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शुक्रवार, 18 मार्च 2011

विकीलीक और भारत की पाखंडी राजनीति


       विकीलीक के भारत संबंधी केबलों के अंग्रेजी दैनिक ' हिन्दू' में निरंतर प्रकाशन के बाद से संसद में हंगामा मचा हुआ है। रोज सांसद इस अखबार में छपी बासी केबलों पर उबल रहे हैं,मचल रहे हैं,संसद ठप्प कर रहे हैं,मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांग रहे हैं। यह प्रच्छन्न तरीके से आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मुँह कैसे काला किया जाए और उसे कैसे नंगा करके जनता में अलग-थलग किया जाए,इस पर भी केबल पत्रकारों की नजर है। खासकर पश्चिम बंगाल,केरल, तमिलनाडु और असम में विधानसभा चुनाव अप्रैल-मई में होने जा रहे हैं।
  विकीलीक के भारतीय केबलों को प्रकाशन के लिए दैनिक 'हिन्दू' ने हासिल करके सुंदर काम किया है। इससे एक तरफ भारतीय राजनीतिक दलों में व्याप्त विचारधारात्मक पतन की परतें खुलेंगी ,लोकतंत्र का खोखलापन सामने आएगा,लोकतंत्र के प्रति संशय बढ़ेगा,राजनीति से किनाराकशी बढ़ेगी और अराजनीतिकरण बढ़ेगा। दूसरी ओर यह भी पता चलेगा कि अमेरिका हमारे देश में कितनी,क्यों और किन विषयों में दिलचस्पी ले रहा है। भारतीय राजनीति के किन नेताओं को अमेरिकी प्रशासन अपने लिए लाड़ला मानता है और कौन हैं जो लाड़ले नहीं हैं। इससे इन नेताओं की इज्जत में बट्टा नहीं लगेगा। वे कभी राजनीतिक तौर पर असुरक्षा के शिकार भी नहीं होंगे। इससे भी बड़ी बात यह है कि भारत की आंतरिक राजनीति में अमेरिकी दूतावास किस तरह काम कर रहा है और क्यों उसकी भारत के आंतरिक मामलों में दिलचस्पी है,यह सब आसानी से सामने आएगा। वैसे अमेरिका भारत में जितनी दिलचस्पी ले रहा है उससे कहीं ज्यादा दिलचस्पी रूस ले रहा है,चीन ले रहा है,वो प्रत्येक देश ले रहा है जिसके हित भारत में दांव पर लगे हैं। भारत भी उनदेशों में दिलचस्पी लेता है जहाँ उसके हित दाँव पर लगे हैं। जरा विकीलीक वाले कोशिश करें कि रूस के भारत में दिलचस्पी के कौन से क्षेत्र हैं,पाक के कौन से क्षेत्र हैं ?
     असल बात यह है कि विकीलीक के केबल सत्य और तथ्य नहीं हैं ये तो अमेरिकी दूतावास में काम करने वाले राजनयिकों की राय हैं,जिन्हें अमेरिकी प्रशासन फीडबैक के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। किसी राजनयिक की राय,भारत के घटनाक्रम पर उसके ब्यौरे और विवरण आदि हमारे देश के लिए किस काम के हैं ? क्या इस तरह के राजनयिक केबलों के जरिए सत्य और तथ्य तक पहुँचा जा सकता है ? मुश्किल यह है कि राय को तथ्य मानकर चला जा रहा है और उसके आधार पर संसद को ठप्प कर दिया गया है। मान लें अमेरिकी राजनयिक जो केबल लिख रहे हैं, सच लिख रहे हैं, लेकिन इस सत्य की पुष्टि कैसे करेंगे ? राय है तो उसके ठोस रूप में पुष्ट भी तो होना चाहिए। हमारे कानूनी ढ़ाँचे और राजनीतिक संरचनाओं में इस तरह के केबल को पुष्ट करने का कोई ठोस ढ़ांचा उपलब्ध नहीं है।
     'हिन्दू' बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित अखबार है। उसके संपादक एन.राम की मीडिया में बड़ी साख है,लेकिन वे एक चीज भूल रहे हैं कि विकीलीक को पुष्ट करने का कोई रास्ता नहीं है। मैं यहाँ बोफोर्स कांड एक्सपोजर की तरफ ध्यान खींचना चाहता हूँ जिसका सबसे ज्यादा खुलासा हिन्दू  अखबार,एन.राम,चित्रा सुब्रह्मण्यम और पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने किया था। 25 सालों तक यह मसला चलता रहा। बोफोर्स कांड के एक्सपोजर के बाद वी पी सिंह  प्रधानमंत्री भी हुए लेकिन वे राजीव गाँधी के खिलाफ सीबीआई को घूसखोरी का कोई प्रमाण नहीं दे पाए। ऐसा कोई प्रमाण स्वयं हिन्दू अखबार ने भी नहीं सौंपा था। हिन्दू अखबार के पास स्विस प्रशासन के जरिए हासिल दस्तावेज थे जिनके आधार पर उसने बोफोर्स कांड को उछाला था लेकिन 250 करोड़ रूपये और 25 साल खर्च करने के बाद भी उसमें यह तय नहीं हो पाया कि घूस किसने ली। स्विस अदालतों से लेकर भारत की अदालतों तक 25 साल में जब हम सिद्ध नहीं कर पाए तो हमें विदेशी स्रोतों पर इतना भरोसा करने की क्या जरूरत है ?
     एक अन्य उदाहरण और लें, क्रिकेट में सट्टेबाजी होती है इसे लेकर 10 साल पहले अमेरिकी प्रशासन ने एक केबल भारत सरकार के पास भेजा था और उस केबल के आधार पर क्रिकेट में सट्टेबाजी पर जमकर हंगामा हुआ और अनेक खिलाडियों का कैरियर बर्बाद हो गया,वह केस अभी भी अदालत में झूल रहा है और 10 साल बाद भी सीबीआई उस केस में चार्जशीट नहीं दे पायी है। केबल स्वयं में प्रमाण नहीं है ,उसे अन्य ठोस आधारों पर पुष्ट किया जाना चाहिए।
     इस पूरे प्रसंग में एक और समस्या है कि विपक्षीदल यह मांग कर रहे हैं कि कांग्रेस सिद्ध करे कि वो सन् 2008 में संसद में विश्वास मत हासिल करने के समय नेक-पाक थी। सब लोग जानते हैं कि कांग्रेस और अन्यदलों का नेक-पाक राजनीति से अब बहुत कम लेना-देना रह गया है। क्लीन राजनीति को कांग्रेस ने बहुत पहले विदा कर दिया था। दूसरी बात यह कि केबल प्रमाण नहीं हैं,यदि इन पर जांच भी होती है तो कुछ भी नहीं निकलेगा और यूपीए -1 की जबाबदेही के लिए नई सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। जिस समय का वाकया हिन्दू ने उछाला है उस समय भी सब जानते थे कि पैसा देकर सांसद खरीदे गए हैं, लेकिन प्रमाण नहीं मिले। संसद में नोटों से भरा बक्शा पहुँच गया लेकिन उसे प्रमाण नहीं माना गया। यही वह बिंदु है जहां पर हमें नोट,केबल और दलीय हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा।
    भारत की राजनीति साफ-सुथरी नहीं है। यहां पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक सब कुछ खरीदा और बेचा जाता है इस सत्य को सारे दल जानते हैं। इस सत्य की पुष्टि के लिए किसी विकीलीक केबल की जरूरत नहीं है।
     भारत की बुर्जुआ राजनीति में घूस को बुरा नहीं मानते,कानूनी नजरों में बुरा मानते हैं,वह भी बुर्जुआजी के सड़े हुए चरित्र पर परदा डाले रखने के लिए,इससे बुर्जुआ राजनीति में ईमानदारी का नाटक चलता रहता है।  बुर्जुआ राजनीति में इस कदर सडांध भरी है कि आप एक मसले पर पकड़ नहीं पाते तब तक दूसरा घोटाला सामने आ जाता है। कानूनी पर्दे की आड़ में बुर्जुआजी आराम से सत्ता की लूट जारी रखता है।
     ये केबल एक बात पुष्ट करते हैं कि भारत में राजनीति नपुंसक हो मीडिया कलंकित हो गया है। मीडिया का कलंकित होना और नेताओं का नपुंसक होना ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस समूचे प्रसंग का सबसे दुखद पहलू है कि अमेरिकी केबलों की नजर से हमारा मीडिया और राजनेताओं के द्वारा भारतीय सच को देखा जा रहा है। सवालउठता है कि हम अमेरिकी राजनयिकों की आंखों से भारतीय सच को देखें या भारतीय आंखों से राजनीति की नंगी सचाई को देखें ?
   अमेरिकी केबलों के आधार पर जो आज संसद में उछल रहे हैं और उन्हें प्रमाण मान रहे हैं वे सचमुच में अमेरिकी आईने से भारतीय समाज को देख रहे हैं.यह खतरनाक कैदखाना है जहां विकीलीक ने हमारे नेताओं और मीडिया को कैद कर लिया है। हमारा एक ही सवाल है  यदि विकीलीक के केबल इतने ही महत्वपूर्ण हैं और सत्यांशों से भरे हैं तो कोई मीडिया घराना इस सत्य के बारे में अभी तक कोई अतिरिक्त तथ्य सामने क्यों नहीं ला पाया ? स्वयं हिन्दू अखबार ने विकीलीक की किसी स्टोरी को आगे ले जाकर विकसित क्यों नहीं किया ? उसमें नए तथ्य क्यों नहीं जोड़े ?
    विकीलीक के अमेरिकी केबल पत्रकारिता का कच्चा माल हैं पत्रकारिता नहीं है। इनकी पुनर्प्रस्तुति तो स्टेनोग्राफी है। यह पत्रकारिता नहीं है। उपलब्ध सत्य और तथ्य में इजाफा किए बगैर पुनरावृत्ति मात्र से इसे एक्टिव खबर नहीं बनाया जा सकता।
   विकीलीक मृतसूचना संसार का हिस्सा हैं। मृत सूचना संसार कितना ही बड़ा सत्य सामने लाए उससे सामयिक यथार्थ को प्रभावित नहीं किया जा सकता है। विकीलीक वैसे ही जैसे ताजमहल है। ताजमलहल के बारे में हम रोज नई -नई ऐतिहासिक खोज समाने लाएं इससे ताजमहल के बारे में दर्शकीय पर्यटन नजरिया आसानी से नहीं बदलेगा। विकीलीक भी अमेरिकी सूचनाओं का ताजमहल है इसमें घुमन्तूओं,यायावरों और मीडिया की दिलचस्पी हो सकती है,पाठकों की इसमें दर्शकीय दिलचस्पी हो सकता है ,इससे ज्यादा इसका कोई महत्व नहीं है।
विकीलीक केबल की घटनाएं घट चुकी हैं। घटित को पुनः हासिल करना, उनके आधार पर पाठकों या जनता को सक्रिय करना असंभव है। विकीलीक में घटनाएं अमेरिकी राजनयिक नजरिए से निर्मित की गई हैं। उन्हें निर्मिति के रूप में ही देखा जाना चाहिए। यह खोजी पत्रकारिता नहीं है। यह तो विकीलीक केबल की अखबारी व्याख्या है।







मंगलवार, 15 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद- 5वीं और समापन किश्त-


विकीलीक के प्रकाशन के बाद एक बहस हो रही है कि क्या विकीलीक का प्रकाशन पत्रकारिता है ? पहले हम देखें कि विकीलीक क्या कहता है  "On Sunday 28th November 2010, Wikileaks began publishing 251,287 leaked United States embassy cables, the largest set of confidential documents ever to be released into the public domain. The documents will give people around the world an unprecedented insight into the US Government's foreign activities." (Wikileaks homepage)
“WikiLeaks has released more classified intelligence documents than the rest of the world press combined.” (Wikileaks homepage)
“With its anonymous drop box, WikiLeaks provides an avenue for every government official, every bureaucrat, and every corporate worker, who becomes privy to damning information that their institution wants to hide but the public needs to know. What conscience cannot contain, and institutional secrecy unjustly conceals, WikiLeaks can broadcast to the world.” (Wikipedia homepage)

मेरे ख्याल में इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि विकीलीक ने दस्तावेज जारी किए हैं। कोई खोजी प्रेस रिपोर्ट जारी नहीं की है। विकीलीक के दस्तावेज का मामला ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के दायरे में आता है। जैसे किसी पत्रकार का लेखन आता है। विकीलीक की घोषणा के साथ हमें देखना होगा कि क्या दस्तावेजों को सीधे पत्रकारिता कह सकते हैं ? जी नहीं।
    ये दस्तावेज पत्रकारिता का कच्चा माल हैं। कोई पत्रकार चाहे तो इनके आधार पर प्रेस के लिए लिख सकता है। पत्रकारों के लिए ये दस्तावेज प्रमाण हैं इसीलिए वे इन दस्तावेजों के प्रकाशन की हिमायत कर रहे हैं। दस्तावेज स्वयं में पत्रकारिता नहीं हैं। वे तो दस्तावेज हैं। इन दस्तावेजों में से सूचनाओं को छांटना,बीनना और फिर समाचार विश्लेषण के रूप में पेश करना पत्रकारिता है। लेकिन सीधे दस्तावेज छापना पत्रकारिता नहीं है। अधिकांश मीडिया घरानों के विकीलीक के आधार पर लिखवाया है, सीधे दस्तावेज नहीं छापे हैं। विकीलीक वालों ने ये दस्तावेज कैसे हासिल किए यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि वे प्रामाणिक दस्तावेज के आधार पर खबरें प्रकाशित कर रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं वे जासूसी करके दस्तावेज लाए हैं. कुछ कह रहे हैं वे घूस देकर दस्तावेज लाए हैं, कुछ आरोप लगा रहे हैं कि विकीलीक ने चोरी करके दस्तावेज हासिल किए हैं। विकीलीक ने दस्तावेज कैसे हासिल किए, यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि दस्तावेज में बतायी बातें सत्य हैं।
     पत्रकारिता का सत्य से रिश्ता होता है। अन्य चीजें उसके लिए गौण हैं। यह भी महत्वपूर्ण नहीं है कि सत्य का किस पर और क्या असर होगा। सत्य महत्वपूर्ण है। सत्य का स्थान राष्ट्रीय हितों.राष्ट्रवाद,सुरक्षा, सेना,मुखबिर,जासूस,राजनयिक,पेंटागन,सेना, सीआईए आदि से ऊँचा होता है। सत्य को पीडित और पीडक के दायरे में बांधकर नहीं रखा जा सकता है। सत्य को आप बंदी बनाकर या वर्गीकृत करके नहीं रख सकते। कारपोरेट मीडिया ने इराक और अफगानिस्तान युद्ध में सूचनाओं की हत्या की। सत्य को मौत के घाट उतारा । उस समय किसी ने हंगामा नहीं किया और जब विकीलीक ने कारपोरेट मीडिया के साजिश और अमेरिकी प्रशासन के साथ मिलीभगत को दस्तावेजों के साथ नंगा किया है तो कारपोरेट मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और अमेरिकी प्रशासन के मदांध शासक हल्ला कर रहे हैं कि असांजे को आतंकवादी है। देशद्रोही है। वे मांग कर रहे हैं कि असांजे को किसी तरह जेल में बंद कर दिया जाए।
    विकीलीक के दस्तावेजों ने बड़े मीडिया घरानों के विदेशी संवाददाताओं की तथाकथित सत्यतापूर्ण रिपोर्टिंग को भी असत्य करार दिया है। प्रकारान्तर से यह बताया है कि विदेशी संवाददाता इराक और अफगानिस्तान के मामले में रिपोर्टिंग करते हुए विशुद्ध झूठ बोल रहे हैं।
     विकीलीक ने कारपोरेट मीडिया के इस प्रचार की हवा निकाल दी है कि शीतयुद्ध खत्म हो गया है। ईरान के खिलाफ किस तरह परमाणु अस्त्रों के बहाने हंगामा खड़ा किया जा रहा है, चुनी गई सरकार के खिलाफ किस तरह बाहर से उकसावे और हस्तक्षेप की कार्रवाईयां हो रही हैं। किस तरह आज भी अमेरिका विभिन्न फंडामेंटलिस्ट और उग्रवादी,आतंकी गिरोहों की मदद कर रहा है और विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है। दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में कैसे शीतयुद्ध चल रहा है इसके व्यापक विवरण और ब्यौरे विकीलीक ने प्रकाशित किए हैं।
    अमेरिका के विभिन्न राजनयिकों के द्वारा प्राइवेट केबल संवाद किस तरह ईरान के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप चल रहा है इसकी सूचना देते हैं। इन केबल संवादों से यह भी पता चलता है कि अमेरिका विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करके क्षेत्रीय संतुलन को बदलना चाहता है।  
   जनता की राय का मेनीपुलेशन-     
      विकीलीक के बारे में अमेरिका स्थित ‘पेव रिसर्च सेंटर’ के मीडिया सर्वेक्षण पर भी गौर कर लेना समीचीन होगा। 29 नवम्बर2010 से लेकर 5 दिसम्बर 2010 के बीच में मीडिया में प्रकाशित खबरों के सर्वे के आधार पर पेव ने रेखांकित किया है कि 23-29 मार्च 2009 में अमेरिकी मीडिया में ओबामा का कवरेज एक सप्ताह के बीच में सबसे ज्यादा यानी 43 प्रतिशत था। उसके बाद 29 नवम्बर से 5 दिसम्बर की अवधि में प्रकाशित विकीलीक का कवरेज 13 प्रतिशत दर्ज किया गया। जबकि इसी अवधि में अमेरिका के समाचारपत्रों में आर्थिक कवरेज 28 प्रतिशत,सेना में समलैंगिकता का सवाल 5 प्रतिशत,2010 के चुनावों पर 4 प्रतिशत,अफगानिस्तान का कवरेज 3 प्रतिशत रहा।
   पेव के अनुसार विकीलीक की खबर उपरोक्त सप्ताह की दूसरी बड़ी खबर रही और इसने समग्र मीडिया में 16 फीसदी स्थान घेरा। इसमें अखबारों के प्रथम पन्ने की हैडलाइन से कर रेडियो-टीवी की खबरें,टॉक शो आदि सबका स्थान शामिल है। विकीलीक रहस्योदघाटन के बाद अमेरिकी मीडिया विकीलीक की खबरें तीसरी बार पहली पांच खबरों में स्थान बनाए रखने में सफल रही है। इनमें अफगानिस्तान के बारे में सूचनाएं 13 प्रतिशत ( 26 जुलाई 2010 से 1 अगस्त 2020 के बीच) रहीं।
    विकीलीक की 29 नवम्बर से प्रकाशित सामग्री में मीडिया में दो महत्वपूर्ण तत्व उभरे हैं। पहला, अमेरिकी कूटनीति,खासकर विदेश विभाग में काम करने वालों की प्रतिक्रियाएं और उसका अमेरिकी कूटनीति पर असर। दूसरा ,जूलियन असांजे की भूमिका। उसे अमेरिकी शासन के लोगों ने ‘हाइटेक आतंकवादी’ तक कह डाला। उसके सेक्सुअल दुर्व्यवहार पर इंटरपोल की सर्च करा दी गयी। विकीलीक के एक्सपोजर पर न्यूयार्क टाइम्स के कार्यकारी संपादक बिल केल्लर ने कहा कि ‘इस तरह के रहस्योदघाटन की अपनी चुनौतियां हैं।’ इसने व्यापक कवरेज हासिल किया। आरंभ के रहस्योदघाटन से यह बात साफ हो गयी कि अमेरिका अपने गोपनीय दस्तावेजों को सुरक्षित रखने में असफल रहा है। सभी माध्यमों में कवरेज का फोकस यही था कि ये दस्तावेज अमेरिकी विदेशनीति और नेताओं को कितनी क्षति पहुँचा सकते हैं। सीएनएन के टीकाकार डेविड गेर्गन ने कहा ये ‘‘दस्तावेज गंभीर क्षतिकारक हैं। यह कोई घोटाला नहीं है। लेकिन यहां हम देख रहे हैं कि अमेरिकी प्रशासन जनता से झूठ बोल रहा है।’’
 दूसरी ओर यह भी देखा गया कि 60 फीसद से ज्यादा अमेरिकी जनता ने कहा कि विकीलीक के दस्तावेजों का प्रकाशन नुकसानदेह है। पेव ने सर्वे में पाया कि 10 में 6 आदमी कह रहे थे कि इन दस्तावेजों का प्रकाशन नुकसानदेह है। जबकि 31 फीसदी ने कहा कि इससे जनसेवा हुई है। यह सर्वे 2-5 दिसम्बर 2010 को किया गया। रोचक बात यह थी कि पाठकों ने दस्तावेज और मीडिया की भूमिका में अंतर किया और पता चला कि 38प्रतिशत मानते थे कि मीडिया इस मामले को बहुत दूर तक खींचकर ले गया। जबकि 39 प्रतिशत का मानना था कि मीडिया ने संतुलन से काम किया है। मात्र 14 प्रतिशत ने कहा कि मीडिया ने गोपनीय दस्तावेजों को अतिरंजित करके छापा है। अगस्त 2010 में विकीलीक के दस्तावेजों के प्रकाशन के समय आम जनता में 47 प्रतिशत ने कहा कि उन्होंने थोड़ा बहुत सुना है विकीलीक की स्टोरी के बारे में। जबकि 42 फीसदी ने कहा कि इसने जनहित के लक्ष्यों की पूर्ति की है।
    विभिन्न दलों में विकीलीक के प्रभाव को लेकर भिन्न राय थी। मसलन रिपब्लिकन का मानना था कि विकीलीक के प्रकाशन से जनता के हितों का नुकसान ज्यादा हुआ है। यानी 75 फीयदी मानते थे कि  नुकसान किया है जबकि मात्र 2 फीसद मानते थे कि जनहित की सेवा की है। डेमोक्रेटिक पार्टी के सदस्यों में 53 फीसदी मानते थे कि इससे जनहित की क्षति हुई है।जबकि 36 फीसद मानते थे कि जनहित की सेवा की है। जबकि बिना दल के लोगों में 53 फीसदी मानते थे कि जनहित की क्षति हुई है और 36 फीसद मानते थे कि जनहित में इनका प्रकाशन सही है।      
विकीलीक के खुलासे के बाद सीआईए और अमेरिकी दूतावास के अन्तस्संबंधों का पर्दाफाश हुआ है। कायदे से दूतावासों को जासूसी का केन्द्र नहीं बनाया जा सकता और खासकर सीआईए के केन्द्र या एजेंट के रूप में अमेरिकी कूटनीतिज्ञों का सीआईए के लिए काम करना चिंता की बात है।
   विकीलीक के खुलासे की शक्ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका और फ्रांस ने अपने सभी इंटरनेट सर्वरों से इसका संचार रोक दिया था ।अन्य देशों पर भी दबाब डाला गया कि वे प्रसारण बंद कर दें। स्वीडन का सर्वर अभी तक काम कर रहा था लेकिन स्वीडन सरकार पर अमेरिकी दबाब है कि वह अपने सर्वर के जरिए विकीलीक को संचार न करने दे। स्थिति की भयावहता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि दुनिया की सभी गुप्तचर संस्थाएं हरकत में आ गयीं। अभी विकीलीक हम तक जो पहुँचा है वह उपासला स्थित सर्वर के माध्यम से पहुँचा है। स्वीडन के सर्वर के जरिए कोई विकीलीक पर पहुँचना चाहता है तो उसे इंकार का सामना करना पड़ रहा है। इंटरनेट अनुरोध को स्वीकार नहीं कर रहा है। चीन के द्वारा बड़े पैमाने पर विकीलीक पर हमले किए गए हैं। 
    विकीलीक केबल का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है कि अमेरिकी प्रशासन,चाहे वहां राष्ट्रपति कोई भी हो ,कभी भी मानवाधिकारों का सम्मान नहीं करता। सर्वसम्मत विश्व कानूनों को नहीं मानता। खासकर 2009 और 2010 में जितने केबल प्रकाशित किए गए हैं उनमें बताया गया है कि कौंसिल ऑफ यूरोप और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट के द्वारा अमेरिका के द्वारा किए जा रहे मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को किस तरह अमेरिकी प्रशासन और उसके मित्रदेशों ने छिपाने और इन मंचों को प्रभावित करने की कोशिश की थी। मसलन कौंसिल ऑफ यूरोप ने यह सत्य रहस्योदघाटित किया था कि अमेरिका आतंकियों के नाम पर किसी भी व्यक्ति को पकड लेता है और उसे तीसरी दुनिया के किसी भी देश में भेज देता है। वहां उसके ऊपर जांच पड़ताल के नाम से अत्याचार किए जाते हैं। इन देशों में ऐसे लोगों को किसी भी तरह का कानूनी संरक्षण नहीं दिया जाता। कौंसिल ने यह भी रेखांकित किया है कि यूरोपीय देशों का अमेरिका के प्रति नरम रूख है। कौंसिल ने यह भी खुलासा किया है कि सीआईए के यूरोप और अन्य देशों में काले जेलघर हैं। कौंसिल के द्वारा अमेरिका के बारे में किए गए खुलासों पर अमेरिकी प्रशासन कैसे सोचता रहा है इसकी झलक हमें स्ट्रासबर्ग में अमेरिका के कौंसिल जनरल विंसेंट कर्वर के विकीलीक केबल संदेशों के एक्सपोजर से पता चलती है। विकीलीक के मार्च 2009 में “Council of Europe: More Effective Around the Edges than at the Core.” शीर्षक से प्रकाशित केबल में विंसेंट ने लिखा है “The Council of Europe (COE) likes to portray itself as a bastion of democracy, a promoter of human rights, and the last best hope for defending the rule of law in Europe—and beyond. It is an organization with an inferiority complex and, simultaneously, an overambitious agenda. In effect, it is at its best in providing technical assistance to member-states and at its worst in tackling geo-political crises.” , “receives (rightfully, in our view) neither the level of funding nor the attention from member-states that other regional organizations, such as the EU and the OSCE (Organization for Security and Cooperation in Europe) receive.” आगे लिखा - “The ECHR will block the extradition of prisoners to non-COE countries if it believes they would be subject to the death penalty or torture. It has also requested more information on pending British extradition cases to the US where it believes the prisoners might be sentenced in the US to life imprisonment with no possible appeal or automatic judicial review of the life sentence.”
     विकीलीक के खुलासे के बाद से यह स्थिति बनी है कि अमेरिका और दूसरे देशों में उन पत्रकारों,अफसरों ,सैनिकों और राजनयिकों की खोज की जा रही है जो विकीलीक के लिए सूचनाएं जुटाने और मदद के काम में लगे हैं। अमेरिकी प्रशासन परेशान है कि उसे अभी तक विकीलीक के स्थानीय संपर्कों का पता नहीं चला है। विकीलीक की मदद करने वाले अमाजॉन कंपनी और पायपाल ने अमेरिकी दबाब में आकर सबसे पहले अपने हाथ खींचे, उसके बाद कई वित्तीय संस्थाओं ने अपने को विकीलीक से अलग कर लिया।
    पूंजीवादी ताकतों की नयी रणनीति है कारपोरेट अधिनायकवाद की। वे इस रास्ते पर राज्य को भी चलने के लिए बाध्य कर रहे हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद का अर्थ है ‘हमारे साथ सहयोग करो वरना मरने को तैयार रहो।’ कारपोरेट अधिनायकवाद से सहयोग किए बिना जो जीना चाहता है उसको वे हाशिए पर डाल देते हैं,विभिन्न किस्म की समस्याओं में घेरकर परेशान करते हैं और अंत में मरने के लिए मजबूर करते हैं। विभिन्न पूंजीवादी देशों में राज्य इसी फार्मूले का अनुसरण कर रहा है और विकीलीक के मामले में भी यही रणनीति अपनायी गयी है।
    अमेरिका ने विकीलीक के हमदर्दों और सहायकों पर हमले तेज कर दिए हैं। कारपोरेट अधिनायकवाद की खूबी है कि वह हमारी इच्छाओं पर शासन करता है। जो उसके खिलाफ प्रतिवाद कर रहे हैं उनको वह उन्हें धीमी गति से आत्महत्या करने या हत्याएं करने के लिए मजबूर करता है। कारपोरेट मीडिया किस तरह भय की सृष्टि करता है उसका आदर्श नमूना है अमेरिका में विकीलीक के रहस्योदघाटन पर किया गया जनमत सर्वेक्षण। 2दिसम्बर 2010 को अमेरिका में यह सर्वे किया गया। इस सर्वेक्षण में 2,000 लोगों से बात की गयी जिसमें से 63 प्रतिशत अमेरिकी मानते हैं कि विकीलीक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। इन लोगों ने अमेरिकी समाचारपत्रों के द्वारा विकीलीक के दस्तावेज प्रकाशित किए जाने का भी विरोध किया है।
    सवाल उठता है अमेरिकी जनता की यह राय कैसे बनी ? असल में विकीलीक के रहस्योदघाटन के बाद से विभिन्न माध्यमो और टीवी पर परिचर्चाओं और टॉक शो में विभिन्न दलों के नेताओं ने विकीलीक विरोधी घृणा का प्रचार किया हैं और धमकाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया है। उन्होंने बार बार एक ही बात पर जोर दिया है कि ‘‘विकीलीक के रहस्योदघाटन के बाद से असंख्य निर्दोष लोगों की जिंदगी के लिए खतरा पैदा हो गया है।’’यह प्रचार वास्तव में मिथ्या है।
     असल में विकीलीक ने बताया है कि अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण माल है युद्ध और हिंसा । अमेरिका सालाना सैंकड़ों विलियन डॉलर सेना पर खर्च करता है। यह अमेरिका के सभी व्यापारिक मुनाफों से ज्यादा बैठता है। उसके सभी राज्य,फेडरल और स्थानीय सरकारी संस्थानों के बजट से भी ज्यादा है। सेना को दीजाने वाली आर्थिक राशि पर अमेरिका में सांसद कभी सवाल नहीं उठाते। अमेरिका की सेना ही उसकी जनसंपर्क अधिकारी है। वही अमेरिका के लिए बाजार और संसाधन मुहैय्या कराती है।
   अमेरिका के मालों और विचारों को हम समृद्धि के मंत्र की तरह ग्रहण करते हैं। विकीलीक के इराक-अफगानिस्तान के जिस सत्य की ओर ध्यान खींचा हैं उसके दो प्रधान पहलू हैं ,पहला पहलू है, इराक-अफगानिस्तान के बारे में कारपोरेट मीडिया और अमेरिकी राजनीतिक दलों का असत्य प्रचार। दूसरा पहलू है, अमेरिकी सेना और राजनयिकों की भूमिका। इन सबकी धुरी है अमेरिका का सैन्य उद्योग।
   अमेरिका को जो लोग विकास के आदर्श मानक के रूप में देखते हैं वे सैन्य उद्योग और अमेरिकी आकांक्षाओं के बीच के अन्तस्संबंध की अनदेखी करते हैं। इस प्रसंग में सीनेटर जे. विलियम फुलब्राइट की किताब ‘ दि पेंटागन प्रौपेगैण्डा मशीन’ में बताए तथ्यों पर गौर कर लेना समीचीन होगा। उन्होंने लिखा है आज अमेरिका में 22,000 बड़े सैन्य ठेकेदार हैं। 100,000 सब-ठेकेदार हैं। अमेरिका के 363 स्थानों और 435 कांग्रेसनल जिलों में सैन्य उत्पादन केन्द्र हैं। अमेरिका के सैन्य उत्पादन केन्द्रों और सैन्य हरकतों को अमेरिकी जनता में अधिकांश समय समर्थन मिला है। इस समूचे अमेरिकी सैन्य उद्योग समूह में लाखों लोगों के हित दांव पर लगे हैं। और वे आम जनता की राय को प्रभावित करते हैं।
     पेंटागन के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उसके जनसंपर्क के नेटवर्क में 30 हजार से ज्यादा लोग काम करते हैं और एसोसिएट प्रेस की खोजी रिपोर्ट पर विश्वास करें तो विगत पांच सालों में सेना ने देश और विदेश में बेशुमार दौलत खर्च की है। अकेले 2009 में ही अमेरिकी सेना ने जनसंपर्क पर होने वाले खर्चे में 63 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है यानी 4.7 बिलियन डॉलर खर्च किया है। इसमें तकरीबन दो बिलियन ड़लर पैसा स्टाफ पर खर्च हुआ। इसके अलावा 1.6 बिलियन डॉलर नए लोगों की भर्ती पर खर्च किया गया। आधा बिलियन डॉलर मनोवैज्ञानिक युद्ध पर खर्च किया गया। जिसके जरिए विदेशी जनता को  निशाना बनाया गया। कुल मिलाकर जनसंपर्क पर 547 मिलियन डॉलर खर्च किया गया। इसका काम था अमेरिका जनता को पेंटागन के लक्ष्यों के अनुकूल ढ़ालना।
  पेंटागन के 2002 के आंतरिक दस्तावेज में जनसंपर्क बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया था। साथ ही यह भी तथ्य सामने आया कि सेना के 75 भू.पू, अफसरों को जनसंपर्क के लिए काम करने के लिए अनुबंधित किया गया और उन्हें टीवी और रेडियो कार्यक्रमों में उतारा गया। साथ ही इन लोगों का काम था अखबारों और पत्रिकाओं के लिए पेंटागन के पक्ष में लिखना।     
    अमेरिकी की आक्रामक विदेश नीति और हस्तक्षेपकारी भूमिका की धुरी यही सैन्य उद्योग है। जितने भी राजनयिक हैं वे इसी उद्योग के लिए जासूसी का काम करते हैं। अमेरिका में सतह पर लोकतंत्र है लेकिन वास्तव अर्थों में अमेरिकी सैन्य अधिकारी जो कहते हैं उसका राजनेता अनुकरण करते हैं। अमेरिका के सभी महत्वपूर्ण फैसले सैन्य उद्योग लेता है लेकिन ऊपर से यह चीज नजर नहीं आती।
    विकीलीक के एक्सपोजर के परे जाकर देखना चाहिए कि आखिरकार राजनयिक जासूसी क्यों कर रहे हैं ? युद्ध क्यों हो रहे हैं ? यहां महत्वपूर्ण यह नहीं है कि किसने क्या कहा ? बल्कि महत्वपूर्ण है सैन्य उद्योग ने क्या किया ? इराक-अफगानिस्तान के दस्तावेज हमें जमीनी हकीकत के एक अंश का अंदाजा देते हैं लेकिन हमें इन दस्तावेजों के परे जाकर पीछे से काम करने वाले सैन्य उद्योग की भूमिका पर विचार करना चाहिए। बिना उसके विकीलीक का एक्सपोजर विचारधारात्मक रूप में समझ में नहीं आएगा।  
    अमेरिकी सेना की नीतियों और आदेशों के अनुसरण का ही परिणाम है कि राजनयिक और अमेरिकी प्रशासन लोकतांत्रिक मूल्यों, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, देशज कानून, विश्व कानून,प्रोटोकोल आदि का खुला उल्लंघन करता रहा है।
    अमेरिका ने अपने शत्रुओं के खिलाफ सेना,भाड़े के सैनिकों और शारीरिक तौर पर सफाया कर देने की नीति का खुले तौर पर पालन किया है। ये सारी चीजें लोकतांत्रिक सरकार की इमेज के अनुकूल नहीं हैं बल्कि सैन्य अधिकारियों की मनोदशा के अनुकूल हैं।
    अमेरिका की विदेशनीति और प्रचार नीति में साझा तत्व है उन्माद का। वे जब भी किसी मसले को उठाते हैं तो उन्मादी की तरह उठते हैं । उन्मादी की तरह प्रचार करते हैं। उन्मादी प्रचार अमेरिकी सैन्य उद्योग का गहना है।
    अमेरिकी जनता में विकीलीक के एक्सपोजर को अधिकांश अमेरिकी जनता ने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ माना है। इसका प्रधान कारण क्या है ? असल में अमेरिकी सैन्य उद्योग समूह का भारी प्रचार अभियान सेना के पापों पर पर्दादारी करता रहा है। उल्लेखनीय है सैन्य समूह के प्रचार के निशाने पर सबसे पहले अमेरिकी जनता रहती है। वे मीडिया को पहले अपने अनुकूल बनाते हैं और बाद में उसके जरिए अमेरिकी जनता पर विचारों की वर्षा करते हैं।
      अमेरिकी सेना में कार्यरत सैनिकों को सैन्य उद्योग समूह और पेंटागन ने अपने विचारों का बंदी बनाकर रखता है। अमेरिका में इस समय भू.पू. सैनिकों की संख्या 28 मिलियन से ज्यादा है। यानी अमेरिका की वयस्क आबादी में पांच में से एक आदमी भू.पू. सैनिक है। इन लोगों के दिमागों की धुलाई हो चुकी है और उस पर निरंतर सैन्य विचारों की महत्ता के पेंटागन प्रचार का दबाब रहता है।
    इसके अलावा 3 मिलियन सैनिक हैं जिनकी अहर्निश पेंटागन दिमागी धुलाई करता रहता है। इन लोगों तक सैन्य विभाग के प्रचार के अलावा अन्य कोई प्रचार नहीं पहुँच पाता है। उल्लेखनीय है 1.5 मिलियन सैन्य स्टेशन विदेशों में हैं जहां पर सैनिकों को पेंटागन और सुरक्षा विभाग के अलावा अन्य किसी भी स्रोत से सूचना नहीं मिलती।
   सेना के विभिन्न अंगों के लिए बड़े पैमाने पर रेडियो और टेलीविजन चैनलों की व्यवस्था है। संभवतः यह विश्व में सबसे बड़ी सैन्य सूचना-मनोरंजन व्यवस्था है। अमेरिकी सेना के नेतृत्व में चलने वाले जमीनी 704 रेडियो और 80 टेलीविजन स्टेशन हैं। ये थाईलैंड से लेकर ईरान तक फैले हुए हैं।  इसके अलावा समुद्री बेड़ों में 56 रेडियो और 11 टेलीविजन स्टेशन हैं। रेडियो स्टेशनों से 450,000 रेडियो कार्यक्रमों के ट्रांस्क्रिप्शन और 60 मिलियन फीट लंबी टीवी फिल्में सालाना मुहैय्या करायी जाती हैं।
   चूंकि सेना 35 सालों से भी ज्यादा समय शीतयुद्ध का हिस्सा रही है अतः आज सेना के लोग अपने को राष्ट्रीय राजनीति का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। अमेरिकी सैन्य उद्योग किसी न किसी बहाने युद्ध को प्रधान एजेण्डा बनाए रखता है और शांति का विरोध करता है। अमेरिका को विश्वस्तर पर अलग-थलग डालने के लिए जरूरी है कि युद्ध की बजाय शांति को प्रधान एजेण्डा बनाया जाए। शांति को समाज में स्थापित करने के लिए लोकतंत्र का ईमानदारी के साथ पालन किया जाए। यही विकीलीक का सबक है।  

















सोमवार, 14 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-4-


पत्रकारिता पर असर- विकीलीक के आने के बाद पत्रकारिता का भी नक्शा बदलेगा। अब तक किसी गुप्त दस्तावेज के स्रोत को पत्रकार छिपाते थे लेकिन अब ऐसा कम होगा। पत्रकार जिन सरकारी स्रोतों से दस्तावेज हासिल करते थे उनके बारे में रहस्य बनाए रखते थे। यह काम पत्रकार और सरकारी स्रोत के साथ अघोषित समझदारी के आधार पर होता था। पत्रकार अपनी बात कहते थे,लेकिन दस्तावेज नहीं दिखाते थे,स्रोत नहीं बताते थे। हम अभी तक नहीं जानते कि बोफोर्स का रहस्योदघाटन करने वाले पत्रकारों चित्रा सुब्रह्मण्यम और एन.राम. ने बोफोर्स की दलाली वाले दस्तावेज कहां से और कैसे हासिल किए थे। उनके दस्तावेजों का स्रोत कौन था ?
     विकीलीक के प्रधान जूलियन असांजे ने ‘डेमोक्रेसी नाउ’ के रेडियो पर दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि अब पत्रकार को दस्तावेजों को लेकर इतनी एहतियात बरतने की जरूरत वहीं होगी। असांजे ने कहा "We don't see, in the case of a story where an organization has engaged in some kind of abusive conduct and that story is being revealed, that it has a right to know the story before the public, a right to know the story before the victims, because we know that what happens in practice is that that is just extra lead time to spin the story ."
    इस प्रसंग में अमेरिका की चिन्ताएं है कि इराक और अफगानिस्तान और अन्य देशों में अमेरिकी के लिए एजेंट का काम करने वालों के नाम बगैरह यदि विकीलीक उदघाटित कर देता है तो गंभीर संकट खड़ा हो सकता है और अमेरिका के लिए खुफिया तौर पर काम करने वाले लोग मारे जा सकते हैं या पकड़कर जेल भेजे जा सकते हैं अतः उन्होंने विकीलीक से विभिन्न मीडिया प्रतिष्ठानों के जरिए अपील की कि दस्तावेज प्रकाशित करते समय जनहानि न हो इसका ख्याल रखा जाना चाहिए । विकीलीक ने यह ध्यान रखा है। उसने अफगानिस्तान,इराक आदि देशों में काम करने वाले स्थानीय अमेरिकी एजेंटों और मुखबिरों के नाम उजागर नहीं किए हैं। उन केबलों और दस्तावेजों को संपादित कर दिया गया था जहां स्थानीय एजेंट का नाम लिखा था। इस तरह विकीलीक ने अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों का ख्याल रखा।
    उल्लेखनीय है 1971 में अमेरिकी प्रशासन ने टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट को गोपनीय दस्तावेज छापने से आधिकारिक तौर पर रोका गया। अमेरिका में रिवाज है कि कोई सरकारी दस्तावेज छापने के पहले सरकारी राय जानने की कोशिश की जाती है और उस समय सरकार ने वियतनाम युद्ध के दस्तावेजों को छापने से रोकने की काफी कोशिश की और उस समय अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी 6-3 से यह फैसला दिया था कि दस्तावेज छापने से रोकना फर्स्ट एमेंडमेंट का उल्लंघन है। लेकिन जजों ने कहा था कि 1950 के जासूसी कानून को इस प्रसंग में लागू किया जा सकता है। लेकिन अदालत ने सरकारी दस्तावेजों के प्रकाशन को रोकने से इंकार कर दिया। कानूनन गोपनीय सरकारी दस्तावेजों को प्रकाशित करना अपराध है। यह कानून शीतयुद्ध के दौरान बनाया गया था। लेकिन अमेरिका में लगातार गोपनीय सरकारी दस्तावेज प्रकाशित होते रहते हैं और कभी भी इस कानून को लागू नहीं किया गया। आमतौर पर अमेरिका के जासूसी कानून में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित सूचनीओं’ और ‘विदेशी सरकार’ से संबंधित लीक छापना अपराध है।
    उल्लेखनीय है पहले कोई भी पत्रकार गोपनीय दस्तावेज सरकारी ऑफिस की चौहद्दी के बाहर लाता था उन्हें सुरक्षित जगह पहुँचाता था,संपादक को दिखाता था फिर चुनकर खबर बनाता था ,लेकिन विकीलीक के मामले में ऐसा नहीं हुआ है। सूचना संप्रेषक सरकारी गोपनीय दस्तावेज को किसी तरह प्राप्त करके सीधे जिप फाइल में सुरक्षित बनाकर ईमेल कर देता है। वह सरकार के सुरक्षा संबंधी किसी भी बाड़े को किसी तरह अतिक्रमित करके यह काम कर लेता है और उसके दस्तावेज सीधे प्रकाशित हो जाते हैं। इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि इंटरनेट,मोबाइल और कम्र्यूटर के विस्तार के साथ ही साथ बड़े पैंमाने पर विभिन्न देशों में सरकार का नागरिकों के जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा है। अमेरिका में निजी मामलों में सरकार दखलंदाजी कर रही है। नागरिकों की संदेह के नाम पर ब्लैकलिस्ट बनायी गयी है। खास किस्म के लोगों ,जैसे मानवाधिकार के लिए काम करने वालों पर हमले और नजरदारी बढ़ी है।यह फिनोमिना अमेरिका से लेकर भारत तक देखा जा रहा है। विभिन्न देशों की सरकारें विभिन्न उपायों को लागू करने की कोशिश कर रही हैं जिनसे नागरिक की पूरी जासूसी और निगरानी की जा सके। राष्ट्रीय सुरक्षा ने नाम पर उन लोगों को परेशान किया जा रहा है जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। अनेक बार सरकारी गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन से सरकारी ऑफीसर की भूलें सामने आती हैं,दुर्व्यवहार सामने आता है। संबंधित विभाग में क्या घोटाला चल रहा है यह सामने आता है।
     मसलन विकीलीक से पता चलता है कि अमेरिका के अनेक राजनयिक वस्तुत सीआईए के जासूस हैं। जबकि नियमानुसार राजनयिक का काम जासूसी करना नहीं है। दूतावास में जासूसों की गोपनीय नियुक्ति नहीं की जा सकती ,लेकिन अनेक देशों में अमेरिकी राजनयिक कूटनीति और जासूसी दोनों काम एक साथ कर रहे थे। एक और भी समस्या है कि जो राजनयिक अपने ऊपर वालों से केबल आदि के जरिए गोपनीय विचार-विमर्श करते हैं उनके लिए भी इस केबल एक्सपोजर ने गंभीर संकट पैदा कर दिया है। उनके आपसी विश्वास को हिला दिया है। एक-दूसरे से बात करने वाले अधिकारी नहीं जानते कि उनकी बातचीत कहीं लीक तो नहीं हो जाएगी और लीक होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी की नौकरी से लेकर जिंदगी तक कुछ भी खतरे में पड़ सकती है।
विकीलीक को इंटरनेट के जरिए यूजर देख न पाएं इसकी ओर भी विभिन्न सरकारों ने चौकसी बढ़ा दी और पाबंदियां लगा दीं। अमेरिकी प्रशासन, अमेरिकी वायुसेना,पेंटागन, सरकारी ऑफिस और अनेक कॉरपोरट ऑफिसों में विकीलीक देखने पर पाबंदी लगा दी गयी। इसके अलावा चीन,थाइलैंड,आस्ट्रेलिया आदि ने भी पाबंदी लगा दी।
   विकीलीक के एक्सपोजर ने यह बात भी उजागर की है 21वीं सदी में सूचनाओं का रूप वैसा नहीं रहेगा जैसा 20वीं सदी में था। कल तक राजनयिकों की गतिविधियां गोपनीय होती थी लेकिन 21वीं सदी में गोपनीय नहीं रहेगी। जिन संस्थानों को गोपनीय माना जाता है वे भी अब गोपनीय नहीं रह जाएंगी। गोपनीयता को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। खासकर गुप्तचर संस्थाओं के लिए बेहद गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
  विकीलीक के दस्तावेज जिस तरह आए हैं उनसे यह भी साफ है कि कौन जासूस है और कहां और किस पर जासूसी कर रहा है और किस तरह की सूचनाएं संकलित कर रहा है इसे आसानी से जान सकते हैं। सूचनाओं का इंस्टेंट स्थानान्तरण एक गंभीर समस्या है। 
     विकीलीक के एक्सपोजर ने एक बात साफ कर दी है कि सरकारों के पास दस्तावेजों और सूचनाओं को छिपाने की जितनी विकसिक तकनीक और बुद्धि है उससे ज्यादा विकसित तकनीक और बुद्धि विकीलीक के पास है। सरकार के बाहर आम लोगों के पास है। अभी यह शक्ति अमेरिका में रंग दिखा रही है कल को यह भारत में भी रंग दिखा सकती है। किसी भी सरकारी अधिकारी के सभी संवाद और फोन टेप करके सुनायी पड़ सकते हैं। राडिया टेप इसका आदर्श नमूना है। इसके अलावा सूचना एक्सपोज करने की पद्धति का शत्रु राष्ट्र भी इस्तेमाल कर सकता है। इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं के नग्नतम अत्याचारों का जिस तरह विकीलीक ने खुलासा किया है उससे 21वीं सदी में संचार की तकनीक का स्वाभाविक झुकाव जनता के हितों का ओर हो गया है। जनता के हितों पर हृमला करने के पहले सरकारें कईबार सोचेंगी।
    विकीलीक ने यह भी समस्या उठा दी है कि जासूस,मुखबिर,हमलावर कौन हैं और पीडित कौन हैं ? नए 3.0 इंटरनेट मानकों के अनुसार आप सूचना के स्थान और समय के बारे में जान सकेंगे। उस स्थान के बारे में भी जान सकेंगे जहां पर प्राइवेट गतिविधि चल रही है। इसका अर्थ है सूचना की दुनिया बुनियादी रूप से बदल गयी है।
    विकीलीक का पहला परिणाम यह है कि युद्ध अब गुप्त नहीं है। युद्ध में क्या हो रहा है ,कितना और किसका नुकसान हो रहा है,किस तरह मानवाधिकारों का हनन हो रहा है और किस तरह खून-खराबा संगठित किया जा रहा है, कौन जासूस हैं और वे क्या कर रहे हैं, कितनी सेना है, कितने टैंक है,कौन कौन से कारपोरेट घराने युद्ध में लिप्त हैं,व्यक्ति के रूप में कौन लोग काम कर रहे हैं, कितने युद्धास्त्र इस्तेमाल किए जा रहे है, आदि बातों के रहस्योदघाटन ने अब युद्ध की गोपनीयता को खत्म कर दिया है।
   

रविवार, 13 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-3-


विकीलीक का स्रोत -
    अब तक विकीलीक ने छह लाख से ज्यादा गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित किए हैं। अमेरिका में गोपनीय दस्तावेजों को अवर्गीकृत करके प्रकाशित करने की परंपरा है और पिछले साल अमेरिकी प्रशासन ने 183,244 गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित किए हैं। जबकि विकीलीक अकेले  छह लाख गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित कर चुका है। इस संदर्भ में रोचक बात यह है कि अमेरिकी प्रशासन ने जितने गोपनीय दस्तावेज प्रकाशित किए हैं उससे कहीं ज्यादा अवर्गीकृत किए हैं। विगत 2009 के साल में ही अवर्गीकृत दस्तावेजों की संख्या 55 मिलियन है और ये सरकारी ऑफिसों में रखे हुए हैं जिन्हें सामान्य सी जोड़तोड़ के जरिए कोई भी हासिल कर सकता है।
    एक अनुमान के अनुसार अमेरिका में 560 मिलियन पेज प्रतिवर्ष क्लासीफाइड किए जाते हैं। अमेरिकी कांग्रेस लाइब्रेरी में करोड़ों पन्ने क्लासीफाइड करके प्रतिवर्ष रखे जाते हैं। उसी तरह हार्वर्ड लाइब्रेरी सिस्टम में प्रतिवर्ष 60 मिलियन पन्ने क्लासीफाइड रूप में दर्ज किए जाते हैं। पीटर गिलीसन (हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) ने लिखा है कि 1970 से अमेरिका में कई अरबों-खरबों की संख्या ट्रिलियन संख्या में दस्तावेजों के जरिए क्लासीफाइड सूचनाएं दी गयी हैं। इन सूचनाओं के लिए अमेरिकी कांग्रेस में जितने लिखित कागज और किताबें हैं उसका 220 गुना ज्यादा कागज लगेगा।
साइबर युद्ध का नकली हल्ला-
मीडिया में और इंटरनेट में विकीलीक के दस्तावेजों के आने के बाद से अचानक उन वेबसाइट पर हैकरों के हमले हुए जहां से विकीलीक के दस्तावेजों को आर्थिक भुगतान के जरिए प्राप्त किया जा सकता था। इनमें प्रमुख हैं मास्टरकार्ड,वीसा कार्ड,  पायपल आदि। इनके वेबसाइट पर जब हैकरों के हमले हुए तो मीडिया में पंडितों ने कहाकि विकीलीक के दस्तावेज आने के साथ ही साइबर युद्ध आरंभ हो गया है। कोई इसे सूचना युद्ध कह रहा था। लेकिन सच यह है कि विकीलीक के दस्तावेजों के आने के साथ जिन वेबसाइट पर हमले हुए और उन्होंने विकीलीक का कारोबार बंद कर दिया और हैकरों का उन पर निरंतर हमला होता रहा उसके पीछे साइबर युद्ध या सूचना युद्ध जैसा कुछ नहीं था। बल्कि इसे साइबर उन्माद कहें तो ज्यादा ठीक होगा।
     हैकरों ने उन वेबसाइट पर हमले किए जो विकीलीक प्रकाशित कर रही थीं, इन्हें तथाकथित "distributed denial of service" (DDoS) कहा गया । ‘सेवा से इंकार’ करने वालों का इंटरनेट पर लंबा-चौड़ा हिसाब किताब फैला हुआ है। इस टैग के साथ हमलाकरने वाले हैकरों का संबंध किसी सरकार या देश या माफिया गिरोह से नहीं है बल्कि यह हाईस्कूल-इंटरमीडिएट स्तर के विद्यार्थियों की हैकर गतिविधि का सामान्य हिस्सा है। ये हैकर अपने हमलों के जरिए निशाने पर लगी वेबसाइट को स्लो कर देते हैं। घंटों सेवाएं ठप्प रखते हैं।
     इस तरह के हैकर हमलों की कारगुजारियों का मूल्यांकन करते हुए क्रेग लावोविट्ज ( अरवोर नामक इंटरनेट सुरक्षाकंपनी ,मैसाचुसैट्स , नेटवर्क के प्रधान वैज्ञानिक ) ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि विकीलीक के ताजा रहस्योदघाटन पर हुए हैकरों के हमले साइबर युद्ध नहीं है बल्कि यह कॉलेज के बच्चों की शैतानियां हैं। मसलन आपरेशन पेबैक अपने वेब संचालन के लिए ‘वोटनैट’ नामक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करता है। इसके आधार पर कम्प्यूटर ऑटोमेटिक चलता है। इस सॉफ्टवेयर का अपराधी इस्तेमाल करते हैं। इससे वे स्पाम और क्म्प्यूटर वायरस वितरित करते रहते हैं साथ ही वेब के जरिए व्यापारियों से धन वसूली करते रहते हैं।
     सीमेंटिक के अनुसार सारी दुनिया में सक्रिय ‘वोटनैट’ की संख्या 3.5 मिलियन से लेकर 5.4 मिलियन के बीच है। अधिकांश ‘वोटनैट’ का कम्प्यूटर मालिकों की सहमति के बाद ही इस्तेमाल किया जा रहा है। जबकि Anonymous एनॉनिमस के अनुसार ‘वोटनैट’ एक तरह का "distributed denial of service" (DDoS) पर हमला करने वाला सिस्टम है। यह स्वैच्छिक हमलावर सिस्टम है।जो भी चाहे इसका इस्तेमाल कर सकता है। ये वे लोग हैं जो इंटरनेट की स्वतंत्रता को हरहालत में बचाए रखना चाहते हैं। वे किसी भी किस्म की सेंसरशप नहीं चाहते यहां तक कि वे विकीलीक की भी सेंसरशिप के खिलाफ हैं।
    मुश्किल यह है स्वैच्छिक हैकरों को हमेशा के लिए एकजुट नहीं किया जा सकता । वे कुछ समय के बाद गायब हो जाते हैं। स्वैच्छिक हैकरों ने “Low Orbit Ion Cannon” or LOIC  नामक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है और यह सॉफ्टवेयर जो भी मांगता है उसे एनानिमस ग्रुप मुहैय्या करा देते हैं।  LOIC   को इंटरनेट से डाउनलोड किया जा सकता है। जो लोग इसका इस्तेमाल करते हैं वे सोचते हैं कि हम हमला कर रहे हैं,हम गुमनाम हैं.हमें कोई पकड़ नहीं सकता लेकिन ऐसा नहीं है उनके आईपी पते पकड़ में आ जाते हैं।एक अनुमान के अनुसार LOIC नामक सॉफ्टवेयर एक लाख से ज्यादा यूजरों ने डाउनलोड किया है। लेकिन विकीलीक के दस्तावेज जिस समय इंटरनेट पर प्रकाशित किए जा रहे थे उस अवधि के दौरान बहुत कम यानी कुछ सौ लोगों ने LOIC को डाउनलोड किया है।
     लाबोविट्ज ने लिखा है विकीलीक के पक्ष और विपक्ष में हमला करने वाले हैकर पेशेवर हैकर नहीं हैं बल्कि स्कूली छोकरे थे इसलिए इसे साइबर युद्ध कहना सही नहीं होगा। इसे साइबर गुंडागर्दी कहना समीचीन होगा। विकीलीक विरोधी हैकरों ने ‘जुम्बी’ का इस्तेमाल किया तो विकीलीक समर्थकों ने सोशल मीडिया के जरिए ‘एनानिमस’ के जरिए हजारों इंटरनेट वालंटियर जुगाड़ किए। इन दोनों ही ग्रुप में काम करने वालों को साइबर में भाडे के सैनिक भी कह सकते हैं।वे हैकिंग के लिए जिस औजार का इस्तेमाल कर रहे थे उसे आमतौर पर अपराधी इस्तेमाल करते हैं।ये दोनों ही हैकर हैं और सुरक्षा की दृष्टि से कमजोर कम्प्यूटरों को निशाना बनाते हैं।
विकीलीक के प्रधान असांजे ने न्यूयार्क टाइम्स के प्रमुख विदेश संवाददाता जॉन बर्न्स से बातचीत में कहा कि ‘मेरा पक्का विश्वास है कि दुनिया में अमेरिका सबसे बड़ी शैतानी ताकत है। वह लोकतंत्र का विध्वंसक है। ’ यह सच है कि विकीलीक के नियमित दस्तावेजी खुलासों ने अमेरिका की एक स्वस्थ और सभ्य लोकतंत्र की छवि के कालिमा मय अध्यायों को उदघाटित किया है। इन दस्तावेजों से अमेरिकी कूटनीति और उसकी ओट में चल रही दुरभिसंधियों और राजनयिक भ्रष्टाचारण को भी उजागर किया है। आखिरकार विभिन्न देशों में अमेरिकी राजनयिक किस तरह के कूटनीतिक,व्यापारिक और सांस्कृतिक पापाचार और भ्रष्टकर्मों में लिप्त हैं और किस तरह वे सोचते हैं,ये सारी चीजें उजागर हुई हैं।
   इन दस्तावेजों से यह भी उजागर हुआ है कि स्वीडन की सरकार स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की तरह काम नहीं कर रही है बल्कि उसके ऊपर अमेरिका का जबर्दस्त दबाव है। यही हाल ब्रिटेन का है। असांजे के नए खुलासों के बाद अचानक तथाकथित उदार कहलाने वाला मीडिया का असली रवैय्या सामने आ गया है और वे भी असांजे की कामुक रातों के बारे में गंदे और घिनौने सवाल कर रहै हैं। मसलन बीबीसी लंदन के रिपोर्टर John Humphrys ने असांजे से साक्षात्कार में पूछा कि  ‘‘Are you a sexual predator?" इस असांजे ने कहा  "ridiculous" साथ ही कहा "Of course not", स्थिति यह थी कि संवाददाता उससे पूछ रहा था कि कितनी औरतों के साथ रातें गुजारी हैं। यही हाल अन्य नामी चैनलों का भी रहा है।
     विकीलीक के संदर्भ में यह विचारणीय है कि संदेश या सूचना अपने आप में सक्रिय नहीं होती। मसलन विकीलीक के लाखों-हजारों संदेश उपलब्ध हैं लेकिन जनता के बीच राजनीतिक गोलबंदी गायब है। विकीलीक के आधार क्या मांगें हो सकती हैं उन पर कोई राजनीतिक सरगर्मी नहीं है सिर्फ मीडिया सरगर्मी है। इस संदर्भ में देखें तो विकीलीक की सूचनाएं और संदेश निरर्थक हैं।
    वाटरगेट कांड के दस्तावेजों के आधार पर अमेरिका में राजनीतिक गोलबंदी हुई, मांगें तय की गईं,कुछ निष्कर्ष निकाले गए और उनके आधार पर जनता ने राष्ट्रपति से इस्तीफा मांगा था। लेकिन विकीलीक के प्रकाशन के बाद से चीन से लेकर अमेरिका तक कोई राजनीतिक मांग सामने नहीं आयी है और न किसी भी किस्म का राजनीतिक आंदोलन ही सामने आया है।
    इस प्रसंग में यह सवाल उठता है कि विकीलीक के राजनीतिक मायने क्या सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी मात्र से जुड़े हैं ? दूसरा सवाल यह है कि विकीलीक से किसे आर्थिक लाभ हो रहा है ? इंटरनेट से लेकर मीडिया तक बड़े कारपोरेट घराने इसके पीछे लगे हैं और धारावाहिक प्रकाशन हो रहा है ,करोड़ो पाठक इंटरनेट से पढ़ रहे हैं और डाउनलोड कर रहे हैं। मीडिया के अनेक बड़े घराने भी इस मामले में मैदान में कूद पड़े हैं। आज विकीलीक के पास  सरकारी दस्तीवेजों का सम्पदा आधिकार है जबकि इसमें वैध-अवैध दोनों ही तरह से अर्जित की गई सूचनाएं ,दस्तावोज,केबिल और संदेश हैं। इन्हें हासिल करने में विकीलीक ने धन खर्च किया है और जाहिरा तौर पर उसको इससे आर्थिक लाभ भी मिला है। क्या विकीलीक की सूचनाएं सार्वजनिक संपत्ति हैं ? यदि हां तो इससे लाभ कमाने का मीडिया और वेब कंपनियों को अधिकार कैसे मिल गया ? वे किसी अधिकार के साथ इतने व्यापक दस्तावेजों के जखीरे को नियंत्रित कर रहे हैं और उनके जरिए व्यापार कर रहे हैं ?  

शनिवार, 12 मार्च 2011

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-2-


     शीतयुद्धोत्तर विचारधारात्मक संघर्ष को विकीलीक ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया है। मजेदार बात यह है कि संचार क्रांति के साथ समाजवाद का अंत आरंभ हुआ था और विकीलीक ने संचार क्रांति के अवसान की घोषणा के साथ अमेरिकी जनतंत्र के मुखौटे को नोंच डाला है। नव्य उदार लोकतंत्र में निहित अधिनायकवादी राजनीति को उजागर किया है। उसका विलोम रचा है। यही वजह है कि विकीलीक के एक्सपोजर के साथ आज रूस के प्रधानमंत्री ब्लादीमीर पुतिन खड़े हैं। रूस का प्रधानमंत्री अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिमायत कर रहा है और ओबामा प्रशासन ने विकीलीक के खिलाफ कड़े कदम उठाने आरंभ कर दिए हैं। अमेरिका में इंटरनेट को नियंत्रित करने के नए उपायों पर विचार चल रहा है जिससे नेट स्वतंत्रता पर बंदिशें थोपी जा सकें।
    समाजवाद को ध्वस्त करने के लिए मीडिया और इंटरनेट से सभी बंदिशें हटाने की मांग की गई थी लेकिन अब बुर्जुआ लोकतंत्र के रौरव नरक के उदघाटन को रोकने के लिए तरह-तरह की बंदिशें लगायी जा रही हैं। विकीलीक ने बुर्जुआ लोकतंत्र और खासकर अमेरिकी लोकतंत्र की जो शक्ल सामने पेश की है वह इतनी कलुषित है कि माफिया गिरोह भी अपने को शर्मिंदा महसूस कर रहे होंगे। खासकर राजनयिकों की भाषा,संवाद और वास्तव जीवन में उनका सार्वजनिक व्यवहार किस तरह पाखंडपूर्ण ,हिंसक,बर्बर होता है यह बात बड़ी ही खूबसूरती के साथ एक्सपोज हुई है।
     उल्लेखनीय है सन् 2006 में विकीलीक ने जब चीन को एक्सपोज करना आरंभ किया था तो पश्चिम का मीडिया और नेतागण उसे सिर पर बिठाए घूम रहे थे। लेकिन ज्योंही विकीलीक ने अमेरिकी बर्बरता, असभ्यता, स्वतंत्रताहरण,दूसरे देशों की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप आदि का खुलासा आरंभ किया है चारों ओर मीडिया से लेकर सरकारों तक तहलका मच गया है और अब अमेरिकी साम्राज्यवादी खेमे में एक ही आवाज है असांजे को पकड़ो, मार डालो,वह आतंकी है,जेल में डालो,इंटरनेट पर अबाध स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाओ।
      विकीलीक के एक्सपोजर ने एक बात और सिद्ध की है कि प्रौपेगैण्डा में शीतयुद्ध बरकरार है। शीतयुद्धीय प्रौपेगैण्डा की विशेषता थी सफेद झूठ बोलना। अमेरिकी साम्राज्यवाद ने इराक,अफगानिस्तान,ईरान आदि को लेकर निरंतर सफेद झूठ बोला है। यह बात विकीलीक के खुलासे से सामने आयी है। यह बात भी पुष्ट हुई है कि इराक में अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप के जो बहाने बताए थे वे सब गलत थे। मैनस्ट्रीम मीडिया लगातार यह आभास दे रहा है कि वह सच बोलता है और उसकी नजर सिर्फ खबर पर होती है,खबर की वस्तुगत प्रस्तुति पर होती है। ये सारी दलीलें गलत साबित हुई हैं। खासकर इराक और अफगानिस्तान के बारे में जो कुछ कारपोरेट मीडिया के द्वारा जो बताया जाता रहा है वह गलत साबित किया है विकीलीक ने।
    ग्लोबल मैनस्ट्रीम मीडिया की विशेषता है कि वह शस्त्र उद्योग के इशारों पर चलता रहा है। शस्त्र उद्योग जो कहता है वही बात ये लोग छापते हैं। इसी तरह भारत में मैनस्ट्रीम मीडिया मूलतः वही कवरेज देता है जो यहां के कारपोरेट घरानों के हित में होता है। इसके लिए वे सत्य प्रस्तुति का पाखंड करते हैं। इसके लिए वे ‘कुछ यहां की कुछ वहां की’ पद्धति का इस्तेमाल करते खबरे देते हैं। कभी भाजपा के खिलाफ तो कभी कांग्रेस के खिलाफ,कभी इस कारपोरेट घराने के बारे में तो कभी उस घराने के बारे में,थोड़ी इसकी-थोड़ी उसकी, थोडी घृणा इसके बारे में तो थोड़ा भय उसके बारे में,यही वह बुनियादी मीडिया नीति है जिसके तहत प्रौपेगैण्डा सामग्री परोसी जा रही है।
    विकीलीक के एक्सपोजर ने यह भी धारणा पुष्ट की है कि अमेरिका सीधे हमलावर होकर युद्ध आयोजित करता रहा है। नए दौर में मुख्यधारा के मीडिया का काम सत्य का अनुसंधान करना नहीं है बल्कि सरकार जो कहे,उसका अनुपालन करना है। सरकार जो कहती है उसके बारे में मीडिया सवाल नहीं उठाता। विकीलीक के एक्सपोजर ने यह तथ्य भी उजागर किया है कि बहुराष्ट्रीय मीडिया अमेरिकी विदेश और गृह नीति का अंधानुकरण करता रहा है।
     अमेरिकी मीडिया की खासतौर पर विशेषता रही है  वह अमेरिकी साम्राज्य विस्तार के लक्ष्यों को प्राथमिकता देता है। वे देश जो अमेरिका की आलोचना करते हैं मीडिया में उन्हें शत्रु या गैर भरोसेमंद मुल्क के रूप में चित्रित किया जाता है। बहुराष्ट्रीय मीडिया में निगमों का नियंत्रण इतना ताकतवर है कि कोई भी व्यक्ति सामान्य सी प्रतिक्रिया भी शस्त्र उद्योग के खिलाफ नहीं बोलता यदि कोई बोलता है तो उसे प्रकाशित नहीं किया जाता। मीडिया में चीजों को सारहीन और सीमित दायरे में रखकर देखने की बाढ़ आ गयी है। पहले यह बीमारी चंद अखबारों तक सीमित थी,किंतु आज यह मैनस्ट्रीम मीडिया की साझा विशेषता है।
   जूलियन असांजे और दो औरतें-
        विकीलीक के संस्थापक जूलियन असांजे जमानत पर रिहा होकर ब्रिटेन में अपने दोस्त के घर आ गए हैं। लेकिन उन दो औरतों का रहस्य अभी भी पूरी तरह खुला नहीं है। आखिरकार वे दो औरतें कौन थीं ?  उन्होंने असांजे के साथ शारीरिक संबंध क्यों बनाए ? पुलिस को शिकायत क्यों की ? पहली बात तो यह असांजे के साथ कोई स्वतःस्फूर्त्त मुठभेड़ में हुआ प्यार नहीं था। ‘गार्दियन’ (17 दिसम्बर,2010) के अनुसार स्वीडन के सरकारी दस्तावेज बताते हैं असांजे पर इन दोनों औरतों के आरोपों के आधार पर स्वीडन में केस दर्ज है और उसके मुतल्लिक अनेक नए तथ्य भी सामने आए हैं। उल्लेखनीय है असांजे 11अगस्त 2010 को स्टॉकहोम गया था और वहां 10 दिन रूका था। इन 10 दिनों में उसका इन दोनों औरतों के साथ संबंध बना। इनमें से एक औरत ने ,जिसका नाम ‘ए’ है ,उसने पुलिस को बताया कि उसने असांजे की स्वीडन यात्रा की व्यवस्था की थी और उसने ही यह ठीक किया था कि असांजे उसके फ्लैट में रहे क्योंकि वह उस दौरान कुछ दिनों को बाहर जाएगी और फिर जल्दी 13 अगस्त को लौट आएगी। इस महिला के विवरण और ब्यौरे का असांजे ने खंडन किया है।
    असांजे ने स्वीडन की पुलिस को बताया है कि ‘‘he began stroking her leg as they drank tea, before he pulled off her clothes and snapped a necklace that she was wearing. According to her statement she "tried to put on some articles of clothing as it was going too quickly and uncomfortably but Assange ripped them off again". Miss A told police that she didn't want to go any further "but that it was too late to stop Assange as she had gone along with it so far", and so she allowed him to undress her.’’
गार्दियन ने लिखा है श्रीमती ‘ए’ के बयान के अनुसार ‘‘According to the statement, Miss A then realised he was trying to have unprotected sex with her. She told police that she had tried a number of times to reach for a condom but Assange had stopped her by holding her arms and pinning her legs. The statement records Miss A describing how Assange then released her arms and agreed to use a condom, but she told the police that at some stage Assange had "done something" with the condom that resulted in it becoming ripped, and ejaculated without withdrawing.’’
    इस पर असांजे ने बाद में पुलिस के सामने कबूला कि उसने इस महिला के साथ सेक्स किया था लेकिन कंडोम को उसने नहीं फाडा और वह नहीं जानता कि सेक्स करते हुए कंडोम फट गया था। असांजे ने कहा  वह लगातार श्रीमती ‘ए’ के बिस्तर पर बाद के दिनों में सोता रहा ।लेकिन उसने कंडोम फट जाने वाली घटना का कभी जिक्र तक नहीं किया। 14 अगस्त को असांजे ने इस महिला के द्वारा आयोजित एक सेमीनार में भाषण दिया। इसी सेमीनार में दूसरी औरत को भी पहली औरत ने भाग लेने के लिए बुलाया था। बाद में इन दोनों महिलाओं और विकीलीक के कुछ सदस्यों के साथ असांजे ने लंच किया। उसके बाद असांजे दूसरी औरत ( नाम डब्ल्यू) के साथ घूमने निकल गए और उन स्थानों पर गए जहां वह काम करती थी। बाद में उसके साथ सिनेमा देखा। सिनेमा से लौटते समय उस महिला ने असांजे को चूमा और असांजे ने उसके कपड़ों में अंदर हाथ दे दिया। उसी शाम को सुश्री ‘ए’ ने एक पार्टी रखी जिसमें उसने अपनी एक सहेली मोनिका को बताया कि उसने असांजे के साथ बगैर कंडोम के सेक्स किया था ।
    एक अन्य मित्र ने पुलिस को बताया कि सुश्री ‘ए’ उससे कहा था ‘‘she had had "the worst sex ever" with Assange: "Not only had it been the world's worst screw, it had also been violent."। असांजे के मित्रों का मानना है सुश्री ‘ए’ ने सारे समय असांजे को पार्टी में रहने दिया,बाद में उसे अपने फ्लैट में रहने दिया, मिस ‘ए’ का मानना है असांजे ने कंडोम को किसी मकसद से फाड़ा था। उस घटना के बाद उसने असांजे के साथ कभी सेक्स नहीं किया क्योंकि वह हदें पार कर चुका था, जबकि वह उसके घर पर ही रह रहा था।
विकीलीक के एक्सपोजर और जूलियन असांजे के खिलाफ दो औरतों के मुकदमे ने एक साथ दो चीजों को गड्डमड्ड कर दिया है। हमारे सूचना पाने के अधिकार और बलात्कार ये दो चीजें एक साथ गड्डमड्ड हो गयी हैं। असांजे ने दो औरतों के साथ जो भी किया उस पर पर्दादारी और उसकी हिमायत नहीं की जा सकती। उसे यह कहकर भी नहीं टाला जा सकता कि इन दो औरतों में एक औरत सीआईए की एजेंट रही है और क्यूबा विरोधी सीआईए की मुहिम का हिस्सा रही है। असांजे ने कानूनन कामुक अपराध किया है। इसलिए असांजे के विकीलीक एक्सपोजर और कामुक अपराध में अंतर करके चलने की जरूरत है।
असांजे के दल में फूट-
     विकीलीक के संस्थापकों में से एक डेनियल डॉमसिट बर्ग ने कुछ ही अर्सा पहले विकीलीक को तोड़ा है। उन्होंने विकीलीक के विकल्प के रूप में ओपेन लीक नामक वेबसाइट बनाने की घोषणा की है। डेनियल का विकीलीक संस्था में असांजे के बाद दूसरा स्थान था और वे भी ऑइकॉन थे विकीलीक के। डेनियल डॉमसिट बर्ग ने एक साक्षात्कार में कहा है कि आरंभ में विकीलीक के अनुभव की खोजी पत्रकारिता के लिहाज से खूब सराहना की गई। आरंभ में विकीलीक ने छद्म नामों के जरिए एक्सपोजर किए बाद में असली नामों से एक्सपोजर किए।
    बर्ग ने कहा कि 2006 में जब इस प्लेटफॉर्म को आरंभ किया गया था तो इसका लक्ष्य था बुद्धिमान लोगों को सूचनाएं देना। ये सूचनाएं ठोस तथ्यों पर आधारित होती थीं और इनके आधार पर बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। लेकिन कुछ समय के बाद समस्याएं आने लगीं। खासकर अफगान युद्ध के बारे में दस्तावेज लीक होने के साथ विकीलीक में अंदर विवाद उठ खड़ा हुआ।
     अफगान युद्ध का उदघाटन करने के साथ ही विकीलीफ ने अपनी लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन कर दिया। इस रहस्योदघाटन के बाद जिम्मेदारियों और पारदर्शिता के सवालों पर आंतरिक बहस हुई। लेकिन सच यह है हम उतने पारदर्शी नहीं थे। बर्ग ने कहा है  आंतरिक आलोचना और विवादास्पद बातों पर हम ध्यान देने को तैयार नहीं थे।खासकर जो अमेरिका की ओर से सवाल उठाए जा रहे थे उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था।  धीरे धीरे जूलियन असांजे ने आंतरिक आलोचना सुनना बंद कर दिया था और सारी शक्तियां अपने हाथों में एकत्रित कर ली थीं।
     बर्ग के अनुसार अफगान युद्ध के दस्तावेज और वीडियो का उद्घाटन आंतरिक विवादों को सबके सामने ले आया। अमेरिका के आपचे  हेलीकॉप्टर ने कैसे 12 अफगान नागरिकों की हत्या की ,इसके अलावा बगदाद में 2007 के हमले में रायटर के दो पत्रकार भी मारे गए थे उसका वीडियो विकीलीक ने जारी किया था और विवाद चरम पर पहुँच गया था।  इसके साथ अफगानिस्तान के हजारों दस्तावेज भी जारी किए और इस पर हम सबके बीच में विवाद उठ खड़ा हुआ।
    उल्लेखनीय है बर्ग को दुनिया में हैंकिंग का सरगना माना जाता है और वह विश्वप्रसिद्ध जर्मन स्थित हैंकिंग ग्रुप से आए हैं और विकीलीक की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। बर्ग की आलोचनाओं ने असांजे के साथ संबंधों को खट्टा बना दिया और असांजे ने बर्ग को गैर वफादार घोषित करते हुए विकीलीक से सस्पेंड कर दिया। बर्ग ने असांजे के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि उसके ऊपर कामुक दुर्व्यवहार के जो आरोप स्वीडन में लगाए गए हैं उन आरोपों को विकीलीक से अलग रखा जाए और इन आरोपों पर सार्वजनिक हंगामा करने की बजाय शांति से अकेले में ले-देकर मामले को हल कर लिया जाए जिसे असांजे ने नहीं माना और इन दोनों में विवाद हुआ और असांजे ने बर्ग को विकीलीक से निकाल दिया।(क्रमशः)

विकीलीक और अमेरिकी साम्राज्यवाद-1-


     अंग्रेजी लेखक लेखक जेफ्री आर्चर ने 'टाइम्स ऑफ इण्डिया' को दिए एक साक्षात्कार में कहा है  विकीलीक ने 'समाचार' को नए रूप में जन्म दिया है। यह समाचार के नए रूप की शुरूआत है। इस बयान में एक हद तक सच्चाई है .लेकिन  विकीलीक के बारे में कोई भी समझ ‘नयी विश्व व्यवस्था’ के अमेरिकी फतवे को दरकिनार करके नहीं बनायी जा सकती। शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ अमेरिकी रणनीति क्या रही है और वह किन लक्ष्यों को हासिल करने का प्रयास करता रहा है इसे जानने के लिए विकीलीक के दस्तावेज प्रामाणिक सामग्री मुहैय्या कराते हैं। यह समाचार का नया विचारधारात्मक पैराडाइम है।
     अमेरिका ने नयी विश्व व्यवस्था में एकमात्र महाशक्ति के नाम पर किस नरक की सृष्टि की है वह सब विकीलीक ने उदघाटित किया है। अमेरिका का नयी विश्व व्यवस्था के संदर्भ में प्रधान लक्ष्य है यूरोप से लेकर एशिया तक,लैटिन अमेरिका से लेकर पूर्व सोवियत गुट के समाजवादी देशों तक किसी भी क्षेत्र में कोई भी महाशक्ति पैदा नहीं होनी चाहिए। सन् 1992 में कारनेगी इंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के द्वारा जारी एक दस्तावेज में कहा गया है कि मानव अधिकारों की रक्षा के नाम पर अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों को सैन्य हस्तक्षेप करना चाहिए। इसके लिए सबसे प्रभावी माध्यम है नाटो जिसका हमें इस्तेमाल करना चाहिए। नयी विश्वव्यवस्था का यही वह बुनियादी लक्ष्य है जिसके विध्वंसक स्वरूप का विकीलीक ने रहस्योदघाटन किया है।
        विकीलीक का मामला इंटरनेट और मीडिया में अब ठंडा पड़ गया है। लेकिन उसने जिस तरह अकस्मात सबका ध्यान खींचा और अचानक क्षितिज से गायब हो गया इस पर हमें सोचना चाहिए। हम सब जानते हैं कि यह हाइपर रियलिटी का जमाना है और इसमें सच और झूठ में फर्क करना बेहद मुश्किल होता है। विकीलीक के रहस्योदघाटन ने भी यही स्थिति पैदा की है कि आप तय नहीं कर सकते कि सच क्या है और झूठ क्या है।
     विकीलीक की प्रस्तुतियों का आधार है उपभोक्ता की कम जानकारी और सनसनी की भावना। दूसरी ओर लीक दस्तावेजों में सुसंगत विवेचन का अभाव है। ये दस्तावेज व्याख्या के बिना सीधे परोसे गए हैं। ये लीक मूलतः उत्तर आधुनिक प्रस्तुति हैं। यह हाइपररीयल प्रस्तुति है। इसमें अंशतः सत्य,अंशतः अमेरिकी राष्ट्रवाद,अंशतः अमेरिकी शैतानियां, अंशतःसीआईए की कारस्तानियां,अंशतः भारत की सच्चाई, अंशतः दुनिया के अनेक देशों की सच्चाईयां चली आई हैं। यानी सच्चाई का अंश ही इसकी धुरी है। समग्रता में लीक को पढ़ना संभव नहीं है। अंश में सच को कारपोरेट मीडिया भी पेश करता है और इंटरनेट पर विकीलीक ने भी यही काम किया है फलतः मीडिया फ्लो के उत्तर आधुनिक वातावरण का उसे अधिकांश देशों में सहारा मिला और कारपोरेट मीडिया ने उसे खूब प्रचारित किया।  
   विकीलीक के खुलासे का अमेरिकी साम्राज्यवाद को समझने के लिहाज से महत्व है। अमेरिकी अभिजन,अमीर,कारपोरेट घराने,सीआईए, पेंटागन,विदेश विभाग,राजनेता आदि की मनोदशा और विचारधारा में निहित अलोकतांत्रिक भावबोध को समझने में इससे मदद मिल सकती है। अमेरिकी तंत्र किस तरह के नायकों-खलनायकों और विचारों से चालित है यह भी विकीलीक से पता चलता है।
        29 नवम्बर 2010 को विकीलीक ने 251,287 अमरीकी दस्तावेज और केबल संदेशों को इंटरनेट पर जारी किया। इनमें केबल संदेश 1966 से लेकर फरवरी 2010 तक के हैं। इनमें 274 एम्बेसियों के गुप्त संदेश हैं। इसके अलावा अमरीका के गोपनीय 15,652 केबल संदेश भी हैं। इन संदेशों और दस्तावेजों में एक बात साफ है कि अमरीका विभिन्न देशों में जासूसी करता रहा है। खासकर मित्र देशों के यूएनओ मिशनों की जासूसी करता रहा है। यह कानूनन गलत है। साथ ही इन संदेशों ने अमरीकी लोकतंत्र की नीतियों की पोल खोलकर रख दी है। जो अमरीका को आदर्श लोकतंत्र मानते हैं वे जरा इन दस्तावेजों के आइने में नए सिरे से अमरीका को परिभाषित करें ?
     अमेरिका राजनयिक कामकाज की आड़ में किस तरह दूसरे देशों की संप्रभुता का अपहरण करता रहा है,जासूसी करता रहा है, हस्तक्षेप करता रहा है, और अमेरिकी संविधान में जो वायदे किए गए हैं उनका अमरीकी सत्ता पर बैठे लोग कैसे उल्लंघन करते रहे हैं, यह सब इससे साफ पता चलता है।  यह भी पता चलता है कि अमेरिका दुनिया का भ्रष्टतम देश है।
    तकरीबन 251,287 दस्तावेज जारी किए गए हैं जिनमें 261,276,536 अक्षर हैं। यानी इराक युद्ध के बारे में जितने दस्तावेज जारी किए थे उससे सातगुना ज्यादा । इसमें 274 दूतावासों और कॉसुलेट्स के केबल संदेश हैं। इसमें 15,652 सीक्रेट हैं,101,748 कॉन्फीडेंशियल और 133,887 अनक्लासीफाइड हैं। इनमें सबसे ज्यादा इराक पर चर्चा है। तकरीबन 15,385 केबल संदेशों में 6,677 केबल संदेश इराक के हैं।अंकारा,तुर्की से 7,918 केबल हैं। अमरीका के स्टेट ऑफिस सचिव के 8017 केबल संदेश हैं। अमरीका के वर्गीकरण के अनुसार विदेशी राजनीतिक संबंधों पर 145,451 ,आंतरिक सरकारी कार्यव्यापार पर 122,898,मानवाधिकार पर 55,211, आर्थिकदशा पर 49.044,आतंकवाद और आतंकियों पर 28,801 और सुरक्षा परिषद पर 6,532 दस्तावेज हैं। मोटे तौर पर विकीलीक ने जुलाई 2010 में अफगानिस्तान से भेजी 92,000 सैन्यमोर्चे की लीक प्रकाशित कीं जिनमें बताया गया था कि अफगानिस्तान में 20 हजार निर्दोष नागरिक सैन्य हमलों में मारे गए हैं।
    सन् 2010 के अक्टूबर में इराक के बारे में चार लाख दस्तावेज प्रकाशित किए गए जिनमें बताया गया कि अमेरिका और मित्रदेशों के हमलों में हजारों निर्दोष इराकी नागरिकों की मौत हुई है।साथ ही बड़े पैमाने पर यातनाशिविरों में भी इराकी नागरिकों का उत्पीड़न हो रहा है।
    इस लीक के दो आयाम है पहला आयाम है सूचनाओं का उदघाटन और दूसरा आयाम है इंटरनेट नियंत्रण। पहले का संबंध सत्य की भूख से है ,दूसरे का संबंध सत्य के दमन से है। यह नए युग का बड़ा अन्तर्विरोध है जिसे हम सत्य की चाह और दमन के अन्तर्विरोध के रूप में जानते हैं। यह अमेरिका नियंत्रित नयी विश्व व्यवस्था का प्रधान अन्तर्विरोध है।
      असल में विकीलीक के बहाने से अमरीकी प्रशासन इंटरनेट पर अंकुश लगाना चाहता है। वे इंटरनेट पर उन तमाम राजनीतिक खबरों को सेंसर करना चाहते हैं जो अमेरीकी प्रशासन को नागवार लगती हैं। स्थिति का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि ओबामा प्रशासन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के नेट पर विकीलीक पढ़ने पर पाबंदी लगा दी है। कई कांग्रेस सदस्य और ज्यादा व्यापक पाबंदी की मांग कर रहे हैं,कुछ ने विकीलीक के संस्थापक की गिरफ्तारी की मांग की है। लाइब्रेरी आफ कांग्रेस ने अपने सभी कम्प्यूटरों पर इस लीक को पढ़ने से रोक दिया है। यहां तक कि रीडिंग रूम में नहीं पढ़ सकते। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के डिप्लोमेटिक छात्रों को इस लीक को पढ़ने से वंचित कर दिया गया है,उनके पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गयी है। उन्हें कहा गया है कि इस रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी न करें। कई सीनेटरों ने ऐसे कानून बनाने का आधिकारिक प्रस्ताव दिया है जिसके आधार पर गुप्त दस्तावेज प्रकाशित करना और पढ़ना अपराध घोषित हो जाएगा। अमरीकी कानून संरक्षकों ने कॉपीराइट के उल्लंघन का बहाना करके कुछ इंटरनेट डोमेन को बंद करा दिया है। ये सारी बातें अमरीका में अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरे की सूचना दे रही हैं।
विकीलीक के बारे में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह के लीक अमरीका में होते रहते हैं, खासकर जो व्यक्ति कल तक विदेश विभाग में राजनयिक की नौकरी कर रहा था वह ज्योंही सेवामुक्त होता है अपने साथ ढ़ेर सारे गुप्त दस्तावेज ले जाता है और उनका रहस्योदघाटन करने लगता है। इसी प्रसंग में न्यूयार्क स्थित राजनीतिविज्ञानी प्रोफेसर डेविड मिशेल ने महत्वपूर्ण बात कही है। डेविड ने लिखा है कि इसमें रहस्योदघाटन जैसा कुछ भी नहीं है। विकीलीक के दस्तावेज महत्वपूर्ण है लेकिन उतने नहीं जितने कहे जा रहे हैं। ये पेंटागन के रूटिन दस्तावेज हैं। ये महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि इनमें अमरीकी सरकार की कथनी और करनी के भेद को साफ देखा जा सकता है। इस अंतर को ही ‘आकर्षक अमरीकी‘झूठ’ कहा जा सकता है।

विकीलीक की सूचनाएं सामान्य सूचनाएं नहीं है,यह महज गॉसिप नहीं है,यह एक्सपोजर मात्र नहीं है,यह कोई षडयंत्र भी नहीं है,बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत जारी की गयी राजनीतिक सूचनाएं हैं, कूटनीतिक सूचनाएं हैं। इनके गंभीर दूरगामी परिणाम होंगे। इसके बहुस्तरीय और अन्तर्विरोधी अर्थ हैं।
    एक बात सामान्य रूप में कही जा सकती है कि विकीलीक के एक्सपोजर ने इंटरनेट स्वतंत्रता की परतें खोलकर रख दी हैं। इसने अमेरिका के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पाखण्ड को एकसिरे से नंगा कर दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहां तक आप राज्य की सत्ता और संप्रभुता को चुनौती नहीं देते।
   विकीलीक का दूसरा महत्वपूर्ण संदेश यह है संचार क्रांति ने अपना दायरा सीमित करना आरंभ कर दिया है। तीसरा संदेश यह है  उत्तर आधुनिकतावाद का अंत हो गया है। विकीलीक ने संचार क्रांति के साथ आरंभ हुए उत्तर आधुनिकतावाद को दफन कर दिया है। यह नव्य उदारतावाद के अवसान की सूचना भी है।(क्रमशः)



गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

आओ राजनीति करें -विकीलीक और सीआईए के मुख्यालय पास-पास

          ( ए- विकीलीक का मुख्यालय, बी- सीआईए का मुख्यालय)
    विकीलीक और अमेरिकीतंत्र की तथाकथित टकराहट अब एक नयी मंजिल पर पहुँच गयी है। जो लोग रात-दिन विकीलीक में अमेरिकी विरोध और साम्राज्यवाद विरोध की गंध लेते रहे हैं उन्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि विकीलीक ने विगत शुक्रवार से अपना अमेरिकी ऑफिस चालू कर दिया है। विकीलीक का पहले सारा कारोबार Silicon Valley Web Hosting  के जरिए हो रहा था लेकिन अब ServInt के जरिए हो रहा है। तब से अमेरिका का कोई नया खुलासा सामने नहीं आया है। कुछ अर्सा पहले विकीलीक ने अमेरिका से अपना सारा ऑपरेशन समेटकर अन्यत्र स्थानान्तरित कर दिया था। पहले विकीलीक के सारे मेल रीडायरेक्ट करके रूस भेज दिए जा रहे थे। लेकिन विगत शुक्रवार से विकीलीक ने अपना अमेरिका स्थित मुख्यालय चालू कर दिया है। अमॉजान ने जब विकीलीक के लिए वेब सुविधा देने से मना कर दिया तो विकीलीक के समस्त वेबतंत्र को यूरोप में नए स्थान पर रीडायरेक्ट किया गया । उसके लिए एक ऐसी नेट व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया जिसमें उसका आईपी एड्रेस पता न चले। यह पद्धति इसलिए अपनायी गयी जिससे उस कंपनी को अमेरिकी हमलों से बचाया जाए। अमेरिका का सारी दुनिया की कंपनियों पर दबाब है कि कोई भी देशी-विदेशी कंपनी विकीलीक की मदद न करे। इस तरह की अपील अमेरिकी सीनेट की गृहसुरक्षा कमेटी के जे.लीवरमेन ने जारी की है। लीवरमैन ने कहा - "No responsible company – whether American or foreign – should assist Wikileaks in its efforts to disseminate these stolen materials.।"
    अब नए सिरे से विकीलीक  वेबसाइट के मुख्यालय को सीआईए के मुख्यालय के पास ले आया गया है।उल्लेखनीय है सीआईए का मुख्यालय और  ServInt  का ऑफिस चंद कदमों की दूरी पर हैं। इन दोनों के ऑफिस पास होने के पीछे भी क्या कोई राजनीति भी हो सकती है ?  विकीलीक ने सीआईए से कहा है उसके ऊपर वह जासूसी करना बंद करे। दूसरी ओर अमेरिकी प्रशासन ने कंपनियों पर दबाब डालना आरंभ किया है कि वे विकीलीक की किसी तरह की मदद न करें। साथ ही वे अपने कर्मचारियों को कहें कि वे विकीलीक न पढ़ें।            










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