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गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

डिजिटल अंधकार में मिस्र में मजदूरों का जनज्वार

                   मिस्र में कल शाम को सेना के हमले और मुबारक समर्थकों और विरोधियों की झड़पों में 3 लोग मारे गए हैं और 600 घायल हुए हैं। यह आंकड़ा मिस्र के स्वास्थ्य मंत्रालय ने जारी किया है। मारे गए और घायलों की संख्या इससे कहीं ज्यादा होने का अनुमान है। अमेरिका-ब्रिटेन आदि दोमुँही बातें कह रहे हैं। इसके अलावा चिन्ता की बात यह है कि मिस्र में जनता के प्रतिवादी आंदोलन पर सेना के हमले तेज हो गए हैं । इस प्रतिवाद ने कई चीजों की ओर ध्यान खींचा है।
          मिस्र के जन आंदोलन के प्रतिवाद की धुरी है मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग। बड़ी तादाद में मजदूरवर्ग का सड़कों पर संगठित प्रतिवाद के रूप में उतरना इस बात का संकेत है कि मध्यपूर्व में लोकतांत्रिक संघर्ष की धुरी मजदूरवर्ग ही है। मिस्र के प्रतिवादी आंदोलन में मजदूरों के नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का यह भी मतलब है कि मध्यपूर्व में धार्मिक फंडामेंटलिज्म के अलावा भी जनता के पास धर्मनिरपेक्ष ताकतों का बड़ा मोर्चा है।
      सारा कारपोरेट मीडिया विभ्रम पैदा करता रहा है कि मध्यपूर्व में कोई भी आंदोलन फंडामेंटलिस्टों के बिना नहीं चल सकता। मिस्र के आंदोलन की विशेषता है मध्यवर्ग और मजदूरवर्ग की अगुवाई में लोकतांत्रिक शक्तियों का संगठित उदय और यह चीज अमेरिकी शासकों के लिए असहनीय है। ओबामा के बयान और एक्शन में जमीन-आसमान का अंतर है। दूसरी ओर मध्यपूर्व के सामंती शासकों की मिस्र के प्रतिवाद ने नींद उडा दी है।
    निष्कर्ष के रूप में कहें तो मिस्र की जनता का प्रतिवाद मजदूरवर्ग की फौलादी शक्ति का शानदार प्रदर्शन है और यह मुबारक के सैन्यशासन और अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ मिस्र की जनता की शानदार एकजुट अभिव्यक्ति है।यह इस बात का भी संकेत है कि मिस्र में इस्लाम के होते हुए भी आम जनता में धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक मूल्यों की गहरी जड़ें हैं।समाज लोकतांत्रिक है।    
     मिस्र के मौजूदा जनांदोलन को कुचलने के लिए संचार के आधुनिक नेटवर्क को राष्ट्रपति हुसनी मुबारक ने बाधित किया और सबसे पहले मीडिया पर हमले तेज किए अलजजीरा के काहिरा ऑफिस बंद कर दिया,पत्रकारों पर हमले हुए और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं।
   आम जनता संकट की अवस्था में होती है तो उसे सूचनाओं की ज्यादा जरूरत होती है और वह एसएमएस ,ईमेल ,ट्विट आदि के जरिए जानना चाहती है कि क्या हो रहा है,नाते-रिश्तेदार सकुशल हैं या नहीं । लेकिन जिस समय जनता ने अपना प्रतिवाद तेज किया और प्रशासन के साथ जनता का पंगा तेज हुआ ठीक उसी समय इंटरनेट सेवाएं ठप्प कर दी गयीं। अधिकांश संचार कंपनियों ने मुबारक के सामने समर्पण कर दिया और संचारसेवाओं को ठप्प कर दिया। इससे एक सबक तो यह निकलता है कि कारपोरेट हितों के सामने जनता के हितों का कोई मोल नहीं है।
    जिस समय मिस्र की जनता प्रतिवाद कर रही थी उस समय वहां डिजिटल कनेक्शन कटे हुए थे। डिजिटल अंधकार में जनता का प्रतिवाद नई बुलंदियों पर पहुँचा था। उल्लेखनीय है मिस्र में ब्रिटेन की कंपनी वोडाफोन का बड़ा कारोबार है और इस कंपनी के 45 फीसदी अंश की मालिक अमेरिकी संचार कंपनी वेरीजॉन है, वोडोफोन ने जनता का प्रतिवाद आरंभ होते ही इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं ठप्प कर दीं।
     इसके अलावा बोईंग की सहयोगी कंपनी नारूस ने मिस्र में एक संचार उपकरण की बड़े पैमाने पर बिक्री की है जिसके आधार पर मिस्र की संचार कंपनियां यह पता लगा सकती हैं कि मोबाइल फोन से जो टेक्स्ट मैसेज भेजा जा रहा है वह प्रतिवादी मैसेज है या नहीं। वे यह भी पता लगा सकते हैं कि मोबाइल फोन करने वाला कितनी दूरी से संदेश भेज रहा है और उसके बाद तुरंत उसको पुलिस पकड़ सकती है।
     मिस्र में जिस समय डिजिटल अंधकार चल रहा था चल रहा था हठात गूगल ने एक नया प्रयोग किया और मिस्र की जनता को गूगल ने एक उपहार दिया कि बिना इंटरनेट कनेक्शन के जनता ट्विट कर सकती है। यह काम सिर्फ वॉयस कनेक्शन के जरिए हो सकता है। गूगल ने अपने ब्लॉग पोस्ट में उज्ज्वल सिंह ने लिखा Like many people we’ve been glued to the news unfolding in Egypt and thinking of what we could do to help people on the ground. Over the weekend we came up with the idea of a speak-to-tweet service—the ability for anyone to tweet using just a voice connection.
We worked with a small team of engineers from Twitter, Google and SayNow, a company we acquired last week, to make this idea a reality. It’s already live and anyone can tweet by simply leaving a voicemail on one of these international phone numbers (+16504194196 or +390662207294 or +97316199855) and the service will instantly tweet the message using the hashtag #egypt. No Internet connection is required. People can listen to the messages by dialing the same phone numbers or going to

We hope that this will go some way to helping people in Egypt stay connected at this very difficult time. Our thoughts are with everyone there.

Update Feb 1, 12:47 PM: When possible, we're now detecting the approximate (country-level) geographic origin of each call dialing one of our speak2tweet numbers and attaching a hashtag for that country to each tweet. For example, if a call comes from Switzerland, you'll see #switzerland in the tweet, and if one comes from Egypt you'll see #egypt. For calls when we can't detect the location, we default to an #egypt hashtag.
गूगल के इस तकनीकी सहयोग ने मिस्र की जनता की बड़ी मदद की। इसका अर्थ यह है कि आज के युग में संचार सेवाओं का इस्तेमाल करके आंदोलन करना बेहद खर्चीला और कौशल का काम है। चीन,ईरान और अब मिस्र की जनता के प्रतिवादी तेवरों ने संचार तकनीक के नए आंदोलनकारी उपयोग की अनंत संभावनाओं के द्वार खोले हैं। जरूरत इस बात की है कि आंदोलनकारियों की नई संचार तकनीक पर मास्टरी हो और तुरंत ही आंदोलनकारी जनता को इसके उपयोग को सिखाने की क्षमता हो।
        










बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

फ्रांस के मजदूरों का महान संघर्षः प्रशंसनीय संघर्षचेतना

फ्रांस के मजदूरों के संघर्ष के कारण आज समूचा फ्रांस ठप्प पड़ा है। समूचे देश में सारी गतिविधियां ठप्प हैं। यह संघर्ष नव्य-उदार आर्थिक नीतियों के खिलाफ मजदूरवर्ग का जबर्दस्त संदेश लेकर आया है। इससे हमारे देश के मजदूरों को भी सबक लेने की जरूरत है। हम यहां फ्रांस के इस आंदोलन पर एक रिपोर्ट साभार दे रहे हैं-
France Riots Over Pension Reforms While Americans Lose Their Homes in Record Numbers With Hardly any Protest
By Mike Whitney, CounterPunch
Posted on October 27, 2010, Printed on October 27, 2010
http://www.alternet.org/story/148623/
Thank God for France. While American liberals tremble at the idea of sending an angry email to congress for fear that their name will appear on the State Department's list of terrorists, French workers are on the front lines choking on tear gas and fending off billyclubs in hand-to-hand combat with Sarkozy's Gendarmerie. That's because the French haven't forgotten their class roots. When the government gets too big for its britches, people pour out onto to the streets and Paris becomes a war zone replete with overturned Mercedes Benzes, smashed storefront windows, and stacks of smoldering tires issuing pillars of black smoke. This is what democracy looks like when it hasn't been emasculated by decades of propaganda and consumerism. Here's a blurb from the trenches:
Headline: "French Energy Sector Crippled by Nationwide Strike... French energy facilities are close to total disruption in the wake of nationwide strike against the raise of the retirement age.....France has been hit by numerous protests across the country against a controversial pension reform that would rise the retirement age to 62 from 60....On October 22 morning 80 protesters blockaded Grandpuits oil refinery outside Paris, key supplier for Charles de Gaulle and Orly international airport." (The Financial)

Shut 'em down.
Take note, Tea Party crybabies who moan about restoring "our freedoms" while stuffing the backyard bunker with seed corn and ammo. Glenn Beck won't save you from the "mean old" gov'mint. Liberty isn't free anymore. If you want it, get out of the barko-lounger and organize. The amount of freedom that any nation enjoys is directly proportionate to the amount of blood its people spilled fighting the state. No more, no less. The man who is willing to accept the blunt force of a cop's truncheon on his back is infinitely more praiseworthy than the leftist/rightist scribe crooning from the bleachers. The state isn't moved by lyrical editorials or prosaic manifestos. It responds to force alone, which is why it takes people who are willing to "throw themselves on the gears" of the apparatus and stop it from moving forward. Unfortunately, most of those people appear to live in France.

The resistance is steadily building in France. The budding rebellion is cropping up everywhere -- "secondary schools, train stations, refineries and highways have been blockaded, there have been occupations of public buildings, workplaces, commercial centers, directed cuts of electricity, and ransacking of electoral institutions and town halls..." And the big unions are calling for more strikes, more agitation, more ferment.

For more than a week, transportation has been blocked across the France due to the protests by students and workers. Sarkozy's popularity has plummeted. 65% of people surveyed don't like the way the French president is handling the strikes. 79% of the people would like to see Sarkozy negotiate with the Union on terms and conditions, but he won't budge. Thus, the cauldron continues to boil while the prospect of violence rises.

"STRIKE, BLOCKADE, SABOTAGE"

This is from an anonymous striker:


"In each city, these actions are intensifying the power struggle and demonstrate that many are no longer satisfied with the order imposed by the union leadership. In the Paris region, amongst the blockades of train stations and secondary schools, the strikes in the primary schools, the workers pickets in front of the factories, people create inter-professional meetings and collectives of struggle are founded to destroy categorical isolation and separation. Their starting point: self-organization to meet the need to take ownership over our struggles without the mediation of those who claim to speak for workers.

We decided Saturday to occupy the Opera Bastille. This was to disturb a presentation that was live on radio, to play the trouble makers in a place where the cultural merchandise circulates and to organize an assembly there. So we met with more than a thousand people at the “place de la nation”, with banners stating “the bosses understand only one language: Strike, blockade, sabotage." (end of communique)

The action was met with predictable police violence and mass arrests.

The pension turmoil is not limited to France either. US pension funds are underfunded by nearly $3 trillion. Will US workers be as willing as their French counterparts to face the beatings (to defend "what's theirs") or will they throw up their hands and appeal to Obama for help?

There's no question that Washington elites have joined with Wall Street to offload the massive debts from the financial meltdown onto workers and retirees. Nor is their any doubt that they will invoke (what Slavoj Zizek calls) a "permanent state of economic emergency" to justify their actions. That will allow them to move ahead with so-called "austerity measures" that are designed to impoverish workers and strip popular government programs of their funding. The trend towards "belt-tightening" merely masks the ongoing class war which is aimed at restoring a feudal system of royalty and serfs.

This is from an article by economist Mark Weisbrot:
"If the French want to keep the retirement age as is, there are plenty of ways to finance future pension costs without necessarily raising the retirement age. One of them, which has support among the French left -- and which Sarkozy claims to support at the international level -- would be a tax on financial transactions. Such a “speculation tax” could raise billions of dollars of revenue -- as it currently does in the U.K. -- while simultaneously discouraging speculative trading in financial assets and derivatives. The French unions and protesters are demanding that the government consider some of these more progressive alternatives."

But the retirement age is not really the issue at all. This is about union busting and "putting people in their place." It's about "who will call-the-shots" and in whose interests will society be run.
The French are fighting back against this "oligarchy of racketeers" and the ripoff system they represent, while namby-pamby Americans are neutralized by signing their umpteenth petition or venting their spleen at a Palin rally.
Mike Whitney lives in Washington state and can be reached at fergiewhitney@msn.com

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

जलेबी नहीं है क्रांति

    जी हां,क्रांति जलेबी नहीं है। जिसका कलेवा कर लिया जाए। क्रांति किसी पार्टी का ऑफिस नहीं है जिसे बना लिया जाए और क्रांति हो जाए। क्रांति दोस्ती का नाम नहीं है। क्रांति मजदूर का धंधा नहीं है।गाली नहीं है।मजाक नहीं है।क्रोध नहीं है।घृणा नहीं है जिस पर जब मन आया थूक दिया जाए।
    क्रांति किसी नारे में नहीं होती । उपासना में भी नहीं होती। क्रांति अंधविश्वास का नाम नहीं है। क्रांति कोई ट्रेडमार्क नहीं है। क्रांति लोगो नहीं है। क्रांति किसी की गुलाम नहीं है। क्रांति इच्छा का खेल नहीं है। कम्युनिस्ट संगठन की असीम क्षमता का नाम क्रांति नहीं है। क्रांति को आप बांध नहीं सकते। सिर्फ होते देख सकते हैं,चाहें तो भाग ले सकते हैं। 
     क्रांति तो सिर्फ क्रांति है। वह भगवान नहीं है,आस्था नहीं है,वह एक सामाजिक प्रक्रिया है जो व्यक्ति की चेतना से स्वतंत्र है और उसे सम्पन्न करने में व्यक्तियों, मजदूरवर्ग, जनता आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्रांति का मतलब है मूलगामी सामाजिक परिवर्तन। मूलगामी सामाजिक परिवर्तन सामाजिकचेतना की अवस्था पर निर्भर करते हैं।
     भारत में अब तक क्रांति नहीं हो पायी है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है ? क्या कम्युनिस्ट पार्टियां जिम्मेदार हैं ? क्या कम्युनिस्ट नेताओं के कलह को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ? भारत में कम्युनिस्ट भूल नहीं करते, विचारधारात्मक विचलन नहीं दिखाते,कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन नहीं होता ,अनेक मेधावी कॉमरेड पार्टी से नहीं निकाले जाते और कम्युनिस्ट संगठित रहते,कभी गलती ही नहीं करते तो क्या भारत में क्रांति हो जाती ? जी नहीं,इसके बाद भी क्रांति नहीं होती।
   क्या पश्चिम बंगाल,केरल और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट क्रांति कर पाए हैं ? जी नहीं,क्रांति एक सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया है। उसे दल,विचारधारात्मक विचलन,दलीय फूट, व्यक्तियों की भूमिका आदि में संकुचित करके नहीं देखना चाहिए।
   क्रांति की कुछ अनिवार्य वस्तुगत परिस्थितियां होती हैं और इन परिस्थितियों को राजनीतिक रूपान्तरण का जब कोई क्रांतिकारी संगठन रूप देता है तो बुनियादी परिवर्तन की प्रक्रिया तेज गति पकड़ लेती है।
  जो लोग सोचते हैं कि कम्युनिस्ट संगठन होने मात्र से क्रांति हो जाएगी वे गलत सोचते हैं। यह भी गलत है कि कम्युनिस्टों का कोई विरोध न करे और उनके लिए समूचे देश में एकच्छत्र शासन का मौका दे तो क्रांति हो जाएगी। ये सारे प्रयोग असफल साबित हुए हैं। क्रांति किसी कल्पना का नाम नहीं है बल्कि वह ठोस भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। विभिन्न सामाजिक वर्गों की राजनीतिक वफादारी पर निर्भर करती है।
       जिस समाज में क्रांति होती है वहां सामाजिक उथल-पुथल होती है। यह सामाजिक उथल-पुथल किसी सामाजिक आवश्यकता के कारण होती है। जब संस्थान पुराने पड़े जाते हैं।  तो वे सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ होते हैं। हमें सोचना चाहिए क्या आधुनिक भारत के संस्थान जीर्ण-शीर्ण हो गए हैं ? क्या जनता की सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बारे में कानून बनाने,तदनुरूप संरचनाएं बनाने और कार्यप्रणाली बदलने में संस्थान असमर्थ हैं ? क्या संस्थान अपनी अपडेटिंग कर रहे हैं ? कानून,संसद,संविधान,बाजार,धर्म आदि में अपडेटिंग हो रही है?
    भारत की खूबी है कि यहां लगातार अपडेटिंग हो रही है। सामाजिक आवश्यकताओं को दमन के आधार पर कुचलने की बजाय पर्सुएशन ,कानून और नियमों के आधार पर नियमित किया जा रहा है। संस्थान यदि अपडेटिंग बंद कर दें तो क्रांति की संभावनाएं पैदा होती हैं।
    संस्थान यदि डंडे के बल पर कोई चीज लागू करने की कोशिश करते हैं तो क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है। संस्थान अन्य के लिए  स्थान नहीं दें तो क्रांति संभव है। संगठित मजदूरों की मांगों पर सरकार ध्यान नहीं दे तो क्रांति संभव है। पुराने मूल्यों और सामाजिक संबंधों के आधार पर जीना मुश्किल हो जाए और आम जनता उन्हें बदलने के  लिए किसी भी हद तक कुर्बानी देने को तैयार हो जाए। जान तक की कुर्बानी देने को तैयार हो जाए तो क्रांति संभव है। ऐसी अवस्था में एकजुट कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में क्रांति की संभावनाएं प्रबल होती हैं। भारत में ये परिस्थितियां ही नहीं हैं।
      भारत में क्रांति की संभावना इस लिए नहीं है क्योंकि यहां के आधुनिक संस्थानों ने क्रमशःसमयानुरूप अपने को बदला है। संगठित मजदूरवर्ग ने जब भी अपनी मांगे उठायी हैं उन पर मोटे तौर पर केन्द्र सरकार ने अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त की है। हाल ही में भयानक आर्थिकमंदी के बावजूद संगठित मजदूरवर्ग को छठे वेतन आयोग के अनुसार नए वेतनमान और अन्य सुविधाएं प्रदान की गईं। इसका यह अर्थ नहीं है कि केन्द्र सरकार मजदूर समर्थक है ,जी नहीं,केन्द्र सरकार लगातार मजदूर विरोधी फैसले लेती रही है लेकिन ज्योंही वेतन और कैरियर से संबंधित मांगे रखी जाती हैं उसने सकारात्मक त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ऐसी स्थिति में मजदूरों को बुनियादी परिवर्तन के लिए हरकत में लाना संभव नहीं है।
      भारत में बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के मार्ग में उसी दिन सबसे बड़ी बाधा खड़ी हो गई जब स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान स्वीकृत किया। इस संविधान के जरिए बुर्जुआ और सामन्ती वर्गों ने सत्ता के केन्द्रीकरण की प्रक्रिया आरंभ कर दी । भारत जैसे विशाल कृषिप्रधान देश में नेहरूयुग के दौरान बुर्जुआजी को शक्तिसंपन्न बनाया गया और सामंतों के अधिकारक्षेत्र में शामिल इलाकों को अनछुआ छोड़ दिया गया। सामंतों को अधिकारहीन बनाए बिना भारत के किसानों और खेतमजदूरों का मजदूरों को समर्थन मिलना असंभव था क्योंकि बड़ी तादाद में खेतमजदूर सामंतों के खेतों में काम करते थे। खेतमजदूरों की संख्या मजदूरों से कई गुना ज्यादा है। कांग्रेस ने गावों में सामंती ढ़ांचे को तोड़ा ही नहीं। राजाओं का प्रिवीपर्स नेहरू युग में जारी रहा। इसके कारण गांवों में सामंतवाद फलता-फूलता रहा। संसद में राजाओं और बड़े सामंतों की बहुत बड़ी तादाद लगातार चुनकर आती रही है।
      सामंती दबाव के कारण मजदूरवर्ग का खेतमजदूरों के साथ मोर्चा ही नहीं बन पाया। इसके अलावा क्रांति के लिए दुकानदारों और व्यापारियों में भी जनाधार बनाने की आवश्यकता थी जिसे कभी कम्युनिस्टों ने गंभीरता से नहीं लिया और दुकानदारों-व्यापारियों को संघ परिवार और कांग्रेस के ही कब्जे में छोड़ दिया। ऐसी स्थिति में जिस सशक्त सामाजिक शक्ति संतुलन के निर्माण की जरूरत थी वह हो ही नहीं पाया। कालांतर में मजदूरों में तेजी से एक नए वर्ग ने जन्म लिया जिसे हम साइबर मजदूर कहते हैं ,ये भी मजदूर संगठनों की पकड़ के बाहर हैं ऐसे में मजदूरवर्ग की सामाजिक शक्ति सीमित होकर रह गयी है।
    भारत में क्रांति न हो पाने का एक अन्य बड़ा कारण है बैंकिंग व्यवस्था। केन्द्र सरकार का राष्ट्रीयकृत बैंकों के जरिए विभिन्न क्षेत्रों में ऋण वितरण करना। इसके लिए कांग्रेस ने सबसे पहले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और बाद में बैंकों को औजार की तरह सामाजिक-राजनीतिक संतुलन बुर्जुआजी के पक्ष में करने के लिए इस्तेमाल किया। प्रत्येक बैंक को यह तय किया कि उन्हें कितना पैसा किसानों को कर्ज देना है,कितना दुकानदार-व्यापारियों आदि को देना है और कितना मध्यवर्ग के लोगों के लिए घर वगैरह के लिए कर्ज देना है। सरकारी बैंकों से कर्ज की सुविधाएं मुहैय्या कराकर केन्द्र सरकार ने मध्यवर्ग और पेशेवर तबकों को क्रांति के दायरे से निकालकर बुर्जुआ विकास के दायरे में शामिल कर लिया।
    दूसरी ओर नौकरशाही को खुली छूट दी और उसके ऊपर किसी भी किस्म का अंकुश नहीं लगाया । इससे सामाजिक शक्ति संतुलन मजदूरों और कम्युनिस्टों के विपरीत चला गया। यह संभव नहीं है कि खेत मजदूर,किसान,दुकानदार-व्यापारी,मध्यवर्ग के बिना कोई बड़ा राजनीतिक मोर्चा वामपंथी बना लें।
     वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल,केरल और त्रिपुरा में शक्ति संतुलन अपने पक्ष में किया है इसके कारण ही उन्हें वहां 40-48 प्रतिशत तक वोट मिलते रहे हैं। बाकी इलाकों में सिर्फ संगठित मजदूरों तक ही वामपंथियों की पहुँच हो पायी है। यह वास्तविकता है।
    हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जिस तरह कम्युनिस्ट अपने पक्ष में सामाजिक शक्ति-संतुलन पैदा करना चाहते हैं,बुर्जुआजी भी अपने पक्ष में सामाजिक शक्ति संतुलन बनाए रखना चाहता है। बुर्जुआजी हमेशा संगठित मजदूरों के गुस्से का शमन करने की चेष्टा करता रहा है। बुर्जुआजी ने सचेत रूप से गैर-मजदूरवर्ग को अपने पक्ष में करने की कोशिश की है। किसानों की 90 हजार करोड़ रूपयों की कर्जमाफी का फैसला एक वर्गीय फैसला था जिसने बुर्जुआजी का किसानों में अलगाव कम किया है।
    भारत में मजदूर आंदोलन की मुश्किल यह भी है कि उसके नेताओं,सदस्यों और कार्यक्रमों में अर्थवाद हावी है । अधिकांश इलाकों में मजदूरवर्ग अभी तक सर्वहाराचेतना से लैस नहीं हो पाया है। मजदूरों में पुराने सड़-गले मूल्यों के प्रति प्रेम और आकर्षण अभी भी बचा हुआ है।
     कम्युनिस्टों में संसदीय लोकतंत्र के प्रति मोह बढ़ा है। संसदीय लोकतंत्र के प्रति मोह को बढ़ाने में पश्चिम बंगाल के दीर्घकालीन संसदीय वामशासन की भी बड़ी भूमिका है। कम्युनिस्टों में संसदीयमोह का बढ़ना इस बात का संकेत है कि निकट भविष्य में कम से कम कम्युनिस्ट पार्टियां किसी भी बड़ी राष्ट्रव्यापी जंग में शामिल होने नहीं जा रही हैं। संसदीयमोह का अर्थ है अब संघर्ष नहीं सांकेतिक प्रतिवाद करो।
  जनता के असंतोष को कम्युनिस्ट राजनीतिक पूंजी में तब्दील न कर लें इस ओर कांग्रेस ने बड़े ही सुनियोजित ढ़ंग से समय-समय पर ध्यान दिया और अपने वर्गीय दोस्तों के हितों की रक्षा की। इसके कारण उसे कम्युनिस्टों के राजनीतिक प्रसार को सीमित करने में मदद मिली।    
            
                       
                                             


ईश्वर प्रेम से बड़ा है मजदूर प्रेम

        समाज में कई तरह के लोग हैं। कुछ ऐसे हैं जो कॉमनसेंस की नजर से दुनिया देखते हैं,कुछ  हैं जो विचारधारा की परिपक्व नजर से दुनिया देखते हैं,कुछ हैं जो असत्य या गप्प की नजर से देखते हैं। इनमें कॉमनसेंस और असत्य की नजर से देखने वालों की संख्या ज्यादा है। विचारधारा की परिपक्व नजर से देखने वालों की संख्या इनकी तुलना में कम है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार से दुनिया को देखने वालों की संख्या इनसे भी कम है। कायदे से यह क्रम उलटा होता तो अच्छा होता। मैंने जब भी आरएसएस की विचारधारा की आलोचना करके लिखा तो संघभक्तों ने कईबार सवाल उठाया कि भारत में कम्युनिस्ट सफल क्यों नहीं हुए ? क्रांति क्यों नहीं हुई ? कम्युनिस्टों के दिन अब लद गए। भारत से उनका नामोनिशां मिट जाएगा।
   यह सच है कि भारत में कम्युनिस्टों को जितनी सफलता मिलनी चाहिए थी उतनी सफलता उन्हें मिली है। वे इससे ज्यादा सफलता हासिल कर सकते थे कि लेकिन क्रांतिकारी विचारों की सफलता और क्रांतिकारी संगठन की सफलता बाह्य तत्वों पर निर्भर करती है। क्रांति का जन्म विचारों के गर्भ से नहीं भौतिक परिस्थितियों के गर्भ से होता है।
     भारत में संगठित कम्युनिस्ट पार्टियां हैं। वे चाहती हैं भारत में क्रांति हो। उनके हमदर्द चाहते हैं क्रांति हो । लेकिन क्रांति चाहने से नहीं होती। क्रांति कोई माल नहीं है कि आप बाजार जाएं और खरीद कर ले आएं और उपभोग करने लगें।
    क्रांति कोई खेल भी नहीं है कि जब इच्छा हो खेलना आरंभ कर दो। क्रांति कोई कॉस्मेटिक्स या खुशबूदार क्रीम या इत्र नहीं है कि खोलो लगाओ और फिर खुशबू ही खुशबू।
   क्रांति और कम्युनिस्टों के बारे में आए दिन जिस तरह की गप्पबाजीभरी टिप्पणियां हम सुनते या पढ़ते हैं उससे एक चीज का पता चलता है कि इस तरह की टिप्पणियां करने वाले लोग क्रांति और क्रांति की प्रक्रिया के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान के अभाव के कारण अनाप-शनाप बोलते-लिखते हैं।
    क्रांति दुनिया का सबसे हसीन और प्यारा पदबंध है। इस पर जितने लोग निछावर हैं उससे ऊपर अभी सिर्फ एक ही पदबंध हैं जिस पर लोग निछावर हैं और प्राण तक देने के लिए तैयार हैं वह है प्रेम। प्रेम और क्रांति की प्रतिस्पर्धा में ईश्वरप्रेमी पिछड़ गए हैं। तुलनात्मक तौर पर देखें तो प्रेम का इतिहास क्रांति के इतिहास से पुराना है। प्रेम  को महान बनाया भक्ति आंदोलन के लेखकों ने। पांचवीं-छठी शताब्दी में दक्षिण भारत में आलवार संतों ने प्रेम और ईश्वर के बीच की प्रतिस्पर्धा आरंभ की और ईश्वर को गौण और प्रेम को महान बना दिया। हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि जिस समय प्रेम का महाख्यान रचा जा रहा था उस समय समाज में दो नए वर्ग जन्म ले रहे थे पहला था कारीगर और दूसरा था व्यापारी। कारीगरों के उदय के साथ प्रेम के महाख्यान का आरंभ हुआ और आधुनिककाल में यही कारीगरवर्ग ,मजदूरवर्ग में रूपान्तरित हुआ और व्यापारी का पूंजीपतिवर्ग में रूपान्तरण हुआ।
      मजदूरों ने आधुनिक समाज को जन्म दिया। औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया। जो लोग कहते हैं कि मजदूरों ने क्या किया है ? वे नहीं जानते या जान-बूझकर अनदेखी करते हैं कि मजदूरवर्ग ने ही औद्योगिक क्रांति को संभव बनाया। संसार की महानतम वैज्ञानिक खोजों को संभव बनाया। मजदूरवर्ग ने औद्योगिक क्रांति से आगे जाकर क्रांति की खोज की। जबकि पूंजीपतिवर्ग औद्योगिक क्रांति तक जाकर ठहर गया।
     संसार में कारीगर जन्म नहीं लेते तो प्रेम का जन्म नहीं होता और भक्ति का महान साहित्य नहीं रचा जाता। कबीरदास-तुलसीदास-मीराबाई जैसे महान लेखकों का जन्म नहीं होता। पहले कारीगर आए फिर उनके भावों-विचारों की अभिव्यक्ति का महान भक्ति साहित्य लिखा गया। इसी तरह पहले मजदूर आए और उन्होंने औद्योगिक क्रांति,जनतंत्र आदि को संभव बनाया।रोमांटिशिज्म के महान अंग्रेजी साहित्य को जन्म दिया।
      कहने का अर्थ है मजदूर सिर्फ वस्तुएं ही नहीं बनाते वे श्रेष्ठतम कलाओं को भी जन्म देते हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से हमें मजदूरों से प्यार करने की आदत ड़ालनी चाहिए। मजदूरों से प्यार किए बिना आप सामयिक जीवन में शांति से नहीं रह सकते। हमारे युवाओं और औरतों में सामाजिक अशांति,अवसाद, कुण्ठा, निराशा का प्रधान कारण है मजदूरों से प्रेम का अभाव ।
     हम मजदूरों की बनायी वस्तुओं से प्यार करते हैं लेकिन मजदूरों से घृणा करते हैं, मजदूरों के क्रांतिकारी विचारों से घृणा करते हैं। यही वह प्रस्थान बिंदु हैं जहां से हम इस दुनिया को नए नजरिए से देखें। जो लोग मजदूरों से प्यार करते हैं वे बड़े ही जिंदादिल इंसान होते हैं। उनसे मिलकर उत्साह और प्रेरणा का संचार होता है।
   आज सामाजिक जीवन के प्रति ज्यादा से ज्यादा नौजवानों में जो निरर्थकताबोध पैदा हो रहा है उसका प्रधान कारण है उनका मजदूरों के साथ अलगाव और प्रेम का अभाव। मजदूरों से प्रेम हमें जीवन की सार्थकता का एहसास कराता है। इसके विपरीत वस्तुओं का प्रेम जंगली पशु बनाता है।
     मजदूरों के बिना वस्तुएं बेजान होती हैं। हम यदि मजदूरों को भूल जाएंगे और वस्तुओं को याद रखेंगे तो विभ्रम के शिकार होंगे। मजदूर और वस्तु को मिलाकर देखेंगे,मिलाकर प्यार करेंगे तो सत्य का सामना करने का साहस पैदा होगा।
    आज समाज में सत्य में दिलचस्पी घटती जा रही है इसका प्रधान कारण है कि हमारी मजदूरों में दिलचस्पी घटती जा रही है। सत्य का हमारी पकड़ के बाहर चले जाना बहुत बडी त्रासदी है लेकिन उससे भी बडी त्रासदी है कि हमारी पकड़ से मजदूरवर्ग का निकल जाना। इसके कारण हम विभ्रमों में फंसकर रह गए हैं।
    विभ्रमों में फंसे व्यक्ति को वास्तव जगत नजर नहीं आता। वास्तव जगत में रहते हुए भी वह उससे अनभिज्ञ होता है। मजदूरों के प्रति बढ़ती अनभिज्ञता का यही प्रधान कारण है। इसके कारण हम भगवान से प्यार करते, प्रेमिका से प्यार करते हैं।माता-पिता से प्यार करते हैं,प्रकृति से प्यार करते हैं,दोस्तों से प्यार करते हैं।लेकिन मजदूरों से प्यार नहीं करते। जो इस समाज के सर्जक हैं उनसे प्यार नहीं करते। हम मजदूरों से प्यार करें तो कभी मनोचिकित्सक के पास जाने की जरूरत न पड़े।कभी सिर में दर्द नहीं होगा। जीवन की रामबाण दवा है मजदूर प्रेम। वह ईश्वर प्रेम और प्रेमिका के प्रेम से भी महान है। सिर्फ एकबार करके तो देखें !   






मंगलवार, 7 सितंबर 2010

फेसबुक पर 7 सितम्बर की हड़ताल



     आज मजदूरों के विभिन्न संगठनों ने मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मंहगाई और दूसरी समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय हड़ताल की। विभिन्न कल-कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों में यह हड़ताल बेहद सफल रही है। मैंने फेसबुक के जरिए जानने कोशिश की थी कि विभिन्न इलाकों में हड़ताल कैसी रही और इस कुछ दोस्तों ने जो प्रतिक्रिया भेजी है वह देखने लायक है इससे हड़ताल का अंदाजा लगेगा साथ ही दोस्त कैसे देख रहे हैं इसका भी अंदाजा लगेगा। 
   उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और मजदूरों तथा कर्मचारियों के फेडरेशनों बीएमएस, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एआईसीसीटीयूयूटीयूसी तथा एलपीएफ ने गत जुलाई को नयी दिल्ली में मजदूरों की दूसरी अखिल भारतीय कन्वेन्शन का आयोजन किया था। केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों और मजदूरों तथा कर्मचारियों के फेडरेशनों के प्रतिनिधि गत जुलाई को मजदूरों की दूसरी राष्ट्रीय कन्वेंशन में एकत्रित हुए और उन पांच साझा मांगों पर संयुक्त कार्रवाई के कार्यक्रम की समीक्षा की। देश की सामाजिक , आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों पर गहन विचार-विमर्श किया गया। 
      पिछले अधिवेशन में लिए गए निर्णय जिसमें विरोध दिवस, प्रदर्शन, धरना, सत्याग्रह, जेल भरो आंदोलन जिसमें लगभग 10 लाख से ज्यादा मजदूरों ने भाग लिया था, की भी समीक्षा करते हुए इन कार्यवाहियों के बाद पैदा हुई स्थितियों पर विचार करते हुए 7 सितम्बर 2010 को राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान करते हुए सर्वसम्मति से निम्नलिखित घोषणा पत्र पारित किया।
      महंगाई पर  खासतौर से खाद्य कीमतों में बढ़ोत्तरी पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कदम उठाने की ट्रेड यूनियनों की मांग के बावजूद खाद्य कीमतें बढ़कर 17 फीसदी तक पहुंच गयी हैं। तथा मुद्रास्फीति बढ़कर दो अंकों में पहुंच गयी है और सरकार मेहनतकश अवाम की भारी तकलीफों को कम करने के मामले में पूरी तरह उदासीन बनी हुई है। 
    श्रम कानून तथा ट्रेड यूनियन अधिकारों के निर्बाध उल्लंघन पर ट्रेड यूनियनों द्वारा चिंता व्यक्त किए जाने के बावजूद स्थिति हर दिन गंभीर तथा दमनकारी बनती जा रही है। रोजगार हानि, अर्द्ध रोजगार असहनीय जीवन स्थितियों, बढ़ते काम के घंटों, अंधाधुंध ठेकाकरण, अस्थायीकरण तथा आउटसोर्सिंग के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद मेहनतकश अवाम की जीवन स्थितियों में गिरावट तथा अमानवीय शोषण को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा।
     मुनाफे वाले सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के विरोध के बावजूद कोल इंडिया लि., बीएसएनएल, सेल, एनएलसी, हिन्दुस्तान कॉपर, एनडीएमसी आदि में ताजा विनिवेश को लागू किया जा रहा है और अंधाधुंध विनिवेश की हानिकर नीति बेरोकटोक जारी है। ट्रेड यूनियनों के यह मांग करने के बावजूद असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए बिना किसी पाबंदी के सार्वभौम सर्वसमावेशी सामाजिक सुरक्षा कवरेज की खातिर एक भारी कल्याण फंड की स्थापना की जाए, फंड आबंटन मामूली बना हुआ है और प्रतिबंधात्मक प्रावधान जारी है। 
     कन्वेन्शन चिंता के साथ यह नोट करता हैकि न सिर्फ ट्रेड यूनियनों के विरोधों की अनदेखी की जा रही है बल्कि उस नीति को भी जोरशोर से लागू किया जा रहा है जिससे खाद्यान्नों की कीमत बढ़ी हैं। इनमें ताजातरीन है पेट्रोलियम कीमतों को नियंत्रण मुक्त करके उन्हें अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जोडऩा जिसके चलते मिट्टी के तेल, रसोई गैस, डीजल तथा पेट्रोल की कीमतों में भारी इजाफा हुआ है। इसलिए यह कन्वेशन 7 सितम्बर 2010 को अखिल भारतीय आम हड़ताल के लिए आव्हान करने का संकल्प लेता है। कन्वेन्शन संबद्धताओं के आर-पार देश के पूरे मेहनतकश अवाम का आह्वान करता है कि देशव्यापी आम हड़ताल को पूरी तरह सफल बनाने के लिए और संघर्ष को और सघन बनाने के लिए नंवबर / दिसम्बर 2010 को संसद पर मजदूरों के जबर्दस्त प्रदर्शन की तैयारी के लिए लामबंद करें। इस संदर्भ में ही    मैंने फेसबुक पर लिखा था - भारत में आज केन्द्रीय मजदूर संगठनों के आह्वान पर राष्ट्रीय हड़ताल चल रही है। मेरे शहर कोलकाता और समूचे प्रांत में इस हड़ताल ने आम हड़ताल की शक्ल ले ली है। यह मजदूर संगठनों की मंहगाई के विरोध की गई जायज हड़ताल है। आपके शहर और प्रांत में यह हड़ताल कैसी रही कृपया बताएं
   इसके जबाब में दोस्तों ने बताया-

Subhash Rai08 सितंबर 2010 को 04:32 बजे
Jagdishwar jee, Agra mandal men bhee hadtal ka vyaapak asar raha. sadakon par aavajaahee kam rahee, sarkaree daftar soone rahe.

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Niranjan Shrotriya- September 8, 2010 at 6:41am
जगदीश्वर भाई! दुखद है की मध्य प्रदेश में अब ट्रेड यूनियन्स का वह प्रभाव अब नहीं रहा! केवल बॅंक्स में छुटपुट असर दिखा! कुल मिलाकर हड़ताल निष्प्रभावी ही रही
Kishan Kaljayee - wrote:
"Delhi me bhi mujhe band ka koee khas asar nahi dikha.Lekin yah hadtal jaruri mudde par thi."

Divik Ramesh commented -
"दिल्ली महानगर ही नहीं देश की राजधानी हॆ । फिर भी काफ़ी अचर रहा हॆ । मुझे १९७३-७४ के दिन याद आ गये । महगाई के विरोध में ही मॆने भी धारा १४४ तोड़ी थी ऒर भूपेश गुप्त जॆसे बड़े नेताओं के साथ जेल (तिहाड़ जेल) में भी रहा था । शायद अध्यापक होने के नाते नॊकरी नहीं गई ।"
Ashish Tripathi - yahan banaras men to kuch ka pata hi nahin chal raha hai...

Asrar Khan -
"Delhi samet NCR mein hadtal kafee had tak kamyaab rahi ..Trade unions ne jamkar akta dikhai  jise dekhkar aissa laga ki vartmaan sarkar se log keval asantust hi nahin  valki sarkar se logon ka vishvaas uth gaya hai... mujhe lagta hai ki hamara desh bahut bade asantosh ki taraf badh raha hai."
ent you a message.
           
Jitendra Srivastava-  08 सितंबर 2010 को 08:52 बजे
dilli men vasa hee hai jaisa aksar hota hai.
Abdul wrote:
"yes com this is Indian Historic movment, long live All india UTUC ..........."
and Ajay Kamath like this.
Tapan Dasgupta -All Central Trade Union called an all India industrial stike agaist price rise, contract system, rights of the unorganised workers, privatisation etc., which got tremendous support and has been a great sucess. In Vadodara thousands of workers took out a rally from Mandvi - a historic central place of Vadodara to Collector Office and submitted a memorundum to him.
message.
           
Shri Krishna Sharma- 07 September 2010 at 17:34
दिल्ली के मजदूरों की स्थिति दूसरे राज्यों के मजदूरों से ज्यादा खराब है। कभी किसी बहाने तो कभी किसी वजह से , उन्हें एक जगह पर रहने तक
नहीं दिया जाता है इसलिए वे हक की लडाई तक में पीछे रह जाते हैं। एक तो कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी, ऊपर से घनी बरसात ने मजदूरों को बिखेर कर रखा है। इस वजह से यहाँ उतना प्रभाव दिखाई नहीं दिया जितना आप वहाँ बता रहे हैं।
     
Pankaj Chaturvedi- 08 September 2010 at 09:42
delhi is the capital and i saw little bit effect on auto rickshaw, except life was normal
Anupam Ojha - "Mumbai me atyant safal rahi ye hadataal !"

Vineet Kumar- 
सॉरी सर,अभी आपका मैसेज देख पाया। दिन में फर्स्ट हाफ में थोड़ा असर दिखा लेकिन शाम के वक्त सीपी में तो सारी दूकानें खुली दिखी। काफी-चहल पहल भी। मयूर विहार में रहता हूं,वहां कोई असर नहीं दिखा।
ent you a message.
     
Meethesh Nirmohi-  samanya rukh hee raha.

Sudha Tiwari - "चंडीगढ़ में बंद का असर मिला- जुला रहा.बैंक वगैरह बंद थे,स्कूल सारे खुले रहे और सड़क पर निजी वाहन ही चल रहे थे,बस- ऑटो वालो ने बंद का साथ  पूरी तरह से दिया जबकि   टैक्सी वालों ने आंशिक रूप से ."


Satyanand Nirupam -
dilli mein kuchh pata nahin chal paya, jahan tak main dekh paya...

Ajay Saklani - जगदीश्वर जी, मैं दिल्ली में रहता हूँ और यहाँ हड़ताल के लिए कोई जगह नहीं है| जंतर मंतर में जो लोग आन्दोलन करते हैं वो वहां आन्दोलनकारियों की भीड़ में खो जाते हैं| रोजाना वहां जा पाना नहीं हो पता है और समाचार वाले तो सर्कार और पूंजीपतियों के गुलाम हैं| तो असर कैसा है उसे जान पाना थोड़ा मुश्किल है| गरीबों को इस आन्दोलन के बारे में या तो पता नहीं है क्योंकि वो अपने जीने के लिए दो पैसे कमाने में व्यस्त हैं और अमीर इसे तमाशा समझते हैं| कौन जी रहा है और कौन मर रहा है इस से अमीरों को कुछ लेना देना नहीं है| उन्हें तो बस हराम की कमाई पसंद है| 
कुछ आन्दोलन ऐसे भी हैं जिन्हें समझ पाना बहुत मुश्किल है| उन आंदोलनों में बैठे ज़्यादातर लोग यह भी नहीं जानते की वो यहाँ क्यों बैठे हैं क्योंकि उन्हें राजनीति के तहत किसी राजनीतिक दल के स्वार्थ के लिए उपयोग किया जा रहा है| 

बुधवार, 16 जून 2010

मजदूरों का असम्मानजनक जीवन

( प्रोफेसर यू जियान आंग)
        चीन में इन दिनों मजदूरवर्ग हडताल पर है। देश के विभिन्न इलाकों की विभिन्न फैक्ट्रियों से हड़ताल की खबरें आ रही हैं। मजदूरों के हड़ताल पर जाने से सारा देश डरा हुआ है। लोगों का मानना है मजदूरों का इस तरह सड़कों पर आंदोलन करते हुए निकलना सामाजिक अशांति पैदा कर सकता है।
      हाल ही में आल चाईना फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन ने एक बयान में कहा है कि वह मजदूरों के कानूनी अधिकारों के संरक्षण और सदभावपूर्ण संबंधों के निर्माण के लिए प्रयास जारी रखेगा। यूनियन का मानना है कि चीन के मजदूर ज्यादा सम्मानजनक अवस्था में जीते रहे हैं। सामाजिक स्थिरता के लिए मजदूरों के सम्मान की रक्षा करना जरूरी है। यूनियन के इस बयान में पहली बात गलत है कि चीन में मजदूरवर्ग सम्मानजनक ढ़ंग से जीवनयापन करता रहा है। हकीकत यह है कि मजदूरों के पास न्यूनतम सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा नहीं है। जीवनशैली बेहद कष्टमय है। काम के क्षेत्र और रहने के क्षेत्र में अनेक विषमताएं हैं।
     इस बयान में पहलीबार मजदूरों के सम्मान के साथ सामाजिक अस्थिरता को जोड़कर देखा गया है। पहलीबार यह बात चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चलने वाले संगठन ने मानी है कि मजदूरवर्ग के सम्मान को बढ़ाने का एकमात्र उपाय है उसके राजनीतिक अधिकारों में बढ़ोतरी। मजदूर के सम्मानजनक जीवन के अभाव में सामाजिक शांति बनाए रखना संभव नहीं होगा। चीन की यूनियन के इस बयान को चीन की समाजविज्ञान अकादमी के रूरल डवलपमेंट इंस्टीट्यूट के निदेशक प्रोफेसर यू जियान आंग ने अपने लेख में उद्धृत किया है।
   यूनियन के बयान में कहा गया है कि चीन में ऐतिहासिक ,सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन घट रहे हैं। सरकारी कारखानों में रिस्ट्रक्चरिंग हो रही है। निजी क्षेत्र विकसित हो रहा है। अनेक स्थानीय सरकारें स्थानीय नीतियां बना रही हैं। इनमें मजदूरों के अधिकारों को पूंजी निवेश के नाम पर तिलांजलि दे दी गयी है। फलतः मजदूरों के अधिकार हाशिए पर चले गए हैं।
     यूनियन के बयान के आधार पर प्रोफेसर साहब ने भी यह माना है कि अनेक कारखाने भाड़े पर चल रहे हैं। ठेके पर ताजिंदगी मजदूरों को बेहद कम मजदूरी पर रख लिया गया है। यह काम सामूहिक हितों की रक्षा के नाम पर किया जा रहा है। अनेक कारखाने सरकारी कारखानों की री-स्ट्रक्चरिंग से निकले हैं।  इन कारखानों को मजदूरों की लूट दुकान भी कह सकते हैं। इन कारखानों में मजदूरों के पास न्यूनतम अधिकार हैं।
    प्रोफेसर यू जियान आंग ने लिखा है कुछ कारखानों में मजदूर भयानक खराब अवस्था में रह रहे हैं। कमरतोड़ मेहनत के बाद भी उन्हें सही पगार नहीं मिलती। वे इतनी कम मजदूरी में काम करते हैं कि ठीक से गुजारा तक नहीं कर पाते। उत्पादन की जगह मजदूर रोबोट बना दिए गए हैं। इन मजदूरों को किसी भी किस्म का सम्मान प्राप्त नहीं है। यू जियान आंग ने लिखा है मजदूरों को अपने राजनीतिक अधिकारों, आर्थिक हितों और सम्मान की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष करना चाहिए और सभी किस्म के तरीके अपनाने चाहिए।  अनेक सरकारी अधिकारी यह मानते हैं कि मजदूरों के अधिकारों के नाम पर हो रही घटनाओं से सामाजिक अस्थिरता पैदा हो रही है।
     विश्व विख्यात राजनीतिविज्ञानी सेमुअल पी. हंटिंगटन ने ‘पोलिटिकल आर्डर इन चेंजिंग सोसायटी’  में लिखा है कि आरंभिक औद्योगिक समाजों में मजदूरों की हड़ताल और सामाजिक अन्तर्विरोधों का प्रधान कारण था कि जो लोग शक्तिशाली थे,सत्ता में थे,वे मजदूरों के अधिकारों को नहीं मानते थे अथवा कानूनी तौर पर मजदूर यूनियन के अस्तित्व को नहीं मानते थे। ये अधिकार तब ही माने गए जब 19वीं सदी के सामाजिक संघर्षों ने इन्हें स्थापित कर दिया। उस समय अनेक सरकारें मजदूर संघों की वैधता पर ही सवालिया निशान लगाती थीं।  जितना मजदूरों की यूनियनों को अस्वीकार किया गया उतना ही मजदूर संगठन रेडीकल होते चले गए।
    जो लोग सत्ता में थे वे मजदूर संघों को अपने लिए चुनौती मानते थे। यह वह मनोदशा थी जिसके कारण मजदूरों ने मौजूदा व्यवस्था को चुनौती दी। बीसवीं शताब्दी में आकर औद्योगिक समाजों के अन्तर्ग्रथित हिस्से के रूप में मजदूर संघों को इज्जत की नजर से देखा गया। विकसित पूंजीवादी मुल्कों में संगठित मजदूर आन्दोलन है। जबकि अविकसित देशों में मजदूर संघ सीमित संख्या में हैं। आज मजदूरों के राष्ट्रीय फेडरेशन होना सम्मान का बात मानी जाती है। चीन में अशांति को खत्म करना है तो मजदूरों को हक देना होगा।          








सोमवार, 10 मई 2010

एप्पल आई फोन की स्क्रीन सफाई से मजदूर अधमरे हुए

       ‘गार्दियन’ ने आज खबर दी है कि लंबे समय तक n-hexane केमीकल के संपर्क में रहने के कारण  एप्पल आई फोन के चीनी कारखाने के मजदूरों के नर्वस सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा और रीड की हड्डी नष्ट होने जाने का खतरा है। उनके हाथ-पैर की मांसपेशियों में दर्द रहने लगता है और कमजोरी आ जाती है। यहां तक कि पैरालिसिस तक हो जाती है। साथ ही इससे मर्दानगी के भी चले जाने का खतरा है। यह बात यूके स्थित रॉयल सोसायटी के पॉल ह्वाइटहेड ने कही है।  
      n-hexane केमीकल के दुष्प्रभाव को उद्योग जगत जानता है। पहले अलकोहल का आई फोन की स्क्रीन को परिष्कार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था लेकिन इससे स्क्रीन देर से सूखता था, लेकिन अब अलकोहल की बजाय n-hexane केमीकल का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। इससे मजदूरों का जीवन असुरक्षित हो गया है।
    इस केमीकल के इस्तेमाल के बाद स्क्रीन को सूखने में कम समय लगता है। यह बात बिंटेक के मैनेजर ने कही है। बिंनटेक के जो कर्मचारी एप्पल में काम करते हैं उन्होंने कहा है कि एप्पल के टच स्क्रीन की सफाई के काम में लगे 44 मजदूर इस केमीकल के इस्तेमाल से प्रभावित हुए हैं। यह घटना  घटी है आईफोन 4जी नामक मॉडल के निर्माण के दौरान।
    जो लोग एप्पल आई फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं वे लोग इल माल की तथाकथित सुंदरता के परे जाकर भी सोचें कि आखिरकार एप्पल आई फोन क्या कर रहा है और आपके हाथ में क्या लेकर आ रहा है। एक मजदूर ने तो यह महसूस किया कि एप्पल की फैक्ट्री में काम करते -करते वह अब तेज गति से चल ही नहीं पाता ।
   एक अन्य मजदूर ने कहा कि एप्पल आईफोन के लिए उन्हें किस तरह की कुर्बानी देनी पड़ रही है वह हम सब जानते हैं। एप्पल आई फोन के कारखाने में काम करने वाले मजदूरों को आलस्य इस कदर घेर लेता है कि वे सुबह उठ ही नहीं पाते।
   विनटेक के कारखाने में n-hexane केमीकल के प्रयोग के कारण सबसे पहले अगस्त 2009 में मजदूर बीमार पड़े जिनके कारण इस केमीकल के इस्तेमाल को बंद करना पडा,चीन में एप्पल बीमार मजदूरों की संख्या लगातार बढ़ रही है।                  



शनिवार, 1 मई 2010

मई दिवस पर विशेष - दादातंत्र ,युद्धतंत्र और भोगतंत्र से तबाह मजदूरवर्ग


      मई दिवस को आज जिस उल्लास और जोशोखरोश के साथ मनाया जाना था वह जोशोखरोश गायब है। मजदूरवर्ग गंभीर संकट में है,यह संकट बहुआयामी है। आर्थिकमंदी में पूंजीपतियों को संकट से उबारने के लिए पैकेज दिए गए लेकिन इन पैकेजों का लाभ मजदूरों तक नहीं पहुँचा है।
     मंदी से पूंजीपतिवर्ग को कम और मजदूरों को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। मंदी की मार से मजदूरों को बचाने के लिए मनमोहन सिंह की सरकार ने कोई ठोस विकासमूलक या मजदूरों की मदद करने वाला कोई भी कदम नहीं उठाया। मंदी की मार के बावजूद पूंजीपतिवर्ग के मुनाफों में कमी नहीं आई जबकि मजदूरों की पामाली कई गुना बढ़ी है। बेकारी कई गुना बढ़ी है। हजारों कारखाने बंद हो गए हैं। मंहगाई आसमान छूने लगी। इसके बावजूद हमारी केन्द्र सरकार ने मजदूरों की रक्षा के लिए,आर्थिक मदद के लिए एक भी कदम नहीं उठाया।
    छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से सरकारी मजदूरों और कर्मचारियों का एक तबका खुश था कि नया वेतनमान आया,लेकिन मंहगाई की छलांग ने नए वेतनमान की खुशी को गायब कर दिया है। जिस गति से सरकारी कर्मचारियों के वेतन बढ़े हैं उसकी तुलना में निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की पगार नहीं बढ़ी है बल्कि उनकी पगार कम हुई है।  
    आज की सच्चाई यह है कि केन्द्र और राज्य सरकारें मिलकर सैन्य और अर्द्ध सैन्यबलों पर जितना खर्च कर रही है उतना विकास पर नहीं। मसलन् माओवाद प्रभावित 136 जिलों में आज अर्द्ध सैन्य आपरेशन पर जितना पैसा खर्च किया जा रहा है,हथियार खरीदने और अस्त्र -शस्त्र तैयार करने पर जितना खर्च किया जा रहा है उतना पैसा गरीबों तक खाद्य सामग्री,स्कूल बनाने,अस्पताल खोलने पर खर्च नहीं हो रहा है।
     हमारे देश में लोकतंत्र है लेकिन समग्रता में बड़ी इमेज बनाकर देखें तो राज्य की लोकतंत्र की नहीं ‘वार स्टेट’ की इमेज दिखाई दे रही है। यह बड़ी भयानक छवि है। उत्तर-पूर्व में सेना घरेलू मोर्चा संभाले है.कश्मीर में सेना घरेलू मोर्चा संभाले है।  माओवाद प्रभावित 136 जिलों में हजारों अर्द्ध सैन्यबल घरेलू मोर्चा संभाले हैं, ऐसी अवस्था में सोचें कि देश में कितने कम इलाके हैं जहां लोकतंत्र की हवा बह रही है ? जो इलाके युद्धतंत्र और दादातंत्र से बचे हैं वहां भोगतंत्र ने कब्जा जमा लिया है।
    देश में बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का अपराधी गिरोहों,साम्प्रदायिक और पृथकतावादी सगठनों, निजी सेनाओं या पार्टी तंत्र के जरिए खुला उल्लंघन हो रहा है। बाकी जो कुछ बचता है उसे सैन्यबलों के जरिए छीन लिया गया है। सैन्यबलों के आपरेशन और मानवाधिकार हनन की अवस्था में लोकतंत्र बंदूकतंत्र या दादातंत्र में बदल गया है।
     दादातंत्र के कारण पश्चिम बंगाल जैसा सुंदर मजदूर राज्य नष्ट हो चुका है। दादातंत्र ने मजदूरवर्ग को सबसे ज्यादा क्षतिग्रस्त किया है। दादातंत्र मूलतः ‘युद्ध तंत्र’ का जुड़वां भाई है। दादातंत्र और युद्धतंत्र एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मजदूरवर्ग के लिए ये दोनों ही फिनोमिना नुकसानदेह हैं।
    दादातंत्र के नियमों का साम्प्रदायिक दलों ,अपराधी गिरोहों,निजी सेनाओं, पृथकतावादी संगठनों ने अपने-अपने इलाकों में जमकर दुरुपयोग किया है। इससे आम मजदूर की हालत खराब हुई है। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक राष्ट्र गायब हो गया है। अब तो धर्मनिरपेक्षता-लोकतंत्र किताबों के पन्नों में ही दिखते हैं बाहर तो दादातंत्र ,युद्धतंत्र और भोगतंत्र के ही दर्शन होते हैं।
    अब साधारण आदमी और खासकर मजदूर ,राजनीति में भाग लेना पसंद नहीं करता। मजदूरों में अ-राजनीतिकरण बढ़ा है। अपराधीकरण बढ़ा है। मजदूरवर्ग में वर्गीयचेतना का ह्रास हुआ है और नग्न अर्थवाद और भोगवाद बढ़ा है। मजदूरों में संस्कृति की बजाय मासकल्चर का प्रभाव बढ़ा है। मार्क्सवादी विश्वदृष्टिकोण की बजाय स्थानीयतावाद बढ़ा है। मजदूरवर्ग और उसके संगठनों की छवि एक कंजरवेटिव दादा संगठन की बनकर रह गयी है। मजदूर संगठन कैसे सौदेबाजी और दबाव की राजनीति के गिरोह में बदल गए ,इसके दर्शन करने हों तो कभी पश्चिम बंगाल चले आएं और कहीं पर भी मजदूरवर्ग के संगठनों के बदले हुए इस रुप को देख सकते हैं।
    विगत 40 सालों में पश्चिम बंगाल में मजदूरवर्ग की इमेज में मूलगामी परिवर्तन आया है। अब मजदूरों के संगठन ,दादावर्ग के संगठन के रुप में ज्यादा पहचाने जाते हैं। मजदूरवर्ग को दादा नामक नए वर्ग ने अपदस्थ कर दिया है।  दादावर्ग यहां का राजनीतिक अभिजन है। यह सभी दलों की साझा पूंजी है।
     मजदूरों की राजनीति करने वालों में असहिष्णुता बढ़ी है। अन्य के प्रति अ-जनतांत्रिक भाव बढ़ा है। इसके कारण बुर्जुआ संगठनों से भी खराब व्यवहार और राजनीति का प्रदर्शन मजदूरवर्ग के संगठन करने लगे हैं। मजदूरों के प्रति साधारण नागरिक की घृणा में इजाफा हुआ है। श्रम और श्रमिकवर्ग के प्रति घृणा में वृद्धि हुई है। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि मजदूर नेताओं ने मजदूरवर्ग को दलीय चुनावी राजनीति का गुलाम बना दिया, दलीय चुनावी हितों को मजदूरवर्ग के हितों की तुलना में तरजीह दी। फलतः आम वातावरण से लोकतंत्र और मजदूरवर्ग गायब हो गया है। काश ! जागरुक बुद्धिजीवी और मार्क्सवादी इसे रोक पाते।          



बुधवार, 28 अप्रैल 2010

भारत बंदः विकासदर का सर्जक मनमोहन सिंह या मजदूरवर्ग ?

      कल मंहगाई के सवाल पर भारतबंद था। यह भारत बंद मंहगाई और अन्य समस्याओं पर जनता के गुस्से का इज़हार है। यह संघर्षशील जनता की हाल के समय में सबसे सार्थक कार्रवाई भी है। जिस समय बंद चल रहा था उसी समय संसद में मंहगाई और दूसरी समस्याओं पर विपक्ष  के बजट कटौती प्रस्तावों पर मतदान हो रहा था और शाम को चैनलों पर बंद और बजट प्रस्तावों पर विपक्ष की हार का चैनल वाले सरकारी भोंपू की तरह प्रचार कर रहे थे। चैनलों की इस निर्लज्ज हरकत की जितनी निंदा की जाए कम है।
     असल में संसद में सरकार जीती और जनता में सरकार हार गयी । मंहगाई आदि समस्याओं पर इतना व्यापक जनाक्रोश हाल के वर्षों में नजर नहीं आया। हमें सोचना चाहिए संसद महान है या जनता महान है ? जनता को मंहगाई के अंधकूप में डालने का जनादेश कांग्रेस को नहीं मिला था। जो सरकार जनादेश के बाहर चली जाए उसे शासन करने का राजनीतिक अधिकार नहीं है।
    एकबार संसद के बारे में कवि धूमिल ने लिखा था मेरी संसद तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल आधा पानी है।
      हमें इस सवाल पर सोचना चाहिए कि कारपोरेट मीडिया को मजदूरवर्ग नापसंद क्यों है ? क्या मजदूरवर्ग और उनके हितैषी संगठनों की राष्ट्र निर्माण में कोई भूमिका नहीं है ? क्या 7-8 या 9 प्रतिशत की विकासदर मनमोहन-सोनिया -प्रणव जैसे नेताओ के श्रम का परिणाम है या मजदूरवर्ग की मेहनत का परिणाम है ? कारपोरेट उत्पादन के लिए किसे श्रेय दें मालिक को या मजदूर को ? चैनलों के बेवकूफ एंकरों से लेकर टॉक शो में शामिल होने वाले भाड़े के कारपोरेट विचारक-राजनीतिज्ञ सिर्फ एक सवाल का जबाव दें देश की उत्पादक शक्ति मजदूर हैं या मनमोहन सिंह ?
    भारत बंद के कवरेज पर चैनलों और खासकर कारपोरेट मीडिया का मजदूरवर्ग के प्रति, बंद के प्रति घृणास्पद रवैय्या देखने लायक था। यह सच है कि बंद को व्यापक सफलता मिली और इसमें वामदलों और मजदूर संगठनों की केन्द्रीय भूमिका थी। यह 13राजनीतिक दलों के द्वारा आयोजित बंद था। कारपोरेट मीडिया ने बंद करने वालों को जनता का विरोधी करार दिया है। बंगला में चर्चित नाम है ‘कर्मनाशा दिन’,इसका खूब प्रचार किया गया।
      कुछ कारपोरेट पैरोकार यह भी तर्क दे रहे थे कि बंद से क्या मंहगाई कम हो जाएगी ? बंद से दैनिक मजदूरों का नुकसान हुआ है। देश को आर्थिक नुकसान हुआ है। असल में इस तरह के तर्क उपयोगितावादी राजनीतिक दर्शन के गर्भ से निकले हैं। यह फिनोमिना अमरीकी विचारकों के द्वारा निर्मित उपयोगितावादी दर्शन की देन है। इसके अनुसार वही करो जो उपयोगी हो। वही पढ़ो जो उपयोगी हो। जिससे काम बने उसे दोस्त बनाओ। उपयोगी नहीं तो बेकार है। येनकेन प्रकारेण काम बनाओ।  इस तरह के चिंतन का कारपोरेट मीडिया विज्ञापनों से लेकर समाचारों तक अहर्निश प्रचार चल रहा है।यह मूलतः निहित स्वार्थी असामाजिक दर्शन है।
    फिलहाल हम मीडिया के द्वारा बंद और मजदूरवर्ग के प्रति व्यक्त नजरिए पर गंभीरता से विचार करें।  
     टेलीविजन का मजदूरवर्ग के साथ गहरा अंतर्विरोध है। टेलीविजन की प्रकृति अ-जनतांत्रिक है। जबकि मजदूरवर्ग की प्रकृति जनतांत्रिक है। मजदूरों के मसले अमूमन खबर नहीं बनते। खबर तब ही बनते हैं जब मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है। मजदूरवर्ग की खबरें सामान्य खबर की कोटि में नहीं आतीं। ये वर्ग विशेष की खबरें हैं। टेलीविजन हमेशा इस वर्ग की खबरों को सामान्य खबर की कोटि में रखकर पेश करता है।    
      टेलीविजन के लिए मजदूरवर्ग की हड़ताल और आम जनता के बीच अंतर्विरोध है। जबकि अवधारणात्मक और सामाजिक तौर पर मजदूरवर्ग के संघर्षों का आम जनता के हितों के साथ अंतर्विरोध नहीं है और न टकराहट है। किंतु ज्योंही मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है अथवा अपने हकों की लड़ाई शुरू करता है उसका समूचे समाज के साथ अंतर्विरोध दिखाने पर टेलीविजन जोर देने लगता है। टेलीविजन यह भूल जाता है कि जिस तरह जनतंत्र में नागरिकों के हक होते हैं, जिम्मेदारियां होती हैं,उसी तरह मजदूरवर्ग के भी हक होते हैं,जिम्मेदारियां होती हैं।
      जिस तरह नागरिकों को अपने सामान्य जीवनयापन की अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती है, उसी तरह मजदूरवर्ग को भी सामान्य नागरिक परिवेश, आवश्यक सुविधाएं और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण की जरूरत होती है।
    टेलीविजन प्रस्तुतियों में मजदूरवर्ग की हड़ताल हो या सामान्य राजनीतिक कार्रवाई हो आदि सभी मामलों में टेलीविजन पूर्वाग्रह से काम लेता है।जब तक हड़ताल की संभावना नहीं होती तब तक मजदूरवर्ग को टेलीविजन पर्दे पर आने नहीं दिया जाता।   
     टेलीविजन जब हड़ताल की खबर का प्रसारण करता है तो पहला संदेश यह देता है कि यूनियनवाले आर्थिक स्थिति बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यूनियन के नेता की छवि हड़ताली नेता के रूप में पेश की जाती है। आम तौर पर हड़ताल की खबर को विकास विरोधी खबर के तौर पर पेश किया जाता है। उन तत्वों,संगठनों आदि पर बल होता है जो हड़ताल विरोधी होते हैं। उनके बयानों को बगैर किसी प्रमाण के पेश किया जाता है। इसके विपरीत मजदूरों के प्रामाणिक बयानों और तथ्यों को छिपाया जाता है। हड़ताल के मुद्दों को तमाम किस्म की आत्म- सेंसरशिप और कारपोरेट सेंसरशिप से गुजरना होता है। उन्हें चलताऊ ढ़ंग से पेश किया जाता है।
     आम तौर पर मजदूरों के बारे में टेलीविजन में मजदूर विरोधी लोग ज्यादा बोलते नजर आते हैं। टेलीविजन कैसे मजदूर विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करता है इसका आदर्श नमूना है टेलीविजन पर आने वाली व्यापारिक खबरें। इन खबरों में जब कभी यह बताया जाता है कि फलां-फलां कंपनी ने इस तिमाही या साल में मुनाफा कमाया तो इसका श्रेय मालिक को दिया जाता है न कि मजदूरों को।
    आज हिन्दुस्तान की ज्यादातर मुनाफा कमाने वाली कंपनियां मजदूरों के श्रम के कारण मुनाफे पर चल रही हैं। किंतु कोई कंपनी जब मुनाफा कमाती है तो टेलीविजन पर्दे पर मालिक या मुख्य प्रबंधक की छवि दिखाई देती है कंपनी के मजदूर नेता की छवि दिखाई नहीं देती।
    मजदूरों के जीवन में सालों-साल जो कुछ भी घटता है उसकी ओर टेलीविजन कभी ध्यान नहीं देता। किंतु हड़ताल पर तुरंत ध्यान देता है। हड़ताल के पहले मजदूर किस तरह की मुसीबतों का सामना करते रहे हैं,उनके घरों में किस तरह की मुश्किलों से परिवारीजनों को गुजरना पड़ा है। बच्चे समय पर स्कूल जा पाते हैं या नहीं। मजदूरों की औरतों को किस तरह की मुश्किलों से दो-चार होना पडता है। मजदूर परिवार को दो जून की रोटी मिल रही है या नही ? ये सारी चिन्ताएं टेलीविजन की नहीं है।
      टेलीविजन कैमरा मजदूर बस्तियों में प्रवेश ही नहीं करता। कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि आखिरकार मजदूर कैसे रहते हैं ? मलिन बस्तियों में कैमरा जाएगा,वेश्यालयों और वेश्या बस्तियों में टेलीविजन वाले जाएंगे किंतु मजदूर बस्तियों में नहीं जाएंगे । इसका प्रधान कारण यह है कि मजदूर परजीवी नहीं है। वह उत्पादक शक्ति है। समाज को पैदा करके देता है। कैमरे में यदि उत्पादक शक्तियों का संसार उजड़ा हुआ नजर आएगा इससे मीडिया के उस प्रचार की पोल खुल जाएगी कि मजदूरों को बहुत वेतन मिलता है। सामान्य तौर पर पूंजीपतिवर्ग की छोटी सी समस्या भी खबर बन जाती है किंतु मजदूरों के बड़े-बड़े हादसे भी खबर नहीं बन पाते।
    सामान्य तौर पर धनियों की बस्ती में  कोई चोरी की घटना हो जाती है तो मुख्य खबर बन जाती है किंतु मजदूरों की बस्तियों, मलिन बस्तियों में गुंड़े सनसनाते घूमते रहते हैं। उत्पीड़न करते रहते हैं।किंतु खबर नहीं बन पाती। सवाल उठता है कि मजदूर रैली या प्रदर्शन या धरना या हड़ताल क्यों करते हैं ? क्या  वे काम चोर हैं ? क्या उनके कारण पूंजीपति के मुनाफों में कमी आई है ?जी नहीं।
   मजदूर हड़ताल या रैली तब निकालते हैं जब प्रशासन उनकी तकलीफों की तरफ ध्यान नहीं देता। यहां तक कि उनकी शिकायतों को भी कोई नहीं सुनता। मजदूर शौकिया तौर पर हड़ताल या रैली के अस्त्र का इस्तेमाल नहीं करते। बल्कि मजबूरी में,अपनी बातों को प्रशासन तक प्रभावशाली रूप में पहुँचाने के लिए ऐसा करते हैं। ये उनकी अभिव्यक्ति के रूप हैं।
    टेलीविजन अपनी अभिव्यक्ति पर किसी भी किस्म का हमला बर्दाश्त नहीं कर सकता किंतु समाज के कमजोर तबकों खासकर उत्पादक शक्तियों की अभिव्यक्ति के रूपों के खिलाफ माहौल बनाने में सबसे आगे रहता है। यही मीडिया का अधिनायकत्व है।इससे जनतंत्र का विकास बाधित होता है।
    

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

पुस्‍तक अंश 'भूमंडलीकरण और ग्‍लोबल मीडि‍या', 'टेलीवि‍जन में मजदूरवर्ग का अधूरा आख्‍यान'


टेलीविजन का मजदूरवर्ग के साथ गहरा अंतर्विरोध है। टेलीविजन की प्रकृति अ-जनतांत्रिक है। जबकि मजदूरवर्ग की प्रकृति जनतांत्रिक है। मजदूरों के मसले अमूमन खबर नहीं बनते। खबर तब ही बनते हैं जब मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है। मजदूरवर्ग की खबरें सामान्य खबर की कोटि में नहीं आतीं। ये वर्ग विशेष की खबरें हैं। टेलीविजन हमेशा इस वर्ग की खबरों को सामान्य खबर की कोटि में रखकर पेश करता है। टेलीविजन के लिए मजदूरवर्ग की हड़ताल और आम जनता के बीच अंतर्विरोध है। जबकि अवधारणात्मक और सामाजिक तौर पर मजदूरवर्ग के संघर्षों का आम जनता के हितों के साथ अंतर्विरोध नहीं है और न टकराहट है। किंतु ज्योंही मजदूरवर्ग हड़ताल पर जाता है अथवा अपने हकों की लड़ाई शुरू करता है उसका समूचे समाज के साथ अंतर्विरोध दिखाने पर टेलीविजन जोर देने लगता है। टेलीविजन यह भूल जाता है कि जिस तरह जनतंत्र में नागरिकों के हक होते हैं, जिम्मेदारियां होती हैं,उसी तरह मजदूरवर्ग के भी हक होते हैं,जिम्मेदारियां होती हैं। जिस तरह नागरिकों को अपने सामान्य जीवनयापन की अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती है, उसी तरह मजदूरवर्ग को भी सामान्य नागरिक परिवेश, आवश्यक सुविधाएं और सौहार्द्रपूर्ण

वातावरण कीजरूरत होती है।

टेलीविजन प्रस्तुतियों में मजदूरवर्ग की हड़ताल हो या सामान्य राजनीतिक कार्रवाई हो आदि सभी मामलों में टेलीविजन पूर्वाग्रह से काम लेता है।जब तक हड़ताल की संभावना नहीं होती तब तक मजदूरवर्ग को टेलीविजन पर्दे पर आने नहीं दिया जाता। टेलीविजन जब हड़ताल की खबर का प्रसारण करता है तो पहला संदेश यह देता है कि यूनियनवाले आर्थिक स्थिति बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यूनियन के नेता की छवि हड़ताली नेता के रूप में पेश की जाती है। आम तौर पर हड़ताल की खबर को विकास विरोधी खबर के तौर पर पेश किया जाता है।उन तत्वों,संगठनों आदि पर बल होता है जो हड़ताल विरोधी होते हैं। उनके बयानों को बगैर किसी प्रमाण के पेश किया जाता है। इसके विपरीत मजदूरों के प्रामाणिक बयानों और तथ्यों को छिपाया जाता है। हड़ताल के मुद्दों को तमाम किस्म की सेंसरशिप से गुजरना होता है। उन्हें चलताऊ ढ़ंग से पेश किया जाता है। आम तौर पर मजदूरों के बारे में टेलीविजन में मजदूर विरोधी लोग ज्यादा बोलते नजर आते हैं। टेलीविजन कैसे मजदूर विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करता है इसका आदर्श नमूना है टेलीविजन पर आने वाली व्यापारिक खबरें। इन खबरों में जब कभी यह बताया जाता है कि फलां-फलां कंपनी ने इस तिमाही या साल में मुनाफा कमाया तो इसका श्रेय मालिक को दिया जाता है न कि मजदूरों को। आज हिन्दुस्तान की ज्यादातर मुनाफा कमाने वाली कंपनियां मजदूरों के श्रम के कारण मुनाफे पर चल रही हैं। किंतु कोई कंपनी जब मुनाफा कमाती है तो टेलीविजन पर्दे पर मालिक या मुख्य प्रबंधक की छवि दिखाई देती है कंपनी के मजदूर नेता की छवि दिखाई नहीं देती। मजदूरों के जीवन में सालों-साल जो कुछ भी घटता है उसकी ओर टेलीविजन कभी ध्यान नहीं देता। किंतु हड़ताल पर तुरंत ध्यान देता है। हड़ताल के पहले मजदूर किस तरह की मुसीबतों का सामना करते रहे हैं,उनके घरों में किस तरह की मुश्किलों से परिवारीजनों को गुजरना पड़ा है। बच्चे समय पर स्कूल जा पाते हैं या नहीं। मजदूरों की औरतों को किस तरह की मुश्किलों से दो-चार होना पडता है। मजदूर परिवार को दो जून की रोटी मिल रही है या नही ? ये सारी चिन्ताएं टेलीविजन की नहीं है।

टेलीविजन कैमरा मजदूर बस्तियों में प्रवेश ही नहीं करता।कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती कि आखिरकार मजदूर कैसे रहते हैं ?मलिन बस्तियों में कैमरा जाएगा,वेश्यालयों और वेश्या बस्तियों में टेलीविजन वाले जाएंगे किंतु मजदूर बस्तियों में नहीं जाएंगे । इसका प्रधान कारण यह है कि मजदूर परजीवी नहीं है। वह उत्पादक शक्ति है। समाज को पैदा करके देता है। कैमरे में यदि उत्पादक शक्तियों का संसार उजड़ा हुआ नजर आएगा इससे मीडिया के उस प्रचार की पोल खुल जाएगी कि मजदूरों को बहुत वेतन मिलता है। सामान्य तौर पर पूंजीपतिवर्ग की छोटी सी समस्या भी खबर बन जाती है किंतु मजदूरों के बड़े-बड़े हादसे भी खबर नहीं बन पाते। सामान्य तौर पर धनियों की बस्ती में कोई चोरी की घटना हो जाती है तो मुख्य खबर बन जाती है किंतु मजदूरों की बस्तियों, मलिन बस्तियों में गुंड़े सनसनाते घूमते रहते हैं। उत्पीड़न करते रहते हैं।किंतु खबर नहीं बन पाती। सवाल उठता है कि मजदूर रैली या प्रदर्शन या धरना या हड़ताल क्यों करते हैं ? क्या वे काम चोर हैं ? क्या उनके कारण पूंजीपति के मुनाफों में कमी आई है ?जी नहीं।

मजदूर हड़ताल या रैली तब निकालते हैं जब प्रशासन उनकी तकलीफों की तरफ ध्यान नहीं देता। यहां तक कि उनकी शिकायतों को भी कोई नहीं सुनता। मजदूर शौकिया तौर पर हड़ताल या रैली के अस्त्र का इस्तेमाल नहीं करते। बल्कि मजबूरी में,अपनी बातों को प्रशासन तक प्रभावशाली रूप में पहुँचाने के लिए ऐसा करते हैं। ये उनकी अभिव्यक्ति के रूप हैं। टेलीविजन अपनी अभिव्यक्ति पर किसी भी किस्म का हमला बर्दाश्त नहीं कर सकता किंतु समाज के कमजोर तबकों खासकर उत्पादक शक्तियों की अभिव्यक्ति के रूपों के खिलाफ माहौल बनाने में सबसे आगे रहता है।यही मीडिया का अधिनायकत्व है।इससे जनतंत्र का विकास बाधित होता है।

मीडिया का एक रूप वह भी है जिसे हम 'नागरिक पत्रकारिता' के नाम से जानते हैं। नागरिक पत्रकारिता साधारण लोगों की चुनाव के समय मदद करती है।मतदाताओं को समूह में गोलबंद करती है।साम्प्रदायिक ,धार्मिक विद्वेष,जातिगत संकीर्णता,स्त्री उत्पीडन,बाल शोषण आदि के खिलाफ प्रचार करती है। हमें कायदे से इस तरह की पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य का समाचारों में ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए।इस परिप्रेक्ष्य के लिए जरूरी है कि राजनीति के बारे में ज्यादा से ज्यादा सोचें। राजनीति के बेहतर आयामों को सामने लाएं। विभिन्न सामाजिक समूहों की राजनीति में हिस्सेदारी को सुनिश्चित बनाएं। यदि किसी क्षेत्र विशेष में अपराध पनप रहे हैं तो केन्द्रित रूप से उनको उजागर करना।जनता में मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता पैदा करना।

नई सूचना और मीडिया तकनीकी जनतंत्र की सेवा के लिए है। जनतंत्र के निषेध के लिए नहीं है। आज किसी भी पत्रकार के पास तकनीकी ने शिकायत का अवसर नहीं छोड़ा है। 'जगह के अभाव' और 'समय के दबाव' और 'संसाधनों का अभाव' के नाम पर आज कोई भी पत्रकार जनता की उपेक्षा नहीं कर सकता। इंटरनेट ने इन तीनों कारणों की छुट्टी कर दी है। आज हमारे पास एक दर्जन से ज्यादा समाचार चैनल हैं। किंतु किसी चैनल का लक्ष्य जन सेवा का मिशन नहीं है। बल्कि ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं की मार्केटिंग करना इनका प्रधान लक्ष्य है। समाचार चैनलों में एक-दूसरे से बेहतर खबरें देने की होड़ नहीं है। बल्कि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन पाने की होड़ लगी है। उनमें चर्चित व्यक्तित्व को दिखाने ,अपराध और हिंसा की खबर दिखाने, मनोरंजन और खेल की खबरें दिखाने,उसमें भी सीमित अवसरों पर विशेष कार्यक्रम दिखाने की प्रवृत्ति मिलती है। इन दिनों समाचार चैनल व्यवहार में स्कण्डल चैनल के रूप में काम कर रहे हैं। किसी ठोस मसले पर वृत्तचित्र यदा-कदा ही सामने आते हैं। किसी ठोस समस्या पर वृत्तचित्र दिखाना मुश्किल हो गया है।

नई मीडिया तकनीकी ने निजी और सामाजिक की परिभाषा बदल दी है। कल तक जो निजी मसला था। वह आज सार्वजनिक हो चुका है। जो सार्वजनिक था वह निजी बन गया है। मीडिया इस संबंध में प्रतिगामी नजरिए से काम ले रहा है। साधारण लोगों से लेकर बड़े लोगों तक के निजी मसलों पर चटखारे लेकर मीडिया जिस तेज गति से सक्रिय होता रहा है। वह माध्यम अध्येताओं के लिए चिन्ता की बात है। आज समाचार चैनल निजी मसलों पर जिस तरह ध्यान दे रहो हैं उस तरह सार्वजनिक हित के सवालों पर बहस नहीं चला रहे हैं। आज चैनलो की रूचि इसमें है कि किस राजनीतिज्ञ या चर्चित मीडिया व्यक्तित्व की सेक्स जिन्दगी या निजी जिन्दगी कैसी है ? वह इस क्षेत्र में किस तरह के घोटाले कर रहा है। किंतु चैनलों ने कभी किसी बड़े मीडिया प्रतिष्ठान में संपादक या अन्य के द्वारा किए जा रहे स्त्री शोषण, परपीडक आनंद या स्त्री रिपोर्टर के यौन शोषण के प्रसंगों पर कभी कुछ क्यों नहीं कहा। अमेरिका में बिल क्लिंटन के सेक्स स्कैण्डल को जिस तरह उछाला गया क्या मीडिया वाशिंगटन पोस्ट के किसी प्रख्यात पत्रकार द्वारा किए जा रहे सेक्स कांड के बारे में बता सकता है ? जी नहीं। यदि चैनल ऐसा करने लगे तो पत्रकारों की साख ही खत्म हो जाएगी। चैनलों के द्वारा निजी मसलों को राष्ट्रीय बनाने के पीछे मुख्य कारण है अपनी रेटिंग बढ़ाना,ज्यादा विज्ञापन पाना, जनता का वाजिब मुद्दों से ध्यान हटाना। इन दिनों मीडिया में जनतंत्र के मुद्दे गायब हैं। जनता को सही अर्थ में मीडिया ने परिभाषित करना बंद कर दिया है। कायदे से मीडिया को जनतंत्र के संसाधनों का खजाना बनाया जा सकता है। विभिन्न मुद्दों ,सवालों,घटनाओं और खबरों के बारे में तथ्यपूर्ण जानकारी देना मीडिया की भूमिका है। विभिन्ना नजरिए से इस कार्य को किया जाना चाहिए।

विभिन्न टीवी चैनलों को गौर से देखें तो पाएंगे कि वहां ताजा कार्यक्रम बहुत कम मात्रा में दिखाए जा रहे हैं।सभी चैनलों पर पुराने और बासी कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है।अपवाद स्वरूप सिर्फ खेल और चुनाव के कार्यक्रम ताजा होते हैं।बाकी सब कुछ पुराना दिखाया जा रहा है। यह सिलसिला तब से शुरू हुआ जब से हमने डिजिटल तकनीकी के युग में प्रवेश किया। खासकर डिजिटल पर्सनल वीडि‍यो रिकॉर्डर के आने के बाद सारी दुनिया में टीवी का चरित्र बदल गया। इसने कार्यक्रम देखने के मामले में समय की बंदिश खत्म कर दी। टीवी के जरिए लाइव प्रसारण की जो धारणा जुड़ी थी उसे खत्म कर दिया। एक जमाने में माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट ने कहा था '' हम अमेरिकी लोग जब किसी घटना को राष्ट्रीय स्तर पर महसूस करते हैं तो उसका प्रधान कारण है कि टीवी पर हम उसे एक साथ देखते हैं। इसी अर्थ में टीवी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। क्योंकि घटना के प्रसारण के क्षण में हम एक साथ होते हैं।'' इसके विपरीत न्यूयार्क टाइम्स ने जनवरी 1999 के सम्पादकीय में लिखा कि ''टीवी हमें अदृश्य भविष्य की ओर ले जा रहा है। जिसके कारण हम राष्ट्रीय बोध की भावना खोते जा रहे हैं। 'डिजिटल पर्सनल वीडियो रिकॉर्डर ' ने इस बोध को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह संभव है कि परंपरागत टीवी तुरंत न मरे। किंतु यह सच है कि धीरे-धीरे मर जाएगा।''

नए तकनीकी दौर में टीवी या तो पूरी तरह अमरीका समर्थक है या पूरी तरह अमरीका विरोधी है। यह स्थिति टीवी के बुनियादी चरित्र से मेल नहीं खाती। प्रसिध्द फ्रांसीसी माध्यम विशेषज्ञ रूडोल्फ अर्नहाइम ने लिखा है कि ''टेलीविजन में यथार्थ की मौलिक कलात्मक प्रस्तुति के तत्व नहीं हैं। बल्कि वह यथार्थ से हमारा संबंध पुनर्निर्धारित करता है। वह हमें बेहतर ढ़ंग से शिक्षा देता है कि बहुआयामी और बहुस्तरीय घटनाओं की उत्पत्ति एक ही साथ हो रही है।वह ऐसी स्थिति की ओर ले जाता है जहां पर हमारी शारीरिक संरचना की धीमी गति और आंखों की कमी उजागर होती है। इस प्रक्रिया में हम ज्यादा भद्र ,कम आत्मकेन्द्रित बनते हैं। यह हमारे अनुभवों को व्यापक बनाने का औजार है। इस माध्यम ने हमारी संवेदनाओं पर समय और देश की सीमाओं का अतिक्रमण करके विजय प्राप्त की है। यह हमारी संवेदनाओं को अतिरिक्त तौर पर समृध्द बनाता है।''

अपराध और हिंसा की खबरों के अलावा भी खबरें हैं उनके साथ संतुलन कायम करते हुए खबरें प्रसारित की जानी चाहिए। एक खास किस्म के हिंसाचार और अपराध की ही निरंतर खबरें केन्द्र में बने रहने का अर्थ है कि अन्य किसी क्षेत्र में कोई घटना नहीं घट रही है। इस तरह जो समाचार आ रहे हैं वे असंतुलित हैं,सामाजिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं,यहां तक विषाक्त भी हैं। यह पत्रकारिता नहीं नशीली पत्रकारिता है। मीडिया इस तरह की खबरों के जरिए पेट भर देना चाहता है,समाचार के समूचे समय को घेर लेना चाहता है। इसके पीछे प्रधान कारण है रेटिंग और ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की अंतहीन भूख। इसके कारण पत्रकारिता के मूल्यों का क्षय हो रहा है। हम ज्यादा से ज्यादा मीडिया उन्माद के शिकार होते जा रहे हैं। इस चक्कर में प्रत्येक खबर बगैर सांस लिए पेश की जा रही है। जिससे पृथ्वी कांपने लगती है। टीवी समाचार प्रस्तोताओं ने पीत पत्रकारिता के सभी फार्मूलों को आत्मसात कर लिया है। अब प्रत्येक दिन एक ही काम है खबरों के जरिए मनोरंजन करना। कायदे से विचार करें तो हम खबरें मनोरंजन के लिए नहीं देखते बल्कि वस्तुगत ढ़ंग से किसी घटना या समस्या के बारे में सूचनाएं हासिल करने के लिए देखते हैं। समाचार की आत्मा है सत्य।

मनोरंजन की पध्दति ( अतिरंजना, यथार्थ और फैंटेसी से पलायन) का जब समाचार में इस्तेमाल किया जाएगा तो इससे अनैतिक कार्यव्यापार में इजाफा होगा। समाचार में नीतिहीनता का प्रवेश होगा। पत्रकारिता की सत्य को उद्धाटित करने की भूमिका खत्म हो जाएगी। अब हम समाचारों में शो मैन की पध्दति का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिसमें हिंसा,सेक्स,उत्तोजना और सेलिब्रेटी के ऊपर फोकस रहता है। हमारे समाचार चैनल स्थानीय खबरों के नाम पर हिंसा और अपराध की खबरों के प्रसारण में इस तरह व्यस्त हो गए हैं कि उससे दर्शक को हिंसा अथवा अपराध के बारे कोई शिक्षा नहीं मिलती। वे अपराध और हिसा के कवरेज को लेकर गुणवत्ताापूर्ण कवरेज या रिपोर्टिंग के सभी मानकों को तोड़ रहे हैं। वे दर्शकों को शिक्षित करने की बजाय भड़काने का काम कर रहे हैं। इस संदर्भ में बांग्ला चैनलों के द्वारा सिंगूर के किसान आंदोलन को लेकर भड़काऊ शैली ,पुस्तक मेले को लेकर उन्माद पैदा करने वाली शैली,निठारी कांड को लेकर उन्माद पैदा करने वाली पध्दति का इस्तेमाल अंतत: दर्शकों की गलत शिक्षा कर रहा है। हमारे समाचार चैनलों का सबसे बड़ा स्रोत हैं विज्ञापन। वे उसका आर्थिक और धार्मिक तत्व हैं। धार्मिक चैनलों से लेकर समाचार चैनलों तक सभी में तीन फार्मूलों के आधार पर समाचार प्रचारित किए जा रहे हैं और वह है 1.शोमैनशिप का फार्मूला,2.अंगभंग और 3.त्रुटिपूर्ण प्रस्तुति।

अंग-भंग की खबरों में आतंकवाद,स्वाभाविक अथवा मानवनिर्मित विध्वंस और अपराध खबरें आती हैं। हमारी रात की खबरों में पचास फीसदी से ज्यादा खबरें इन क्षेत्रों की होती हैं।इनमें भी सबसे ज्यादा अपराध,उसके बाद विध्वंस और सबसे कम युध्द की खबर होती हैं। अंग-भंग की खबरें या हिंसाचार की खबरें सबसे ज्यादा बिकती हैं इसके लिए सरल दिमाग की जरुरत होती है।इसमें पुनरावृत्तिा का तत्व प्रमुख होता है। पुनरावृत्ति के जरिए संघर्ष,उडान,खून और क्षेत्र विशेष के तत्व का इस्तेमाल किया जाता है।

त्रुटिपूर्ण फार्मूले के तहत हमारे साथ खबर का लगाव पेश किया जाता है और हमारे साथ उसके जीवंत संबंध को स्थापित करने की कोशिश की जाती है। समाचार वाले ऐसा करते समय हमें कृतार्थ करते हैं। हम इस फ्रेम में पेश की गई खबरों को अथवा त्रुटिपूर्ण अपील वाली खबरों को समाचार के प्रोमोज,एंकर की बतकही या चाट,हल्की खबरों में देख सकते हैं ,और सेलिब्रेटी न्यूज असल में त्रुटिपूर्ण खबर का इंडेक्स तैयार करती है। ऐसी खबरें रात के समाचारों में तकरीबन पैंतीस फीसदी तक होती हैं। हिंसा की खबरें बुध्दिमत्तापूर्ण तरीके से भी पेश की जा सकती हैं ,नागरिक के सामाजिक सरोकारों को निर्मित करने में मददगार साबित हो सकती हैं। अथवा हिंसा की खबरें सिर्फ बिना सोचे समझे पेश कर दी जाती हैं और परोस दी जाती हैं। टीवी चैनलों का मुख्य लक्ष्य है दर्शक का ध्यान खींचना,किंतु अच्छी टीवी पत्रकारिता के लिए जरुरी है कि एक अच्छा वीडियो फुटेज हो, अच्छा विचार हो,आप ज्योंही इसे पेश करेंगे आपका दर्शक भाग जाएगा। इसका अर्थ है विचार और इमेज बोरिंग होते हैं,धीमे होते हैं,वे दर्शक का मनोरंजन नहीं करते। जबकि समाचार चैनलों का लक्ष्य है दर्शक का ध्यान खींचना,इस काम में उन्हें एक अच्छे वीडियो इमेज और अच्छे विचार से मदद नहीं मिलती। वे भावुकता को उभारने वाली इमेजों को पेश करते हैं। उसी को अच्छा टेलीविजन कहते हैं। उनके लिए उस सामग्री के लिए समय नहीं है जो उनके पास नहीं है। वे विश्लेषण के पक्ष में नहीं हैं,जटिलता के पक्ष में नहीं हैं।मनुष्य के दिमाग की गहराईयों में जाने के लिए जिस गंभीरता की जरूरत होती है उसके पक्ष में नहीं हैं। अच्छा टेलीविजन मानवीय बुध्दि की उत्तोजक पुनरावृत्तिा वाली मानसिकता के साथ कदम मिलाकर चलता है। टेलीविजन खबरें जल्दी में होती हैं सारे दिन उन्हें जिस उद्विग्नता के साथ तैयार किया जाता है शाम होते ही उन्हें जल्दी-जल्दी परोस दिया जाता है। वे इतनी जल्दी में होते हैं कि खबरों की पुनरावृत्ति के अलावा वे और कोई काम नहीं करते।

आप चाहे जितने बुध्दिमान और विद्वान रहें वे आपका ध्यान खींचकर रहेंगे। इन बातों को कहने का अर्थ यह नहीं है कि टीवी में काम करने वाले लोग पेशेवर नहीं हैं। अथवा टीवी में कोई भी पत्रकार सही ढ़ंग से काम नहीं करता,बल्कि यह कह सकते हैं कि टीवी में तकनीकी क्षेत्र में काम करने वाले लोग बड़े परिश्रमी होते हैं,यहां तक कि कई प्रतिभाशाली पत्रकार भी टीवी में हैं। इसके बावजूद यह कहना पड़ेगा कि टीवी का पेशेवराना काम पेशेवर पत्रकारिता की कोटि में नहीं आता।यह वीडियो प्रोडक्शन का पेशेवर रुप है। इसमें समाचार की खोज, संकलन और रिपोर्टिंग का महत्व नहीं है बल्कि आप शो कैसा पेश करते हैं उसका महत्व है। टीवी खबरों में कभी-कभार ही ऐसी स्टोरी आती है जो उसने स्वयं खोजी हो। टीवी के लिए स्टोरी खोजने के लिए जिस परिश्रम और धन की जरुरत है वह उसके पास नहीं है अथवा वे खर्च करना नहीं चाहते। यही वजह है कि वे ज्यादातर समाचार पत्रों में छपी खबरों का पीछा करते हैं और जन-संपर्क के फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। यही उनकी स्टोरी की राय का प्राथमिक स्रोत होता है। स्टोरी चयन करते समय भावनाओं को भड़काने वाली स्टोरियों को प्राथमिकता से चुना जाता है। इसमें दर्शक को सूचना देने या उसका नजरिया बनाने का भाव नहीं होता। कभी यह भी होता है कि जो स्टोरी दर्शक की राय बना रही है या उसे सूचनाएं दे रही है उसके साथ ही भावकुतापूर्ण स्टोरी पेश कर दी जाती है।

सच यह है कि गुणवत्ताापूर्ण खबरों के लिए व्यापक संसाधन और ज्यादा प्रयासों की जरुरत होती है। किंतु चैनलों के पास इस सबका अभाव दिखाई देता है। वे अपनी खबरों के मामले में गंभीरता के साथ परिश्रम नहीं करते। संस्थानगत स्मृति से जुड़ी खबरें, वीट्स, अथवा समुदाय विशेष की खबरें न्यूनतम होती हैं। अथवा दुर्लभ होती हैं। वे ज्यादातर मामलों में समाचारपत्रों की खबरों पर ही निर्भर करते हैं। उनके यहां तथ्यों की वैधता को जांचने का कोई ढ़ांचा नहीं है अथवा उसमें कमजोरी रहती है। जैसाकि कहा जाता है कि व्यावसायिक संस्कृति में गंभीरता का दाम नहीं है। वीडियो न्यूज के वातावरण में काम करना पाठ की संस्कृति नहीं है। पाठ की संस्कृति का स्टोरी के क्षेत्र में खोज, चयन और पत्रकारिता के नियम ये तीनों चीजें मिलकर पत्रकारिता का निर्माण करते हैं। जबकि वीडियो समाचार की आदत और संस्कृति किसी भी स्टोरी को भावुकता उभारने वाले प्रोडक्ट के रुप में पेश करती है। इसी आधार पर उसका संपादन करके प्रसारित किया जाता है।

टेलीविजन पत्रकारों की ये सारी कमजोरियां बेकार हैं अथवा अप्रासंगिक हैं। क्योंकि उनका सबसे बड़ा काम तो यही है कि वे शाम को खबर के ऊपर सबका ध्यान खींच लेते हैं। इसी अर्थ में स्थानीय खबरें लाभकारी होती हैं। हमें इस स्थिति को बदलना चाहिए। हमारे नागरिकों के दिमाग को रोज सीधे,सरलतम चीजों का आदी बनाया जा रहा है। आज सूचना-सम्पन्ना नागरिक को महज उपभोक्ता में तब्दील कर दिया गया है। उसे शिरकत करने के लिए उद्बुध्द करने की बजाय दर्शक बने रहने और बैठे-बैठे मनोरंजन करने का आदी बना दिया गया है। हमें इस स्थिति को तोड़ना चाहिए। हमें सूचना सम्पन्ना नागरिक की जरुरत है, व्यापक सामाजिक हित के सवालों और समस्याओं पर शिक्षित करने वाले मीडिया की जरुरत है। उसी से अच्छा टेलीविजन बनेगा। हमें टीवी को विचारों की प्रतिस्पर्धा, ठोस सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक खबरों का मीडियम बनाना चाहिए, अभी यह भावुक प्रतिस्पर्धा का माध्यम है।

इसी संदर्भ में ज़ीन-लुक-गोदार्द ने कहा था कि '' टीवी विस्मृति के लिए बना है।'' यह तेज और जल्दी ही अपदस्थ कर देने वाला या भुला देने वाला माध्यम है। जबकि साहित्य ऐसा नहीं है। बच्चों के संदर्भ में टीवी हिंसा का सवाल केन्द्रीय सवाल है, टीवी हिंसा का बच्चों पर गहरा असर होता है। टीवी के संदर्भ में अंतर्वस्तु का प्रश्न बड़ा सवाल नहीं है ,बल्कि बच्चों का टीवी देखना और उसकी आदतें सबसे बड़ी समस्या है। बच्चे जब टीवी देखते हैं और उसके आदी बन जाते हैं तो इससे बच्चे की स्वाभाविक ढ़ंग से देखने की दृष्टि बाधित होती है। बच्चे की स्वाभाविक और अनिर्देशित ढ़ंग से खोज करने की मनोदशा पलट जाती है। एक तरुण का यह स्वाभाविक धर्म है कि वह रोज वास्तव जगत के संपर्क में आए,उसका स्पर्श करे, आस्वाद ले,वास्तव जगत को पकड़े या स्पर्श करे, उसकी गंध ले,उसे मेनीपुलेट करे,और यह सब वह अपने द्वारा निर्धारित क्रम के जरिए करे, इस तरह जब बच्चा सक्रिय होता है,खोज करता है तो अपनी बुध्दि का विकास करता है, किंतु ज्योंही वह वीडियो निर्मित जगत के संपर्क में आता है वह इन सब चीजों से वंचित हो जाता है।

टीवी जिस तरह बच्चों की गतिविधियों को अपदस्थ करता है वैसे ही वयस्कों की गतिविधियों को भी अपदस्थ करता है। इसका सीधा परिणाम अपराध रोकने में दिखाई देता है। आज हमारे देश में सबसे ज्यादा टीवी देखा जा रहा है ध्यान रहे टीवी का देखना नागरिक की शिरकत को अपदस्थ करता है। इसका व्यापक संदर्भ सामुदायिक संबंधों और तानेबाने से जुड़ा है।समाज व्यवस्था से जुड़ा है। हम इस सबके लिए क्या कर रहे हैं ? यह सच है कि सब कुछ परिवर्तनीय है। साक्षर और सक्रिय आदमी हमेशा अच्छी चीज की ओर आकर्षित होता है। हमें उसको मद्देनजर रखते हुए योजनाएं बनानी चाहिए। हम टीवी देखने पर अपना जितना कीमती समय खर्च करते हैं उतना समय यदि समाज,घर और परिवार के बीच में खर्च करें तो हम नागरिक के दायित्वों का ज्यादा जिम्मेदारी के साथ निर्वाह कर सकते हैं।

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