बुधवार, 1 सितंबर 2010

युवाओं की तबाही का महाख्यान -गिरीश मिश्रा


विगत 12 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र ने द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष की शुरुआत की । उसी दिन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी 86 पृष्ठों की रिपोर्ट 'ग्लोबल एंप्लायमेंट ट्रेंड्स फॉर यूथ' जारी की जिसमें रेखांकित किया कि आर्थिक अस्थिरता के वर्तमान संदर्भ में देखें तो युवक युवतियां सबसे अधिक अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।
ये युवक युवतियां, मोटे तौर पर वे हैं जो 15 वर्ष से 24 वर्ष की आयु की हैं यानी ऊर्जा और ओज से भरपूर। वे जब दक्षता और कौशल प्राप्त कर वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में भरपूर योगदान करने के लिए आर्थिक दुनिया में दाखिल होती हैं तब उनका मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाते हुए सम्मानजनक जीवनयापन के लिए समुचित आय प्राप्त करना होता है।
जब उन्हें कहा जाता है कि उनकी कार्य क्षमता के अनुकूल रोजगार के अवसर नहीं हैं तब उन्हें भारी निराशा होती है। वे न सिर्फ अपने परिवार और समाज बल्कि खुद आपनी नजरों में हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। लगता है कि सारी पढाई लिखाई सारा शिक्षण-प्रशिक्षण निरर्थक गया। अपने परिवार और सगे संबंधियों के ऊपर भार बनना उनको कतई पसंद नहीं होता यही कारण है कि अनेक युवा मनोरोग ग्रस्त हो जाते हैं। कुछ खुदकुशी पर उतर आते हैं। कई अपराध की दुनिया में दाखिल हो जाते हैं, तो कई आंतकवादी बन जाते हैं। कहना न होगा कि जो विशुध्द अपराध  और आंतकवाद की दुनिया में चले जाते हैं, उनका नागरिक समाज में लौट पाना असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन जरुर हो जाता है।
     अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट की विस्तार से चर्चा करने के पूर्व दो तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है। पहला बेरोगजगारी को जिन रूपों और आयामों में देख रहे हैं, वे आधुनिक औद्योगिक पूंजीवाद के उदय के साथ आए हैं। दूसरा अठारहवीं सदी के दौरान ही श्रम को माल बना यानी खरीद-फरोख्त की वस्तु में परिवर्तित कर बाजार में ला पटका गया। यह सवाल आज भी उत्तर की तलाश में है कि श्रम को माल बनाना कैसे जायज है जब कि वह मनुष्य के शरीर के साथ अभिन्न रूप से जुडा होता है और उसकी मृत्यु के बाद श्रम का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। श्रम का उत्पादन अन्य वस्तुओं की तरह बिक्री के लिए नहीं होता और न ही उसको श्रमिक से अलग कर संजोया जा सकता है।
 कार्ल पोलान्यी का मानना है कि श्रम को बाजार तंत्र के हवाले करने का मतलब है समाज के विनाश का मार्ग प्रशस्त करना। हम कच्चे माल या मशीन को बिना इस्तेमाल किए छोड सकते हैं या आंशिक तौर पर इस्तेमाल कर सकत हैं। इसके दूरगामी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक असर नहीं होंगे। मगर यह श्रम और उसको धारण करने वाले मनुष्य के ऊपर लागू नहीं होता।
    जिस व्यक्ति में श्रम निहित होता है वह अपनी आवाज और मताधिकार को तत्कालीन सत्ता के विरुध्द इस्तेमाल कर सकता है। वह अपने जैसे अन्य श्रमिकों के साथ आंशिक या पूर्णरूपेण रोजगार से वंचित करने वालों के खिलाफ संघर्ष कर सकता है। इनता ही नहीं, जैसा कि हम कह चुके हैं, किसी भी सक्षम व्यक्ति की श्रमशक्ति का उपयोग करने से मना करने से उसकी मनोदशा पर प्रतिकूल प्रभाव पड सकता है तथ उसके आत्मसम्मान को धक्का लग सकता है जिसके  परिणाम भयावह हो सकते हैं। अब आइए रिपोर्ट की ओर लौटें।
    विश्व भर में युवा बेरोजगारी एक नई ऊंचाई पर पहुंच गई है।  अगर स्थित नहीं बदली तो हो सकता है एक पूरी पीढी रोजगार के अवसर में वंचित हो जाए। दुनिया भर में वर्ष  2009 के दौरान 62 करोड क़ार्य सक्षम युवा थे जिनमें से लगभग 8 करोड 10 लाख बेरोजगार थे यानी युवा वर्ग में बेरोजगारी 13 प्रतिशत से कहीं अधिक थी जो आम बेरोजगारी दर से काफी ऊंची थी।
     याद रहे दो साल पहले यानी 2007 में यह दर 11.9 प्रतिशत थी। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन से जुडे अर्थशास्त्री स्टीवेन काप्सोस के अनुसार युवा बेरोजगारों का इतना बडा आकार और प्रतिशत पहले कभी नहीं दिखा। आगे आने वाले समय में युवा बेरोजगारी घटने की कोई संभावना नहीं दिख रही। वर्तमान वर्ष 2010 में युवा बेरोजगारी का प्रतिशत निश्चित रूप से 13.1 का आंकड़ा पार कर जाएगा। कहना न होगा कि वर्ष 2007 में शुरू हुई अतिमंदी की मार सबसे अधिक युवा लोगों पर पडी है। वयस्क बेरोजगारी में थोडी-बहुत कमी दिख रही है, मगर युवा बेरोजगारों को कोई राहत नहीं मिली है। जो युवा अपने रोजगार बचा पाए हैं उनसे पहले के मुकाबले अधिक घंटे काम कराया जाता और कम मजदूरी दी जाती है।
स्पेन और ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों में युवा बेरोजगारों ने रोजगार के नए अवसर ढूंढने बंद कर दिए हैं। श्रम बाजार को अलविदा कह अपने आप को तकदीर के हवाले कर दिया है। इस स्थिति से उपजने वाले संभावित परिणामों की ओर हम संकेत कर चुके हैं।  रिपोर्ट के अनुसार सबसे खराब हालत विकासशील देशों के युवा बेरोजगारों की है।
    दक्षिण एशिया को लें यहां वर्ष 2000 में जितने युवा श्रमशक्ति में शामिल थे उतने 2010 में नही रहे। उनकी संख्या घटी। 1998-2008 के दौरान युवा बेरोजगारी में 27.5 प्रतिशत की वृध्दि हुई।   विश्व भर में करीब 15 करोड 20 लाख युवा लोगों को 2008 में रोजगार प्राप्त था यानी एक चौथाई युवा श्रमिक ही रोजगार पा सके थे। वे सब भयंकर गरीबी की जिंदगी बसर कर रहे थे। उनके परिवार में औसतन 1.25 डॉलर प्रतिदिन पर हर कोई गुजारा कर रहा था।
    युवा समुदाय में पुरूषों की तुलना में महिलाओं की स्थिति कहीं अधिक खराब थी। युवतियां को रोजगार के अवसर ढूंढने में अधिक कठिनाई थी। वर्ष 2009 में जहां 13.2 प्रतिशत महिला श्रमिकों को बेरोजगारी का सामना करना पड रहा था वहीं पुरूष युवा बेरोजगार 12.9 प्रतिशत थे।  अतिमंदी के दौर में रोजगार की सुरक्षा में काफी ह्यास हुआ है। बेरोजगारों की मोलभाव की शक्ति क्षीण होने के कारण मालिक जब चाहते तब छंटनी का परवान थमा देते हैं। श्रमिकों की ओर से शायद ही जोरदार प्रतिरोध होता है क्योंकि एक ओर रोजगार के अवसर तेजी से घटे हैं वहीं दूसरी ओर श्रमिक संघों की स्थिति कमजोर हुई है। अधिकतर देशों में, जिनमें विकासशील देशों की बहुतायत है नौकरी छूट जाने पर सामाजिक सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में भी अगर छह माह तक कोई काम नही मिल जाता तो बेरोजगारी भत्ता बंद हो जाता है।
      अमेरिका में अफ्रीकी मूल के मजदूर बेरोजगारी से अधिक पीडित हैं। अश्वेत युवा लोगों की स्थिति गोरे युवकों से कहीं  अधिक खराब है। अमेरिका की सुप्रतिष्ठित पत्रिका 'द नेशन' के 19 जुलाई के अंक में छपे कैथरीन एस  न्यूमैन और डेविड पेडुल्ला के लेख 'ऐन अनइकुअल ऑपरचुनिटी रिसेशन' में बतलाया गया है कि अतिमंदी द्वारा लाई गई बरबादी का वितरण समान रूप से नहीं हुआ है। काले लोगों के बीच बेरोजगारी का प्रतिशत गोरे लोगों की तुलना में दुगुना है। मर्द और औरत के बीच भी काफी अंतर देखा जा सकता है। स्थिति में अब तक कोई टिकाऊ सुधार होता नजर नहीं आ रहा। तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी से बाहर नहीं आ सकी है। वहां सरकारी तौर पर बेरोजगारी की दर 9.6 प्रतिशत बतलाई जा रही है यद्यपि कई लोगों का मानना है कि वस्तुत: यह दर 17 प्रतिशत से ऊपर है क्योंकि जिन लोगों को रोजगार ढूंढते छह महीने से ऊपर हो गए हैं उनको बेरोजगारी भत्ता मिलना बंद हो गया है और उन्हें बेरोजगारों की सूची से निकाल दिया गया है जिससे बेरोजगारों की संख्या घटी है। इन बेरोजगारों में युवाओं की अच्छी खासी तादाद है। इधर यूरोपीय संघ के कई देशों में संकट गहराने से बेरोजगारों की फौज का आकार बढा है।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का मानना है कि नि:संदेह युवा लोग सम्मानजनक और उत्पादक रोजगार की तलाश में हैं जिससे वे अपना भविष्य संवार सके। इस आशा को छीन लीजिए तब आपको एक निराश युवक मिलेगा जो किसी तरह गुजर बसर कर रहा है या श्रम बाजार से पूरी तरह छिटकने वाला है। इस प्रकार उसकी आर्थिक संभाव्यता का भारी विनाश प्रकट होता है।
 आंकडों से बढती युवा बेरोजगारी और आर्थिक संकट के बीच तगडा जुडाव उजागर होता है। वर्ष 2007 और वर्ष 2009 के बीच युवा बेरोजगारी में 78 लाख की वृध्दि हुई। इसमें से 11 लाख बढाेतरी 2007 -08 और 67 लाख वृध्दि 2008-09 में हुई। अतिमंदी के पहले  दशक के दौरान बेरोजगार नौजवानों की संख्या में औसतन एक लाख 91 हजार प्रतिवर्ष वृध्दि हुई। रोजगार के शालीन अवसरों के अभाव में पढे-लिखे लोग अधिक बेरोजगार हुए हैं। कम पढे- लिखे और अप्रशिक्षित युवा कोई न कोई काम ढूंढ कर अपना पेट पाल लेते हैं मगर शिक्षित प्रशिक्षित युवा ऐसा नहीं कर पाते।
       हम अपने देश में नजर दौडाकर स्थिति का काफी कुछ अनुमान लगा सकते हैं।  वर्ष 2007 से ही कॉल सेंटरों पर ग्रहण लगना शुरू हो गया। इनमें भारी संख्या में नवयुवक-नवयुवतियां कार्यरत थीं या रोजगार की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं।  दुबई से लेकर अमेरिका तक युवा वर्ग रोजगार के लिए जा रहा था। इस पर काफी कुछ विराम लग गया। इतना ही नहीं, इन देशों से अनेक लोग बेरोजगार होकर स्वदेश लौटने लगे। केरल में खाडी देशों से लौटने वाले बेरोजगारों के कारण अर्थव्यवस्था कुप्रभावित हुई और सामाजिक माहौल बिगडा। कई युवक युवतियों की शादियां रुकीं। आस्ट्रेलिया जैसे देशों में बाहर से आकर पढाई कर नौकरी पाने की कोशिश करने वाले युवा लोगों के विरुध्द नस्ली भेदभाव भी उभरा। मार पीट की घटनाएं भी हुईं।
 ( लेखक जाने माने अर्थशास्त्री हैं) 




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