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रविवार, 5 जून 2011

फेसबुक और बाबा रामदेव का नाटक


      बाबा रामदेव को कल पुलिस ने रामलीला मैदान  के अनशन स्थल पर जाकर गिरफ्तार कर लिया। बाबा की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को जमकर लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े। बाबा की कानूनभंजक राजनीति का इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था।बाबा रामदेव के आंदोलन का पहला निष्कर्ष है कि यह नकली और नियोजित आंदोलन था। दूसरा, किसी आंदोलन के संदर्भ में संचार क्रांति के टांय-टांय फिस्स के आदर्श के रूप में इस घटना को जाना जाएगा। तीसरा. पापुलिज्म और फेकनेस बहुत ज्यादा समय तक बने नहीं रहते। चौथा,फेक और नेक में हमें अंतर करने की समझ पैदा करनी चाहिए।पांचवां, संघ परिवार अपनी राष्ट्रतोड़क-अराजक राजनीति में प्रच्छन्न ढ़ंग से  सक्रिय है। छठा, सत्ता यदि साम्प्रदायिक ताकतों के प्रति सख्ती से पेश आए तो वे भाग खड़े होते हैं। सातवां,बाबा के 50 हजार के जमावड़े को पुलिस ने जिस कौशल से मात्र डेढ़ घंटे में रामलीला मैदान से भगा दिया उससे यह भी पता चलता है कि बाबा आंदोलन के नाम पर सरल-सीधे लोगों को ,बहला-फुसलाकर ले आए थे। इन लोगों ने कोई खास प्रतिवाद नहीं किया।आठवां, दिल्ली पुलिस ने इतने बड़े जमाबड़े को न्यूनतम लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले छोड़कर घटनास्थल से हटाकर भीड़ नियंत्रण की नयी मिसाल कायम की है।
हम अपने ब्लॉग पर पहले भी बाबा के बारे में विस्तार से लिख चुके हैं। वे सभी लेख यहां उपलब्ध हैं। यहां पर हम अपने फेसबुक वॉल पर लिखी टिप्पणियों को दे रहे हैं। ये टिप्पणियां कुछ महत्वपूर्ण सवालों को उठाती हैं।   --

                       -1-

काले धन का मामला बेहद जटिल है,इस पर यही कहना है- "नाड़ी छूअत वैद्यके पड़े फफोले हाथ।।"
                               -2-

बाबा रामदेव की मांग है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश से निकाल दें। तब मोबाइल,इंटरनेट,कार, जहाज और उनके विदेश में बने आश्रमों का प्रबंध कौन करेगा ?दवाएं कहां से आएंगी ? बाबा के भक्तों से अपील है वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामान और सेवाओं का इस्तेमाल तत्काल बंद कर दें।
                        -3-


बाबा रामदेव यदि यह मानते हैं कि उनका कोई साम्प्रदायिक एजेण्डा नहीं है तो वे संत का बाना त्यागकर एक नागरिक के बाने में आकर राजनीति करें ? संघ परिवार ने धर्म और राजनीति के मेल पर जोर दिया है और बाबा एक धार्मिक संत के नाते ,संतों के साथ वैसे ही आंदोलन कर रहे हैं,जैसे राममंदिर आंदोलन के समय चलाया था संघ परिवार ने।
                        -4-

सवाल यह है कि सॉफ्ट हिन्दुत्व की लाइन के तहत बाबा को कांग्रेस पटाने में क्यों लगी है ? बाबा से मिलने क्यों भेजा मंत्रियों को ? हम मांग करते हैं कि बाबा और उनके सानिध्य में चलने वाले ट्रस्टों की संपत्तियों की जांच की जाए।



                         -5-
कहो ना प्यार है , मनमोहन दौर की नूरा कुश्तियों का दंगल जिंदाबाद।नव्य -उदारीकरण में लड़ाईयां भी वे ही तय करते हैं जो नव्य उदारपंथी नीतिकार हैं।कितना लड़ोगे,कैसे लड़ोगे,कितना बोलोगे,कहां बोलोगे,सब कुछ तय है। अमेरिकी राजनीति का यह लोकतंत्र को बंधक बनाने वाला नया मॉडल है।मनमोहन सरकार अन्ना हजारे के साथ पहला प्रयोग कर चुकी है,उसमें सफल रही,अब बाबा के साथ भी यह प्रयोग सफल रहा।बेबकूफ बनी जनता ।
                       -6-

हमने पहले भी कहा था अब फिर से दोहरा रहे हैं,यह बाबा रामदेव की मनमोहन सेवा है।सब कुछ तय था। नाटक तय,अभिनय,तय,स्क्रिप्ट भी तय,आदि तय और अंत भी तय था। अब खाली थोड़ी-बहुत नाटकीयता के साथ प्रेस कॉफ्रेंस होगी या प्रेस रिलीज,फिर बाबा रामदेव अपने आश्रम चले जाएंगे कपाल भारती करने और जनता अपना कपाल फोड़े ?

                            -7-

कांग्रेस की कालेधन को देश में वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे काले धन के संरक्षण के लिए द्वि-दलीय व्यवस्था की ओट मैं दो फ्रंट बनाए हुए हैं और काला-धन नामक ड्रामा खेल रहे हैं यह शो 3 दशक से चल रहा है।वरना क्या बात अमेरिका अपना काला धन निकालकर ले गया स्विस बैंकों से हम नहीं ला पाए ?
                            -8-


बाबा रामदेव-अन्ना हजारे टाइप आंदोलनों का संबंध मीडिया के उन्मादित कवरेज के साथ है। उन्मादित कवरेज में दर्शक का विवेक बंधक बना लिया जाता है। मीडिया इमेजों के जरिए आम जनता को नचाया जाता है। यह बिलकुल मनमोहन देसाई की अमिताभ बच्चन फिल्मों की तरह है। अमिताभ बच्चन की फिल्मों की सफलता का रहस्य था कि दर्शक 3 घंटे सोचता नहीं था,बंधा रहता था। यही हाल मीडिया के उन्मादित अभियान का है।
                              -9-

बाबा रामदेव पर जो मुग्ध हैं उनके इस भाव को मीडिया ने बनाया है। इसे हम मीडिया में ज्ञात-अज्ञात की नजरों से देखेंगे तो ठीक समझ पाएंगे। बाबा रामदेव मीडिया का सबसे बड़ा ब्राँण्ड है। सबसे महंगा भी ।संपत्ति भी वह सब ब्राँण्डों से ज्यादा कमाता है।वो संत नहीं ब्राँण्ड हैं।
                           -10-

उपभोक्तावाद का प्रचार वस्तुओं के उपभोग पर बल देता है। उसकी विचारधारा छिपाता है। बाबा के मामले में भ्रष्टाचार पर बात करो,विचारधारा पर नहीं। हमें वस्तुओं का आनंद पसंद है ,लेकिन विचारधारात्मक प्रभाव के बारे में अनभिज्ञ रहते हैं। विचारधारा छिपाओ और वस्तु को बेचो।बाबा के लिए भ्रष्टाचार एक वस्तु है जिसकी वे ब्राँण्डिंग कर रहे हैं.जैसे कोई कार की करता है।                       

                                  -11-
काला पैसा विदेश से वापस लाना देशसेवा है। जो देश छोड़कर आप्रवासी होगए हैं बाबा उनको यहां संपत्ति सहित लाना क्यों नहीं चाहते ?
                                -12-

बाबा रामदेव का अनशन तय था कि कब तक चलेगा और कब वापस लिया जाएगा। यह बात बाबा रामदेव के बांए हाथ आचार्य बालकृष्ण की लिखी चिट्ठी में लिखी है,इसमें लिखा कि अनशन 4-6जून के बीच खत्म हो जाएगा। यह चिट्ठी आंदोलन के पहले दी गयी ।सरकार ने खुलासा किया है यह।स्टार न्यूज पर खबर देखें। नकली देशभक्त ऐसे ही होते हैं।
                                  -13-


आज रात 12.30 बजे बाबा रामदेव को रामलीला मैदान में पकड़ने की कोशिश की।उनको दी गयी योग शिविर की अनुमति को रद्द कर दिया है। बाबा को उनके समर्थक घेरे हुए हैं। पुलिस-जनता में मुठभेड़ चल रही है।
                                   -14-


बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण अचानक मंच से गायब हो गए हैं। माइक काट दिया है। बाबा गायब हैं।पुलिस ने चारों ओर से पुलिस का घेरा कड़ा कर दिया गया है।पत्थरबाजी भी हो रही भी हो रही है।
                                -15-



  सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान का योगशिविर के नाम पर अनशन आरंभ करने के इस्तेमाल क्यों होने दिया ? जबकि पहले से खबरें आ रही थीं कि बाबा योग शिविर नहीं अनशन करेंगे।
                                 -16-


बाबा रामदेव गिरफ्तार हो गए हैं। रामलीला मैदान में लाठीचार्ज-आंसूगैस के गोले चले हैं। पचासों लोग घायल हुए हैं। बाबा अपनी जनता को असहाय और नेतृत्वविहीन छो़ड़कर पुलिस के कब्जे में हैं।
                         -17-

बाबा रामदेव का आंदोलन आरंभ हुआ जिस जोश के साथ समाप्त भी वैसे ही हुआ। पुलिस और भक्तों को झूठ क्यों बोला बाबा ने ? बाबा आंदोलन करते अनुमति लेते और करते,अनुमति नहीं मिली तो कानूनभंग करके करते,लेकिन करते। योगशिविर की आड़ में लोगों को इकट्ठा करना और फिर पुलिस से पिटवाना उनके नेतृत्व की कायरता और दिशाहीनता का संकेत है।
                           -18-

बाबा रामदेव के अनुयायियों पर पुलिस का लाठीचार्ज निंदनीय है। लेकिन हमें तथ्य और सत्य दोनों को देखना चाहिए। बाबा ने योग शिविर के लिए अनुमति लेकर असत्य क्यों बोला ? एक सन्यासी का असत्य बोलना महापाप की कोटि में आता है। बाबा आंदोलन के लिए अनुमति मांगते और संघर्ष करते समझ में आता है।
                               -19-

बाबा रामदेव ने पुलिस को कहा कि वो योग शिविर लगाना चाहते हैं 20 दिन का और 4हजार लोग आएंगे। लेकिन ये दोनों ही बातें असत्य कहीं बाबा ने। उनके जमावड़े में कोई योगशिविर नहीं था योग तो बहाना था,जनता 50 हजार से ज्यादा थी,पुलिस ने पहले ही दिन दोपहर को बाबा को पत्र दिया कि क्यों न अनुमति रद्द कर दी जाए।बाबा ने जबाव नहीं दिया। वे खेल खेल रहे थे संघ का।
                           -20-

बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन के लिए वैसे ही असत्य का सहारा लिया जिस तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संघ परिवार ने लिया था। इन दोनों में भावुक उत्तेजना साझा तत्व है। आम लोगों को भावुक बनाओ,और फिर अन्य एजेण्डे पर काम करो।बाबा की मंशाएं क्या थीं ? बाबा ने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन तत्काल समाप्त क्यों नहीं किया ?
                           -21-

बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन के लिए वैसे ही असत्य का सहारा लिया जिस तरह बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय संघ परिवार ने लिया था। इन दोनों में भावुक उत्तेजना साझा तत्व है। आम लोगों को भावुक बनाओ,और फिर अन्य एजेण्डे पर काम करो।बाबा की मंशाएं क्या थीं ? बाबा ने सरकार से लिखित आश्वासन मिलने के बाद आंदोलन तत्काल समाप्त क्यों नहीं किया ?
                                -22-


बाबा रामदेव ने पापुलिज्म और अराजक राजनीति का जो घोल तैयार किया उसकी यही परिणति हो सकती थी।
                               -23-


 बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों का समय ठीक वही है जिस समय 2 जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम के करप्शन पर बड़े लोग सींखचों में जा रहे हैं। बाबा रामदेव ने जिस भाव से अपना आंदोलन आरंभ किया है और अन्ना हजारे,आरएसएस आदि ने उनका समर्थन किया है उससे शक है कि दूरसंचार कंपनियां सरकार पर दबाब डालने के लिए बाबा,अन्ना और आरएसएस का इस्तेमाल कर रही हैं ?
                               -24-       


काश !बाबा रामदेव सच्चे योगी होते और संघ परिवार के लोग किसी तपे-तपाए तांत्रिक से मंत्र यज्ञ कराते,वो मंत्रजप करता,बाबा योगी रूप में उड़कर जाते और स्विस बैंक से कालेधन की तिजोरी उठाकर ले आते !कहां है वे संत-महंत-तांत्रिक-पंडित जो आए दिन मंत्रशक्ति के नाम पर जनता को ठगते रहते हैं ? क्या कोई मंत्र है जिसके जप से कालाधन वापस भारत आ जाए ?
                                  -25-

संत के पैसा जो चंदा आता है वो पुण्य की कमाई का होता है ?
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क्या सुंदर दृश्य है माओवादी+आरएसएस +स्वयंसेवी संगठन + सिविल सोयायटी+भाजपा अब जो बाकी हैं वे भी धीरे धीरे संत के साथ आ ही जाएंगे। कालेधन को विदेश से वापस लाने में संघ परिवार कितना 'सक्रिय' है यह बात तो एनडीए सरकार के 6 साल के शासन में समझ में आ गयी थी ,उस समय विदेशों में कालाधन ज्यादा जमा हुआ है बाबा,जरा संघवालों से पूछो वे उस समय चुप क्यों थे ?
                           -27-


कल्पना करें बाबा रामदेव प्रधानमंत्री होते ,और मनमोहन सिंह संत होते ,मनमोहन सिंह -सोनिया आमरण आमरण अनशन पर इन्हीं मांगों को लेकर बैठ गए होते तो बाबा रामदेव विदेशों में जमा कालाधन कैसे वापस लाते ?जरा बाबा के भक्त जबाव दें ?
                               -28-



बाबा रामदेव और उनका योगशास्त्र मूलतः मर्दानगी का शास्त्र है। नव्य़ आर्थिक उदारीकरण के दौर में योग को हठात महान कला साबित करने में सक्रिय कारपोरेट घरानों ने चालाकी के साथ स्त्री के वैभव और अधिकारों के विकल्प के रूप में बाबा रामदेव को मर्दानगी के नायक के रूप में इस्तेमाल किया है। योग की विचारधारा मूलतःपुंसवाद और पितृसत्ता की पोषक है। हम अपने पुराने ग्रंथों को पढ़ें तो सहज ही पता चल जाएगा।

                                -29-
बाबा रामदेव को योग योद्धा कहते हैं। वे योग और भाववाद के हिमायती हैं। योग ने भौतिकवाद के खिलाफ भाववाद की विचारधारा के विकास का काम किया है। बाबा रामदेव का समस्त योग स्कूल आम जनता में भाववाद का प्रचार करता है। नव्य आर्थिक उदारीकरण के लिए बाबा सबसे उपयुक्त महापुरूष हैं क्योंकि बाबा भौतिकवाद के खिलाफ भाववाद का प्रचार करते रहे हैं। यही वजह है कि नव्य उदारपंथी देशी-विदेशी सभी कारपोरेट घराने और राजनीतिक दलों के नेता उनकी सेवा में खड़े हैं।
                            -30-
                          -31-

बाबा रामदेव के योग-प्राणायाम उद्योग का टर्नओवर पन्द्रह हजार करोड़ रूपये साल का है। उद्योगपति बाबा के खेल ने आम लोगों में स्वास्थ्य की बदहाल दशा के कारण अपील पैदा की है। इस अपील को संघ परिवार अपने राजनीतिक हितों को विस्तार देने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।

                                  -32-
बाबा रामदेव की बातें निराली हैं,अदा भी निराली है,मांगें भी निराली हैं। हम चाहते हैं कि बाबा रामदेव का सपना पूरा हो व्यवस्था बदले,बस बाबा हमारी तीन मांगों को अपनी लिस्ट में शामिल कर लें।1.भारत के सभी अरबपतियों की संपत्ति और कारखानों का राष्ट्रीयकरण,2.विदेश से पैसा लेने वाले राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी संगठनों पर पाबंदी ,3-बंद कल-कारखाने खोलने के लिए पहल और भूमिहीन किसानों में तेजी से भूमि सुधार लागू किए जाएं।
                                   -33-

बाबा रामदेव ने बड़े भोले मन से कहा है सत्ता नहीं,व्यवस्था परिवर्तन चाहता हूँ। सवाल यह है कैसे ?किस नजरिए से और क्यों ? व्यवस्था बदलने की जंग में पहला मुद्दा गरीबी है या काला धन ? मजदूर-किसान का मोर्चा होगा या संघ परिवार और उनके लगुओं-भगुओं का ? व्यवस्था परिवर्तन के पहले सभी मतों के धर्माचार्यों-धर्मपीठों-ईसाई संपदा आदि धार्मिक संपदा को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया जाए ? कालेधन और भ्रष्टाचार का एक अंश मंदिरों-संयासियों के पास भी जाता है।
                               -34-


ओबामा ने स्विटजरलैंड की बैंकों में जमा काले 4हजार करोड़ डॉलर निकाले,लेकिन उससे अमेरिकी जनता की मंदी कम नहीं नहीं हुई।उलटे उसने कारपोरेट घरानों को सहायता दी। सवाल यह है कि जो धन घर में है और काला -सफेद है, क्या बाबा उसके निकाले जाने के पक्ष में हैं ? 80हजारकरोड़ रूपये बैंकों के भारत के धनियों के पास डूबे पड़े हैं,बाबा उसकी वसूली को मसला क्यों नहीं बनाते ?
                                    -35-

अन्ना हजारे-बाबा रामदेव फिनोमिना वस्तुतः देश की जनता में साम्राज्यवाद विरोधीचेतना के विलोप का कार्य कर रहे हैं। भ्रष्टाचार-कालेधन का मसला अमीरों का मसला है। गरीबों के मसले हैं भूमि,भोजन ,रोजगार,और मकान । इनमें से किसी मसले में इन दोनों महापुरूषों की कोई दिलचस्पी नहीं है। भ्रष्टाचार-कालेधन का संकट सत्ता और अमीरों का संकट है।

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जिन मांगों पर बाबा अनशन करने जा रहे हैं। उनमें से कुछ के बारे में सरकार कहने जा रही है- हम काले धन को वापस लाने के लिए कड़े कानून बनाएंगे। नया कानून बनाने के लिए मसौदा समिति बनाएंगे। करप्शन के खिलाफ यू एन कन्वेंशन को मानेंगे,काला धन वालों को कड़ी सजा के रूप में सजा-ए-मौत का भी प्रावधान होगा। 15 अगस्त तक लोकपाल बिल पास हो जाएगा। अनशन कुछ दिन चलेगा क्योंकि तैयारियों के लिए पेमेंट हो चुका है।
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बाबा रामदेव का अनशन एक मजेदार मेला है। रामलीला मैदान के 2.5 लाख स्क्वेयर फुट के एरिया में शानदार पंडाल लगाया गया है,इसमें 1000हजार सिलिंग फेन लगाए गए हैं।50 एम्बुलेंस रखी हैं। एंटेसिव केयर यूनिट स्थापित की गई है। एक हजार टॉयलेट बनाए गए हैं। 5लाख लीटर पानी का इंतजाम किया गया है,अनशन के दौरान योग कैंप चलेंगे।विलीबोर्ड बनाए गए हैं। कोई कह सकता है कि इस अनशन में कोई कष्ट होगा ? यानी मजे में संघर्ष।
                                     -38-


बाबा रामदेव की मांग यदि यह होती कि सारे देश में भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किया जाए और वे अनशन पर बैठते तो क्या सरकार मनाने जाती ? या फिर बाबा रामदेव की मांगों पर लालकृष्ण आडवाणी या वामनेतागण अनशन पर बैठ जाते तो क्या मंत्रियों का झुंड मिलने जाता ?
                                   -39-
बाबा रामदेव अनशन करेंगे।अन्ना हजारे ने आमरण अनशन किया था।सरकार अनशन पर सब तरह की व्यवस्था करेगी। रामलीला मैदान के आसपास पूरा रोशनी-मेला-ठेला -दुकानें-भजन-कीर्तन-जागरण-खाने-पीने की दुकानें-लैट्रीन -बाथरूम सब होगा,सिर्फ एक चीज की गारंटी करनी है बाबा को वहां किसी राजनीतिक दल का नेता अनशन न करे। अन्ना हजारे से भी यही उम्मीद थी उन्होंने माना। यानी राजनीति हो बिना राजनीतिज्ञ और दल के। इसीलिए यह मित्र संघर्ष है।
                              -40-

बाबा रामदेव और मनमोहन मंडली में वर्गीय मित्रता है और बाबा रामदेव का संघर्ष मित्र संघर्ष है।यही वजह है कि 4 मंत्री बाबा को मनाने एयरपोर्ट गए थे।

                                      





















मंगलवार, 15 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद- 5वीं और समापन किश्त-


विकीलीक के प्रकाशन के बाद एक बहस हो रही है कि क्या विकीलीक का प्रकाशन पत्रकारिता है ? पहले हम देखें कि विकीलीक क्या कहता है  "On Sunday 28th November 2010, Wikileaks began publishing 251,287 leaked United States embassy cables, the largest set of confidential documents ever to be released into the public domain. The documents will give people around the world an unprecedented insight into the US Government's foreign activities." (Wikileaks homepage)
“WikiLeaks has released more classified intelligence documents than the rest of the world press combined.” (Wikileaks homepage)
“With its anonymous drop box, WikiLeaks provides an avenue for every government official, every bureaucrat, and every corporate worker, who becomes privy to damning information that their institution wants to hide but the public needs to know. What conscience cannot contain, and institutional secrecy unjustly conceals, WikiLeaks can broadcast to the world.” (Wikipedia homepage)

मेरे ख्याल में इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि विकीलीक ने दस्तावेज जारी किए हैं। कोई खोजी प्रेस रिपोर्ट जारी नहीं की है। विकीलीक के दस्तावेज का मामला ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के दायरे में आता है। जैसे किसी पत्रकार का लेखन आता है। विकीलीक की घोषणा के साथ हमें देखना होगा कि क्या दस्तावेजों को सीधे पत्रकारिता कह सकते हैं ? जी नहीं।
    ये दस्तावेज पत्रकारिता का कच्चा माल हैं। कोई पत्रकार चाहे तो इनके आधार पर प्रेस के लिए लिख सकता है। पत्रकारों के लिए ये दस्तावेज प्रमाण हैं इसीलिए वे इन दस्तावेजों के प्रकाशन की हिमायत कर रहे हैं। दस्तावेज स्वयं में पत्रकारिता नहीं हैं। वे तो दस्तावेज हैं। इन दस्तावेजों में से सूचनाओं को छांटना,बीनना और फिर समाचार विश्लेषण के रूप में पेश करना पत्रकारिता है। लेकिन सीधे दस्तावेज छापना पत्रकारिता नहीं है। अधिकांश मीडिया घरानों के विकीलीक के आधार पर लिखवाया है, सीधे दस्तावेज नहीं छापे हैं। विकीलीक वालों ने ये दस्तावेज कैसे हासिल किए यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि वे प्रामाणिक दस्तावेज के आधार पर खबरें प्रकाशित कर रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं वे जासूसी करके दस्तावेज लाए हैं. कुछ कह रहे हैं वे घूस देकर दस्तावेज लाए हैं, कुछ आरोप लगा रहे हैं कि विकीलीक ने चोरी करके दस्तावेज हासिल किए हैं। विकीलीक ने दस्तावेज कैसे हासिल किए, यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि दस्तावेज में बतायी बातें सत्य हैं।
     पत्रकारिता का सत्य से रिश्ता होता है। अन्य चीजें उसके लिए गौण हैं। यह भी महत्वपूर्ण नहीं है कि सत्य का किस पर और क्या असर होगा। सत्य महत्वपूर्ण है। सत्य का स्थान राष्ट्रीय हितों.राष्ट्रवाद,सुरक्षा, सेना,मुखबिर,जासूस,राजनयिक,पेंटागन,सेना, सीआईए आदि से ऊँचा होता है। सत्य को पीडित और पीडक के दायरे में बांधकर नहीं रखा जा सकता है। सत्य को आप बंदी बनाकर या वर्गीकृत करके नहीं रख सकते। कारपोरेट मीडिया ने इराक और अफगानिस्तान युद्ध में सूचनाओं की हत्या की। सत्य को मौत के घाट उतारा । उस समय किसी ने हंगामा नहीं किया और जब विकीलीक ने कारपोरेट मीडिया के साजिश और अमेरिकी प्रशासन के साथ मिलीभगत को दस्तावेजों के साथ नंगा किया है तो कारपोरेट मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और अमेरिकी प्रशासन के मदांध शासक हल्ला कर रहे हैं कि असांजे को आतंकवादी है। देशद्रोही है। वे मांग कर रहे हैं कि असांजे को किसी तरह जेल में बंद कर दिया जाए।
    विकीलीक के दस्तावेजों ने बड़े मीडिया घरानों के विदेशी संवाददाताओं की तथाकथित सत्यतापूर्ण रिपोर्टिंग को भी असत्य करार दिया है। प्रकारान्तर से यह बताया है कि विदेशी संवाददाता इराक और अफगानिस्तान के मामले में रिपोर्टिंग करते हुए विशुद्ध झूठ बोल रहे हैं।
     विकीलीक ने कारपोरेट मीडिया के इस प्रचार की हवा निकाल दी है कि शीतयुद्ध खत्म हो गया है। ईरान के खिलाफ किस तरह परमाणु अस्त्रों के बहाने हंगामा खड़ा किया जा रहा है, चुनी गई सरकार के खिलाफ किस तरह बाहर से उकसावे और हस्तक्षेप की कार्रवाईयां हो रही हैं। किस तरह आज भी अमेरिका विभिन्न फंडामेंटलिस्ट और उग्रवादी,आतंकी गिरोहों की मदद कर रहा है और विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है। दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में कैसे शीतयुद्ध चल रहा है इसके व्यापक विवरण और ब्यौरे विकीलीक ने प्रकाशित किए हैं।
    अमेरिका के विभिन्न राजनयिकों के द्वारा प्राइवेट केबल संवाद किस तरह ईरान के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप चल रहा है इसकी सूचना देते हैं। इन केबल संवादों से यह भी पता चलता है कि अमेरिका विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करके क्षेत्रीय संतुलन को बदलना चाहता है।  
   जनता की राय का मेनीपुलेशन-     
      विकीलीक के बारे में अमेरिका स्थित ‘पेव रिसर्च सेंटर’ के मीडिया सर्वेक्षण पर भी गौर कर लेना समीचीन होगा। 29 नवम्बर2010 से लेकर 5 दिसम्बर 2010 के बीच में मीडिया में प्रकाशित खबरों के सर्वे के आधार पर पेव ने रेखांकित किया है कि 23-29 मार्च 2009 में अमेरिकी मीडिया में ओबामा का कवरेज एक सप्ताह के बीच में सबसे ज्यादा यानी 43 प्रतिशत था। उसके बाद 29 नवम्बर से 5 दिसम्बर की अवधि में प्रकाशित विकीलीक का कवरेज 13 प्रतिशत दर्ज किया गया। जबकि इसी अवधि में अमेरिका के समाचारपत्रों में आर्थिक कवरेज 28 प्रतिशत,सेना में समलैंगिकता का सवाल 5 प्रतिशत,2010 के चुनावों पर 4 प्रतिशत,अफगानिस्तान का कवरेज 3 प्रतिशत रहा।
   पेव के अनुसार विकीलीक की खबर उपरोक्त सप्ताह की दूसरी बड़ी खबर रही और इसने समग्र मीडिया में 16 फीसदी स्थान घेरा। इसमें अखबारों के प्रथम पन्ने की हैडलाइन से कर रेडियो-टीवी की खबरें,टॉक शो आदि सबका स्थान शामिल है। विकीलीक रहस्योदघाटन के बाद अमेरिकी मीडिया विकीलीक की खबरें तीसरी बार पहली पांच खबरों में स्थान बनाए रखने में सफल रही है। इनमें अफगानिस्तान के बारे में सूचनाएं 13 प्रतिशत ( 26 जुलाई 2010 से 1 अगस्त 2020 के बीच) रहीं।
    विकीलीक की 29 नवम्बर से प्रकाशित सामग्री में मीडिया में दो महत्वपूर्ण तत्व उभरे हैं। पहला, अमेरिकी कूटनीति,खासकर विदेश विभाग में काम करने वालों की प्रतिक्रियाएं और उसका अमेरिकी कूटनीति पर असर। दूसरा ,जूलियन असांजे की भूमिका। उसे अमेरिकी शासन के लोगों ने ‘हाइटेक आतंकवादी’ तक कह डाला। उसके सेक्सुअल दुर्व्यवहार पर इंटरपोल की सर्च करा दी गयी। विकीलीक के एक्सपोजर पर न्यूयार्क टाइम्स के कार्यकारी संपादक बिल केल्लर ने कहा कि ‘इस तरह के रहस्योदघाटन की अपनी चुनौतियां हैं।’ इसने व्यापक कवरेज हासिल किया। आरंभ के रहस्योदघाटन से यह बात साफ हो गयी कि अमेरिका अपने गोपनीय दस्तावेजों को सुरक्षित रखने में असफल रहा है। सभी माध्यमों में कवरेज का फोकस यही था कि ये दस्तावेज अमेरिकी विदेशनीति और नेताओं को कितनी क्षति पहुँचा सकते हैं। सीएनएन के टीकाकार डेविड गेर्गन ने कहा ये ‘‘दस्तावेज गंभीर क्षतिकारक हैं। यह कोई घोटाला नहीं है। लेकिन यहां हम देख रहे हैं कि अमेरिकी प्रशासन जनता से झूठ बोल रहा है।’’
 दूसरी ओर यह भी देखा गया कि 60 फीसद से ज्यादा अमेरिकी जनता ने कहा कि विकीलीक के दस्तावेजों का प्रकाशन नुकसानदेह है। पेव ने सर्वे में पाया कि 10 में 6 आदमी कह रहे थे कि इन दस्तावेजों का प्रकाशन नुकसानदेह है। जबकि 31 फीसदी ने कहा कि इससे जनसेवा हुई है। यह सर्वे 2-5 दिसम्बर 2010 को किया गया। रोचक बात यह थी कि पाठकों ने दस्तावेज और मीडिया की भूमिका में अंतर किया और पता चला कि 38प्रतिशत मानते थे कि मीडिया इस मामले को बहुत दूर तक खींचकर ले गया। जबकि 39 प्रतिशत का मानना था कि मीडिया ने संतुलन से काम किया है। मात्र 14 प्रतिशत ने कहा कि मीडिया ने गोपनीय दस्तावेजों को अतिरंजित करके छापा है। अगस्त 2010 में विकीलीक के दस्तावेजों के प्रकाशन के समय आम जनता में 47 प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने थोड़ा बहुत सुना है विकीलीक की स्टोरी के बारे में। जबकि 42 फीसदी ने कहा कि इसने जनहित के लक्ष्यों की पूर्ति की है।
    विभिन्न दलों में विकीलीक के प्रभाव को लेकर भिन्न राय थी। मसलन रिपब्लिकन का मानना था कि विकीलीक के प्रकाशन से जनता के हितों का नुकसान ज्यादा हुआ है। यानी 75 फीयदी मानते थे कि  नुकसान किया है जबकि मात्र 2 फीसद मानते थे कि जनहित की सेवा की है। डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों में 53 फीसदी मानते थे कि इससे जनहित की क्षति हुई है।जबकि 36 फीसद मानते थे कि जनहित की सेवा की है। जबकि बिना दल के लोगों में 53 फीसदी मानते थे कि जनहित की क्षति हुई है और 36 फीसद मानते थे कि जनहित में इनका प्रकाशन सही है।      
विकीलीक के खुलासे के बाद सीआईए और अमेरिकी दूतावास के अन्तस्संबंधों का पर्दाफाश हुआ है। कायदे से दूतावासों को जासूसी का केन्द्र नहीं बनाया जा सकता और खासकर सीआईए के केन्द्र या एजेंट के रूप में अमेरिकी कूटनीतिज्ञों का सीआईए के लिए काम करना चिंता की बात है।
   विकीलीक के खुलासे की शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और फ्रांस ने अपने सभी इंटरनेट सर्वरों से इसका संचार रोक दिया था ।अन्य देशों पर भी दबाब डाला गया कि वे प्रसारण बंद कर दें। स्वीडन का सर्वर अभी तक काम कर रहा था लेकिन स्वीडन सरकार पर अमेरिकी दबाब है कि वह अपने सर्वर के जरिए विकीलीक को संचार न करने दे। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि दुनिया की सभी गुप्तचर संस्थाएं हरकत में आ गयीं। अभी विकीलीक हम तक जो पहुँचा है वह उपासला स्थित सर्वर के माध्यम से पहुँचा है। स्वीडन के सर्वर के जरिए कोई विकीलीक पर पहुँचना चाहता है तो उसे इंकार का सामना करना पड़ रहा है। इंटरनेट अनुरोध को स्वीकार नहीं कर रहा है। चीन के द्वारा बड़े पैमाने पर विकीलीक पर हमले किए गए हैं। 
    विकीलीक केबल का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है कि अमेरिकी प्रशासन,चाहे वहां राष्ट्रपति कोई भी हो ,कभी भी मानवाधिकारों का सम्मान नहीं करता। सर्वसम्मत विश्व कानूनों को नहीं मानता। खासकर 2009 और 2010 में जितने केबल प्रकाशित किए गए हैं उनमें बताया गया है कि कौंसिल ऑफ यूरोप और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के द्वारा अमेरिका के द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को किस तरह अमेरिकी प्रशासन और उसके मित्रदेशों ने छिपाने और इन मंचों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। मसलन कौंसिल ऑफ यूरोप ने यह सत्य रहस्योदघाटित किया था कि अमेरिका आतंकियों के नाम पर किसी भी व्यक्ति को पकड लेता है और उसे तीसरी दुनिया के किसी भी देश में भेज देता है। वहां उसके ऊपर जांच पड़ताल के नाम से अत्याचार किए जाते हैं। इन देशों में ऐसे लोगों को किसी भी तरह का कानूनी संरक्षण नहीं दिया जाता। कौंसिल ने यह भी रेखांकित किया है कि यूरोपीय देशों का अमेरिका के प्रति नरम रूख है। कौंसिल ने यह भी खुलासा किया है कि सीआईए के यूरोप और अन्य देशों में काले जेलघर हैं। कौंसिल के द्वारा अमेरिका के बारे में किए गए खुलासों पर अमेरिकी प्रशासन कैसे सोचता रहा है इसकी झलक हमें स्ट्रासबर्ग में अमेरिका के कौंसिल जनरल विंसेंट कर्वर के विकीलीक केबल संदेशों के एक्सपोजर से पता चलती है। विकीलीक के मार्च 2009 में “Council of Europe: More Effective Around the Edges than at the Core.” शीर्षक से प्रकाशित केबल में विंसेंट ने लिखा है “The Council of Europe (COE) likes to portray itself as a bastion of democracy, a promoter of human rights, and the last best hope for defending the rule of law in Europe—and beyond. It is an organization with an inferiority complex and, simultaneously, an overambitious agenda. In effect, it is at its best in providing technical assistance to member-states and at its worst in tackling geo-political crises.” , “receives (rightfully, in our view) neither the level of funding nor the attention from member-states that other regional organizations, such as the EU and the OSCE (Organization for Security and Cooperation in Europe) receive.” आगे लिखा - “The ECHR will block the extradition of prisoners to non-COE countries if it believes they would be subject to the death penalty or torture. It has also requested more information on pending British extradition cases to the US where it believes the prisoners might be sentenced in the US to life imprisonment with no possible appeal or automatic judicial review of the life sentence.”
     विकीलीक के खुलासे के बाद से यह स्थिति बनी है कि अमेरिका और दूसरे देशों में उन पत्रकारों,अफसरों ,सैनिकों और राजनयिकों की खोज की जा रही है जो विकीलीक के लिए सूचनाएं जुटाने और मदद के काम में लगे हैं। अमेरिकी प्रशासन परेशान है कि उसे अभी तक विकीलीक के स्थानीय संपर्कों का पता नहीं चला है। विकीलीक की मदद करने वाले अमाजॉन कंपनी और पायपाल ने अमेरिकी दबाब में आकर सबसे पहले अपने हाथ खींचे, उसके बाद कई वित्तीय संस्थाओं ने अपने को विकीलीक से अलग कर लिया।
    पूंजीवादी ताकतों की नयी रणनीति है कारपोरेट अधिनायकवाद की। वे इस रास्ते पर राज्य को भी चलने के लिए बाध्य कर रहे हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का अर्थ है ‘हमारे साथ सहयोग करो वरना मरने को तैयार रहो।’ कारपोरेट अधिनायकवाद से सहयोग किए बिना जो जीना चाहता है उसको वे हाशिए पर डाल देते हैं,विभिन्न किस्म की समस्याओं में घेरकर परेशान करते हैं और अंत में मरने के लिए मजबूर करते हैं। विभिन्न पूंजीवादी देशों में राज्य इसी फार्मूले का अनुसरण कर रहा है और विकीलीक के मामले में भी यही रणनीति अपनायी गयी है।
    अमेरिका ने विकीलीक के हमदर्दों और सहायकों पर हमले तेज कर दिए हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद की खूबी है कि वह हमारी इच्छाओं पर शासन करता है। जो उसके खिलाफ प्रतिवाद कर रहे हैं उनको वह उन्हें धीमी गति से आत्महत्या करने या हत्याएं करने के लिए मजबूर करता है। कारपोरेट मीडिया किस तरह भय की सृष्टि करता है उसका आदर्श नमूना है अमेरिका में विकीलीक के रहस्योदघाटन पर किया गया जनमत सर्वेक्षण। 2दिसम्बर 2010 को अमेरिका में यह सर्वे किया गया। इस सर्वेक्षण में 2,000 लोगों से बात की गयी जिसमें से 63 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि विकीलीक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। इन लोगों ने अमेरिकी समाचारपत्रों के द्वारा विकीलीक के दस्तावेज प्रकाशित किए जाने का भी विरोध किया है।
    सवाल उठता है अमेरिकी जनता की यह राय कैसे बनी ? असल में विकीलीक के रहस्योदघाटन के बाद से विभिन्न माध्यमो और टीवी पर परिचर्चाओं और टॉक शो में विभिन्न दलों के नेताओं ने विकीलीक विरोधी घृणा का प्रचार किया हैं और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने बार बार एक ही बात पर जोर दिया है कि ‘‘विकीलीक के रहस्योदघाटन के बाद से असंख्य निर्दोष लोगों की जिंदगी के लिए खतरा पैदा हो गया है।’’यह प्रचार वास्तव में मिथ्या है।
     असल में विकीलीक ने बताया है कि अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण माल है युद्ध और हिंसा । अमेरिका सालाना सैंकड़ों विलियन डॉलर सेना पर खर्च करता है। यह अमेरिका के सभी व्यापारिक मुनाफों से ज्यादा बैठता है। उसके सभी राज्य,फेडरल और स्थानीय सरकारी संस्थानों के बजट से भी ज्यादा है। सेना को दीजाने वाली आर्थिक राशि पर अमेरिका में सांसद कभी सवाल नहीं उठाते। अमेरिका की सेना ही उसकी जनसंपर्क अधिकारी है। वही अमेरिका के लिए बाजार और संसाधन मुहैय्या कराती है।
   अमेरिका के मालों और विचारों को हम समृद्धि के मंत्र की तरह ग्रहण करते हैं। विकीलीक के इराक-अफगानिस्तान के जिस सत्य की ओर ध्यान खींचा हैं उसके दो प्रधान पहलू हैं ,पहला पहलू है, इराक-अफगानिस्तान के बारे में कारपोरेट मीडिया और अमेरिकी राजनीतिक दलों का असत्य प्रचार। दूसरा पहलू है, अमेरिकी सेना और राजनयिकों की भूमिका। इन सबकी धुरी है अमेरिका का सैन्य उद्योग।
   अमेरिका को जो लोग विकास के आदर्श मानक के रूप में देखते हैं वे सैन्य उद्योग और अमेरिकी आकांक्षाओं के बीच के अन्तस्संबंध की अनदेखी करते हैं। इस प्रसंग में सीनेटर जे. विलियम फुलब्राइट की किताब ‘ दि पेंटागन प्रौपेगैण्डा मशीन’ में बताए तथ्यों पर गौर कर लेना समीचीन होगा। उन्होंने लिखा है आज अमेरिका में 22,000 बड़े सैन्य ठेकेदार हैं। 100,000 सब-ठेकेदार हैं। अमेरिका के 363 स्थानों और 435 कांग्रेसनल जिलों में सैन्य उत्पादन केन्द्र हैं। अमेरिका के सैन्य उत्पादन केन्द्रों और सैन्य हरकतों को अमेरिकी जनता में अधिकांश समय समर्थन मिला है। इस समूचे अमेरिकी सैन्य उद्योग समूह में लाखों लोगों के हित दांव पर लगे हैं। और वे आम जनता की राय को प्रभावित करते हैं।
     पेंटागन के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उसके जनसंपर्क के नेटवर्क में 30 हजार से ज्यादा लोग काम करते हैं और एसोसिएट प्रेस की खोजी रिपोर्ट पर विश्वास करें तो विगत पांच सालों में सेना ने देश और विदेश में बेशुमार दौलत खर्च की है। अकेले 2009 में ही अमेरिकी सेना ने जनसंपर्क पर होने वाले खर्चे में 63 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है यानी 4.7 बिलियन डॉलर खर्च किया है। इसमें तकरीबन दो बिलियन ड़लर पैसा स्टाफ पर खर्च हुआ। इसके अलावा 1.6 बिलियन डॉलर नए लोगों की भर्ती पर खर्च किया गया। आधा बिलियन डॉलर मनोवैज्ञानिक युद्ध पर खर्च किया गया। जिसके जरिए विदेशी जनता को  निशाना बनाया गया। कुल मिलाकर जनसंपर्क पर 547 मिलियन डॉलर खर्च किया गया। इसका काम था अमेरिका जनता को पेंटागन के लक्ष्यों के अनुकूल ढ़ालना।
  पेंटागन के 2002 के आंतरिक दस्तावेज में जनसंपर्क बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया था। साथ ही यह भी तथ्य सामने आया कि सेना के 75 भू.पू, अफसरों को जनसंपर्क के लिए काम करने के लिए अनुबंधित किया गया और उन्हें टीवी और रेडियो कार्यक्रमों में उतारा गया। साथ ही इन लोगों का काम था अखबारों और पत्रिकाओं के लिए पेंटागन के पक्ष में लिखना।     
    अमेरिकी की आक्रामक विदेश नीति और हस्तक्षेपकारी भूमिका की धुरी यही सैन्य उद्योग है। जितने भी राजनयिक हैं वे इसी उद्योग के लिए जासूसी का काम करते हैं। अमेरिका में सतह पर लोकतंत्र है लेकिन वास्तव अर्थों में अमेरिकी सैन्य अधिकारी जो कहते हैं उसका राजनेता अनुकरण करते हैं। अमेरिका के सभी महत्वपूर्ण फैसले सैन्य उद्योग लेता है लेकिन ऊपर से यह चीज नजर नहीं आती।
    विकीलीक के एक्सपोजर के परे जाकर देखना चाहिए कि आखिरकार राजनयिक जासूसी क्यों कर रहे हैं ? युद्ध क्यों हो रहे हैं ? यहां महत्वपूर्ण यह नहीं है कि किसने क्या कहा ? बल्कि महत्वपूर्ण है सैन्य उद्योग ने क्या किया ? इराक-अफगानिस्तान के दस्तावेज हमें जमीनी हकीकत के एक अंश का अंदाजा देते हैं लेकिन हमें इन दस्तावेजों के परे जाकर पीछे से काम करने वाले सैन्य उद्योग की भूमिका पर विचार करना चाहिए। बिना उसके विकीलीक का एक्सपोजर विचारधारात्मक रूप में समझ में नहीं आएगा।  
    अमेरिकी सेना की नीतियों और आदेशों के अनुसरण का ही परिणाम है कि राजनयिक और अमेरिकी प्रशासन लोकतांत्रिक मूल्यों, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, देशज कानून, विश्व कानून,प्रोटोकोल आदि का खुला उल्लंघन करता रहा है।
    अमेरिका ने अपने शत्रुओं के खिलाफ सेना,भाड़े के सैनिकों और शारीरिक तौर पर सफाया कर देने की नीति का खुले तौर पर पालन किया है। ये सारी चीजें लोकतांत्रिक सरकार की इमेज के अनुकूल नहीं हैं बल्कि सैन्य अधिकारियों की मनोदशा के अनुकूल हैं।
    अमेरिका की विदेशनीति और प्रचार नीति में साझा तत्व है उन्माद का। वे जब भी किसी मसले को उठाते हैं तो उन्मादी की तरह उठते हैं । उन्मादी की तरह प्रचार करते हैं। उन्मादी प्रचार अमेरिकी सैन्य उद्योग का गहना है।
    अमेरिकी जनता में विकीलीक के एक्सपोजर को अधिकांश अमेरिकी जनता ने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ माना है। इसका प्रधान कारण क्या है ? असल में अमेरिकी सैन्य उद्योग समूह का भारी प्रचार अभियान सेना के पापों पर पर्दादारी करता रहा है। उल्लेखनीय है सैन्य समूह के प्रचार के निशाने पर सबसे पहले अमेरिकी जनता रहती है। वे मीडिया को पहले अपने अनुकूल बनाते हैं और बाद में उसके जरिए अमेरिकी जनता पर विचारों की वर्षा करते हैं।
      अमेरिकी सेना में कार्यरत सैनिकों को सैन्य उद्योग समूह और पेंटागन ने अपने विचारों का बंदी बनाकर रखता है। अमेरिका में इस समय भू.पू. सैनिकों की संख्या 28 मिलियन से ज्यादा है। यानी अमेरिका की वयस्क आबादी में पांच में से एक आदमी भू.पू. सैनिक है। इन लोगों के दिमागों की धुलाई हो चुकी है और उस पर निरंतर सैन्य विचारों की महत्ता के पेंटागन प्रचार का दबाब रहता है।
    इसके अलावा 3 मिलियन सैनिक हैं जिनकी अहर्निश पेंटागन दिमागी धुलाई करता रहता है। इन लोगों तक सैन्य विभाग के प्रचार के अलावा अन्य कोई प्रचार नहीं पहुँच पाता है। उल्लेखनीय है 1.5 मिलियन सैन्य स्टेशन विदेशों में हैं जहां पर सैनिकों को पेंटागन और सुरक्षा विभाग के अलावा अन्य किसी भी स्रोत से सूचना नहीं मिलती।
   सेना के विभिन्न अंगों के लिए बड़े पैमाने पर रेडियो और टेलीविजन चैनलों की व्यवस्था है। संभवतः यह विश्व में सबसे बड़ी सैन्य सूचना-मनोरंजन व्यवस्था है। अमेरिकी सेना के नेतृत्व में चलने वाले जमीनी 704 रेडियो और 80 टेलीविजन स्टेशन हैं। ये थाईलैंड से लेकर ईरान तक फैले हुए हैं।  इसके अलावा समुद्री बेड़ों में 56 रेडियो और 11 टेलीविजन स्टेशन हैं। रेडियो स्टेशनों से 450,000 रेडियो कार्यक्रमों के ट्रांस्क्रिप्शन और 60 मिलियन फीट लंबी टीवी फिल्में सालाना मुहैय्या करायी जाती हैं।
   चूंकि सेना 35 सालों से भी ज्यादा समय शीतयुद्ध का हिस्सा रही है अतः आज सेना के लोग अपने को राष्ट्रीय राजनीति का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। अमेरिकी सैन्य उद्योग किसी न किसी बहाने युद्ध को प्रधान एजेण्डा बनाए रखता है और शांति का विरोध करता है। अमेरिका को विश्वस्तर पर अलग-थलग डालने के लिए जरूरी है कि युद्ध की बजाय शांति को प्रधान एजेण्डा बनाया जाए। शांति को समाज में स्थापित करने के लिए लोकतंत्र का ईमानदारी के साथ पालन किया जाए। यही विकीलीक का सबक है।  

















बुधवार, 1 सितंबर 2010

ऐसे चली फेसबुक पर हिन्दीभाषा पर बहस

                             

Ajay Brahmatmaj -कल मेरे अध्‍यापक मित्र जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ने विरोधपूर्ण आपत्ति जतायी कि मैं हिंदी शब्‍दों को रोमन फॉण्‍ट में न लिखूं। उनकी भावनाओं की मैंने हमेशा कद्र की है,इसलिए उनसे पूरी तरह सहमत नहीं होने पर भी आज का स्‍टेटस नागरी में लिख रहा हूं। आप की क्‍या राय है?
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Sharad Dixit - जर्मनी में अंग्रेजी कम बोली जाती है। यही हाल रूस का है। भारतेंदु जी के शब्‍दों में निज भाषा उन्‍नति अहै सब उन्‍नति को मूल।

Ajay Brahmatmaj - जगदीश्‍वर चतुर्वेदी का गुस्‍सा...इंटरनेट पर हिन्दी वालों में भाषायी विभ्रम
पूरा http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

Prakash K Ray - likhne ki unki baat maan bhi li jaye par unse poochhiye ki naagari mein bola kaise jaye...
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Ravindra Ranjan -आपने बहुत अच्छा किया, कृपया इस स‌िलसिले को जारी रखें
Prakash K Ray on Chaturvedi Sir's opinion in his blog:- "I call the discourse of power any discourse that engenders blame, hence guilt, in its recipient." -Roland Barthes
Ashish Bansal -भाषा वो ही लिखें जो सबको समझ में आए विरोध का सिर्फ आदर करें

Khurshid Anwar - Jagdishwar ki bhavana ki qadar karna ek baat hai lekin unke is vichar se asahmat hone par unka vichar mana apne vichar se ashmati dikhana hai. Waise yeh bahas hindi urdu dono main rahi hai. maan lo main apne vichar urdu mein likhna chaun to kya karun? Script badal dun to jagdishwar kya samajh payenge. Tab kya kahoge urdu mein vichar vyakt karna hi band kar do?
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Ravi Shekhar - parivartan sanasar ka niyam hai....jo parivartan se katrayega ..ruk jayega...bas bahte raho...jo bah gaya -bah gaya, jo rah gaya rah gaya...!
Khurshid Anwar-  Yeh jagsishwar ke liye جگدیشور اب کیا خیال ہے
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Bhuwnesh Prabhu Joshi-  chahe roman mai ho ya nagri mai.... Hindi bhasha ka parsar antrastriya star par hona chahiye.....
garv hai Hindi bhashi hone par
Gaurav Solanki -एक आदर्श नियम तो कहता है कि हर भाषा उसकी लिपि में ही लिखी जाए तो बेहतर है. कोशिश भी यही की जानी चाहिए, लेकिन जैसा ख़ुर्शीद साहब ने कहा, फिर उर्दू लिखने के लिए भी उसकी लिपि का इस्तेमाल करने की वकालत होनी चाहिए. हम हिन्दुस्तानी लिखते हुए भी उर्दू के शब्दों को देवनागरी में लिखते हैं, इस पर उनका क्या स्टैंड है?
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Khurshid Anwar- bhai Gaurav main bilkul vakalat nahi kar raha urdu shabdon ko usi lipi main likhne ki.apki post mein behtar, koshish, sahab, urdu, istemaal, vakalat, jaiose shabd 'istemal' hue. devnagri mein hamesha isi tarah likhe gaye aur aisa hi hona ch...
Vineet Kumar - नागरी में लिखकर अच्छा ही किया,हम शुद्धतावादी आग्रह की वजह से तो नहीं लेकिन पढ़ने में दिक्कत होती है इसलिए कहूंगा कि ऐसा ही करें। लेकिन अगर कोई इस वजह से लिखना छोड़ता है कि उसे नागरी टाइप करनी नहीं आती तो उन्हें जगदीश्वरजी की बातों पर कान नहीं देनी चाहिए। पहली चीज है लिखना,अपने को व्यक्त करना। तब बाकी चीजें आती हैं..
Krishna Gopal - रोमन मेँ हम शब्द तो लिख देते हैँ परन्तु भाव कहीँ पिछे रह जातेँ हैँ..
Vibha Rani - मित्रों का ख्याल रखने मं वैसे भी आपका कोई मुकाबला नहीं कर सकता.
Jagadishwar Chaturvedi - मेरी बात को गलत समझा गया है, मैं हिन्दी में न लिखने का विरोध नहीं कर रहा था। मैं उस समस्या की ओर ध्यान दिला रहा था जो अंग्रेजी में हिन्दी के लिखने से पैदा हो रही है।आप सभी दोस्त हैं कैसे भी लिखें , हिन्दी को लेकर मैं किसी भी किस्म के शुद्धतावाद के पक्ष में नहीं हूँ। आप जैसा चाहें लिखें। क्योंकि खिचड़ी भाषा या परायी भाषा के प्रति आकर्षण ही इंटरनेट संस्कृति का परिणाम है। सवाल यह है कि क्या हम अपनी भाषा को नेट के सार्वजनिक मंच के उपयुक्त बनाते हैं या नहीं ? बहुभाषियों में क्या हिन्दी संवाद का माध्यम नहीं हो सकती ?
अजय ब्रह्मात्मज- mitron ...roman mein likhne se mujhe kai aise mitra mile hain jo jo hindi bol aur samjh sakte hain,lekin likh-padh nahin paate.kya main aise mitron ki parwaah na karoon?main apna lekhan khalis hindi mein karta hoon,lekin ab mehsoos ho raha hai ki english mein likhna chahiye...bade recognition aur jyada paison ke liye...
Abhishek Tiwari - bahut badhiya sir , ye to aapke dil me mitron ke prati shradha ka bhaw hai jo aapko prerit kar rahaa hai ,
Farid फ़रीद Khan ख़ाँ - मैं किसी भाषा और किसी भी लिपि का विरोधी नहीं हूँ। संप्रेषणीयता का रूप निरंतर बदलता भी रहता है। पर मैं कुछ कहना चाहता हूँ : ऐसे बहुत सारे भारतीय साहित्यकार हैं जो अगर अपना साहित्य अंग्रेज़ी में लिखने लगें तो उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल जाये। वेद व्यास, तुलसीदास, मीराबाई, मीर, ग़ालिब, निराला, मुक्तिबोध, सुब्रह्मण्य भारती आदि से लेकर वे भी जो आज जीवित हैं। देश का विकास और निर्माण केवल 'पथ निर्माण' और 'पुल निर्माण' से ही नहीं होता है। अपनी भाषा और अपनी अभिव्यक्ति भी उस विकास का ही हिस्सा है। वैश्वीकरण प्रदत्त अर्थयुग ने सबसे पहले सस्कृतियों का ही नाश किया है। मैं अपनी सीमा में इस वैश्वीकरण से लड़ रहा हूँ और जिन्हें हिन्दी नहीं आती या मुश्किल पेश आती, उन्हें हिन्दी सिखा रहा हूँ

Balram Kanwat बलराम कांवट -fareed saab sahi hain.
Vikash Kumar-  sir mere hisaab se trade off hona chahiye... english me bhi likhiye aur hindi me bhi... english me commercial motivation and self publicity k liye likhiye aur hindi me seva-bhav se likhiye... service to tradition and our heritage.
waise mujhe lagta hai ke agle 40-50 saal me hindi ke samajhdar pathak bahut kam ho jayenge.. vilupt nahi honge lekin kam rah jayenge. hindi literature ka commercial level pe importance already kafi kam ho gaya hai.. aur 2 generation k baad pata nahi kya hoga..



Renu Gupta - Apka fisla sahi hoga @Farid yeh kisi bhasha ke prati pakshpat nahi hai balki sawal is baat ka hai ki hum kaya kehna chahten hain aur kis tak pahuchana chahte hain - yadi kahani aur kavita likhani hai to ek bhasha ka sath nibhana padega lekin journalism ko bhsha ki seemaon mein nahi bandha ja sakta.
about an hour ago · Like
Jagadishwar Chaturvedi - रेनू जी आपने आधा सच बोला है। इंटरनेट पर सभी भाषाभाषी लोग हैं और वे अपनी-अपनी भाषा में लिख रहे हैं। इंटरनेट पर संवाद का यह रूप अनौपचारिक है अतः किसी भी भाषा में कर सकते हैं और किसी भी विषय पर कर सकते हैं लेकिन इस संदर्भ में हमें विकासशील समाजों के अनुभवों से सीखना चाहिए। जर्मन या फ्रेंच के ज्यादातर लोग अपनी भाषा में संवाद कर रहे हैं, चीन का इंटरनेट का अधिकांश यूजर चीनी भाषा में संवाद कर रहा है इसमें बुद्धिजीवी भी शामिल हैं। अजय यदि संवाद के नाम पर फेसबुक में अंग्रेजी में हिन्दी लिखता है तो कोई अन्याय नहीं करता लेकिन भविष्य के साथ अन्याय कर रहा है। इन दिनों हम जो कुछ भी फेसबुक या ट्विटर पर लिख रहे हैं उसकी अमेरिकन लाइब्रेरी में एक संग्रहशाला बन गयी है और भविष्य में लोग उसे देखकर फैसला करेंगे कि भारत के बुद्धिजीवी फेसबुक पर कैसे अंग्रेजी में हि्दी लिखते थे। फेसबुक पर भाषा के प्रति कट्टर भाव संभव नहीं है लेकिन पर्सुएशन के भाव से ही दिल जीता जा सकता है। जो लोग जानबूझकर अपनी भाषा की उपेक्षा कर रहे हैं उन्हें समझाया जाना चाहिए।
Khurshid Anwar -Jagdishwar aap pehle yeh tai karein ki aap bhasha ki baat kar rahe hain lipi ki. Agar aap apni post dekhen to adhiktar baat aap bhadsha ke sandarbh mein kar rahen hain lekin baat shuru hui thi lipi ke sandarbh se. yeh post jo main likh raha hun ya Renu ne likhi usme utni hi samanya hindi ke shabd hain jitni aap ki post mein. Lipi ke sawal par na sirf aap balki bahutere urdu wale yahi tark detein hain jo aapne diya. Kai bhashayen officially Roman mein likhi jati hain lekin woh angrezi nahi hain Kya samvaad ki bhsha lipi badlne se mar jati hai? kya uski mahatta kam ho jati hai. Aur yeh sara sandarbh Sahityik lekhan ka nahi hai matra samvaad ka hai
about an hour ago ·
Renu Gupta - Apne jo German, French or China ke udharan diye, un deshon mein hamare desh ki tarah ki vikat paristhithi nahi hai unki sirf ek hi bhasha hai par hum hidustaniyon ke liye, ye ek savendansheel vishay hai. Hum sabko apni paristhiti ke anusar apna faisla kud lena hai.
Khurshid Anwar-  Main Renu se sahmat hun
Jagadishwar Chaturvedi - भाई साहब आप असहमत रहें तो अच्छा होगा। अब तक आप ही थे,कम से कम अब तो रेनू से खुलकर बातें करने दो। यह मामला भाषा के बहाने खुल रहा है। इंटरनेट की भाषा को लेकर हमें अभी से सतर्क होना होगा। बाद में काफी देर हो जाएगी। उर्दू की हम उपेक्षा करके बर्बाद कर चुके हैं। शानदार भाषा थी और आज भी है। काश खुर्शीद का संचार उर्दू में भी होता और कोई पास होता तो हम भी समझते।
Jagadishwar Chaturvedi - दोस्त संवाद करते-करते ही हम अपनी भाषा भूल रहे हैं।
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Prakash K Ray - सर, कौन सी भाषा भूलने की बात कर रहे हैं....वो भाषाएँ जो आदिवासियों की हैं (जिनमें अधिकांश अब थी हो गयीं) या वो भाषाएँ जिन्हें बोलियों की श्रेणी में डाल कर ढांप दिया गया.... यह हिन्दी तो क़ायदे से डेढ़ सौ साल की भी नहीं हुई... क्या हुआ ब्रज का, अवधी का, राजस्थानी का, भोजपुरी का.... और सबसे बड़ा सवाल कि कैसे और क्यों हुआ.. हिंदी की राजनीति ने मारा उर्दू को.. हिंदी के तेवर औपनिवेशिक हैं... मेरी मातृभाषा भोजपुरी है... हिंदी उतनी ही अपनी है जितनीअंग्रेजी...

Jagadishwar Chaturvedi - प्रकाश जी, वे सभी भाषाएं जो मीडिया और शिक्षा में जगह नहीं बना पाईं उन्हें हम भूलने लगे हैं। आदिवासियों की भाषाओं से लेकर ब्रजभाषा तक सबका एक ही जैसा परिणाम निकला है।

सोमवार, 2 अगस्त 2010

आतंकवाद और अमेरिकी खेल

      आतंकवाद राजनीतिक फिनोमिना है।इसका एक आयाम राज्य आतंकवाद है।आमतौर पर राज्य आतंकवाद के संदर्भ में अमरीकी आतकवाद की भूमिका की अनदेखी होती है। अमरीकी आतंकवाद महज राजनीतिक हिंसाचार नहीं है अपितु आतंकवाद का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संगठनकर्त्ता है।यह साम्राज्यवादी हितों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों का विस्तार भी है।यह भी कह सकते हैं कि द्वितीय विश्व युद्धोत्तर दौर में आतंकवाद का साम्राज्यवाद के हितों के विस्तार के लिए संगठित ढ़ंग से विकास किया गया और इस कार्य को अमरीका,सीआईए और पेंटागन के जरिए विश्वव्यापी फिनोमिना के तौर पर फैलाया गया।इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में अपराधी गिरोहों,भाड़े के सैनिकों के सैन्य दलों का गठन किया गया।इन कार्यों के लिए अमरीकी सरकार ने पर्याप्त मात्रा मे धन,सैन्य सामग्री और प्रचार माध्यमों की सहायता मुहैयया कराई।साथ ही खुल्लमखुल्ला राजनीतिकसमर्थन भी प्रदान किया और तमाम किस्म के हत्यारों को अपने देश में शरण दी। इस कार्य में राजनीतिक मुद्दे,मकसद और मदद सुनिश्चित करने में अमरीका के विदेश विभाग और विदेश नीति का गहरा हाथ रहा है। 

अमरीकी आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं का विश्वव्यापी रहस्योद्धाटन करने में नॉम चोमस्की की अग्रणी भूमिका रही है।हाल ही में 11सितम्बर और उसके बाद के घटनाक्रम पर सबसे ज्यादा सुसंगत ढ़ंग से उन्होंने प्रकाश ड़ाला है।चोमस्की के विचारों में अमरीकी प्रशासन की समग्र नीतियों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।वह विश्व के प्रति अमरीका के समग्र नजरिए की आलोचना करते हुए विकल्प के प्रस्तावों को सामने लाते हैं। 

चोमस्की ने 17 फरवरी के न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख के जबाव में 19फरवरी2002 को जेड नेट वेबसाइट को दिए अपने एक साक्षात्कार में कहा कि 11 सितम्बर को अमरीका में आतंकी हमले के बाद बहुराष्ट्रीय प्रचार माध्यमों ने जिस तरह एकायामी ढ़ंग से अमरीकी सरकार के भोंपू का कार्य किया उससे आतंकवाद के बारे में सही समझ बनने की बजाए भ्रम की सृष्टि ज्यादा हुई। मसलन् यह कहा गया कि 11 सितम्बर के हमले के पीछे लादेन का हाथ था। यदि यह सच भी हो तब भी हमें यह जानना चाहिए कि उसके क्या कारण थे ?इससे गरीबों और असहाय लोगों को तो कोई मदद मिलने से रही।यहां तक कि फिलिस्तीनियों को भी इससे कोई मदद मिलने से रही।यदि लादेन ने इसकी योजना बनाई थी तो उसका लक्ष्य क्या था ? इसके जबाव में चोमस्की ने कहा कि हमें इसके प्रति सतर्क होकर सोचना चाहिए। 

रॉबर्ट फिस्क के अनुसार (जिसने लादेन के कई लंबे-लंबे साक्षात्कार लिए थे)इस क्षेत्र की जनता में फिलिस्तीनियों के खिलाफ इजराइली हिंसाचार और उत्पीड़न को अमरीका द्वारा दिए गए समर्थन के खिलाफ गुस्सा था साथ ही इराक के खिलाफ आर्थिक पाबंदी के नाम पर जो तबाही मचाई गई उसके कारण अमरीका के खिलाफ तीव्र गुस्सा था।इस सबको लादेन महसूस न करता हो इसमें संदेह है। 

अनेक लोग यह भी मानते हैं कि अफगानिस्तान की गुफाओं में रहने वाले लादेन में 11सितम्बर जैसे सुव्यवस्थित और उच्च तकनीकी संपन्न हमला करने की क्षमता नहीं हो सकती।किन्तु उसके नेटवर्क का इसमें हाथ हो सकता है।वह अपने अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत रहा है।इसके बावजूद याद रखें कि इस नेटवर्क का ढ़ांचा विकेन्द्रित रहा है।इसका गैर हायरार्कीकल ढांचा है।इनमें सीमित स्तर पर संचार संबंध हैं।चोमस्की ने कहा कि जब विन लादेन यह कहता है कि उसे 11सितम्बर की घटना के बारे में कुछ भी नहीं मालूम तो संभवत: वह सच बोल रहा हो। क्योंकि वह वाचाल है यदि उसने इस आपरेशन की अनुमति दी होती तो वह जोर-जोर से इसकी घोषणा भी करता। 

चोमस्की ने कहा कि इन सब बातों को छोड़ भी दें तब भी हमे यह ध्यान रखना होगा कि विन लादेन क्या चाहता है इसे लेकर उसका इरादा एकदम साफ है।यह बात वह किसी पश्चिमी से बात करते समय ही ध्यान में नहीं रखता अपितु किसी अरब से बात करते समय भी ध्यान में रखता है।आम लोगों में प्रसारित उसके कैसेट बताते हैं कि वह पश्चिम को बताना चाहता है कि सऊदी अरब और इस क्षेत्र के भ्रष्ट और जुल्मी शासनों के खिलाफ उसके अंदर जबर्दस्त गुस्सा है।इनमें से कोई भी सच्चा ''इस्लामिक''नहीं है। वह और उसका नेटवर्क मुसलमानों का गैर मुसलमानों के खिलाफ समर्थन करता रहा है।चेचेन्या,बोसनिया,श्मीर,पश्चिमी चीन,दक्षिण-पूर्व एशिया,उत्तरी अफ्रीका आदि स्थानों पर वह मुसलमानों का समर्थन करता रहा है।उन्हें मुस्लिम अफगानिस्तान से सोवियत संघ (उनके अनुसार यूरोपीय)को खदेड़ देने और युध्द जीतने का मौका मिला।वे अमरीका को सऊदी अरब से निकाल बाहर करने के प्रति और भी ज्यादा उत्साही थे।इससे भी बड़ी बात यह कि वे सऊदी अरब एक पवित्र देश है और इससे अमरीका को बाहर किया जाए।साथ ही वे सऊदी अरब के बर्बर, भ्रष्ट और गिरोहवाज शासकों को उखाड़ देना चाहता था।यह भी सच है कि लादेन के अपराध इस क्षेत्र के गरीबों और सबसे ज्यादा शोषितों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह हैं।उसका ताजा हमला फिलिस्तीनियों के लिए सबसे क्षतिकारक है।लेकिन दूर से देखने पर ऐसा नहीं लगता। जो साहस के साथ उत्पीड़को के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं उन्हें यह वास्तव में हीरो लगता होगा। किंतु बहुसंख्यक गरीबों के लिए उसके एक्शन क्षतिकारक हैं।यदि अमरीका उसको मारने में सफल हो जाता है तब वह और भी बड़ा शहीद हो जाएगा और उसके कैसेट और भी ज्यादा सुनाई देंगे।वह प्रतीक है।वस्तुगत शक्ति है।खासकर अमेरिका और इस क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता के लिए। 

प्रत्येक दृष्टि से वह जो कह रहा है उस पर ध्यान देना चाहिए।इसके अपराध सीआई के लिए शायद आश्चर्यजनक हों।क्योंकि इस्लामिक तत्ववादियों को संगठित करने और हथियारबंद करने में अमेरिका-मिस्र-फ्रांस-पाकिस्तान की सक्रिय भूमिका रही है। 





शनिवार, 17 जुलाई 2010

‘हेडलाइन टुडे’ पर हमला और फासीवादी संचार फ्लो

    अंग्रेजी टीवी चैनल ’हेडलाइन टुडे’ ने 15जुलाई 2010 को एक स्टिंग ऑपरेशन करके यह बताया कि आरएसएस का आतंकवाद या हिन्दू उग्रवाद से गहरा संबंध है। इस संबंध में भाजपा के एक भू.पू. सांसद के विचारों को कैमरे में कैद करके स्टिंग ऑपरेशन किया गया और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप आरएसएस ने आजतक / हेडलाइन टुडे के ऑफिस पर हमला बोल दिया। अधिकांश दलों ने चैनल के दफ्तर पर हमले की निदा की है। एक दल ने संघ से माफी मांगने को कहा है तो कुछ ने पाबंदी की मांग की है।
         इस समस्या के कई आयाम हैं। पहला आयाम है टीवी चैनल या मीडिया के प्रति आरएसएस का हमलावर रवैय्या। संघ के लोग समय-समय पर मीडिया पर हमले करके मीडिया का मुँह बंद करने और आतंकित करने की कोशिश करते रहे हैं। वे पहले भी अनेक मीडिया कंपनियों पर हमले कर चुके हैं। संघ के प्रति आलोचनात्मक रूख रखने वाले मीडिया के प्रति हमलावर रूख नई बात नहीं है। संघ के द्वारा नियमित ऐसे हमले किसी न किसी बहाने होते रहते हैं। इंटरनेट की बेवसाइटों पर इनके हमलों की व्यापक सूचनाएं उपलब्ध हैं।

    इस मसले का दूसरा आयाम ‘हेडलाइन टुडे’ और धर्मनिरपेक्ष दलों और भाजपा से जुड़ा है। हम सब जानते हैं कि ‘हेडलाइन टुडे’ के लोग पेशेवर लोग हैं। वे भोले और गैर-पेशेवर नहीं हैं। वे फोकट में काम नहीं करते, फोकट में खबर भी नहीं देते। खबर उनका धंधा है। संघ के बारे में उन्होंने कोई नई बात नहीं दिखाई है।
    केन्द्र सरकार के खुफिया विभाग वाले जानते हैं कि संघ क्या है,केन्द्र में जिन दलों की सरकार है वे भी जानते हैं कि संघ एक फासिस्ट संगठन है। लेकिन मुश्किल यह है कि संघ के द्वारा जिस पार्टी का संचालन होता है वह है भाजपा। भाजपा को लोकतांत्रिक विपक्ष का दर्जा हासिल है। क्या कांग्रेस की इस हमले के पीछे मुख्य विपक्षीदल भाजपा को राजनीतिक तौर पर बर्बाद करने की मंशा काम कर रही है ?
        कांग्रेस और दूसरे दलों को यह बात सोचनी चाहिए कि क्या किसी भी व्यक्ति को लोकतंत्र में महज फासीवादी विचार रखने के कारण जेल में ड़ाला जा सकता है ? क्या स्टिंग ऑपरेशन खबर है ? आखिरकार ‘ हेडलाइन टुडे ’ ने ऐसी कौन सी नई बात कही है जिस पर इतना बबाल मच रहा है ? क्या संघ के लोग नहीं जानते कि उनके विचार क्या हैं ? क्या वे ‘ स्टिंग  ऑपरेशन’ में व्यक्त विचारों को नहीं जानते थे ? वे जानते हैं कि उनके भू.पू.सांसद के क्या विचार हैं । फिर ‘हेडलाइन टुडे’ पर हमला क्यों ? धरना ,प्रदर्शन.प्रतिवाद क्यों ?
    संघ को अगर किसी पर आपत्ति हो सकती थी तो उस सांसद के विचारों पर होनी चाहिए थी, उस सांसद के घर जाकर प्रदर्शन करना चाहिए था। टीवी टुडे वालों का इसमें कोई कसूर नहीं है उन्होंने तो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए संघ के पूर्व सांसद के विचारों को चैनल पर सार्वजनिक मात्र किया है। यह महज फासीवादी विचारों का प्रसारण है।
     इस स्टिंग ऑपरेशन में कोई खबर नहीं थी। यहां तो मात्र एक व्यक्ति के विचार सुनाए गए थे। इस तरह के विचारों में डूबे हुए सैंकड़ों-हजारों बंदे संघ के पास हैं। संघ के प्रकाशनों में नियमित ऐसी बातें और विचार प्रकाशित होते रहते हैं जिनसे पत्रकारिता के मानकों का आए दिन उल्लंघन होता है। इन विचारों को आसानी से राष्ट्रविरोधी विचारों की कोटि में रखा जा सकता है लेकिन कांग्रेस की केन्द्र सरकार से लेकर न्यायपालिका के जजों तक किसी को भी इनके बारे में संज्ञान लेने की फुर्सत नहीं है।
      हेडलाइन टुडे’ पर संघ के कार्यकर्ताओ के हमले की जितनी निंदा की जाए कम है। लेकिन ‘हेडलाइन टुडे’ के मीडिया विशेषज्ञों को यह जानना चाहिए कि उन्होंने संघ के एक पूर्व सांसद के उग्र हिन्दूवाद संबंधी विचारों का प्रसारण करके संघ की विचारधारात्मक सेवा की है। संघ इस तरह के प्रसारणों से कमजोर नहीं होगा बल्कि उसकी आक्रामकता में इजाफा होगा।
      संघ के फासीवादी विचारों का किसी भी रूप में प्रचार अंततः संघ की सेवा है। चैनल वाले इस मामले में बिन लादेन के पैटर्न का अनुगमन कर रहे हैं। जिस तरह बिन लादेन के आतंकी विचारों के वीडियो कैसेट जारी किए जाते हैं ,ठीक उसी पैटर्न पर किसी न किसी बहाने भारत के चैनल वाले संघ के आतंकी विचारों का वीडियो बनाकर जारी कर रहे हैं। फ़र्क यह है बिन लादेन के आतंकी विचार स्वयं उसके होते हैं। यहां थोड़ा विकेन्द्रीकरण है और संघ के मौजूदा और भू.पू. प्रचारकों और कार्यकर्ताओं के विचारों का प्रचार के लिए चैनल इस्तेमाल कर रहे हैं।
    आतंकी या फंडामेटलिस्ट विचार जब मासमीडिया के जरिए किसी भी रूप में प्रसारित किए जाएंगे तो वे सनसनी,खबर,प्रमाण,सत्य आदि नहीं रह जाते बल्कि प्रौपेगैण्डा में तब्दील हो जाते हैं। विचारधारात्मक प्रचार में अपने के रूपान्तरित कर लेते हैं और संक्रमित करते हैं। आतंकी संगठन चाहते हैं कि उनके विचार संक्रमित हों, फैलें, प्रसारित हों। इस तरह के विचारों का प्रसारण संबंधित संगठन की साख में इजाफा करता है। यह बात अनेक बड़े मीडिया विशेषज्ञों ने रेखांकित की है।
       ‘हेडलाइन टुडे’ वालों की चाहे जो मंशा रही हो लेकिन उन्होंने फासीवादी विचारों को प्रसारित किया है। आतंकी विचारों का प्रसारण आतंकवाद की सेवा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पत्रकारिता नहीं है ,यह किसी भी मानक के आधार पर स्वस्थ पत्रकारिता नहीं है। इसकी किसी भी रूप में वैधता नहीं है। ऐसी स्थिति में संघ के बारे में ‘हेडलाइन टुडे’ का तथाकथित भंडाफोड़ महज एक सनसनीखेज प्रस्तुति है। यह विचारधारात्मक संघर्ष नहीं है। यदि मीडिया के फासीवादी संचार फ्लो के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इस तरह की प्रस्तुतियां बेहतर ढ़ंग से समझ में आ सकती हैं।
    मीडिया में फासीवादी संचार फ्लो का मतलब है समाचार की जगह निर्मित खबर, काल्पनिक खबर,संदर्भरहित खबर,स्रोतरहित खबर, अफवाह या प्रचार की खबर, संवाददाता, फोटोग्राफर,संपादक के नाम के बिना खबर आदि कुछ नमूने हैं जो फासीवादी समाचार फ्लो का निर्माण करते हैं। क्या ’आजतक’ और ‘हेडलाइन टुडे’ इस फासीवादी संचार फ्लो का अनुकरण नहीं कर रहे ? क्या स्रोत.संदर्भ,सत्य की समाचार से विदाई में ये चैनल अग्रणी नहीं हैं ?
     उल्लेखनीय है फासीवाद के विचारधारात्मक आधार को ऐसी खबरें ज्यादा मदद करती हैं जो फासीवादी संचार मॉडल पर आधारित होती हैं। यही बुनियादी बिंदु है जहां से खड़े होकर मीडिया समाचार प्रस्तुतियों और ‘हेडलाइन टुडे’ के तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन को देखना चाहिए।       

















बुधवार, 30 जून 2010

'उत्तरआधुनिक' एजेंडा क्या है? - 3- इलेन मिकसिन्स वुड

   वर्तमान उत्तरआधुनिकतावाद के बारे में एक और विशेष रूप से रोचक बात है, एक खास रूप से नोट करने लायक अंतर्विरोध। एक ओर यह इतिहास के प्रतिवाद पर आधारित है, जो एक प्रकार के राजनीतिक निराशावाद से जुड़ा है। चूंकि कोई भी ऐसा तंत्र और कोई भी इतिहास नहीं है जिसके प्रयोजनमूलक विश्लेषण की गुंजाइश है, अत: हम बहुत सारी शक्तियों के मूल तक नहीं पहुंच सकते, जो हमारा दमन करती है; और हम किसी प्रकार के संयुक्त विरोध, किसी प्रकार की सामान्य मानव मुक्ति अथवा पूंजीवाद के विरुध्द वैसे आम संघर्ष की भी आकांक्षा नहीं कर सकते जिसमें समाजवादी विश्वास करते थे। अधिक से अधिक हम कई विशिष्ट और पृथक प्रतिरोधों की उम्मीद कर सकते हैं।
दूसरी ओर ऐसा प्रतीत होता है कि इस राजनीतिक निराशावाद का उद्गम पूंजीवादी संपन्नता और संभावना के प्रति अपेक्षाकृत अधिक आशावादी दृष्टिकोण में है। आज के उत्तरआधुनिकतावाद (जैसा कि हमने देखा है यह प्रतीकात्मक रूप से साठ के दशक की पीढ़ी के उत्तरजीवियों तथा उनके छात्रों द्वारा अपनाया गया है), जिसकी विश्व के प्रति दृष्टि अभी भी पूंजीवाद के 'स्वर्णिम युग' में बध्दमूल है, के अनुसार पूंजीवादी व्यवस्था के प्रमुख लक्षण हैं : 'उपभोक्तावाद', उपभोग के पैटर्न की विविधता तथा 'जीवन-शैलियों' का प्रसार। भाषा और विमर्श पर उत्तरआधुनिकतावादी द्वारा जोर दिया जाना उनकी उपभोक्ता पूंजीवाद के प्रति आसक्ति तथा उनके इस दृढ़ विश्वास में देखा जा सकता है कि पुरानी राजनीतिक एजेंसियां (विशेष रूप से श्रमिक आंदोलन) स्थायी रूप से पूंजीवादी उपभोक्तावाद के 'प्रभुत्व' में आ गई हैं। बौध्दिक आचरण को सामाजिक जगत के केंद्र में स्थापित कर तथा बुध्दिजीवियों को प्रोत्साहित कर या विशेष रूप से शिक्षाविदों को ऐतिहासिक एजेंसी का अग्रदूत बनाकर उत्तरआधुनिकतावाद ने इन प्रभुता संपन्न एजेंसियों का स्थानापन्न नई एजेंसियों से करने के लिए अंतिम, और प्राय: भौंडा, अतिवादी और सुपरिचित प्रयास
किया है।
यहां भी उत्तरआधुनिकतावादी बुध्दिजीवी अपने मौलिक गैर-इतिहासवाद को दरशाते हैं। ऐसा लगता है युध्दोतर तेजी के 'स्वर्णिम' क्षण के बाद के पूंजीवाद के संरचनात्मक संकट ठीक उनके सामने से निकल गए हैं या कम से कम इनका उन पर कोई खास सैध्दांतिक प्रभाव नहीं पड़ा है। कुछ के अनुसार इसका अर्थ यह है कि पूंजीवाद के विरोध के अवसर बहुत सीमित हो गए हैं। अन्य मानो यह कह रहे हों कि अगर हम सचमुच व्यवस्था को बदल नहीं सकते या यहां तक कि समझ नहीं सकते (या इसे हम व्यवस्था मानें भी) और अगर हमारे पास कोई श्रेयस्कर स्थिति न है न हो सकती है, जिससे कि हम उस व्यवस्था की आलोचना कर सकें इसका विरोध करने की तो बात ही छोड़िए, तो भी बैठकर इसका आनंद उठा सकते हैं या इससे भी बेहतर है कि खरीददारी करने जा सकते हैं।
इन बौध्दिक प्रवृत्तियों के प्रतिपादक भाष्यकार निश्चित तौर पर जानते हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है लेकिन इन प्रवृत्तियों में शायद ही कुछ ऐसा है, जिससे उदाहरण के लिए आज की बढ़ती हुई गरीबी तथा बेघरबारी, गरीब मेहनतकश वर्ग के बढ़ते आकार, असुरक्षित और पार्ट टाइम श्रमिक के नए रूपों आदि को समझने में मदद मिलती हो। बीसवीं सदी के अस्पष्ट इतिहास के दोनों पक्षों, इसकी विभीषिकाओं तथा इसके चमत्कारों ने निस्संदेह उत्तरआधुनिकतावादी चेतना के निर्माण में भूमिका निभाई है। लेकिन जिन विभीषिकाओं ने प्रगति की पुरानी धारणा को नष्ट किया है, वे आज के उत्तरआधुनिकतावाद की सुस्पष्ट प्रकृति को परिभाषित करने में उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा उपभोक्ता पूंजीवाद की धन समृध्दि। उत्तरआधुनिकतावाद कभी-कभी पूंजीवाद की अस्पष्टता के समान दिखता है, तब जब इसे उनके नजरिए से देखा जाए जो इसके फायदों का आनंद उठाते हैं न कि उनके दृष्टिकोण से जो इसकी लागतों को झेलते हैं।
अंतिम विश्लेषण में 'उत्तरआधुनिकता' उत्तरआधुनिकतावादी बुध्दिजीवियों के लिए इतिहास का एक क्षण न होकर स्वयं मानवीय स्थिति प्रतीत होती है, जिससे बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं। यदि मिलस के अनुसार उनके युग की प्रमुख समस्या यह थी कि प्रसन्नचित्त यंत्रमानवों में स्वतंत्रता अथवा तर्कना की शक्ति होने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, तो नव उत्तरआधुनिकतावादी स्वयं भी उन्हीं अभिवृत्तियों को प्रदर्शित करते हैं जिनकी मिलस ने निंदा की थी। यहां तक कि वे उन्हीं संकटापन्न प्रबोधन मूल्यों को आधुनिक बुराइयों की जड़ मानते हैं और उन्होंने उन्हें निसर्गत: दमनकारी मानकर खुलेआम अस्वीकार कर दिया है। दूसरे शब्दों में, उत्तरआधुनिकतावाद अब निदान नहीं, बीमारी बन गया है।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...