शुक्रवार, 2 मई 2014

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

अरविन्द केजरीवाल फिनोमिना

25 April 2014 at 21:21
अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने फिर इस्तीफा दिया। फिलहाल वे बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। भारतीय राजनीति के संदर्भ में कई मायनों में यह विलक्षण फिनोमिना है । केजरीवाल ने लंबे समय से परंपरागत राजनीति से भिन्न सामाजिक सरोकारों की वैकल्पिक राजनीति की है। 'सूचना प्राप्ति अधिकार' से लेकर 'जन-लोकपाल बिल' तक विभिन्न मसलों पर आम जनता के विभिन्न तबकों में गंभीर राजनीतिक और वैचारिक प्रचार अभियान चलाया है। उन्होंने आम लोगों को जाग्रत ,संगठित और संघर्ष के लिए प्रेरित करने का काम निस्वार्थ भाव से किया है। यही काम उनकी राजनीतिक पूंजी भी है । 
    केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने स्वयंसेवी संगठनों की संसदीय राजनीति में भाग न लेने की प्रतिज्ञा को तोड़ा है। इस समय देश में तकरीबन 40हजार के करीब स्वयंसेवी सामाजिक संगठन हैं जो विभिन्न मसलों पर आम जनता में विभिन्न सामाजिक स्तरों पर काम कर रहे हैं। इन संगठनों की यह साझा राजनीतिक प्रतिबद्धता रही है कि संसदीय चुनावी राजनीति से दूर रहो, राजनीतिक दबाब समूह के रुप में काम करो और जनता को जाग्रत करो,शिक्षित करो और उसके बुनियादी मसलों पर संघर्ष करो । इन संगठनों की सांगठनिक क्षमता सीमित है,लेकिन संगठनों की संख्या असंख्य है और इनका राजनीतिक दबाब किसी भी बड़े राजनीतिक दल से ज्यादा रहा है ।
    केजरीवाल फिनोमिना को समझने के लिए एनजीओ राजनीति में विगत 25सालों में आए उभार और  विकास को जानना जरुरी है । केजरीवाल फिनोमिना के निर्माण में एनजीओ राजनीति की बहुत बड़ी भूमिका है। एनजीओ संगठनों की राजनीति मूलतःमानवाधिकारों की रक्षा और नागरिकसमाज के निर्माण की राजनीति है । मानवाधिकारों की चेतना के विकास और स्वीकृति दिलाने में एनजीओ संगठनों की केन्द्रीय भूमिका रही है ।
एनजीओ राजनीति का लक्ष्य संसद-विधानसभा या पंचायतें नहीं रही हैं । अधिकांश सक्रिय एनजीओ संगठनों की सामाजिक सक्रियता के प्रमुख विषय  हैं - आम लोगों की जिंदगी में विकास,नए आर्थिक विकास,खेती,बाँध,नहर,प्रकृति,साम्प्रदायिकता ,शिक्षा, साक्षरता,  सूचना प्राप्ति अधिकार,भ्रष्टाचार आदि मसलों की क्या भूमिका है और उनको क्या करना चाहिए । राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली से भिन्न ये संगठन कमोबेश जनता की शिरकत और उनके द्वारा ही फैसले लेने पर जोर देते रहे हैं ।इसने आम नागरिकों में दलीय राजनीतिक संगठनों से भिन्न किस्म का माहौल पैदा किया है ।
      केजरीवाल का राजनीति में आना या आम आदमी पार्टी का जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं है । यह चंद व्यक्तियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की भी अभिव्यक्ति नहीं है। यह कारपोरेट षडयंत्र की दुरभिसंधि का परिणाम भी नहीं है।  आम आदमी पार्टी का उदय असल में स्वयंसेवी संगठनों की जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया का स्वाभाविक परिणाम है । जन-लोकपाल बिल का आंदोलन नहीं भी हुआ होता तो एकदिन इस प्रक्रिया के गर्भ से आम आदमी पार्टी जैसे किसी राजनीतिक दल का उदय होता । जन लोकपाल बिल के आंदोलन ने स्वयंसेवी संगठनों और जनशिरकत की राजनीतिक प्रक्रिया को सघन और तेज बनाया।
केजरीवाल फिनोमिना और आम आदमी पार्टी विचारधाराहीन नहीं है। यह फिनोमिना परंपरागत अर्थ में विचारधारा को नहीं मानता । यह समस्याकेन्द्रित मानवाधिकार परिप्रेक्ष्यों की अभिव्यक्ति है।  परंपरागत राजनीतिक दलों का आम जनता की समस्याओं के प्रति विचारधारा केन्द्रित नजरिया रहा है। मसलन् वे विचारधारा के आधार पर जनता को गोलबंद करते हैं और फिर उसे समस्या के साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। जमता उनके यहां दर्शकीय भूमिका अदा करती है। उनके यहां दर्शक और दाता का भाव है। जनता दर्शक है ,और राजनीतिकदल दाता हैं । जनता अनुयायी और वे नेता हैं।
    नेता जैसे बताए जनता वैसे करे। जनता की राय तब ही ली जाएगी जब नेता कहे या दल कहे। जनता की वही बात नेता या दल मानेगा जो अनुकूल हो । वे ही मसले उठाए जाएंगे जो दल या नेता बताए। उसी परिप्रेक्ष्य में लड़ाई लड़ी जाएगी जो दल या नेता ने तय कर दिया है। इसी फ्रेमवर्क में परंपरागत राजनीतिक दल निचले स्तर पर काम करते रहे हैं । इसके कारण जनता और दल या नेता के बीच में असमान संबंध बना है। इकतरफा कम्युनिकेशन हुआ है। बेमेल और स्वार्थी भ्रष्ट रिश्ता बना है। इस रिश्ते में ईमानदारी,जनशिरकत,मानवाधिकारों की चेतना,लोकतांत्रिक मानवीय व्यवहार और आचरण की कोई जगह नहीं रही। इस प्रक्रिया के कारण 20वीं सदी के उत्तरार्ध में निर्मित लोकतंत्र की सभी बुनियादें नष्ट हो गयीं। यह लोकतंत्र का सर्वसत्तावादी मार्ग है।
   लोकतंत्र के सर्वसत्तावादी मार्ग पर चलने के कारण हमारे संविधान में चित्रित सपने का अंत हो गया । संविधान,लोकतंत्र,धर्मनिरपेक्षता,समाजवाद मखौल,हास्य-व्यंग्य की विषयवस्तु में तब्दील हो गया । हमारे यहां  राजनीतिक सर्वसत्तावाद को धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीय एकता बनाम सामाजिक विभाजन, वामपंथी बनाम दक्षिणपंथी,प्रगतिशील बनाम प्रतिक्रियावादी ,धर्मनिरपेक्षता बनाम छद्म धर्म निरपेक्षता, एक परिवार का शासन बनाम कांग्रेसविरोध,संघ बनाम कांग्रेस,लोहिया बनाम नेहरु आदि विभिन्न केटटेगरी में वर्गीकृत किया और पैंसठ सालों से इन्हीं ध्रुवीकरणों में बाँधकर राजनीति का मूल्यांकन करते रहे । राजनीतिक सर्वसत्तावाद को हमने कभी निशाना नहीं बनाया। इस मामले में वामदलों से लेकर दक्षिणपंथी भाजपा तक सभी दल लोकतंत्र के नाम पर सर्वसत्तावाद का ही किसी न किसी रुप में अनुकरण करते रहे हैं ।
लोकतंत्र के आवरण में पल्लवित सर्वसत्तावाद ने लोकतंत्र की अपूरणीय क्षति की है। मसलन् कांग्रेस को यही सर्वसत्तावाद आपातकाल तक ले गया। भाजपा को2002 के गुजरात जनसंहार,अकालीदल को आतंकवाद-पृथकतावाद,शिवसेना को साम्प्रदायिकता,द्रमुकदलों को अंध क्षेत्रीयतावाद,वामदलों को निरुद्योगीकरण और पार्टीतंत्र की सत्ता-महत्ता तक ले गया । आमतौर पर लोकतंत्र पर बातें करते  समय हमने स्वतंत्र और स्वतःस्फूर्त जनशिरकत की सभी संभावनाओं को खत्म करके नियोजित लोकतंत्र में अपने राजनीतिक तंत्र का रुपान्तरण कर दिया । कमोबेश यह प्रक्रिया सभी दलों में घटित हुई ।
   केजरीवाल फिनोमिना राजनीतिक सर्वसत्तावाद को एकसिरे से खारिज करता है । जो लोग आम आदमी पार्टी को विचारधाराहीन होने का लेबिल लगा रहे हैं वे नहीं जानते कि राजनीति के जितने भी प्रचलित दलीय रुप हैं वे स्वयं में समस्याग्रस्त हैं। उनके पास अपनी सीमाओं से निकलने का कोई मार्ग नहीं है। मसलन्, भाजपा हो वामदल हों किसी के पास जनशिरकत को सुनिश्चित करने वाली न तो धारणा है और न सांगठनिक संरचनाएं ही है ।
   केजरीवाल फिनोमिना नियोजित जनता, पैसा देकर,दादागिरी या दबाब के जरिए जुटायी गयी जनता से भिन्न स्वतःस्फूर्त्त शिरकत करने वाली जनता की धारणाओं के आधार पर पैदा हुआ राजनीतिक फिनोमिना है । जिस गति से आम आदमी पार्टी से आमलोग सदस्यता ले रहे हैं वह अपने आप में विलक्षण  फिनोमिना है । किसी भी लोकतांत्रिक देश में किसी दल के साथ इतनी बड़ी तादाद में और इतने कम समय में आम लोगों ने दलीय मेम्बरशिप नहीं ली है । आम आदमी को जोड़ने की रणनीतियों को आम आदमी पार्टी सुगम और सर्वसुलह बनाया है । बिना किसी मध्यस्थ के आप सीधे सदस्यता ले सकते हैं ।अब दल है और जनता है। इन दोनों के बीच नेता नामक तत्व का लोप हो गया है । मसलन् आप फोन करें,एसएमएस करें.ऑनलाइन भरे और सदस्यता मिल जाएगी। सदस्यता लेने का यह तरीका प्रत्यक्षतः नेता की विदाई का आख्यान कह रहा है । पहले किसी भी दल का सदस्य होने के लिए नेता या कार्यकर्ता को पकड़ना पड़ता था और वही मेम्बरशिप दिलाता था लेकिन आम आदमी पार्टी ने इस समूचीप्रक्रिया को पारदर्शी और जनसुलभ बनाकर सर्वसत्तावादी राजनीति की बुनियाद में मट्ठा डाल दिया है ।
     सर्वसत्तावादी राजनीति की नींव सदस्य बनाने के नियम से बुनियादी तौर पर जुड़ी है । परंपरागत दलों में सदस्य बनने के लिए नेता या कार्यकर्ता से मिलना जरुरी था, यही नेता जनता और दल के बीच मध्यस्थ या सेतु होता है। यह राजनीति का सबसे भ्रष्ट तत्व है और यही सर्वसत्तावादी राजनीति की धुरी है । यहीं से दलाल पैदा हुआ है। कोई भी काम कराना हो तो इसी मीडिलमैन को पकड़ना होता है । मंत्री,सांसद,विधायक औदि तब कार्य करते हैं जब कोई मिडिलमैन आपके साथ हो। विगत 65 सालों में इसी मिडिलमैन ने विभिन्न स्तरों पर दलाल की भूमिका अदा की और आज यह हर दल में सबसे ज्यादा ताकतवर है। मसलन् सोनिया गांधी या नरेन्द्र मोदी से ज्यादा ताकतवर इनके मिडिलमैन हैं । आम आदमी पार्टी ने अपनी पार्टी सदस्यता को सरल-सुगम और सर्वसुलभ कराकर नेता की विदाई करके सदस्यता को जनशिरकत के पैराडाइम में ले जाकर खड़ा कर दिया है । यह सर्वसत्तावादी राजनीति के अंत की घोषणा भी है । 
   केजरीवाल फिनोमिना ने आम जनता की उम्मीदों को नए शिखर दिखाए हैं। आम आदमी बहुत उम्मीदें कर रहा है। उम्मीदें जगाना नई बातनहीं है, हर आंदोलन या नए राजनीतिक नारे के साथ जनता में उम्मीदें जगती रही हैं। लेकिन केजरीवाल से उम्मीदें अलग किस्म की आशाएं लेकर आई हैं और नए राजनीतिक संबंध को लेकर आई हैं । परंपरागत राजनीतिकदलों की जीत के साथ यह उम्मीद रहती थी  हमने वोट दे दिया अब तुम काम करो, हम पाच साल बाद देखेंगे। पांच साल बाद मूल्यांकन करेगे। मतदाता यह मानकर चलता है कि हमने वोट दिया और हमारा काम खत्म और अब नेता की जिम्मेदारी है वह अपना वायदा निभाए। इस इकतरफा संबंध को आम आदमी पार्टी ने उलट दिया है ।
    आम आदमी पार्टी बार-बार हर बड़े मसले पर जनता में जाने,जनता की राय लेने, सबकुछ जनता के बीच में साफगोई के साथ पेश करने पर जोर दे रही है । वे जो भी फैसला लेते हैं टीवी लाइव कवरेज के जरिए आम जनता में सीधे सम्प्रेषित करते हैं । इंटरनेट पर सभी फैसलों की जानकारी देते हैं । जनशिरकत को महत्व देते हुए सत्ता में जाने का फैसला दिल्ली के मुहल्लों में सभाएं करके किया। 
       विगत तीन दशकों में देश के विभिन्न हिस्सों में स्वयंसेवी संगठनों का जिस तरह नेटवर्क उभरकर सामने आया है और उसने मीडिया और समाज में विभिन्न समयों पर जो नए किस्म के लोकतांत्रिक राजनीतिकबोध और मानवाधिकारकेन्द्रित राजनीतिक प्रक्रिया को जन्म दिया है उससे स्थानीय स्तर पर मीडिया भी प्रभावित होता रहा है । उल्लेखनीय है कि मीडिया में स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवी संगठनों के संघर्षों का कवरेज बराबर आता रहा है। यहां तक कि अनेकबार इस कवरेज ने राष्ट्रीय मीडिया में भी प्रमुखता के साथ स्थान बनाया है ।
      केजरीवाल फिनोमिना पर विचार करते समय हमें भारत के बदलते सार्वजनिक माहौल (पब्लिक स्फेयर) पर गंभीरता से विचार करना चाहिए । विगत30सालों में टेलीविजन और इंटरनेट ने आम आदमी के संपर्क,संबंध और संप्रेषण के तौर-तरीकों ने नए किस्म के जीवन संबंधों और जीवनशैली को जन्म दिया है । टेलीविजन और इंटरनेट जहां पर भी पहुँच रहे हैं वहां पर पुराने नजरिए में बदलाव आना शुरु हुआ है । दुनिया को देखने और समझने का संस्कार बदला है । इससे राजनीतिकदलों और जनता के संबंधों में बदलाव आया है। सार्वजनिक बहस के मुद्दे अब वे हैं जिनको मीडिया (टीवी-इंटरनेट) प्रमुखता से पेश करता है।
     प्रेसयुग से इलैक्ट्रोनिक युग में दाखिल होने के साथ भारत ने तेजी से साइबर युग में प्रवेश किया। टेलीविजन क्रांति के चंद वर्षों बाद ही कम्प्यूटर क्रांति और बाद में साइबरक्रांति में आम जनता दाखिल हो गयी । इसने परंपरागत राजनीति और उसके जनता से जुड़ने, संवाद करने और जनता को गोलबंद करने के पुराने तरीकों को एक ही झटके में बदल दिया ।राजनीति और सामाजिक सत्य के बीच में तनाव को सघन बना दिया ।
    टेलीविजन युग आने के पहले तक राजनीति और सामाजिक सत्य में परंपरागत अनुकरणवादी संबंध होता था ।यह संबंध स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रियाओं से निर्देशित होता था। लेकिन टेलीविजन आने के बाद से राजनीति और सामाजिक सत्य का संबंध गुणात्मक तौर पर बदल गया ।
     पहले राजनीतिक दल सामाजिक  सत्य को अनुभवों और अनुमानों के आधार पर पेश करते थे। टेलीविजन आने के राजनीतिविज्ञान के नियमों का प्रयोग बढ़ा। धीरे धीरे हम चुनावी भविष्यवाणियों के दौर में दाखिल होते हैं। जनमतसंग्रह के दौर में दाखिल होते हैं। चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण और चुनाव के बाद जनमत संग्रह की प्रक्रिया में दाखिल होते हैं । इसने राजनीति को अनुमानों से परे ले जाकर राजनीतिविज्ञान के ठोस चिंतन और नए किस्म के सोच-विचार के तंत्र के साथ जोड़ा। वहीं दूसरी ओर स्वयंसेवी संगठनों ने जमीनी स्तर पर तथ्यसंग्रह करके राय बनाने की पद्धति का ईमानदारी से पालन किया और उनको बेहतर सामाजिक-राजनीतिक परिणाम मिले । पहलीबार राजनीतिविज्ञान को लोकतंत्र की सेवा में लगाया गया। परंपरागत दलों ने राजनीति का इस्तेमाल किया है राजनीतितविज्ञान का नहीं । स्वयंसेवी संगठनों और जनमत सर्वेक्षण करने वालों ने राजनीतिविज्ञान और लोकतंत्र के बीच में नए रिश्ते का आरंभ किया। इससे लोकतंत्र और राजनीति दोनों को समझने में बहुत बड़ी मदद मिली है । राजनीति के सत्य को विज्ञान के जरिए जानना और फिर राजनीति में  परिवर्तन की ओर ध्यान गया ।
      परंपरागत तरीके से राजनीति करने वाले दलों का जनता के साथ अन्तर्विरोध बढ़ा। परंपरगत दल समझ ही नहीं पा रहे हैं कि जनता के सत्य को कैसे जानें और उसमें निहित समस्याओं के समाधान कैसे करें । इसका दुष्परिणाम यह निकला कि परंपरागत राजनीतिकदल लगातार अपनी साख खोते चले गए । वे राजनीति तो कर रहे थे लेकिन राजनीतिविज्ञान को जाने और माने बिना । राजनीतिकदल यदि राजनीतिविज्ञान की मदद से देश को समझने की कोशिश करते तो देश और दलों की प्रकृति ही कुछ और होती । मसलन् राजनीतिक दलों ने कभी भी किसी भी समस्या के वैज्ञानिक कारणों को जानने और उसके अनुसार समाधान खोजने का काम नहीं किया। बार-बार समस्या आने के बाद  तदर्थ समाधान खोजे गए और यह मान लिया गया कि अब समस्या को बेहतर ढ़ंग से हल कर लिया जाएगा। लेकिन समस्या इससे और जटिल बनी है। मसलन् बलात्कार के खिलाफ हुए निर्भयाकांड विरोधी आंदोलन को ही लें इस आंदोलन के दबाब में जो कानूनी बदलाव किए गए हैं वे समस्या की विकरालता और व्यापकता को बुनियादी तौर पर देख  ही नहीं पाते। बलात्कार की घटना को रोकने के लिए कानूनी बदलाव एक सीमित कदम है असल में हमें बलात्कार की जडों को नष्ट करने  बारे में सोचने की जरुरत है । बलात्कार की जड़ों को राजनीतिविज्ञान की मदद के बिना समझना मुश्किल है।
      हमारी अब तक की राजनीतिक प्रक्रिया और दलीय राजनीति आम जनता को लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की सत्ता-महत्ता का बोध पैदा कराने में असफल रही है।राजनीतिकदल आम जीवन का लोकतांत्रिकीकरण करने में असफल रहे हैं । आम जीवन के लोकतांत्रिकीकरण के अभाव के कारण ही हमें तमाम सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं से आज मुठभेड़ करनी पड़ रही है । हमारे देश में लोकतंत्र को आए 65साल हो गए लेकिन आज भी हम आम नागरिक को लोकतांत्रिक अधिकार क्या होते हैं ? वे क्यों जरुरी हैं ?लोकतांत्रिक मूल्य क्या हैं और उनको समृद्ध करना क्यों जरुरी है ,यह समझा नहीं पाए हैं ।
    हमारे देश में लोकतंत्र है लेकिन जनता में लोकतांत्रिकबोध,लोकतांत्रिक मूल्य और लोकतांत्रिक व्यवहार एकसिरे से गायब है । यह अजीब आयरनी है कि देश को बचाने के काम को लोकतंत्र बचाने के लक्ष्य से पृथक करके देखने वालों की संख्या बहुत है । देश की एकता और अखंड़ता किसी मनोभाव विशेष या देशज उन्माद पर निर्भर नहीं करती । हमने देश और लोकतंत्र की अन्तर्ग्रथित समझ का कभी प्रचार प्रसार ही नहीं किया । हमेशा यही संदेश दिया है कि देश का मतलब दल विशेष या परिवार विशेष या नेताविशेष या धर्म विशेष का शासन है । भारत का मतलब न तो कांग्रेस है,नहीं हिन्दुओं का देश है और नहीं राजनीतिक दल विशेष का देश है ।
     लोकतंत्र में नागरिक महत्वपूर्ण होता है। नागरिक अधिकार महत्वपूर्ण होते हैं।नागरिक अधिकारों का संरक्षण और पल्लवन करने वाली संस्थाएं महत्वपूर्ण होती हैं । नागरिक मान-मर्यादाएं और नागरिक संस्कार महत्वपूर्ण होते हैं। हमारा समूचा समाज अभी तक जातिगत और धार्मिक संस्कारों के दायरों में बंद है,हमने आम आदमी को कभी इन बंद दरवाजों की कैद से बाहर निकालकर जानने –समझने की कोशिश नहीं की । हमने उसमें कभी नागरिकबोध पैदा नहीं किया। केजरीवाल फिनोमिना का महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु यही है। वह व्यक्ति को जाति और धर्म की पहचान की कैद से एक ही झटके में मुक्त करके नए पैराडाइम में ले जाने में सफल हुआ है ।
    केजरीवाल फिनोमिना  ने राजनीतिकदलों की अनुमान पर आधारित राजनीति और विभिन्न समस्याओं पर अनुमान आधारित बयानबाजी से आगे निकलकर तथ्यपूर्ण बयानबाजी और शोधपरक बयानबाजी को महत्ता दी, राजनीतिक दलों को राजनीतिविज्ञान के अनुसार प्रत्येक विषय पर अनुसंधान करने,किसी भी समस्या को उठाने के पहले  उस पर रिसर्च करने का तरीका पेश करके राजनीति के व्यवहार को राजनीति के विज्ञान से जोड़ा है । मसलन्, जनता की समस्या विशेष को उठाने के पहले उसकी जड़ों तक तहकीकात करना और उस समस्या पर उठाए गए सभी कदमों को विभिन्न पहलुओं से समझने का काम किया है। यह पद्धति जनलोकपाल बिल पर बहस के दौरान बहुत ही सटीक ढ़ंग से सामने आई है।
      केजरीवाल फिनोमिना ने उन तमाम स्वयंसेवी संगठनों को संसदीय जनतंत्र में शिरकत करने और संसदीय मंचों पर अपनी जगह बनाने की संभावनाओं को खोला है। आज विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों के कार्यकर्त्ता आम आदमी पार्टी में बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं और वे लोग भी शामिल हो रहे हैं जो पहले किसी न किसी राजनीतिक दल में थे लेकिन अपने को कुंठित और निराश महसूस कर रहे थे और सामाजिक हस्तक्षेप के लिए छटपटा रहे थे । इससे सामाजिक तौर पर राजनीति को लेकर निराशा का वातावरण टूटा है । राजनीति में शिरकत बढ़ी है। वे तमाम ईमानदार लोग जो एक समय राजनीति को लेकर निराश थे,अपने को हस्तक्षेप करने में असमर्थ महसूस कर रहे थे वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं और यही वे लोग भी हैं जो आम आदमी पार्टी के गठन के पहले जनलोकपाल बिल पर चल रहे अन्ना आंदोलन में शिरकत कर रहे थे ।
   केजरीवाल फिनोमिना इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने 'अ-राजनीति¬' की राजनीति के बहाने उन तमाम लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जो राजनीति को बुरा समझते थे । इसके साथ पापुलिज्म के सभी रुपों और पापुलिज्म के खेल में शामिल सभी रंगत के लोगों के साथ अपने संपर्क-संबंधों को खुला भी रखा । मसलन् , कश्मीर के सवाल पर जनमत संग्रह की मांग करना भी सही है और राष्ट्रीय एकता की बात कहना भी सही है । यह मिला-जुला नजरिया आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ सहयोगी का है । वे नागरिक अधिकारों की रक्षा के तहत इस नजरिए का प्रचार करते रहे हैं । राष्ट्रीय एकता के नाम पर वे देश के देशभक्तों को भी सम्बोधित कर रहे हैं और जनमत संग्रह के नाम पर कश्मीरी पृथकतावादियो को भी सम्बोधित कर रहे हैं । उसी तरह आम आदमी पार्टी के समर्थक अनेक नेता हैं जो सिंगूर-नंदीग्राम के सवाल पर वामदलों का विरोध करते रहे हैं जिससे वे पश्चिम बंगाल में चल रहे पापुलिज्म को भी भुना रहे हैं  और पश्चिम बंगाल के बाहर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वामदलों के साथ भी संगति बनाए रखते हैं । यही हाल माओवादी संगठनों को लेकर है। मूल बात यह है कि आम आदमी पार्टी में शामिल नेतागण पापुलिज्म को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पापुलिज्म के साथ जुड़े रहने का एक नमूना निर्भयाकांड पर दिल्ली में चला बलात्कार विरोधी जनादोलन है। इस आंदोलन को राजनीतिक तौर पर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने पूरी तरह भुनाया ।
      दिलचस्प बात यह है कि निर्भयाकांड आंदोलन जब चल रहा था तो उनसे जुड़े लोग लोग जो इंडिया अगेंस्ट करप्शन,जन लोकपाल बिल आंदोलन आदि नामों से विभिन्न संगठनों में काम कर रहे थे। उन लोगों ने निर्भयाकांड के बाद जब आम आदमी पार्टी बनायी तो उसके बाद दिल्ली में विगत सवा साल में बलात्कार की घटनाओं में बेशुमार वृद्धि हुई है लेकिन उन्होंने कोई जुलूस तक नहीं निकाला,कोई आंदोलन नहीं किया,यहां तक कि किसी बलात्कार पीड़ित महिला को जाकर सांत्वना देने या उसके संबंध में बयान तक जारी नहीं किया। दिल्ली और उसके बाहर सभी किस्म के आंदोलनों से जुड़ना और पापुलिज्म की पिच को बनाए रखना यही उनका लक्ष्य रहा है । अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के सवाल पर उन तमाम लोगों ने आपत्ति की थी जो इन दिनों आम आदमी पार्टी में जाने का प्रयास कर रहे हैं । यही हाल हरियाणा की बदनाम खाप पंचायत को लेकर है । 
     समस्या यह है कि आम आदमी पार्टी में ऐसे लोग आ रहे हैं जिनके विभिन्न राष्ट्रीय या क्षेत्रीय सवालों पर अलग-अलग नजरिए रहे हैं और वे तेजी से आम आदमी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। ऐसे लोगों के आम आदमी पार्टी में शामिल होने के पहले के नजरिए और शामिल होने के बाद के नजरिए में अंतर करना होगा ,समस्या यह है कि विभिन्न मसलों पर आम आदमी पार्टी का नीतिगत रुख अभी साफ होना बाकी है। होसकता है आम आदमी पार्टी के सुसंगत नजरिए के आने के बाद विभिन्न मतावलम्बी लोग अपने को आम आदमी पार्टी के नजरिए में बांध लें,यदि वे अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण पर कायम रहते हैं तो आम आदमी पार्टी को भविश्य में बिखरने से कोई नहीं बचा सकता । आम आदमी पार्टी को समझना होगा कि स्वयंसेवी संगठन और राजनीतिक दल की कार्यप्रणाली और राजनीतिक जिम्मेदारी में अंतर है।
स्वयंसेवी संगठनों में एक बड़ा हिस्सा है जिसकी भारत के संविधान और संसद में कोई आस्था नहीं है। वे संविधान को नहीं मानते । फलतः वे दलीय राजनीति का विरोध करते हैं । स्वयंसेवी संगठन होने के नाते वे लोकतांत्रिक संरचनाओं में जबावदेही से मुक्त हैं । वे देश की नीतियों के बंधनों से मुक्त हैं,वे प्रशासनिक आदेशों से बंधे नहीं हैं ।
      आम आदमी पार्टी बन जाने के बाद केजरीवाल राजनीतिकदल की भूमिका से बंधने के लिए बाध्य हैं। वे उन नीतियों को मानने को बाध्य हैं जो संसद द्वारा स्वीकृत हैं। वे उन कन्वेंशनों और परंपराओं को मानने को बाध्य हैं जो एक राजनीतिकदल पर लागू होती हैं,वे उन नियमों को मानने को मजबूर हैं जो मुख्यमंत्री पर लागू होते हैं ।
    एनजीओ  स्वयंसेवक के पास अनंत स्वतंत्रता होती है,लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती,वे अपने संगठन और अपने विचार के सर्वतंत्र स्वतंत्र नेता होते हैं। लेकिन मुख्यमंत्री और राजनीतिक दलों के लिए स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है और केजरीवाल को उसी लक्ष्मणरेखा में रहकर काम करना होगा ।
    समग्रता में देखें तो हर हालत में पापुलिज्म के साथ जुड़ना और अपने जनाधार का विस्तार करना यही आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं की आम आदमी पार्टी के गठन के पहले रणनीति रही है और यह रणनीति आज उनको मदद कर रही है विभिन्न रंगत के लोग तेजी से आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले रहे हैं ।अनेक लोग ऐसे भी हैं जो बिना जाने-बिना सोचे भी सदस्यता ले रहे हैं ।
   केजरीवाल फिनोमिना की सबसे बड़ी खूबी है कि उसने जनता के प्रासंगिक सवालों को केन्द्र में रखा है और एकाग्रभाव से उसको बार-बार मीडिया और इंटरनेट के जरिए प्रचारित किया है । इसके कारण उनके बारे में यह राय भी बनी है कि 'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल'। 
'बात तो ठीक कह रहा है केजरीवाल' मुहावरा आमलोगों में चल निकला है। कस्बों और देहात में आमलोग कुछ इसी तरह मुहावरे में केजरीवाल फिनोमिना पर चुटकियां लेते नजर आ रहे हैं । केजरीवाल फिनोमिना का आम जनता का मुहावरा बन जाना और 'आम आदमी' नाम पर विगत कई सालों में कांग्रेस के प्रचार अभियान को अपनी प्रचारकला में शामिल करके इस्तेमाल कर लेना,एकदम विरल घटना है। 'आम आदमी का हाथ ,कांग्रेस के साथ' का नारा कांग्रेस की सबसे ताकतवर कैम्पेन का हिस्सा रहा है सन् 2009 के चुनाव के समय और धीरे धीरे कांग्रेस इस नारे को भूल गयी और आम आदमी पार्टी ने इस कैम्पेन पर अप्रत्यक्षतौर पर वैचारिक हमला करके इस नाम (आम आदमी) के साथ जुड़ी जनप्रियता को सीधे अपने पक्ष में करलिया । मीडिया और आम जनता में प्रचार में यदि उन पदबंधों का इस्तेमाल किया जाए जिन पर विज्ञापनबाजी हो चुकी है और मीडिया का पर्याप्त कवरेज आता रहा है तो पदबंध की जनप्रियता का बहुत जल्द लाभ उठाया जा सकता है । केजरीवाल एंड कंपनी ने यही किया है। उन्होंने 'आम आदमी ' की जनप्रियता को देखकर ही अपने दल का नाम आम आदमी पार्टी रखा। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में मीडिया कवरेज के चरित्र की उपेक्षा करके कोई बात नहीं हो सकती। न्यूज टेलीविजन चैनलों ने विगत 5 सालों में खबरें कम राष्ट्रीय उन्माद ज्यादा पैदा किया है । मेनीपुलेशन को महामीडियम और संप्रेषक बनाया है। अब हम देखते हैं और दौडते हैं , सोचते नहीं हैं । टीवी का महा मंत्र है मध्यवर्ग को हाँको। अविवेक को महिमामंडित करो। शार्टकट को मूल्यवान बनाओ। ये सभी डिजिटल स्क्रीन मेनीपुलेशन के आधारसूत्र हैं । इनको हम टीवी और इंटरनेट कवरेज के रुपों जैसे अन्ना का हठ,बाबा रामदेव का योग,मोदी का महामोह और अब आप पार्टी  के ' लोकतंत्र मुक्तियज्ञ' में देख सकते हैं । हाँको का अहर्निश पुरश्चरण और इन सबके पीछे मध्यवर्ग को हाँककर ले जाने की परिणतियों पर गंभीरता सोचने की जरुरत है।
     भारत का लोकतंत्र, मध्यवर्गीय शार्टकट और नीतिहीनता की देन नहीं है। यह लंबे संघर्ष और गंभीर नीति विमर्शों के गर्भ से पैदा हुआ है। जो लोग शार्टकट में समाधान तलाश रहे हैं वे जान लें शार्टकट  में किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है। जो कहता है कि मैं एक्शन करुँगा मुझे सत्ता दो,उससे ठहरकर बातें करो, नीतियों के बारे में पूछो और तसल्ली से सोचो फिर राय बनाओ। तसल्ली के साथ सोचे बिना लोकतंत्र समृद्ध नहीं होता । शार्टकट मध्यवर्गीय रुमानी राजनीतिक रास्ता हमेशा सामाजिक-राजनीतिक विभाजन और हिंसा की ओर ले जाता है । इसके अनेक उदाहरण विगत 65 सालों में देखे गए हैं।  
     मध्यवर्ग की अनालोचनात्मक और शार्टकट में सबकुछ पाने की मनोदशा का टीवी चैनलों ने बड़ी बारीकी से दोहन किया है । अन्ना के पीछे मध्यवर्ग क्यों था ? क्योंकि वह शार्टकट में परिणाम चाहता था।मोदी पर बलिहारी क्यों है ?क्योंकि शार्टकट में बिना सोचे समझे एक्शन का नायक लग रहा है। "आप " पार्टी या केजरीवाल क्यों मुग्ध कर रहा है ?क्योंकि जल्दी से भ्रष्टाचार खत्म कर देनेवाली जादुई झाडू उसके पास है !
     टीवी एंकरों से लेकर समाचार संपादकों तक यह विभ्रम फैला हुआ है कि जल्दी-जल्दी सामाजिक परिवर्तन कर रहे हैं । दो मिनट में 100 या 50 या 25 खबरें देने वाले समाचार मूल्य निर्माता कैसे हो सकते हैं ? जिनके पास समाचार के लिए स्पेस नहीं है वे हमें सिखा रहे हैं कि जीवन के हल स्पीड न्यूज की तरह खोजो , नेता की हेडलाइन देखो और उसके पीछे चलो!
      टेलीविजन ने नीतिविहीन शब्दवीर नेताओं को महिमामंडित किया है और यह बेहद खतरनाक पक्ष है। अन्ना,मोदी,बाबा रामदेव,केजरीवाल सबकीशब्दवीरता के नए नए बाइटस दिखाकर मध्यवर्ग की विवेकहीन मनोदशा का जमकर दोहन किया जा रहा है । जो लोग यह मानते हैं कि मध्यवर्ग के अधिकांश लोग पढे-लिखे होते हैं ,अक्लमंद होते हैं। उनसे मैं असहमत हूँ।
     मध्यवर्ग कितना अक्लमंद है यह देखना हो तो इसवर्ग की बिना सोचे-समझे विकास कर रही समूची युवापीढ़ी को देखो,यह देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरुरत नहीं है अपने आसपास के किसी भी कॉलेज-विश्वविद्यालय में जाकर देखो कि हमारा युवा किस रुप में निर्मित हो रहा है ।
    युवाओं और मध्यवर्ग के प्रति  रोमैंटिक और अनालोचनात्मक भावबोध छोड़कर हमें गंभीरता से इस मसले पर हस्तक्षेप करने की जरुरत है ।शार्टकट मानसिकता और टेलीविजन उन्माद के बीच बन रहे मध्यवर्गीय सोच के तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने की जरुरत है । मध्यवर्ग या टेलीविजन जो कह रहा है उसकी अंतर्वस्तु की गंभीरता के साथ समीक्षा करने की जरुरत है।
   टीवी चैनलों ने नीतिविहीनता को महान बनाया है। शोर या टीवी हंगामे को लोकतांत्रिक राजनीति का नाम दिया है । टीवी के टॉक शो या नेता की आमसभा -प्रेस कॉफ्रेस के   लाइव कवरेज से राजनीतिक दलों या नेताओं की प्रासंगिकता तय होने लगेगी तो हम बहुत गंभीर संकट में फंसने जा रहे हैं । अन्ना,मोदी और अब केजरीवाल के बारे में नीतिविहीन ढ़ंग से जिस तरह महिमामंडन चल रहा है वह लोकतंत्र के लिए शुभलक्षण नहीं है।
        नव्य आर्थिक उदारवाद ने ऐसा मध्यवर्ग निर्मित किया है जो किसी गंभीर आलोचनात्मक नीतिगत मंथन में शामिल नहीं होना चाहता वह तो बस चटपट एक्शन चाहता है । जो एक्शन करे ,वह महान है । लोकतंत्र का नायक बनने लायक है। यह मनोदशा लोकतंत्र का नहीं अविवेक और सर्वसत्तावाद का आधार तैयार कर रही है।
     सर्वसत्तावाद की नई रणनीति है विवेक से दूर रहो, नीतियों पर बहस मत करो।वोट दो,एक्शन देखो। क्या कहा जा रहा है ,उस पर सोचो मत। विश्वास करो।जो डिजिटल स्क्रीन पर दिखे वही सत्य है। जो डिजिटल स्क्रीन पर न दिखे ,वह असत्य है।   यानी अब विवेक ,नीति,कुर्बानी,भाईचारा आदि महत्वपूर्ण नहीं हैं डिजिटल स्क्रीन महत्वपूर्ण है ,इसलिए डिजिटल स्क्रीन पर ज्यादा से ज्यादा दिखने की भेड़चाल आरंभ हो गयी है। जिसनेता को जितना ज्यादा दिखाया जा रहा है ,समझो वही नेता महान है ,वही काम का है, वही लोकतंत्र का नायक है। यानी मध्यवर्ग के विवेक को टीवी या इंटरनेट स्क्रीन ने अपहृत कर लिया है और यही वह बिंदु है जहां पर सतर्क नीतिगत वाद-विवाद-संवाद को लोकतंत्र की विभिन्न दृष्टियों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. वर्ल्ड बैंक के इशारे पर वित्तमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा भारत में मजदूर आंदोलन को तोड़ने हेतु NGOs प्रणाली शुरू की गई थी। 40 प्रतिशत अनुदान सरकारी अधिकारी व कर्मचारी बतौर रिश्वत लेकर मज़ा लूटते हैं बाकी 60 प्रतिशत से कोई कुछ कम व कोई कुछ ज़्यादा अपनी जेब में डाल कर दानी व जन-हितैषी बना घूमता है। ऐसे ही NGOs का सरगना है अमेरिका का प्रिय केजरीवाल। उसका समर्थन अप्रत्यक्ष रूप से जन-विरोधी निर्णय है।

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