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शनिवार, 14 मई 2016

कीर्तन ,संस्कृति और राजनीति


       
कीर्तन-भजन हमारा समाज कब से कर रहा है यह ठीक-ठीक बताना मुश्किल है।भजन के लिए पवित्र मंत्र चाहिए।जबकि कीर्तन के लिए संगीत और लय चाहिए।भजन अकेले की साधना है ,जबकि कीर्तन सामूहिक आनंद है।कीर्तन बुनियादी तौर पर शास्त्रीय संगीत का विकल्प है।शास्त्रीय संगीत में गायक प्रमुख है। जबकि कीर्तन एकल नहीं सामूहिक होता है।शास्त्रीय संगीत में गायक-श्रोता आमने-सामने होते हैं। उनमें विभाजन या अंतराल बना रहता है।जबकि कीर्तन में श्रोता की भिन्न स्थिति नहीं होती।बल्कि कीर्तन में वह शामिल होता है।गायक-श्रोता का वर्गीकरण कीर्तन के लिए बेमानी है।

शब्द का अपना इतिहास होता है,मंशा होती है और उससे जुड़ी राजनीति भी होती है।मजदूरों की बस्ती में जब कीर्तन होता है तो उसका लक्ष्य वही नहीं रहता जो मन्दिर में होने वाले कीर्तन का है।कईबार दंगों के पहले कीर्तन का आयोजन करके दंगों के लिए माहौलबनाया गया है।अपराधी लोग अपने को पुण्यात्मा के रूप में स्वीकृति दिलाने के लिए कीर्तन कराते हैं।इस नजरिए से देखें तो कीर्तन का अर्थ संदर्भ और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।फलतःकीर्तन भिन्न भिन्न परिस्थितियों में भिन्न अर्थ की सृष्टि करता है।नए विमर्शों को जन्म देता है।

हिन्दीभाषी क्षेत्रों से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तरपूर्व के राज्यों तक कीर्तन के अनेक रूप प्रचलन में हैं।कीर्तन की विशेषता है किसी मंत्र विशेष का संकीर्तन।जैसे-हरे राम हरे राम ,राम राम हरे हरे,हरे कृष्णा हरे कृष्णा,कृष्णा-कृष्णा हरे हरे।यह वैष्णव सम्प्रदाय का जनप्रिय कीर्तन है।इन दिनों इस कीर्तन में पश्चिम और पूर्व का सम्मिश्रण खूब हो रहा है।हरे राम हरे कृष्णा सम्प्रदाय से लेकर श्रीश्री रविशंकर आदि तमाम धार्मिक गुरूओं के यहां कीर्तन के सम्मिश्रित रूपों को आसानी से देखा जा सकता है। कीर्तन में मंत्र,शरीर, और संगीत लय इस कदर गुंथे होते हैं कि उनसे निकलकर सोचना असंभव होता है।



कीर्तन में नाद का आनंद और उन्माद अंतर्ग्रथित है।अंतमें शिरकत करने वाले के पास कीर्तन की स्मृति मात्र रह जाती है।कीर्तन ने संगीत प्रस्तुति के प्रभुत्वशाली रूपों को चुनौती दी है और शिरकत के भावबोध को जन्म दिया है। कीर्तन में हर कोई शिरकत कर सकता है।इस अर्थ में कीर्तन सेकुलर है। प्रिफॉर्मर और श्रोता के बीच के भेद को कीर्तन खत्म कर देता है।कीर्तन में हर कोई अपनी लय,भाव,भाषा और भंगिमा के साथ शिरकत करता है।कीर्तन में कोई भी गीत या मंत्र बार-बार दोहराया जाता है और पुनरावृत्ति के क्रम में ही संगीत की लय में एकता और आनंद की सृष्टि होती है।पुनरावृत्ति समर्पण और धर्मनिरपेक्ष भावबोध निर्मित करती है।इस अर्थ में कीर्तन धर्मनिरपेक्षीकरण का महत्वपूर्ण औजार है। कीर्तन में शरीर,शब्द और गीतात्मक ये तीनों मिलकर नए परिवेश और अनुभूति की सृष्टि करते हैं।यह प्रक्रिया अशिक्षित-शिक्षित में अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है,ध्वनि और शब्द की अंतर्क्रियाओं को जन्म देती है।इसमें अंतर्निहित द्वयार्थात्मकता भी अपना खतरनाक खेल खेलती है।अभी तक हम मानते रहे हैं कि शब्द सबसे ताकतवर होता है,हठात कीर्तन हमें यह बोध देता है लय और नाद ताकतवर होते हैं। वेद की ऋचाओं के पाठ के जरिए नाद की जो परंपरा आरंभ हुई वह सचेत रूप से कीर्तन में चली आई है,उसी तरह वैदिक ऋचाओं का पाठ जिस नाद की सृष्टि करता है वह ऋचाओं में निहित अर्थ को छिपाने का काम करता है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां पर हमें सोचना चाहिए और सवाल उठाना चाहिए कि कीर्तन की मंशा क्या है ॽ विचारधारा क्या है ॽविचारधारा का संबंध मंशा से है।आयोजक कौन है और किसलिए आयोजन किया जा रहा है ॽऔर किस स्थान पर आयोजन किया जा रहा हैॽ ये सवाल कीर्तन से गहरे जुड़े हैं,इनके आधार पर कीर्तन की विचारधारा को रेखांकित करने में मदद मिल सकती है।

बुधवार, 25 नवंबर 2015

गुरु नानकदेव और उनकी विश्वदृष्टि


संत गुरु नाननदेव मेरे सबसे प्रिय संत-कवि हैं। उनकी रचनाएं और जीवनशैली देखने के बाद नए किस्म के व्यक्ति और नए किस्म के मूल्यबोध की सृष्टि होती है। नानक उन संतों में हैं जिसने गाना गाकर सब कुछ पा लिया। गाना इतनी तल्लीनता के साथ गाया कि गान ही जीवन का सर्वस्व बन गया। पूरे मन-प्राण से गाने से उनको जो मिला वह अपने आपमें बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसलिए जो भी काम करें प्राण लगाकर करें तो सफलता जरुर मिलती है।प्राण लगाकर एक गीत गा दो सफलता मिलेगी।नाच लो सफलता मिलेगी,कक्षा पढाओ सफलता मिलेगी,भाषण दो तो लोग प्रशंसा करेंगे।

नानक की विश्वदृष्टि का मूलाधार है “जपुजी”,

आदि सचु जुगादि सचु

मंत्र:

इक ओंकार सतिनाम

करता पुरखु निरभउ निरवैर।

अकाल मूरित अजूनी सैभं गुरु प्रसाद।।

जपु:

आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

पउड़ी: 1

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार।

भु.खया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।

सहस सियाणपा लख होहि, त इक न चले नालि।

किव सचियारा होइए, किव कूड़ै तुटै पालि।

हुकिम रजाई चलणा 'नानक' लिखिआ नालि।

अर्थात् -आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

'वह आदि में सत्य है, युगों के आरंभ में सत्य है, अभी सत्य है। नानक कहते हैं, वह सदा सत्य है।

भविष्य में भी सत्य है।'



'वह एक है, ओंकार स्वरुप है, सत नाम है, कर्ता पुरुष है, भय से रहित है, वैर से रहित है, कालातीत-

मूर्त्ति है, अयोनि है, स्वयंभू है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है।'

एक है--इक ओंकार सतिनाम।

जो भी हमें दिखाई पड़ता है वह अनेक है। जहां भी तुम देखते हो, भेद दिखाई पड़ता है। जहां तुम्हारी आंख

पड़ती है, अनेक दिखाई पड़ता है। सागर के किनारे जाते हो, लहरें दिखाई पड़ती हैं। सागर दिखाई नहीं पड़ता।

हालांकि सागर ही है। लहरें तो ऊपर-ऊपर हैं।

किसी भी बात को कहने के लिए कहानी में कहो तो बात बेहतर ढ़ंग से संप्रेषित होती है, कहानी सच है और कहानी कल्पना भी है।कहानी हमेशा प्रतीक के बहाने संप्रेषित होती है। नानक की कहानी में भी प्रतीक का बड़ा महत्व है।जब भी कोई गहरी बात कहनी हो प्रतीक के माध्यम से कहो तो बेहतर ढ़ंग से संप्रेषित होगी। प्रतीकात्मक कहानी यह है कि नानकदेव अपने मित्र मरदाना के साथ नदी किनारे बैठे हुए बातें कर रहे थे, अचानक उन्होंने अपने कपड़े उतारे और नदी में कूद गए,मरदाना ने काफी खोजबीन की लेकिन नानक का कोई पता नहीं चला। गांव लौटकर सब गांववालों को खबर दी कि नानक नदी में नहाने गए तो निकले ही नहीं। सारा गांव नदी किनारे एकत्रित हो गया,नानक की कहीं कोई खबर नहीं मिल रही थी, सब रो रहे थे,क्योंकि सारा गांव नानक को बहुत प्यार करता था।तीन दिन बीत गए लोगों ने मान लिया कि नानक डूब गए या फिर किसी जानवर ने उनको खा लिया। सब यही सोच रहे थे कि वे अब नहीं लौटेंगे। लेकिन तीसरे दिन अचानक नानक प्रकट हुए। गांववालों की खुशी का ठिकाना न रहा।प्रकट होने पर “जपुजी” नामक पहला अमृत वचन कहा। कहने को यह कहानी बहुत छोटी है लेकिन बेहद मारक है। इस कहानी के मर्म में प्रवेश करने की जरुरत है। यह कहानी इसलिए नहीं बता रहे हैं कि हम नानक के जरिए चमत्कार चर्चा करना चाहते हैं,बल्कि हम तो इसमें निहित संदेश को जानना चाहते हैं। इसका पहला संदेश है कि जब तक तुम खो न जाओ,मिट न जाओ तुमको परमात्मा नहीं मिलता। तुम्हारा खो जाना ही उसको पाना है। नानक को खो जाने में तीन दिन लगे,तीन दिन बाद परमात्मा को पाया। अजीब संयोग है कि जब भी कोई आदमी मरता है तो उसके सूतक से मुक्त होने में तीन दिन लगते हैं।मृतक का तीसरा मनाते हैं। तीसरा इसलिए मनाते हैं क्योंकि मरने की घटना को घटित होने में तीन दिन लगते हैं। कहने का आशय यह कि जब तुम किसी के सामने मरते हो तो सामने वाला ही परमात्मा होता है। नानक की भी यही दशा थी। मनुष्य के परमात्मा में लोप की पहली सीढ़ी है अहंकार का लोप।यह मनुष्यत्व को पाने की पहली सीढ़ी है।

सिक्ख वह है जो गृहस्थ भी है और सन्यासी भी है। सिक्ख वह है जो सीखने वाला है। सिक्ख का मतलब है गृहस्थ और सन्यासी का एक साथ होना। गृहस्थ होकर सन्यासी होना बड़ा टेढ़ा मामला है।लोग गृहस्थी से भागकर सन्यासी होते हैं। लेकिन नानक ने गृहस्थी से भागकर संत पद नहीं पाया,वे गृहस्थ रहकर सन्यासी बने।यानी रहना घर में लेकिन ऐसे रहना जैसे सन्यासी हो।यानी रहना घर में लेकिन ऐसे रहना जैसे नहीं रहते हो। हिमालय पर रहते हो। नानक ने सन्यासी की यह परिभाषा निर्मित की इसने समूचे भक्ति आंदोलन के चरित्र को प्रभावित किया।हमारे अनेक संत कवि सपरिवार रहते थे और संत थे। नानक इस संसार से भागने के शिक्षा नहीं देते बल्कि इस संसार से प्रेम करने की शिक्षा देते हैं।

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार।

भुखिया भुख न उतररी जे बंना पुरीआं भार।

सहस सियाणपा लख होहि, त इक न चले नालि।

किव सचियारा होइए, किव कूड़ै तुटै पालि।

हुकिम रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि।

यह बड़ा कीमती, बहुमूल्य सूत्र है। यह नानक के नजरिए का सार है। भगवान सोचने से या चिन्तन से नहीं मिलता, चिन्तन करोगे तो भटक जाओगे। सवाल सोचने का नहीं है देखने का है। देखने के लिए निर्मल आँखें चाहिए। विचारों से भरी आँखों से देखोगे तो चीजें समझ में नहीं आएंगी।भगवान को सोचकर पाया नहीं जा सकता। भगवान के पक्ष में बनाए गए विचारों की यह सबसे गंभीर आलोचना है। हम बार-बार भगवान की सत्ता सिद्द करने के लिए विचारों की मदद लेते हैं जो कि गलत है। नानक की अकाट्य पद्धति थी जिसके जरिए वे विवेकवाद की ओर मुड़ते थे,एक नमूना देखें-

नानक एक मुसलमान नवाब के घर मेहमान थे। नानक को क्या हिंदू क्या मुसलमान! जो ज्ञानी है, उसके लिए

कोई सम्प्रदाय की सीमा नहीं। उस नवाब ने नानक को कहा कि अगर तुम सच ही कहते हो कि न कोई हिंदू न

कोई मुसलमान, तो आज शुक्रवार का दिन है, हमारे साथ नमाज पढ़ने चलो। नानक राजी हो गए। पर उन्होंने

कहा कि अगर तुम नमाज पढ़ोगे तो हम भी पढ़ेंगे। नवाब ने कहा, यह भी कोई शर्त की बात हुई? हम पढ़ने

ही जा रहे हैं। पूरा गांव इकट्ठा हो गया। मुसलमान-हिंदू सब इकट्ठे हो गए। हिंदुओं में तहलका मच गया। नानक के घर के लोग भी पहुंच गए कि यह क्या कर रहे हो? लोगों को लगा कि नानक मुसलमान होने जा रहे हैं। लोग अपने भय से ही दूसरे के भय को भी तौलते हैं।नानक मस्जिद गए। नमाज पढ़ी गई। नवाब बहुत नाराज हुआ। बीच-बीच में लौट-लौट कर देखता था कि नानक न तो झुके, न नमाज पढ़ी। बस खड़े रहे । लोगों ने जल्दी-जल्दी नमाज पूरी की, लेकिन क्रोध में कहीं नमाज पूरी हो सकती है । किसी तरह नमाज पूरी करके लोग नानक पर टूट पड़े।और उन्होंने कहा कि तुम धोखेबाज हो।कैसे साधु ,कैसे संत हो ! तुमने वचन दिया नमाज पढ़ने का लेकिन तुमने नमाज की नहीं।

नानक ने कहा, वचन दिया था, शर्त आप भूल गए। कहा था कि आप नमाज पढोगे तो मैं भी पढूँगा। आपने नहीं पढ़ी तो मैं कैसे पढ़ता ? नवाब ने कहा, क्या कह रहे हो? होश में तो हो ? इतने लोग गवाह हैं कि हम नमाज पढ़ रहे थे।नानक ने कहा इनकी गवाही मैं नहीं मानता,क्योंकि मैं आपको देख रहा था कि भीतर क्या चल रहा है।आप काबुल में घोड़े खरीद रहे थे। नवाब थोड़ा हैरान हुआ;क्योंकि खरीद वह घोड़े ही रहा था।उसका सबसे अच्छा घोड़ा मर गया था उसी दिन सुबह।वह उसी की पीड़ा से भरा था।नमाज क्या खाक पढ़ता !वह नमाज पढ़ते हुए मन में यही सोच रहा था कि जल्दी से काबुल जाऊँ और बढिया घोड़ा खरीदकर लाऊँ।क्योंकि वही घोड़ा उसी शान था,इज्जत था।और नाननक ने कहा कि यह जो मौलवी है तुम्हारा,जो नमाज पढ़वा रहा था,यह खेत में अपनी फसल काट रहा था। और यह बात सच थी।मौलवी ने भी कहा कि बात तो सच है।फसल पक गयी है और काटने का दिन आ गया है।गांव में मजदूर नहीं मिल रहे हैं और मन पर चिंता सवार है। तो नानक ने कहा ,अब तुम बोलो,तुमने नमाज पढ़ी जो मैं साथ दूँ ? इस कहानी का आशय एकदम साफ है। तुम जबर्दस्ती नमाज पढ लो,पूजा-उपासना कर लो, इस सबका कोई मूल्य नहीं है।पहले सोचो तुम्हारे मन में क्या चल रहा है ? पत्थर की तरह मूर्ति के सामने बैठ जाने से ईश्वर या मन सधेगा ?







शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

रामकृष्ण परमहंस और फेसबुक



-1- 

रामकृष्ण परमहंस ने प्रेम की जो परिभाषा दी है वो शानदार है। लिखा है- "पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है। वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं। इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था।

दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक-दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं।यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है।

परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है। इस समर्थ प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है तुम सुखी रहो ,मुझे चाहे कुछ भी हो। राधा में यह प्रेम विद्यमान था। श्रीकृष्ण के सुख में उन्हें सुख था।गोपियों ने भी यह उच्चावस्था प्राप्त की थी।

-2-

भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं,शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं ,सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं.सब ने देखा, भीष्म की आंखों में आंसू बह रहे हैं।अर्जुन

श्रीकृष्ण से बोले , भाई यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह -जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं,सत्यवादी है,जितेन्द्रिय,ज्ञानी,आठों वसुओं में से एक हैं- वेभी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं। यही बात भीष्मदेव से जब श्रीकृष्ण ने कही तो भीष्मदेव ने कहा ,कृष्ण ,तुम तो खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ। जब सोचता हूँ कि जब स्वयं भगवान पाण्डवों के सारथि हैं ,फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अंत नहीं होता तब यही सोचकर आंसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया।

-3-

रामकृष्ण परमहंस ने लिखा है," जिसका मन जिस पर रमता है वह उसी को चाहता है;कहां रहता है,उसकी कितनी कोठियां हैं, कितने बगीचे हैं,कितना धन है ,परिवार में कौन-कौन हैं,नौकर कितने हैं -इसकी खबर कौन लेता है ?"

-4-

फेसबुकप्रेम तो ईश्वरप्रेम की तरह है।इसके रास्ते में जितने बढोगे उतने ही कर्म छूटे चले जाएंगे।

-5-

जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है ।जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा कुछ घट जाता है।केवल 'पूड़ी लाओ,पूड़ी लाओ' की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् -शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा।तब सब चुप !

-6-

रामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्त शिवनाथ को देखकर कहा ,"क्या शिवनाथ तुम आए हो ,देखो तुम लोग भक्त हो,तुम लोगों को देखकर बड़ा आनंद होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है,कभी तो उसे गले ही लगा लेता है।"

फेसबुकिए की दशा भी क्या गंजेडी जैसी है ?

-7-

रामकृष्ण परमहंस ने जातिप्रथा को समाप्त करने के लिए एक सुंदर सुझाव दिया है, उन्होंने कहा- "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है।वह उपाय है -भक्ति।भक्तों के जाति नहीं है।"

-8-

रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह लिखा है ''कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। '' यह बात सौ फीसद आज भी सत्य है।

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...