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सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

लोकतंत्र पर हमला है मुस्लिम विद्वेष


मुसलमान की नई पहचान बन रही है,इस नई पहचान पर बातें होनी चाहिए। एक जमाना था भारत में बहुत कम संख्या में मुस्लिम मध्यवर्ग था,लेकिन आजादी के बाद स्थितियां बदली हैं,तमाम किस्म की बदहाली और गरीबी के बावजूद मुसलमानों में मध्यवर्ग का उदय एक बड़ी घटना है और यह हम सबके लिए खुशी की बात भी है। मध्यवर्गीय मुसलमानों को देखकर यह निष्कर्ष न निकालें कि मुसलमानों में गरीब मुसलमान नहीं हैं। लेकिन मुझे लगता है नवोदित मुस्लिम मुसलमान मध्यवर्ग पर हमें बातें करनी चाहिए। हाल ही अखलाक की हत्या और उसके बाद के दौर में मुसलमानों की प्रतिक्रिया देखकर यह बात कही जा सकती है कि मुसलमानों में जो मध्यवर्ग उभरकर सामने आया है वह इस तरह के हमलों से दुखी है,गुस्से में है ,लेकिन वह किसी भी किस्म के उन्माद में बहना नहीं चाहता।

मैं फेसबुक पर आए दिन मुस्लिम मित्रों की प्रतिक्रियाएं पढ़ता हूँ उनमें संजीदगी रहती है। जबकि यह सच है कि मध्यवर्गीय मुसलमान को तोड़ने की सुनियोजित साजिशें चल रही हैं। गुजरात के दंगों में जो कुछ हुआ उससे मध्यवर्गीय मुसलमान को आर्थिक तौर पर पूरी तरह तोड़कर रख दिया गया। लेकिन यही मध्यवर्गीय मुसलमान आधुनिक शिक्षा प्राप्त करके लगातार पुराने किस्म के स्टीरियोटाइप और पहचान के रुपों से अपने को अलग कर रहा है,नए शिक्षित मध्यवर्ग की पहचान में ढाल रहा है। जबकि यह भी सच है कि विभिन्न गैर वाम राजनीतिक दलों के शातिर नेतागण मुसलमानों को पुरानी जीवनशैली और पिछड़े हुए नजरिए में बाधे रखना चाहते हैं। इनमें वे लोग भी हैं जो मुसलमानों के हमदर्द होने का दावा करते हैं।

मुसलमानो की धीरता,सभ्यता और तहजीब की हमें प्रशंसा करनी चाहिए कि लगातार हमलों के बावजूद वे साम्प्रदायिक ताकतों के साथ कभी नहीं गए।साम्प्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों को धर्म और आतंकवाद के नाम पर गोलबंद करने की अनेक कोशिशें की हैं लेकिन मुसलमानों ने लोकतंत्र और सभ्यता का मार्ग चुनना पसंद किया। नए मध्यवर्गीय मुसलमानों ने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करके या मदरसों के बाहर निकलकर शिक्षा का व्यापक दायरा अपने बीच में खोलकर जिस नए सामाजिक परिवर्तन को जन्म दिया है उस पर कायदे से बात करने की जरुरत है। जबकि लगातार यही प्रचार होता रहा है कि मुसलमान बहुत पिछड़े हैं,आतंकी हैं,साम्प्रदायिक हैं। जबकि ये सभी आरोप मुसलमान समुदाय की समग्र इमेज की रोशनी में बेबुनियाद लगते हैं। तमाम किस्म की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद मुसलमान यदि आज हमारे बीच में लोकतांत्रिक भावबोध के साथ धर्मनिरपेक्षदलों के साथ दिख रहा है तो यह अपने आपमें उस स्टीरियोटाइप प्रचार प्रत्युत्तर है जिसको हम रोज सुनते हैं कि वे साम्प्रदायिक हैं,आतंकी हैं।

मैंने अपने अनुभव में आज तक प्रतिक्रियावादी मध्यवर्गीय मुसलमान को नहीं देखा।जो लोग सोच रहे हैं कि मुसलमान कमजोर है,पिटता है,इसलिए नहीं बोल रहा ,वे गलतफहमी में हैं। मुसलमान सभ्य है,धर्मनिरपेक्ष है इसलिए वह हमेशा यह उम्मीद करता है कि उन पर होने वाले हमलों पर देश की सभी धर्मनिरपेक्ष –लोकतांत्रिक ताकतें बोलें,हस्तक्षेप करें।मुसलमान लोकतांत्रिक पहचान पसंद करता है और उसी के भावबोध में रहता है। मीडिया और हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन नियोजित ढ़ंग से मुसलमानों के खिलाफ घृणा अभियान चलाते रहते हैं। इस अभियान के तहत वह सब कहा जाता रहा है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। हमें लोकतांत्रिक नजरिए से मुसलमानों की विकसित नई लोकतांत्रिकचेतना और उसकी समस्याओं के प्रति विवेकवादी ढ़ंग से विचार करना चाहिए। हमें उन तमाम पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए जो हमें भारत विभाजन के बाद विरासत में मिले हैं। हमें उन रुपों,विचारों और संगठनों का हर स्तर पर विरोध करना चाहिए जो मुसलमान को देशद्रोही सिद्ध करने में एडी -चोटी का परिश्रम करते रहते हैं।

अखलाक की हत्या हम सबके लिए सबक है कि हमने यदि अपने अंदर छिपे हुए मुस्लिम विद्वेष को नष्ट नहीं किया तो यह मुस्लिम विद्वेष हमारे लोकतंत्र को नष्ट कर देगा।मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह का घृणा अभियान बटुक संगठनों ने चलाया हुआ है और प्रत्यक्ष ढ़ंग से वे मीडिया का जिस चालाकी से इस्तेमाल करके मुस्लिम विद्वेष को कवरेज दे रहे हैं यह हम सबके लिए चिंता की बात है। बटुकों के नेताओं के घृणित और जहरीले बयानों को हाल ही में मीडिया ने जिस तरह व्यापक कवरेज दिया है वह हमारे लिए चिन्ता की बात है । हमने सोचना चाहिए कि कैसा मीडिया है जो मुसलमानों के खिलाफ खुलेआम जहरीले बयानों को प्रसारित कर रहा है। इस तरह केबयानों का प्रसारण समाचार संहिता का उल्लंघन है। कायदे से वे बयान नहीं दिखाए जाने जाने जो घृणा भरे हों। हम साफ तौर पर कहना चाहते हैं कि मुस्लिम विद्वेष को हवा देकर बटुकगण और उनके भगवा संगठन सारे देश में साम्प्रदायिक अशांति पैदा करने कोशिश कर रहे हैं। वे लगातार वे ही मसले उठा रहे हैं जिनके जरिए मुसलमानों के खिलाफ घृणा को और सघन बनाया जाय।अफसोस की बात है कि उनके मुस्लिमविरोधी घृणा प्रचार का अन्य धर्मनिरपेक्ष किस्म के हिन्दुओं पर भी असर दिख रहा है,अब फेसबुक पर वे लोग भी मुसलमानों के खिलाफ जहरीले बयान दे रहे हैं जो मुसलमान विरोधी नहीं हैं,लेकिन बीफ कांड की जो मुहिम बटुकों ने देश में झेड़ी है उससे प्रभावित हो गए हैं। मुस्लिम विरोधी घृणा अभियान ने साम्प्रदायिक लोगों पर ही नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष लोगों पर भी असर डालना शुरु कर दिया है,उनकी फेसबुक टिप्पणियां और कमेंटस उस खतरे का संकेत है जिस ओर भगवादल ले जाना चाहता है।



ये लोग विकास की आड़ में सारे देश को मुस्लिम विद्वेष में डुबो देना चाहते हैं। हम सबको ईमानदारी के साथ मुसलमानों के खिलाफ फैलाए जा रहे जहर को रोकना चाहिए और मुस्लिम विद्वेष का जमकर प्रतिकार करना चाहिए।

रविवार, 9 नवंबर 2014

इक़बाल के नजरिए की मुश्किलें

         अल्लामा इक़बाल उर्दू के प्रमुख शायरों में से एक हैं जिनकी शायरी में धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के गहरे अंतर्विरोध मिलते हैं। ये अंतर्विरोध इस बात का संकेत है कि एक लेखक के अंदर में वैचारिक पराभव की प्रक्रिया कभी भी पैदा हो सकती है यदि वो धर्मनिरपेक्ष राजनीति के प्रति वफादार न हो। इक़बाल की कविता में एक अच्छा-खासा अंश है जो धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन दूसरी ओर उनकी कविता पर मुस्लिमलीगी साम्प्रदायिक राजनीति का भी गहरा असर है। कहने का तात्पर्य है कि इकबाल जब प्रतिक्रियावादी राजनीति में खुलकर खेलने लगे तो इससे उनकी कविता सीधे प्रभावित हुई।उनकी साम्प्रदायिक राजनीति के रंग में रंगी कविताएं सबसे कमजोर कविताएं हैं,जबकि उनकी आरंभिक दौर की कविताओं में धर्मनिरपेक्षता जमकर अभिव्यंजित हुई है। इक़बाल का जन्म 9नवम्बर1877 को स्यालकोट में (पंजाब, अब पाक में है) हुआ। एम.ए. की परीक्षा में वे यूनीवर्सिटी भर में अव्वल आए थे।शायरी का उनको स्कूली जीवन से ही शौक था। शायरी की बदौलत उनको जर्मन सरकार ने 'डाक्टरेट' की उपाधि दी।भारत सरकार ने 'सर' की उपाधि दी।टैगोर के बाद वे ही भारत के अकेले ऐसे शायर थे जिनको इतनी ख्याति मिली।सन्1905 में वे बैरिस्टरी की सनद लेने इंग्लैंड गए और वहाँ से 1908 में सफलता हासिल करके लौटे और लाहौर में वकालत आरंभ की।शायर के रुप में इकबाल1899 में जनता के सामने आए। इक़बाल की शायरी के तीन दौर हैं। पहला विलायत जाने से पूर्व 1899 से 1905 तक,दूसरा विलायत-प्रवास के दौरान 1905-1908 तक और तीसरा भारत आने पर 1908 से मृत्यु पर्यन्त।

पहले दौर में इकबाल की शायरी में भारत ही भारत छाया हुआ है। भारत की जनता, उसके हित,ईमान,हिन्दू-मुस्लिम प्रेम उनका मज़हब,स्वतंत्रता और संगठन पर केन्द्रित ढ़ेरों कविताएं मिलती हैं। ये वे कविताएं हैं जो आज भी प्रसांगिक हैं। इस दौर की कविताओं में भारत की गूंज उन्हें बहुत दूर तक ले जाती। नमूना देखें-

''यूनानियोंको जिसने हैरान कर दिया था।

सारे जहाँको जिसने इल्मोहुनर दिया था।।

मिट्टीको जिसकी हक़ने ज़रका असर दिया था।

तुर्कोंका जिसने दामन हीरोंसे भर दिया था।।

मेरा वतन वही है,मेरा वतन वही है।।''

भारत में मज़हबी फंडामेंटलिज्म,गाय और बाजे पर हंगामा खड़े करने वाले,हलाल और झटका का सवाल खड़े करने वाले,मन्दिर और मस्जिद के पंगे खड़े करनेवालों को सम्बोधित कविता में लिखा-

''सच कह दूँ ऐ बिरहमन गर तू बुरा न माने।

तेरे सनमकदों के बुत हो गये पुराने।।

अपनों से बैर रखना तू ने बुतों से सीखा।

जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़को भी ख़ुदाने।।

तंग आके मैंने आख़िर दैरोहरम को छोड़ा।

वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़िसाने।।

पत्थरकी मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है।

ख़ाके-वतनका मुझ को हर ज़र्रा देवता है।।

आ, ग़ैरियत के पर्दे इकबार फिर उठा दें।

बिछड़ोंको फिर मिला दें नक़्शे-दुई मिटा दें।।

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिलकी बस्ती।

आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें।।

दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ।

दामाने-आस्माँसे इस का कलस मिला दें।।

हर सुबह उठके गायेंमनतर वोह मीठे -मीठे।

सारे पुजारियोंको मय प्रीतकी पिला दें।।

शक्ति भी,शान्ति भी भक्तोंके गीतमें है।

धरतीके वासियोंको मुक्ती पिरीतमें है।।

हर सुबह मिल के गायें मन्तर वो मीठे- मीठे।

सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला दें।।

शक्ती भी शान्ती भी भक्तों के गीत में है।

धरती के वासियों की मुक्ती पिरीत में है।।''

''आफ़ताबे सुबुह'' कवितामें अपने विशाल –हृदय का परिचय देते हुए लिखा-

''शौक़े-आज़ादीके दुनियामें न निकले होसले,

ज़िन्दगी भर क़ैदे ज़ंजीरे तअल्लुकमें रहे।

जेरोबाला एक हैं तेरी निगाहों के लिए,

आरजू है कुछ इसी चश्मे तमाशाकी मुझे।।''

'सर सैयदकी लोहे तुरबत' कविता में अमन की भीख मांगते हुए लिखा-

''वा न करना फ़िर्काबन्दीके लिए अपनी जबाँ,

छिपके है बैठा हुआ हंगामिए महशर यहाँ।

वस्लके सामान पैदा हों तेरी तहरीरसे,

देख कोई दिल न दुख जाये तेरी तक़रीरसे।।

महफ़िले-नौमै पुरानी दास्तानोंको न छेड़।

रंगपर जो अब न आएँ उन फ़िसानोंको न छेड़।।''

यह भी लिखा-

''दिखा वोह हुस्ने आलम सोज़,अपनी चश्मेपुरनमको।

जो तड़पाता है परवानेको,रुलवाता है शबनमको।।''

थोड़ा इधर भी गौर करें-

''यह दौर नुक्ताचीं है कहीं छुपके बैठ रह।

जिस दिल में तू मुकीं है वहीं छुपके बैठ रह।।''

इक़बाल की शायरी का दूसरा दौर 1905 से 1908 तक माना जाता है। इस दौरान वे विलायत में रहे और इस दौर में उन्होंने बहुत कम लिखा,इस दौर की कविताओं में फारसी का रंग हावी है।इसके बावजूद उर्दू के भी कई सुंदर प्रयोग मिलते हैं। देखें-

''भला निभेगी तेरी हमसे क्योंकर ऐ वाइज़!

कि हम तो रस्मे मुहब्बतको आम करते हैं।।

मैं उनकी महफ़िले-इशरतसे काँप जाता हूँ।

जो घर को फूँक के दुनिया में नाम करते हैं।।''



यह भी लिखा-

''गुज़र गया अब वोह दौर साकी,कि छुपके पीतेथे पीनेवाले।

बनेगा सारा जहान मयखाना,हर कोई बादहख़्वार होगा।

तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़जरसे आपकी खडुदकशी करेगी।

जो शाख़े नाज़ुकपै आशियाना बनेगा,ना पाएदार होगा।

ख़ुदाके बन्दे तो हैं हज़ारों ,वनोंमें फिरते हैं मारे-मारे।

मैं उसका बन्दा हनूँगा जिसको,ख़ुदाके बन्दों से प्यार होगा।''

इकबाल की कविता का तीसरा दौर 1908 में विलायत से लौटने से लेकर उनकी मृत्यु पर्यन्त 1938तक फैला हुआ है। इस दौर में इकबाल पूरी तरह साम्प्रदायिक रंग में रंगे नजर आते हैं।इस दौर की अधिकांश कविताएं मुस्लिम नजरिए के रंग में रंगी है। इस दौर के उनके दो प्रसिद्ध मुसद्दस हैं, एक है,'शिकवा' और दूसरा है 'जबाबे शिकवा',इन दोनों ने मुसलमानों और उर्दू शायरी में नए अध्याय की शुरुआत की। इन दोनों कविताओं में उन्होंने खुदा से अपने कष्टों और आंतरिक भावनाओं को बड़ी बेबाकी के साथ शेयर किया है। नमूना देखें-

'हो जाएँ खून लाखों लेकिन लहू न निकले।'

'जवाबे-शिकवा' में लिखा- '' जिनको आता नहीं दुनियामें कोई फ़न तुम हो।

नहीं जिस क़ौमको परवाए-नशेमन तुम हो।।

बिज़लियाँ जिसमेंहों आसूदा वोह खिरमन तुम हो

बेच खाते हैं जो इसलाफ़के मदफ़न तुमहो।''

जो लोग आए दिन खुदा को दुखों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं उनके बारे में लिखा-

''शिकवा न बेशोकमका तकदीरका गिला है।

राज़ीहैं हम उसीमें,जिसमें तेरी रज़ा है।।''

इक़बाल ने अंधविश्वास और अकर्मण्यता के खिलाफ भी लिखा है।इसके अलावा मनुष्य की जिजीविषा को केन्द्र में रखकर नए किस्म के आधुनिक नजरिए को रुपायित किया। इसमें दुनिया के प्रति व्यवहारिक नजरिया अपनाने पर जोर है। इक़बाल के ऊपर नीत्शे,बर्गसां,गोयथे ,रुमी आदि का गहरा असर था। इसके अलावा मुस्लिम लीग से जुड़े रहे। यह भी सच है कि जिन्ना के मन में पाक का विचार पुख्ता करने में उनके जिन्ना को लिखे पत्रों की बड़ी भूमिका थी। मुस्लिम लीग के 1930 में अध्यक्ष बननेपर इकबाल ने मुसलमानों के लिए स्वतंत्र राष्ट्र की मांग रखी। इलाहाबाद में 1930 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में अध्यक्ष पद से बोलते हुए उन्होंने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग की।

अपने देश के बाशिंदों पर चोट करते हुए लिखा-

''इक वलवला-ए-ताज़ा दिया मैंने दिलों को

लाहौर से ता-ख़ाके-बुख़ारा-ओ-समरक़ंद

लेकिन मुझे पैदा किया उस देस में तूने

जिस देस के बन्दे हैं ग़ुलामी पे रज़ामंद।''

इक़बाल की 'राम' शीर्षक कविता का अंश देखें-

''लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द.

सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द।

ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक[3] उसका है असर,

रिफ़अत[4] में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द।

इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त,

मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द

है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,

अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द

एजाज़ इस चिराग़े-हिदायत, का है यही

रोशन तिराज़ सहर ज़माने में शामे-हिन्द

तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था,

पाकीज़गी में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था।''









रविवार, 25 नवंबर 2012

मुस्लिम वोटबैंक की घेराबंदी में जुटी माकपा और ममता


    
      पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए माकपा और ममता दोनों ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। धार्मिकनेताओं को बहला-फुसलाकर मतदाताओं को राजनीतिक समर्थन में तब्दील करने की कोशिशें तेज हो गयी हैं। 

सन् 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करेंगे। यहां 30 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है। दूसरी ओर ममता ने राज्य सरकार की ओर से मौलवियों को सरकारी भत्ते की घोषणा करके मुस्लिम मतदाताओं को महत्वपूर्ण बना दिया है और साथ ही यह भी संदेश दिया है आगामी चुनावों में मौलवियों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। माकपा इस सबसे बेहद परेशान है। असल में ममता ने चंद वर्षों में ही मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पुख्ता पकड़ बनाकर माकपा के लिए सिरदर्द पैदा कर दिया है।

उल्लेखनीय है ममता को सत्ता में लाने में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में वामदलों को मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफलता नहीं मिली।जबकि वहां पर तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव नहीं लड़ा था। पिछले दिनों माकपा महासचिव प्रकाश कारात ने यह चिन्ता व्यक्त की कि पश्चिम बंगाल में धार्मिक फंडामेंटलिज्म सिर उठा रहा है और राज्य की भावी राजनीति के लिए यह अशुभ संकेत है।

तृणमूल कांग्रेस की समूची रणनीति की धुरी ये मुस्लिम वोट हैं। इन वोटों को बचाए रखने के लिए तृणमूल काग्रेस ने अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जो हमारे धर्मनिरपेक्ष शासन की राजनीति के साँचे में फिट नहीं बैठते। मसलन् मस्जिद के मौलवियों को सरकारी भत्ते की स्कीन को लागू करके तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों के दिल जीतना चाहती है और इस काम में उसे एक हद तक सफलता भी मिली है।

दूसरी ओर माकपा ने अपने कद्दावरनेता अब्दुल रज्जाक मुल्ला को इस काम में लगाया है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला को कुछ दिन पहले यह इल्हाम हुआ कि वे मुसलमान हैं और उनको हज जाना चाहिए। वे हज गए और लौट भी आए हैं और उनकी हज यात्रा के बाद सामान्यतौर पर धार्मिक हलकों में उनका सम्मान-सत्कार भी हो रहा है। एक नागरिक के नाते वे हज जा सकते हैं। लेकिन वे इसका प्रचार क्यों कर रहे हैं ? वे नमाज पढ़ सकते हैं लेकिन वे इसका मीडिया में प्रचार क्यों कर रहे हैं ? एक राजनेता का धार्मिक प्रचार राजनीति में अनुदार ताकतों की मदद करता है।

कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म को मानने और न मानने के लिए स्वतंत्र है। धर्म एक निजी मसला है। लेकिन जब व्यक्ति अपनी धार्मिक आस्थाओं को सार्वजनिक करता है और उनका प्रचार करता है तो वह धर्म के नाम पर राजनीति करता है। धर्म के नाम पर राजनीति करने से धर्म में अनुदार तत्वों की ताकत बढ़ती है। राजनीति में धार्मिक अनुदारवाद को बल मिलता है। अब्दुल रज्जाक मुल्ला के द्वारा अभी तक अपनी हज यात्रा और उसके बाद के धार्मिक कदमों को मीडिया में प्रचारित करने से वाम राजनीति को कम धार्मिक अनुदार राजनीति को ज्यादा बल मिला है।

सवाल यह है कि अब्दुल रज्जाक मुल्ला तपे-तपाए कम्युनिस्टनेता हैं और उन्हें अपनी जिंदगी के इस दौर में अचानक धार्मिक पहचान का इल्हाम क्यों हुआ ? वे बार बार अपने को मुस्लिम के रूप में क्यों पेश कर रहे हैं ? एक कम्युनिस्ट के लिए धर्म निजी कार्य-व्यापार है। लेकिन मुल्ला ने अपनी धार्मिक पहचान और धार्मिक कार्यकलापों का मीडिया में प्रचार करके धर्म को राजनीति से जोड़ा है जो गलत है और वाम राजनीति के उसूलों के खिलाफ है। इसके बावजूद माकपा ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया है।

धार्मिक अनुदार राजनीति कैंसर है। यह अस्मिता की राजनीति का हिस्सा है। अस्मिता की राजनीति यदि अस्मिता में बांधे रखे और अस्मिता से आगे लेजाकर सामाजिक मुक्ति में रूपान्तरित न करे तो पलटकर सामाजिक विभाजन का काम करती है। यह सभी रंगत के धर्मनिरपेक्ष और उदार विचारों का निषेध है। यह धार्मिक फंडामेंटलिज्म है।

पश्चिम बंगाल में धार्मिक अनुदार राजनीति को अभी तक पर्दे के पीछे काम करते देखा गया था। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में इस दिशा में तेजी से बदलाव आया है और इस तरह की राजनीति को चुनाव के मैदान में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए देखा गया है। जंगीपुर लोकसभा उपचुनाव में धार्मिक अनुदार राजनीति को तकरीबन 10 फीसदी वोट मिले हैं और इसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही रंगत के संगठन शामिल हैं। इतने वोट धार्मिक फंडामेंटलिस्ट संगठनों को हाल-फिलहाल के वर्षों में कभी नहीं मिले।

असल में राज्य में बढ़ रहे धार्मिक फंडामेंटलिज्म को नष्ट करने की जिम्मेदारी सभीदलों की है। इस मसले पर सभी राजनीतिक दलों को साझामंच बनाकर काम करना चाहिए। खासकर राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जिम्मेदारी ज्यादा है कि वे धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया पर नजर रखें और इस तरह के नीतिगत कदम उठाएं जिनसे धार्मिक फंडामेंटलिज्म कमजोर हो।

धार्मिक अल्पसंख्यकों का दिल जीतने के लिए धर्म और धार्मिकतंत्र की मदद नहीं ली जाय। इसके विपरीत विकासमूलक योजनाओं के बहाने अल्पसंख्यकों को मैनस्ट्रीम राजनीति के अंदर सक्रिय किया जाय।


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