संदेश

July, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अस्‍ि‍मता और आत्‍मकथा की चुनौति‍यां

राष्ट्रकविरामधारीसिंहदिनकरकेशताब्दीवर्षकेउपलक्ष्यमेंविशेष- अस्मिता और आत्मकथा की चुनौतियां लेखक के विजन का उसके सामयिक सरोकारों के साथ गहरा संबंध होता है। इन दिनों लेखक के बारे में जितनी भी बातें हो रही हैं वे लेखक के दार्शनिक सैध्दान्तिक नजरिए को दरकिनार करके हो रही हैं। लेखक के बारे में हम हल्के -फुलके ढ़ंग या चलताऊ ढ़ंग से सोचा जा रहा है। साहित्य और जीवन से जुड़े गंभीर सवालों से किनाराकशी चल रही है। आज हम लेखक के विजन की बातें नहीं कर रहे बल्कि हल्की-फुल्की चुटकियों के जरिए बहस कर रहे हैं। किसी भी लेखक को पढ़ने का सबसे सटीक प्रस्थान बिंदु है उसका विजन। विजन पर बातें करने का अर्थ है उसके दार्शनिक प्रकल्प में दाखिल होना। बगैर दार्शनिक प्रकल्प में दाखिल हुए किसी भी कवि की कविता या साहित्य को विश्लेषित करना संभव नहीं है। सवाल उठता है रचना का लेखक कौन है ? अमूमन रचना व्यक्तिगत प्रयास के रूप में जानी जाती थी आज रचना का लेखक व्यक्ति नहीं है। बल्कि रचना सामूहिक सृजन की देन है। 'रश्मिरथी' में कर्ण कथा को विषयवस्तु के रूप में चुनकर लेखक ने सर्जक के नए आयाम का उद्धाटन किया है। यह महाभ…

प्रेमचंद जयंती पर विशेष- इति‍हास का आधार प्रेमचंद क्‍यों नहीं

प्रेमचंद जयंती पर विशेष-

इति‍हास का आधार प्रेमचंद क्‍यों नहीं

हिन्दी साहित्य के दो महत्वपूर्ण इतिहास ग्रंथ रामचन्द्र शुक्ल का 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखित ' हिन्दी साहित्य की भूमिका' का प्रकाशन एक दशक के दौरान होता है, यह दशक प्रेमचंद के साहित्य का चरमोत्कर्ष भी है। शुक्लजी और द्विवेदीजी ने प्रेमचंद की उपेक्षा करके क्रमश: तुलसीदास और कबीर को इतिहासदृष्टि का आधार क्यों बनाया ? शुक्लजी ने छायावाद से 'कल्पना' और द्विवेदीजी ने प्रगतिशील आंदोलन से 'विचारधारा' को ग्रहण करते हुए अपनी इतिहासदृष्टि का निर्माण किया। आज ये दोनों ही तत्व अप्रासंगिक हैं। मजेदार बात यह है कि उस समय भी ये दोनों तत्व प्रेमचंद के सामने बौने थे। ऐसी अवस्था में प्रेमचंद को इतिहासदृष्टि का आधार न बनाकर तुलसी और कबीर के आधार पर हिंदी को कैसी इतिहासदृष्टि मिली ? क्या इससे मध्यकालीनबोध पुख्ता हुआ या कमजोर हुआ ? छायावाद और प्रगतिशील आंदोलन अब इतिहास की चीज हैं। किंतु प्रेमचंद नहीं हैं ?
हिंदी के आलोचकगण प्रे…

जेएनयू के महाख्यान की स्मृतियां

- जेएनयू के महाख्यान की स्मृतियां -
- 1-
छात्र राजनीति का महाख्यान है जेएनयू। छात्र अस्मिता की राजनीति का आरंभ सन् 65-66 में बीएचयू में समाजवादियों ने किया और जेएनयू ने उसे सन् 1972-73के बाद से नई बुलंदियों तक पहुँचाया। देश में छात्र अस्मिता और छात्र राजनीति को लोकतांत्रिक बोध देने में एसएफआई की बड़ी भूमिका रही है, खासकर जेएनयू में। जेएनयू लोकतांत्रिक छात्र राजनीति की प्रयोगशाला है। इस प्रयोगशाला के निर्माण में माक्र्सवादियों, समाजवादियों और फ्री थिंकरों की केन्द्रीय भूमिका रही है।
आमतौर पर शिक्षा का देश में जो वातावरण है वह छात्रों को सामाजिक जड़ताओं और रूढियों से मुक्त नहीं करता। इसके विपरीत जेएनयू के संस्थापकों का सपना था शिक्षा को रूढियों और सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का अस्त्र बनाया जाए। शिक्षा केन्द्र वर्जनाओं से मुक्ति के तीर्थ बनें। जेएनयू के वातावरण में सभी किस्म की वर्जनाओं से मुक्ति का संदेश छिपा है। जेएनयू में पढ़ने वाला छात्र सामान्य प्रयत्न से सामाजिक रूढियों और वर्जनाओं से मुक्त होता …

मार्शल मैकलुहान और ग्लोबल विलेज

जगदीश्वर चतुर्वेदी
सुधा सिंह



मैकलुहान ने ग्लोबल विलेज की जब धारणा पेश की तो ज्यादातर विचारकों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया । आज सारी दुनिया में ग्लोबल विलेज की धारणा का धडल्ले से प्रयोग हो रहा है। ग्लोबल विलेज अथवा भूमंडलीय गांव रुपक है। इसके जरिए परवर्ती पूंजीवादी विकास और तद्जनित मीडिया वातावरण और सामाजिक संरचनाओं के अध्ययन में मदद मिलती है। ग्लोबल विलेज में टीवी को आधार बनाकर धारणा पेश की गई थी, इसके अलावा मासकल्चर के विकास को भी इस धारणा को जोड़कर देखना चाहिए। ग्लोबल विलेज का निर्माण ग्लोबल मीडिया प्रसारण और ग्लोबल मासकल्चर के प्रसार के साथ जुड़ा हुआ है।
मैकलुहान ने लिखा '' आज,इलैक्ट्रिक तकनीक के आने के एक शताब्दी से भी ज्यादा समय गुजर जाने के बाद हमने अपने केन्द्रीय नरवस सिस्टम को ग्लोबल के हवाले किया है, भूमंडल के संदर्भ में स्पेस और टाइम दोनों का लोप हो गया है।'' इस नजरिए से यदि बीसवीं शताब्दी को देखें तो एकदम भिन्ना नजारा दिखाई देगा। यही वह शताब्दी है जिसमें दो विश्व…