत के यथार्थ से संबंध टूट चुका है।वे जो कुछ भी कहते हैं उनकी सरकार उससे तत्काल पलट जाती है।नोट नीति के संदर्भ में यह बात खासतौर पर सामने आई है।हर रोज रिजर्व बैंक ने पीएम के कहे का उल्लंघन किया कल जो नियम बनाया उसे दूसरे दिन ही बदल दिया।बार बार बदलना,निषेधका निषेध करना,असल में प्रतिवाद के छंद को स्थिर नहीं रहने देता।

कर्णसिंह चौहान के बहाने उठे सवाल

        कल मैंने जब हिंदी के आलोचक कर्णसिंह चौहान को अंध मोदीभक्त की तरह मोदीजी की नोट नीति की हिमायत में फेसबुक पर पढा तो मैं सन्न रह गया।वे बेहतरीन व्यक्ति हैं,सुंदर समीक्षा लिखते हैं और उन्होंने बेहतरीन अनुवाद किए हैं।साहित्य के मर्मज्ञ हैं।लेकिन अर्थशास्त्र में वे एकदम शून्य हैं,वे हर चीज को पुराने माकपा कार्यकर्ता की तरह मात्र आस्था के आधार पर देख रहे थे,उनके लेखन से मन बहुत खराब हुआ,उनके चाहने वाले अनेक मित्रों ने उनके नोट नीति के समर्थन पर मुझे फोन पर उनके रूख पर हैरानी व्यक्त की।तब मैंने सोचा कि हमें समस्या की जड़ों में जाना चाहिए।यह मसला एक लेखक का नहीं है,बल्कि उससे कहीं गहरा है।
        भारत इस समय बहुत गंभीर संकट से गुजर रहा है।शिक्षितों का एक बड़ा वर्ग इस संकट को संकट ही नहीं मान रहा।संकट यह नहीं है कि बैंक में लाइन लगी है,एटीएम में पैसा नहीं है,संकट यह नहीं है कि किसान कर्ज में डूबा हुआ है और वे आत्महत्या कर रहे हैं, संकट यह है हम सबकी आँखों से यथार्थ रूप में ठोस मनुष्य और उसकी तकलीफें गायब हो गयी हैं।हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब मनुष्य गायब हो गया है।चीजें गायब हो गयी हैं। बौद्रिलार्द की मानें तो चुनौती यह है कि यथार्थ ही अदृश्य हो गया है।पहले समस्या यह थी कि साहित्य और मीडिया में कोई प्रवृत्ति आती और जाती थी,आंदोलन आते और जाते थे,राजनीतिक दल सत्ता में आते और जाते थे,लेकिन मनुष्य के यथार्थ पर हमारी पकड़ बनी हुई थी,हम ठोस रूप में मनुष्य को जानते थे,उसके दुखों को जानते थे,ठोस हकीकत के रूप में मनुष्य की समस्याओं पर बातें करते थे।लेकिन नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद से समूचा पैराडाइम ही बदल गया है।यही वह दौर है जिसमें मनुष्य और उसका यथार्थ अदृश्य हुआ है।अब हर चीज,घटना,वस्तु, फिनोमिना आदि हठात् आ जा रहे हैं।हम देखरहे हैं लेकिन कुछ भी करने,हस्तक्षेप करने में असमर्थता महसूस करते हैं।

यथार्थ के अदृश्य हो जाने के कारण हमने यथार्थ पर बातें खूब की हैं,हत्याओं पर बातें खूब की हैं,लेकिन हत्या का यथार्थ हमने कभी महसूस नहीं किया,मसलन् 2002 के गुजरात के दंगों के बारे में जितना लिखा और बोला गया उतना तो संभवतःभारत-विभाजन के समय की विभीषिका पर भी नहीं बोला गया।इसके बावजूद दंगों के यथार्थ को हम पकड़ने में असमर्थ रहे।दंगे हुए,लोग मारे गए,लेकिन पीड़ितों का दर्द और त्रासदी गायब रही।यानी हम जब से वर्चुअल रियलिटी और इंटरनेट की दुनिया में दाखिल हुए हैं तब से यथार्थ का साक्षात अनुभव और उसकी विचारधारात्मक समझ गायब हुई है। सवाल यह है यथार्थ के अदृश्य हो जाने के पहले हमने यथार्थ को जानने की कितनी कोशिश की थी ॽ

यही हाल नोट नीति का है.आज नोट नीति के संकट को हम समझ नहीं पा रहे हैं और सरकार के इकतरफा प्रचार अभियान से सीधे प्रभावित हैं तो सबसे पहले तो यही सवाल उठता है हम बुद्धिजीवी नोट नीति लागू होने के पहले भारतीय अर्थव्यवस्था,कालेधन, आतंकवाद आदि के बारे में कितना जानते थे ॽ हिन्दी में बहुत छोटा अंश है जो इन समस्याओं के बारे में जानता है और उन समस्याओं का विश्लेषण करके लिखता रहा है। अधिकतर बुद्धिजीवियों में कॉमनसेंस से विचार विमर्श चलाने की प्रवृत्ति है।ऐसी स्थिति में यदि हिंदी का कोई लेखक-आलोचक-पत्रकार यदि नोट नीति का भक्त नजर आता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

मसलन् आप हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं उठाकर आसानी से देख सकते हैं कि हिंदी में अर्थशास्त्र के विषयों पर कितने हिंदी पत्रकार नियमित अखबारों में लिखते रहे हैं अथवा कितने हिंदी के आलोचक हैं जो साहित्यिक पत्रिकाओं या अपनी किताबों में अर्थशास्त्र के विषयों पर लिखते रहे हैं।यह ठोस हकीकत है अर्थशास्त्र के विषयों पर लिखने वाले समझदार किस्म के एक दर्जन बुद्धिजीवी भी हिंदी के पास नहीं हैं।ऐसी स्थिति में यदि किसी लेखक को नोट नीति में आशा की किरण नजर आए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

असल बात यह है कि यथार्थ के कारकों को जाने बिना यथार्थ पकड़ नहीं सकते.कल जब हिंदी के एक प्रतिष्ठित लेखक को मैं नोट नीति पर बलिहारी भाव-भंगिमा में फेसबुक पर लिखते देख रहा था तो मुझे उनकी स्थिति देखकर तकलीफ हो रही थी,मैं जानता हूँ कि उन्होंने अर्थशास्त्र को न तो पढा है और न कभी उस पर लिखा है,ऐसे में अर्थशास्त्र का सच वे कैसे बता सकते हैं ! वे तो अपनी चेतना के सबसे निचले धरातल पर खड़े होकर बातें कर रहे थे,उनकी भंगिमा अर्थशास्त्र के ज्ञान से नहीं मोदी की नोट नीति के प्रति आस्था से बनी थी।

नोट नीति से जुड़े अर्थशास्त्र के सवाल हैं,ये आस्था के सवाल नहीं हैं ,ये कॉमनसेंस के सवाल नहीं है,ये अर्थशास्त्र के गंभीर जटिल संबंधों और संश्लिष्ट प्रक्रिया से जुड़े सवाल हैं और इन सवालों पर हमें विशेषज्ञों की राय को पढ़ने और समझने की जरूरत है।

चूंकि हिंदी के बुद्धिजीवियों से हमारा संबंध ज्यादा है इसलिए हम यही कहना चाहते हैं कि कहानी या उपन्यास पर बात करने के लिए महज पाठक होना ही काफी नहीं है।यदि आलोचना करनी है तो आलोचकीय विवेक ,आलोचना के उपकरणों और आलोचना की विधागत परंपरा का ज्ञान होना भी जरूरी है।मात्र कृति पढ़कर पाठकीय अनुभव के आधार पर आलोचना विकसित नहीं हो सकती।

मसलन् ,किसी बड़े लेखक ने लिखा है इसलिए उसकी रचना अच्छी ही होगी,यह निष्कर्ष सही नहीं है।बड़े लेखक की रचनाएं भी कमजोर होती है,महज आस्था के आधार पर हम यह कहें कि प्रेमचंद या नागार्जुन की सभी रचनाएं क्लासिक हैं,तो गलत होगा।जिस तरह साहित्य में लेखक के प्रति आस्था के आधार पर रचना के बारे में मूल्य-निर्णय करना गलत है ठीक वैसे ही नोट नीति के बारे में मात्र मोदीजी के प्रति आस्था के आधार पर समर्थन देना ,नोट नीति के समर्थन में फतवे देना गलत है।

बुधवार, 30 नवंबर 2016

फिदेल की माँ , धर्म और गरीबी

        फिदेल कास्त्रो को स्पष्टवादिता का संस्कार क्रांति से मिला। क्रांतिकारी होने के नाते वे हर बात को स्पष्ट ढ़ंग से कहते थे।फिदेल का मानना था ´क्रांतिकारी राजनीतिज्ञ हर चीज के बारे में स्पष्ट और बेबाक बोलते हैं।´ यही स्पष्टवादिता क्रांतिकारियों को अभिव्यक्ति के मामले में अन्य विचारधारा के नेताओ से अलग करती है।मार्क्सवादियों में धर्मसंबंधी निजी सवालों के उत्तर देते समय अनेक किस्म के विभ्रम नजर आते हैं।लेकिन फिदेल के अंदर कोई विभ्रम नजर नहीं आते।

जब एफ.बिट्टो ने फिदेल से सवाल पूछा कि आपका जन्म धार्मिक परिवार में हुआ है ॽ तो फिदेल ने कहा इस सवाल का मैं किस तरह जवाब दूँ ॽ मैं इस सवाल का इस तरह उत्तर देना चाहूँगा,पहली बात यह कि मैं एक धार्मिक राष्ट्र से आता हूँ,दूसरी बात यह कि मैं एक धार्मिक परिवार में जन्मा,मेरी माँ लीना धार्मिक महिला थीं।मेरे पिता भी धार्मिक व्यक्ति थे।गांव में मेरा जन्म हुआ और मेरी माँ भी गांव की ही रहने वाली थीं।वह क्यूबा की रहने वाली थी।जबकि पिता गलीशिया,स्पेन के अत्यंत गरीब किसान थे।

फिदेल की माँ को किसी ईसाई मिशनरी ने धर्म की शिक्षा नहीं दी थी,वह एकदम अनपढ़ थीं। लेकिन उनकी गहरी धार्मिक आस्थाएं थीं।उन्होंने वयस्क होने के बाद अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा। फिदेल के पिता का नाम एंजेल था। फिदेल ने कहा ´मेरी माँ एकदम निरक्षर थीं,उसने अपने आप लिखना-पढ़ना सीखा,मुझे याद नहीं है कि उसको लिखना-पढना सिखाने के लिए कोई शिक्षक मिला था,क्योंकि उसने किसी भी शिक्षक का कभी कोई जिक्र नहीं किया।उसने बहुत परिश्रम करके लिखना-पढ़ना सीखा,मैंने कभी नहीं सुना कि वह कभी पढ़ने के लिए स्कूल गयी ,वह स्व-शिक्षित थी,उसने कभी किसी स्कूल और चर्च में जाकर कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की।मेरा मानना है उसके धार्मिक विश्वासों का स्रोत उसके परिवार की धार्मिक परंपराएं थीं।खासकर उसकी माँ (फिदेल की नानी) और माँ की माँ बड़ी धार्मिक थीं।´

बिट्टो ने फिदेल से पूछा कि क्या आपकी माँ नियमित चर्च जाती थी तो फिदेल ने कहा ´ वे नियमित चर्च नहीं जाती थीं,क्योंकि मेरा जहाँ जन्म हुआ था वह इलाका शहर से बहुत दूर गांव में पड़ता था,वहां कोई चर्च नहीं था।´

फिदेल का जहां जन्म हुआ उस गांव का नाम था बीरान,इस गांव में कुछ बड़ी इमारतें थी,कुछ रिहायशी घर थे,इन सबका स्पेनिश स्थापत्य था.चूंकि फिदेल के पिता स्पेनिश थे,अतः घर का स्थापत्य स्पेनिश था।उनके पास गांव में एक टुकड़ा जमीन का प्लॉट था,जिसमें खेती होती थी और लकड़ी का घर भी था,साथ ही पशुपालन भी करते थे।जाड़ों में पशुओं को घर के अंदर रखना होता था।घर में सूअर और गाएं थीं जिनका परिवार पालन-पोषण करता था।

दिलचस्प बात है फिदेल कास्त्रो के यहां तकरीबन बीस-तीस गाएं भी थीं, वे जब छह साल की उम्र के थे तो जाडों में घर में गायों के साथ सोते थे। फिदेल का बचपन का यह दौर गाय के गोबर और दूध के बीच गुजरा।

फिदेल की माँ की मृत्यु 6अगस्त1963 को हुई,यानी क्यूबा की क्रांति के छह महिने बाद।जबकि पिता की मृत्यु पहले ही 21अक्टूबर1956 को हो चुकी थी।उस समय फिदेल 30साल और दो महिने के थे।फिदेल ने अपनी आत्मकथा ´माई लाइफः फिदेल कास्त्रो´ में लिखा है कि वे अपनी मां के धार्मिक विश्वासों और आस्थाओं का हमेशा सम्मान करते थे।उनको एक क्रांतिकारी की माँ होने के नाते बहुत कष्ट उठाने पड़े।वे अत्यंत गरीब और सहिष्णु थीं।

धर्म और फिदेल कास्त्रो

फिदेल कास्त्रो के बारे में यह सब जानते हैं कि वे क्रांतिकारी थे,मार्क्सवादी थे,लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि फिदेल बेहतरीन धार्मिक समझ वाले व्यक्ति भी थे।फिदेल ने धर्म को लेकर जिस नजरिए को व्यक्त किया उससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है।यह सच है धर्म का जो रूप हम आज देखते हैं वह बहुत कुछ मूल रूप से भिन्न है।एक बेहतरीन मार्क्सवादी वह है जो धर्म को उसके सही रूप में समझे और धर्म की सही सामाजिक भूमिका पर जोर दे।
          हमारे यहां राजसत्ता और उसके संचालक धर्म के प्रचलित रूपों के सामने समर्पण करके रहते हैं, धर्म की विकृतियों के खिलाफ कभी जनता को सचेत नहीं करते,धर्म की गलत मान्यताओं को कभी चुनौती नहीं देते हैं ,धर्म का अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए दुरूपयोग करते हैं और इसके लिए सर्वधर्म समभाव की संवैधानिक समझ की आड़ लेते हैं।संविधान की आड़ लेकर धर्म की ह्रासशील प्रवृत्तियों को संरक्षण देने के कारण ही आज हमारे समाज में धर्म,संत-महंत,पंडे,पुजारी,तांत्रिक ,ढोंगी आदि का समाज में तेजी से जनाधार बढ़ा है,इन लोगों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है।इसके कारण समाज में अ-सामाजिकता बढ़ी है, लोकतंत्र विरोधी ताकतें मजबूत हुई हैं।

यह सच है हम पैदा होते हैं धर्मकी छाया में और सारी जिंदगी उसकी छाया में ही पड़े रहते हैं।धर्म की छाया में रहने की बजाय उसके बाहर निकलकर समाज की छाया में रहना ज्यादा सार्थक होता है। धर्म की छाया यानी झूठ की छाया । हम सारी जिंदगी झूठ के साथ शादी करके रहते हैं,झूठ में जीवन जीते हैं,झूठ से इस कदर घिरे रहते हैं कि सत्य की आवाज हमको बहुत मुश्किल से सुनाई देती है।झूठ के साथ रहते-रहते झूठ के अभ्यस्त हो जाते हैं और फिर झूठ को ही सच मानने लगते हैं। इसका परिणाम यह निकलता है कि सत्य से हम कोसों दूर चले जाते हैं।

धर्म पर बातें करते समय उसके मूल स्वरूप पर हमेशा बातें करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने की जरूरत है।धर्म को झूठ से मुक्त करने का अर्थ है धर्म को धार्मिक प्रपंचों से बाहर ले जाकर गरीब के मुक्ति प्रयासों से जोड़ना। इन दिनों धर्म को संतों-पंडितों ने अपहृत कर लिया है।अब हम धर्म के मूल स्वरूप और मूल भूमिका के बारे में एकदम नहीं जानते लेकिन उन तमाम किस्म की भूमिकाओं को जरूर जानते हैं जिनको कालांतर में धर्म के धंधेबाजों ने पैदा किया है। सवाल यह है धर्म यदि गरीब का संबल है तो राजनीति में धर्म को गरीबों की राजनीति से रणनीतिक तौर पर जुड़ना चाहिए।लेकिन होता उलटा है गरीबों की राजनीति करने वालों की बजाय धर्म और धार्मिक संस्थानों का अमीरों की राजनीति करने वालों की राजनीति से गहरा संबंध नजर आता है।

धर्म गरीब के दुखों की अभिव्यक्ति है।मार्क्सवाद भी गरीबों के दुखों की अभिव्यक्ति है।इसलिए धर्म और मार्क्सवाद में गहरा संबंध बनता है।लेकिन धर्म और मार्क्सवाद के मानने वालों में इसे लेकर विभ्रम सहज ही देख सकते हैं। फिदेल कास्त्रो इस प्रसंग में खासतौर पर उल्लेखनीय हैं। वे धर्म की व्याख्या करते हुए गरीब को मूलाधार बनाते हैं और कहते हैं कि ईसाईयत और मार्क्सवाद दोनों के मूल में है गरीब की हिमायत करना,गरीब की रक्षा करना,गरीब को गरीबी से मुक्त करना। इसलिए ईसाईयत और मार्क्सवाद में स्थायी रणनीतिक संबंध है।इसी आधार पर वे पुख्ता नैतिक,राजनैतिकऔर सामाजिक आधार का निर्माण करते हैं।

फिदेल के धर्म संबंधी नजरिए को अभिव्यंजित करने वाली शानदार किताब है ´फिदेल एंड रिलीजन´,यह किताब FREI BETTO ने लिखी है।इसमें फिदेल से उनकी 23घंटे तक चली बातचीत का विस्तृत लेखाजोखा है।यह किताब मूलतःक्यूबा और लैटिन अमेरिका में धर्म और मार्क्सवाद,धर्म और क्रांतिकारियों के अंतस्संबंधों पर विस्तार से रोशनी डालती है।इस बातचीत में फिदेल से 9 घंटे तक सिर्फ धर्म संबंधी सवालों को पूछा गया।धर्म और मार्क्सवाद के अन्तस्संबंध को समझने के लिए यह पुस्तक मददगार साबित हो सकती है।इस किताब को भारत में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस ने 1987 में अंग्रेजी में छापा था। इस किताब में लिए गए इंटरव्यू कई बैठकों में संपन्न हुए।ये इंटरव्यू 1985 में लिए गए थे।ये किसी समाजवादी राष्ट्र राष्ट्राध्यक्ष के द्वारा धर्म पर दिए गए पहले विस्तृत साक्षात्कार हैं। आमतौर पर मार्क्सवादी शासकों ने धर्म पर इस तरह के इंटरव्यू नहीं दिए हैं।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

नंगे का अर्थशास्त्र

         मोदीजी ने जब से नोटबंदी लागू की है,उसने हम सबके अंदर के डरपोक और अज्ञानी मनुष्य को एकदम नंगा कर दिया है।कहने के लिए हम सब पढ़-लिखे,शिक्षित लोग हैं लेकिन हम सबमें सच को देखने के साहस का अभाव है।सच कोई आंकड़ा मात्र नहीं होता,सच तो जीवन की वास्तविकता है और जीवन की वास्तविकता या यथार्थ को तब ही समझ सकते हैं जब जनता के जीवन को अपने मन,सुख और वैभव को मोहपाश से मुक्त होकर नंगी आंखों से देखें।

हम सबमें एक बड़ा वर्ग है जो मान चुका है कि मोदीजी अच्छा कर रहे हैं,कालेधन पर छापा मार रहे हैं,कालाधन सरकार के पास आएगा तो सरकार सड़क बनाएगी ,स्कूल खोलेगी,कारखाने खोलेगी,बैंकों से घरों के लिए सस्ता कर्ज मिलेगा,महंगाई कम हो जाएगी,हर चीज सस्ती होगी,सब ईमानदार हो जाएंगे,चारों ओर ईमानदारी का ही माहौल होगा,इत्यादि बातों को आम जनता के बहुत बड़े हिस्से के दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया है,अब जनता इंतजार कर रही है कि कालेधन की मुहिम पचास दिन पूरे कर ले,फिर हम सब ईमानदारी के समुद्र में तैरेंगे ! ये सारी बातें फार्मूला फिल्म की तरह आम जनता के बीच में संप्रेषित करके उनको मोदी-अफीम के नशे में डुबो दिया गया है।

तकरीबन इसी तरह का नशा एक जमाने में नव्य-आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू करते समय सारे मीडिया ने हम सबके मन में उतारा था,वह नशा कुछ कम हो रहा था कि अचानक मोदी अफीम के नशे में जनता को फिर से डुबो दिया गया है। हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं जो नीति जनता के विवेक का अपहरण करके लागू की जाती है वह कभी भी जनहित में नहीं हो सकती। जनता के विवेक को दफ्न करके मोदीजी जिस नीति को लागू कर रहे हैं वह सारे देश के लिए समग्रता में विध्वंसक साबित होगी।

फिदेल कास्त्रो ने ऐसे ही नशीले माहौल को मद्देनजर रखकर कहा था ,´ हममें से जो विद्वान नहीं हैं उनको भी साहस की खुराक चाहिए। दुनिया में जो कुछ हो रहा है उसे अधिकाधिक जान लेने की कोशिश के बावजूद कभी-कभी हमारे पास यह जानने के लिए समय नहीं होता कि हम जिस अद्वितीय इतिहास प्रक्रिया से गुजर रहे हैं उसके बारे में क्या नए तथ्य और विचार उभरकर सामने आ रहे हैं और हमारे सामने खड़ा अनिश्चित भविष्य कैसा होगा? ´

कालेधन को बाहर निकालने के प्रयास पहले भी विभिन्न सरकारों ने किए हैं,मोदीजी इस मामले में नया कुछ नहीं कर रहे। उन्होंने जो नया काम किया है वह है नोटबंदी।नोटबंदी से कालेधन वालों पर कोई खास असर नहीं होगा।यही वजह है कि उन्होंने नोटबंदी के 20दिन बाद अचानक स्वैच्छिक आय घोषणा योजना-2 की घोषणा की है उसके लिए आयकर कानून में कुछ संशोधन सुझाए हैं। ये संशोधन लागू हो जाने पर भी कालेधन पर कोई अंकुश नहीं लगेगा और कालाधन बाहर नहीं आएगा।

इस प्रसंग मे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था कम से कम कालेधन से नहीं चल रही,कालाधन समानान्तर अर्थव्यवस्था जरूर है लेकिन देश की मूल अर्थव्यवस्था नहीं है।मोदी सरकार आने के बाद सबसे बड़ी समस्या यह हुई है कि मूल अर्थव्यवस्था पंगु हो गयी है।कहीं पर कोई परिणाम नजर नहीं आ रहे।बेकारी और विकास में कोई परिवर्तन नहीं आया।इससे ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार ने नोट नीति की घोषणा की और 500 और 1000 के नोट अमान्य घोषित कर दिए। अब समस्या यह है वे इस नोटबंदी पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही,कालेधन के समर्थक आदि के तमगे लगा रहे हैं। हम जानना चाहते हैं यह कौन सा अर्थशास्त्र है जिसमें सवाल नहीं खड़े कर सकते ॽ

मोदीजी ने जो नोट नीति बनायी है उस पर समानता के आधार पर विभिन्न मतों के अनुसार सवाल उठाने की इजाजत सरकार दे, नीति पर बहस की बजाय सरकार और मीडिया मिलकर नोट नीति के खिलाफ सवाल खड़े करने वालों को अपमानित कर रहे हैं ,सवाल उठाने को ही देशद्रोह और कालेधन की हिमायत कह रहे हैं।यह तो देश की प्रतिभा और जनतांत्रिक मतभिन्नता का अपमान है,यह तानाशाही है और अल्पविवेक का शासन है।

मोदीजी को मालूम होना चाहिए भारत में अर्थशास्त्र की बड़े पैमाने पर पढायी होती है और हमारे यहां सभी किस्म के मत पढाए जाते हैं,विभिन्न किस्म के मतों का अध्ययन करके आने वाले लोगों की यह पहली जिम्मेदारी बनती है कि वे नोट नीति पर खुलकर बोलें,विभिन्न राजनीतिक दलों की भी यह जिम्मेदारी है वे अपने मतों को खुलकर व्यक्त करें। मीडिया और सरकार दोनों मिलकर मतविभन्नता का गला घोंटकर खत्म कर देना चाहते हैं।यह पारदर्शिता का हनन है।

मोदी-मीडिया मिलकर प्रचार कर रहे हैं कि नीति के मामले में हर हालत में अनुशान पैदा करने की जरूरत है,नीति से विचलन और मत-भिन्नता मोदी के लेखे अनुशासनहीनता है,यह देशद्रोह है,कालेधन की सेवा है।इस तरह के तर्क बुनियादी तौर पर फासिस्ट तर्क हैं।किसी भी नीति पर बहस के लिए अनुशासन की शर्त लगाना गलत ही नहीं अ-लोकतांत्रिक भी है।पारदर्शिता और खुलेपन के लिए अनुशासन की विदाई करना पहली जरूरत है।सरकार ने जो नीति जारी की है तो उससे संबंधित सूचनाएं भी जारी करे,नीति पर विभिन्न दृष्टियों से बहस हो,विभिन्न विचारों की रोशऩी में नीति को परखा जाए,विभिन्न कसौटियों पर कसा जाए,यह किए बिना नोट नीति को सीधे लागू करना तानाशाही है। सब जानते हैं मीडिया पर सरकार का संपूर्ण वर्चस्व है और वह इस वर्चस्व का खुला दुरूपयोग कर रही है।नोट नीति लागू करते समय सरकार की शर्त है हमारी बात मानो,नहीं मानोगे तो देशद्रोही कहलाओगे।यह बुनियादी नजरिया लोकतंत्र विरोधी है।

रविवार, 27 नवंबर 2016

फिदेल की औरतें और चंडूखाने के चंडूबाज

            हिन्दू फंडामेंटलिस्टों और समाजवाद विरोधियों का जनप्रिय धंधा है चरित्र-हनन अभियान चलाना। पहले ये लोग स्वायत्त ढ़ंग से यह काम करते थे, लोकल थे,लेकिन मोदी के उभार के बाद हिन्दू फंडामेंटलिस्टों ने भी तालिबानियों की तरह साइबर तरक्की की है, वे अब लोकल नहीं रहे,साइबर में आते ही ग्लोबल हो गए हैं। हिन्दू फंडामेंटलिस्टों का फेसबुक पर प्रिय धंधा है कम्युनिस्टों के खिलाफ मिथ्या प्रचार करना,समाजवाद के बारे में,समाजवादी नेताओं और विचारकों के बारे में कपोल-कल्पित कहानियां प्रचारित-प्रसारित करना।ये सल में चंडूबाज हैं।

फिदेल कास्त्रो की मौत के बाद सारी दुनिया में फिदेल के चरित्र-हनन की आंधी चल रही है।इस आंधी में अनेक रंगत के लोग शामिल हैं,इनमें जेएनयू के पुराने प्रतिक्रियावादी और मोदीभक्त भी शामिल हैं।ये लोग जब जेएनयू में पढ़ते थे,तब भी इनको समाजवाद और साम्यवाद से एलर्जी थी,आज भी है,कहने को ये शिक्षित हैं,लेकिन साम्यवाद को लेकर ये लोग किताब,विचार,विमर्श,तथ्य और सत्य किसी से संबंध नहीं रखते,सिर्फ चंडूबाजों की तरह फेसबुक पर लिख रहे हैं।इनके अलावा अनेक आरएसएस के सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं जो आए दिन अपनी साम्यवाद विरोधी चंडू आवाजें सुनाते रहते हैं। हाल में इन लोगों ने फिदेल कास्त्रो के निजी जीवन को लेकर घटिया किस्म की चंडूखाने की खबरें प्रसारित की हैं।इनमें कोई सच्चाई नहीं है।

यह सच है फिदेल कास्त्रो की निजी जिंदगी के बारे में दुनिया बहुत कम जानती है।स्वयं जिन परिस्थितियों में कास्त्रो जैसे क्रांतिकारी काम करते रहे हैं उसमें सब कुछ सार्वजनिक करके रखकर सत्ता चलाना बहुत ही मुश्किल काम है,खासकर जब सामने सीआईए और बहुराष्ट्रीय मीडिया घराने जहर उगलने के लिए खड़े हों। इस स्थिति से निबटने का सबसे बेहतर तरीका यही होता कि स्वयं कास्त्रो अपने परिवार,पत्नी,बच्चे,माँ-बाप,भाई आदि के बारे में स्वयं ही कुछ लिखते,इससे विभ्रम पैदा नहीं होता।

मेरा मानना है क्रांतिकारियों को अपने परिवार और परिवारीजनों के बारे में स्वयं लिखना चाहिए,इससे तथ्य और सत्य के बीच किसी तरह के विभ्रम की संभावनाएं नहीं रहतीं।इसके बावजूद यह सच है कि फिदेल कास्त्रो अनुशासित क्रांतिकारी थे।निजी और सार्वजनिक जीवन में औरतों के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था और समानता का भाव था।इस नजरिए को क्यूबा के सामाजिक यथार्थ की रोशनी में देखना चाहिए,न कि सीआईए के प्रचार अभियान के नजरिए से।

सवाल यह है क्यूबा में क्रांति के पहले औरतों का जीवन स्तर क्या था और आज क्या है ॽ अथवा फिदेल कास्त्रो के जमाने में क्या था ॽ जो फिदेल की 25हजार रखैलों का फेसबुक पर बार-बार जिक्र कर रहे हैं वे यह नहीं बताते कि उनकी सूचना का स्रोत क्या है ॽ उलेखनीय है सीआईए के फिदेल के खिलाफ जब सारे मिथ्या प्रचार अभियान धराशायी हो गए तब अंतिम अस्त्र के रूप में 25हजार रखैलों की खबर को चंडूबाजों ने मीडिया में प्रसारित किया।

क्यूबा और फिदेल पर बातें करते समय यह ध्यान रखें कि अमेरिका में एक बहुत बड़ा तंत्र है जिसको फिदेल और क्यूबा के खिलाफ मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने के लिए ही अरबों रूपये दिए जाते हैं। इन मनगढ़ंत कहानियों को सबसे पहले सीआईए के चंडूबाज तैयार करते हैं और उसके बाद सारी दुनिया में मीडिया एक ही झटके में प्रचारित-प्रसारित कर देता है। फिदेल की 25 हजार रखैलों की कहानी इसी सीआईए के कारखाने की देन है।इस कहानी का जन्मस्थान है मियामी।

ध्यान रहे फिदेल की मौत के बाद फिदेल के किलाफ सबसे ज्यादा घृणाभरे जुलूस और नारे मियामी में लगे हैं।मियामी उन तमाम क्यूबाईयों का बसेरा है जो क्यूबा को छोड़कर चले आए या फिर जिनके क्यूबा के प्रशासन से मतैक्य नहीं था या फिर जिनको क्यूबा में मानवाधिकार हनन नजर आ रहा था,इस तरह के लोगों को अमेरिका ने क्रांति के बाद के समय से ही हर स्तर पर प्रलोभन देकर प्रोत्साहित किया और उनको फिदेल और क्यूबा की क्रांति के खिलाफ प्रचार के औजार की तरह इस्तेमाल किया। सीआईए किस मनगढ़ंत कहानियां बनाता रहा है इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे।

फिदेल और सीआईए के मेढ़क -

       कल फिदेल कास्त्रो की मौत हुई,क्रांति के हमदर्दों को इससे दुख पहुंचा,वे फेसबुक पर उन पर लिख रहे हैं, सारी दुनिया में फिदेल की मौत की खबर प्रमुख खबर बनी,लेकिन हमारे देश में क्रांति विरोधी,समाजवाद विरोधी और मोदीपंथी लोग फिदेल के खिलाफ जहर उगलते हुए सक्रिय हो गए।

अरे भाई,जब फिदेल से कोई लेना-देना नहीं है तो फिर उनकी मौत पर यह मेढ़कों की तरह टर्र-टर्र क्यों ? मरे फिदेल हैं लेकिन आप लोगों के दिमाग का कैंसर क्यों फट पड़ा?

हिन्दू सभ्यता की परंपरा मान्यता है जब भी कोई व्यक्ति मरता है तो उसके गुण बताए जाते हैं,लेकिन इन दिनों मोदीपंथी जंगलियों की एक नई पौध पैदा हुई है जो उनकी मौत पर घृणा अभियान चला रहे हैं।लगता है इन लोगों के अंदर हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की सभ्यता का कोई असर ही नहीं है !

कल से जिन लोगों ने फिदेल के बारे गंदा,जहरीला प्रचार किया है ,वे वस्तुतःन तो क्यूबा को जानते हैं और फिदेल को जानते हैं।उनको यदि जानकारी है तो सीआईए द्वारा पेश की गयी सूचनाओं की,वे सीआईए गुलामों की तरह फेसबुक से लेकर मीडिया तक फिदेल के बारे में सफेद झूठ की वर्षा कर रहे हैं। इस तरह के लोग क्यूबा के बारे में भारत की सर्वमान्य नीति की मुखालफत कर रहे हैं और सीआईए के एजेंट का काम कर रहे हैं।मोदीपंथियों की यह देशभक्ति नहीं बल्कि देशद्रोही हरकत है।

फिदेल कास्त्रो क्या थे और क्या बन गए ,क्यूबा क्या था और आज किस रूप में सारी दुनिया के सामने खड़ा है,वह अकल्पनीय मिसाल है सामाजिक परिवर्तन की।

क्यूबा की अमेरिका द्वारा पांच दशक तक की गयी लंबी आर्थिक नाकेबंदी ,सीआईएके षडयंत्र ,भाड़े के सैनिकों और बुद्धिजीवियों की विश्वव्यापी फौज और बहुराष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के संगठित अभियान के बाद भी फिदेल और क्यूबा का सामाजिक परिवर्तन के रास्ते पर आगे बढ़ते जाना और दुनिया में क्यूबा का एक समर्थ राष्ट्र के रूप में खड़े रहना अपने आपमें प्रशासनिक -कूटनीतिक कौशल की शानदार मिसाल है।

फिदेल का भारत के साथ खास संबंध था,जेएनयू के साथ खास संबंध था, जेएनयू के छात्र आंदोलन के प्रेरकों में फिदेल अग्रणी थे,देश में क्यूबा को लेकर जितने अभियान चले हैं उनमें भारत के नौजवानों की केन्द्रीय भूमिका रही है।

क्यूबा के कष्ट के दिनों में भारत की जनता और सरकार फिदेल कास्त्रो और क्यूबा की जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही है।लाखों नौजवानों ने चंदा देकर,किसानों ने गेंहूँ देकर,मजदूरों ने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से चंदा देकर क्यूबा की क्रांतिकारी सरकार की कठिन समय में रक्षा की है।समाजवाद और क्रांति के पक्ष में इस तरह की पक्षधरता विरल है।

खासकर सोवियत संघ के विघटन के बाद क्यूबा की क्रांतिकारी सत्ता को बचाने में भारत की सरकार और जनता की शानदार भूमिका रही है।

भारत - क्यूबा मित्रता का मूलाधार है फिदेल कास्त्रो और उनका नजरिया।फिदेल के नजरिए और भारत के नजरिए में अनेक स्तरों पर नीतिगत साम्य रहा है,भारत के कम्युनिस्टों और उदारवादियों के साथ क्यूबा की गहरी मित्रता रही है,यह ऐसी मित्रता है जो कठिन चुनौतीपूर्ण समय में खरी उतरी है।इस मित्रता को अमेरिकी दवाब तक तोड़ नहीं पाया।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

विध्वंस के स्तूप बनाते मोदीजी

           पीएम मोदी की विशेषता है जो कहते हैं उससे एकदम उलटा आचरण करते हैं,नोटबंदी उनकी इसी खासियत का परिणाम है।पहले वायदा किया था कि पांच सौ और हजार के नोट 30दिसम्बर तक बदले जा सकेंगे, लेकिन आज सरकार ने घोषणा की है कि पुराने नोट अब बदले नहीं जाएंगे।इसी तरह पहले कहा करते थे संसद सर्वोच्च है अब कहते हैं ट्विटर और एप सर्वोच्च हैं ! नोट नीति के पक्ष में उन्होंने जो सर्वे किया है उसमें करोड़ों पीड़ित किसानों की राय शामिल नहीं है। सवाल है ये पाँच लाख कौन हैं जो जनता के कष्ट को सही मान रहे हैं? जनता की तकलीफ़ों को जायज ठहराने की मोदी एप सर्वे ने जो कोशिश की है उससे एक बात साफ़ है कि यह सर्वे तयशुदा ढंग से तैयार किया गया है। यह जनता की नेचुरल राय का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस सर्वे का लक्ष्य है नोटबंदी के फैसले में निहित संविधानविरोधी फैसले को छिपाना और मोदी के नोटबंदी के फासिस्ट और संविधान विरोधी फैसले को वैध ठहराना।मोदी एप सर्वे में वे ही लोग शामिल हैं जो स्मार्टफ़ोन वाले हैं। देश की अधिकांश जनता के पास न स्मार्टफ़ोन हैं और न इंटरनेट है। करोड़ों दैनिक मज़ूरी करने वालों की राय का इस सर्वे से कोई लेना देना नहीं है। नोटबंदी से यह वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित है।

कालेधन और नोटबंदी पर अर्थशास्त्रियों की राय महत्वपूर्ण होगी लेकिन इसबार कहा जा रहा है संसद नहीं, अर्थशास्त्री नहीं, राजनीतिक दल नहीं, सिर्फ भाजपा,सिर्फ पाँच लाख मोदी यूजर तय करेंगे कि मोदी की नोट नीति सही है। मोदीभक्तों को जवाब देना चाहिए कि भाजपा करोड़ों सदस्यों वाला दल है उसमें से मात्र पाँच लाख लोग ही मोदी एप में वोट देने क्यों आए ? करोड़ों मोदी भक्त कहाँ हैं ? क्या मोदी एप के सर्वे का भाजपा सदस्यों ने बहिष्कार किया है? दिलचस्प बात है जो अर्थशास्त्र नहीं जानते, नोट नीति के बारे में नहीं जानते , वे बता रहे हैं नोटबंदी सही है, मोदी एप सर्वे की धुरी इसी तरह के लोग हैं।

संसद में पूर्ण बहुमत होने के बाद भी नोटबंदी का प्रस्ताव संसद में पेश करने से मोदी सरकार क्यों भाग रही है? मोदीजी क्यों डरे हुए हैं? मात्र पाँच लाख लोगों ने मोदी एप पर नोटबंदी पर पीएम के सर्वे का जवाब दिया। 125 करोड़ की आबादी में मात्र इतने कम लोगों के प्राथमिकतौर पर रिएक्शन सामने आए हैं। करोड़ों रूपये सोशलमीडिया पर ख़र्च करने बाद मात्र पाँच लाख लोगों ने सर्वे में भाग लिया है। इससे मोदी की इंटरनेट जनता पर बहुत कम लोगों तक पकड़ का अंदाज़ा लगता है।मात्र पाँच लाख लोग मोदी नीति के पक्ष में बोले हैं।बाकी जनता जो चुप है वह साथ नहीं है।

नोटबंदी के कारण अब तक 75 से ज्यादा लोग मारे गए हैं,इनमें 17लोग अस्पताल में पुराने नोट न लेने और इलाज के अभाव में मारे गए हैं।८नवम्बर के बाद पुराने नोट नहीं लिए जा रहे, खासकर निजी अस्पताल में पुराने नोट नहीं लिए जा रहे हैं।सवाल यह है सरकार ने पुराने नोटों को सरकारी अस्पताल में वैध रखा लेकिन निजी अस्पताल में वैध क्यों नहीं रखा ?

हम माँग करते हैं कि जिन लोगों के पास आधारकार्ड और जनधन खाता है और राशन ख़रीदने के पैसे नहीं हैं उनको केन्द्र सरकार गेहूँ,आटा, दाल, तेल और सब्ज़ी उधार दे । नोट नीति की तबाही थमने वाली नहीं है।इसके अलावा जिसके पास आधार कार्ड और जनधन खाता है उसे सरकारी और निजी अस्पताल में मुफ्त दवा और इलाज की सुविधा दी जाय ।

रिजर्व बैंक ने संविधान प्रदत्त अधिकारों , स्वायत्तता और जवाबदेही का जिस तरह त्याग किया है और रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने जिस तरह की गैर ज़िम्मेदाराना और संविधानविरोधी भूमिका अदा की है उसका हर स्तर पर प्रतिवाद होना चाहिए, साथ ही पीएम की नोटबंदी के असंवैधानिक निर्णय का भी प्रतिवाद होना चाहिए। आज बैंक कर्मचारी सबसे ज्यादा संकट में घिरे हैं। अब बैंक कर्मचारियों को संघर्ष का एलान करना चाहिए और साफ कहना चाहिए कि उनको अकारण असंवैधानिक और जनविरोधी नोट नीति का अंग बना दिया गया है।आप जरा बैंक कर्मचारियों की मुश्किलों और बैंकिंग व्यवस्था के बारे में सोचें नोट नीति के कारण विगत दस दिनों से बैंकों का सारा कारोबार ठप्प पड़ा है। फिलहाल बैंक रूपये लेने देने के काम में लगे हैं।बैंकों की आमदनी ठप्प पड़ी है, कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ गया है। कर्मचारी बेहद तनाव में काम कर रहे हैं।बैंकों के समूचे कामकाज के ठप्प हो जाने से प्रतिदिन कितने हजार रूपये की क्षति हो रही है ? विगत दस दिनों से जो काम बंद पड़े हैं उस बक़ाया काम को समाप्त करने में बैंक कर्मचारियों को कितने हजार घंटे काम करना पड़ेगा ?यही हालात यदि कुछ सप्ताह और रहते हैं तो बैंक कर्मचारी शारीरिक तौर पर भयानक दवाब में आ जाएंगे।

फेडरेशन ऑफ राजस्थान ट्रेड ऐंड इंडस्‍ट्री (फोर्टी) का मानना है नोटबंदी से राजस्थान में आगामी दो माह में करीब एक लाख करोड़ रुपये का कारोबार प्रभावित होगा, समाचार पत्रों, सोशल मीडिया आदि के जरिये भ्रांति व भय के माहौल में व्यापारी वर्ग डरा हुआ है तथा मजदूर वर्ग को रोजगार की उपलब्धता के बावजूद भी आर्थिक तंगी का सामना करना पड रहा है। फोर्टी ने प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह को कल सौंपा है जिसमें प्रधानमंत्री से व्यापार व उद्योग जगत के साथ-साथ आमजन को राहत पहुंचाने की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि नोट बंदी के कारण विनिर्माण क्षेत्र और खुदरा क्षेत्र में बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करने के लिए पर्याप्‍त नकदी उपलब्ध नहीं होने के कारण उत्पादन पर भी असर पडा है।

मोदी सरकार की असंवैधानिक और विध्वंसक नोट नीति-

            पीएम नरेन्द्र मोदी डर के मारे संसद में नहीं बोल रहे,डर के मारे बैंक पीड़ितों से नहीं मिल रहे, आत्महत्या कर रहे किसानों से नहीं मिल रहे,उनके अंदर का डर इस कदर हावी है कि रिजर्व बैंक को स्वायत्त ढ़ंग से काम नहीं करने दे रहे।इसके विपरीत राहुल गांधी एकदम निडर और निस्संकोच आम जनता में जाकर मिल रहे हैं,बैंक और एटीएम की लाइन में लगे लोगों से मिल रहे हैं,कर्ज से पीड़ित किसानों से मिल रहे हैं ।आंदोलनकारी पूर्व सैनिकों से मिल रहे हैं।लोकतंत्र में तानाशाह और लोकतांत्रिक नेता का अंतर देखना हो तो डर के पैमाने से देखो,डरा नेता जनता से दूर रहता है, हिटलर की तरह हमेशा सभा मंच पर नजर आता है जनता से दूर रहता है,जबकि लोकतांत्रिक नेता हमेशा जनता में नजर आता है।

जिस तरह आपातकाल ने उत्तरभारत में कांग्रेस की कमर तोड़ी थी वैसे ही नोटबंदी ने भाजपा की पूरे देश में रीढ़ तोड़ दी है। आपातकाल के लाभ विपक्ष ने उठाए उसी तरह नोटबंदी से पैदा हुई तबाही का लाभ विपक्ष को मिलना तय है। नोटबंदी के मायने हैं " नो अपील नो वकील और नो दलील" । यही आपातकाल का मोटो था।जिसे सुप्रीम कोर्ट में उस जमाने के महान्यायवादी ने व्यक्त किया था।

पी एम नरेन्द्र मोदी लगातार झूठ बोल रहे हैं,वे कह रहे हैं नोट बंदी का कुछ दिन तक ही बुरा असर रहेगा,सच यह है इसका बहुत ज्यादा दिनों, कई महिने और कई साल तक बुरा असर रहेगा।भारत की सारी दुनिया में इससे मट्टी पलीत हुई है।अब विदेशी पूंजी निवेश कम से कम भारत में निकट भविष्य में नहीं आएगा।सारी दुनिया जान गयी है भारत में इस समय ऐसा पीएम है जिसके पास स्नातक स्तर के ज्ञानधारी देशभक्त और नौकरशाह हैं।

सारी दुनिया में जितने पीएम हैं वे बेहतरीन शिक्षितों से विभिन्न पहलुओं पर सलाह करके नीति बनाते हैं लेकिन मोदीजी ज्ञानी और विद्वानों से कोसों दूर रहते हैं ,उनके पास नौकरशाह सलाहकार हैं,ये नौकरशाह सलाहकार अधिक से अधिक स्नातक हैं और इनकी कोई विशेष योग्यता नहीं है।इसके अलावा यह भी पता चला है कि नोट नीति बनाते समय कुछ ही लोगों से सलाह करके फैसला लिया गया,ये कुछ लोग कौन हैं यह भी सामने आना बाकी है,उनके काम करने की पद्धति वही है जो आपातकाल में श्रीमती गांधी की थी,वे चंडाल चौकड़ी से घिरी हुई थीं,सारे फैसले चंडाल चौकड़ी लेती थी, मंत्रीमंडल कागजी था,संविधान फालतू था।मोदीजी भी चंडाल चौकड़ी से घिरे हैं और वही देश को संचालित कर रही है।नोट बंदी का फैसला इसी चंडाल चौकड़ी ने लिया है।अखबारों में अभी जो नाम आ रहे हैं वे सब गलत हैं।असली नाम कुछ और हैं।नोट बंदी का फैसला न तो रिजर्व बैंक ने लिया है और न मंत्रीमंडल ने विस्तार से बहस करके लिया है,यह फैसला मूलतःपीएम का है और उसे सारे देश पर थोप दिया गया है। नियमानुसार यह फैसला संसद और रिजर्व बैंक को लेना था,लेकिन संसद को ठेंगे पर रखा गया है,रिजर्व बैंक को रबड़ स्टैम्प की तरह इस्तेमाल किया गया है।इस सबको नाम दिया गया सीक्रेसी का।

जो नीति सारे देश पर लागू होनी है उस पर सीक्रेसी की क्या जरूरत यह बात हमारी समझ में नहीं आती।यह कैसी नीति है जिस पर रिजर्व बैंक बहस न करे,संसद बहस न करे,मंत्रीमंडल में बहस न हो,देश में बहस न हो और देश से कह दिया जाए कि तुम नीति का पालन करो।यही तो अधिनायकवाद है।

नोट नीति के जरिए पीएम मोदी की जनता में पहलीबार प्रशासनिक दक्षता परीक्षा हुई और वे इसमें बुरी तरह फेल हुए हैं।जबकि वे प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी के दावे पर वे लोकसभा का चुनाव जीतकर आए थे। इस नीति के पहले उनकी नीतिगत तौर पर जनता में कोई परीक्षा नहीं हुई थी,यहां तक कि जिन जनधन खाता धारकों के करोड़ों खाते खुलवाने का वे दावा करते हैं उसमें बैंक कर्मचारियों की बड़ी भूमिका थी,इसमें मोदीजी की प्रशासनिक क्षमता नजर नहीं आती,जिस तरह वे खाते खुले हैं,सारा देश जानता है, उनकी अक्षमता,मूर्खता और जनविरोधी भावनाओं को आम जनता में नंगा करके रख दिया है।कल राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विमुद्रीकरण की नीति को सटीक आलोचना करते हुए तबाही के जिस मंजर का खाका पेश किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।इसके विपरीत कल वित्तमंत्री अरूण जेटली की पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर हमला करने वाली प्रेस कॉंफ़्रेंस देखकर यह विश्वास हो गया है कि मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है और असहिष्णुता के शिखर पर बैठी है। जेटली के बयान का मर्म यह था कि मनमोहन सिंह को बोलने का कोई हक नहीं है।क्योंकि उनके शासन में कालाधन आया , सबसे ज्यादा घोटाले हुए , वे महान पापी हैं! जो महान पापी हैं उनको मोदीजी जैसे चरित्रवान,ईमानदार, बेदाग़ नए कपड़े पहने वाले नेता की नीति की आलोचना करने का कोई हक नहीं है।मोदी जी इतने महान हैं कि विगत सत्तर साल में इस तरह का चरित्रवान और पुण्यात्मा कोई पीएम नहीं बना है! सच तो यह है उनसे बेहतर कोई पीएम न तो सोच सकता है और न बोल ही सकता है!!
मोदीजी महान हैं! क्योंकि वे संविधान के बंधनों से मुक्त हैं! हमेशा १२५ करोड लोगों के बंधन में बँधे रहते हैं। १२५ करोड लोगों की तरह ही सोचते हैं, हँसते हैं, गाते हैं ,खाते हैं, रोते हैं!!उनके मन और तन में १२५ करोड़ मनुष्य वास करते हैं!करोड़ों जीव-जन्तु-पशु-पक्षी उनके हृदय में निवास करते हैं !
उनका मन मंदिर है और हृदय जंगल है।वे इस जंगल के बेताज बादशाह हैं। वे वैसे ही अक्लमंद हैं जैसे जंगल में पशु -पक्षी अक्लमंद होते हैं।जिस तरह १२५ करोड जनता कभी किसी अर्थशास्त्री से राय नहीं लेती जो मन में आए काम करती है मोदीजी भी ठीक वैसे ही काम करते हैं।यही वजह है मोदीजी महान हैं! मोदीजी की आलोचना वही कर सकता है जो उनके जैसा महान हो ! मनमोहन चूँकि मोदीजैसे महान नहीं हैं इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से दरकिनार करने की जरूरत है।रही बात संसद की तो संसद नक्षत्रों से भरी है उसमें मोदी जैसा सूर्य मिसफ़िट है। यही वजह मोदी जैसा सूर्य हमेशा संसद के बाहर ही चमकता है , कल पंजाब में दिखाई देंगे ।

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

नोट बंदी यानी मोदी सरकार ठप्प है !

            पीएम नरेन्द्र मोदी ने 9नवम्बर से नोटबंदी की नीति लागू करते समय आम जनता से पचास दिन मांगे हैं।कहा है पचास दिन में यह नीति अभीप्सित लक्ष्य हासिल न कर पाए तो जनता पीएम को दण्डित कर सकती है।सवाल यह है नोट बंदी के पहले जो वायदे पूरे करने की बात थी उनका क्या हुआ ॽ क्या उन वायदों को भी 50दिन के लिए स्थगित कर दिया जाय ॽ सवाल यह है नोटबंदी की घोषणा के बाद सरकार ठप्प क्यों हो गयी ॽ

यह सच है नोटबंदी के कारण सब कुछ ठहर गया है। नोटबंदी के बारे में जो कुछ कहा गया उससे उलट परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं।मसलन् यह नहीं कहा गया कि नोटबंदी से कामगारों को बेकारी का सामना करना पड़ेगा,खासकर दैनिक मजूरी करने वालों को तत्काल रोजी-रोटी से हाथ धोना पडेगा।बाजार में सन्नाटा पसर जाएगा।बैंकिंग के नियमित कामकाज बंद हो जाएंगे।आयकर विभाग के नियमित काम ठप्प हो जाएंगे।पुराने नोटों का कालाधन धंधा शुरू हो जाएगा,मुद्रा दलालों की चाँदी ही चाँदी होगी।निर्माण कार्य,विकास कार्य,सरकारी योजनाओं का कार्यान्वयन ठप्प हो जाएगा।

नोटबंदी लागू करने के साथ यह कहा गया इससे काले धन पर रोक लगेगी।लेकिन व्यवहार में ठीक उलटा हुआ है।व्यवहार में मुद्रा दलालों ने बड़ी मात्रा में बैंकरों की मदद से करोड़ों रूपये का धंधा किया है।अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि पुराने खारिज नोट कितनी बड़ी संख्या में मुद्रा दलालों के जरिए बदले गए हैं।अभी तक जन-धन एकाउंट में 21हजार करोड़ रूपये जमा होने की बात केन्द्र सरकार ने मानी है।लेकिन दलालों ने अमान्य मुद्रा में से कितनी मुद्रा को परिवर्तित कराने में मदद की,इसका कोई आंकड़ा सरकार नहीं दे पायी है।जन-धन एकाउंट में अवैध पैसा जमा होने वाली बात भी इसलिए कही जा रही है जिससे ममता बनर्जी और राहुल गांधी को इस मुहिम से जोड़ा जाए,क्योंकि जन-धन एकाउंट में बड़े पैमाने पर पैसा सरकार के मुताबिक बंगाल और कर्नाटक में ही जमा हुआ है।

मोदी सरकार ने सब कुछ जानते हुए भी कि किनके पास अवैध कालाधन कैश में घरों रखा हुआ है उनके यहां घरों पर छापे न मारकर नोटबंदी का रास्ता चुना।सरकार यदि कालेधन के मगरमच्छों को पकड़ना चाहती तो आसानी से पकड़ सकती थी लेकिन उसने यह सब करना जरूरी नहीं समझा,उलटे उनको जन-धन एकाउंट के जरिए धन जमा करने की सुविधा मुहैय्या करायी।जिस तरह अनाप-शनाप तरीकों से जन-धन एकाउंट खुलवाए गए थे उस समय अनेक लोगों ने इन खातों के दुरूपयोग होने की ओर ध्यान खींचा था लेकिन सरकार ने एक भी बात नहीं मानी।आज यही जन-धन एकाउंट कालेधन को बैंकों में जमा करने के सबसे बड़े स्रोत बनकर सामने आए हैं।

नोटबंदी के बाद बैंकों में पारदर्शिता दिखनी चाहिए। केन्द्र सरकार तुरंत अब तक छापे गए और बैंक से दिए गए नोटों का हिसाब सार्वजनिक करे और बताए कि नए नोट कितनी संख्या में जारी किए गए हैं ॽइस समूची प्रक्रिया की गहराई में जाकर जांच करने की जरूरत है।दिलचस्प बात है मोदी सरकार नोटबंदी की नीति लागू होने के बाद एक भी मुद्रा दलाल को अवैध मुद्रा के लेन-देन के चक्कर में पकड़ नहीं पायी है।इसका प्रधान कारण हमारे यहां अवैध,खारिज,फटे-पुराने नोट आदि का कारोबार करने वाले पचासों वर्षों से यह धंधा कर रहे हैं और वैध ढ़ंग से वे अपना काम करते रहे हैं। सवाल यह है जब उनका धंधा वैध है तब आप कालेधन वाले को पकड़ेंगे कैसे ॽ

दूसरा सवाल यह है जुलाई से सितम्बर माह 2016 के बीच में बैंकों में जमा पूंजी में जबर्दस्त उछाल आया है,वे कौन लोग हैं जिन्होंने अचानक बैंकों में बड़ी मात्रा में धन जमा किया है ॽ बैंकों के सारे खातों को खंगालने की जरूरत है, साथ ही राजनीतिक दलों के खातों को भी खंगालने की जरूरत है। इस अवधि के बीच में जिन लोगों ने पांच लाख ,दस लाख,पचास लाख या उससे ऊपर धन जमा किया है उन लोगों कि शिनाख्त की जानी चाहिए,उनसे आय के स्रोतों की जानकारी देने के लिए कहा जाना चाहिए।इसके अलावा दो लाख से ऊपर के गहने खरीदने वालों की जांच हो।खासकर उन लोगों की जिन्होंने हठात् 8नवम्बर के बाद से महंगे दाम पर सोना खरीदा है, विगत 15दिनों में सोना खरीदने वालों के नाम तो सरकार जारी कर ही सकती है।यह कैसे संभव है कि जिन लोगों ने पहले सोना नहीं खरीदा अचानक 8नवम्बर की 8बजे की घोषणा के बाद ही सोना खरीदा ! उन कंपनियों और ठेकेदारों की भी खोज की जाए जिन्होंने एडवांस में अपने मजदूरों को कई महिने की पगार दे दी और अपना कालाधन सफेद कर लिया। ये बातें उस गोरखधंधे की एक झलक देती हैं जो नोटबंदी के नाम पर विगत 15 दिनों से हो रहा है और मोदी सरकार की इसे रोकने में कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती,उलटे हुआ यह है कि नोट बंदी के बाद सरकार के सभी विभाग ठप्प हो गए हैं। नोटबंदी को यदि अचानक लागू करना था तो सरकारी विभाग ठप्प क्यों हो गए ॽ

बुधवार, 23 नवंबर 2016

मोदी एप सर्वे यानी फ़्रॉड का फ़्रॉड -


  नोटबंदी पर मोदी एप सर्वे में विपक्ष ने भाग नहीं लिया,सिर्फ भाजपा-आरएसएस ने इसमें भाग लिया, मोदीजी की साइबरमंडली-मीडिया मंडली ने जनमत जुटाने का काम किया और इसके बाद १२५करोड की आबादी में वे मात्र पाँच लाख लोगों की राय ही वे जुटा पाए, इससे एक बात साफ है कि अधिकांश भाजपाईयों ने इस सर्वे का बहिष्कार किया है, भाजपा यदि पूरी तरह दिलचस्पी लेती तो यह सर्वे कबीं ज्यादा बड़ी संख्या में लोगों की पाय जुटा पाता। 
       इस तरह के सर्वे की सबसे बडी कमज़ोरी यह है कि सर्वे कर्ता मानकर चल रहा है कि सर्वे में जो लोग भाग ले रहे हैं वे कालेधन,भ्रष्टाचार और नोटबंदी के सभी पहलुओं से वाक़िफ़ हैं।जबकि सच इसके एकदम विपरीत है। अधिकतर लोगों की बात छोड़ दें सिर्फ ९नवम्बर से कल तक के अखबार उठाकर देखेंगे तो उपरोक्त विषयों से संबंधित बहुत कम सामग्री इनमें मिलेगी। इतनी कम जानकारी के आधार देश की महत्वपूर्ण नीति के बारे में जन समर्थन का दावा करना गलत है, अवैज्ञानिक है।
     सवाल यह है जिस व्यक्ति को नोट बंदी का बेसिक नहीं मालूम उसकी राय को सही कैसे कहते हैं ? स्वयं पीएम मोदीजी ने आज तक नहीं बताया कि नोटबंदी का फैसला उन्होंने कैसे और किस अधिकार से लिया? जबकि संवैधानिक तौर पर ने यह फैसला वे नहीं ले सकते। नोटबंदी का फैसला लेने का एकमात्र संवैधानिक हक रिजर्व बैंक के पास है और सच यह है कि रिजर्व बैंक ने नोटबंदी का फैसला नहीं लिया बल्कि रिजर्व बैंक पर मोदीजी ने अपना फैसला थोप दिया और आदेश दिया कि इसे लागू करो।यह कदम अपने आपमें असंवैधानिक है।
        मोदीजी अपने असंवैधानिक फैसले को छिपाने के लिए मोदी एप सर्वे का मुखौटे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। सवाल यह भी है मोदीजी ने स्वयं सर्वे क्यों किया ? कभी भी कोई नीति निर्धारक स्वयं सर्वे नहीं करता । तटस्थ संस्थाएँ सर्वे करती हैं ।उससे  जनमत की सही भावनाएँ सामने आती हैं। सर्वे के पहले जनमत को  विवादास्पद मसले पर शिक्षित किया जाता है उसके बाद राय ली जाती है, मोदीजी यह मानकर चल रहे हैं कि नोटबंदी पर जनता सब कुछ जानती है और उससे सीधे सवाल किए जाने चाहिए। हालात यह है कि स्वयं मोदीजी ने आज तक विस्तार से कालेधन और नोट नीति के संवैधानिक पहलुओं पर किसी भी पेशेवर पत्रकार के सवालों के सीधे जवाब नहीं दिए हैं, क्योंकि वे जानते नहीं हैं। सवाल यह है जब पीएम अपनी नीति के बारे में अज्ञानी हो तब आम जनता कैसे ज्ञानी हो सकती है? 

नोटबंदी और मीडिया के अक्षम्य अपराध-

          नोटबंदी के आतंकियों और माओवादियों पर असर की झूठी खबरों से मीडिया भरा पड़ा है,जबकि आँखों के सामने भारत के प्रत्येक नागरिक के यहां तबाही मची हुई है,कम से कम पचास लाख घरों में शादियां हो रही हैं और वहां सभी एकस्वर से मोदी सरकार की निंदा कर रहे हैं लेकिन मीडिया में यह सब गायब है , नोटबंदी का आतंकियों पर क्या असर हुआ है,यह बताने में मीडिया मगन है,जबकि मीडिया को किसी आतंकी से कोई पुष्ट और प्रामाणिक जानकारी नहीं मिली है।इनमें सारे फोटो पुराने हैं,सिर्फ ऑफिस में बैठकर गप्पें तैयार की जा रही हैं।नोटबंदी ने समूचे बैंकिंग सिस्टम को पंक्चर कर दिया है।आयकर विभाग परेशान है कि कैसे काम करे,मुश्किल से दस लोगों को आयकर विभाग ने नोटिस भेजा और उससे यह आभास पैदा किया गया कि पता नहीं कितना बड़ा तीर मार लिया गया,जबकि आयकर विभाग को मालूम है कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

मोदी जी सरेआम मायावती और दूसरे नेताओं पर हमले कर रहे हैं और सफेद झूठ बोल रहे हैं।नोटबंदी से इन नेताओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।कम से कम अब तक 14 दिनों में मोदीजी ने किसी नेता के यहां छापा मारकर एक लाख के अमान्य नोट तक नहीं पकड़े हैं,उलटे आयकर विभाग ने 91लाख के नोट महाराष्ट्र के भाजपा विधायक और मंत्री की कार से पकड़े हैं।नोटबंदी लागू होने के कुछ समय पूर्व भाजपा के खाते में कोलकाता में 3करोड़ रूपये के नोट जमा कराए गए हैं।इसके बाद भी यह हल्ला कि विपक्ष के पास कालाधन है और उसको नोटबंदी से नष्ट कर दिया गया है।यह पहला मौका है जब मीडिया पीएम और वित्तमंत्री के बयानों की तथ्यपरक जांच नहीं कर रहा। उसका कमर कसकर अफवाह अभियान में जुट जाना इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है।

भारत के इतिहास में सहकारी बैंकों को कभी सामान्य बैंकिंग प्रणाली से काटकर नहीं रखा गया,लेकिन नोटबंदी के बाद सहकारी बैंकिग व्यवस्था ठप्प पड़ी है। वहां कोई लेन-देन नहीं हो रहा,कोई काम नहीं हो रहा।यहां तक कि तुलनात्मक तौर पर पोस्ट ऑफिस से भी इन बैंकों का बुरा हाल है।

इस समस्त प्रक्रिया में पेट्रोल पंप वाले से लेकर बिग बाजार के मालिक तक पर हमारी सरकार को विश्वास है ,उनको किसी न किसी रूप में दो हजार रूपये नागरिकों को निकालने की वहां से सुविधा दे दी गयी है,लेकिन सहकारी बैंकों को तो बिग बाजार और पेट्रोल पंप मालिक कंपनियों जैसे लेन-देन की भी सुविधा नहीं दी गयी है।

सवाल यह है कि ये कंपनियां क्या अपने पॉकेट से नागरिकों को दो हजार रूपये बांटेगी ?कहीं नई मुद्रा को सलेक्टिव ढ़ंग से कारपोरेट घरानों को देने की मुहिम तो नहीं चल रही ?मसलन् बिग बाजार ने दो हजार की मुद्रा डेबिड कार्ड के आधार पर नागरिक को दी तो आखिरकार वह मुद्रा बिग बाजार कहां से जुगाड़ करेगा ,जिस समय बैंकों के पास मुद्रा न हो वैसे में बिग बाजार जैसे निजी नैटवर्क को दो हजार रूपये डेबिड कार्ड के जरिए देने का फैसला नए किस्म की मोदी -कारपोरेट मिलीभगत का नमूना है।यह नोटबंदी की आड़ में चल रहा मोदी करप्शन है।

इसी तरह यह प्रचार भी तथ्यहीन है कि कैशलैस सोसायटी करप्शन मुक्त होती है।सारी दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो कैशलैस हो,यहां तक कि जिन देशों में कैशलैस सिस्टम बहुत पुख्ता है वहां पर भी करचोरी बड़ी मात्रा में होती है।कैशलेस सिस्टम अंततःकैश पर ही चलता है।सिर्फ अंतर यह है कि चलमुद्रा का एक बड़ा अंश चलन से बाहर रहता है, वह बैंकों के पास रहता है।

पहले से ही एक लाख करोड़ रूपये की प्लास्टिक मनी चलन में है।यह प्लास्टिक मनी मोदीजी के पीएम बनने के पहले से ही चलन में है।प्लास्टिक मनी बाजार की पूरक मुद्रा है, विनिमय की मुद्रा है,यह वस्तुतः मुद्रा नहीं, मुद्रा का वायदा है,गारंटी है।असल मुद्रा तो इसके कारण चलन के बाहर है।

सारी दुनिया में 1.2 बिलियन लोग हैं जिनकी जिंदगी प्रतिदिन एक डॉलर से भी कम पैसे से चलती है,भारत में आबादी का बहुत बड़ा अंश है जिसकी रोज की आय तीस रूपये से भी कम है।ऐसे में कैशलैस विनिमय की बात करना अवैज्ञानिक है,साथ ही गरीबों के साथ भद्दा मजाक है।

इस दौर में आम जनता की राय को बनाने और नियंत्रित करने में मीडिया सबसे बड़ी भूमिका अदा कर रहा है अतः मीडिया की भूमिका पर व्यापक बहस होनी चाहिए।सवाल यह है मीडिया यह मानकर क्यों चल रहा है कि नोटबंदी अच्छी बात है,सही फैसला है ?बिना इस नीति की तहकीकात किए,उसके बुनियादी आधार के बारे में सवाल खड़े किए बिना मीडिया ने जिस तरह का माहौल बनाया है उससे पहली बात यह निकलती है कि मीडिया वालों में साक्षरता का अभाव है,मीडिया साक्षरता के अभाव के कारण नोटबंदी के प्रति इस तरह का अनालोचनात्मक रवैय्या पैदा होता है।आम जनता देखती है कि मीडिया समर्थन कर रहा है फलतः जनता मानकर चल रही है कि मोदीजी की नोट बंदी सही है।मीडिया बार बार असुविधाओं को चित्रित कर रहा है उसमें भी वह बड़ी कृपणता के साथ पेश आ रहा है। विगत 14 दिनों में मीडिया का समूचा कवरेज नोटबंदी के प्रति अनालोचनात्मकता से लबालब भरा रहा है।

मीडिया का काम है कि वह जनता की आवाज बने,लेकिन हमारे यहां मीडिया खुल्लमखुल्ला सरकार और कारपोरेट घरानों की आवाज के रूप में काम कर रहा है,ऐसे में मीडिया साक्षरता का काम और भी महत्वपूर्ण हो उठा है।

नोटबंदी के सवाल पर मीडिया ने दो बड़े अपराध किए हैं उसने आर्थिक सूचनाओं को छिपाया है और अ-प्रासंगिक सूचनाओं का प्रसार किया है। दूसरा अपराध यह किया है कि मीडिया अपनी भूमिका भूलकर सरकार के भोंपू की भूमिका अदा कर रहा है।हम सब जानते हैं आम जनता मीडिया द्वारा प्रसारित सूचनाओं पर पूरी तरह निर्भर है ऐसे में आम जनता से सही सूचनाएं छिपाना और सरकार की ही सिर्फ सूचनाओं को प्रसारित करना अपराध की कोटि में आता है।

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी पर जनमत एप का मोदी पाखण्ड -

         पी एम नरेन्द्र मोदी संसद में किसी हॉल में बैठकर भाजपा सांसदों को सम्बोधित कर सकते हैं,संसद शुरू होने के बाद वे दो बार उनको सम्बोधित कर चुके हैं लेकिन वहीं पास में संसद के सदन में आकर भाषण देने में क्यों डर रहे हैं ?
वे संसद की बिल्डिंग में जा रहे हैं लेकिन सदन में नहीं जा रहे,सदन से वे कन्नी क्यों काट रहे हैं ? उनसे क्या कोई संवैधानिक चूक हुई है ?जी हां,हमने फेसबुक पर जितने भी मसले संवैधानिक उल्लंघन के रेखांकित किए थे आज वे सभी मुद्दे विपक्ष भी उठा रहा है।
मोदीजी सदन में बोलते हैं तो वे अपने बयान की संवैधानिक पुष्टि के लिए मजबूर होंगे,दिलचस्प बात है मोदी मंत्रीमंडल के सभी लोग संसद में बोलने को तैयार हैं एकमात्र मोदी बोलना नहीं चाहते,क्योंकि वे अपने को संवैधानिक जवाबदेही से बाहर रखना चाहते हैं।
मसलन्, संसद में यदि वे कहते हैं कि मैंने नोट बंदी का फैसला लिया तो यह संवैधानिक बयान होगा जो सीधे संविधान के उल्लंघन के दायरे में आता है मोदीजी को नोट बंदी का फैसला लेने का हक नहीं है,यदि वे कहते हैं मंत्रीमंडल ने फैसला लिया तो यह कहना भी असंवैधानिक होगा।यही बुनियादी वजह है कि वे संसद से बाहर बोल रहे हैं,संसद के बाहर उनके बोलने का कोई संवैधानिक मूल्य नहीं है।
जो खबरें सामने आई हैं वे ये हैं कि मोदीजी ने नोट बंदी के लिए सभी संवैधानिक नियमों और संस्थाओं को अमान्य या दरकिनार करके नोटबंदी का फैसला लिया है,वे मीडिया और सोशलमीडिया के जरिए आम जनता की राय को मेनीपुलेट करना चाहते हैं।यही वजह है कि आज उन्होंने एक एप के जरिए नोटबंदी से जुड़े 10 सवालों पर राय जानने की कोशिश की है,पीएम की ओर से जो दस सवाल नागरिकों से पूछे गए हैं,वे सवाल गलत हैं और उन सवालों को जिस क्रम से रखा गया है उनके उत्तर पहले से ही तय हैं।
कायदे से नोटबंदी को लेकर पहले सभी आधिकारिक सूचनाएं जनता को दी जाएं और फिर सवाल किए जाएं तो कुछ हद तक संतुलित राय मिलेगी।
मसलन् ,पहले जनता को यह बताया जाए कि नोटों पर पाबंदी लगाने का संवैधानिक अधिकार किस संस्था को है ,हमारे देश में अधिकतर लोग नहीं जानते,कम से कम पीएम को नोटबंदी के फैसले लेने का संवैधानिक हक नहीं है,यह रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दूसरी बात यह कि रिजर्व बैंक ने यह फैसला कब लिया ,क्या यह फैसला कुछ मिनटों या घंटों में लिया यदि हां तो इस तरह का गंभीर फैसला लेने के लिए बैंक के मुखिया पर किसने दवाब डाला,नोटबंदी का फैसला सबसे बड़ा फैसला है,यह हठात नहीं लिया जा सकता।यह ऐसा फैसला है जिससे देश का हर नागरिक प्रभावित हुआ है और परेशान है,उसके संवैधानिक हक पर इस फैसले के जरिए हमला बोला गया है,बेहतर यही होगा कि रिजर्व बैंक सभी तथ्यों को आम जनता के सामने रखे।जनता को नोट बंदी से जुड़े सभी तथ्यों की जानकारी देने के बाद ही पीएम को इस फैसले पर जनमत की राय लेनी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि मीडिया तक को नहीं मालूम कि किसने फैसला लिया और क्यों फैसला लिया,मीडिया एकतरफा ढ़ंग से नोटबंदी के पक्ष में प्रचार कर रहा है और उसी भाषा में प्रचार कर रहा है जिस भाषा में 8नवम्बर2016 को आठ बजे मोदीजी बोले थे।इस तरह नियोजित प्रचार और सूचनाओं के अभाव के आधार पर कोई भी जनमत की राय एकसिरे अवैज्ञानिक और निराधार ही कही जाएगी।सूचनाओं के पर्याप्त प्रचार-प्रसार के बाद ही जनमत की राय ली जानी चाहिए।
इस प्रसंग में दूसरी बात यह कि मोदीजी को हठात् जनमत के समर्थन की जरूरत क्यों है ? वे तो मानकर चल रहे हैं कि उनके साथ सारा देश खड़ा है,वे सही कर रहे हैं,जनता खुश है,बस जरा सी तकलीफ है,सब कुछ यदि पचास दिन तक ऐसे ही चलता रहा तो मोदीजी किला फतह कर लेंगे।
जनमत की राय का एप जारी करके मोदीजी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि आम जनता और खासकर भाजपा के सांसदों-विधायकों में एक अच्छा-खासा हिस्सा उनके पक्ष में नहीं है,इसलिए उन पर दवाब पैदा करने के लिए मोदीजी ने एप के जरिए जनमत की राय का औजार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
दूसरा ,वे विपक्ष के खिलाफ प्रचार अभियान के अंग के रूप में इस एप को लेकर आए हैं,इसके सवालों में यह बात निहित है।
दिलचस्प बात यह है कि नोट बंदी पर रिजर्व बैंक के हक पर हमला बोला गया,संसद के हक पर हमला बोला गया,मीडिया-सोशलमीडिया के जरिए आम जनता के दिमाग पर हमले चल रहे हैं,अब एप के जरिए बमबर्षा की जाएगी।

रविवार, 20 नवंबर 2016

यह एंटी करप्शन नहीं फासिज्म है !

       देश में भ्रष्टाचार,बेईमानी और घूसखोरी के खिलाफ जून १९७५ को लाए गए आपातकाल को भारत की जनता भूली नहीं है। इंदिरा गांधी के उन दिनों के भाषणों को देखना चाहिए। मोदीजी इन दिनों जो भाषा बोल रहे हैं वह अधिनायकवाद की भाषा है,जब आपातकाल लगा तो उस समय भी इंदिराजी के साथ एक योगी था नाम था धीरेन्द्र ब्रह्मचारी , तकरीबन वैसा ही इस समय हो रहा है, मोदी के साथ योगी रामदेव हैं।आपातकाल को विनोवा भावे ने अनुशासन पर्व कहा था और इस समय अन्ना हजारे वही भाषा बोल रहे हैं। आरएसएस ने उस समय इंदिराजी को सहयोग देने के लिए तीनपत्र लिखे थे।आज संयोग से वे देश की केन्द्र सरकार चला रहे हैं उनका नायक पीएम है।
मोदी वही भाषा बोल रहे हैं जो आपातकाल लगाते समय श्रीमती इंदिरा गांधी बोल रही थी। वे भी कठोर फैसले लेने के लिए जानी जाती हैं ,मोदीजी भी सख्त हैं।
आपातकाल में सभी अरबपति इंदिरा के साथ थे, मोदी के साथ भी कारपोरेट घराने हैं।जनता पर नसबंदी , राजनीतिक कारणों से गिरफ्तारी के बहाने बेशुमार जुल्म किए गए।

मोदीजी ने नोटबंदी के बहाने जनता जनजीवन और शांति पर सीधे हमला किया है। यह संयोग है बिडला की एक कंपनी ने "एक्टिव एप "के नाम से फासिस्ट नजरिए का विज्ञापन जारी किया है। आपातकाल में १जुलाई१९७५ को घनश्याम दास बिडला के नेतृत्व में देश के सभी अमीरों ने दिल्ली में आपातकाल और बीस सूत्री कार्यक्रम के समर्थन में जुलूस निकाला था।

जनता ने आपातकाल में असीम धैर्य का परिचय दिया था,लेकिन मन में वह कांग्रेस से नफरत करने लगी,किसी को अंदाजा नहीं लगा कि जनता नाराज है। सारा सरकारी तंत्र पीएम को यही कह रहा था जनता आपके साथ है, लेकिन चुनाव होने पर कांग्रेस बुरी तरह हार गयी। ठीक वैसा ही माहौल इन दिनों है, मोदीजी की योजना है कि जनता भडक जाए तो फिर सीधे सेना की मदद लेकर कुचल दिया जाए, मोदीजी ने जिस दिन नोटनीति घोषित की उसी दिन तीनों सेनाध्यक्षों के साथ बैठक की। हमारा अनुमान है यह बैठक पाक के सीमापर हो रहे हमलों को लेकर नहीं हुई।

आपातकाल को अध्यादेश के जरिए लागू किया गया।नोटबंदी को भी सरकारी आदेश के जरिए लागू किया गया है।दोनों ही मामलों में संसद की अवहेलना की गयी।
हम जनता के विवेक और संयम पर भरोसा करते हैं ,किसी भी अवस्था में जनता को संयम और विवेक को छोडना नहीं चाहिए।जरूरत है मोदी सरकार और आरएसएस के प्रति नफरत को और भी गहरा बनाएं और वोट और शांतिपूर्ण प्रतिवाद के जरिए अपना मन वोट में व्यक्त करें।

धिक्कार है ! नोटबंदी राष्ट्रीय अपराध है !

      जिन लोगों को बाजार नजर न आए,बैंक में लाइन नजर न आए,सूना एटीएम नजर न आए,पाकिस्तान से आए आतंकी नजर न आएं,जनता का क्रोध नजर न आए,औरतों और किसानों की पैसे की तंगी से पैदा हुई तकलीफें नजर न आएं,दैनिक मजदूरों-असंगठित मजदूरों-ठेके पर काम करने वाले मजदूरों-बैंक कर्मचारियों की परेशानियां और मौतें नजर न आएं, आश्चर्य है वे लोग बता रहे हैं वे देश जानते हैं और देश तरक्की कर रहा है !

आम जनता के जमाधन को अचल करना राष्ट्रीय अपराध है औंर यह राष्ट्रीय अपराध किया है आरएसएस-मोदी सरकार ने।
भक्त तो अंततःभक्त हैं पोंदू खोलकर महान नेता के सामने आँखें बंद करके खड़े हैं,कह रहे हैं मार ले ,जितनी चाहे मार ले,महान नेता जितनी मारता है उतने ही खुश होते हैं ,महान नेता जितना तबाह करता है खुश होते है ,महान नेता जितने ज्यादा करेंट के झटके देतां है,उतना ही जोर से कहते हैं "आई लाइक इट", लोकतंत्र में ठेठ भाषा में इसे बाट लगाना कहते हैं,लोकतंत्र की बाट लगी पड़ी है और ये लोग भविष्य की बातें कर रहे हैं,पहले कह रहे थे,परिणाम एक दो दिन में देख लेना,फिर बोले सात दिन में,ये दोनों ही समय निकल गए,परिणाम नहीं दिखा,हां,कुपरिणाम जरूर सामने आ गए हैं।
9नवम्बर से देश की अर्थ व्यवस्था में अकेला बाजार प्रतिदिन 30हजार करोड़ रूपये का नुकसान उठा रहा है, बैंकों ने कितना नुकसान उठाया है वह भी इसमें जोड़ लिया जाए तो जितना कालाधन यह सरकार पकड़ेगी उससे ज्यादा की अब तक क्षति हो चुकी है।सारे लोग कह रहे हैं 5-7लाख करोड़ रूपये से ज्यादा का कालाधन हाथ नहीं लगेगा,लेकिन इतने का तो देश का नुकसान अब तक हो चुका है।इसके बाद भी यदि आप कह रहे हैं कि नोटबंदी सही नीति है तो हम तो यही कहेंगे कि आपसे बड़ा बैसाखनंदन अब देश में दूसरा नहीं है।कम से कम मोटा गणित का हिसाब ही लगा लिया होता तो ,समझ जाते कि देश को किस दिशा में ले जा रहे हो।
मोदी सरकार की नोटबंदी की नीति मूलतः फंडामेंटलिस्ट आर्थिक नीति है,इसको उपभोग और उपभोक्तावाद से सख्त नफरत है,वे लगातार इस पर हमले करते रहते हैं,मोदीजी ने फंडामेंटलिस्टों की नीतियों के अनुरूप नोटबंदी लागू करके समूचे उपभोक्ता बाजार को ही तबाह कर दिया है ,जिस तरह बाजार और नागरिक को तबाह करके फंडामेंटलिस्ट आनंद मनाते हैं ठीक वैसा ही आनंद मोदीपंथी फंडामेंटलिस्ट मना रहे हैं।ये वे लोग हैं जो इस देश के हिन्दुत्ववादी अभियान और हमारी शिक्षा व्यवस्था के तंत्र से निकले हैं।
जनता को बिजली के करेंट के झटके देकर अर्थनीति लागू करने का फार्मूला फंडामेंटलिस्टों की देन है इसका हमारे देश के संविधान,संसद से स्वीकृत नीतियों और उदारतावादी मूल्यों से गहरा बैर है।
खतरा बड़ा है तुम तय करो किस ओर हो ,नई नोटबंदी की नीति फंडामेटलिस्ट समाज बनाने की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है,इसके कारण आज समूचा लोकतंत्र खतरे में है।आपलोगों ने यदि जल्द ही विवेक से काम नहीं लिया तो तय है आगे और भी तकलीफें आने वाली हैं।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

अस्मिता का पुनर्पाठ

          आदमी की निगाह का निर्धारक तत्व है वर्तमान। वह जब भी कोई चीज़,वस्तु,घटना , परंपरा,इतिहास या लिंग को देखता है तो वर्तमान के नज़रिएसे देखता है। सवाल यह है इंटरनेट या सूचना तकनीकी युग में औरत कोकैसे देखें ? इंटरनेट में लिंगबोध या लिंग जैसी कोई चीज़ नहीं होती। लिंगकी पहचान या स्त्री अस्मिता मूलत:प्रेस क्रांति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित अवधारणा है। प्रेस क्रांति को ज्यों ज्यों अपदस्थ करते जाएँगे लिंगरहित अवस्था से जुड़ी समस्याओं में गुजरते जाएँगे। सवाल उठता है इंटरनेट युग या ऑनलाइन युगमें अस्मिता कैसेनिर्मित होती है ? हमारा आज भी अधिकांश समाज ग़ैर-इंटरनेट अवस्थामें जी रहा है, वहाँ ठीक से प्रेसक्रांति भी नहीं पहुँची है ऐसे में हमारे समाज में एक औरत में कई औरतों की इमेज और भाव-भंगिमाएँ सहज रूप मेंदेखी जा सकती हैं। मसलन्,जो लड़की इंटरनेट यूज़र है वह अतीत के स्त्रीमूल्यों से बुरी तरह बंधी है। जो पश्चिमी मूल्यों की क़ायल है वह दिमाग़ सेदहेज और संपत्ति के मोह में डूबी हुई है।तमाम क़िस्म के सामाजिकपरवर्जन में डूबी है।इसी तरह जो लड़की सूचना तकनीक का जमकरउपयोग कर रही है उनमें से अधिकांश की सामयिक राजनीति औरसमकालीन समस्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसी तरह नए बदलेमाहौल ने एक बड़ा परिवर्तन यह किया है कि उसने शिक्षित -अशिक्षितसभी क़िस्म की महिलाओं को मोबाइल से जोड़ दिया है।कम्युनिकेशन केलिहाज़ से यह लंबी छलाँग है। मोबाइल कम्युनिकेशन ने स्त्रीभेद औरउम्रभेद को एक ही झटके में ख़त्म कर दिया है। इसके कारण स्त्री के निजी और सार्वजनिक रूपों , बातों और संस्कारों में मूलगामी परिवर्तन हुआ है।

पहले स्त्री की कायिक मौजूदगी केन्द्र में थी लेकिन इंटरनेट-मोबाइल-एसएमएस ने स्त्री की भाषिक मौजूदगी को प्रमुख बना दिया है ।अब स्त्रीभाषा में मिलती है।पहले स्त्री के शरीर पर बहुत बातें हुई हैं, समूचाश्रृंगाररस स्त्री शरीर के ऊपर केन्द्रित है। लेकिन स्त्री की कायिक सत्ताका रीतिकाल के समापन के साथ पूँजीवाद ने नवीकरण किया है। पहलेसाहित्य में श्रृंगाररस थी जीवन में नहीं था । पूँजीवाद ने श्रृंगार कोवायवीयता बियावान से निकालकर भौतिक बनाया है ।

रैनेसां में स्त्री शरीर के सवाल केन्द्र में आते हैं।मध्यकाल में कविता में औरत का शरीर है जबकि रैनेसां में गद्य में औरत के शरीर कोरखा गया , कम्युनिकेशन और व्यापार के केन्द्र में स्त्री शरीर को रखा।यानी आधुनिककाल आते ही औरत को घर की चहारदीवारी से बाहरनिकाला गया।पहले की तुलना में औरत ने व्यापक सामाजिक स्थानबनाया । उसका बहुआयामी शोषण हुआ। नए श्रम विभाजन में औरत नेअपनी जगह बनायी। नए कम्युनिकेशन , नए सामाजिक बदलाव में औरतने सक्रिय भूमिका निभायी।ख़ासकर राजनीति और राजनीतिक अर्थशास्त्रके निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दिलचस्प बात यह है श्रृंगारऔरत करती थी लेकिन तय व्यवस्था ने किया। किसी महिला ने श्रृंगाररस पर नहीं लिखा। पुरूषों ने लिखा। इसी तरह सेक्स और उसका संबंधकैसा हो यह भी पुरूषों ने लिखा।कामसूत्र और श्रृंगार रस पर लिखा समूचाशास्त्र पुरूषों ने रचा। पुरूष माने व्यवस्था यह धारणा कई हज़ार सालों मेंनिर्मित हुई है। अब यह आदत बन गयी है। औरतों ने इन विषयों पर क्योंनहीं लिखा यह रहस्य बना हुआ है।जबकि उस ज़माने में औरतें जमकरलिख रही थीं।इसी तरह रैनेसां में स्त्री के सवाल केन्द्र में हैं लेकिन औरतेंचुप हैं ।औरतों की इस चुप्पी को जितना खोला जाएगा भिन्न क़िस्म केसवाल जन्म लेंगे।

मध्यकाल और रैनेसां में स्त्री को बाँधने, नियमित और नियंत्रित करनेके शास्त्र रचे गए।यह काम इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप ढंग से हुआफलत:स्त्री के तन,मन और अनुभूति को समाज सीमित रूप में ही जानपाया।औरत को इस क्रम में वैविध्यपूर्ण और मानवीय बनाने की बजायवायवीय-मिथकीय- रहस्यात्मक बना दिया।सच यह है मध्यकाल में पुरूष,औरत को बहुत कम जानता था।लेकिन आधुनिककाल में स्त्री के शरीर कीबजाय उसके सामाजिक अस्तित्व के सवाल जब उठे तो स्त्रीशरीर औरपुरूष के नज़रिए से मुक्ति का मार्ग निकला। स्त्री के बारे में , उसके मन,तन और सामाजिक कार्य व्यापार के बारे में सामाजिक सचेतनता बढी।कहने का आशय यह है कि तन के परे स्त्री के सामाजिक अस्तित्व केसवाल समाज और मीडिया में जितना स्थान घेरेंगे उतना ही स्त्रीताक़तवर बनेगी। स्त्री देह के सवाल पुरुष वर्चस्व को बनाए रखते हैं।जबकि स्त्री के सामाजिक अस्तित्व के सवालों पर संवाद और विमर्श सेमहिला सशक्तिकरण में इज़ाफ़ा होता है।

विगत चार दशकों के दौरान स्त्री अस्मिता की राजनीति साहित्यविमर्श के केन्द्र में है। क़ायदे से स्त्री अस्मिता को स्थिर अवधारणा के रूपमें देखने से बचना चाहिए। हिन्दी में अधिकांश लेखन स्त्री अस्मिता केस्थिर रूप से जुड़ा है। जबकि स्त्री अस्मिता को रूपान्तरित अवधारणा केरूप में देखना चाहिए। मसलन् एक स्त्री की अस्मिता सिर्फ़ स्त्री केविभिन्न रूपों में ही रूपान्तरित नहीं होती बल्कि अनेकबार वहलिंगातिक्रमण भी कर जाती है। मसलन् स्त्री अस्मिता या अस्मिता केस्थिर रूप के ज़रिए समलैंगिक या लेस्बियन अस्मिता को समझ ही नहींसकते। इसी तरह यदि मायावती-ममता -जयललिता आदि स्त्रियाँ जब राजनीति करती हैं तो वे मात्र स्त्री नहीं रह जातीं बल्कि उनकी राजनेता कीअस्मिता बन जाती है। यह वस्तुत: स्त्री अस्मिता का रूपान्तरित रूप है जोबेहद महत्वपूर्ण है। इसी तरह स्त्री और उच्च तकनीक के अन्तस्संबंधों सेजिस अस्मिता का निर्माण होता है वह स्त्री अस्मिता से भिन्न है। डोना हर्वेके अनुसार उच्च तकनीक के पैराडाइम में स्त्री या पुरूष का लिंगभेद ग़ायबहो जाता है, ऊँच -नीच, छोटेबडे का भेद ग़ायब हो जाता है। यहाँ पर तोज्ञान और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में पहचान बनती है। हम डोना केनज़रिए से असहमत हैं,अंत: वे सही हैं,यह स्थिति नेट के प्रसंग में कम है, लेकिन कम्प्यूटर के संदर्भ में ज़्यादा है। नेट पर बडे पैमाने परस्त्रीविरोधी सामग्री है, बेवसाइट हैं।अभी तक सोशलमीडिया लेकर बेवसाइट तक स्त्री के लिए सुरक्षित स्थान नहीं है।वर्चुअल स्त्री के लिए समाज की ज़रूरत नहीं है लेकिन वास्तव औरत की दुनिया को समाज या समुदाय के बिना निर्मित नहीं कर सकते।वर्चुअल स्पेस में औरत नहीं उसकी इमेज मात्र रहती है। यह वास्तव स्त्री नहीं है।

रेमण्ड विलियम्स ने लिखा है मानवीय सांस्कृतिक गतिविधियों पर विचार करते समय सबसे बाधा यह है कि हम तात्कालिक और नियमित अनुभवों को निष्पन्न विचारों के साथ जोड़ देते हैं।इस क्रम में सारवान अतीत की ओर जाते हैं साथ ही सामयिक जीवन की ओर भी जाते हैं।इसमें संबंधो,संस्थानों और उन रूपों की ओर जाते हैं जिनमें सक्रिय हैं और रूपान्तरित कर रहे हैं,इस प्रक्रिया को निर्माण प्रक्रिया न कहकर समग्र कहना समीचीन होगा। इस नजरिए से देखें तो रोमांस,नौकरी ,शादी ,शिक्षा आदि कोई भी चीज जो अस्मिता को बनाती है वह तात्कालिक सामाजिक संरचनाओं और रूपों से निर्मित नहीं होती।मनुष्य सिर्फ तात्कालिक चीजों से ही नहीं बनता।बल्कि उसके निर्माण की प्रक्रिया सामाजिक अभ्यासों पर निर्भर है।सामाजिक अभ्यासों का निर्माण दीर्घकालिंक प्रक्रिया में होता है।इसलिए अस्मिता पर विचार करते समय इस पर सोचें कि उसके निर्माण के उपकरण कौन से हैं ॽ

सारी दुनिया में अस्मिता की अवधारणा को जनप्रिय बनाने और स्थापित करने में अमेरिकी समाजविज्ञानी-मनोशास्त्री जी.एच.मीड की बहुत बड़ी भूमिका है।भारत में अस्मिता के जिन उपकरणों का जो लोग इस्तेमाल करते हैं उनमें मीड के नजरिए के उपकरण जाने-अनजाने चले आए हैं।मसलन्, अस्मिता को व्यक्ति की सहजजात क्षमताओं को सामाजिक जीवन,आत्म-चेतना और आत्म-अभिव्यंजनाओं के साथ जोड़कर सामाजिक इतिहास का उत्पाद बनाकर पेश किया गया।इस तरह की वस्तुगत प्रस्तुतियों को संवेदनाओं के साथ जोड़कर पेश किया गया और यही अस्मिता का बुनियादी आधार है। सामान्यतौर पर अस्मिता की अवधारणा सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक रूपों के साथ निजी जगत की अभिव्यंजना है। मेरे लेखे अस्मिता निजी जीवन की भूमिकाओं सामाजिक परिणाम है।इसलिए अस्मिता को सामाजिक आचार-व्यवहार और अभ्यासों के जरिए ही समझा जा सकता है।अस्मिता का एक छोर जिस तरह सामाजिक अभ्यासों से जुड़ा है वहीं दूसरा छोर मनोजगत की संरचनाओं से जुड़ा है।मसलन् व्यक्ति अपनी देखभाल कैसे करता है,उसके प्रेरक कौन हैं,उसके इर्द-गिर्द जो घट रहा है उसके प्रति उसका किस तरह का रूख है,वह करीबी यथार्थ की कितनी देखभाल करता है।क्योंकि इन सबसे मिलकर ही मानवीय गतिविधियों का निर्माण होता है।मसलन्, निज के संदर्भ में अस्मिता नजर आती है,उसके हक नजर आते हैं ,जबकि अन्य के प्रति हम बेगाने बने रहते हैं तो इसे अस्मिता की अनुभूति नहीं कहेंगे।अस्मिता बनती है निजी और सामाजिक सरोकारों के साथ जुड़ने से।इसमें निजी जितना महत्वपूर्ण है,सामाजिक भी उतना ही महत्वपूर्ण है।हमें निजी तौर पर प्रभुत्व जितनी पीड़ित करता है सामाजिक तौर पर भी वह उतना ही पीड़ादायक होता है।इसलिए प्रभुत्व के सवाल निजी और सामाजिक दोनों ही धरातल पर हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं।अस्मिता सिर्फ निज की मुक्ति का प्रकल्प नहीं है बल्कि सामाजिक मुक्ति का प्रकल्प भी है।अस्मिता बनाम प्रभुत्व का अन्तर्विरोध एकायामी नहीं है बल्कि बहुआयामी है।अमूमन हिन्दी में अस्मिता एकायामी दिशा में गतिशील है इसलिए सामाजिक स्तर पर प्रभावहीन है।अस्मिता के सवाल सुविधा,आरक्षण आदि के ही सवाल नहीं हैं बल्कि अस्मिता के सवाल दीर्घकालिक अभ्यासों और सांस्थानिक रूपों को चुनौती देने के सवाल भी हैं।

सन् 1977 के बाद से अस्मिता विमर्श पर जितना लिखा गया है उतना किसी अन्य विषय पर नहीं लिखा गया है।यह स्थिति भारत की ही नहीं सारी दुनिया की है।भारत के संदर्भ में आपातकाल मूल रूप से पैराडाइम बदलता है। आपातकाल के बाद लोकतंत्र की रक्षा का सवाल सबसे बड़ा सवाल बन गया,लोकतंत्र हमारे देश की अस्मिता के पहचान का सबसे बड़ा रूप है,बाकी सारी अस्मिताएं इसके अधीन हैं या मातहत हैं। अस्मिता के सवाल लोकतंत्र के परिप्रेक्ष्य में उठाए जाने चाहिए। आपातकाल के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन यही आया कि उसने पहले से चले आ रहे बहस के मुद्दों को सामाजिक क्षितिज से ठेलकर हाशिए पर डाल दिया और उन मुद्दों को केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया जो लोकतंत्र से सीधे जुड़े हुए थे।लोकतंत्र बचेगा तो देश बचेगा,तमाम किस्म की अस्मिताएं भी बचेंगी।यही वह मूल प्रस्थान बिंदु है जिसके कारण विभिन्न क्षेत्रों में अस्मिता के सवाल उठे और उन पर व्यापकतौर पर लिखा गया।हिन्दी में दलित और स्त्री के संदर्भ में अस्मिता के सवाल ज्यादा उठे।

अस्मिता का कोई न मित्र है न शत्रु । अस्मिता की सारी आपत्तियां 'अन्याय' के खिलाफ हैं। 'अन्याय' के खिलाफ सामाजिक लामबंदी का उपकरण है अस्मिता। सवाल यह है अंत में अस्मिता किस बिंदु पर पहुँचती है ? क्या पुन: लौटकर अस्मिता की ओर लौटते हैं अथवा मानवता की ओर पहुँचते हैं।अस्मिता मूलत: राजनीतिक मंशा की देन है। अस्मिता पर राजनीति के बिना चर्चा संभव नहीं है। अस्मिता में निहित व्यक्तिगत और सामाजिक इच्छाओं को अभिव्यक्त किया है।अस्मिता विमर्श का इतिहास से गहरा संबंध है। इतिहास में जाए बिना इसका चित्रण और विवेचन संभव नहीं है।

अस्मिता विकल्प है। वह कभी स्वाभाविक नहीं होती। वह सामाजिक निर्मिति है।अस्मिता की धुरी है मनुष्य और मानवता।वह प्रतिस्पर्धी और बहुरूपी है। उसका दूसरा तत्व है भावुकता और सामाजिक तनाव। तीसरा , आत्महीनता। चौथा ,अस्मिता का सम-सामयिक फ्रेमवर्क । पांचवां , अस्मिता की राजनीति। अस्मिता विमर्श का सत्ता विमर्श के साथ गहरा संबंध है । छठा, अस्मिता विमर्श व्यक्तिवादी विमर्श है।अस्मिता विमर्श का इन दिनों जो रूप देखने में आ रहा है उसके दो प्रमुख आयाम है पहला है 'अन्याय' और दूसरा है ' इच्छापूर्त्ति'। सामाजिक-सांस्कृतिक रूपों में इन दो रूपों में अस्मिता का व्यापक उपभोग हो रहा है। अस्मिता विमर्श मूलत: उत्पादक है। सामाजिक शिरकत को बढ़ावा देती है। ध्यान रहे जाति,लिंग,नस्ल,त्वचा,धर्म आदि पर आधारित अस्मिता की सीमित भूमिका होती है। अस्मिता का मूलाधार है मानवता। मनुष्य ही प्रधान अस्मिता है। बाकी इसके मुखौटे हैं।

अस्मिता के फ्रेमवर्क में इन दिनों अनेक लेखक-लेखिकाओं की आत्मकथाएं आई हैं। अतः आत्मकथा के प्रमुख तत्वों को जानना बेहद जरूरी है।आत्मकथा का पहला तत्व है व्यक्तिगत अस्मिता और निर्वैयक्तिकता। आत्मकथा का दूसरा तत्व है उपस्थिति,वर्तमान और प्रस्तुति। रोलां बार्थ के शब्दों में आत्मकथा को उपन्यास के चरित्रों के माध्यम से व्यक्त होना चाहिए।आत्मकथा लिखते समय चिर-परिचित क्षेत्र हमेशा परेशान करते हैं। चिर-परिचित वातावरण समस्या पैदा करता है।दलितों की आत्मकथा को ही लें।इन आत्मकथाओं में चिर-परिचित यथार्थ है भारत की जाति समस्या। जाति समस्या लेखक को परेशान और उत्तेजित दोनों ही करती है। जातिप्रथा को करीब से जानने के कारण लेखक को इसके बारे में सटीक वर्णन ,विवरण और ब्यौरे तैयार करने में मदद मिली है। लेखक को जातिप्रथा की अनेक 'दरारें' नजर आती हैं। आत्मकथा में 'दरारों' की केन्द्रीय भूमिका होती है। 'दरारें' पुराने व्यक्तित्व की जगह नए व्यक्तित्व को सामने लाने का काम करती हैं। लेखक की जाति उत्पीड़न की पीड़ाएं जितनी बार व्यक्त होती हैं उतनी ही बार उसका नया रूप सामने आता है। पुराना रूप बदल जाता है। लेखक कहीं पर भी पुराने रूप को स्थापित करने का प्रयास नहीं करता। हमेशा नए रूप को सामने लाता है। पुराने रूप के साथ सामंजस्य बिठाने की बजाय 'दरारों' और 'अंतरालों' के बीच में से नए रूप में लेखक सामने आता है। रोलां बार्थ ने आत्मकथा के बारे में लिखा है आत्मकथा में आप स्वयं को नहीं देखते बल्कि इमेज को देखते हैं। अपनी आंखों को नहीं देखते। आत्मकथा लेखन हमेशा विचलनभरा होता है। विचलन के ऊबड़ खाबड़ पैरामीटर सर्किल बनाते हैं। इन रास्तों से गुजरने के बाद एक ही संदेश संप्रेषित होता है कि जिंदगी अर्थपूर्ण है।

आत्मकथा का केन्द्र बिंदु कौन सा है ? यह खोजने की जरूरत है।आत्मकथा में विश्वास सबसे बड़ी चीज है। आस्था के साथ लिखी आत्मकथा इमेज बनाती है। आत्मकथा में चित्रण के लिए चित्रण नहीं होता बल्कि प्रस्तुति पर जोर रहता है। आत्मकथा चिर-परिचित यथार्थ की प्रस्तुति होती है। प्रस्तुति में अंतराल ज्यादा साफ नजर आते हैं। क्योंकि आत्मकथा में समग्रता के तत्व का पालन नहीं होता।आत्मकथा में न्यूनतम अनुकरण, उद्धाटन ,विवरण और आख्यान होता है। आत्मकथा में नामों का जिक्र और नामों के साथ जुड़े अनुभवों का वर्णन होता है। फलत: आत्मकथा के दायरे में अनेक मील के पत्थर और पैरामीटर होते है। आत्मकथा भाषा प्रमुख है।वही आत्मकथा है। भाषा का संसार ही है जिसके कारण वह अपील करती है। आत्मकथा की भाषा में प्रस्तुति 'मैं' के अंत की घोषणा है। ''मैं'' संकेत मात्र होकर रह जाता है। भाषा सामूहिक प्रयासों से बनती है। आत्मकथा के 'मैं' का राजनीतिक - दार्शनिक चीजों में लोप हो जाता है। भाषाविज्ञान में लोप हो जाता है। आत्मकथा में '' मैं'' हमेशा घुला मिला होता है। आत्मकथा में जैसे 'तुम','वह','हम' होते हैं वैसे ही 'मैं' भी होता है। आत्मकथा में सब्जेक्ट और ऑब्जेक्ट दोनों एक हो जाते हैं। वक्ता और विषय एक हो जाते हैं।आत्मकथा का तीसरा प्रमुख तत्व है सुसंगत अनुभूति। जीवन के तथ्यों को सीधे बगैर किसी लाग-लपेट के अनुभूतियों के साथ पेश करना इसकी खूबी है। यहां तथ्यों को बगैर चासनी के पेश किया जाता है। बगैर किसी कृत्रिमता के पेश किया है। तथ्यों को अकृत्रिम भाव से पेश करना आत्मकथा का उत्तर आधुनिक फिनोमिना है। उत्तर आधुनिक आत्मकथा में अनिश्चितता,विचलन आदि को सहज ही देख सकते हैं। इसमें भाषा और विमर्श प्रभावशाली होते हैं।

आत्मकथा का पांचवां तत्व है छवि,काल्पनिक छवि और कल्पना। वाल्टर वूगीमैन के अनुसार '' वैध ज्ञान की पद्धति, कल्पना का अंत है।'' कहानी में शब्द,भाषा और भाषण चेतना निर्मित करते हैं। यथार्थ परिभाषित करते हैं। कल्पना के जरिए रूढिबद्धता से अपने को मुक्त करते हैं। अन्य किस्म का व्यक्तित्व निर्मित करते हैं। कल्पना के जरिए ही सामाजिक-साहित्यिक रूढियों को खारिज करने में मदद मिलती है। मनुष्य का रूपान्तरण होता है। यह रूपान्तरण सामंजस्य बिठाकर नहीं होता। व्यक्ति क्या है और व्यक्ति की क्या छवि बन रही है इन दोनों पर लेखक की नजर होती है,इसकी प्रस्तुति के दौरान लेखक रूढिबद्धता से बचने की कोशिश करता है। पूर्ण स्वतंत्रता और कल्पना का इस्तेमाल करता है। स्वतंत्रता और कल्पना के प्रयोग के कारण ही आत्मकथा ऊर्जा से भरी होती है। पढ़ने वालों के मन में ऊर्जा का संचार करती है। साहस और आस्था के साथ जोखिम उठाने की प्रेरणा देती है।

आत्मकथा का छठा तत्व है विमर्श,उद्धाटन और समापन। आत्मकथा में आत्म को उद्धाटित करने के लिए साहस की जरूरत होती है। अनेक लेखकों में साहस का अभाव होता है। आत्मविश्वास और साहस के बिना आत्मकथा लिखना संभव नहीं है। जो लेखन में जोखिम उठाते हैं और अपनी बात कहते हैं। वे अपना बोझ हलका करते हैं साथ ही समाज को भी खुली हवा में सांस लेने का मौका देते हैं।आत्म के बहाने लेखक लंबे समय से बंद कमरों को खोलता है। आत्मकथा में उद्धाटित करते समय लेखक डरता है, डरता है कि कहीं पकड़ा न जाऊँ ? अन्य के सामने नंगे खड़े होने का डर रहता है। यह शर्म और डर कहां से आता है ? असल में जो बौनेपन के शिकार होते हैं वे शर्माते हैं, डरते हैं। औसत बुद्धि के लेखक शर्माते और डरते हैं। इनमें से ज्यादातर रूढियों में जीते और तयशुदा मार्ग पर चलते हैं। 'क्लीचे' में जीते और बातें करते हैं।मजेदार बात यह है आत्मकथा में आत्म को बताना तो बहुत दूर की बात है लोग कहां जा रहे हैं यह तक साफतौर पर नहीं बताते। वे सामान्य सी चीज को बताने में डरते हैं, शरमाते हैं। उन्हें डर लगता है यदि अपनी बात बता देंगे तो पता नहीं क्या हो जाएगा। अमूमन हमें न बताने की आदत है। छिपाने की आदत है। छिपाना हमारी प्रकृत्ति है। जो छिपाया जा रहा है वह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही वह भी महत्वपूर्ण है जो बताया जा रहा है। आत्मकथा को लिखने का मकसद होता है बंद अनुभूतियों को खोलना। छिपे हुए को सामने लाना। आत्मकथा के वातावरण को विभिन्न परिप्रेक्ष्य में देखना । निष्कर्ष निकालने से बचना।निष्कर्ष आत्मकथा को बंद गली में ले जाते हैं।आत्मकथा का मार्ग खुला होता है उसे निष्कर्ष के बहाने बंद करना आत्मकथा के मानकों की अवहेलना है। लेखन को इस बात से आंकना चाहिए कि आप कितना भूलते हैं और कितना क्षमा करते हैं। लेखन में अनुभवों की संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता।