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सोमवार, 16 नवंबर 2015

हिन्दूसमाज के कठोर आलोचक दयानन्द सरस्वती

जो लोग 'हिन्दू महान' का नारा लगाकर हिन्दुओं की बुराईयों पर पर्दा डाल रहे हैं वे हिन्दूसमाज का अहित कर रहे हैं,इससे भी बढ़कर वे हिन्दूसमाज की आलोचना करने वालों पर हमले कर रहे हैं,उनकी निंदा कर रहे हैं,उन्हें देशद्रोही तक कह रहे हैं।ऐसे लोगों का दयानन्द सरस्वती के बारे में क्या कहना है ? क्या दयानन्द सरस्वती ने हिन्दूसमाज और हिन्दू धर्म की रुढ़ियों और कुरीतियों पर प्रहार करके देशद्रोह का परिचय था या भारतीय समाज को सुधारने का काम किया था ?
संघ के प्रचार ने इस कदर युवाओं पर बुरा असर डाला है कि हिन्दूसमाज की सभी बेहतरीन परंपराओं और विवेकवान लोगों के किए-धरे को हम भूल गए हैं या फिर जानना तक नहीं चाहते। कम से कम आरएसएस ने अभी तक दयानन्द सरस्वती जैसा कोई महान् हिन्दू पैदा नहीं किया है !
देश में महान हिन्दू और महान भारतीय होने का गौरव दयानन्द सरस्वती को हासिल है,राजा राममोहन राय को हासिल है।ये सब हिन्दूसमाज और हिन्दूधर्म की आलोचना में अग्रवर्ती भूमिका निभा चुके हैं।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

सामाजिक रूढ़िवाद की देन है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष

      इस्लामिक दर्शन और धर्म की परंपराओं के बारे में घृणा के माहौल को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है मुसलमानों और इस्लाम धर्म के प्रति अलगाव को दूर किया जाए। मुसलमानों को दोस्त बनाया जाए। उनके साथ रोटी-बेटी के संबंध स्थापित किए जाएं। उन्हें अछूत न समझा जाए। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को निर्मित करने लिए जमीनी स्तर पर विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों के बीच में सांस्कृतिक -सामाजिक आदान-प्रदान पर जोर दिया जाए। अन्तर्धार्मिक समारोहों के आयोजन किए जाएं।  मुसलमानों और हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक अलगाव को दूर करने के लिए आपसी मेलजोल,प्रेम-मुहब्बत पर जोर दिया जाए। इससे समाज का सांस्कृतिक खोखलापन दूर होगा,रूढ़िवाद टूटेगा  और सामाजिक परायापन घटेगा।
      भारत में करोड़ों मुसलमान रहते हैं लेकिन गैर मुस्लिम समुदाय के अधिकांश लोगों को यह नहीं मालूम कि  मुसलमान कैसे रहते हैं,कैसे खाते हैं, उनकी क्या मान्यताएं, रीति-रिवाज हैं। अधिकांश लोगों को मुसलमानों के बारे में सिर्फ इतना मालूम है कि दूसरे वे धर्म के मानने वाले हैं । उन्हें जानने से हमें  क्या लाभ है। इस मानसिकता ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के सामाजिक अंतराल को बढ़ाया है। इस अंतराल ने संशय,घृणा और बेगानेपन को पुख्ता किया है।
     मुसलमानों के बारे में एक मिथ है कि उनका खान-पान और हमारा खान-पान अलग है, उनका धर्म और हमारा धर्म अलग है। वे मांस खाते हैं, गौ मांस खाते हैं। इसलिए वे हमारे दोस्त नहीं हो सकते। मजेदार बात यह है कि ये सारी दिमागी गड़बड़ियां कारपोरेट संस्कृति उद्योग के प्रचार के गर्भ से पैदा हुई हैं।
    सच यह है कि मांस अनेक हिन्दू भी खाते हैं,गाय का मांस सारा यूरोप खाता है। मैकडोनाल्ड और ऐसी दूसरी विश्वव्यापी खाद्य कंपनियां हमारे शहरों में वे ही लोग लेकर आए हैं जो यहां पर बड़े पैमाने पर मुसलमानों से मेलजोल का विरोध करते हैं। मीडिया के प्रचार की खूबी है कि उसने मैकडोनाल्ड का मांस बेचना, उसकी दुकान में मांस खाना, यहां तक कि गौमांस खाना तो पवित्र बना दिया है, लेकिन मुसलमान यदि ऐसा करता है तो वह पापी है,शैतान है ,हिन्दू धर्म विरोधी है।
     आश्चर्य की बात है जिन्हें पराएपन के कारण मुसलमानों से परहेज है उन्हें पराए देश की बनी वस्तुओं, खाद्य पदार्थों , पश्चिमी रहन-सहन,वेशभूषा,जीवनशैली आदि से कोई परहेज नहीं है। यानी जो मुसलमानों के खिलाफ ज़हर फैलाते हैं वे पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अंधभक्तों की तरह प्रचार करते रहते हैं। उस समय उन्हें अपना देश,अपनी संस्कृति,देशी दुकानदार,देशी माल,देशी खानपान आदि कुछ भी नजर नहीं आता। अनेक अवसरों पर यह भी देखा गया है कि मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने वाले पढ़े लिखे लोग ऐसी बेतुकी बातें करते हैं जिन्हें सुनकर आश्चर्य होता है। वे कहते हैं मुसलमान कट्टर होता है। रूढ़िवादी होता है। भारत की परंपरा और संस्कृति में मुसलमान कभी घुलमिल नहीं पाए,वे विदेशी हैं।
    मुसलमानों में कट्टरपंथी लोग यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान तो भारत के विजेता रहे हैं।वे मुहम्मद बिन कासिम,मुहम्मद गोरी और महमूद गजनवी की संतान हैं। उनकी संस्कृति का स्रोत ईरान और अरब में है। उसका भारत की संस्कृति और सभ्यता के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सच यह नहीं है।
   सच यह है कि 15वीं शताब्दी से लेकर आज तक भारत के सांस्कृतिक -राजनीतिक-आर्थिक निर्माण में मुसलमानों की सक्रिय भूमिका रही है। पन्द्रहवीं से लेकर 18वीं शताब्दी तक उत्तरभारत की प्रत्येक भाषा में मुसलमानों ने शानदार साहित्य रचा है। भारत में तुर्क,पठान अरब आदि जातीयताओं से आने शासकों को अपनी मातृभाषा की भारत में जरूरत ही नहीं पड़ी,वे भारत में जहां पर भी गए उन्होंने वहां की भाषा सीखी और स्थानीय संस्कृति को अपनाया। स्थानीय भाषा में साहित्य रचा। अपनी संस्कृति और सभ्यता को छोड़कर यहीं के होकर रह गए। लेकिन जो यहां के रहने वाले थे और जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया था उनको अपनी भाषा बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई। जो बाहर से आए थे वे स्थानीय भाषा और संस्कृति का हिस्सा बनकर रह गए।
   हिन्दी आलोचक रामविलास शर्मा ने लिखा है मुसलमानों के रचे साहित्य की एक विशेषता धार्मिक कट्टरता की आलोचना, हिन्दू धर्म के प्रति सहिष्णुता,हिन्दू देवताओं की महिमा का वर्णन है। दूसरी विशेषता यहाँ की लोक संस्कृति,उत्सवों-त्यौहारों आदि का वर्णन है। तीसरी विशेषता सूफी-मत का प्रभाव और वेदान्त से उनकी विचारधारा का सामीप्य है।
   उल्लेखनीय है दिल्ली सल्तनत की भाषा फारसी थी लेकिन मुसलमान कवियों की भाषाएँ भारत की प्रादेशिक भाषाएँ थीं। अकबर से लेकर औरंगजेब तक कट्टरपंथी मुल्लाओं ने सूफियों का जमकर विरोध किया। औरंगजेब के जमाने में उनका यह प्रयास सफल रहा और साहित्य और जीवन से सूफी गायब होने लगे। फारसीयत का जोर बढ़ा।        
 भारत में ऐसी ताकतें हैं जो मुसलमानों को गुलाम बनाकर रखने ,उन्हें दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखने में हिन्दू धर्म का गौरव समझती हैं। ऐसे संगठन भी  हैं जो मुसलमानों के प्रति अहर्निश घृणा फैलाते रहते हैं। इन संगठनों के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव का ही दुष्परिणाम है कि आज मुसलमान भारत में अपने को उपेक्षित,पराया और असुरक्षित महसूस करते हैं।
    जिस तरह हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन सक्रिय हैं वैसे ही मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन भी सक्रिय हैं। ये एक ही किस्म की विचारधारा यानी साम्प्रदायिकता के दो रंग हैं।
 हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को नष्ट करने के लिए जो रास्ता सुझाया है वह काबिलोगौर है। उन्होंने लिखा-‘‘ भारतवर्ष में जो सबसे बड़ी दुर्बलता है ,वह शिक्षा की है। हिन्दुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाय। परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों,दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढ़ें और सीखें। फिर जिस तरह भाषा में मुसलमानों के चिह्न रह गए हैं और उन्हें अपना कहते हुए अब किसी हिन्दू को संकोच नहीं होता, उसी तरह मुसलमानों को भी आगे चलकर एक ही ज्ञान से प्रसूत समझकर अपने ही शरीर का एक अंग कहते हुए हिन्दुओं को संकोच न होगा। इसके बिना,दृढ़ बंधुत्व के बिना ,दोनों की गुलामी के पाश नहीं कट सकते,खासकर ऐसे समय ,जबकि फूट डालना शासन का प्रधान सूत्र है।’’ 
   भारत में मुसलमान विरोध का सामाजिक और वैचारिक आधार है जातिप्रथा,वर्णाश्रम व्यवस्था। इसी के गर्भ से खोखली भारतीयता का जन्म हुआ है जिसे अनेक हिन्दुत्ववादी संगठन प्रचारित करते रहते हैं। जातिप्रथा के बने रहने के कारण धार्मिक रूढ़ियां और धार्मिक विद्वेष भी बना हुआ है।
     भारत में धार्मिक विद्वेष का आधार है सामाजिक रूढ़ियाँ। इसके कारण हिन्दू और मुसलमानों दोनों में ही सामाजिक रूढ़ियों को किसी न किसी शक्ल में बनाए रखने पर कट्टरपंथी लोग जोर दे रहे हैं। इसके कारण हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष बढ़ा है। सामाजिक एकता और भाईचारा टूटा है। हिन्दू-मुसलमान एक हों इसके लिए जरूरी है धार्मिक -सामाजिक रूढ़ियों का दोनों ही समुदाय अपने स्तर पर यहां विरोध करें।
   हिन्दू-मुस्लिम समस्या हमारी पराधीनता की समस्या है। अंग्रेजी शासन इसे हमें विरासत में दे गया है। इस प्रसंग में निराला ने बड़ी मार्के की बात कही है। निराला का मानना है  हिन्दू मुसलमानों के हाथ का छुआ पानी पिएं,पहले यह प्राथमिक साधारण व्यवहार जारी करना चाहिए। इसके बाद एकीकरण के दूसरे प्रश्न हल होंगे।
      निराला के शब्दों में हिन्दू-मुसलमानों में एकता पैदा करने के लिए इन समुदायों को ‘‘वर्तमान वैज्ञानिकों की तरह विचारों की ऊँची भूमि’’ पर ले जाने की जरूरत है। इससे ही वे सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त होंगे।   




शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

आरएसएस का मूक हिन्दू यूटोपिया


   (मोदी के गुजरात में हुए दंगे का एक दृश्य) 

मोदी ने मूक हिन्दू यूटोपिया निर्मित किया है। इसमें सहज धर्मनिरपेक्ष वातावरण असहिष्णु लगता है। नागरिकों ने अपनी जिम्मेदारी संघ के कंधों पर डाल दी है और अपने को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है। मूक कल्पनालोक में अहर्निश वाचिक हिंसा चलती रहती है। 

गुजरात में शोषण है,गरीबी है और बोरियत भी है। साम्प्रदायिक हिंसा ने इन सबसे निजात दिलाने का वायदा किया किंतु वास्तव में ऐसा न हो सका बल्कि स्थिति सुधरने की बजाय और भी बिगड़ती चली गयी। हम सोच रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा ,दंगा पीड़ितों को दुबारा से बसा दिया जाएगा किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ।

 मोदी के पास गुजरात के भविष्य को लेकर कोई नया प्रस्ताव नहीं है,पुरानी त्रासदी से निकलने का रास्ता नहीं है। मोदी को मीडिया ने महानायक के रूप में प्रस्तुत किया। मोदी से नीतिगत तौर पर कोई सवाल नहीं किए। उससे सिर्फ उपलब्धियां बोलने के लिए कहा गया उसकी किसी भी उपलब्धि के बारे में मीडिया वालों ने अपनी ओर से पुष्टि का प्रयास नहीं किया। मोदी ने जो कहा उसको प्रसारित कर दिया, उसकी तहकीकात नहीं की,अन्य स्रोत से पुष्टि नहीं की। इसी को कहते हैं राजनीतिक जनसंपर्क।  राजनीतिक प्रचार। लेकिन इसे पेश किया खबर के रूप में।

 राजनीतिक प्रचार खबर नहीं होता। मोदी को इजारेदारियां सबसे ज्यादा पसंद करती हैं। इसका प्रधान कारण है मोदी का बड़ी पूंजी के प्रति प्रेम। बड़ी पूंजी के अपने प्रेम को मोदी आशिक की तरह निभाता रहा है। वह बड़ी पूंजी का दीवाना है। उसे ऐसी नीतियों से नफरत है जो बड़ी पूंजी का निषेध करें। बड़ी पूंजी का वातवरण किसी भी किस्म के धर्मनिरपेक्ष वातावरण को स्थिर नहीं बनने देता। इसके विपरीत गैर धर्मनिरपेक्ष वातावरण बनाने पर जोर देता है। जनता के जीवन में विमर्श,संवाद और वैचारिक तानवों की समाप्ति हो जाती है। जनता मूलत: दर्शक बना दी जाती है। वह देखती है किंतु बोलती नहीं।
  
बड़ी पूंजी के परिवेश में नए किस्म की सामूहिक गोलबंदी और मानसिकता पैदा हो जाती है। जिसमें आधुनिक की बजाय गैर आधुनिक सामाजिक गोलबंदियां उभरकर सामने आ जाती हैं। ये हथियारबंद और आक्रामक गोलबंदियां हैं। संघ परिवार के नए प्रयोग इस रणनीति से परिचालित हैं और कांग्रेस भी इसी धंधे में लग गयी है और उसने गुर्जर आरक्षण के नाम पर यह प्रयोग शुरू कर दिया है। लोकतांत्रिक राजनीति के निहाज से सामूहिक गोलबंदियां शुभ लक्षण नहीं है।  

सामूहिक उन्माद से संचालित गोलबंदियां अंतत: हमारे देश को कांगो और सूडान जैसे जनसंहारों और समूहों की खूनी लड़ाईयों के युग में ले जाएंगी अथवा नाइजीरिया की तरह समाज में अपराधियों का ही शासन होगा। सामूहिक गोलबंदी फासिस्ट हथयार है। इसके जरिए अप्रासंगिक सवालों के आधार पर  लोगों को हमेशा उन्माद में रखा जाता है। ऐसी स्थिति में किसी भी किस्म के तर्क और परेशान करने वाले सवालों को उठाना संभव ही नहीं होता। मोदी इसी गोलबंदी की पैदाइश है। मोदी के राजनीतिक जगत में धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक लेखक ,बुध्दिजीवी,संस्कृकिर्मी के लिए किसी भी किस्म की स्वायत्त जगह नहीं है। अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं है। वे सिर्फ दोयमदर्जे के नागरिक होकर ही जी सकते हैं।
      
मोदी के गूंगे कल्पनालोक में सैंकडों साल पुराने विचार बार-बार दर्शन देते हैं। ये ऐसे विचार हैं जो पहले कभी किसी ने नहीं देखे न सुने। हिन्दुत्व की तथाकथित शुध्दतावादी धारा का कल्पित आख्यान और विदेशी हमलावरों की मनगढ़ंत कहानियां इस कल्पनालोक सबसे बड़ी पूंजी हैं। इन आख्यानों का नए उपभोक्तावाद से गहरा संबंध है।  

इस काम के लिए कथावाचकों,भजनमंडलियों, टीवीपंथी संतों -महंतों की पूरी मंडली अहर्निश काम कर रही है।ये लोग पुराने विचारों की बाढ़ पैदा किए हुए हैं। इनमें नया बहुत ही कम है। इन कथावाचकों के पास कहानियां हैं कि माँ कैसे अपने बेटे से प्यार करती थीबाप कैसा सदाचारी था, अथवा अनाचारी था तो भगवान ने उसे कैसे ठीक कर दिया। ऐसी भी कहानियां सुनाते  हैं जो पुरूषत्व और स्त्रीत्व को अस्वीकार करती हैं। ऐसे पिता की कहानी बताते हैं जो माता का विरोध करता था। जमींदार किसान का विरोध करता था। इसके अलावा विलक्षणताओं से भरी हुई कहानियां भी सुनाई जा रही हैं। 

मोदी और संघ के पक्ष में रचे जा रहे इस कल्पनालोक का  इतिहास से बैर है। उसे किस्से-कहानियां,पौराणिक कहानियां पसंद हैं, किंतु इतिहास पसंद नहीं है। उसकी कल्पना की नदी की कहानी में दिलचस्पी है नदी के विकास की वैज्ञानिक कहानी में दिलचस्पी नहीं है।  
       
संघ परिवार के यहां मनुष्य और पशु में अंतर नहीं है। बल्कि अनेक बार तो यह देखा गया है मनुष्य से ज्यादा पशु को महान बनाया गया है। याद करें गौ संरक्षण आंदोलन को। गूंगा कल्पनालोक स्त्री-पुरूष में अंतर नहीं करता बल्कि प्रत्येक चीज को पुरूष की नजर से ही देखता है। कृत्रिम और असली में अंतर नहीं करता। यूटोपिया और विज्ञान में अंतर नहीं करता। इतिहास और मिथक में अंतर नहीं करता बल्कि मिथकों को ही मुक्ति का स्रोत मानता है। मिथकीय कहानी की शुरूआत सहजभाव से हो जाती है और फिर अचानक उसमें इतिहास का समावेश कर लिया जाता है। 

गूंगे कल्पनालोक के साइबोर्ग पक्के दोस्त हैं। मोदी के भी कार्यकलाप की धुरी इंटरनेट है। मोदी के लक्षण साइबोर्ग से काफी मिलते हैं। साइबोर्ग को मिथकीय कहानियां पसंद हैं और वे तमाम चीजें उन्हें भी अच्छी लगती हैं जो गूंगे कल्पनालोक के निर्माताओं को अच्छी लगती हैं।
   
मौजूदा परवर्ती पूंजीवाद का सबसे बड़ा फिनोमिना है खोखलापन अथवा अर्थहीनता। परवर्ती पूंजीवाद में खोखलापन अथवा अर्थहीनता चारों ओर से घेर लेती है। यह खोखलापन हमारे बौध्दिक और कलात्मक उत्पादन को आकर घेर लेता है। सर्जनात्मकता भी खोखलेपन की शिकार हो जाती है। इसके कारण वैचारिक विभ्रम में इजाफा होता है। हम लगातार रहस्यों की दुनिया में घिरते चले जाते हैं।

 आज हम जिसे संस्कृति कहते हैं वह पदबंध स्वयं में ही दिग्भ्रमित करने लगा है। संस्कृति की जब बातें करते हैं तो संस्कृति के वैज्ञानिक और नये खोजपरक आयामों की ओर ध्यान नहीं जाता। सामान्य शिक्षा की अवधारणा और उसके वैज्ञानिक आयाम की ओर ध्यान नहीं जाता। बल्कि हमारी शिक्षा और संस्कृति को लेकर समस्त प्रतिक्रियाएं दैनंदिन जिंदगी,त्यौहारों और भावनाओं से तय होती हैं। अर्थहीनता क्रांतिकारी परिवर्तनों के खिलाफ विभ्रम पैदा करती हैं।

 मौजूदा समाज में संस्कृति के उत्पादन के क्षेत्र में संस्कृतिविरोधी चीजों का इजारेदारियों के समर्थन से सुचिंतित भाव से उत्पादन हो रहा है। मसलन् उपन्यास और सिनेमा जगत में घटिया उपन्यासों और फिल्मों की बाढ़ आयी हुई है। इस समूची प्रक्रिया का युवावर्ग पर गहरा असर हो रहा है। प्रभुत्वशाली विचारधारा युवावर्ग में प्रतिगामी विचारों और भावनाओं को संगठित कर रही है। प्रतिगामी व्यक्ति का निर्माण किया जा रहा है। 

व्यक्ति के सामने विचारधारात्मक विभ्रम की स्थिति है। संकट यह है कि खोखलेपन का उत्पादन अंत में स्वयं बुध्दिजीवियों और रचनाकारों को ही चुनौती देने लगा है। हिन्दी में यह स्थिति बड़े पैमाने पर पैदा हो गयी है। अन्य भाषाओं में भी संभवत: यही स्थिति है।
    
साहित्य,कला,संस्कृति से लेकर राजनीति तक सभी क्षेत्रों में खोखलेपन ने कब्जा जमा लिया है। अब सारी गतिविधियां उपयोगितावाद के सिद्धान्तों को मद्देनजर तय की जा रही हैं। ये सारी गतिविधियां खंड-खंड हैं। बिखरी हैं। इसमें आलोचना और अनुसंधान अभाव है। बुर्जुआजी बार-बार नयी चीजों के आस्वाद में निवेश कर रहा है। नई से नयी चीजों का आस्वाद लेने की प्रवृत्तिा बेहद खतरनाक प्रवृत्तिा है। इसमें अनेक बार पतनशील भी आ रहा है। यह ऐसा नया है जो आक्रामक है, भ्रमित करने वाला है।
        व्यापारिक तंत्र समूची सांस्कृतिक गतिविधियों पर वर्चस्व स्थापित किए हुए है और जरा सी भी ऐसी कोई चीज जो समाज के वैनगार्ड का काम कर रही है उसे विभाजित करने की कोशिश करने लगता है। उसे सामाजिक नियमों के बहाने रोका जा रहा है। स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि हम लोग बहस के दौरान  खंड- खंड, शंकालु और वैविध्यपूर्ण व्याख्या के नाम पर बहसों से पलायन करने लगे हैं। बहस के पुख्ता आधारों को त्याग देते हैं । वैनगार्ड का यहां अर्थ है संरक्षक। संरक्षक हमें बुर्जुआजी की मूर्खताओं और संस्कृतिविहीनता से बचाता है। चीजों पर संदेह करना सिखाता है। आज ऐसे लोगों और संगठनों से संघर्ष की जरूरत है जो संस्कृति में उपयोगितावाद,खंड-खंड सत्य,भ्रमित  अथवा शंकालु यथार्थ ,व्याख्याओं के वैविध्य के नाम पर मूर्खताओं को फैला रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि आपके पास सुसंगत क्रांतिकारी कार्यक्रम हो। क्रांतिकारी नीति हो। हमें संस्कृति से लेकर राजनीति तक प्रत्येक क्षेत्र में आलोचनात्मक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के बिना किसी भी नयी चीज को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
     
मोदी के ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' के नारे को अधिकांश दलों ने  अनालोचनात्मक ढ़ंग से स्वीकार कर लिया है। किसी भी दल ने इस नारे के पीछे छिपी राजनीति और फासीवादी विचारधारा को निशाना नहीं बनाया सिर्फ इतनाभर कहा गया कि यह नारा हिन्दुत्व पर पर्दा डालने के लिए लाया गया है। 

सच यह नहीं है, यह एकदम नया नारा है। इसकी वैचारिक परिणतियां और तानाबाना अलग है। यह अस्मिता की राजनीति के सबसे खतरनाक बिंदु पर हमें ले जाता है। हमें पूरी तरह निरस्त्र कर देता है। आलोचनात्मक विवेक को निशाना बनाता है। सभी किस्म के तर्कों को खत्म कर देता है। इसमें भविष्यवादी की अनुगूंजें सुनाई देती हैं।  तकनीकी महानता का महिमामंडन है। इसके बहाने  कला,संस्कृति आदि पर सीधे हमले किए जा रहे हैं। घटिया फिल्मों के रिलीज के लिए गुजरात में कोई परेशानी नहीं है बल्कि जितनी भी परेशानी है अच्छे सिनेमा के लिए है। गुजराती अस्मिता और विकास के नाम पर संघ परिवार तकनीक और बुर्जुआ तरक्की को आक्रामक भाव से पेश कर रहा है साथ ही कला,साहित्य,संस्कृति के श्रेष्ठतम मानकों पर घृणिततम हमले कर रहा है। यह स्थिति तकरीबन वैसी ही है जैसी प्रथमविश्वयुध्द के बाद इटली में थी। कला,साहित्य संस्कृति पर राष्ट्रवाद और फासीवाद ने जमकर हमले किए। आश्चर्य की बात यह है कि भारत का इजारेदार पूंजीपतिवर्ग इस तरह के हमलों को संरक्षण दे रहा है। भाजपा को बड़े पैमाने पर धन मुहैयया कराया जा रहा है।
      
भाजपा गुजरात में जो कुछ कर रही है वह भारतीय पूंजीपतिवर्ग के समर्थन से कर रही है। वे खुल्लमखल्ला फासीवाद को प्रश्रय दे रहे हैं। गुजरात में अपनी बर्बर कार्रवाईयों  के जरिए संघ परिवार के छोटे से लेकर बड़े नेतागण परंपरागत संस्कृति की धारणा को ही बदलने में लगे हैं। आज स्थिति इतनी बदतर है कि कोई भी मूर्ख व्यक्ति गुजरात में खड़ा होकर किसी भी कलाकार,साहित्यकार,बुध्दिजीवी का सरेआम अपमान कर जाता है और उसके खिलाफ कोई प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती। प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता। उलटे ऐसे व्यक्तियों को संरक्षण दिया जा रहा है। संस्कृति की नकारात्मक व्याख्या तैयार की जा रही है। संस्कृति के खिलाफ मूर्ख और हिंसक लोग फरमान जारी कर रहे हैं। यह सब संघ परिवार के लोग कर रहे हैं।

     



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