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गुरुवार, 17 मार्च 2011

परमाणु रैनेसां का अंत


                  (जापान की सुनामी -भूकंप की तबाही का एक दृश्य) 
     जापान में प्राकृतिक विनाशलीला का ताण्डव सारी दुनिया को एक नए किस्म के आर्थिक-राजनीतिक संकट की ओर ले जा रहा है। जापान के भूकंप और परमाणु विकिरण का सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक प्रभाव सिर्फ जापान तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि इसका असर आने वाले समय में समूची विश्व राजनीति पर पड़ेगा। खासकर वे देश जो परमाणु ऊर्जा और परमाणु अस्त्रों के बारे में शांतिपूर्ण प्रयोग के बहाने परमाणु खतरे का संचय कर रहे हैं उनके यहां भी आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा के विरोध में आंदोलन तेज होंगे।
    खासकर भारत जैसे देश में नव्य उदारीकरण और अमेरिकी परमाणु इजारेदारियों के दबाब में जिस तरह भारत सरकार परमाणु संयंत्रों पर तेजी से काम कर रही है और मनमोहन सिंह-सोनिया-आडवाणी-अटल और संघ परिवार की लॉबी भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने के लिए जो काम कर रही है उससे भारत भविष्य में कभी भी श्मशान में तब्दील हो सकता है। परमाणु अस्त्रों और परमाणु ऊर्जा के हिमायतियों को नए युग के कापालिक कहा जा सकता है जो परमाणु के शांतिपूर्ण इस्तेमाल की ओट में श्मशान साधना कर रहे हैं। आज इसके बारे में आम जनता को गोलबंद करने और राजनीतिक दबाब पैदा करने की जरूरत है।
    मनमोहन सिंह सरकार को जापान की सामयिक तबाही का यह संदेश है कि भारत को परमाणु विनाश की गोद में मत बैठाओ। भारत के कारपोरेट मीडिया को यह संदेश है कि वह परमाणु ऊर्जा और परमाणु बम की संस्कृति का विरोध करने वालों को उपहास का पात्र न बनाए। परमाणु ऊर्जा के बारे में भारत के कारपोरेट मीडिया ने तथ्यों को छिपाया है और आम जनता को गुमराह किया है। परमाणु ऊर्जा का मामला महज बिजली उत्पादन का मामला नहीं है। यह अमेरिका बनाम वामदलों का मामला नहीं है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र महज तकनीक मात्र नहीं हैं। यह असामान्य विध्वंसक तकनीक है,जिसके सामान्य से विस्फोट से भारत कभी भी मरघट में बदल जाएगा। परमाणु तकनीक असाधारण तौर पर मंहगी तकनीक है। जनविरोधी तकनीक है। विकास विरोधी तकनीक है।  यही वजह है कि परमाणु ऊर्जा विरोधी आंदोलन को और भी ज्यादा शक्तिशाली बनाने और पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण पर जोर देने की जरूरत है। वैकल्पिक ऊर्जा के सवालों पर विचार करने की जरूरत है।
     जापान में जिस समय भूकंप आया उस समय किसी को यह आभास भी नहीं था कि परमाणु ऊर्जा केन्द्रों में इस तरह भयानक विस्फोट होंगे,परमाणु भट्टियां धू-धू करके जल उठेंगी,परमाणु आग बेकाबू हो जाएगी और जापान की अधिकांश आबादी परमाणु खतरे की जद में आ जाएगी। जापान में आए भूकंप औक सुनामी से समुद्री इलाकों में बसे शहरों का पूरी तरह सफाया हो गया है। हजारों लोग मर गए हैं या लापता हैं। पूरे शहर मिट्टी के मलबे में तब्दील हो गए हैं। जापान के भूंकप और सुनामी ने यह बात एक बात फिर से सिद्ध कर दी है कि प्रकृति पर नियंत्रण का पूंजीवाद ने जो दावा किया था वह खोखला है।
( फुकोसीमा दाल्लची परमाणु ऊर्जा संयंत्र में तीन नं.रिएक्टर में विस्फोट का दृश्य)
जापान में भूकंप,सुनामी और परमाणु विकिरण के त्रिस्तरीय संकट ने जापान के साथ समूचे विश्व को हिलाकर रख दिया है। फिलहाल जापान में बड़े पैमाने पर बिजली का संकट है,बिजली की सप्लाई के अभाव के कारण जापान के 55 परमाणु रिएक्टर बंद हैं। इनके लिए प्राइमरी और वैकअप बिजली सप्लाई बंद है। लाखों घरों में अँधेरा है।
     उल्लेखनीय है सोवियत संघ के यूक्रेन स्थित चेरनोविल परमाणु संयंत्र में 1986 में हुए विस्फोट और विकिरण ने समूची समाजवादी व्यवस्था को धराशायी कर दिया था ठीक वैसे ही परवर्ती पूंजीवाद की विदाई का संकेत जापान के परमाणु विकिरण और परमाणु ऊर्जा केन्द्रों में हुए विस्फोटों ने भेजा है। चेरनोविल (यूक्रेन) ने समाजवाद पर आम रूसी जनता का विश्वास उठा दिया वैसे ही जापानी परमाणु संकट ने परवर्ती पूंजीवाद के ताबूत में कील ठोंक दी है और परवर्ती पूंजीवाद के ऊपर से आम जनता पूरा विश्वास खत्म कर दिया है।
      जापान के 55 परमाणु रिएक्टरों में से 3 में विस्फोट हुए हैं और स्थिति किसी भी तरह नियंत्रण में नहीं है। विध्वस्त परमाणु संयंत्रों के आसपास के इलाकों से दो लाख से ज्यादा लोगों को निकालकर सुरक्षित इलाकों में पहुँचाया गया है।
     जापान के परमाणु विध्वंस के कई सबक हैं,पहला सबक है प्रकृति अजेय है। दूसरा, परमाणु इजारेदारियां सारी दुनिया में परमाणु ऊर्जा के नाम पर आक्रामक ढ़ंग से जीवनघाती तकनीक को थोप रही हैं। वे और उनके भोंपू कारपोरेट मीडिया प्रचार कर रहे हैं परमाणु तकनीक और परमाणु सवालों पर आम जनता को सिर खपाने की जरूरत नहीं है। परमाणु सुरक्षित ऊर्जा है। तीसरा सबक है परमाणु ऊर्जा संयंत्र किसी भी कीमत पर सुरक्षित नहीं हैं,यदि प्राकृतिक विपदा आ जाए तो जनता के ऊपर तबाही दर तबाही का मंजर टूट सकता है। जापान का चौथा सबक है हम परमाणु ऊर्जा के विकल्पों पर अभी से सोचें और परमाणु ऊर्जा के मोह को त्यागें। जो देश परमाणु मोह को नहीं त्यागेगा उसे कभी भी भयानक जनविनाश का सामना करना पड़ सकता है। भविष्य को सुंदर बनाने के लिए परमाणु से बचो।
   इस समय सारी दुनिया में 440 व्यवसायिक परमाणु संयंत्र काम कर रहे हैं। इनमें अमेरिका में 104 संयंत्र हैं, अमेरिका में अधिकांश परमाणु संयंत्रों में जो डिजाइन इस्तेमाल किया गया है वह जापान में फेल हो गया है। जापान में आई परमाणु विभीषिका के तात्कालिक और दीर्घकालिक दुष्प्रभावों के बारे में अभी कुछ भी कहना संभव नहीं है। भूकंप-सुनामी में मरने वालों की सही संख्या का अनुमान करना कठिन है, उस पर से परमाणु संयंत्रों में हुए विस्फोटों ने सारे मामले को और भी पेचीदा बना दिया है।फुकोसीमा परमाणु ऊर्जा उत्पादन संयंत्र केन्द्र  में 3 रिएक्टरों में विस्फोट हो चुका है और चौथे में भी दरारें आ गयी हैं।
   विगत 40 सालों से जापान में लगाये जा रहे परमाणु संयंत्रों का वैज्ञानिक विरोध कर रहे थे और सावधान कर रहे थे कि जापान कभी भी विनाश के मुँह में जा सकता है ,लेकिन जापान के शासकों और कारपोरेट घरानों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन इसबार सुनामी और भूकंप की घटना ने जापान को परमाणु सुनामी के करार पर पहुँचा दिया है। परमाणु विकिरण का खतरा टोक्यो तक पहुँच गया है। जगह जगह परमाणु पाइप लाइन फट गयी हैं। उनसे बड़े पैमाने पर परमाणु रिसाव हो रहा है। जापान के प्रधानमंत्री ने माना है  हीरोशीमा-नागासाकी पर परमाणु विस्फोट के समय जैसी आपदा आयी थी उससे ज्यादा बड़ी विपत्ति है ये। मीडिया ने इसे "कैटेस्ट्रोफी" कहा है। न्यूयार्क टाइम्स ने 1997 में कराए एक शोध के हवाले से लिखा है कि “It estimated 100 quick deaths would occur within a range of 500 miles and 138,000 eventual deaths. The study also found that land over 2,170 miles would be contaminated and damages would hit $546 billion. That section of the Brookhaven study focused on boiling water reactors—the kind at the heart of the Japanese crisis.” यह शोध ब्रुकवेन नेशनल लेबोरेटरी ने लॉग आइसलैंड के बारे में किया था। उल्लेखनीय है जापान के ज्यादातर परमाणु संयंत्र भूकंप संभावित समुद्री क्षेत्रों में ही लगाए गए हैं। यही स्थिति अमेरिका की भी है वहां पर भी समुद्री तटों के किनारे दर्जनों परमाणु केन्द्र बनाए गए हैं।
    इस समय फ्रांस में 58,ब्रिटेन में 19,जर्मनी में 17,स्वीडन में 10,बेल्जियम में 7,स्विटजरलैण्ड में 5 और कनाडा में 18 परमाणु ऊर्जा संयंत्र केन्द्र हैं। जापान की परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की तबाही एक ही संदेश दे रही है कि परमाणु रैनेसां का अंत । परमाणु रैनेसां सामाजिक उत्थान का नहीं सामाजिक विध्वंस का प्रकल्प है और इसका हर कीमत पर विरोध करना चाहिए।

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

ओबामा की भाषा में छिपी परमाणु सच्चाई

   अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के तीन दिन के दौरे का समापन हो चुका है। उन्हें और हमें जो कहना था उसे संयुक्त विज्ञप्ति में कलमबंद किया जा चुका है। सारी बातें कागजों में दर्ज हो चुकी हैं। अब हम अतिथि सत्कार के माहौल से बाहर आकर, जय हो ओबामा जय हो ओबामा के मीडिया निर्मित वातावरण के बाहर आकर उस वास्तविकता को देखें जो ओबामा के मीडिया प्रबंधन के कारण हमें नजर ही नहीं आई।   
      हमारे दर्जनों विशेषज्ञों,कूटनीतिज्ञों और विदेश नीति विशेषज्ञों ने विभिन्न चैनलों पर जमकर इस पक्ष या उस पक्ष के हितों और नीतियों की रंगबिरंगी व्याख्याएं पेश की हैं। हमें इन व्याख्याओं के परे जाकर उस भाषा को सही नजरिए से,यथार्थ की आंखों से पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए जो भारत-अमेरिका की संयुक्त विज्ञप्ति में है। हमें राष्ट्रपति बराक ओबामा के संसद में दिए गए भाषण की भाषा में निहित राजनीतिक समझ पर गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए। यह काम ठंड़े दिलो-दिमाग से करने की जरूरत है।
बराक ओबामा की यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत जैसा चाहता था ओबामा उसी भाषा में बोले। दूसरी ओर अमेरिका की उपलब्धि है कि वह जो चाहता था उसे मनवाने में वह सफल रहा है। हम पसंदीदा भाषा से खुश हैं। ओबामा इच्छित आर्थिक ,सैन्य और कूटनीतिक समझौते करके खुश हैं।
     संयुक्त विज्ञप्ति के अनुसार बराक ओबामा और मनमोहन सिंह व्यापारिक घरानों के हितों की रक्षा और संवर्द्धन के मामले में एक ही धरातल पर खड़े हैं इस दौरे से अमेरिका-भारत के कारपोरेट घरानों को लाभ होगा, अमेरिका में 70 हजार नए रोजगार पैदा होंगे लेकिन भारत के बेकारों,किसानों और साधारण जरूरतमंद लोगों को कोई लाभ नहीं मिलेगा।
     उलटे भारत के गृहमंत्रालय और अमेरिका के गृहमंत्रालय के बीच में एक नई साँठगाँठ हुई है उससे भारत के नागरिकों की नज़रदारी और जासूसी बढ़ जाएगी। भारत में काउंटर टेररिज्म के नाम पर प्रच्छन्नतः अमेरिकी हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। इस प्रसंग में संयुक्त विज्ञप्ति में जो कहा गया है उसके भारत की जनता की संप्रभुता के लिए घातक परिणाम निकलेंगे। यह सारा खेल काउंटर टेररिज्म के नाम पर होगा।
    विज्ञप्ति में कहा गया है-‘‘Building upon the Counter Terrorism Initiative signed in July 2010, the two leaders announced a new Homeland Security Dialogue between the Ministry of Home Affairs and the Department of Homeland Security and agreed to further deepen operational cooperation, counter-terrorism technology transfers and capacity building.’’ मजेदार बात यह है कि भारत सरकार ने अभी तक न तो संसद को और न राजनीतिक दलों को बुलाकर यह बताया है कि आखिरकार यह जुलाई 2010 का काउंटर टेररिज्म संबंधी समझौता क्या है ? ‘Department of Homeland Security and agreed to further deepen operational cooperation, counter-terrorism technology transfers and capacity building.’ इस पदबंध को गौर से पढ़ें और अमेरिका के द्वारा बंदी बनाकर रखे गए आतंकी अपराधी डेविड हेडली के संदर्भ में अब तक अमेरिका द्वारा भारत के साथ किए गए व्यवहार को देखें तो पता चलेगा कि हम किस मुसीबत में फंसने जा रहे हैं और अमेरिका हमें किस सीमा तक मदद करेगा।
     सब जानते हैं कि 26/11 के मुंबई आतंकी हिंसाकांड में पाक का हाथ था,हेडली भी उस हिंसाचार की योजना में शामिल था ,हमारे यहां उस घटना पर केस चल रहा है, हमें हेडली को अमेरिका को सौंपना चाहिए था लेकिन उसने हमें हेडली नहीं सौंपा। मीडिया में यह भी खबरें हैं कि हेडली अमेरिकी जासूसी एजेंसियों के लिए काम करता था। हेडली हमारे और अमेरिका के बीच में काउंटर टेररिज्म सहयोग के मामले में आदर्श उदाहरण बन सकता था लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ है।
      असल में अमेरिका काउंटर टेररिज्म संबंधी समझौते के तहत भारत के नागरिकों को भी अपनी निगरानी के दायरे और छानबीन की परिधि में ले आना चाहता है। अप्रत्यक्ष तौर पर वह यह काम अभी भी कर रहा है। उसने तमाम किस्म की संचार कंपनियों खासकर इंटरनेट सेवाप्रदाता कंपनियों को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। गूगल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट सभी इस मामले में सीआईए से लेकर एफबीआई के सामने समर्पण कर चुके हैं और काउंटर टेररिज्म के तकनीकी मैकेनिज्म को लागू करने के नाम पर अमेरिकी नागरिकों की जिंदगी में सरकारी दखलंदाजी बढ़ गयी है और अब वही फार्मूला भारत में भी लागू होने जा रहा है। अभी आरएसएस से जुड़े संगठनों के व्यक्तियों पर इसके प्रयोग चल रहे हैं और बाद में यह सिलसिला और बढ़ेगा। दैनंदिन जीवन में काउंटर टेररिज्म के नियमों के दबाब बढ़ेंगे। काउंटर टेररिज्म का अमेरिकी नाटक जनविरोधी और मानवाधिकारों का हनन करने वाला है। अमेरिका में विभिन्न किस्म के मानवाधिकार संगठन इसका जमकर विरोध कर रहे हैं।  

      अमेरिकी राष्ट्रपति परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर कितने ईमानदार हैं और सच बोल रहे हैं। इसे जानने के लिए ज्यादा प्रमाणों की जरूरत नहीं है। अमेरिका के नेतृत्व में नाटो सैन्य संगठन ने अपने परमाणु युद्धास्त्रों को बनाए रखने का फैसला किया है। इसके विपरीत भारत-अमेरिका की संयुक्त विज्ञप्ति में संपूर्ण निरस्त्रीकरण की दिशा में काम करने की प्रतिज्ञा की गयी है। सवाल प्रतिज्ञा का नहीं है ,सवाल एक्शन का है।
    अमेरिका के पास सबसे ज्यादा परमाणु युद्धास्त्र हैं और वह उन्हें खत्म करना नहीं चाहता। बल्कि उन्नत बनाने में लगा है। परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए ओबामा साहब राष्ट्रपति पद संभालने के बाद रूस से भी समझौता कर चुके हैं लेकिन सब कुछ कागजों में है। एक्शन में जाने की अमेरिका की मंशा दूर-दूर तक नजर नहीं आती। हाल ही में नाटो के कमाण्डर ने कहा है कि नाटो अपने परमाणु युद्धास्त्रों को सज्जितभाव से बनाए रखेगा।
    ओबामा साहब परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर यदि ईमानदार हैं तो कम से कम आरंभिक कदम के तौर पर नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया को आरंभ करें।  दुनिया के अनेक देशों में नाटो और अमेरिका ने परमाणु युद्धास्त्र लगाए हुए हैं कम से कम उन्हें हटा लें। इससे अमेरिका या विकसित पूंजीवादी मुल्कों की सुरक्षा पर कोई बुरा असर नहीं होगा। हम उम्मीद कर रहे हैं कि अगले महिने पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटो की बैठक में कोई ठोस परिणाम आएगा।
    नाटो के मुखिया की बात मानें तो परमाणु अस्त्रों को अमेरिका न तो कम करने जा रहा है और न हटाने जा रहा है। उल्लेखनीय है कि नाटो के परमाणु युद्धास्त्रों को लेकर नाटो सदस्यों के द्वारा नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की जा रही है। उस मांग को भी अमेरिका और फ्रांस मानने को तैयार नहीं हैं।
अमेरिका के हाल के चुनावों में ओबामा की पार्टी की जो पराजय हुई है उसमें सैन्य उद्योग ओर उससे जुड़े मीडिया घरानों की बड़ी भूमिका रही है। सैन्य उद्योग दुनिया में स्थायी तौर युद्ध का माहौल बनाए रखना चाहता है और ओबामा इस मामले में निरस्त्र हैं। ओबामा परमाणु निरस्त्रीकरण के नाम पर ईरान के खिलाफ नए किस्म की युद्धोन्मादी तैयारियां कर रहे हैं। वे परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए यदि सचमुच में ईमानदार हैं तो उन्हें सबसे पहले नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण के एजेण्डे को हाथ में लेना चाहिए।
     उल्लेखनीय है नाटो सदस्यों जर्मनी,पोलैण्ड,बेलजियम और स्वीडन ने नाटो के परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की है लेकिन अमेरिका और फ्रांस इसे मानने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर नाटो की परमाणु नाकेबंदियों का बहाना बनाकर रूस भी अपने परमाणु ज़खीरे को कम नहीं करना चाहता। ऐसी अवस्था में परमाणु निरस्त्रीकरण के सवाल पर किए गए वायदों का कागज पर लिखे शब्दों से ज्यादा कोई मूल्य नहीं है। ओबामा सचमुच में परमाणु निरस्त्रीकरण चाहते हैं तो उन्हें यूरोप से परमाणु युद्धास्त्र हटा लेने चाहिए,नाटो को परमाणुरहित बनाना चाहिए और भारत के लिए खतरनाक बने हुए दियागो गार्सिया सैन्य अड्डे से परमाणु अस्त्र हटा लेने चाहिए। हम देखना चाहते हैं कि वे परमाणु निरस्त्रीकरण के मामले पर कितने ईमानदार हैं !   































शनिवार, 24 अप्रैल 2010

अमेरिकी परमाणु युद्धोन्माद का शंखनाद

     अमेरिका में जब से ओबामा प्रशासन ने सत्ता संभाली है तब से कारपोरेट घरानों की बल्ले-बल्ले हो रही है और आम अमेरिकी नागरिक को भयानक तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। आर्थिकमंदी के बावजूद अमेरिकी कारपोरेट घरानों के मुनाफों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वहीं दूसरी ओर आम अमेरिकी की पामाली और बेकारी बढ़ी है, जीवनशैली में गिरावट आयी है। ओबामा के सत्ता संभालने के साथ जिस तरह की आशाएं पैदा हुई थीं वे धीरे-धीरे गायब हो गयी हैं।
    ओबामा का सबसे बड़ा वायदा था अमेरिका को युद्धवादी नीतियों से हटाने का। लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई भी सकारात्मक कदम ओबामा प्रशासन ने नहीं उठाया है, इसके विपरीत अमेरिकी विदेश नीति को पूरी तरह युद्धपंथी ताकतों की सेवा में लगा दिया है। ईरान पर हमले की तैयारियां चल रही हैं। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं की संख्या बढ़ा दी गयी है। इराक में अमेरिका और मित्र देशों की सेनाओं की आक्रामक कार्रवाईयां जारी हैं।
    आश्चर्य की बात है कि सारी दुनिया के ताकतवर देश अमेरिका के खिलाफ मुँह बंद किए बैठे हैं। सारी दुनिया में पैदा हुई इस नपुंसकता का दूर-दूर तक कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है। हमें सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ कि अमेरिकी युद्धोन्माद और बर्बरता का सारी दुनिया तमाशा देख रही है। आज कोई भी राष्ट्र पहल करके अमेरिकी बर्बरता के खिलाफ राजनीतिक जागरण पैदा करने का काम क्यों नहीं कर रहा ? क्यों सारी दुनिया के देश अमेरिका के स्वतःठीक होने का इंतजार कर रहे हैं ? आज संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद का स्वायत्त अस्तित्व खत्म हो गया है। आज यह विश्व संस्था अमेरिका के  फरमानों को जारी करने के मंच के रुप में सिकुड़कर रह गई है।
    क्या अमेरिका बर्बरता में जाने-अनजाने भारत के शासनाध्यक्षों की कोई भूमिका है ? हमें सचेत नागरिक के नाते अमेरिकी बर्बरता और युद्धपंथी नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए।
    अमेरिकी बर्बरता का ताजा कदम है ओबामा प्रशासन के द्वारा तैयार कराए जा रहे दो नए शक्तिशाली परमाणु युद्धास्त्र। ये ऐसे युद्धास्त्र हैं जिनके माध्यम से सारी दुनिया में कहीं पर भी एक घंटे से भी कम समय में हमला करके तबाही मचायी जा सकती है। इस तरह के जनसंहारक दो युद्धास्त्रों का अमेरिकी ने 22 अप्रैल 2010 को सफल परीक्षण किया है। इनमें एक का परीक्षण कैलीफोर्निया के वेनडेनवर्ग वायुसेना केन्द्र और दूसरे का फ्लोरिडा के केपकेनविरल वायु सेना केन्द्र पर किया गया। 
    पहले युद्धास्त्र को Conventional Prompt Global Strike अथवा CPGS कहते हैं। यह अस्त्र सारी दुनिया में एक घंटे से भी कम समय में कहीं पर भी जाकर हमला करके तबाही मचा सकता है। इसका अंतर्महाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल के जरिए किसी भी लक्ष्य पर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह अस्त्र इतना शक्तिशाली है कि एक सैकिण्ड में 4000 फीट की गहराई तक जाकर तबाही मचा सकता है। यह 8000 पॉण्ड वजनी है। यह 3000 हजार फुट के क्षेत्र में सारी चीजों को पूरी तरह तबाह कर सकता है। इस अस्त्र को तैयार करने के लिए ओबामा प्रशासन ने अमरीकी कांग्रेस से सन् 2011 तक के लिए 240मिलियन डॉलर की मांग की है। यह बजट में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। सन् 2015 तक इस कार्यक्रम पर 2 बिलियन डॉलर खर्चा आएगा। यह युद्धास्त्र 13 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की गति यानी ध्वनि की गति से 20 गुना ज्यादा तेज गति से हमला कर सकता है। इस युद्धास्त्र के प्रयोग से यह भी सिद्ध होता है कि अमेरिका की परमाणु अस्त्रों को कम करने,हथियारों की दौड़ कम करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। स्मरणीय है इस युद्धास्त्र का परीक्षण ऱुस और अमेरिका के बीच में हाल में संपन्न परमाणु अस्त्र परिसीमन संधि के बाद हुआ है।
     दूसरे नये युद्धास्त्र का नाम है X-37B । इस अस्त्र के विवरण पेंटागन ने अभी तक बताए नहीं हैं। इसकी लागत भी कई बिलियन डॉलर में आएगी। यह अमेरिका के ब्लैक बजट का हिस्सा है। इस युद्धास्त्र का लक्ष्य है अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को तेज करना, अंतरिक्ष का सैन्य लक्ष्यों के लिए इस्तेमाल करना। यह एक तरह का अंतरिक्ष प्लेटफॉर्म है जिसे अंतरिक्षयान के जरिए आकाश में स्थापित किया जाएगा। यह अब तक की अंतरिक्ष में सबसे महत्वाकांक्षी परमाणु सैन्य परियोजना के क्रियान्वयन की दिशा में अमेरिका के द्वारा उठाया गया सबसे खतरनाक कदम है। 
     आश्चर्य की बात है कि भारत,चीन आदि देशों ने अभी तक इस तरह के परीक्षणों पर कुछ भी नहीं कहा है। जबकि रुस ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इससे अंतरिक्ष में परमाणु शस्त्रों की दौड़ तेज होगी और पृथ्वी और भी असहाय बनेगी। उल्लेखनीय है ओबामा प्रशासन ने परमाणु अस्त्रों की दौड़ ऐसे समय में तेज की है जब अमेरिका गंभीर आर्थिक संकट में फंसा हुआ है और अमेरिकी कारपोरेट घरानों की लूटलीला नग्नतम रुप में सामने आ चुकी है। इन दोनों अस्त्रों के बनाने का अर्थ है कि सारी दुनिया में कभी भी परमाणु युद्ध छिड़ सकता है।                         





मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

ओबामा का परमाणु असत्य


     अमेरिका में राजनीतिज्ञों खासकर राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा सफेद झूठ बोलने की परंपरा रही है। झूठे राष्ट्रपतियों की सूची में नयी एण्ट्री है राष्ट्रपति बराक ओबामा की। हाल ही में रुस -अमेरिका के बीच में परमाणु अस्त्र कम करने के बारे में एक समझौता हुआ है। इस समझौते को नयी स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी का नाम दिया गया है। उल्लेखनीय है ऐसा समझौता सोवियत संघ के साथ पहले भी हुआथा और उसका अमेरिका ने पालन नहीं किया।
    नए समझौते के अनुसार 1,550 परमाणु अस्त्र दोनों देश का करेंगे। लेकिन तुर्की में तैनात परमाणु अस्त्रों के बारे में अमेरिका ने चुप्पी साधी हुई है। दक्षिणी अनातेलिया के इनकिरलिक हवाई अड्डे पर तैनात परमाणु अस्त्रों को अनेरिका हटाने नहीं जा रहा है। यह भी कह सकते हैं कि नए समझौते में कहीं पर भी यह नहीं लिखा है कि दुनिया के विभिन्न देशों में अमेरिका के जो परमाणु हथियार लगे हैं वे हटाए जाएंगे।
     जब पत्रकारों ने अमेरिकी प्रशासन से यह जानना चाहा कि क्या पांच यूरोपीय देशों में लगे अमेरिकी परमाणु अस्त्र हटाए जाएंगे तो अमेरिकी अधिकारी ने इसका नकारात्मक उत्तर दिया। उल्लेखनीय है अमेरिका के परमाणु अस्त्रों से लैस 200 बी61 बमबर्षक विमान तुर्की,बेलजियम, फ्रांस, नीदरलैण्ड और जर्मनी में तैनात हैं। ये विमान शीतयुद्ध के जमाने से तैनात हैं। अलकेले तुर्की में ही 90 परमाणु युद्धास्त्र इनकिरलिक हवाई अड्डे पर तैनात हैं। अमेरिका ने धमकी दी है कि तुर्की में लगे 90 परमाणु युद्धास्त्रों का ईरान के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।





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