मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मीडि‍या ,तकनीक,यथार्थ और बौद्रि‍लार्द

ज़ीन बौद्रिलार्द बीसवीं शताब्दी के सबसे चर्चित बुध्दिजीवियों में से एक है। उसके नजरिए से गुजरे बिना उत्तार आधुनिकतावाद और उपभोक्ता समाज के किसी भी सवाल पर चर्चा संभव नहीं है। बौद्रिलार्द ने आलोचना के क्षेत्र में जिस तरह की शोहरत हासिल की है उसके कारण उसे 'आतंकवादी आलोचक' तक कहा गया है। कुछ लोगों ने यहां तक कहा है कि उसके विचार खोखले हैं। अधूरे हैं। किंतु सच यह है कि उसने उत्तर आधुनिक परिस्थितियों के संदर्भ में मार्क्‍सवाद,तकनीक,मीडिया, दर्शन आदि पर नए सिरे से रोशनी ड़ाली है।बौद्रिलार्द का जन्म रीम्स में 27 जुलाई 1929 को हुआ था। उनका पालन-पोषण एकदम परंपरागत वातावरण में हुआ था। सन् 1956 में उन्होंने सैकेण्ड्री स्तर पर समाजशास्त्र का अध्यापन आरंभ किया और यह 1966 तक जारी रहा। सन् 1966 से 1987 तक वह नानटेरी विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया। यहां पर उन्हें प्रख्यात विद्वान लेफेब्रेव के सहयोगी के रूप में काम करने का अवसर मिला। उनका पीएचडी का चर्चित ग्रंथ है '' दि सिस्टम ऑफ ऑब्जेक्ट''। जिसे उन्होंने लेफेब्रेव के निर्देशन में तैयार किया।

बौद्रिलार्द ने आरंभ में जर्मन साहित्य पर कई महत्वपूर्ण काम किए, जिसमें पीटर वायस और बर्तोल्त ब्रेख्त आदि पर लिखी उनकी आलोचनाएं चर्चित हैं। बाद में उन्होंने उपभोक्ता समाज, मासमीडिया, मासकल्चर ,हाइपर रीयलिटी आदि विषयों पर विस्तार से अनुसंधान कार्य किया। आरंभ में उनके लेखन से सिर्फ फ्रेंच पाठक ही वाकिफ थे। बाद में उनकी रचनाओं का जब अंग्रेजी तर्जुमा आया तब उन्हें बाकी विश्व जान पाया। 6मार्च 2007 को पेरिस में उनका देहान्त हुआ। बौद्रिलार्द के नजरिए पर माक्र्स,नीत्शे, फ्रॉयड,लेवीस्त्रास,रोलां बार्थ, थियोदोर एडोर्नो आदि का गहरा असर है। फ्रांस के विभिन्ना संस्थानों में समाजशास्त्र के शिक्षक के रूप में उन्होंने काम किया, इसके अलावा उन्हें बुनियादी तौर पर समाजविज्ञान के उन विचारकों में गिना जाता है जिन्होंने संचार के सेतु या मेडीएशन के रूपों का अध्ययन किया है। संचार के सेतुओं की मीमांसा के क्षेत्र में बौद्रिलार्द का कोई जबाव नहीं है। संचार के सेतुओं की मीमांसा के क्रम में ही उन्होने उपभोक्तावाद,संचार की उच्च तकनीक के सामाजिक प्रभावों से लेकर लिंगभेद तक के सवालों पर विस्तार से विचार किया है। अपने युग के प्रत्येक चर्चित और महत्वपूर्ण प्रश्न पर विस्तार से विचार किया। उन्हें उत्तार -आधुनिकतावाद और उत्तार -संरचनावाद का प्रमुख आलोचक-सिध्दान्तकार माना जाता है। इस क्षेत्र में उसने अनुकरण (सीमुलेशन), दोहन(सिडक्शन) और हाइपर रियलिटी इन तीन संदर्भ सूत्रों को केन्द्र में रखकर काम किया। इस क्रम में चिन्हशास्त्र की सैध्दान्तिकी और हाइपर रियलिटी के संदर्भों का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया।

बौद्रिलार्द का मानना था कि प्रत्येक वस्तु या पदबंध का अपना निजी संदर्भ सूत्र होता है, निजी संदर्भ सूत्र को खोजने की जरूरत है। किसी वस्तु या संकेत की व्याख्या निजी संदर्भ सूत्र के उद्धाटन पर टिकी हुई है। वस्तु का एक होता है सार्वभौम संदर्भ, और दूसरा होता है स्थानीय अथवा निजी संदर्भ, इन दोनों में निर्णायक स्थानीय अथवा निजी संदर्भ होता है। भूमंडलीकरण के कारण शब्दों का अतिवादी रूप में इस्तेमाल होता है इससे शब्दों से अर्थहीनता बोध भी पैदा होता है। बौद्रिलार्द ने विश्व का अध्ययन ऑब्जेक्ट के रूप में किया। ऑब्जेक्ट की दोहन या शोषण की क्षमता क्या है ? इसका विस्तार से विवेचन किया। बौद्रिलार्द ने अन्तर्विषयवर्ती पध्दति के आधार पर व्याख्या पेश की। उनकी पध्दति और नजरिए में किसी एक पक्ष को खोजना मुश्किल होगा। यही वजह है कि उनके यहां पूर्णत: उत्तार आधुनिक विमर्श नजर आता है तो पहले के लेखन में माक्र्सवादी विचारधारा का प्रभाव नजर आता है, उत्तर आधुनिक विमर्श मूलत: खिचड़ी विमर्श है। इसमें एकाधिक विचारधाराओं और स्कूलों का प्रयोग मिलता है। उत्तार आधुनिक विमर्श में जो लोग बौद्रिलार्द को शामिल करते रहे हैं वे लंबे समय तक नहीं जानते थे कि उन्होंने मार्क्‍सवादी नजरिए से क्या काम किया है। उनकी मूल धारणाओं का आधार मार्क्‍सवाद रहा है और सर्जनात्मक मार्क्‍सवादी के रूप में उन्होंने सैध्दान्तिकी का विकास किया और सारी दुनिया में शोहरत हासिल की।

बौद्रिलार्द की चर्चित किताबें हैं , 1. दि सिस्टम ऑफ आब्जेक्ट ( 1968 फ्रेंच, 1996 अंग्रेजी), कन्ज्यूमर सोसायटी,(1970 फ्रेंच, 1998 अंग्रेजी), फार ए क्रिटिक ऑफ दि पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ दि साइन ,(1972 फ्रेंच, 1981 अंग्रेजी) ये कृतियां आलोचनात्मक समाजशास्त्र के ढ़ांचे में तैयार की गयीं। बौद्रिलार्द ने बीस से ज्यादा किताबें लिखी हैं।

बौद्रिलार्द को अंग्रेजी जगत तब ही जान पाया जब वे पढ़ाने के लिए फ्रांस के बाहर निकले और उनकी कृतियों के अनुवाद अंग्रेजी में आने शुरू हुए। बौद्रिलार्द को फ्रांस के बाहर पढ़ाने का सबसे पहले मौका सन् 1975 में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में मिला। न्यूयार्क स्थित प्रकाशन संस्थान सीमियोटेक्स (इ) ने ''फॉरेन एजेण्ट सीरीज'' के तहत बौद्रिलार्द की दो किताबें छापीं। ये हैं , ''इन दि सेडो ऑफ साइलेंट मैजोरिटी : ओर ,दि एण्ड ऑफ सोशल''(1978) एवं '' सीमुलेशन''(1981) ये दोनों किताबें 1983 में एक ही साथ प्रकाशित हुईं। इन किताबों के प्रकाशन के साथ ही अंग्रेजी जगत में अचानक 'सीमुलेशन' ,'सीमुलकरा' , ' एक्सप्लोजन ऑफ मीनिंग' और 'हाइपर रीयल' पदबंध के प्रयोग की बाढ़ आ गयी। सन् 1980 और 1990 के दशक में बौद्रिलार्द ने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की और अपने व्याख्यान के जरिए अकादमिक और गैर-अकादमिक जगत में व्यापक ख्याति अर्जित की। बौद्रिलार्द की रचनाएं विचारोत्तोजक होती हैं और इन्हें पढ़ने में मजा आता है।

बचपन में बौद्रिलार्द के मन पर फ्रांस में प्रचलित एक नारे का गहरा असर पड़ा, नारा था '' आधुनिकीकरण या पतन'' ,यह नारा मोनेट योजना के तहत दिया गया था। फ्रांस सरकार के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई थी उसके तहत यह नारा दिया गया था। इस नारे को फ्रांस के राजनीतिक अर्थशास्त्री ज़ीन मोनेट ने दिया था। मोनेट को यूरोपीय आर्थिक समुदाय का पितामह कहा जाता है। द्वितीय विश्वयुध्द के बाद आर्थिक विकास का रास्ता क्या हो ? किस तरह के बुनियादी उद्योग स्थापित किए जाएं ?और समाज में स्थिरता कैसे लायी जाए ? इत्यादि सवालों को ही मोनेट योजना का बुनियादी लक्ष्य बनाया गया था।

बौद्रिलार्द की आरंभिक रचनाएं जां पाल सार्त्र की पत्रिका 'लेस टेम्स मॉडर्नेस' में प्रकाशित हुईं। युध्दोत्तार फ्रांस में सार्त्र सबसे बड़े बुध्दिजीवी के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे। सार्त्र का मानना था कि जीवन का आधार मनुष्य का अपना चयन है। मनुष्य स्वयं चुनता है। अपने जीवन का फैसला वह स्वयं करता है। जब कि परंपरागत लोग यह मानते थे कि मनुष्य के जीवन के बारे में ईश्वर ने पहले से ही तय कर दिया है। इस धारणा का सार्त्र ने जमकर विरोध किया। सार्त्र स्वयं माक्र्सवाद से गहरे प्रभावित थे, और फ्रांस में माक्र्सवाद को अनेक बुध्दिजीवियों ने उनके जरिए ही सीखा। बौद्रिलार्द भी उनमें से एक हैं। यह संयोग की बात थी कि बौद्रिलार्द की पहली किताब फ्रेंच में 1968 में प्रकाशित हुई, यह उनकी थीसिस थी। अंग्रेजी में यह किताब ' दि सिस्टम ऑफ ऑब्जेक्ट' के नाम से प्रकाशित हुई। सन् 1968 फ्रांस के इतिहास में स्मरणीय वर्ष के रूप में जाना जाता है। यह किताब उसी साल प्रकाशित हुई। यह किताब माक्र्सवादी नजरिए से लिखी गयी है । इस किताब के अंग्रेजी में आने के पहले और इस किताब के आधार पर बौद्रिलार्द के बारे में समझ बनाने के पहले ही बौद्रिलार्द को परवर्ती रचनाओं के आधार पर उत्तार आधुनिकतावादी घोषित कर दिया गया।

आधुनिक विश्व में विगत पचास सालों में संस्कृति,साहित्य और मीडिया में जिन सवालों पर हम विचार करते रहे हैं उन सवालों के पीछे 1968 के फ्रांसीसी छात्र आंदोलन की आग कहीं न कहीं काम करती रही है। फ्रांसीसी बुध्दिजीवियों में उन दिनों हेगेल,माक्र्स और सार्त्र के विचारों का गहरा प्रभाव था। इन तीनों विचारकों की रचनाएं व्यापक तौर पर इस्तेमाल की जा रही थीं। इसके अलावा जिस व्यक्ति के विचारों का व्यापक असर था वह था ज़ीन हायपोलाइट। उनके जरिए ही फ्रेंच बुध्दिजीवियों ने हेगेल को जाना, हेगेल के संबंध में उनके निष्कर्षों को लेकर ही स्थानीय बुध्दिजीवी प्रभावित थे,उल्लेखनीय है कि हायपोलाइट के अंदर ही फ्रांस के सबसे चर्चित उत्तार संरचनावादी विचारकों जिली देल्युज, ज्यांक देरीदा, मिशेल फूको ने अध्ययन किया था। फ्रांस में हेगेल महत्वपूर्ण क्यों था ? यह तब तक समझ में नहीं आ सकता जब तक कि हम हायपोलाइट के अवदान से वाकिफ न हों। हेगेल के नजरिए का बौद्रिलार्द पर भी गहरा असर था। हेगेल के तमाम विचारों में से द्वंद्ववाद की धारणा पर फ्रांसीसी बुध्दिजीवियों ने सबसे ज्यादा विचार किया है, इस समस्या पर भी विचार किया है कि द्वंद्ववाद का अतिक्रमण कैसे और कब संभव है। हेगेल की किताब '' फिनोमिनोलॉजी ऑफ स्प्रिट'' का इन सब पर गहरा असर था। इस किताब में हेगेल ने इस बात पर जोर दिया था कि मनुष्य के विषय तब ही समझ में आते हैं जब हम उन्हें अन्य मनुष्यों के संदर्भ में देखते हैं। इसी धारणा के आधार पर हेगेल ने आदिम अवस्था से लेकर आधुनिक अवस्था तक के मनुष्य के कार्य-व्यापार पर विस्तार से विचार किया था।

हेगेल के मालिक और दास के केटेगरी में वर्णित रूपों और धारणाओं की व्यापक व्याख्या के क्रम में चार्ल्स टेलर ने इस तथ्य की ओर ध्यान खींचा था कि मालिक और गुलाम के अलावा एक अन्य तत्व भी होता है जिसे

'' भौतिक यथार्थ'' कहते हैं। अत: हमें मालिक,गुलाम और भौतिक यथार्थ (मेटीरियल रियलिटी) इन तीन केटेगरी पर एक साथ विचार करना चाहिए। द्वंद्ववाद पर चली बहस के दौरान द्वंद्ववाद की सीमाएं भी सामने आयीं, जिन्हें कायदे से विस्तार से जानना चाहिए। इससे हिन्दी चिन्तन का काफी उपकार हो सकता है। बौद्रिलार्द के नजरिए पर हेगेल,माक्र्स, सार्त्र,हायपोलाइट के अतिरिक्त जॉर्ज बातिली के लेखन का भी गहरा असर था। इन विचारकों के अलावा वियतनाम युध्द,मानवाधिकार आंदोलनों ने भी उनके विचारों को प्रभावित किया। फ्रांस में 1968 में छात्र आंदोलन के उदय के समय बौद्रिलार्द नानटेरे में अध्यापन कार्य कर रहे थे। यही वह समय है जब बौद्रिलार्द ने माक्र्सवाद के बारे में उत्तार संरचनावादी परिप्रेक्ष्य में सवाल उठाए हैं। इन सवालों को बाद में उन्होंने अपनी थीसिस '' दि सिस्टम ऑफ ऑब्जेक्ट'' में लागू किया है। वियतनाम युध्द के संदर्भ में पीटर वाइस के नाटक का अंग्रेजी से फ्रेंच मे '' डिस्कोर्स ऑफ वियतनाम'' का बौद्रिलार्द ने प्रकाशन किया। यह नाटक वियतनाम युध्द के बारे में मार्क्‍सवादी आलोचना को व्यक्त करता था। इस नाटक ने फ्रेंच बुध्दिजीवियों को काफी प्रभावित किया।

वियतनाम युध्द पहला टीवी युध्द था। इसने समूचे मीडिया विमर्श को भी बदल दिया। टीवी के कारण ही वियतनाम युध्द अंतर्राष्ट्रीय ख्याति हासिल कर पाया। सन् 1968 के छात्र आंदोलन और वियतनाम युध्द को लेकर बौद्रिलार्द ने मीडिया कवरेज को लेकर जो बातें कही हैं वे काबिलेगौर हैं। बौद्रिलार्द ने ''क्रिटिक ऑफ दि पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ दि साइन'' (1972) में एक स्वतंत्र अध्याय ही है जिसमें विस्तार से 1968 के छात्र आंदोलन के मीडिया कवरेज का मूल्यांकन किया गया है। इस अध्याय का शीर्षक है ''रिक्वाइम फोर दि मीडिया'', बौद्रिलार्द का मानना है कि नानटेरे में छात्रों का आंदोलन 'प्रतीकात्मक' था। इस आंदोलन के पहले तक फ्रांस के विश्वविद्यालयों में पढ़ायी का एकतरफा मार्ग था, इकसार पढ़ायी होती थी, वैकल्पिक नजरिए को कोई स्थान नहीं दिया जाता था, अध्यापक ही ज्ञान के स्रोत थे, छात्रों को बोलने का हक नहीं था, अध्यापकों के जरिए ही वैकल्पिक ज्ञान भी छात्रों में पहुँच रहा था, यही वजह थी कि छात्रों में ही बगावत के स्वर सुनाई दिए। शिक्षकों की हालत खराब थी, वे सिर्फ सुनाते थे, सुनते नहीं थे। कक्षाओं में संवाद नहीं था। बाहर भी संवादहीनता की स्थिति थी। इसी क्रम में बौद्रिलार्द ने विश्वविद्यालय व्यवस्था की समस्याओं की ओर व्यापक परिप्रेक्ष्य में ध्यान खींचा है। विश्वविद्यालयों में ज्ञान का विनिमय नहीं होता था। छात्र आंदोलन प्रतीकात्मक इसलिए था कि यह एक तरह का रेपचर था। विश्वविद्यालय व्यवस्था में रेपचर था। यह परंपरागत तौर पर दी जाने वाली शिक्षा के कोड या संहिता का भंजन भी था। शिक्षा की पुरानी संहिता या कोड के तहत शिक्षक आते थे, कक्षाएं करते थे, वे बोलते थे, छात्र सुनते थे, छात्रों को सवाल करने या संवाद करने का कोई अवसर नहीं मिलता था। शिक्षण्ा की इस अर्थव्यवस्था को छात्र आंदोलन ने अस्तव्यस्त कर दिया। शिक्षण के कोड बदल दिए। शिक्षण की संहिता बदल दी। पहले कक्षा में संवाद को बकवास माना जाता था,बेकार माना जाता था, छात्र आंदोलन के बाद ऐसा नहीं रहा। अब कक्षा में संवाद प्रमुख था बल्कि यह निवेश था।

छात्र आंदोलन का व्यापक उभार इस तथ्य का संकेत था कि फ्रांस का रूटिन दैनंदिन जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। इसी अर्थ में यह घटना प्रतीकात्मक है। मीडिया और अन्य स्रोतों के जरिए विभिन्ना किस्म की व्याख्याओं के जरिए इसे नियंत्रित करने की कोशिश की गयी। बौद्रिलार्द ने सवाल उठाया है कि 1968 के छात्र आंदोलन के समय मीडिया की क्या भूमिका थी ? बौद्रिलार्द कहता है मीडिया ने चालाकीभरी भूमिका अदा की। मीडिया या तो दमनात्मक भूमिका अदा कर रहा था और उसमें सुधार की जरूरत थी, अथवा वह भड़काने का काम कर रहा था। जिससे राजनीतिक असंतोष और भड़के। ये दोनों ही भूमिकाएं गलत थीं। बौद्रिलार्द कहता है, '' मई 68 एक अच्छा उदाहरण हो सकता है,जिसके जरिए हम विश्वास कर सकते हैं कि मीडिया का इस दौर में सवबर्सिव प्रभाव था , उपनगरीय रेडियो स्टेशन और अखबारों ने छात्र आंदोलन को चारों ओर फैला दिया, छात्र यदि बारूद थे तो मीडिया बटन था। इससे भी बड़ी बात यह थी कि अधिकारी खुलेआम मीडिया पर दोषारोपण कर रहे थे कि '' वह क्रांतिकारी खेल खेल रहा है।'' .... बौद्रिलार्द कहता है ,मैं इसके विपरीत सोच रहा हूँ मीडिया ने कभी भी प्रभावी ढ़ंग से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया। उसकी भूमिका आदतन सामाजिक नियंत्रण स्थापित करने की थी, वे अपनी भूमिका के बारे में सबसे ऊपर सही थे।''[1] सवाल यह है कि मीडिया ने ज्ञान को संप्रसारित करने में क्या गलत किया ? अथवा छात्र आंदोलन की रिपोर्टिंग में क्या गलत किया ? इसका एक ही जबाव है मीडिया की स्वाभाविक रिदम। जनता के जटिल एक्शनों को न खोलना। आखिरकार क्यों इतने बड़े पैमाने पर लोग छात्र आंदोलन के साथ हो गए ? लोगों की शिरकत को मीडिया ने बढ़ावा दिया। मीडिया इकतरफा 'क्रांतिकारी' छवि के प्रचार में मशगूल था। यह ऐसी इमेज थी जिसे अन्तहीन रूप में पेश किया जा रहा था। इकतरफा इमेजों का पुनरूत्पादन और प्रसार ,सड़कों पर घटने वाली घटनाओं का शॉर्ट सर्किट प्रचार अंतत: आंदोलन को गिरा रहा था। सड़कों पर घटने वाली घटनाओं का प्रचार संप्रेषण्ा नहीं कर रहा था, बल्कि यह इकतरफा सूचनाभर थीं, सड़कें तो सहज भाव से मीडिया को उपलब्ध थीं। किंतु इनके मीडिया कवरेज में रेस्पांस गायब था। यानी घटना की रिपोर्टिंग थी, किंतु आदर्श संप्रेषण के लिए रेस्पांस भी जरूरी होता है वह गायब था। इसलिए संचार का विनिमय नहीं हो सका।

मीडिया का मार्ग इकतरफा मार्ग था। वे सिर्फ यह बता रहे थे कि छात्र प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। इकतरफा संप्रेषण को विस्तार से विश्लेषित करते हुए बौद्रिलार्द ने लिखा आदिम समाजों में,पुराने समाजों में कैसे शक्ति उनके पास होती थी जो देते थे, उनके पास नहीं होती थी जो पुन:भुगतान कर रहे हैं। हम नए युग में उसी दौर में आ गए हैं। बौद्रिलार्द कहता है कि मीडिया इससे जुड़ी तमाम समस्याओं से भागता है। कुछ लोगों को यह मीडिया की धूर्तता लगती है किंतु धूर्तता कहना मूर्खता है। '' मई में असली क्रांतिकारी मीडिया तो भाषण और दीवारें थीं। सिल्क स्क्रीन पोस्टर और हाथ से लिखे नोटिस थे। सड़कों पर भाषणों के जरिए विनिमय चल रहा था। प्रत्येक चीज का तत्काल ही वर्णन और व्याख्या पेश की जा रही थी। तत्काल दिया और लिया जा रहा था। लोग बोल रहे थे,सवाल कर रहे थे, स्पेस और टाइम पूरी तरह मोबाइल था। यहां ग्रहण कर रहे थे,सामंजस्य बिठा रहे थे और अन्तर्विरोध भी पैदा हो रहे थे। इस अर्थ में सड़कें मासमीडिया का वैकल्पिक और सवबर्सिव रूप थीं। मासमीडिया एक तरह से चिट्ठी की तरह था जिसमें संदेश का जबाव संभव नहीं था, दूर से संचार की व्यवस्था के रूप में काम कर रहा था।'' मीडिया की पध्दति थी ''ट्राई'' (प्रयास) और '' टेकओवर'' (हथियाने)करने की। किंतु यह पध्दति बोगस साबित हुई है। क्योंकि इससे रूप एक जैसे बने रहते हैं।

बौद्रिलार्द ने 60 और सत्तर के दशक में वस्तुओं और उपभोक्ता समाज के बारे में विस्तार से समाजशास्त्रीय नजरिए से विचार किया। यह असल में द्वितीय विश्वयुध्दोत्तर दौर की अवस्था की दैनंदिन जिंदगी को पुनर्संगठित करने कोशिश का हिस्सा है। यह वह दौर है जिसमें धारणाओं का लोप हो रहा था। बोरियत बढ़ रही थी, अनुकरण की दुनिया हावी हो रही थी, ऐसे में बौद्रिलार्द ने लिखा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अपराध है बोरियत। पहला अपराध है बोर। बौद्रिलार्द ने लिखा जब आप कहते हैं कि मैं तुम्हें प्यार करता हूँ तो आप भाषा के प्रेम में पड़ जाते हैं। यह स्वयं में विच्छेद है और चारित्रिक दुर्बलता का लक्षण है। बौद्रिलार्द के अनुसार सामाजिक यथार्थ 'संदर्भगत भ्रम',' भाग्य की रणनीति', 'उत्पादन का आईना' , 'आतंकवाद की स्प्रिट', अथवा 'यथार्थ का रेगिस्तान' रहा है। इस तरह के संदर्भके आधार पर बौद्रिलार्द जब अपना परिप्रेक्ष्य बनाता है तो राजनीतिक अर्थशास्त्र समाजशास्त्र की सामाजिक संरचनाओं से दूर चला जाता है। विलोम इमेजों के आधार पर वह हमेशा वंचना और आतंक के गुणों की खोज करता है।

वस्तुओं का संसार इच्छाओं को सक्रिय करता है। इच्छाएं उत्पादक होती हैं। इच्छा का क्षेत्र वस्तुओं के पाने से लेकर पावर अर्जित करने तक फैला हुआ है। इच्छा हमेशा असंतुष्ट रखती है अथवा यों कहें कि आगे की चाहत बनाती है। वस्तु जब इच्छाओं को स्पर्श करती हैं तब जाने-अनजाने नैतिकता को भी प्रभावित करती हैं, नैतिकता को बदलती हैं। इस अर्थ में वस्तुओं का संसार वस्तु तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि वह नैतिकता और अर्थशास्त्र तक फैला होता है। वस्तुएं सिर्फ हमारे उपयोग के लिए ही जरूरी नहीं हैं बल्कि उनकी मौजूदगी ईगो को भी संतुष्ट करती है। वस्तुओं का स्वतंत्र कार्य-व्यापार अंतत: स्वतंत्रता की भी गारंटी है।

बौद्रिलार्द ने मार्क्‍सवाद के मूल सिध्दान्तों से कभी अपना संबंध नहीं तोड़ा बल्कि सर्जनात्मक रूप में मार्क्‍स की धारणाओं का विकास किया। मार्क्‍स की विचारधारा की धारणा के आधार पर हाइपर रियलिटी को देखा, सीमुलकरा और सीमुलेशन की धारणा का माल की धारणा के रूपों के आधार पर विकास किया। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि बौद्रिलार्द ने मार्क्‍सवाद को त्यागकर उत्तार-संरचनावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद के सिध्दान्तों का सहारा लिया। इसीलिए बौद्रिलार्द भूतपूर्व मार्क्‍सवादी कहने की बजाय परवर्ती मार्क्‍सवादी कहना ज्यादा सही होगा। वह मार्क्‍स की बुनियादी समझ के आधार पर परवर्ती पूंजीवाद की विभिन्न प्रवृत्तियों और फिनोमिना का अध्ययन करता है।

केलनर का मानना है बौद्रिलार्द '' दि मिरर ऑफ प्रोडक्शन' (1975) में मार्क्‍सवाद से संबंध तोड़ते हैं। मार्क्‍सवाद से संबंध तोड़ते हुए सामयिक समाज का ज्यादा विकसित नजरिया पेश करते हैं।बाद में ''सिम्बोलिक एक्सचेंज एंड डेथ''(1993) में मार्क्‍सवाद से ज्ञानमीमांसात्मक आधार पर अलग होते हुए उत्तर आधुनिक नजरिए को पेश करते हैं। केलनर के इस मूल्यांकन के बारे में सवाल किया जाना चाहिए। पहली बात यह है कि बौद्रिलार्द ''सिम्बोलिक एक्सचेंज एंड डेथ'' नामक कृति में सिर्फ यह तथ्य उजागर करते हैं कि ''आधुनिकता'' का अंत हो गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे आधुनिकता के समग्रता में सफाए की बात कह रहे हैं। आधुनिकता का अंत आधुनिकता का सफाया नहीं है।

केलनर ने यह भी लिखा है कि बौद्रिलार्द ने श्रम का अंत,उत्पादन का अंत,राजनीतिक अर्थशास्त्र का अंत आदि तमाम चीजों के अंत की लंबी फेहरिस्त पेश की है। 'अंत' का विमर्श पेश करते हुए बौद्रिलार्द उत्तर आधुनिक टूट की ओर ध्यान खींचते हैं। यह इतिहास के क्रम में टूट है। बौद्रिलार्द जब 'अंत' की बात करते हैं तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उन सब चीजों का सफाया हो गया है जिन्हें आधुनिकता के दौर में निर्मित किया गया था, 'अंत' का अर्थ उनका 'अस्तित्व' का अंत नहीं है, 'सफाया' नहीं है।

हिन्दी में 'अंत' की धारणा को तो कभी देखा गया और कभी गंभीरता से विश्लेषित ही किया। 'अंत' का मतलब यह नहीं है कि जिसका अस्तित्व था वह खत्म हो गया। अथवा उसका दमन कर दिया गया। बल्कि अंत का अर्थ है कि आधुनिकता को पछाड़ते हुए नयी चीजें जन्म ले लेती हैं, नए रूप, नई तकनीकी रूप जन्म ले लेते हैं, वे पुराने से ज्यादा विकसित होते हैं जिसके कारण पुराने को गौण बना देते हैं। 'अंत' तब होता है जब ज्ञानमीमांसात्मक धरातल पर पुराना विचार अप्रासंगिक हो जाय, यह वैसे ही जैसे कोई पुराना कपड़ा फट जाता है तो आपको नए कपड़े की जरूरत महसूस होती है। अंत का अनिवार्यता से गहरा संबंध है। अंत अथवा ब्रेक की तुलनात्मक रूप में महत्ता देखी जानी चाहिए। इसी क्रम में नए धारणाओं की जरूरत पड़ती है, उनकी महत्ता को हम स्वीकार करते हैं।

बौद्रिलार्द को जो लोग उत्तर आधुनिक,उत्तर संरचनावादी आदि बनाने में लगे हैं उनकी मुश्किल यह है कि वे पहले यह नहीं जानते थे कि बौद्रिलार्द ने मार्क्‍सवादी नजरिए से क्या काम किया था। उनकी मार्क्‍सवादी रचनाएं उनके उत्तर आधुनिक घोषित कर दिए जाने के बाद अनुदित होकर अंग्रेजी में आईं। 'भूलने' अथवा 'विस्मृति' के बारे में बौद्रिलार्द ने लिखा था कि दो किस्म की विस्मृति होती हैं। एक , धीमी गति की आदिम हिंसक -स्मृति जो स्मृति को नष्ट कर देती है। दूसरी दृश्यमान -स्मृति है, यह ऐतिहासिक स्पेस को विज्ञापन के वातावरण में तब्दील कर देती है,अब प्रतिष्ठा की अस्थायी चौकी है मीडिया रणनीति बन जाती हैं।'' ''अब प्रत्येक व्यक्ति हर चीज भूल जाता है।'' यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है जो बौद्रिलार्द को उत्तर आधुनिकतावादी बनाने का काम कर रहे हैं, वे हर चीज को भूल गए हैं। वे विस्मृति के शिकार हैं। स्वयं बौद्रिलार्द ने इस बात का खण्डन किया कि वह उत्तर आधुनिकतावादी है।

(पुस्‍तक अंश ' मीडि‍या प्राच्‍यवाद और वर्चुअल यथार्थ' लेखक- जगदीश्‍वर चतुर्वेदी,सुधासिंह, प्रकाशक- अनामि‍का पब्‍लि‍शर्स एंड डि‍स्‍ट्रीब्‍यूटर्स (प्रा.लि‍.),4697/3, 21ए,अंसारी रोड,दरि‍यागंज,नई दि‍ल्‍ली, 110002)

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