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फेसबुक की चुनौतियां

हिन्दी में फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवालोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य,अनुवाद,विमर्श आदि आ रहा है। इसमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियां भी हो रही हैं।
फेसबुक एक गंभीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिए,ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक-राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।
फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है ,इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं,यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो।खबरें लिखी जाएं। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े। हिन्दी में फेसबुक अभ…

लोकतंत्र के पुंसवादीतंत्र में औरतें

लोकसभा चुनावों में नेताओं के बंद दिमाग़ से बाहर निकलकर औरतों की ओर भी हमें नज़र डालने की ज़रुरत है। सन् १९५२में संसद में ४९९सीट थीं जिसमें २२महिला सांसद थीं। यानी ४.४फीसदी सीटों पर महिलाएँ क़ाबिज़ थीं। लेकिन २००९ में ५४३सीटों में मात्र ५८महिलाएं सांसद बनीं।
सन् २००४ में छह राष्ट्रीय दलों ने १,३५१उम्मीदवार खड़े किए जिसमें महिला प्रत्याशियों की संख्या ११० थी। इसमें मात्र ३०महिलाएं चुनाव जीत पायीं। कांग्रेस ने ४१७उम्मीदवार खड़े किए जिसमें ४५ महिलाएँ थीं। भाजपा ने ३६४उम्मीदवार खड़े किए जिसमें ३० महिलाएँ थीं।
सन् २००९ में हुए लोकसभा चुनाव में छह राष्ट्रीय दलों ने कुल १,६२३ उम्मीदवार खड़े किए जिनमें मात्र १३४ महिलाएँ थीं। यानी मात्र ८फीसदी महिलाएँ मैदान में थीं। इनमें से मात्र ४३ महिलाएँ ही चुनाव जीत पायीं।
२०१४ के चुनाव में अब तक कांग्रेस की दो लिस्ट आ चुकी हैं जिनमें २६५ के नाम हैं जिनमें ३९महिलाओं को लोकसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। भाजपा की सूची में अब तक मात्र १४ महिलाओं को टिकट मिला है। आम आदमी पार्टी ने मात्र २३ महिलाओं को टिकट दिया है। इस मामले में वामदलों की अवस्था बेहतर नहीं …

मुक्त व्यापार,मुक्त बाज़ार का मुक्त नायक केजरीवाल

अरविंद केजरीवाल पर मीडिया के लट्टू होने की वजह धीरे धारे साफ़ होती जा रही हैं। साथ ही नव्य उदार आर्थिक नीतियों के हिमायती युवाओं के उसके प्रति आकर्षण के वैचारिक कारण भी सामने आने लगे हैं । हमें यह भ्रम भी नहीं पालना चाहिए कि केजरीवाल सिस्टम में परिवर्तन करने के लिए राजनीति में आए हैं । वे भी यह नहीं मानते ।
अरविंद केजरीवाल ने साफ़ कहा है कि वह 'क्रोनी कैपीटलिज्म" ( लंपट पूँजीवाद) के ख़िलाफ़ है। लेकिन पूँजीवाद के पक्ष में है। सीआईआई के जलसे में बोलते हुए केजरीवाल ने कहा

"We are not against capitalism, we are against crony capitalism", ( बिज़नेस स्टैंडर्ड, 17फरवरी 2014)
यह भी कहा 'हम ग़लती कर सकते हैं लेकिन हमारी मंशाएँ भ्रष्ट नहीं हैं।'
केजरीवाल की मंशाएँ साफ़ हैं और लक्ष्य भी साफ़ हैं। पहलीबार केजरीवाल ने आर्थिक नीतियों के सवाल पर अपना नज़रिया व्यक्त करते हुए जो कुछ कहा है वह संकेत है कि आख़िरकार वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ?
केजरीवाल पर बातें करते समय उनके आम आदमी पार्टी के गठन के पहले के बयानों और कामों के साथ मौजूदा दौर में दिए जा रहे बयानों …

पापुलिज्म का प्रेत और लोकतंत्र

सन् 2014 का लोकसभा चुनाव पापुलिज्म के आधार पर लडा जाएगा। पापुलिज्म के आधार पर पहले कांग्रेस वोट जुगाड़ करती रही है। लंबे समय के बाद पहलीबार यह दृश्य नजर आ रहा है कि पापुलिज्म की प्रतिस्पर्धा में कांग्रेस से आम आदमी पार्टी और भाजपा ने बाजी मार ली है ।

सन् 1971 के चुनाव श्रीमती इंदिरा गांधी ने पापुलिज्म के आधार पर लड़ा था। उस समय नारा दिया 'समाजवाद लाओ,गरीबी हटाओ।' इसके बाद आपातकाल आया और 1977 का चुनाव 'लोकतंत्र लाओ देश बचाओ' के नारे पर लड़ा गया ।

पापुलिज्म के रुप क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न रुपों में अभिव्यक्त होते रहे हैं लेकिन परंपरागत पार्टी व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए अन्ना आंदोलन का होना और बाद में उस आंदोलन से निकले लोगों के द्वारा आम आदमी पार्टी का गठन करना अपने आप में एक बड़ी परिघटना है। यह परिघटना सन् 1974 के जेपी आंदोलन से पूरी तरह भिन्न है। जेपी आंदोलन के लोगों ने जनता पार्टी का उन्हीं कायदे-कानूनों और सिद्धांतों के आधार पर गठन किया जो पहले से प्रचलन में थे ,इसके कारण उसमें शामिल विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं और उनके अनुयायियों में वैचारिक एकीकरण नहीं …

आम आदमी पार्टी और लोकसभा चुनाव के सबक

लोकतंत्र में लोक गौण है, तंत्र महान है। आमतौर पर यही कहते हैं कि लोक प्रमुख है। लेकिन वस्तुगत सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में तंत्र और उसके दांव-पेंच ही प्रमुख हैं। जो दल जितने अच्छे दांव-पेंच जानता है वह उतना ही बेहतर भूमिका अदा करता है। दांव-पेंच का एक भरा पूरा शास्त्र है जिसने लोकतंत्र में लोक को कमजोर और तंत्र को समृद्ध बनाया है।
     दांव-पेंच में जरा सी चूक होते ही बाजी हाथ से निकल जाती है। इसलिए कहा जाता है लोकतंत्र में चूक नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में जिससे चूक हुई वो चुक जाता है अथवा हाशिए पर चला जाता है। लोकतंत्र में एकबार हाशिए पर जाने के बाद फिर केन्द्र में आना मुश्किल होता है।इस नजरिए से आम आदमी पार्टी की इसबार के लोकसभा चुनाव में भूमिका को देखें तो कुछ नए पक्ष सामने आएंगे।

       आम आदमी पार्टी ने खुलकर अपने नजरिए का इजहार किया और यह भी बताया कि उसका आर्थिक मॉडल क्या है ? वह किस तरह की आर्थिक नीतियों को मानती है। दिल्ली में चुनाव जीतने के पहले आम आदमी पार्टी की आर्थिक नीति को लोग नहीं जानते थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के साथ वे जान गए। आम आदमी पार्टी की समग्रता में भूमिका …

पश्चिम बंगाल में वाम की पराजय के सबक

वामदलों और खासकर माकपा का बड़ा आरोप यह है कि पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर चुनावों में धांधली, बूथदखल आदि की घटनाएं हुई हैं। उनके कार्यकर्ताओं और पोलिंग एजेण्टों पर हमले हुए हैं,जिसके कारण वे यह चुनाव हारे हैं। इन आरोपों में एक हद तक सच्चाई है। लेकिन कई अन्य चीजें भी हैं जिनको देखने की जरुरत है। मसलन्, वामदलों ने पश्चिम बंगाल में आधे मन से चुनाव लड़ा। कहीं पर कोई नारेबाजी नहीं,पोस्टर-बैनर आदि नहीं। कहीं पर प्रभावशाली दीवार लेखन नहीं । कोई नया नारा नहीं। कार्यकर्ताओं में कोई खास उत्साह नहीं। उनको देखकर यही लग रहा था की माकपा अपनी पराजय मानकर चल रही है और किसी दैवीय चमत्कार की उम्मीद में  चुनाव लड़ रही है।      यह सच है कि माकपा पर बेशुमार हमले हुए हैं लेकिन माकपा अपने सदस्यों की रक्षा नहीं कर पा रही है। यदि चुनाव आधे मन से लडना था या चुनावों में भयानक धांधली हुई है तो माकपा ने चुनावों का बहिष्कार क्यों नहीं किया ? जब चुनाव आयोग ने धांधली के आरोप नहीं माने तब तो माकपा चुनावों के बहिष्कार का निर्णय ले ही सकती थी।     लोकसभा के चुनाव परिणाम बताते हैं कि वामदलों का हिन्दीभाषियों और मुसल…

कांग्रेस की पराजय के प्रमुख कारण

इस बार के लोकसभा चुनाव में विकास के मुद्दे ने सभी मुद्दे अपहृत कर लिए इन अपहृत मुद्दों में बड़ा मुद्दा स्त्री के अधिकारों और सुरक्षा संबंधी मसलों से जुड़ा था। यह दुर्भाग्यजनक है कि स्त्री के सवाल जो विगत दो साल से मीडिया में सबसे ज्यादा स्थान घेरे रहे वे सवाल मीडिया में से ठेलकर बाहर कर दिए गए। यह प्रक्रिया क्यों और कैसे संपन्न हुई यह विचारणीय समस्या है। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि नव्य उदार आर्थिक नीतियों के जनविरोधी पहलू की तो चर्चा हुई लेकिन विकल्प की नीतियों पर कोई बात नहीं हुई।

कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने इसबार के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी चूक यह की कि उसने मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव नहीं लड़ा। भारतीय समाज में बूढ़ा नेता साखदार होता है। मनमोहन सिंह को सामने रखकर चुनाव लड़ा जाता तो परिणाम भिन्न होते और राजनीतिक जबावदेही के नाते उन्हें जनता में भेजना चाहिए था लेकिन अफसोस यह कि जनता में मनमोहन कम से कम गए। मनमोहन सिंह देश की नीतियों के प्रतीक हैं वे चुनाव के समय चुप रहेंगे तो यह बात देश की जनता हजम नहीं कर सकती।

कांग्रेस के दोनों नेताओं सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने  क…

मोदी की जीत से निकलती संभावनाएं

अन्ना आंदोलन के आने के साथ अस्मिता की राजनीति की विदाई का सिलसिला शुरु हुआ तो मोदी की जीत के साथ अस्मिता की राजनीति के समापन का मध्याह्न है। मोदी की जीत के साथ नए किस्म की चुनौती सामने आई है।मोदी स्वयं अस्मिता की पैदाइश थे और अंत में स्वयं अस्मिता के खिलाफ खड़े हुए। कहने का अर्थ है अस्मिता हमेशा अस्मिता को ही खाती है। मोदी ने हिन्दुत्व की अस्मिता का अंत करके संघ के बड़े प्रकल्प का समापन किया है।

लोकसभा चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि अस्मिता की राजनीति जा रही है और आक्रामक नव्य उदारीकरण की राजनीति आने वाली है। यह राजनीति से वकील,दलील और प्रतिवाद के अंत की शुरुआत है।

मायावती का जाना, लालू-नीतीश का पराभव ,मोदी का विकास को प्रमुख और हिंदुत्व को प्रच्छन्न बनाना नए किस्म के नजरिए और लामबंदी की मांग करता है।उल्लेखनीय है राममंदिर आंदोलन से अस्मिता की राजनीति परवान चढ़ी थी और संघ के मोदी प्रकल्प ने ही अस्मिता की राजनीति का अंत कर दिया है।

मोदी की जीत का सकारात्मक पक्ष है ज्योतिषी झूठे साबित हुए ,नामांकन के दिन को दोष था उसका भी कोई मोदी पर असर नहीं हुआ। कुल मिलाकर ज्योतिषी और ज्योतिष असत्य साबि…

मोदी के गुडियाघर की गुडियाएं

मोदी पर मुग्ध औरतें फेसबुक में कम हैं लेकिन मतदाताओं में ज्यादा हैं। सवाल यह है कि भाजपा को औरतों के वोट क्यों मिलते हैं,जबकि यह खुला सच है  औरतों के बारे में मोदी के आधुनिक विचार नहीं हैं। फेसबुकपर सक्रिय मोदीभक्त औरतें वैज्ञानिक विवेचना की अपेक्षा आसपास के लोगों की बातों से ज्यादा प्रभावित हैं।    मोदीभक्त औरतों में बड़ा अंश उन औरतों का है जो अपने लिए रक्षक चाहती हैं। स्त्री की स्वतंत्र,मुक्त और स्वायत्त भूमिका को अस्वीकार करती हैं। ये वे औरते हैं जो आज्ञा-पालन के समय स्वतंत्र रहने का दिखावा करती हैं। अन्य अवसरों पर शांत रहने का दिखावा करती हैं। इनमें एक वर्ग ऐसी औरतों का भी है जो निरंकुशता और अत्याचार को अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर स्वीकार करती हैं। इनमें वे औरतें भी हैं जो कहने को किताबों का सम्मान करती हैं लेकिन शब्दों के अर्थ समझे बिना पन्ने पलटती रहती हैं। वे मोदी पर बोल रही हैं लेकिन मोदी की राजनीति को बिना जाने, मोदी और संघ के स्त्री के प्रति अनुदार नजरिए को बिना जाने। ये असल में मोदी के गुडियाघर की गुडियाएं हैं।     जो औरत मोदी के मुखड़े में देश का मुखड़ा देख रही है उनके बारे…

मोदी की हिमायती औरतें

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नरेन्द्र मोदी पर हमारी आलोचनाएं राजनीतिक हैं। उन सभी आलोचनाओं का एक आयाम राजनीतिक है तो दूसरा आयाम सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक है। असल में मोदी की आड़ में हम सबके मन में पितृसत्ता विचारधारा फल फूल रही है । यह सबसे घृणित विचारधारा है। यह उस समय और भी खतरनाक होती है जब कोई स्त्री जाने-अनजाने पितृसत्ता की हिमायत करे। मोदी की हिमायत अंततः पितृसत्ता की हिमायत है। 
मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों का साक्षात प्रतिनिधि रुप है। पितृसत्ता के लिबरल रुपों और अनुदार रुपों में इस चुनाव में सीधी टकराहट है। राहुल गांधी-सोनिया गांधी पितृसत्ता के लिबरल रुपों के प्रतिनिधि हैं। इसके विपरीत मोदी पितृसत्ता के अनुदार रुपों के नुमाइंदे हैं। इन दोनों में यह वैचारिक अंतर हमें लिबरल को चुनने की ओर ठेल रहा है। पितृसत्तात्मक लिबरल विचारधारा अंततः संकट की घड़ी में स्त्री विरोधी या स्त्री समर्थक हो सकती है। समस्या यह है कि किस तरह का सामाजिक दबाव पैदा करते हैं। शाहबानो केस के समय कट्टरपंथी मुसलमानों का दबाव था और लिबरल पितृसत्ता को हमने स्त्री विरोधी भूमिका अदा करते देखा। राजीव गांधी ने शाहबानो और मुसलिम औरतों…

अस्मिता ,वर्चस्व और अमेरिकी जेल व्यवस्था

अमेरिका ने अपने देश में इस तरह की संस्कृति निर्मित की है जिसमें पुलिस और न्याय की हिंसा सामान्य और वैध लगती है। जिस तरह हमारे देश में आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज करना आमलोगों को वैध लगता है वैसे ही अमेरिकी समाज में भी पुलिस की हिंसा और आतंक को मीडिया प्रचार ने वैध बनाया है। सामान्य नागरिकों पर की गई पुलिस हिंसा को आजकल अमेरिका में लोग नॉर्मल एक्ट की तरह लेते हैं। एक जमाना था कि साधारण सी पुलिस कार्रवाई पर सारा देश हुंकार भर उठता था लेकिन लेकिन इन दिनों ऐसा कुछ भी नहीं होता।

आमलोगों में पुलिस के खिलाफ प्रतिवाद की भावना के लोप में मीडिया के रीगनयुगीन मॉडल की केन्द्रीय भूमिका है।यह प्रचार किया गया कि जो पुलिस के खिलाफ प्रचार या प्रतिवाद करते हैं वे क्रिमिनल हैं। यह भावना पैदा की गयी है कि पुलिस के खिलाफ वे ही लोग ज्यादा हल्ला मचाते हैं जो गलत धंधा करते हैं। ये ही लोग कानून तोड़ते हैं, नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं , गुण्डागर्दी करते हैं या हिंसा करते हैं ,आदि।

प्रसिद्ध मार्क्सवादी मीडिया सिद्धांतकार बौद्रिलार्द के अनुसार रीगनयुगीन अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में सीनिरियो या परिदृश्य …

मोदी का गरीबप्रेम

भारत में एक विषय है जिस पर मध्यवर्ग से लेकर संसद तक ,नेताओं के बयानों से लेकर सरकारी सर्कुलरों तक अ-गंभीर भाव दिखता है वह है गरीबी। गरीबी की इन सबकी अपनी-अपनी व्याख्याएं और परिभाषाएं हैं।इन सभी व्याख्याओं में गरीबी से जान छुडाने  का भाव है । लेकिन गरीबी पीछा छोडने को तैयार नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इन सबकी गरीबी से लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। 
      हाल ही में गुजरात के गरीबभक्त नरेन्द्र मोदी की सरकार का गरीबप्रेम उजागर हुआ है।गुजरात में  गांवों में 324 रुपये और शहर में 501 रुपये से ज्यादा कमाने वालों को गरीब नहीं माना जाता। यानी 11 रुपये रोज कमाने वाला ग्रामीण गरीबी रेखा से ऊपर माना जाता है।  'नई दुनिया' में छपी खबर के मुताबिक गुजरात सरकार के खाद्य-आपूर्ति विभाग की ओर से जारी एक निर्देश में कहा गया है कि शहरी इलाकों में 16 रुपये 80 पैसे रोजाना और ग्रामीण इलाकों में 10 रुपये 80 पैसे रोजाना से कम कमाने वालों को ही बीपीएल कार्ड के योग्य माना जाए। 
कुछ अर्सा  पहले केंद्रीय योजना आयोग अपने गरीबप्रेम को उजागर करते हुए बता चुका था कि देश में शहर में 32 रुपये और गांव में 26 र…

बहुलतावाद 'इवेंट' नहीं है नामवरजी !

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हिन्दी आलोचना इनदिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। विधा के रुप में देखने की बजाय इवेंट के रुप में समीक्षा लिखी जा रही है। आलोचना इवेंट नहीं है।वह समाचार भी नहीं है।आलोचना महिमा मंडन या महोत्सव भी नहीं है कि आलोचक को नायक के रुप में पेश किया जाय। लेकिन फिलहाल आलोचना में यह खेल खूब चल रहा है। आलोचना की धुरी है अवधारणा । लेकिन अधिकांश आलोचकों ने अवधारणा में सोचना और लिखना बंद कर दिया है अथवा आलोचना से तदर्थ रिश्ता बना लिया है। फलतः आलोचना में विभ्रमों की बाढ़ आ गयी है। आत्मज्ञान और कॉमनसेंस के आधार पर ज्यादा लिखा जा रहा है । इस प्रवृति को विश्लेषित करने के मेरे सामने दो अवधारणाएं हैं 'वर्गसंघर्ष' और 'बहुलतावाद' । सन् 2001 में नामवर सिंह ने कहा 'कभी-कभी बड़े आलोचक भी आत्मरति के शिकार हो जाते हैं और उनके भी कई अन्धबिन्दु होते हैं।डॉ.रामविलास शर्मा ने सुमित्रानन्दन पन्त पर जो लिखा, वह 'आत्मरति' ही था। इसी प्रकार कार्ल मार्क्स के लिए ' वर्ग संघर्ष' एक ऐसा अंधबिन्दु है ,जिससे परे वे कुछ और देख ही नहीं सके। दुर्भाग्यवश भारत में कई मार्क्सवादियों ने भी उनके …