रविवार, 8 मई 2016

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क्षण मेरे जीवन के सबसे मूल्यवान क्षण हैं,दुखों में जितना सीखा उतना सुखो में नहीं सीख पाया।रिश्तेदार-सगे -संबंधी-मित्र आदि की पहचान दुख में ही हुई। दुख में किसी को पास नहीं पाया।यह बात आज से पचास पहले जितनी सच थी उतनी ही आज भी सच है।दुख जब आते हैं तो चारों ओर से आते हैं।कोई मदद करने वाला नहीं होता।सारे सामाजिक संबंध बेकार नजर आते हैं।दुख जीवन के अनिच्छित कर्मों में से एक है,दुखों को कभी भूलना नहीं चाहिए।कष्टमय जीवन को जो लोग भूल जाते हैं वे अपने हृदय के द्वार मानवीय संवेदनाओं के लिए बंद कर देते हैं।
मैं जब पैदा हुआ तो माँ की उम्र 13-14 साल रही होगी।उसके लिए बच्चा पैदा करना चमत्कार से कम न था।सुंदर पुत्र संतान को जन्म देकर वह खुश थी,लेकिन भविष्य को लेकर चिंतित और सतर्क । उसके लिए मातृत्व आनंद की चीज थी। वह मातृत्व से नफरत नहीं करती थी और नहीं बोझ समझती थी। उसके लिए मातृत्व स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति जैसा था।
उसके लिए यह विलक्षण स्थिति थी ,एक तरफ मातृत्व का अहं और आनंद, दूसरी ओर अहंकाररहित गौरवानुभूति। मातृत्व को वह सृजन के रूप में देखती थी।दाई की मदद से मेरा जन्म घर में ही हुआ।इस प्रसंग में मुझे हेगेल के शब्द याद आते हैं,हेगेल ने लिखा है, ´सन्तान का जन्म माता-पिता की मृत्यु भी है।बालक अपने स्रोत से पृथक होकर ही अस्त्विमान् होता है।उसके पृथकत्व में माँ मृत्यु की छाया देखती है।´ संभवतःयही वजह रही होगी कि मेरी माँ ने मुझे अपने से कभी दूर नहीं रखा।वह जितनी बेहतर चीजें जानती थीं उनकी कल्पना में रहती थी,उसे अनेक किस्म के हुनर आते थे,जिनको लेकर वह व्यस्त रहती थी।वह कभी उदासीनता या अवसाद में नहीं रहती थी,हमेशा कोई न कोई काम अपने लिए खोज लेती थी।उसकी इसी व्यस्तता ने उसे आत्मनिर्भर और स्वतंत्रता प्रिय बना दिया था।
अमूमन बच्चा माँ पर आश्रित होता है लेकिन मेरे मामले में थोड़ा उलटा था चीजों को जानने के मामले में माँ मुझ पर आश्रित थी,मैं उसे जब तक नहीं बताता वह जान नहीं पाती थी और तुरंत जानना उसकी विशेषता थी,तुरंत जानना और तुरंत जबाव देना।याद नहीं है उसने मुझे कभी पीटा हो,वह नाराज होती थी लेकिन पिटाई नहीं करती थी,जबकि पिता के हाथों दसियों बार पिटा हूँ।उसे समाज को लेकर गुस्सा नहीं था लेकिन असहमतियां थीं,जिनको वह बार-बार व्यक्त करती थी।वह पिता के आचरण से बहुत नाराज रहती थी,उसे असंतोष था कि पिता उसकी बात नहीं मानते बल्कि अपनी माँ की बातें मानते हैं।


उसका स्वभाव शासन करने का नहीं था बल्कि वह शिरकत करने में विश्वास करती थी,कोई उसके ऊपर शासन करे यह वह कभी मानने को तैयार नहीं होती थी।शिरकत वाले स्वभाव के कारण वह अपनी माँ और नानी की प्रतिदिन घरेलू कामों में समय निकालकर मदद करने उनके घर जाती थी,उसको जब मन होता था घर से निकल पड़ती थी,उसे बंदिशें एकदम पसंद नहीं थीं,पिता और दादी उसके इस स्वभाव को जानते थे और उसे आने-जाने में कभी बाधा नहीं देते थे।वह शिरकत वाले स्वभाव के कारण घर में हर काम में दादी की मदद करती थी, वहनियमित सिनेमा देखती थी, पिता हर सप्ताह उसे सिनेमा दिखाने ले जाते थे। जबकि ताईजी की स्थिति एकदम विपरीत थी,वे कभी घर के काम में शिरकत नहीं करती थीं।उसकी शिरकत वाली भावना का सबसे आनंददायी रूप वह होता था जब मैं छत पर पतंग उडाता था और वह छत पर आकर बैठी रहती और सिलाई करते हुए देखती रहती ,उसे हमेशा मेरी चिन्ता रहती कि कहीं बन्दर मुझे काट न लें। वह बंदरों से मुझे बचाने के लिए छत पर डंडा लिए बैठी रहती।तकरीबन यही दशा मेरी भी थी गर्मियों में आलू के पापड़ आदि बनाने में मैं उसकी मदद करता,घंटों छत पर बैठा रहता जिससे पापड़ आदि की बंदरों से रक्षा कर सकूँ। कहने के लिए और भी बच्चे थे घर में लेकिन उसकी विशेष कृपा मेरे ऊपर थी,वह छत पर काम करेगी और मैं बंदरों पर नजर रखूँगा।जैसाकि सब जानते हैं मथुरा में बंदरों की संख्या बहुत है और वे बहुत परेशान करते हैं,नुकसान पहुँचाते हैं,काट लेते हैं।तेज गर्मियों में वह पापड़ आदि बनाने का छत पर काम करती थी और मैं भरी दोपहरी उसको कम्पनी देता था।
वह देखने में बहुत सुंदर थी,सारा शरीर सुंदर गठा हुआ था।हाथों की अंगुलियां कलात्मक थीं। अच्छी बात यह थी बच्चे उसके लिए बंधन या बोझ नहीं थे,वह उनमें आनंद लेती थी और अपना मूल्यवान समय उन पर खर्च करती थी।उसका साहचर्य हम सबमें ऊर्जा भरता था।दिलचस्प बात यह थी कि वह मुझसे कोई भी चीज छिपाती नहीं थी,प्रेम,गुस्सा,आनंद हर चीज मेरे साथ शेयर करती थी,अनेक चीजों की मेरे पास जानकारी होती थी,पिता को पता ही नहीं होता था,पिता पूछते थे तब मैं बताता था।शरीर,सेक्स,कला,सिनेमा,समाचार सब कुछपर उसकी नजर थी और इनसे जुड़ी चीजों पर वह बातें करती रहती थी।उसकी जिज्ञासाएं अनंत थीं,सबसे दुर्लभ चीज यह थी कि वह कभी थकती नहीं थी,उसके शरीर ने जब धोखा दे दिया तब ही वह बैठी,वरना वह कभी खाली नहीं बैठती,उसके पास हमेशा काम रहते।




3 टिप्‍पणियां:

विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...