प्रथम स्वाधीनता संग्राम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रथम स्वाधीनता संग्राम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

क्रांतिकारी मंगल पांडे के शहीद दिवस पर विशेष- 1857 के विद्रोह का परिप्रेक्ष्य - इरफान हबीब


सबसे पहली बात तो यह है कि मैं 1857 के विद्रोह को औपनिवेशिक शासन के बृहत्तर संदर्भ में रखना चाहूंगा। बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनमें अनेक इतिहासकार भी शामिल हैं, जो अब यह मानने लगे हैं कि हमारी पाठयपुस्तकों में और इतिहास में औपनिवेशिक शासन की जो आलोचनाएं हैं, उनमें कुछ ज्यादती हुई है। अब से दो-तीन साल पहले, एन.सी.ई.आर.टी. की पाठयपुस्तकों में अनेक इतिहासकारों ने यह बात चलाई भी थी। लेकिन, मुझे लगता है कि हम 1857 के विद्रोह को और उसके चरित्र को तब तक नहीं समझ सकते हैं, जब तक हम यह नहीं समझते कि भारत के लिए और वास्तव में किसी हद तक पूरी दुनिया के लिए ही उपनिवेशवाद का क्या अर्थ रहा था और इस औपनिवेशिक शासन के साथ भारत किस तरह जुड़ा हुआ था और खास तौर पर भारतीय सेना के सिपाही उसके साथ किस तरह जुड़े हुए थे।
अव्वल तो उपनिवेशवाद का अर्थ था लगातार भारत के संसाधनों का दोहन कर बाहर ले जाया जाना। प्रसंगत: कह दूं कि एन.सी.ई.आर.टी. ने हाई स्कूल के बच्चों के लिए अब जो पाठयपुस्तकें लगाई हैं, उनमें से व्यावहारिक मायने में यह पहलू गायब ही है। बहरहाल, यह उस समय जीवन का एक तथ्य था। इस तरह निचोड़ा जाने वाला राष्ट्रीय आय का
3-4 फीसद हिस्सा, बेशक छोटा सा लग सकता है। लेकिन, याद रहे कि औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन में बचतों का स्तर वास्तव में 6 फीसद से ज्यादा नहीं था। इससे कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है कि साल दर साल, कैसी तबाह करने वाली लूट हो रही थी। 1854 से 1855 तक यानी विद्रोह से पहले के दो वर्षों में ही, भारतीय तटकर संबंधी रिकार्डों के अनुसार, भारत के लिए आयातों के मुकाबले निर्यातों की अधिकता यानी यह लूट 5.8 करोड़ रु. की आंकी गई है। उस जमाने की कीमतों के हिसाब से यह बहुत बड़ी रकम थी। इस लूट का मतलब यह है कि हिंदुस्तानी जनता को बढ़ते हुए फालतू कराधान का शिकार बनाया जा रहा था। और कराधान में यह बढ़ोतरी, जो ब्रिटिश शासन के कर बंदोबस्तों के रूप में सामने आई थी, सबसे ज्यादा बोझ उन इलाकों पर डाल रही थी जिन्हें महालवाड़ी इलाकों के नाम से जाना जाता था। करों का यह अतिरिक्त बोझ उतना ज्यादा स्थायी बंदोबस्ती के इलाकों पर और मद्रास प्रेसिडेंसी में रैयतवारी इलाकों पर नहीं पड़ रहा था, क्योंकि यहां पर करों का हिस्सा अपेक्षाकृत ज्यादा अवधि के लिए तय होता था। इसके विपरीत महालवाड़ी इलाकों में अपरिहार्य रूप से करों का यह बोझ ज्यादा था। वास्तविक मूल्य का हिसाब लगाएं तो 1819 से 1856 के बीच महालवाड़ी इलाके में, जिसमें उत्तर प्रदेश, मध्य भारत के हिस्से, हरियाणा आदि आते थे, कर के बोझ में पूरे 70 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी। इसलिए 1839 से 1859 के बीच, ज्यादातर जिलों में 50 फीसद तक मामलों में जमीनें इस हाथ से उस हाथ चली गई थीं। इसका अर्थ यह है कि किसानों के और जमींदारों के लिए, भूमि की समस्या और कराधान की समस्या बहुत ही नाजुक होती जा रही थी। याद रहे कि यही इलाका विद्रोह का हृदय साबित हुआ था। यही वह क्षेत्र था जहां से बंगाल आर्मी के सिपाही आए थे और उनके बारे में कहा जाता है कि वे बस वर्दी पहने हुए भारतीय किसान थे। ये किसान छोटी-छोटी जमीनों पर मालिकाना हक रखने वाले किसानों के परिवारों से थे, जिस पर मैं जरा आगे चलकर चर्चा करूंगा।
दूसरा घटनाविकास था, उस चीज का विकास जिसे मुक्त बाजार का साम्राज्यवाद कहते हैं। 1833 के चार्टर कानून के बाद तो अंगरेजी और औद्योगिक विनिर्माता, भारत में व्यावहारिक मायने में शुल्क माफी के साथ ही आ रहे थे। इसका अर्थ यह है कि बड़े पैमाने पर भारतीय सूत कातने वालों और बुनकरों का रोजगार छिन रहा था। कार्ल मार्क्स ने इसकी ओर ध्यान खींचा था और जहां तक भारतीय बुनकरों का सवाल है, उनके लिए तो इसे मार्क्स ने मानव जाति का सफाया ही करार दिया था। भारत के कपड़े के कुल उपभोग के चौथाई हिस्से से ज्यादा की पूर्ति अब ब्रिटेन से होने वाले आयातों से हो रही थी और यह आंकड़ा उस भारत के लिए है, जो कपास के उत्पादन में सिरमौर माना जाता था। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तानी शहरी आबादी और खास तौर पर कताई करने वालों और बुनकरों पर कितनी भारी मार पड़ रही होगी। इस मुकाम पर हमें यह याद रखना चाहिए और हम जरा आगे चलकर इसका जिक्र भी करेंगे कि किस तरह अंगरेज लेखकों ने बुनकरों को, 1857 के विद्रोह में शामिल हुए असैनिकों में से सबसे कट्टर विद्रोहियों के रूप में यूं ही पेश नहीं किया है।
तीसरे, मुक्त व्यापार के साम्राज्यवाद के साथ ही साथ, 1843 से 1856 के बीच नए-नए इलाकों के हड़पे जाने की नीति को भी लागू किया जा रहा था। इस नीति के तहत, हिंदुस्तान के अनेक हिस्सों को हड़प कर ब्रिटिश शासित क्षेत्र में मिला लिया गया था, ताकि मुक्त व्यापार की छतरी को और फैलाया जा सके। 1843 से 1856 के बीच ही पंजाब, अवध, सतारा, नागपुर और झांसी को हड़पा गया था। इन वर्षों के दौरान ही हिंदुस्तानी भू-भाग का करीब पांचवां हिस्सा, ब्रिटिश शासन के इलाके में जोड़ा गया था। इस तरह हड़पेजाने का हर एक कदम, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी भी पैदा करता था क्योंकि पुराने शासनों में काम कर रहे बहुत से लोगों को, नई व्यवस्था में अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ता था। इसी प्रकार, दस्तकारों को बड़ी संख्या में रोजगार से हाथ धोना पड़ रहा था। मिसाल के तौर पर 1856 में लखनऊ की आबादी 6 लाख पचास हजार से ऊपर आंकी गई थी। यह विद्रोह से सिर्फ साल भर पहले, 1856 में अवध को हड़पे जाने के बाद की बात है। वास्तव में एक अंगरेज ने, जो विद्रोह फूटने के समय लखनऊ में ही था, पहले ही यह भविष्यवाणी जैसी कर दी थी कि लखनऊ की जनता को अंगरेजों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए और ऐसा होने की संभावना है। उसने लिखा था कि 'हमने ऐसा शायद ही कुछ किया होगा, जिससे हमें उनका प्यार मिल सकता हो।' उसने इसका विवरण दिया है कि किस तरह लोगों को रोजगार से हाथ धोने पड़े थे और किस तरह ब्रिटिश सरकार साधारण जनता से बहुत ज्यादा कर निचोड़ रही थी। अवध आदि इलाकों के अंगरेजी राज द्वारा हड़पे जाने की नीति ने आम लोगों की तकलीफें और बढ़ा दी थीं।
आखिरी नुक्ता यह कि मुक्त व्यापार के साम्राज्यवाद की कीमत खून से चुकानी पड़ रही थी और यह ऐसा पहलू है जिसे अकसर अनदेखा ही कर दिया जाता है। बंगाल आर्मी, जिसमें 1 लाख 35 हजार हिंदुस्तानी सैनिक थे, युध्द की तमाम आधुनिक पध्दतियों में प्रशिक्षित सेना थी और यह एशिया की सबसे बड़ी आधुनिक सेना थी। यही उस समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद की मुख्य सेना थी। 1839 से लगातार इसी सेना ने भारत में और दुनिया भर में, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के हमलावर युध्दों की तलवार की तरह काम किया था।
ऐसा पहला युध्द जिसमें इस सेना के हजारों लोग मारे गए थे, अफगानिस्तान का युध्द था। इसी तरह, 1843 में ग्वालियर के खिलाफ लड़े गए युध्द को अब भुला ही दिया गया है। पंजाब के और बर्मा में, दो बहुत ही खून-खराबे भरी लड़ाइयां हुई थीं और बंगाल आर्मी के हिंदुस्तानी सिपाहियों को फ्रांस और इंगलैंड के लिए लड़ने के लिए, क्रमश: केन्या और रूस भेजा गया था। इसके बाद इसी सेना के सिपाहियों को इंगलैंड के लिए अफीम युध्द में लड़ने के लिए, 1840 से 1857 तक चीन में झोंका गया था, जहां विद्रोह फूटा था। बाद में 1856 में इसी सेना को लड़ने के लिए ईरान भेजा गया था।
इन लड़ाइयों का कोई अंत ही नजर नहीं आता था। लेकिन तभी बंगाल आर्मी ने ही विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस तरह एक मायने में साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद द्वारा पैदा किए जा रहे सारे के सारे तनाव, नाटकीय तरीके से उस औजार पर संकेद्रित हो गए, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने खुद ही गढ़ा था। यह पक्का करने के खयाल से कि इस सेना में एक ही भाषा बोलने वाले सिपाही लेने चाहिए, बंगाल आर्मी के सिपाही हिंदुस्तानी भाषा बोलने वाले इलाके से ही भर्ती किए गए थे। इसे तिलंगी सेना या कुर्गी सेना भी कहा जाता था। इसे तिलंगी सेना इसलिए कहा जाता था कि इस सेना के शुरुआती सिपाही आंध्र प्रदेश से थे। इस सेना में वे चूंकि साक्षर लोगों को ही रखना चाहते थे, अत: उन्होंने भर्ती के लिएब्राह्मणों पर ही ध्यान केंद्रित किया था। यह हमें इसकी भी याद दिलाता है कि यह एक साक्षर सेना थी। इस सेना का नवाबों, शाहजादों, जमींदारों और तालुकेदारों की पुरानी दुनिया से कुछ भी लेना-देना नहीं था। यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।
इसमें शक नहीं कि उन्होंने तात्कालिक रूप से तो चिकनाई वाले कारतूसों से भड़ककर ही विद्रोह किया था और इस तरह दीन या धर्म के मुद्दे पर विद्रोह किया था। लेकिन, यह कोई धार्मिक सेना नहीं थी। सिपाही बस उतने ही धार्मिक थे, जितने बाकी तमाम लोग। वे जाति के मामले में जरूर काफी सचेत थे। 1850 के बाद यह तय किया गया था कि चूंकि इस सेना में इतने सारे ब्राह्मण थे, निचली जाति के लोगों को इस सेना में भर्ती ही नहीं किया जाए। इस तरह, वे किसी हद तक जाति-सजग जरूर थे अन्यथा वे संगठन के और सैन्य नेतृत्व के आधुनिक तरीकों से अच्छी तरह से परिचित थे और उनका सामंती वर्ग के साथ कोई लेना-देना नहीं था।
बंगाल आर्मी के संबंध में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को साथ-साथ रखा गया था। सैय्यद अहमद खान ने तो अपनी रचना, 'हिंदुस्तानी बंगावत के वजूहात' में अंगरेजों की इसके लिए आलोचना भी की थी कि उन्होंने इतनी नासमझी की थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को बटालियानों और रेजीमेंटों के तहत साथ-साथ रखा था। वह लिखते हैं : 'जब वे लड़ने के लिए निकले, दोनों के खून आपस में मिल गए और हिंदू, मुसलमान की मदद के भरोसे था और मुसलमान, हिंदू की मदद के आसरे।' इस तरह वे भाई बन गए। उनकी भाईचारे की भावनाएं, सगे भाइयों से गहरी थीं। वह कहते हैं, 'यह गलत था।' अगर मुसलमान और हिंदू, अलग-अलग रेजीमेंटों में रहे होते, तो मुसलमानों के विद्रोह करने की स्थिति में अंगरेज, हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का या मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं का उपयोग कर सकते थे।
लेकिन, यह सलाह तो विद्रोह हो जाने के बाद दी जा रही थी। सच तो यह है कि चूंकि एक का खून दूसरे के खून से मिल गया था, हिंदू और मुसलमान सिपाही यह भूल ही गए थे कि वे अलग-अलग धर्मों को मानने वाले हैं। जब चिकनाई वाले कारतूसों का मुद्दा आया या फिर दूसरे अनेक मौके आए थे जब मुसलमान सिपाहियों ने कहा था कि जब तक हमारे हिंदू भाई इन कारतूसों को स्वीकार नहीं करते, हम भी उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। आगे चलकर सिपाहियों ने अपने अफसरों का चुनाव करना शुरू कर दिया। यह हैरानी की बात है कि प्रचंड रूप से हिंदुओं की बहुलता वाले दस्तों ने मुसलमानों को अपना अफसर चुना था और प्रचंड रूप से मुसलिम बहुल दस्तों ने हिंदुओं को। यह कोई सचेत रूप से नहीं किया जा रहा था। यही बात इस सचाई को खास तौर पर शानदार बना देती है।
मैं सिपाहियों की भूमिका पर खास तौर पर जोर देना चाहता हूं क्योंकि कुछ बात है कि हमें 'बंगावत' शब्द पसंद नहीं है और इस नापसंदगी को फैलाकर बंगाल आर्मी के सिपाहियों तक पहुंचा दिया गया है। वे ही इस विद्रोह की रीढ़ थे। वे इस विद्रोह के सबसेपुख्ता घटक थे। वे ही इस विद्रोह के सबसे सशस्त्र तत्व थे। बेशक, विद्रोह में दूसरे भी शामिल थे। लेकिन विद्रोह में, सशस्त्र बलों की भूमिका ही सबसे पहले आती है। इसी ने 1857 के विद्रोह को दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशविरोधी विद्रोह बनाया था। दूसरा कोई भी विद्रोह बंगाल आर्मी जैसे 1 लाख 20 हजार से ज्यादा पेशेवर सैनिकों को विद्रोह के मैदान में नहीं उतार पाया था। बंगाल आर्मी के कुल 1 लाख 35 हजार सिपाहियों में से सिर्फ 8 हजार ही थे जो अब भी ब्रिटिश सेना के वफादार बने हुए थे।
मेरे खयाल में हमारे देश के लोगों की बंगाल आर्मी के सिपाहियों की जनतांत्रिक भावनाओं या उनके जनतांत्रिक परिसर के बारे में जानने में खास तौर पर दिलचस्पी होगी। उन्होंने हर एक स्थान पर काउंसिलों का गठन किया था। सिपाहियों ने इन्हें काउंसिलों का ही नाम दिया था। उन्होंने इन्हें 'पंचायत' का नाम नहीं दिया था। दूसरों ने जरूर इन्हें पंचायत कहा था। लेकिन, सिपाही इन्हें काउंसिल ही कहते थे। उन्होंने प्रशासन के संचालन के लिए इन काउंसिलों में अपने साथियों को चुना था। दिल्ली में वास्तव में उन्होंने एक कोर्ट ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन का गठन किया था। इसमें विभिन्न दस्तों के उनके प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्हें दिल्ली का शासन संभालना था और व्यवहार में, रस्मी सम्राट बहादुशाह जफर को परे खिसकाकर, सरकार के सारे के सारे फैसले लेने थे। अगर विद्रोह सफल हो गया होता तो भारत की शुरुआती संसद के रूप में हमारे सामने, सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली की जगह पर, दिल्ली का कोर्ट ऑफ एडमिनिस्टे्रशन आया होता। इसलिए, यह बंगाल आर्मी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक था। उनके बीच एक आधुनिक संगठन की अवधारणा तो थी ही, इसके अलावा उन्होंने चुनाव और चयन प्रणाली को इतना भारी महत्व भी दिया था। यह कहा जाता था कि यही उनकी मुसीबत भी बन गया क्योंकि कोई भी फैसला लिए जाने से पहले, अंतहीन बहसें हुआ करती थीं।
गौर करने वाली एक और बात यह है कि ब्रिटिश राज में सिपाहियों के आचरण की आलोचनाएं किए जाने के बावजूद, अगर हम वाकई मिसाल के तौर पर विद्रोहियों के नियंत्रण के चार महीनों के दौरान दिल्ली के हालात पर नजर डालते हैं, जिस दौर के संबंध में अखबार और दस्तावेज, राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद हैं, सिपाहियों के गलत आचरण के मामले बहुत सीमित नजर आते हैं और यह उल्लेखनीय बात है। उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिल रही थी, जिसके चलते शुरुआत में उन्हें असैनिक आबादी से कुछ पैसे की उगाही करनी पड़ी थी। लेकिन, जब उनकी तनख्वाह का इंतजाम हो गया, उसके बाद उन्होंने असैनिक आबादी को परेशान नहीं किया, यहां तक कि महाजनों को भी नहीं। इन परिस्थितियों को देखते हुए, विद्रोहियों के नियंत्रण के इन चार महीनों के दौरान दिल्ली में जिस तरह कानून व व्यवस्था को कायम रखा गया, वाकई उल्लेखनीय है। किसी की भी ओर से इसकी कोई शिकायत नहीं आई थी कि सिपाहियों ने उसके परिवार को लूटा हो या किसी को मार दिया हो।
जरा इसकी तुलना, ब्रिटिश कब्जे के दौरान उसी दिल्ली में जो कुछ हुआ था उससे करके देखें। एक सिरे से जनता का नरसंहार हुआ था और उसे लूटा गया था। साहूकारों और व्यापारियों का सब कुछ छिन गया। अंगरेजों के लाड़ले कहे जाने वाले अफसरों ने उनके घरों को खुदवा दिया था। इस तरह विद्रोह के पूरे दौर में बागी सिपाहियों का आचरण, उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए वास्तव में उदाहरणीय था।
जहां तक धर्म का सवाल है, मैं पहले ही कह चुका हूं कि बेशक, धर्म उनका एक नारा था। यह विचार विकसित किया गया था कि हिंदू और मुसलमान, दोनों एकेश्वरवादी हैं, जबकि ईसाई ही हैं जो त्रिमूर्ति में विश्वास करते हैं। मुसलमानों और हिंदुओं के धार्मिक मूल्य एक ही हैं। वे ईश्वर में विश्वास रखते हैं। हर जगह विद्रोहियों द्वारा दोनों समुदायों को एकजुट करने के लिए यह तर्क पेश किया जा रहा था। लेकिन, इससे आगे यह धारणा थी कि वे हिंदुस्तान के प्रति वफादार थे और अंगरेज एक भिन्न राष्ट्रीयता के लोग थे, जो हिंदुस्तानियों को बेइज्जत कर रहे थे।
मैं इस विद्रोह के एक और तत्व पर आना चाहूंगा, जिसे भुला ही दिया गया है। उस समय दिल्ली से तीन अखबार निकलते थे, दो उर्दू में और एक फारसी में। देहली का उर्दू अखबार एक बड़ा अखबार था। ये अखबार उस जमाने के शिक्षित वर्ग की भाषाओं में निकलते थे। देहली उर्दू अखबार की मुख्य लाइन इस प्रकार थी : 'अंगरेज विदेशी हैं। वे गोरे हैं और हम काले हैं। वे ईसाई हैं और वे त्रिमूर्ति में विश्वास करते हैं। हम मुसलमान और हिंदू हैं। मुसलमान, अल्लाह में विश्वास करते हैं और हिंदू, आदिपुरुष में।'
जहां तक दोनों समुदायों को एक दूसरे से जोड़ने का सवाल है, यह सब सही था। लेकिन, देश के नाम पर देशभक्तिपूर्ण पुकारें भी थीं। देहली उर्दू अखबार अपने पाठकों को हमेशा, 'प्यारे देशवासियो' कहकर संबोधित करता है। उसकी पूरी वफादारी हिंदुस्तान या भारत के लिए है। उसके लिए सिपाही बादशाही फौज या शाही फौज नहीं है। वे तो 'फौज-ए-हिंदुस्तान' हैं या 'हिदुस्तानी फौज'। वे मजहब से भले ही हिंदू हों या मुसलमान, यह अखबार अकसर उन्हें जेहादी या धर्मयोध्दा कहता है।
विद्रोहियों के जनतंत्रवादी कमांडर, बख्त खान इस अखबार की नजरों में उसके सबसे बड़े नायक हैं। मैं कहना चाहूंगा कि बख्त खान, धर्मशास्त्रविदों को काफी हिकारत की नजर से देखता था। मिसाल के तौर पर उसने यह आदेश जारी किया था कि अगर दिल्ली में कोई गोकुशी करता है तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। उसने इस आशय के आदेश जारी किए थे। पिछले ही दिनों गोकुशी के खिलाफ आई.सी.एच.आर. की प्रदर्शनी में इस आदेश को प्रदर्शित किया गया था। खुद को मुजाहिदीन कहने वाले जो लोग हिंदू-मुसलिम एकता में खलल डालना चाहते थे, उनके लिए उसने कह दिया था कि उन्हें जामा मसजिद से निकाल फेंका जाना चाहिए, क्योंकि वे अपनी गंदगी से मसजिद को नापाक कर रहे थे। वास्तव में इसी शख्श की देहली उर्दू अखबार प्रशंसा करता है। यह एक महान सैन्यकमांडर या सिपाही था, जो दिल्ली का कमांडर इन चीफ बनाया गया था। वह आखिर में लखनऊ चला गया और वहां लड़ाई के मैदान में 1859 में उसकी मौत हो गई। ऐसा शख्श देहली उर्दू अखबार का हीरो था।
सच यह है कि शिक्षित आबादी धर्मशास्त्रियों के अंगूठे के नीचे किसी भी तरह से नहीं थी और उसके बीच अनेक आधुनिक विचार मौजूद थे। उर्दू अखबार इसकी वकालत कर रहा था कि शिक्षित लोगाें को हथियार बनाने वाले कारीगर का काम संभाल लेना चाहिए; उन्हें राइफलें बनानी चाहिए। यहां शारीरिक श्रम के प्रति प्रशंसा का भाव सामने आता है और दूसरी ओर संचार के किसी भी आधुनिक साधन की किसी तरह की निंदा नहीं है। वास्तव में फिरोज शाह ने तो 1857 के अगस्त के अपने एलान में भाप से चलने वाले जहाजों का और रेलवे के विकास का वादा किया था। इन सिपाहियों और खास तौर पर शिक्षित लोगों ने विद्रोहों को दिशा देने का काम किया था और उसके लिए एक विचारधात्मक रूपरेखा मुहैया कराई। लेकिन, दूसरे तबकों की भी भूमिका महत्वपूर्ण थी। यह बात दस्तकारों के मामले में तो और भी सच है, जो हर जगह विद्रोहों में शामिल हुए थे। मुजाहिदीन के नाम से पहचाने जाने वाले असैनिक वालंटियरों में, जिन्होंने वास्तव में लड़ाकों के रूप में विद्रोह में हिस्सा लिया था, उनकी संख्या काफी अच्छी थी। मुजाहिदीन की संज्ञा का प्रयोग अकसर मुसलमानों के मामले में ही किया जाता था, हालांकि कई बार हिंदू असैनिक वालंटियरों के लिए भी इस संज्ञा का प्रयोग किया गया है।
जहां तक इस विद्रोह में किसानों के शामिल होने का सवाल है, इस सिलसिले में मुझे कुछ खास कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि अब, खास तौर पर एरिक स्टोक्स की कृति के सामने आने के बाद से, इस भूमिका को पूरी तरह से पहचाना जा चुका है। उन्होंने जमींदारों को नेतृत्व में रखकर लड़ाई लड़ी थी और बहुत बार, किसान समुदाय ने स्वतंत्र रूप से कार्रवाइयां भी थीं, जिस सब पर एरिक स्टोक्स ने विस्तार से चर्चा की है।
 थार्न हिल ने, जो 1858 के आखिर में मथुरा के डिस्ट्रिक्ट मजिस्टे्रट थे, लिखा था कि ब्रिटिश शासन के बने रहने के सबसे ज्यादा खिलाफ तो किसान ही थे। उनका कहना था कि अंगरेजों का काम अब यह होगा कि जमींदारों की मदद करें और किसानों को दबाएं। इस विद्रोह में किसानों की हिस्सेदारी सबसे पहले तो कर वसूली और वास्तव में कमरतोड़ कर वसूली का नतीजा थी। दूसरे, विद्रोहों में उन देहाती इलाकों के किसानों की हिस्सेदारी खास तौर पर ज्यादा थी, जहां किसान और सिपाहियों के बीच सीधे रिश्ते थे। बेशक, बाद वाले कारक की भी भूमिका रही थी, फिर भी विद्रोह में किसानों की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी की वजहें तो, महालवाड़ी इलाकों में कमरतोड़ कर वसूली और ऋणों के बोझ के चलते, उनके अपनी जमीनें खो बैठने या खोने के खतरे में आ जाने आदि से संबंधित थीं। इसी ने उन्हें विद्रोह की ओर धकेला था।
अब मैं पूरे सम्मान के साथ, अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पंडित नेहरू नेइस विद्रोह के संबंध में जो कुछ कहा था, उसकी चर्चा करना चाहता हूं। उन्होंन 1857 के विद्रोह को एक विशाल और जबरदस्त विद्रोह का नाम दिया था। वह अपनी इस बात को दोहराते भी हैं क्योंकि 1857 के उनके विवरण के आखिर में आया यह सूत्रीकरण बहुत ही भावपूर्ण है। सचाई यह है कि अंगरेजों ने भारत पर जो जुल्म ढाए थे, जिस तरह लोगों को फांसियां दी थीं और लूटा था, उसे लेकर वह काफी भावुक हो उठते हैं। वह विस्तार से इस सबका वर्णन करते हैं। फिर भी यह कहते हैं कि अंतिम विश्लेषण में यह विद्रोह था एक सामंती विद्रोह ही। बुनियादी तौर पर सामंती विद्रोह। इस विद्रोह के संबंध में उसके प्रमुख नेताओं ने जो विचार व्यक्त किए थे, उनके दिमाग में रहे होंगे।
इसमें तो कोई शक ही नहीं है कि इस विद्रोह के अनेक प्रमुख नेता या राजा-राजकुमार थे या जमींदार। मुझे उनके नाम गिनाने की जरूरत नहीं है। मिसाल के तौर पर जगदीशपुर के जमींदार, कुंवरसिंह या अमरसिंह का उदाहरण लिया जा सकता है, जिन्होंने अपनी विद्रोही सेना के साथ रीवां, कालपी, कानपुर, लखनऊ और आजमगढ़ तक मार्च किया था। कहा जाता है कि ब्रिटिश इतिवृत्तकारों के विद्रोह के वृत्तांतों में यह स्वीकार किया जाता था कि अगर विद्रोहियों के पास इनके जैसे दर्जन भर नेता भी होते, तो दोबारा ब्रिटिश राज कायम हो ही नहीं सकता था। खुद एंगेल्स ने 1857 में अमरसिंह की कार्यनीति की प्रशंसा की थी। वे बेशक जमींदार थे। इसी तरह रानी लक्ष्मीबाई, झांसी की रानी थीं। उधर हजरतमहल थीं, जिन्होंने इतनी मजबूती से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। बेशक, ये सभी 1857 के महान नायक थे।
ऐसे तालुकेदारों की संख्या काफी बड़ी है, जिन्होंने विद्रोह के लिए अपनी जानें कुर्बान की थीं और जिन्हें अपने देश के लिए लड़ने के लिए अंगरेजों ने फांसी पर चढ़ाया था। बरेली के खान बहादुर खान का जिक्र किया जा सकता है, जो एक जमींदार थे और आखिरकार उन्हें फांसी दी गई थी। अपनी बढ़ी उम्र के बावजूद, वह अंगरेजों के बहुत मुखर विरोधी थे। इसी तरह, इन विद्रोहों में मुगलों की बहुत ही शानदार भूमिका को लिया जा सकता है। और बहादुरशाह जफर, जिसने अपनी शुरुआती हिचकिचाहट की बाद में क्षतिपूर्ति कर दी थी और अंतत: अपनी शायरी को और खुद को समर्पित कर दिया था, जिसमें उसने इस विद्रोह के शहीदों को श्रध्दांजलि अर्पित की थी। विद्रोह के बारे में पंडितजी के चरित्रांकन को लेकर कोई विवाद नहीं है, यह कहना सही नहीं होगा। वास्तव में इस विद्रोह के चरित्रांकन पर भिन्न-भिन्न रायें रही हैं। मिसाल के तौर पर एक तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि 1857 का विद्रोह, सारत: एक किसान विद्रोह था, जिसके निशाने पर जमींदार थे और विदेशी शासन। लेकिन, वास्तव में ऐसा कहना पूरी तरह से गलत होगा। पी.सी. जोशी ने पचास साल पहले इस गलती को रेखांकित किया था और मैं इस पर आगे बहस नहीं करना चाहूंगा।
असली नुक्ता यह है कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तालुकेदार, जमींदारऔर राजा-रजवाड़े, सिपाहियों, किसानों और दस्तकारों के साथ होकर, उस समय की दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी सत्ता के खिलाफ उठ खड़े हुए, खुद उनकी अपनी धारणाएं भी बदल गईं। प्रतिरोधी संघर्ष ने उनके नजरिए को बदल कर रख दिया था।
इस सिलसिले में मैं अवध के विद्रोहियों के दो दस्तावेजों की ओर ध्यान खींचना चाहूंगा। इनमें से पहला दस्तावेज भाषा के पहलू से बहुत ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में विद्रोहियों के सारे के सारे दस्तावेज, चाहे वे अखबार हों या फिर उनकी घोषणाएं हों, महत्वपूर्ण हैं। फिर भी यह एलान मेरा प्रिय दस्तावेज है, जो कि हमारे संविधान के उस प्रावधान को चुनौती देता है, जो यह कहता है कि हिंदी, संस्कृत की शब्दावली पर आधारित होनी चाहिए। ये एलान संस्कृत की शब्दावली में न होकर, पूरी तरह से बोलचाल की हिंदुस्तानी में हैं। उनमें उर्दू के शब्दों का तो बोलबाला है, लेकिन फारसी के शब्दों का नहीं। मिसाल के तौर पर मेरे पास एक घोषणा का द्विभाषिक पाठ है, जिसमें दाएं हाथ में उर्दू में घोषणा है और बाएं पर हिंदी में। दोनों पाठ पूरी तरह से एक जैसे नहीं हैं। उर्दू या हिंदुस्तानी के पाठ में उर्दू के शब्दों की बहुतायत है, न कि फारसी के शब्दों की। इसी तरह, हिंदी के पाठ में हिंदुस्तानी के शब्द प्रमुखता से हैं, कुछेक शब्द फारसी के भी मिल जाएंगे, लेकिन संस्कृत के शब्द व्यावहारिक मायने में गैर-हाजिर ही हैं। यही है जनता की भाषा। यह एलान छपे हुए रूप में है। इस तरह विद्रोह का एलान करने में विद्रोही, छपाई का सहारा ले रहे थे। यह पुराने सामंती रुख से काफी भिन्न मामला है। यह कोई हुक्मनामा नहीं है। यह कोई आज्ञाप्ति नहीं है।
इस सार्वजनिक अपील के लिए 'इश्तिहारनामा' शब्द का प्रयोग किया गया है। आखिर, यह अपील किसको संबोधित थी? यह अपील जमींदारों के लिए और आम बाशिंदों के लिए थी। इस पाठ में पुराने मूल्य भी नजर आते हैं। इसकी शिकायत की जा रही है कि जमींदारों की जमीनें अंगरेज छीन रहे हैं, जैसा इससे पहले के निजाम में नहीं होता था। ये जमींदार अपनी जमीनों की इज्जत करते थे। अंगरेज तो इन जमींदारों के साथ भी, मजूरों-हम्मालों जैसा बर्ताव कर रहे थे। अंगरेजों के लिए तो वे मोचियों की तरह हैं। इसलिए, भारतीय निजाम फिर से श्रेणी विभाजन को बहाल करेगा। लेकिन, जल्द ही विद्रोहियों की घोषणाओं से यह तत्व काफूर होना शुरू हो गया। अंत में उन्हीं विद्रोहियों ने, हजरत महल के उसी कोर्ट की तरफ से जब 1857 के अक्टूबर में मलका विक्टोरिया की घोषणा का जवाब दिया, तो ये सभी मामले भुलाए जा चुके थे। अब साधे-सीधे हिंदुस्तानियों से अपील की जा रही थी।
अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो अवध के विद्रोहियों की 1857 की जुलाई की घोषणा में हमें 'हिंदुस्तान' शब्द दिखाई नहीं देता है। लेकिन, मलका विक्टोरिया की घोषणा के जवाब में हमें 'हिंदुस्तान' शब्द मिल जाता है। ठीक-ठीक जिस जुमले का इस्तेमाल किया गया है वह है'हिंदुस्तानी फौज और अवाम'। उन्हें संबोधित कर कहा जा रहा है किमलका विक्टोरिया पर विश्वास न करें। मलका विक्टोरिया का एलान धोखे और फरेब से भरा हुआ है। अगर वे वाकई न्याय करना चाहती हैं तो मैसूर क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने टीपू सुलतान से छीना था? वे पंजाब क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने दिलीपसिंह से छीना था? और वे बंगाल क्यों नहीं लौटा देतीं जो उन्होंने धोखे से छीना था? और अवध भी क्यों नहीं लौटा देतीं अगर मलका विक्टोरिया की दिलचस्पी न्याय करने में है तो उन्होंने यहां भी जो संपदा हथियाई है, उसे लौटा क्यों नहीं देतीं?
इस जबाव में जो दूसरी दलील दी जा रही थी वह यही थी कि अंगरेज तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगे। तुम्हें तब तक लड़ते रहना होगा, जब तक कि अंगरेजों को निकाल बाहर नहीं किया जाता है। लड़ाई से पीछे नहीं हटना चाहिए। यह कमाल की बात है कि उस समय जबकि विद्रोह का सब कुछ खतम हो चुका था, उन्होंने यह जवाब छपवाया था और उसमें पूरे भारत की तसवीर को सामने रखते हुए, यह सब कहा था। इस तरह हम, सामंती वर्ग के नजरिए में एक बदलाव आता देखते हैं।
यहां मैं जो नुक्ते लेना चाहूंगा, वे सब आपस में जुड़े हुए हैं। पहला है, झांसी की रानी के रुख में आया बदलाव। इससे हमें पता चलता है कि किस तरह पारिवारिक शिकायतें, आज की भाषा में कहें तो राष्ट्रीय लक्ष्यों में या बृहत्तर लक्ष्यों में बदल जाती हैं। अगर झांसी को ब्रिटिश राज में नहीं मिलाया गया होता और उनके दत्तक पुत्र के दावे को खारिज न कर दिया गया होता, तो झांसी की रानी का ब्रिटिश हुकूमत से कोई विरोध नहीं होता। इसीलिए वह विद्रोहियों के साथ आने में हिचकिचा रही थीं। लेकिन, एक बार जब वह विद्रोह के साथ जुड़ गईं, वह ऐसी गतिविधियों तक पहुंच गईं जिनकी पहले कभी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी, जैसे पठान रक्षक और मुसलिम तोपची रखना, सिपाहियों का नेतृत्व करना, बंदूक बनाने के लिए फाउंड्री स्थापित करना आदि। जब वह तूफानी लड़ाई के बाद झांसी से दूर निकल रही थीं, दकन के एक पंडित से उनकी भेंट हो गई।
उस ब्राह्मण विष्णु भट्ट ने यह दर्ज किया है कि वह पठानी पोशाक में थीं और पठान रक्षक ही उनके साथ थे। वह कुएं से पानी पीना चाहती थीं। जैसे ही रानी को उसके दकन का ब्राह्मण होने का पता चला, उन्होंने ब्राह्मण से बातचीत शुरू कर दी। विष्णु भट्ट जब विद्रोह के बीच फंसा, वह बनारस से आ रहा था। उसने जो लिखा है, एक तटस्थ प्रेक्षक का बयान है। झांसी की रानी ने उससे कहा था : 'मैं तो एक गरीब विधवा हूं। मुझे विधवा धर्म अपनाना चाहिए था, जैसा कि रिवाज है। लेकिन नियति को यही मंजूर था कि मैं आज हिंदू धर्म के सम्मान के लिए लड़ रही हूं।'
बेशक, वह जिस हिंदू धर्म के लिए लड़ने की बात कर रही थीं, उस परंपरा-निर्धारित धर्म के लिए लड़ना नहीं हो सकता है, जिसका तकाजा यही था कि वह बाकी हर चीज से कटी हुई एक विधवा का जीवन व्यतीत करतीं। वह तो उस हिंदू धर्म की बात कर रही थीं, जिसका यह निर्देश था कि विदेशियों के राज को उखाड़ फेंको। सिपाहियों की ही तरह, झांसी की रानी की भी धर्म ने निर्देश के मामले में यही धारणा थी। रजतकांत राय ने अपने 'अनुभूत' समुदाय के विश्लेषण में धर्म और देशभक्ति के इस खास अंतर्संबंध का बहुत सुंदर तरीके से विश्लेषण किया है और यह दिखाया है कि किस तरह यहां आकर धर्म की अवधारणा, किसी खास धर्म के प्रति वफादारी मात्र के विचार से आगे बढ़कर, खास तौर पर देशभक्तिपूर्ण, असांप्रदायिक रूप ले लेता है।
यही बात वहाबियों के संबंध में भी लागू होती है। मेरे मित्र इक्तिदार आलम खान ने वहाबियों के इस मामले पर गहराई से चर्चा की है और मैं इस संबंध में ज्यादा कुछ नहीं जोड़ पाऊंगा। फिर भी मैं यह जरूर कहूंगा कि आगे चलकर इस विद्रोह में वहाबियों की भूमिका के संबंध में जो भी दावे किए गए, बहुत ही अतिरंजित थे। वास्तव में उनकी भूमिका किसी भी तरह से उल्लेखनीय नहीं थी। इससे भिन्न, ऐसे मुसलिम वालंटियरों की भूमिका जरूर उल्लेखनीय थी, जो इस विद्रोह में शामिल हुए हिंदू असैनिकों की ही तरह यह मानते थे कि उनके धर्म का यही निर्देश है कि उन्हें विदेशियों के शासन के खिलाफ लड़ना चाहिए। लेकिन, ऐसे लोगों में ज्यादातर ने न तो अब्दुल बहाव का नाम सुना था और न सैयद अहमद बरेलवी का। दूसरी ओर उन्होंने बख्त खान का नाम जरूर सुना था और उन्हें देखा था। यह दूसरी बात है कि विलियम डेलरिंपल ने बड़ी आसानी से बख्त खान को वहाबियों के खाने में डाल दिया है, जबकि वास्तव में वह हर प्रकार के बहावी विचार के सख्त खिलाफ थे।
मैं अंत में यह कहना चाहूंगा कि पहले अकसर यह सुनने को मिलता था कि अंगरेजों ने जो कुछ किया था, उसकी पर्दापोशी नहीं की जानी चाहिए। हो सकता है कि कूटनीतिक पहलू से हम इस पहलू की चर्चा नहीं करना चाहें। लेकिन, विद्रोह फूटने के बाद जो कुछ हुआ था, उसे इतिहास के पन्नों से मिटाया तो नहीं जा सकता है। कानुपर के बीवीघर नरसंहार से काफी पहले ही, नील ने यह लिखा था कि, 'कहा जाता है कि एक अंगरेज का गला विक्षोभ से लगभग रुंध ही जाता है कि श्रीमती चैंबर या सुश्री जेनिंग्स की हत्या कर दी गई। लेकिन देसी इतिहासों में या देसी लोगों के इतिहास में ऐसी लोकख्यातियों और लोक-कथाओं की कमी नहीं है,जिनमें हमारे लोगों के खिलाफ यह दर्ज होगा कि अपेक्षाकृत कम परिचित नाम वाली माताओं, बीवियों और बच्चों को, ब्रिटिश प्रतिशोध की विभीषिका का दयनीय शिकार बनना पड़ा था और इन कथाओं का भी दूसरी सभी कथाओं की तरह ही गहरा भावनात्मक असर होगा।'
डेलरिंपल ने दिल्ली के नरसंहार का विशद वर्णन किया है। यह दूसरी बात है कि यह विवरण पहले से मौजूद संस्मरणों की विशाल संख्या और ब्रिटिश रिपोर्टों के माध्यम से, पहले से आम जानकारी में रहा है। पूरे के पूरे शहर को उजाड़ा गया और वहां नरहसंहार किया गया। हां, एक बात जरूर है कि आधिकारिक रूप से औरतों की हत्याएं नहीं की गई थीं। लेकिन, अगर सभी मर्दों को मार दिया जाए तो औरतें कहां से खाएंगी, कहां जाएंगी? सैयद अहमद खान ने जो उस समय एक ब्रिटिश एजेंट थे, बिना किसी सहानुभूति के जिस तरह से विवरण दिया था, वह इस प्रकार है :
'नगीना के शहरियों ने सोचा था कि लूट होगी और उनमें से कुछ ने अपने परिवारों को वहां से हटाया भी था, लेकिन उन सबको तो कत्ल ही कर दिया गया। यह कत्लेआम दिन भर चला। वहां सिर्फ एक शख्स को बख्श दिया गया था क्योंकि उसने अंगरेजों के खिलाफ फतवे पर दस्तखत करने से इनकार किया था। वर्ना सभी निर्दोष लोगों को कत्ल कर दिया गया।' सैयद अहमद ने यह वर्णन हमदर्दी का एक शब्द तक खर्च किए बिना किया है। जब उनका इस तरह का रुख था, तो अंगरेजों का रुख कैसा होगा इसका हम अंदाजा लगा सकते हैं।
विष्णु भट्ट ने कोष्टिपुर की लूट का वर्णन किया है। हम जानते हैं कि दिल्ली में सिर्फ मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था। लेकिन, भट्ट के अनुसार कोष्टिपुर में और झांसी में, रानी के ब्राह्मण होने की वजह से, सभी ब्राह्मणों को कत्ल कर दिया गया। वह यह भी बताता है कि कोष्टिपुर में तो औरत, मर्द, बच्चे, सभी का नरसंहार किया गया था।
साफ है कि प्रतिशोध भी इतिहास का हिस्सा है। जिस तरह यह बदला लिया गया, वह भी इतिहास का हिस्सा है। इसे मिटाया नहीं जा सकता है। इसे मिटाया नहीं जाना चाहिए। अगर विद्रोहियों ने सैकड़ों में अंगरेजों की जानें ली थीं, तो अंगरेजों ने दसियों हजार में उनकी हत्याएं की थीं। एक-एक अंगरेज की हत्या की सजा, दोषियों और निर्दोषों को समान रूप से दी जाती थी। दूसरी ओर, किसी भी भारतीय की हत्या के लिए किसी यूरोपीय को कोई सजा नहीं दी गई। तब हम बदले की इन कार्रवाइयों को बराबर कैसे मान सकते हैं? इसलिए, जब हम भारत में ब्रिटिश शासन की अच्छाइयों की बात करते हैं, जैसे इंडियन सिविल सर्विस की स्थापना आदि, तो हमें इस विद्रोह में अपने प्राणों की आहुति देने वाले विद्रोहियों को तो याद करना ही चाहिए, उन साधारण नागरिकों को, आम औरतों, मर्दों और बच्चों को भी याद कर लेना चाहिए, जिन्हें 1857-58 के दौरान मौत के घाट उतारा गया था और यातनाएं देने के भांति-भांति के तरीके आजमाते हुए मौत के घाट उतारा गया था।
जहां तक अन्य विद्रोहों की और खासकर दक्षिण भारत की भूमिका का सवाल है, एक दिलचस्प प्रसंग का जिक्र करना चाहूंगा। अब से कुछ अर्सा पहले टेलीविजन पर हैदर अली और टीपू सुलतान पर एक कार्यक्रम सीरियल के रूप में दिखाया जा रहा था। लेकिन, अदालत का आदेश आ गया कि उसमें यह एलान जोड़ा जाना चाहिए कि यह इतिहास नहीं है बल्कि मिथक है या ऐसा ही कुछ और। मैंने भारतीय टेलीविजन पर किसी अन्य सीरियल में इस तरह की घोषणा जोड़े जाने का आग्रह नहीं देखा है। बहरहाल, अदालत ने यह सुनिश्चित कर दिया कि हैदरअली और टीपू सुलतान को मिथकीय चरित्रों की तरह ही लिया जाए। यह बात सही है कि बहुत बार इससे पहले के विद्रोह हमारे ध्यान से निकल जाते हैं और ऐसा लगने लगता है जैसे सब कुछ 1857 के विद्रोह से ही शुरू हुआ हो।बहरहाल, जहां तक इससे पहले के किसी तुलनीय विद्रोह का सवाल है, यह समझना जरूरी है कि देश के पूरी तरह से एकीकृत होने से पहले, अलग-अलग कड़ियों को आपस में जोड़ना मुश्किल होता होगा। विद्रोह करना वैसे भी एक नाटकीय निर्णय होता है और हम तो यही देखकर अजरज में पड़ जाते हैं कि 1857 में उत्तरी भारत में यह फैसला कैसे लिया गया होगा, जबकि लोग यह अच्छी तरह समझते थे कि यह जान की बाजी लगाने का मामला है।
फिर भी पंजाब के दो युध्दों से एक हद तक इसकी तुलना की जा सकती है। भारतीय प्रतिरोध के किसी भी इतिहास में पंजाब के दोनों युध्दों को हमेशा याद रखा जाना चाहिए। ब्रिटिश राज के विस्तार का, पंजाब के दो युध्दों जैसा जबरदस्त प्रतिरोध पहले नहीं हुआ था। अंगरेजों को इतनी कठिन लड़ाइयां पहले नहीं लड़नी पड़ी थीं। इन लड़ाइयों में बंगाल आर्मी के ही हजारों सिपाही मारे गए थे। बहरहाल, 1857 में पंजाब में हुए अधिकांश विद्रोह, वहां तैनात बंगाल आर्मी के सिपाहियों के ही विद्रोह थे। ऐतिहासिक घटनाओं में ऐसी भिन्नताओं का सामने आना स्वाभाविक है। एक मायने में हम यह कह सकते हैं कि 1857 के विद्रोह को और फैलने का मौका ही नहीं मिला था क्योंकि साल के भीतर-भीतर, वास्तव में तो छह महीने में ही, उसे कुचला जा चुका था। कौन जानता है कि अगर यह सफल हो जाता तो क्या होता!
(इरफान हबीब,प्रसिद्ध इतिहासकार हैं,यह लेख सांसदों के लिए भाषण माला के क्रम में 9 मई 2007 को आयोजित व्याख्यान पर आधारित है)
















सोमवार, 22 नवंबर 2010

भारतीय सेना में विद्रोह- कार्ल मार्क्स

फूट डालो और राज्य करो, रोम के इसी महान नियम के आधार पर ग्रेट ब्रिटेन लगभग डेढ़ सौ वर्ष तक अपने भारतीय साम्राज्य पर अपना शासन बनाए रखने में कामयाब हुआ था। जिन विभिन्न नस्लों, कबीलों, जातियों, धार्मिक संप्रदायों और स्वतंत्र राज्यों के योग से उस भौगोलिक एकता का निर्माण हुआ है जिसे भारत कहा जाता है, उनके बीच आपसी शत्रुता फैलाना ही ब्रिटिश आधिपत्य का बुनियादी उसूल रहा है। लेकिन, बाद के काल में, उस आधिपत्य की परिस्थितियों में एक परिवर्तन हुआ। सिंध और पंजाब की फतह के बाद, एंग्लो-इंडियन साम्राज्य न केवल अपनी स्वाभाविक सीमाओं तक फैल गया था, बल्कि स्वतंत्र भारतीय राज्यों के अंतिम चिह्नों को भी पैरों तले कुचल कर उसने नष्ट कर दिया था। तमाम लडाकू देशी जातियों को वश में कर लिया गया था, देश के अंदर के तमाम बड़े झगड़े खतम हो गए थे, और हाल में अवध के (अंगरेजी सलतनत मेंअनु.) मिला लिए जाने की घटना ने संतोषप्रद रूप से इस बात को सिध्द कर दिया था कि तथाकथित स्वतंत्र भारतीय राज्यों के अवशेष केवल अंगरेजों की दया पर ही जिंदा हैं। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थिति में एक जबरदस्त परिवर्तन आ गया था। अब वह भारत के एक भाग की मदद से दूसरे भाग पर हमला नहीं करती थी; वह अब उसके शीर्ष स्थान पर आसीन हो गई थी और सारा भारत उसके चरणों में पड़ा था। अब वह फतह करने का काम नहीं कर रही थी, वह सर्वविजेता बन गई थी। उसकी मातहत सेनाओं को अब उसके साम्राज्य का विस्तार करने की नहीं, बल्कि उसे केवल बनाए रखने की जरूरत थी। सिपाहियों को बदल कर उन्हें पुलिस मैन बना दिया गया था; 20 करोड़ भारतवासियों को अंगरेज अफसरों की मातहती में 2 लाख सैनिकों की देशी फौज की मदद से दबा कर रखा जा रहा है, और इस देशी फौज को केवल 40 हजार अंगरेज सैनिकों की सहायता से काबू में रखा जा रहा है। प्रथम दृष्टि में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय जनता की फर्माबरदारी उस देशी फौज की नमकहलाली पर आधारित है जिसे संगठित करके ब्रिटिश शासन ने, साथ ही साथ, भारतीय जनता के प्रतिरोध के एक प्रथम आम केंद्र को भी संगठित कर दिया है। उस देशी फौज पर कितना भरोसा किया जा सकता है, यह हाल की उसकी उन बंगावतों से बिलकुल स्पष्ट है जो, फारस (ईरान) के साथ युध्द के कारण, बंगाल प्रेसिडेंसी (प्रांत) के यूरोपियन सैनिकों से खाली होते ही वहां पर आरंभ हो गई थीं। भारतीय सेना में इससे पहले भी बंगावतें हुई थीं, लेकिन वर्तमान विद्रोह उनसे भिन्न है, उसकी कुछ अपनी विशिष्ट और घातक विशेषताएं हैं। यह पहली बार है जबकि सिपाहियों की रेजीमेंटों ने अपने यूरोपीय अफसरों की हत्या कर दी है; जबकि अपने आपसी विद्वेषों को भूल कर, मुसलमान और हिंदू अपने सामान्य स्वामियों के खिलाफ एक हो गए हैं; जबकि 'हिंदुओं द्वारा आरंभ की गई उथल-पुथल ने दिल्ली के राज्य सिंहासन पर वास्तव में एक मुसलमान बादशाह को बैठा दिया है;जबकि बंगावत केवल कुछ थोड़े से स्थानों तक ही सीमित नहीं रही है; और, अंत में, जबकि एंग्लो इंडियन सेना का विद्रोह अंगरेजों के प्रभुत्व के विरुध्द महान एशियाई राष्ट्रों के असंतोष के आम प्रदर्शन के साथ मिलकर एक हो गया है। इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं कि बंगाल की सेना का विद्रोह फारस (ईरान) और चीन के युध्दों के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
बंगाल की सेना में चार महीने पहले जो असंतोष फैलने लगा था, उसका तथाकथित कारण यह बताया जाता है कि देशी फौजों को यह डर था कि सरकार उनके धर्मकर्म में हस्तक्षेप करेगी। कहा गया है कि सिपाहियों में जो कारतूस बांटे गए थे, उनके कागजों में गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी, और इसलिए उनको दांत से काटने की आज्ञा को देशी फौजियों ने अपने धार्मिक रीतिरिवाजों में दखलंदाजी माना, और यही चीज स्थानीय फसादों के लिए एक सिगनल बन गई। 22 जनवरी को कलकत्ते से थोड़े ही फासले पर स्थिति छावनियों में भयानक आग लग गई। 25 फरवरी को बरहमपुर में 19वीं देशी रेजीमेंट ने बंगावत कर दी जिसके सैनिकों को उन कारतूसों के प्रति विरोध था। 31 मार्च को इस रेजीमेंट को भंग कर दिया गया। मार्च के अंत में, बैरकपुर में स्थित 34 वीं सिपाही रेजीमेंट ने परेड ग्राउंड पर अपने एक सैनिक को भरी हुई बंदूक लेकर एकदम अगली कतार तक आगे बढ़ जाने दिया; वहां से बंगावत के लिए अपने साथियों को आह्वान करने के बाद उसे अपने एडजुटेंट और सार्जेंट-मेजर पर हमला करने और उन्हें घायल करने दिया। इसके बाद जो जबरदस्त हाथापाई हुई, उसके दौरान सैकड़ों सिपाही चुपचाप खड़े तमाशा देखते रहे और कुछ दूसरों ने इस मारपीट में शामिल होकर अपनी बंदूकों के कुंदों से अफसरों की मरम्मत की। इसके बाद उस रेजीमेंट को भी भंग कर दिया गया। अप्रैल महीने का श्रीगणेश इलाहाबाद, आगरा, अंबाला आदि कई छावनियों में बंगाली सेना की आगजनी से, मेरठ में हल्के घुड़सवारों की तीसरी रेजीमेंट की बंगावत से, और मद्रास और बंबई की सेनाओं में इसी प्रकार की बागी प्रवृत्तियों के प्रदर्शन से हुआ। मई के आरंभ में अवध की राजधानी लखनऊ में भी एक विद्रोह की तैयारी हो रही थी, लेकिन सर एच. लारेंस की सतर्कता ने उसे रोक दिया था। 9 मई को मेरठ की तीसरी हल्की घुड़सवार सेना के बागियों को जेल ले जाया गया जिससे कि उन्हें जो भिन्न-भिन्न सजाएं दी गई थीं उन्हें वे काटें। अगले दिन की शाम को, 11वीं और 20वींदो देशी रेजीमेंटों के साथ तीसरी घुड़सवार सेना के सैनिक परेड मैदान में इकट्ठे हो गए। जो अफसर उन्हें शांत और अनुशासित करने की कोशिश कर रहे थे उनको उन्होंने मार डाला, छावनियों में आग लगा दी और जितने अंगरेजों को वे पा सके, उन सबको उन्होंने काट डाला। ब्रिगेड के अंगरेज सैनिकों के भाग ने यद्यपि पैदल सेना की एक रेजीमेंट, घुड़सवार सेना की एक रेजीमेंट, और पैदल घुड़सवार तोपखाने की एक भारी शक्ति जमा कर ली थी, लेकिन रात होने से पहले वे कोई कार्रवाई न कर सके। बागियों को वे कोई चोट न पहुंचा सके, और उन्होंने वहां से उन्हें खुले मैदान में, मेरठ से लगभग चालीस मील के फासले पर स्थित दिल्ली के ऊपर, धावा करने के लिए चला जाने दिया। वहां 38वीं, 54वीं और 74वीं पैदल सेना की रेजीमेंटों की देशी गैरीसन, और देशी तोपखाने की एक कंपनी भी उनके साथ शामिल हो गई। ब्रिटिश अफसरों पर हमला बोल दिया गया, जितने भी अंगरेजों को विद्रोही पकड़ सके उनकी हत्या कर दी गई, और दिल्ली के पिछले मुगल बादशाह के वारिस को भारत का बादशाह घोषित कर दिया गया। मेरठ की मदद के लिए, जहां पुन: व्यवस्था स्थापित कर ली गई थी, भेजी गई फौजों में से देशी घुड़सवार और पैदल सिपाहियों की छह कंपनियों ने, जो 15 मई को वहां पहुंची थीं, अपने कमांडिंग अफसर मेजर फ्रेजर को मार डाला और फौरन देहात की तरफ चल पड़ीं। उनके पीछे-पीछे घुड़सवार तोपखाने की फौजें और छठे ड्रैगन गाड्र्स की बहुत सी टुकड़ियां उन्हें पकड़ने के उद्देश्य से निकल पड़ीं। पचास या साठ बागियों को गोली मार दी गई, लेकिन बाकी भाग कर दिल्ली पहुंचने में सफल हो गए। पंजाब के फीरोजपुर में 57वीं और 45वीं देशी पैदल रेजीमेंटों ने बंगावत कर दी, लेकिन उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। लाहौर से आने वाले निजी पत्र बताते हैं कि तमाम देशी फौजें खुले तौर से बागी बन गई हैं। 19 मई को कलकत्ता में तैनात सिपाहियों ने सेंट विलियम के किले पर अधिकार करने की असफल कोशिश की थी। बुशायर से बंबई आई तीन रेजीमेंटों को तुरंत कलकत्ता रवाना कर दिया गया।
इन घटनाओं का सिंहावलोकन करते समय मेरठ के ब्रिटिश कमांडर के रवैए के संबंध में हर आदमी को हैरत होती है। लड़ाई के मैदान में उसका देर से आना और ढीले-ढाले ढंग से उसके द्वारा बागियों का पीछा किया जाना उससे भी कम समझ में आता है। दिल्ली जमुना के दाहिने तट पर और मेरठ उसके बाएं तट पर स्थित है। दोनों तटों के बीच दिल्ली में केवल एक पुल है। इसलिए भागते हुए सिपाहियों का रास्ता काट देने से अधिक आसान चीज दूसरी न होती!
इसी दरम्यान, तमाम अप्रभावित जिलों में मार्शल लॉ लगा दिया गया है। मुख्यतया भारतीय फौजी टुकड़ियां उत्तर पूर्व और दक्षिण से दिल्ली की तरफ बढ़ रही हैं। कहा जाता है कि पड़ोसी राजे-रजवाड़ों ने अंगरेजों के पक्ष में होने का एलान कर दिया है। लंका चिट्ठियां भेज दी गई हैं कि लार्ड एलगिन और जनरल एशबर्नहम की सेनाओं को चीन जाने से रोक दिया जाए और, अंत में, पखवाड़े भर के अंदर ही 14 हजार अंगरेज सैनिक इंगलैंड से भारत भेजे जा रहे हैं। भारत के वर्तमान मौसम के कारण और आवाजाही के साधनों की एकदम कमी की वजह से ब्रिटिश फौजों के आगे बढ़ने में चाहे जो रुकावटें सामने आएं, लेकिन बहुत संभव यही है कि दिल्ली के विद्रोही बिना किसी लंबे प्रतिरोध के ही हार जाएंगे। लेकिन, इसके बावजूद, यह उस भयानक दुखांत नाटक की मात्र भूमिका है जो वहां अभी खेला जाएगा।
 (15 जुलाई 1857 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 5056, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)



सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

भारत में ब्रिटिश शासन के भावी परिणाम- कार्ल मार्क्स- 1-


   भारत के संबंध में अपनी टिप्पणियों को इस पत्र में मैं समाप्त कर देना चाहता हूं।
यह कैसा हुआ कि भारत के ऊपर अंगरेजों का आधिपत्य कायम हो गया? महान मुगल की सर्वोच्च सत्ता को मुगल सूबेदारों ने तोड़ दिया था। सूबेदारों की शक्ति को मराठों ने नष्ट कर दिया था। मराठों की ताकत को अफगानों ने खतम किया, और जब सब एक दूसरे से लड़ने में लगे थे, तब अंगरेज घुस आए और उन सबको कुचल कर खुद स्वामी बन बैठे। एक देश जो न सिर्फ मुसलमानों और हिंदुओं में, बल्कि, कबीले-कबीले और वर्ण-वर्ण में भी बंटा हुआ हो; एक समाज जिसका ढांचा उसके तमाम सदस्यों के पारस्परिक विरोधों और वैधानिक अलगावों के ऊपर आधारित होऐसा देश और ऐसा समाज क्या दूसरों द्वारा फतह किए जाने के लिए ही नहीं बनाया गया था? भारत के पिछले इतिहास के बारे में यदि हमें जरा भी जानकारी न हो, तब भी क्या इस जबरदस्त और निर्विवाद तथ्य से हम इनकार कर सकेंगे कि इस क्षण भी भारत को, भारत के ही खर्च पर पलने वाली एक भारतीय फौज अंगरेजों का गुलाम बनाए हुए है? अत:, भारत दूसरों द्वारा जीते जाने के दुर्भाग्य से बच नहीं सकता, और उसका संपूर्ण पिछला इतिहास अगर कुछ भी हो, तो वह उन लगातार जीतों का इतिहास है जिनका शिकार उसे बनना पड़ा है। भारतीय समाज का कोई इतिहास नहीं है, कम से कम ज्ञात इतिहास तो बिलकुल ही नहीं है। जिसे हम उसका इतिहास कहते हैं, वह वास्तव में उन आक्रमणकारियों का इतिहास है जिन्होंने आकर उसके उस समाज के निष्क्रिय आधार पर अपने साम्राज्य कायम किए थे, जो न विरोध करता था, न कभी बदलता था। इसलिए, प्रश्न यह नहीं है कि अंगरेजों को भारत जीतने का अधिकार था या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या अंगरेजों की जगह तुर्कों, ईरानियों, रूसियों द्वारा भारत का फतह किया जाना हमें ज्यादा पसंद होता।
भारत में इंगलैंड को दोहरा काम करना है : एक ध्वंसात्मक, दूसरा पुनर्रचनात्मक पुराने एशियाई समाज को नष्ट करने का काम और एशिया में पश्चिमी समाज के लिए भौतिक आधार तैयार करने का काम।
अरब, तुर्क, तातार, मुगल, जिन्होंने एक के बाद दूसरे भारत पर चढाई की थी, जल्दी ही खुद हिंदुस्तानी बन गए थे : इतिहास के एक शाश्वत नियम के अनुसार बर्बर विजेता अपनी प्रजा की श्रेष्ठतर सभ्यता द्वारा स्वयं जीत लिए गए थे। अंगरेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता श्रेष्ठतर थी, और, इसलिए, हिंदुस्तानी सभ्यता उन्हें अपने अंदर न समेट सकी। देशी बस्तियों को उजाड़ कर, देशी उद्योग-धंधों को तबाह कर और देशी समाज के अंदर जो कुछ भी महान और उदात्त था उस सबको धूल-धूसरित करके उन्होंने भारतीय सभ्यता को नष्ट कर दिया। भारत में उनके शासन के इतिहास के पन्नों में इस विनाश की कहानी के अतिरिक्त और लगभग कुछ नहीं है। विध्वंस के खंडहरों में पुनर्रचना के कार्य का मुश्किल से ही कोई चिह्न दिखलाई देता है। फिर भी यह कार्य शुरू हो गया है।
पुनर्रचना की पहली शर्त यह थी कि भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हो और वह महान मुगलों के शासन में स्थापित एकता से अधिक मजबूत और अधिक व्यापक हो। इस एकता को ब्रिटिश तलवार ने स्थापित कर दिया है और अब बिजली का तार उसे और मजबूत बनाएगा और स्थायित्व प्रदान करेगा। भारत अपनी मुक्ति प्राप्त कर सके और हर विदेशी आक्रमणकारी का शिकार होने से वह बच सके, इसके लिए आवश्यक था कि उसकी अपनी एक देशी सेना हो : अंगरेज ड्रिल-सार्जेंट ने ऐसी ही एक सेना संगठित और शिक्षित करके तैयार कर दी है। (एशियाई समाज में पहली बार स्वतंत्र अखबार कायम हो गए हैं।) इन्हें मुख्यतया भारतीयों और यूरोपियनों की मिली-जुली संतानें चलाती है और वे पुनर्निर्माण के एक नए और शाक्तिशाली साधन के रूप में काम कर रहे हैं। जमींदारी और रैयतवारी प्रथाओं के रूप मेंयद्यपि ये अत्यंत घृणित प्रथाएं हैंभूमि पर निजी स्वामित्व के दो अलग रूप कायम हो गए हैं; इससे एशियाई समाज में जिस चीज की (भूमि पर निजी स्वामित्व की प्रथा कीअनु.) अत्यधिक आवश्यकता थी, उसकी स्थापना हो गई है। भारतीयों के अंदर से, जिन्हें अंगरेजों की देख-देख में कलकत्ते में अनिच्छापूर्वक और कम से कम संख्या में शिक्षित किया जा रहा है, और नया वर्ग पैदा हो रहा है जिसे सरकार चलाने के लिए आवश्यक ज्ञान और यूरोपीय विज्ञान की जानकारी प्राप्त हो गई है। भाप ने यूरोप के साथ भारत का नियमित और तेज संबंध कायम कर दिया है, उसने उसके मुख्य बंदरगाहों को पूरे दक्षिण-पूर्वी महासागर के बंदरगाहों से जोड़ दिया है, और उसकी उस अलगाव की स्थिति को खतम कर दिया है जो उसकी प्रगति न करने का मुख्य कारण थी। वह दिन बहुत दूर नहीं है जब रेलगाड़ियों और भाप से चलने वाले समुद्री जहाज इंगलैंड और भारत के बीच के फासले को, समय के माप के अनुसार, केवल आठ दिन का कर देंगे और वह वैभवशाली देश पश्चिमी संसार का सचमुच एक हिस्सा बना जाएगा।
ग्रेट ब्रिटेन के शासक वर्गों की भारत की प्रगति में अभी तक केवल आकस्मिक, क्षणिक और अपवाद रूप में ही दिलचस्पी रही है। अभिजात वर्ग उसे फतह करना चाहता था, थैलीशाहों का वर्ग उसे लूटना चाहता था, और मिलशाहों का वर्ग सस्ते दामों पर अपना माल बेच कर उसे बर्बाद करना चाहता था। लेकिन अब स्थिति एकदम उलटी हो गई है। मिलशाहों के वर्ग को पता लग गया है कि भारत को एक उत्पादन करने वाले देश में बदलना उनके अपने हित के लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है, और यह कि, इस काम के लिए, सबसे पहले इस बात की आवश्यकता है कि वहां पर सिंचाई के साधनों और आवाजाही के अंदरूनी साधनों की व्यवस्था की जाए। अब वे भारत में रेलों का जाल बिछा देना चाहते हैं। और वे बिछा देंगे। इसका परिणाम क्या होगा, इसका उन्हें कोई अनुमान नहीं है।
यह तो कुख्यात है कि विभिन्न प्रकार की उपजों को लाने-ले जाने और उसकी अदला-बदली करने के साधनों के नितांत अभाव ने भारत की उत्पादक शक्ति को पंगु बना रखा है। अदला-बदली के साधनों के अभाव के कारण, प्राकृतिक प्रचुरता के मध्य ऐसी सामाजिक दरिद्रता हमें भारत से अधिक कहीं और दिखलाई नहीं देती। ब्रिटिश कॉमन्स सभा की एक समिति के सामने, जो 1848 में नियुक्त की गई थी, यह साबित हो गया था कि :
खानदेश में जिस समय अनाज 6 शिलिंग से लेकर 8 शिलिंग फी क्वार्टर के भाव से बिक रहा था, उसी समय पूना में उसका भाव 64 शिलिंग से 70 शिलिंग तक का था, जहां पर अकाल के मारे लोग सड़कों पर दम तोड़ रहे थे, पर खानदेश से अनाज ले आना संभव नहीं था क्योंकि कच्ची सड़कें एकदम बेकार थीं।
रेलों के जारी होने से खेती के कामों में भी आसानी से मदद मिल सकेगी, क्योंकि जहां कहीं बांध बनाने के लिए मिट्टी की जरूरत होगी वहां तालाब बन सकेंगे, और पानी को रेलवे लाइन के सहारे विभिन्न दिशाओं में ले जाया जा सकेगा। इस प्रकार सिंचाई का, जो पूर्व में खेती की बुनियादी शर्त है, बहुत विस्तार होगा और पानी की कमी के कारण बार-बार पड़ने वाले स्थानीय अकालों से निजात मिल सकेगी। इस दृष्टि से देखने पर रेलों का आम महत्व उस समय और भी स्पष्ट हो जाएगा जब हम इस बात को याद करेंगे कि सिंचाई वाली जमीनें, घाट के नजदीक वाले जिलों में भी, बिना सिंचाई वाली जमीनों की तुलना में उतने ही रकबे के ऊपर तीन-गुना अधिक टैक्स देती हैं, दस या बारह गुना अधिक लोगों को काम देती हैं और उनसे बारह या पंद्रह गुना अधिक मुनाफा होता है।
रेलों के बनने से फौजी छावनियों की संख्या और उनके खर्चे में कमी करना भी संभव हो जाएगा। फोर्ट सेंट विलियम के टाउन मेजर, कर्नल वारेन ने कॉमन्स सभा की एक प्रवर समिति के सामने कहा था :
यह संभावना कि जितने दिनों में, यहां तक कि हफ्तों में, देश के दूर-दूर के भागों से आजकल जो सूचनाएं आ पाती हैं, वे आगे से उतने ही में वहां से प्राप्त हो जाया करेंगी और इतने ही संक्षिप्त समय में फौजों और सामान के साथ वहां हिदायतें भेजी जा सकेंगी, यह ऐसी संभावना है जिसका महत्व कभी भी बहुत बढ़ाकर नहीं आंका जा सकता। फौजों को तब और दूर-दूर की, और आज की अपेक्षा अधिक स्वास्थ्यप्रद, छावनियों में रखा जा सकेगा और बीमारी के कारण जो बहुत सी जानें जाती हैं, उन्हें इस तरह बचा लिया जा सकेगा। तब विभिन्न गोदामों में इतना अधिक सामान रखने की भी जरूरत नहीं होगी और सड़ने-गलने और जलवायु के कारण नष्ट हो जाने से होने वाले नुकसान से भी बचा जा सकेगा। फौजों की कार्य-क्षमता के प्रत्यक्ष अनुपात में उनकी संख्या में भी कमी की जा सकेगी। (क्रमशः)

सोमवार, 13 सितंबर 2010

1857 के भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर विशेष- भारत में विद्रोह - फ्रेडरिक एंगेल्स

                  (मार्क्सवाद के प्रतिष्ठाता फ्रेडरिक एंगेल्स)
     गर्मी और वर्षा के गर्म महीनों में भारत का अभियान लगभग पूर्ण रूप में स्थगित कर दिया गया है। सर कॉलिन कैंपबेल ने एक शाक्तिशाली प्रयास के द्वारा अवध और रुहेलखंड के तमाम महत्वपूर्ण स्थानों पर गर्मी के प्रारंभ में ही अधिकार कर लिया था। उसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को छावनी में रख दिया है और बाकी देश को खुले तौर पर बागियों के कब्जे में छोड़ दिया है। और अपनी कोशिशों को वे संचार के अपने साधनों को बनाए रखने तक ही सीमित रख रहे हैं। इस काल में महत्व की जो एकमात्र घटना अवध में हुई है, वह है मान सिंह की सहायता के लिए सर होप ग्रैंट का शाहगंज के लिए अभियान। मान सिंह एक ऐसा देशी राजा है जिसने काफी हीले-हवाले के बाद कुछ ही समय पहले अंगरेजों के साथ समझौता कर लिया था और अब उसके पुराने देशी मित्रों ने उसे घेर लिया था। यह अभियान केवल एक सैनिक सैर के समान सिध्द हुआ-यद्यपि लू और हैजे की वजह से अंगरेजों का उसमें भारी नुकसान हुआ होगा। देशी लोग बिना मुकाबला किए ही तितर-बितर हो गए और मान सिंह अंगरेजों से जा मिला। इतनी सरलता से प्राप्त हुई इस सफलता से यद्यपि यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा अवध इसी प्रकार आसानी से अंगरेजों के सामने नत-मस्तक हो जाएगा, लेकिन इससे यह तो मालूम ही हो जाता है कि बागियों की हिम्मत एकदम टूट गई है। अंगरेजों के हित में यदि यह था कि गर्मी के मौसम में आराम करें, तो विल्पकारियों के हित में यह था कि वे उन्हें अधिक से अधिक परेशान करें। लेकिन इसके बजाए कि वे सक्रिय रूप से छापामार युध्द का संगठन करें, दुश्मन ने जिन शहरों पर अधिकार कर रखा है उनके बीच के उसके संचार-साधनों को छिन्न-विच्छिन्न करें, उसकी छोटी-छोटी टुकड़ियों को घात लगाकर रास्ते में ही साफ कर दें, दाना-पानी की खोज करने वाले उसके दलों को हलकान कर दें, रसद की सप्लाई के काम को नामुमकिन बना दें, अर्थात उन सब चीजों का आना-जाना एकदम रोक दें जिनके बिना अंगरेजों के कब्जे का कोई भी बड़ा शहर जिंदा नहीं रह सकता हैइन सब चीजों को करने के बजाए, देशी लोग लगान वसूल करने और उसके दुश्मनों ने जो थोडी सी मोहलत उन्हें दे दी है, उसका उपभोग करने में ही वे प्रसन्न हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि, मालूम होता है कि, वे आपस में लड़ भी गए हैं। न ही ऐसा मालूम होता है कि इन चंद शांतिपूर्ण हफ्तों का उपयोग उन्होंने अपनी शक्तियों को पुनर्संगठित करने, गोला-बारूद के अपने भंडारों को फिर से भरने, अथवा नष्ट हो गई तोपों की जगह दूसरी तोपें इकट्ठा करने के ही काम में किया है। शाहगंज की उनकी भगदड़ प्रकट करती है कि पहले की किसी भी पराजय की अपेक्षा अब उनका विश्वास अपने में और अपने नेताओं में और भी कम हो गया है। इसी बीच अधिकांश राजे-रजवाड़ों और ब्रिटिश सरकार के बीच गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा है। ब्रिटिश सरकार ने, आखिरकार, देख लिया है कि अवध की पूरी सरजमीन को हड़प जाना उनके लिए एक अव्यावहारिक सा काम है और इसलिए इस बात के लिए वह अच्छी तरह राजी हो गई है कि उचित शर्तों पर उसे फिर उसके पुराने स्वामियों को लौटा दी जाए। इस भांति, अंगरेजों को अंतिम विजय के संबंध में अब कोई संदेह नहीं रह गया है और इसलिए लगता है कि अवध का विद्रोह सक्रिय छापामार युध्द के दौर से गुजरे बिना ही खतम हो जाएगा। अधिकांश जमींदार-ताल्लुकेदार अंगरेजों के साथ ज्योंही समझौता कर लेंगे, त्योंही विप्लवकारियों के दल छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और जिन लोगों को सरकार का बहुत ज्यादा डर है वे डाकू बन जाएंगे और उन्हें पकड़वाने में फिर किसान भी सरकार को खुशी-खुशी मदद देंगे।
अवध के दक्षिण-पश्चिम में जगदीशपुर के जंगल इस तरह के डकैतों के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थल मालूम पड़ते हैं। बांसों और झाड़ियों के इन अभेद्य जंगलों पर अमर सिंह के नेतृत्व में विप्लवकारियों के एक दल का कब्जा है। अमर सिंह को छापामार युध्द का अधिक ज्ञान है, ऐसा मालूम होता है और वह क्रियाशील भी अधिक है। जो कुछ भी हो, चुपचाप इंतजार करने के बजाए जब भी मौका मिलता है वह अंगरेजों के ऊपर हमला बोल देता है। उस सुदृढ़ अड्डे से भगाए जाने से पहले ही उसके पास जाकर अवध के विद्रोहियों का एक भाग भी अगर मिल गयाजैसी कि आशंका हैतो अंगरेजों के लिए मुसीबत हो जाएगी और उनका काम बहुत बढ़ जाएगा। लगभग 8 महीनों से ये जंगल विप्लवकारी दलों के लिए छिपने और विश्राम करने के स्थल बने हुए हैं। इन दलों ने कलकत्ता और इलाहाबाद के बीच की सड़क, ग्रैंड टं्रक रोड को, जो अंगरेजों का मुख्य संचार मार्ग है, अत्यंत असुरक्षित बना दिया है।
पश्चिमी भारत में जनरल रौबट्र्स और कर्नल होम्स अब भी ग्वालियर के विद्रोहियों का पीछा कर रहे हैं। ग्वालियर पर जिस समय कब्जा किया गया, उस समय यह प्रश्न बहुत महत्व का था कि पीछे हटती हुई सेना कौन सी दिशा अपनाएगी; क्योंकि मराठों का पूरा देश और राजपूताने का एक भाग मानो विद्रोह के लिए तैयार बैठा थाइंतजार बस वह इस बात का कर रहा था कि नियमित सैनिकों की एक मजबूत सेना पहुंच जाए जिससे कि विद्रोह का एक अच्छा केंद्र वहां कायम हो जाए। उस वक्त लगता था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से सबसे अधिक संभावना इसी बात की दिखलाई देती थी कि ग्वालियर की फौजें पैंतरा बदलकर होशियारी से दक्षिण-पश्चिमी दिशा की ओर निकल जाएंगी। लेकिन विप्लवकारियों ने पीछे हटने के लिए उत्तर-पश्चिमी दिशा को चुना है। ऐसा उन्होंने किन कारणों से किया है, इसका उन रिपोर्टों से हम अनुमान नहीं लगा सकते जो हमारे सामने हैं। वे जयपुर गए, वहां से दक्षिण उदयपुर की तरफ घूम गए और मराठों के प्रदेश में पहुंचने वाले मार्ग पर आगे बढ़ने की कोशिश करने लगे। लेकिन इस चक्करदार रास्ते की वजह से रौबट्र्स को यह मौका मिल गया कि वह उनको जा पकड़े। रौबट्र्स उनके पास पहुंच गया और बिना किसी बड़े प्रयास के ही, उसने उन्हें पूरे तौर से हरा दिया। इस सेना के जो अवशेष बचे हैं, उनके पास न तोपें हैं, न संगठन और न गोला-बारूद हैं, न कोई नामी नेता है। नए विद्रोह खड़े कर सकेंऐसे ये लोग नहीं हैं। इसके विपरीत मालूम होता है कि लूट-खसोट में प्राप्त चीजों की जो विशाल मात्रा वे अपने साथ ले जा रहे हैं और जिसकी वजह से उनकी तमाम गतिविधि में बाधा पड़ रही है, उसने किसानों की लोलुपता को जगा दिया है। अलग-थलग घूमते-भटकते हर सिपाही को मार दिया जाता है और सोने की मोहरों के भार से उसे मुक्त कर दिया जाता है। स्थिति अगर यही रही, तो इन सिपाहियों को अंतिम रूप से ठिकाने लगाने के काम को जनरल रौबट्र्स बड़े मजे में अब देहाती जनता के जिम्मे छोड़ दे सकता है। सिंधिया के खजाने को उसके सिपाहियों ने लूट लिया है; इससे अंगरेजों के लिए
हिंदुस्तान से भी अधिक खतरनाक एक दूसरे क्षेत्र में विद्रोह के फिर से शुरू हो जाने का खतरा मिट गया है। यह क्षेत्र अंगरेजों के लिए बहुत खतरनाक था, क्योंकि मराठों के प्रदेश में विद्रोह शुरू हो जाने पर बंबई की फौज के लिए बड़ी ही कठोर परीक्षा का समय आ जाता।
ग्वालियर के पड़ोस में एक नई बंगावत उठ खड़ी हुई है। एक छोटा सरदारमान सिंह (अवध का मान सिंह नहीं), जो सिंधिया के अधीन था, विप्लवकारियों के साथ जा मिला है और पौड़ी के छोटे किले पर उसने कब्जा कर लिया है। लेकिन उस जगह को अंगरेजों ने घेर लिया है और जल्द ही उस पर कब्जा हो जाना चाहिए।
इस बीच, जीते गए इलाके धीरे-धीरे शांत होते जा रहे हैं। कहा जाता है कि दिल्ली के पास-पड़ोस के इलाके में सर जे. लॉरेंस ने ऐसी पूर्ण शांति कायम कर दी है कि कोई भी यूरोपियन अब वहां बिना हथियार के और बिना अंगरक्षकों को लिए पूर्ण सुरक्षा के साथ इधर-उधर आ-जा सकता है। इसका रहस्य यह है कि किसी गांव के क्षेत्र में होने वाले हर जुर्म अथवा बलवे के लिए उस गांव की जनता को अंगरेजों ने सामूहिक रूप से जिम्मेदार बना दिया है; उन्होंने एक फौजी पुलिस संगठित कर दी है; और इस सबसे भी अधिक हर जगह कोर्ट मॉर्शल द्वारा आनन-फानन में सजा देने की व्यवस्था कायम होर् गई। पूर्व के लोगों पर कोर्ट मॉर्शल की व्यवस्था का कुछ खास ही रौब पड़ता है। फिर भी यह सफलता एक अपवाद जैसी मालूम होती है, क्योंकि दूसरे क्षेत्रों से तरह की कोई चीज हमें सुनाई नहीं देती। रुहेलखंड और अवध को, बुंदेलखंड और दूसरे अनेक बड़े प्रांतों को पूर्णतया शांत करने के काम के लिए अब भी बहुत लंबे समय की जरूरत होगी और उसके सिलसिले में अंगरेजी सैनिकों और कोर्ट मॉर्शलों को अब भी बहुत काम करना पड़ेगा।
लेकिन जहां हिंदुस्तान के विद्रोह का विस्तार इतना छोटा हो गया है कि अब उसमें फौजी दिलचस्पी की कोई चीज नहीं रह गई है, वहीं वहां से काफी दूरअफगानिस्तान के अंतिम सीमांतों परएक ऐसी घटना हो गई है जिसमें आगे चलकर भारी कठिनाइयां उत्पन्न होने की आशंका छिपी हुई है। डेरा इस्माइल खान में स्थित कई सिख रेजीमेंटों में अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह करने और अपने अफसरों की हत्या कर देने के एक षडयंत्र का पता लगा है। इस षडयंत्र की जड़ें कितनी दूर तक फैली हुई हैं, यह हम नहीं बता सकते। संभव है कि वह केवल एक स्थानीय चीज हो जिसका सिखों के एक खास वर्ग से सबंध हो। लेकिन इस बात को हम साधिकार नहीं कह सकते। कुछ भी हो, यह बहुत ही खतरनाक लक्षण है। ब्रिटिश सेना में इस समय लगभग 1,00,000 सिख हैं, और यह तो हम सुन ही चुके हैं कि वे कितने उद्दंड हैं। वे कहते हैं कि आज वे अंगरेजों की तरफ से लड़ते हैं, पर अगर भगवान की ऐसी ही मर्जी हुई तो कल उनके खिलाफ भी लड़ सकते हैं! वे बहादुर होते हैं, जोशीले होते हैं, अस्थिर होते हैं और दूसरे पूर्वी लोगों से भी अधिक आकस्मिक और अन-अपेक्षित आवेगों के शिकार हो जाते हैं। यदि सचमुच उनके अंदर बंगावत शुरू हो जाए, तब फिर अंगरेजों के लिए अपने को बचाए रखने का काम कठिन हो जाएगा। भारत के निवासियों में सिख हमेशा अंगरेजों के सबसे कट्टर विरोधी रहे हैं; अपेक्षाकृत एक काफी शक्तिशाली साम्राज्य की उन्होंने स्थापना कर ली है; वे ब्राह्मणों के एक खास संप्रदाय के हैं और हिंदुओं और मुसलमानों दोनों से नफरत करते हैं। ब्रिटिश 'राज' को वे अधिकतम खतरे के समय देख चुके हैं, उसकी पुनर्स्थापना के कार्य में उन्होंने बहुत योग दिया है, और उन्हें तो इस बात का भी पूरा विश्वास है कि उनका योग ही वह निर्णायक चीज थी जिसने ब्रिटिश राज्य को बचा लिया है। तब फिर इससे अधिक स्वाभाविक और क्या हो सकता है यदि वे यह सोचें कि ब्रिटिश राज्य की जगह अब सिख राज्य की स्थापना कर दी जानी चाहिए, दिल्ली या कलकत्ते की गद्दी पर भारत का शासन करने के लिए किसी सिख सम्राट का अभिषेक कर दिया जाना चाहिए? संभव है कि यह विचार अभी तक सिखों के अंदर बहुत परिपक्व न हुआ हो, यह भी संभव है कि उन्हें होशियारी से इस तरह अलग-अलग वितरित कर दिया जाए कि हर जगह उनका मुकाबला करने के लिए काफी यूरोपियन मौजूद रहें जिससे कि कहीं भी विद्रोह होने पर उन्हें आसानी से दबा दिया जा सके। लेकिन यह विचार अब उनके अंदर आ गया है, यह चीज, हमारे, खयाल के मुताबिक, हर उस व्यक्ति को स्पष्ट होगी जिसने पढ़ा है कि दिल्ली और लखनऊ के बाद से सिखों के क्या रंग-ढंग हैं।
लेकिन, फिलहाल, भारत को अंगरेजों ने फिर जीत लिया है। वह महान विद्रोह जिसकी चिनगारी बंगाल की सेना की बंगावत से उठी थी, लगता है, सचमुच ही खतम हो रहा है। लेकिन इस दोबारा विजय से इंगलैंड भारतीय जनता के मन पर अपना प्रभाव नहीं बैठा सका है। देशियों द्वारा किए जाने वाले अनाचारों-अत्याचारों की बढ़ी-चढ़ी और झूठी रिपोर्टों से क्रुध्द होकर अंगरेजी फौजों ने बदले की कार्रवाई के तहत जो बर्बर और जघन्य कार्य किए हैं, उनकी क्रूरता ने और अवध के राज्य को पूरे तौर से और टुकड़े-टुकड़े करके, दोनों तरफ से, हड़प लेने की उनकी कोशिशों ने विजेताओं के लिए कोई खास प्रेम की भावना नहीं पैदा की है। इसके विपरीत, अंगरेज स्वयं स्वीकार करते हैं कि हिंदुओं और मुमलमानों दोनों के अंदर ईसाई आक्रमणकारी के विरुध्द पुश्तैनी घृणा की भावना आज हमेशा से ही अधिक तीव्र है। यह घृणा इस समय भले ही दुर्बल हो, लेकिन जब तक सिखों के पंजाब के सिर पर भयानक बादल मंडरा रहा है, तब तक उसे महत्वहीन और निरर्थक नहीं कहा जा सकता। बात इतनी ही नहीं है। दोनों महान एशियाई ताकतेंइंगलैंड और रूसइस समय साइबेरिया और भारत के बीच एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गई हैं जहां रूसियों और अंगरेजों के स्वार्थों में सीधी टक्कर होना अनिवार्य है। वह बिंदु पीकिंग है। वहां से पश्चिम की और पूरे एशियाई महाद्वीप पर, एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक ऐसी रेखा जल्द ही खींच दी जाएगी जिस पर इन दो विरोधी स्वार्थों के बीच निरंतर संघर्ष होता रहेगा। इस प्रकार, वास्तव में संभव है कि वह समय बहुत दूर न हो जब व्यास नदी के मैदानों में अगेरजी फौज और कज्जाक का मुकाबला हो जाए। और अगर यह मुकाबला होना है, तो 1,50,000 देशी भारतीयों की उत्कट ब्रिटिश-विरोधी भावनाएं गंभीर चिंता का विषय बन जाएंगी।
(फ्रे. एंगेल्स द्वारा 17 सितंबर 1858  लिखा गया। 1 अक्टूबर 1858 के न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून, अंक 1443, में एक संपादकीय लेख के रूप में प्रकाशित हुआ।)




विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...