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June, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ममता सरकार की आर्थिक चुनौतियां

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ममता सरकार ने हाल ही में जो नए आर्थिक कदम उठाए हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है नव्य उदार आर्थिक नीतियों के प्रति खुला समर्थन। यह समर्थन पिछली सरकार की नीतियों के क्रम में ही आया है। ममता सरकार ने विधानसभा में जो बजट पेश किया है वह कमोबश पुरानी सरकार का बनाया हुआ है। इसमें कोई नई चीज नहीं है। बल्कि कुछ लोग जो नए की उम्मीद कर रहे थे उन्हें निराशा हाथ लगी है। बजट प्रस्तावों में प्रत्येक मद में औसतन 10फीसदी की बढोतरी का वाम जमाने का फार्मूला बरकरार है। नए वित्तमंत्री ने पुराने वित्तमंत्री द्वारा बनाई लक्ष्मणरेखा का अतिक्रमण नहीं किया है। एक नई चीज है राज्य में 17 नए औद्योगिक केन्द्रों का निर्माण। सवाल यह है कि राज्य के अंदर क्या इतने बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास की संभावनाएं हैं ? वाम शासन ने एक जमाने में इस दिशा में सोचा था लेकिन यह योजना बुरी तरह पिट गयी। ममता सरकार को कायदे से पहले उन तमाम व्यापारिक समझौतों को उठाना चाहिए जो पिछली सरकार ने किए थे। उन प्रकल्पों में काम आरंभ करने के प्रयास करने चाहिए जिनको तृणमूल कांग्रेस के नेताओं-माओवादियों ने धमकी देकर बंद करा दिया था। इनमें सबसे महत्वपू…

बाबा नागार्जुन के जन्म शताब्दी वर्ष के समापन पर विशेष- मोर होगा ...उल्लू होंगे ! -

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(बाबा ने यह कविता आपातकाल के प्रतिवाद में लिखी थी।) 

खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो

प्रजातंत्र को कौन पूछता,तुम्हीं बड़ी हो

डर के मारे न्यायपालिका काँप गई है

वो बेचारी अगली गति-विधि भाँप गई है

देश बड़ा है,लोकतंत्र है सिक्का खोटा

तुम्हीं बड़ी हो,संविधान है तुम से छोटा

तुम से छोटा राष्ट्र हिन्द का ,तुम्हीं बड़ी हो

खूब तनी हो,खूब अड़ी हो,खूब लड़ी हो


गांधी -नेहरू तुम से दोनों हुए उजागर

तुम्हें चाहते सारी दुनिया के नटनागर

रूस तुम्हें ताकत देगा,अमरीका पैसा

तुम्हें पता है ,किससे सौदा होगा कैसा

ब्रेजनेव के सिवा तुम्हारा नहीं सहारा

कौन सहेगा धौंस तुम्हारी ,मान तुम्हारा

हल्दी.धनिया, मिर्च,प्याज सब तो लेती हो

याद करो औरों को तुम क्या-क्या देती हो

मौज,मजा,तिकड़म,खुदगर्जी,डाह,शरारत

बेईमानी,दगा,झूठ की चली तिजारत

मलका हो तुम ठगों-उचक्कों के गिरोह में

जिद्दी हो,बस ,डूबी हो आकंठ मोह में

यह कमजोरी ही तुमको अब ले डूबेगी

आज नहीं तो कल सारी जनता ऊबेगी

लाभ-लोभ की पुतली हो,छलिया माई हो

मस्तानों की माँ हो,गुंडों की धाई हो

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है प्रबल पिटाई

सुदृढ़ प्रशासन का मतलब है 'इन्द्रा' म…

'नए तुलसीदास' और साहित्य पतन

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हिन्दी का नया ठाट नये जनसंपर्क अधिकारी या 'नए तुलसीदास' रच रहे हैं, इनके पास मीठी भाषा,मधुर सपने, पद, हैसियत,पैसा आदि सब है। इनके नेता से लेकर प्रोफेसरों तक संपर्क-संबंध हैं।इन्हें सत्तातंत्र की बारीक रीति-नीति का ज्ञान है। 'नए तुलसीदास' ने इस युग में 'पद' को महान बनाया है। जितनी बड़ी कुर्सी ,साहित्य और हिन्दी अकादमिक जगत में उतना ही बड़ा स्थान। इन दिनों लिखने-पढ़ने से साहित्य का ओहदा तय नहीं हो रहा । उल्लेखनीय है साहित्य में नया तत्व दाखिल हुआ है कनेक्टविटी का। साहित्य में कनेक्टविटी जितनी अच्छी उसका उतना ही नाम। यह सूचनायुग का सीधा असर है। हिन्दी का प्रत्येक ख्यातिलब्ध लेखक इस आधार पर खा -कमा रहा है। आज से कुछ साल पहले एक ख्यातिलब्ध लेखक को मात्र एक साल में 10 से ज्यादा पुरस्कार मिले। ज्ञानपीठ को छोड़कर ये जनाब सभी पुरस्कार पाने में सफल रहे, अब वे सिर्फ ज्ञानपीठ और नोबुल पुरस्कार का ही इंतजार कर रहे हैं। साहित्य में कृति,कृतिकार और पाठक के बीच में पाठ सेतु का काम करता था। लेकिन आज पाठ गौण है,लिखा हुआ गौण है। कनेक्टविटी बड़ी चीज है। कॉलेज-विश्वविद्यालयों में हि…

बिदेसिया यानी सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति-कुमार नरेन्द्र सिंह

भोजपुरी साहित्य के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाटक, सच कहें तो भोजपुरी लोक जीवन का जीवंत दस्तावेज है, भोजपुरियों के दिल की धड़कन है। बिदेसिया महज नाटक की एक किताब भर नहीं है बल्कि भोजपुरिया अस्मिता की पहचान है, सृजनशीलता की प्रतीक है। शहरीकरण और औद्योगीकरण की आंधी में उजड़ते भोजपुरिया परिवार और कोलकाता, असम के चटकलों काम की तलाश में पहुंचे भोजपुरिया मजदूरों की जिंदगी की दारुण दास्तान है बिदेसिया।

नृत्य-नाट्य की बिदेसिया शैली भोजपुरी लोक-संस्कृति की अनोखी उपलब्धि तो है ही, लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के कवित्तमय और कलात्मक सौंदर्य-बोध की विशिष्ट पहचान भी है। वास्तव में बिदेसिया नाटक वैयक्तिक प्रतिभा और संस्कृति के अंतर्मेल की उपज है। यही कारण है कि शायद ही कोई ऐसा खांटी भोजपुरिया मिले जो बिदेसिया के अभाव में भोजपुरी संस्कृति की कल्पना भी कर सके। बिदेसिया शैली की अपार लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण कारण इसका परंपरा-स्युत होना ही है। भोजपुरी साहित्य और संस्कृति मूल रूप से मौखिक परंपरा पर आधारित रही है और गेयता इसका स्वभाव रहा है। भोजपुरी के प्रसार में उसकी गेयता, गीतों की बड़ी प्रधान…

सिंगूर की लूटलीला, टीवी और अराजक राजनीति

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भारत के इतिहास में किसी मुख्यमंत्री ने जमीन की खरीद-फरोख्त के मामले में ऐसा भद्दा मजाक नहीं किया जैसा पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने सिंगूर के मामले में किया है। टाटा को राज्य सरकार की लीज पर दी गयी जमीन,जिसके 85 प्रतिशत मुआवजे का भुगतान हो गया,टाटा और अन्य का उस पर 3000 हजार करोड़ खर्च हो गया,और उसे एक ही झटके में कानून के बहाने राज्य सरकार ने अवैध ढ़ंग से हस्तगत कर लिया। कलकत्ता उच्चन्यायालय में टाटा की ओर से याचिका दायर की गई है। जिस पर सुनवाई चल रही है। दूसरी ओर राज्य सरकार जिद पर अड़ी है वो अपनी राजनीतिक प्रतिज्ञाओं को अमलीजामा पहनाकर ही दम लेगी। सिंगूर में पहले कारखाना खोले जाने के पहले पंगा,मध्य में पंगा,स्थापना के बाद पंगा,अब बंद कारखाने पर पंगा।     सिंगूर में चल रहे जमीन और उद्योग के इस अंतहीन पंगे से कई सवाल उठे हैं क्या पश्चिम बंगाल में फिर से औद्योगिक विकास होगा ? क्या अराजक राजनीति का अंत होगा ? परिस्थितियां बता रही हैं कि राज्य में आने वाले समय में जमीन के सवाल पर बड़ी लड़ाईयां होंगी।काफी खून खराबा होगा।      सिंगूर के नए प्रसंग में पहला सवाल यह है कि राज्य सरकार ने टाटा …

सांस्कृतिक पराधीनता और हिन्दी संस्थान

इन दिनों हिन्दी हम हिन्दी वाले हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे ।मालिकों की सेवा कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज में पढ़ाने वाले या केन्द्र सरकार के संस्थानों के हिन्दी अधिकारी इस भ्रम में हैं कि वे हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, असल में वे मालिकों की सेवा कर रहे हैं और उनकी सेवा के लिए सुंदर सेवक तैयार कर रहे हैं। हिन्दी को मालिकों की भाषा मालिकों ने नहीं हम बुद्धिजीवियों-हिन्दीसेवियों ने बनाया है। रघुवीर सहाय ने एक कविता में लिखा है, "वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध/जो सिर्फ अपनी भाषा में बोलेगा/ मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं/चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा/बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा/वह क्या करेगा अपने गूँगे गुस्से को वह /कैसे कहेगा ? तुमको शक है /गुस्सा करना ही/गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम/वह और खोज रहा है/ तुम जानते नहीं।"यानी मालिक की भाषा से बचने का कोई शास्त्र है हमारे पास ?हम क्यों और कब से मालिक की भाषा बोल रहे हैं ? हिन्दी को मालिक की दासी कैसे बनाया गया ? अरबो-खरबों रूपये खर्च करने बाबजूद हिन्दी आज भी पिछड़ी क्यों है ? इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करन…

The discreet charm of civil societyP. SAINATH

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The discreet charm of civil societyP. SAINATH
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The HinduSocial Activist and Member of Lokpal Bill Committee, Anna Hazare, addresses a press conference in New Delhi. Photo: Shanker Chakravarty



There is nothing wrong in having advisory groups. But there is a problem when groups not constituted legally cross the line of demands, advice and rights-based, democratic agitation.

The 1990s saw marketing whiz kids at the largest English daily in the world steal a term then in vogue among sexually discriminated minorities: PLUs — or People Like Us. Media content would henceforth be for People Like Us. This served advertisers' needs and also helped shut out unwanted content. As the daily advised its reporters: dying farmers don't buy newspapers. South Mumbaikars do. So the suicide deaths of a couple of fashion models in that city grabbed more space in days than those of over 40,000 farmers in Maharashtra did in a decade.

February 2011 saw one of the largest ra…

खुदरा व्यापार में बहुराष्ट्रीय निगमों का खेल-शेखर स्वामी

भारत के खुदरा बाजार पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां खुले तौर पर हमला बोल रही हैं। देशी दुकानदारों का धंधा तबाही की ओर जा रहा है और केन्द्र सरकार खुलेआम बहुराष्ट्रीय निगमों की हिमायत कर रही है।अन्ना हजारे से लेकर विभिन्न राजनीतिक दल इस मसले पर चुप्पी साधे बैठे हैं। हिन्दू समूह के अखबार "बिजनेस लाइन " में शेखर स्वामी ने खुदरा उद्योग की सुंदर मीमांसा की है। हम यह लेख साभार दे रहे हैं-

In the first part of my series yesterday, I had stated that big multi-brand retailers in the West like the Walmarts and Tescos and Carrefours routinely mark up the prices on their entire basket of products by a minimum 2x, and this goes as high as 9x, compared with the retail/wholesale mark-ups in India.

The point that was made was that the efficiency of the channel should be determined by how much they charge the end consumer by way of mark-ups (which is the aggregate of the costs incurred and profits made by the channel). By this measure, I had concluded that the Indian distribution chain comprising w…

सबसे महंगे ब्रॉण्ड का राजनीतिक पराभव

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बाबा रामदेव का अनशन अंततः खत्म हो गया ,उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा ,उनकी शारीरिक अवस्था लगातार खराब होती गयी । इससे आयुर्वेदिक चिकित्सा की बजाय अंग्रेजी चिकित्सा के प्रति आम लोगों की आस्था गहरी होगी। धन्य हैं बाबा जो अनशन तोड़ने अपने अस्पताल नहीं ले जाए गए।उनका इलाज करने वाले डाक्टर एलोपैथी के हैं।क्या आयरनी है आयुर्वेद के महारथी के अनशन की ? हम तो यही चाहते थे कि बाबा रामदेव और उनके भक्त तब तक क्रमिक अनशन करते जब तक सारा काला धन विदेश से वापस नहीं आ जाता। बाबा को बर्मा (म्यांमार) की नेत्री आंग शांग सू ची की तरह लंबा अनशन करना चाहिए और योग शिविर को अन्य लोगों को चलाना चाहिए था लेकिन अफसोस की बात है वे ऐसा नहीं कर पाए। बाबा सोच रहे थे वे अनशन करेंगे और तत्काल परिणाम सामने आ जाएगा। राजनीति में ऐसा नहीं होता। बाबा के अनशन के समर्थन में आरएसएस के लोग सबसे ज्यादा हल्ला कर रहे हैं। क्या संघ परिवार अपनी आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक करेगा ?  एक सवाल यह भी उठा है कि जेपी आंदोलन की तरह लाखों की भीड़ कभी इन नेताओं (अन्ना-बाबारामदेव) पीछे क्यों नहीं देखी गयी? क्यों नहीं ये लोग भ्रष्टाचार के …