बुधवार, 1 सितंबर 2010

ऐसे चली फेसबुक पर हिन्दीभाषा पर बहस

                             

Ajay Brahmatmaj -कल मेरे अध्‍यापक मित्र जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ने विरोधपूर्ण आपत्ति जतायी कि मैं हिंदी शब्‍दों को रोमन फॉण्‍ट में न लिखूं। उनकी भावनाओं की मैंने हमेशा कद्र की है,इसलिए उनसे पूरी तरह सहमत नहीं होने पर भी आज का स्‍टेटस नागरी में लिख रहा हूं। आप की क्‍या राय है?
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Sharad Dixit - जर्मनी में अंग्रेजी कम बोली जाती है। यही हाल रूस का है। भारतेंदु जी के शब्‍दों में निज भाषा उन्‍नति अहै सब उन्‍नति को मूल।

Ajay Brahmatmaj - जगदीश्‍वर चतुर्वेदी का गुस्‍सा...इंटरनेट पर हिन्दी वालों में भाषायी विभ्रम
पूरा http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

Prakash K Ray - likhne ki unki baat maan bhi li jaye par unse poochhiye ki naagari mein bola kaise jaye...
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Ravindra Ranjan -आपने बहुत अच्छा किया, कृपया इस स‌िलसिले को जारी रखें
Prakash K Ray on Chaturvedi Sir's opinion in his blog:- "I call the discourse of power any discourse that engenders blame, hence guilt, in its recipient." -Roland Barthes
Ashish Bansal -भाषा वो ही लिखें जो सबको समझ में आए विरोध का सिर्फ आदर करें

Khurshid Anwar - Jagdishwar ki bhavana ki qadar karna ek baat hai lekin unke is vichar se asahmat hone par unka vichar mana apne vichar se ashmati dikhana hai. Waise yeh bahas hindi urdu dono main rahi hai. maan lo main apne vichar urdu mein likhna chaun to kya karun? Script badal dun to jagdishwar kya samajh payenge. Tab kya kahoge urdu mein vichar vyakt karna hi band kar do?
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Ravi Shekhar - parivartan sanasar ka niyam hai....jo parivartan se katrayega ..ruk jayega...bas bahte raho...jo bah gaya -bah gaya, jo rah gaya rah gaya...!
Khurshid Anwar-  Yeh jagsishwar ke liye جگدیشور اب کیا خیال ہے
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Bhuwnesh Prabhu Joshi-  chahe roman mai ho ya nagri mai.... Hindi bhasha ka parsar antrastriya star par hona chahiye.....
garv hai Hindi bhashi hone par
Gaurav Solanki -एक आदर्श नियम तो कहता है कि हर भाषा उसकी लिपि में ही लिखी जाए तो बेहतर है. कोशिश भी यही की जानी चाहिए, लेकिन जैसा ख़ुर्शीद साहब ने कहा, फिर उर्दू लिखने के लिए भी उसकी लिपि का इस्तेमाल करने की वकालत होनी चाहिए. हम हिन्दुस्तानी लिखते हुए भी उर्दू के शब्दों को देवनागरी में लिखते हैं, इस पर उनका क्या स्टैंड है?
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Khurshid Anwar- bhai Gaurav main bilkul vakalat nahi kar raha urdu shabdon ko usi lipi main likhne ki.apki post mein behtar, koshish, sahab, urdu, istemaal, vakalat, jaiose shabd 'istemal' hue. devnagri mein hamesha isi tarah likhe gaye aur aisa hi hona ch...
Vineet Kumar - नागरी में लिखकर अच्छा ही किया,हम शुद्धतावादी आग्रह की वजह से तो नहीं लेकिन पढ़ने में दिक्कत होती है इसलिए कहूंगा कि ऐसा ही करें। लेकिन अगर कोई इस वजह से लिखना छोड़ता है कि उसे नागरी टाइप करनी नहीं आती तो उन्हें जगदीश्वरजी की बातों पर कान नहीं देनी चाहिए। पहली चीज है लिखना,अपने को व्यक्त करना। तब बाकी चीजें आती हैं..
Krishna Gopal - रोमन मेँ हम शब्द तो लिख देते हैँ परन्तु भाव कहीँ पिछे रह जातेँ हैँ..
Vibha Rani - मित्रों का ख्याल रखने मं वैसे भी आपका कोई मुकाबला नहीं कर सकता.
Jagadishwar Chaturvedi - मेरी बात को गलत समझा गया है, मैं हिन्दी में न लिखने का विरोध नहीं कर रहा था। मैं उस समस्या की ओर ध्यान दिला रहा था जो अंग्रेजी में हिन्दी के लिखने से पैदा हो रही है।आप सभी दोस्त हैं कैसे भी लिखें , हिन्दी को लेकर मैं किसी भी किस्म के शुद्धतावाद के पक्ष में नहीं हूँ। आप जैसा चाहें लिखें। क्योंकि खिचड़ी भाषा या परायी भाषा के प्रति आकर्षण ही इंटरनेट संस्कृति का परिणाम है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी भाषा को नेट के सार्वजनिक मंच के उपयुक्त बनाते हैं या नहीं ? बहुभाषियों में क्या हिन्दी संवाद का माध्यम नहीं हो सकती ?
अजय ब्रह्मात्मज- mitron ...roman mein likhne se mujhe kai aise mitra mile hain jo jo hindi bol aur samjh sakte hain,lekin likh-padh nahin paate.kya main aise mitron ki parwaah na karoon?main apna lekhan khalis hindi mein karta hoon,lekin ab mehsoos ho raha hai ki english mein likhna chahiye...bade recognition aur jyada paison ke liye...
Abhishek Tiwari - bahut badhiya sir , ye to aapke dil me mitron ke prati shradha ka bhaw hai jo aapko prerit kar rahaa hai ,
Farid फ़रीद Khan ख़ाँ - मैं किसी भाषा और किसी भी लिपि का विरोधी नहीं हूँ। संप्रेषणीयता का रूप निरंतर बदलता भी रहता है। पर मैं कुछ कहना चाहता हूँ : ऐसे बहुत सारे भारतीय साहित्यकार हैं जो अगर अपना साहित्य अंग्रेज़ी में लिखने लगें तो उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल जाये। वेद व्यास, तुलसीदास, मीराबाई, मीर, ग़ालिब, निराला, मुक्तिबोध, सुब्रह्मण्य भारती आदि से लेकर वे भी जो आज जीवित हैं। देश का विकास और निर्माण केवल 'पथ निर्माण' और 'पुल निर्माण' से ही नहीं होता है। अपनी भाषा और अपनी अभिव्यक्ति भी उस विकास का ही हिस्सा है। वैश्वीकरण प्रदत्त अर्थयुग ने सबसे पहले सस्कृतियों का ही नाश किया है। मैं अपनी सीमा में इस वैश्वीकरण से लड़ रहा हूँ और जिन्हें हिन्दी नहीं आती या मुश्किल पेश आती, उन्हें हिन्दी सिखा रहा हूँ

Balram Kanwat बलराम कांवट -fareed saab sahi hain.
Vikash Kumar-  sir mere hisaab se trade off hona chahiye... english me bhi likhiye aur hindi me bhi... english me commercial motivation and self publicity k liye likhiye aur hindi me seva-bhav se likhiye... service to tradition and our heritage.
waise mujhe lagta hai ke agle 40-50 saal me hindi ke samajhdar pathak bahut kam ho jayenge.. vilupt nahi honge lekin kam rah jayenge. hindi literature ka commercial level pe importance already kafi kam ho gaya hai.. aur 2 generation k baad pata nahi kya hoga..



Renu Gupta - Apka fisla sahi hoga @Farid yeh kisi bhasha ke prati pakshpat nahi hai balki sawal is baat ka hai ki hum kaya kehna chahten hain aur kis tak pahuchana chahte hain - yadi kahani aur kavita likhani hai to ek bhasha ka sath nibhana padega lekin journalism ko bhsha ki seemaon mein nahi bandha ja sakta.
about an hour ago · Like
Jagadishwar Chaturvedi - रेनू जी आपने आधा सच बोला है। इंटरनेट पर सभी भाषाभाषी लोग हैं और वे अपनी-अपनी भाषा में लिख रहे हैं। इंटरनेट पर संवाद का यह रूप अनौपचारिक है अतः किसी भी भाषा में कर सकते हैं और किसी भी विषय पर कर सकते हैं लेकिन इस संदर्भ में हमें विकासशील समाजों के अनुभवों से सीखना चाहिए। जर्मन या फ्रेंच के ज्यादातर लोग अपनी भाषा में संवाद कर रहे हैं, चीन का इंटरनेट का अधिकांश यूजर चीनी भाषा में संवाद कर रहा है इसमें बुद्धिजीवी भी शामिल हैं। अजय यदि संवाद के नाम पर फेसबुक में अंग्रेजी में हिन्दी लिखता है तो कोई अन्याय नहीं करता लेकिन भविष्य के साथ अन्याय कर रहा है। इन दिनों हम जो कुछ भी फेसबुक या ट्विटर पर लिख रहे हैं उसकी अमेरिकन लाइब्रेरी में एक संग्रहशाला बन गयी है और भविष्य में लोग उसे देखकर फैसला करेंगे कि भारत के बुद्धिजीवी फेसबुक पर कैसे अंग्रेजी में हि्दी लिखते थे। फेसबुक पर भाषा के प्रति कट्टर भाव संभव नहीं है लेकिन पर्सुएशन के भाव से ही दिल जीता जा सकता है। जो लोग जानबूझकर अपनी भाषा की उपेक्षा कर रहे हैं उन्हें समझाया जाना चाहिए।
Khurshid Anwar -Jagdishwar aap pehle yeh tai karein ki aap bhasha ki baat kar rahe hain lipi ki. Agar aap apni post dekhen to adhiktar baat aap bhadsha ke sandarbh mein kar rahen hain lekin baat shuru hui thi lipi ke sandarbh se. yeh post jo main likh raha hun ya Renu ne likhi usme utni hi samanya hindi ke shabd hain jitni aap ki post mein. Lipi ke sawal par na sirf aap balki bahutere urdu wale yahi tark detein hain jo aapne diya. Kai bhashayen officially Roman mein likhi jati hain lekin woh angrezi nahi hain Kya samvaad ki bhsha lipi badlne se mar jati hai? kya uski mahatta kam ho jati hai. Aur yeh sara sandarbh Sahityik lekhan ka nahi hai matra samvaad ka hai
about an hour ago ·
Renu Gupta - Apne jo German, French or China ke udharan diye, un deshon mein hamare desh ki tarah ki vikat paristhithi nahi hai unki sirf ek hi bhasha hai par hum hidustaniyon ke liye, ye ek savendansheel vishay hai. Hum sabko apni paristhiti ke anusar apna faisla kud lena hai.
Khurshid Anwar-  Main Renu se sahmat hun
Jagadishwar Chaturvedi - भाई साहब आप असहमत रहें तो अच्छा होगा। अब तक आप ही थे,कम से कम अब तो रेनू से खुलकर बातें करने दो। यह मामला भाषा के बहाने खुल रहा है। इंटरनेट की भाषा को लेकर हमें अभी से सतर्क होना होगा। बाद में काफी देर हो जाएगी। उर्दू की हम उपेक्षा करके बर्बाद कर चुके हैं। शानदार भाषा थी और आज भी है। काश खुर्शीद का संचार उर्दू में भी होता और कोई पास होता तो हम भी समझते।
Jagadishwar Chaturvedi - दोस्त संवाद करते-करते ही हम अपनी भाषा भूल रहे हैं।
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Prakash K Ray - सर, कौन सी भाषा भूलने की बात कर रहे हैं....वो भाषाएँ जो आदिवासियों की हैं (जिनमें अधिकांश अब थी हो गयीं) या वो भाषाएँ जिन्हें बोलियों की श्रेणी में डाल कर ढांप दिया गया.... यह हिन्दी तो क़ायदे से डेढ़ सौ साल की भी नहीं हुई... क्या हुआ ब्रज का, अवधी का, राजस्थानी का, भोजपुरी का.... और सबसे बड़ा सवाल कि कैसे और क्यों हुआ.. हिंदी की राजनीति ने मारा उर्दू को.. हिंदी के तेवर औपनिवेशिक हैं... मेरी मातृभाषा भोजपुरी है... हिंदी उतनी ही अपनी है जितनीअंग्रेजी...

Jagadishwar Chaturvedi - प्रकाश जी, वे सभी भाषाएं जो मीडिया और शिक्षा में जगह नहीं बना पाईं उन्हें हम भूलने लगे हैं। आदिवासियों की भाषाओं से लेकर ब्रजभाषा तक सबका एक ही जैसा परिणाम निकला है।

3 टिप्‍पणियां:

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