मार्क्सवाद सामाजिक परिवर्तन का विज्ञान है।दुनिया को बदलने का विश्व दृष्टिकोण है। जो भी विचार और धारणाएं बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में मदद कर सकती हैं उनको आत्मसात् करना प्रत्येक मार्क्सवादी चिंतक का कार्य है।स्वयं मार्क्स-एंगेल्स ने अपने समकालीन और पूर्ववर्ती गैर -मार्क्सवादी विचारकों, सिध्दान्तकारों, अर्थशास्त्रियों से ऐसा काफी कुछ ग्रहण किया है जो दार्शनिक धरातल पर मार्क्सवाद के करीब नहीं आते थे। उनके यहां गैर-मार्क्सवादी परिभाषिक शब्दावली का प्रयोग होता था। किंतु परवर्ती मार्क्सवादी आलोचकों ,सिध्दान्तकारों ने इस रवैयये का तकरीबन त्याग ही कर दिया।
मार्क्सवाद को सांस्थानिक रूप देने के चक्कर में मार्क्सवाद की बुनियादी धारणाएं, तयशुदा पारिभाषिक शब्दावली में कुछ इस कदर पेश की गईं कि गोया मार्क्सवाद में नया या मौलिक कुछ भी जोड़ने की जरूरत ही नहीं है। मार्क्स -एंगेल्स ने जिन धारणाओं को बना दिया वे सब अपरिवर्तनीय हैं। मार्क्सवादी आलोचकों के एक तबके ने मार्क्सवाद का टीकाशास्त्र तैयार किया।चूंकि मूलशास्त्र मार्क्स-एंगेल्स बना गए थे अत: उसे बदलने की जरूरत या उसमें नए के समावेश की संभावनाएं तकरीबन खत्म कर दी गईं।जिसने भी मार्क्सवादी शब्दावली से भिन्न शब्दावली में अपने को व्यक्त किया उसे झटककर मार्क्सवाद के दायरे के बाहर कर दिया गया।इस तरह के रवैयये का मार्क्सवाद से कम कठमुल्ले मार्क्सवाद से ज्यादा संबंध है।अथवा इस तरह का मार्क्सवादी रवैयया तब ही पैदा होता है जब आप मार्क्सवाद को राजसत्ता के साथ नत्थी कर दें।मार्क्सवाद को पावर के गेम में शामिल कर दें।
मार्क्सवाद जड़ सैध्दान्तिकी नहीं है।यह वर्चस्व का नजरिया नही है।इसकी भाषा, अवधारणाएं, परिवर्तन के औजार सब कुछ देशज परिवर्तनकामी राजनीतिक परंपरा की अवस्था पर निर्भर हैं।मार्क्सवाद में सामाजिक परिवर्तन के प्रति जिस तरह का आग्रह है उसके कारण वह अन्य से सीखने,आत्मसात् करने,अपने को समृध्द करने में गहरी दिलचस्पी लेता है।वह समाज के प्रति जितना आलोचनात्मक है उतना ही स्वयं के प्रति भी आलोचनात्मक रूख व्यक्त करता है। आलोचना और आत्मालोचना इसके दो बड़े अस्त्र हैं। मार्क्सवादी आलोचना की खूबी यह है कि यह जितना सिखाती है उससे ज्यादा सीखती भी है।
सवाल यह है कि देरिदा के साथ मार्क्सवाद की क्या कोई पटरी बैठ सकती है ? इस संदर्भ में पहली बात यह है कि देरिदा के पास बुनियादी सामाजिक परिवर्तन का कोई खाका या सैध्दान्तिक दृष्टिकोण नहीं है।सामाजिक परिवर्तन के स्पष्ट कार्यक्रम के आधार के अभाव में देरिदा अंतत: पूंजीपतिवर्ग के सफल पैरोकार बनकर रह जाते हैं।
सामाजिक परिवर्तन के कुछ बुनियादी नियम हैं जिन्हें देरिदा स्वीकार नहीं करते।कुछ बुनियादी कोटियां हैं जिन्हें देरिदा स्वीकार नहीं करते।देरिदा के पास इसके अलावा बहुत कुछ ऐसा है जिससे सीखा जा सकता है।किंतु यदि कोई यह कहे कि देरिदा के पास सामाजिक परिवर्तन का सैध्दान्तिक नजरिया है तो यह सिर्फ भ्रम है।देरिदा पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म नहीं करना चाहते थे।इस सीमा के बावजूद देरिदा इस युग के बड़े दार्शनिक विचारक थे।'व्याख्या' और 'विश्लेषण' की पध्दति के महान पंडित थे।
देरिदा और मार्क्सवाद में बुनियादी फर्क यह है कि देरिदा 'व्याख्या के लिए व्याख्या' की पध्दति का सहारा लेते हैं जबकि मार्क्स-एंगेल्स ने बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के लिए विश्लेषण का सहारा लिया।सवाल व्याख्या का नहीं है सवाल है दुनिया को बदलने का।देरिदा जिस पूंजीवादी दुनिया की आलोचना करते हैं उसको बुनियादी तौर पर बदलना नहीं चाहते।वे पूंजीवादी दुनिया के काले धब्बों को सिर्फ साफ करना चाहते हैं।वे इस क्रम में परिवर्तकारी के रूप में नहीं सिर्फ धोबी के रूप में सामने आता है।धोबी की मूल चिन्ता यह है कि गंदे कपड़े को धोकर जहां तक संभव हो साफ-सुथरा कर दिया जाए।
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों में समाजवाद के पराभव के बाद एकसिरे से सारी दुनिया में मार्क्सवाद और समाजवाद की मौत पर जश्न मनाए जा रहे थे। इन विजयोल्लास के क्षणों में मार्क्सवाद को जोर-शोर के साथ चीख-चीखकर अप्रासंगिक घोषित करने की मुहिम भी तेज हो गई। समाजवाद के पक्षधरों में निराशा छा गई।ऐसे में 1994 में उनका एक व्याख्यान 'मार्क्स के प्रेत' शीर्षक से सामने आया। इसे 'पहल' पत्रिका (अक्टूबर,नवम्बर,दिसम्बर 1994)ने प्रकाशित किया। साथ ही प्रसिध्द मार्क्सवादी आलोचक एजाज अहमद का लेख ' मेल बनाते देरिदा :'मार्क्स के प्रेत' और विखण्डनवादी राजनीति'' भी प्रकाशित किया । मजेदार बात यह है कि देरिदा और एजाज अहमद अपने-अपने कारणों से समाजवाद के पराभव का विश्लेषण पेश नहीं करते।
देरिदा एक आस्थावान संत की भाषा में मार्क्सवाद के प्रति अपनी आस्था अस्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हैं।मार्क्सवाद की विरासत से जुड़ने की बात कहते हैं। किंतु समाजवाद के पराभव की ठोस मीमांसा पेश नहीं करते। वहीं दूसरी ओर देरिदा के मार्क्सवाद के प्रति सम्पूर्ण रवैयये को एजाज अहमद सवालों के दायरे में खड़ा करते हैं। देरिदा की तीखी आलोचना करते हैं। किंतु समाजवादी व्यवस्था के पराभव के कारणों को पेश नहीं करते। मार्क्सवाद प्रासंगिक है या अप्रासंगिक है ?उसका भविष्य में स्वरूप क्या होगा ?इन दोनों सवालों के बारे में सही रूख इस बात पर निर्भर करता है कि समाजवादी समाजों के पराभव के कारणों को मार्क्सवादी कितनी सच्चाई के साथ रेखांकित करते हैं।पराभव के अनुभवों से क्या सीखते हैं ?मार्क्सवाद संबंधी समूचे प्रपंच में यह तथ्य ध्यान रखना चाहिए कि मार्क्सवादी विचारकों के पास जितनी बेहतर विश्लेषण बुध्दि है। तार्किक ढ़ंग से समझाने का जो कौशल है वह अन्यत्र दुर्लभ है।मौजूदा दौर में मार्क्सवाद के नजरिए से समाजवादी व्यवस्था के भावी स्वरूप की क्या कोई परिकल्पना मार्क्सवादी विचारकों के पास है ?क्या समाजवाद के पराभव के बाद मार्क्सवाद का वहीं स्वरूप रह गया है जो पराभव के पहले था ?क्या समाजवादी व्यवस्था की परिकल्पना वही रह गई है जो पराभव के पहले थी ?इन सवालों के बारे में देरिदा और एजाज अहमद अपने-अपने कारणों से चुप हैं।शायद इतना गंभीर संकट विचारकों के सामने पहले कभी नहीं आया था।समाजवादी व्यवस्था में शोषण के पुराने रूपों के खात्मे,शोषक वर्गों के समूल खात्मे के बाद समाजवादी समाजों में शोषक वर्गों का उदय एक गंभीर परिघटना है।यह ऐसी परिघटना है जो अबतक के समाजवाद के समूचे चिन्तन में कहीं पर भी नहीं मिलती।
देरिदा ने 'मार्क्स के प्रेत' शीर्षक व्याख्यान में जो बाद में ''स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स' शीर्षक से पुस्तकाकार रूप में छप चुका है।देरिदा इस व्याख्यान में अनेक चीजों के बीच मेल बिठाने की कोशिश करते हैं।उन्हें भौतिकवाद और मार्क्सवाद भी चाहिए और उत्तर आधुनिक प्रपंचों के प्रति स्वीकृति भी चाहिए।देरिदा ऐसा करते हुए अन्तर्विरोधी तत्वों को एक ही छतरी के पीचे इकट्ठा करना चाहते हैं।वे मूलत: सर्वसंग्रहवादी की तरह रवैयया व्यक्त करते हैं।मजेदार बात यह है कि वे मार्क्सवाद को स्वीकृति दिलाना चाहते हैं साथ ही उत्तर आधुनिक सांस्कृतिक दबावों यानी 'भिन्नता' और 'विविधता' के सांस्कृतिक विमर्श को भी स्वीकृति दिलाना चाहते हैं।वे चाहते हैं कि लोग मार्क्सवाद को मानें साथ ही विमर्श,नरेटिव, लैंग्वेजगेम, राईटिंग,प्रजेंट,प्रामाणिक अस्मितस,स्व पहचान आदि को भी वैधता प्रदान करें।इस तरह 'स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स' में देरिदा ने अन्तर्विरोधी तत्वों में मेल बिठाने की असफल कोशिश की है।इस क्रम में देरिदा एक तरह का रहस्यवादी वातावरण तैयार करते हैं।'प्रेत की भाषा' में अतीत केबारे में रोमैंटिक बोध पैदा करते हैं।मार्क्सवाद और रोमैंटिक उत्तर आधुनिकतावाद के बीच संवाद पैदा करते हैं।यहां रोमैंटिक उत्तर आधुनिकतावाद से मतलब है 'लोकल नेरेटिव' के आधार पर 'मेटा नेरेटिव' को खारिज करना।जैसाकि ल्योतार ने किया है। देरिदा इस कृति में प्रेत के बहाने वैचारिक एकात्मकता को उभारते हैं।उसे रोमैंटिक उत्तर आधुनिकतावाद के सरोकारों से पुष्ट करना चाहते हैं।इसके माध्यम से वह संस्कृति को बनाए रखना चाहते हैं,अतीत की सांस्कृतिक एकात्मकता को बनाए रखना चाहते हैं,यथार्थ के ऊपर न्याय की तलाश करते हैं,अन्य के लिए न्याय की तलाश करते हैं।देरिदा का मानता है कि तब तक न्याय संभव नहीं है जब तक 'जिम्मेदारी' के सिध्दान्त की रक्षा न की जा सके।एजाज अहमद ने सही सवाल किया है कि मार्क्सवाद के प्रति देरिदा का आग्रह सोवियत और समाजवादी समाजों के विघटन के बाद क्यों पैदा हुआ ?देरिदा को मार्क्सवाद की प्रासंगिकता का अहसास इतनी देर बाद क्यों हुआ ?इसका उत्तर देरिदा ने कभी नहीं दिया।
देरिदा ने 'मार्क्स के प्रेत' में लिखा है ''मार्क्स को बार-बार न पढ़ना, चर्चा न करना हमेशा एक दोष ही कहलाएगा। यह कहने का अर्थ है कुछ अन्यों को भी पढ़ना और विद्वतापूर्ण 'पठन' तथा 'चर्चा' से परे जाना।यह उत्तरोत्तर एक दोष होगा, सैध्दान्तिक, दार्शनिक,राजनीतिक दायित्व वहन की एक असफलता।जब जडसूत्री मशीन और 'मार्क्सवादी' विचारधारात्मक तंत्र( राज्य,दल,प्रकोष्ठ,यूनियन तथा जड़सूत्रों के उत्पादन की अन्य स्थलियॉँ)ओझल होने की प्रक्रिया में हैं,तब हमारे पास इस दायित्व से मुँह चुराने के केवल बहाने हैं,औचित्य कोई नहीं !इसके बिना कोई भविष्य नहीं होगा:मार्क्स के बगैर नहीं,मार्क्स के बिना कोई भविष्य नहीं,मार्क्स की विरासत और स्मृति के बगैर:हर हाल में किसी एक मार्क्स ,उसकी प्रतिभा,और कम से कम उसकी एक आत्मा (की स्मृति और विरासत के बगैर)क्योंकि यह हमारा 'हाईपोथीसिस' होगा,बल्कि हमारा पूर्वाग्रह : वे एक से अधिक हैं,वे एक से अधिक होंगे।''(पहल,50-51,पृ.49)
देरीदा से सवाल किया जाना चाहिए कि क्या उन्होंने मार्क्स को बार-बार स्मरण किया ?क्या मार्क्सवाद सिर्फ रीडिंग है ?क्या मार्क्सवाद सिर्फ दायित्वबोध है ?क्या मार्क्सवाद सिर्फ स्मृति है ?विरासत है ?जिस तरह के भाषा खेल के जरिए देरिदा मार्क्सवाद को पढ़ना चाहते हैं उससे मार्क्सवाद का भला कम देरिदा का भला ज्यादा होता है।
यह सारी दुनिया जानती है कि देरीदा को वे सारी चीजें पसंद नहीं हैं जो मार्क्स-एंगेल्स को पसंद थीं।मसलन् देरिदा दलीय राजनीति के पक्ष में नहीं हैं। कम्युनिस्ट पार्टी की धारणा के पक्ष में नहीं हैं। यह कैसे संभव है कि कम्युनिस्ट पार्टी न हो और मार्क्सवाद को बचा लिया जाए या उसकी विरासत की रक्षा कर ली जाए। विरासत की रक्षा का सवाल सिर्फ रीडिंग और राईटिंग या रेटोरिक का प्रश्न नहीं है। मार्क्सवाद की विरासत बचाने का अर्थ यह नहीं है कि क्रांति को किताबों,विमर्शों में बंद कर दिया जाए।
क्रांति,समाजवाद,वर्ग संघर्ष,विचारधारा आदि के सवाल किताबी लेखन, सेमीनार, संगोष्ठी आदि के गर्भ से पैदा नहीं हुए।बल्कि इन धारणाओं का सामाजिक प्रक्रियाओं के गर्भ, सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष के गर्भ से जन्म हुआ। देरिदा की मुश्किल यह है कि वे मार्क्सवाद को सामाजिक प्रक्रियाओं,राजनीतिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में नहीं देखते।बल्कि बार-बार यही कोशिश करते हैं कि मार्क्सवाद को एक विचार मात्र बना दिया जाए।वे तर्क और आस्था से मार्क्सवाद की रक्षा करना चाहते हैं।यदि मार्क्सवाद को इसी तरह बचाया जा सकता तो विकसित पूंजीवादी मुल्कों के शिक्षा संस्थानों में मार्क्सवाद पर सबसे ज्यादा संगोष्ठियां होती हैं। मार्क्सवाद पर सबसे ज्यादा कृतियां इन्हीं देशों में छपती हैं किंतु मार्क्सवाद सबसे ज्यादा खस्ताहाल अवस्था में इन्हीं देशों में है।
मार्क्सवाद को तर्क या आस्था से जिंदा नहीं रखा जा सकता।मार्क्सवाद का भविष्य विचारकों पर नहीं क्रांतिकारी शक्तियों,मजदूरों, किसानों, शोषित तबकों के संघर्षों की अवस्था पर टिका है।क्रांतिकारी शक्तियों को अपने जीवन की ठोस सच्चाईयों के तहत काम करना होता है।कम्युनिस्ट पार्टी, मजदूरों-किसानों आदि के संगठनों को यथार्थवादी कार्यक्रम के आधार पर काम करना होता है।उनके लिए मार्क्सवाद किताब या रीडिंग या विश्लेषण नहीं है बल्कि दुनिया को बुनियादी तौर पर बदलने का विश्व दृष्टिकोण है।
मार्क्सवाद कभी दलविहीन,कम्युनिस्ट पार्टीरहित वातावरण में जिंदा नहीं रह सकता। सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों में मार्क्सवाद और समाजवाद के पराभव का प्रधान कारण है वास्तव अर्थों में कम्युनिस्ट पार्टी का लोप।इन देशों में जो कम्युनिस्ट पार्टियां कार्यरत थीं। वे कम्युनिस्ट पार्टी के उसूलों पर कम सत्ता के उसूलों से ज्यादा परिचालित थीं। सतह पर ये कम्युनिस्ट थे। किंतु इनकी अंतरात्मा और रवैयये का कम्युनिस्ट उसूलों से कोई वास्ता नहीं था। इसलिए यदि इन देशों में समाजवादी व्यवस्था का पराभव हुआ है तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस पर शोक भी नहीं मनाया जा सकता है। किंतु एक बात जरूर सीखने की है कि सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद के बहाने झूठ नहीं बोला जाना चाहिए।
मार्क्सवाद की खूबी है कि वह संसार के झूठ पर से पर्दा उठाता है।वास्तव संसार को ठोस सच्चे अर्थ में उद्धाटित करता है।समाजवादी देशों में जो कुछ घट रहा था।उसके बारे में अधिकांश कम्युनिस्ट पार्टियों ने सच कभी नहीं कहा। जब समाजवादी व्यवस्था धराशायी हो गई तब कहीं जाकर दबे स्वरों में आलोचनाएं सामने आईं।
मार्क्सवाद ने जिस समाजवाद की परिकल्पना की है वह बंद समाज नहीं है।ऐसा समाज नहीं जिसके बारे मे आलोचना ही न की जा सके।जिन कम्युनिस्ट पार्टियों ने समाजवादी समाजों के पराभव के बाद पतन के कारणों पर विस्तार से रोशनी ड़ाली,उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि उन्होंने इसके पहले साफगोई से काम क्यों नही लिया ?
मार्क्सवाद साफगोई सिखाता है।सत्य के प्रति आग्रह पैदा करता है।किंतु व्यवहार में इसका उल्टा हुआ है।समाजवादी समाजों के बारे में हमने मिथ बनाए हैं।अनालोचनात्मक रवैयये का निर्माण किया है।मिथ बनाना और अनालोचनात्मक रवैयया मूलत: गैर-मार्क्सवादी तत्व हैं।अभी भी मार्क्सवादी हलकों में समाजवादी समाजों के पराभव को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है।यही हाल देरिदा का भी है। वे समाजवादी समाजों की वास्तव अर्थों में मीमांसा किए बगैर यह कह देते हैं कि ''हम में से अनेकों के लिए एक खास किस्म ( मैं खास पर जोर दे रहा हूँ) के कम्युनिस्ट मार्क्सवाद का अंत,सोवियत संघ तथा पूरी दुनिया में इस पर आधारित प्रत्येक चीज के पतन के पहले ही हो गया था।यह सब पचास के दशक में आरंभ हुआ था।''
सवाल किया जाना चाहिए जब पचास के दशक में ही कम्युनिस्ट मार्क्सवाद का अंत हो चुका था तब ही देरिदा ने मार्क्सवाद की विरासत की रक्षा की सौगंध क्यों नहीं ली ? ऐसा क्या हुआ कि पचास वर्ष के बाद उन्हें मार्क्सवाद की विरासत को बचाने का अहसास पैदा हुआ ?दूसरी बात यह है कि क्या सोवियत संघ और समाजवादी समाजों के मार्क्सवादी अनुभवों,सारी दुनिया के कम्युनिस्टों के मार्क्सवादी तजुर्बों को दरकिनार करके मार्क्सवाद के बारे में कोई बहस संभव है ?
समाजवादी समाजों और गैर-समाजवादी समाजों के मार्क्सवाद के सबक क्या हैं ?क्या मार्क्सवादियों को मौजूदा दौर में इन सबसे सबक हासिल करने की जरूरत है या नहीं ?क्या मार्क्सवाद की दुनिया वही है जो मार्क्स-एंगेल्स के जमाने की थी ?क्या मार्क्सवाद का एक ही पाठ संभव है ?क्या एक रीडिंग संभव है ? क्या क्रांति संभव है ?कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में समूची मानवता को एकजुट करना संभव है ?क्या कोई नया इंटरनेशनल संभव है ?क्या दलरहित इंटरनेशनल संभव है ?क्या किताब लिखने के लिए,सिर्फ समीक्षाओं के लिए इंटरनेशनल संभव है ?क्या साम्राज्यवाद और पूंजीवाद इन दोनों के प्रति रणनीति, कार्यनीति और कार्यक्रम का विश्वस्तर पर एक ही मसौदा संभव है ? क्या समाज में कम्युनिस्ट पार्टी और उसके जनसंगठनों की प्रासंगिकता और जरूरत बची हुई है ?ये कुछ बुनियादी सवाल हैं जिन्हें हल किए बिना मार्क्सवाद की विरासत को आत्मसात् करना संभव नहीं है।जाहिर है देरीदा इनमें सेकिसी भी सवाल का जबाव नहीं देते।उन्हें सिर्फ मार्क्सवाद की विरासत को हासिल करने की चिन्ता है।गोया! विरासत नहीं उन्हें वसीयत की चिन्ता है।
वे चाहते हैं कि मार्क्सवाद की वसीयत उन जैसे लोगों के नाम लिख दी जाए जिन्होंने मार्क्सवाद की विरासत को बचाने,समृध्द करने में कोई भी योगदान नहीं किया है।मार्क्सवाद का मामला उत्तराधिकार या परंपरा का मामला नहीं है बल्कि कुर्बानी का मामला है।यह विमर्श का नहीं वर्ग संघर्ष का मामला है। यह पूंजीवाद के प्रति सदाशयता या पूंजीवाद को सदाचारी बनाने का नहीं बल्कि उसके प्रति अनवरत,समझौताविहीन निर्मम संघर्ष का मामला है।
देरिदा के समग्र दृष्टिकोण में सबसे मुश्किल मामला है भाषा का।देरिदा विमर्श के लिए अलंकारिक और धार्मिक भाषा चुनते हैं।इस तरह की भाषा द्विअर्थीपन लिए होती है।इसे आप किसी भी दिशा में मोड़ सकते हैं।मजेदार बात यह है कि भाषा के खेल में देरिदा सबसे पहले मार्क्स-एंगेल्स रचित भाषा और अवधारणा दोनों को ही नष्ट करता है। मार्क्सवाद के संदर्भ में देरिदा के भाषिक प्रयोग को देखें ''दायित्व के आह्वान से रहित कोई विरासत नहीं होती।विरासत हमेशा एक कर्ज की पुनर्पुष्टि होती है,लेकिन एक आलोचनात्मक, चुनावपरक और छनतीहुई पुनर्पुष्टि। इसीलिए हमने कई आत्माओं के अस्तित्व को माना है।''उपरोक्त,पृ.77) देरिदा से सवाल किया जाना चाहिए कि मार्क्स की कई आत्माएं उन्होंने कहां से खोज निकालीं ?यदि कई आत्माएं हैं ?तो उन्हें कौन सी आत्मा या आत्माएं पसंद हैं ?मार्क्स की किस आत्मा का कर्ज वे उतारना चाहेंगे ?किस आत्मा को आलोचनात्मक विवेक के साथ चुनना चाहेंगे।
सच यह है कि मार्क्स की अनेक नहीं एक आत्मा है और वह है क्रांति। देरिदा को विरासत में क्या चाहिए मार्क्सवाद के प्रति कोरी वाचिक आस्था या क्रांति। मार्क्स का कर्ज इस पृथ्वी पर से तबतक नहीं उतरेगा जब तक क्रांति नहीं होती। जाहिर है देरिदा को क्रांति पसंद नहीं है।जिनके अंदर क्रांति का जज्बा है।उसे पाने की छटपटाहट है,जो वर्ग संघर्ष के काम में लगे हैं वे ही मार्क्सवाद के असली वारिस हैं।आज जो लोग साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और सामंतवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं वे ही असली वारिस है। उल्लेखनीय है कि मार्क्स-एंगेल्स को क्रांति से कम कोई भी चीज पसंद नहीं थी।कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा क्रांति संभव नहीं है।देरिदा को कम्युनिस्ट पार्टियां पसंद नहीं हैं।संभवत: वे क्रांति, वर्ग संघर्ष,कम्युनिस्ट पार्टी से रहित मार्क्सवाद को विरासत में पाना चाहते हैं।
मजेदार बात यह है कि देरिदा ने अपने पूरे व्याख्यान में एक भी जगह साम्राज्यवाद या पूंजीवाद को नष्ट करने की बात नहीं की है।देरिदा जिन सवालों को उठाते हैं वे वस्तुत: बुर्जुआ समाज के सवाल हैं।वे क्रांति की संभावनाओं, चुनौतियों,क्रांति के दोस्त और दुश्मन किसी का भी जिक्र नहीं करते।देरिदा मूलत: अधिरचना के सवाल उठाते हैं।अधिरचना में सुधार के सवाल उठाते हैं।जबकि मार्क्सवाद आधार और अधिरचना दोनों के बुनियादी सवालों को पूंजीवादी व्यवस्था के विकल्प के रूप में समाजवादी समाज व्यवस्था के संदर्भ में विश्लेषित करते हैं।
देरिदा को समाजवादी व्यवस्था से परहेज है।उन्हें असल में 'मार्क्स के प्रेत' या उसकी आत्मा या 'स्पिरिट' की जरूरत है।मार्क्सवाद इनमें से कुछ भी नहीं है।वह तो दुनिया को बदलने का विज्ञान है। जिसकी कसौटी है जिन्दगी। जिन्दगी की कसौटी पर मार्क्सवाद की जो धारणाएं खरी उतरीं उन्हें माक्र्स-एगेल्स ने आत्मसात् किया।जो धारणाएं जिन्दगी की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं उन्हें खारिज कर दिया।मार्क्स-एंगेल्स के सामने पूंजीवाद की जो भयावह तस्वीर उभरकर आई थी उसी के आधार पर वे दोनों इस नतीजे पर पहुँचे कि समाज को बुनियादी तौर पर बदलना चाहिए।
देरिदा ने 'नया इंटरनेशनल' बुलाने का सुझाव रखा है।वे इसे अतर्राष्ट्रीय कानून के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखते हैं।इसके सामने मानवाधिकार,शरणार्थी समस्या, विदेशी कर्ज आदि के सवालों को विश्लेषित करने के लिए देरिदा को 'नया इंटरनेशनल' चाहिए।यह इंटरनेशनल पुराने से भिन्न होगा।देरिदा पुराने इंटरनेशनल के कर्ज से मुक्त होकर नए का आयोजन करना चाहते हैं।वे पुराने इंटरनेशनल के लक्ष्यों और उपलब्धियों पर गौर तक नहीं करना चाहते। देरिदा से सवाल किया जाना चाहिए कि ऐसी क्या एलर्जी है कि मार्क्सवाद की आत्मा के वारिस होना चाहते हो,मानवाधिकारों के चैम्पियन बनना चाहते हो,किंतु पहले,दूसरे और तीसरे इंटरनेशनल पर गौर करना नहीं चाहते।लेनिन के शब्दों में ''पहले इंटरनेशनल ने समाजवाद के लिए सर्वहारा के संघर्ष की नींव डाली।दूसरे इंटरनेशनल का काल वह काल था ,जब कई देशों में इस आंदोलन के व्यापक तथा जनव्यापी रूप में फैलने के लिए जमीन तैयार की गई।तीसरे इंटरनेशनल ने पहले और दूसरे इंटरनेशनल के काम के फल बटोरे,उसकी अवसारवादी,सामाजिक अंध-राष्ट्रवादी,बुर्जुआ तथा टुटपुंजिया खोटे को निकाल फेंका और उसने सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को कार्यान्वित करना प्रारभ कर दिया है।''(लेनिन,' अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन',प्रगति प्रकाशन मास्को, 1984,पृ.305)
देरिदा का मानना है नया इंटरनेशनल ''सामीप्य,पीड़ा और आशा का एक सूत्र है।''किंतु 'गुप्तसूत्र' है।''यह एक असामयिक सूत्र है,बिना पदवी,बिना ख़िताब ,बिना नाम के,जो भले गुप्त न हो लेकिन अभी सार्वजनिक भी नहीं है,बिनाअनुबंध,'विश्रृंखलित',बिना समायोजन,बिना पार्टी,बिना देश,बिना राष्ट्रीय समुदाय(हर तरह के राष्ट्रीय परिसीमन से परे,पहले अंतर्राष्ट्रीय),बिना सह-नागरिकता,बिना एक वर्ग से सामुदायिक संबंध के,यहाँ नए इंटरनेशनल का नाम उन्हें दिया जा रहा है जो तमाम उन लोगों के जो संस्थाहीन मैत्री गठबंधन की मांग करता है जो भले ही समाजवादी-मार्क्सवादी इंटरनेशनल में,सर्वहारा के अधिनायकत्व में,सभी देशों के सर्वहाराओं की सार्वभौमिक एकता की मसीहाई युगान्त घोषी भूमिका में विश्वास न करते हों,पर माक्र्स या माक्र्स की कम से कम एक आत्मा से अभी भी उत्प्रेरित हैं (वे अब जानते हैं कि वे एक से अधिक हैं),और खुद को नए,ठोस,वास्तविक ढ़ंग से एकजुट करने के लिए भी।भले यह गठबंधन एक पार्टी या मजदूरों के इंटरनेशनल की शक्ल न ले,बल्कि एक तरह का प्रति-मंत्रोच्चार हो-अंतर्राष्ट्रीय कानून की हालत,राज्य व राष्ट्र की अवधारणाओं इत्यादि की (सैध्दान्तिकी और व्यावहारिक)मीमांसा के रूप में:माक्र्सवादी मीमांसा का पुन: नवीनीकरण करने और विशेषत: इसे आमूल परिवर्तित करने के लिए।'' (पहल,उपरोक्त,पृ.74)यानी देरिदा की मूल चिन्ता मार्क्सवाद को आमूल पविर्तित करने की है। पूंजी के द्वारा श्रम के शोषण के तंत्र को उखाड़ फेंकने की नहीं है।
देरिदा के उपरोक्त व्याख्यान पर एजाज अहमद ने सही लिखा है कि यह ''साहित्यिक शैली का प्रदर्शनपरक पाठ है।एक ऐसा पाठ जो विश्लेषण नहीं करता,एक प्रदर्शन की प्रस्तुति करता है:शव को दफनाने और पुनप्र्राप्ति का एक अनुष्ठानी प्रदर्शन,इसीलिए शपथ,प्रेतीयता और प्रतिश्रुति के मॉटिफ।'' (पहल,उपरोक्त,पृ.85) देरिदा के बारे में एजाज अहमद का यह निष्कर्ष है कि वे ''दक्षिणपंथ के आदमी नहीं हैं।''एजाज अहमद ने देरिदा के व्याख्यान 'मार्क्स के प्रेत' को 'शोकगीत' नाम दिया है। ''इस पाठ में उन्होंने अपने लेखन का स्वर बहुत सावधानी के साथ चुना है।यह एक शोकगीत का,पराजित को सीख देने का स्वर है,जख्मों के उपचार की एक भाषा ताकि नयी प्रतिश्रुतियाँ की जा सकें,ताकि पूर्वजों की प्रतिश्रुतियों का निर्वाह किया जा सके,भले ही एक तरीके से।''(वही,पृ.94) देरिदा का मानना है कि विखण्डन ,मार्क्सवाद का आमूल परिवर्तन है।एजाज अहमद ने विखण्डन को मार्क्सवाद का आमूल परिवर्तन मानने से इंकार किया है।
एजाज अहमद ने सही सवाल उठाया है कि देरिदा यह सोचें कि क्या विखण्डन को आत्म-समीक्षा की जरूरत है या नहीं ? विखण्डन के नाम पर दक्षिणपंथी और धुर मार्क्सवाद विरोधियों ने विखण्डन की ओट से मार्क्सवाद पर हमले आखिर क्यों किए ? क्या इन हमलों को सुनिश्चित बनाने में विखण्डन के तत्व से कोई मदद मिली या नहीं ? इसका यह अर्थ नहीं है कि देरिदा दक्षिणपंथी थे।देरिदा ने मार्क्सवाद की असख्य गलतियों की तरफ ध्यान दिया है।यदि कितु विखण्डन की गलतियों कर तरफ देरिदा ने आलोचनात्मक नजरिए से नहीं देखा।
एजाज अहमद ने लिखा है कि '' यह एक ठोस सच्चाई है कि अधिक कुख्यात किस्म के मार्क्सवाद विरोधी उग्र सुधारवादों से देरिदा ने आम तौर पर खुद को दूर रखा है।लेकिन उत्तरी अमेरिका और विशेषत:येल में उनके अनेक निकट सहकर्मियों -जिनके कारण देरिदा को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली और जिनसे देरिदा ने स्वयं को दूर नहीं किया- की खातिर मार्क्सवाद का कोई अर्थ नहीं रहा है।उनमें कुछ दूसरों के मुकाबले अधिक तीखे विरोधी हैं।,लेकिन मार्क्सवाद विरोध उनकी सांझी विशिष्टता रही है।''(वही,पृ.97)
जगदीश्वर चतुर्वेदी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। पता- jcramram@gmail.com
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रविवार, 12 जुलाई 2009
शनिवार, 11 जुलाई 2009
देरिदा : संकट का मसीहा
देरिदा के विचारों ने सारी दुनिया में धूम मचाई है।किंतु भारत में देरिदा के विचारों के प्रभाव की वह गर्मी दिखाई नहीं देती जो अमेरिका,अफ्रीका,यूरोप में है।यहां तक कि लैटिन अमेरिका में जनप्रिय हैं। देरिदा भारत आए और दिल्ली,कोलकाता में धमाकेदार व्याख्यान भी दे गए। किंतु साहित्यालोचना, इतिहास, दर्शन,राजनीति विज्ञान आदि के क्षेत्रों में उनका वैसा स्वागत नहीं हुआ जैसा आम तौर पर होता है।इस उपेक्षाभाव के कारणों की खोज की जानी चाहिए। हिन्दी में साहित्यालोचना की इन दिनों जो अवस्था है उसमें नए की तरफ बुध्दिजीवियों का ध्यान ही नहीं जाता।नए के प्रति संशय का भाव है अथवा नए को न सीखने की जिद है।हिन्दी समीक्षा लंबे समय से पुनरावृत्ति की शिकार है। पुराने को ही बार-बार चमकाने या दोहराने की प्रवृत्ति जम गई है। वह अतीत में कैद हैं। शीतयुध्दीय राजनीति और प्रगतिशील साहित्यालोचना की रूढ़ियों की शिकार है। रूढ़ियों का अनुगमन करने के कारण इसमें नए के प्रति कोई आकर्षण नहीं है।स्थिति इतनी भयावह है कि मार्क्सवाद के बारे में,मार्क्सवादी पध्दति के प्रयोग के बारे में भी रूढ़ियां हावी हैं।
भारत के सामाजिक माहौल की एक विशेषता है कि वह हर चीज को हजम कर जाती है।वह पुराने को खत्म किए वगैर उससे मुक्त हुए वगैर नए को भी हजम कर जाती है।हर चीज को हजम कर जाने का विचार मूलत: जनतंत्र विरोधी है। सर्वसंग्रहवादी है।प्रतिगामी है। इसमें अप्रासंगिक पुराने विचारों के प्रति जबर्दस्त आग्रह है।वह प्रत्येक नए विचार को पुराने में समाहित करने के लिहाज से देखता है। यह पुराने का खजांची है।हमारे समाज में 'ओल्ड इज गोल्ड' की धारणा की गहरी जड़ें हैं। हिन्दी मे अतीतपंथी हैं या शीतयुध्दीय राजनीति की कोटियों में सोचने वाले हैं।ये दोनों ही रास्ते साहित्यालोचना की गंभीर बाधा हैं।
साहित्यालोचना को प्रासंगिक बनाने के लिए जरूरी है कि उसे सभी किस्म की आलोचना रूढ़ियों की कैद से मुक्त किया जाए।नियमों और सिध्दान्तों के बने-बनाए सांचों में रखकर जब भी आलोचना लिखी जाएगी उसमें जीवन की धड़कन सुनाई नहीं देगी।आज वास्तविकता यह है कि साहित्यालोचना से गंभीर वाद-विवाद गायब हैं।आलोचना की जगह व्यक्तिगत और आत्मगत तत्व आ गए हैं।भाषा के भदेस प्रयोगों के नाम पर भाषा में गंभीर विमर्श के माहौल को बिगाड़ा जा रहा है।साहित्यालोचना को सस्तेपन,गुटबाजी और व्यक्तिगत प्रमोशन स्कीम के हवाले कर दिया गया है।आलोचना पूरी तरह गायब हो गई है। आज आलोचक हैं किंतु आलोचना गायब है।आलोचना के नाम पर चाटुकारिता और रीतिवाद आ गया है। विमर्श,विवाद,संवाद,संपर्क की जगह व्यक्तिगत निंदा, जोड़तोड़, चालाकियों,नकल ,और झूठ ने ले ली है।इसी अर्थ में यह साहित्यालोचना के ह्रास का संकेत है। साहित्यालोचना के मौजूदा माहौल को बदलने के लिहाज से फ्रासीसी दार्शनिक ज्यांक देरीदा प्रस्थान बिन्दु हो सकता है।
ज्यांक देरिदा किसी भी किस्म की संकीर्णता और नियमों की कैद से मुक्त है।यह स्वभाव और सिध्दान्त में जनतांत्रिक है।इसकी आलोचना सैध्दान्तिकी का मिजाज हमारे समाज की वैविध्यपूर्ण जनतांत्रिक परिस्थितियों के अनुकूल है।देरीदा सबका है और किसी का नहीं है। भारत जैसे विषम समाज में देरीदा के विचारों की सबसे ज्यादा प्रासंगिकता है। वह वंचितों और दुखियों का पक्षधर है।इसके चिन्तन के केन्द्र में एक नहीं अनेक हैं।अभी तक आलोचना निज को केन्द्र में रखकर लिखी जाती रही है।देरीदा ने आलोचना और दर्शन को निज के दायरे से बाहर निकालकर अन्य के दायरे में लाकर खड़ा किया है।वह अन्य, अन्यत्व,वंचित,काले,अल्पसंख्यक,स्त्री आदि के सवालों को केन्द्र में रखकर सोचता है।उसकी चिंता के केन्द्र में मानवाधिकार हैं।वह मानवाधिकारों की चेतना का विकास करते हुए सामाजिक परिवर्तन देखना चाहता है।उसकी चिन्ता क्रान्ति नहीं है।रेडीकल जनतंत्र है। सर्वसत्तावादी शासन नहीं जनतांत्रिक शासन है।देरीदा मानवीय इच्छाशक्ति का प्रवक्ता है।मानवीय जीवन को उसने सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा है।वह सोचने,समझने और देखने की सभी नई और पुरानी बनी-बनायी कोटियों को अपदस्थ करता है।आप जो हैं।वह नहीं रहते।वह बदलने के लिए मजबूर करता है।उसके समूचे चिन्तन के केन्द्र में एक ओर जनतंत्र है दूसरी ओर मानवीय विकास है।जनतंत्र और विकास के नजरिए से वह हाशिए के लोगों या वंचितों के बारे में सोचता है।
भारत में देरिदा के जनप्रिय न हो पाने का प्रधान कारण है जातिप्रथा और उच्चवर्ण के दृष्टिकोण का वर्चस्व।इसके अलावा वेदान्त और कठमुल्ला माक्र्सवादी नजरिए का बौध्दिकों पर गहरा असर।दूसरा प्रधान कारण है आलोचना का दर्शन से अलगाव। मजेदार बात यह है कि दर्शन में जिस गति से भारत में विगत पचास वर्षों में नई समझ पैदा हुई है उसका साहित्यालोचना के साथ तकरीबन संवाद नहीं हुआ है।उल्लेखनीय है कि दर्शन और सैध्दान्तिकी के साथ संवाद के बिना आलोचना मर जाती है।साहित्यालोचना की प्राणवायु साहित्य के साथ-साथ दर्शन से आती है।वास्तव जीवन के साथ-साथ सैध्दान्तिक विमर्श से आती है। हिन्दी की आलोचना के पुरोधा आलोचक नामवर सिंह को थियरी से गहरी चिढ़ है। जबकि थियरी के बिना विकास संभव नहीं है।हिन्दी के चर्चित साहित्यकार,सम्पादकों को चटपटी बातें कहने, सनसनीखेज बातें करने, उठा-पटक और पुरस्कारों में जितनी रूचि है उतनी गंभीर विमर्श में नहीं है।यही वजह है कि हिन्दी में गंभीर लेखन की न तो कोई पत्रिका है और न कोई शोध संस्थान है।हिन्दी के अधिकांश आलोचक ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिसमें गंभीर बहस नहीं हो सकती।साहित्यिक पत्रिकाएं कामचलाऊ नजरिए से प्रकाशित हो रही हैं।इन पत्रिकाओं को देखकर लगता ही नहीं है कि हम 21वी शताब्दी में हैं। कमोबेश रूप में इन पत्रिकाओं में उन्नीसवीं शताब्दी के वर्गीकरण और अवधारणाओं के आधार पर सामग्री प्रकाशित हो रही है।अनुसंधान और गंभीर विमर्श से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं को एलर्जी है।इसका प्रधान कारण है विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी के प्रति अगंभीर और अनुसंधान विरोधी रवैयये का होना।स्थिति की भयावहता का अनुमान सिर्फ इसी तथ्य से लगा सकते हैं कि हिन्दी के अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षक शोध प्रविधि के सामान्य नियमों से अनभिज्ञ हैं।इस अज्ञानता को देखने के लिए बाजार में उपलब्घ शोधपरक कृतियों को देखा जा सकता है।इन सब बातों को रखने का मकसद किसी का अपमान करना नहीं है। किसी को छोटा या हेय ठहराना नहीं है।अपितु इस तथ्य की ओर ध्यान खींचना है कि हिन्दी का साहित्य जगत गंभीर संकट में फंसा है।इस संकट से निकलने का एक ही रास्ता है कि सबसे पहले साहित्यालोचना अपने को गंभीर विचार- विमर्श में शामिल करे।देरीदा इस संदर्भ में हमारे लिए पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं।देरीदा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। हमारी परंपरा में बहुत कुछ ऐसा है जिससे देरीदा को समृध्द कर सकते हैं।
मजेदार बात यह है कि हम अपनी परंपरा का मूल्यांकन करते हुए आगे की ओर नहीं हमेशा पीछे की ओर जाते हैं।हमें इस सवाल पर विचार करना होगा कि परंपरा का मूल्यांकन करते-करते हमारी दृष्टि परंपरावादी क्यों हो जाती है।हम परंपरा को अतीत के खूंटे से मुक्त क्यों नहीं कर पाते।जिस आलोचक ने भी परंपरा का मूल्यांकन किया अपने को अतीत का हिस्सा बना लिया।जबकि देरीदा ने विरासत का मूल्यांकन करते हुए विरासत को, परंपरा को अतीतबोध से मुक्त किया।आधुनिक विमर्श,आधुनिक सामाजिक,सांस्थानिक, संरचनात्मक प्रक्रियाओं से जोड़ा।
हमारे समर्थ आलोचक परंपराओं की खोज के क्रम में प्रवेश आलोचनात्मक विवेक के साथ करते हैं किंतु लौटते हैं परंपरा के आराधक बनकर,अनालोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ।जिसने भी परंपरा का मूल्यांकन किया वह परंपरा का अंग बन गया।मेरे हिसाब से किसी आलोचक के लिए यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि जीते जी परंपरा या विरासत में चला जाए।हमारे यहां विरासत में जाने की जितनी बेचैनी है उतनी भविष्य में जाने की नहीं है। वर्तमान में जीने में नहीं है। परंपरा का जितना मूल्यांकन हुआ है उतना वर्तमान और भविष्य का नहीं हुआ।विचारों की दुनिया में पुराने को यदि पुराने के आधार पर परखा जाएगा तो पुराना अपने पुरानेपन से मुक्त नहीं होगा।यदि पुराने को वर्तमान के आधार पर,नए के आधार पर परखेंगे तो नए का जन्म होगा।परंपरा के मूल्यांकन में हमने अभी तक अपनी सारी ऊर्जा जो उपलब्ध है, जिसे हम कमोबेश जानते हैं उसी की खोज और पैकेजिग बदलने में लगाई है। परंपरा या विरासत के मूल्यांकन का अर्थ तब खुलता है जब हम अनुपलब्ध को खोजते हैं। हम जब अनुपलब्ध को खोजते हैं तब ही नए का जन्म होता है।किंतु परंपरा की खोज के नाम पर अब तक का सारा कारोबार मूल की प्रतिलिपि तैयार करने का रहा है।खासकर हमारी आलोचना ने परंपरा के नाम पर जो कुछ दिया है वह पहले से उपलब्घ था।हमारे ये आलोचक मूल को उसकी प्रतिलिपि से अलग नहीं कर पाए।परंपरा के जिन रूपों या व्यक्तित्वों या जिस साहित्य परंपरा की खोज की गई उसमें हमें यह तथ्य देखना होगा कि उसमें मूल और प्रतिलिपि में क्या फर्क है ?इसके लिए विश्लेषण का कहां तक इस्तेमाल किया गया है ?जो उपलब्ध था क्या उसे भिन्न भाषा में पेश कर दिया गया है।अथवा यहां-वहां से उध्दरण जुटाकर सजा दिया गया है।
परंपरा का मूल्यांकन सिर्फ भाषा का खेल नहीं है।हमें देरीदा की यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि मौलिक का जन्म कभी भाषा के आधार पर नहीं होता। भाषा को लुप्त अनुभवों का प्रतिनिधित्व करने का हक नहीं दे सकते।भाषा के जरिए लुप्त की खोज नहीं की जा सकती।देरिदा ने लिखा है कि मौलिक का जन्म,शुध्द का उदय कभी भी भाषा के आधार पर नहीं हो सकता।लेखन को वाक् के मातहत नहीं रख सकते।यदि ऐसा करते हैं तो यह हमारा ऐतिहासिक पूर्वाग्रह होगा।प्रत्येक 'साइन' में एक 'सिगनीफायर' होता है जो अन्य को व्यंजित करता रहता है।अर्थभेद पैदा करता है।इसी तरह 'सप्लीमेंट' या पूरक के विचार को लें इसमें बड़े रोचक सवाल निहित हैं। हम मौलिक के बारे में सोच सकते हैं।किंतु मौलिकता जैसी कोई चीज नहीं होती।बल्कि अपूर्ण मौलिक होता है।जिसके कारण हम 'पूरक' का सृजन करते हैं।इसे हम 'अतिरिक्त' भी कह सकते हैं।पूर्ण में इसे जोड़ सकते हैं।इससे संपूर्ण की कमजोरी सामने आ जाएगी।इसी को देरिदा ने 'लॉजिक ऑफ दि सप्लीमेंट' कहा है।
देरिदा ने कहा कि वर्तमान सिर्फ वर्तमान है।जब तक वह अपनी भिन्न पहचान बनाए रखता है,हम जब अनुपस्थित की खोज करते हैं तो अनुपस्थित ने जो संकेत छोड़े हैं उन्हीं पर लौटते हैं।जब हम मौलिक वर्तमान की बात करते हैं तो उसका उदय भी खोजें।वह वर्तमान में ही होता है।अतीत में नहीं।दर्शन हमेशा जो 'मौजूद' है उसकी बात करता है, क्योंकि जीवंत अनुभवों की वर्तमान में ही परीक्षा संभव है।
देरिदा की नजर में प्रत्येक पाठ ,दुहरा पाठ होता है।इसे रीडिंग या पठन के स्तर पर देख सकते हैं।इसमें अन्तर्विरोध भी होते हैं।पाठ की दूसरी रीडिंग खुली होती है।उसकी कोई सिंथीसिस संभव नहीं है।देरिदा ने 'ग्राम्मटोलॉजी' को लेखन का विज्ञान कहा।वह लेखन के परंपरागत मॉडल के परे जाता है।देरिदा लेखन के उदय और सैध्दान्तिकी पर रोशनी डालते हैं।लेखन और मेटाफिजिक्स के अन्तस्संबंधों पर रोशनी डालते हैं।'मेटाफिजिक्स ऑफ प्रिजेंस' की धारणा के तहत बताते हैं कि वक्ता की शारीरिक मौजूदगी उसकी वक्तृता की प्रामाणिकता है।वाचन से ही हम लेखन की ओर बढ़े हैं।इसी को देरीदा ने 'दि साइन ऑफ दि साइन' कहा है।चूंकि रीडिंग के समय लेखक मौजूद नहीं रहता जिससे कि वह पाठ को वैधता प्रदान कर सके।यही वजह है कि वाचिक भाषा को सीधे विचारों से संबंधित मान लिया गया है।इसी अर्थ में लेखन और वाक् एक-दूसरे के पूरक हैं।देरीदा का मानना था कि लेखन न केवल अर्थ को प्रदूषित करता है,वरंच वक्तृत्व का स्थान भी ले लेता है,क्योंकि वक्तव्य सदैव पूर्व-लिखित है।देरिदा के शब्दों में ' स्पीच ऑलवेज ऑलरेडी रिटेन'।ये बातें गोपीचंद नारंग ने अपनी पुस्तक 'संरचनावाद,उत्तर- संरचनावाद एवंप्राच्य काव्यशास्त्र' में लिखी हैं।(पृ.164)किंतु नारंग साहब यह भूल गए कि देरीदा ने ये बातें पुस्तक के संदर्भ में कही थीं।नारंग साहब की मुश्किल यह है कि वे देरीदा के विचारों से गुजरते हैं।किंतु विचारों के सन्दर्भ को छिपा जाते हैं।आलोचना का यह रूपवादी तरीका है।देरीदा ने असल में 'पुस्तक' के संदर्भ में इस समस्या को खोला है।सुधीश पचौरी ने देरीदा के इस पक्ष की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ''पश्चिमी परंपरा में 'पुस्तक' के मायने 'स्थिर' और 'बंद' ज्ञान है।माना जाता है कि ज्ञान पुस्तक में 'कैद' हो जाता है।ज्ञान लेखक की कैद में होता है।उसी में लेखक रहता है।यही उसकी उपस्थिति है,-'प्रेजेंस' है जो अभीष्ट अर्थ को संभव करती है।दूसरे शब्दों में लेखक न होगा तो अर्थ न होगा,पुस्तक न होगी।देरीदा बताते हैं कि अच्छा लेखन हमेशा समग्रता में समझने योग्य होता है जो किसी किताब में पूरी तरह सुरक्षित होता है।पुस्तक का विचार समग्रता का विचार है।समग्र का व्यंजक है लेकिन यह समग्रता कहां से आई ?जरूर पूर्व-स्थित समग्रता के बिना यह समग्रता संभव नहीं है।इस तरह कथित पुस्तक की वस्तुगतता,समग्रता,और लेखन के पीछे और पहले एक विचार मौजूद रहता है। यह पहले मौजूद विचार,पूर्व-स्थित विचार ही वाक्-केन्द्रिक या शब्द-केन्द्रिक (लोगोसैंट्रिक) तत्व है जो वाचिक सत्य की प्रामाणिकता को मानकर चलता है।प्रकट पुस्तक के पीछे लेखक का बोलना छिपा होता है।उसकी समग्रता इसे किसी एक अर्थकेन्द्र की ओर ले जाने लगती है।''(देरिदा का विखंडन और साहित्य,1997,पृ.28)
देरिदा के लेखन में अवधारणाओं का महत्व है।अवधारणाओं का महत्व ऐसे समय स्थापित किया गया जब पश्चिम में अवधारणाओं के महत्व को खारिज किया जा रहा था।पुराने को ठुकराया जा रहा था।यह मान लिया गया था कि परवर्ती पूंजीवाद के वैचारिक प्रपंचों को समझने में पुराना ज्ञान एकदम बेकार की चीज है।आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद के अनेक पुरोधा अब तक की तमाम वैचारिक केटेगरी,अवधारणाओं आदि को अप्रासंगिक घोषित कर रहे थे।ऐसे में देरीदा के लेखन ने गंभीरता के साथ नई-पुरानी सभी अवधारणाओं की विस्तार से व्याख्या पेश की।इस क्रम में बहुत कुछ नया आया।साथ ही हमारा समाज सब कुछ खारिज करने वाली समीक्षा से बच गया।हम अवधारणाओं के लोप से बच गए। अवधारणाओं में सोचने की पध्दति का बचे रहना देरीदा का परवर्ती पूंजीवाद के प्रति सबसे बड़ा हस्तक्षेप है।
हिन्दी आलोचना के लिए देरिदा इस अर्थ में प्रासंगिक हैं कि हमारे यहां अवधारणा का संकट गहराता जा रहा है।पीसी जोशी ने तो 'अवधारणा का संकट' नाम से ही किताब लिख डाली।मार्क्सवादियों में रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी अवधारणाओं में नए के नाम पर सबसे ज्यादा समस्याएं पैदा की हैं।सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी शिविर के पतन के बाद इस शिविर के पक्षधर लेखकों के सामने अवधारणा का संकट सबसे विकराल रूप में आया।इसी तरह अमेरिकी भविष्यवादियों के यहां अवधारणा का संकट सबसे तीव्र रूप में अभिव्यक्ति पा रहा है।इसी तरह मासकल्चर के सिध्दान्तकारों खासकर समाज शास्त्रियों के यहां भी इस संकट को साफतौर पर देखा जा सकता है।अवधारण्ाा का संकट इस बात का द्योतक है कि पूंजीवाद गहरे संकट में है। सामाजिक विकास के क्रम में जब भी सामाजिक व्यवस्थाओं के सामने संकट या संक्रान्ति की अवस्था आई है अवधारणा का संकट सामने आया है।परवर्ती पूंजीवाद के संकट की अवस्था में हमेशा फ्रांस के विचारकों ने आगे बढ़कर इस संकट के हल तलाश करने की कोशिश की है।आधुनिक फ्रंासीसी विचारकों ने बड़े पैमाने पर सारी दुनिया के बौध्दिकों को प्रभावित किया है।खासकर उन बुध्दिजीवियों को प्रभावित किया है जो समाज में विकास के रथ को आगे ले जाना चाहते हैं।दर्शन,साहित्य,कला,संस्कृति,मासकल्चर आदि सभी क्षेत्रों में फ्रांसीसी बौध्दिकों ने नेतृत्वकारी भूमिका अदा की है।परवर्ती पूंजीवाद की कलाबाजियों से लड़ने का उनके पास बौध्दिक कौशल रहा है।इसके लिए ये लोग बार-बार परंपरा में गए हैं।पुराने दर्शन के पास गए हैं।वहां से विवाद खड़े करते हुए नए जमाने की जरूरतों के लिहाज से उन्होंने विचारों, धारणाओं आदि को खोला है।
देरिदा ने भी संकट की अवस्था में परंपरा के दरवाजे पर दस्तक दी।किंतु साहस के साथ।परंपरा के पास जाने के लिए,नए को व्यक्त करने के लिए,धारणाओं में सोचने के लिए,सही को सही और गलत को गलत कहने के लिए साहस की जरूरत होती है।जिस बुध्दिजीवी में साहस का अभाव है।वह बुध्दिजीवी कहलाने का हकदार नहीं है।साहस के तत्व को देरीदा ने महत्व दिया है।विचारों या जीवन में साहस के तत्व का प्रयोग जोखिम उठाए बिना संभव नहीं है।
बतर्ज देरिदा साहस और जोखिम ये दो बुनियादी तत्व हैं जो बुध्दिजीवी में होने चाहिए।मार्च 1998 में दिए एक साक्षात्कार में देरिदा ने कहा कि साहस एक वर्चु है।खासकर बौध्दिक वर्चु है।अक्षम और गैर-जिम्मेदार बुध्दिजीवियों में ह्रास की ओर जाने का साहस होता है।देरीदा ने लिखा है कि मैं यह नहीं सोचता कि आज सारे बुध्दिजीवी पतन की ओर जाने का साहस कर रहे हैं।मैं यह भी नहीं मानता कि वे 'उत्तर -इतिहास' और संशयवाद के शिकार हो चुके हैं।असल में ,'उत्तर -इतिहास', 'संशयवाद', 'बुध्दिजीवियों की भूमिका' आदि सवालों पर मीडिया की शैली में नहीं लिखा जा सकता।मीडिया में इन सवालों के संक्षिप्ततम जबाव देने से अच्छा है चुप रहो।कुछ लोग इसे अभिजनवाद कहेंगे,तो कहें।क्योंकि ये मसले जटिल हैं।इन्हें संक्षिप्त रूप में पेश करके सुलझाना संभव नहीं है।खासकर ऐसे बुध्दिजीवी को संक्षेप में समझाना मुश्किल है जो जनता का बुध्दिजीवी हो।
विश्व स्तर पर समाजवाद के पराभव पर चिन्ता व्यक्त करते हुए देरिदा ने 'स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्स' कृति में लिखा कि आज एक नए किस्म के इंटरनेशनल के आयोजन की जरूरत है।आज विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा एकता की जरूरत है।इस एकता को आप समाजवादियों की इंटरनेशनल जैसी एकता के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते।इसके बावजूद मैं इंटरनेशनल पदबंध के इस्तेमाल के पक्ष में हूँ।इस पदबंध को रखने का अर्थ है क्रांति और न्याय की स्प्रिट को बनाए रखना।जिसके तहत वंचितों,मजदूरों आदि की एकता को राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के बाहर ले जाकर गैर सरकारी तौर पर हासिल करना।इसके कुछ मानवीय लक्ष्य होंगे।
देरिदा ने कहा कि आज हमारे बुध्दिजीवी ग्लोबल प्लेग के शिकार हैं।वे एकदम हाशिए पर हैं।आज विश्व की दुर्दशा को कुछ आंकड़ों के जरिए अच्छी तरह समझ सकते हैं।मसलन् लाखों बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं।पचास फीसदी औरतें उत्पीडन की शिकार होती हैं। साठ मिलियन गायब हो जाती हैं।सालाना 30 मिलियन औरतें कुपोषण की शिकार होती हैं। 23 मिलियन लोग एड्स के शिकार हैं।इनमें से 90 फीसदी लोग अफ्रीका में रहते हैं।वहां के बजट का पांच फीसदी हिस्सा एड्स पर खर्च हो रहा है।इसी तरह स्त्री भ्रूण-हत्या एवं बाल-श्रमिकों की भी बड़ी तादाद भारत सहित अनेक देशों में है।करोड़ों लोग अशिक्षित हैं। तकरीबन 140 मिलियन निरक्षर बच्चे हैं।मैं ये आंकड़े इसलिए बता रहा हूँ कि आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह की एकता की जरूरत है।यह एकता पार्टी,राष्ट्र आदि के आधार पर हासिल नहीं की जा सकती।इनमें से कोई भी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा नहीं सकता।मैं समझता हँ कि आज ग्लोबल पूंजीवाद का जमकर विरोध किया जाना चाहिए।
देरिदा ने कहा कि ग्लोबलाइजेशन की दो प्रमुख समस्याएं हैं प्रथम राज्य का लोप।दूसरा राजनीति का नपुंसकीकरण।इन दोनों समस्याओं के समाधान के लिए हमें दर्शन की ओर जाना चाहिए।आज की सभी राजनीतिक खोजों का दार्शनिक आधार है।वे दर्शन की धुरी हैं। असली राजनीतिक कार्रवाईयां हमेशा दर्शन से जुड़ी होती है।सभी राजनीतिक कार्रवाईयों, फैसलों आदि के अपने नियम होते हैं।हमें इन सबको जानकर राज्य के लोप का जमकर विरोध करना चाहिए।हमें राष्ट्र के उन रूपों का भी विरोध करना चाहिए जब वह राष्ट्रवाद के सामने समर्पण कर देता है।हमें विश्लेषित करके हर समय उसके नियम बनाने चाहिए।देरीदा ने कहा कि हमें सोवियत संघ के पतन से सबक लेना चाहिए।वहां सर्वसत्तावाद था।सर्वसत्तावाद से माक्र्सवाद की मुक्ति जरूरी है।सारा माक्र्सवाद त्यागने की जरूरत नहीं है।देरीदा ने लिखा कि '' वे चाहते हों या नहीं,जानते हों या नहीं,समूची पृथ्वी के तमाम पुरूष और स्त्रियाँ माक्र्सवाद के वारिस हैं।''
सामान्य तौर पर ग्लोबलाइजेशन के आने के बाद से बुध्दिजीवियों में यह धारणा पैदा हो गई कि अब यूटोपिया का अंत हो चुका है।इस पर देरीदा ने कहा कि यूटोपिया में आलोचनात्मक क्षमता होती है।आप इसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते।यूटोपिया को लोग सहज रूप में स्वप्न,गैर-शिरकत,असंभव आदि से जोड़कर देखते हैं।इसका अर्थ है कि यूटोपिया को अस्वीकार करो।उसके लिए कार्रवाई मत करो।मैं भी बार-बार 'इम्पॉसिविल' की बात करता हूँ।इसका अर्थ 'यूटोपियन' नहीं है।बल्कि इसके विपरीत यह स्वयं को इच्छाओं की ओर मोड़ना है।कार्रवाई में जाना है।निर्णय पर लाना है।यह यथार्थ का रूप है। इसकी अपनी अवधि,अनिवार्यता आदि है।
आज सारी दुनिया में करोडों लोग शरणार्थी समस्या से जूझ रहे हैं।अनेक राजनीतिक दल और देश इस समस्या के आधार पर सामान्य जनता के जीवन में विषवमन करते रहते हैं। हमारे यहां संघ परिवार के लोग इस मामले में सबसे आगे हैं।शरणार्थी समस्या पर विचार करते हुए देरीदा ने लिखा कि इस समस्या का संबंध न्याय की धारणा से जुड़ा है। र्सशत्त आतिथ्य की धारणा को इसका आधार नहीं बनाया जा सकता।यदि कोई इसे राजनीति में लागू करना चाहेगा तो इसके प्रतिगामी असर होंगे। आतिथ्य के सिध्दान्त को बदलने के लिए हमें पूरी संस्कृति, आदतें, संस्कार,कानून आदि को बदलना होगा।
देरिदा ने कहा कि शरणार्थी समस्या के प्रति उन्मादकारी,राष्ट्रवादी प्रतिक्रियाएं आती रहती हैं। ये सामान्य लक्षण हैं।आज इस संदर्भ में कार्यभार तय करना बेहद जरूरी है। पिछले दिनों में 'रिफ्यूजी' शब्द की परिभाषा बदली है।'रिफ्यूजी',ं'एग्जाइल', 'डिपोटर्ेट', 'डिस्प्लेस्ड पर्सन', और 'विदेशी' पदबंध का अर्थ बदला है। इस समस्या पर विचार विमर्श करने के लिए भिन्न किस्म के विमर्श और व्यवहारिक प्रतिक्रिया की जरूरत है। इससे नागरिकता की राजनीति और राष्ट्र के साथ लगाव का अर्थ भी बदल जाएगा।कोशिश होनी चाहिए कि 'आतिथ्य का कानून' सकारात्मक हो।यदि यह असंभव है तो इसकी प्रत्येक को तहकीकात करनी चाहिए। अपनी आत्मा और चेतना के स्तर पर इस सवाल पर सोचना चाहिए।
देरिदा ने 'होस्पीटेलिटी' या आतिथ्य की धारणा के बारे में कहा कि आतिथ्य का अर्थ है बिनार् शत्त अन्य का स्वागत।अतिथि से प्रमाण मांगे बिना,नाम पूछे बिना,संदर्भ पूछे बिना स्वागत किया जाना चाहिए।अन्य के साथ यह पहला संबंध होगा।हम अपनी जगह, घर के दरवाजे , भाषा,संस्कृति,राष्ट्र,राज्य और स्वयं को खोल दें। बगैरर् शत्त के अतिथि के आगे खुलना होगा।जब मैं 'बिनार् शत्त' कहता हूँ तो यह शब्द भय पैदा करता है।जब मैं कहता हूँ कि मेरे घर,मेरी जगह,भाषा,संस्कृति,शहर,राष्ट्र आदि में बिनार् शत्त अन्य को आने दो। तो इसका अर्थ यह भी है कि जब अन्य मेरी जगह आएगा तो असुविधा पैदा कर सकता है। चीजें अस्त-व्यस्त कर सकता है।सब कुछ उलट-पुलट कर सकता है।उपेक्षा कर सकता। यहां तक कि नष्ट भी कर सकता है।इससे भी बुरा हो सकता है।पूरी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है।मैं इसके लिए तैयार हूँ।चूँकि यह बिनार् शत्त आतिथ्य है अत: इसमें अच्छा-बुरा कुछ भी हो सकता है।यह भी संभव है कि परंपरागत दोस्ती प्रतिगामी शक्ल ले ले।इसके बावजूद हमें बिनार् शत्त आतिथ्य पर अड़े रहना होगा।देरीदा ने आतिथ्य की नई धारणा के जरिए सारी दुनिया में उभर रही शरणार्थी समस्या पर विस्तार से विचार किया है। देरीदा की सहानुभूति शरणार्थियों के साथ है।देरीदा ने कहा कि ज्यों ही आप आतिथ्य की नई परिभाषा पर विचार करने जाएंगे आपको नए किस्म की नागरिकता की परिभाषा बनानी होगी।
देरिदा ने ग्लोबलाइजेशन का विरोध किया और इसके खिलाफ नए किस्म के विश्वव्यापी प्रतिरोध आंदोलन खड़े करने का आह्वान किया।देरीदा ने कहा कि मैं 'ग्लोबलाइजेशन' पदबंध का इस्तेमाल नहीं करता।यह अस्पष्ट धारणा है।यह कोई नई चीज नहीं है।बल्कि काफी पहले से चला आ रहा है।यह भ्रमित करने वाली धारणा है।इसमें अनेक धारणाएं,राजनीतिक चालाकियां,रणनीतियां आदि आ गई हैं।उल्लेखनीय है कि परवर्ती पूंजीवाद के मौजूदा दौर को ग्लोबलाइजेशन के नाम से पुकारे जाने के खिलाफ देरीदा अकेले विचारक नहीं हैं।बल्कि अनेक विचारक हैं।
देरिदा के यहां अवधारणाओं का खजाना है।देरिदा पर बात करने के लिए उसकी धारणाओं की सही समझ का होना बेहद जरूरी है।देरिदा के लिए ग्राम्माटोलॉजी वस्तुत: लेखन का विज्ञान है।इसे व्याख्यायित करने के लिए वह लेखन के परंपरागत मॉडल के परे जाता है।'लोगोसेंटरिज्म' के तहत बताता है कि ज्ञान की जडें भाषा में हैं।अब हम इन्हें खो चुके हैं। देरिदा के मुताबिक भाषा भगवान की देन है।अथवा किसी अन्य,पराशक्ति,विचार,महान स्प्रिट,सेल्फ आदि की देन है।यही हमारी भाषा,विचारों और एक्शन का मूलाधार है।उसी ने वायनरी रूपों को बनाया है।वायनरी की जो श्रृंखला मिलती है वह हायरार्की में अवस्थित है।
'बायनरी अपोजीशन' हायरार्की के रूप में आते हैं।यह लोगोसेंटरिज्म का परिणाम है।इस धारणा पर विचार करते समय देरीदा की ज्यादा रूचि मार्जिन या हाशिए में है।किंतु 'सप्लीमेंट' की धारणा भी महत्वपूर्ण है।यह धारण्ाा उसने रूसो से ली है।हिन्दी में इसे पूरक कह सकते हैं।देरीदा के यहां यह अतिरिक्त है,स्वयं में पूर्ण है।देरिदा का तर्क है जो पूर्ण है उसमें जोड़ा नहीं जा सकता।वहां पूरक की जरूरत नहीं होती।जहां अभाव है वहां 'ओरिजनरी लैक' यानी अनुपस्थित चीजों के सम्पूरक का प्रयोग किया जाना चाहिए।इसके साथ ही 'ट्रेस' यानी गैर-मौजूदगी के सूचक का प्रयोग किया जाना चाहिए।
विखंडन की रीडिंग रणनीति के कुछ सामान्य तत्व हैं।यहां जो 'अपोजिस्टस' हैं।वे एकीकृत हैं।एक-दूसरे पर निर्भर हैं।अन्तर्निहित हैं।इसीलिए उनमें एक की उपस्थिति दूसरे के बिना संभव नहीं है।विभेद और भिन्नता भाषा में निहित हैं।प्रत्येक शब्द भाषा के खेल में सक्रिय होता है।विखंडन के जरिए पाठ की अन्तर्विरोधी रीडिंग खत्म नहीं हो जाती।बल्कि पाठ में निहित अर्थ को पाठ में ही सरल बनाती है।
विखंडनकारी रीडिंग का तर्क है कि प्रत्येक पाठ स्वयं को विखंडित करता है।किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि पाठ का अंत हो गया है।बल्कि विचारोत्तेजक रीडिंग लेखन के रूपों का उद्धाटन करती है,वह शब्द और अर्थ के प्रति स्व-चेतन है।यह संभव है कि वह विश्रृंखलित यथार्थ पेश करे किंतु वह हमेशा भाषा में होती है।देरीदा का मानना है कि भाषा में भिन्नता होती है।भिन्नता को देरिदा ने सकारात्मक अर्थ में प्रयोग किया है।खासकर भिन्नता की संरचना में उसका प्रयोग किया है।देरिदा का मानना है कि अर्थ स्वयं सिगनीफायर में नहीं होता।बल्कि नेटवर्क में होता है।अन्य चीजों के संबंध में होता है।देरिदा का मानना है कि अस्तित्व के मूल में 'सार' नहीं 'भिन्नता' या डिफरेंस रहता है।देरिदा ने यह भी कहा कि परम अस्मिता नाम की कोई चीज नहीं होती।व्यक्ति में व्यक्ति जैसा कुछ भी नही होता।'ट्रांस हिस्टोरिकल सत्य' वस्तुत: भिन्नता का परिणाम है।भिन्नता के सिस्टम के बाहर कुछ भी नहीं है। देरिदा हमें 'खेल' या 'प्ले' पदबंध के साथ खेलने के लिए उत्साहित करता है।'खेल' में हार-जीत संभव है।अंत में सिर्फ खेल रह जाता है।देरिदा ने स्थान और समय के प्रति भिन्नता के सवाल उठाए हैं।वह टाइम और स्पेस के बीच व्यक्ति या मौजूदगी को रखकर देखता है। देरिदा ने आण्टोलॉजी के प्रत्युत्तर में हाण्टोलॉजी पदबंध का प्रयोग किया है।इसी अवधारणा के तहत उसने 'भूत' या 'घोस्ट' के रूपक का प्रयोग किया है।'स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्स' कृति में पहलीबार देरिदा ने 'भूत' पदबंध का प्रयोग किया है।यह वस्तुत: परंपरागत अर्थ में तथ्यों की छानबीन की पध्दति का एक रूप है।इसके माध्यम से देरीदा बताना चाहते हैं कि तथ्यों को बार-बार संगठित किया जा सकता है।खासकर अतीत की घटनाओं को खोजने के लिए।देरीदा की नजर में डाटा दृश्य एवं काल्पनिक होते हैं।उनसे दृष्टि/ इमेज/ संगठन का दृश्य अथवा उसके पर्यावरण का पता चलता है।डाटा ऑर्किटेक्चर है, दूसरी ओर उसे प्रतीकात्मक व्यवस्था या तर्क के कच्चे डाटा पर आरोपित करते हैं।देरिदा ने लिखा है कि दिन के उजाले के अभाव में हमें भूत सताते हैं।वे दीवारों के जरिए आते हैं वे ऐसे गड्डे खोदते हैं जिन्हें भरा नहीं जा सकता। 'खोरा' पदबंध के जरिए देरीदा 'अन-अन्तर्विरोधी' तर्कों का उल्लंघन करते हैं।'नेगेटिव थियोलॉजी' के जरिए देरिदा बताते हैं कि प्रत्येक भाषा अधूरी होती है।सत्य तो अतिसारतत्व है।या मनुष्य की परिधि के बाहर है। देरिदा ने 'रेजिस्टेंस' की धारणा का व्यापक प्रयोग किया है।यह धारणा मूलत: मनोशास्त्र की देन है।मनोरोगी की प्रतिरोध भावना को थेरपिस्ट कम करता है।वह मरीज के विद्रोह का प्रतीक है।इसमें 'सहयोग' एवं 'प्रतिरोध' अन्तर्निहित है।इस धारणा का ऐतिहासिक महत्व है। मनोशास्त्री के यहां प्रतिरोध का अर्थ बगावत नही है,क्रांति नहीं है बल्कि विश्लेषण है।
देरिदा ने सवाल उठाया कि आदमी कब मरता है ? आदमी की जब इच्छाशक्ति मर जाती है तब मर जाता है।यह बात देरिदा ने गिलिस देल्युज की कृति ''दि लॉजिक ऑफ सेंस''(1969) के हवाले से कही।देरिदा ने लिखा कि प्रत्येक मौत विशिष्ट और असामान्य होती है।एक मर्तबा देल्युज ने कहा था कि हमें जानना चाहिए कि किताबों की दुनिया में क्या हो रहा है।अनेक वर्ष बीत गए,हम इन दिनों प्रतिक्रिया के जगत में जी रहे हैं। प्रत्येक क्षेत्र में सिर्फ प्रतिक्रिया ही दिखाई दे रही है।यह संभव नहीं है कि पुस्तक प्रतिक्रिया से मुक्त हो।वह इससे बची रहे। आज लोग साहित्य,न्याय,अर्थनीति और राजनीति में पक्षपात कर रहे हैं।यह सारा कार्य प्रतिक्रियावादी है।षड़यंत्र की तरह पहले से बनाया हुआ है।पूरी तरह समाज को तोड़ देने वाला है। यही वह जगह है जहां हमें मुक्ति के सवालों को सुनियोजित ढ़ंग से विश्लेषित करना चाहिए।
देरिदा की कृति 'दि स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स' में पहलीबार 'भूत' के रूपक का प्रयोग मिलता है।यहां 'भूत' का बहुवचन में प्रयोग किया गया है।इस रूपक के बहाने देरीदा मार्क्सवाद की अप्रासंगिकता नहीं बल्कि प्रासंगिकता पर रोशनी डालते हैं।साथ ही मार्क्सवाद की कमजोरियों और सर्वसत्तावादी स्वरूप पर प्रहार करते हैं।देरिदा पर विचार करते समय हमें पत्रकारिता की शैली में लिखी बातों और विद्वतापूर्ण अकादमिक समालोचना में फर्क करना चाहिए। पत्रकारिता की समीक्षा दबाव में लिखी जाती है।जबकि अकादमिक समीक्षा दबाव रहित होती है।पत्रकारिता की समीक्षा विखंडन का इस्तेमाल करते हुए हत्या करती है या मौत की घोषणा करती है।जबकि विद्वतापूर्ण समीक्षा शिक्षित करती है।अध्ययन के लिए प्रेरित करती है।सामान्य तौर पर कठमुल्ले माक्र्सवदियों में देरीदा को लेकर संशय और विरोध का भाव घर किए हुए है।
देरिदा के संदर्भ में 'शरीर','आत्मा',और 'भूत' ये तीन पदबंध विचार करने योग्य हैं। 'शरीर' के बगैर आत्मा के भूत बन जाने की संभावना है।देरीदा इसी पध्दति का इस्तेमाल करता है।वह बताता है कि 'शरीर' से 'आत्मा' निकल गई और 'शरीर' ,'भूत' हो गया।सवाल यह है कि क्या भूतों से बात की जा सकती है।एक नहीं,एकाधिक भूतों से बात की जा सकती है। क्या उनके प्रति सवाल उठाए बगैर बात की जा सकती है ?उल्लेखनीय है कि 'भूत' के रूपक का रैनेसां में खूब इस्तेमाल किया गया।'भूत' से हमेशा लंबा और मारक संघर्ष चलता है।यह मूलत: धार्मिक आस्था पर टिकी धारणा है।भूत उस आस्था के प्रति सवाल पैदा करता है जिसे अपील करता है।रैनेसां में आस्था प्रबल थी।किंतु उत्तर रैनेसां में कल्पना प्रमुख हो गई।'शक्ति के भूत' की बजाय अब 'कल्पना शक्ति' पर जोर दिया गया।इसी क्रम में हम मौत की सीमा लांघकर जीवन की ओर आए।'कल्पना की शक्ति' को रोमैण्टिशिज्म ने फैलाया।
देरिदा को पढ़ते हुए पाते हैं कि उनके यहां हास्य चरित्रों एवं व्यंग्य शैली का व्यापक प्रयोग किया गया है।द्विअर्थी चरित्रों का खूब प्रयोग मिलता है।ऐसा करते हुए देरिदा कॉमिक अंत की ओर ले जाते हैं। कॉमिक विधा और कॉमिक चरित्रों का जमकर प्रयोग करते हैं।असल में दर्शन के प्रति व्यापक पैमाने पर जो अरूचि पैदा हुई है उससे मुक्ति के अस्त्र के तौर पर 'कॉमिक' और 'कॉमेडी' के रूपों का व्यापक प्रयोग करते हैं।इन दोनों में 'विच्छिन्नता'और 'मनमानापन' ये दो तत्व प्रमुख हैं।इसके अलावा कॉमेडी प्रभुत्वशाली समाज का प्रतिनिधित्व करती है।मनमाने नियमों के तहत कार्य करती है।देरीदा ने विखंडन में प्रतीक के मनमानेपन को ग्रहण किया।यह उनके विखंडन का प्रस्थान-बिन्दु है।
देरिदा ने पाठ में घटना और दुर्घटना का व्यापक प्रयोग किया है।किंतु सचेत रूप से इसके लक्षणों से पलायन करते हैं।वे पाठ में 'क्षेपक' और 'टुकडों' में कहने की पध्दति का प्रयोग करते हैं।इसी के जरिए मौजूदा जगत को देखते हैं।कॉमेडी का अर्थ है कि किसी भी चीज का कोई मतलब नहीं है, अंत हो चुका है,समाप्त हो चुकी है,पूर्ण हो चुकी है। कॉमेडी में आम तौर पर मनमानापन होता है।व्यवधान उसमें बाद में आता है।देरीदा के यहां विखंडन का विमर्श इच्छा,आग्रह,नाम आदि के जरिए आता है।इच्छा और आग्रह अर्थ देते हैं। कुछ कहना चाहते हैं।उनकी उपस्थिति बताती है कि वे चुके नहीं हैं।इच्छाएं कभी पूरी नहीं होतीं।उन्हें हमेशा स्थगित रखते रहते हैं।ऐसा करते समय हमें कुछ भी नहीं मिलता।देरीदा की नजर में सभी किस्म की प्रस्तुतियां पुनर्प्रस्तुतियां हैं।इनके उद्भव की शुध्दता को लेकर सब समय बाधाएं आती रही हैं।
कॉमेडी में इच्छा और आग्रह हमेशा पुनरूत्पादक होते हैं।उत्पादक नहीं होते।कॉमेडी में सेक्स पर मुख्य जोर रहता है।क्योंकि सेक्स समानतावादी है,स्वाभाविक है। यह मनुष्य के सामान्य हितों को सामने लाता है।यह ताकत और समृध्द है।देरीदा ने अपने दार्शनिक नजरिए में ''फेलोगोसेण्टरिज्म'' की रणनीति अपनाते हुए 'मास्टरवेशन' या हस्तमैथुन की पध्दति के बहाने दर्शन में बौध्दिक स्खलन करते हैं।विखंडन की रीडिंग में हमेशा जोखिम रहता है। 'कास्ट्रेशन' होता है।यहां पाठ कॉलम में विभक्त होता है।यह दर्शन का स्खलन है।यह अंतरालों का उद्धाटन करता है।स्त्री का उद्धाटन करता है।स्त्री की रेडीकल इमेज को सामने लाता है।दर्शन इस पर निर्भर है।वह उसे नियंत्रित नहीं करता है।विखंडन ने स्त्रीत्व का नोटिस लिया है।वह स्त्री की तरह सोचता है।असल में स्त्री का स्खलन नहीं होता।बल्कि वह उर्वर होती है।जनती है।खेलती है।अंतहीन खेलती है।वह न तो सिगनीफाइड है और न सिगनीफायर है।न प्रस्तुति है और न पुनर्प्रस्तुति है।वह न दिखती है न छिपती है।
मनमानापन ,असंबध्दता,मुखौटे और नकल आदि के जरिए कॉमेडी अर्थ सृष्टि करती है।उसके लिए आत्म चालू चीज है।कॉमेडी में व्यक्तिगत की बजाय टाइप चरित्रों में प्रस्तुति की जाती है। टाइप चरित्र होने के कारण उनका न तो विकास होता है और न वे बदलते हैं।बल्कि वे 'होस्टाइल' जगत में बने रहते हैं।वे वैविध्य रूपों में आते हैं।उनके अंदर भाषागत वैविध्य होता है।उनका व्यक्तित्व तरल और बहुस्तरीय होता है।द्विअर्थी होता है।भाषा का विस्तार होता है।कॉमिक चरित्रों के स्वभाव और मुखौटे में फर्क होता है।शब्द एवं अर्थ में फर्क होता है।इनमें जितनी बड़ी मानवता दिखानी होती है उतने ही बड़े मुखौटों की जरूरत होती है।यहां प्रत्येक चीज को सतह पर और अनिवार्य प्रस्तुति के रूप में पेश करना होता है।कॉमेडी में मुखौटे ही विखंडन का सत्य हैं।किंतु सत्य को कभी सत्य के जरिए उद्धाटित नहीं कर सकते।सत्य जब गैर-सत्य में आता है तब ही प्रसार पाता है।सुशोभित होता है।कला रूप बनता है।यहां आत्म की खोज की जाती है।आत्म का उद्धाटन किया जाता है।अपनी मौजूदगी का अहसास कराया जाता है।अपनी पहचान को सही शब्द और नाम से पेश किया जाता है।आत्म हमेशा कहानी का अतिक्रमण करता है।स्वयं को व्यक्त करता है। इसे आप तब तक नहीं मानते जब तक वह पुनरावृत्ति न करे।पुनरावृत्ति में ही वह जोड़ता है। आत्म के लिए पूरक की जरूरत नहीं होती।लेखन में जनतंत्र तब आया जब इतिहास का अंत हो गया।व्यक्तिगत का भाषा के गतिशील दर्पण में लोप हो गया।मानवता के बंधनों को तोड़ा।भाषा की परंपरा बनायी।
कॉमेडी में यू-टोपिया का बड़ा महत्व होता है।अन्य लोग इसे तर्क या विमर्श कहते हैं। कॉमेडी स्वभावत: त्रासदी विरोधी है।यह यूटोपिया से प्रेरित है।निष्कर्ष पर पहुँचती है। परिप्रेक्ष्य हासिल करती है।कॉमेडी का कोई निश्चित स्थान नहीं होता।दैनंदिन जीवन की सीमाओं का बंधन नहीं होता।समय के साथ जुड़े परंपरागत और प्रभुत्वशाली रूपों से अपने को पृथक् कर लेती है।उनके परे ले जाती है।यहां तक कि उसमें विवेकवाद एवं नैतिकता का परंपरागत संदर्भ भी नहीं होता।बल्कि वह इन्हें चुनौती देती है।कॉमेडी की तरह ही देरीदा का विखंडन स्थानरहित है।यहां से वे दर्शन से संवाद करते हैं।विखंडन की कोई निश्चित जगह नहीं है।विखंडन न तो भीतर होता है और न बाहर होता है।बल्कि घटित होता है।यह घटना नहीं है बल्कि इसे घटना है।दूसरी ओर इसमें निरंतर नए संदर्भ शामिल होते रहते हैं।इसीलिए यह अनिश्चयात्मक है।अनिश्चयात्मकता का अर्थ है गैर- अवधारणात्मक।यह व्यवस्था में अन्तर्निहित होता है।प्रतिरोध करता है।असंगठित करता है।अनिश्चयात्मक होने के कारण ही इसे भाषा में 'यू-टोपियाज' कहते हैं।पाठ में यह छिद्र की तरह है।पाठ में पंक्चर की तरह है।यह पंक्चर ही पाठ को 'टेक्चर' देता है।उसका स्थानरहित होना उसका संसाधन है।अर्थ का संक्षित भंडार है।अर्थ की खोज और अर्थ के सृजन का आधार है।देरीदा के यहां पाठ का जो यूटोपियन अर्थ मिलता है उसमें सिगनीफिगेटिव कॉमेडी के तत्व मिलते हैं।वह बातचीत में आनंद लेता है।उत्सव मनाता है।न स्वाद पर प्रहार करता है।नैतिक एवं राजनैतिक बिन्दुओं को उभारता है।परमाणु अस्त्रों के प्रसार पर प्रहार करता है।वंचितों को उभारता है।हाशिए के लोगों के प्रति आग्रहशील है। हाशिए के लोगों पर ही लिखना पसंद करता है।देरीदा के यहॉ मार्जिन महत्वपूर्ण है।यह वैसे ही है जैसे कोई पेण्टर अपनी पेण्टिंग के चारों ओर हाशिए छोड़ता है।हाशिए की खूबी यह होती है कि वे न तो व्यवस्था के अंदर होते हैं और न बाहर होते हैं।वे यह भी बताते हैं कि व्यवस्था या सिस्टम बंद नहीं है।व्यवस्था में आत्मनियंत्रण नहीं होता।वे जैसे थे वैसे ही हैं। मार्जिन या हाशिया एक तरह से 'लूज एण्डस' है।वे ही विखंडन का विमर्श तैयार करते हैं।वे उस संरचना को ध्वस्त करते हैं जिसका वे हिस्सा हैं।इसीलिए तर्क की व्यवस्था का उद्धाटन करने के क्रम में तर्क को उलटा कर देते हैं।यह सबवर्जन ही कॉमेडी है।यही देरीदा की विशेषता है।कॉमेडी की तरह देरीदा के यहां भी इमीटेशन का प्रयोग होता है। देरिदा पाठ के दर्शन को इमीटेशन के जरिए खत्म करते हैं।वह विडम्बना में जीते हैं। विडम्बना को हमेशा बनाए रखते हैं।विडम्बना के बने रहने का अर्थ है स्वतंत्रता और भविष्य का बने रहना।देरीदा सत्य के मूल्य को चुनौती नहीं देते।और न नष्ट ही करते हैं।बल्कि उसे व्यापक संदर्भ में विश्लेषित करते हैं।वे अतीत के दार्शनिकों-विचारकों की उपेक्षा नहीं करते।खारिज नहीं करते।बल्कि बार-बार पढ़ते हैं।वस्तुओं पर वे विखंडनकारी हमला करते हैं।यह नष्ट करने वाला हमला नहीं है।बल्कि निर्माण करने वाला हमला है।वे अतीत के दार्शनिकों को जन्म देते हैं।उभारते हैं।उन्हें राहत देते हैं।विरेचित करते हैं।यह एक तरह की वैधतामूलक कॉमिक राहत है।विडम्बना है।यह विडम्बनापरक खेल है।अपने और अन्य के साथ संवाद है।यह पूर्ण सामाजिक के साथ निर्मितिमूलक सामाजिकता है।यह पलटती है।भिन्नता को सामने लाती है।देरिदा कॉमेडी की तरह भविष्य को प्राथमिकता देते हैं। भविष्य को सुसंगत रूप में पेश करते हैं।सुसंगत को बताने के लिए जरूरी है कि हमेशा असंगत को बताया जाए।यही देरीदा के नजरिए का वैशिष्टय है।
भारतीय समाज में जनतंत्र के मौजूदा स्वरूप और उसकी कारगुजारियों से प्रत्येक व्यक्ति जनतंत्र के प्रति संदेह व्यक्त करने लगा है।जनतंत्र के मौजूदा प्रदूषित रूप से बचने का सटीक रास्ता देरीदा ने सुझाया है।जनतंत्र की प्रचलित धारणाओं और सैध्दान्तिकी को खारिज करते हुए देरीदा ने जिस जनतंत्र की वकालत की है उससे सभी लोग सीख सकते हैं। देरिदा के लिए जनतंत्र भविष्य का सपना नहीं है।यह कोई यूटोपिया भी नहीं है।इसे राष्ट्र-राज्य,व्यवस्था के मौजूदा तंत्र के दायरे में रखकर नहीं समझा जा सकता।देरीदा के लिए जनतंत्र का अर्थ अभी और इसी समय है।इसे वे तत्काल लाना चाहते हैं।यदि कोई व्यक्ति जनतंत्र लाना चाहे तो ला सकता है।इस संदर्भ में वे कांट से एक हद तक सहमत होते हुए कांट से आगे निकल जाते हैं।कांट के यहां जनतंत्र का अर्थ है कॉस्मोपोलिटिकल। इसकी कुछर् शत्ते हैं।देरिदा जनतंत्र को इसके दायरे से भी परे ले जाते हैं। देरिदा के अनुसार लोकतंत्र का अर्थ है न्यूनतम समानता।आप जनतत्र को तत्काल अर्जित कर सकते हैं र्बशत्ते आप समानता,न्याय,अन्य के प्रति सम्मान,अन्य के कार्य को सम्मान दें,इन सब बातों का अनुभव करें।देरीदा ने कहा जनतंत्र भविष्य की चीज नहीं है।इसे तत्काल आना चाहिए।नए जनतंत्र की धारणा नागरिकता और राज्य की धारणा से भिन्न है।आप जनतंत्र को जब तक वास्तव अर्थों में महसूस नहीं करते,उसके अनुभवों से नहीं गुजरते जनतंत्र की नई धारणा निर्मित नहीं होगी।इसमें गैर-सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत है। राजनीतिक पहलकदमी की जरूरत है।नए किस्म की नागरिकता की परिभाषा बनाने की जरूरत है।
देरिदा के विचारों का विश्लेषण करते समय उनकी चर्चित कृति 'मित्रता की राजनीति' को नहीं भूलना चाहिए।यह कृति उनके राजनीतिक विचारों के मर्म को सामने लाती है।इसी कृति में देरिदा ने रेखाकित किया है कि राजनीति का मित्रता और अतिथि की धारणा से गहरा संबंध है।देरीदा राजनीति की वकालत करते हैं।किंतु परंपरागत अर्थ से अलग हटकर राजनीति के नए क्षितिज खोलते हैं।देरीदा ने कहा कि मैं राजनीति को राष्ट्र-राज्य, राजनीतिक शासन आदि के संदर्भ में नहीं देख रहा हूँ,बल्कि मेरे लिए राजनीति व्यक्तिगत प्रतिबध्दता है।यह 'स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स' में है।प्रतिबध्दता को व्यवहार में व्यक्त होना चहिए।माक्र्स के पाठ,सिध्दान्तों आदि का अध्ययन करने के लिए कुछ व्यक्तिगत प्रतिबध्दताएं जरूरी हैं।इसी को मैं राजनीति कहता हूँ।देरीदा की राजनीतिक प्रतिबध्दता की धारणा राजनीतिक दल के कार्यक्रम या विचारधारा की प्रतिबध्दता से एकदम भिन्न है।परंपरागत जनतांत्रिक राजनीति से अलग है।हमारे देश में राजनीतिक दलों के कार्यक्रम और विचारधारा से प्रतिबध्दता को ही राजनीतिक प्रतिबध्दता मान लिया गया है।ऐसे अधिकांश प्रतिबध्द लोग जीवन में पग-पग पर अ-जनतांत्रिक कार्य-व्यवहार में लिप्त पाए जाते हैं। इसके कारण सामान्य लोगों में जनतंत्र की बजाय सर्वसत्तावादी राजनीति की ओर रूझान पैदा होते हैं।ऐसे लोगों में व्यक्तिगत तौर पर किसी भी किस्म की राजनीतिक प्रतिबध्दता नहीं मिलती।
देरिदा ने मित्रता को राजनीति के साथ रखकर विश्लेषित किया है।राजनीतिक दर्शन में मित्रता हाशिए की धारणा है।देरिदा ने लिखा है कि प्रत्येक राजनीतिक विचारक, दार्शनिक आदि ने मित्रता के ऊपर विचार किया है।मित्रता के आधार पर न्याय और जनतंत्र को परिभाषित किया है।मित्रता कई तरह की होती है।खासकर अरस्तू के यहां तीन तरह की मित्रता के बारे में विवेचन मिलता है।अरस्तू की नजर में मित्रता वर्चु है।पहली कोटि में वह मित्रता आती है जो वर्चु है।जो दो व्यक्तियों में है।इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी कोटि उस मित्रता की है जिसका आधार उपयोगिता है।यह राजनीतिक मित्रता है।तीसरी मित्रता आनंद के आधार पर होती है।इस कोटि की तरफ युवाओं का व्यापक रूझान पाया जाता है।अरस्तू कहते हैं कि दैनन्दिन जीवन में आए दिन सुनते रहते हैं कि राजनीतिक लोगों में हमें अपने मित्र बनाने चाहिए।किंतु यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति राजनीतिक तौर पर दोस्त हो किंतु व्यक्तिगत तौर पर शत्रु हो।व्यक्तिगत तौर पर मित्र हो किंतु राजनीतिक तौर पर शत्रु हो।यह भी संभव है कि कभी न्याय के लिए मित्रता को धोखा देना पड़े।मित्रता का अतिक्रमण करना पड़े।
देरिदा ने अरस्तू से लेकर आज तक के सभी प्रमुख दार्शनिकों के मित्रता संबंधी चिन्तन पर गौर करते हुए मित्रता को नए रूप में परिभाषित किया है।सदियों से यह सवाल विवाद के केन्द्र में रहा है कि मित्र कौन ?देरीदा मित्रता को भगवान और स्त्री के दायरे के बाहर ले जाते हैं।अरस्तू के यहां मित्रता के पांच तत्व पाए जाते हैं।ये मित्रता की पांच बुनियाद भी हैं।1.मित्र की रक्षा के लिए शुभकामना करना,स्वयं से प्यार करना।2.मित्र जिन्दा रहे,सकुशल रहे इसकी कामना करना।3.अन्य के साथ रहना,4मित्र की समान अभिरूचियां हों।5.आपस में सुख,दु:ख बांट सकें।अरस्तू के यहाँ पहली मित्र माँ है।उसके साथ आप सुख,दु:ख बांट सकते हैं।माँ अपने बच्चे से सचमुच में प्यार करती है।प्यार का ढोंग नहीं करती।इसका अर्थ यह है कि मित्रता समान लोगों में नहीं हो सकती।बच्चे और माँ में किसी भी तरह समानता नहीं है।मित्रता की भावना को कार्रवाई या एक्ट में संकुचित नहीं कर सकते।गौर करें तो पाएंगे कि माँ को हम मित्रता के दायरे से बाहर रखते हैं।भारतीय परंपरा में पिता को मित्र का दर्जा मिला है किंतु माँ को मित्र का दर्जा नहीं मिला है।
देरिदा ने लिखा है कि माँ को हम मित्रता के दायरे के बाहर इसलिए रखते हैं क्योंकि वह बदले में प्यार पाने की आकांक्षा के बिना प्यार करती है। सच है कि वह मित्र है क्योंकि वह अन्य को प्यार करती है।वह उसे प्यार करती है जो उसका अभी तक मित्र नहीं बना है।सामान्य तौर पर यह तथ्य हमारी ऑंखों से ओझल रहता है।अरस्तू ने मित्रता के जिन पांच तत्वों की चर्चा की है उसमें 'सेल्फ लव' या निज प्रेम को सबसे ऊँचा दर्जा दिया है।किंतु यह सामने तब ही आता है जब माँ सामने आती है।अरस्तू की नजर में माँ सबसे अच्छी मित्र होती है।
अरस्तू सिर्फ मित्र के गुण ही नहीं बताते बल्कि बताते हैं कि मित्रता का अर्थ क्या है ?मित्र वह है जो अपने मित्र की भलाई की कामना करे।उसकी दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना करे।मॉ ऐसी ही कामना अपने बच्चे के लिए करती है।संकट की स्थिति में जो मदद करता है वह मित्र है।देरीदा को माँ का मित्र रूप पसंद है।वह कहता है माँ जब प्यार करती है तो पूर्णत: प्यार करती है।वह प्यार पाए बिना प्यार करती है।वह स्वयं मित्र बन जाती है।यह उसका दुर्लभ गुण है।ऐसा करते हुए वह स्वयं से ही प्यार करने लगती है।देरीदा इसी तत्व को उभारते हैं।वे 'स्वयं से प्यार' की धारणा को मित्रता की बुनियाद बनाते हैं।'स्वयं से प्यार' वस्तुत: निज की उपस्थिति का एहसास पैदा करता है। देरीदा ने लिखा है कि व्यक्ति यदि स्वयं से प्यार करता है तो अन्य से भी प्यार करेगा।'स्वयं से प्यार' मित्रता का महान गुण है।
स्व से प्यार करने वाला व्यक्ति अहंकार से मुक्त होगा।व्यक्ति का एक मित्र नहीं होता।बल्कि अनेक दोस्त होते हैं।जिसके अनेक दोस्त होते हैं उसका कोई दोस्त नहीं होता। इसी अर्थ में देरिदा ने कहा कि व्यक्ति का एक दोस्त नहीं होता।दोस्ती का एक रूप भाईचारे का भी है।सिसरो,माण्टेगनी,कार्ल स्मिट आदि के विचारों के विश्लेषण के क्रम में देरिदा ने भाईचारे और मित्रता के अन्तस्संबंधों पर विस्तार से विचार किया है।इन विचारकों ने मित्रता को रक्तसंबंधों के दायरे से बाहर निकालकर सार्वभौम मित्रता के मानवतावादी दायरे में लाकर खड़ा किया।मित्रता और जनतंत्र का दायरा बड़ा किया।कार्ल स्मिट के विश्लेषण के क्रम में देरिदा ने मित्रता के अगले विकास के रूप में भाईचारे को देखा।देरीदा ने लिखा कि बेहतर मित्रता वह है जो स्वाभाविक है।प्रतीकात्मक मित्रता बेहतर मित्रता की कोटि में नहीं आती।ऐसी मित्रता के शत्रुता में बदल जाने का खतरा बना रहता है।इसीलिए देरिदा ने मित्रता को मित्र-शत्रु की कोटि से बाहर रखकर देखने की हिमायत की।यदि ऐसा नहीं करते तो मित्र कब शत्रु हो जाएगा और शत्रु कब मित्र बन जाएगा हम सोच नहीं सकते।देरीदा ने इसीलिए लिखा कि मित्रता में दोस्ती और दुश्मनी दोनों की समान संभावनाएं होती हैं।यह भी संभव है कि भाईचारे के बिना मित्रता हो।युध्द और शत्रु के दायरे के परे प्रेम और मित्रता हो।मजेदार बात यह है कि देरिदा के मित्रता विमर्श में बहिनें और औरतें शामिल नहीं हैं।इसका अर्थ यह नहीं है कि मित्रता और राजनीति के दायरे में औरतों का प्रवेश निषिध्द है।
देरीदा ने अरस्तू के प्रसिध्द वाक्य -''हे मेरे मित्र,मेरा कोई मित्र नहीं है''- को व्याख्यायित करते हुए कहा है कि जिसके बहुत मित्र होते हैं उसका कोई मित्र नही होता।देरीदा ने जनतंत्र के परिप्रेक्ष्य में मित्रता की व्याख्या की है।देरीदा ने लिखा कि जनतंत्र में सब समान हैं। सिर्फ भाई -भाई ही समान नहीं हैं,सब समान हैं।मित्रता का राजनीति से संबंध है।यह प्रचलित अर्थ में राजनीति नहीं है।बल्कि 'ध्यानाकर्षण की राजनीति'' है।इसका वह दोहरे अर्थ में इस्तेमाल करता है।एक तरफ इसमें सुनना,चेतना और स्वयं पर ध्यान केन्द्रित करना शामिल है।दूसरी ओर इसमें इंतजार,अनुमान और अनुभव से अधिक खुलापन शामिल है। इसका पूरा स्वरूप अन्य के सामने खुलता है।उस समय खुलता है जब आप अन्य को अन्य की तरह स्वीकृति दें।अन्य के रूप में इंतजार करें।जिम्मेदारी और एकीकरण का रूप तब उभरता है जब पुनरावृत्ति होती है,जब आप मतभेद व्यक्त करते हैं।मित्रता हमेशा एकाधिक लोगों से होती है।मित्रता तब होती है जब आप अन्य को अन्य की तरह देखें,अन्य को समान नजरिए से देखें। इसी क्रम में बाद में देरीदा ने 'रेडीकल डेमोक्रेसी' की धारणा व्यक्त की।इसका अर्थ है जनतंत्र को सभी किस्म की सीमाओं से परे ले जाओ,उदार राज्य,राष्ट्र, भाईचारा,राजनीतिक दलों के दायरे से परे ले जाओ।
भारत के सामाजिक माहौल की एक विशेषता है कि वह हर चीज को हजम कर जाती है।वह पुराने को खत्म किए वगैर उससे मुक्त हुए वगैर नए को भी हजम कर जाती है।हर चीज को हजम कर जाने का विचार मूलत: जनतंत्र विरोधी है। सर्वसंग्रहवादी है।प्रतिगामी है। इसमें अप्रासंगिक पुराने विचारों के प्रति जबर्दस्त आग्रह है।वह प्रत्येक नए विचार को पुराने में समाहित करने के लिहाज से देखता है। यह पुराने का खजांची है।हमारे समाज में 'ओल्ड इज गोल्ड' की धारणा की गहरी जड़ें हैं। हिन्दी मे अतीतपंथी हैं या शीतयुध्दीय राजनीति की कोटियों में सोचने वाले हैं।ये दोनों ही रास्ते साहित्यालोचना की गंभीर बाधा हैं।
साहित्यालोचना को प्रासंगिक बनाने के लिए जरूरी है कि उसे सभी किस्म की आलोचना रूढ़ियों की कैद से मुक्त किया जाए।नियमों और सिध्दान्तों के बने-बनाए सांचों में रखकर जब भी आलोचना लिखी जाएगी उसमें जीवन की धड़कन सुनाई नहीं देगी।आज वास्तविकता यह है कि साहित्यालोचना से गंभीर वाद-विवाद गायब हैं।आलोचना की जगह व्यक्तिगत और आत्मगत तत्व आ गए हैं।भाषा के भदेस प्रयोगों के नाम पर भाषा में गंभीर विमर्श के माहौल को बिगाड़ा जा रहा है।साहित्यालोचना को सस्तेपन,गुटबाजी और व्यक्तिगत प्रमोशन स्कीम के हवाले कर दिया गया है।आलोचना पूरी तरह गायब हो गई है। आज आलोचक हैं किंतु आलोचना गायब है।आलोचना के नाम पर चाटुकारिता और रीतिवाद आ गया है। विमर्श,विवाद,संवाद,संपर्क की जगह व्यक्तिगत निंदा, जोड़तोड़, चालाकियों,नकल ,और झूठ ने ले ली है।इसी अर्थ में यह साहित्यालोचना के ह्रास का संकेत है। साहित्यालोचना के मौजूदा माहौल को बदलने के लिहाज से फ्रासीसी दार्शनिक ज्यांक देरीदा प्रस्थान बिन्दु हो सकता है।
ज्यांक देरिदा किसी भी किस्म की संकीर्णता और नियमों की कैद से मुक्त है।यह स्वभाव और सिध्दान्त में जनतांत्रिक है।इसकी आलोचना सैध्दान्तिकी का मिजाज हमारे समाज की वैविध्यपूर्ण जनतांत्रिक परिस्थितियों के अनुकूल है।देरीदा सबका है और किसी का नहीं है। भारत जैसे विषम समाज में देरीदा के विचारों की सबसे ज्यादा प्रासंगिकता है। वह वंचितों और दुखियों का पक्षधर है।इसके चिन्तन के केन्द्र में एक नहीं अनेक हैं।अभी तक आलोचना निज को केन्द्र में रखकर लिखी जाती रही है।देरीदा ने आलोचना और दर्शन को निज के दायरे से बाहर निकालकर अन्य के दायरे में लाकर खड़ा किया है।वह अन्य, अन्यत्व,वंचित,काले,अल्पसंख्यक,स्त्री आदि के सवालों को केन्द्र में रखकर सोचता है।उसकी चिंता के केन्द्र में मानवाधिकार हैं।वह मानवाधिकारों की चेतना का विकास करते हुए सामाजिक परिवर्तन देखना चाहता है।उसकी चिन्ता क्रान्ति नहीं है।रेडीकल जनतंत्र है। सर्वसत्तावादी शासन नहीं जनतांत्रिक शासन है।देरीदा मानवीय इच्छाशक्ति का प्रवक्ता है।मानवीय जीवन को उसने सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा है।वह सोचने,समझने और देखने की सभी नई और पुरानी बनी-बनायी कोटियों को अपदस्थ करता है।आप जो हैं।वह नहीं रहते।वह बदलने के लिए मजबूर करता है।उसके समूचे चिन्तन के केन्द्र में एक ओर जनतंत्र है दूसरी ओर मानवीय विकास है।जनतंत्र और विकास के नजरिए से वह हाशिए के लोगों या वंचितों के बारे में सोचता है।
भारत में देरिदा के जनप्रिय न हो पाने का प्रधान कारण है जातिप्रथा और उच्चवर्ण के दृष्टिकोण का वर्चस्व।इसके अलावा वेदान्त और कठमुल्ला माक्र्सवादी नजरिए का बौध्दिकों पर गहरा असर।दूसरा प्रधान कारण है आलोचना का दर्शन से अलगाव। मजेदार बात यह है कि दर्शन में जिस गति से भारत में विगत पचास वर्षों में नई समझ पैदा हुई है उसका साहित्यालोचना के साथ तकरीबन संवाद नहीं हुआ है।उल्लेखनीय है कि दर्शन और सैध्दान्तिकी के साथ संवाद के बिना आलोचना मर जाती है।साहित्यालोचना की प्राणवायु साहित्य के साथ-साथ दर्शन से आती है।वास्तव जीवन के साथ-साथ सैध्दान्तिक विमर्श से आती है। हिन्दी की आलोचना के पुरोधा आलोचक नामवर सिंह को थियरी से गहरी चिढ़ है। जबकि थियरी के बिना विकास संभव नहीं है।हिन्दी के चर्चित साहित्यकार,सम्पादकों को चटपटी बातें कहने, सनसनीखेज बातें करने, उठा-पटक और पुरस्कारों में जितनी रूचि है उतनी गंभीर विमर्श में नहीं है।यही वजह है कि हिन्दी में गंभीर लेखन की न तो कोई पत्रिका है और न कोई शोध संस्थान है।हिन्दी के अधिकांश आलोचक ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जिसमें गंभीर बहस नहीं हो सकती।साहित्यिक पत्रिकाएं कामचलाऊ नजरिए से प्रकाशित हो रही हैं।इन पत्रिकाओं को देखकर लगता ही नहीं है कि हम 21वी शताब्दी में हैं। कमोबेश रूप में इन पत्रिकाओं में उन्नीसवीं शताब्दी के वर्गीकरण और अवधारणाओं के आधार पर सामग्री प्रकाशित हो रही है।अनुसंधान और गंभीर विमर्श से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं को एलर्जी है।इसका प्रधान कारण है विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी के प्रति अगंभीर और अनुसंधान विरोधी रवैयये का होना।स्थिति की भयावहता का अनुमान सिर्फ इसी तथ्य से लगा सकते हैं कि हिन्दी के अधिकांश विश्वविद्यालय और कॉलेज शिक्षक शोध प्रविधि के सामान्य नियमों से अनभिज्ञ हैं।इस अज्ञानता को देखने के लिए बाजार में उपलब्घ शोधपरक कृतियों को देखा जा सकता है।इन सब बातों को रखने का मकसद किसी का अपमान करना नहीं है। किसी को छोटा या हेय ठहराना नहीं है।अपितु इस तथ्य की ओर ध्यान खींचना है कि हिन्दी का साहित्य जगत गंभीर संकट में फंसा है।इस संकट से निकलने का एक ही रास्ता है कि सबसे पहले साहित्यालोचना अपने को गंभीर विचार- विमर्श में शामिल करे।देरीदा इस संदर्भ में हमारे लिए पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं।देरीदा से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। हमारी परंपरा में बहुत कुछ ऐसा है जिससे देरीदा को समृध्द कर सकते हैं।
मजेदार बात यह है कि हम अपनी परंपरा का मूल्यांकन करते हुए आगे की ओर नहीं हमेशा पीछे की ओर जाते हैं।हमें इस सवाल पर विचार करना होगा कि परंपरा का मूल्यांकन करते-करते हमारी दृष्टि परंपरावादी क्यों हो जाती है।हम परंपरा को अतीत के खूंटे से मुक्त क्यों नहीं कर पाते।जिस आलोचक ने भी परंपरा का मूल्यांकन किया अपने को अतीत का हिस्सा बना लिया।जबकि देरीदा ने विरासत का मूल्यांकन करते हुए विरासत को, परंपरा को अतीतबोध से मुक्त किया।आधुनिक विमर्श,आधुनिक सामाजिक,सांस्थानिक, संरचनात्मक प्रक्रियाओं से जोड़ा।
हमारे समर्थ आलोचक परंपराओं की खोज के क्रम में प्रवेश आलोचनात्मक विवेक के साथ करते हैं किंतु लौटते हैं परंपरा के आराधक बनकर,अनालोचनात्मक दृष्टिकोण के साथ।जिसने भी परंपरा का मूल्यांकन किया वह परंपरा का अंग बन गया।मेरे हिसाब से किसी आलोचक के लिए यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि जीते जी परंपरा या विरासत में चला जाए।हमारे यहां विरासत में जाने की जितनी बेचैनी है उतनी भविष्य में जाने की नहीं है। वर्तमान में जीने में नहीं है। परंपरा का जितना मूल्यांकन हुआ है उतना वर्तमान और भविष्य का नहीं हुआ।विचारों की दुनिया में पुराने को यदि पुराने के आधार पर परखा जाएगा तो पुराना अपने पुरानेपन से मुक्त नहीं होगा।यदि पुराने को वर्तमान के आधार पर,नए के आधार पर परखेंगे तो नए का जन्म होगा।परंपरा के मूल्यांकन में हमने अभी तक अपनी सारी ऊर्जा जो उपलब्ध है, जिसे हम कमोबेश जानते हैं उसी की खोज और पैकेजिग बदलने में लगाई है। परंपरा या विरासत के मूल्यांकन का अर्थ तब खुलता है जब हम अनुपलब्ध को खोजते हैं। हम जब अनुपलब्ध को खोजते हैं तब ही नए का जन्म होता है।किंतु परंपरा की खोज के नाम पर अब तक का सारा कारोबार मूल की प्रतिलिपि तैयार करने का रहा है।खासकर हमारी आलोचना ने परंपरा के नाम पर जो कुछ दिया है वह पहले से उपलब्घ था।हमारे ये आलोचक मूल को उसकी प्रतिलिपि से अलग नहीं कर पाए।परंपरा के जिन रूपों या व्यक्तित्वों या जिस साहित्य परंपरा की खोज की गई उसमें हमें यह तथ्य देखना होगा कि उसमें मूल और प्रतिलिपि में क्या फर्क है ?इसके लिए विश्लेषण का कहां तक इस्तेमाल किया गया है ?जो उपलब्ध था क्या उसे भिन्न भाषा में पेश कर दिया गया है।अथवा यहां-वहां से उध्दरण जुटाकर सजा दिया गया है।
परंपरा का मूल्यांकन सिर्फ भाषा का खेल नहीं है।हमें देरीदा की यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि मौलिक का जन्म कभी भाषा के आधार पर नहीं होता। भाषा को लुप्त अनुभवों का प्रतिनिधित्व करने का हक नहीं दे सकते।भाषा के जरिए लुप्त की खोज नहीं की जा सकती।देरिदा ने लिखा है कि मौलिक का जन्म,शुध्द का उदय कभी भी भाषा के आधार पर नहीं हो सकता।लेखन को वाक् के मातहत नहीं रख सकते।यदि ऐसा करते हैं तो यह हमारा ऐतिहासिक पूर्वाग्रह होगा।प्रत्येक 'साइन' में एक 'सिगनीफायर' होता है जो अन्य को व्यंजित करता रहता है।अर्थभेद पैदा करता है।इसी तरह 'सप्लीमेंट' या पूरक के विचार को लें इसमें बड़े रोचक सवाल निहित हैं। हम मौलिक के बारे में सोच सकते हैं।किंतु मौलिकता जैसी कोई चीज नहीं होती।बल्कि अपूर्ण मौलिक होता है।जिसके कारण हम 'पूरक' का सृजन करते हैं।इसे हम 'अतिरिक्त' भी कह सकते हैं।पूर्ण में इसे जोड़ सकते हैं।इससे संपूर्ण की कमजोरी सामने आ जाएगी।इसी को देरिदा ने 'लॉजिक ऑफ दि सप्लीमेंट' कहा है।
देरिदा ने कहा कि वर्तमान सिर्फ वर्तमान है।जब तक वह अपनी भिन्न पहचान बनाए रखता है,हम जब अनुपस्थित की खोज करते हैं तो अनुपस्थित ने जो संकेत छोड़े हैं उन्हीं पर लौटते हैं।जब हम मौलिक वर्तमान की बात करते हैं तो उसका उदय भी खोजें।वह वर्तमान में ही होता है।अतीत में नहीं।दर्शन हमेशा जो 'मौजूद' है उसकी बात करता है, क्योंकि जीवंत अनुभवों की वर्तमान में ही परीक्षा संभव है।
देरिदा की नजर में प्रत्येक पाठ ,दुहरा पाठ होता है।इसे रीडिंग या पठन के स्तर पर देख सकते हैं।इसमें अन्तर्विरोध भी होते हैं।पाठ की दूसरी रीडिंग खुली होती है।उसकी कोई सिंथीसिस संभव नहीं है।देरिदा ने 'ग्राम्मटोलॉजी' को लेखन का विज्ञान कहा।वह लेखन के परंपरागत मॉडल के परे जाता है।देरिदा लेखन के उदय और सैध्दान्तिकी पर रोशनी डालते हैं।लेखन और मेटाफिजिक्स के अन्तस्संबंधों पर रोशनी डालते हैं।'मेटाफिजिक्स ऑफ प्रिजेंस' की धारणा के तहत बताते हैं कि वक्ता की शारीरिक मौजूदगी उसकी वक्तृता की प्रामाणिकता है।वाचन से ही हम लेखन की ओर बढ़े हैं।इसी को देरीदा ने 'दि साइन ऑफ दि साइन' कहा है।चूंकि रीडिंग के समय लेखक मौजूद नहीं रहता जिससे कि वह पाठ को वैधता प्रदान कर सके।यही वजह है कि वाचिक भाषा को सीधे विचारों से संबंधित मान लिया गया है।इसी अर्थ में लेखन और वाक् एक-दूसरे के पूरक हैं।देरीदा का मानना था कि लेखन न केवल अर्थ को प्रदूषित करता है,वरंच वक्तृत्व का स्थान भी ले लेता है,क्योंकि वक्तव्य सदैव पूर्व-लिखित है।देरिदा के शब्दों में ' स्पीच ऑलवेज ऑलरेडी रिटेन'।ये बातें गोपीचंद नारंग ने अपनी पुस्तक 'संरचनावाद,उत्तर- संरचनावाद एवंप्राच्य काव्यशास्त्र' में लिखी हैं।(पृ.164)किंतु नारंग साहब यह भूल गए कि देरीदा ने ये बातें पुस्तक के संदर्भ में कही थीं।नारंग साहब की मुश्किल यह है कि वे देरीदा के विचारों से गुजरते हैं।किंतु विचारों के सन्दर्भ को छिपा जाते हैं।आलोचना का यह रूपवादी तरीका है।देरीदा ने असल में 'पुस्तक' के संदर्भ में इस समस्या को खोला है।सुधीश पचौरी ने देरीदा के इस पक्ष की व्याख्या करते हुए लिखा है कि ''पश्चिमी परंपरा में 'पुस्तक' के मायने 'स्थिर' और 'बंद' ज्ञान है।माना जाता है कि ज्ञान पुस्तक में 'कैद' हो जाता है।ज्ञान लेखक की कैद में होता है।उसी में लेखक रहता है।यही उसकी उपस्थिति है,-'प्रेजेंस' है जो अभीष्ट अर्थ को संभव करती है।दूसरे शब्दों में लेखक न होगा तो अर्थ न होगा,पुस्तक न होगी।देरीदा बताते हैं कि अच्छा लेखन हमेशा समग्रता में समझने योग्य होता है जो किसी किताब में पूरी तरह सुरक्षित होता है।पुस्तक का विचार समग्रता का विचार है।समग्र का व्यंजक है लेकिन यह समग्रता कहां से आई ?जरूर पूर्व-स्थित समग्रता के बिना यह समग्रता संभव नहीं है।इस तरह कथित पुस्तक की वस्तुगतता,समग्रता,और लेखन के पीछे और पहले एक विचार मौजूद रहता है। यह पहले मौजूद विचार,पूर्व-स्थित विचार ही वाक्-केन्द्रिक या शब्द-केन्द्रिक (लोगोसैंट्रिक) तत्व है जो वाचिक सत्य की प्रामाणिकता को मानकर चलता है।प्रकट पुस्तक के पीछे लेखक का बोलना छिपा होता है।उसकी समग्रता इसे किसी एक अर्थकेन्द्र की ओर ले जाने लगती है।''(देरिदा का विखंडन और साहित्य,1997,पृ.28)
देरिदा के लेखन में अवधारणाओं का महत्व है।अवधारणाओं का महत्व ऐसे समय स्थापित किया गया जब पश्चिम में अवधारणाओं के महत्व को खारिज किया जा रहा था।पुराने को ठुकराया जा रहा था।यह मान लिया गया था कि परवर्ती पूंजीवाद के वैचारिक प्रपंचों को समझने में पुराना ज्ञान एकदम बेकार की चीज है।आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद के अनेक पुरोधा अब तक की तमाम वैचारिक केटेगरी,अवधारणाओं आदि को अप्रासंगिक घोषित कर रहे थे।ऐसे में देरीदा के लेखन ने गंभीरता के साथ नई-पुरानी सभी अवधारणाओं की विस्तार से व्याख्या पेश की।इस क्रम में बहुत कुछ नया आया।साथ ही हमारा समाज सब कुछ खारिज करने वाली समीक्षा से बच गया।हम अवधारणाओं के लोप से बच गए। अवधारणाओं में सोचने की पध्दति का बचे रहना देरीदा का परवर्ती पूंजीवाद के प्रति सबसे बड़ा हस्तक्षेप है।
हिन्दी आलोचना के लिए देरिदा इस अर्थ में प्रासंगिक हैं कि हमारे यहां अवधारणा का संकट गहराता जा रहा है।पीसी जोशी ने तो 'अवधारणा का संकट' नाम से ही किताब लिख डाली।मार्क्सवादियों में रामविलास शर्मा ने मार्क्सवादी अवधारणाओं में नए के नाम पर सबसे ज्यादा समस्याएं पैदा की हैं।सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी शिविर के पतन के बाद इस शिविर के पक्षधर लेखकों के सामने अवधारणा का संकट सबसे विकराल रूप में आया।इसी तरह अमेरिकी भविष्यवादियों के यहां अवधारणा का संकट सबसे तीव्र रूप में अभिव्यक्ति पा रहा है।इसी तरह मासकल्चर के सिध्दान्तकारों खासकर समाज शास्त्रियों के यहां भी इस संकट को साफतौर पर देखा जा सकता है।अवधारण्ाा का संकट इस बात का द्योतक है कि पूंजीवाद गहरे संकट में है। सामाजिक विकास के क्रम में जब भी सामाजिक व्यवस्थाओं के सामने संकट या संक्रान्ति की अवस्था आई है अवधारणा का संकट सामने आया है।परवर्ती पूंजीवाद के संकट की अवस्था में हमेशा फ्रांस के विचारकों ने आगे बढ़कर इस संकट के हल तलाश करने की कोशिश की है।आधुनिक फ्रंासीसी विचारकों ने बड़े पैमाने पर सारी दुनिया के बौध्दिकों को प्रभावित किया है।खासकर उन बुध्दिजीवियों को प्रभावित किया है जो समाज में विकास के रथ को आगे ले जाना चाहते हैं।दर्शन,साहित्य,कला,संस्कृति,मासकल्चर आदि सभी क्षेत्रों में फ्रांसीसी बौध्दिकों ने नेतृत्वकारी भूमिका अदा की है।परवर्ती पूंजीवाद की कलाबाजियों से लड़ने का उनके पास बौध्दिक कौशल रहा है।इसके लिए ये लोग बार-बार परंपरा में गए हैं।पुराने दर्शन के पास गए हैं।वहां से विवाद खड़े करते हुए नए जमाने की जरूरतों के लिहाज से उन्होंने विचारों, धारणाओं आदि को खोला है।
देरिदा ने भी संकट की अवस्था में परंपरा के दरवाजे पर दस्तक दी।किंतु साहस के साथ।परंपरा के पास जाने के लिए,नए को व्यक्त करने के लिए,धारणाओं में सोचने के लिए,सही को सही और गलत को गलत कहने के लिए साहस की जरूरत होती है।जिस बुध्दिजीवी में साहस का अभाव है।वह बुध्दिजीवी कहलाने का हकदार नहीं है।साहस के तत्व को देरीदा ने महत्व दिया है।विचारों या जीवन में साहस के तत्व का प्रयोग जोखिम उठाए बिना संभव नहीं है।
बतर्ज देरिदा साहस और जोखिम ये दो बुनियादी तत्व हैं जो बुध्दिजीवी में होने चाहिए।मार्च 1998 में दिए एक साक्षात्कार में देरिदा ने कहा कि साहस एक वर्चु है।खासकर बौध्दिक वर्चु है।अक्षम और गैर-जिम्मेदार बुध्दिजीवियों में ह्रास की ओर जाने का साहस होता है।देरीदा ने लिखा है कि मैं यह नहीं सोचता कि आज सारे बुध्दिजीवी पतन की ओर जाने का साहस कर रहे हैं।मैं यह भी नहीं मानता कि वे 'उत्तर -इतिहास' और संशयवाद के शिकार हो चुके हैं।असल में ,'उत्तर -इतिहास', 'संशयवाद', 'बुध्दिजीवियों की भूमिका' आदि सवालों पर मीडिया की शैली में नहीं लिखा जा सकता।मीडिया में इन सवालों के संक्षिप्ततम जबाव देने से अच्छा है चुप रहो।कुछ लोग इसे अभिजनवाद कहेंगे,तो कहें।क्योंकि ये मसले जटिल हैं।इन्हें संक्षिप्त रूप में पेश करके सुलझाना संभव नहीं है।खासकर ऐसे बुध्दिजीवी को संक्षेप में समझाना मुश्किल है जो जनता का बुध्दिजीवी हो।
विश्व स्तर पर समाजवाद के पराभव पर चिन्ता व्यक्त करते हुए देरिदा ने 'स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्स' कृति में लिखा कि आज एक नए किस्म के इंटरनेशनल के आयोजन की जरूरत है।आज विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा एकता की जरूरत है।इस एकता को आप समाजवादियों की इंटरनेशनल जैसी एकता के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते।इसके बावजूद मैं इंटरनेशनल पदबंध के इस्तेमाल के पक्ष में हूँ।इस पदबंध को रखने का अर्थ है क्रांति और न्याय की स्प्रिट को बनाए रखना।जिसके तहत वंचितों,मजदूरों आदि की एकता को राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के बाहर ले जाकर गैर सरकारी तौर पर हासिल करना।इसके कुछ मानवीय लक्ष्य होंगे।
देरिदा ने कहा कि आज हमारे बुध्दिजीवी ग्लोबल प्लेग के शिकार हैं।वे एकदम हाशिए पर हैं।आज विश्व की दुर्दशा को कुछ आंकड़ों के जरिए अच्छी तरह समझ सकते हैं।मसलन् लाखों बच्चे जन्म लेते ही मर जाते हैं।पचास फीसदी औरतें उत्पीडन की शिकार होती हैं। साठ मिलियन गायब हो जाती हैं।सालाना 30 मिलियन औरतें कुपोषण की शिकार होती हैं। 23 मिलियन लोग एड्स के शिकार हैं।इनमें से 90 फीसदी लोग अफ्रीका में रहते हैं।वहां के बजट का पांच फीसदी हिस्सा एड्स पर खर्च हो रहा है।इसी तरह स्त्री भ्रूण-हत्या एवं बाल-श्रमिकों की भी बड़ी तादाद भारत सहित अनेक देशों में है।करोड़ों लोग अशिक्षित हैं। तकरीबन 140 मिलियन निरक्षर बच्चे हैं।मैं ये आंकड़े इसलिए बता रहा हूँ कि आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह की एकता की जरूरत है।यह एकता पार्टी,राष्ट्र आदि के आधार पर हासिल नहीं की जा सकती।इनमें से कोई भी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठा नहीं सकता।मैं समझता हँ कि आज ग्लोबल पूंजीवाद का जमकर विरोध किया जाना चाहिए।
देरिदा ने कहा कि ग्लोबलाइजेशन की दो प्रमुख समस्याएं हैं प्रथम राज्य का लोप।दूसरा राजनीति का नपुंसकीकरण।इन दोनों समस्याओं के समाधान के लिए हमें दर्शन की ओर जाना चाहिए।आज की सभी राजनीतिक खोजों का दार्शनिक आधार है।वे दर्शन की धुरी हैं। असली राजनीतिक कार्रवाईयां हमेशा दर्शन से जुड़ी होती है।सभी राजनीतिक कार्रवाईयों, फैसलों आदि के अपने नियम होते हैं।हमें इन सबको जानकर राज्य के लोप का जमकर विरोध करना चाहिए।हमें राष्ट्र के उन रूपों का भी विरोध करना चाहिए जब वह राष्ट्रवाद के सामने समर्पण कर देता है।हमें विश्लेषित करके हर समय उसके नियम बनाने चाहिए।देरीदा ने कहा कि हमें सोवियत संघ के पतन से सबक लेना चाहिए।वहां सर्वसत्तावाद था।सर्वसत्तावाद से माक्र्सवाद की मुक्ति जरूरी है।सारा माक्र्सवाद त्यागने की जरूरत नहीं है।देरीदा ने लिखा कि '' वे चाहते हों या नहीं,जानते हों या नहीं,समूची पृथ्वी के तमाम पुरूष और स्त्रियाँ माक्र्सवाद के वारिस हैं।''
सामान्य तौर पर ग्लोबलाइजेशन के आने के बाद से बुध्दिजीवियों में यह धारणा पैदा हो गई कि अब यूटोपिया का अंत हो चुका है।इस पर देरीदा ने कहा कि यूटोपिया में आलोचनात्मक क्षमता होती है।आप इसे पूरी तरह त्याग नहीं सकते।यूटोपिया को लोग सहज रूप में स्वप्न,गैर-शिरकत,असंभव आदि से जोड़कर देखते हैं।इसका अर्थ है कि यूटोपिया को अस्वीकार करो।उसके लिए कार्रवाई मत करो।मैं भी बार-बार 'इम्पॉसिविल' की बात करता हूँ।इसका अर्थ 'यूटोपियन' नहीं है।बल्कि इसके विपरीत यह स्वयं को इच्छाओं की ओर मोड़ना है।कार्रवाई में जाना है।निर्णय पर लाना है।यह यथार्थ का रूप है। इसकी अपनी अवधि,अनिवार्यता आदि है।
आज सारी दुनिया में करोडों लोग शरणार्थी समस्या से जूझ रहे हैं।अनेक राजनीतिक दल और देश इस समस्या के आधार पर सामान्य जनता के जीवन में विषवमन करते रहते हैं। हमारे यहां संघ परिवार के लोग इस मामले में सबसे आगे हैं।शरणार्थी समस्या पर विचार करते हुए देरीदा ने लिखा कि इस समस्या का संबंध न्याय की धारणा से जुड़ा है। र्सशत्त आतिथ्य की धारणा को इसका आधार नहीं बनाया जा सकता।यदि कोई इसे राजनीति में लागू करना चाहेगा तो इसके प्रतिगामी असर होंगे। आतिथ्य के सिध्दान्त को बदलने के लिए हमें पूरी संस्कृति, आदतें, संस्कार,कानून आदि को बदलना होगा।
देरिदा ने कहा कि शरणार्थी समस्या के प्रति उन्मादकारी,राष्ट्रवादी प्रतिक्रियाएं आती रहती हैं। ये सामान्य लक्षण हैं।आज इस संदर्भ में कार्यभार तय करना बेहद जरूरी है। पिछले दिनों में 'रिफ्यूजी' शब्द की परिभाषा बदली है।'रिफ्यूजी',ं'एग्जाइल', 'डिपोटर्ेट', 'डिस्प्लेस्ड पर्सन', और 'विदेशी' पदबंध का अर्थ बदला है। इस समस्या पर विचार विमर्श करने के लिए भिन्न किस्म के विमर्श और व्यवहारिक प्रतिक्रिया की जरूरत है। इससे नागरिकता की राजनीति और राष्ट्र के साथ लगाव का अर्थ भी बदल जाएगा।कोशिश होनी चाहिए कि 'आतिथ्य का कानून' सकारात्मक हो।यदि यह असंभव है तो इसकी प्रत्येक को तहकीकात करनी चाहिए। अपनी आत्मा और चेतना के स्तर पर इस सवाल पर सोचना चाहिए।
देरिदा ने 'होस्पीटेलिटी' या आतिथ्य की धारणा के बारे में कहा कि आतिथ्य का अर्थ है बिनार् शत्त अन्य का स्वागत।अतिथि से प्रमाण मांगे बिना,नाम पूछे बिना,संदर्भ पूछे बिना स्वागत किया जाना चाहिए।अन्य के साथ यह पहला संबंध होगा।हम अपनी जगह, घर के दरवाजे , भाषा,संस्कृति,राष्ट्र,राज्य और स्वयं को खोल दें। बगैरर् शत्त के अतिथि के आगे खुलना होगा।जब मैं 'बिनार् शत्त' कहता हूँ तो यह शब्द भय पैदा करता है।जब मैं कहता हूँ कि मेरे घर,मेरी जगह,भाषा,संस्कृति,शहर,राष्ट्र आदि में बिनार् शत्त अन्य को आने दो। तो इसका अर्थ यह भी है कि जब अन्य मेरी जगह आएगा तो असुविधा पैदा कर सकता है। चीजें अस्त-व्यस्त कर सकता है।सब कुछ उलट-पुलट कर सकता है।उपेक्षा कर सकता। यहां तक कि नष्ट भी कर सकता है।इससे भी बुरा हो सकता है।पूरी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है।मैं इसके लिए तैयार हूँ।चूँकि यह बिनार् शत्त आतिथ्य है अत: इसमें अच्छा-बुरा कुछ भी हो सकता है।यह भी संभव है कि परंपरागत दोस्ती प्रतिगामी शक्ल ले ले।इसके बावजूद हमें बिनार् शत्त आतिथ्य पर अड़े रहना होगा।देरीदा ने आतिथ्य की नई धारणा के जरिए सारी दुनिया में उभर रही शरणार्थी समस्या पर विस्तार से विचार किया है। देरीदा की सहानुभूति शरणार्थियों के साथ है।देरीदा ने कहा कि ज्यों ही आप आतिथ्य की नई परिभाषा पर विचार करने जाएंगे आपको नए किस्म की नागरिकता की परिभाषा बनानी होगी।
देरिदा ने ग्लोबलाइजेशन का विरोध किया और इसके खिलाफ नए किस्म के विश्वव्यापी प्रतिरोध आंदोलन खड़े करने का आह्वान किया।देरीदा ने कहा कि मैं 'ग्लोबलाइजेशन' पदबंध का इस्तेमाल नहीं करता।यह अस्पष्ट धारणा है।यह कोई नई चीज नहीं है।बल्कि काफी पहले से चला आ रहा है।यह भ्रमित करने वाली धारणा है।इसमें अनेक धारणाएं,राजनीतिक चालाकियां,रणनीतियां आदि आ गई हैं।उल्लेखनीय है कि परवर्ती पूंजीवाद के मौजूदा दौर को ग्लोबलाइजेशन के नाम से पुकारे जाने के खिलाफ देरीदा अकेले विचारक नहीं हैं।बल्कि अनेक विचारक हैं।
देरिदा के यहां अवधारणाओं का खजाना है।देरिदा पर बात करने के लिए उसकी धारणाओं की सही समझ का होना बेहद जरूरी है।देरिदा के लिए ग्राम्माटोलॉजी वस्तुत: लेखन का विज्ञान है।इसे व्याख्यायित करने के लिए वह लेखन के परंपरागत मॉडल के परे जाता है।'लोगोसेंटरिज्म' के तहत बताता है कि ज्ञान की जडें भाषा में हैं।अब हम इन्हें खो चुके हैं। देरिदा के मुताबिक भाषा भगवान की देन है।अथवा किसी अन्य,पराशक्ति,विचार,महान स्प्रिट,सेल्फ आदि की देन है।यही हमारी भाषा,विचारों और एक्शन का मूलाधार है।उसी ने वायनरी रूपों को बनाया है।वायनरी की जो श्रृंखला मिलती है वह हायरार्की में अवस्थित है।
'बायनरी अपोजीशन' हायरार्की के रूप में आते हैं।यह लोगोसेंटरिज्म का परिणाम है।इस धारणा पर विचार करते समय देरीदा की ज्यादा रूचि मार्जिन या हाशिए में है।किंतु 'सप्लीमेंट' की धारणा भी महत्वपूर्ण है।यह धारण्ाा उसने रूसो से ली है।हिन्दी में इसे पूरक कह सकते हैं।देरीदा के यहां यह अतिरिक्त है,स्वयं में पूर्ण है।देरिदा का तर्क है जो पूर्ण है उसमें जोड़ा नहीं जा सकता।वहां पूरक की जरूरत नहीं होती।जहां अभाव है वहां 'ओरिजनरी लैक' यानी अनुपस्थित चीजों के सम्पूरक का प्रयोग किया जाना चाहिए।इसके साथ ही 'ट्रेस' यानी गैर-मौजूदगी के सूचक का प्रयोग किया जाना चाहिए।
विखंडन की रीडिंग रणनीति के कुछ सामान्य तत्व हैं।यहां जो 'अपोजिस्टस' हैं।वे एकीकृत हैं।एक-दूसरे पर निर्भर हैं।अन्तर्निहित हैं।इसीलिए उनमें एक की उपस्थिति दूसरे के बिना संभव नहीं है।विभेद और भिन्नता भाषा में निहित हैं।प्रत्येक शब्द भाषा के खेल में सक्रिय होता है।विखंडन के जरिए पाठ की अन्तर्विरोधी रीडिंग खत्म नहीं हो जाती।बल्कि पाठ में निहित अर्थ को पाठ में ही सरल बनाती है।
विखंडनकारी रीडिंग का तर्क है कि प्रत्येक पाठ स्वयं को विखंडित करता है।किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि पाठ का अंत हो गया है।बल्कि विचारोत्तेजक रीडिंग लेखन के रूपों का उद्धाटन करती है,वह शब्द और अर्थ के प्रति स्व-चेतन है।यह संभव है कि वह विश्रृंखलित यथार्थ पेश करे किंतु वह हमेशा भाषा में होती है।देरीदा का मानना है कि भाषा में भिन्नता होती है।भिन्नता को देरिदा ने सकारात्मक अर्थ में प्रयोग किया है।खासकर भिन्नता की संरचना में उसका प्रयोग किया है।देरिदा का मानना है कि अर्थ स्वयं सिगनीफायर में नहीं होता।बल्कि नेटवर्क में होता है।अन्य चीजों के संबंध में होता है।देरिदा का मानना है कि अस्तित्व के मूल में 'सार' नहीं 'भिन्नता' या डिफरेंस रहता है।देरिदा ने यह भी कहा कि परम अस्मिता नाम की कोई चीज नहीं होती।व्यक्ति में व्यक्ति जैसा कुछ भी नही होता।'ट्रांस हिस्टोरिकल सत्य' वस्तुत: भिन्नता का परिणाम है।भिन्नता के सिस्टम के बाहर कुछ भी नहीं है। देरिदा हमें 'खेल' या 'प्ले' पदबंध के साथ खेलने के लिए उत्साहित करता है।'खेल' में हार-जीत संभव है।अंत में सिर्फ खेल रह जाता है।देरिदा ने स्थान और समय के प्रति भिन्नता के सवाल उठाए हैं।वह टाइम और स्पेस के बीच व्यक्ति या मौजूदगी को रखकर देखता है। देरिदा ने आण्टोलॉजी के प्रत्युत्तर में हाण्टोलॉजी पदबंध का प्रयोग किया है।इसी अवधारणा के तहत उसने 'भूत' या 'घोस्ट' के रूपक का प्रयोग किया है।'स्पेक्टर्स ऑफ मार्क्स' कृति में पहलीबार देरिदा ने 'भूत' पदबंध का प्रयोग किया है।यह वस्तुत: परंपरागत अर्थ में तथ्यों की छानबीन की पध्दति का एक रूप है।इसके माध्यम से देरीदा बताना चाहते हैं कि तथ्यों को बार-बार संगठित किया जा सकता है।खासकर अतीत की घटनाओं को खोजने के लिए।देरीदा की नजर में डाटा दृश्य एवं काल्पनिक होते हैं।उनसे दृष्टि/ इमेज/ संगठन का दृश्य अथवा उसके पर्यावरण का पता चलता है।डाटा ऑर्किटेक्चर है, दूसरी ओर उसे प्रतीकात्मक व्यवस्था या तर्क के कच्चे डाटा पर आरोपित करते हैं।देरिदा ने लिखा है कि दिन के उजाले के अभाव में हमें भूत सताते हैं।वे दीवारों के जरिए आते हैं वे ऐसे गड्डे खोदते हैं जिन्हें भरा नहीं जा सकता। 'खोरा' पदबंध के जरिए देरीदा 'अन-अन्तर्विरोधी' तर्कों का उल्लंघन करते हैं।'नेगेटिव थियोलॉजी' के जरिए देरिदा बताते हैं कि प्रत्येक भाषा अधूरी होती है।सत्य तो अतिसारतत्व है।या मनुष्य की परिधि के बाहर है। देरिदा ने 'रेजिस्टेंस' की धारणा का व्यापक प्रयोग किया है।यह धारणा मूलत: मनोशास्त्र की देन है।मनोरोगी की प्रतिरोध भावना को थेरपिस्ट कम करता है।वह मरीज के विद्रोह का प्रतीक है।इसमें 'सहयोग' एवं 'प्रतिरोध' अन्तर्निहित है।इस धारणा का ऐतिहासिक महत्व है। मनोशास्त्री के यहां प्रतिरोध का अर्थ बगावत नही है,क्रांति नहीं है बल्कि विश्लेषण है।
देरिदा ने सवाल उठाया कि आदमी कब मरता है ? आदमी की जब इच्छाशक्ति मर जाती है तब मर जाता है।यह बात देरिदा ने गिलिस देल्युज की कृति ''दि लॉजिक ऑफ सेंस''(1969) के हवाले से कही।देरिदा ने लिखा कि प्रत्येक मौत विशिष्ट और असामान्य होती है।एक मर्तबा देल्युज ने कहा था कि हमें जानना चाहिए कि किताबों की दुनिया में क्या हो रहा है।अनेक वर्ष बीत गए,हम इन दिनों प्रतिक्रिया के जगत में जी रहे हैं। प्रत्येक क्षेत्र में सिर्फ प्रतिक्रिया ही दिखाई दे रही है।यह संभव नहीं है कि पुस्तक प्रतिक्रिया से मुक्त हो।वह इससे बची रहे। आज लोग साहित्य,न्याय,अर्थनीति और राजनीति में पक्षपात कर रहे हैं।यह सारा कार्य प्रतिक्रियावादी है।षड़यंत्र की तरह पहले से बनाया हुआ है।पूरी तरह समाज को तोड़ देने वाला है। यही वह जगह है जहां हमें मुक्ति के सवालों को सुनियोजित ढ़ंग से विश्लेषित करना चाहिए।
देरिदा की कृति 'दि स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स' में पहलीबार 'भूत' के रूपक का प्रयोग मिलता है।यहां 'भूत' का बहुवचन में प्रयोग किया गया है।इस रूपक के बहाने देरीदा मार्क्सवाद की अप्रासंगिकता नहीं बल्कि प्रासंगिकता पर रोशनी डालते हैं।साथ ही मार्क्सवाद की कमजोरियों और सर्वसत्तावादी स्वरूप पर प्रहार करते हैं।देरिदा पर विचार करते समय हमें पत्रकारिता की शैली में लिखी बातों और विद्वतापूर्ण अकादमिक समालोचना में फर्क करना चाहिए। पत्रकारिता की समीक्षा दबाव में लिखी जाती है।जबकि अकादमिक समीक्षा दबाव रहित होती है।पत्रकारिता की समीक्षा विखंडन का इस्तेमाल करते हुए हत्या करती है या मौत की घोषणा करती है।जबकि विद्वतापूर्ण समीक्षा शिक्षित करती है।अध्ययन के लिए प्रेरित करती है।सामान्य तौर पर कठमुल्ले माक्र्सवदियों में देरीदा को लेकर संशय और विरोध का भाव घर किए हुए है।
देरिदा के संदर्भ में 'शरीर','आत्मा',और 'भूत' ये तीन पदबंध विचार करने योग्य हैं। 'शरीर' के बगैर आत्मा के भूत बन जाने की संभावना है।देरीदा इसी पध्दति का इस्तेमाल करता है।वह बताता है कि 'शरीर' से 'आत्मा' निकल गई और 'शरीर' ,'भूत' हो गया।सवाल यह है कि क्या भूतों से बात की जा सकती है।एक नहीं,एकाधिक भूतों से बात की जा सकती है। क्या उनके प्रति सवाल उठाए बगैर बात की जा सकती है ?उल्लेखनीय है कि 'भूत' के रूपक का रैनेसां में खूब इस्तेमाल किया गया।'भूत' से हमेशा लंबा और मारक संघर्ष चलता है।यह मूलत: धार्मिक आस्था पर टिकी धारणा है।भूत उस आस्था के प्रति सवाल पैदा करता है जिसे अपील करता है।रैनेसां में आस्था प्रबल थी।किंतु उत्तर रैनेसां में कल्पना प्रमुख हो गई।'शक्ति के भूत' की बजाय अब 'कल्पना शक्ति' पर जोर दिया गया।इसी क्रम में हम मौत की सीमा लांघकर जीवन की ओर आए।'कल्पना की शक्ति' को रोमैण्टिशिज्म ने फैलाया।
देरिदा को पढ़ते हुए पाते हैं कि उनके यहां हास्य चरित्रों एवं व्यंग्य शैली का व्यापक प्रयोग किया गया है।द्विअर्थी चरित्रों का खूब प्रयोग मिलता है।ऐसा करते हुए देरिदा कॉमिक अंत की ओर ले जाते हैं। कॉमिक विधा और कॉमिक चरित्रों का जमकर प्रयोग करते हैं।असल में दर्शन के प्रति व्यापक पैमाने पर जो अरूचि पैदा हुई है उससे मुक्ति के अस्त्र के तौर पर 'कॉमिक' और 'कॉमेडी' के रूपों का व्यापक प्रयोग करते हैं।इन दोनों में 'विच्छिन्नता'और 'मनमानापन' ये दो तत्व प्रमुख हैं।इसके अलावा कॉमेडी प्रभुत्वशाली समाज का प्रतिनिधित्व करती है।मनमाने नियमों के तहत कार्य करती है।देरीदा ने विखंडन में प्रतीक के मनमानेपन को ग्रहण किया।यह उनके विखंडन का प्रस्थान-बिन्दु है।
देरिदा ने पाठ में घटना और दुर्घटना का व्यापक प्रयोग किया है।किंतु सचेत रूप से इसके लक्षणों से पलायन करते हैं।वे पाठ में 'क्षेपक' और 'टुकडों' में कहने की पध्दति का प्रयोग करते हैं।इसी के जरिए मौजूदा जगत को देखते हैं।कॉमेडी का अर्थ है कि किसी भी चीज का कोई मतलब नहीं है, अंत हो चुका है,समाप्त हो चुकी है,पूर्ण हो चुकी है। कॉमेडी में आम तौर पर मनमानापन होता है।व्यवधान उसमें बाद में आता है।देरीदा के यहां विखंडन का विमर्श इच्छा,आग्रह,नाम आदि के जरिए आता है।इच्छा और आग्रह अर्थ देते हैं। कुछ कहना चाहते हैं।उनकी उपस्थिति बताती है कि वे चुके नहीं हैं।इच्छाएं कभी पूरी नहीं होतीं।उन्हें हमेशा स्थगित रखते रहते हैं।ऐसा करते समय हमें कुछ भी नहीं मिलता।देरीदा की नजर में सभी किस्म की प्रस्तुतियां पुनर्प्रस्तुतियां हैं।इनके उद्भव की शुध्दता को लेकर सब समय बाधाएं आती रही हैं।
कॉमेडी में इच्छा और आग्रह हमेशा पुनरूत्पादक होते हैं।उत्पादक नहीं होते।कॉमेडी में सेक्स पर मुख्य जोर रहता है।क्योंकि सेक्स समानतावादी है,स्वाभाविक है। यह मनुष्य के सामान्य हितों को सामने लाता है।यह ताकत और समृध्द है।देरीदा ने अपने दार्शनिक नजरिए में ''फेलोगोसेण्टरिज्म'' की रणनीति अपनाते हुए 'मास्टरवेशन' या हस्तमैथुन की पध्दति के बहाने दर्शन में बौध्दिक स्खलन करते हैं।विखंडन की रीडिंग में हमेशा जोखिम रहता है। 'कास्ट्रेशन' होता है।यहां पाठ कॉलम में विभक्त होता है।यह दर्शन का स्खलन है।यह अंतरालों का उद्धाटन करता है।स्त्री का उद्धाटन करता है।स्त्री की रेडीकल इमेज को सामने लाता है।दर्शन इस पर निर्भर है।वह उसे नियंत्रित नहीं करता है।विखंडन ने स्त्रीत्व का नोटिस लिया है।वह स्त्री की तरह सोचता है।असल में स्त्री का स्खलन नहीं होता।बल्कि वह उर्वर होती है।जनती है।खेलती है।अंतहीन खेलती है।वह न तो सिगनीफाइड है और न सिगनीफायर है।न प्रस्तुति है और न पुनर्प्रस्तुति है।वह न दिखती है न छिपती है।
मनमानापन ,असंबध्दता,मुखौटे और नकल आदि के जरिए कॉमेडी अर्थ सृष्टि करती है।उसके लिए आत्म चालू चीज है।कॉमेडी में व्यक्तिगत की बजाय टाइप चरित्रों में प्रस्तुति की जाती है। टाइप चरित्र होने के कारण उनका न तो विकास होता है और न वे बदलते हैं।बल्कि वे 'होस्टाइल' जगत में बने रहते हैं।वे वैविध्य रूपों में आते हैं।उनके अंदर भाषागत वैविध्य होता है।उनका व्यक्तित्व तरल और बहुस्तरीय होता है।द्विअर्थी होता है।भाषा का विस्तार होता है।कॉमिक चरित्रों के स्वभाव और मुखौटे में फर्क होता है।शब्द एवं अर्थ में फर्क होता है।इनमें जितनी बड़ी मानवता दिखानी होती है उतने ही बड़े मुखौटों की जरूरत होती है।यहां प्रत्येक चीज को सतह पर और अनिवार्य प्रस्तुति के रूप में पेश करना होता है।कॉमेडी में मुखौटे ही विखंडन का सत्य हैं।किंतु सत्य को कभी सत्य के जरिए उद्धाटित नहीं कर सकते।सत्य जब गैर-सत्य में आता है तब ही प्रसार पाता है।सुशोभित होता है।कला रूप बनता है।यहां आत्म की खोज की जाती है।आत्म का उद्धाटन किया जाता है।अपनी मौजूदगी का अहसास कराया जाता है।अपनी पहचान को सही शब्द और नाम से पेश किया जाता है।आत्म हमेशा कहानी का अतिक्रमण करता है।स्वयं को व्यक्त करता है। इसे आप तब तक नहीं मानते जब तक वह पुनरावृत्ति न करे।पुनरावृत्ति में ही वह जोड़ता है। आत्म के लिए पूरक की जरूरत नहीं होती।लेखन में जनतंत्र तब आया जब इतिहास का अंत हो गया।व्यक्तिगत का भाषा के गतिशील दर्पण में लोप हो गया।मानवता के बंधनों को तोड़ा।भाषा की परंपरा बनायी।
कॉमेडी में यू-टोपिया का बड़ा महत्व होता है।अन्य लोग इसे तर्क या विमर्श कहते हैं। कॉमेडी स्वभावत: त्रासदी विरोधी है।यह यूटोपिया से प्रेरित है।निष्कर्ष पर पहुँचती है। परिप्रेक्ष्य हासिल करती है।कॉमेडी का कोई निश्चित स्थान नहीं होता।दैनंदिन जीवन की सीमाओं का बंधन नहीं होता।समय के साथ जुड़े परंपरागत और प्रभुत्वशाली रूपों से अपने को पृथक् कर लेती है।उनके परे ले जाती है।यहां तक कि उसमें विवेकवाद एवं नैतिकता का परंपरागत संदर्भ भी नहीं होता।बल्कि वह इन्हें चुनौती देती है।कॉमेडी की तरह ही देरीदा का विखंडन स्थानरहित है।यहां से वे दर्शन से संवाद करते हैं।विखंडन की कोई निश्चित जगह नहीं है।विखंडन न तो भीतर होता है और न बाहर होता है।बल्कि घटित होता है।यह घटना नहीं है बल्कि इसे घटना है।दूसरी ओर इसमें निरंतर नए संदर्भ शामिल होते रहते हैं।इसीलिए यह अनिश्चयात्मक है।अनिश्चयात्मकता का अर्थ है गैर- अवधारणात्मक।यह व्यवस्था में अन्तर्निहित होता है।प्रतिरोध करता है।असंगठित करता है।अनिश्चयात्मक होने के कारण ही इसे भाषा में 'यू-टोपियाज' कहते हैं।पाठ में यह छिद्र की तरह है।पाठ में पंक्चर की तरह है।यह पंक्चर ही पाठ को 'टेक्चर' देता है।उसका स्थानरहित होना उसका संसाधन है।अर्थ का संक्षित भंडार है।अर्थ की खोज और अर्थ के सृजन का आधार है।देरीदा के यहां पाठ का जो यूटोपियन अर्थ मिलता है उसमें सिगनीफिगेटिव कॉमेडी के तत्व मिलते हैं।वह बातचीत में आनंद लेता है।उत्सव मनाता है।न स्वाद पर प्रहार करता है।नैतिक एवं राजनैतिक बिन्दुओं को उभारता है।परमाणु अस्त्रों के प्रसार पर प्रहार करता है।वंचितों को उभारता है।हाशिए के लोगों के प्रति आग्रहशील है। हाशिए के लोगों पर ही लिखना पसंद करता है।देरीदा के यहॉ मार्जिन महत्वपूर्ण है।यह वैसे ही है जैसे कोई पेण्टर अपनी पेण्टिंग के चारों ओर हाशिए छोड़ता है।हाशिए की खूबी यह होती है कि वे न तो व्यवस्था के अंदर होते हैं और न बाहर होते हैं।वे यह भी बताते हैं कि व्यवस्था या सिस्टम बंद नहीं है।व्यवस्था में आत्मनियंत्रण नहीं होता।वे जैसे थे वैसे ही हैं। मार्जिन या हाशिया एक तरह से 'लूज एण्डस' है।वे ही विखंडन का विमर्श तैयार करते हैं।वे उस संरचना को ध्वस्त करते हैं जिसका वे हिस्सा हैं।इसीलिए तर्क की व्यवस्था का उद्धाटन करने के क्रम में तर्क को उलटा कर देते हैं।यह सबवर्जन ही कॉमेडी है।यही देरीदा की विशेषता है।कॉमेडी की तरह देरीदा के यहां भी इमीटेशन का प्रयोग होता है। देरिदा पाठ के दर्शन को इमीटेशन के जरिए खत्म करते हैं।वह विडम्बना में जीते हैं। विडम्बना को हमेशा बनाए रखते हैं।विडम्बना के बने रहने का अर्थ है स्वतंत्रता और भविष्य का बने रहना।देरीदा सत्य के मूल्य को चुनौती नहीं देते।और न नष्ट ही करते हैं।बल्कि उसे व्यापक संदर्भ में विश्लेषित करते हैं।वे अतीत के दार्शनिकों-विचारकों की उपेक्षा नहीं करते।खारिज नहीं करते।बल्कि बार-बार पढ़ते हैं।वस्तुओं पर वे विखंडनकारी हमला करते हैं।यह नष्ट करने वाला हमला नहीं है।बल्कि निर्माण करने वाला हमला है।वे अतीत के दार्शनिकों को जन्म देते हैं।उभारते हैं।उन्हें राहत देते हैं।विरेचित करते हैं।यह एक तरह की वैधतामूलक कॉमिक राहत है।विडम्बना है।यह विडम्बनापरक खेल है।अपने और अन्य के साथ संवाद है।यह पूर्ण सामाजिक के साथ निर्मितिमूलक सामाजिकता है।यह पलटती है।भिन्नता को सामने लाती है।देरिदा कॉमेडी की तरह भविष्य को प्राथमिकता देते हैं। भविष्य को सुसंगत रूप में पेश करते हैं।सुसंगत को बताने के लिए जरूरी है कि हमेशा असंगत को बताया जाए।यही देरीदा के नजरिए का वैशिष्टय है।
भारतीय समाज में जनतंत्र के मौजूदा स्वरूप और उसकी कारगुजारियों से प्रत्येक व्यक्ति जनतंत्र के प्रति संदेह व्यक्त करने लगा है।जनतंत्र के मौजूदा प्रदूषित रूप से बचने का सटीक रास्ता देरीदा ने सुझाया है।जनतंत्र की प्रचलित धारणाओं और सैध्दान्तिकी को खारिज करते हुए देरीदा ने जिस जनतंत्र की वकालत की है उससे सभी लोग सीख सकते हैं। देरिदा के लिए जनतंत्र भविष्य का सपना नहीं है।यह कोई यूटोपिया भी नहीं है।इसे राष्ट्र-राज्य,व्यवस्था के मौजूदा तंत्र के दायरे में रखकर नहीं समझा जा सकता।देरीदा के लिए जनतंत्र का अर्थ अभी और इसी समय है।इसे वे तत्काल लाना चाहते हैं।यदि कोई व्यक्ति जनतंत्र लाना चाहे तो ला सकता है।इस संदर्भ में वे कांट से एक हद तक सहमत होते हुए कांट से आगे निकल जाते हैं।कांट के यहां जनतंत्र का अर्थ है कॉस्मोपोलिटिकल। इसकी कुछर् शत्ते हैं।देरिदा जनतंत्र को इसके दायरे से भी परे ले जाते हैं। देरिदा के अनुसार लोकतंत्र का अर्थ है न्यूनतम समानता।आप जनतत्र को तत्काल अर्जित कर सकते हैं र्बशत्ते आप समानता,न्याय,अन्य के प्रति सम्मान,अन्य के कार्य को सम्मान दें,इन सब बातों का अनुभव करें।देरीदा ने कहा जनतंत्र भविष्य की चीज नहीं है।इसे तत्काल आना चाहिए।नए जनतंत्र की धारणा नागरिकता और राज्य की धारणा से भिन्न है।आप जनतंत्र को जब तक वास्तव अर्थों में महसूस नहीं करते,उसके अनुभवों से नहीं गुजरते जनतंत्र की नई धारणा निर्मित नहीं होगी।इसमें गैर-सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत है। राजनीतिक पहलकदमी की जरूरत है।नए किस्म की नागरिकता की परिभाषा बनाने की जरूरत है।
देरिदा के विचारों का विश्लेषण करते समय उनकी चर्चित कृति 'मित्रता की राजनीति' को नहीं भूलना चाहिए।यह कृति उनके राजनीतिक विचारों के मर्म को सामने लाती है।इसी कृति में देरिदा ने रेखाकित किया है कि राजनीति का मित्रता और अतिथि की धारणा से गहरा संबंध है।देरीदा राजनीति की वकालत करते हैं।किंतु परंपरागत अर्थ से अलग हटकर राजनीति के नए क्षितिज खोलते हैं।देरीदा ने कहा कि मैं राजनीति को राष्ट्र-राज्य, राजनीतिक शासन आदि के संदर्भ में नहीं देख रहा हूँ,बल्कि मेरे लिए राजनीति व्यक्तिगत प्रतिबध्दता है।यह 'स्पेक्टेटर ऑफ मार्क्स' में है।प्रतिबध्दता को व्यवहार में व्यक्त होना चहिए।माक्र्स के पाठ,सिध्दान्तों आदि का अध्ययन करने के लिए कुछ व्यक्तिगत प्रतिबध्दताएं जरूरी हैं।इसी को मैं राजनीति कहता हूँ।देरीदा की राजनीतिक प्रतिबध्दता की धारणा राजनीतिक दल के कार्यक्रम या विचारधारा की प्रतिबध्दता से एकदम भिन्न है।परंपरागत जनतांत्रिक राजनीति से अलग है।हमारे देश में राजनीतिक दलों के कार्यक्रम और विचारधारा से प्रतिबध्दता को ही राजनीतिक प्रतिबध्दता मान लिया गया है।ऐसे अधिकांश प्रतिबध्द लोग जीवन में पग-पग पर अ-जनतांत्रिक कार्य-व्यवहार में लिप्त पाए जाते हैं। इसके कारण सामान्य लोगों में जनतंत्र की बजाय सर्वसत्तावादी राजनीति की ओर रूझान पैदा होते हैं।ऐसे लोगों में व्यक्तिगत तौर पर किसी भी किस्म की राजनीतिक प्रतिबध्दता नहीं मिलती।
देरिदा ने मित्रता को राजनीति के साथ रखकर विश्लेषित किया है।राजनीतिक दर्शन में मित्रता हाशिए की धारणा है।देरिदा ने लिखा है कि प्रत्येक राजनीतिक विचारक, दार्शनिक आदि ने मित्रता के ऊपर विचार किया है।मित्रता के आधार पर न्याय और जनतंत्र को परिभाषित किया है।मित्रता कई तरह की होती है।खासकर अरस्तू के यहां तीन तरह की मित्रता के बारे में विवेचन मिलता है।अरस्तू की नजर में मित्रता वर्चु है।पहली कोटि में वह मित्रता आती है जो वर्चु है।जो दो व्यक्तियों में है।इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी कोटि उस मित्रता की है जिसका आधार उपयोगिता है।यह राजनीतिक मित्रता है।तीसरी मित्रता आनंद के आधार पर होती है।इस कोटि की तरफ युवाओं का व्यापक रूझान पाया जाता है।अरस्तू कहते हैं कि दैनन्दिन जीवन में आए दिन सुनते रहते हैं कि राजनीतिक लोगों में हमें अपने मित्र बनाने चाहिए।किंतु यह भी संभव है कि कोई व्यक्ति राजनीतिक तौर पर दोस्त हो किंतु व्यक्तिगत तौर पर शत्रु हो।व्यक्तिगत तौर पर मित्र हो किंतु राजनीतिक तौर पर शत्रु हो।यह भी संभव है कि कभी न्याय के लिए मित्रता को धोखा देना पड़े।मित्रता का अतिक्रमण करना पड़े।
देरिदा ने अरस्तू से लेकर आज तक के सभी प्रमुख दार्शनिकों के मित्रता संबंधी चिन्तन पर गौर करते हुए मित्रता को नए रूप में परिभाषित किया है।सदियों से यह सवाल विवाद के केन्द्र में रहा है कि मित्र कौन ?देरीदा मित्रता को भगवान और स्त्री के दायरे के बाहर ले जाते हैं।अरस्तू के यहां मित्रता के पांच तत्व पाए जाते हैं।ये मित्रता की पांच बुनियाद भी हैं।1.मित्र की रक्षा के लिए शुभकामना करना,स्वयं से प्यार करना।2.मित्र जिन्दा रहे,सकुशल रहे इसकी कामना करना।3.अन्य के साथ रहना,4मित्र की समान अभिरूचियां हों।5.आपस में सुख,दु:ख बांट सकें।अरस्तू के यहाँ पहली मित्र माँ है।उसके साथ आप सुख,दु:ख बांट सकते हैं।माँ अपने बच्चे से सचमुच में प्यार करती है।प्यार का ढोंग नहीं करती।इसका अर्थ यह है कि मित्रता समान लोगों में नहीं हो सकती।बच्चे और माँ में किसी भी तरह समानता नहीं है।मित्रता की भावना को कार्रवाई या एक्ट में संकुचित नहीं कर सकते।गौर करें तो पाएंगे कि माँ को हम मित्रता के दायरे से बाहर रखते हैं।भारतीय परंपरा में पिता को मित्र का दर्जा मिला है किंतु माँ को मित्र का दर्जा नहीं मिला है।
देरिदा ने लिखा है कि माँ को हम मित्रता के दायरे के बाहर इसलिए रखते हैं क्योंकि वह बदले में प्यार पाने की आकांक्षा के बिना प्यार करती है। सच है कि वह मित्र है क्योंकि वह अन्य को प्यार करती है।वह उसे प्यार करती है जो उसका अभी तक मित्र नहीं बना है।सामान्य तौर पर यह तथ्य हमारी ऑंखों से ओझल रहता है।अरस्तू ने मित्रता के जिन पांच तत्वों की चर्चा की है उसमें 'सेल्फ लव' या निज प्रेम को सबसे ऊँचा दर्जा दिया है।किंतु यह सामने तब ही आता है जब माँ सामने आती है।अरस्तू की नजर में माँ सबसे अच्छी मित्र होती है।
अरस्तू सिर्फ मित्र के गुण ही नहीं बताते बल्कि बताते हैं कि मित्रता का अर्थ क्या है ?मित्र वह है जो अपने मित्र की भलाई की कामना करे।उसकी दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना करे।मॉ ऐसी ही कामना अपने बच्चे के लिए करती है।संकट की स्थिति में जो मदद करता है वह मित्र है।देरीदा को माँ का मित्र रूप पसंद है।वह कहता है माँ जब प्यार करती है तो पूर्णत: प्यार करती है।वह प्यार पाए बिना प्यार करती है।वह स्वयं मित्र बन जाती है।यह उसका दुर्लभ गुण है।ऐसा करते हुए वह स्वयं से ही प्यार करने लगती है।देरीदा इसी तत्व को उभारते हैं।वे 'स्वयं से प्यार' की धारणा को मित्रता की बुनियाद बनाते हैं।'स्वयं से प्यार' वस्तुत: निज की उपस्थिति का एहसास पैदा करता है। देरीदा ने लिखा है कि व्यक्ति यदि स्वयं से प्यार करता है तो अन्य से भी प्यार करेगा।'स्वयं से प्यार' मित्रता का महान गुण है।
स्व से प्यार करने वाला व्यक्ति अहंकार से मुक्त होगा।व्यक्ति का एक मित्र नहीं होता।बल्कि अनेक दोस्त होते हैं।जिसके अनेक दोस्त होते हैं उसका कोई दोस्त नहीं होता। इसी अर्थ में देरिदा ने कहा कि व्यक्ति का एक दोस्त नहीं होता।दोस्ती का एक रूप भाईचारे का भी है।सिसरो,माण्टेगनी,कार्ल स्मिट आदि के विचारों के विश्लेषण के क्रम में देरिदा ने भाईचारे और मित्रता के अन्तस्संबंधों पर विस्तार से विचार किया है।इन विचारकों ने मित्रता को रक्तसंबंधों के दायरे से बाहर निकालकर सार्वभौम मित्रता के मानवतावादी दायरे में लाकर खड़ा किया।मित्रता और जनतंत्र का दायरा बड़ा किया।कार्ल स्मिट के विश्लेषण के क्रम में देरिदा ने मित्रता के अगले विकास के रूप में भाईचारे को देखा।देरीदा ने लिखा कि बेहतर मित्रता वह है जो स्वाभाविक है।प्रतीकात्मक मित्रता बेहतर मित्रता की कोटि में नहीं आती।ऐसी मित्रता के शत्रुता में बदल जाने का खतरा बना रहता है।इसीलिए देरिदा ने मित्रता को मित्र-शत्रु की कोटि से बाहर रखकर देखने की हिमायत की।यदि ऐसा नहीं करते तो मित्र कब शत्रु हो जाएगा और शत्रु कब मित्र बन जाएगा हम सोच नहीं सकते।देरीदा ने इसीलिए लिखा कि मित्रता में दोस्ती और दुश्मनी दोनों की समान संभावनाएं होती हैं।यह भी संभव है कि भाईचारे के बिना मित्रता हो।युध्द और शत्रु के दायरे के परे प्रेम और मित्रता हो।मजेदार बात यह है कि देरिदा के मित्रता विमर्श में बहिनें और औरतें शामिल नहीं हैं।इसका अर्थ यह नहीं है कि मित्रता और राजनीति के दायरे में औरतों का प्रवेश निषिध्द है।
देरीदा ने अरस्तू के प्रसिध्द वाक्य -''हे मेरे मित्र,मेरा कोई मित्र नहीं है''- को व्याख्यायित करते हुए कहा है कि जिसके बहुत मित्र होते हैं उसका कोई मित्र नही होता।देरीदा ने जनतंत्र के परिप्रेक्ष्य में मित्रता की व्याख्या की है।देरीदा ने लिखा कि जनतंत्र में सब समान हैं। सिर्फ भाई -भाई ही समान नहीं हैं,सब समान हैं।मित्रता का राजनीति से संबंध है।यह प्रचलित अर्थ में राजनीति नहीं है।बल्कि 'ध्यानाकर्षण की राजनीति'' है।इसका वह दोहरे अर्थ में इस्तेमाल करता है।एक तरफ इसमें सुनना,चेतना और स्वयं पर ध्यान केन्द्रित करना शामिल है।दूसरी ओर इसमें इंतजार,अनुमान और अनुभव से अधिक खुलापन शामिल है। इसका पूरा स्वरूप अन्य के सामने खुलता है।उस समय खुलता है जब आप अन्य को अन्य की तरह स्वीकृति दें।अन्य के रूप में इंतजार करें।जिम्मेदारी और एकीकरण का रूप तब उभरता है जब पुनरावृत्ति होती है,जब आप मतभेद व्यक्त करते हैं।मित्रता हमेशा एकाधिक लोगों से होती है।मित्रता तब होती है जब आप अन्य को अन्य की तरह देखें,अन्य को समान नजरिए से देखें। इसी क्रम में बाद में देरीदा ने 'रेडीकल डेमोक्रेसी' की धारणा व्यक्त की।इसका अर्थ है जनतंत्र को सभी किस्म की सीमाओं से परे ले जाओ,उदार राज्य,राष्ट्र, भाईचारा,राजनीतिक दलों के दायरे से परे ले जाओ।
देरिदा: प्रेम,मित्रता और विखंडन
देरिदा दार्शनिक नहीं बनना चाहता था।वह पेशेवर फुटबाल खिलाड़ी बनना चाहता था। औपचारिक स्कूली शिक्षा में देरिदा फिसड्डी था।बार-बार परीक्षा में फेल होता था। इसके बावजूद उसे 'इकोल नॉरमाले सुपीरियर इन पेरिस' में दाखिला मिला। आधुनिक युग का दर्शन का सबसे बड़ा दार्शनिक सब समय टीवी ,फिल्में और खबरें देखना पसंद करता था।वह एक दार्शनिक ही नहीं बल्कि आला दर्जे का इंसान था। उसने सबको 'डिकंस्ट्रक्शन' या विखंडन का सिध्दान्त दिया। इसका वह स्वयं भी व्यवहार में पालन करता था।वह जो कुछ भी देखता था उसके प्रति आलोचनात्मक रवैयया रखता था।यह कार्य वह सचेत रूप से करता था।
देरिदा ने एक बार एक साक्षात्कार में कहा कि मैं सब समय विखंडन करता रहता हूँ। साक्षात्कार में जब पूछा गया कि आपने आखिरी फिल्म कौन सी देखी ?क्या उसका भी विखंडन किया ?इसके जबाव में देरिदा ने गुस्से में कहा कि मैं विखंडन पदबंध के इस तरह के इस्तेमाल से बहुत दुखी हूँ। मैं सोचता हूँ कि यह इस पदबंध का शोषण हो रहा है। स्नातक स्तर के छात्र विखंडन पदबंध का स्टीरियोटाईप की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। उसे विकृत कर रहे हैं।
देरिदा के चिन्तन की केन्द्रीय विशेषता है कि उन्होंने दर्शनशास्त्र को नए सिरे से गरिमा दिलायी।यह काम उन्होंने ऐसे समय मे किया जब दर्शन के अंत की दुंदंभी बज रही थी।आधुनिक काल में दर्शनशास्त्र पेशेवर दार्शनिकों का क्षेत्र बनकर रह गया था।सामान्य बौध्दिक जगत की हलचलों में दर्शन की उपेक्षा हो रही थी।कला,साहित्य,संस्कृति, राजनीति,न्याय आदि सभी क्षेत्रों से दर्शनशास्त्र का संवाद तकरीबन टूट गया था।यह सारी परिघटना बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही शुरू हुई।दर्शन का ज्ञान,विज्ञान,समाजविज्ञान आदि से सामान्य तौर पर रिश्ता क्यों और कैसे टूटा इस सवाल पर गंभीरता विचार करने की जरूरत है।
देरिदा के चिन्तन की दूसरी केन्द्रीय विशेषता है कि वे दर्शन, साहित्य, राजनीति, न्याय,भाषा आदि के समूचे विमर्श को नए सिरे से विश्लेषित करते हैं। सभी धारणाओं, मॉडल, पध्दतियों और विचारधाराओं को विश्लेषित करते हैं, उनकी मान्यताओं को चुनौती देते हैं। इस क्रम में लेखकों, दार्शनिकों, विचारकों के बन-बनाए साँचे टूट जाते हैं। फलत: समूचे विमर्श का पैराडाइम ही बदल जाता है।
देरिदा की तीसरी महत्वपूर्ण खूबी है कि उनका कोई पाठक उनसे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता।दोस्त हो या दुश्मन वे सभी को प्रभावित करते हैं। सभी को विश्लेषण के औजार बदलने के लिए प्रेरित करते हैं।देरिदा को पढ़ने के बाद नजरिए में परिवर्तन अनिवार्य है।इस तरह की वैचारिक ताकत शायद मार्क्स के बाद किसी भी विचारक ने हासिल नहीं की थी।
देरिदा के नजरिए की चौथी विशेषता यह है कि वे परंपरा पर नए सिरे से समग्रता में विचार करते हैं। खासकर आधुनिक काल के विकास के नजरिए से सोचते हैं। वे उन तमाम दार्शनिक परंपराओं पर समग्रता में विचार करते हैं जिनके बारे में हमने सोचना बंद कर दिया था,यह मान लिया गया था कि अब तो या कुछ भी विवेचन लायक नहीं है।
असल में देरिदा का विखंडन स्वयं को चुनौती देता है।वह उस समूचे जगत को चुनौती देता है जिसमें हम जीते हैं।विखंडन प्रतिगामी वैचारिक औजार नहीं है। बल्कि वह वैध-अवैध, विवेक - अविवेक, तथ्य,कहानी,आब्जर्वेन,इमेजीनेशन आदि सभी को चुनौती देता है।विखंडन में दर्शन से लेकर जनमाध्यम, साइबरजगत तक की समस्याओं पर विचार किया गया है।
''देरिदा का मानना है कि उनका काम मौजूदा विमर्श में बेहद हाशियाकृत है।उनके अनुसार विखंडन दार्शनिक आशयों,विषयों,निष्कर्षों, तत्व मीमांसाओं, कविताओं,धर्मशास्त्रों, विचारधारा शास्त्रों से संबंधित नहीं है,बल्कि विभिन्न रूप में सार्थक संरचानाओं,सांस्थानिक संरचनाओं,शिक्षणात्मक या अलंकारशास्त्रीय नियमों,कानून सत्ता,और उनके बाजार की प्रातिनिधिकता से संबंधित है।स्पष्ट है कि देरिदा अपने इस कथन से विखंडन के नाम पर चल रहे तमाम तरह के प्रवादों की सीमा रेखा खींच देते है।वे विखंडन को सांस्थानिक बनाए जाने के प्रयत्नों को नकार देते है जो अमरीकी विश्वविद्यालयों के अंग्रेजी विभागों तथा तुलनात्मक साहित्य के विभागों में इन दिनों हो रहे हैं।''(सुधीश पचौरी,देरिदा का विखंडन और साहित्य,1997,पृ.20)
विखंडन सन् 60 के दशक में सामने आया।यह पश्चिम की 'मेटाफिजिकल परंपरा' का सिध्दान्त है।इसमें बीसवीं शताब्दी के सभी प्रमुख विचारकों के नजरिए का कनवर्जन है।यह उपग्रह युग की कनवर्जन तकनीकी का साहित्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र है।इसमें हुसेर्लियन फिनोमिनोलॉजी, मार्क्स,सोस्यूर,फ्रांसीसी संरचनावाद,मनोशास्त्र और भारतीय दर्शनशास्त्र का समावेश है।
विखंडन खास तरह की रीडिंग के अभ्यास,आलोचना की पध्दति, विश्लेषणात्मक खोज की पध्दति का नाम है।बारबरा जॉनसन ने 'दि क्रिटिकल डिफरेंस'(1981) में लिखा 'विखंडन' को 'विध्वंस' के पर्यायवाची के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह 'विश्लेषण' के ज्यादा करीब है। विश्लेषण में त्यागना अनिवार्य शर्त है। बिना त्यागे विश्लेषण संभव नहीं है। बारबरा ने लिखा है कि विखंडन वास्तव अर्थों में 'पुनर्निर्माण' का पर्यायवाची है। यदि कोई चीज विध्वंसक रीडिंग में नष्ट होती है तो वह पाठ नहीं है बल्कि उसका वर्चस्वशाली रूप नष्ट होता है। यह ऐसी रीडिंग है जो पाठ के विश्लेषण के दौरान उसमें निहित आलोचनात्मक फर्क को सहज ही उजागर कर देती है।
पाल द मान ने लिखा है विखंडन रीडिंग की सैध्दान्तिकी है।जो पाठ में निहित विपरीत अर्थ के तर्क की उपेक्षा करने वाले नजरिए का विखंडन करती है। विखंडन के बारे में एक अमेरिकी पत्रिका ने अप्रैल 1993 में लिखा कि विखंडन संभवत: यूरोप के लिए सबसे प्यारी चीज है। किंतु अमेरिका के साथ उसका 'लव-हेट' (प्रेम-घृणा) का संबंध है। सुधीश पचौरी के मुताबिक ''विखंडन मानता है कि आलोचना लेखन का एक तरीका है,जो किसी चीज में से किसी चीज को खोजता नहीं है बल्कि उस टैक्स्ट मे अर्थ का निर्माण भर करता है जिससे वह संलग्न होती है।इसलिए वह रचना की तरह ही रचनात्मक है।जिस तरह रचना टैक्स्ट में अर्थ का निर्माण करती है,उसी तरह आलोचना टैक्स्ट में 'अर्थ का निर्माण' करती है।इसलिए रचना और आलोचना 'अर्थ निर्माण के दो तरीके हैं'बड़े-छोटे नहीं हैं।इस अवधारणा ने सिध्दान्तिकी के परंपरावादियों की नींद हराम कर दी है।''(उपरोक्त,पृ.21-22)
''विखंडन की दूसरी रणनीति यह है कि वह किसी भी 'टैक्स्ट' में मौजूद अर्थ को निश्चित,पक्का और पूरा नहीं मानता।वह नहीं मानता कि किसी टैक्स्ट या पाठ की पूरी तरह और अंतिमत: व्याख्या की जा सकती है।उसका मानना है कि हर पाठ कुपाठ होता है।'मिस रीडिंग' है।''(उपरोक्त,पृ.22)
सामान्य तौर पर बुध्दिजीवी यह आरोप लगाते हैं कि देरिदा की किताबें बेहद जटिल हैं। वह कठिन गद्य लिखता है।उसे समझने में मुश्किल होती है। पाठकों को हतोत्साहित करता है। लेखन में सरलतापंथी पेटू लोग हिन्दी में जिस तरह व्यापक पैमाने पर पाए जाते हैं वैसे ही पश्चिम में भी पाए जाते हैं।इस तरह के सरलतापंथी पेटू लोगों को ध्यान में रखकर देरिदा ने कहा था कि यह सच है कि इससे मेरा नुकसान होता है।इससे बचने के लिए जो भी संभव है मैं करता हूँ। असल में जो लोग कहते हैं कि उन्हें मेरी बात समझने में कष्ट होता है। मेरी बात उनकी समझ में नहीं आती। असल में वे लोग समझना ही नहीं चाहते। जो समझना नहीं चाहते उन्हें मेरी पुस्तकें समझ में नहीं आएंगी। हमें उनकी रीडिंग और विश्लेषण की पध्दति के बारे में सवाल उठाने चाहिए।असल में वे लोग आरामदायक और सरल तरीके से पढ़ना चाहते हैं।
देरिदा ने कहा जब कोई गणितज्ञ या फिजिसिस्ट लिखता है, उसके लिखे को जब कोई नहीं समझता तो उसके लिखे के बारे में कोई नहीं कहता कि समझ में नहीं आता। कोई विदेशीभाषा बोले,तब भी नहीं कहते कि समझ में नहीं आता अथवा लोग कुछ नहीं बोलते। कोई जब आपकी भाषा की टांग तोड़ दे, तब ही कहते हैं कि समझ में नहीं आता। अथवा वे लोग कुछ नहीं बोलेंगे। असल में सवाल संबंध का है।आप कैसा संबंध बनाना चाहते हैं। मैं जटिल बनाने के लिए जटिल नहीं लिखता। ऐसा करना हास्यापद होगा। लोग यह मानकर क्यों चल रहे हैं कि दार्शनिक को सरल होना चाहिए। वे किसी वैज्ञानिक के बारे में ऐसा क्यों नहीं सोचते। जबकि वैज्ञानिक तो बहुत सारे पाठकों की पहुँच से बाहर होता है। जटिलता के सवाल को साहित्य के संदर्भ या लेखक के संबंध में ही क्यों उठाया जाता है। लेखक के संदर्भ में ही अपठनीयता का सवाल क्यों उठाया जाता है ? जबकि वह नए की खोज करता है। नया रास्ता सुझाता है। वह भाषा की व्याख्या करता है। भाषा का अर्थशास्त्र बनाता है।कोड बनाता है।ग्रहण करने के चैनल बनाता है।
देरिदा पर विचार करते समय अनेक विचारकों ने लिखा है कि विखंडन एक पध्दति है। देरिदा ने इस धारणा का बार-बार खण्डन किया है।उन्होंने यहां तक कहा है कि यह कोई 'देरीदियन मैथड' नहीं है।देरिदा पर विचार करते समय यह ध्यान रखें कि वह बोलने और लिखने की इच्छा को सर्वोच्च स्थान देता है।उसे इडियम में लिखना,इडियम बनाना पसंद है, किंतु यह भी मानता है कि इडियम प्योर नहीं होता।प्रत्येक इडियम की अपनी पध्दति होती है।प्रत्येक विमर्श,काव्य,वाक्य आदि के अपने नियम होते हैं।यह भी कहा कि मैं इडियम में विश्वास नहीं करता।इसके बावजूद सच यह है कि लेखक की लिखने की अपनी इच्छा होती है।वह कुछ भी लिखे या बोले।उसे किसी न किसी इडियम के जरिए अपनी बात कहनी होती है।यह कार्य वह गैर-अपदस्थीकृत रूप में करता है।किंतु अपने कार्य को ज्यों ही निश्चित रूप देता है अपदस्थ हो जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें पुनरावृत्ति की संभावना भी है।वह ज्यों ही भाषा के माध्यम से इडियम में प्रवेश करता है उसे इडियम से बाहर के तत्वों से समझौता करना पड़ता है। वह कॉमनभाषा,अवधारणा,कानून,सामान्य नियमों आदि से समझौता करता है। इस क्रम में वह इडियम को सुरक्षित रखने की कोशिश भी करता है।नियमों की व्यवस्था को सुरक्षित रखता है। साथ ही इडियम के मैथड को भी मानता है। मैं यह भी कहना चाहता हँ कि रचनात्मक सवालों के बहाने मैथड के सवाल हीं उठाए जाने चाहिए।उसकी तकनीकी प्रक्रिया है।वहां एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ तक पुनरावृत्ति होती रहती है।मसलन् मैं जो कुछ लिखता हूँ उसके भी सामान्य नियम हैं।कुछ प्रक्रिया है।इसका मैं विश्लेषण के लिए इस्तेमाल करता हूँ।इसी को मैं टीचिंग,नॉलेज और एप्लीकेशन कहता हूँ। किंतु ये सारे नियम पाठ से लिए जाते हैं। प्रत्येक पाठ विलक्षण होता है। उसमें विलक्षण तत्व होते हैं। उसे स्वयं में संपूर्णता के हवाले नहीं किया जा सकता है।इसी तरह लिखे हुए के प्रभाव के बारे में भी सोचना चाहिए। कोई चाहे या न चाहे इडियम का अन्य पर असर होता है। यह फोटोग्राफी के प्रभाव की तरह है।आप चाहे जिस रूप में फोटो खिंचवा लें।चाहे जितनी सावधानी बरतें।चाहे जैसे दिखने की कोशिश करें।इसके बावजूद ऐसे क्षण आएंगे जब फोटो आपको आश्चर्यचकित करेगा।
देरिदा के व्यक्तित्व की यह विशेषता थी कि उन्होंने हमेशा अपने को बहुत ही सामान्य ढंग से पेश किया।किंतु उनके लेखन को लेकर जबर्दस्त विवाद उठे हैं। उन पर अभूतपूर्व हिंसक हमले भी हुए हैं। उनकी जमकर निन्दा भी हुई है। इसके कारणों की खोज करते हुए देरिदा ने कहा कि मेरा कार्य सक्रिय प्रक्रिया का हिस्सा है। वहां अभी बहुत कुछ अनखुला है। खासकर प्रतिरोध अनखुला है जो कभी भी उभरकर सामने आ सकता है।प्रतिरोध उभरेगा तो वह व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहेगा। अनुशासन तक ही सीमित नहीं रहेगा।शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा।इस प्रतिरोध में छात्र,युवा एवं शिक्षक बार-बार शामिल हो रहे हैं। यदि मेरे सहकर्मी मेरे ऊपर हमले कर रहे हैं तो इसका कारण शैक्षणिक नहीं है, पागलपन नहीं है, बल्कि सच यह है कि कहीं न कहीं अपने लिए खतरा महसूस कर रहे हैं। मुझे उम्मीद और विश्वास है कि वे अनेक सिध्दान्तों का मूल्यांकन कर रहे हैं,अनेक प्रभुत्वशाली विमर्शों की पुन:परीक्षा कर रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों का मूल्यांकन कर रहे हैं। प्रभुत्वशाली विमर्शों में संशोधन कर रहे हैं। उनका राजनीतिकरण कर रहे हैं। यदि ये सिर्फ व्यक्तिगत हमले होते तो बात कुछ और थी। यह व्यक्तिगत मामला नहीं है। विखंडन की अनेक जिज्ञासाएं सवाल खड़े कर रही है। उन तमाम वर्गीकरणों,तटस्थ रूपों के प्रति सवाल खड़े कर रही हैं जो दर्शन में मौजूद हैं।
कायदे से इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि देरिदा के समसायिक राजनीतिक मसलों पर लिए गए स्टैंड ने कोई हंगामा खड़ा नहीं किया बल्कि व्यवहार में उसकी उपेक्षा ही ज्यादा हुई है।ऐसा क्यों हुआ ?इसके बारे में देरिदा का कहना है कि यह सच है राजनीति में चुप्पी है।अनेक मामलों में मेरी वापसी भी हुई है।किंतु चीजों को अतिरंजित रूप में पेश नहीं करना चाहिए।इस संदर्भ में यदि किसी को रूचि है तो वह देख सकता है कि मेरी रूचियां क्या हैं ?चयन क्या है ?वगैर किसी दुविधा के कुछ चीजें अभिव्यक्त हुई हैं।मैंने सामान्य तौर पर खास और आम बातों पर ही बोला है।ऐसी स्थिति में मैं अन्य की राय या वोट में शामिल हो गया हूँ।मैंने कभी अधिकारी विद्वान् होने का दावा नही किया।कोई यश लेने की कोशिश नहीं की। अपने लिए दार्शनिक या बुध्दिजीवी जैसा विशेष दर्जा नहीं मांगा।बल्कि सच यह है कि मुझे उसी समय ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा है जब मैंने अपने को दार्शनिक, बुध्दिजीवी या प्रोफेसर के रूप में देखने की कोशिश की है।मैं सोचता हूँ कि खास परिस्थितियों में, क्लासिक भूमिका एवं जिम्मेदारी निभाने की जरूरत होती है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।मैं रूपान्तरण करने की कोशिश करता हूँ और अच्छे भावों को अपील करने की राजनीतिक जिम्मेदारी निभाता रहा हूँ।
देरिदा के चिन्तन की धुरी है ग्रीक दर्शन और उसकी धुरी है 'लव ऑफ विजडम'। बतर्ज देरिदा फ्रांस में दर्शन को 'इटीमोलॉजी' यानी 'व्युत्पत्तिविज्ञान' कहते हैं। 'व्युत्पत्ति' यानी मालूम करना।संस्कृत में इसे निरूक्त कहते हैं।ग्रीक में दर्शन को प्रेम अथवा सोफिया के प्रति मित्रता कहा जाता है।इसमें 'विजडम' भी शामिल है।इसे ज्ञान का कौशल भी कह सकते हैं।देरिदा ने कहा कि हमें सवाल करना चाहिए कि 'फिलिया'क्या है ? प्रेम क्या है ? इच्छा क्या है ?इन सवालों से टकराते हुए हमने दर्शन को परिभाषित करना शुरू किया।इन सबको परिभाषित करने के लिए हमने व्युत्पत्तिविज्ञान को आधार बनाया।यही वजह है कि प्रेम और मित्रता की व्याख्या करने वाले अनेक पाठ प्रचलन में आए हैं।मैंने भी एक पुस्तक 'पॉलिटिक्स ऑफ फ्रेण्डशिप' नाम से लिखी है।तकरीबन सभी बड़े फ्रांसीसी विचारकों ने मित्रता और प्रेम के सवाल पर विस्तार से विचार किया है।देरिदा ने कहा कि मैं इस प्रसंग में इस बात से सहमत हूँ कि चीजों को इस तरह देखने से दर्शन की ज्ञानमीमांसापरक व्याख्या से हम भटक जाते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक दार्शनिक ने दर्शन की अपनी परिभाषा बनायी है। इसी को लेकर दार्शनिकों में जबर्दस्त विवाद है।वे दर्शन पर विचार करते रहे हैं कि यह कब और कैसे पैदा हुआ ?दर्शन की उत्पत्ति का आधार क्या है ?इस संदर्भ में यह ध्यान रखें कि आप दर्शन क्या है ?इसकी अवधारणात्मक व्याख्या तक ही सीमित नहीं रह सकते।यहां दर्शन शब्द का अर्थभर बता देना ही पर्याप्त नहीं है। 'फिलॉसफी' पदबंध ग्रीक का है।इसकी अनेक व्याख्याएं हैं।इन व्याख्याओं में बदलाव आता रहा है।
विखंडन नकारात्मक धारणा नहीं है।बल्कि हो यह रहा है कि विखण्डन को अधूरे रूप में पेश किया जा रहा है।सन् 1980 में देरीदा ने इस तरह के रूझानों को मद्देनजर रखकर ही कहा था कि विखण्डन के साथ प्रेम की धारणा को रखकर पढ़ा जाना चाहिए। देरिदा ने कहा था कि प्रेम का मतलब है अन्य की इच्छा-आकांक्षाओं के प्रति दृढ़ निश्चयीभाव।अन्य का सम्मान करना।अन्य की तरफ ध्यान देना।न कि अन्य के अन्यत्व को नष्ट करना।यह मेरी बुनियादी समझ है। इसके बावजूद यह सवाल किया जा सकता है कि विखण्डन में नकारात्मक क्या है ? मैं कहना चाहता हूँ कि विखण्डन में कुछ भी नकारात्मक नहीं है।तुम इसकी आलोचना कर सकते हो।सवाल खड़े कर सकते हो।चुनौती दे सकते हो। कभी-कभी विरोध भी कर सकते हो।इसके बावजूद विखण्डन में नकारात्मक कुछ भी नहीं है। विखण्डन नकारात्मक होकर कार्य नहीं करता।नकारात्मकता के आधार पर आप कोई कार्य नहीं कर सकते।यदि आलोचना करना चाहते हैं,इसे अस्वीकार करना चाहते हैं,खारिज करना चाहते हैं,चाहे अन्य का विरोध करने के लिए ही सही,तो इसके साथ आपको एक छोटा सा समझौता करना पड़ेगा सबसे पहले आप उसकी मौजूदगी को मानें।
देरिदा ने कहा कि जब आप अन्य को सम्बोधित करना चाहते हैं,चाहे अन्य का विरोध करने के लिए ही सही,तो आप अन्य की उपस्थिति को मानें।अन्य को अन्य की तरह सम्बोधित करें। अन्य को हजम करने के लिए सम्बोधित नहीं किया जा सकता।यहीं पर हमें अन्य की विशिष्टता को स्वीकार करना है। इस स्थिति को किसी भी तरह बदला नहीं जा सकता। यही इसका मूल नैतिक तत्व भी है।इस दृष्टि से देखें तो विखंडन एक एथिक्स है।यह सामान्य अर्थ में एथिक्स नहीं है।
देरिदा ने अपने लेखन में 'यस' पदबंध का काफी प्रयोग किया है।देरीदा कहते हैं कि 'यस' पदबंध 'अन्य' की तरह नहीं है।तुम 'यस' का प्रयोग नहीं भी करो तब भी यह ध्यान रखो कि प्रत्येक भाषा में 'यस' पदबंध है।यह प्रत्येक दार्शनिक के यहां हैं। हाइडेगर के यहां भी है। हाइडेगर कहा करता था कि चिन्तन की शुरूआत सवाल से होती है।सवाल करने का अर्थ है चिन्तन के सम्मान के प्रति सवाल खड़े करना।एक दिन ऐसा भी आएगा कि हम यह कहें कि 'उसके बयान का खण्डन करते हुए कह रहा हूँ 'यस'।उल्लेखनीय है 'यस' का दार्शनिकों की भारतीय परंपरा में मौनम् सम्मति लक्षणम् के अर्थ में प्रयोग होता रहा है।अथवा भारतीय दार्शनिक यों कहते हैं कि अब तक जो कहा गया वह फलां का है। इसके आगे मैं कहता हूँ।देरीदा ने कहा कि 'यस' कहने से बात खत्म नहीं हो जाती।बल्कि इसके बाद जो सिलसिला शुरू होता है।वह यह रेखांकित करता है कि चिन्तन के पहले भी कुछ मौजूद है।इसी को जूसेज ने चुपचाप स्वीकार करना कहा है।संस्कृत में इसी को मौनम् सम्मति लक्षणम् है।स्वीकार करने का अर्थ है दृढतापूर्वक कहना।'यस' कहने का अर्थ है कि तुम अन्य को पहले मानो और कहो कि मैं तुमसे सवाल करना चाहता हूँ।अन्य से कहो कि मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ।अन्य को चुनौती देने,विरोध करने से पहले यह कहना जरूरी है कि मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ।तुम्हारा अस्तित्व मानता हूँ।ज्योंही आप यह कहते हैं आप अपने और अन्य में जो कॉमन है उसे बता रहे हैं तो इसी को 'लव' या प्रेम कहते हैं।इसी को कहते हैं दृढ़ निश्चयपूर्वक कहना।
देरिदा के चिन्तन की मुश्किल यह है कि उसे पढ़ते समय आप उसके दायरे के बाहर नहीं जा सकते।उससे बाहर राय नहीं बना सकते।यह आंतरिक तौर पर उसकी भाषिक संरचना में निहित है।असल में इस समस्या का संबंध उसके परंपरा संबंधी मूल्यांकन से है।विरासत के सवाल से है।देरीदा ने कहा कि मेरा सब कुछ 'इनहेरिटेड' नामक धारणा पर टिका है।जब आप भाषा को विरासत में पाते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि आप पूरी तरह इसके अंदर हैं।अथवा ठंडे रूप में इसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं।'इनहेरिटेड' का मतलब है भाषा को आप पूरी तरह आत्मसात् करें।रूपान्तरित करें।उसमें से कुछ का चयन करें। व्याख्या करें। प्रतिक्रिया दें।जबाव दें।दायित्व लें।जब दायित्व लेते हैं तो आप विरासत के बंदी नहीं होते।'हेरीटेज' का अर्थ यह नहीं है कि आप उसे समूचा पा लें। या दे दें।आप हेरीटज के बंदी नहीं हैं।आप उसे सिर्फ संरक्षित नहीं रख सकते जिससे वह सिर्फ बची रहे। तुम्हें जीना है और विकास करना है।इसमें चयन और व्याख्या की प्रक्रिया भी शामिल है।मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि इसमें दोहराने या कंजरवेटिव पोजीशन लेने की बेचैनी या उद्विग्नता भी होती है।किंतु जरूरी नहीं है कि यह प्रक्रिया घटित हो। मैं कहना चाहता हूँ कि कुछ भी नया करने के लिए विरासत को आत्मसात् करना जरूरी है।तुम्हें भाषा के अंदर जाना होगा। परंपरा के अंदर जाना होगा।तुम जब तक अंदर नहीं जाओगे रूपान्तरित नहीं कर सकते।किसी चीज को तब तक अपदस्थ नहीं कर सकते जब तक उसके अंदर न जाओ।
देरिदा को परंपरा की पुनरावृत्ति से कोई एतराज नहीं है।इस संदर्भ में हमें पुनरावृत्ति और इन्नोवेशन (खोज)में चयन नहीं करना है।बल्कि दो तरह की परंपराओं और इन्नोवेशनों में से चयन करना है।इसके अलावा कुछ और भी सक्रिय रूप भी हो सकते हैं।मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि कुछ नया खोजने की व्यवस्था बनानी है।अथवा कुछ नया घटित हो इसका प्रयास करना है।यह संभव है कि परंपरा के साथ धोखा करो या उसे भूल जाओ।तुम यदि किसी से बात करते हो तो यह सुनो कि अन्य क्या कहते हैं।संभवत: तुम उसकी पुनरावृत्ति करो।इसका तुम्हें जबाव देना होगा।प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होगी।देरिदा ने कह कि मैं परंपरा पर बात करते समय प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी दोनों को शामिल करता हूँ।देरिदा सामान्य तौर पर जब भाषा पर बात करता है तो उसे पुनरूक्ति कहता है।वह नए और संभावित अर्थ में व्यक्त होती है।इस प्रसंग में देरीदा ने कहा कि मुझे संस्कृत के व्युत्पत्तिशास्त्र की अस्पष्ट समझ है।वहां 'इटिरा' का अर्थ है और फिर एकबार।वही पुनरावृत्ति है।अथवा कुछ अन्य है,कुछ बदलाव के साथ है।इसका अर्थ है कि भाषा स्वयं को नए संदर्भ में पुन: प्रस्तुत करती है।नए फॉर्म में पेश करती है। उसके संभावित अर्थों के बारे में बताना असभव है।उसकी सीमा तय करना असंभव है।इसका अर्थ यह भी है कि पाठ से अर्थ को अलग नहीं कर सकते।खासकर लेखक की मंशा से पाठ को अलग नहीं कर सकते।इसका अर्थ यह भी है कि लेखक अपनी पुस्तक के भविष्य के लिए जिम्मेदार है।किंतु यह बात यांत्रिक तौर पर लागू नहीं होती।लेखक,दार्शनिक आदि को अपने लिखे के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। मसलन् लिखते समय राजनीतिक आयाम के प्रति सतर्क रहना चाहिए। कोशिश करो कि ज्यादा नियंत्रण स्थापित न किया जाए।लेखन के सभी संभावित परिणामों के मद्देनजर कहना चाहता हँ कि जनता आपके लेखन से कुछ न कुछ अर्थ निकाल लेगी।इसी को ओवलीगेशन कहते हैं।प्रत्येक चीज को देखने एवं विश्लेषित करने का दबाव कहते हैं। लेखन को नियंत्रित करना असंभव है।तुम चीजों को नियंत्रित नहीं कर सकते।अथवा खास तरह के विमर्श या वाक्यों को प्रकाशित होने से रोक नहीं सकते।ध्यान रहे जब कोई चीज खोजी जा रही है तो खोजी जा रही है।खोज हमेशा आपकी पकड़ के बाहर होती है।आपके नियंत्रण के बाहर होती है।वह भिन्न संदर्भ में होती है।उसका शोषण या अपदस्थीकरण संभव है।इसका लेखक के लक्ष्य से भिन्न इस्तेमाल संभव है।
यही सवाल मैंने नीत्शे के संदर्भ में उठाया था।यह सच है कि नीत्शे का नाजियों ने इस्तेमाल किया। दुरूपयोग किया।इसी वजह है नीत्शे को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसमें संदेह नहीं है कि वह यह सब नहीं चाहता था। किंतु हम यह कैसे भूल सकते हैं कि नाजी उसे अपना उत्तराधिकारी मानते थे।यही वजह है कि उसके साथ विमर्श होना चाहिए। उसके नाजी संबंधों के बारे में विमर्श होना चाहिए।मैंने यह कार्य अपने तरीके से किया है। फिर भी उसके दुरूपयोग रोक नहीं सकते। मैं चाहता हूँ कि भाषा के वर्चस्व के प्रति प्रतिरोध किया जाए। किंतु इसके साथ यह भी कहना चाहता हूँ कि राष्ट्रवाद का भी विरोध किया जाए।भाषा के वर्चस्व के प्रति विरोध को कुछ प्रतिक्रियावादी तत्वों ने आत्मसात् कर लिया है।कुछ लोगों ने कहा कि तुम डिफरेंस या भिन्नता के नाम पर सार्वभौम भाषा में दरार पैदा कर रहे हो।अत: हम तुम्हारे विमर्श को राष्ट्रवाद या प्रतिक्रियावादी भाषायी हिंसा के पक्ष में इस्तेमाल करते हैं।मैं इस तरह के चिन्तन को नियंत्रित नहीं कर सकता।तुम सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते।इसका अर्थ यह है कि तुम चुके हुए इंसान हो,सीमित इंसान हो।इसका संबंध भाषा की संरचना से है।खोज की संरचना से है।ज्यों ही तुम कोई चीज खोजने जाते हो तो खोज का कार्य मूल से स्वतंत्र हो जाता है।ज्यों ही तुम कोई चीज खोज लेते हो तो तुरंत पलायन कर जाते हो।मैंने इसी अर्थ में कहा था कि तुम किताब को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते।मेरे इस साक्षात्कार का भविष्य भी मैं नियंत्रित नहीं कर सकता।अभी यह टेप हो रहा है।बाद में इसे लिखोगे।पुन: लिखोगे।पुन: नए फ्रेम में डालोगे।नए संदर्भ में विकसित करोगे।फलत: मेरे वाक्य नई ध्वनि व्यक्त करने लगेंगे।यह असल में आस्था और विश्वास का मामला है।आपको अपने कहे या लिखे पर विश्वास करना होगा।
एक दार्शनिक के नाते देरिदा से अमेरिका में घटित 'सितम्बर 11' की घटनाओं के बारे में सवाल किए गए। ' 9/ 11 ' की भाषा के बारे में पूछा गया। उसकी परिणतियों के बारे में पूछा गया तो देरिदा ने कई महत्वपूर्ण पक्षों पर रोशनी डाली। देरिदा ने कहा कि ' 9/ 11' की घटना के बारे में जैसा कि तुमने सवाल किया है। इससे यह बात उभरती है कि इसमें तिथि का महत्व है।वही इसका नाम है। ज्यों ही तुमने 'सेप्टेम्बर इलेवन' कहा,तो पहले ही बता दिया कि अब तुम मुझसे इस घटना को याद करते हुए बात कर रहे हो।तुम्हारे सवाल में ही निहित है कि हमारे सार्वजनिक जीवन से 'डेट' और 'डेटिंग' को,पांच सप्ताह हो गए, उठा लिया गया है।(यह साक्षात्कार 22 अक्टूबर 2001 को लिया गया) ।
अब हम 'तिथि' में नहीं 'अनुभूति की तिथि' में जी रहे हैं। फ्रेंच में इसे तारीख निर्माण कहते हैं। इतिहास में दिन का निर्माण है।इसके प्रभाव को आप महसूस कर सकते हैं। यह अभूतपूर्व एकायामी घटना है। इसकी अनुभूति उतनी स्वर्त:स्फूत्त नहीं है जितनी ऊपर से लग रही है।असल में व्यापक स्तर पर इस अनुभूति का अभ्यस्त बनाया गया है। इस अनुभूति को निर्मित किया गया है। यदि यह वास्तव में निर्मिति नहीं है तब भी मीडिया के जरिए,तकनीकी-सामाजिक- राजनीतिक मशीन के जरिए इसे प्रसारित किया गया है।जिससे इस तारीख को इतिहास बनाया जा सके।इसका समूचा वर्णन संभावना और पूर्व संभावना में आ रहा है। अपरिष्कृत और कठमुल्ले रूप में आ रहा है।अथवा यह भी कह सकते हैं कि सुचिंतित,संगठित, सुनियोजित रणनीति के तहत इसका प्रचार हो रहा है।
देरिदा ने कहा कि ' 9/ 11' का संबंध 'अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद' की धारणा से है। जब हम ' 9 / 11 '' कहते हैं तो इस नाम और नम्बर के जरिए क्या कहना चाहते हैं हम नहीं जानते ? इस नामकरण का अविवादास्पद असर हुआ है।इस असर के बारे में हमने सोचा ही नहीं है।इस तरह के नामकरण का अर्थ क्या है ? जब हम 'सेप्टेम्बर इलेवन' कह रहे होते हैं।इसे दोहरा रहे होते हैं।जब हम पुनरावृत्ति करते हैं तो ध्यान रहे पुनरावृत्ति तटस्थ बनाती है।समापन की ओर ले जाती है।संवेदना से दूरी बनाती है।यही बात टेलीविजन प्रसारित इमेज पर भी लागू होती है। इस नाम का या किसी भी नाम का बार-बार उच्चारण अंतत: उस नाम को शक्तिहीन बनाता है।अर्थहीन बनाता है।हमें इस घटना को भाषा के परे जाकर देखना चाहिए।उस दिन भयानक घटना हुई।इसका अंत क्या होगा,हम नहीं जानते।यह हिंसा है।इसकी निन्दा करनी चाहिए।इसमें अनेक लोग मारे गए हैं।कोई नहीं मानेगा कि यही इसका अंत है।असल में यह घटना हमें कुछ कहने के लिए बाध्य करती है।
देरिदा ने कहा कि इस घटना का एक 'इम्प्रेशन' है दूसरा 'इंटरप्रिटेशन' है।अभी इंटरप्रिटेशन असंभव है।इसी तरह हमें ध्यान रखना होगा कि इसके बारे में 'कुछ ठोस तथ्यों' की व्यवस्था कर दी गई है।अत: हमें 'सूचनाओं' में अंतर करना चाहिए।जहां तक संभव हो हम व्याख्या करें।जिससे इस बड़ी घटना को समझा जा सके।जब देरिदा से कहा गया कि यह ऐसा हिंसाचार है जो विश्वयुध्द में भी नहीं देखा गया तो देरिदा ने कहा कि इस तरह के अनेक उदाहरण हैं।ऐसे अनेक जनसंहार हुए हैं।किंतु उन्हें दर्ज नहीं किया गया है।उनकी व्याख्या नहीं हुई है।उन्हें हम महसूस नहीं करते।उन्हें बड़ी घटना के रूप में पेश नहीं करते।इसलिए वे घटनाएं प्रभाव नहीं छोड़तीं।कम से कम सभी पर अपना प्रभाव नहीं छोड़तीं।खासकर विस्मृत न की जाने वाली विनाशलीला के रूप में प्रभाव नहीं छोड़तीं।हमें सवाल करना चाहिए कि हमारे ऊपर ये दो तरह के प्रभाव कैसे पड़ रहे हैं।एक तरफ हम इस घटना के पीड़ितों के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर रहे हैं,दुख व्यक्त कर रहे हैं,निंदा कर रहे हैं,किंतु दूसरी तरफ हमें जनसंहारों पर कुछ भी कहने की जरूरत महसूस नहीं होती।मेरा मानना है कि हमें बगैर किसी सीमा के,बगैर किसीर् शत्त के सभी किस्म की बर्बरता,हिंसाचार की निन्दा करनी चाहिए।हमें बर्बरतापूर्ण घटनाओं के प्रति अंदर से आंतरिक प्रतिरोध व्यक्त करना चाहिए।उसकी व्याख्या करनी चाहिए।उन परिस्थितियों को बताना चाहिए कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं।
इसी तरह 'विश्वास' का फिनोमिना, साख एवं संबंध पर निर्भर करता है।इसी पर इसकी व्याख्या निर्भर करती है।देरिदा ने कहा कि ' 9 /11 ' की घटना को 'आतंकवाद के खिलाफ जंग' कहना भ्रमित करना है।(उल्लेखनीय है अमेरिका ने इसी थीम पर सारा प्रचार किया है।)हमें इस भ्रम को विश्लेषित करना चाहिए।बुश ने कहा कि यह 'युध्द' है किंतु असलियत में वह इसे परिभाषित करने में असमर्थ रहा।जबकि यह घोषित युध्द था।यह भी बार-बार कहा गया कि यह अफगानिस्तान के नागरिकों के खिलाफ जंग नहीं है।यह भी कहा गया कि अफगानिस्तान की जनता और सेना अमेरिका की शत्रु नहीं है।यह मानकर चला गया कि विन लादेन वहीं है।वह स्वायत्त रूप से फैसले लेता है।जबकि प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह अफगान नहीं है।उसे उसके देश ने ही ठुकरा दिया है।बहिष्कृत कर दिया है। यह भी कह सकते हैं कि उसे प्रत्येक देश और राज्य ने अस्वीकार कर दिया है।यह सच है कि उसे प्रशिक्षण अमेरिका ने ही दिया था।अत: वह अकेला नहीं है।उसे कोई भी राज्य खुले तौर पर समर्थन भी नहीं करता।जहां तक आतंकवादियों को शरण देने वाले राष्ट्रों का मामला है तो इस बारे में यही कह सकते हैं कि उनकी पहचान नहीं हो सकती। अमेरिका,यूरोप,लंदन, बर्लिन इनके अभयारण्य हैं।ये वे देश हैं जहां दुनियाभर के सभी आतंकवादियों के प्रशिक्षण,निर्माण अदि की सभी सूचनाएं उपलब्ध हैं।इनके बारे में किसी भूगोल,सीमा क्षेत्र को आधार नहीं बना सकते।आज हमें किसी देश में गड़बड़ी फैलाने के लिए भाड़े के सैनिक या आतंकवादी भेजने की जरूरत नहीं है।बल्कि सिर्फ कम्प्यूटर वायरस भेजने की जरूरत है।वायरस के प्रसार से ही उस देश की समूची अर्थव्यवस्था,सैन्य और राजनीतिक संसाधनों को नष्ट किया जा सकता है।चाहें तो किसी देश या महाद्वीप को धराशायी कर सकते हैं।आज दुनिया में आतंक,आतंकवाद और क्षेत्र का रिश्ता बदल गया है।यह संभव हुआ है तकनीकी विज्ञान के जरिए।यह तकनीकी विज्ञान ही है जो 'युध्द' और 'आतंक' के अर्थ को बदल रहा है।आज जिन लोगों ने ' 9/ 11 ' की घटना की है वे कल इससे भी भयानक घटना को अंजाम दे सकते हैं।यह कार्य वे बगैर खून-खराबे के भी कर सकते हैं।यह 'युध्द' दो राष्ट्रों के बीच भी नहीं है।यह 'सिविलवार' भी नहीं है।न यह 'पार्टीजान युध्द' है।इसका लक्ष्य कुछ भी हो।यह मुक्ति युध्द भी नहीं है।लेकिन यह सच है कि विन लादेन के नेटवर्क ने सऊदी अरब को अस्थिर कर दिया है।उसकी जगह नए राष्ट्र को प्रतिष्ठित कर दिया है।
देरिदा के समूचे चिन्तन की धुरी है वंचित समाज,स्त्री,काले, हाशिए के लोग, अनाथ,शरणार्थी लोग,सांस्कृतिक -सामाजिक तौर पर बेदखल कर दिए गए लोग। वंचितों की अस्मिता,शास्त्र,संस्कार और मूल्यों की चिन्ता को लेकर सारा देरीदाशास्त्र निर्मित किया गया है। आधुनिक काल में चिन्तकों में वंचितों की मुक्ति की इस कदर बेचैनी कार्ल मार्क्स के बाद पहलीबार देरिदा में दिखाई देती है।देरिदा की केन्द्रीय समस्या यह है कि वे वंचितों की मुक्ति चाहते हैं किंतु जनतंत्र के अंदर।वे अपने समूचे लेखन में पूंजीवादी व्यवस्था की तीखी आलोचना पेश करते हैं किंतु इसके विकल्प का सपना उनके पास नही है। घूम-फिरकर वे पुन: पूंजीवादी विकल्पों में ही वापस जाते हैं।गैर-पूंजीवादी सामाजिक विकल्प की कोई तस्वीर उनके पास नहीं है।वे एक साफ-सुथरा,दोषरहित पूंजीवाद चाहते हैं। देरिदा के चिन्तन की यह सबसे बड़ी सीमा है। वे मौलिक इस मायने में हैं कि चिन्तन के बन-बनाए ढांचों को यथातथ्य स्वीकार नहीं करते।सन् साठ के बाद के फ्रांसीसी समाज के परिवर्तनों को वे अभिव्यक्ति देते हैं।विखंडन का सारा तामझाम अपनी पूरी शक्ति के साथ पुन: एकबार केन्द्र में आता है।ऐसा नहीं है कि देरिदा विखंडन की धारणा का इस्तेमाल करने वाले पहले दार्शनिक हैं।बल्कि यों कहें तो ज्यादा सही होगा कि पूंजीवादी विकास के क्रम में सैध्दान्तिकी की भीड़ ने जो भ्रम का वातावरण बनाया था।दिशाहीनता पैदा की थी।चिन्तन के क्षेत्र में जो हताशा छायी हुई थी।सामान्य तौर पर बुध्दिजीवियों को समझ में नहीं आ रहा था कि उनके लिए कौन सा रास्ता या दृष्टिकोण सही है।
द्वितीय विश्व युध्द के बाद पूंजीवादी दार्शनिकों की साख एकसिरे से खत्म हो चुकी थी। उसमें प्राणवायु का संचार करने में अस्तित्ववाद भी असमर्थ रहा।यहां तक मार्क्सवाद के बारे में संदेह और प्रश्नाकुलता इसी दौर में सबसे ज्यादा मार्क्सवादी खेमों में पैदा हुई।द्वितीय विश्वयुध्द के समापन के समय सारा जगत गहरे वैचारिक मंथन से गुजर रहा था।सभी विचाधाराओं को बुध्दिजीवी संदेह की नजर से देख रहे थे।मार्क्सवाद की कतारों में भी विचलन नजर आ रहे थे। बुर्जुआ विचारधाराओं में नित नए प्रयोग हो रहे थे।युध्दोत्तर दौर की नई तकनीकी-वैज्ञानिक एवं राजनीतिक कतारबंदी ने वैचारिक उथल-पुथल को तेज कर दिया था।पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों में गहरा मंथन चल रहा था।परवर्ती पूंजीवाद और समाजवाद के परिवर्तनों को लेकर नई वैचारिक रणनीति क्या हो ?इसे लेकर सभी स्कूल सक्रिय थे।यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें देरिदा सक्रिय होते हैं।वे सारे चिन्तन को जो स्वयं ही विखण्डित हो रहा था।एक नई विखंडन सैध्दान्तिकी देते हैं।वे सहमति के माहौल में असहमति का मंत्र लेकर आते हैं।वे ऐसे रूढिवादी माहौल में असहमति और विखंडन की बात करते हैं। जब मार्क्सवाद अपने को सत्य का पर्याय बना चुका था।समाजवादी व्यवस्था स्थिर हो चुकी थी।समाजवादी शिविर सामने आ चुका था।समाजवादी खेमे और मार्क्सवादियों की ओर से यह मान लिया गया कि जनतंत्र एक चुकी हुई व्यवस्था है। जनतंत्र का सर्वोच्च विकास समाजवादी जनतंत्र है। ऐसे में देरिदा का प्रवेश बेहद महत्वपूर्ण है।देरिदा ने मार्क्सवाद और पूंजीवाद के अब तक के प्रचलित सभी भावों,विचारों,विचारों,मूल्यों,नियमों, संहिताओं आदि को गंभीर चुनौती दी।यह चुनौती वे एकदम नई जमीन से देते हैं। उल्लेखनीय है कि मार्क्सवाद और पूंजीवाद ये दोनों ही मानवाधिकारों की बात नहीं करते। इनकी जितनी भी सिध्दान्त चर्चा है वह मानवाधिकार के दृष्टिकोण की उपेक्षा करती है।
देरिदा का सबसे बड़ा एकमात्र अवदान यह है कि वे युध्दोत्तर दौर में मानवाधिकारों का जो चार्टर संयुक्त राष्ट्रसंघ ने बनाया था।जिसे समाजवादी और पूंजीवादी व्यवस्था के पक्षधर मानने को तैयार नहीं थे।इस मानवाधिकार के दृष्टिकोण को अपने समूचे चिन्तन की बुनियाद बनाया।वे विखंडन के जरिए मानवाधिकारों की खोज करते हैं।जिस तरह कार्ल मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन का मंत्र बताया था। उसी परंपरा में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में मानवाधिकारों और मानवाधिकारों के पक्ष में खड़ी सैध्दान्तिकी के रूप में देरिदा सामने आते हैं। देरिदा को अभी यह चिन्ता नहीं है कि क्रांति कब होगी ? समाजवादी व्यवस्था को बचाया जाए या गिराया जाए ? देरिदा की मूल चिन्ता यह है कि अब तक के आधुनिक विकास के क्रम में मानवाधिकारों का सारी दुनिया में विकास नहीं हुआ है। मानवाधिकारों के पक्ष में दर्शन का कोई स्कूल खड़ा नहीं है। यहां तक कि कोई दार्शनिक भी मुस्तैदी के साथ खड़ा नहीं है। देरिदा के दर्शन,साहित्य,भाषा,संस्कृति,जनमाध्यम, न्याय,कानून,नैतिकता, लिंगभेद, नस्लवाद विरोध, शरणार्थी समस्या,फिलिस्तीन समस्या आदि का मूलाधार मानवाधिकार का परिप्रेक्ष्य है। उनकी बुनियादी समझ यही है कि मानवाधिकारों का उनकी सर्वोच्च अवस्था तक विकास किया जाए। मानवाधिकारों की हर हालत में रक्षा की जाए।
शीतयुध्द के दौरान मानवाधिकारों के सवाल को सोवियत संघ के माक्र्सवादियों ने सीआईए का राजनीतिक प्रपंच बना दिया था।इसके चलते बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के प्रति परिवर्तनकामी शक्तियों में गलत समझ बन गई।मानवाधिकारों की चिन्ता को बड़े कौशल के साथ देरीदा दर्शन,साहित्य,भाषा, आदि के क्षेत्र में विखण्डन के बहाने ले आते हैं।कायदे से मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में देरिदा को पढ़ा जाना चाहिए।मानवाधिकार और विखण्डन का गहरा संबंध है। मानवाधिकार के सवालों ने पूंजीवाद और समाजवाद के समूचे तानेबाने को अस्त-व्यस्त किया है।वही कार्य विखण्डन ने किया है।असल में विखण्डन मानवाधिकार की दार्शनिक रणनीति है।जिस तरह मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में सभी क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई है।यही कार्य विखण्डन ने चिन्तन के क्षेत्र में किया है।विखण्डन की रणनीति गैर-राजनीतिक नहीं है।बल्कि पूरी तरह राजनीतिक है।सम-सामयिक है।मजेदार बात यह है कि जिस जमाने में मानवाधिकारों की चेतना नहीं थी।उस दौर के चिन्तन को भी देरीदा मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में खोलकर देखते हैं।मानवाधिकार की राजनीति और देरीदा और उनके अनुयायियों का गहरा रिश्ता है।आम तौर पर आलोचकों ने इस पहलू की उपेक्षा की है।देरिदा पूंजीवाद या समाजवाद या माक्र्सवाद की आलोचना करते समय कोई निश्चित व्यवस्था का खाका पेश नहीं करते।सिर्फ मनुष्य और उसके अधिकारों के पक्ष में जनतंत्र को सबसे बडा तत्व मानते हैं। देरिदा के चिन्तन के आने के बाद सारी दुनिया में समानता, जनतंत्र,अस्मिता, स्त्री अस्मिता,दलित अस्मिता,काले लोगों के अधिकार,वंचितों के अधिकार का मामला एकदम नए स्पेस में चला गया है।
उल्लेखनीय है कि देरिदा ऐसे समय में अपनी समस्त वैचारिक ऊर्जा के साथ दाखिल होते हैं जब सांस्कृतिक-सैध्दान्तिक चिन्तन पतन की ओर जा रहा था।इस पतन से बचने का कोई मार्ग नजर नही आ रहा था।बड़े-बड़े विचारक,आलोचक,लेखक इस संकट की अवस्था में अध्यात्म में लौट चुके थे।अथवा अपनी-अपनी सैध्दान्तिक रूढ़ियों में कैद थे। देरीदा इन सबसे मुक्ति दिलाते हैं। जब हिन्दी से लेकर अंग्रेजी तक थियरी को अप्रासंगिक ठहराया जा रहा था। जब युवाओं में मानवाधिकारों और मध्य-पूर्व के संकट और नस्लवाद पर बातें करने की बजाय अप्राकृतिक मैथुन पर ज्यादा चर्चाएं हो रही थीं।समाजवाद के प्रति आकर्षण घट रहा था।जब 'शरीर' और सिर्फ कामुक शरीर चर्चा के केन्द्र में था।ऐसे में देरीदा ने अपनी विखण्डन रणनीति के जरिए वंचितों और उपेक्षितों को सारी दुनिया में केन्द्रीय एजेण्डा बनाया।जो काम इस दौर में मार्क्सवाद नहीं कर पाया उसे देरिदा के चिन्तन ने कर दिखाया।जिस समय आलोचना के नाम पर साहित्य में कचरा जमा हो रहा था।आलोचना रूढियों के मार्ग पर चली गई थी।छात्रों,शिक्षकों,आलोचकों और विचारकों के पास कोई प्रेरक व्यक्तित्व नहीं था।ऐसे में देरीदा ने प्रेरक के रूप में सारी दुनिया के बौध्दिक विमर्श को नई बुलंदियों तक पहुँचाया।देरिदा ऐसे दौर में दाखिल होते हैं जब बौध्दिकों को भविष्य को देखने के औजार नहीं मिल रहे थे।देरीदा के चिन्तन की केन्द्रीय उपलब्धि यह है कि वह बुध्दिजीवियों को सभी किस्म के रूढिगत चिन्तन से मुक्त करता है।भविष्य में आस्था पैदा करता है।भावी सपनों को आलोचनात्मक विवेक की रणनीति के जरिए खोलता है। देरीदा को पढ़ना एक राजनीतिक अभ्यास भी है।
सवाल पैदा होता है कि विखंडन में बुनियादी चीज क्या है ?इसमें दो बुनियादी चीजें हैं।पहला,देरीदा ने 'वायनरी अपोजीशन' में जो संबंध होते हैं।उन्हें विखंडन की रणनीति के तहत उलट दिया है।वह वायनरी अपोजीशन के उलट का मसीहा है।इसी के आधार पर उसने सोचने की दिशा को बदला है।मसलन् वायनरी अपोजीशन में मर्द / औरत, अच्छा /बुरा, वाक् / लेखन आदि के जो प्रचलित संबंध थे।उन्हें उलट दिया।मसलन् मर्द और औरत के संबंध में मर्द केन्द्र में था। किंतु देरीदा ने स्त्री को केन्द्र में स्थापित कर दिया।अच्छे और बुरे में अच्छा केन्द्र में था उसकी जगह बुरे को बिठा दिया।वाक् केन्द्र में था उसकी जगह लेखन को रख दिया।वायनरी अपोजीशन में यह उलट सारी दुनिया के लिए वरदान साबित हुआ है।यहां तक कि अब वे भी इस रणनीति का पालन कर रहे हैं जो कभी इसकी निन्दा करते थे।
विखंडन की रणनीति का दूसरा बड़ा अवदान यह है कि उसने समस्त भेदों को अस्थिर कर दिया है।विखंडन रीडिंग का दार्शनिक अस्त्र है यह अन्य के पाठ की व्याख्या का औजार है।इस औजार का विकास जनतंत्र में ही संभव है।जनतंत्र में ही अन्य की मुक्ति संभव है।जनतंत्र की धुरी है समानता और समानता पर आधारित न्याय का शासन।निष्पक्ष न्यायपालिका और न्याय के बिना जनतंत्र का काम करना संभव नहीं है।इस तथ्य को देरिदा ने बार-बार अपने कानून और न्याय संबंधी व्याख्यानों और लेखों में रेखांकित किया है।अपने पहले कानून-संबंधी व्याख्यान 'विफोर द लॉ' में देरिदा ने कानून के सामान्य और विशिष्ट अर्थ की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि आज कानून बेहद महत्वपूर्ण हो उठा है। न्यायाधिकारी की महत्ता बढ़ी है।वे कभी-कभी राजनीतिज्ञों द्वारा सत्ता के दुरूपयोग को रोकते हैं। जनतंत्र के स्वस्थ विकास के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना बेहद जरूरी है। स्वतंत्र न्यायपालिका हो यह जनतंत्र के लिए भी परीक्षा की घड़ी है।जो दार्शनिक एथिक्स और राजनीति में रूचि लेते हैं उन्हें कानून पर लौटना ही होगा।यदि जनतंत्र सही मायने में ग्लोबल बनता है तो दार्शनिक,कानून और न्याय से भाग नहीं सकते।उल्लेखनीय है कि देरिदा ने कानून की औपचारिक पढ़ाई नहीं की थी।किंतु कानून के सवालों पर उनकी दार्शनिक मीमांसा को सारी दुनिया के कानूनविदों में वही सम्मान और शोहरत मिली जो साहित्य या दर्शन में मिली।सामान्य तौर पर कानून पढ़ने की जरूरत उन्हें तब पड़ी जब वे एकबार लेखक के अधिकारों और कापीराइट के मसले पर कानूनी नुक्तों का अध्ययन करने के लिए मुखातिब हुए।उन्होंने साहित्य के संदर्भ में ही सबसे पहले कानून का अध्ययन आरंभ किया।लेखक के अधिकारों और कापीराइट के सवाल पर अंग्रेजी और फ्रांसीसी कानून में वर्णित प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद येल में एक सेमीनार में पर्चा पढ़ा।देरिदा ने कानून संबधी लेखन में केन्द्रीय रूप में जिस बात को आधार बनाया है वह है एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति दायित्व।इसी के आधार पर उन्होंने सीक्रेट, टेस्टीमॉनी,होस्पीटेलिटी, फोरगिवनेस आदि विषयों पर व्याख्यान दिए।
देरिदा के चिन्तन की बुनियादी धुरी है कि कुछ भी अंतिम नहीं है।कोई चीज अपने अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है।सब कुछ बदल सकता है।सब चीजों,विचारों,मूल्यों,तकनीकी आदि को उलट- पुलटकर देखा जाना चाहिए। वस्तुओं,विचार,मूल्य,मान्यता आदि के प्रति देवत्वभाव से मुक्त होकर आलोचनात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए।विश्लेषण,व्याख्या, और परिवर्तन से परे कुछ भी नहीं है।यहां तक कि हमारी आस्थाएं और विश्वास भी विश्लेषण के दायरे में आते हैं।वे भी बदल सकते हैं।बदल रहे हैं।कोई चीज अंतिम नहीं है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जो मानव सभ्यता के विकास के अनंत पथ खोलता है।इसी अर्थ में देरिदा और उनके अनुयायियों की पहल बढ़ी है।वे ज्यादा प्रासंगिक सवाल उठा रहे हैं। प्रश्नाकुलता पैदा कर रहे हैं।असहमति का शास्त्र रच रहे हैं। सहमति की दुनिया में असहमति का शास्त्र विकास का लक्षण है,पतन कर नहीं।इसी अर्थ में विखण्डन एक सकारात्मक रणनीति है। यह खोए हुए यथार्थ,पराए लोगों,वंचित लोगों और जनतंत्रप्रेमी जनता का अस्त्र है।
हमारे देश में कुछ लोग चाहते हैं कि एकायामी हिन्दुत्ववादी शिक्षा दी जाए।इस तरह की शिक्षा का देरीदा ने अपने देश में भी विरोध किया था।वहां पर भी कुछ लोग ऐसी शिक्षा के पक्ष में थे कि जो एकायामी हो,विविधता की विरोधी हो।जिसमें बहुलतावाद,विज्ञान, धार्मिक विविधता आदि की कोई जगह न हो।इस तरह की शिक्षा को देरीदा ने 'प्रभुत्ववादी केन्द्रीयता' की संज्ञा दी।
देरिदा नहीं चाहते थे कि सारी दुनिया का एकीकरण हो जाए।एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द सारे देश जमा हों।'नई विश्व व्यवस्था' के बारे में जो तर्क दिए गए उन्हें यूरोप की सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में खोलते हुए देरीदा ने लिखा कि यह दुधारी तलवार है। यूरोप की सांस्कृतिक अस्मिता को आप नई विश्व व्यवस्था के नाम पर रफा-दफा नहीं कर सकते। जब मैं कहता हूँ कि किसी भी तरह नहीं,तो इसके दो अर्थ हैं,पहला ऐसा करना हार्दिक तौर पर मुश्किल है।दूसरी बात यह कि हम किसी केन्द्रीय ऑथरिटी की पूंजी स्वीकार नहीं कर सकते।खासकर ऐसी पूंजी जो नियंत्रित करे और स्टैण्डर्डाइज करे।स्थान के आधार पर लोगों की चेतना का निर्माण बहुत सहज है।उस चेतना की बिक्री सहज कार्य है।इस तरह का सामान्यीकरण किसी भी जगह सब समय सांस्कृतिक पूंजी बनाता है।यही कार्य वर्चस्ववादी केन्द्र भी करता है।ब्रूनर ने लिखा था कि आत्म या निज को अन्य के संदर्भ में परिभाषित करो।'देरिदा ने भी कहा कि ''अस्मिता में वस्तुत:अन्य भी होता है।'' ''यह कह सकते हैं, आंतरिक और बाह्य तौर पर अस्मिता के सभी रूपों के निर्धारण में कम से कम कोई आत्म संबंध नहीं होता।स्वयं से कोई संबंध नहीं होता।आप स्वयं के आधार पर कोई पहचान नहीं बनाते।संस्कृति के बगैर अस्मिता की पहचान संभव नहीं है और संस्कृति स्वयं में अन्य की संस्कृति होती है।संस्कृति में दुहरा रूप छिपा होता है।वह स्वयं से फ़र्क खत्म करती है।'' इसका अर्थ यह है कि बौध्दिक क्षमता बढ़ाने के लिए अन्यत्व, बहुस्तरीयता और अन्तर्विरोधी स्वरों भी को शामिल किया जाए।जिससे भाषा को आलोचनात्मक अभिव्यक्ति मिले। इन स्वरों के बहिष्कार का अर्थ है कि शिक्षा का तटस्थीकरण।इसका अर्थ यह भी है कि राजनीतिक तौर पर हम यह फैसला लेने जा रहे हैं कि हमें शिक्षित नहीं करना है। देरिदा ने भिन्नता और अन्यत्व की अभिव्यक्ति को स्वीकार किया है।'नई विश्व व्यवस्था' की आलोचना करते हुए लिखा कि ''आज हमारे सामने बहुस्तरीय वैविध्य के प्रति दोहरी जिम्मेदारी है।''देरिदा ने लिखा कि इसके कई बिन्दु हैं जिन्हें ध्यान रखें।संक्षेप में देरीदा की बातों को निम्नलिखित रूप में समझ सकते हैं।
1.यह जरूरी है कि परंपरा को याद करें।साथ ही 'भिन्नता' के प्रति खुले रहें।
2.यह जरूरी है कि 'विदेशियों' का स्वागत करें।उन्हें अपने अंदर समाहित करने के लिए नहीं।बल्कि उन्हें मानें,स्वीकार करें,सम्मान दें।
3.यह जरूरी है कि सर्वसत्तावादी कठमुल्लावाद की सिध्दान्त और व्यवहार में आलोचना करें। साथ ही धर्म की पूंजी को जिसे कठमुल्ले पैदा कर रहे हैं,जो नए रूप में आ रही है,उससे सीखें और रेखांकित करें।उसकी आलोचना करें।
4.यह जरूरी है कि आलोचनात्मक विचारों और आलोचनात्मक परंपरा पैदा करें।उसे विखंडन की रणनीति के हवाले करें।उसे आलोचक और सवालों के परे ले जाएं।
5.यह जरूरी है कि हम मानकर चलें कि यूरोपीय परंपरा में लोकतंत्र का विचार एक विलक्षण विचार है।यह भी मानकर चलें कि इस विचार को कभी छोड़ा नहीं गया।यह भी कह सकते हैं कि इस पर कभी -कभी यह विचार किया गया कि यह जरूर लागू होगा।
6.यह जरूरी है कि भिन्नता,इडियम,अल्पसंख्यकों,विश्ष्टिता,कानून का सार्वभौमत्व,समझौते और असहमति की इच्छा व्यक्त करें।साथ ही बहुसंख्यकों के कानून का विरोध करें।नस्लवाद का विरोध करें।राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी उन्माद का विरोध करें।
7.सहिष्णु बनें।सम्मान करें।ये सभी बातें तर्क के शासन में नहीं आतीं।ये आस्था के भिन्न रूप हैं।साथ ही यदि तर्क के बारे में लगातार सोचें ,तर्क के इतिहास के बारे में सोचें,अनिवार्यत: उसकी व्याख्या का उल्लंघन करें। अतार्किक हुए वगैर अज्ञान की सीमा को जानें।
8.दुहरी जिम्मेदारी का अर्थ है जिम्मेदारी।''यानी सोचने,बोलने और लागू करने की जिम्मेदारी।''समुचित परिस्थितियों और दोहरे अन्तर्विरोधों के स्तर पर उन सभी का सम्मान करते हुए यह काम उन्हें भी सम्मानित करते हुए करें जो किसी भी किस्म की जिम्मेदारी नहीं निभाते।
देरीदा का सबसे चर्चित अवदान विखंडन है इसके विखंडन के मूल बिन्दु इस प्रकार हैं-
1.यह पाठ की रणनीति है।इसका उपयोग मूल्य है।इसका उत्तर व्युत्पत्तिशास्त्र में छिपा है।यह किसी भी किस्म की संदर्भगत रणनीति के बाहर है।
2.विखंडन साहित्य और दर्शन के पाठ पर निर्भर है।उसकी क्षमता है नए पाठ और नए पाठक को आत्मसात् करने की।विखंडन को 'पध्दति' में संकुचित नहीं किया जा सकता।यह खोज है।विश्लेषण है।नए तनावों की खोज है।पाठ में अन्तर्निहित अस्थिरता की खोज है।वह सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।बल्कि पाठ में निहित चीजों को उभारने,सामने लाने,उजागर करने,उन पर बल देने का नाम है।यह स्वयं और अन्य की खोज भी है।
3.विखंडन चीजों की तय प्राथमिकताओं के बारे में सवाल खड़े करता है।खासकर मूल,स्वाभाविक अथवा जो स्व-प्रमाणित है उसके प्रति सवाल खड़े करता है।कौन से मुख्य पदबंध हैं।मंशाएं हैं।चरित्र हैं।उन्हें पाठ के अंदर वायनरी अपोजीशन या युग्मी-युक्ति के रूप में परिभाषित करना।अपोजीशन कैसे क्रमानुवर्ती है ? यह अपोजीशन अस्थिर है।इसके संबंध को बदला जा सकता है।यह एक-दूसरे पर निर्भर है,अन्य पर निर्भर है।यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि पाठ कैसे उलटता है।लेखक की मंशा से परे चला जाता है।अतिक्रमण कर जाता है।
4.आज के साहित्यिक परिदृश्य में विखंडनात्मक रीडिंग व्यापक तौर पर व्याख्यात्मक रणनीति का हिस्सा है।इसका बार-बार हायरार्कीकल अपोजीशन को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।(जैसे मर्द/ औरत, अभिजन/ पापुलर कल्चर, आदि)।देरीदा ने विखंडन को अपना केन्द्रीय कार्य कभी नहीं माना।यही वजह है कि उसने इसे एक व्यवस्था,आंदोलन या स्कूल बनाने की कोशिश नहीं की।अभी तक हमारी जानकारी में कहीं 'डिकंस्ट्रक्टनिज्म' पदबंध का प्रयोग सामने नहीं आया है।हिन्दी में सिर्फ गोपीचंद नारंग ने इसे विरचनावाद कहा है।जो गलत है।उन्होंने ही इसे 'वाद' बनाया है।
5.यह भी भूल होगी कि हम विखंडन को उत्तर-संरचनावाद का पर्याय बना दें।या उस रूप में समझें।उत्तर -संरचनावाद दर्शन है।इससे देरिदा जुड़े रहे हैं।जबकि इस कार्य के अंदर विखंडन एक पदबंध है।
देरिदा पर जब भी चर्चा होती है तो हाइडेगर और नीत्शे का जिक्र जरूर आता है।इस संदर्भ में यह तथ्य ध्यान रहे कि देरिदा ने इनके सकारात्मक तत्वों को आत्मसात् किया था।इनका अंधानुकरण नहीं किया था।इन दोनों के परिप्रेक्ष्य से भिन्न परिप्रेक्ष्य में देरीदा सोचते थे।इन दोनों से भिन्न देरीदा की समसामयिक राजनीतिक सवालों पर राय थी।
देरिदा के विखंडन की मुश्किल यह है कि वह अकल्पनीय मुश्किलों से ग्रस्त है।मसलन् जब भी कोई व्यक्ति बोलता है तो तर्क की भाषा में बोलता है।ऐसे में विखंडन की रणनीति के तहत ऐसे व्यक्ति के वक्तव्य में हमें उन छिपे हुए क्षेत्रों की खोज करनी चाहिए जो तयशुदा अर्थ से भिन्न है।तर्क के नियमों से परे हैं।यहीं पर दुहरा खेल शुरू होता है।यह उभयभाविता की मांग करता है।दर्शन की भाषा में इसे दुरंगापन कहते हैं।
हाइडेगर के लिए दर्शन का अंत मेटाफिजिक्स में निहित था।हाइडेगर का मानना था कि अनुभवनिरपेक्ष के बारे में सवाल करना अर्थहीन है।वह मानता था कि दर्शन का अंत हो चुका है।दर्शन और कुछ नहीं पश्चिमी विचारधारा है।जो स्वयं सुपीरियर मानती है।देरिदा ने हाइडेगर के तर्कों से भिन्न बात कही है।देरिदा मानता है कि अनुभवनिरपेक्षता के सवालों से आप बच नहीं सकते।विचारधारा के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं यदि वे सच हैं तो ये आरोप तो दर्शन की भाषा के प्रति हुए।कायदे से पूछा जाना चाहिए कि क्या प्रभुत्वशाली विचारधारा को किसी अन्य विचारधारा ने अपदस्थ किया है।जैसे मार्क्सवाद,फ्रायडवाद वगैरह ने।देरिदा ने कहा कि मैं तर्क करना चाहता हूँ कि तर्क पुराना या रूढ़ हो गया है।वह स्वयं को ही अपील करता है।वह जिसका विरोध करता है उसके खिलाफ स्वयं को ही अपील करता है।अपने क्षेत्र को ही सम्बोधित करता है।इसी अर्थ देरिदा ने कहा कि तर्क रूढ़ हो गया है।अप्रासंगिक हो गया है।
देरिदा ने हाइडेगर की इतिहास को लेकर जो समझ है उसे लेकर कोई झगड़ा नहीं किया।मसलन् जब हाइडेगर कहता है कि दर्शन के इतिहास का अंत हो गया तो देरिदा सवाल उठाता है कि ऐसा क्या हुआ है कि अंत हो गया ?अपने समूचे चिन्तन में देरिदा ने जो रणनीति चुनी है वह दुरंगी है।वह दुहरा खेल खेलती है।वह तर्क की भाषा के जरिए सक्रिय होती है।चूँकि अन्य कोई भाषा नहीं है।वह ऐसे क्षेत्र में भी जाती है जहां समस्याओं के कोई उत्तर नहीं हैं।वह तार्किक स्थितियों के अन्तर्विरोधों को दिखाती है।देरिदा इस रणनीति को ही विखंडन कहता है।हाइडेगर के यहां यह 'विध्वंस' है।हाइडेगर के लिए 'डिस्ट्रक्शन' या विध्वंस 'इतिहास के इतिहास' की जांच या खोज है।इसमें वर्तमान की नकारात्मक व्याख्या शामिल है।हाइडेगर मानता है कि व्यक्ति इस संसार में अकेला है।वह साधारण जिन्दगी जीता है।साधारण जिन्दगी जीते हुए वह संसार सागर से मुक्त नहीं हो पाता बल्कि उलटे फंसता चला जाता है।ऐसे में दुखी होकर मोक्ष की कामना करने लगता है।इस क्रम मे वह संसार सागर की व्याख्या करता है।विरासत में प्राप्त परंपरा की व्याख्या करता है।निरंतर मृत्यु की कामना करता है।मृत्यु के भय में जीता है।इस क्रम में वर्तमान की नकारात्मक और इतिहास की सकारात्मक व्याख्या करते हुए प्रामाणिकता हासिल करता है।वह कठिन सवालों को उठाता है।जिससे वह अपनी ऑथरिटी को मनवा सके।इसके लिए वह जगत की टुकड़ों में व्याख्या करता है।उसे इतिहास में खोजता है।हाइडेगर का मानना था कि अस्तित्व के अंतर्य को समझने के लिए जरूरी है कि मनुष्य सभी किस्म की व्यावहारिक मान्यताओं को त्याग दे।अपनी नश्वरता,क्षणभंगुरता को पहचाने।सतत रूप से मृत्यु के आमने-सामने होने की अनुभूति से ही मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षण की अर्थवत्ता तथा भरपूरता को देखने की स्थिति में होता है और अपने को लक्ष्यों,आदर्शों और वैज्ञानिक अपकर्षणों से मुक्त कर सकता है।
देरिदा के यहां एक अन्य धारणा है भिन्नता ।वे इसे भेद से अलग करते हैं।उनके यहां भिन्नता और भेद दो अलग-अलग धारणाएं हैं।भिन्नता यानी अस्मिता का पृथक् रूप।भेद यानी समय का पृथक रूप।इस धारणा पर देरीदा हुसेर्ल को पढ़ते हुए पहुँचे।खासकर 'फिनोमिनोलॉजी ऑफ हिस्ट्री' के विखंडन के जरिए पहुँचे।देरीदा ने कहा कि यह हमारे सारे सवालों का उत्तर देता है।यह बताता है कि सत्य को कैसे पाया जा सकता है।यदि सत्य को सत्य बनना है तो उसे रूढ़ बनना होगा।परमत्व को प्राप्त करना होगा।उसे सभी किस्म के नजरिए से स्वतंत्र करना होगा।फिनोमिनोलॉजी सत्य के उदय की खोज करती है। फिनोमिनोजिस्ट तर्क देते हैं कि सिर्फ वर्तमान ही मौजूद है।वर्तमान में अतीत का रहना एक तरह से सभ्यता की अनुपस्थिति का सूचक है।भविष्य का आप अनुमान लगा सकते हैं किंतु यह कार्य वर्तमान में रहकर ही संभव है।अतीत को वर्तमान में बचाए रखने के लिए जरूरी है कि भविष्य की भी वर्तमान में भविष्यवाणी की जाए।वर्तमान को सिर्फ वर्तमान में नहीं होना चाहिए बल्कि वर्तमान ऐसा होना चाहिए जो अभी आना बाकी है।साथ ही वर्तमान ऐसा जो अतीत हो चुका है।यही वह बिन्दु है जहां 'डिफरेंस' की धारणा में देरीदा दाखिल होते हैं।वह कहते हैं कि वर्तमान की स्वयं के साथ एकरूपता नहीं है।यह भिन्नता ही आरंभिक तथ्य की समस्या को सामने लाती है।मान लीजिए हमने किसी आरंभिक तथ्य के जरिए किसी घटना के आरंभ की खोज की ऐसी अवस्था में हम यह कैसे कह सकते हैं कि इसके निर्माताओं के दिमाग में यही अर्थ था।हम अपने अर्थ को उनके अर्थ के बराबर नहीं रख सकते।यदि हम 'फिनोमिनोलॉजी' बनाते हैं तो हमें हुर्सेल के 'सिध्दान्त का सिध्दान्त' की धारणा का इस्तेमाल करना होगा।सिध्दान्त यह है कि इतिहास अर्थपूर्ण रहा है।किंतु भ्रमित करनेवाला रहा है।उसे बताने के लिए किसी की जरूरत है।उसे पीढ़ी-दर पीढ़ी संचारित कर सकते हैं।उसमें कई स्वर हैं।उसे किसी भी समय लिपिबध्द नहीं किया गया।व्यक्ति और अर्थ एक नहीं हो सकता।अर्थ हमेशा भिन्न होता है। सही क्या है ? और तथ्य क्या है ?ये दोनों एक नहीं हैं।इसका कारण यह है कि तथ्य और सही में सामान्य फर्क होता है।इसी तरह देरीदा कहते हैं कि प्रथम तो प्रथम है,वह प्रथम इसलिए है क्योंकि उसके पीछे द्वितीय है।प्रथम को आप अकेले नहीं पहचानते बल्कि प्रथम के लिए द्वितीय का होना जरूरी है।पूर्वर् शत्त है।दूसरे को मानने का अर्थ है तीसरे का आना।इसी अर्थ में ओरिजन एक तरह का पूर्वाभ्यास है।पुनरावृत्ति का पूर्वाभ्यास है।मौलिक की नकल है।
देरिदा ने एक बार एक साक्षात्कार में कहा कि मैं सब समय विखंडन करता रहता हूँ। साक्षात्कार में जब पूछा गया कि आपने आखिरी फिल्म कौन सी देखी ?क्या उसका भी विखंडन किया ?इसके जबाव में देरिदा ने गुस्से में कहा कि मैं विखंडन पदबंध के इस तरह के इस्तेमाल से बहुत दुखी हूँ। मैं सोचता हूँ कि यह इस पदबंध का शोषण हो रहा है। स्नातक स्तर के छात्र विखंडन पदबंध का स्टीरियोटाईप की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। उसे विकृत कर रहे हैं।
देरिदा के चिन्तन की केन्द्रीय विशेषता है कि उन्होंने दर्शनशास्त्र को नए सिरे से गरिमा दिलायी।यह काम उन्होंने ऐसे समय मे किया जब दर्शन के अंत की दुंदंभी बज रही थी।आधुनिक काल में दर्शनशास्त्र पेशेवर दार्शनिकों का क्षेत्र बनकर रह गया था।सामान्य बौध्दिक जगत की हलचलों में दर्शन की उपेक्षा हो रही थी।कला,साहित्य,संस्कृति, राजनीति,न्याय आदि सभी क्षेत्रों से दर्शनशास्त्र का संवाद तकरीबन टूट गया था।यह सारी परिघटना बीसवीं शताब्दी के आरंभ में ही शुरू हुई।दर्शन का ज्ञान,विज्ञान,समाजविज्ञान आदि से सामान्य तौर पर रिश्ता क्यों और कैसे टूटा इस सवाल पर गंभीरता विचार करने की जरूरत है।
देरिदा के चिन्तन की दूसरी केन्द्रीय विशेषता है कि वे दर्शन, साहित्य, राजनीति, न्याय,भाषा आदि के समूचे विमर्श को नए सिरे से विश्लेषित करते हैं। सभी धारणाओं, मॉडल, पध्दतियों और विचारधाराओं को विश्लेषित करते हैं, उनकी मान्यताओं को चुनौती देते हैं। इस क्रम में लेखकों, दार्शनिकों, विचारकों के बन-बनाए साँचे टूट जाते हैं। फलत: समूचे विमर्श का पैराडाइम ही बदल जाता है।
देरिदा की तीसरी महत्वपूर्ण खूबी है कि उनका कोई पाठक उनसे प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता।दोस्त हो या दुश्मन वे सभी को प्रभावित करते हैं। सभी को विश्लेषण के औजार बदलने के लिए प्रेरित करते हैं।देरिदा को पढ़ने के बाद नजरिए में परिवर्तन अनिवार्य है।इस तरह की वैचारिक ताकत शायद मार्क्स के बाद किसी भी विचारक ने हासिल नहीं की थी।
देरिदा के नजरिए की चौथी विशेषता यह है कि वे परंपरा पर नए सिरे से समग्रता में विचार करते हैं। खासकर आधुनिक काल के विकास के नजरिए से सोचते हैं। वे उन तमाम दार्शनिक परंपराओं पर समग्रता में विचार करते हैं जिनके बारे में हमने सोचना बंद कर दिया था,यह मान लिया गया था कि अब तो या कुछ भी विवेचन लायक नहीं है।
असल में देरिदा का विखंडन स्वयं को चुनौती देता है।वह उस समूचे जगत को चुनौती देता है जिसमें हम जीते हैं।विखंडन प्रतिगामी वैचारिक औजार नहीं है। बल्कि वह वैध-अवैध, विवेक - अविवेक, तथ्य,कहानी,आब्जर्वेन,इमेजीनेशन आदि सभी को चुनौती देता है।विखंडन में दर्शन से लेकर जनमाध्यम, साइबरजगत तक की समस्याओं पर विचार किया गया है।
''देरिदा का मानना है कि उनका काम मौजूदा विमर्श में बेहद हाशियाकृत है।उनके अनुसार विखंडन दार्शनिक आशयों,विषयों,निष्कर्षों, तत्व मीमांसाओं, कविताओं,धर्मशास्त्रों, विचारधारा शास्त्रों से संबंधित नहीं है,बल्कि विभिन्न रूप में सार्थक संरचानाओं,सांस्थानिक संरचनाओं,शिक्षणात्मक या अलंकारशास्त्रीय नियमों,कानून सत्ता,और उनके बाजार की प्रातिनिधिकता से संबंधित है।स्पष्ट है कि देरिदा अपने इस कथन से विखंडन के नाम पर चल रहे तमाम तरह के प्रवादों की सीमा रेखा खींच देते है।वे विखंडन को सांस्थानिक बनाए जाने के प्रयत्नों को नकार देते है जो अमरीकी विश्वविद्यालयों के अंग्रेजी विभागों तथा तुलनात्मक साहित्य के विभागों में इन दिनों हो रहे हैं।''(सुधीश पचौरी,देरिदा का विखंडन और साहित्य,1997,पृ.20)
विखंडन सन् 60 के दशक में सामने आया।यह पश्चिम की 'मेटाफिजिकल परंपरा' का सिध्दान्त है।इसमें बीसवीं शताब्दी के सभी प्रमुख विचारकों के नजरिए का कनवर्जन है।यह उपग्रह युग की कनवर्जन तकनीकी का साहित्यशास्त्र, दर्शनशास्त्र है।इसमें हुसेर्लियन फिनोमिनोलॉजी, मार्क्स,सोस्यूर,फ्रांसीसी संरचनावाद,मनोशास्त्र और भारतीय दर्शनशास्त्र का समावेश है।
विखंडन खास तरह की रीडिंग के अभ्यास,आलोचना की पध्दति, विश्लेषणात्मक खोज की पध्दति का नाम है।बारबरा जॉनसन ने 'दि क्रिटिकल डिफरेंस'(1981) में लिखा 'विखंडन' को 'विध्वंस' के पर्यायवाची के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि यह 'विश्लेषण' के ज्यादा करीब है। विश्लेषण में त्यागना अनिवार्य शर्त है। बिना त्यागे विश्लेषण संभव नहीं है। बारबरा ने लिखा है कि विखंडन वास्तव अर्थों में 'पुनर्निर्माण' का पर्यायवाची है। यदि कोई चीज विध्वंसक रीडिंग में नष्ट होती है तो वह पाठ नहीं है बल्कि उसका वर्चस्वशाली रूप नष्ट होता है। यह ऐसी रीडिंग है जो पाठ के विश्लेषण के दौरान उसमें निहित आलोचनात्मक फर्क को सहज ही उजागर कर देती है।
पाल द मान ने लिखा है विखंडन रीडिंग की सैध्दान्तिकी है।जो पाठ में निहित विपरीत अर्थ के तर्क की उपेक्षा करने वाले नजरिए का विखंडन करती है। विखंडन के बारे में एक अमेरिकी पत्रिका ने अप्रैल 1993 में लिखा कि विखंडन संभवत: यूरोप के लिए सबसे प्यारी चीज है। किंतु अमेरिका के साथ उसका 'लव-हेट' (प्रेम-घृणा) का संबंध है। सुधीश पचौरी के मुताबिक ''विखंडन मानता है कि आलोचना लेखन का एक तरीका है,जो किसी चीज में से किसी चीज को खोजता नहीं है बल्कि उस टैक्स्ट मे अर्थ का निर्माण भर करता है जिससे वह संलग्न होती है।इसलिए वह रचना की तरह ही रचनात्मक है।जिस तरह रचना टैक्स्ट में अर्थ का निर्माण करती है,उसी तरह आलोचना टैक्स्ट में 'अर्थ का निर्माण' करती है।इसलिए रचना और आलोचना 'अर्थ निर्माण के दो तरीके हैं'बड़े-छोटे नहीं हैं।इस अवधारणा ने सिध्दान्तिकी के परंपरावादियों की नींद हराम कर दी है।''(उपरोक्त,पृ.21-22)
''विखंडन की दूसरी रणनीति यह है कि वह किसी भी 'टैक्स्ट' में मौजूद अर्थ को निश्चित,पक्का और पूरा नहीं मानता।वह नहीं मानता कि किसी टैक्स्ट या पाठ की पूरी तरह और अंतिमत: व्याख्या की जा सकती है।उसका मानना है कि हर पाठ कुपाठ होता है।'मिस रीडिंग' है।''(उपरोक्त,पृ.22)
सामान्य तौर पर बुध्दिजीवी यह आरोप लगाते हैं कि देरिदा की किताबें बेहद जटिल हैं। वह कठिन गद्य लिखता है।उसे समझने में मुश्किल होती है। पाठकों को हतोत्साहित करता है। लेखन में सरलतापंथी पेटू लोग हिन्दी में जिस तरह व्यापक पैमाने पर पाए जाते हैं वैसे ही पश्चिम में भी पाए जाते हैं।इस तरह के सरलतापंथी पेटू लोगों को ध्यान में रखकर देरिदा ने कहा था कि यह सच है कि इससे मेरा नुकसान होता है।इससे बचने के लिए जो भी संभव है मैं करता हूँ। असल में जो लोग कहते हैं कि उन्हें मेरी बात समझने में कष्ट होता है। मेरी बात उनकी समझ में नहीं आती। असल में वे लोग समझना ही नहीं चाहते। जो समझना नहीं चाहते उन्हें मेरी पुस्तकें समझ में नहीं आएंगी। हमें उनकी रीडिंग और विश्लेषण की पध्दति के बारे में सवाल उठाने चाहिए।असल में वे लोग आरामदायक और सरल तरीके से पढ़ना चाहते हैं।
देरिदा ने कहा जब कोई गणितज्ञ या फिजिसिस्ट लिखता है, उसके लिखे को जब कोई नहीं समझता तो उसके लिखे के बारे में कोई नहीं कहता कि समझ में नहीं आता। कोई विदेशीभाषा बोले,तब भी नहीं कहते कि समझ में नहीं आता अथवा लोग कुछ नहीं बोलते। कोई जब आपकी भाषा की टांग तोड़ दे, तब ही कहते हैं कि समझ में नहीं आता। अथवा वे लोग कुछ नहीं बोलेंगे। असल में सवाल संबंध का है।आप कैसा संबंध बनाना चाहते हैं। मैं जटिल बनाने के लिए जटिल नहीं लिखता। ऐसा करना हास्यापद होगा। लोग यह मानकर क्यों चल रहे हैं कि दार्शनिक को सरल होना चाहिए। वे किसी वैज्ञानिक के बारे में ऐसा क्यों नहीं सोचते। जबकि वैज्ञानिक तो बहुत सारे पाठकों की पहुँच से बाहर होता है। जटिलता के सवाल को साहित्य के संदर्भ या लेखक के संबंध में ही क्यों उठाया जाता है। लेखक के संदर्भ में ही अपठनीयता का सवाल क्यों उठाया जाता है ? जबकि वह नए की खोज करता है। नया रास्ता सुझाता है। वह भाषा की व्याख्या करता है। भाषा का अर्थशास्त्र बनाता है।कोड बनाता है।ग्रहण करने के चैनल बनाता है।
देरिदा पर विचार करते समय अनेक विचारकों ने लिखा है कि विखंडन एक पध्दति है। देरिदा ने इस धारणा का बार-बार खण्डन किया है।उन्होंने यहां तक कहा है कि यह कोई 'देरीदियन मैथड' नहीं है।देरिदा पर विचार करते समय यह ध्यान रखें कि वह बोलने और लिखने की इच्छा को सर्वोच्च स्थान देता है।उसे इडियम में लिखना,इडियम बनाना पसंद है, किंतु यह भी मानता है कि इडियम प्योर नहीं होता।प्रत्येक इडियम की अपनी पध्दति होती है।प्रत्येक विमर्श,काव्य,वाक्य आदि के अपने नियम होते हैं।यह भी कहा कि मैं इडियम में विश्वास नहीं करता।इसके बावजूद सच यह है कि लेखक की लिखने की अपनी इच्छा होती है।वह कुछ भी लिखे या बोले।उसे किसी न किसी इडियम के जरिए अपनी बात कहनी होती है।यह कार्य वह गैर-अपदस्थीकृत रूप में करता है।किंतु अपने कार्य को ज्यों ही निश्चित रूप देता है अपदस्थ हो जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें पुनरावृत्ति की संभावना भी है।वह ज्यों ही भाषा के माध्यम से इडियम में प्रवेश करता है उसे इडियम से बाहर के तत्वों से समझौता करना पड़ता है। वह कॉमनभाषा,अवधारणा,कानून,सामान्य नियमों आदि से समझौता करता है। इस क्रम में वह इडियम को सुरक्षित रखने की कोशिश भी करता है।नियमों की व्यवस्था को सुरक्षित रखता है। साथ ही इडियम के मैथड को भी मानता है। मैं यह भी कहना चाहता हँ कि रचनात्मक सवालों के बहाने मैथड के सवाल हीं उठाए जाने चाहिए।उसकी तकनीकी प्रक्रिया है।वहां एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ तक पुनरावृत्ति होती रहती है।मसलन् मैं जो कुछ लिखता हूँ उसके भी सामान्य नियम हैं।कुछ प्रक्रिया है।इसका मैं विश्लेषण के लिए इस्तेमाल करता हूँ।इसी को मैं टीचिंग,नॉलेज और एप्लीकेशन कहता हूँ। किंतु ये सारे नियम पाठ से लिए जाते हैं। प्रत्येक पाठ विलक्षण होता है। उसमें विलक्षण तत्व होते हैं। उसे स्वयं में संपूर्णता के हवाले नहीं किया जा सकता है।इसी तरह लिखे हुए के प्रभाव के बारे में भी सोचना चाहिए। कोई चाहे या न चाहे इडियम का अन्य पर असर होता है। यह फोटोग्राफी के प्रभाव की तरह है।आप चाहे जिस रूप में फोटो खिंचवा लें।चाहे जितनी सावधानी बरतें।चाहे जैसे दिखने की कोशिश करें।इसके बावजूद ऐसे क्षण आएंगे जब फोटो आपको आश्चर्यचकित करेगा।
देरिदा के व्यक्तित्व की यह विशेषता थी कि उन्होंने हमेशा अपने को बहुत ही सामान्य ढंग से पेश किया।किंतु उनके लेखन को लेकर जबर्दस्त विवाद उठे हैं। उन पर अभूतपूर्व हिंसक हमले भी हुए हैं। उनकी जमकर निन्दा भी हुई है। इसके कारणों की खोज करते हुए देरिदा ने कहा कि मेरा कार्य सक्रिय प्रक्रिया का हिस्सा है। वहां अभी बहुत कुछ अनखुला है। खासकर प्रतिरोध अनखुला है जो कभी भी उभरकर सामने आ सकता है।प्रतिरोध उभरेगा तो वह व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहेगा। अनुशासन तक ही सीमित नहीं रहेगा।शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा।इस प्रतिरोध में छात्र,युवा एवं शिक्षक बार-बार शामिल हो रहे हैं। यदि मेरे सहकर्मी मेरे ऊपर हमले कर रहे हैं तो इसका कारण शैक्षणिक नहीं है, पागलपन नहीं है, बल्कि सच यह है कि कहीं न कहीं अपने लिए खतरा महसूस कर रहे हैं। मुझे उम्मीद और विश्वास है कि वे अनेक सिध्दान्तों का मूल्यांकन कर रहे हैं,अनेक प्रभुत्वशाली विमर्शों की पुन:परीक्षा कर रहे हैं। शैक्षणिक संस्थानों का मूल्यांकन कर रहे हैं। प्रभुत्वशाली विमर्शों में संशोधन कर रहे हैं। उनका राजनीतिकरण कर रहे हैं। यदि ये सिर्फ व्यक्तिगत हमले होते तो बात कुछ और थी। यह व्यक्तिगत मामला नहीं है। विखंडन की अनेक जिज्ञासाएं सवाल खड़े कर रही है। उन तमाम वर्गीकरणों,तटस्थ रूपों के प्रति सवाल खड़े कर रही हैं जो दर्शन में मौजूद हैं।
कायदे से इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि देरिदा के समसायिक राजनीतिक मसलों पर लिए गए स्टैंड ने कोई हंगामा खड़ा नहीं किया बल्कि व्यवहार में उसकी उपेक्षा ही ज्यादा हुई है।ऐसा क्यों हुआ ?इसके बारे में देरिदा का कहना है कि यह सच है राजनीति में चुप्पी है।अनेक मामलों में मेरी वापसी भी हुई है।किंतु चीजों को अतिरंजित रूप में पेश नहीं करना चाहिए।इस संदर्भ में यदि किसी को रूचि है तो वह देख सकता है कि मेरी रूचियां क्या हैं ?चयन क्या है ?वगैर किसी दुविधा के कुछ चीजें अभिव्यक्त हुई हैं।मैंने सामान्य तौर पर खास और आम बातों पर ही बोला है।ऐसी स्थिति में मैं अन्य की राय या वोट में शामिल हो गया हूँ।मैंने कभी अधिकारी विद्वान् होने का दावा नही किया।कोई यश लेने की कोशिश नहीं की। अपने लिए दार्शनिक या बुध्दिजीवी जैसा विशेष दर्जा नहीं मांगा।बल्कि सच यह है कि मुझे उसी समय ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ा है जब मैंने अपने को दार्शनिक, बुध्दिजीवी या प्रोफेसर के रूप में देखने की कोशिश की है।मैं सोचता हूँ कि खास परिस्थितियों में, क्लासिक भूमिका एवं जिम्मेदारी निभाने की जरूरत होती है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।मैं रूपान्तरण करने की कोशिश करता हूँ और अच्छे भावों को अपील करने की राजनीतिक जिम्मेदारी निभाता रहा हूँ।
देरिदा के चिन्तन की धुरी है ग्रीक दर्शन और उसकी धुरी है 'लव ऑफ विजडम'। बतर्ज देरिदा फ्रांस में दर्शन को 'इटीमोलॉजी' यानी 'व्युत्पत्तिविज्ञान' कहते हैं। 'व्युत्पत्ति' यानी मालूम करना।संस्कृत में इसे निरूक्त कहते हैं।ग्रीक में दर्शन को प्रेम अथवा सोफिया के प्रति मित्रता कहा जाता है।इसमें 'विजडम' भी शामिल है।इसे ज्ञान का कौशल भी कह सकते हैं।देरिदा ने कहा कि हमें सवाल करना चाहिए कि 'फिलिया'क्या है ? प्रेम क्या है ? इच्छा क्या है ?इन सवालों से टकराते हुए हमने दर्शन को परिभाषित करना शुरू किया।इन सबको परिभाषित करने के लिए हमने व्युत्पत्तिविज्ञान को आधार बनाया।यही वजह है कि प्रेम और मित्रता की व्याख्या करने वाले अनेक पाठ प्रचलन में आए हैं।मैंने भी एक पुस्तक 'पॉलिटिक्स ऑफ फ्रेण्डशिप' नाम से लिखी है।तकरीबन सभी बड़े फ्रांसीसी विचारकों ने मित्रता और प्रेम के सवाल पर विस्तार से विचार किया है।देरिदा ने कहा कि मैं इस प्रसंग में इस बात से सहमत हूँ कि चीजों को इस तरह देखने से दर्शन की ज्ञानमीमांसापरक व्याख्या से हम भटक जाते हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक दार्शनिक ने दर्शन की अपनी परिभाषा बनायी है। इसी को लेकर दार्शनिकों में जबर्दस्त विवाद है।वे दर्शन पर विचार करते रहे हैं कि यह कब और कैसे पैदा हुआ ?दर्शन की उत्पत्ति का आधार क्या है ?इस संदर्भ में यह ध्यान रखें कि आप दर्शन क्या है ?इसकी अवधारणात्मक व्याख्या तक ही सीमित नहीं रह सकते।यहां दर्शन शब्द का अर्थभर बता देना ही पर्याप्त नहीं है। 'फिलॉसफी' पदबंध ग्रीक का है।इसकी अनेक व्याख्याएं हैं।इन व्याख्याओं में बदलाव आता रहा है।
विखंडन नकारात्मक धारणा नहीं है।बल्कि हो यह रहा है कि विखण्डन को अधूरे रूप में पेश किया जा रहा है।सन् 1980 में देरीदा ने इस तरह के रूझानों को मद्देनजर रखकर ही कहा था कि विखण्डन के साथ प्रेम की धारणा को रखकर पढ़ा जाना चाहिए। देरिदा ने कहा था कि प्रेम का मतलब है अन्य की इच्छा-आकांक्षाओं के प्रति दृढ़ निश्चयीभाव।अन्य का सम्मान करना।अन्य की तरफ ध्यान देना।न कि अन्य के अन्यत्व को नष्ट करना।यह मेरी बुनियादी समझ है। इसके बावजूद यह सवाल किया जा सकता है कि विखण्डन में नकारात्मक क्या है ? मैं कहना चाहता हूँ कि विखण्डन में कुछ भी नकारात्मक नहीं है।तुम इसकी आलोचना कर सकते हो।सवाल खड़े कर सकते हो।चुनौती दे सकते हो। कभी-कभी विरोध भी कर सकते हो।इसके बावजूद विखण्डन में नकारात्मक कुछ भी नहीं है। विखण्डन नकारात्मक होकर कार्य नहीं करता।नकारात्मकता के आधार पर आप कोई कार्य नहीं कर सकते।यदि आलोचना करना चाहते हैं,इसे अस्वीकार करना चाहते हैं,खारिज करना चाहते हैं,चाहे अन्य का विरोध करने के लिए ही सही,तो इसके साथ आपको एक छोटा सा समझौता करना पड़ेगा सबसे पहले आप उसकी मौजूदगी को मानें।
देरिदा ने कहा कि जब आप अन्य को सम्बोधित करना चाहते हैं,चाहे अन्य का विरोध करने के लिए ही सही,तो आप अन्य की उपस्थिति को मानें।अन्य को अन्य की तरह सम्बोधित करें। अन्य को हजम करने के लिए सम्बोधित नहीं किया जा सकता।यहीं पर हमें अन्य की विशिष्टता को स्वीकार करना है। इस स्थिति को किसी भी तरह बदला नहीं जा सकता। यही इसका मूल नैतिक तत्व भी है।इस दृष्टि से देखें तो विखंडन एक एथिक्स है।यह सामान्य अर्थ में एथिक्स नहीं है।
देरिदा ने अपने लेखन में 'यस' पदबंध का काफी प्रयोग किया है।देरीदा कहते हैं कि 'यस' पदबंध 'अन्य' की तरह नहीं है।तुम 'यस' का प्रयोग नहीं भी करो तब भी यह ध्यान रखो कि प्रत्येक भाषा में 'यस' पदबंध है।यह प्रत्येक दार्शनिक के यहां हैं। हाइडेगर के यहां भी है। हाइडेगर कहा करता था कि चिन्तन की शुरूआत सवाल से होती है।सवाल करने का अर्थ है चिन्तन के सम्मान के प्रति सवाल खड़े करना।एक दिन ऐसा भी आएगा कि हम यह कहें कि 'उसके बयान का खण्डन करते हुए कह रहा हूँ 'यस'।उल्लेखनीय है 'यस' का दार्शनिकों की भारतीय परंपरा में मौनम् सम्मति लक्षणम् के अर्थ में प्रयोग होता रहा है।अथवा भारतीय दार्शनिक यों कहते हैं कि अब तक जो कहा गया वह फलां का है। इसके आगे मैं कहता हूँ।देरीदा ने कहा कि 'यस' कहने से बात खत्म नहीं हो जाती।बल्कि इसके बाद जो सिलसिला शुरू होता है।वह यह रेखांकित करता है कि चिन्तन के पहले भी कुछ मौजूद है।इसी को जूसेज ने चुपचाप स्वीकार करना कहा है।संस्कृत में इसी को मौनम् सम्मति लक्षणम् है।स्वीकार करने का अर्थ है दृढतापूर्वक कहना।'यस' कहने का अर्थ है कि तुम अन्य को पहले मानो और कहो कि मैं तुमसे सवाल करना चाहता हूँ।अन्य से कहो कि मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ।अन्य को चुनौती देने,विरोध करने से पहले यह कहना जरूरी है कि मैं तुमसे बातें करना चाहता हूँ।तुम्हारा अस्तित्व मानता हूँ।ज्योंही आप यह कहते हैं आप अपने और अन्य में जो कॉमन है उसे बता रहे हैं तो इसी को 'लव' या प्रेम कहते हैं।इसी को कहते हैं दृढ़ निश्चयपूर्वक कहना।
देरिदा के चिन्तन की मुश्किल यह है कि उसे पढ़ते समय आप उसके दायरे के बाहर नहीं जा सकते।उससे बाहर राय नहीं बना सकते।यह आंतरिक तौर पर उसकी भाषिक संरचना में निहित है।असल में इस समस्या का संबंध उसके परंपरा संबंधी मूल्यांकन से है।विरासत के सवाल से है।देरीदा ने कहा कि मेरा सब कुछ 'इनहेरिटेड' नामक धारणा पर टिका है।जब आप भाषा को विरासत में पाते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि आप पूरी तरह इसके अंदर हैं।अथवा ठंडे रूप में इसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं।'इनहेरिटेड' का मतलब है भाषा को आप पूरी तरह आत्मसात् करें।रूपान्तरित करें।उसमें से कुछ का चयन करें। व्याख्या करें। प्रतिक्रिया दें।जबाव दें।दायित्व लें।जब दायित्व लेते हैं तो आप विरासत के बंदी नहीं होते।'हेरीटेज' का अर्थ यह नहीं है कि आप उसे समूचा पा लें। या दे दें।आप हेरीटज के बंदी नहीं हैं।आप उसे सिर्फ संरक्षित नहीं रख सकते जिससे वह सिर्फ बची रहे। तुम्हें जीना है और विकास करना है।इसमें चयन और व्याख्या की प्रक्रिया भी शामिल है।मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि इसमें दोहराने या कंजरवेटिव पोजीशन लेने की बेचैनी या उद्विग्नता भी होती है।किंतु जरूरी नहीं है कि यह प्रक्रिया घटित हो। मैं कहना चाहता हूँ कि कुछ भी नया करने के लिए विरासत को आत्मसात् करना जरूरी है।तुम्हें भाषा के अंदर जाना होगा। परंपरा के अंदर जाना होगा।तुम जब तक अंदर नहीं जाओगे रूपान्तरित नहीं कर सकते।किसी चीज को तब तक अपदस्थ नहीं कर सकते जब तक उसके अंदर न जाओ।
देरिदा को परंपरा की पुनरावृत्ति से कोई एतराज नहीं है।इस संदर्भ में हमें पुनरावृत्ति और इन्नोवेशन (खोज)में चयन नहीं करना है।बल्कि दो तरह की परंपराओं और इन्नोवेशनों में से चयन करना है।इसके अलावा कुछ और भी सक्रिय रूप भी हो सकते हैं।मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि कुछ नया खोजने की व्यवस्था बनानी है।अथवा कुछ नया घटित हो इसका प्रयास करना है।यह संभव है कि परंपरा के साथ धोखा करो या उसे भूल जाओ।तुम यदि किसी से बात करते हो तो यह सुनो कि अन्य क्या कहते हैं।संभवत: तुम उसकी पुनरावृत्ति करो।इसका तुम्हें जबाव देना होगा।प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होगी।देरिदा ने कह कि मैं परंपरा पर बात करते समय प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी दोनों को शामिल करता हूँ।देरिदा सामान्य तौर पर जब भाषा पर बात करता है तो उसे पुनरूक्ति कहता है।वह नए और संभावित अर्थ में व्यक्त होती है।इस प्रसंग में देरीदा ने कहा कि मुझे संस्कृत के व्युत्पत्तिशास्त्र की अस्पष्ट समझ है।वहां 'इटिरा' का अर्थ है और फिर एकबार।वही पुनरावृत्ति है।अथवा कुछ अन्य है,कुछ बदलाव के साथ है।इसका अर्थ है कि भाषा स्वयं को नए संदर्भ में पुन: प्रस्तुत करती है।नए फॉर्म में पेश करती है। उसके संभावित अर्थों के बारे में बताना असभव है।उसकी सीमा तय करना असंभव है।इसका अर्थ यह भी है कि पाठ से अर्थ को अलग नहीं कर सकते।खासकर लेखक की मंशा से पाठ को अलग नहीं कर सकते।इसका अर्थ यह भी है कि लेखक अपनी पुस्तक के भविष्य के लिए जिम्मेदार है।किंतु यह बात यांत्रिक तौर पर लागू नहीं होती।लेखक,दार्शनिक आदि को अपने लिखे के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। मसलन् लिखते समय राजनीतिक आयाम के प्रति सतर्क रहना चाहिए। कोशिश करो कि ज्यादा नियंत्रण स्थापित न किया जाए।लेखन के सभी संभावित परिणामों के मद्देनजर कहना चाहता हँ कि जनता आपके लेखन से कुछ न कुछ अर्थ निकाल लेगी।इसी को ओवलीगेशन कहते हैं।प्रत्येक चीज को देखने एवं विश्लेषित करने का दबाव कहते हैं। लेखन को नियंत्रित करना असंभव है।तुम चीजों को नियंत्रित नहीं कर सकते।अथवा खास तरह के विमर्श या वाक्यों को प्रकाशित होने से रोक नहीं सकते।ध्यान रहे जब कोई चीज खोजी जा रही है तो खोजी जा रही है।खोज हमेशा आपकी पकड़ के बाहर होती है।आपके नियंत्रण के बाहर होती है।वह भिन्न संदर्भ में होती है।उसका शोषण या अपदस्थीकरण संभव है।इसका लेखक के लक्ष्य से भिन्न इस्तेमाल संभव है।
यही सवाल मैंने नीत्शे के संदर्भ में उठाया था।यह सच है कि नीत्शे का नाजियों ने इस्तेमाल किया। दुरूपयोग किया।इसी वजह है नीत्शे को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसमें संदेह नहीं है कि वह यह सब नहीं चाहता था। किंतु हम यह कैसे भूल सकते हैं कि नाजी उसे अपना उत्तराधिकारी मानते थे।यही वजह है कि उसके साथ विमर्श होना चाहिए। उसके नाजी संबंधों के बारे में विमर्श होना चाहिए।मैंने यह कार्य अपने तरीके से किया है। फिर भी उसके दुरूपयोग रोक नहीं सकते। मैं चाहता हूँ कि भाषा के वर्चस्व के प्रति प्रतिरोध किया जाए। किंतु इसके साथ यह भी कहना चाहता हूँ कि राष्ट्रवाद का भी विरोध किया जाए।भाषा के वर्चस्व के प्रति विरोध को कुछ प्रतिक्रियावादी तत्वों ने आत्मसात् कर लिया है।कुछ लोगों ने कहा कि तुम डिफरेंस या भिन्नता के नाम पर सार्वभौम भाषा में दरार पैदा कर रहे हो।अत: हम तुम्हारे विमर्श को राष्ट्रवाद या प्रतिक्रियावादी भाषायी हिंसा के पक्ष में इस्तेमाल करते हैं।मैं इस तरह के चिन्तन को नियंत्रित नहीं कर सकता।तुम सब कुछ नियंत्रित नहीं कर सकते।इसका अर्थ यह है कि तुम चुके हुए इंसान हो,सीमित इंसान हो।इसका संबंध भाषा की संरचना से है।खोज की संरचना से है।ज्यों ही तुम कोई चीज खोजने जाते हो तो खोज का कार्य मूल से स्वतंत्र हो जाता है।ज्यों ही तुम कोई चीज खोज लेते हो तो तुरंत पलायन कर जाते हो।मैंने इसी अर्थ में कहा था कि तुम किताब को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकते।मेरे इस साक्षात्कार का भविष्य भी मैं नियंत्रित नहीं कर सकता।अभी यह टेप हो रहा है।बाद में इसे लिखोगे।पुन: लिखोगे।पुन: नए फ्रेम में डालोगे।नए संदर्भ में विकसित करोगे।फलत: मेरे वाक्य नई ध्वनि व्यक्त करने लगेंगे।यह असल में आस्था और विश्वास का मामला है।आपको अपने कहे या लिखे पर विश्वास करना होगा।
एक दार्शनिक के नाते देरिदा से अमेरिका में घटित 'सितम्बर 11' की घटनाओं के बारे में सवाल किए गए। ' 9/ 11 ' की भाषा के बारे में पूछा गया। उसकी परिणतियों के बारे में पूछा गया तो देरिदा ने कई महत्वपूर्ण पक्षों पर रोशनी डाली। देरिदा ने कहा कि ' 9/ 11' की घटना के बारे में जैसा कि तुमने सवाल किया है। इससे यह बात उभरती है कि इसमें तिथि का महत्व है।वही इसका नाम है। ज्यों ही तुमने 'सेप्टेम्बर इलेवन' कहा,तो पहले ही बता दिया कि अब तुम मुझसे इस घटना को याद करते हुए बात कर रहे हो।तुम्हारे सवाल में ही निहित है कि हमारे सार्वजनिक जीवन से 'डेट' और 'डेटिंग' को,पांच सप्ताह हो गए, उठा लिया गया है।(यह साक्षात्कार 22 अक्टूबर 2001 को लिया गया) ।
अब हम 'तिथि' में नहीं 'अनुभूति की तिथि' में जी रहे हैं। फ्रेंच में इसे तारीख निर्माण कहते हैं। इतिहास में दिन का निर्माण है।इसके प्रभाव को आप महसूस कर सकते हैं। यह अभूतपूर्व एकायामी घटना है। इसकी अनुभूति उतनी स्वर्त:स्फूत्त नहीं है जितनी ऊपर से लग रही है।असल में व्यापक स्तर पर इस अनुभूति का अभ्यस्त बनाया गया है। इस अनुभूति को निर्मित किया गया है। यदि यह वास्तव में निर्मिति नहीं है तब भी मीडिया के जरिए,तकनीकी-सामाजिक- राजनीतिक मशीन के जरिए इसे प्रसारित किया गया है।जिससे इस तारीख को इतिहास बनाया जा सके।इसका समूचा वर्णन संभावना और पूर्व संभावना में आ रहा है। अपरिष्कृत और कठमुल्ले रूप में आ रहा है।अथवा यह भी कह सकते हैं कि सुचिंतित,संगठित, सुनियोजित रणनीति के तहत इसका प्रचार हो रहा है।
देरिदा ने कहा कि ' 9/ 11' का संबंध 'अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद' की धारणा से है। जब हम ' 9 / 11 '' कहते हैं तो इस नाम और नम्बर के जरिए क्या कहना चाहते हैं हम नहीं जानते ? इस नामकरण का अविवादास्पद असर हुआ है।इस असर के बारे में हमने सोचा ही नहीं है।इस तरह के नामकरण का अर्थ क्या है ? जब हम 'सेप्टेम्बर इलेवन' कह रहे होते हैं।इसे दोहरा रहे होते हैं।जब हम पुनरावृत्ति करते हैं तो ध्यान रहे पुनरावृत्ति तटस्थ बनाती है।समापन की ओर ले जाती है।संवेदना से दूरी बनाती है।यही बात टेलीविजन प्रसारित इमेज पर भी लागू होती है। इस नाम का या किसी भी नाम का बार-बार उच्चारण अंतत: उस नाम को शक्तिहीन बनाता है।अर्थहीन बनाता है।हमें इस घटना को भाषा के परे जाकर देखना चाहिए।उस दिन भयानक घटना हुई।इसका अंत क्या होगा,हम नहीं जानते।यह हिंसा है।इसकी निन्दा करनी चाहिए।इसमें अनेक लोग मारे गए हैं।कोई नहीं मानेगा कि यही इसका अंत है।असल में यह घटना हमें कुछ कहने के लिए बाध्य करती है।
देरिदा ने कहा कि इस घटना का एक 'इम्प्रेशन' है दूसरा 'इंटरप्रिटेशन' है।अभी इंटरप्रिटेशन असंभव है।इसी तरह हमें ध्यान रखना होगा कि इसके बारे में 'कुछ ठोस तथ्यों' की व्यवस्था कर दी गई है।अत: हमें 'सूचनाओं' में अंतर करना चाहिए।जहां तक संभव हो हम व्याख्या करें।जिससे इस बड़ी घटना को समझा जा सके।जब देरिदा से कहा गया कि यह ऐसा हिंसाचार है जो विश्वयुध्द में भी नहीं देखा गया तो देरिदा ने कहा कि इस तरह के अनेक उदाहरण हैं।ऐसे अनेक जनसंहार हुए हैं।किंतु उन्हें दर्ज नहीं किया गया है।उनकी व्याख्या नहीं हुई है।उन्हें हम महसूस नहीं करते।उन्हें बड़ी घटना के रूप में पेश नहीं करते।इसलिए वे घटनाएं प्रभाव नहीं छोड़तीं।कम से कम सभी पर अपना प्रभाव नहीं छोड़तीं।खासकर विस्मृत न की जाने वाली विनाशलीला के रूप में प्रभाव नहीं छोड़तीं।हमें सवाल करना चाहिए कि हमारे ऊपर ये दो तरह के प्रभाव कैसे पड़ रहे हैं।एक तरफ हम इस घटना के पीड़ितों के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर रहे हैं,दुख व्यक्त कर रहे हैं,निंदा कर रहे हैं,किंतु दूसरी तरफ हमें जनसंहारों पर कुछ भी कहने की जरूरत महसूस नहीं होती।मेरा मानना है कि हमें बगैर किसी सीमा के,बगैर किसीर् शत्त के सभी किस्म की बर्बरता,हिंसाचार की निन्दा करनी चाहिए।हमें बर्बरतापूर्ण घटनाओं के प्रति अंदर से आंतरिक प्रतिरोध व्यक्त करना चाहिए।उसकी व्याख्या करनी चाहिए।उन परिस्थितियों को बताना चाहिए कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं।
इसी तरह 'विश्वास' का फिनोमिना, साख एवं संबंध पर निर्भर करता है।इसी पर इसकी व्याख्या निर्भर करती है।देरिदा ने कहा कि ' 9 /11 ' की घटना को 'आतंकवाद के खिलाफ जंग' कहना भ्रमित करना है।(उल्लेखनीय है अमेरिका ने इसी थीम पर सारा प्रचार किया है।)हमें इस भ्रम को विश्लेषित करना चाहिए।बुश ने कहा कि यह 'युध्द' है किंतु असलियत में वह इसे परिभाषित करने में असमर्थ रहा।जबकि यह घोषित युध्द था।यह भी बार-बार कहा गया कि यह अफगानिस्तान के नागरिकों के खिलाफ जंग नहीं है।यह भी कहा गया कि अफगानिस्तान की जनता और सेना अमेरिका की शत्रु नहीं है।यह मानकर चला गया कि विन लादेन वहीं है।वह स्वायत्त रूप से फैसले लेता है।जबकि प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह अफगान नहीं है।उसे उसके देश ने ही ठुकरा दिया है।बहिष्कृत कर दिया है। यह भी कह सकते हैं कि उसे प्रत्येक देश और राज्य ने अस्वीकार कर दिया है।यह सच है कि उसे प्रशिक्षण अमेरिका ने ही दिया था।अत: वह अकेला नहीं है।उसे कोई भी राज्य खुले तौर पर समर्थन भी नहीं करता।जहां तक आतंकवादियों को शरण देने वाले राष्ट्रों का मामला है तो इस बारे में यही कह सकते हैं कि उनकी पहचान नहीं हो सकती। अमेरिका,यूरोप,लंदन, बर्लिन इनके अभयारण्य हैं।ये वे देश हैं जहां दुनियाभर के सभी आतंकवादियों के प्रशिक्षण,निर्माण अदि की सभी सूचनाएं उपलब्ध हैं।इनके बारे में किसी भूगोल,सीमा क्षेत्र को आधार नहीं बना सकते।आज हमें किसी देश में गड़बड़ी फैलाने के लिए भाड़े के सैनिक या आतंकवादी भेजने की जरूरत नहीं है।बल्कि सिर्फ कम्प्यूटर वायरस भेजने की जरूरत है।वायरस के प्रसार से ही उस देश की समूची अर्थव्यवस्था,सैन्य और राजनीतिक संसाधनों को नष्ट किया जा सकता है।चाहें तो किसी देश या महाद्वीप को धराशायी कर सकते हैं।आज दुनिया में आतंक,आतंकवाद और क्षेत्र का रिश्ता बदल गया है।यह संभव हुआ है तकनीकी विज्ञान के जरिए।यह तकनीकी विज्ञान ही है जो 'युध्द' और 'आतंक' के अर्थ को बदल रहा है।आज जिन लोगों ने ' 9/ 11 ' की घटना की है वे कल इससे भी भयानक घटना को अंजाम दे सकते हैं।यह कार्य वे बगैर खून-खराबे के भी कर सकते हैं।यह 'युध्द' दो राष्ट्रों के बीच भी नहीं है।यह 'सिविलवार' भी नहीं है।न यह 'पार्टीजान युध्द' है।इसका लक्ष्य कुछ भी हो।यह मुक्ति युध्द भी नहीं है।लेकिन यह सच है कि विन लादेन के नेटवर्क ने सऊदी अरब को अस्थिर कर दिया है।उसकी जगह नए राष्ट्र को प्रतिष्ठित कर दिया है।
देरिदा के समूचे चिन्तन की धुरी है वंचित समाज,स्त्री,काले, हाशिए के लोग, अनाथ,शरणार्थी लोग,सांस्कृतिक -सामाजिक तौर पर बेदखल कर दिए गए लोग। वंचितों की अस्मिता,शास्त्र,संस्कार और मूल्यों की चिन्ता को लेकर सारा देरीदाशास्त्र निर्मित किया गया है। आधुनिक काल में चिन्तकों में वंचितों की मुक्ति की इस कदर बेचैनी कार्ल मार्क्स के बाद पहलीबार देरिदा में दिखाई देती है।देरिदा की केन्द्रीय समस्या यह है कि वे वंचितों की मुक्ति चाहते हैं किंतु जनतंत्र के अंदर।वे अपने समूचे लेखन में पूंजीवादी व्यवस्था की तीखी आलोचना पेश करते हैं किंतु इसके विकल्प का सपना उनके पास नही है। घूम-फिरकर वे पुन: पूंजीवादी विकल्पों में ही वापस जाते हैं।गैर-पूंजीवादी सामाजिक विकल्प की कोई तस्वीर उनके पास नहीं है।वे एक साफ-सुथरा,दोषरहित पूंजीवाद चाहते हैं। देरिदा के चिन्तन की यह सबसे बड़ी सीमा है। वे मौलिक इस मायने में हैं कि चिन्तन के बन-बनाए ढांचों को यथातथ्य स्वीकार नहीं करते।सन् साठ के बाद के फ्रांसीसी समाज के परिवर्तनों को वे अभिव्यक्ति देते हैं।विखंडन का सारा तामझाम अपनी पूरी शक्ति के साथ पुन: एकबार केन्द्र में आता है।ऐसा नहीं है कि देरिदा विखंडन की धारणा का इस्तेमाल करने वाले पहले दार्शनिक हैं।बल्कि यों कहें तो ज्यादा सही होगा कि पूंजीवादी विकास के क्रम में सैध्दान्तिकी की भीड़ ने जो भ्रम का वातावरण बनाया था।दिशाहीनता पैदा की थी।चिन्तन के क्षेत्र में जो हताशा छायी हुई थी।सामान्य तौर पर बुध्दिजीवियों को समझ में नहीं आ रहा था कि उनके लिए कौन सा रास्ता या दृष्टिकोण सही है।
द्वितीय विश्व युध्द के बाद पूंजीवादी दार्शनिकों की साख एकसिरे से खत्म हो चुकी थी। उसमें प्राणवायु का संचार करने में अस्तित्ववाद भी असमर्थ रहा।यहां तक मार्क्सवाद के बारे में संदेह और प्रश्नाकुलता इसी दौर में सबसे ज्यादा मार्क्सवादी खेमों में पैदा हुई।द्वितीय विश्वयुध्द के समापन के समय सारा जगत गहरे वैचारिक मंथन से गुजर रहा था।सभी विचाधाराओं को बुध्दिजीवी संदेह की नजर से देख रहे थे।मार्क्सवाद की कतारों में भी विचलन नजर आ रहे थे। बुर्जुआ विचारधाराओं में नित नए प्रयोग हो रहे थे।युध्दोत्तर दौर की नई तकनीकी-वैज्ञानिक एवं राजनीतिक कतारबंदी ने वैचारिक उथल-पुथल को तेज कर दिया था।पूंजीवादी और मार्क्सवादी दोनों ही खेमों में गहरा मंथन चल रहा था।परवर्ती पूंजीवाद और समाजवाद के परिवर्तनों को लेकर नई वैचारिक रणनीति क्या हो ?इसे लेकर सभी स्कूल सक्रिय थे।यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें देरिदा सक्रिय होते हैं।वे सारे चिन्तन को जो स्वयं ही विखण्डित हो रहा था।एक नई विखंडन सैध्दान्तिकी देते हैं।वे सहमति के माहौल में असहमति का मंत्र लेकर आते हैं।वे ऐसे रूढिवादी माहौल में असहमति और विखंडन की बात करते हैं। जब मार्क्सवाद अपने को सत्य का पर्याय बना चुका था।समाजवादी व्यवस्था स्थिर हो चुकी थी।समाजवादी शिविर सामने आ चुका था।समाजवादी खेमे और मार्क्सवादियों की ओर से यह मान लिया गया कि जनतंत्र एक चुकी हुई व्यवस्था है। जनतंत्र का सर्वोच्च विकास समाजवादी जनतंत्र है। ऐसे में देरिदा का प्रवेश बेहद महत्वपूर्ण है।देरिदा ने मार्क्सवाद और पूंजीवाद के अब तक के प्रचलित सभी भावों,विचारों,विचारों,मूल्यों,नियमों, संहिताओं आदि को गंभीर चुनौती दी।यह चुनौती वे एकदम नई जमीन से देते हैं। उल्लेखनीय है कि मार्क्सवाद और पूंजीवाद ये दोनों ही मानवाधिकारों की बात नहीं करते। इनकी जितनी भी सिध्दान्त चर्चा है वह मानवाधिकार के दृष्टिकोण की उपेक्षा करती है।
देरिदा का सबसे बड़ा एकमात्र अवदान यह है कि वे युध्दोत्तर दौर में मानवाधिकारों का जो चार्टर संयुक्त राष्ट्रसंघ ने बनाया था।जिसे समाजवादी और पूंजीवादी व्यवस्था के पक्षधर मानने को तैयार नहीं थे।इस मानवाधिकार के दृष्टिकोण को अपने समूचे चिन्तन की बुनियाद बनाया।वे विखंडन के जरिए मानवाधिकारों की खोज करते हैं।जिस तरह कार्ल मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन का मंत्र बताया था। उसी परंपरा में सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में मानवाधिकारों और मानवाधिकारों के पक्ष में खड़ी सैध्दान्तिकी के रूप में देरिदा सामने आते हैं। देरिदा को अभी यह चिन्ता नहीं है कि क्रांति कब होगी ? समाजवादी व्यवस्था को बचाया जाए या गिराया जाए ? देरिदा की मूल चिन्ता यह है कि अब तक के आधुनिक विकास के क्रम में मानवाधिकारों का सारी दुनिया में विकास नहीं हुआ है। मानवाधिकारों के पक्ष में दर्शन का कोई स्कूल खड़ा नहीं है। यहां तक कि कोई दार्शनिक भी मुस्तैदी के साथ खड़ा नहीं है। देरिदा के दर्शन,साहित्य,भाषा,संस्कृति,जनमाध्यम, न्याय,कानून,नैतिकता, लिंगभेद, नस्लवाद विरोध, शरणार्थी समस्या,फिलिस्तीन समस्या आदि का मूलाधार मानवाधिकार का परिप्रेक्ष्य है। उनकी बुनियादी समझ यही है कि मानवाधिकारों का उनकी सर्वोच्च अवस्था तक विकास किया जाए। मानवाधिकारों की हर हालत में रक्षा की जाए।
शीतयुध्द के दौरान मानवाधिकारों के सवाल को सोवियत संघ के माक्र्सवादियों ने सीआईए का राजनीतिक प्रपंच बना दिया था।इसके चलते बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों के प्रति परिवर्तनकामी शक्तियों में गलत समझ बन गई।मानवाधिकारों की चिन्ता को बड़े कौशल के साथ देरीदा दर्शन,साहित्य,भाषा, आदि के क्षेत्र में विखण्डन के बहाने ले आते हैं।कायदे से मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में देरिदा को पढ़ा जाना चाहिए।मानवाधिकार और विखण्डन का गहरा संबंध है। मानवाधिकार के सवालों ने पूंजीवाद और समाजवाद के समूचे तानेबाने को अस्त-व्यस्त किया है।वही कार्य विखण्डन ने किया है।असल में विखण्डन मानवाधिकार की दार्शनिक रणनीति है।जिस तरह मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में सभी क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई है।यही कार्य विखण्डन ने चिन्तन के क्षेत्र में किया है।विखण्डन की रणनीति गैर-राजनीतिक नहीं है।बल्कि पूरी तरह राजनीतिक है।सम-सामयिक है।मजेदार बात यह है कि जिस जमाने में मानवाधिकारों की चेतना नहीं थी।उस दौर के चिन्तन को भी देरीदा मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में खोलकर देखते हैं।मानवाधिकार की राजनीति और देरीदा और उनके अनुयायियों का गहरा रिश्ता है।आम तौर पर आलोचकों ने इस पहलू की उपेक्षा की है।देरिदा पूंजीवाद या समाजवाद या माक्र्सवाद की आलोचना करते समय कोई निश्चित व्यवस्था का खाका पेश नहीं करते।सिर्फ मनुष्य और उसके अधिकारों के पक्ष में जनतंत्र को सबसे बडा तत्व मानते हैं। देरिदा के चिन्तन के आने के बाद सारी दुनिया में समानता, जनतंत्र,अस्मिता, स्त्री अस्मिता,दलित अस्मिता,काले लोगों के अधिकार,वंचितों के अधिकार का मामला एकदम नए स्पेस में चला गया है।
उल्लेखनीय है कि देरिदा ऐसे समय में अपनी समस्त वैचारिक ऊर्जा के साथ दाखिल होते हैं जब सांस्कृतिक-सैध्दान्तिक चिन्तन पतन की ओर जा रहा था।इस पतन से बचने का कोई मार्ग नजर नही आ रहा था।बड़े-बड़े विचारक,आलोचक,लेखक इस संकट की अवस्था में अध्यात्म में लौट चुके थे।अथवा अपनी-अपनी सैध्दान्तिक रूढ़ियों में कैद थे। देरीदा इन सबसे मुक्ति दिलाते हैं। जब हिन्दी से लेकर अंग्रेजी तक थियरी को अप्रासंगिक ठहराया जा रहा था। जब युवाओं में मानवाधिकारों और मध्य-पूर्व के संकट और नस्लवाद पर बातें करने की बजाय अप्राकृतिक मैथुन पर ज्यादा चर्चाएं हो रही थीं।समाजवाद के प्रति आकर्षण घट रहा था।जब 'शरीर' और सिर्फ कामुक शरीर चर्चा के केन्द्र में था।ऐसे में देरीदा ने अपनी विखण्डन रणनीति के जरिए वंचितों और उपेक्षितों को सारी दुनिया में केन्द्रीय एजेण्डा बनाया।जो काम इस दौर में मार्क्सवाद नहीं कर पाया उसे देरिदा के चिन्तन ने कर दिखाया।जिस समय आलोचना के नाम पर साहित्य में कचरा जमा हो रहा था।आलोचना रूढियों के मार्ग पर चली गई थी।छात्रों,शिक्षकों,आलोचकों और विचारकों के पास कोई प्रेरक व्यक्तित्व नहीं था।ऐसे में देरीदा ने प्रेरक के रूप में सारी दुनिया के बौध्दिक विमर्श को नई बुलंदियों तक पहुँचाया।देरिदा ऐसे दौर में दाखिल होते हैं जब बौध्दिकों को भविष्य को देखने के औजार नहीं मिल रहे थे।देरीदा के चिन्तन की केन्द्रीय उपलब्धि यह है कि वह बुध्दिजीवियों को सभी किस्म के रूढिगत चिन्तन से मुक्त करता है।भविष्य में आस्था पैदा करता है।भावी सपनों को आलोचनात्मक विवेक की रणनीति के जरिए खोलता है। देरीदा को पढ़ना एक राजनीतिक अभ्यास भी है।
सवाल पैदा होता है कि विखंडन में बुनियादी चीज क्या है ?इसमें दो बुनियादी चीजें हैं।पहला,देरीदा ने 'वायनरी अपोजीशन' में जो संबंध होते हैं।उन्हें विखंडन की रणनीति के तहत उलट दिया है।वह वायनरी अपोजीशन के उलट का मसीहा है।इसी के आधार पर उसने सोचने की दिशा को बदला है।मसलन् वायनरी अपोजीशन में मर्द / औरत, अच्छा /बुरा, वाक् / लेखन आदि के जो प्रचलित संबंध थे।उन्हें उलट दिया।मसलन् मर्द और औरत के संबंध में मर्द केन्द्र में था। किंतु देरीदा ने स्त्री को केन्द्र में स्थापित कर दिया।अच्छे और बुरे में अच्छा केन्द्र में था उसकी जगह बुरे को बिठा दिया।वाक् केन्द्र में था उसकी जगह लेखन को रख दिया।वायनरी अपोजीशन में यह उलट सारी दुनिया के लिए वरदान साबित हुआ है।यहां तक कि अब वे भी इस रणनीति का पालन कर रहे हैं जो कभी इसकी निन्दा करते थे।
विखंडन की रणनीति का दूसरा बड़ा अवदान यह है कि उसने समस्त भेदों को अस्थिर कर दिया है।विखंडन रीडिंग का दार्शनिक अस्त्र है यह अन्य के पाठ की व्याख्या का औजार है।इस औजार का विकास जनतंत्र में ही संभव है।जनतंत्र में ही अन्य की मुक्ति संभव है।जनतंत्र की धुरी है समानता और समानता पर आधारित न्याय का शासन।निष्पक्ष न्यायपालिका और न्याय के बिना जनतंत्र का काम करना संभव नहीं है।इस तथ्य को देरिदा ने बार-बार अपने कानून और न्याय संबंधी व्याख्यानों और लेखों में रेखांकित किया है।अपने पहले कानून-संबंधी व्याख्यान 'विफोर द लॉ' में देरिदा ने कानून के सामान्य और विशिष्ट अर्थ की विस्तार से व्याख्या करते हुए कहा कि आज कानून बेहद महत्वपूर्ण हो उठा है। न्यायाधिकारी की महत्ता बढ़ी है।वे कभी-कभी राजनीतिज्ञों द्वारा सत्ता के दुरूपयोग को रोकते हैं। जनतंत्र के स्वस्थ विकास के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका का होना बेहद जरूरी है। स्वतंत्र न्यायपालिका हो यह जनतंत्र के लिए भी परीक्षा की घड़ी है।जो दार्शनिक एथिक्स और राजनीति में रूचि लेते हैं उन्हें कानून पर लौटना ही होगा।यदि जनतंत्र सही मायने में ग्लोबल बनता है तो दार्शनिक,कानून और न्याय से भाग नहीं सकते।उल्लेखनीय है कि देरिदा ने कानून की औपचारिक पढ़ाई नहीं की थी।किंतु कानून के सवालों पर उनकी दार्शनिक मीमांसा को सारी दुनिया के कानूनविदों में वही सम्मान और शोहरत मिली जो साहित्य या दर्शन में मिली।सामान्य तौर पर कानून पढ़ने की जरूरत उन्हें तब पड़ी जब वे एकबार लेखक के अधिकारों और कापीराइट के मसले पर कानूनी नुक्तों का अध्ययन करने के लिए मुखातिब हुए।उन्होंने साहित्य के संदर्भ में ही सबसे पहले कानून का अध्ययन आरंभ किया।लेखक के अधिकारों और कापीराइट के सवाल पर अंग्रेजी और फ्रांसीसी कानून में वर्णित प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद येल में एक सेमीनार में पर्चा पढ़ा।देरिदा ने कानून संबधी लेखन में केन्द्रीय रूप में जिस बात को आधार बनाया है वह है एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति दायित्व।इसी के आधार पर उन्होंने सीक्रेट, टेस्टीमॉनी,होस्पीटेलिटी, फोरगिवनेस आदि विषयों पर व्याख्यान दिए।
देरिदा के चिन्तन की बुनियादी धुरी है कि कुछ भी अंतिम नहीं है।कोई चीज अपने अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है।सब कुछ बदल सकता है।सब चीजों,विचारों,मूल्यों,तकनीकी आदि को उलट- पुलटकर देखा जाना चाहिए। वस्तुओं,विचार,मूल्य,मान्यता आदि के प्रति देवत्वभाव से मुक्त होकर आलोचनात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए।विश्लेषण,व्याख्या, और परिवर्तन से परे कुछ भी नहीं है।यहां तक कि हमारी आस्थाएं और विश्वास भी विश्लेषण के दायरे में आते हैं।वे भी बदल सकते हैं।बदल रहे हैं।कोई चीज अंतिम नहीं है।यही वह प्रस्थान बिंदु है जो मानव सभ्यता के विकास के अनंत पथ खोलता है।इसी अर्थ में देरिदा और उनके अनुयायियों की पहल बढ़ी है।वे ज्यादा प्रासंगिक सवाल उठा रहे हैं। प्रश्नाकुलता पैदा कर रहे हैं।असहमति का शास्त्र रच रहे हैं। सहमति की दुनिया में असहमति का शास्त्र विकास का लक्षण है,पतन कर नहीं।इसी अर्थ में विखण्डन एक सकारात्मक रणनीति है। यह खोए हुए यथार्थ,पराए लोगों,वंचित लोगों और जनतंत्रप्रेमी जनता का अस्त्र है।
हमारे देश में कुछ लोग चाहते हैं कि एकायामी हिन्दुत्ववादी शिक्षा दी जाए।इस तरह की शिक्षा का देरीदा ने अपने देश में भी विरोध किया था।वहां पर भी कुछ लोग ऐसी शिक्षा के पक्ष में थे कि जो एकायामी हो,विविधता की विरोधी हो।जिसमें बहुलतावाद,विज्ञान, धार्मिक विविधता आदि की कोई जगह न हो।इस तरह की शिक्षा को देरीदा ने 'प्रभुत्ववादी केन्द्रीयता' की संज्ञा दी।
देरिदा नहीं चाहते थे कि सारी दुनिया का एकीकरण हो जाए।एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द सारे देश जमा हों।'नई विश्व व्यवस्था' के बारे में जो तर्क दिए गए उन्हें यूरोप की सांस्कृतिक अस्मिता के संदर्भ में खोलते हुए देरीदा ने लिखा कि यह दुधारी तलवार है। यूरोप की सांस्कृतिक अस्मिता को आप नई विश्व व्यवस्था के नाम पर रफा-दफा नहीं कर सकते। जब मैं कहता हूँ कि किसी भी तरह नहीं,तो इसके दो अर्थ हैं,पहला ऐसा करना हार्दिक तौर पर मुश्किल है।दूसरी बात यह कि हम किसी केन्द्रीय ऑथरिटी की पूंजी स्वीकार नहीं कर सकते।खासकर ऐसी पूंजी जो नियंत्रित करे और स्टैण्डर्डाइज करे।स्थान के आधार पर लोगों की चेतना का निर्माण बहुत सहज है।उस चेतना की बिक्री सहज कार्य है।इस तरह का सामान्यीकरण किसी भी जगह सब समय सांस्कृतिक पूंजी बनाता है।यही कार्य वर्चस्ववादी केन्द्र भी करता है।ब्रूनर ने लिखा था कि आत्म या निज को अन्य के संदर्भ में परिभाषित करो।'देरिदा ने भी कहा कि ''अस्मिता में वस्तुत:अन्य भी होता है।'' ''यह कह सकते हैं, आंतरिक और बाह्य तौर पर अस्मिता के सभी रूपों के निर्धारण में कम से कम कोई आत्म संबंध नहीं होता।स्वयं से कोई संबंध नहीं होता।आप स्वयं के आधार पर कोई पहचान नहीं बनाते।संस्कृति के बगैर अस्मिता की पहचान संभव नहीं है और संस्कृति स्वयं में अन्य की संस्कृति होती है।संस्कृति में दुहरा रूप छिपा होता है।वह स्वयं से फ़र्क खत्म करती है।'' इसका अर्थ यह है कि बौध्दिक क्षमता बढ़ाने के लिए अन्यत्व, बहुस्तरीयता और अन्तर्विरोधी स्वरों भी को शामिल किया जाए।जिससे भाषा को आलोचनात्मक अभिव्यक्ति मिले। इन स्वरों के बहिष्कार का अर्थ है कि शिक्षा का तटस्थीकरण।इसका अर्थ यह भी है कि राजनीतिक तौर पर हम यह फैसला लेने जा रहे हैं कि हमें शिक्षित नहीं करना है। देरिदा ने भिन्नता और अन्यत्व की अभिव्यक्ति को स्वीकार किया है।'नई विश्व व्यवस्था' की आलोचना करते हुए लिखा कि ''आज हमारे सामने बहुस्तरीय वैविध्य के प्रति दोहरी जिम्मेदारी है।''देरिदा ने लिखा कि इसके कई बिन्दु हैं जिन्हें ध्यान रखें।संक्षेप में देरीदा की बातों को निम्नलिखित रूप में समझ सकते हैं।
1.यह जरूरी है कि परंपरा को याद करें।साथ ही 'भिन्नता' के प्रति खुले रहें।
2.यह जरूरी है कि 'विदेशियों' का स्वागत करें।उन्हें अपने अंदर समाहित करने के लिए नहीं।बल्कि उन्हें मानें,स्वीकार करें,सम्मान दें।
3.यह जरूरी है कि सर्वसत्तावादी कठमुल्लावाद की सिध्दान्त और व्यवहार में आलोचना करें। साथ ही धर्म की पूंजी को जिसे कठमुल्ले पैदा कर रहे हैं,जो नए रूप में आ रही है,उससे सीखें और रेखांकित करें।उसकी आलोचना करें।
4.यह जरूरी है कि आलोचनात्मक विचारों और आलोचनात्मक परंपरा पैदा करें।उसे विखंडन की रणनीति के हवाले करें।उसे आलोचक और सवालों के परे ले जाएं।
5.यह जरूरी है कि हम मानकर चलें कि यूरोपीय परंपरा में लोकतंत्र का विचार एक विलक्षण विचार है।यह भी मानकर चलें कि इस विचार को कभी छोड़ा नहीं गया।यह भी कह सकते हैं कि इस पर कभी -कभी यह विचार किया गया कि यह जरूर लागू होगा।
6.यह जरूरी है कि भिन्नता,इडियम,अल्पसंख्यकों,विश्ष्टिता,कानून का सार्वभौमत्व,समझौते और असहमति की इच्छा व्यक्त करें।साथ ही बहुसंख्यकों के कानून का विरोध करें।नस्लवाद का विरोध करें।राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी उन्माद का विरोध करें।
7.सहिष्णु बनें।सम्मान करें।ये सभी बातें तर्क के शासन में नहीं आतीं।ये आस्था के भिन्न रूप हैं।साथ ही यदि तर्क के बारे में लगातार सोचें ,तर्क के इतिहास के बारे में सोचें,अनिवार्यत: उसकी व्याख्या का उल्लंघन करें। अतार्किक हुए वगैर अज्ञान की सीमा को जानें।
8.दुहरी जिम्मेदारी का अर्थ है जिम्मेदारी।''यानी सोचने,बोलने और लागू करने की जिम्मेदारी।''समुचित परिस्थितियों और दोहरे अन्तर्विरोधों के स्तर पर उन सभी का सम्मान करते हुए यह काम उन्हें भी सम्मानित करते हुए करें जो किसी भी किस्म की जिम्मेदारी नहीं निभाते।
देरीदा का सबसे चर्चित अवदान विखंडन है इसके विखंडन के मूल बिन्दु इस प्रकार हैं-
1.यह पाठ की रणनीति है।इसका उपयोग मूल्य है।इसका उत्तर व्युत्पत्तिशास्त्र में छिपा है।यह किसी भी किस्म की संदर्भगत रणनीति के बाहर है।
2.विखंडन साहित्य और दर्शन के पाठ पर निर्भर है।उसकी क्षमता है नए पाठ और नए पाठक को आत्मसात् करने की।विखंडन को 'पध्दति' में संकुचित नहीं किया जा सकता।यह खोज है।विश्लेषण है।नए तनावों की खोज है।पाठ में अन्तर्निहित अस्थिरता की खोज है।वह सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है।बल्कि पाठ में निहित चीजों को उभारने,सामने लाने,उजागर करने,उन पर बल देने का नाम है।यह स्वयं और अन्य की खोज भी है।
3.विखंडन चीजों की तय प्राथमिकताओं के बारे में सवाल खड़े करता है।खासकर मूल,स्वाभाविक अथवा जो स्व-प्रमाणित है उसके प्रति सवाल खड़े करता है।कौन से मुख्य पदबंध हैं।मंशाएं हैं।चरित्र हैं।उन्हें पाठ के अंदर वायनरी अपोजीशन या युग्मी-युक्ति के रूप में परिभाषित करना।अपोजीशन कैसे क्रमानुवर्ती है ? यह अपोजीशन अस्थिर है।इसके संबंध को बदला जा सकता है।यह एक-दूसरे पर निर्भर है,अन्य पर निर्भर है।यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि पाठ कैसे उलटता है।लेखक की मंशा से परे चला जाता है।अतिक्रमण कर जाता है।
4.आज के साहित्यिक परिदृश्य में विखंडनात्मक रीडिंग व्यापक तौर पर व्याख्यात्मक रणनीति का हिस्सा है।इसका बार-बार हायरार्कीकल अपोजीशन को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।(जैसे मर्द/ औरत, अभिजन/ पापुलर कल्चर, आदि)।देरीदा ने विखंडन को अपना केन्द्रीय कार्य कभी नहीं माना।यही वजह है कि उसने इसे एक व्यवस्था,आंदोलन या स्कूल बनाने की कोशिश नहीं की।अभी तक हमारी जानकारी में कहीं 'डिकंस्ट्रक्टनिज्म' पदबंध का प्रयोग सामने नहीं आया है।हिन्दी में सिर्फ गोपीचंद नारंग ने इसे विरचनावाद कहा है।जो गलत है।उन्होंने ही इसे 'वाद' बनाया है।
5.यह भी भूल होगी कि हम विखंडन को उत्तर-संरचनावाद का पर्याय बना दें।या उस रूप में समझें।उत्तर -संरचनावाद दर्शन है।इससे देरिदा जुड़े रहे हैं।जबकि इस कार्य के अंदर विखंडन एक पदबंध है।
देरिदा पर जब भी चर्चा होती है तो हाइडेगर और नीत्शे का जिक्र जरूर आता है।इस संदर्भ में यह तथ्य ध्यान रहे कि देरिदा ने इनके सकारात्मक तत्वों को आत्मसात् किया था।इनका अंधानुकरण नहीं किया था।इन दोनों के परिप्रेक्ष्य से भिन्न परिप्रेक्ष्य में देरीदा सोचते थे।इन दोनों से भिन्न देरीदा की समसामयिक राजनीतिक सवालों पर राय थी।
देरिदा के विखंडन की मुश्किल यह है कि वह अकल्पनीय मुश्किलों से ग्रस्त है।मसलन् जब भी कोई व्यक्ति बोलता है तो तर्क की भाषा में बोलता है।ऐसे में विखंडन की रणनीति के तहत ऐसे व्यक्ति के वक्तव्य में हमें उन छिपे हुए क्षेत्रों की खोज करनी चाहिए जो तयशुदा अर्थ से भिन्न है।तर्क के नियमों से परे हैं।यहीं पर दुहरा खेल शुरू होता है।यह उभयभाविता की मांग करता है।दर्शन की भाषा में इसे दुरंगापन कहते हैं।
हाइडेगर के लिए दर्शन का अंत मेटाफिजिक्स में निहित था।हाइडेगर का मानना था कि अनुभवनिरपेक्ष के बारे में सवाल करना अर्थहीन है।वह मानता था कि दर्शन का अंत हो चुका है।दर्शन और कुछ नहीं पश्चिमी विचारधारा है।जो स्वयं सुपीरियर मानती है।देरिदा ने हाइडेगर के तर्कों से भिन्न बात कही है।देरिदा मानता है कि अनुभवनिरपेक्षता के सवालों से आप बच नहीं सकते।विचारधारा के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं यदि वे सच हैं तो ये आरोप तो दर्शन की भाषा के प्रति हुए।कायदे से पूछा जाना चाहिए कि क्या प्रभुत्वशाली विचारधारा को किसी अन्य विचारधारा ने अपदस्थ किया है।जैसे मार्क्सवाद,फ्रायडवाद वगैरह ने।देरिदा ने कहा कि मैं तर्क करना चाहता हूँ कि तर्क पुराना या रूढ़ हो गया है।वह स्वयं को ही अपील करता है।वह जिसका विरोध करता है उसके खिलाफ स्वयं को ही अपील करता है।अपने क्षेत्र को ही सम्बोधित करता है।इसी अर्थ देरिदा ने कहा कि तर्क रूढ़ हो गया है।अप्रासंगिक हो गया है।
देरिदा ने हाइडेगर की इतिहास को लेकर जो समझ है उसे लेकर कोई झगड़ा नहीं किया।मसलन् जब हाइडेगर कहता है कि दर्शन के इतिहास का अंत हो गया तो देरिदा सवाल उठाता है कि ऐसा क्या हुआ है कि अंत हो गया ?अपने समूचे चिन्तन में देरिदा ने जो रणनीति चुनी है वह दुरंगी है।वह दुहरा खेल खेलती है।वह तर्क की भाषा के जरिए सक्रिय होती है।चूँकि अन्य कोई भाषा नहीं है।वह ऐसे क्षेत्र में भी जाती है जहां समस्याओं के कोई उत्तर नहीं हैं।वह तार्किक स्थितियों के अन्तर्विरोधों को दिखाती है।देरिदा इस रणनीति को ही विखंडन कहता है।हाइडेगर के यहां यह 'विध्वंस' है।हाइडेगर के लिए 'डिस्ट्रक्शन' या विध्वंस 'इतिहास के इतिहास' की जांच या खोज है।इसमें वर्तमान की नकारात्मक व्याख्या शामिल है।हाइडेगर मानता है कि व्यक्ति इस संसार में अकेला है।वह साधारण जिन्दगी जीता है।साधारण जिन्दगी जीते हुए वह संसार सागर से मुक्त नहीं हो पाता बल्कि उलटे फंसता चला जाता है।ऐसे में दुखी होकर मोक्ष की कामना करने लगता है।इस क्रम मे वह संसार सागर की व्याख्या करता है।विरासत में प्राप्त परंपरा की व्याख्या करता है।निरंतर मृत्यु की कामना करता है।मृत्यु के भय में जीता है।इस क्रम में वर्तमान की नकारात्मक और इतिहास की सकारात्मक व्याख्या करते हुए प्रामाणिकता हासिल करता है।वह कठिन सवालों को उठाता है।जिससे वह अपनी ऑथरिटी को मनवा सके।इसके लिए वह जगत की टुकड़ों में व्याख्या करता है।उसे इतिहास में खोजता है।हाइडेगर का मानना था कि अस्तित्व के अंतर्य को समझने के लिए जरूरी है कि मनुष्य सभी किस्म की व्यावहारिक मान्यताओं को त्याग दे।अपनी नश्वरता,क्षणभंगुरता को पहचाने।सतत रूप से मृत्यु के आमने-सामने होने की अनुभूति से ही मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षण की अर्थवत्ता तथा भरपूरता को देखने की स्थिति में होता है और अपने को लक्ष्यों,आदर्शों और वैज्ञानिक अपकर्षणों से मुक्त कर सकता है।
देरिदा के यहां एक अन्य धारणा है भिन्नता ।वे इसे भेद से अलग करते हैं।उनके यहां भिन्नता और भेद दो अलग-अलग धारणाएं हैं।भिन्नता यानी अस्मिता का पृथक् रूप।भेद यानी समय का पृथक रूप।इस धारणा पर देरीदा हुसेर्ल को पढ़ते हुए पहुँचे।खासकर 'फिनोमिनोलॉजी ऑफ हिस्ट्री' के विखंडन के जरिए पहुँचे।देरीदा ने कहा कि यह हमारे सारे सवालों का उत्तर देता है।यह बताता है कि सत्य को कैसे पाया जा सकता है।यदि सत्य को सत्य बनना है तो उसे रूढ़ बनना होगा।परमत्व को प्राप्त करना होगा।उसे सभी किस्म के नजरिए से स्वतंत्र करना होगा।फिनोमिनोलॉजी सत्य के उदय की खोज करती है। फिनोमिनोजिस्ट तर्क देते हैं कि सिर्फ वर्तमान ही मौजूद है।वर्तमान में अतीत का रहना एक तरह से सभ्यता की अनुपस्थिति का सूचक है।भविष्य का आप अनुमान लगा सकते हैं किंतु यह कार्य वर्तमान में रहकर ही संभव है।अतीत को वर्तमान में बचाए रखने के लिए जरूरी है कि भविष्य की भी वर्तमान में भविष्यवाणी की जाए।वर्तमान को सिर्फ वर्तमान में नहीं होना चाहिए बल्कि वर्तमान ऐसा होना चाहिए जो अभी आना बाकी है।साथ ही वर्तमान ऐसा जो अतीत हो चुका है।यही वह बिन्दु है जहां 'डिफरेंस' की धारणा में देरीदा दाखिल होते हैं।वह कहते हैं कि वर्तमान की स्वयं के साथ एकरूपता नहीं है।यह भिन्नता ही आरंभिक तथ्य की समस्या को सामने लाती है।मान लीजिए हमने किसी आरंभिक तथ्य के जरिए किसी घटना के आरंभ की खोज की ऐसी अवस्था में हम यह कैसे कह सकते हैं कि इसके निर्माताओं के दिमाग में यही अर्थ था।हम अपने अर्थ को उनके अर्थ के बराबर नहीं रख सकते।यदि हम 'फिनोमिनोलॉजी' बनाते हैं तो हमें हुर्सेल के 'सिध्दान्त का सिध्दान्त' की धारणा का इस्तेमाल करना होगा।सिध्दान्त यह है कि इतिहास अर्थपूर्ण रहा है।किंतु भ्रमित करनेवाला रहा है।उसे बताने के लिए किसी की जरूरत है।उसे पीढ़ी-दर पीढ़ी संचारित कर सकते हैं।उसमें कई स्वर हैं।उसे किसी भी समय लिपिबध्द नहीं किया गया।व्यक्ति और अर्थ एक नहीं हो सकता।अर्थ हमेशा भिन्न होता है। सही क्या है ? और तथ्य क्या है ?ये दोनों एक नहीं हैं।इसका कारण यह है कि तथ्य और सही में सामान्य फर्क होता है।इसी तरह देरीदा कहते हैं कि प्रथम तो प्रथम है,वह प्रथम इसलिए है क्योंकि उसके पीछे द्वितीय है।प्रथम को आप अकेले नहीं पहचानते बल्कि प्रथम के लिए द्वितीय का होना जरूरी है।पूर्वर् शत्त है।दूसरे को मानने का अर्थ है तीसरे का आना।इसी अर्थ में ओरिजन एक तरह का पूर्वाभ्यास है।पुनरावृत्ति का पूर्वाभ्यास है।मौलिक की नकल है।
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