शनिवार, 17 जुलाई 2010

‘हेडलाइन टुडे’ पर हमला और फासीवादी संचार फ्लो

    अंग्रेजी टीवी चैनल ’हेडलाइन टुडे’ ने 15जुलाई 2010 को एक स्टिंग ऑपरेशन करके यह बताया कि आरएसएस का आतंकवाद या हिन्दू उग्रवाद से गहरा संबंध है। इस संबंध में भाजपा के एक भू.पू. सांसद के विचारों को कैमरे में कैद करके स्टिंग ऑपरेशन किया गया और उसकी प्रतिक्रियास्वरूप आरएसएस ने आजतक / हेडलाइन टुडे के ऑफिस पर हमला बोल दिया। अधिकांश दलों ने चैनल के दफ्तर पर हमले की निदा की है। एक दल ने संघ से माफी मांगने को कहा है तो कुछ ने पाबंदी की मांग की है।
         इस समस्या के कई आयाम हैं। पहला आयाम है टीवी चैनल या मीडिया के प्रति आरएसएस का हमलावर रवैय्या। संघ के लोग समय-समय पर मीडिया पर हमले करके मीडिया का मुँह बंद करने और आतंकित करने की कोशिश करते रहे हैं। वे पहले भी अनेक मीडिया कंपनियों पर हमले कर चुके हैं। संघ के प्रति आलोचनात्मक रूख रखने वाले मीडिया के प्रति हमलावर रूख नई बात नहीं है। संघ के द्वारा नियमित ऐसे हमले किसी न किसी बहाने होते रहते हैं। इंटरनेट की बेवसाइटों पर इनके हमलों की व्यापक सूचनाएं उपलब्ध हैं।

    इस मसले का दूसरा आयाम ‘हेडलाइन टुडे’ और धर्मनिरपेक्ष दलों और भाजपा से जुड़ा है। हम सब जानते हैं कि ‘हेडलाइन टुडे’ के लोग पेशेवर लोग हैं। वे भोले और गैर-पेशेवर नहीं हैं। वे फोकट में काम नहीं करते, फोकट में खबर भी नहीं देते। खबर उनका धंधा है। संघ के बारे में उन्होंने कोई नई बात नहीं दिखाई है।
    केन्द्र सरकार के खुफिया विभाग वाले जानते हैं कि संघ क्या है,केन्द्र में जिन दलों की सरकार है वे भी जानते हैं कि संघ एक फासिस्ट संगठन है। लेकिन मुश्किल यह है कि संघ के द्वारा जिस पार्टी का संचालन होता है वह है भाजपा। भाजपा को लोकतांत्रिक विपक्ष का दर्जा हासिल है। क्या कांग्रेस की इस हमले के पीछे मुख्य विपक्षीदल भाजपा को राजनीतिक तौर पर बर्बाद करने की मंशा काम कर रही है ?
        कांग्रेस और दूसरे दलों को यह बात सोचनी चाहिए कि क्या किसी भी व्यक्ति को लोकतंत्र में महज फासीवादी विचार रखने के कारण जेल में ड़ाला जा सकता है ? क्या स्टिंग ऑपरेशन खबर है ? आखिरकार ‘ हेडलाइन टुडे ’ ने ऐसी कौन सी नई बात कही है जिस पर इतना बबाल मच रहा है ? क्या संघ के लोग नहीं जानते कि उनके विचार क्या हैं ? क्या वे ‘ स्टिंग  ऑपरेशन’ में व्यक्त विचारों को नहीं जानते थे ? वे जानते हैं कि उनके भू.पू.सांसद के क्या विचार हैं । फिर ‘हेडलाइन टुडे’ पर हमला क्यों ? धरना ,प्रदर्शन.प्रतिवाद क्यों ?
    संघ को अगर किसी पर आपत्ति हो सकती थी तो उस सांसद के विचारों पर होनी चाहिए थी, उस सांसद के घर जाकर प्रदर्शन करना चाहिए था। टीवी टुडे वालों का इसमें कोई कसूर नहीं है उन्होंने तो स्टिंग ऑपरेशन के जरिए संघ के पूर्व सांसद के विचारों को चैनल पर सार्वजनिक मात्र किया है। यह महज फासीवादी विचारों का प्रसारण है।
     इस स्टिंग ऑपरेशन में कोई खबर नहीं थी। यहां तो मात्र एक व्यक्ति के विचार सुनाए गए थे। इस तरह के विचारों में डूबे हुए सैंकड़ों-हजारों बंदे संघ के पास हैं। संघ के प्रकाशनों में नियमित ऐसी बातें और विचार प्रकाशित होते रहते हैं जिनसे पत्रकारिता के मानकों का आए दिन उल्लंघन होता है। इन विचारों को आसानी से राष्ट्रविरोधी विचारों की कोटि में रखा जा सकता है लेकिन कांग्रेस की केन्द्र सरकार से लेकर न्यायपालिका के जजों तक किसी को भी इनके बारे में संज्ञान लेने की फुर्सत नहीं है।
      हेडलाइन टुडे’ पर संघ के कार्यकर्ताओ के हमले की जितनी निंदा की जाए कम है। लेकिन ‘हेडलाइन टुडे’ के मीडिया विशेषज्ञों को यह जानना चाहिए कि उन्होंने संघ के एक पूर्व सांसद के उग्र हिन्दूवाद संबंधी विचारों का प्रसारण करके संघ की विचारधारात्मक सेवा की है। संघ इस तरह के प्रसारणों से कमजोर नहीं होगा बल्कि उसकी आक्रामकता में इजाफा होगा।
      संघ के फासीवादी विचारों का किसी भी रूप में प्रचार अंततः संघ की सेवा है। चैनल वाले इस मामले में बिन लादेन के पैटर्न का अनुगमन कर रहे हैं। जिस तरह बिन लादेन के आतंकी विचारों के वीडियो कैसेट जारी किए जाते हैं ,ठीक उसी पैटर्न पर किसी न किसी बहाने भारत के चैनल वाले संघ के आतंकी विचारों का वीडियो बनाकर जारी कर रहे हैं। फ़र्क यह है बिन लादेन के आतंकी विचार स्वयं उसके होते हैं। यहां थोड़ा विकेन्द्रीकरण है और संघ के मौजूदा और भू.पू. प्रचारकों और कार्यकर्ताओं के विचारों का प्रचार के लिए चैनल इस्तेमाल कर रहे हैं।
    आतंकी या फंडामेटलिस्ट विचार जब मासमीडिया के जरिए किसी भी रूप में प्रसारित किए जाएंगे तो वे सनसनी,खबर,प्रमाण,सत्य आदि नहीं रह जाते बल्कि प्रौपेगैण्डा में तब्दील हो जाते हैं। विचारधारात्मक प्रचार में अपने के रूपान्तरित कर लेते हैं और संक्रमित करते हैं। आतंकी संगठन चाहते हैं कि उनके विचार संक्रमित हों, फैलें, प्रसारित हों। इस तरह के विचारों का प्रसारण संबंधित संगठन की साख में इजाफा करता है। यह बात अनेक बड़े मीडिया विशेषज्ञों ने रेखांकित की है।
       ‘हेडलाइन टुडे’ वालों की चाहे जो मंशा रही हो लेकिन उन्होंने फासीवादी विचारों को प्रसारित किया है। आतंकी विचारों का प्रसारण आतंकवाद की सेवा है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘स्टिंग ऑपरेशन’ पत्रकारिता नहीं है ,यह किसी भी मानक के आधार पर स्वस्थ पत्रकारिता नहीं है। इसकी किसी भी रूप में वैधता नहीं है। ऐसी स्थिति में संघ के बारे में ‘हेडलाइन टुडे’ का तथाकथित भंडाफोड़ महज एक सनसनीखेज प्रस्तुति है। यह विचारधारात्मक संघर्ष नहीं है। यदि मीडिया के फासीवादी संचार फ्लो के परिप्रेक्ष्य में देखें तो इस तरह की प्रस्तुतियां बेहतर ढ़ंग से समझ में आ सकती हैं।
    मीडिया में फासीवादी संचार फ्लो का मतलब है समाचार की जगह निर्मित खबर, काल्पनिक खबर,संदर्भरहित खबर,स्रोतरहित खबर, अफवाह या प्रचार की खबर, संवाददाता, फोटोग्राफर,संपादक के नाम के बिना खबर आदि कुछ नमूने हैं जो फासीवादी समाचार फ्लो का निर्माण करते हैं। क्या ’आजतक’ और ‘हेडलाइन टुडे’ इस फासीवादी संचार फ्लो का अनुकरण नहीं कर रहे ? क्या स्रोत.संदर्भ,सत्य की समाचार से विदाई में ये चैनल अग्रणी नहीं हैं ?
     उल्लेखनीय है फासीवाद के विचारधारात्मक आधार को ऐसी खबरें ज्यादा मदद करती हैं जो फासीवादी संचार मॉडल पर आधारित होती हैं। यही बुनियादी बिंदु है जहां से खड़े होकर मीडिया समाचार प्रस्तुतियों और ‘हेडलाइन टुडे’ के तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन को देखना चाहिए।       

















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