मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

किसानों के प्रति टेलीविजन का रोमांस

               
     टेलीविजन स्वभावत: रोमैंटिक है। इसमें रोमैंटिक भावबोध जितना बिकता है यथार्थबोध उतना नहीं बिकता।कृषि पर घमासान मचा है। किंतु किसान गायब है। कृषि सब्सीडी, किसान की पामाली और भुखमरी के चित्र गायब हैं। किसानों के नाम पर मंत्रियों और आला अफसरों के चित्र दिखाए जा रहे हैं। किसी भी चैनल ने यह बताने की जरूरत महसूस नहीं की है कि आखिरकार विश्व अर्थव्यवस्था में किसान किस स्थान पर है ? हमारे देश में किसान कहां चला गया है ?स्वयं किसान अपनी बदहाली के मुद्दों पर क्या सोच रहे हैं

मजेदार बात यह है कि विश्व व्यापार की कृषि संबंधी वार्ताओं में सरकारी प्रतिनिधिमंडल में किसान संगठनों को नहीं बुलाया जाता। सवाल किया जाना चाहिए  क्या पेशेवर कूटनीतिक विमर्श में किसानों की प्रतीकात्मक उपस्थिति भी जरूरी नहीं है फ़र्ज करो विकसित देशों ने अपने किसानों को देने वाली समस्त सब्सीडी खत्म कर दी होती तो क्या इससे किसान को बेमौत मरने से बचाया जा सकता था ?

क्या पूंजीवाद में बगैर सब्सीडी के किसान को तबाही से बचाना संभव है क्या उद्योग का बगैर सब्सीडी के निर्माण और विकास संभव है ?क्या यूरोप और अमेरिका के किसानों की समस्त सब्सीडी खत्म कर दी जाए तो यूरोप और अमेरिका के किसान बच पाएंगे ?दूसरी बात यह है कि क्या अमेरिका और यूरोप में किसानी का रूप वही है जो तीसरी दुनिया के देशों में है ?क्या अफ्रीकी किसान और भारतीय,चीनी,ब्राजीलियन किसान की बुनियादी समस्याएं और अमेरिकी किसानों की समस्याएं एक हैं ?क्या यूरोपीय आर्थिक समुदाय के देशों में किसानों की जिंदगी में वे समस्याएं हैं जिन्हें तीसरी दुनिया का किसान झेल रहा है।

कहने का तात्पर्य यह है कि किसानों की सब्सीडी के सवाल को बाजार,वाणिज्य और उद्योग के दृष्टिकोण से चैनलों में उठाया जा रहा है।यह कृषि का नहीं वाणिज्य का सवाल बनकर सामने आया।वाणिज्य के सवाल के रूप में पेश करने से इस सवाल के जितने समाधान सुझाए जाएंगे वे सभी व्यापार के हित में होंगे कृषि और कृषक के हित में नहीं होंगे।

 क्या यह विचारणीय मुद्दा नहीं है कि विश्व बहुसंख्यक कृषक आबादी की पामाली के सवाल पर बातें की जाएं ?विश्व की समस्त सरकारों पर सामूहिक तौर पर यह दबाव पैदा किया जाय कि कृषियोग्य और खाली जमीन को खेतिहर किसानों में बांट दिया जाय।अथवा गरीब किसानों के कर्जे माफ कर दिए जाएं। सब्सीडी के सवाल पर जितनी भी चर्चाएं चैनलों में आईं उनमें किसानों के वास्तव मुद्दे एकसिरे से गायब थे। विश्व में किसान जीवन का आज सामाजिक अस्तित्व दांव पर लगा  है।
    
चैनलों में किसानों की अनुपस्थिति को कृषि जीवन के आंकड़ों के जरिए भरने की कोशिश की जाती है।यानी किसान को मत देखो किसान के आंकड़ों को देखो।किसान के साक्षात् जीवन का दृश्यों से गायब होना और उसका आंकड़ा बन जाना इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी है।सच यह है कि किसान आंकड़ा नहीं है।वह साक्षात् हाड़ - मांस का जीता-जागता मनुष्य है।हम जब किसी व्यक्ति, समुदाय अथवा वर्ग को जीवन से अपदस्थ करना चाहते हैं तो आंकड़ा बना देते हैं।मनुष्य का आंकड़े या डाटा में रूपान्तरण नए युग की सबसे भयानक त्रासदी है।

गांव में जितने लोग भूख के शिकार हैं उतने ही फीसद शहरों की झुग्गी-झोंपड़ियों में रहनेवाले भूख के शिकार हैं। आम लोगों की क्रयशक्ति घट रही है। सुनिश्चित रोजगार योजनाओं का पूरी तरह अभाव है। हम चीन से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि चीन के किसान की तुलना में भारत के किसान से बिजली का दुगुना दाम लिया जाता है।भारत में कृषि निवेश घटा है। भुखमरी बढ़ी है।

किसानों के प्रति बैंकों का सौतेला व्यवहार रहा है। बैंक किसी भी किसान को ट्रैक्टर के लिए गांव की जमीन के टुकड़े पर कर्ज नहीं देतीं। यदि कोई बैंक कर्ज मुहैय्या कराएगी तो बदले में किसान को कम से कम तीस बीघा जमीन गिरवी रखनी होगी। इसके विपरीत शहर के किसी भी जमीन के टुकड़े पर बने प्लाट के बदले या जमीन के बदले बैंक से तुरंत कार के लिए कर्ज मिल जाता है।शहर के लोग जब भी गांव जाते हैं वे पर्यटक की तरह जाते हैं।

 किसान नेता शरद जोशी के द्वारा सुझाव दिया जा रहा है कि केन्द्र सरकार को एसेंसियल फूड कमोडिटी एक्ट को खत्म कर देना चाहिए, एफसीआई को बंद कर देना चाहिए। शरद जोशी शायद यह नहीं जानते कि आजादी के पहले एफसीआई जैसी संस्थाओं के अभाव में ब्रिटिश शासन के दौरान सबसे ज्यादा अकाल पड़े। साम्राज्यवाद के नए पैरोकार यही चाहते हैं कि ये दोनों चीजें खत्म कर दी जाएं।इससे सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों को होगा।आज हमारे पास खाद्य का सुरक्षित भंडार है।इसके जरिए किसी भी आपात्कालीन स्थिति का सामना किया जा सकता है। अकाल और सूखे की स्थिति से समय रहते निबट सकते हैं। बड़े किसानों के पैरोकारों को किसानों की दरिद्रता से कोई मतलब नहीं है।उन्हें तो फसल चाहिए चाहे जिस कीमत पर पैदा हो। 

उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार ने 1980 से सिंचाई के क्षेत्र में निवेश बंद कर दिया। इसके कारण फसल पूरी तरह अनुकूल मानसून पर टिक गई है। अनुकूल मानसून नहीं होने पर फसल तबाह हो जाती है। केन्द्र सरकार को यदि किसानों के हितों की इतनी ही चिंता है तो उसे कृषि उपजों के न्यूनतम बिक्री मूल्य की ही घोषणा करके शांत नहीं हो जाना चाहिए। बल्कि एफसीआई के जरिए कृषि उपज की बाजिव दामों पर खरीद की व्यवस्था भी करनी चाहिए। यह तर्क दिया जा रहा है कि सरकारी गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है अत: सरकार नहीं खरीदेगी। इसके परिणामस्वरूप किसानों को औने-पौने दामों पर अपनी फसल को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे किसानों की तबाही बढ़ी है और व्यापारियों के पौ-बारह हो गए हैं।

केन्द्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों का दुष्परिणाम यह हुआ है कि आंध्र,महाराष्ट्र और कर्नाटक में किसानों द्वारा आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले प्रकाश में आए हैं। इन राज्यों में सबसे ज्यादा पूंजी निवेश हो रहा है। किसान विकसित चीजों की खेती कर रहे हैं।इन फसलों के लिए बैंकों से कर्ज नहीं मिलते।ऐसी स्थिति में किसान सूदखोरों से ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेते हैं। जब फसल बिक नहीं पाती तो उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं बचता। क्योंकि उनकी फसल को सरकार खरीदती नहीं है।

आज यदि किसानों के प्रति सच्चे दिल से सरकार कोई काम करना चाहे तो उसके सामने कोई बाधा टिक नहीं सकती।बैंक आंकड़े बताते हैं कि बैंकों का सबसे ज्यादा बकाया पूंजीपतियों पर है न किसानों के पास। अंधेरगर्दी का आलम यह है कि उ.प्र.में किसानों से दस घंटे बिजली  सप्लाई के आधार पर बिजली के बिल भेज दिए गए जबकि बिजली की सप्लाई तीन साढ़े तीन घंटे से ज्यादा नहीं हुई। ऐसी स्थिति में किसान यदि बिलों का भुगतान नहीं करते तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि बिजली चोरी सबसे ज्यादा गांवों में नहीं शहरों में होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि केन्द्र सरकार किसानों के हितों की चैम्पियन होने का ढ़ोंग करना बंद करे।

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