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सोशल मीडिया के डिजिटल संस्कार

फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए।

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढ़ती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो …

यूरोपीयन आर्थिक यूनियन से ब्रिटेन के अलग होने का मतलब

ब्रिटेन के जनमत संग्रह का मूल संदेश - शासकदल आम जनता की भावनाओं और संवेदनाओं से पूरी तरह कट चुका है।वे आम जनता के असंतोष को सही ढ़ंग से समझ ही नहीं पाए। शासकवर्ग का जनता के दिलोदिमाग से कट जाना कोई नई बात नहीं है,हमारे यहां मनमोहन सिंह सरकार का पतन इसके कारण ही हुआ।इसी तरह स्कोटिस जनमत संग्रह,स्पेन के आम चुनाव,ग्रीस के चुनाव,डोनाल्ड डम्प के समर्थन में उठ रही आवाजों में इस जन -को देखा जा सकता है।

ब्रिटेन के जनमत संग्रह में मजदूरों ( औद्योगिक और खान मजदूरों) के बड़े तबके ने यूरोपीयन यूनियन से बाहर निकलने के पक्ष में वोट दिया है,इसका प्रधान कारण यह है कि मजदूरों का यह अनुभव है कि यूनियन में रहने के कारण उनकी आर्थिकदशा में कोई बडा परिवर्तन नहीं आया ।उलटे बहुत ही सीमित अमीरवर्ग को इससे लाभ हुआ।गरीबी,बेकारी और हाशिए पर ठेलकर रखने की घटनाएं बढ़ी हैं,इसलिए मजदूरों ने निकलने के पक्ष में वोट दिया।

ब्रिटेन के जनमत संग्रह का पहला साइड इफेक्ट -सारे पीआए एजेंसियों के जनमतसंग्रह के बारे में पूर्वानुमान गलत साबित हुए हैं।अधिकांश पूर्वानुमान बता रहे थे कि लघु बहुमत से ब्रिटेन ईयू में बना रहेगा।ल…

मोदी का भयाक्रांत लोकतंत्र

मोदी के सत्तारूढ होने के बाद "लोकतंत्र" का "भयाक्रांत लोकतंत्र " में रूपान्तरण करने की कोशिशें हो रही हैं।इस खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।मोदीजी चाहते हैं लोकतंत्र,लेकिन साथ में यह भी चाहते हैं कि लोग भयभीत होकर रहें।हमें "भयाक्रांत लोकतंत्र" के समूचे तानेबाने को तोड़ना होगा और "वास्तव लोकतंत्र" स्थापित करने की दिशा में बढ़ना होगा।

सच यह है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अकेले इस पहलू की ओर विभिन्न बयानों के जरिए ध्यान खींच रहे हैं लेकिन विपक्ष उसे गंभीरता से नहीं ले रहा है।"भयाक्रांत लोकतंत्र " बहुत ही भयानक अवस्था है इसकी परिकल्पना संविधान में भी नहीं है,यह फासीवाद की हरकतों और लक्षणों से भिन्न है।

मोदीजी का "भयाक्रांत लोकतंत्र" वस्तुतःसत्ता को दलीय आधार पर देखता है। सत्ता को दल के आधार पर देखना,संसद में बहुमत के आधार पर देखना,उसके आधार पर सत्ता , संसाधनों और नीतियों का डंडे के बल पर अमल कराना मुख्य विशेषता है।आम जनता के आधार पर सत्ता को न देखना,इसकी मुख्य विशेषता है। जबकि सत्ता का आधार है आम जन…

योग - संयोग और शासन

मैं योग दिवस के पक्ष में हूँ !!मैं बाबा रामदेव आदि के भी पक्ष में हूँ! क्योंकि इन लोगों ने योग को मासकल्चर का अंग बना दिया, कल तक योग ,कल्चर का अंग था। मैं बाबा रामदेव और मोदीजी से बहुत ख़ुश हूँ कि उन्होंने योग को ग्लोबल ब्राण्ड बना दिया। पूँजीवादी विरेचन का हिस्सा बना दिया।

योग करने के कई फ़ायदे हैं जिनको योगीजन टीवी पर बता रहे हैं।लेकिन सबसे बडा फ़ायदा है कि वह अब सरकारी फ़ैशन, सरकारी जनसंपर्क और सरकारी जुगाड़ का अंग बन गया है। योग आसन था लेकिन अब योग शासन है।पहले योग स्वैच्छिक था कल अनिवार्य होगा!केन्द्र सरकार से लेकर तमाम देशी -विदेशी सरकारों तक योग अब शासन का अंग है ,यूएनओ कोई जनसंगठन नहीं है वह सत्ताओं का संगठन है। योग को ११७ देशों का समर्थन है योग अब आसन नहीं शासन की क्रिया है!

माकपावालो बंगाल लाइन भ्रष्ट लाइन

माकपा का संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा।समूची पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय कमेटी भ्रष्ट बंगाल माकपा यूनिट को बचाने में लगी है।जिस बंगाल लाइन को लेकर हंगामा मचा है उसके लिए मेनीपुलेशन और इस्तेमाल का आधार तो विगत सीसी और पीबी ने ही तैयार किया था।संध्याभाषा में बंगाल में मोर्चा बनाने का जो आह्वान किया गया उसके ही गर्भ से बंगाल लाइन निकली है।मीडिया की मानें तो इसके निर्माता हैं बुद्धदेव भट्टाचार्य,सूर्यकांत मिश्रा,गौतमदेव,मोहम्मद सलीम।इन चार नेताओं ने गंभीरता के साथ बंगाल लाइन को लागू किया,इसके अलावा इसे लागू करने में पश्चिम बंगाल के सभी पोलिट ब्यूरो और केन्द्रीय समिति सदस्य अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास में यह विरल घटना है कि पार्टी ने किसी दल के साथ समझौता किया या मोर्चा बनाया या सीटों पर समझौता किया लेकिन उसके बारे में पोलिट ब्यूरो,केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी किसी ने भी आधिकारिक तौर पर कोई लिखित बयान जारी नहीं किया,हमने इस संदर्भ में फेसबुक पर लिखा भी था। लिखिततौर पर बयान जारी न करके दलीय समझौता करके चुनाव लड़ना स्वयं में अनैतिक ,नीतिहीन और भ्रष्ट आ…

न्याय की गुलामी

विचारों की दरिद्रता कहें या फिर गुलामी कहें न्यायपालिका की प्रशंसा करते थकते नहीं हैं,सच यह है न्याय प्रक्रिया एकदम भ्रष्ट और उत्पीड़नकारी है,इ सके बावजूद न्यायपालिका की प्रशंसा बढती ही जा रही है।यही है हमारे समाज का संकट ।वह सच को देखने,और सच बोलने से डरता है।
हम सब जानते हैं अदालतों में हर ईंट घूस खाती है लेकिन कभी. कोई पकडा नहीं गया।वकील बेहिसाब पैसे लेते हैं लेकिन कोई नियमन नहीं है।अदने से अहलकार से लेकर पेशकार तक सब पैसे लेते हैं,बिना पैसे लिए कोई काम नहीं करता,इसके बावजूद कभी कोई बोलता नहीं है,सिस्टम चलाने वालों से लेकर जजों तक सबको मालूम है कि पेमेंट की दर क्या है,जब न्यायपालिका भ्रष्ट होगी तो देश भी भ्रष्ट होगा,न्याय दुर्लभ होगा।न्याय कभी समय पर नहीं होगा।जिस देश में न्याय समय पर न हो,जल्दी फैसले न हों तो उस देश का अपराधीकरण तो होगा ही।

पेशेवर लोगों में कभी वकील और जजों को भी आलोचनात्मक नजरिए से देख लिया करो।वकील और जज के पेशे में दिन प्रतिदिन स्वस्थ मूल्यों की गिरावट आई है,जगह जगह राजनीतिक गिरोह बनाकर वकील काम कर रहे हैं। हर दल का वकीलों में नेटवर्क है।जब वकील नेटवर…

मुफ़्तख़ोर आतंकी जुनून

श्रीनगर के पुराने शहर यानी डाउनटाउन इलाक़े में आज भी विलक्षण पुराने क़िस्म की रमणीयता नज़र आती है। छोटी गलियाँ, छोटे पुराने घर,सामान्य और सरल क़िस्म के लोग, पुराने क़िस्म की दुकानें, पुरानी तहज़ीब इसके समूचे परिवेश में फैली हुई है।एक ख़ास क़िस्म की अनौपचारिकता और मधुरभाव यहाँ की तहज़ीब में सहज ही महसूस कर सकते हो।
पुराने शहर का बाज़ार जब बंद हो जाता है तब गलियों का सौंदर्य नज़र आता है। लेकिन जब बाज़ार खुला होता है तो लोगों से भरा, माल से भरा लगता है। मैं जब फ़ोटो खींच रहा था तो एक बुज़ुर्ग ने कहा हमारी ग़ुरबत यानी ग़रीबी को मत दिखाना। यह वह इलाक़ा है जिसने १९८९ के बाद तक़रीबन २० साल तक चैन नहीं देखा। कब और किस तरह इस शांत इलाक़े में अशांति चली आई यह अपने आपमें सबसे जटिल सवाल है। लोग अभी भी चुप हैं और सही उत्तर खोज रहे हैं।
यहाँ के लोग आज भी वह सुबह याद करते हैं तो भय से काँपने लगते हैं। पुराने शहर का कोई घर नहीं होगा जिसमें पुलिस-बीएसएफ़ या सेना कभी घुसी न हो, कोई घर नहीं है जिसकी अंदर की साँकल -कुंडी -चटखनी लात मार -मारकर सैन्यबलों ने तोड़ी न हो,एक समय तो लोगों ने अंदर से घ…

आलोचना की समस्याएँ -

हिन्दी में रचनाएँ हैं, रचनाकार भी हैं।लेकिन कोई बहस नहीं है।एक ज़माना था हमारे पास नामवर सिंह ,रामविलास शर्मा थे, लेकिन आज आलोचक नहीं है। आज के लेखक के पास जीवन के व्यापक अनुभव हैं और उन पर वह जमकर लिख रहा है।वह अपनी अनुभूतियों से इस तरह चिपका हुआ है कि वह निजी अनुभूतियों के परे कुछ भी देख नहीं पा रहा। इस पूरे परिदृश्य में यह सवाल उठा है कि क्या साहित्य के लिए अनुभूतियों का होना ही ज़रूरी है ? क्या दुख या उत्पीड़न के अनुभवों के आधार पर ही महान रचना बन सकती ? ग़ौर से सोचें नामवरजी ने भी दुख देखा है, ग़रीबी भी देखी है, लेकिन क्या ग़रीबी और दुख की अनुभूति या उसे देखने मात्र से बेहतरीन साहित्य रचा जा सकता है ? कहने का आशय यह कि लिखने के लिए अनुभूति के अलावा भी चीज़ें चाहिए। अनुभूतियों अलावा सबसे बड़ी चीज़ है विचारधारा , लेकिन लेखक के पास जब तक एक सुसंगत वैचारिक दृष्टि न हो वह चीज़ों को देख ही नहीं सकता।दूसरी चीज़ चाहिए अकादमिक अनुशासन।अनुभूति, वैचारिकदष्टि और अकादमिक अनुशासन इन तीनों चीज़ों के सहमेल से साहित्य का सर्जनात्मक फलक बनता है। अभी जितने बडे पैमाने पर लेखन आ रहा है वैसा लेखन प्रवा…

लिबरल कश्मीर से गुज़रते हुए

कश्मीर के बारे में जब भी बातें होती हैं तो मीडिया निर्मित मिथ हमेशा दिमाग़ में छाए रहते हैं। अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान जिस कश्मीर को क़रीब से देखा है वह मीडिया निर्मित धारणाओं से एकदम मेल नहीं खाता।यह भी कह सकते हैं कश्मीर अपनी नई पहचान बना रहा है। मसलन्, कश्मीर के विभिन्न जिलोंके  इलाक़ों और मुहल्लों आदि में घूमते हुए , आम लोगों से बातें करते हुए यह एहसास पैदा हुआ कि हम कश्मीर के बारे में जो कुछ जानते हैं वह इकतरफ़ा और स्टीरियोटाइप है, इस स्टीरियोटाइप समझ को बनाने में मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका रही है।
       इस प्रसंग में पहली धारणा मुसलमान की है। कश्मीर के मुसलमानों को कठमुल्ला और पृथकतावादी के रूप में जमकर चित्रित किया गया है जो कि एक सिरे से ग़लत है। हमने गलियों और मुहल्लों से लेकर श्रीनगर के हलचल भरे इलाक़ों में घूमकर देखा और पाया कि अधिकतर मुसलमान दिखने में वैसे नहीं हैं जैसी इमेज हमारे ज़ेहन में मीडिया ने बनायी है। ज़्यादातर कश्मीरी युवा मुसलमान फ़ैशन की ओर बढ़ रहे हैं। वे फ़ैशनेबल बालों को रखते हैं।बढ़ी हुई दाढी और टिपिकल मुस्लिम ड्रेस अब गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गयी है,बह…