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February, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

स्पीड युग का नायक नरेन्द्र मोदी

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(मोदी के शासन में साम्प्रदायिक दंगे का दृश्य)
मासमीडिया दुधारी तलवार है। दर्शकों के लिए  बिडम्बनाओं की सृष्टि करता है। मासमीडिया के द्वारा सृजित अर्थ वहीं पर नहीं होता जहां बताया जा रहा है बल्कि अर्थ अन्यत्र होता है। अर्थ वहां होता है जहां विचारधारा होती है और विचारधारा को लागू करने वाले संगठन होते हैं। चूंकि गुजरात में संघ परिवार की सांगठनिक संरचनाएं बेहद पुख्ता हैं अत: टीवी के अर्थ का लाभ उठाने की संभावनाएं भी वहां पर ज्यादा हैं। मासमीडिया अदृश्य हाथों को लाभ पहुँचाता है अत: हमें देखना होगा मोदी के संदर्भ में अदृश्य शक्ति कौन है ? मीडिया जब एक बार किसी चीज को अर्थ प्रदान कर देता है तो उसे अस्वीकार करना बेहद मुश्किल होता है। इसबार मीडिया ने यही किया उसने मोदी को नया अर्थ दिया,मोदी को विकासपुरूष बनाया। विकास को मोदी की इमेज के साथ जबर्दस्ती जोड़ा गया जबकि विकास का मोदी से कोई संबंध नहीं बनता। इसने मोदी का दंगापुरूष का मिथ तोड़ दिया। मोदी का दंगापुरूष का मिथ जब एकबार तोड़ दिया गया तो उसका कोई संदर्भ नहीं बचता था और इसी शून्य को सचेत रूप से विकासपुरूष और गुजरात की अस्मिता के प्रतीक के जर…

सच्चे ग्राम्यसेवक थे नानाजी देशमुख

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(स्व.नानाजी देशमुख)
नानाजी देशमुख ने राजनीति और सामाजिक विकास का नया मानक बनाया था, आज उनके निधन की खबर पढ़कर बेहद कष्ट हुआ। नानाजी ने आरएसएस के श्रेष्ठतम प्रचारक और संगठनकर्ता के रुप में यश अर्जित किया था। मैं अपने छात्र जीवन में कईबार उनसे मिला था। मथुरा में मेरा घर है, जहां पर संघ के सभी नामी व्यक्तित्वों को करीब से जानने का अवसर मिला करता था।
आपात्काल के बाद नानाजी जब पहलीबार मथुरा आए थे तो उन्हें करीब से जानने और अनेक मसलों पर खुली चर्चा का अवसर मिला था, शहर के सभी संघी नेता मेरे मंदिर पर नियमित आते थे और आज भी आते हैं। संयोग की बात थी कि मेरे हिन्दी शिक्षक मथुरानाथ चतुर्वेदी थे , वह संघ के श्रेष्ठतम नेता थे। मेरी हिन्दी और राजनीति में दिलचस्पी पैदा करने वाले वही प्रेरक थे । मथुरानाथ चतुर्वेदी वर्षों जनसंघ के अध्यक्ष रहे़, मथुरा नगरपालिका के भी चेयरमैन रहे। साथ ही मथुरा में संघ के संस्थापकों में प्रमुख थे। उनसे ही संघ के प्रमुख विचारकों का समस्त गंभीर साहित्य पढ़ने को मिला और मैं संघ के विचारकों से कभी प्रभावित नहीं हो पायाऔर मजेदार बात हुई कि वामपंथ के करीब चला गया। इसके बावजूद …

आरएसएस का मूक हिन्दू यूटोपिया

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(मोदी के गुजरात में हुए दंगे का एक दृश्य)
मोदी ने मूक हिन्दू यूटोपिया निर्मित किया है। इसमें सहज धर्मनिरपेक्ष वातावरण असहिष्णु लगता है। नागरिकों ने अपनी जिम्मेदारी संघ के कंधों पर डाल दी है और अपने को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है। मूक कल्पनालोक में अहर्निश वाचिक हिंसा चलती रहती है। 
गुजरात में शोषण है,गरीबी है और बोरियत भी है। साम्प्रदायिक हिंसा ने इन सबसे निजात दिलाने का वायदा किया किंतु वास्तव में ऐसा न हो सका बल्कि स्थिति सुधरने की बजाय और भी बिगड़ती चली गयी। हम सोच रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा ,दंगा पीड़ितों को दुबारा से बसा दिया जाएगा किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ।
 मोदी के पास गुजरात के भविष्य को लेकर कोई नया प्रस्ताव नहीं है,पुरानी त्रासदी से निकलने का रास्ता नहीं है। मोदी को मीडिया ने महानायक के रूप में प्रस्तुत किया। मोदी से नीतिगत तौर पर कोई सवाल नहीं किए। उससे सिर्फ उपलब्धियां बोलने के लिए कहा गया उसकी किसी भी उपलब्धि के बारे में मीडिया वालों ने अपनी ओर से पुष्टि का प्रयास नहीं किया। मोदी ने जो कहा उसको प्रसारित कर दिया, उसकी तहकीकात नहीं की,अन्य स्रोत से पुष्टि नहीं की। इसी क…

आरएसएस का गुजरात मॉडल सामाजिक वैविध्य का अस्वीकार है

संघ के मोदी प्रयोग ने एक और काम किया है उसने भारत में विविधता की सीमारेखा तय कर दी है। धर्मनिरपेक्षता ने विविधता की असंख्य संभावनाओं को खोला था किंतु संघ ने विविधता की सीमा बांध दी है। विविधताओं में अन्तर्क्रिया की भी सीमा तय कर दी है। इस मॉडल को वे धीरे-धीरे सारे देश में ले जाने चाहते हैं। उनका मानना है  धर्मनिरपेक्ष अनंत विविधता  समस्या की मूल जड़ है। विविधता की जड़ों कोही काटने के फार्मूले के तौर पर ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' पर जोर दिया गया। यह मूलत: गुजरात की सांस्कृतिक-भाषायी और धार्मिक विविधता का अस्वीकार है। इसमें एकत्व का भाव है। समानता और न्यायभावना नहीं है।       गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसाचार सिर्फ कायिक हिंसा तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि गरीबी, शिक्षा, सामाजिक उत्पीडन आदि के रूप में भी इसको व्यापक रूप दिया गया है। मसलन् कोई व्यक्ति यदि ईसाई है तो उत्पीड़न का शिकार है,अन्तर्जातीय विवाह करता है तो उत्पीड़ित किया जाता है, मुसलमान किसी स्कूल को चलाते हैं तो उनमें हिन्दू बच्चे पढ़ने नहीं जाते, मुसलमान की दुकानों से हिन्दू खरीददारी नहीं कर रहे हैं। …

दो पड़ोसियों की लाइफलाइन है दोस्ती

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कल भारत-पाक के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत खत्म हुई तो मीडियावाले विवाद खोज रहे थे, पंगे वाले सवाल उठा रहे थे। बातचीत को व्यर्थ बता रहे थे। प्रेस काँफ्रेस में भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव शांतभाव से पत्रकारों के सवालों के जबाव दे रही थीं,राव की बॉडी लैंग्वेज में जो स्वाभाविकता और सहजता थी वह तारीफ के काबिल है। कूटनीति की भाषा शरीर की भावभंगिमा के जरिए बहुत कुछ कह देती है। निरुपमा राव की भावभंगिमा ने मीडिया की सनसनी को ठंड़े बस्ते में ड़ाल दिया है। दोनों पड़ोसी देशों में बातें हों यह सभी चाहते हैं,खासकर इन देशों की जनता यही चाहती है। विदेश सचिव स्तर की बातचीत के ठीक पहले पूना में ब्लास्ट हुआ जिसमें अनेक लोग मारे गए। आतंकी नहीं चाहते कि भारत-पाक में दोस्ती और संवाद बने। दोनों देशों के संबंध ज्यों ही सामान्य होने शुरु होते हैं कोई न कोई हंगामा खड़ा कर दिया जाता है। मीडिया इस प्रक्रिया में आग में घी का काम करता रहा है। मीडिया और दोस्ती विरोधी देशी ताकतों को( ऐसी ताकतें दोनों देशों में हैं)  यह बात पसंद नहीं है कि भारत-पाक में दोस्ती बनी रहे। कायदे से देखा जाए तो इसबार की बैठक सार्थक रह…

मोदी और गुजराती अस्मिता की राजनीति-2

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‘जनता की चेतना’ के नाम पर पांच करोड़ जनता का जयगान वस्तुत: ऐसी जनता का जयगान है जिसने सचेत रूप से वास्तविकता से अपने को अलग कर लिया है। जनता की यथार्थ से विच्छिन्न अवस्था का मीडिया ने खासकर चैनल प्रसारणों में बार-बार प्रक्षेपण किया गया।
     चैनलों में विधानसभा चुनाव के समय गुजरात की जनता के चेहरे आ रहे थे ,चैनलों में शिरकत के जरिए जनता का महिमामंडन चल रहा था,किंतु जनता के ऊपर मीडिया का सत्य थोपा हुआ था, मीडिया सत्य के आधार पर जनता की भावनाओं को उभारा जा रहा था। इसका सिलसिला काफी पहले से शुरू हुआ था।
मोदी की विकासपुरूष की इमेज,''पांच करोड़ की गुजराती अस्मिता''को मीडिया ने विगत पांच वर्षों (2002-07 ) में सचेत रूप से विकसित किया गया। सन् 2002 के दंगों की विभीषिका और तद्जनित सत्य से लोग दूर रहें, इसका सारा ताना-बाना गुजरात में 2002 के दंगों के बाद से शुरू हुआ था और इसके लिए एक ही बात बार-बार कही गयी कि हम 2002 को भूलना चाहते हैं। हम आगे जाना चाहते हैं। लेकिन विपक्ष बार-बार 2002 का रोना-धोना लेकर आ जाता है और हमें गोधरा की याद दिलाता है।      उल्लेखनीय है संघ परिवार भारत मे…

‘तेरा’ ‘मेरा ’ ग्लोबल प्रेत

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प्रेत कभी अकेले नहीं आते हमेशा अनेक के साथ आते हैं। यह वर्णशंकर प्रेत है। यह आधा भारतीय है और आधा विलायती है। इसका राजनीतिक शरीर भी वर्णशंकर है। आधा ''हमारा'' और आधा ''तुम्हारा''।यह अद्भुत मिश्रित क्लोन है। ग्लोबल कल्चर की उपज है। इसके कपड़े और मुखौटे जरूर राजनीतिक दलों के हैं किंतु इसकी आत्मा ठेठ अमरीकी है। ग्लोबल है।
कहने को इसका शरीर भारतीय है किंतु मन-मिजाज,स्वभाव,भाव-भंगिमा, बयान, चाल- ढाल, संगठनशैली सब अमरीकी हैं। यह नयी विश्वव्यापी जनतंत्रस्थापना की अमरीकी मुहिम के सभी लक्षणों से युक्त है। नया अमरीकी जनतंत्र जबरिया थोपा जनतंत्र है, लाठी का जनतंत्र है।इसमें सत्ता जैसा चाहेगी वैसा ही विपक्ष भी होगा। पश्चिम बंगाल या भारत के लिए यह पराया जनतंत्र है। प्रेतों के वचनों में हमेशा मानवीय भाषा होती है जैसे झगड़े का समाधान बातचीत से होना चाहिए, हमें झगड़ा पसंद नहीं है। हम चाहते हैं कि सब लोग शांति से रहें, प्रेम से रहें, भाईचारे के साथ रहें। हमारे प्रशासन का काम है लोगों को सुरक्षा देना। मानवीय मंगलवचनों का इनके मुख से निरंतर पाठ चलता रहता है। यह वैसे ही है …

- मोदी और गुजराती अस्मिता की राजनीति - 1-

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गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का विगत विधानसभा चुनाव में सबसे चर्चित नारा था ''पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता'' को वोट दो।  स्वयं को गुजराती अस्मिता का वारिस घोषित किया। मोदी और संघ के अलावा सब इसके दायरे के बाहर हैं। पराए हैं। खारिज करने लायक हैं। यह अनेकार्थी नारा है। फासीवादी नारा है।
इस नारे का पहला संदेश, पांच करोड़ गुजराती खुश हैं, वे मेरा समर्थन कर रहे हैं अत: तुम भी समर्थन करो। यानी लोगों की खुशी को मोदी को चुनने के साथ जोड़ देते हैं।
दूसरा संदेश, यदि आप खुश होना चाहते हैं तो पांच करोड़ की कतार में शामिल हों अथवा दुख के लिए तैयार रहें। पांच करोड़ की कतार में शामिल हैं तो आपका परिवार और संसार सुखी है वरना तुम सोच लो। तीसरा संदेश, मोदी के पांच करोड़ के संसार में सब सुखी हैं। कोई भी दुखी नहीं। अर्थात् मोदी के पांच करोड़ में दुखियों के लिए कोई जगह नहीं है। वंचितों और बेकारों के लिए कोई जगह नहीं है। जो पांच करोड़ में शामिल नहीं वह खुश नहीं।
''पांच करोड़ गुजराती'' के रूपक के बहाने मोदी वस्तुत: धर्मनिरपेक्ष पहचान पर हमला बोलते हैं। लोकतांत्रिक व…

गुजरात में मोदी फिनोमिना कैसे जन्मा

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गुजरात में विगत 15 सालों में जो मतदाता बने हैं उनमें से अधिकांश बेरोजगारऔर अर्द्ध रोजगार करते हैं। बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज स्वयं में बड़ी समस्या है। इस वर्ग में ''खाओ कमाओ, मौज करो'' की उपभोक्तावादी विचारधारा प्रबल है और इस समुदाय को सकारात्मक और जिम्मेदार राजनीति से नफरत है। यही वर्ग आज सबसे ज्यादा हिन्दुत्व की विचारधारा के पक्ष में है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ है। अल्पसंख्यकों के प्रति जिस तरह का अभूतपूर्व हिंसाचार सन् 2002 में हुआ था उसमें युवावर्ग की केन्द्रीय भूमिका थी और यही युवावर्ग आज उन्मादी समूह की तरह गुजरात में सक्रिय है। इसमें शहरी मध्यवर्ग से लेकर दलित- आदिवासी का एक हिस्सा भी शामिल था।     गुजरात के चुनाव में हिन्दुत्व के सामाजिक एवं धार्मिक श्रेष्ठत्व के सिध्दान्त को केन्द्र में रखा गया। मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए जाति और धर्म के समीकरणों का व्यापकरूप में इस्तेमाल किया गया। दंगों के लिए अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा को बुनियादी आधार बनाया । चुनावों में संघ परिवार का एक ही संदेश था भाजपा को मुसनमानों के वोट नहीं चाहिए। अल्पसंख्यकों की गुजरात में कोई जगह…