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बाबरी मसजिद विवाद- जस्टिस एस.यू.खान की राय

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बाबरी मसजिद विवाद पर अदालत का इलाहाबाद उच्चन्यायालय की लखनऊ पीठ की तीन जजों की बैंच ने जो फैसला दिया है उसने अनेक नए विवाद खड़े कर दिए हैं। सामन्य तौर पर इन विवादों में क्या नया है और क्या पुराना है,इस पर थोड़ा ठहर कर विचार करेंगे,पहले हम जस्टिस एस.यू.खान के फैसले की मूल बातों पर गौर करें-    GIST OF THE FINDINGS by S.U.Khan J. 1. The disputed structure was constructed as mosque by or under orders of Babar. 2. It is not proved by direct evidence that premises in dispute including constructed portionbelonged to Babar or the person who constructed the mosque or under whose orders it was constructed. 3. No temple was demolished for constructing the mosque. 4. Mosque was constructed over the ruins of temples which were lying in utter ruins since a very long time before the construction of mosque and some material thereof was used in construction of the mosque. 5. That for a very long time till the construction of the mosque it was treated/believed by Hindus that some where in a very large …

बाबरी मसजिद प्रकरण- लखनऊ का सांस्कृतिक समझौता फार्मूला

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आज जब इलाहाबाद उच्चन्यालय की लखनऊ पीठ ने बाबरी मसजिद परफैसला सुनाया तो आरंभ में टीवी चैनलों पर भगदड़ मची हुई थी,भयानक भ्रम की स्थिति थी। समझ में नहीं आ रहा था आखिरकार क्या फैसला हुआ ? लेकिन धीरे-धीरे धुंध झटने लगा। बाद में पता चला कि उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बुनियादी तौर पर विवाद में शामिल पक्षों को सांस्कृतिक समझौते का रास्ता दिखाया है। इस फैसले की कानूनी पेचीदगियों को तो वकील अपने हिसाब से देखेंगे। लेकिन एक नागरिक के लिए यह फैसला चैन की सांस लेने का मौका देता है।      लखनऊ पीठ के फैसले की धुरी है भारत की सामयिक सांस्कृतिक-राजनीतिक विविधता और भाईचारा। बाबरी मसजिद का विवाद राजनीतिक-साम्प्रदायिक विवाद है। यह मंदिर-मसजिद का विवाद नहीं है बल्कि एक तरह से विचारधारात्मक विवाद भी है औऱ विचारधारात्मक विवादों पर बुर्जुआ अदालतों में फैसले अन्तर्विरोधी होते हैं।     राम के जन्म को लेकर जिस चीज को आधार बनाया गया है वह कानूनी आधार नहीं है ,वह सांस्कृतिक-राजनीतिक समझौते का आधार है। अदालत के फैसले से राम पैदा नहीं हो सकते और न भगवान के जन्म को तय किया जा सकता है। भगवान अजन्मा है। यह विवाद का विष…

बाबरी मसजिद प्रकरण- कारपोरेट मीडिया के कलंकित कवरेज के सबक -2-

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टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के अध्ययन से अंग्रेजी दैनिकों के बारे में यह बात उभरती है कि ‘राजधानी के अंग्रेजी दैनिक सांप्रदायिकता भड़काने वालों में नहीं थे, वे सांप्रदायिकता भड़काने वालों को शह देनेवालों में थे। उनके लिए तर्क, सिद्धांत और व्याख्याएं जुटा रहे थे।’रिपोर्ट में यह बात रेखांकित हो गई है कि किस व्यक्ति के वक्तव्य को किस सीमा तक छापा जाए, इसका निर्णय हमें करना होगा। अराजक ढंग से बयान नहीं छापे जा सकते। किसी भी ट्रेन में या बस अड्डे पर कोई आदमी किसी मंत्री, प्रधानमंत्री को गाली देता हुआ मिल जाएगा तो क्या उसे छाप दिया जाए? यही हाल संपादक के नाम आनेवाले पत्रों का है। क्या पत्रों की भाषा और तेवर की कोई जिम्मेदारी अखबार पर नहीं है ? कोई अखबार ऐसे पत्रों को किस सीमा तक छूट देगा, यह तो उसे तय करना ही पड़ेगा। यह भी सवाल उठाया जा सकता है कि पाठक को विचार-अभिव्यक्ति की छूट देने की आड़ में कहीं अखबार खुद अपना मकसद तो हल नहीं कर रहा है? मसलन, स्टेट्समैन में 4 नवंबर 1990 को एक पत्र छपा है जिसमें इस्लाम को असहिष्णु धर्म और हिंदुओं को सहनशील बताया गया। इसी पत्र में कहा गया कि राम मं…

बाबरी मसजिद प्रकरण- कारपोरेट मीडिया के कलंकित कवरेज के सबक -1-

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आज इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बैंच बाबरी मसजिद विवाद पर साठ साल बाद फैसला करने जा रही है। जब से यह मुकदमा चल रहा है तब से बाबरी मसजिद प्रकरण में बहुत कुछ अनचाही चीजें घट चुकी हैं। उसमें सबसे बुरी तीन बातें हुई हैं। पहला, अनेक साम्प्रदायिक दंगे हुए जिनमें अनेक निर्दोष लोगों की जान गई। दूसरा बाबरी मसजिद को संघ परिवार ने गिरा दिया। तीसरा, कारपोरेट मीडिया ने सबसे घिनौनी भूमिका अदा की, साम्प्रदायिक कवरेज दिया और सारे वातावरण को विषाक्त बनाया। आज जब फैसला सुनाया जाएगा तो सारे देश की आंखें लखनऊ की ओर लगी हुई हैं। सारे देश में कारपोरेट मीडिया ने भय का वातावरण बना दिया है। जबकि ऐसा अभी तक कुछ भी नहीं घटा है जिसे लेकर चिंतित हुआ जाए। विवादित मसले पर विभिन्न पक्षों ने सिर्फ अपनी राय का इजहार किया है लेकिन मीडिया कवरेज ने अचानक सारे देश में भय और सामाजिक असुरक्षा का वातावरण बना दिया है। हमें इस पर विचार करना चाहिए कि कारपोरेट मीडिया ने यह भय का वातावरण क्यों बनाया है ? दूसरी समस्या यह है कि बाबरी मसजिद प्रकरण संपत्ति विवाद नहीं है। प्रॉपर्टी विवाद नहीं हैं,धार्मिक विवाद नहीं है। यह हिन्दू साम्प्रदा…

सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम कार्ल मार्क्स के नजरिए से देखें- भारतीय विद्रोह की स्थिति

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भारत से आने वाली पिछली डाक के साथ-साथ जो भारी-भरकम रिपोर्ट लंदन पहुंची थी, उससे दिल्ली पर कब्जा किए जाने की अफवाह इतनी तेजी से फैल गई थी और उसने इतनी अधिक मान्यता प्राप्त कर ली थी कि सट्टा बाजार के कारोबार पर भी उसका असर पड़ा था। इस खबरों की हलकी-फुलकी सूचना तारों के जरिए पहले ही प्राप्त हो चुकी थी। सेवास्तोपोल पर कब्जा करने के झांसे का, छोटे पैमाने पर, यह दूसरा संस्करण था! अगर मद्रास से आने वाले उन अखबारों की, जिनमें अनुकूल खबर आई बताई गई थी, तारीखों और उनके मजमूनों की जरा भी जांच कर ली जाती, तो यह भ्रम दूर हो जाता। कहा जाता है कि मद्रास संबंधी सूचना आगरा से 17 जून को भेजे गए निजी पत्रों के ऊपर आधारित है, लेकिन 17 जून को ही लाहौर से जारी की गई एक आधिकारिक विज्ञप्ति बताती है कि 16 तारीख के तीसरे पहर के चार बजे तक दिल्ली के आसपास सब कुछ शांत था। और 1 जुलाई की तारीख को बंबई टाइम्स लिखता है कि 'कई हमलों को रोक देने के बाद, 17 तारीख की सुबह को जनरल बरनार्ड सहायता के लिए आने वाले और सैनिकों का इंतजार कर रहे थे।' मद्रास से आई सूचना की तारीख के बारे में इतना ही काफी है। जहां तक इस सू…

हिन्दूधर्म के भ्रष्टीकरण का चरमोत्कर्ष है संघ परिवार का प्रौपेगैण्डा

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मौजूदा दौर सांप्रदायिक ताकतों के आक्रामक रवैय्ये का दौर है। इस दौर को विराट पैमाने पर माध्यमों की क्षमता ने संभव बनाया है। सांप्रदायिक ताकतों, विशेषकर हिंदुत्ववादी (आरएसएस संप्रदाय) संगठनों की सांप्रदायिक विचारधारा को व्यापक पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित करने में परंपरागत और इलैक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों की प्रभावी भूमिका रही है। हिंदुस्तानी ताकतों ने किस तरह की माध्यम रणनीति आख्तियार की, उसका परिप्रेक्ष्य और विचारधारात्मक पक्ष क्या रहा है? इसका समग्रता में मूल्यांकन किया जाना चाहिए। हिंदुत्ववादी माध्यम रणनीति पर विचार करते समय पहला प्रश्न यह उठता है कि अयोध्या, मथुरा, वाराणसी का ही चयन क्यों किया गया? इनमें से अयोध्या को ही सांप्रदायिक आंदोलन का केंद्र क्यों चुना गया? क्या यह चयन किसी वैचारिक योजना का अंग है? मेरा मानना है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। इसका प्रेरक तत्व हिटलर की रणनीति से लिया गया है। हिटलर ने मीन कॉम्फ में लिखा था कि किसी आंदोलन के लिए स्थान विशेष की भौगोलिक, राजनीतिक महत्ता का महत्वपूर्ण स्थान होता है। स्थान विशेष के कारण ही मक्का या रोम का म…