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September, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेडिसन स्क्वेयर के चाक्षुष आनंद की मोदीधुन

मोदी के भाषणों की सबसे बड़ी विशेषता है मेनीपुलेशन। मेनीपुलेशन के बिना वे भाषण नहीं देते। उनके भाषण की दूसरी विशेषता है फुटपाथशैली। इन दोनों शैलियों का मेडिसन स्केवयर गार्डन में दिए गए भाषण में उन्होंने जमकर इस्तेमाल किया।मसलन् मोदी ने कहा गांधीजी को 'आज़ादी' और 'सफ़ाई' ये दो चीज़ें पसंद थीं। सच यह है गांधीजी को आजादी और साम्प्रदायिक सद्भाव पसंद था। स्वच्छता उनकी राजनीतिक जंग का अंग ही नहीं था। अस्पृश्यता निवारण उनके लक्ष्यों में से एक जरुर था। सवाल यह है मोदीजी यह सब बताना भूल गए अथवा उनकी संघ बुद्धि ने बताने नहीं दिया ?     मोदी का अपने हर अभियान में महात्मा गांधी का इस्तेमाल बताता है कि आनेवाले दिनों में महात्मा गांधी के विचारों का वे जमकर दुरुपयोग करेंगे । इतिहासकारों की यह जिम्मेदारी है कि इस मामले में सजगता दिखाएं। मोदी जिस तरह विचारधाराहीन महात्मा गांधी पेश कर रहे हैं,इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वह भारत के लिए चिंता की बात है। मसलन् महात्मा गांधी का भारत आना,किसी आप्रवासी का भारत आना मात्र नहीं था,जैसाकि मोदी ने पेश किया।वे देश को साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराने…

जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन के बहाने नए बंगाल की तलाश

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पश्चिम बंगाल में विगत कई सालों में जिस तरह की जड़ता,हताशा और पराजय भाव का जन्म हुआ है उसने सभी जागरुक लोगों को चिन्ताग्रस्त किया है। चिन्ताएं इसलिए भी बढ़ी हैं क्योंकि वामदलों की साख घटी है, जनसंघर्षों के प्रति संशय और संदेह का भाव बढ़ा है। मध्यवर्ग में कदाचार और हिंसाचार के प्रति सहिष्णुता बढ़ी है। विश्वविद्यालय-कॉलेजों में व्यापक आतंक और कदाचार बढ़ा है। शिक्षक-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मियों की इमेज धूमिल हुई है। उन पर हमले बढ़े हैं। शासकों में अन्याय-हिंसा –भ्रष्टाचार-बर्बरता की नग्न हिमायत ने जन्म लिया है। सभ्य बंगाल अब असभ्य और बर्बर प्रतीत होने लगा है !

सभ्य बंगाली अपने को बंगाली कहने में लज्जित महसूस करने लगे हैं। बंगाल में लंपटई,दबंगई,कु-संगति का आज जितना सम्मान है उतना सभ्यता का सम्मान नहीं रह गया है। बुद्धिजीवियों को कल तक ओपिनियनमेकर माना जाता था लेकिन आज उनकी आवाज को कोई सुन नहीं रहा। कल तक ज्ञानी-गुणी-बुद्धिजीवी-संस्कृतिकर्मी-कलाकार –शिक्षक आदि को गर्व की नजर से देखा जाता था लेकिन आज वह सब गायब हो चुका है। यही वह परिवेश है जिसमें राजनीति में वाम की पराजय हुई और ममता बनर्ज…

कार्ल मार्क्स और सर्वहारा की तानाशाही

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इन दिनों फेसबुक पर अशिक्षितों का फैशन हो गया है कि वे मार्क्स को शैतान सिद्धांतकार और सर्वहारा की तानाशाही को गंदी गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। इसमें सभी रंगत और विचारधारा के लोग हैं,यहां तक कि मार्क्स के अनुयायी होने का दावा करने वाले पूर्व मार्क्सवादियों में भी एक वर्ग है जो सर्वहारा की तानाशाही की गलत व्याख्या करता है।
      सर्वहारा की तानाशाही का मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही नहीं है। व्यवहार में अनेक पूर्व समाजवादी देशों में इस अवधारणा का इसी रुप में इस्तेमाल किया गया। पूर्व समाजवादी देशों में सर्वहारा की तानाशाही का जिस तरह दुरुपयोग हुआ उससे यह धारणा विकृत हुई और इसकी गलत समझ प्रचारित हुई। मुश्किल यह है कि एक तरफ बुर्जुआजी का कु-प्रचार और दूसरी ओर कम्युनिस्टों के द्वारा इस धारणा का भ्रष्टीकरण ये दो चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं। कार्ल मार्क्स की अनेक धारणाओं को इन दोनों ओर से गंभीर खतरा है। तीसरा खतरा सोशल मीडिया ने पैदा किया है। इसके यूजरों का एक बड़ा हिस्सा है जो मार्क्सवाद को एकदम नहीं जानता लेकिन मार्क्सवाद ,साम्यवाद और उससे जुड़ी धारणाओं के बारे में आए…

कार्ल मार्क्स और लोकतंत्र

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कार्ल मार्क्स के बारे में मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक अनेक मिथ प्रचलित हैं।इन मिथों में एक मिथ है कि मार्क्स का लोकतंत्र से कोई सम्बन्ध नहीं है,मार्क्स लोकतंत्र विरोधी हैं। फलश्रुति यह कि जो मार्क्स को मानते हैं वे लोकतंत्र विरोधी होते हैं। सच्चाई इसके एकदम विपरीत है।मार्क्स ने अपना जीवन रेडीकल या परिवर्तनकामी लोकतांत्रिक नागरिक के रुप में आरंभ किया। कालान्तर में वे इस मार्ग पर चलते हुए क्रांतिकारी बने। अपने व्यापक जीवनानुभवों के आधार पर मार्क्स ने तय किया कि लोकतंत्र को वास्तव लोकतंत्र में रुपान्तरित करना बेहद जरुरी है।

हममें से अधिकांश लोकतंत्र के प्रचलित रुप को मानते और जानते हैं। लेकिन जेनुइन लोकतंत्र को हम लोग नहीं जानते अथवा उसे पाने से परहेज करते हैं। कार्ल मार्क्स के समग्र लेखन और कर्म पर विचार करें तो पाएंगे कि वे राजसत्ता की परमसत्ता के विरोधी थे। प्रसिद्ध ब्रिटिश मार्क्सवादी आलोचक टेरी इगिलटन के अनुसार मार्क्स जनता की लोकप्रिय संप्रभुता के पक्षधर थे। इसका एक रुप संसदीय लोकतंत्र है। वे सिद्धांततः संसद के विरोधी नहीं थे। वे मात्र संसद में ही लोकतंत्र के पक्ष…

इमेजों के विभ्रम में कैद मोदी

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नरेन्द्र मोदी के लिए चीन के राष्ट्रपति की यात्रा काफी असुविधाजनक रही है। इस यात्रा के दौरान मोदी इमेज युद्ध में ढ़ीले पड़ गए। पराजित भी हुए। मोदी फोटो सचेत रहे जबकि चीन के राष्ट्रपति ने अपने को स्वाभाविक रखा।मोदी की नजर कैमरे पर थी लेकिन चीन के राष्ट्रपति की नजर मोदी पर थीं।लगता है मोदी के सलाहकारों ने ठीक से कैमरा अभ्यास नहीं कराया या फिर मोदी सही ढ़ंग से सीख नहीं पाए। फोटोसचेत नेता निष्प्रभावी होता है। इमेज युद्ध में जीनेवाले की इमेजों में ही विदाई होती है। वह आनंदमय क्षण था कि मोदी जब चीन के राष्ट्रपति से मिल रहे थे! साथ ही वे अपना विलोम भी रच रहे थे! लोकसभा चुनाव के समय उन्होंने इमेजों के जरिए "नायक" को रचा था!लेकिन चीन के राष्ट्रपति से मिलते हुए वे नायक कम फोटो सचेतक ज्यादा नजर आए। उनके कायिक इमेज संसार में सहजता-सरलता और स्वाभाविकता एकसिरे से नदारत थी और इसने मोदी की इमेज को नुकसान पहुँचाया है।इससे भारत की इमेज पर भी बुरा असर पड़ा है। हमें संदेह है कि मोदी के व्यक्तित्व से चीन के राष्ट्रपति प्रभावित हुए होंगे!
नेता कूटनीतिक क्षणों में मुसकराते हैं ,दांत नहीं दि…

वृन्दावन की विधवाएं और नया बंगाली समाज

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वृन्दावन में विधवाओं की दीन दशा पर आज 'एबीपी न्यूज' टीवी चैनल पर मथुरा से भाजपा सांसद हेमामालिनी का साक्षात्कार सुनने को मिला। हेमामालिनी ने एक दर्शक के नजरिए से वृन्दावन की विधवाओं को देखा है,उन्होंने भाजपा के स्थानीय नेताओं की फीडबैक पर भरोसा किया है। वे इस समस्या की जड़ों में जाना नहीं चाहतीं,लेकिन उनकी एक बात से मैं सहमत हूँ कि विधवाओं को सम्मानजनक ढ़ंग से रहना चाहिए, सम्मानजनक ढ़ंग से वे रहें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। वे भीख न माँगे हमें यह भी देखना चाहिए। असल में औरतों के प्रति हेमामालिनी का 'चाहिएवादी' नजरिया समस्यामूलक है।यह दर्शकीय भाव से पैदा हुआ है और इसका समस्या की सतह से संबंध है।
वृन्दावन में विधवाएं क्यों आती हैं या भेज दी जाती हैं,इसके कारणों की ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है। इस प्रसंग में बंगाली समाज में विगत 100साल में जो आंतरिक परिवर्तन हुए हैं उनको ध्यान में रखें। बंगाली समाज में सबसे पहला परिवर्तन तो यह हुआ है कि परिवार की संरचना बदली है, परिवार में नए आधुनिक जीवन संबंधों का उदय हुआ है। इसने एक खास किस्म की स्थिति बूढ़ों और औ…

भारतीय मुसलमानों की बलिदानी परंपरा

मुसलमानों की देशभक्ति की बात उठते ही भारत-पाक मैच का संदर्भ बार-बार संघी लोग उठाते हैं और कहते हैं देखिए मुसलमान भारत की हार पर बल्ले बल्ले कर रहे हैं। इनको शर्म नहीं आती,ये देशद्रोही हैं,आदि किस्म के कुतर्कों की हम फेसबुक से लेकर मासमीडिया में आएदिन प्रतिक्रिया देखते हैं। हम साफ कहना चाहते हैं कि खेल को राष्ट्रवाद के साथ नहीं जोडा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद कैंसर है इसे जिससे भी जोड़ेंगे वह चीज सड़ जाएगी। खेल से जोड़ेंगे खेल नष्ट हो जाएगा। रही बात पाक की जीत पर खुशी मनाने की तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

खेल के दर्शक को हम दर्शक की तरह देखें हिन्दू-मुसलमान के रुप में न देखें। खेल में धर्म,देश,छोटा-बड़ा नहीं होता। खेल तो सिर्फ खेल है।खेल में कोई जीतेगा और कोई हारेगा,कोई खुशी होगा तो कोई निराश होगा, खेल अंततःसर्जनात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। खेल को यदि राष्ट्रवाद से जोड़ा जाएगा या किसी भी किस्म की राजनीति से जोड़ा जाएगा तो उससे सामाजिक सर्जनात्मकता पर बुरा असर पड़ेगा।खेल का मकसद है जोड़ना।जबकि राष्ट्रवाद का मकसद है तोड़ना।भारत-पाक मैच के साथ संघी लोग राष्ट्रवाद को जोड़कर अपनी फूटसंस्कृति …

वृन्दावन की विधवाएँ और पुंसवाद

हेमामालिनी ने वृन्दावन की विधवाओं के बारे में स्त्री विरोधी बयान देकर विधवाओं को आहत किया है।ये विधवाएँ हमारे समाज का आईना हैं और ये हमारी स्त्री विरोधी राजनीति का महाकाव्य भी हैं। वृन्दावन की विधवाएँ अभी तक बस नहीं पायी हैं। सोनिया गांधी से लेकर हेमामालिनी , इन्दिरा गांधी से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी, कांग्रेस से लेकर जनवादी महिला समिति तक का समूचा विधवा प्रलाप हमारी राजनीति में प्रच्छन्न और प्रत्यक्षतौर पर सक्रिय पितृसत्तात्मक विचारधारा के वर्चस्व की अभिव्यक्ति करता है। केन्द्र से लेकर राज्य तक कई सरकारें आई और गईं लेकिन विधवाओं की दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। न तो किसी सांसद -विधायक विकासनिधि का इनके पुनर्वास के लिए इस्तेमाल हुआ और न विधवाओं तक विधवा पेंशन या बेकारीभत्ता का धन पहुँचा ।     यह सोचने लायक बात है कि वृन्दावन में सैंकडों बेहद समृद्ध संत हैं लेकिन किसी ने दो मुट्ठी चावल से ज़्यादा की उनके लिए व्यवस्था नहीं की। आज़ादी के बाद लाखों लोगों को सरकार घर बनाकर दे चुकी है लेकिन इन विधवाओं के लिए घर बनाकर देने की किसी को चिन्ता नहीं है। यही हाल शैलानी पर्यटकों और नव-धनाढ्यवर्ग का है …

बर्बरता के प्रतिवाद में

भारत में सभ्यता विमर्श है लेकिन हमने कभी यह ठहरकर नहीं सोचा कि सभ्यता के पर्दे के पीछे बर्बरता के किस तरह के रुप समाज में विकसित हो रहे हैं । हम सभ्यता और धर्म की ऊँची मीनारों पर सवार हैं लेकिन  बर्बरता की भी ऊँची मीनारों का निर्माण किया है । हमने बर्बरता के लक्षणों की तफ़सील के साथ जाँच- पड़ताल नहीं की ।       आज़ाद भारत की नींव भारत -विभाजन और तेलंगाना विद्रोह के दमन से पैदा हुई बर्बरता पर रखी गयी है । यह संयोग है कि भारत विभाजनजनित बर्बरता की तो कभी -कभार चर्चा सुनने को मिल जाती है लेकिन तेलंगाना के किसान आंदोलन के दमन और बर्बरता के रुपों की कभी चर्चा ही नहीं होती, यहाँ तक कि कम्युनिस्ट थिंकरों के यहाँ भी उसका ज़िक्र नहीं मिलता ।     भारत में लोकतंत्र का कम और बर्बरता का ज़्यादा विकास हुआ है । बर्बरता की जब भी बातें होती हैं तो हम वफ़ादारी के आधार पर पक्ष- विपक्ष तय करने लगते हैं या फिर राजनीतिक - सामाजिक पूर्वाग्रहों के आधार पर ।    भारत में दो तरह की बर्बरता है , पहली बर्बरता घर के अंदर है ,दूसरी बर्बरता घर के बाहर समाज के विभिन्न स्तरों पर घट रही है। संक्षेप में , बर्बरता के दो बड़…

मुसलमानों की हिमायत में

आरएसएस और उसके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह प्रचार आरंभ किया है उसे देखते हुए सामयिक तौर पर मुसलमानों की इमेज की रक्षा के लिए सभी भारतवासियों को सामने आना चाहिए। मुसलमानों को देशद्रोही और आतंकी करार देने में इन दिनों मीडिया का एक वर्ग भी सक्रिय हो उठा है,ऐसे में मुसलमानों की भूमिका को जोरदार ढ़ंग से सामने लाने की जरुरत है। सबसे पहली बात यह कि भारत के अधिकांश मुसलमान लोकतांत्रिक हैं और देशभक्त हैं। वे किसी भी किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति का अंग नहीं रहे हैं। चाहे वह मुस्लिम साम्प्रदायिकता ही क्यों न हो। भारत के मुसलमानों ने आजादी के पहले और बाद में मिलकर देश के निर्माण में बड़ी भूमिका निभायी है और उनके योगदान की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।भारतीय मुसलमानों के बारे में जिस तरह का स्टीरियोटाइप प्रचार अभियान मीडिया ने आरंभ किया है कि मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं,अनुदार होते हैं,नवाजी होते हैं,गऊ का मांस खाते हैं,हिन्दुओं से नफरत करते हैं,चार शादी करते हैं,आतंकी या माफिया गतिविधियां करते हैं।इस तरह के स्टीरियोटाइप प्रचार जरिए मुसलमान को भारत मुख्यधारा से भिन्न दरशाने की क…

मध्यवर्गीय जंगलीपन के प्रतिवाद में

भारत के मध्यवर्ग में जंगलीपन की आंधी चल रही है। मेरठ,मुजफ्फरनगर,कोलकाता,त्रिवेन्द्रम से लेकर लखनऊ तक इस आँधी के थपेड़े महसूस किए जा सकते हैं। कल कोलकाता के साल्टलेक इलाके में पुलिस अफसरों ने स्त्री विरोधी आदेश नेट पर जारी किया,उसके पहले सांसद तापस पाल ने स्त्री विरोधी बयान दिए,इसके पहले कई 'भद्र'नेता स्त्रीविरोधी बयान दे चुके हैं। इन 'भद्र' नेताओं में सभी रंगत के लोग शामिल हैं। यही हाल मेरठ-मुजफ्फरनगर में सक्रिय संघसेना का है । उनकी समूची मध्यवर्गीय भगवा सेना फेसबुक से लेकर अखबारों तक,यूपी में पंचायतों से लेकर कोर्ट-कचहरी तक सक्रिय है। यही हाल कमोबेश केरल का भी है। 'लव जेहाद' केरल से आया है। फेसबुक से लेकर दैनिक अखबारों तक इस मध्यवर्गीय जंगलीपन को सहज रुप में देखा जा सकता है। यह मध्यवर्गीय जंगली आंधी है।

मध्यवर्गीय जंगलीपन का नया रुप है 'लव जेहाद' के नाम पर शुरु किया गया राजनीतिक प्रपंच। हमारे समाज में पहले से ही 'प्रेम' को निषिद्ध मानकर बहुत कुछ होता रहा है। मध्यवर्ग ने खाप पंचायतों और सलाशी पंचायतों के जरिए औरतों के ऊपर बेशुमार जुल्म किए…

आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता

आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो।         हिन…

आरएसएस की आदतें ,अविवेकवाद और आधुनिकता

आरएसएस की कुछ संस्कारगत आदतें हैं। पहली आदत है सब कुछ हिन्दूमय देखो। वे अपने संगठन में आने वाले हर व्यक्ति को हिन्दूमय होकर देखने का सुझाव देते हैं। उनकी आँख-नाक-कान-जिह्वा- दिमाग़ सबमें हिन्दूमय भावबोध निर्मित किया जाता है। जबकि मनुष्य का मन स्वभावतः कोरा काग़ज़ होता है। वे अपने संगठन में आने वाले बच्चों को हिन्दूमय रहने की शिक्षा देते हैं ,हिन्दू संस्कारों पर ज़ोर देते हैं।  वे आगंतुक को सबसे पहले यही शिक्षा देते हैं कि वह अपने को हिन्दू माने और हिन्दू महसूस करे। इसके लिए वे नानसेंस , पौराणिक मिथों और काल्पनिक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं। वे हिन्दू की तरह व्यवहार करने पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना हिन्दूबोध पर ज़ोर देते हैं। वे व्यवहार की स्वतंत्रता देते हैं लेकिन हिन्दूबोध से बँधे रहने का आग्रह करते हैं।यह हिन्दूबोध वस्तुत: संघी आदत है।इस तरह वे आधुनिक व्यावहारिकता और हिन्दुत्व में संबंध बनाने में सफल हो जाते हैं। मसलन् हिन्दुत्ववादी रहो और झूठ बोलो,मुनाफ़ाख़ोरी करो, ज़ख़ीरेबाज़ी करो, दहेज लो और दहेज दो,मोबाइल से लेकर सभी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करो और हिन्दुत्ववादी रहो।         हिन…

इंटरनेट पर वाम-वाम को राम राम

इंटरनेट और उससे जुड़े माध्यमों और विधा रुपों के आने के बाद से संचार की दुनिया में मूलगामी बदलाव आया है। वैचारिक संघर्ष पहले की तुलना में और भी ज़्यादा जटिल और तीव्र हो गया है। जनसंपर्क और जनसंवाद पहले की तुलना में कम खर्चीला और प्रभावशाली हो गया है। लेकिन वामदलों और ख़ासकर कम्युनिस्ट पार्टियों में इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती। यह सच है कि वामदलों के पास बुद्धिजीवियों का बहुत बड़ा ज़ख़ीरा है और ज्ञान के मामले में ये लोग विभिन्न क्षेत्र में बेजोड़ हैं। आज भी भारत की बेहतरीन समझ के विभिन्न क्षेत्रों में मानक इन्होंने ही बनाए हैं। लेकिन इंटरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम के आने के बाद वामदलों के रवैय्ये में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया है।वामदल आज हाशिए पर हैं उसके कई कारण हैं उनमें एक बड़ा कारण है कम्युनिकेशन की नई वास्तविकता को आत्मसात न कर पाना। वे क्यों इंटरनेट के संदर्भ में अपनी गतिविधियों और संचार की भूमिका को सुसंगठित रुप नहीं दे पाए हैं यह समझना मुश्किल है।       वामदल जानते हैं कि नेट कम्युनिकेशन न्यूनतम खर्चे पर चलने वाला कम्युनिकेशन है। यह ऐसा कम्युनिकेशन है जो लोकतांत…

बेमिसाल सुनील गुप्ता

सुनील गुप्ता के अकस्मात हमारे बीच से चले जाने की ख़बर फ़ेसबुक पर पढ़ी । मन को बेहद दुख हुआ।मैं सुनील को तब से जानता हूँ जब वह जेएनयू पढ़ने आए थे। हम दोनों सतलज में रहते थे। रोज़ का मिलना और तरह - तरह के विषयों पर आदान प्रदान आदत बन गयी थी। सुनील मेरे साथ 1980-81 में छात्रसंघ में कौंसलर रहे। सुनील के जीवन का हिंदीप्रेम मुझे बेहद अपील करता था साथ ही उनकी सादगी को मैं मन ही मन सराहता था और उनको अनेकबार कहता भी था कि आपकेसमाजवादी विचार और सादगी कोहर नागरिक को सीखना चाहिए। सुनील अपने समाजवादी आदर्शों और ग़रीबों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता के लिए हम सभी मित्रों में सम्मान की नज़र से देखे जाते थे। शानदार अकादमिक रिकॉर्ड के बावजूद सुनील ने ग़रीबों की सेवा करने का फ़ैसला करके युवाओं में मिसाल क़ायम की थी और उसका यह त्याग हमलोगों में ईर्ष्या की चीज़ था। सुनील से मेरी लंबे समय से मुलाक़ात नहीं हो पायी लेकिन मैं उसके लिखे को खोजकर पढ़ता रहा हूँ। सुनील का अकस्मात निधन भारत के समाजवादी आंदोलन की अपूरणीय क्षति है ।      सुनील जब जेएनयू आए तो उस समय उसका कैम्पस बदल रहा था। पहले जेनयू कैम्पस में जो क…

नरेन्द्र मोदी का डिजिटल टाइमपास

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब कल टीवी पर शिक्षक दिवस के बहाने बोल रहे थे तो वे सामान्यबोध के धरातल से सम्बोधित कर रहे थे। सामान्यबोध ने उनके राजनीतिकबोध को दबाए रखा । असल में वे बच्चों की चेतना के दबाव में थे। जैसा उम्मीद थी सब कुछ नियोजित था और नियोजन में कोई ऐसी बात नहीं घटती कि वक़्ता को परेशानी हो या उलझन हो। बच्चों में मोदी को लेकर कुतूहल था और मोदी अपनी शैली से उसे उभारने की कोशिश कर रहे थे । बच्चों के सवाल बच्चों जैसे थे लेकिन मोदी के जबाव बच्चों के अनुकूल नहीं थे बल्कि पीएम के अनुकूल थे।      प्रधानमंत्री का काॅमनसेंसभाषण मीडिया के पैरामीटर के अनुसार तय किया गया था और उसमें उन बातों को ही कहने पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया जो बातें बच्चे आए दिन अपने स्कूलों में शिक्षकों या माता-पिता से सुनते हैं। सुनें हुए को सुनना कोई असर नहीं छोड़ता , हाँ, उससे टाइमपास जरुर होता है।फलत:बच्चों के साथ मोदी सत्र टाइमपास का डिजिटल रुप था।      डिजिटल टाइमपास की यह ख़ूबी है वहाँ पर कहीं गयी बातें तेजगति से आती हैं और जाती हैं। चूँकि टाइमपास में रुढिबद्ध सम्प्रेषण के रुपों का प्रयोग करते हैं अत: कम्युनिक…

'गुरु' के नए 'कू-भाषी' कॉमेडियन

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बेवकूफियों से हास्य पैदा करना,ऊल-जलूल बातों से हास्य पैदा करना, कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है। इस कार्यक्रम से बबूल संघ ,उसके साइबर बटुक और मोदी सरकार बहुत प्रभावित है। वे कपिल के कॉमेडी शो को भारत का राजनीतिक कंटेंट बना रहे हैं। देश के हर जलसे,दिवस,नायक,अच्छे नाम,अच्छे गुण आदि को राजनीतिक 'कू-भाषा' से अपदस्थ कर रहे हैं। वे हर अच्छे दिन और अच्छे त्यागी पुरुष को टीवी इवेंट बना रहे हैं ! 'कू' कर रहे हैं।। इस 'कू -कल्चर' के नए नायक इन दिनों टीवी टॉक शो पर आए दिन दिख जाएंगे। फेसबुक में दिख जाएंगे!   कपिल के कॉमेडी शो की खूबी है ' कू-भाषा' का हास्य के लिए दुरुपयोग ,वहां हास्य कम और 'कू-भाषा' का दुरुपयोग ज्यादा होता है और यही भाषिक दुरुपयोग सांस्कृतिक भ्रष्टाचार की नई खाद है और इससे आमलोगों में भाषायी कुरुपता पैदा होती। 'कू-भाषा' की संस्कृति का विस्तार होता है।नव्य-आर्थिक उदारीकरण ने सारी दुनिया में 'कू-भाषा' को नए-नए रुपों में प्रसारित किया है।इसके भाषिक प्रयोगों को हम आए दिन युवाओं से लेकर फेसबुक तक देख सकते हैं। 'कू-भाषा…

सोशल मीडिया और बर्बरता

सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बर्बरता का महाख्यान चल रहा है। जिस तरह आईएसआईएस की पोस्ट अबाधित रुप में पेश की जा रही हैं, बर्बर संगठनों के पक्ष में निरंतर लिखा जा रहा है। उससे यह संकेत जा रहा है कि सोशल मीडिया के लिए बर्बरता सबसे बड़ी खबर है और राजनीतिक आंदोलन, प्रतिवाद और लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई मूल्य नहीं है।अधिकांश मीडिया, बर्बरता की प्रस्तुतियों में इस कदर व्यस्त है कि उनको जनांदोलनों की किसी खबर या समस्या के कवरेज की कोई चिंता ही नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बर्बरता का नाटक चल रहा है और हम सब उसके मूकदर्शक बन गए हैं।बर्बरता का जितने बड़े रुप में प्रसारण हो रहा है जनांदोलनों का उतने बड़े रुप में प्रसारण नहीं हो रहा। यानी मीडिया की नजर में बर्बरता प्रासंगिक है,मोहन भागवत के नॉनशेंस बयान,बत्रा पंडित का पोंगापंथ और भगवापंथ की इरेशनल खबरें प्रासंगिक हैं, लेकिन अन्य लोकतांत्रिक खबरें और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष विचार प्रासंगिक नहीं हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया का यह बर्बरता प्रेम , बर्बरता का मित्र बना रहा है और लोकतंत्र से दूसरी बढ़ा रहा है। बर्…