सोमवार, 13 सितंबर 2010

परिवार के अंदर और बाहर का समाज

      आज परिवार की संरचना सबसे ज्यादा संकटग्रस्त है। कोई परिवार नहीं है जहां संकट न हो। सवाल यह है  क्या परिवार स्थिर संरचना है ? अपरिवर्तनीय संरचना है अथवा परिवार की संरचना में बदलाव आते रहे हैं। परिवार बनाने और परिवार बचाने के नाम पर निरंतर हिंसाचार हो रहा है और औरतों पर हमले बढ़े हैं। विभिन्न बहानों से औरतों के अधिकारों में कटौती की पुंसवादियों ने मुहिम छेड़ दी है। ऐसे में एकबार परिवार  और उससे जुड़े बुनियादी सवालों पर विचार कर लेना समीचीन होगा।
      फ्रेडरिक एंगेल्स ने ‘परिवार,निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ नामक किताब में लिखा है ‘‘मौर्गन कहते हैं : 'परिवार एक सक्रिय स्रोत है। वह कभी भी जड़ और स्थिर नहीं होता, बल्कि निम्न रूप से सदा उच्चतर रूप की ओर अग्रसर होता है। यह उसी प्रकार है जिस तरह पूरा समाज निम्न से उच्च्तर अवस्था की ओर बढ़ता है। इसके विपरीत, रक्त-संबध्दता की व्यवस्थाएं निष्क्रिय हैं। परिवार ने जो प्रगति की है, उसे ये व्यवस्थाएं बहुत बाद में जाकर व्यक्त करती हैं। ये मौलिक रूप से तभी बदलती हैं, जब परिवार में मौलिक परिवर्तन हो चुका होता है।' मार्क्स इस पर कहते हैं : 'और यही बात राजनीतिक, कानूनी, धार्मिक तथा दार्शनिक प्रणालियों पर भी लागू होती है।' परिवार तो जीवित अवस्था में रहता है, लेकिन रक्त-संबद्धता की व्यवस्था जड़ीभूत हो जाती है। रक्त-संबद्धता की व्यवस्था जबकि रूढ़िबद्ध रूप में विद्यमान रहती है, परिवार विकसित होकर उसके चौखटे से बाहर निकल आता है।’’  यह बात आज भी सच है कि परिवार आगे निकल गया है,इसके बावजूर रक्त संबंधों पर आधारित गोत्र व्यवस्था अभी भी जड़ रूप में मौजूद है और उसके खाप पंचायत जैसे हिमायती भी हैं। वे परिवार को देख नहीं रहे हैं वे गोत्र को देख रहे हैं।
     खाप पंचायत वाले जिस तरह परिवार और गोत्र की व्यवस्था के बारे में शुद्धतावादी नजरिए से बातें कर रहे हैं उसे देखकर आश्चर्य होता है कि अपने गोत्र के अतीत को भी वैज्ञानिक ढ़ंग से देखना नहीं चाहते। वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि मानव सभ्यता में ,मानव संबंधों में,गोत्र के संबंधों में आदिकाल में कोई अनियंत्रित यौन संबंध नहीं थे। सामाजिक विकास के क्रम में एकनिष्ठ यौन संबंध बहुत बाद की अवस्था में पैदा हुए हैं। खाप पंचायत वाले यौन सभ्यता के इतिहास और उसकी सम्मिश्रण की प्रक्रिया को ठुकरा रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक बार एंगेल्स को याद करना बेहतर होगा।
     एंगेल्स के अनुसार ‘‘कुछ दिनों से यह कहना एक नैतिक शुध्दतावादी फैशन सा हो गया है कि मानवजाति के यौन-जीवन के इतिहास में इस प्रारंभिक अवस्था का अस्तित्व ही न था। उद्देश्य यह है कि मानवजाति इस 'कलंक' से बच जाए। कहा जाता है कि ऐसी अवस्था का कहीं कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिलता। इसके अलावा, खास तौर पर बाकी पशुलोक की दुहाई दी जाती है। इसी प्रेरणावश लेतूर्नो ने ('विवाह और परिवार का विकास', 1888) ऐसे बहुत से तथ्यों को जमा किया जिनसे सिध्द होता था कि पशुलोक में भी नीचे की अवस्था में ही पूर्ण रूप से अनियंत्रित यौन-संबंध पाए जाते हैं। लेकिन इन तमाम तथ्यों से मैं केवल एक ही परिणाम निकाल सकता हूं। वह यह कि जहां तक मनुष्य का और उसकी आदिम जीवनावस्था का संबंध है, इन तथ्यों से कुछ भी सिध्द नहीं होता। यदि कशेरुकी पशु लंबे समय तक युग्म-जीवन व्यतीत करते हैं तो इसके पर्याप्त शरीरक्रियात्मक कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, पक्षियों में मादा को अंडे सेने के दिनों में मदद की जरूरत होती है। वैसे भी पक्षियों में दृढ़ एकनिष्ठ परिवार के उदाहरणों से मनुष्य के बारे में कुछ भी सिध्द नहीं होता क्योंकि मनुष्य पक्षियों के वंशज नहीं हैं। यदि एकनिष्ठ यौन-संबंध को ही नैतिकता की पराकाष्ठा समझा जाए तो हमें टेपवर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए। इसके शरीर में 50 से 200 तक देहखंडों में से प्रत्येक में नर और मादा दोनों प्रकार का पूरा लैंगिक उपकरण होता है। इसका पूरा जीवन इन खडों में से प्रत्येक में, स्वयं अपने साथ सहवास करने में बीतता है। लेकिन यदि हम केवल स्तनधारी पशुओं पर विचार करें, तो हमें उनमें हर प्रकार का यौन-जीवन मिलता है अनियंत्रित यौन-संबंध, यूथ-संबंध के चिह्न, एक नरपशु का अनेक मादापशुओं से यौन-संबंध और एकनिष्ठ यौन-संबंध। केवल एक रूप, एक मादापशु का अनेक नरपशुओं से यौन-संबंध उनमें नहीं मिलता। इस रूप तक केवल मनुष्य ही पहुंच सके। हमारे निकटतम संबंधी, चौपाया प्राणियों में भी, नर और मादा के संबंधों में हद दर्जे की विभिन्नता पाई जाती है। और यदि हम अपने दायरे को और भी सीमित करना चाहें और केवल चार तरह के पुरुषाभ वानरों पर विचार करें, तो लेतूर्नो से हमें ज्ञात हो सकता है कि वे कभी एकनिष्ठ यौन-जीवन व्यतीत करते हैं तो कभी बहुनिष्ठ। सोस्सुर, जिन्हें जिरो-त्यूलों ने उध्दृत किया है, कहते हैं कि वे एकनिष्ठ ही होते हैं। हाल में प्रकाशित 'मानव विवाह का इतिहास'(लंदन, 1891) में वेस्टरमार्क के इस दावे को भी कि पुरुषाभ वानरों में एकनिष्ठ यौन-जीवन की प्रवृत्ति पाई जाती है, कोई बहुत बड़ा सबूत नहीं माना जा सकता। संक्षेप में, ये सारे तथ्य इस प्रकार के हैं कि ईमानदार लेतूर्नो को स्वीकार करना पड़ता है कि 'स्तनधारी पशुओं में बौध्दिक विकास के स्तर तथा यौन-संबंध के रूप में कोई निश्चित संबंध नहीं पाया जाता।' और एस्पिनास ('पशु समाज', 1877) तो साफ-साफ कहते हैं कि 'पशुओं में दिखाई पड़ने वाला सर्वोच्च सामाजिक रूप यूथ होता है। लगता है कि यूथ परिवारों को मिलाकर बना है लेकिन शुरू से ही परिवार और यूथ के बीच एक विरोध बना रहता है, वे एक दूसरे के उल्टे अनुपात में विकसित होते हैं।' बुनियादी बात है यूथ और परिवार के बीच का अन्तर्विरोध। जो आज भी बना हुआ है समस्या यह है कि इसे किस तरह हल किया जाए।



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