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शनिवार, 27 अप्रैल 2013

अस्मिता,आम्बेडकर और रामविलास शर्मा


रामविलास शर्मा के लेखन में अस्मिता विमर्श को मार्क्सवादी नजरिए से देखा गया है। वे वर्गीय नजरिए से जातिप्रथा पर विचार करते हैं। आमतौर पर अस्मिता साहित्य पर जब भी बात होती है तो उस पर हमें बार-बार बाबासाहेब के विचारों का स्मरण आता है। दलित लेखक अपने तरीके से दलित अस्मिता की रक्षा के नाम बाबा साहेब के विचारों का प्रयोग करते हैं। दलित लेखकों ने जिन सवालों को उठाया है उन पर बड़ी ही शिद्दत के साथ विचार करने की आवश्यकता है। आम्बेडकर-ज्योतिबा फुले का महान योगदान है कि उन्होंने दलित को सामाजिक विमर्श और सामाजिक मुक्ति का प्रधान विषय बनाया।

अस्मिता विमर्श का एक छोर महाराष्ट्र के दलित आंदोलन और उसकी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा है ,दूसरा छोर यू.पी-बिहार की दलित राजनीति और सांस्कृतिक प्रक्रिया से जुड़ा है। अस्मिता विमर्श का तीसरा आयाम मासमीडिया और मासकल्चर के राष्ट्रव्यापी उभार से जुड़ा है। इन तीनों आयामों को मद्देनजर रखते हुए अस्मिता की राजनीति और अस्मिता साहित्य पर बहस करने की जरूरत है।

अस्मिता के सवाल आधुनिकयुग की देन हैं। आधुनिक युग के पहले अस्मिता की धारणा का जन्म नहीं होता। आधुनिककाल आने के साथ व्यक्तिगत को सामाजिक करने और अपने अतीत को जानने-खोजने का जो सिलसिला आरंभ हुआ उसने अस्मिता विमर्श को संभव बनाया।

अस्मिता राजनीति में विगत 150 सालों में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।खासकर नव्य आर्थिक उदारीकरण और उपग्रह मीडिया प्रसारण आने बाद परिवर्तनों का सिलसिला तेज हुआ है। खासकर उत्तर आधुनिकतावाद आने के साथ सारी दुनिया में उत्तर आधुनिक अस्मिता की धारणा का तो बबंडर ही चल निकला।मसलन् अस्मिता निर्माण के उपरकरणों के रूप में मोबाइल,आई पोड,मर्दानगी आदि पर जमकर चर्चाएं हुई हैं।

उत्तर आधुनिकता के साथ आई अस्मिता ने सेल्फ (निज ) के तरल, विखंडित, विश्रृंखलित,अ-केन्द्रित, अवसादमय, वर्णशंकर, रूपों को जन्म दिया। उत्तर आधुनिक अस्मिता का अर्थ है तर्क,सत्य,प्रगति और सार्वभौम स्वतंत्रता वाले आधुनिक आख्यान का अंत। इन दिनों अस्मिता के छोटे छोटे आख्यान केन्द्र में आ गए हैं। स्त्री से लेकर दलित तक,भाषा से लेकर संस्कृति तक, साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, राष्ट्रवाद आदि तक अस्मिता की राजनीति का विमर्श फैला हुआ है।

आखिरकार आधुनिक युग में अछूत कैसे जीएंगे हम नहीं जानते थे। हम कबीर को जानते थे,रैदास को जानते थे। ये हमारे लिए कवि थे। साहित्यकार थे। संत थे। किंतु ये अछूत थे और इसके कारण इनका संसार भिन्न किस्म का था यह सब हम नहीं जानते थे। अछूत की खोज आधुनिकयुग की महानतम सामाजिक उपलब्धि है।

अछूत के उद्धाटन के बाद पहलीबार देश के विचारकों को पता चला वे भारत को कितना कम जानते हैं। भारत एक खोज को अछूत की खोज ने ढंक दिया। आज भारत एक खोज सिर्फ किताब है, सीरियल है,एक प्रधानमंत्री के द्वारा लिखी मूल्यवान किताब है। इस किताब में भी अछूत गायब है। उसका इतिहास और अस्तित्व गायब है। आंबेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा बल्कि शूद्र के आधार पर देखा। शूद्र के नजरिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा। इसी अर्थ में आंबेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है।

भारत एक खोज से सभ्यता विमर्श सामने आया,अछूत खोज ने परंपरा और इतिहास की असभ्य और बर्बरता की परतों को खोला। आंबेडकर इस अर्थ में सचमुच में बाबासाहेब हैं कि उन्होंने भारत के आधुनिक एजेण्डे के रूप में अछूत को प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग की सबसे जटिल समस्या के रूप में अछूत समस्या को पेश किया।

आधुनिकाल में किसी के लिए स्वाधीनता,किसी के लिए समाजसुधार, किसी के लिए औद्योगिक विकास , किसी के लिए क्रांति और साम्यवादी समाज से जुड़ी समस्याएं प्रधान समस्या थीं किंतु आंबेडकर ने इन सबसे अलग अछूत समस्या को प्रधान समस्या बनाया।

अछूत समस्या पर बातें करने ,पोजीशन लेने का अर्थ था अपने बंद विचारधारात्मक कैदघरों से बाहर आना। जो कुछ सोचा और समझा था उसे त्यागना। अछूत और उसकी समस्याओं पर संघर्ष का अर्थ है पहले के तयशुदा विचारधारात्मक आधार को त्यागना और अपने को नए रूप में तैयार करना। अछूत समस्या से संघर्ष किसी क्रांति के लिए किए गए संघर्ष से भी ज्यादा दुष्कर है। आधुनिककाल में क्रांति संभव है,आधुनिकता संभव है,औद्योगिक क्रांति संभव है किंतु आधुनिक काल में अछूत समस्या का समाधान तब ही संभव है जब मानवाधिकार के प्रकल्प को आधार बनाया जाए।

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बारे में रामविलास शर्मा ने जिस नजरिए से विचार किया है उसके आधार पर अस्मिता की राजनीति को समझने में हमें मदद मिल सकती है। इस प्रसंग में रामविलास शर्मा की 'गाँधी,आम्बेडकर ,लोहिया और इतिहास की समस्याएँ' (2000) किताब बेहद महत्वपूर्ण है।

सामंतवाद,साम्राज्यवाद ,क्रांति,आधुनिकता,औद्योगिक क्रांति इन सबका आधार मानवाधिकार नहीं हैं। बल्कि किसी न किसी रूप में इनमें मानवाधिकारों का हनन होता है। अछूत समस्या मानवीय समस्या है इसके खिलाफ संघर्ष करने का अर्थ है स्वयं के खिलाफ संघर्ष करना और इससे हमारा बौध्दिकवर्ग, राजनीतिज्ञ और मध्यवर्ग भागता रहा है। ये वर्ग किसी भी चीज के लिए संघर्ष कर सकते हैं किंतु अछूत समस्या के लिए संघर्ष नहीं कर सकते। अछूत समस्या अभी भी मध्यवर्ग और पूंजीपतिवर्ग के चिन्तन को स्पर्श नहीं करती। अछूत समस्या को वे महज घटना के रूप में दर्शकीय भाव से देखते हैं। अछूत समस्या न तो घटना है और न परिघटना और न संवृत्ति ही है। बल्कि मानवीय समस्या है मानवाधिकार की समस्या है। मानवाधिकारों के विकास की समस्या है। हमारे समाज में मानवाधिकारों के विकास को लेकर जितनी जागृति पैदा होगी अछूत समस्या उतनी ही कम होती जाएगी। जिस समाज में मानवाधिकारों का अभाव होगा वहां पर अछूत समस्या,बहिष्कार की समस्या उतनी प्रबल रूप में नजर आएगी।

रामविलास शर्मा ने लिखा है '' भारत में वर्ग हैं, जाति बिरादरी हैं।दोनों यथार्थ हैं। परंतु वर्ग ऐसा य़थार्थ है जो जीवंत है,जो आगे बढ़ रहा है और जाति बिरादरी ऐसा यथार्थ है जो मर रहा है और पिछड़ रहा है। आम्बेडकर ने कहा थाः जब परिवर्तन आरंभ होता है,तब सदा पुराने पुराने और नए के बीच संघर्ष होता है। नए का समर्थन न किया जाए तो यह खतरा बना रहता है कि वह इस संघर्ष में निरस्त कर दिया जाएगा।"[1]

रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर की विश्वदृष्टि की खोज करते हुए रेखांकित किया कि उनके दृष्टिकोण का आधार वर्ग हैं।मजदूरवर्ग है। न कि जाति। उन्होंने लिखा है, " यदि इस समय अभ्युदयशील वर्गों का समर्थन न किया गया, जाति-बिरादरी का समर्थन किया गया, तो यह संभव है,जाति-बिरादरी बनी रहे और वर्गों की भूमिका पीछे छूट जाए। जाति-बिरादरी के भेद वर्गों के संगठन और वर्ग संघर्ष द्वारा ही संभव किए जा सकते हैं।आम्बेडकर ने कहा था,मजदूरवर्ग को मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा थाःमजदूरों को केवल अपने संघ कायम करने से संतोष नहीं करना चाहिए उन्हें घोषित करना चाहिए कि उनका उद्देश्य शासन-तंत्र पर अधिकार करना है।"[2] दुखद बात यह है कि आम्बेडकर की वर्गीय दृष्टि की बजाय अस्मिता की राजनीति करने वालों ने जाति और वर्ण के बारे में लिखी बातों को अपना लिया है और बाकी सारी बातों को त्याग दिया है।

भारतीय समाज में शूद्र सिर्फ अछूत नहीं है। बल्कि गुमशुदा भी है। हम उसे कम से कम जानते हैं। हम उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं। उसका कम से कम वर्णन करते हैं। अछूतों के जीवन के व्यापक ब्यौरे तब ही आए जब हमें आधुनिककाल में ज्योतिबा फुले और आंबेडकर जैसे प्रतिभाशाली विचारक मिले। यह सोचने वाली चीज है कि आंबेडकर ने जाति व्यवस्था के मर्म का उद्धाटन करते हुए जितने विस्तार के साथ अछूतों की पीड़ा को सामने रखा और उससे मुक्त होने के लिए सामाजिक-राजनीतिक प्रयास आरंभ किए वैसे प्रयास पहले कभी नहीं हुए।

आधुनिककाल के पहले शूद्र हैं किंतु अनुपस्थित और अदृश्य हैं। जातिव्यवस्था है किंतु जातिव्यवस्था के अनुभव गायब हैं। जाति सिर्फ मनोवैज्ञानिक चीज नहीं है। उसका ठोस आर्थिक आधार है। जाति के ठोस आर्थिक आधार को बदले बगैर जाति की संरचनाओं को बदलना संभव नहीं है। संत और भक्त कवियों के यहां जाति एक मनोदशा के रूप में दाखिल होती है। मनोदशा के धरातल पर ही ईश्वर सबका था और सब ईश्वर के थे। भक्ति में भेदभाव नहीं था। भक्ति का सर्वोच्च रूप वह था जो मनसा भक्ति से जुड़ा था। वास्तविकता इसके एकदम विपरीत थी। ईश्वर और धर्म की सत्ता के वर्चस्व के कारण भेद और वैषम्य के सभी समाधान मनोदशा के धरातल पर ही तलाशे गए। मन में ही सामाजिक समस्याओं के समाधान तलाशे गए। सामाजिक यथार्थ से भक्त कवियों का लगाव एकदम नहीं था। यही वजह है कि वे जातिभेद के सामाजिक रूपों को देखने में असमर्थ रहे। इस कमजोरी के बावजूद भक्तकवियों ने जातिभेद के खिलाफ मनोदशा के स्तर पर संघर्ष करके कम से कम सामंजस्य का वातावरण तो बनाया। यह दीगर बात है कि सामंजस्य के पीछे वर्चस्वशाली वर्गों की हजम कर जाने की मंशा काम कर रही थी। उल्लेखनीय है सामंजस्य की बात तब उठती है जब अन्तर्विरोध हों, टकराव हो,तनाव हो। वरना सामंजस्य पर इतना जोर क्यों ?

अनेक विचारक वर्णभेद को नस्लभेद के रूप में चित्रित करते हैं। इस चित्रण को बड़े ही चलताऊ ढ़ंग से साहित्य में इस्तेंमाल किया जा रहा है। आम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते।[3] दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि आम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी ,वे लगातार अपने विचारों का विकास करते हैं। विचारों की विकासशाल प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे। आम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए। आमतौर पर हम यह मानते हैं कि आर्य एक जाति थी,नस्ल थी। आमेहेडकर ने इस धारणा का खंडन किया है। आर्य एक समुदाय था। "आम्बेडकर ने लिखाः आर्य एक जन समुदाय का नाम है। जो चीज उन्हें आपस में बैंधे हुए थी,वह एक विशेष संस्कृति,जो आर्य संस्कृति कहलाती थी,को सुरक्षित रखने में उनकी दिलचस्पी थी। जो भी आर्य संस्कृति स्वीकार करता था,वह आर्य था।आर्य नाम की कोई नस्ल नहीं थी।"[4] आम्बेडकर ने यह भी लिखा है कि " आर्यों में रंग संबंधी द्वेषभाव था जिससे उनकी समाज व्यवस्था निर्धारित हुई,यह बात निहायत बेसिर-पैर की है।यदि कोई ऐसा जन-समुदाय था जिसमें रंग सम्बन्धी द्वेषभाव का अभाव था तो वह आर्यों का समुदाय था और ऐसा इसलिए कि उनमें कोई ऐसा रंग प्रधान नहीं था जिससे वे अलग पहचाने जाते।"[5]

भीमराव आम्बेडकर ने इस धारणा का भी खंडन किया है कि दस्यु लोग अनार्य थे।[6] वे यह भी नहीं मानते कि आर्य भारत के बाहर से आए थे। वे यह भी मानते हैं कि शूद्र भी आर्य हुआ करते थे।

भीमराव आम्बेडकर ने सन् 1946 में 'शूद्र कौन थे ?' ( हू वेयर द शूद्राज ) नामक किताब लिखी। इस किताब में पश्चिमी विद्वानों की तमाम धारणाओं का उन्होंने खंडन किया। " आम्बेडकर ने इन विद्वानों की 7 मुख्य स्थापनाएँ प्रसुत की हैः 1. जिन लोगों ने वैदिक साहित्य रचा था, वे आर्य नस्ल के थे। 2. यह आर्य नस्ल बाहर से आई थी और उसने भारत पर आक्रमण किया था ।3. भारत के निवासी दास और दस्यु के रूप में जाने जाते थे और ये आर्यों से नस्ल के विचार से भिन्न थे।4. आर्य श्वेत नस्ल के थे, दास और दस्यु काली नस्ल के थे।5. आर्यों ने दासों और दस्युओं पर विजय प्राप्त की।6.दास और दस्यु विजित होने के बाद दास बना लिए गए और शूद्र कहलाए।7. आर्यों में रंगभेद की भावना थी और इसलिए उन्होंने चातुर्वर्ण्य का निर्माण किया। इसके द्वारा उन्होंने श्वेत नस्ल को काली नस्ल से, यथा दासों और दस्युओं से अलग किया। आगे आम्बेडकर ने इन सातों स्थापनाओं का खंडन किया।"[7] इन सभी मतों का इन दिनों प्राच्यवादी पश्चिमी विचारक खूब प्रचार कर रहे हैं।इन विचारों से हिंदी लेखकों का एक तबका भी प्रभावित है।

रामविलास शर्मा ने सवाल उठाया है कि शूद्र अनार्य नहीं थे तो वे कौन थे ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने आम्बेडकर के विचारों का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है, " इस प्रश्न के उत्तर में आम्बेडकर की तीन स्थापनाएँ हैः (1) शूद्र आर्य थे।(2) शूद्र क्षत्रिय थे। (3) क्षत्रियों में शूद्र ऐसे महत्वपूर्ण वर्ग के थे कि प्राचीन आर्य समुदायों के कुछ सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा शूद्र हुए थे।"[8]

रामविलास शर्मा ने आम्बेडकर का मूल्यांकन करते हुए अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं दी हैं। ये अवधारणाएं अनेक मामलों में आम्बेडकर के चिंतन से भिन्न मार्क्सवादी नजरिए को व्यक्त करती हैं। रामविलास शर्मा ने लिखा है, " आम्बेडकर के विचार से हिंदुओं का जो साहित्य पवित्र या धार्मक कहलाता है,वह प्रायःसबका सब ब्राह्मणों का रचा हुआ है।ब्राह्मण विद्वान् उसका आदर करें, यह स्वाभाविक है।उसी तरह अब्राह्मण विद्वान उसके प्रति आदर प्रकट न करें, यह भी स्वाभाविक है। यहाँ ब्राह्मण और अब्राह्मण का भेद करने के बदले पुरोहित और अपुरोहित का भेद करना उचित होगा। बहुत से ब्राह्मणों ने पुरोहित वर्ग के विरुद्ध साहित्य रचा है।इसके सिवा प्राचीन साहित्य का कुछ अंश क्षत्रियों का रचा हुआ भी है।और जो सबसे पवित्र ग्रंथ ऋग्वेद है,उसे रचने वाले सामंती व्यवस्था के ब्राह्मण थे,इसका कोई प्रमाण नहीं है। ब्राह्मण और क्षत्रिय जब अवकाशभोगी वर्ग बनते हैं,तब उत्पादन से उनका संबंध टूट जाता है। अपने से भिन्न श्रमिक वर्ग के बिना वे अवकाश में जीवन बिता नहीं सकते। ऋग्वेद में शूद्र शब्द केवल एक बार पुरूष सूक्त में आया है और वह सूक्त बाद में जोडा गया है,यह बहुत से लोगों की मान्यता है।यदि ऋग्वेद में शूद्र नहीं हैं, तो उस में ब्राह्मण और क्षत्रिय भी नहीं हैं।"[9]

रामविलास शर्मा इस धारणा का भी खंडन किया है कि साहित्य का उदभव किसी धार्मिक पाठ से हुआ है। वे मानते हैं कि साहित्य का उदभव लौकिक या सेक्युलर होता है। इस मिथ का भी खंडन किया है कि प्राचीनकाल में ब्राह्णणों की प्रधानता थी। उनका मानना है कि " भारयीय समाज में पहले क्षत्रियों की प्रधानता थी,ब्राह्मणों की नहीं,यह उस साहित्य से प्रमाणित होता है जिसे ब्राह्मणों का रचा हुआ माना जाता है।" [10]

रामविलास शर्मा ने यह भी लिखा है कि रामायण,महाभारत के नायक क्षत्रिय माने गए हैं।किसी भी प्राचीन महाकाव्य का नायक ब्राह्मण नहीं है। यही नहीं, महाभारत में धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले अब्राह्मण ही हैं। युधिष्ठिर को धर्म और राजनीति की बातें भीष्म समझाते हैं और अर्जुन को दर्शन और धर्म का ज्ञान कृष्ण देते हैं। महाभारत में एक प्रसिद्ध ब्राह्मण है द्रोणाचार्य। वह राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं और युद्ध में सेनापति का कार्य करते हैं।इन कथाओं में शस्त्रयुक्त क्षत्रिय और शस्त्रविहीन ब्राह्मण वर्गों का अस्तित्व नहीं है।"[11]

बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने शूद्रों के बारे में प्रचलित मतों का खंडन करते हुए लिखा "शूद्रों के लिए कहा जाता है कि वे अनार्य थे,आर्यों के शत्रु थे।आर्यों ने उन्हें जीता था और दास बना लिया। ऐसा था तो यजुर्वेद और अथर्ववेद के ऋषि शूद्रों के लिए गौरव की कामना क्यों करते हैं ? शूद्रों का अनुग्रह पाने की इच्छा प्रकट क्यों करते हैं ?शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो शूद्र सुदास् ऋग्वेद के मंत्रों के रचनाकार कैसे हुए ? शूद्रों के लिए कहा जाता है, उन्हें यज्ञ करने का अधिकार नहीं है। ऐसा था तो सुदास् ने अश्वमेध कैसे किया ?शतपथ ब्राह्मण शूद्र को यज्ञकर्ता के रूप में कैसे प्रस्तुत करता है ? और उसे कैसे सम्बोधन करना चाहिए,इसके लिए शब्द भी बताता है।शूद्रों के लिए कहा जाता है कि उन्हें उपनयन संस्कार का अधिकार नहीं है।यदि आरंभ में ऐसा था तो इस बारे में विवाद क्यों उठा ? बदरि और संस्कार गणपति क्यों कहते हैं कि उसे उपनयन का अधिकार है? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह संपत्ति संग्रह नहीं कर सकता।ऐसा था तो मैत्रायणी और कठक संहिताओं में धनी और समृद्ध शूद्रों उल्लेख कैसे है ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि वह राज्य का पदाधिकारी नहीं हो सकता। ऐसा था तो महाभारत के राजाओं के मंत्री शूद्र थे,ऐसा क्यों कहा गया ? शूद्र के लिए कहा जाता है कि सेवक के रूप में तीनों वर्णों की सेवा करना उसका काम है। यदि ऐसा था तो शूद्र राजा कैसे हुए जैसा कि सुदास् के उदाहरण से,तथा सायण द्वारा दिए गए अन्य उदाहरणों से मालूम होता है।"[12]

आधुनिकाल आने के बाद पहलीबार ईश्वर की विदाई होती है। धर्म के वैचारिक आवरण के बाहर पहलीबार मनुष्य झांकता है। उसे सारी दुनिया और अपनी परंपराएं, सामाजिक यथार्थ वास्तव रूप में दिखाई देता है और उसकी वास्तव रूप में ही अभिव्यक्ति भी करता है। आधुनिककाल में दुख पहले गद्य में अभिव्यक्त होता है। मध्यकाल में दुख पद्य में अभिव्यक्त होता है। दुख और अन्तर्विरोध की अभिव्यक्ति गद्य में हुई या पद्य में इससे भी दुख के संप्रेषण की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मध्यकाल में मनुष्य अपने दुख और पिछडेपन के लिए भाग्य को दोष देता था,पुनर्जन्म के कर्मों को दोष देता था,ईश्वर की कृपा को दोषी ठहराता था। किंतु आधुनिक युग में मनुष्य को पहलीबार अपने दुख और कष्ट के कारण के तौर पर शिक्षा का अभाव सबसे बड़ी चीज नजर आती है। यही वजह है कि शूद्रों में सामाजिक समानता,उन्नति के मंत्र के तौर पर शिक्षा को प्राथमिक महत्व पहलीबार ज्योतिबा फुले ने दिया। सन् 1948 में पुणे में फुले ने एक पाठशाला खोली, यह शूद्रों की पहली पाठशाला थी। भारत के ढाई हजार साल के इतिहास में शूद्रों की यह पहली पाठशाला थी। असल में पाठशाला तो प्रतीकमात्र है उस आने वाले तूफान का जो ज्योतिबा फुले महसूस कर रहे थे।

सन् 1848 में शूद्रों की शिक्षा का आरंभ करके कितना बड़ा क्रांतिकारी कार्य किया था यह बात आज कोई नहीं समझ सकता। उस समय शूद्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिलते थे अत: ज्योतिबा फुले ने अपनी अशिक्षित पत्नी को सुशिक्षित कर अध्यापिका बना दिया। इस उदाहरण में अनेक अर्थ छिपे हैं। पहला अर्थ यह कि शूद्रों के साथ अतीत में सबकुछ अच्छा नहीं होता रहा है। भारत का अतीत जाति सामंजस्य की बजाय जातीय घृणा के आधार पर टिका हुआ था। जातीय घृणा के कारण शूद्रों के लिए स्वतंत्र शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ी। दूसरा अर्थ यह संप्रेषित होता है कि शूद्र सामाजिक तौर पर अति पिछडे थे। तीसरा अर्थ यह कि भारत में शूद्रों के पठन-पाठन की परंपरा ही नहीं थी। सामंजस्य और भक्ति के नाम पर सामाजिकभेदों से जुड़ी सभी चीजों को छिपाया हुआ था। यही वजह है कि शूद्रों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की शुरूआत की गई तो चारों ओर जबर्दस्त हंगामा हुआ।

आधुनिककाल में पहलीबार शूद्रों को यह बात समझाने में ज्योतिबा फुले को सफलता मिली कि मनुष्य के अस्तित्व की पहचान शिक्षा से होती है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु समान होता है। शूद्रों के लिए शिक्षा का अर्थ वही नहीं था जो सवर्णों के लिए था। शूद्रों के लिए शिक्षा अस्तित्वरक्षा, स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और आत्मोध्दार के साथ अस्मिता की स्थापना का उपकरण भी थी। यही वजह है कि शिक्षा का शूद्रों में जितना प्रसार हुआ है अस्मिता की राजनीति का भी उतना ही प्रसार हुआ है।

ज्योतिबाफुले -आंबेडकर के द्वारा शुरू की गई अस्मिता की राजनीति विदेश से लायी गई चीज नहीं है। साम्राज्यवादी साजिश का अंग नहीं है। बल्कि यह तो भारत के संतुलित विकास के परिप्रेक्ष्य के गर्भ से उपजी राजनीति है। इसका आयातित अस्मिता की मौजूदा राजनीति के साथ तुलना करना सही नहीं होगा। शूद्रों की शिक्षा का लक्ष्य था, सामाजिक भेदभाव को खत्म करना, मानवाधिकारों के प्रति सचेतनता पैदा करना और समानता को व्यापक मूल्य के रूप में स्थापित करना।

आम्बेडकर ने अछूत के रूप में जिन जातियों को रखा उनका चयन अंग्रेजों ने किया था।सन् 1935 के कानून में उन जातियों की सूची बना दी गयी जिनको अनुसूचित जातियां कहा जाता है। इस तरह के वर्गीकरण पर रामविलास शर्मा ने लिखा है "अछूत हमेसा अचूत बने रहें,यह स्थिति अंग्रेज पक्की कर रहे थे।"[13] अछूतप्रथा से हिंदुओं को आर्थिक लाभ था और यह धर्म पर आधारित थी। आम्बेडकर का मानना था कि हिंदू सामाजिक गठन की विशेषता है और वह अन्य सभी जन समुदायों से हिन्दुओं को अलग करती है।[14]

अछूत समस्या हमारे देश में कई हजार सालों से है। किंतु इसके खिलाफ कभी सामाजिक आंदोलन नहीं हुए। आखिरकार क्या कारण है कि भारत में विगत ढाई हजार सालों में कभी क्रांति नहीं हुई ? क्या अछूत समस्या को खत्म किए बगैर क्रांति संभव है ? क्या वजह है कि आधुनिककाल में ही अछूत समस्या के खिलाफ सामाजिक आंदोलन संभव हो पाया ? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में जातिभेद खत्म हो सकता है ? इन सभी सवालों का एक-दूसरे के साथ गहरा संबंध है।

भारत में जातिव्यवस्था के खिलाफ क्रांति अथवा सामाजिक क्रांति न हो पाने के तीन प्रधान कारण हैं , पहला ,अंधविश्वासों में आस्था,दूसरा ,पुनर्जन्म की धारणा में विश्वास और तीसरा ,कर्मफल के सिध्दान्त के प्रति विश्वास। इन तीन विचारधारात्मक बाधाओं के कारण भारत में सामाजिक क्रांति नहीं हो पायी। अंधविश्वासों में आस्था के कारण हमने कभी जातिभेद क्यों है ? गरीब गरीब क्यों है और अमीर अमीर क्यों है ? क्या पीपल के पेड़ को पूजने से मनोकामना पूरी होती है ? क्या साहित्य में जो रूढ़ियां चलन में हैं वे वास्तव में भी हैं ? इत्यादि चीजों को यथार्थ में कभी परखा नहीं। हम यही मानकर चलते रहे हैं कि मनुष्य गरीब इसलिए है क्योंकि पहले जन्म में कभी बुरे कर्म किए थे। उसका ही फल है कि इस जन्म में गरीब है। अमीर इसलिए अमीर है क्योंकि वह पहले जन्म में पुण्य करके आया है।

अच्छे कर्म करोगे अच्छे घर में जन्म लोगे। बुरे कर्म करोगे नीच कुल में जन्म होगा। निचली जाति में उन्हीं लोगों का जन्म होता है जिन्होंने पहले बुरे कर्म किए थे। निचली जातियों को नरक के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया और एक नए किस्म के प्रचार अभियान की शुरूआत हुई। इससे जातिभेद को वैधता मिली। कर्मफल के सिध्दान्त की सबसे बड़ी किताब है श्रीमद्भगवतगीता इसके आधार पर कर्मफल के सिध्दान्त को खूब प्रचारित किया गया। कर्म किए जा फल की चिन्ता मत कर। उल्लेखनीय है गीता को आदर्श दार्शनिक किताब के रूप में तिलक से लेकर गांधी तक सभी ने प्रधानदर्जा दिया था। गीता आज भी मध्यवर्ग की आदर्श किताब है।

उल्लेखनीय है कि बाबासाहेब आंबेडकर ने जातिप्रथा को इन तीनों विचारधारात्मक बाधाओं के दायरे बाहर निकालकर पेश किया। संभवत: बाबासाहेब अकेले बड़े स्वाधीनतासेनानी थे जिनकी कर्मफल के सिध्दान्त,पुनर्जन्म और अंधविश्वासों में आस्था नहीं थी। यदि इन तीनों चीजों में आस्था रही होती तो अछूत समस्या को राष्ट्रीय समस्या बनाना संभव ही न होता। कहने का तात्पर्य यह है अछूत समस्या से मुक्ति के लिए, जातिप्रथा से मुक्ति के लिए चार प्रमुख कार्य किए जाने चाहिए।

पहला- अंधविश्वासों के खिलाफ जंग।

दूसरा- पुनर्जन्म की धारणा के खिलाफ जनजागरण।

तीसरा- कर्मफल के सिध्दान्त के खिलाफ सचेतनता।

चौथा- अछूत जातियों के साथ रोटी-बेटी के संबंध और पक्की दोस्ती।

ये चारों कार्यभार एक-दूसरे से अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक को भी त्यागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है शिक्षा ,नौकरी अथवा आरक्षण मात्र से अछूत समस्या का समाधान संभव नहीं है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए आमलोगों में खासकर दलितों में विज्ञानसम्मत चेतना का प्रसार करना बेहद जरूरी है। विज्ञानसम्मतचेतना के अभाव में दलित हमेशा दलित रहेगा। उसकी दलितचेतना से मुक्ति नहीं होगी। जातिभेद कभी खत्म नहीं होगा। हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि हमारी शिक्षा हमें कितना विज्ञानसम्मत विवेक देती है ? सच यही है कि हमारी शिक्षा में कूपमंडूकता कूटकूटकर भरी पड़ी है। पैंतीस साल के शासन के वाबजूद पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में से कूपमंडूकता को पूरी तरह विदा नहीं कर पाए हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जातिप्रथा एक तरह का पुराने किस्म का सामाजिक अलगाव है। जातिप्रथा को आज नष्ट करने के लिए सामाजिक अलगाव को नष्ट करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव आज के दौर में व्यापक शक्ल में सामने आया है। हम एक-दूसरे के दुख-सुख में साझीदार नहीं बनते। कभी एक-दूसरे के बारे में खबर-सुध नहीं लेते। यही सामाजिक अलगाव पहले जातियों में भी था। खासकर निचली कही जाने वाली जातियों के प्रति सामाजिक अलगाव यकायक पैदा नहीं हुआ। बल्कि इसे पैदा होने में सैंकड़ों साल लगे। सामाजिक अलगाव को अब हमने वैधता प्रदान कर दी है। सामाजिक अलगाव को हम स्वाभाविक मानने लगे हैं। नए युग की विशेषता मानने लगे हैं। नए आधुनिक जीवन संबंधों की अनिवार्य परिणति मानने लगे हैं। सामाजिक अलगाव की अवस्था में जातिभेद और जातिघृणा बढ़ेगी। क्योंकि सामाजिक अलगाव से जातिघृणा को ऊर्जा मिलती है। यह अचानक नहीं है कि सन् 1970 के बाद के वर्षों में पूंजीवादी विकास जितना तेज गति से हुआ है। सामाजिक अलगाव में भी इजाफा हुआ है। जाति संगठनों में भी इजाफा हुआ है। जातिघृणा और जाति संघर्ष बढ़े हैं। जातिघृणा,जातिसंघर्ष और जातिगत तनाव तब ही पैदा होते हैं जब हम अलगाव की अवस्था में होते हैं।

सामाजिक अलगाव पूंजीवादी विकास की स्वाभाविक परिणति है ,इसका सचेत रूप से प्रतिवाद किया जाना चाहिए। अचेत रूप से सामाजिक अलगाव को स्वीकार लेने का अर्थ है आपसी अलगाव में इजाफा। अलगाव खत्म होगा तो संगठन की महत्ताा भी समझ में आती है। सामाजिक शिरकत,सामाजिक साझेदारी, व्यक्तिगत और सामाजिक भावनात्मक विनिमय और आर्थिक सहयोग ये चीजें जितनी बढ़ेंगी उतनी ही भेद की दीवार गिरेगी।

हमें सोचना चाहिए आरक्षण किया,संविधान में संरक्षण दिया, तमाम किस्म के कानून बनाए,सभी दल इन कानूनों के प्रति वचनबध्द हैं,इसके बावजूद जाति उत्पीड़न थमने का नाम नहीं लेरहा। एससी,एसटी का अलगाव कम नहीं हो रहा। उनकी असुरक्षा की भावना कम नहीं हो रही। इस प्रसंग में पश्चिम बंगाल के उदाहरण से समझाना चाहूँगा।यहां पर जातियाँ हैं। जातिभेद भी है। किंतु निचले स्तर पर कम्युनिस्ट पार्टियों के संगठनों का तंत्र इस कदर फैला हुआ है कि आप उसकी परिधि के बाहर जा नहीं सकते। यह तंत्र सामाजिक संपर्क,सामाजिक संबंध और आपसी भाईचारा बनाए रखने और विनिमय का काम करता है। इसका सुफल यह निकला है कि आमलोगों में अभी शिरकत और सहयोग का भाव बचा हुआ है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख में सहयोग करते हैं। यही वजह है पश्चिम बंगाल में जातिगत तनाव और जाति संघर्ष नहीं हैं।

जबकि सच यह है आरक्षण यहां कम लागू हुआ है। राजनीति में दलितों का नहीं सवर्णों का बोलवाला है। इसके बावजूद जातिसंघर्ष नहीं हैं। यथासंभव निचली जातियों को जमीन का हिस्सा भी मिला है। संगठन के कारण उनकी आवाज सुनी भी जाती है। इसके कारण उत्पीडन करने की हिम्मत नहीं होती। आंबेडकर ने स्वयं संगठन को महत्ता दी थी, संगठन के तौर पर आदर्श सांगठनिक संरचना कम्युनिस्टों के पास है। मुश्किल यहां से शुरू होती है। कम्युनिस्ट कतारें अभी भी उपरोक्त तीन विचारधारात्मक बाधाओं को नष्ट नहीं कर पायी हैं। अभी भी कम्युनिस्ट कतारों में अंधविश्वासों में आस्था रखने वाले, पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले,कर्मफल के सिध्दान्त में विश्वास करने वाले बचे हुए हैं। किंतु इनकी संख्या में तुलनात्मक तौर पर गिरावट आयी है।

किंतु एक चीज जरूर हुई है कि जातिभेद का जितना प्रत्यक्ष तांडव देश के अन्य इलाकों में नजर आता है वैसा यहां नजर नहीं आता। इसका प्रधान कारण है सामाजिक रूप से कम्युनिस्ट संगठनों का सामाजिक संरचनाओं में घुलामिला रहना। आंबेडकर के इस विचार को कि जातिप्रथा को नष्ट करने के लिए जरूरी है कि शूद्रों और गैर शूद्रों में रोटी-बेटी के संबंध हों। यही चीज कमोबेश पश्चिम बंगाल में लागू करने में वामपंथियों को सफलता मिली है। इस अर्थ में वे इस राज्य में सामाजिक क्रांति में एककदम आगे जा पाए हैं। दूसरी बात यह है कि दलितों पर उत्पीडन की घटनाएं इस राज्य में कम से कम होती हैं। यदि कभी दलित उत्पीड़न की कोई घटना प्रकाश में आती है तो प्रशासन से लेकर राजनीतिक स्तर तक ,यहां तक कि मध्यवर्गीय कतारों में भी उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया होती है। यह इस बात का संकेत है कि सामाजिक संवेदनशीलता अभी बची हुई है। अन्य राज्यों में स्थिति बेहद खराब है।

जिस राज्य में दलित मुख्यमंत्री हो,दलित पार्टी का शासन हो,वहां दलित उत्पीडन की घटनाएं रोजमर्रा की बात हो गयी हैं। इन घटनाओं के प्रति आम जनता में संवेदनशीलता कहीं पर भी नजर नहीं आती। क्योंकि उन राज्यों में सामाजिक अलगाव को कम करने का कोई भी प्रयास राजनीतिक दल नहीं करते। बल्कि राजनीतिक लाभ और क्षुद्र सांगठनिक लाभ हेतु सामाजिक अलगाव का इस्तेमाल करते हैं।

एक वाक्य में कहें तो उत्तरप्रदेश,बिहार आदि राज्यों में जातिदलों ने सामाजिक अलगाव को अपनी राजनीतिक पूंजी में तब्दील कर दिया है। वे सामाजिक अलगाव का निहितस्वार्थी लक्ष्यों को अर्जित करने के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। इससे जातिसंघर्ष बढ़े हैं। सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है। सामाजिक अस्थिरता बढ़ी है। अछूत समस्या बढ़ी है। अछूत समस्या को खत्म करने के लिए सामाजिक अलगाव को खत्म करना बेहद जरूरी है। सामाजिक अलगाव का राजनीतिक दुरूपयोग बंद करना जरूरी है।

दलित का राजनीतिक दुरूपयोग सामाजिक टकराव और तनावों को बनाए रखता है और विगत साठ सालों में हमारे विभिन्न राजनीतिक दलों ने दलित समस्या के समाधान के नाम पर यही किया है। उनके लिए दलित मनुष्य नहीं है बल्कि वोट है। एक अमूर्त पहचान है। बेजान चीज है। सत्ताा का स्रोत है। यही दलित की आयरनी भी है। अब हम दलित को मनुष्य के तौर पर नहीं वोटबैंक के तौर पर जानते हैं। आरक्षण के नाम से जानते हैं। वोटबैंक और आरक्षण में दलित की पहचान का रूपान्तरण दलित को वर्चुअल बना देता है। दलित का वर्चुअल बनना मूलत: मध्यकाल में लौटना है। वर्चुअल बनने के बाद दलित और भी दुर्लभ हो गया है। हमें दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल बनने का अर्थ है वह है भी और नहीं भी। वर्चुअल दलित मायावती जैसे नेताओं की पूंजी है। ये दोनों एक-दूसरे के चौखटे में फिट बैठते हैं। मायावती के यहां दलित वर्चुअल है। ठोस हाड़मांस का इन्सान नहीं है। यही वजह है दलित की किसी भी समस्या को ठोस रूप में मायावती अपने चुनावी घोषणापत्र में व्यक्त नहीं करती। बल्कि यह कहना सही होगा कि मायावती स्वयं वर्चुअल है। उसने कोई भी ठोस चुनावी घोषणापत्र भी जारी नहीं किया। यही हाल दलितों के मसीहा लालू-मुलायम का है। ये दलितों के हैं और दलितों के नहीं भी हैं। दलित इनके यहां वर्चुअल है और दलित के लिए ये वर्चुअल हैं। कहने का तात्पर्य यह है दलित को वर्चुअल होने से बचाना होगा। दलित के वर्चुअल होने का अर्थ है दलित का लोप । यह एक तरह से बेहद त्रासद और भयावह है।





































बुधवार, 20 अप्रैल 2011

टेलीविजन युग में बुद्ध ब्राँण्ड का पराभव



पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बारे में बांग्ला चैनलों से लेकर राष्ट्रीय चैनलों तक विभिन्न सर्वेक्षणों में अनुमान व्यक्त किया गया है कि तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस के मोर्चे को 182 सीट से लेकर 231 तक सीटें मिल सकती हैं। जबकि वाम मोर्चे को 102 से 125 सीट मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है। वहीं दूसरी ओर माकपा नेताओं का दावा है कि उन्हें 160 सीटें मिलेंगी। लेकिन पश्चिम बंगाल का इसबार का विधानसभा चुनाव वाम के प्रति असंतोष के और गहरा होने की ओर संकेत कर रहा है। उल्लेखनीय है रेलमंत्री ममता बनर्जी का आज जितना विशाल कद नजर आ रहा है उसमें बांग्ला टेलीविजन चैनलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ममता की राजनीति को सकारात्मक और प्रभावी बनाने में इस माध्यम ने जो जमीनी असर पैदा किया है वह काबिलेगौर है। मजेदार बात यह है कि 2006 में बांग्ला चैनलों ने बुद्ध ब्राँण्ड की जमकर मार्केटिंग की और वाम मोर्चा तीन-चौथाई सीटें जीत गया। उस समय ममता बनर्जी टीवी के खेल में पिछड़ गयी थीं,लेकिन कुछ समय बाद ममता ने सही रणनीति अपनायी और राजनीतिक एक्शन और टेलीविजन का ऐसा सुंदर गठजोड़ तैयार किया कि ब्राँण्ड बुद्ध को अप्रासंगिक बना दिया। वाममोर्चा भूल गया कि आज के युग का सबसे बड़ा प्रचारक है टेलीविजन । पार्टी संगठन नहीं। टेलीविजन ने प्रचार के सभी पुराने तंत्रों और रूपों को अपने अंदर समेट लिया है अथवा अपनी संगति में विकसित करने पर जोर दिया है जो माध्यम ऐसा नहीं कर पाता उसे टेलीविजन निगल जाता है।टेलीविजन आधुनिकयुग का डायनासोर है। यह सबको खा सकता है इसे कोई नहीं खा सकता। पुरानी भाषा में कहें तो टेलीविजन अजर,अमर और अबध्य है। इस पर कोई सवारी नहीं कर सकता बल्कि यही सबके ऊपर सवारी करता है। टेलीविजन परवर्ती पूंजीवाद की चालकशक्ति है। सभी किस्म के प्रचार अभियान और विचारधारा विमर्श का मूल स्रोत है। चैनल खोलकर,चैनलों का स्वामित्व अपने पास रखकर टेलीविजन को माकपा वाले इसे अपने पक्ष में नचा नहीं सकते। टेलीविजन का मालिक कोई भी हो इसे मालिक नहीं नचाता बल्कि टेलीविजन सबको नचाता है। टेलीविजन में अंतर्वस्तु का महत्व नहीं है 'फ्लो' और 'प्रक्रिया' का महत्व है। ये दोनों तत्व टेलीविजन को सर्वोपरि स्थान दिलाते हैं।


टेलीविजन माध्यमों में से एक माध्यम नहीं है, यह विभिन्न माध्यमों के साथ सामंजस्य नहीं बिठाता बल्कि माध्यमों के बीच में जो सामंजस्य है उसे अस्वीकार करता है और अपना वर्चस्व स्थापित करता है। टेलीविजन के आने के बाद अन्य माध्यम उसके साथ संगति बिठाने को मजबूर होते हैं और टेलीविजन से ग्रहण करते हैं। जो माध्यम टेलीविजन से सीखने को तैयार नहीं होते वे हाशिए पर पहुँच जाते हैं। यही वह बिंदु है जहां पर माकपा की सारी मशीनरी और प्रौपेगैण्डा हार रहा है।परंपरागत संचार अथवा संगठन का संप्रेषण तब ही प्रभावी होता है जब जनता और संगठन के बीच में संवाद हो। विगत कई सालों से ग्रामीण जनता के साथ माकपा का संवाद टूट चुका है। पश्चिम बंगाल में तकरीबन पचास फीसद मतदाता हैं जो माकपा के साथ किसी भी किस्म का संवाद नहीं करते और वे निरंतर माकपा और वाममोर्चे के खिलाफ वोट देते रहे हैं। यह अंतराल विगत पांच सालों में और भी बढ़ा है।

पंचायत से लेकर शहरी अंचलों तक, शहरी दफ्तरों से लेकर गली-मुहल्लों तक माकपा का आम जनता से संवाद टूटा है। माकपा के खिलाफ आम जनता का अलगाव बढ़ा है। इसमें टीवी संस्कृति की बड़ी भूमिका है। मसलन् ,सन् 2006 के विधानसभा चुनावों में तकरीबन 136 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों को वाममोर्चे की तुलना में ज्यादा वोट प्राप्त हुए थे। इन दोनों दलों में मत विभाजन था और उस विभाजन के कारण वाममोर्चे को अपनी तथाकथित दो-तिहाई जीत को हासिल करने का मौका मिल गया। यदि इन दोनों दलों में समझौता रहा होता तो सन् 2006 में ही वाममोर्चे की पोल खुल जाती।


पन्द्रहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीट समझौता था उसके कारण वोटों का विभाजन नहीं हो पाया और वामविरोधी विधानसभा सीटों की संख्या 196 के ऊपर पहुँच गयी। यानी सन् 2006 से 2009 के बीच में तकरीबन साठ से ज्यादा सीटों पर वामपंथी दल अपने विरोधियों से पिछड़ गए। इस बीच पंचायतों के चुनाव हुए और उनमें वाममोर्चे को बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा। आधे के करीब पंचायत सीटों पर वामविरोधी प्रत्याशियों की जीत हुई और यह आंकड़ा स्वयं में इस बात का संकेत था कि वाममोर्चे का ग्रामीण जनता और शहरी जनता के बीच संपर्क,संवाद और संबंध टूट चुका है। सन् 2006 के विधानसभा चुनाव में वाममोर्चे को जितने वोट मिले थे उनमें पंचायत चुनावों के समय पांच फीसद तक की गिरावट दर्ज की गयी और सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में वाम मतों में गिरावट का प्रतिशत पांच प्रतिशत से बढ़कर आठ प्रतिशत के पार चला गया।
इस प्रसंग में पहली बात यह कि पश्चिम बंगाल को वाम का पर्याय नहीं समझना चाहिए। वामपंथ की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उसने राज्य मशीनरी की स्वायत्तता खत्म करके उसे पार्टी तंत्र के मातहत बना दिया। अब यह तानाबाना असहनीय हो चुका है और जनता में जागरूकता और साहस का संचार हुआ है । इसके बावजूद पार्टीतंत्र का तानाबाना वर्चस्व बनाए हुए है। यह वर्चस्व धीरे-धीरे ही खत्म होगा। मार्क्सवाद की प्रासंगिकता और प्रतिवाद की राजनीति की प्रासंगिकता माकपा के पराभव के बाद भी बनी रहेगी। माकपा यदि अपने को दुरूस्त करती है तो निश्चित रूप से आम जनता में पुन: अपना खोया विश्वास प्राप्त कर सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है पार्टी की ओट में बनाए गए असंवैधानिक तंत्र को पूरी तरह नष्ट किया जाए। इस तंत्र को नष्ट किए बिना माकपा को पहले जैसी जनप्रियता शायद कभी न मिले। पश्चिम बंगाल में विगत पैंतीस सालों के शासनकाल में माकपा अथवा वाममोर्चे ने अपना एक भी नया कार्यक्रम प्रशासन के जरिए लागू नहीं किया है। वाममोर्चे ने जितने भी कार्यक्रम लागू किए हैं वे किसी न किसी समय अन्य दल के बनाए थे। कांग्रेस के बनाए बुर्जुआ कार्यक्रम थे। इन्हीं कार्यक्रमों में भूमि सुधार और वितरण, साक्षरता ,पंचायत व्यवस्था, पंचवर्षीय योजना ,राष्ट्रीयकरण, सार्वजनिक क्षेत्र, ग्रामीण विकास रोजगार योजना, वीपीएल कार्ड योजना, प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना ,नरेगा आदि आते हैं। सवाल यह है कि जब बुर्जुआजी के कार्यक्रमों को ही लागू करना है तो क्रांति का पाखंड क्यों ? क्यों नहीं बुर्जुआ व्यवस्था की संगति में आज तक माकपा अपना राजनीतिक कार्यक्रम बना पायी ? क्या बुर्जुआ कार्यक्रम लागू करके क्रांतिकारी इमेज बनाना संभव है ? ब्राँण्ड बुद्ध की अप्रासंगिकता की यही जड़ है।


























बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

फिल्मी संगीत का नया पैराडाइम


 संगीत और समाज का द्वंद्वात्मक संबंध होता है। यह रिश्ता प्रभुत्व की शक्तियों और आम जनता के अंतर्विरोधों को व्यक्त करता है। प्रभुत्वशाली तबकों और वंचितों के बीच के अंतर्विरोधों का इस संबंध के विकास पर गहरा प्रभाव देखा जाता है। सामाजिक विकास की शक्तियों को किस तह नियंत्रित किया जाए ? वंचितों में दासत्वबोध और हारे हुए की भावना को कैसे निर्मित जाए ? सांस्कृतिक रूप में किस परिकल्पना के अनुकूल ढाला जाए, यही केंद्रीय चिंता लोकप्रिय संगीत में सक्रिय रहती है।
लोकप्रिय संगीत मूलत: बुर्जुआ संगीत है। आभिजात्य संगीत है। इसमें हमें फिल्मी संगीत, भक्ति संगीत, गैर-फिल्मी संगीत और पाश्चात्य संगीत ये चार तरह के संगीत
रूप मिलते हैं। संगीत के रूप जटिल और विलक्षण होते हैं। उनके बारे में सरलता का दृष्टिकोण असुविधा पैदा करता है। अंर्स्ट फिशर के शब्दों में कहें तो 'समस्त कलाओं में संगीत सबसे ज्यादा अमूर्त और रूपात्मक कला है।' संगीत पर विचार करते समय उसके रूप और किस तरह की सामाजिक अंतर्वस्तु से इसका अंतस्संबंध है, इसका विश्लेषण करना चाहिए। संगीत को संगीत के रूप में देखना रूपपरक दृष्टिकोण की ओर ले जाता है वहीं संगीत और उसकी सामाजिक अंतर्वस्तु के साथ जोड़कर देखने से संगीत के जटिल रूपों को उद्धाटित करने में मदद मिलती है।
हेगेल के शब्दों में सोचें तो 'संगीत की अंतर्वस्तु का अर्थ वही नहीं होता, जो हम दृश्यकलाओं या कविता की बात करते समझते हैं। इसमें जिस चीज का अभाव होता है, वह यही वस्तुपरक बाह्य वस्तु है, चाहे हम इसे कोई वास्तविक प्रपंच मानें, अबौध्दिक विचारों और बिंबों की वस्तुपरकता मानें।'
संगीत की अंतर्वस्तु वह अनुभव है जो व्यक्तिगत (संगीतकार का) होने के साथ-साथ सामाजिक भी होता है। वह संगीतकार के संदर्भ से जुड़ा होता है। संगीत की भूमिका समष्टिगत भावनाओं को उभारने की रही है। इसमें रचनाकार स्वचालित साहचर्यों का इस्तेमाल करता है।
लोकप्रिय फिल्मी संगीत मूलत: शहरी अर्द्धशिक्षित जनता के लोकप्रिय दृष्टिकोण को व्यक्त करता है। यह पेशेवर संगीतकारों की देन है। इसी तरह फिल्मी गीत भी पेशेवर गीतकारों की देन है। ये दोनों ही पेशेवर तबके मूलत: उच्चवर्गों पर निर्भर हैं। ये दोनों अभिजन की जन-कला के अंग हैं। यह जनता के लिए निर्मित कलारूप है। इसकी इकसार संगीतबोध पैदा करने में, माल के रूप में संगीत का बाजार तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

लोकप्रिय संगीत अत्याधुनिक माध्यम तकनीकी से निर्मित संगीत है। प्रविधि एवं प्रौद्योगिकी प्रगति से इसका गहरा संबंध है। यह संगीत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्रोत है। यह ऐसा कलारूप है जिसमें रचनाकार का प्रत्यक्ष स्पर्श महसूस नहीं होता। प्रत्यक्ष स्पर्श का यहां लोप हो जाता है। ध्यान रहे,  तकनीकी विकास का इतिहास जाने बगैर कला के इतिहास को समझना मुश्किल है। तकनीकी प्रक्रियाएं हमेशा से कलात्मक विचारों का अंतर्ग्रंथित हिस्सा ही हैं।

तकनीकी प्रगति सिर्फ आर्थिक रूप से ही लाभप्रद नहीं होती अपितु वह जनता के दैनिक जीवन, अभिरुचियों और मूल्यों का अंग रही है। अत: सामाजिक विकास के लिए तकनीकी विकास अनिवार्य शर्त है। तकनीकी विकास सामाजिक सांस्कृतिक विकास का उपकरण बने इसके लिए तकनीकी पर मास्टरी होना बेहद जरूरी है। जन-कला (मास आर्ट) के नियम कठोर, सुनिश्चित एवं अननुमेय होते हैं। लोकप्रिय संगीत-गीत पर भी यह बात लागू होती है। लोकप्रिय गीत और संगीत का निर्माता फॉर्मूलाबध्द सृजन करता है। उसके लिए जो लोकप्रिय है वह प्रासंगिक है। अगर कोई फॉर्मूला पिट चुका है तो वह कोई दूसरा फॉर्मूला खोज लेता है।

औद्योगिक जन-उत्पादन की यह विशेषता है कि उसका उत्पादक मानकीकृत और अंतर-विनिमय के तत्वों को एक जगह इकट्ठा करके वस्तु का निर्माण करता है। इसमें कम श्रम लगता है। यही स्थिति लोकप्रिय संगीत-गीत की भी है। तैयारशुदा हिस्सों या तत्वों का कम श्रम और लागत से संयोजन करके गीत या संगीत का निर्माण किया जाता है।

लोकप्रिय संगीत में फॉर्मूले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती है फॉर्मूले की पुनरावृत्ति की प्रभावशाली प्रस्तुति। पुनरावृत्ति के कारण संगीत का प्रभामंडल खंडित होता है। संगीत लोकतांत्रिाक, सहज, बोधगम्य और स्टीरियोटाइप हो जाता है। इसी क्रम में संगीत का विसंदर्भीकरण भी हो जाता है। पुनरावृत्ति के बार-बार अनुभव से गुजरने के कारण ही हमें विसंदर्भीकरण अब परेशान नहीं करता। धीरे-धीरे संदर्भरहित चिंतन के हम आदी हो जाते हैं और चीजों को अनैतिहासिक ढंग से देखने और सोचने के आदी हो जाते हैं। लोकप्रिय संगीत इस प्रक्रिया में तेजी से फैलता है, व्यवसाय करता है, अतिरिक्त मांग पैदा करता है और उन्माद की हद तक श्रोताओं में लगाव पैदा करता है।

अतिरिक्त मांग का संबंध संगीत की नई तर्ज के साथ है। अतिरिक्त मांग जितनी ज्यादा और तीव्रता के साथ पैदा होगी उतनी ही गति के साथ नई तर्ज एवं धुन निर्मित की जाती है। इस प्रक्रिया में पुनरावृत्ति का तत्व बना रहता है। नई तर्ज के कारण ही पुनरावृत्तिा के द्वारा सृजित इकसार प्रभाव को तोड़ने में मदद मिलती है। इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि सिनेमा संगीत गतिशील होता है। इसके विपरीत अगतिशीलता और निर्वैयक्तिक कारीगरी यहां हावी रहती है। बौध्दिक रूप से यह जड़ एवं स्वतंत्रतारहित होता है। यह तयशुदा परिवेश के साथ संवाद करता है। इसी अर्थ में इसमें शिक्षित
करने की क्षमता नहीं है। व्यक्तित्व रूपांतरण करने में सफल नहीं होता।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

कोपेनहेगन में मनुष्य का भविष्य दांव पर लगा था - अरुण माहेश्वरी

धरती की जलवायु पर कोपेनहेगन सम्मेलन (7–18 दिसंबर ’09) खत्म होगया। सम्मेलन के अंदर और बाहर, सभी जगह बेहिसाब उत्तेजना रही। उत्तेजना के मूल में यह चिंता थी कि इस पृथ्वी ग्रह को बचाने का आखिरी मौका है। अब न चेता गया तो पृथ्वी और उसपर मनुष्य मात्र के अस्तित्व पर खतरा है।

इसके बावजूद, अमेरिका, चीन, भारत, ब्राजील, जर्मनी, फ्रांस आदि आज की दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले देशों के राष्ट्राध्यक्ष घंटों सर खपाते रह गये, लेकिन जिसे सख्ती के साथ सारी दुनिया पर लागू किया जा सके, ऐसी वैद्यानिक बाध्यता वाला कोई नतीजा सामने नही आया। 

निष्कर्ष के तौर पर जिस समझौते की घोषणा की गयी, वह पर्यावरण को बचाने के बारे में एक सामान्य प्रकार की प्रतिबद्धता के अलावा और कुछ नहीं था। धरती के तापमान को और 2 डिग्री सेंटीग्रेट से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया जाना चाहिए, धनी देश अपने ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कटौती करेंगे, विकासशील देश अपने उत्सर्जन पर नियंत्रण करेंगे और गरीब देशों को मौसम में परिवर्तन से निपटने के लिये आर्थिक सहायता दी जायेगी इस तरह की कुछ सामान्य प्रतिश्रुतियों के अलावा वनसंरक्षण और ग्रीन तकनीक के महत्व की बातें इस समझौते में कही गयी है।

 जो लोग इस सम्मेलन को पूरी तरह से विफल बताते हैं, उनके मंतव्य पर टाईमपत्रिका का कहना है कि यह कोरा सरलीकरणहै। उसके टिप्पणीकार के अनुसार विवादों का होना ही इस सम्मेलन का होना है। कोपेनहेगन में समझौते पर पहुंचने के लिये किया गया संघर्ष ही यह बताता है कि मौसम संबंधी नीति अब जाकर परिपक्व हुई है। 

कोपेनहेगन में चली वार्ता इतने विवादों से भरी हुई इसलिये थी क्योंकि इसके प्रस्तावों का वास्तविक असर सिफ‍र् पर्यावरण पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थ– व्यवस्थाओं पर पड़ेगा। चीन और अमेरिका ने वार्ता के लिये अपने राष्ट्राध्यक्षों को भेजा और सिफ‍र् इसलिये काफी फूंक फूंक कर कदम रखे क्योंकि इसमें उन्हें कुछ खोना था।
संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पर्यावरण सम्मेलनों का सिलसिला 1972 से शुरू होगया था। कोपेनहेगन सम्मेलन 15वां सम्मेलन था। 1997 में जापान के क्योटो में तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर अंकुश लगाये जाने के बारे में दुनिया के देशों के बीच बाकायदा एक समझौता हुआ था, जिसे 2005 के फरवरी से कानूनन लागू कर दिये जाने की बात थी। उस समझौते पर दुनिया के 141 देशों ने हस्ताक्षर किये थे तथा सबने अपनी राष्ट्रीय सभाओं से उन पर मोहर भी लगवा ली थी। लेकिन अकेले अमेरिका की सीनेट ने उसे स्वीकार नहीं किया और वह पूरा समझौता अधर में लटक कर रह गया। 

क्योटो संधि के अनुसार सात वर्ष के अंदर दुनिया के विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 1990 के स्तर से 5 प्रतिशत कटौती करनी थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने उस पर हस्ताक्षर किये थे। लेकिन 2001 में अमेरिका के नये राष्ट्रपति जार्ज बुश ने इस संधि को यह कह कर ठुकरा दिया कि यह एक बेहद महंगा मामला है। परवर्ती दिनों में व्हाइट हाउस ने ग्लोबल वार्मिंग के बारे मे वैज्ञानिकों के आकलन पर ही सवाल उठाना शुरू कर दिया और कहा जाने लगा  कि यदि अमेरिका इस संधि को मान लेता है तो उससे सारी दुनिया में करोड़ों लोगों के रोजगार छिन जायेंगे।

प्रश्न जहां इस पृथ्वी और उसपर मनुष्यमात्र के अस्तित्व से जुड़ा हुआ हो, वहां भी राष्ट्रों के खोनेपाने का स्वार्थी हिसाब किया जा रहा है, इसे देख कर बहुतों को आश्चर्य हो सकता है। लेकिन वैश्विकचिंताओं वाले इस युग की सबसे बड़ी सचाई यही है। इससे साफ है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण का सवाल सिफ‍र् प्राकृतिक विज्ञान की किसी एक शाखा और उसके विशेषज्ञों का सवाल नहीं है, जैसा कि इस बीच तैयार होगयी पेशेवर पर्यावरण विशेषज्ञों की एक बड़ी सी फौज बताना चाहती है, बल्कि उससे बहुत आगे पूरे सभ्यता विमर्श से जुड़ा हुआ एक व्यापक सामाजिकआर्थिक सवाल है।

कोपेनहेगन में भी इस सच के अहसास की झलक दिखाई दी थी। इसका प्रमाण अखबारों की रिपोर्टों से पता चलता है कि वहां इका हुए गैरसरकारी प्रतिनिधियों के बीच गांधीजी के प्रति बड़ा आग्रह था और सम्मेलन स्थल के बाहर ही गांधीजी की एक बड़ी सी तस्वीर भी लगी हुई थी। आज के काल में पर्यावरण के संदर्भ में गांधीजी का स्मरण अनायास नहीं है। 

यह साल गांधीजी की पुस्तक हिंद स्वराजकी शताब्दी का साल है और हिंद स्वराजको आधुनिक सभ्यता के खिलाफ तीव्र घृणा से भरा एक जोरदार अभियोग पत्र कहा जा सकता है। इसमें मौजूदा पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता को अधर्म’, ‘शैतानी राज्य’, ‘कलियुग’, ‘नाशकारीऔर नाशवानक्याक्या नहीं कहा गया है। यह ऐसी सभ्यता है कि इसकी लपेट में पड़े हुए लोग अपनी ही सुलगाई आग में जल मरेंगे। इस सभ्यता के प्रतीक रेलगाड़ी, वकील और डाक्टर पर गांधीजी का आरोप था कि भारत को रेलगाडि़यों, वकीलों और डाक्टरों ने कंगाल बना दिया है।

गांधीजी ने इस सभ्यता को बुरी तरह कोसा था, 1909 के बाद से लेकर आजादी के पहले तक वे अपने उन विचारों में किसी परिवर्तन के पक्ष में नहीं थे, लेकिन इतिहास इस बात का भी गवाह है कि खुद अपनी देखरेख में उन्होंने कांग्रेस के मंच से भारत के भावी विकास की जिन तमाम योजनाओं को अनुमोदित किया, वे रेल की पटरियों को उखाड़ फेंकने या अदालतों को खत्म कर देने और आधुनिक चिकित्सा को ठुकराने की योजनाएं नहीं थी। 

अगर गहराई से देखे तो पता चलेगा कि गांधीजी की आधुनिक वर्तमान की त्रासदियों की पहचान और उसे अधर्म बताना उनके असहयोगकी तरह ही उनका नकारथा, विकल्प नहीं। किसी भी बात को अस्वीकार करना भी उतना ही बड़ा आदर्श हो सकता है जितना किसी बात को स्वीकार करना...उपनिषदों के रचयिताओं ने ब्रा का सबसे अच्छा वर्णन नेतिनेतिकहकर ही किया है।  
असहयोग के बारे में रवीन्द्रनाथ की आपत्तियों पर बहस करते हुए गांधीजी का यही मूल जवाब था। 

उनके विपरीत रवीन्द्रनाथ का सारा बल इस बात पर था कि मनुष्य के अंत:करण का धर्म यही है कि वह परिश्रम से केवल सफलता ही नहीं बल्कि आनंद भी प्राप्त करता है। ...यदि कुछ लोग कहें, यह पत्थर का फलक हमारे दादापरदादाओं का हथियार है, इसको यदि हम छोड़ दें तो हमारी जाति नष्ट हो जायेगी तो जिसको वे जातिरक्षाकहते हैं वह संभव हो भी सकती है लेकिन वे मानवता की महान परंपरा को आघात पहंुचाते हैं जो उनकी भी है। जो लोग आज भी पत्थर के फलक से संतुष्ट हैं उनको मनुष्य ने जाति से बाहर कर दिया है वे जंगलों में छिपकर जीवन व्यतीत करते हैं।
इसीलिये मसला गांधीजी के इस नकारको सत्य मानने का नहीं है, उसकी अन्तरदृष्टि को समझने और आत्मसात करने का है। गांधीजी ने वर्तमान की त्रासदी की लाक्षणिक पहचान की और उसकी बुराइयों की निंदा में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन इस त्रासदी की बुनियाद में पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के जरिये सक्रिय जो लोभलालच काम कर रहा है, जो रवीन्द्रनाथ के संधानशील मानवीय अंत:करण को, विज्ञान भी जिसकी एक अभिव्यक्ति है, नगदकौड़ी की सेवा में नियुक्त किये हुए है, गांधीजी उसके प्रति कभी उतने निर्मम और कठोर नहीं हो पाये।

प्रकृति के साथ मनुष्य के व्यवहार को मनुष्य के साथ मनुष्य के व्यवहार से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जिस समाज में उत्पादन के साधनों से विच्छिन्न मनुष्य की श्रम शक्ति एक बिकाऊ माल होती है, प्रकृति को अपना दास मानना और उसका अधिक से अधिक पण्यीकरण भी उसी समाज की मूल प्रवृत्ति है। 

श्रम की तरह ही प्रकृति संपदा का एक प्रमुख स्रोत है। पूंजीवादी अर्थनीतिशास्त्र उसे मुफ्त की चीज नहीं मानता। और, कहना न होगा, पूरी समाज व्यवस्था प्रकृति तथा श्रम, इन दोनों की ही अबाध लूट को बदस्तूर कायम रखने के समूचे तामझाम के अलावा और कुछ नहीं है। श्रम ही सारी संपदा का श्रोत हैक्लासिकल अर्थशास्त्र के इस कथन को मार्क्‍स एक दुरभिसंधिमूलक कथन मानते थे। उनके शब्दों में पूंजीपति अगर झूठे ही श्रम पर अलौकिक सृजन शक्ति का आरोप करते हैं तो वे ऐसा सकारण करते हैं, क्योंकि ठीक इसी बात से कि श्रम प्रकृति पर निर्भर करता है, यह बात पैदा होती है कि जिस मनुष्य के पास अपनी श्रमशक्ति के अलावा और कोई संपत्ति नहीं है, उसे समाज और संस्कृति की सभी अवस्थाओं में उन दूसरे मनुष्यों का दास होना पड़ेगा, जिन्होंने अपने को श्रम की भौतिक परिस्थितियों का मालिक बना लिया है।

मार्क्‍स के साम्यवादी समाज का श्रमजीवी मनुष्य एक सहचर मजदूरहै। वह प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका साझीदार है। समाजवादी समाज का योजनाबद्ध विकास मुनाफे की किसी अंधी दौड़ पर नहीं, प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य पर टिका होता है।

 मजदूर वर्ग की मुक्ति का आह्वान करने वाले मार्क्‍स को थामस मुंजर का यह कथन बहुत प्रिय था कि सभी प्राणियों को संपत्ति में तब्दील कर दिया गया है, जल में मछली को, हवा में पक्षी को, धरती पर पौधों को सभी जीवित चीजों को मुक्त किया जाए।

जलवायु और पर्यावरण की तरह के प्रश्नों के टिकाऊ समाधान के लिये मानव समाज और प्रकृति के संबंधों की एक ऐसी अविभाज्य दृष्टि के विस्तार की जरूरत है। पर्यावरण की लड़ाई पूंजीवाद के खात्मे की लड़ाई से जुड़ी हुई है।

रविवार, 12 जुलाई 2009

देरि‍दा और मार्क्‍सवाद

मार्क्‍सवाद सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है।दुनिया को बदलने का विश्व दृष्टिकोण है। जो भी विचार और धारणाएं बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में मदद कर सकती हैं उनको आत्मसात् करना प्रत्येक मार्क्‍सवादी चिंतक का कार्य है।स्वयं मार्क्‍स-एंगेल्स ने अपने समकालीन और पूर्ववर्ती गैर -मार्क्‍सवादी विचारकों, सिध्दान्तकारों, अर्थशास्त्रियों से ऐसा काफी कुछ ग्रहण किया है जो दार्शनिक धरातल पर मार्क्‍सवाद के करीब नहीं आते थे। उनके यहां गैर-मार्क्‍सवादी परिभाषिक शब्दावली का प्रयोग होता था। किंतु परवर्ती मार्क्‍सवादी आलोचकों ,सिध्दान्तकारों ने इस रवैयये का तकरीबन त्याग ही कर दिया।
मार्क्‍सवाद को सांस्थानिक रूप देने के चक्कर में मार्क्‍सवाद की बुनियादी धारणाएं, तयशुदा पारिभाषिक शब्दावली में कुछ इस कदर पेश की गईं कि गोया मार्क्‍सवाद में नया या मौलिक कुछ भी जोड़ने की जरूरत ही नहीं है। मार्क्‍स -एंगेल्स ने जिन धारणाओं को बना दिया वे सब अपरिवर्तनीय हैं। मार्क्‍सवादी आलोचकों के एक तबके ने मार्क्‍सवाद का टीकाशास्त्र तैयार किया।चूंकि मूलशास्त्र मार्क्‍स-एंगेल्स बना गए थे अत: उसे बदलने की जरूरत या उसमें नए के समावेश की संभावनाएं तकरीबन खत्म कर दी गईं।जिसने भी मार्क्‍सवादी शब्दावली से भिन्न शब्दावली में अपने को व्यक्त किया उसे झटककर मार्क्‍सवाद के दायरे के बाहर कर दिया गया।इस तरह के रवैयये का मार्क्‍सवाद से कम कठमुल्ले मार्क्‍सवाद से ज्यादा संबंध है।अथवा इस तरह का मार्क्‍सवादी रवैयया तब ही पैदा होता है जब आप मार्क्‍सवाद को राजसत्ता के साथ नत्थी कर दें।मार्क्‍सवाद को पावर के गेम में शामिल कर दें।
मार्क्‍सवाद जड़ सैध्दान्तिकी नहीं है।यह वर्चस्व का नजरिया नही है।इसकी भाषा, अवधारणाएं, परिवर्तन के औजार सब कुछ देशज परिवर्तनकामी राजनीतिक परंपरा की अवस्था पर निर्भर हैं।मार्क्‍सवाद में सामाजिक परिवर्तन के प्रति जिस तरह का आग्रह है उसके कारण वह अन्य से सीखने,आत्मसात् करने,अपने को समृध्द करने में गहरी दिलचस्पी लेता है।वह समाज के प्रति जितना आलोचनात्मक है उतना ही स्वयं के प्रति भी आलोचनात्मक रूख व्यक्त करता है। आलोचना और आत्मालोचना इसके दो बड़े अस्त्र हैं। मार्क्‍सवादी आलोचना की खूबी यह है कि यह जितना सिखाती है उससे ज्यादा सीखती भी है।
सवाल यह है कि देरि‍दा के साथ मार्क्‍सवाद की क्या कोई पटरी बैठ सकती है ? इस संदर्भ में पहली बात यह है कि देरि‍दा के पास बुनियादी सामाजिक परिवर्तन का कोई खाका या सैध्दान्तिक दृष्टिकोण नहीं है।सामाजिक परिवर्तन के स्पष्ट कार्यक्रम के आधार के अभाव में देरि‍दा अंतत: पूंजीपतिवर्ग के सफल पैरोकार बनकर रह जाते हैं।
सामाजिक परिवर्तन के कुछ बुनियादी नियम हैं जिन्हें देरि‍दा स्वीकार नहीं करते।कुछ बुनियादी कोटियां हैं जिन्हें देरि‍दा स्वीकार नहीं करते।देरि‍दा के पास इसके अलावा बहुत कुछ ऐसा है जिससे सीखा जा सकता है।किंतु यदि कोई यह कहे कि देरि‍दा के पास सामाजिक परिवर्तन का सैध्दान्तिक नजरिया है तो यह सिर्फ भ्रम है।देरि‍दा पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म नहीं करना चाहते थे।इस सीमा के बावजूद देरि‍दा इस युग के बड़े दार्शनिक विचारक थे।'व्याख्या' और 'विश्लेषण' की पध्दति के महान पंडित थे।
देरि‍दा और मार्क्‍सवाद में बुनियादी फर्क यह है कि देरि‍दा 'व्याख्या के लिए व्याख्या' की पध्दति का सहारा लेते हैं जबकि मार्क्‍स-एंगेल्स ने बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के लिए विश्लेषण का सहारा लिया।सवाल व्याख्या का नहीं है सवाल है दुनिया को बदलने का।देरि‍दा जिस पूंजीवादी दुनिया की आलोचना करते हैं उसको बुनियादी तौर पर बदलना नहीं चाहते।वे पूंजीवादी दुनिया के काले धब्बों को सिर्फ साफ करना चाहते हैं।वे इस क्रम में परिवर्तकारी के रूप में नहीं सिर्फ धोबी के रूप में सामने आता है।धोबी की मूल चिन्ता यह है कि गंदे कपड़े को धोकर जहां तक संभव हो साफ-सुथरा कर दिया जाए।
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों में समाजवाद के पराभव के बाद एकसिरे से सारी दुनिया में मार्क्‍सवाद और समाजवाद की मौत पर जश्न मनाए जा रहे थे। इन विजयोल्लास के क्षणों में मार्क्‍सवाद को जोर-शोर के साथ चीख-चीखकर अप्रासंगिक घोषित करने की मुहिम भी तेज हो गई। समाजवाद के पक्षधरों में निराशा छा गई।ऐसे में 1994 में उनका एक व्याख्यान 'मार्क्‍स के प्रेत' शीर्षक से सामने आया। इसे 'पहल' पत्रिका (अक्टूबर,नवम्बर,दिसम्बर 1994)ने प्रकाशित किया। साथ ही प्रसिध्द मार्क्‍सवादी आलोचक एजाज अहमद का लेख ' मेल बनाते देरिदा :'मार्क्‍स के प्रेत' और विखण्डनवादी राजनीति'' भी प्रकाशित किया । मजेदार बात यह है कि देरि‍दा और एजाज अहमद अपने-अपने कारणों से समाजवाद के पराभव का विश्लेषण पेश नहीं करते।
देरि‍दा एक आस्थावान संत की भाषा में मार्क्‍सवाद के प्रति अपनी आस्था अस्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हैं।मार्क्‍सवाद की विरासत से जुड़ने की बात कहते हैं। किंतु समाजवाद के पराभव की ठोस मीमांसा पेश नहीं करते। वहीं दूसरी ओर देरि‍दा के मार्क्‍सवाद के प्रति सम्पूर्ण रवैयये को एजाज अहमद सवालों के दायरे में खड़ा करते हैं। देरि‍दा की तीखी आलोचना करते हैं। किंतु समाजवादी व्यवस्था के पराभव के कारणों को पेश नहीं करते। मार्क्‍सवाद प्रासंगिक है या अप्रासंगिक है ?उसका भविष्य में स्वरूप क्या होगा ?इन दोनों सवालों के बारे में सही रूख इस बात पर निर्भर करता है कि समाजवादी समाजों के पराभव के कारणों को मार्क्‍सवादी कितनी सच्चाई के साथ रेखांकित करते हैं।पराभव के अनुभवों से क्या सीखते हैं ?मार्क्‍सवाद संबंधी समूचे प्रपंच में यह तथ्य ध्यान रखना चाहिए कि मार्क्‍सवादी विचारकों के पास जितनी बेहतर विश्लेषण बुध्दि है। तार्किक ढ़ंग से समझाने का जो कौशल है वह अन्यत्र दुर्लभ है।मौजूदा दौर में मार्क्‍सवाद के नजरिए से समाजवादी व्यवस्था के भावी स्वरूप की क्या कोई परिकल्पना मार्क्‍सवादी विचारकों के पास है ?क्या समाजवाद के पराभव के बाद मार्क्‍सवाद का वहीं स्वरूप रह गया है जो पराभव के पहले था ?क्या समाजवादी व्यवस्था की परिकल्पना वही रह गई है जो पराभव के पहले थी ?इन सवालों के बारे में देरि‍दा और एजाज अहमद अपने-अपने कारणों से चुप हैं।शायद इतना गंभीर संकट विचारकों के सामने पहले कभी नहीं आया था।समाजवादी व्यवस्था में शोषण के पुराने रूपों के खात्मे,शोषक वर्गों के समूल खात्मे के बाद समाजवादी समाजों में शोषक वर्गों का उदय एक गंभीर परिघटना है।यह ऐसी परिघटना है जो अबतक के समाजवाद के समूचे चिन्तन में कहीं पर भी नहीं मिलती।
देरि‍दा ने 'मार्क्‍स के प्रेत' शीर्षक व्याख्यान में जो बाद में ''स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्‍स' शीर्षक से पुस्तकाकार रूप में छप चुका है।देरि‍दा इस व्याख्यान में अनेक चीजों के बीच मेल बिठाने की कोशिश करते हैं।उन्हें भौतिकवाद और मार्क्‍सवाद भी चाहिए और उत्तर आधुनिक प्रपंचों के प्रति स्वीकृति भी चाहिए।देरि‍दा ऐसा करते हुए अन्तर्विरोधी तत्वों को एक ही छतरी के पीचे इकट्ठा करना चाहते हैं।वे मूलत: सर्वसंग्रहवादी की तरह रवैयया व्यक्त करते हैं।मजेदार बात यह है कि वे मार्क्‍सवाद को स्वीकृति दिलाना चाहते हैं साथ ही उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक दबावों यानी 'भिन्नता' और 'विविधता' के सांस्कृतिक विमर्श को भी स्वीकृति दिलाना चाहते हैं।वे चाहते हैं कि लोग मार्क्‍सवाद को मानें साथ ही विमर्श,नरेटिव, लैंग्वेजगेम, राईटिंग,प्रजेंट,प्रामाणिक अस्मितस,स्व पहचान आदि को भी वैधता प्रदान करें।इस तरह 'स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्‍स' में देरि‍दा ने अन्तर्विरोधी तत्वों में मेल बिठाने की असफल कोशिश की है।इस क्रम में देरि‍दा एक तरह का रहस्यवादी वातावरण तैयार करते हैं।'प्रेत की भाषा' में अतीत केबारे में रोमैंटिक बोध पैदा करते हैं।मार्क्‍सवाद और रोमैंटिक उत्तर आधुनिकतावाद के बीच संवाद पैदा करते हैं।यहां रोमैंटिक उत्तर आधुनिकतावाद से मतलब है 'लोकल नेरेटिव' के आधार पर 'मेटा नेरेटिव' को खारिज करना।जैसाकि ल्योतार ने किया है। देरि‍दा इस कृति में प्रेत के बहाने वैचारिक एकात्मकता को उभारते हैं।उसे रोमैंटिक उत्तर आधुनिकतावाद के सरोकारों से पुष्ट करना चाहते हैं।इसके माध्यम से वह संस्कृति को बनाए रखना चाहते हैं,अतीत की सांस्कृतिक एकात्मकता को बनाए रखना चाहते हैं,यथार्थ के ऊपर न्याय की तलाश करते हैं,अन्य के लिए न्याय की तलाश करते हैं।देरि‍दा का मानता है कि तब तक न्याय संभव नहीं है जब तक 'जिम्मेदारी' के सिध्दान्त की रक्षा न की जा सके।एजाज अहमद ने सही सवाल किया है कि मार्क्‍सवाद के प्रति देरि‍दा का आग्रह सोवियत और समाजवादी समाजों के विघटन के बाद क्यों पैदा हुआ ?देरि‍दा को मार्क्‍सवाद की प्रासंगिकता का अहसास इतनी देर बाद क्यों हुआ ?इसका उत्तर देरि‍दा ने कभी नहीं दिया।
देरि‍दा ने 'मार्क्‍स के प्रेत' में लिखा है ''मार्क्‍स को बार-बार न पढ़ना, चर्चा न करना हमेशा एक दोष ही कहलाएगा। यह कहने का अर्थ है कुछ अन्यों को भी पढ़ना और विद्वतापूर्ण 'पठन' तथा 'चर्चा' से परे जाना।यह उत्तरोत्तर एक दोष होगा, सैध्दान्तिक, दार्शनिक,राजनीतिक दायित्व वहन की एक असफलता।जब जडसूत्री मशीन और 'मार्क्‍सवादी' विचारधारात्मक तंत्र( राज्य,दल,प्रकोष्ठ,यूनियन तथा जड़सूत्रों के उत्पादन की अन्य स्थलियॉँ)ओझल होने की प्रक्रिया में हैं,तब हमारे पास इस दायित्व से मुँह चुराने के केवल बहाने हैं,औचित्य कोई नहीं !इसके बिना कोई भविष्य नहीं होगा:मार्क्‍स के बगैर नहीं,मार्क्‍स के बिना कोई भविष्य नहीं,मार्क्‍स की विरासत और स्मृति के बगैर:हर हाल में किसी एक मार्क्‍स ,उसकी प्रतिभा,और कम से कम उसकी एक आत्मा (की स्मृति और विरासत के बगैर)क्योंकि यह हमारा 'हाईपोथीसिस' होगा,बल्कि हमारा पूर्वाग्रह : वे एक से अधिक हैं,वे एक से अधिक होंगे।''(पहल,50-51,पृ.49)
देरीदा से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या उन्होंने मार्क्‍स को बार-बार स्मरण किया ?क्या मार्क्‍सवाद सिर्फ रीडिंग है ?क्या मार्क्‍सवाद सिर्फ दायित्वबोध है ?क्या मार्क्‍सवाद सिर्फ स्मृति है ?विरासत है ?जिस तरह के भाषा खेल के जरिए देरि‍दा मार्क्‍सवाद को पढ़ना चाहते हैं उससे मार्क्‍सवाद का भला कम देरि‍दा का भला ज्यादा होता है।
यह सारी दुनिया जानती है कि देरीदा को वे सारी चीजें पसंद नहीं हैं जो मार्क्‍स-एंगेल्स को पसंद थीं।मसलन् देरि‍दा दलीय राजनीति के पक्ष में नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की धारणा के पक्ष में नहीं हैं। यह कैसे संभव है कि कम्युनिस्ट पार्टी न हो और मार्क्‍सवाद को बचा लिया जाए या उसकी विरासत की रक्षा कर ली जाए। विरासत की रक्षा का सवाल सिर्फ रीडिंग और राईटिंग या रेटोरिक का प्रश्न नहीं है। मार्क्‍सवाद की विरासत बचाने का अर्थ यह नहीं है कि क्रांति को किताबों,विमर्शों में बंद कर दिया जाए।
क्रांति,समाजवाद,वर्ग संघर्ष,विचारधारा आदि के सवाल किताबी लेखन, सेमीनार, संगोष्ठी आदि के गर्भ से पैदा नहीं हुए।बल्कि इन धारणाओं का सामाजिक प्रक्रियाओं के गर्भ, सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के गर्भ से जन्म हुआ। देरि‍दा की मुश्किल यह है कि वे मार्क्‍सवाद को सामाजिक प्रक्रियाओं,राजनीतिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में नहीं देखते।बल्कि बार-बार यही कोशिश करते हैं कि मार्क्‍सवाद को एक विचार मात्र बना दिया जाए।वे तर्क और आस्था से मार्क्‍सवाद की रक्षा करना चाहते हैं।यदि मार्क्‍सवाद को इसी तरह बचाया जा सकता तो विकसित पूंजीवादी मुल्कों के शिक्षा संस्थानों में मार्क्‍सवाद पर सबसे ज्यादा संगोष्ठियां होती हैं। मार्क्‍सवाद पर सबसे ज्यादा कृतियां इन्हीं देशों में छपती हैं किंतु मार्क्‍सवाद सबसे ज्यादा खस्ताहाल अवस्था में इन्हीं देशों में है।
मार्क्‍सवाद को तर्क या आस्था से जिंदा नहीं रखा जा सकता।मार्क्‍सवाद का भविष्य विचारकों पर नहीं क्रांतिकारी शक्तियों,मजदूरों, किसानों, शोषित तबकों के संघर्षों की अवस्था पर टिका है।क्रांतिकारी शक्तियों को अपने जीवन की ठोस सच्चाईयों के तहत काम करना होता है।कम्युनिस्ट पार्टी, मजदूरों-किसानों आदि के संगठनों को यथार्थवादी कार्यक्रम के आधार पर काम करना होता है।उनके लिए मार्क्‍सवाद किताब या रीडिंग या विश्लेषण नहीं है बल्कि दुनिया को बुनियादी तौर पर बदलने का विश्‍व दृष्टिकोण है।
मार्क्‍सवाद कभी दलविहीन,कम्युनिस्ट पार्टीरहित वातावरण में जिंदा नहीं रह सकता। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों में मार्क्‍सवाद और समाजवाद के पराभव का प्रधान कारण है वास्तव अर्थों में कम्युनिस्ट पार्टी का लोप।इन देशों में जो कम्युनिस्ट पार्टियां कार्यरत थीं। वे कम्युनिस्ट पार्टी के उसूलों पर कम सत्ता के उसूलों से ज्यादा परिचालित थीं। सतह पर ये कम्युनिस्ट थे। किंतु इनकी अंतरात्मा और रवैयये का कम्युनिस्ट उसूलों से कोई वास्ता नहीं था। इसलिए यदि इन देशों में समाजवादी व्यवस्था का पराभव हुआ है तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस पर शोक भी नहीं मनाया जा सकता है। किंतु एक बात जरूर सीखने की है कि सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद के बहाने झूठ नहीं बोला जाना चाहिए।
मार्क्‍सवाद की खूबी है कि वह संसार के झूठ पर से पर्दा उठाता है।वास्तव संसार को ठोस सच्चे अर्थ में उद्धाटित करता है।समाजवादी देशों में जो कुछ घट रहा था।उसके बारे में अधिकांश कम्युनिस्ट पार्टियों ने सच कभी नहीं कहा। जब समाजवादी व्यवस्था धराशायी हो गई तब कहीं जाकर दबे स्वरों में आलोचनाएं सामने आईं।
मार्क्‍सवाद ने जिस समाजवाद की परिकल्पना की है वह बंद समाज नहीं है।ऐसा समाज नहीं जिसके बारे मे आलोचना ही न की जा सके।जिन कम्युनिस्ट पार्टियों ने समाजवादी समाजों के पराभव के बाद पतन के कारणों पर विस्तार से रोशनी ड़ाली,उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि उन्होंने इसके पहले साफगोई से काम क्यों नही लिया ?
मार्क्‍सवाद साफगोई सिखाता है।सत्य के प्रति आग्रह पैदा करता है।किंतु व्यवहार में इसका उल्टा हुआ है।समाजवादी समाजों के बारे में हमने मिथ बनाए हैं।अनालोचनात्मक रवैयये का निर्माण किया है।मिथ बनाना और अनालोचनात्मक रवैयया मूलत: गैर-मार्क्‍सवादी तत्व हैं।अभी भी मार्क्‍सवादी हलकों में समाजवादी समाजों के पराभव को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है।यही हाल देरि‍दा का भी है। वे समाजवादी समाजों की वास्तव अर्थों में मीमांसा किए बगैर यह कह देते हैं कि ''हम में से अनेकों के लिए एक खास किस्म ( मैं खास पर जोर दे रहा हूँ) के कम्युनिस्ट मार्क्‍सवाद का अंत,सोवियत संघ तथा पूरी दुनिया में इस पर आधारित प्रत्येक चीज के पतन के पहले ही हो गया था।यह सब पचास के दशक में आरंभ हुआ था।''
सवाल किया जाना चाहिए जब पचास के दशक में ही कम्युनिस्ट मार्क्‍सवाद का अंत हो चुका था तब ही देरि‍दा ने मार्क्‍सवाद की विरासत की रक्षा की सौगंध क्यों नहीं ली ? ऐसा क्या हुआ कि पचास वर्ष के बाद उन्हें मार्क्‍सवाद की विरासत को बचाने का अहसास पैदा हुआ ?दूसरी बात यह है कि क्या सोवि‍यत संघ और समाजवादी समाजों के मार्क्‍सवादी अनुभवों,सारी दुनिया के कम्युनिस्टों के मार्क्‍सवादी तजुर्बों को दरकिनार करके मार्क्‍सवाद के बारे में कोई बहस संभव है ?
समाजवादी समाजों और गैर-समाजवादी समाजों के मार्क्‍सवाद के सबक क्या हैं ?क्या मार्क्‍सवादियों को मौजूदा दौर में इन सबसे सबक हासिल करने की जरूरत है या नहीं ?क्या मार्क्‍सवाद की दुनिया वही है जो मार्क्‍स-एंगेल्स के जमाने की थी ?क्या मार्क्‍सवाद का एक ही पाठ संभव है ?क्या एक रीडिंग संभव है ? क्या क्रांति संभव है ?कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में समूची मानवता को एकजुट करना संभव है ?क्या कोई नया इंटरनेशनल संभव है ?क्या दलरहित इंटरनेशनल संभव है ?क्या किताब लिखने के लिए,सिर्फ समीक्षाओं के लिए इंटरनेशनल संभव है ?क्या साम्राज्यवाद और पूंजीवाद इन दोनों के प्रति रणनीति, कार्यनीति और कार्यक्रम का विश्वस्तर पर एक ही मसौदा संभव है ? क्या समाज में कम्युनिस्ट पार्टी और उसके जनसंगठनों की प्रासंगिकता और जरूरत बची हुई है ?ये कुछ बुनियादी सवाल हैं जिन्हें हल किए बिना मार्क्‍सवाद की विरासत को आत्मसात् करना संभव नहीं है।जाहिर है देरीदा इनमें सेकिसी भी सवाल का जबाव नहीं देते।उन्हें सिर्फ मार्क्‍सवाद की विरासत को हासिल करने की चिन्ता है।गोया! विरासत नहीं उन्हें वसीयत की चिन्ता है।
वे चाहते हैं कि मार्क्‍सवाद की वसीयत उन जैसे लोगों के नाम लिख दी जाए जिन्होंने मार्क्‍सवाद की विरासत को बचाने,समृध्द करने में कोई भी योगदान नहीं किया है।मार्क्‍सवाद का मामला उत्तराधिकार या परंपरा का मामला नहीं है बल्कि कुर्बानी का मामला है।यह विमर्श का नहीं वर्ग संघर्ष का मामला है। यह पूंजीवाद के प्रति सदाशयता या पूंजीवाद को सदाचारी बनाने का नहीं बल्कि उसके प्रति अनवरत,समझौताविहीन निर्मम संघर्ष का मामला है।
देरि‍दा के समग्र दृष्टिकोण में सबसे मुश्किल मामला है भाषा का।देरि‍दा विमर्श के लिए अलंकारिक और धार्मिक भाषा चुनते हैं।इस तरह की भाषा द्विअर्थीपन लिए होती है।इसे आप किसी भी दिशा में मोड़ सकते हैं।मजेदार बात यह है कि भाषा के खेल में देरि‍दा सबसे पहले मार्क्‍स-एंगेल्स रचित भाषा और अवधारणा दोनों को ही नष्ट करता है। मार्क्‍सवाद के संदर्भ में देरि‍दा के भाषिक प्रयोग को देखें ''दायित्व के आह्वान से रहित कोई विरासत नहीं होती।विरासत हमेशा एक कर्ज की पुनर्पुष्टि होती है,लेकिन एक आलोचनात्मक, चुनावपरक और छनतीहुई पुनर्पुष्टि। इसीलिए हमने कई आत्माओं के अस्तित्व को माना है।''उपरोक्त,पृ.77) देरि‍दा से सवाल किया जाना चाहिए कि मार्क्‍स की कई आत्माएं उन्होंने कहां से खोज निकालीं ?यदि कई आत्माएं हैं ?तो उन्हें कौन सी आत्मा या आत्माएं पसंद हैं ?मार्क्‍स की किस आत्मा का कर्ज वे उतारना चाहेंगे ?किस आत्मा को आलोचनात्मक विवेक के साथ चुनना चाहेंगे।
सच यह है कि मार्क्‍स की अनेक नहीं एक आत्मा है और वह है क्रांति। देरि‍दा को विरासत में क्या चाहिए मार्क्‍सवाद के प्रति कोरी वाचिक आस्था या क्रांति। मार्क्‍स का कर्ज इस पृथ्वी पर से तबतक नहीं उतरेगा जब तक क्रांति नहीं होती। जाहिर है देरि‍दा को क्रांति पसंद नहीं है।जिनके अंदर क्रांति का जज्बा है।उसे पाने की छटपटाहट है,जो वर्ग संघर्ष के काम में लगे हैं वे ही मार्क्‍सवाद के असली वारिस हैं।आज जो लोग साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं वे ही असली वारिस है। उल्लेखनीय है कि मार्क्‍स-एंगेल्स को क्रांति से कम कोई भी चीज पसंद नहीं थी।कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा क्रांति संभव नहीं है।देरि‍दा को कम्युनिस्ट पार्टियां पसंद नहीं हैं।संभवत: वे क्रांति, वर्ग संघर्ष,कम्युनिस्ट पार्टी से रहित मार्क्‍सवाद को विरासत में पाना चाहते हैं।
मजेदार बात यह है कि देरि‍दा ने अपने पूरे व्याख्यान में एक भी जगह साम्राज्यवाद या पूंजीवाद को नष्ट करने की बात नहीं की है।देरि‍दा जिन सवालों को उठाते हैं वे वस्तुत: बुर्जुआ समाज के सवाल हैं।वे क्रांति की संभावनाओं, चुनौतियों,क्रांति के दोस्त और दुश्मन किसी का भी जिक्र नहीं करते।देरि‍दा मूलत: अधिरचना के सवाल उठाते हैं।अधिरचना में सुधार के सवाल उठाते हैं।जबकि मार्क्‍सवाद आधार और अधिरचना दोनों के बुनियादी सवालों को पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में समाजवादी समाज व्यवस्था के संदर्भ में विश्लेषित करते हैं।
देरि‍दा को समाजवादी व्यवस्था से परहेज है।उन्हें असल में 'मार्क्‍स के प्रेत' या उसकी आत्मा या 'स्पिरिट' की जरूरत है।मार्क्‍सवाद इनमें से कुछ भी नहीं है।वह तो दुनिया को बदलने का विज्ञान है। जिसकी कसौटी है जिन्दगी। जिन्दगी की कसौटी पर मार्क्‍सवाद की जो धारणाएं खरी उतरीं उन्हें माक्र्स-एगेल्स ने आत्मसात् किया।जो धारणाएं जिन्दगी की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं उन्हें खारिज कर दिया।मार्क्‍स-एंगेल्स के सामने पूंजीवाद की जो भयावह तस्वीर उभरकर आई थी उसी के आधार पर वे दोनों इस नतीजे पर पहुँचे कि समाज को बुनियादी तौर पर बदलना चाहिए।
देरि‍दा ने 'नया इंटरनेशनल' बुलाने का सुझाव रखा है।वे इसे अतर्राष्ट्रीय कानून के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखते हैं।इसके सामने मानवाधिकार,शरणार्थी समस्या, विदेशी कर्ज आदि के सवालों को विश्लेषित करने के लिए देरि‍दा को 'नया इंटरनेशनल' चाहिए।यह इंटरनेशनल पुराने से भिन्न होगा।देरि‍दा पुराने इंटरनेशनल के कर्ज से मुक्त होकर नए का आयोजन करना चाहते हैं।वे पुराने इंटरनेशनल के लक्ष्यों और उपलब्धियों पर गौर तक नहीं करना चाहते। देरि‍दा से सवाल किया जाना चाहिए कि ऐसी क्या एलर्जी है कि मार्क्‍सवाद की आत्मा के वारिस होना चाहते हो,मानवाधिकारों के चैम्पियन बनना चाहते हो,किंतु पहले,दूसरे और तीसरे इंटरनेशनल पर गौर करना नहीं चाहते।लेनिन के शब्दों में ''पहले इंटरनेशनल ने समाजवाद के लिए सर्वहारा के संघर्ष की नींव डाली।दूसरे इंटरनेशनल का काल वह काल था ,जब कई देशों में इस आंदोलन के व्यापक तथा जनव्यापी रूप में फैलने के लिए जमीन तैयार की गई।तीसरे इंटरनेशनल ने पहले और दूसरे इंटरनेशनल के काम के फल बटोरे,उसकी अवसारवादी,सामाजिक अंध-राष्ट्रवादी,बुर्जुआ तथा टुटपुंजिया खोटे को निकाल फेंका और उसने सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कार्यान्वित करना प्रारभ कर दिया है।''(लेनिन,' अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन',प्रगति प्रकाशन मास्को, 1984,पृ.305)
देरि‍दा का मानना है नया इंटरनेशनल ''सामीप्य,पीड़ा और आशा का एक सूत्र है।''किंतु 'गुप्तसूत्र' है।''यह एक असामयिक सूत्र है,बिना पदवी,बिना ख़िताब ,बिना नाम के,जो भले गुप्त न हो लेकिन अभी सार्वजनिक भी नहीं है,बिनाअनुबंध,'विश्रृंखलित',बिना समायोजन,बिना पार्टी,बिना देश,बिना राष्ट्रीय समुदाय(हर तरह के राष्ट्रीय परिसीमन से परे,पहले अंतर्राष्ट्रीय),बिना सह-नागरिकता,बिना एक वर्ग से सामुदायिक संबंध के,यहाँ नए इंटरनेशनल का नाम उन्हें दिया जा रहा है जो तमाम उन लोगों के जो संस्थाहीन मैत्री गठबंधन की मांग करता है जो भले ही समाजवादी-मार्क्‍सवादी इंटरनेशनल में,सर्वहारा के अधिनायकत्व में,सभी देशों के सर्वहाराओं की सार्वभौमिक एकता की मसीहाई युगान्त घोषी भूमिका में विश्वास न करते हों,पर माक्र्स या माक्र्स की कम से कम एक आत्मा से अभी भी उत्प्रेरित हैं (वे अब जानते हैं कि वे एक से अधिक हैं),और खुद को नए,ठोस,वास्तविक ढ़ंग से एकजुट करने के लिए भी।भले यह गठबंधन एक पार्टी या मजदूरों के इंटरनेशनल की शक्ल न ले,बल्कि एक तरह का प्रति-मंत्रोच्चार हो-अंतर्राष्ट्रीय कानून की हालत,राज्य व राष्ट्र की अवधारणाओं इत्यादि की (सैध्दान्तिकी और व्यावहारिक)मीमांसा के रूप में:माक्र्सवादी मीमांसा का पुन: नवीनीकरण करने और विशेषत: इसे आमूल परिवर्तित करने के लिए।'' (पहल,उपरोक्त,पृ.74)यानी देरि‍दा की मूल चिन्ता मार्क्‍सवाद को आमूल पविर्तित करने की है। पूंजी के द्वारा श्रम के शोषण के तंत्र को उखाड़ फेंकने की नहीं है।
देरि‍दा के उपरोक्त व्याख्यान पर एजाज अहमद ने सही लिखा है कि यह ''साहित्यिक शैली का प्रदर्शनपरक पाठ है।एक ऐसा पाठ जो विश्लेषण नहीं करता,एक प्रदर्शन की प्रस्तुति करता है:शव को दफनाने और पुनप्र्राप्ति का एक अनुष्ठानी प्रदर्शन,इसीलिए शपथ,प्रेतीयता और प्रतिश्रुति के मॉटिफ।'' (पहल,उपरोक्त,पृ.85) देरि‍दा के बारे में एजाज अहमद का यह निष्कर्ष है कि वे ''दक्षिणपंथ के आदमी नहीं हैं।''एजाज अहमद ने देरि‍दा के व्याख्यान 'मार्क्‍स के प्रेत' को 'शोकगीत' नाम दिया है। ''इस पाठ में उन्होंने अपने लेखन का स्वर बहुत सावधानी के साथ चुना है।यह एक शोकगीत का,पराजित को सीख देने का स्वर है,जख्मों के उपचार की एक भाषा ताकि नयी प्रतिश्रुतियाँ की जा सकें,ताकि पूर्वजों की प्रतिश्रुतियों का निर्वाह किया जा सके,भले ही एक तरीके से।''(वही,पृ.94) देरि‍दा का मानना है कि विखण्डन ,मार्क्‍सवाद का आमूल परिवर्तन है।एजाज अहमद ने विखण्डन को मार्क्‍सवाद का आमूल परिवर्तन मानने से इंकार किया है।
एजाज अहमद ने सही सवाल उठाया है कि देरि‍दा यह सोचें कि क्या विखण्डन को आत्म-समीक्षा की जरूरत है या नहीं ? विखण्डन के नाम पर दक्षिणपंथी और धुर मार्क्‍सवाद विरोधियों ने विखण्डन की ओट से मार्क्‍सवाद पर हमले आखिर क्यों किए ? क्या इन हमलों को सुनिश्चित बनाने में विखण्डन के तत्व से कोई मदद मिली या नहीं ? इसका यह अर्थ नहीं है कि देरि‍दा दक्षिणपंथी थे।देरि‍दा ने मार्क्‍सवाद की असख्य गलतियों की तरफ ध्यान दिया है।यदि कितु विखण्डन की गलतियों कर तरफ देरि‍दा ने आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखा।
एजाज अहमद ने लिखा है कि '' यह एक ठोस सच्चाई है कि अधिक कुख्यात किस्म के मार्क्‍सवाद विरोधी उग्र सुधारवादों से देरि‍दा ने आम तौर पर खुद को दूर रखा है।लेकिन उत्तरी अमेरिका और विशेषत:येल में उनके अनेक निकट सहकर्मियों -जिनके कारण देरि‍दा को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली और जिनसे देरि‍दा ने स्वयं को दूर नहीं किया- की खातिर मार्क्‍सवाद का कोई अर्थ नहीं रहा है।उनमें कुछ दूसरों के मुकाबले अधिक तीखे विरोधी हैं।,लेकिन मार्क्‍सवाद विरोध उनकी सांझी विशिष्टता रही है।''(वही,पृ.97)

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