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सोमवार, 1 सितंबर 2014

सोशल मीडिया और बर्बरता

        सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक बर्बरता का महाख्यान चल रहा है। जिस तरह आईएसआईएस की पोस्ट अबाधित रुप में पेश की जा रही हैं, बर्बर संगठनों के पक्ष में निरंतर लिखा जा रहा है। उससे यह संकेत जा रहा है कि सोशल मीडिया के लिए बर्बरता सबसे बड़ी खबर है और राजनीतिक आंदोलन, प्रतिवाद और लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई मूल्य नहीं है।अधिकांश मीडिया, बर्बरता की प्रस्तुतियों में इस कदर व्यस्त है कि उनको जनांदोलनों की किसी खबर या समस्या के कवरेज की कोई चिंता ही नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक बर्बरता का नाटक चल रहा है और हम सब उसके मूकदर्शक बन गए हैं।बर्बरता का जितने बड़े रुप में प्रसारण हो रहा है जनांदोलनों का उतने बड़े रुप में प्रसारण नहीं हो रहा। यानी मीडिया की नजर में बर्बरता प्रासंगिक है,मोहन भागवत के नॉनशेंस बयान,बत्रा पंडित का पोंगापंथ और भगवापंथ की इरेशनल खबरें प्रासंगिक हैं, लेकिन अन्य लोकतांत्रिक खबरें और लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष विचार प्रासंगिक नहीं हैं।

मीडिया और सोशल मीडिया का यह बर्बरता प्रेम , बर्बरता का मित्र बना रहा है और लोकतंत्र से दूसरी बढ़ा रहा है। बर्बरता प्रेम का ही परिणाम है कि अनंतमूर्ति से लेकर विपनचन्द्र तक की मौत पर बर्बरता प्रेमी खुशी का इजहार कर रहे हैं। इस तरह का बर्बरता प्रेम गुलाम युग में देखा गया था।सोशलमीडिया -मीडिया कवरेज ने नार्सीसिस्ट भावबोध की सृष्टि की है। इसके कारण मीडिया ने करोड़ों-अरबों का मुनाफा कमाया है। इसने जहां एक ओर परपीड़क आनंद और उसके भोक्ताओं का बर्बर समाज पैदा किया है वहीं दूसरी ओर मूल्याधारित राजनीति को पूरी तरह निम्नस्तर पर उतार दिया है। मुनाफेखोर मीडिया घराने खुश हैं कि उनकी रेटिंग और मुनाफों में उछाल आया है वहीं दूसरी ओर वे मीडिया -सोशलमीडिया के जरिए लोगों की वधलीला भी कर रहे हैं। आज सोशलमीडिया में किसी के हत्या की तस्वीर लगाइए और खूब कवरेज पाइए। नैतिकता,सभ्यता और भद्रता के जितने ज्यादा परखच्चे उड़ाएंगे उतना ही दावे के साथ ज्यादा मुनाफा कमाएंगे।

पी साईनाथ ने कहा-' मीडिया में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर...हिरोशिमा-नगासाकी पर बम गिराए जाने के बाद The Times of India ने अपने 11 नंबर पेज पर शीर्षक लगाया था, "Excellent results in raid on Nagasaki" और इसके नीचे एक और ख़बर थी जिसका शीर्षक था, "Uranium shares go up 90 points after Hiroshima.'' इस घटना पर पूरी दुनिया में वाइट हाउस से जारी प्रेस रिलीज़ आधारित जो पत्रकारिता की गई, उसने पत्रकारिता में उसी वक्‍त दो स्‍कूल बना दिए- एक पत्रकारों का और दूसरा स्‍टेनोग्राफरों का। आज पत्रकारिता में 80 फीसदी स्‍टेनोग्राफर हैं जो धीरे-धीरे कॉरपोरेट स्‍टेनोग्राफर होते जा रहे हैं। ये कहना है जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ का।'

'दिल्ली के कॉन्‍सटिट्यूशन क्‍लब में आयोजित एक समारोह में अपने संबोधन के दौरान पी. साईनाथ ने पत्रकारिता को लेकर कई अन्य बातें भी बताईं, जिसमें से एक यूं हैं.... हिरोशिमा-नगासाकी पर अमेरिकी बमबारी का जश्‍न मनाते हुए जब न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के (अमेरिकी सैन्‍य विभाग प्रायोजित) पत्रकार विलियम लॉरेन्‍स 'बम के सौंदर्य की तुलना बीथोवन की सिम्‍फनी के ग्रैंड फिनाले' से और बमबारी से पैदा हुए 'मशरूम की आकृति के धुएं के गुबार की तुलना स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी' से कर रहे थे, ठीक उस वक्‍त सिर्फ एक फ्रीलांसर पत्रकार था जिसने इस घटना का सच सामने लाने के लिए अपने खर्च पर हिरोशिमा जाने का फैसला किया। ऑस्‍ट्रेलिया के इस पत्रकार का नाम था विल्‍फ्रेड बर्चेट। उसकी बेहतरीन रिपोर्टिंग 'द डेली एक्‍सप्रेस' में छपी।'

'विल्‍फ्रेड बर्चेट की रिपोर्टिंग का वैश्विक मीडिया के समक्ष खण्‍डन करने के लिए टोक्‍यो में अमेरिकी मैनहैटन प्रोजेक्‍ट के ब्रिगेडियर जनरल थॉमस फैरेल ने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स रखी। बर्चेट को पता चला कि प्रेस कॉन्‍फ्रेन्‍स उसी के ऊपर है, तो वह वहां पहुंच गया। उसने ब्रिगेडियर से कुछ सवाल किए। सवालों से असहज होकर ब्रिगेडियर ने उससे कहा कि वह जापान के साम्राज्‍यवादी प्रोपेगेंडा का शिकार हो गया है। बाहर निकलते ही एलाइड ताकतों के प्रमुख के निर्देश पर उसका पासपोर्ट ज़ब्‍त कर लिया गया, उसे हिरासत में ले लिया गया और हिरोशिमा-नगासाकी बमबारी की रिपोर्टिंग पर प्री-सेंसरशिप लगा दी गई।छूटने के बाद दोबारा जब बर्चेट ने पासपोर्ट बनवाया तो फिर से गुप्‍तचर एजेंसियों ने उसे चुरा लिया। इसके बाद वह आजीवन बिना पासपोर्ट के रहा। बर्चेट ने अपनी आत्‍मकथा 'पासपोर्ट' के नाम से लिखी और हिरोशिमा में लगे विकिरण के असर से बेहद गरीबी में जीते हुए बगैर किसी नागरिकता के उसका निधन हुआ। उधर, अमेरिकी सैन्‍य विभाग द्वारा प्रायोजित न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स के पत्रकार को दुनिया के सामने बम का सौंदर्य बखान करने के लिए पुलित्‍ज़र पुरस्‍कार से नवाज़ा गया। तभी से दुनिया भर की पत्रकारिता में दो ध्रुव कायम हो गए- लॉरेन्‍स की और बर्चेट की पत्रकारिता। अब आपको तय करना है कि आप क्‍या बनना चाहेंगे- विलियम लॉरेन्‍स या विल्‍फ्रेड बर्चेट?'

(पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के वॉल से)







रविवार, 7 अप्रैल 2013

नरेन्द्र मोदी के मीडिया उन्माद और राहुल के समावेशी मॉडल में भिडंत


  

         मोदी को लेकर इनदिनों जो मीडिया उन्माद चल रहा है वह भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव अभी एक साल बाद होंगे लेकिन भाजपा और मोदी की प्रधानमंत्री पद को पाने की बेचैनी देखने लायक है।
   एक जमाने में इंडिया साइनिंग के नाम से जिस तरह का भाजपा ने मीडिया उन्माद पैदा किया था ठीक वैसा ही मीडिया उन्माद इन दिनों मोदी को लेकर पैदा किया जा रहा है। प्रतिस्पर्धा साफ दिख रही है। कांग्रेस ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी के लिए मन बना लिया है। सीआईआई के अधिवेशन में काग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी पहलीबार सार्वजनिक तौर पर बोले। उनके भाषण में एक युवानेता के सपने,ख्याल,भारत की तस्वीर और भारत की लाइफलाइन की ध्वनि वायवीय रूप में उभरकर सामने आई।
   सीआईआई के सम्मेलन में देश 1500से ज्यादा उद्योगपति भाग रहे हैं और वे धैर्य के साथ सभी दलों के नेताओं को सुन रहे हैं उसमें राहुल गांधी का भाषण काल्पनिक ज्यादा था.व्यापारी जगत काल्पनिक दुनिया में जीने का आदी नहीं है। उसे ठोस बातें करने और सुनने की आदत है।
राहुल और उनके भक्तों को जानना चाहिए भारत कोई आख्यान नहीं है। यह एक जीता-जागता देश है और इसमें जिंदादिल लोग रहते हैं।उनकी धड़कनें हैं,कम से कम राहुल के भाषण में युवामन, दलितमन, स्त्रीमन, मुस्लिम मन की अभिव्यंजना कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रही थी।राहुल गांधी के भाषण में न किसी की आलोचना न किसी की निंदा,न नीति की आलोचना न व्यक्ति की आलोचना।इसके विपरीत व्यापारियों को क्या करना चाहिए और उन्होंने क्या नहीं किया। इसी पैराडाइम पर पूरा भाषण केन्द्रित था। प्रच्छन्नतः कहा कि मनमोहन सरकार पर उंगली मत उठाओ ,यह देखो तुमने क्या नहीं किया।
मसलन् लोगों को ट्रेंड करने का काम तुम्हारा है, संरचना बनाने का काम तुम्हारा है,गांव के प्रधान को फैसलेकुन कमेटी में लाने का काम तुम्हारा है,तुम यह नहीं जानते ,तुम वह नहीं जानते,देश इसके कारण ऊर्जा के रहते पिछड़ रहा है, राजनीतिक व्यवस्था का समाज से अलगाव हो गया है। राहुल गांधी के भाषण में आत्मालोचन एकसिरे से गायब था।
राहुलगांधी के भाषण के कुछ घंटे बाद गुजरात के  मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुजरात से भाषण टीवी चैनलों के जरिए सीधे लाइव प्रसारित कराया गया। इससे यह तो साफ है कि भाजपा ने मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री के रुप में खड़ा करने का मन बना लिया है। मोदी ने अपने भाषण में एक मार्के की बात कही कि मैंने गुजरात का कर्ज उतारा है, अब देश का कर्ज उतारना है। प्रतीकात्मक तौर पर मोदी कहना चाहते हैं कि वे प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में मन बना चुके हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए स्वयं को पेश करना यह अपने आप में भारत में विरल घटना है। भाजपा ने आधिकारिकतौर पर उनको अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है और नहीं एनडीए ने। चूंकि मोदी बार-बार गुजरात मॉडल की बात कह रहे हैं अतःगुजरात के प्रसंग में कुछ तथ्य उल्लेखनीय हैं। गरीबी में आई कमी के आधार पर गुजरात 20 राज्यों की सूची में 10वें पायदान पर है। मजदूरी और इसमें बढ़ोतरी के मामले में 20 बड़े राज्यों में क्रमश: 14वें और 15वें स्थान पर आता है जो संपन्न और विपन्न लोगों के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाता है।
मोदी के शासन में शिक्षा क्षेत्र में तबाही चल रही है।  एक गैर सरकारी संगठन के मुताबिक ग्रामीण गुजरात में करीब 95 फीसदी बच्चे विद्यालयों में पंजीकृत हैं लेकिन ज्ञान का स्तर काफी कम है। पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले करीब 55 फीसदी बच्चे दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रम नहीं पढ़ पाते हैं। लगभग 65 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जो गणित के सामान्य जोड़ घटाव भी नहीं कर पाते हैं।
बहुत सारे लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक शराब पीकर आते हैं और ताश खेलते हैं। बारिया में बच्चों के लिए साल में 24 दिन का शिविर चलाने वाली हार्डीकर कहती हैं कि पांचवीं कक्षा के बच्चे अक्षर भी नहीं पहचान पाते हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति के बारे में अर्थशास्त्री वाई .के .अलघ कहते हैं कि इसकी हालत भी खस्ता है। अहमदाबाद के समाज विज्ञानियों के मुताबिक ज्यादातर कॉलेज और विश्वविद्यालय ठगों और नाकाम प्रशासकों द्वारा चलाए जा रहे हैं। तकनीकी कॉलेजों में ही थोड़ी बहुत क्षमता है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में 96 गांवों को सेवाएं देने वाले राज्य द्वारा संचालित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पिछले सात साल से किसी बाल रोग विशेषज्ञ और स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ चिकित्सक की तैनाती नहीं हुई है। गुजरात में 44.6 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हालांकि शिशु मृत्यु दर में कमी जरूर आई है लेकिन इस दर में गिरावट राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है। करीब 65 फीसदी ग्रामीण परिवारों और 40 फीसदी शहरी परिवारों के पास शौचालय की व्यवस्था नहीं है और उन्हें मजबूरी में खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। राज्य में पुरुष महिला अनुपात कम है यानी 1000 पुरुषों पर 918 स्त्रियों का औसत है। यह भी राष्ट्रीय औसत से कम है।मुसलमानों की वास्तव जिंदगी देखें तो भाजपा-मोदी की पोल खुल जाती है।मसलन् गरीबी की बात करें तो शहरी मुसलमान ऊंची जाति के हिंदुओं की तुलना में करीब 8 गुना ज्यादा गरीब हैं।
सामाजिक विकास के आड़ में मुसलमानों को मैनस्ट्रीम विकास से काटकर अलग कर दिया गया है। दूसरी बात यह कि मोदी समावेशी विकास की बात नहीं करते। मसलन् 2002 के दंगों में मारे गए लोगों को कोई आर्थिक सहायता राज्य ने नहीं दी। मुसलमानों की अरबों की संपत्ति देगों में नष्ट हुई थी लेकिन उनके पुनर्वास के लिए राज्य सरकार ने समुचित कदम नहीं उठाए। दंगों में शामिल दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तब हुई जब सुप्रीमकोर्ट ने हस्तक्षेप किया और राज्य के बाहर दंगों से संबंधित मुकदमे चलाने का आदेश दिया। यही वह प्रसंग है जिसमें राहुल गांधी का समावेशी विकास का मॉडल मोदी के मॉडल पर भारी पड़ता है। राहुल गांधी ने समावेशी मॉडल को भविष्य का प्रधान एजेण्डा बनाकर पहल मोदी के हाथ से छीन ली है।




शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

आशीषनंदी अभिव्यक्ति की आजादी और फेसबुक

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अभिव्यक्ति की आजादी की धारणा के जन्म लेने के बाद विचारकों ने बार-बार अभिव्यक्ति की सीमाओं को तोड़ा है ,और अभिव्यक्ति के नए दायरे पैदा किए हैं। मर्यादा को मानते तो नए दायरे नहीं पैदा होते। यह काम लेखकों-विचारकों ने पुराने सोच,विचार,मान्यता ,मूल्य और न्याय व्यवस्था आदि के बारे में निर्मम विचार संग्राम चलाकर किया है।

ग्राम्शी कहते थे युद्ध में शत्रु के कमजोर हिस्सों पर हमले करो और विचारों की जंग में शत्रु के मजबूत किले पर हमला करो। आशीषनंदी ने मजबूत किले पर हमला बोला है इसीलिए इतनी बेचैनी है।

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टीवी मीडिया पर ज्ञानीजी कह रहे हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी के लिए हमें मर्यादा की सीमा तय करनी चाहिए। ये महान ज्ञानी लोग आईबीएन-7 में बोल रहे थे।

अरे मित्रो, अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय नहीं कर सकते। अभिव्यक्ति का क्षितिज किसी सीमा में नहीं बांध सकते। अभिव्यक्ति में मर्यादा की मांग अंततः अभिव्यक्ति में कटौती और नियंत्रण की मांग है। अभिव्यक्ति को यह नैतिक आधार पर देखना होगा। अभिव्यक्ति का मसला मर्यादा या सीमा का मसला नहीं है।

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भाषण में किस तरह की भाषा होगी, यह वक्ता तय करेगा। आशीषनंदी के बयान की भाषा को लेकर ज्ञानी लोग टीवी में बैठकर सवाल कर रहे हैं कि वे ऐसे नहीं ,ऐसे बोलते तो मामला ठीक रहता। ये लोग भूल रहे हैं कि भाषा पर विवाद नहीं है, विवाद आशीषनंदी के आइडिया के कारण हुआ है। आशीषनंदी अपने विचार को वापस लेने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में पुलिस-कचहरी आदि के बहाने ये तथाकथित हाशिए की राजनीति करने वाले लोग कानूनी आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं ।

जजों के एक वर्ग में भी कानूनी आतंकवाद की महत्ता बनी हुई है। जज कैसे तय कर सकते हैं कि किसी वक्ता को क्या कहना चाहिए।

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दलित विचारकों का एक वर्ग यह कह रहा है कि उनके विचारों को चुनौती नहीं दी जा सकती। यह धारणा लोकतंत्रविरोधी है। लोकतंत्र में सभी किस्म के विचारों और नीतियों की निंदा-आलोचना हो सकती है। लोकतंत्र विचारों का विश्वविद्यालय है। यह एकवर्ग के विचारों का संरक्षकतंत्र नहीं है।

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गजब कुतर्क दिए जा रहे हैं कुछ लोग कह रहे हैं कि आशीषनंदी ने गलत बात की है अतः उनको जेल भेजो। इस तरह के लोग मीडिया से लेकर अदालत तक भीड़तंत्र को लोकतंत्र का सिरमौर बनाने में लगे हैं। ये भीड़तंत्र के छोटे हिटलर हैं।

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भारत साहित्य समारोहों के आयोजक विलक्षण-मजेदार और रीढ़िविहीन हैं। पिछलीबार जयपुर साहित्य महोत्सव में सलमान रूसदी बुलाए गए वे नहीं आ पाए,इसबार वे भारत आए हैं, लेकिन जयपुर में बुलाए नहीं गए.कोलकाता साहित्य महोत्सव में वे बुलाए गए लेकिन ममता के आदेश केकारण शामिल नहीं हो पाए।

मजेदार बात यह कि कलकत्ता साहित्य महोत्सव के आयोजकों ने कहा कि उन्होंने सलमान रूशदी को आमंत्रित ही नहीं किया था। इसके जबाब में रूशदी ने ट्विट किया है कि उनके पास आयोजकों के कई ईमेल हैं, निमंत्रणपत्र है, और यहां तककि आयोजकों ने उनको एयरटिकट भी भेजा था। रूशदी ने कहा कि ममता बनर्जी के दबाब के कारण उनको कोलकाता आने से रोका गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने आशीषनंदी के विवादास्पद बयान पर दर्ज एफआईआर के आधार पर उनको गिरफ्तार करने पर 1फरवरी 2013 को रोक लगा दी ।

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पश्चिम बंगाल में असभ्यता की लहर चल रही है।वामदलों से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक,अधिकांश दलों के नेता सार्वजनिक सभाओं में घटिया और गंदी भाषा का जमकर उपयोग कर रहे हैं। यह पश्चिम बंगाल में मध्यवर्ग की सभ्यता के ह्रास का युग है।

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सोमवार, 21 जनवरी 2013

मीडिया उन्माद ,कांग्रेस और फेसबुक


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राजनीति में भावुकता कैंची है,वह इधर -उधर दोनों ओर काटती है। यह लाभ कम नुकसान ज्यादा करती है। भावुकता के आधार पर जुटाया समर्थन किस तरह रसातल में ले जा सकता है। इसे राजीवगांधी की इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुई जीत के बाद कांग्रेस के पराभव के साथ देख सकते हैं। यही हाल बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ भाजपा के ह्रास के रूप में भी देख सकते हैं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों भावुकता का दुरूपयोग करती रही हैं और इसबार राहुल गांधी ने भावुक भाषण देकर कांग्रेस में प्राणसंचार करने की असफल कोशिश की है।

भावुक भाषण कभी संगठन में प्राण नहीं फूंकते, उनसे टीवी में जान आती है।

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राहुल गांधी ने अपने भाषण में 'उम्मीद' पर जोर दिया 'पावर' यानी सत्ता को निशाना बनाया। उनके भाषण का यह फॉरमेट ओबामा के राष्ट्रपति चुनाव की पहली पारी में दिए गए भाषण की बुनियादी समझ से परिचालित है।

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राहुल गांधी को नेताओं की तलाश है,राजकुमार भूल गए कि यह दौर नेता के अंत का दौर है। परवर्ती पूंजीवाद में नेता नहीं बचता,दलाल रह जाते हैं या औसतदर्जे के नेता रह जाते हैं। आज नेताओं का अभाव सभी दलों में है। राहुल ने कहा-

'' हमें ऐसे चालीस-पचास नेता तैयार करने हैं, जो देश और प्रदेश को चला सकें। हर प्रदेश में 5 से 10 ऐसे नेता हों जो सीएम बन सकें। हर जिले में यह बात हो। जब भी कोई पूछे कि कांग्रेस क्या करती है तो जवाब मिलना चाहिए कि भविष्य के लिए सेकुलर नेता तैयार करती है। जमीन से जुड़े नेता तैयार करती है। ऐसे नेता तैयार करती है, जिन्हें देखकर हिंदुस्तान के लोग उनके पीछे खड़े होने के लिए तैयार हो जाएं। इसके लिए संगठन की जरूरत हैं। ऐसा सिस्टम बन सकता है, जिसे आप बनाएंगे और चलाएंगे।''

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राहुल गांधी के भाषण में आए सरलीकरण-

"मैं सबकुछ नहीं जानता। दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो सबकुछ जानता हो। "

''हमें इस पावर का इस्तेमाल लोगों के सशक्तिकरण के लिए करना चाहिए।''

"अगर आप पावरफुल होते हैं, तो आपको बहुत संभलकर रहने की जरूरत है। "

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राहुल गांधी किस तरह की भूमिका में ले जाना चाहते हैं और किस तरह की तुलनाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं,इससे उनकी और कांग्रेस पार्टी की भूमिका का भावी कार्यक्रम समझ में आ जाएगा। वे जज बनना चाहते हैं। वे जनता नहीं बनना चाहते,जनसेवक नहीं बनना चाहते।



"कचहरी में दो लोग होते हैं जज और वकील। मैं जज का काम करूंगा। वकील का काम नहीं करूंगा।"

न्यायप्रियता और जज में अंतर होता है। यह सत्ता का अहंकार है।

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सत्ता हर कोई हासिल करना चाहता है, वह 'जहर' की तरह है।(राहुल गांधी) के इस बयान के बाद टीवी पर भारी प्रौपेगैण्डा चल रहा है। यह मीडिया केन्द्रित नकली या प्रायोजित प्रशंसा है। प्रायोजित प्रशंसा लोकतंत्र में मीडिया जहर है।

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कांग्रेस चिन्तन शिविर में राजनीतिक-सांगठनिक कमजोरी को "स्ट्रक्चरल वीकनेस "कहा गया। यह भाषा का बदला हुआ रूप है जिसके जरिए कांग्रेस राजनीतिक दुर्बलता को कम करके पेश कर रही है। जिन इलाकों में कांग्रेस कमजोर है उसको सांगठनिक तौर पर कैसे दूर करेगी,इसके बारे में कोई दिशा निर्देश सामने नहीं आए हैं।

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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी आज जयपुर के चिन्तन शिविर में भावुक और अन्तर्विरोधपूर्ण भाषण दिया। पहला अंतर्विरोध-

"मैं जब बच्चा था तो मुझे बैडमिंटन बहुत पसंद था। यह खेल इस जटिल दुनिया में मुझे बैलेंस देता था। मैं अपनी दादी के घर में दो पुलिस वालों के साथ बैडमिंटन खेलता था। वे मेरी दादी की सुरक्षा का जिम्मा संभालते थे। वे मेरे दोस्त हो गए थे। एक दिन उन्होंने मेरी दादी को मार दिया और मेरे जीवन का बैलेंस छीन लिया।"

यह पैराग्राफ क्या संदेश देता है ? दोस्त कभी भी दुश्मन हो सकता है ।

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मीडियावाले कह रहे हैं कि राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने 2014 के अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का संकेत दे दिया है। उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तब सोनिया अध्यक्ष थीं लेकिन प्रधानमंत्री नहीं बन पायीं,राहुल को यदि अध्यक्ष भी बना दिए जाए तो भी प्रधानमंत्री के पद पर कांग्रेसी उनको ही बिठाएंगे यह कहना मुश्किल है।

कांग्रेस अंततः संघ परिवार और अमेरिका के फैसले को मानता है,सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बन पाने और मनमोहन के बन जाने में इन दोनों की बड़ी भूमिका थी।

प्रधानमंत्री का पद उसको ही मिलेगा जिस पर अमेरिकी मोहर लगी होगी .।

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कांग्रेस नेताओं की सोशलमीडिया पर सोनिया गांधी के भाषण पर आई प्रतिक्रियाएं देखकर भावी रणनीति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है ।आनेवाले समय में कांग्रेस सोशलमीडिया के नियमंन की दिशा में जा सकती है ?--11-

टीवी चैनलों की आरामतलबी का आलम यह है कि कांग्रेस के चिन्तनशिविर से कोई खबर लीक नहीं हो रही है। कांग्रेस को अपने चिन्तनशिविर को पारदर्शी बनाना चाहिए और उसकी लाइव प्रसारण व्यवस्था करनी चाहिए जिससे पता चले कि कांग्रेस के अंदर क्या चिन्तन हो रहा।

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राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाया गया।वे संगठन में दूसरे नम्बर पर आ गए हैं।

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मीडिया चैनल और कांग्रेसी नेताओं की बेबकूफीभरी युगलबंदी देखें- दोनों कह रहे हैं कि राहुल को बड़ी भूमिका दी जाय,यह खबर विगत दो साल से समय समय पर टीवी में चलायी जा रही है। मीडिया राहुल के बारे में इस तरह की गप्प को बार बार क्यों उछालता है ?

राहुल बड़ी भूमिका में आएं तब ही खबर दें। अघटित घटना की खबर को खबर नहीं कहते।

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कांग्रेसी नीतियों की असफलता का ताजा प्रमाण देखें- आधारभूत ढांचा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी जीएमआर और जीवीके पूंजी जुटाने की असमर्थता की वजह से बड़ी सड़क परियोजनाओं से बाहर निकल रही हैं। यह बात यह बात भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने आज कही।

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कांग्रेस आनेवाले चुनाव में खाद्य विधेयक को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक अस्त्र बनाने जा रही है। लेकिन इस अस्त्र से कांग्रेस को कोई खास लाभ नहीं होगा। इस विधेयक को लाने के पीछे प्रधान कारण सब्सीडी को घटाना, लेकिन यह काम नहीं हो पाएगा। उलटे सबसे पहले खाद्य सब्सिडी का खर्च बढ़ेगा और मौजूदा सरकारी आकलन के मुताबिक पहले साल में यह 1.2 लाख करोड़ रुपये होगा, जो तीसरे साल 1.5 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच सकता है अगर एमएसपी में बढ़ोतरी होती रहे और इसे जारी करने की कीमत स्थिर रहे। अगर हम इस विधेयक में कुपोषण समाप्त करने, भंडारण व अनाज की ढुलाई के लिए बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को जोड़ें तो यह आसानी से सालाना 2 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।

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सरकार ने खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क गणना के लिए निर्धारित शुल्क मूल्य व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया। अब खाद्य तेलों के आयात पर उनके शुल्क मूल्य की गणना अंतरराष्ट्रीय कीमत के आधार पर होगी। इससे खाने के तेलों के दामों में उछाल आएगा। यानी सूखी रोटी खाओ कांग्रेस के गुन गाओ।

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कांग्रेस गरीबी का समारोह कैसे करती है इसे देखें-कांग्रेस के 'चिंतन शिविर' से एक दिन पहले संसदीय स्थायी समिति ने आज खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश की। इस विधेयक में देश की 75 फीसदी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी आबादी को बिना किसी विभेद के एकसमान 5 किलोग्राम अनाज मुहैया कराने का कानूनी अधिकार देने का प्राïवधान किया गया है। यह अनाज फ्लैट रेट (अपरिवर्तित दर) पर वितरित किया जाएगा। इसमें चावल की दर 3 रुपये, गेहूं की 2 रुपये और मोटे अनाजों की 1 रुपये प्रति किलोग्राम होगी।

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कांग्रेस का तीन दिनों तक चलने वाला चिंतन शिविर आज यानी शुक्रवार से जयपुर में शुरू हो रहा है। यह चिंतन शिविर ऐसे समय हो रहा है जब कांग्रेस की नीतियों का खोखलापन तेजी से सामने आ रहा है। हर मोर्चे पर सरकार और उसकी नीतियां विफल रही हैं। नव्य आर्थिक उदारीकरण का पूरा प्रपंच चरमराने लगा है। क्या आत्मसमीक्षा भी होगी इस शिविर में ?

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टीवी चैनलों ने सरकारी भांड़ का दायित्व अपने ऊपर ले लिया है वे पेट्रोल आदि के दामों में बढोत्तरी के संबंध में पहले से ही खबर लगाते हैं और लगातार इस तरह के लोगों के विचार पेश करते रहते हैं जो किसी न किसी रूप में दाम बढ़ाए जाने को वैधता प्रदान करते हैं। भांडों का काम है सरकार के भोंपू की तरह काम करना। इस तरह की टीवी पत्रकारिता वस्तुगत होने का दावा नहीं कर सकती।

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एनडीटीवी इंटिया पर आज रवीशकुमार के टॉकशो पर सभी वक्ता कह रहे हैं कि 2014 में लोकसभा चुनाव के समय 20 करोड़ लोग वोटर इंटरनेट से जुड़े होंगे। ये 20करोड़ जागरूक वोटर होंगे।

हमारी राय में सोशलमीडिया की राजनीतिक भूमिका को यह अतिरंजित रूप में देखना होगा। वोटर अपनी राय जमीनी हकीकत और अपने पुराने विश्वासों के आधार पर बनाता और व्यक्त करता है।

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रवीशकुमार कह रहे हैं कि सोशलमीडिया की भाषा भिड़ने की भाषा है। रवीशकुमार को यह बात समझनी होगी कि सोशलमीडिया की भाषा पर्सुशसन की भाषा है।

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एनडीटीवीइंडिया में अभी एक टॉकशो चल रहा है सोशलमीडिया की भूमिका पर। भाजपा के अरविंद गुप्ता ने कहा है कि सोसलमीडिया पर राइटविंग के मंच के रूप में उनके मीडियम को जाना जाता है।

असल में सोशलमीडिया पर मात्र कम्युनिकेशन होता है वहां कोई विचारधारात्मक कम्युनिकेशन नहीं होता।

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टीवी चैनलों में पाकविरोधी उन्माद इनदिनों चरमोत्कर्ष पर है । भाजपा और उसके सहजिया सम्प्रदाय के नेता और संगठन भारत के दो सैनिकों की पाक द्वारा हत्या किए जाने के बाद से आर-पार की जंग जारी रखो,पाक से कडाई से पेश आओ,का नारा लगाकर मीडिया में उन्मादी प्रचार कर रहे हैं।

इन उन्मादी नेताओं और मीडिया के दबाव में मनमोहन सरकार भी आ गयी है।

सवाल यह है कि यूरोप से हमने दोस्ती करना क्यों नहीं सीखा, जिनदेशों ने सारी दुनिया पर 2-2 विश्वयुद्ध थोपे,करोड़ों लोगों की हत्या की उन देशों के साथ सभी देशों के मित्रतापूर्ण संबंध हैं।

करोडों लोगों की हत्या करने वाले हिटलर के देश के साथ कभी किसी ने यह नहीं कहा कि हम जर्मनी की टीम के साथ नहीं खेलेंगे।जर्मनी के गायकों को नहीं सुनेंगे।

भारत में हाल की घटनाओं पर जिस तरह की घटिया उन्मादी प्रतिक्रिया टीवी चैनलों ने दी है वह निंदनीय है और मानवाधिकार के विश्व परिप्रेक्ष्य के खिलाफ है।

हमें सोवियत संघ से सीखना चाहिए जिसके द्वितीय विश्वयुद्ध में करोडों लोग मारे गए लेकिन कभी किसी नेता ने यह मांग नहीं की सोवियत संघ का जर्मनों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध नहीं होगा।

हमें वियतनाम से सीखना चाहिए जिसको अमेरिका ने पूरी तरह कई दशक तक बमों से रौंदा लेकिन वियतनाम जब अमेरिकी प्रभुत्व से मुक्त हो गया तो अमेरिका के साथ गहरी मित्रता करके उसने नई मिसाल कायम की है और वियतनाम में आज सबसे ज्यादा अमेरिकी कंपनियां काम कर रही हैं। हमें पड़ोसी देशों के प्रति उन्माद पैदा करने की राजनीति को बंद करना चाहिए।

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भारतीय चैनलों के द्वारा पाक-भारत संबंधों को बिगाड़ने के लिए सचेत कोशिशें हो रही हैं।

इस तरह के टॉकशो आयोजित किए जा रहे हैं जिनसे पाक के प्रति घृणा पैदा की जा सके। भारतीय सीमा पर पाक का बार बार उल्लंघन और हमारे दो सैनिकों का पाकसैनिकों द्वारा कत्ल निंदनीय कृत्य है। इसकी निंदा की जानी चाहिए। लेकिन इस घटना की आड़ में भारत-पाक संबंधों को बिगाडकर हमारे चैनल जनविरोधी हरकत कर रहे हैं। खासकर पाकविरोधी भावनाओं को व्यापक कवरेज दे रहे हैं। पाकविरोधी उन्मादी प्रचार टीवी चैनलों की मासकल्चर संस्कृति का वैचारिक खाद्य है। इससे सावधान रहने की जरूरत है।

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की नेत्री सुषमा स्वराज से पाक के साथ बढे हुए तनाव पर अभी बातें की हैं। लेकिन इससे क्या भाजपा के पाकविरोधी घृणा अभियान को वे शांत कर पाएंगे ?

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हाल ही में कलकत्ता में विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब बोल रहे थे तो वे वैज्ञानिकों को सम्बोधित कम और कांग्रेसियों को सम्बोधित करते ज्यादा दिख रहे थे। वे कांग्रेस के प्रचारक के रूप में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री का विज्ञान कांग्रेस में दिया गया भाषण राजनीतिक प्रचार से ज्यादा महत्व नहीं रखता। वे जो कहते हैं वह कपूर की तरह कुछ क्षण दिखता है फिर गायब हो जाता है। संभवतः वे अकेले प्रधानमंत्री हैं जिनके किसी भी भाषण की कोई भी बात आम आदमी से लेकर बुद्धिजीवियों तक किसी को भी याद नहीं है। प्रधानमंत्री का प्रचारक होना सामान्य बात है लेकिन मनमोहन सिंह इस मामले में विरल हैं क्योंकि वे नव्य उदारनीतियों के नीति निर्माता-प्रचारक के रूप में काम करते रहे हैं। वे मूलतः वर्चुअल हैं। आप उनको पकड सकते हैं लेकिन घेर नहीं सकते। गलती पकड सकते हैं लेकिन दोषी नहीं ठहरा सकते।



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को विपक्ष जब भी घेरने की कोशिश करता है वे हाथ से निकल जाते हैं। हाल ही में दामिनी दिल्ली बलात्कार कांड के प्रसंग में मीडिया उन्माद के जरिए मनमोहन सरकार को घेरने की असफल कोशिश की गई लेकिन वे साफ बच निकले। सवाल यह है कि मनमोहन सरकार को घेरने में विपक्ष आज तक सफल क्यों नहीं हुआ ?



मनमोहन सरकार और कांग्रेस पार्टी ने एक नयी रणनीति बनाई है जिसके तहत वे पापुलिज्म और लोकप्रिय जनदबाब का प्रत्युत्तर प्रशासनिक एक्शन के जरिए दे रहे हैं। मसलन् जब 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला सामने आया तो उन्होंने सीधे एक्शन लिया। कॉमनवेल्थ कांड से लेकर दामिनी कांड तक जो भी समस्या आई उसके प्रशासनिक समाधान तलाशने की सक्रिय कोशिश की और इससे भी ज्यादा अपनी कोशिश का मीडिया में जमकर प्रचार किया।



मनमोहन सरकार का मानना है पापुलर को मानो,आलोचनात्मक राय दो । राजनीतिक दबाब को प्रशासनिक –न्यायिक समाधान दो। इस अर्थ में वे लगातार संरचनात्मक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। संरचनात्मक सुधार वस्तुतःनव्य आर्थिक उदारीकरण का हिस्सा हैं। नव्य उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार नयी समस्याएं पुराने कानूनी फ्रेमवर्क में हल नहीं हो सकतीं, मनमोहन सरकार ने इसे सभी मंत्रालयों की कार्यप्रणाली का अंग बना दिया है। इस पद्धति का अनुकरण करने के कारण उनकी जब आलोचना आरंभ होती है तब वे सामने होते हैं लेकिन प्रशानिक एक्शन जब आने लगते हैं तो मनमोहन सरकार के खिलाफ गुस्सा गायब हो जाता है और फिर आमलोगों से लेकर मीडिया तक समस्या और समाधान पर ही बहस आकर टिक जाती है। इसके कारण राजनीति में पैदा हुए उन्माद और भावुकता को हाशिए पर डालने में उनको सफलता मिली है।



मनमोहन सिंह जब से प्रधानमंत्री बने हैं। वे मीडिया और विशेषज्ञों की आलोचना के केन्द्र में नहीं आते। उन्हें प्रधानमंत्री बने 8 साल से ज्यादा समय हो गया है। मीडिया में ममता बनर्जी,शरद पवार ,प्रफुल्ल पटेल ,डी.राजा ,कांग्रेस के क्षेत्रीय नेताओं ,कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों आदि की आलोचना दिखेगी लेकिन मनमोहन सिंह की आलोचना नहीं मिलेगी। आकाश छूती मंहगाई है लेकिन प्रधानमंत्री पर न तो मीडिया हमला कर रहा है और न विपक्ष। असल में मनमोहन सिंह डिजिटल हो गए हैं। उनका डिजिटल इमेज में रूपान्तरण कर दिया गया है। डिजिटल इमेज और राजनीतिक व्यक्तित्व की इमेज में यही अंतर होता है। राजनीतिक इमेज को पकड़ सकते हैं लेकिन डिजिटल इमेज को पकड़ नहीं सकते।



मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व अनेक गुणों से परिपूर्ण है। वे बेहद विनम्र हैं, सुसंस्कृत है, शिक्षित हैं। नव्य -उदार नीतियों के विशेषज्ञ हैं। मीडिया में उनके बारे में न्यूनतम बातें छपती हैं। संभवतः मीडिया में उन्हें सबसे कम कवरेज वाले प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।



नई डिजिटल इमेज एक ही साथ मिथकीय और ऐतिहासिक होती है। अतीतपंथी और भविष्योन्मुखी होती है। तकनीकीपरक और धार्मिक होती है। मनमोहन सिंह ने अपने प्रचार में बार-बार समृद्ध भारत और समर्थ भारत की बात करते हैं। बार-बार विकासदर को उछाला है। भारत को समृद्धि के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। खासकर पूंजीपति,ह्वाइट कॉलर और मध्यवर्ग के साथ जोड़ा है। इस क्रम में उन्होंने मजदूरों-किसानों की राजनीति को हाशिए पर ड़ालने में सफलता अर्जित की है।



मनमोहन कोड की विशेषता है कि उसने गरीबी के यथार्थ विमर्श को वायवीय बनाया है। गरीबी और अभाव को गैर-बुनियादी विमर्शों के जरिए अपदस्थ किया है। मनमोहन कोड ने गरीबी और अभाव को अप्रत्यक्ष दानव में रूपान्तरित किया है। जिसके बारे में आप सिर्फ कभी-कभार सुन सकते हैं। मनमोहनकोड के लिए गरीबी और अभाव कभी महान समस्या नहीं रहे। मनमोहन कोड ने देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे खतरनाक शत्रु के रूप में माओवाद को प्रतिष्ठित किया है। जबकि माओवाद भारत विभाजन या सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा नहीं है।



मनमोहन कोड की काल्पनिक सृष्टि है माओवाद और आतंकी हिन्दू। यह जादुई-मिथकीय शत्रु है। मनमोहन कोड के अनुयायी और प्रचारक माओवाद के बारे में तरह-तरह की दंतकथाएं, किंवदन्तियां आदि प्रचारित कर रहे हैं। मीडिया में माओवाद एक मिथकीय महामानव है। इसी तर्ज पर आरएसएस के नाम पर बहुत सारे आतंकी हिन्दू महामानव पैदा कर दिए गए हैं। ये सारे मनमोहन कोड से सृजित वर्चुअल सामाजिक शत्रु हैं। ये आधे मानव और आधे दानव हैं।



माओवाद और हिन्दू आतंकवाद की रोचक डिजिटल कहानियां आए दिन सम्प्रेषित की जा रही हैं। इन्हें सामाजिक विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आप जरा गौर से माओवादी नेता किशनजी की कपड़ा मुँह पर ढ़ंके इमेज और हिन्दू आतंकी के रूप में पकड़े गए संतों को ध्यान से देखें तो इनमें आप आधे मनुष्य और आधे प्राचीन मनुष्य की इमेज के दर्शन पाएंगे।



कारपोरेट मीडिया माओवादी और हिन्दू आतंकी की ऐसी इमेज पेश कर रहा है गोया कोई फोरेंसिक रिपोर्ट पेश कर रहा हो। वे इनके शरीर की ऐसी इमेज पेश कर रहे हैं जिससे ये आधे मनुष्य और आधे शैतान लगें। इससे वे खतरे और भय का विचारधारात्मक प्रभाव पैदा कर रहे हैं।



मनमोहन सिंह मीडिया में उतने नजर नहीं आते जितना इन दिनों डिजिटल दानवों (माओवाद और हिन्दू आतंकी) को पेश किया जा रहा है। हमें इस कोड को खोलना चाहिए। यह तकरीबन वैसे ही है जैसे अमेरिका ने तालिबान और विन लादेन की इमेजों के प्रचार-प्रसार के जरिए सारी दुनिया को तथाकथित आतंकवाद विरोधी मुहिम में झोंक दिया और तबाही पैदा की । सामाजिक अस्थिरता पैदा की । घृणा का वातावरण पैदा किया । ठीक यही काम मनमोहन कोड अपने डिजिटल शत्रुओं के प्रचार-प्रसार के नाम पर कर रहा है। हमें जागरूक रहने की जरूरत है।


रविवार, 30 दिसंबर 2012

दामिनी प्रकरण पर फेसबुक कवरेज का असर

दामिनी प्रसंग में हमने अनेक मांगें ,सुझाव और अनेक विचार रखे । इनमें अनेक मांगें और सुझाव केन्द्र सरकार के नेताओं ने माने हैं।अनेक सुझावों को मीडिया में प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया और यही विचारों का आदान-प्रदान फेसबुक लेखन की बड़ी उपलब्धि है। इस प्रसंग में उन सभी टिप्पणियों को यहां नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है। 

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दामिनी का पार्थिव शरीर आज तड़के सुबह विशेष विमान के जरिए दिल्ली आ चुका है। हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मौजूद थीं। हम सब दामिनी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

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औरतों पर अत्याचार थमें इसके लिए जरूरी है कि पुलिस फोर्स में खाली पड़े स्थानों को तत्काल भरा जाय। प्रत्येक थाने के प्रतिदिन के फोन रिकॉर्ड रखे जाएं। प्रत्येक थाने में स्त्री विरोधी मानसिकता के खिलाफ पुलिसकर्मियों को शिक्षित किया जाय।

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केन्द्र सरकार को औरतों पर बढ़ते हुए अत्याचारों को देखते हुए तुरंत एक नयी योजना घोषित करनी चाहिए जिसके तहत देश में औरतों के खिलाफ चल रहे उत्पीड़न के मुकदमों को विशेष अदालतों के हवाले करके तत्काल न्याय की व्यवस्था करनी चाहिए। इन अदालतों के अलावा महिला आयोगों को अधिकार संपन्न बनाया जाना चाहिए। महिला आयोगों के जरिए स्थानीय स्तर पर न्याय की व्यवस्था की जानी चाहिए और इसके लिए राज्य और केन्द्र महिला आयोगों को कानूनी और संवैधानिक अधिकार दिए जाने चाहिए।

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अभी खबर आई है कि बारासात( कोलकाता) में एक महिला के साथ गैंग रेप हुआ है और उसके बाद उसे अपराधियों ने जान से मार डाला है। यह घटना शाम को साढ़े 6बजे हुई है।

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बलात्कार के खिलाफ अमेरिका में सख्त कानून हैं और अपराधियों को दण्ड भी जल्दी मिलता है लेकिन वहां पर अभी तक बलात्कार थमे नहीं हैं। एक आंकड़ा देखे- अमेरिका में 1992-2000 के दशक के आंकड़ों के अनुसार एक साल में एक लाख हजार औरतों के साथ बलात्कार हुआ। तकरीबन एक लाख 10 हजार औरतों के साथ बलात्कार की कोशिश की गई।

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पोर्नोग्राफी में बलात्कार पूरी योजना के तहत होता है। इसमें प्रत्येक चरण, भाव-भंगिमा, आसन यानि कि क्रियान्वयन के सभी रूप तय होते हैं जो क्रमवार ढ़ंग से पूर्ण उत्तेजना उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। स्त्री के सामूहिक बलात्कार में पोर्नोग्राफी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 'डीप थ्रोट' कार्यक्रम आने के बाद थ्रोट रेप जैसी घटनाएँ और भी बढ़ी हैं। ऐसे उपक्रमों द्वारा पुरुष के इस विश्वास की पुष्टि होती है कि वह स्त्री को गहरे भेद सकता है, उसके बिल्कुल अंदर प्रवेश कर सकता है। पोर्नोग्राफी से उपजे असामान्य व्यवहारों ने औरतों के खिलाफ हिंसक अपराधों को जन्म दिया है। ऐसे कुकृत्य स्त्री के प्रति गुलाम मानसिकता व उन्हें प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति से प्रेरित होते हैं।

हमने विगत आठ वर्षों में देखा है कि बलात्कार के दौरान कैमरे के इस्तेमाल में वृद्धि हुई है। कैमरे द्वारा उतारे गए बलात्कार के दृश्य त्वरित वेग से बाज़ार में उपलब्ध होते हैं। यह ही असली रेप है जो छुपे, नितांत एकायामी आनंद के रूप में सामने आता है। औरतों का उत्पीड़न हर जगह हो रहा है, गैर पारंपरिक रोजगार के क्षेत्र में, शिक्षा में, घर में। घर के भयप्रद, असुरक्षित, आज्ञाकारी परिवेश में महिलाएँ सबसे ज्यादा हिंसा की शिकार होती हैं। पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल बच्चों पर भी किया जाता है ताकि उनका तीव्र अनुकूलन किया जा सके। ऐसा उन स्थानों पर अधिक होता है जहाँ दूसरी जगहों से आकर बस गए लोग अपनी इच्छा पूर्ति के लिए पास-पड़ोस के बच्चों व स्त्रियों पर वाचिक, शारीरिक हमले करते हैं।

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सामान्यतौर पर जो लोग और संगठन अपनी विचारधारा के प्रचार के लिए स्त्री के परंपरागत रूप की हिमायत करते हैं और उसे परंपरागत दायरे में कैद रखना चाहते हैं वे मूलतः स्त्री को मातहत रखना चाहते हैं।

स्त्री को मातहतभाव से मुक्त करने के लिए जरूरी है कि माँ,बहन,पत्नी आदि संबंधों के आगे जाकर स्त्री को नागरिक की पहचान देने की जरूरत है। स्त्री को नागरिक की पहचान मिलने के साथ ही नागरिक हकों का बोध होता है।

हमारे परंपरापूजक लोग स्त्री को सब कुछ बनाना चाहते लेकिन नागरिक नहीं बनने देना चाहते। आज स्त्री को नागरिक पहचान देने की जरूरत है। आज स्त्रियां जो आंदोलन कर रही हैं वे नागरिक अधिकारों के परिप्रेक्ष्य में ही बलात्कारकांड की जांच की मांग कर रही हैं।

हम स्त्री को पहले नागरिक मानें और उसके नागरिक हकों को परिवार से लेकर बाहर समाज तक लागू करें।

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क्या गऊ को माता मानने और पूजने से औरतों पर हो रहे जुल्म हंद हो जाएंगे ? क्या गऊमाता के संरक्षण और पालन-पोषण से भारतीय मूल्यों की रक्षा होती है ?

असल में गऊमाता की पूजा की आड़ में भारत में पितृसत्ता का वैचारिकतंत्र काम करता रहा है। आज भी गऊमाता के संरक्षण के नाम पर तमाम किस्म के वैचारिक पिछड़ेपन की संघ परिवार वकालत करता रहा है। गऊमाता के साथ जो लोग स्त्री की तुलना करते हैं वे वस्तुतः स्त्री को पशु से बेहतर अवस्था में नहीं रखते। धिक्कार है उनको जो गऊ को गऊ न कहकर गऊमाता कहते हैं और औरत को अपमानित करते हैं।

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ये निर्देश यदि मान लिए गए हैं तो फिर उसके इलाज के लिए सिंगापुर भेजे जाने पर सवाल खड़े क्यों कर रहे हैं मीडिया धुरंधर और तथाकथित समाजसेवक ? पीड़ित कहां इलाज कराए यह उसके परिवार का निजी फैसला है। उसको लेकर बतंगड़ मचाने की जरूरत नहीं है। इलाज कैसे हो और कहां हो यह भी प्राइवेसी में आता है।

Ajit Anjum:

''सभी न्यूज चैनलों ने आपसी सहमति से ये फैसला किया है कि हम उस लड़की के परिवार, उसके गांव, उसके अंतिम संस्कार की तस्वीरें नहीं दिखाएंगे . हम नहीं चाहते कि जिस परिवार की बेटी के साथ इतना दर्दनाक हादसा हुआ है , उसकी निजता का उलंघन हो . न्यूज चैनलों की आपसी सहमति के बाद बीईए ने एक गाइडलाइंस तैयार की है .....

1.No OB and teams at the funeral or home town or airport

2.do not show the funeral.

3. Do not show shots of home or family.

4. No shot of arrival of body.

5.no shots of transportation of body. And if course no chasing of the funeral van .

6. No interview with any relative .

7. Info about arrival of body and funeral should be given. However, location of funeral should not be given.

8. The above guidelines are exhaustive. There could be situations not covered in above points. In such cases, pl follow the guiding principle of protecting the IDENTITY , DIGNITY and PRIVACY of the girl.''

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केन्द्र सरकार यदि बलात्कार कांड पर सहानुभूति रखती थी तो उसमे मेट्रो के दरवाजे बंद क्यों किए ? जीन्यूज के एंकर ने सवाल उठाया है,एंकर कह रहा है जिस तरह इलाज के लिए पीड़िता को सिंगापुर भेजा उसी तरह न्याय के लिए दोषियों को सउदीअरब भेज दिया जाए।

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टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी ने स्त्री उत्पीडन के मसले को अ-राजनीतिक बनाने की असफल कोशिश की है। चैनल के संपादक और एंकर के नाते उनका यह कहना गलत है कि यह आंदोलन अ-राजनीतिक है।

इस आंदोलन में विभिन्न रंगत की राजनीतिक विचारधाराएं शामिल हैं, विभिन्न विचारधारा के संगठन शामिल हैं। इसमें अनेक महिला संगठन शामिल हैं इसके अलावा अनेक संगठन भी शामिल हैं। ऐसी स्थिति में चंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन अ-राजनीतिक नहीं है। यहां तक कि टाइम्स नाउ के पैनल में आम आदमी पार्टी के दो लोग इस समय टॉकशो में भाग ले रहे हैं। इससे भी बड़ी बात यह कि स्त्री के सवाल अ-राजनीतिक नहीं होते। स्त्री के सवाल राजनीतिक होते हैं।इनके राजनीतिक समाधान होने चाहिए।

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दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अचानक अभी जंतर-मंतर गयीं। उनका वहां जाना राजनीतिक गलती है। जंतर-मंतर पर लोग प्रतिवाद कर रहे हैं और वे शोक में डूबे हुए हैं। शीला दीक्षित को शोक ही व्यक्त करना है तो पीड़ित लड़की के घर जातीं और कांग्रेस के द्वारा आयोजित शोकसभा में जातीं।

दामिनी की मौत भारत के युवाओं के लिए बहुत बड़ा धक्का लगा है। भारत के युवा उसकी मौत में आकंठ ङूबे हुए हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि दिल्ली सरकार की इस घटना के बाद नींद गायब हो गयी है। कांग्रेसी नेताओं को इस घटना पर प्रतिवाद का कोई अधिकार नहीं है। वे प्रच्छन्न रूप से प्रशासनिक असफलता के जिम्मेदार हैं।

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दामिनी की बॉडी जब सिंगापुर से दिल्ली आए तो भारत सरकार और दिल्ली सरकार को अपने उच्च अधिकारियों और मंत्रियों को हवाई अड्डे पर श्रद्धांजलि देने के लिए भेजना चाहिए। साथ ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए ।

जिस समय अंतिम संस्कार हो उस समय सारे टीवी चैनल प्रतीकात्मक तौर पर कुछ मिनट के लिए अपने प्रसारण शोक मनाते हुए बंद करें। केन्द्र सरकार को दामिनी की मौत पर संभव हृो तो राजकीय शोक की घोषणा करनी चाहिए।

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जेएनयू के छात्रों ने दिल्ली बलात्कार कांड के खिलाफ जिस तरह अग्रणी कतारों में भूमिका अदा की है वह हमारे देश के छात्र आंदोलन की मूल्यवान संपदा है।

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इंग्लैंड और वेल्स में सन् 2010-11 में एक मिलियन औरतें घरेलू उत्पीडन और हिंसा की शिकार हुई हैं। पूंजीवादी समाज में बलात्कार असल में व्यवस्था की देन है। ब्रिटिश क्राइम ब्यूरो के अनुसार ब्रिटेन में सालाना 80हजार औरतें बलात्कार की शिकार हुई हैं।

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भारत में रेप के खिलाफ गुस्सा क्यों फूटा क्योंकि भारत में प्रति 54 मिनट पर एक बलात्कार होता है। प्रति 51 मिनट पर छेड़खानी की घटना ,प्रति 43 मिनट पर अपहरण की घटना , प्रति 26 मिनट पर औरत पर शारीरिक हमला और हर सातवें मिनट पर औरत के खिलाफ अपराध की घटना होती है। हमें शर्म आती है ऐसे लोकतंत्र और उसके शासकों पर जहां औरत अहर्निश हमलों की शिकार है। ये आंकड़े बताते हैं कि औरत की यातना को कानूनी सुधारों से रोकना संभव नहीं है। जरूरत इस बात की है समूचे समाज का दिलो-दिमाग बदला जाय।

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दामिनी की मौत का एक ही संदेश है कि परवर्ती पूंजीवाद में औरतें सुरक्षित नहीं हैं। पूंजीवाद को कानूनी थेगड़ियों के जरिए बचाया नहीं जा सकता।

दामिनी की मौत का प्रतिकार तब ही संभव है जब हमारे मन में परवर्ती पूंजीवाद के प्रति तीव्र घृणा और आक्रोश हो। दामिनी की मौत का अर्थ महज कानूनी सुधार करना नहीं है।

दामिनी की मौत परवर्ती पूंजीवाद में तिल-तिलकर मर रही स्त्री की मौत का प्रतीक है। वह अपनी मौत के साथ हमारे सामने पूंजीवादी तंत्र को नंगा कर गयी है। दामिनी की मौत के सामने पीएम से लेकर संसद तक सब बौने और बेमानी महसूस हो रहे हैं।

समूचे पूंजीवादी सिस्टम के प्रति घृणा व्यक्त हो रही है। परवर्ती पूंजीवाद के खिलाफ एक स्त्री की मौत पर इतनी तीव्र घृणा को मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया। असल में बलात्कार तो परवर्ती पूंजीवाद का सबसे महत्वपूर्ण बायप्रोडक्ट है। दामिनी तुम बार बार याद आओगी कि परवर्ती पूंजीवाद कितना बर्बर और नृशंस है।

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दामिनी मरकर अमर हो गई है। वह भारत के नागरिकों की आंखों में एक सपना है। यह सपना है उत्पीडनमुक्त स्त्री की जिंदगी का। वह मरकर हम सबके मन में प्रवेश कर गई है। उसने मरकर हम सबके मन में छिपे आक्रोश और सामाजिक परिवर्तन के जज्बे को जगा दिया है। उसकी मौत हमें प्रेरणा देती रहेगी। वह भावी स्त्रीउत्पीडन मुक्त भारत का स्वप्न है।

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दिल्ली बलात्कार कांड की शिकार लड़की का सिंगापुर में निधन हो गया। हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।

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आम जनता को दामिनी बलात्कार कांड के बाद नए सिरे अपने इलाके के सांसद-विधायक के सांस्कृतिकबोध की पड़ताल करनी चाहिए। चुने हुए प्रतिनिधियों का सांस्कृतिकबोध उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना राजनीतिकबोध । इनकी दबंगई को जब तक लोकतंत्र के कब्रिस्तान में दफन नहीं करते तब तक ये लोग रह-रहकर अपनी गंदीभाषा और पुंसवाद को अभिव्यक्त करते रहेंगे।

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आज ममता के दल की एक महिला सांसद ने पार्कस्ट्रीट बलात्कार कांड की शिकार महिला के खिलाफ अशोभनीय टिप्पणी की है। सवाल यह है कि ये सांसद इस मौके पर अपने अंदर छिपे मर्दवाद को क्यों व्यक्त कर रहे हैं ?

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स्त्री उत्पीडक राक्षस पुरूष के मन में रहता है। समाज में तो उसके क्लोन हरकतें करते नजर आ रहे हैं।

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भाजपा से लेकर माकपा, कांग्रेस से सपा तक तक सभी दलों के नेताओं के इनदिनों औरतों के बारे में घटिया बयान सामने आए हैं ये बयान बताते हैं किकि राजनेता किस तरह सड़ गए हैं।

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स्त्री पर शारीरिक हमले सत्ता के लोकतांत्रिक संस्थानों के पितृसत्तात्मक रवैय्ये से प्रश्रय पाते रहे हैं। अनेक मामलों में अदालतें भी पुंसवादी नजरिए से फैसले देती रही हैं। संसद से लेकर अदालत तक हालत यह है कि स्त्री न्याय के लिए सालों भटकती रहती है लेकिन उसे न्याय नहीं मिलता। आज सुप्रीमकोर्ट ने बलात्कार के मामले दो महीनों में निबटाने का आदेश दिया है। यह फैसला इस बात की सूटना भी है कि बलात्कार के मामलों पर अदालतें समय रहते फैसले नहीं कर रहीं। जो न्याय सोया हुआ है उसे जगाने के लिए अदालतों के बाहर भी जुलूस निकाले जाने चाहिए।

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लोकतंत्र और भारत के संविधान के तहत प्राप्त अधिकारों के आधार पर औरतों की बदहाल स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। लोकतंत्र की आयरनी यह है कि इसमें पुंसवाद का स्वतः अंत नहीं होता। लोकतंत्र में समानता के दावे के बाद भी पितृसत्ता बनी रहती है।लोकतंत्र में स्त्री की सजगता के बिना लिंगभेद और भी गहरा होता है।

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स्त्री की सुरक्षा के लिए कानूनी संशोधन जरूरी हैं लेकिन इसके साथ ही स्त्री के प्रति घर से लेकर बाहर तक नजरिए को बदलने की जरूरत है। स्त्री को हम व्यक्ति और नागरिक के रूप में देखें। स्त्री को कानूनों के साथ नागरिक के रूप में तब्दील करने की जरूरत है। हम स्त्री को नागरिक के रूप में नहीं देखते। स्त्री को नागरिक के रूप में देखें और मानें तो सारे समाज में परिवर्तन की लहर सीधी दिशा में जाती नजर आएगी। कानूनोंसे औरत की पहचान नहीं बनती।

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मीडिया में मर्दानगी का किस तरह विचारधारात्मक महिमामंडन होता है इसे देखना हो तो आज आप प्रत्येक चैनल पर हिन्दी सिनेमा के महामर्द सलमान खान का जन्मदिन का महाकवरेज देखें। चैनलों को इस तरह के कार्यक्रमों से घिन क्यों नहीं आती ?

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स्त्री की सुरक्षा के लिए कानूनी संशोधन जरूरी हैं लेकिन इसके साथ ही स्त्री के प्रति घर से लेकर बाहर तक नजरिए को बदलने की जरूरत है। स्त्री को हम व्यक्ति और नागरिक के रूप में देखें। स्त्री को कानूनों के साथ नागरिक के रूप में तब्दील करने की जरूरत है। हम स्त्री को नागरिक के रूप में नहीं देखते। स्त्री को नागरिक के रूप में देखें और मानें तो सारे समाज में परिवर्तन की लहर सीधी दिशा में जाती नजर आएगी। कानूनोंसे औरत की पहचान नहीं बनती।

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प्रियदर्शन (सीनियर न्यूज एडीटर एनडीटीवी) ने एनडीटीवी इंडिया चैनल पर अभी टीवी टॉकशो में कहा कि देश में मर्दों को अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत ,हमें यह समझना होगा कि औरत बदल रही है। हमें स्त्री के बारे में पुरानी धारणा से बाहर निकलना होगा।

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कांग्रेसी सांसद अभिजीत मुखर्जी के स्त्रीविरोधी बयान दिए जाने और बाद में माफी जाने के साथ एक चीज साफ हो गई है कि कांग्रेस के अंदर हरियाणा से लेकर पश्चिम बंगाल तक सांसदों की एक ऐसी लॉबी है जो औरत के प्रति आधुनिक नजरिया नहीं रखती बल्कि यह कहना सही होगा कि कांग्रेस के नेता और नेत्रियां स्त्री को घर की चौखट के बाहर राजनीतिक प्रतिवाद करते हुए देखना नहीं चाहते। उनके लिए सोनिया गांधी राजनीति करे तो जायज मध्यवर्ग की लड़कियां अपने हकों के लिए संघर्ष करें जो ये लोग औरतों की खिल्लियां उडाते हैं।

कायदे से औरतों के खिलाफ जो सांसद -विधायक अपमानजनक बयान दे उसकी संसद या विधानसभा सदस्यता तत्काल प्रभाव से खारिज कर दी जानी चाहिए। सांसदों-विधायकों और नेताओं में जो भी स्त्रीविरोधी बयान दे उसे मतदान करने के अधिकार से वंचित कर दिया जाना चाहिए।

नेताओं-बुद्धिजीवियों और तथाकथित गणमान्य नागरिकों ने स्त्रियों के खिलाफ बोलने-लिखने का फैशन बनाया हुआ है। स्त्री के खिलाफ लिखना और बोलना अपराध घोषित किया जाय और इसके लिए सटीक कानून बनाया जाय।

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भारत की राजनीतिक बिडम्बना है यहां रेप के खिलाफ जितना तेज प्रतिवाद दिख रहा है वैसा तेज प्रतिवाद बैंकिंग बिल के पास होने के खिलाफ नजर नहीं आया। देश के लिए स्त्री के सम्मान और सामाजिक सुरक्षा के सवाल जितने महत्वपूर्ण हैं उतना ही देश की आर्थिक बदहाली और नव्य आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ जंग के सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन त्रासदी है हमारे समाज में अभी तक कानून व्यवस्था के सवालों से आगे जाकर राजनीतिकचेतना विकसित नहीं हो पाई है।

स्त्री के हित हों या बैंकिंग बिल के खिलाफ संघर्ष हो, इसके लिए सटीक राजनीतिकचेतना के लिए नागरिकचेतना का विकास करने की जरूरत है। स्त्री पर हो रहे हमलों के खिलाफ संघर्ष को नागरिकचेतना निर्मित करने के स्तर तक ले जाना जरूरी है।

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एनडीटीवी इंडिया ने सुभाष तोमर की मौत के चश्मदीद गवाह की बातों पर यकीन कर लिया है और वह बार बार इस गवाह को पेश करके साफ कर देने पर आमादा है कि चश्मदीद गवाह का सत्य परमसत्य है।

सोमवार, 19 नवंबर 2012

बाल ठाकरे और फेसबुक पर उठे सवाल

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बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

कैसे फासिस्टी प्रभुओं की --

गला रहा है दाल ठाकरे!

अबे संभल जा, वो आ पहुंचा बाल ठाकरे !

सबने हां की, कौन ना करे !

छिप जान, मत तू उधर ताक रे!

शिव-सेना की वर्दी डाटे जमा रहा लय-ताल ठाकरे!

सभी डर गए, बजा रहा है गाल ठाकरे !

गूंज रही सह्यद्रि घाटियां, मचा रहा भूचाल ठाकरे!

मन ही मन कहते राजा जी; जिये भला सौ साल ठाकरे!

चुप है कवि, डरता है शायद, खींच नहीं ले खाल ठाकरे !

कौन नहीं फंसता है, देखें, बिछा चुका है जाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

बर्बरता की ढाल ठाकरे !

प्रजातंत्र के काल ठाकरे!

धन-पिशाच के इंगित पाकर ऊंचा करता भाल ठाकरे!

चला पूछने मुसोलिनी से अपने दिल का हाल ठाकरे !

बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे! बाल ठाकरे!

-----नागार्जुन (जनयुग, 7 जून 1970)



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उद्धव ठाकरे को टीवी वालों ने जिस तरह हिन्दूरीति से अपने पिता का अंतिम संस्कार करते हुए लाइव प्रसारित किया है उससे टीवी प्रसारण की आचार संहिता के प्रचलित मानकों का सीधे उल्लंघन हुआ है।

उल्लेखनीय है रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी द्वारा हिन्दूरीति से किए गए अंतिम संस्कार के अविकल प्रसारण पर आपत्ति व्यक्त की थी।

उस प्रसारण को दूरदर्शन ने आधा घंटे तक सीधे दिखाया था और उसका सीधा असर सिखों के खिलाफ घृणा के रूप में सामने आया था। इस तथ्य की ओर रंगनाथ मिश्रा कमीशन की अप्रकाशित रिपोर्ट में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।

हम मांग करते हैं कि अंतिम संस्कार के लाइव प्रसारण के खिलाफ निजी चैनल अपनी आत्मालोचना करें और भविष्य में इस तरह के प्रसारण से बचें। सब जानते हैं कि बाल ठाकरे सारी जिंदगी घृणा की राजनीति करते रहे हैं, कभी किसी के खिलाफ कभी किसी के खिलाफ। घृणा के नायक का महिमामंडन बेहद खतरनाक है और यह टीवी चैनलों की स्तरहीनता और नीतिहीनता की अभिव्यक्ति है।

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कल शिवाजी मैदान में जिस तरह बाल ठाकरे का अंतिम संस्कार किया गया उसने कई सवाल खड़े किए हैं। मैं नहीं जानता कि शिवाजी पार्क के अहाते में क्या कोई श्मशान है ? और यदि है तो कोई फेसबुक मित्र बताए,हमें शिवाजी मैदान के भूगोल का कोई ज्ञान नहीं है।

सवाल यह है कि शिवाजी मैदान को अंतिम संस्कार करने के लिए चिता बनाने की अनुमति देना क्या ठीक है ? हमारी सामान्य बुद्धि कहती है कि मैदान का श्मशान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दूसरी बात यह कि बालठाकरे कभी किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे, ऐसी स्थिति में भी क्या राजकीय सम्मान के साथ पुलिस की सलामी दी जा सकती है ?

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जो नेता जिंदगीभर भारतीय राजसत्ता को तरह तरह से कोसते रहते हैं , नए रंग का झंडा फहराते रहते हैं ,वे अंत में राजसत्ता के तिरंगे में ही लिपटकर स्वर्ग जाना चाहते हैं । यह सीधे सत्ता के सामने समर्पण है ।

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बाल ठाकरे ने साठ के दशक में अस्मिता की राजनीति की शुरूआत की और सारी ज़िंदगी उसके लिए लड़ते रहे।
अस्मिता की जंग में उन्होंने मराठी पहचान के सवाल को आक्रामक तेवर के साथ उठाया और इस क्रम में वाम और उदार राजनीति पर हमले किए। उन्होंने मराठी अस्मिता पर पहले काम किया बाद में 1992 में हिन्दू पहचान के सवालों को प्रमुखता के साथ उठाया । 

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उल्लेखनीय है साठ का दशक सारे देश में अस्मिता की राजनीति के उभार का दौर है ।

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नए दौर में फिर से 'हिन्दू हृदय सम्राट 'की खोज आरंभ हो गई है, बाल ठाकरे की मौत से यह जगह खाली हुई है । वैसे भी बाल ठाकरे स्वनियुक्त' हिन्दू हृदय सम्राट 'थे ।

इस काम में कारपोरेट हिन्दू मीडिया अभी से सक्रिय हो गया है। ठाकरे की मौत के बाद का टीवी कवरेज असल में उसी प्रयास का हिस्सा है।

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बालठाकरे की विरासत के वारिस की जंग आरंभ हो गई है ।

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बालठाकरे को महाराष्ट्र के किसानों में वैसी जनप्रियता नहीं मिली जैसी उनको मुंबई में मिली । यह इस बात का संकेत है कि वे मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के जनप्रिय नेता थे ।

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शवयात्रा में शामिल होने का अर्थ संबंधित व्यक्ति के विचारों से सहमत ह़ोना नहीं है।

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बाल ठाकरे ने समानान्तर सत्ताकेन्द्र के रूप में मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में जिस तरह अपने को विकसित किया उसने उनके इर्दगिर्द बड़े पैमाने  पर दादा राजनीति को नई बुलंदी दी।उन्होंने निजी बातचीत में उदार और राजनीति में कट्टरतावादी व्यक्तित्व का प्रदर्शन किया। यह एक तरह से सर्वसत्तावादी भारतीय मन है जिसको श्यामाप्रसाद मुखर्जी-अटलजी आदि से प्रेरणा लेकर गढ़ा गया।

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बालठाकरे का व्यापक टीवी कवरेज कम से कम ठाकरे भक्तजनता के भावों का शमन करने में मदद कर रहा है। इसी अर्थ में टीवी भावों के नियंत्रण और नियमन में मदद करता है । राजकीय सम्मान और नेशनल कवरेज के साथ विदाई अंततः एक संस्कार है ।

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बाल ठाकरे ने लोकल राजनीति के साथ अंधक्षेत्रीयतावाद और भावुकता को जोड़कर मराठी अस्मिता को प्रधान मुद्दा बनाया ।

वे राष्ट्रवाद के नए युग के नायक थे। वे अपने पिता के गुणों से भिन्न गुणों को राजनीति में लेकर आए । महाराष्ट्र में वे निर्विवाद नायक थे।

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बाल ठाकरे ने अंधक्षेत्रीयतावाद का हिन्दू साम्प्रदायिकता में बड़े कौशल के साथ रूपान्तरण किया । बाल ठाकरे ने जो पैराडाइम शिफ्ट किया है उसका भविष्य अब इन दोनों से परे विकास की राजनीति में देख सकेंगे।

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शिवसेना के शेर बाल ठाकरे के निधन के साथ शिवसेना की साम्प्रदायिक राजनीति के प्रथम चरण का अवसान हो गया है। बाल ठाकरे की मौत के साथ आक्रामक राजनीति का मैनस्ट्रीम राजनीति से अंत हो गया ।

रविवार, 16 सितंबर 2012

ऑडीटर,पत्रकार ,स्टैनोग्राफर और कोलगेट मीडिया कवरेज

कोलगेट कांड पर मीडिया लबालब भरा है।कोई भी अखबार उठाओ या चैनल देखो चारों ओर कोलगेट की वर्षा हो रही है।इस तरह की समाचार वर्षा हाल-फिलहाल के दिनों में किसी भी खबर की नहीं देखी गयी। कोलगेट कांड में सच क्या है यह सब लोग जानते हैं। इसमें धांधली हुई है। यह धांधली मुख्यमंत्रियों ने की या केन्द्रीय मंत्री ने की या प्रधानमंत्री ने की ,लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली आवंटन के पहले हुई या बाद में हुई यह सवाल भी बेमानी है।लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि धांधली हुई है। एक कंपनी ने की या चार ने की लेकिन धांधली तो हुई है। धांधली पर कोई विवाद नहीं है। सभी दल मानते हैं कि कोलगेट में कुछ न कुछ गड़बड़ है।पहले कांग्रेस मानने को तैयार नहीं थी लेकिन अब वह भी मान रही है कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। दो सांसदों की शिकायत पर सीबीआई जांच कर रही है,कई कंपनियों के खिलाफ नियमों के उल्लंघन को लेकर एफआईआर दायर की गयी हैं।विपक्ष का कोलगेट कांड पर गुस्सा और प्रतिवाद जायज है।

इस सबसे अलग हटकर हमें यहां पर इस विषय पर विचार करना है कि आखिरकार मीडिया में कोलगेट रिपोर्टिंग का स्रोत क्या है ?क्या यह पत्रकारों के परिश्रम का खेल है ? क्या यह खोजी पत्रकारिता की देन है ? या फिर यह सरकारी स्रोत की लीक रिपोर्ट पर आधारित है ? कोलगेट कांड को किसी पत्रकार ने उजागर नहीं किया । यह सीएजी ( कंट्रोलर ऑफ ऑडीटर जनरल) रिपोर्ट पर आधारित है। सीएजी रिपोर्ट कैसे बाहर आय़ी,संसद में बहस किए जाने के पहले ही कैसे लीक हुई,बिना संसद में पास हुए और पीएसी के बिना तहकीकात किए किस तरह इसे वैध माना जाय,ये सारे सवाल अभी अनुत्तरित हैं।

लेकिन कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं जिनका इस प्रसंग में जिक्र करना समीचीन होगा। मसलन् सीएजी की रिपोर्ट गोपनीय होती है।वह पहले संसद में पेश की जाती है उसके बाद संसद की मुहर लगने के बाद पब्लिक एकाउंट कमेटी के पास जाती है और फिर वहां से जांच पूरी होने के बाद सरकार को एक्शन के लिए भेजी जाती है। कोई भी सीएजी रिपोर्ट स्वयं में तब तक मान्य नहीं है जब तक उसके तथ्यों और सूचनाओं की पीएसी जांच न कर ले। सीएजी की रिपोर्ट का पीएसी (पब्लिक एकाउंट कमेटी) द्वारा जांच किया जाना अनिवार्य है और उसके बाद ही सरकार उस पर कार्रवाई करने को बाध्य है। कोलगेट कांड सीएजी रिपोर्ट के संदर्भ में अभी तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। यह रिपोर्ट संसद में पेश किए जाने के पहले ही लीक कर दी गयी। किसने लीक की,क्यों लीक की और सीएजी ने इस रिपोर्ट के लीक किए जाने की अभी तक जांच क्यों नहीं करायी,यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है। विपक्ष भी सीएजी रिपोर्ट पर संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही एक्शन चाहता है। प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा गया है।

इसी प्रसंग में कांग्रेसनेता दिग्विजय सिंह ने हैडलाइन टुडे टीवी चैनल में एक साक्षात्कार में सवाल किया है कि सीएजी की रिपोर्ट जब तक संसद में पेश नहीं हो जाती तब तक सीएजी के महानिदेशक की यह जिम्मेदारी है कि वह उस रिपोर्ट की गोपनीयता बनाए रखें,लेकिन महानिदेशक विनोद राय ने सचेत तरीके से सीएजी रिपोर्ट को मीडिया में लीक किया और बाद में वह रिपोर्ट संसद में पेश की गयी। आश्चर्य की बात है विनोद राय ने रिपोर्ट लीक किए जाने की अभी तक जांच कराए जाने की मांग नहीं की है। संसद में रिपोर्ट पेश करने के पहले मीडिया को रिपोर्ट लीक हो जाने के लिए विनोद राय को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। सवाल यह है कि केन्द्र सरकार ने या पीएमओ ने अपनी पहल पर इस पहलू की जांच क्यों नहीं करायी ?कांग्रेस को जांच कराने से किसने रोका था ?

एक अन्य पहलू है जिस पर गौर करें और यह कवरेज से संबंधित है। कोलगेट कांड का कवरेज किसी संवाददाता की देन नहीं है।यह तो सीएजी रिपोर्ट की देन है और बिना छानबीन के सीएजी के बताए तथ्यों या सूचनाओं का प्रचार है। यह मूलतःनिष्पन्न खबर की कटपेस्ट कला है।इसमें सत्य कितना है और असत्य कितना यह कोई नहीं जानता। लेकिन कांग्रेस के आरोप में दम है कि सीएजी ने अपनी जांच के संवैधानिक दायरे का अतिक्रमण किया है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कोयला खानों के उपयोग की कानूनी समूची और वैज्ञानिक प्रक्रिया की रिपोर्टिंग में एकसिरे से अनदेखी हुई है।इस प्रसंग में सरकार के मंत्रियों को ही बीच बीच में बोलना पड़ा है।लेकिन मीडिया की इस प्रक्रिया को जानने और बताने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मीडिया यह भी देखना नहीं चाहता कि जिनलोगों को आवंटन हुआ है वे किस दशा और दिशा में काम कर रहे हैं।

विवादास्पद कोयलाखानों की जमीनी सच्चाई को किसी भी पत्रकार ने उदघाटित करने की कोशिश नहीं की । मीडिया तो सीधे सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है उसे ब्रह्म वाक्य मानकर चल रहा है अथवा नेताओं के बाइटस को प्रमाण मान रहा है।नेताओं के बाइटस प्रमाण नहीं प्रचार हैं। असल में मीडिया ने इस घोटाले को सनसनीखेज बनाकर रख दिया है। घोटाले को सनसनीखेज बनाने से अंततःलुटेरों को फायदा होता है। सनसनीखेज प्रस्तुति सत्य को आंखों से ओझल कर देती है।बोफोर्स इस तरह की प्रस्तुतियों का आदर्श उदाहरण है।मूल अभियुक्त देश से सकुशल चले गए और राजीव गांधी और अमिताभ-अजिताभ बच्चन पर मीडिया निशाने लगाता रहा और 25साल बाद पता चला कि ये तीनों लोग निर्दोष हैं।बोफोर्स मामले में इन तीनों का अंततः निर्दोष साबित होना मीडिया कवरेज की सनसनीखेज प्रस्तुतियों की पराजय थी। सनसनीखेज प्रस्तुति देखने में अच्छी लगती है पढ़ने में अपील करती है। लेकिन असल में फेक होती है।

उल्लेखनीय है फेक स्टोरियों से एक जमाने में राममंदिर का उन्माद पैदा किया गया,तथ्यों को गढ़ा गया,जनता को गुमराह किया गया। प्रेस कौंसिल ने भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हिन्दी के चार बड़े अखबारों की इस आंदोलन के संदर्भ में जो भूमिका रही थी उसकी तीखी आलोचना की ।

कोलगेट के दस्तावेज या उससे जुड़ी खबरों का सीएजी की रिपोर्ट लीक होने के पहले क्षेत्रीय मीडिया से लेकर नेशनल मीडिया में अनुपस्थित रहना,इस बात का संकेत है कि पत्रकार अब खबरें खोजने नहीं जाते बल्कि बनी-बनायी खबरें उनके पास चली आती हैं।सीएजी रिपोर्ट पर सिलेसिलेबार आया कवरेज इस बात को पुष्ट करता है।

यही हाल कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा के मामले में आए कवरेज के समय भी देखा गया ,उस समय लोकपाल की रिपोर्ट के आधार पर दनादन खबरें आईं। कायदे से जहां घटना घट रही है वहां पत्रकार को होना चाहिए और इसके बाद तथ्य संकलन करके लिखना चाहिए। इनदिनों मीडियावाले सीधे किसी सरकारी स्रोत की तलाश में रहते हैं।सरकारी स्रोत जब पत्रकारिता के प्रमाण बन जाते हैं तो मीडिया अपनी स्वतंत्र भूमिका,भाषा और विवेक खो देता है।

कोलगेट से जुड़ी सभी स्टोरियां इसलिए फेक हैं,निष्पन्न हैं, रेडीमेड हैं,वर्चुअल हैं, क्योंकि वे सीएजी की रिपोर्ट से हैं या सीबीआई की एफआईआर से ली गयी हैं। ये रिपोर्ट किसी पत्रकार के खोजी परिश्रम का कमाल नहीं हैं ।यह तो हमारे ऑडीटरों की देन है।ऑडीटर को पत्रकार नहीं कहते।ऑडीटर की रिपोर्ट के आधार पर निर्मित कवरेज में पत्रकार कम ऑडीटर ज्यादा बोलता रहा है।

सवाल यह है कि क्या पत्रकार को ऑडीटर के जरिए अपदस्थ कर सकते हैं ? क्या पत्रकार और ऑडीटर के काम करने का तरीका एक है ? यदि सीएजी रिपोर्ट ही कवरेज के केन्द्र में है तो मीडिया में किसी भी चैनल ने या प्रिंट मीडिया ने देश के ख्यातिलब्ध ऑडीटरों की राय क्यों नहीं ली ? ऑडिट का क्या नियम है और कहां मेनीपुलेशन है इसे ऑडीटर ही बता सकता है कोई पत्रकार नहीं। इस अर्थ में कोलगेट कवरेज एकदम फेक है। इस तरह का कवरेज देकर मीडिया ने फेक को महान बनाया है।

सवाल यह भी है कि कोलगेट जब घट रहा था तब मीडिया कहां सोया था ? सीएजी रिपोर्ट लीक होने के पहले किसी भी पत्रकार को या टीवी समाचार संपादक को इस घोटाले के दर्शन क्यों नहीं हुए ? जबकि लूट तो पहले से चल रही थी,किसी भी भाजपा या विपक्ष के सांसद ने यह मसला सीएजी रिपोर्ट के पहले मीडिया के सामने पेश क्यों नहीं किया और जब सीएजी रिपोर्ट आ गयी तो संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने तक इंतजार क्यों नहीं किया ?

भारत के मीडिया की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह किसी भी घोटाले की तह तक जाने में असमर्थ रहा है और उसने सत्य को सामने रखने का साहस नहीं दिखाया है। इसके विपरीत मीडिया ने लगातार राजनीतिक प्रौपेगैंडा के अस्त्र का काम किया है। बोफोर्स कांड से लेकर राममंदिर आंदोलन तक के अब तक के कवरेज की त्रासदी यह है कि रिपोर्टर अपनी स्वतंत्र सत्ता-महत्ता को त्यागकर प्रौपेगैंडा करने लगता है या फिर रिपोर्टर न होकर स्टैनोग्राफर हो जाता है। कोलगेट कांड पर पत्रकार अभी तक सीएजी के स्टैनोग्राफर का ही काम करते रहे हैं । कायदे से पत्रकार को स्टैनोग्राफर नहीं होना चाहिए। उसे घटना की अपने नजरिए से जांच करनी चाहिए और घटना जब घट रही हो या घटने के बाद घटनास्थल पर जाकर जांच करनी चाहिए और संबंधित सभी पक्षों को यथोचित कवरेज भी देना चाहिए।

शुक्रवार, 17 जून 2011

The discreet charm of civil societyP. SAINATH


The discreet charm of civil societyP. SAINATH
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The HinduSocial Activist and Member of Lokpal Bill Committee, Anna Hazare, addresses a press conference in New Delhi. Photo: Shanker Chakravarty



There is nothing wrong in having advisory groups. But there is a problem when groups not constituted legally cross the line of demands, advice and rights-based, democratic agitation.

The 1990s saw marketing whiz kids at the largest English daily in the world steal a term then in vogue among sexually discriminated minorities: PLUs — or People Like Us. Media content would henceforth be for People Like Us. This served advertisers' needs and also helped shut out unwanted content. As the daily advised its reporters: dying farmers don't buy newspapers. South Mumbaikars do. So the suicide deaths of a couple of fashion models in that city grabbed more space in days than those of over 40,000 farmers in Maharashtra did in a decade.

February 2011 saw one of the largest rallies staged in Delhi in years. Lakhs of workers from nine central trade unions — including the Congress party's INTUC — hit the streets to protest against rising food prices and unemployment. This was many times bigger than the very modest numbers at Anna Hazare's fast and larger than Ramdev's rollicking ‘yoga camp.' These were workers and unions not linked to the state. Not market-driven. Not corporate-funded. And expressing clearly the interests and values of their members. In fact, fitting some classic definitions of ‘civil society.' The rally was covered by the BBC, Reuters and AFP but was mostly invisible in mainstream Indian media except when attacked for creating traffic jams.

Perhaps the whizz kids were on to something larger than even they knew. At least one dictionary has since added this entry under People Like Us: “A subtle reference to people of the same socio-economic class.” Only, there was nothing subtle here. The Indian elite play the PLU game like few others do. Entry into the club is by birth or invitation only. And getting certification from the classes that matter takes some work. Your own background can be surmounted however, even turned to advantage, if there are enough strong PLUs around you. Anna Hazare had this. Baba Ramdev did not have it. Both claimed to speak for ‘civil society.' A media applying that word with reverence to those around Anna Hazare, denied it with scorn to those they saw as Ramdev's rabble.

Sections of the media embarrassed by Ramdev point, in contrast, to the ‘many fine people' around Hazare. Most of them part of the Delhi elite with indeed impeccable records of service. Yet, how did their approach differ in principle from Ramdev's?

Both were self-selected groups claiming primacy over the elected government. Both asserted they knew what was best for the nation. (Rather than an electorate they scorned as sold on a bottle of liquor or a hundred-rupee note). Both had no qualms about breaking down the walls between the institutions of state. Never mind the Constitution, they sought a body whose members they would largely appoint. A super organ above the legislature, the executive and the judiciary. Take the government notification on the drafting body for the Lokpal bill. It uses the words: “The five nominees of Anna Hazare [including himself] are as under…” When have such vital national appointments been made by and in the name of one individual, however noble?

Both felt they had the best solutions for fighting corruption, which is fair enough. Both, however, demanded that their fatwas be written into law. That their will prevail in the writing of the bill. That the Constitution assigns this right to the legislature mattered little. Both saw themselves as more representative of the nation than its people. In months, they would succeed where “in 62 years” the nation had failed.

Electoral democracy drew special contempt. In this, they were at one with the top tier of PLUs. “Who takes all that stuff seriously?” asked one celeb on a television panel discussion. Well, it seems people do. Voting in Assam, Kerala and Tamil Nadu crossed 75 per cent in May 2011. In West Bengal and Puducherry, it edged towards 85 per cent. Tamil Nadu in May 2011 saw its highest turnout in 44 years. And voters there showed how vital the issue of corruption was to them. Money power has surely corrupted the electoral process severely. But does the electorate deserve the scorn poured on it by ‘civil society?' If the latter has struck a chord at all, it is because of the deep concerns of the former.

So who do these versions of Indian ‘civil society' represent? Do we take the World Bank's definition? Civil society would then be: “a wide array of non-governmental and not-for-profit organisations that have a presence in public life.” And which express “the interests and values of their members or others, based on ethical, cultural, political, scientific, religious or philanthropic considerations.” The European Commission states flatly that there is “no commonly accepted or legal definition” of the term. It also “does not make a distinction between civil society organisations or other forms of interest groups.”

The U.S.-based Civil Society International raises the question of whether the media should be included in ‘civil society.' More so when they are privately-owned and hyper-commercial in character. It points out that some notions could render both the League of Women Voters and the Ku Klux Klan part of civil society. In India, the RSS is a large voluntary organisation claiming to be cultural and non-political in character. Ergo, civil society?

Theory aside, civil society in India seems defined by exclusion. It is crowded with human rights lawyers and activists, NGO leaders, academics and intellectuals, high-profile journalists, celebrities and think tank-hirelings. Mass media debates never see landless labourers, displaced people, nurses, trade union workers, bus conductors being asked to speak for ‘civil society.' Though, indeed they should.

Marketing minds would define civil society more clearly as a prime PLU platform. They'd be right, too. Who else do we see out there? The PLU syndrome goes way beyond the Lokpal bill. When Kaushik Basu, chief economic adviser to the Finance Ministry, called for a certain class of bribes to be legalised, ‘civil society' simply shut its eyes and brain. The National Campaign for Peoples' Right to Information — a flag bearer of civil society — maintained a studied, shameful silence. Professor Basu was not pushing this idea in his private blog. He put it up on a Government of India website. Yet, thundering anchors who ‘skewer' politicians in television interviews uttered not a squeak. Had this insane idea come from a Ramdev, or even a Lalu Prasad, and not from a certified PLU member, imagine the fun the media would have had trashing it. As for the NCPRI, it might have begun a special desk to campaign on the issue. True, an individual associated with it did write a mild critique of the economicsof Prof. Basu's folly — evading its moral degeneracy. But the NCPRI let itself down (and all those who support the RTI movement) with its craven silence.

The same media now trashing Ramdev came out snarling in his defence when he clashed with Brinda Karat in 2006. That was over the exploitation of 113 workers thrown out of the pharmacy controlled by Ramdev's Trust and facing false cases. The media brushed that aside and slammed Ms Karat. In the PLU food chain, workers are a low form of pond life. (Oh yes, the PLU syndrome has a strong caste component, too. But that's another story.)

Ramdev had carved out a base in sections of the elite. He also counts some media owners amongst his followers. Though not, perhaps the more anglicised anchors of television. He even has a following in Bollywood. He had attained the celebrity status so vital to gain any media attention at all. And had done so by using television itself for his ‘brand' of yoga. But he overplayed his hand when the desired ‘A-level' certification from the south Delhi elite was still pending. Otherwise, his claim to represent ‘civil society' is no weaker than that of the group around Mr. Hazare. The ‘my-civil-society-is-more-civil-than-yours' squabble has begun. And both groups have failed to pin down a corrupt, bungling government that made such a pig's breakfast of the Ramlila event.

There is nothing wrong in having advisory groups. Not a thing wrong in governments consulting them and also listening to people, particularly those affected by its decisions. There is a problem when groups not constituted legally cross the line of demands, advice and rights-based, democratic agitation. When they seek to run the government and legislation — no matter how well-intentioned they are. Pushing a coherent vision is a good thing to do. So is demanding that the government do its job. Beyond that lies trouble.

Meanwhile, a section of Platinum tier PLUs have become champions of the parliamentary democracy they actively helped undermine during the past two decades. They cheered loudly for giant economic and financial decisions taken outside the budget, bypassing Parliament. So long as the destruction of institutions favoured corporate power, they welcomed it, collaborating with corrupt governments such as this one wholeheartedly. The Ramdev route would have done much the same in time — the Baba himself is a spiritual corporation. But he just wasn't one of us. These new champions of parliamentary democracy have no qualms when the groups dictating terms to the government are CII, FICCI, ASSOCHAM or their ilk. They didn't like it when the bypassing of institutions came from Mr. Hazare. They hated it when it came from Ramdev. Dumping democracy is, after all, the privilege of the Platinum PLUs.

(दैनिक हिन्दू से साभार,17जून2011 को प्रकाशित)

बुधवार, 8 जून 2011

बाबा रामदेव, कांग्रेस और मीडिया

बाबा रामदेव के अनशन पर 4 जून की रात को अचानक 12.30 बजे पुलिस के हजारों सिपाहियों ने घेरा डाल दिया। सोते हुए नागरिकों पर लाठीचार्ज,जबर्दस्ती खदेड़ने ,मारने,आंसू गैस के गोले छोड़ने आदि के कारण अनेक लोग घायल हुए हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मानना है  उनकी सरकार के पास इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं था । असल में कांग्रेस को बाबा पर अपनी रणनीति तय करने में वक्त लगा और जब बाबा से मुठभेड़ का फैसला किया तब तक 1 लाख लोग अनशन स्थल के आसपास पहुँच गए थे। इससे यही पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक तौर पर फैसले लेने में किस कठिनाई से गुजरना पड़ा होगा। पहले कांग्रेस ने तदर्थभाव से बाबा के अनशन को लिया और टुकड़ो में उसे सिलटाने की सोची थी ,लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां तदर्थ में सोचने की कांग्रेस की आदत के अनुकूल नहीं थीं ,अतः कांग्रेस ने बाबा का राजनीतिक मुकाबला करने का फैसला किया और उसी फैसले के तहत अनशन स्थल पर पुलिस एक्शन हुआ। आज 8 जून 2011को अन्ना हजारे इसके प्रतिवाद में अनशन कर रहे हैं, अपनी तदर्थ राजनीतिक समझ के कारण अन्ना हजारे के पहले वाले अनशन को कांग्रेस ठीक से देख ही नहीं पायी लेकिन अब इन दोनों से ही उसने टकराव का रास्ता अपना लिया है।
    बाबा के अनशन का अहर्निश लाइव कवरेज करने वाले चैनलों की पुलिस एक्शन के समय की छवियों के प्रसारण को लेकर जो भूमिका रही है वह चिंता की बात है और उसने कई नए सवालों को जन्म दिया है।
मसलन्, कारपोरेट मीडिया पर मनमोहन सरकार की अघोषित सेंसरशिप है या सेल्फ सेंसरशिप है ?बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर टीवी चैनलों ने ढाई घंटे की पुलिस कार्रवाई के बर्बर दृश्यों को सेंसर कर दिया है। कारपोरेट मीडिया की इस तरह सत्य को छिपाने की कोशिश की तीखी आलोचना की जानी चाहिए।इससे कारपोरेट मीडिया की पोल खुलती है ।कि वो किससे के साथ है ? आजतक ने किस दबाब में पुलिस बर्बरता को छिपाया है ? अपने वेब पेज पर पीटीआई की मासूम तस्वीरें दी हैं इनको देखकर नहीं लगता कि बाबा के अनशन स्थल पर कोई पुलिस वाला मार रहा था ? टीवी चैनलों का पूरी नंगई के साथ अनशन पर पुलिस की बर्बरता को छिपाना अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या है ?जिस समय बाबा रामदेव के अनशन स्थल पर पुलिस ने घेरा डाला,लाठीचार्ज किया उस समय एकमात्र स्टार न्यूज के संवाददाता दीपक चौरसिया कमेन्ट्री कर रहे थे। बाकी चैनल वाले सोए हुए थे।वे सब बाद में धीरे धीरे पहुँचे।पीटीआई संवाद एजेंसी किस तरह सरकारी एजेंसी की तरह काम करती है और सेंसरशिप का प्रयोग करते हैं,आजतक चैनल की वेबसाइट पर दी तस्वीरें इसका आदर्श प्रमाण हैं। ऐसी अवस्था में लोग किस पर विश्वास करें ? स्टार न्यूज पर दीपक चौरसिया बता रहे थे कि कैसे पुलिस लाठियां बरसा रही है,औरतों को पीट रही है,नृशंसतापूर्ण व्यवहार कर रही है लेकिन तस्वीरों में यह सब गायब था। स्टूडियो में फोटो सेंसर करके सीधे कमेंट्री सुनाई जा रही थी।
एनडीटीवी पर विष्णुसोम आते हैं और वे उन्हीं तस्वीरों को दिखाते हैं जो स्टार न्यूज की थीं लेकिन कमेंट्री अपनी बनाते हैं। बाद में उनकी संवाददाता पहुँचती है लेकिव तस्वीरें नहीं आतीं। आखिर बर्बर लाठीचार्ज की तस्वीरें किसके कहने से सेंसर की गईं ?
टाइम्स नाउ के अर्णव गोस्वामी हरकत में आते हैं। संवाददाताओं को भेजते - खोजते हैं। स्टार न्यूज की इमेजों का प्रक्षेपण जारी रखते हैं। उनके 2 संवाददाता पहलीबार यह बताते हैं कि पुलिस ने दोपहर ही बाबा को नोटिस दिया था कि आपको दी गई परमीशन क्यों न कैंसिल कर दी जाए।बाबा जबाब नहीं देते। मीडिया ने उस समय यह खबर क्यों नहीं दी ?टाइम्सनाउ ने भी नहीं दी।क्यों ?
टीवी चैनलों ने बाबा रामदेव के अनशन पर बर्बर लाठीचार्ज की जो तस्वीरें दी हैं उनमें यह सामान्य पुलिस कार्रवाई लगती है। जबकि उनके बयानों में यह असामान्य कार्रवाई थी। क्या यह रूटिन पुलिस एक्शन था ?बाबा रामदेव से लेकर भारतीय जनता पार्टी के आडवाणी जी तक कह रहे हैं यह जलियांवालाबाग जैसी घटना है। यह तुलना सरासर गलत है।जलियाँबाग की नृशंस घटना के बाद सारे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गयी थी। बाबा रामदेव के अनशन पर लाठीजार्ज को जनता ने सामान्य भाव से लिया है। भाजपाके बड़े नेता अपने धरने पर 5हजार की भीड़ भी नहीं जुटा पाए।

बाबा रामदेव ने उस समय दिल्ली की जनता का आह्वान किया था कि वो घरों से आकर प्रतिवाद करें।संभवतः ज्यादातर लोगों ने उसे देखा ही नहीं था। बाबा रामदेव बताएंगे कि कितने लोग घायल हुए ?टीवी चैनल वाले अभी तक संख्या क्यों बता रहे ? उस रात विभिन्न अस्पतालों में कितने अनशनकारी लोगों का इलाज हुआ।किस तरह की चोटें आईं उन्हें ?बाबा रामदेव के कहा है कि उनके पास सभी अनशनकारियों के मोबाइल नम्बर हैं। फिर उन्होंने अभी तक घायल अनशनकारियों के नाम-पते जारी क्यों नहीं किए ? फिर उन लोगों की मीडिया जांच करे ?आस्था चैनल बाबा रामदेव चलाते हैं और उस चैनल के लोग भी कैमरा लेकर 4जून को अनशन स्थल पर थे पुलिस एक्शन के समय के उनके कैमरे में बंद फुटेज आज तक क्यों नहीं दिखाए गए ? बाबा किसका इंतजार कर रहे हैं ? किस मंशा से नहीं दिखाए अभी तक फुटेज ?         
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले पर संज्ञान लिया है और संबंधित संस्थानों से जबाव मांगे हैं।मानवाधिकार आयोग ने भी नोटिस जारी किए हैं। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को सभी प्रमुख चैनलों कवरेज से असंपादित फुटेज जमा करने के लिए कहना चाहिए ।अनशन स्थल पर सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे , अदालत को दिल्ली पुलिस को आदेश देना चाहिए कि वह सीसीटीवी कैमरों के जरिए लिए गए सभी चित्रों को अदालत में पेश करे ,इससे पुलिस बर्बरता को समझने में मदद मिलेगी।  




गुरुवार, 26 मई 2011

मनमोहिनी ममता और मीडिया


     मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य की कमान संभाल ली है। वह कोशिश में है कि सभी वर्गों और समूहों की इच्छाओं का ख्याल रखा जाए और इसी दबाब में मंत्रीमंडल की पहली बैठक में 30 मिनट में 18 फैसले कर डाले। यह मनमोहिनी प्रशासनिक कार्यप्रणाली का नमूना है। इसी क्रम में वे अपनी गतिविधियों को खबरों के प्रवाह के रूप में  बनाए रखना चाहती हैं। फलतःप्रशासन और मीडिया के बीच में एक नया संबंध जन्म ले रहा है। अब तक पश्चिम बंगाल में राज्य प्रशासन और मीडिया आमने-सामने थे। पहलीबार मीडिया और राज्य सरकार एक ही धुन में बज रहे हैं। यह मीडिया के लिए खतरे की घंटी है। मीडिया को सरकार और जनता के बीच क्रिटिकल सेतु होना चाहिए। उल्लेखनीय है ममता बनर्जी की जीत के कवरेज में मीडिया ने आम जनता के आनंद को ज्यादा उभारा है। ममता बनर्जी की जीत के राजनीतिक पक्ष पर कम जोर दिया है । जबकि ममता बनर्जी की विजय में राजनीति की बड़ी भूमिका है,इच्छाओं की कम। लेकिन बाजार में मीडिया की प्रतिस्पर्धा राजनीति के साथ कम और इच्छाओं के साथ ज्यादा खेल रही है। भारत में उदार लोकतंत्र है और इसकी विशेषता है सहमति। यहां कहने को सहमति के आधार फैसले होते हैं लेकिन लोकतंत्र में सहमति से भी बड़ी चीज है असहमति। मीडिया पिछले 35 सालों से वाम मोर्चे के शासन के साथ असहमति बनाकर अपने स्पेस का विस्तार करता रहा है। असहमति के कारण ही उसकी एक साख  है। लेकिन ममता बनर्जी की जीत ने सारी स्थितियां उलट दी हैं। कल तक मीडिया और ममता विपक्ष में थे,लेकिन आज ममता सत्ता में है। क्या मीडिया भी सत्ता के साथ रहना पसंद करेगा ? ममता के प्रशासन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए उदार लोकतंत्र का व्यापक विकास किया जाए। वाम मोर्चा के शासन में राज्य में उदार लोकतंत्र का दायरा सिकुड़ा है। लोकतांत्रिकीकरण के नाम पर सामाजिक नियंत्रण और पार्टी नियंत्रण बढ़ा था। ममता प्रशासन को इसे तोड़ना होगा। इसके जेनुइन विकल्प के रूप में 'तथ्य' और 'ज्ञान' को आम जनता का अस्त्र बनाना होगा। उदार लोकतंत्र के विकास के लिए ये दोनों बेहद जरूरी तत्व हैं। ये दोनों तत्व वामशासन में सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त हुए हैं। शिक्षा से लेकर राजनीति तक इन दोनों तत्वों का क्षय हुआ है। 'तथ्य' और 'ज्ञान' को सामाजिक-राजनीतिक जीवन में बड़े औजार के रूप में विकसित करने का काम किया जाना चाहिए। इस काम में राज्य और मीडिया बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। आम जनता की ममता बनर्जी के प्रशासन से बड़ी आकांक्षाएं हैं इन आकांक्षाओं में किस तरह और किस हद राज्य प्रशासन भूमिका अदा कर सकता है उस पर आलोचनात्मक ढ़ंग से निरंतर चौकसी की जरूरत है। वाम शासन में राज्य में 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' का मॉडल लागू किया गया। इसके कारण आधुनिकीकरण के मामले में राज्य सरकार का डिफेंसिव रवैय्या था। राज्य को 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' के पैराडाइम से बाहर लाने की जरूरत है। इस मॉडल के कारण राज्य आर्थिक रूप से कमजोर हुआ है आम जीवन में मुद्रा की कमी आई। जीवनशैली में ठहराव आया । सुरक्षा के नाम पर क्लब-पार्टी आदि पर निर्भरता बढ़ी। 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' के कारण ही सड़क-परिवहन आदि का सटीक आधुनिकीकरण नहीं हो पाया। 'डिफेंसिव आधुनिकीकरण' के दायरे के बाहर जाकर संचार और सड़कों का गांवों तक विस्तार करने की जरूरत है। विमानपत्तन और शिपयार्ड के इलाकों की सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए। गांवों में कृषि का जबर्दस्त उत्पादन है लेकिन उसके वितरण का देशव्यापी नेटवर्क गायब है। ग्रामीणों को उपज के सही दाम मिलें, ठंडे गोदामघर बनाए जाएं,वितरण की आधुनिक प्रणाली बनायी जाए। मजदूरों-कारीगरों को आधुनिक सामाजिक संबंधों में बांधा जाए और पार्टी-यूनियन के बंधनों से मुक्ति दिलायी जाए। इससे नए किस्म के पेशेवर संबंध जन्म लेंगे। आर्थिक-श्रम-सामाजिक इन तीनों ही स्तरों पर रेशनलाइजेशन किया जाना चाहिए। ममता बनर्जी के प्रौपेगैण्डा ने आम लोगों में यह बात बिठादी कि वाम सरकार झूठ बोलती रही है साथ ही उसने लोगों की वामदलों के द्वारा दी गई व्यक्तिगत यातनाओं की यादों को जगा दिया। इससे वाम के खिलाफ व्यापक जनता ने वोट दिया। वाम मोर्चा लोकतंत्र में वोट से जीतता रहा है लेकिन इस प्रक्रिया में सामाजिक और वैचारिक नियंत्रण की भूमिका की अमूमन अनदेखी होती रही है। ममता बनर्जी के प्रचार अभियान का लक्ष्य यही दो चीजें थीं और इस काम में उनकी चुनाव आयोग ने प्रभावशाली ढ़ंग से मदद की।  वाम मोर्चा ने भूमि वितरण में सफलता पाने के बाद सामाजिक नियंत्रण को गांवों तक फैला दिया । पंचायती व्यवस्था और पार्टीतंत्र का जमकर दुरूपयोग किया गया। कालांतर में इसी के गर्भ से माफियातंत्र के साथ साझा संबंध बने और राज्यभर में विभिन्न रूपों में उगाही तंत्र ने जन्म लिया। नागरिक सुविधाओं और अधिकारों को गौण बना दिया गया। "जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत" के आधार पर समूचे राज्य को एक सूत्र में बांधे रखने की कोशिश की गई। मानवाधिकारों का हनन हुआ। याद रहे वाम मोर्चा हारा है लेकिन वामदल अभी मौजूद हैं।उनके पास 41 फीसदी जनता का समर्थन है,ममता प्रशासन को वाम के पीछे गोलबंद जनता का दिल जीतना होगा। यह काम लोकतांत्रिक माहौल और मानवाधिकारों का विकास करते हुए किया जाना चाहिए। ममता प्रशासन को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शिक्षा व्यवस्था को शामिल करना चाहिए। शिक्षा के समूचे तंत्र को पार्टीतंत्र से मुक्त करके पेशेवर बनाने की जरूरत है। यह काम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों  के आधार पर करना चाहिए। साथ ही कलकत्ता विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने का काम करना चाहिए। इससे राज्य के अकादमिक वातावरण में व्याप्त पिछड़ेपन को दूर करने में मदद मिलेगी। साथ ही संसाधनों और सुविधाओं के अभाव के कारण पैदा हुई परेशानियों से मुक्ति मिलेगी। पश्चिम बंगाल में एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय नहीं है। जबकि यहां संस्कृत में बहुत महत्वपूर्ण काम हुआ है । अतः राज्य में एक संस्कृत विश्वविद्यालय खोला जाना चाहिए,इस काम में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की मदद ली जानी चाहिए।  
                      













शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

अन्ना हजारे की मीडिया रणनीतियां

            अन्ना हजारे -अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के बयानों में एक खास किस्म का भ्रष्टाचार निरंतर चल रहा है। इन लोगों की बातों और समझ में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। यह एनजीओ राजनीति विमर्श की पुरानी बीमारी है। जन लोकपाल बिल का लक्ष्य है आर्थिक भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सक्रिय कानूनी तंत्र का गठन। यह बहुत ही सीमित उद्देश्य है। निश्चित रूप से इतने सीमित लक्ष्य की जंग को आप धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता, संघ परिवार आदि के पचड़ों नहीं फंसा सकते।
       अरविंद केजरीवाल ने 14 अप्रैल 2011 को टाइम्स आफ इण्डिया में लिखे अपने स्पष्टीकरण में साफ कहा है कि "हमारा आंदोलन धर्मनिरपेक्ष और गैरदलीय है।" सतह पर इस बयान से किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। समस्या है अन्ना हजारे के कर्म की। वे क्या बयान देते हैं उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है उनका कर्म। पर्यावरण के नाम पर उन्होंने जो आंदोलन चलाया हुआ है और अपने हरित गांवों में जो सांस्कृतिक वातावरण पैदा किया है वो उनके विचारधारात्मक चरित्र को समझने के लिए काफी है। कायदे से अरविंद केजरीवाल को मुकुल शर्मा के द्वारा काफिला डॉट कॉम पर लिखे लेख का जबाब देना चाहिए। बेहतर तो यही होता कि अन्ना हजारे स्वयं जबाव दें।
     अरविंद केजरीवाल का टाइम्स ऑफ इण्डिया में जो जबाव छपा है वह अन्ना हजारे को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना सकता। अन्ना ने पर्यावरण को धर्म से जोड़ा है। पर्यावरण संरक्षण का धर्म से कोई संबंध नहीं है। अन्ना ने पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू संस्कारों और रीति-रिवाजों से जोड़ा है। अन्ना का सार्वजनिक आंदोलन को धर्म से जोड़ना अपने आप में साम्प्रदायिक कदम है।
     अन्ना के तथाकथित एनजीओ आंदोलन की धुरी है संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारधारा। जिसकी किसी भी समझ से हिमायत नहीं की जा सकती। अन्ना हजारे को लेकर चूंकि मीडिया में महिमामंडन चल रहा है और अन्ना इस महिमामंडन को भुना रहे हैं, इसलिए उनके इस वर्गीय चरित्र की मीमांसा करने की भी जरूरत महसूस नहीं की गई ।
     अन्ना ने अपने एक बयान में कहा है कि "  मेरा अनशन किसी सरकार या व्यक्ति के खिलाफ पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं था बल्कि वह तो भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्योंकि इसका आम आदमी पर सीधे बोझा पड़ रहा है।" अन्ना का यह बयान एकसिरे से गलत है अन्ना ने अनशन के साथ ही अपना स्टैंण्ड बदला है। अन्ना का आरंभ में कहना था केन्द्र सरकार संयुक्त मसौदा समिति की घोषणा कर दे मैं अपना अनशन खत्म कर दूँगा। बाद में अन्ना को लगा कि केन्द्र सरकार उनके संयुक्त मसौदा समिति के प्रस्ताव को तुरंत मान लेगी और ऐसे में अन्ना ने तुरंत एक नयी मांग जोड़ी कि मसौदा समिति का अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनाया जाए जिसका नाम अन्ना दें। केन्द्र ने जब इसे मानने से इंकार किया तो अन्ना ने तुरंत मिजाज बदला और संयुक्त अध्यक्ष का सुझाव दिया लेकिन सरकार ने यह भी नहीं माना और अंत में अध्यक्ष सरकारी मंत्री बना और सह-अध्यक्ष गैर सरकारी शांतिभूषण जी बने। लेकिन दिलचस्प बात यह हुई कि अन्ना इस समिति में आ गए। जबकि वे आरंभ में स्वयं नहीं रहना चाहते थे। मात्र एक कमेटी के निर्माण के लिए अन्ना ने जिस तरह प्रतिपल अपने फैसले बदले उससे साफ हो गया कि पर्दे के पीछे कुछ और चल रहा था।
       अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे मनीपावर भी काम करती रही है इसका साक्षात प्रमाण है मात्र 4 दिन में इस आंदोलन के लिए मिला 83 लाख रूपये चंदा और इस समिति के लोगों ने इसमें से तकरीबन 32 लाख रूपये खर्च भी कर दिए। टाइम्स ऑफ इण्डिया में 15 अप्रैल 2011 को प्रकाशित बयान में इस ग्रुप ने कहा है -
"it has received a total donation of Rs 82,87,668."..  "spokesperson said, they have spent Rs 32,69,900." यानी अन्ना हजारे के लिए आंदोलन हेतु संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। मात्र 4 दिनों 83 लाख चंदे का उठना इस बात का संकेत है कि अन्ना के पीछे समर्थ लॉबी काम करती रही है। अन्ना हजारे के आंदोलन की मीडिया हाइप का यह सीधे फल है जो अन्ना के भक्तों को मिला है। एनजीओ संस्कृति नियोजित पूंजी की संस्कृति है। स्वतःस्फूर्त संस्कृति नहीं है बल्कि निर्मित वातावरण की संस्कृति है।
     एनजीओ समुदाय में काम करने वाले लोगों की अपनी राजनीति है।विचारधारा है और वर्गीय भूमिका भी है। वे परंपरागत दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में काम करते रहे हैं। अन्ना हजारे के इस आंदोलन के पीछे जो लोग हठात सक्रिय हुए हैं उनमें एक बड़ा अंश ऐसे लोगों का है जो विचारों से संकीर्णतावादी हैं।
       मीडिया उन्माद,अन्ना हजारे की संकीर्ण वैचारिक प्रकृति और भ्रष्टाचार इन तीनों के पीछे सक्रिय सामाजिक शक्तियों के विचारधारा त्मक स्वरूप का विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। इस प्रसंग में इंटरनेट पर सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी फेसबुक मंच पर आयी टिप्पणियों का सामाजिक संकीर्ण विचारों के नजरिए से अध्ययन करना बेहतर होगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोग इतने संकीर्ण और स्वभाव से फासिस्ट हैं कि वे अन्ना हजारे के सुझाव से इतर यदि कोई व्यक्ति सुझाव दे रहा है तो उसके खिलाफ अपशब्दों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे इतने असहिष्णु हैं कि अन्ना की सामान्य सी भी आलोचना करने वाले पर व्यक्तिगत कीचड उछाल रहे हैं। औगात दिखा देने की धमकियां दे रहे हैं। यह अन्ना के पीछे सक्रिय फासिज्म है।
    अन्ना की आलोचना को न मानना,आलोचना करने वालों के खिलाफ हमलावर रूख अख्तियार करना संकीर्णतावाद है। इस संकीर्णतावाद की जड़ें भूमंडलीकरण में हैं। अन्ना हजारे और उनकी भक्तमंडली के सामाजिक चरित्र में व्याप्त इस संकीर्णतावाद का ही परिणाम है कि अन्ना हजारे स्वयं भी कपिल सिब्बल की सामान्य सी टिप्पणी पर भड़क गए और उनसे मसौदा कमेटी से तुरंत हट जाने की मांग कर बैठे।
    अन्ना हजारे फिनोमना हमारे सत्ता सर्किल में पैदा हुए संकीर्णतावाद का एनजीओ रूप है जिसका समाजविज्ञान में भी व्यापक आधार है। वरना यह कैसे हो सकता है कि अन्ना हजारे के संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारों को जानने के बाबजूद बड़े पैमाने पर लोकतांत्रिक मनोदशा के लोग उनके साथ हैं। ये ही लोग प्रत्यक्षतः आरएसएस के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं हैं लेकिन अन्ना हजारे के साथ खड़े होने के लिए तैयार हैं जबकि अन्ना के विचार उदार नहीं संकीर्ण हैं। इससे यह भी पता चलता है कि एजीओ संस्कृति की आड़ में संकीर्णतावादी -प्रतिगामी विचारों की जमकर खेती हो रही है,उनका तेजी से मध्यवर्ग में प्रचार-प्रसार हो रहा है।
   अन्ना मार्का संकीर्ण विचार के प्रसार का बड़ा कारण है उनका सत्ता के विचारों का विरोध करना। वे सत्ता की विचारधारा का विरोध करते हैं और अपने विचारों को सत्ता के विचारों के विकल्प के रूप में पेश करते हैं। उन्होंने अपने को सुधारवादी -लिबरल के रूप में पेश किया हैं। वे हर चीज को तात्कालिक प्रभाव के आधार पर विश्लेषित कर रहे हैं। वे सत्ता के विकल्प का दावा पेश करते हुए जब भी कोई मांग उठाते हैं ,उसके तुरंत समाधान की मांग करते हैं, और जब वे चटपट समाधान कराने में सफल हो जाते हैं तो दावा करते हैं कि देखो हम कितने सही हैं और हमारा नजरिया कितना सही है। अन्ना हजारे का मानना यही है, उन्होंने जन लोकपाल बिल की मांग की और 4 दिन में केन्द्र सरकार ने उनकी मांग को मान लिया।यही सरकार 42 साल से नहीं मान रही थी,लेकिन अन्ना की मांग को 4 दिन में मान लिया।
    अन्ना हजारे टाइप लोग 'पेंडुलम इफेक्ट' की पद्धति का व्यवहार करते हैं। चट मगनी पट ब्याह। इसके विपरीत लोकपाल बिल का सत्ता विमर्श बोरिंग,दीर्घकालिक और अवसाद पैदा करने वाला था। इसके प्रत्युत्तर में अन्ना हजारे टाइप एक्शन रेडीकल और तुरत-फुरत वाला था। यह बुनियादी तौर पर संकीर्णतावादी आर्थिक मॉडल से जुड़ा फिनोमिना है। 
   अन्ना के एक्शन ने संदेश दिया कि वह चटपट काम कर सकते हैं। जो काम 42 सालों में राजनीतिक दलों ने नहीं किया उसे हमने मात्र 4 दिन में कर दिया। लोकपाल बिल के पास होने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी हमने इसके पास होने की उम्मीदें जगा दी। निराशा में आशा पैदा करना और इसकी आड़ में वैज्ञानिक बुद्धि और समझ को छिपाने की कला काम करती रही है। दूसरा संदेश यह गया कि सरकार परफेक्ट नहीं हम परफेक्ट हैं। सरकार की तुलना में अन्ना की प्रिफॉर्मेंश सही है।जो काम 42 साल से राजनीतिक दल नहीं कर पाए वह काम एनजीओ और सिविल सोसायटी संगठनों ने कर दिया। इस काम के लिए जरूरी है कि सत्ता के साथ एनजीओ सक्रिय भागीदारी निभाएं।
    रामविलास पासवान ने जब लोकपाल बिल की मसौदा कमेटी में दलित भागीदारी की मांग की तो भ्रष्टाचार विरोधी मंच के लोग बेहद खफा हो गए। दूसरी ओर अन्ना ने भी कमेटी के लिए जिन लोगों के नाम सुझाए वे सभी अभिजन हैं। इससे अन्ना यह संदेश देना चाहते हैं कि वे लोकतंत्र में अभिजन के प्रभुत्व को मानते हैं। आम जनता सिर्फ वोट दे,शिरकत करे। लेकिन कमेटी में अभिजन ही रहेंगे। अन्ना हजारे इस सांकेतिक फैसले का अर्थ है लोकतंत्र में सत्ता और आम जनता के बीच खाई बनी रहेगी।
     इसके अलावा अन्नामंडली ने इस पूरे लोकतांत्रिक मसले को गैरदलीय और अ-राजनीतिक बनाकर पेश किया। इससे यह संदेश गया कि  लोकतंत्र में राजनीति की नहीं अ-राजनीति की जरूरत है। अन्ना हजारे के अनशन स्थल पर उमाभारती आदि राजनेताओं के साथ जो दुर्व्यवहार किया गया उसने यह संदेश दिया कि जनता और राजनीति के संबंधों का अ-राजनीतिकरण हो गया है। और आम जनता को राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रहना चाहिए राजनीति दल चोर हैं,भ्रष्ट हैं। इस तरह अन्ना मुक्त बाजार में मुक्त राजनीति के नायक के रूप में उभरकर सामने आए हैं।
      
     अन्ना ने एनजीओ राजनीति को उपभोक्ता वस्तु की तरह बेचा है। जिस तरह किसी उपभोक्ता वस्तु का एक व्यावसायिक और विज्ञापन मूल्य होता है।ठीक वैसे ही अन्ना हजारे मार्का आमरण अनशन का मासमीडिया ने इस्तेमाल किया है। उन्होंने अन्ना के आमरण अनशन और उसकी उपयोगिता पर बार बार बलदिया। उसका टीवी चैनलों के जरिए लंबे समय तक लाइव टेलीकास्ट किया।
     अन्ना के आमरण अनशन की प्रचार नीति वही है जो किसी भी माल की होती है। अन्ना ने कहा 'तेरी राजनीति से मेरी राजनीति श्रेष्ठ है।'  इसके लिए उन्होंने नागरिकों की व्यापक भागीदारी को मीडिया में बार बार उभारा और सिरों की गिनती को महान उपलब्धि बनाकर पेश किया।  यह वैसे ही है जैसे वाशिंग मशीन के विज्ञापनदाता कहते हैं कि 10 करोड़ घरों में लोग इस्तेमाल कर रहे हैं तुम भी करो। अन्ना की मीडिया टेकनीक है चूंकि इतने लोग मान रहे हैं अतः तुम भी मानो। यह विज्ञापन की मार्केटिंग कला है।
  टीवी कवरेज में बार-बार एक बात पर जोर दिया गया कि देखो अन्ना के समर्थन में "ज्यादा से ज्यादा" लोग आ रहे हैं। "ज्यादा से ज्यादा" लोगों का फार्मूला आरंभ हुआ चंद लोगों से और देखते ही देखते लाखों -लाख लोगों के जनसमुद्र का दावा किया जाने लगा। चंद से लाखों और लाखों से करोड़ों में बदलने की कला विशुद्ध विज्ञापन कला है। इसका जनता की हिस्सेदारी के साथ कोई संबंध नहीं है। यह विशुद्ध मीडिया उन्माद पैदा करने की कला है जिसका निकृष्टतम ढ़ंग से अन्नामंडली ने इस्तेमाल किया।
टीवी कवरेज में एक और चीज का ख्याल रखा गया और वह है क्रमशः जीत या उपलब्धि की घोषणा। विज्ञापन युद्ध की तरह शतरंज का खेल है। इसमें आप जीतना जीतते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं।जितना अन्य का व्यापार हथिया लेते हैं उतने ही सफल माने जाते हैं। अन्नामंडली ने ठीक यही किया आरंभ में उन्होंने प्रचार किया कि केन्द्र सरकार जन लोकपाल बिल के पक्ष में नहीं है। फिर बाद में दो दिन बाद खबर आई कि सरकार झुकी, फिर खबर आई कि सरकार ने दो मांगें मानी,फिर खबर आई कि खाली मसौदा समिति के अध्यक्ष के सवाल पर मतभेद है,बाद में खबर आई कि सरकार ने सभी मांगें मान लीं। क्रमशः अन्ना की जीत की खबरों का फ्लो बनाए रखकर अन्नामंडली ने अन्ना को एक ब्राँण्ड बना दिया। उन्हें भ्रष्टाचारविरोधी ब्राँण्ड के रूप में पेश किया।
      अन्ना के व्यक्तिवाद को खूब उभारा गया। अन्ना के व्यक्तिवाद को सफलता के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। मीडिया कवरेज में अन्ना मंडली ने आंदोलन के 'युवापन' को खूब उभारा,जबकि सच यह है कि अन्ना ,अग्निवेश,किरन बेदी में से कोई भी युवा नहीं है। आमरण अनशन का नेतृत्व एक बूढ़ा कर रहा था। इसके बाबजूद कहा गया यह युवाओं का आंदोलन है। आरंभ में इसमें युवा कम दिख रहे थे लेकिन प्रचार में युवाओं पर तेजी से इंफेसिस दिया गया। आखिर इन युवाओं को प्रचार में निशाना बनाने की जरूरत क्यों पड़ी ? आखिर अन्ना के आंदोलन में किस तरह का युवा था ?
     अन्ना की मीडिया टेकनीक 'सफलता' पर टिकी है। 'सफलता' पर टिके रहने के कारण अन्ना को सफल होना ही होगा। यदि अन्ना असफल होते हैं तो संकीर्णतावाद का प्रचार मॉडल पिट जाता है। अन्ना के बारे में बार-बार यही कहा गया कि देखो उन्होंने कितने 'सफल' आंदोलनों का नेतृत्व किया। एनजीओ संस्कृति और संघर्ष की रणनीति में 'सफलता' एक बड़ा फेक्टर है जिसके आधार पर अ-राजनीति की राजनीति को सफलता की ऊँचाईयों के छद्म शिखरों तक पहुँचाया गया।
   अन्नामंडली की मीडिया रणनीति की सफलता है कि वे अपने आंदोलन को नियोजित और पूर्व कल्पित की बजाय स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करने में सफल रहे। जबकि यह नियोजित आंदोलन था। जब आप किसी आंदोलन को स्वतःस्फूर्त और स्वाभाविक रूप में पेश करते हैं तो सवाल खड़े नहीं किए जा सकते। यही वजह है अन्ना हजारे,उनकी भक्तमंडली,आमरण अनशन,लोकपाल बिल,भ्रष्टाचार आदि पर कोई परेशानी करने वाला सवाल करने वाला तुरंत बहिष्कृतों की कोटि में डाल दिया जाता है। अन्ना ने इस समूचे प्रपंच को बड़ी ही चालाकी के साथ भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में रखकर पेश किया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में आमरण अनशन को पेश करने का लाभ यह हुआ कि आमरण अनशन पर सवाल ही नहीं उठाए जा सकते थे। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में पेश करने के कारण ही अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को अतिसरल बना दिया और उसकी तमाम जटिलताओं को छिपा दिया। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस में जब जन लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार को पेश किया तो दर्शक को इस मांग और आंदोलन के पीछे सक्रिय विचारधारा को पकड़ने में असुविधा हुई। भ्रष्टाचार के कॉमनसेंस को दैनंदिन जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के फुटेजों के जरिए पुष्ट किया गया।
    एनजीओ संकीर्णतावाद के पीछे लोगों को गोलबंद करने के लिए कहा गया कि राजनीतिज्ञ ,राजनीतिक प्रक्रिया,चुनाव आदि भ्रष्ट हैं। इससे एनजीओ संकीर्णतावाद और अन्नामंडली के प्रतिगामी विचारों को वैधता मिली।

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