शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

रामकृष्ण परमहंस और फेसबुक



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रामकृष्ण परमहंस ने प्रेम की जो परिभाषा दी है वो शानदार है। लिखा है- "पहला जो 'साधारण' प्रेम है उसमें प्रेमी केवल अपना ही सुख देखता है। वह इस बात की चिन्ता नहीं करता कि दूसरे व्यक्ति को भी उससे सुख है अथवा नहीं। इस प्रकार का प्रेम चन्द्रावली का श्रीकृष्ण के प्रति था।

दूसरा प्रेम जो 'सामंजस्य' रूप होता है उसमें दोनों एक-दूसरे के सुख के इच्छुक होते हैं।यह एक ऊँचे दर्जे का प्रेम है।

परन्तु तीसरा प्रेम सबसे उच्च है। इस समर्थ प्रेम में प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है तुम सुखी रहो ,मुझे चाहे कुछ भी हो। राधा में यह प्रेम विद्यमान था। श्रीकृष्ण के सुख में उन्हें सुख था।गोपियों ने भी यह उच्चावस्था प्राप्त की थी।

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भीष्मदेव देह छोड़ना चाहते हैं,शरों की शय्या पर लेटे हुए हैं ,सब पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ खड़े हैं.सब ने देखा, भीष्म की आंखों में आंसू बह रहे हैं।अर्जुन

श्रीकृष्ण से बोले , भाई यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि पितामह -जो स्वयं भीष्मदेव ही हैं,सत्यवादी है,जितेन्द्रिय,ज्ञानी,आठों वसुओं में से एक हैं- वेभी देह छोड़ते समय माया में पड़े रो रहे हैं। यही बात भीष्मदेव से जब श्रीकृष्ण ने कही तो भीष्मदेव ने कहा ,कृष्ण ,तुम तो खूब जानते हो कि मैं इसलिए नहीं रो रहा हूँ। जब सोचता हूँ कि जब स्वयं भगवान पाण्डवों के सारथि हैं ,फिर भी उनके दुःख और विपत्तियों का अंत नहीं होता तब यही सोचकर आंसू बहाता हूँ कि परमात्मा के कार्यों का कुछ भी भेद न पाया।

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रामकृष्ण परमहंस ने लिखा है," जिसका मन जिस पर रमता है वह उसी को चाहता है;कहां रहता है,उसकी कितनी कोठियां हैं, कितने बगीचे हैं,कितना धन है ,परिवार में कौन-कौन हैं,नौकर कितने हैं -इसकी खबर कौन लेता है ?"

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फेसबुकप्रेम तो ईश्वरप्रेम की तरह है।इसके रास्ते में जितने बढोगे उतने ही कर्म छूटे चले जाएंगे।

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जैसे ब्रह्मभोज में पहले खूब शोरगुल मचता है ।जब सभी के आगे पत्तल पड़ जाती है तब गुलगपाड़ा कुछ घट जाता है।केवल 'पूड़ी लाओ,पूड़ी लाओ' की आवाज होती रहती है। फिर जब लोग पूड़ी-तरकारी खाना शुरू करते हैं तब बारह आना शब्द घट जाता है। जब दही आया तब सप्-सप् -शब्द मानो होता ही नहीं। और भोजन के बाद निद्रा।तब सब चुप !

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रामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्त शिवनाथ को देखकर कहा ,"क्या शिवनाथ तुम आए हो ,देखो तुम लोग भक्त हो,तुम लोगों को देखकर बड़ा आनंद होता है। गंजेड़ी का स्वभाव होता है कि दूसरे गंजेड़ी को देखते ही वह खुश हो जाता है,कभी तो उसे गले ही लगा लेता है।"

फेसबुकिए की दशा भी क्या गंजेडी जैसी है ?

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रामकृष्ण परमहंस ने जातिप्रथा को समाप्त करने के लिए एक सुंदर सुझाव दिया है, उन्होंने कहा- "एक उपाय से जातिभेद उठ सकता है।वह उपाय है -भक्ति।भक्तों के जाति नहीं है।"

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रामकृष्ण परमहंस ने एक जगह लिखा है ''कलकत्ते के लोग हुल्लड़बाज हैं। '' यह बात सौ फीसद आज भी सत्य है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (8-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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