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अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा

रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।

अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।

अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आ…

पश्चिम बंगाल के माफियातंत्र के सामने बौने लग रहे हैं भद्रलोकनेता

विगत शुक्रवार को प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में चांसलर और राज्य के राज्यपाल एम.के नारायणन ने छात्रों से कैम्पस में हुई तोड़फोड़ और हिंसा से छात्रों की रक्षा न कर पाने के लिए माफी मांगी। चांसलर का स्वर पीड़ा से भरा था लेकिन वे भरोसा पैदा नहीं कर पा रहे थे।कायदे से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को माफी मांगनी चाहिए लेकिन यह काम राज्यपाल से कराया गया।


प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में टीएमसी के कार्यकर्त्ताओं ने बुधवार को प्रतिवाद करते हुए हिंसा का ताण्डव किया ,कैम्पस में गेट का ताला तोड़कर प्रवेश किया,छात्र-छात्राओं पर हमले किए, ऐतिहासिक बेकर लैव में जाकर तोड़फोड़ की। उपकुलपति मालविका सरकार ने इस हिंसक ताण्डव को अपनी आंखों से देखा, रजिस्ट्रार ने पुलिस से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही।


उल्लेखनीय है 9 अप्रैल को दिल्ली में योजना आयोग भवन के अहाते में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके साहयोगी मंत्रियों के खिलाफ एसएफआई ने प्रदर्शन किया था वे मांग कर रहे थे सुदीप्त गुप्ता की पुलिस कस्टैडी में हुई मौत की न्यायिक जांच करायी जाय, उस समय किन्हीं कारणों से एसएफआई कार्यकर्त्ता…

नरेन्द्र मोदी के मीडिया उन्माद और राहुल के समावेशी मॉडल में भिडंत

मोदी को लेकर इनदिनों जो मीडिया उन्माद चल रहा है वह भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव अभी एक साल बाद होंगे लेकिन भाजपा और मोदी की प्रधानमंत्री पद को पाने की बेचैनी देखने लायक है।    एक जमाने में “इंडिया साइनिंग” के नाम से जिस तरह का भाजपा ने मीडिया उन्माद पैदा किया था ठीक वैसा ही मीडिया उन्माद इन दिनों मोदी को लेकर पैदा किया जा रहा है। प्रतिस्पर्धा साफ दिख रही है। कांग्रेस ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी के लिए मन बना लिया है। सीआईआई के अधिवेशन में काग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी पहलीबार सार्वजनिक तौर पर बोले। उनके भाषण में एक युवानेता के सपने,ख्याल,भारत की तस्वीर और भारत की लाइफलाइन की ध्वनि वायवीय रूप में उभरकर सामने आई।    सीआईआई के सम्मेलन में देश 1500से ज्यादा उद्योगपति भाग रहे हैं और वे धैर्य के साथ सभी दलों के नेताओं को सुन रहे हैं उसमें राहुल गांधी का भाषण काल्पनिक ज्यादा था.व्यापारी जगत काल्पनिक दुनिया में जीने का आदी नहीं है। उसे ठोस बातें करने और सुनने की आदत है।
राहुल और उनके भक्तों को जानना चाहिए भारत कोई आख्यान नहीं है। यह ए…

आधुनिक रीतिवाद के प्रतिवाद में

रामविलास शर्मा के जन्मशती के मौके पर इस ‘संवाद’ के बहाने हमें हिंदी आलोचना पर नए सिरे से विचार करने का मौका मिला है।  फलतः नई-पुरानी सभी धारणाओं को नए पैराडाइम के आधार पर देखा जाना जाना चाहिए। रामविलासजी को याद करने का अर्थ उनकी मान्यताएं दोहराना या उनकी जीरोक्स कॉपी पेश करना या धारणाओं का स्तवन मात्र करना नहीं है।इसे साहित्य में आधुनिक रीतिवाद कहते हैं ,और रामविलास शर्मा को रीतिवादी रूझानों से सख्त नफरत थी।आलोचना की पहली समस्या है कि उसे आधुनिक रीतिवाद या स्टीरियोटाइप से बचाया जाए। दुर्भाग्य की बात है कि जिनके कंधों पर विकल्प खोजने की जिम्मेदारी है ,वे ही साहित्य में आधुनिक रीतिवाद के पुरोधा बने हुए हैं। इनकी मुश्किल यह है कि वे नए मसलों और अवधारणाओं पर सोचने के लिए तैयार नजर नहीं आते।        आधुनिक आलोचना में रीतिवाद के प्रभाववश ही अब प्रगतिशीलों के लिखे पर कोई विवाद नहीं होता। वे मिलते हैं तो पूछते हैं कैसे हो, क्या लिख रहे हो,कहां जा रहे हो, कौन क्या कर रहा है, किसे इनाम मिला, फलां-फलां लेखक क्या कर रहा है,या इसी तरह के व्यक्तिगत और गैर-साहित्यिक सवालों पर संवाद ज्यादा होता है।…