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गुरुवार, 6 जनवरी 2011

आत्महत्या और मनोविकृति की अवस्थाएं - एमिल दुर्खीम-1-

      दो तरह के सामाजिक कारण हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे आत्महत्या दर को प्रभावित करते हैं। ये हैं कायिक मानसिक विन्यास और भौतिक पर्यावरण का स्वरूप। व्यक्ति स्वभाव या व्यक्तियों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के स्वभाव में आत्महत्या की ओर ले जाने वाली प्रत्यक्ष प्रवृत्ति हो सकती है। इसकी तीव्रता में देशों के अनुसार अंतर हो सकता है। दूसरी ओर कायिक रचना पर जलवायु तापमान की क्रिया के अप्रत्यक्ष रूप में वही प्रभाव हो सकते हैं। किसी भी स्थिति में इस परिकल्पना को बगैर विचार किए अस्वीकार नहीं किया जा सकता। हम इन तत्वों पर एक-एक करके विचार करेंगे और देखेंगे कि वे हमारे अध्ययनाधीन विषय पर प्रभाव डालते हैं और यदि डालते हैं तो कितना।
किसी निश्चित समाज के मामले में निश्चित बीमारियों की वार्षिक दर अपेक्षाकृत स्थिर होती है हालांकि इसको लेकर विभिन्न आवामों में काफी अंतर होता है। विक्षिप्तता भी ऐसी ही बीमारी है। प्रत्येक स्वैच्छिक मौत में यदि विक्षिप्तता पाई जाती है तो हमारी समस्या हल हो जाती है और आत्महत्या को वैयक्तिक रोग मान लिया जाएगा।
इस बात का बहुत से मनोचिकित्सकों ने समर्थन भी किया है। एस्कुइरोल के अनुसार : 'आत्महत्या में दिमागी पागलपन के सभी लक्षण मौजूद हैं।' 'कोई व्यक्ति उन्माद की अवस्था में ही आत्महत्या का प्रयास करता है। और आत्महंतक दिमागी तौर पर पागल होते हैं। इस सिध्दांत से उसने निष्कर्ष निकाला कि आत्महत्या अनिच्छा से की जाती है, इसलिए कानून में उसके लिए दंडविधान नहीं होना चाहिए। फलरेट5 और मोरो डि टूर्स ने भी लगभग इसी शब्दावली का प्रयोग किया है। टूर्स ने जिस पैसेज में अपना सिध्दांत रखा है उसी में ही वह एक ऐसी टिप्पणी कर देता है जो उसे संदेहास्पद बना देती है : 'क्या आत्महत्या को सभी मामलों में पागलपन का परिणाम माना जाना चाहिए ? इस मुश्किल सवाल का उत्तर देने के बजाए हम सामान्य तौर पर कह सकते हैं कि जो व्यक्ति जितना अधिक अनुभव प्राप्त करेगा, जितने अधिक पागल लोगों की जांच करेगा वह उतना ही अधिक इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा।' 1845 में अपने एक ब्रोशर, जिसने चिकित्सा जगत में तुरंत तहलका मचा दिया, में डॉ. बोरडिन ने यही बात रखी बल्कि अधिक निस्संकोच रूप में।
इस सिध्दांत की पैरवी दो रूपों में की जा सकती है और की गई है। आत्महत्या को या तो अपने आप में ही एक अद्वितीय बीमारी माना गया है, एक विशेष प्रकार का पागलपन; या इसे अलग वर्ग न मानकर पागलपन के एक या विभिन्न रूपों में पाई जाने वाली बीमारी मान लिया जो कि स्वरूप व्यक्तियों में नहीं पाई जाती। इनमें से पहला बोरडिन का सिध्दांत है। एस्कुईरोल दूसरा विचार रखने वाला प्रमुख विद्वान है। उसका कहना है, 'जो पाया गया है उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि आत्महत्या कई विभिन्न कारणें का परिणाम होती है और कई विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। जाहिर है कि यह किसी बीमारी की विशेषता नहीं होती। आत्महत्या को एक अद्वितीय बीमारी मानकर कई सामान्य बातें कह दी गई हैं जो अनुभव की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।'
आत्महत्या को विक्षिप्तता की अभिव्यक्ति साबित करने की इन दो विधियों में से दूसरी कम श्रमसाध्य और निश्चयात्मक है क्योंकि इसके कारण निषेधात्मक अनुभव असंभव हैं। आत्महत्या के सभी मामलों की पूरी सूची नहीं बनाई जा सकती और न ही प्रत्येक में पागलपन के प्रभाव को दर्शाया जा सकता है। केवल इक्का-दुक्का उदाहरण दिए जा सकते हैं। लेकिन उनकी संख्या चाहे जितनी हो उन्हें वैज्ञानिक सामान्यीकरण का आधार नहीं बनाया जा सकता। साथ ही इस बारे में हालांकि विरोधी उदाहरण नहीं दिए गए हैं, लेकिन उनके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि आत्महत्या को अपनी विशेषताओं और अपने अलग अस्तित्व वाली मानसिक बीमारी दर्शाया जा सकता है तो समस्या सुलझ जाती है। प्रत्येक आत्महंतक एक पागल व्यक्ति है।
लेकिन क्या आत्महत्यात्मक पागलपन जैसी कोई चीज है? आत्महत्या की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप में विशेष और निश्चित होती है। यदि यह एक तरह की विक्षिप्तता है तो यह एक कृत्य तक सीमित आंशिक विक्षिप्तता होगी। एक कृत्य तक सीमित होने पर ही इसे उन्माद कहा जा सकता है, क्योंकि यदि उन्माद कई कृत्यों को लेकर है तो शेष को छोड़कर एक कृत्य द्वारा उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। मानसिक रोग विज्ञान की परंपरागत शब्दावली में इन सीमित उन्मादों को एकोन्माद कहा जाता है। एकोन्मादी ऐसे बीमार व्यक्ति को कहते हैं जिसका दिमाग केवल एक मामले को छोड़कर शेष सभी मामलों में स्वस्थ रहता है। उसमें केवल एक दोष होता है। उदाहरण के लिए, उसमें शराब पीने, चोरी करने या गाली देने की असंगत और बेतुकी कामना होती है; लेकिन उसके अन्य कृत्य और अन्य विचार पूरी तरह से सही होते हैं। इसलिए यदि कोई आत्महत्यात्मक उन्माद होता है तो वह एकोन्माद ही हो सकता है और सामान्यत: इसे यही कहकर पुकारा गया है।
दूसरी ओर यदि एकोन्माद कही जाने वाली इस विशेष बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है तो यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि उसमें आत्महत्या को क्यों शामिल किया जाता है। अभी दी गई परिभाषा के अनुसार इस तरह की बीमारियों का स्वरूप ऐसा होता है कि इनसे बौध्दिक कार्य में कोई अनिवार्य गड़बड़ी नहीं होती। एकोन्मादी और स्वस्थ व्यक्ति के मानसिक जीवन का आधार एक होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि एकोन्मादी के मामले में एक निश्चित मनोदशा इस सामान्य आधार से कटी होती है। संक्षेप में एकोन्माद मनोवेगों में से एक उग्र मनोवेग, विचारसमूह में से एक गलत विचार है लेकिन इसकी तीव्रता इतनी अधिक होती है कि वह दिमाग को अभिभूत कर लेता है और उसे पूरी तरह से अपना दास बना लेता है। उदाहरण के लिए, जब महत्वाकांक्षा विकराल रूप धारण कर लेती है और बाकी सभी दिमागी कार्य पंगु हो गए लगते हैं तो वह विकृत होकर भव्य एकोन्माद का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार दिमागी संतुलन को गड़बड़ा देने वाला हिंसक मनोवेग एकोन्माद का पर्याप्त कारण बन सकता है। सामान्यत: आत्महत्याएं असामान्य आवेग से प्रभावित लगती हैं। इस आवेग की ऊर्जा का अचानक विस्फोट हो सकता है या वह धीरे-धीरे विकसित हो सकती है। यह आावेग इस आधार पर तर्कसंगत भी लग सकता है कि आत्मरक्षण की बुनियादी सहजवृत्ति का प्रतिकार करने के लिए इस तरह का बल हमेशा चाहिए। इसके अलावा आत्महत्या के कृत्य को छोड़कर आत्महंतक बिलकुल दूसरे आदमियों जैसे होते हैं। उन्हें सामान्य रूप में उन्मादी नहीं कहा जा सकता। इस तर्क के आधार पर आत्महत्या को एकोन्माद की संज्ञा देकर विक्षिप्तता की अभिव्यक्ति माना गया है।
लेकिन क्या एकोन्मादियों का वास्तव में कोई वजूद है? काफी लंबे समय तक इस पर सवाल नहीं उठाया गया। सभी मनोचिकित्सक बगैर किसी चर्चा के आंशिक उन्माद के सिध्दांत पर सहमत थे। इसे न केवल चिकित्सकीय दृष्टि से पक्का मान लिया गया बल्कि मनोविज्ञान के निष्कर्षों के अनुरूप मान लिया गया। मानव बुध्दि के विषय में कहा गया है कि उसमें पृथक आत्मिक ऊर्जाएं और अलग शक्तियां हैं जो सामान्यत: मिलकर काम करती हैं। लेकिन वे अलग होकर भी कार्य कर सकती हैं। अत: स्वाभाविक तौर पर ऐसा लगा कि ये शक्तियां अलग-अलग रोगग्रस्त हो सकती हैं। जब मानव-बुध्दि बगैर संकल्पशक्ति के और भावनाएं बगैर बुध्दि के प्रकट हो सकती हैं तो भावनाओं में बगैर गड़बड़ी के बुध्दि या संकल्प संबंधी और बुध्दि या संकल्प में बगैर गड़बड़ी के भावनाओं संबंधी विकार क्यों नहीं हो सकते? इस नियम को जब आत्मिक ऊर्जाओं के विशेषीकृत रूपों पर लागू किया गया तो यह सिध्दांत उभर कर सामने आया कि कोई आघात केवल किसी मनोवेग, कृत्य या अलग-थलग विचार को प्रभावित कर सकता है।
लेकिन आज इस विचार को सब जगह त्याग दिया गया है। प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण से एकोन्मादियों की गैरमौजूदगी सिध्द नहीं की जा सकती लेकिन साथ ही उनकी मौजूदगी का भी कोई निर्विवाद उदाहरण नहीं दिया जा सकता। चिकित्सीय अनुभव के दौरान कोई बिलकुल अलग मनोवेग नजर में नहीं आया है। जब किसी एक आत्मिक ऊर्जा पर आघात लगता है तो दूसरियों को भी आघात पहुंचता है। एकोन्माद में विश्वास करने वाले इन सहगामी आघातों को इसलिए नहीं देख पाए हैं क्यों उनका पर्यवेक्षण बहुत कमजोर है। फलरेट ने लिखा है कि 'उदाहरण के लिए धार्मिक विचारों से आविष्ट किसी विक्षिप्त व्यक्ति को लें जिसे धार्मिक एकोन्मादियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। वह स्वयं को दिव्य प्रेरित कहता है; अपने दिव्य मिशन के तहत वह संसार में नया धर्म लाता है...इस विचार को पूरी तरह से विक्षिप्तता कहा जा सकता है; फिर भी उसके धार्मिक विचारों को छोड़कर उसकी बाकी बातें दूसरे आदमियों की तरह युक्तियुक्त होती हैं। उससे ध्यान से पूछताछ करने पर कुछ और रुग्ण विचार सामने आएंगे। उदाहरण के लिए, धार्मिक विचारों के समानांतर उसमें गर्व की प्रवृत्ति मिलेगी। वह ऐसा विश्वास करता है कि उसे न केवल धर्म बल्कि समाज को सुधारने के लिए पैदा किया गया है। वह शायद यह कल्पना भी करेगा कि उसकी नियति में बहुत बड़ा काम करना लिखा है। यदि इस रोगी में आपको गर्व की प्रवृत्तियां नहीं मिलती हैं तो उसमें नम्रता के विचार या भय की प्रवृत्तियां मिलेंगी। धार्मिक विचारों के भंवर में फंसकर वह स्वयं को ध्वस्त, विनाश नियति वाला आदि मानेगा।'9 उन्माद के ये सभी रूप किसी एक व्यक्ति में इकट्ठे नहीं मिलेंगे, लेकिन कुछ रूप इकट्ठे मिल सकते हैं। यदि वे बीमारी के किसी विशेष क्षण में नजर नहीं आते तो बाद में एक के बाद बहुत जल्दी नजर आ सकते हैं।
इन लक्षणों के अलावा इन तथाकथित एकोन्मादियों की एक सामान्य मानसिक अवस्था होती है जो बीमारी की बुनियाद होती है। उन्मादी विचार तो इसकी बाहरी और क्षणिक अभिव्यक्ति हैं। आनंदातिरेक या गहरा अवसाद या सामान्य विकृति इसकी अनिवार्य विशेषता हैं। विचार और कृत्य में संतुलन और समन्वय का अभाव रहता है।
रोगी सोच-विचार करता है, लेकिन उसके विचारों में रिक्ति होती है। उसके कृत्यों में विसंगति नहीं होती लेकिन उनमें कोई तारतम्य नहीं होता। अत: यह कहना गलत है कि विक्षिप्तता मानसिक जीवन का एक हिस्सा, एक सीमित हिस्सा है। यह जब बुध्दि में घुसता है तो उसे पूरी तरह से आच्छादित कर देता है।
इसके अलावा एकोन्माद की परिकल्पना का बुनियादी सिध्दांत विज्ञान के वास्तविक आंकड़ों का प्रतिवाद करता है। अत: शक्ति के पुराने सिध्दांत के अब बहुत कम पैरोकार हैं। अब विभिन्न प्रकार की सचेत गतिविधियों को अलग-अलग, असंबध्द और केवल गूढ़ तत्व में जुड़ी ताकतें नहीं माना जाता। उन्हें अब एक दूसरे पर आश्रित तत्व माना जाता है। यदि एक को आघात पहुंचता है तो दूसरा उससे अप्रमादित नहीं रह सकता। यह बात अन्य अवयवों के बजाए मानसिक जीवन के मामले में अधिक सही है क्योंकि मानसिक कार्यों के लिए इस तरह से अलग-अलग अवयव नहीं होते कि अन्यों को छोड़कर केवल एक को प्रभावित किया जा सके। मस्तिष्क के विभिन्न भागों में उनका वितरण बहुत स्पष्ट नहीं होता। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि यदि किसी एक भाग को अपना कार्य करने से रोका जाता है तो अन्य भाग बड़ी तत्परता के साथ एक दूसरे का स्थान ले लेते हैं। ये इस कदर एक दूसरे से संबध्द हैं कि विक्षिप्तता अन्यों को छोड़ कर केवल कुछ पर आघात नहीं कर सकती। मानसिक जीवन को पूरी तरह से बदले बगैर विक्षिप्तता द्वारा किसी एक भावना या विचार को प्रभावित कर दिया जाना तो बिलकुल असंभव है। विचारों और आवेगों का कोई अलग-अलग अस्तित्व नहीं है। वे ऐसे बहुत से छोटे तत्व, आध्यात्मिक एटम नहीं हैं जिनके इकट्ठे होने से मस्तिष्क बनता है। वे चेतना के केंद्रों की सामान्य अवस्था की बाह्य अभिव्यक्ति मात्र हैं। चेतना ही उनका स्रोत है और वे उसी की अभिव्यक्ति करते हैं। इस प्रकार वे इस अवस्था की विकृति के बगैर रुग्ण नहीं हो सकते।
यदि मानसिक दोषों का स्थान निर्धारण नहीं किया जा सकता तो अपने वास्तविक अर्थ में एकोन्मादी भी नहीं हो सकते। इससे जुड़ी और स्थानिक लगने वाली गड़बड़ी वास्तव में बहुत व्यापक उथल-पुथल होती है। वे अपने आप में बीमारियां नहीं होतीं बल्कि अधिक सामान्य बीमारियों की गौण अभिव्यक्ति होती हैं। इस प्रकार यदि एकोन्मादी नहीं हैं तो आत्महत्यापरक एकोन्माद भी नहीं हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप हम कह सकते हैं कि आत्महत्या विक्षिप्तता का विशिष्ट रूप नहीं है।

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

आत्महत्या क्या है ? - एमिल दुर्खीम -2- समापन किश्त

    आत्महत्या व्यक्ति का कृत्य है और इससे व्यक्ति ही प्रभावित होता है। अत: वह पूरी तरह से वैयक्तिक तत्वों पर ही आश्रित रहना चाहिए जिनका ताल्लुक केवल मनोविज्ञान से है। लेकिन क्या आत्महंता के संकल्प में उसके मिजाज, चरित्र, पूर्ववृत्त और निजी इतिहास की कोई भूमिका नहीं है?
आत्महत्याओं का इस तरह से युक्तियुक्त अध्ययन किस डिग्री और अवस्थाओं में किया जा सकता है, इस पर फिलहाल विचार करने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह बात निश्चित है कि उन्हें एक अलग आलोक में देखा जा सकता है। यदि आत्महत्याओं को अलग-अलग अध्ययन के योग्य अलग-थलग और असंबध्द घटनाओं के रूप में देखने के बजाए एक निश्चित काल के दौरान एक निश्चित समाज में उनकी संपूर्णता में देखा जाए तो पता चलेगा कि यह संपूर्णता स्वतंत्र इकाइयों का जोड़ मात्र नहीं है। यह अपने आप में एक अद्वितीय तथ्य है जिसकी अपनी अन्विति, वैयक्तिक और अपना स्वरूप हैएक स्वरूप जो कि प्रमुख रूप में सामाजिक है। यदि बहुत लंबी अवधि को न लिया जाए तो, जैसा कि तालिका ढ्ढ (देखें पृष्ठ 45)से स्पष्ट है, उसी समाज के आंकड़े लगभग एक जैसे हैं। यह इसलिए है क्योंकि आवामों के जीवन से जुड़ी पर्यावरण परिस्थितियां वर्ष दर वर्ष अपेक्षाकृत अपरिवर्तित रहती हैं। यह सही है कि अधिक विचारणीय परिवर्तन कभी-कभार होते हैं। लेकिन वे अपवाद स्वरूप होते हैं। साथ ही वे स्पष्ट रूप में हमेशा सामाजिक अवस्था को प्रभावित करने वाले अस्थायी संकट के साथ आते हैं। 1948 में वे यूरोपीय देशों में अचानक गिरावट के रूप में आए।
यदि एक लंबी अवधि को लिया जाए तो अधिक गंभीर परिवर्तन नजर आएंगे। इसके बाद वे चिरकालिक बन जाते हैं। इससे केवल यही सिध्द होता है कि समाज की संरचनात्मक विशेषताओं में भी इसके साथ ही गंभीर बदलाव आए हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे अत्यधिक धीमी गति से प्रकट नहीं होते जैसा कि बहुत से प्रेक्षकों का मानना है। वे अकस्मात और प्रगतिशील होते हैं। कुछ वर्षों, जिनके दौरान इन आंकड़ों में बहुत कम उतार-चढ़ाव होता है, के बाद इनमें अचानक वृध्दि होती है जो बार-बार दोलन के बाद स्थिर हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सामाजिक संतुलन में गड़बड़ी अचानक आई लगती है, लेकिन इसके सभी परिणामों के सामने आने में समय लगता है। आत्महत्या का क्रम-विकास अलग और निरंतर तरंगित हलचलों के रूप में होता है जो कि अनियमित होती है और कुछ समय तक विकसित होकर थम जाती है और फिर शुरू हो जाती है। तालिका-1- के अनुसार इस तरह की तरंग पूरे यूरोप में 1848
तालिका -1-
प्रमुख यूरोपीय देशों में आत्महत्या की स्थिरता (पूर्ण आंकड़े)
वर्ष    फ्रांस  एशिया इंगलैंड सेक्सोनी     बावरिया      डेनमार्क
1841  2,814 1,630       290         377
1842  2,866 1,598       318         317
1843  3,020 1,720       420         301
1844  2,973 1,575       335   244   285
1845  3,082 1,700       338   250   290
1846  3,102 1,707       373   220   376
1847  (3,647)     (1,852)            377   217   345
1848  (3,301)     (1,649)            398   215   (305)
1849  3,583 (1,527)            (328) (189) 337
1850  3,596 1,736       390   250   340
1851  3.598 1,809       402   260   401
1852  3,676 2,073       530   226   426
1853  3.415 1,942       431   263   419
1854  3,700 2,198       547   318   363
1855  3,810 2,351       568   307   399
1856  4,189 2,377       550   318   426
1857  3,967 2,038 1,349 485   286   427
1858  3,903 2,126 1,275 491   329   457
1859  3,899 2,146 1,248 507   387   451
1860  4,050 2,105 1.365 548   339   468
1861  4,454 2,185 1,347 (643)
1862  4,770 2,112  1,317  557
1863  4,613 2,374 1,315  643
1864  4,521 2,203 1,240 (545)       411
1865  4,946 2,361 1,392 619         451
1866  5,119  2,485 1,329 704   410   443
1867  5,011 3,625 1,316  752   471   469
1868  (5,547)     3,658 1,508 800  453   498
1869  5,114  3,544 1,588 710   425   462
1870        3,270 1,554             486
1871        3,135 1,495
1872        3,467 1,514
के घटनाक्रम के बाद या देशों के अनुसार 1850-1853 के दौरान आई। एक अन्य तरंग 1866 के युध्द के बाद जर्मनी में आई। फ्रांस में यह साम्राज्यवादी सरकार के शिखर पर पहुंचने के समय 1860 के आसपास आई, इंगलैंड में 1868 के आसपास या समकालीन वाणिज्यिक संधियों से उत्पन्न वाणिज्यिक क्रांति के बाद। शायद इसी कारण से 1865 के आसपास यह तरंग 1865 में इंगलैंड में फिर आई। अंत में 1870 के युध्द के बाद फिर आगे बढ़ी जो कि अभी भी और कमोबेश पूरे यूरोप में नजर आ रही है।
अपने इतिहास के प्रत्येक क्षण में प्रत्येक समाज में आत्महत्या के प्रति एक निश्चित रुझान रहता है। इस रुझान की तीव्रता स्वैच्छिक मृत्यु की संख्या और प्रत्येक आयु और लिंग की जनसंख्या के अनुपात द्वारा मापी जाती है। इस संख्यात्मक आधार को हम आत्महत्या के जरिए मृत्युदर, विचाराधीन समाज की विशेषता कहेंगे। यह प्रत्येक दस लाख निवासियों में इनकी संख्या द्वारा परिकलित की जाती है।
यह दर न केवल काफी लंबे समय तक स्थिर बनी रहती है बल्कि इसकी स्थिरता महत्वपूर्ण जनसंख्या आंकड़ों की स्थिरता से भी अधिक है। सामान्य मृत्युएं वर्ष दर वर्ष अधिक बार बदलती हैं और यह बदलाव कहीं अधिक होता है। यह बात विभिन्न अवधियों में दोनों तत्वों में परिवर्तन की तुलना करके दर्शाई जा सकती है। यह कार्य हमने तालिका ढ्ढढ्ढ में किया है। इनमें संबंध को दर्शाने के लिए प्रत्येक वर्ष में मृत्यु और आत्महत्या दोनों की दरों को उस अवधि की औसत दर के अनुपात के रूप में प्रतिशत में दर्शाया गया है। एक वर्ष से दूसरे वर्ष के अंतरों या औसत दर से अंतरों को दो कालमों में तुलनीय बनाया गया है। इस तुलना से ऐसा लगता है कि प्रत्येक अवधि में आत्महत्या के मुकाबले सामान्य मृत्यु के मामले में परिवर्तन मात्रा बहुत अधिक है। औसतन यह दुगुनी है। पिछली दो अवधियों में लगातार दो वर्षों में केवल न्यूनतम अंतर प्रत्येक मामले में स्पष्ट रूप से समान है। लेकिन मृत्यु के कालम में यह न्यूनता अपवाद रूप में कम है, जबकि आत्महत्याओं में वार्षिक परिवर्तन इससे कभी-कभार ही भिन्न है। यह औसत अंतरों में तुलना करके देखा जा सकता है।
एक निश्चित बात यह है कि यदि हम एक अवधि के लगातार वर्षों में तुलना करने के बजाए विभिन्न अवधियों के औसतों की तुलना करें तो मृत्युदर में परिवर्तन लगभग नगण्य नजर आएगा। यदि अधिक लंबी अवधि का परिकलन किया जाए तो अस्थायी या दुर्घटना कारणों से वर्ष दर वर्ष एक या दूसरी दिशा में परिवर्तन एक दूसरे को निष्प्रमाणित कर देते हैं; ये परिवर्तन औसत आंकड़ों में नहीं झलकते जिसकी वजह से उनमें अपरिवर्तनीयता और अधिक नजर आती है। उदाहरण के लिए, फ्रांस में 1841 से 1870 की अवधि में लगातार प्रत्येक दस वर्ष में यह 23.18; 23.72; 22.87 थी। लेकिन सबसे पहले तो यह उल्लेखनीय है कि एक वर्ष से अगले वर्ष में आत्महत्याएं
तालिका -2-
आत्महत्या मृत्युदर और सामान्य मृत्युदर में तुलनात्मक भिन्नता
क. पूर्ण आंकड़े
अवधि प्रति   प्रति   अवधि प्रति   प्रति   अवधि प्रति   प्रति
1841- 1,00,000    1,000 1849- 1,00,000    1,000 1856- 1,00,000    1,000
 46   आत्महत्या   मृत्यु- 55   आत्महत्या   मृत्यु- 60   आत्महत्या   मृत्यु-
      दर    दर          दर    दर          दर    दर
1841  8.2   23.2  1849  10.0  27.3  1856  11.6   23.1
1842  8.3   24.0  1850  10.1  21.4  1857  10.9  23.7
1843  8.7   23.1  1851  10.0  22.3  1858  10.7  24.1
1844  8.5   22.1  1852  10.5  22.5  1859  11.1   26.8
1845  8.8   21.2  1853  9.4   22.0  1860  11.9   21.4
1846  8.7   23.2  1854  10.2  27.4
                  1855  10.5  25.9
औसत 8.5   22.8  औसत 10.1  24.1  औसत 11.2   23.8
ख. औसत से संबंधित वार्षिक दर प्रतिशत में
1841  96    101.7 1849  98.9  113.2 1856  103.5 97
1842  97    105.2 1850  100   88.7  1857  97.3  99.3
1843  102   101.3 1851  98.9  92.5  1858  95.5  101.2
1844  100   96.9  1852  103.8 93.3  1859  99.1  112.6
1845  103.5 92.9  1853  93    91.2  1860  106.0 89.9
1846  102.3 101.7 1854  100.9 113.6            
                  1855  103   107.4            
औसत 100   100   औसत 100   100   औसत 100   100
ग. अंतर की मात्रा
      दो लगातार वर्षों           औसत से नीचे
      के बीच      और ऊपर
                 
      सर्वाधिक     न्यूनतम     औसत अधिकतम    अधिकतम
      अंतर  अंतर  अंतर  नीचे   ऊपर
                  प्रतिशत 1841-46
सामान्य मृत्यु 8.8   2.5   4.9   7.1   4.0
आत्महत्या मृत्यु     5.0   1     2.5   4     2.8
                  प्रतिशत 1849-55
सामान्य मृत्यु 24.5  0.8   10.6  13.6  11.3
आत्महत्या मृत्यु     10.8  1.1    4.48  3.8   7.0
                  प्रतिशत 1856-60
सामान्य मृत्यु 22.7  1.9   9.57  12.6  10.1
आत्महत्या मृत्यु     6.9   1.8   4.82  6.0   4.5
अवधिवार सामान्य मृत्युओं से अधिक नहीं तो बराबर स्थिर है। इसके अलावा औसत मृत्युदर सामान्य और अव्यक्तिक होकर ही इस तरह की नियमितता प्राप्त करती है। इससे किसी समाज की बहुत अपूर्ण तसवीर ही उभरती है। वास्तव में एक जैसी सभ्यता मात्रा वाले सभी आवामों में यह लगभग एक समान है। यदि अंतर है तो बहुत कम। उदाहरण के लिए, फ्रांस के मामले में जैसा कि हमने अभी देखा 1841 से 1870 के बीच यह प्रति हजार निवासी 23 मृत्यु के आसपास रही। इसी अवधि के दौरान बेल्जियम में यह 23.93, 22.5, 24.04 थी; इंगलैंड में 22.32, 22.21, 22.68; डेनमार्क में 22.65 (1845-49), 20.44 (1855-59), 20.4 (1861-68); रूस, जो कि केवल भौगोलिक दृष्टि से यूरोपीय है, को छोड़कर बड़े यूरोपीय देशों में केवल इटली में मृत्युदर में काफी अंतर है। 1961 और 1867 के बीच यह बढ़कर 30.6 हो गई। ऑस्ट्रिया में यह और भी अधिक (32.52) थी। इसके विपरीत आत्महत्या दर के वार्षिक परिवर्तन तो बहुत कम हुए हैं, लेकिन समाज के अनुसार वह दुगुनी, तिगुनी चौगुनी और उससे भी ज्यादा है (। इस प्रकार मृत्युदर से इसकी मात्रा अधिक है और प्रत्येक सामाजिक समूह, जिसमें इसे विशेषता सूचकांक माना जा सकता है, के मामले में अलग है। यह राष्ट्रीय मिजाज के गहरे तत्व के साथ इतनी घनिष्ठता के साथ संबध्द है कि इस दृष्टि से विभिन्न समाजों का जो क्रम बनाया गया है, वह विभिन्न अवधियों में बना रहता है। यह बात इसी तालिका की जांच से सिध्द हो जाती है। यहां जिन तीन कालों की तुलना की गई है, उन सभी में आत्महत्या बढ़ी है लेकिन इस वृध्दि में सभी आवामों ने एक दूसरे से अपनी दूरी बनाए रखी है। वृध्दि का प्रत्येक का अपना एक गुणांक है।
इस प्रकार आत्महत्या दर एक वास्तविक पध्दति है, एकीकृत और निश्चित। यह बात इसकी स्थिरता और अस्थिरता दोनों से ही स्पष्ट है। यह स्थिरता और कुछ नहीं बल्कि अलग विशेषताओं के समूह का परिणाम है। ये विशेषताएं परस्पर आश्रित हैं और अलग आनुषंगिक परिस्थितियों के बावजूद एक साथ प्रभावी होती हैं। अस्थिरता इन्हीं विशेषताओं के ठोस और वैयक्तिक स्वरूप को सिध्द करती है क्योंकि उनमें समाज के वैयक्तिक स्वरूप के अनुसार परिवर्तन होता है। संक्षेप में ये आंकड़े पूरे समाज को सामूहिक रूप में ग्रसित करने वाली आत्महत्या प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करते हैं। इस प्रवृत्ति के वास्तविक स्वरूप को व्यक्त करने की जरूरत नहीं है अर्थात यह सामूहिक मानस की अद्वितीय मनोदशा है जिसकी अपनी वास्तविकता है या यह व्यक्ति मनोदशाओं का जोड़ मात्र है। पहले के विचारों का दूसरी परिकल्पना के साथ संगति बिठाना मुश्किल है। इस बारे में हम इस पुस्तक में आगे चर्चा करेंगे। इस विषय के बारे में किसी का कुछ भी अभिमत क्यों न हो इस तरह की प्रवृत्ति किसी न किसी  शीर्षक से जरूर मौजूद रहती है। प्रत्येक समाज में स्वैच्छिक मृत्युओं का एक निश्चित कोटा रहता ही है। यह स्थिति समाजशास्त्र में विशेष अध्ययन का विषय हो सकती है। हम इसी का अध्ययन करना चाहते हैं।
इस प्रकार हम व्यक्ति आत्महत्या के मूल को प्रभावित करने वाली सभी स्थितियों की यथासंभव पूरी सूची नहीं तैयार करना चाहते। हम तो केवल उन स्थितियों की जांच करना चाहते हैं जिन पर यह निश्चित तथ्य, जिसे हमने सामाजिक आत्महत्या दर कहा है, निर्भर करता है। इन दोनों सवालों के बीच चाहे जितना ताल्लुक हो लेकिन ये स्पष्ट रूप में भिन्न हैं। निश्चित रूप में कुछ वैयक्तिक स्थितियां इतनी आम नहीं हैं कि वे कुल स्वैच्छिक मृत्युओं और जनसंख्या के बीच संबंध को प्रभावित कर सकें। ये इस या उस व्यक्ति द्वारा आत्महत्या का कारण बन सकती हैं, लेकिन वे पूरे समाज में आत्महत्या की छोटी या बड़ी प्रवृत्ति नहीं बन सकतीं। चूंकि ये स्थितियां सामाजिक गठन की किसी निश्चित अवस्था पर आश्रित नहीं होतीं इसलिए उनकी कोई सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी नहीं होतीं। इस प्रकार उनका ताल्लुक मनोविज्ञानिक से है समाजशास्त्री से नहीं। समाजशास्त्री उन कारणों का अध्ययन करता है जो अलग-अलग व्यक्तियों को नहीं बल्कि समूह को प्रभावित करने में सक्षम हैं। इसलिए उसका ताल्लुक आत्महत्या के केवल उन तत्वों से है जिनका प्रभाव पूरे समाज द्वारा महसूस किया जाता है। आत्महत्या दर इन्हीं तत्वों का परिणाम है। यही कारण है कि हम केवल उन्हीं की ओर ध्यान देंगे।
मौजूदा काम के इस विषय को तीन खंडों में रखा गया है।
स्पष्टीकरण के लिए चुना गया प्रस्तुत तत्व व्यापक सामान्यतया वाले समाजेत्तर कारणों पर निर्भर कर सकता है या स्पष्ट रूप में सामाजिक कारणों पर। पहले हम समाजेत्तर कारणों का अनुसंधान करेंगे और देखेंगे कि या तो इनका कोई अस्तित्व ही नहीं है या फिर बहुत नगण्य।इसके बाद हम सामाजिक कारणों के स्वरूप को तय करेंगे और यह देखेंगे कि विभिन्न प्रकार की आत्महत्याओं से जुड़ी व्यक्ति मनोदशाओं के साथ उनका क्या ताल्लुक है।
इसके बाद ही हम निश्चित रूप से कह पाएंगे कि आत्महत्या के सामाजिक तत्व क्या हैं; अभी हमने जिस सामूहिक प्रवृत्ति की बात की वह क्या है, इसका दूसरे सामाजिक तथ्यों के साथ क्या संबंध है और इसका मुकाबला कौन से साधनों से किया जा सकता है।






गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

आत्महत्या क्या है ? - एमिल दुर्खीम -1-

'आत्महत्या' शब्द के बारे में वार्तालाप में निरंतर चर्चा होती रहती है। अत: ऐसा सोचा जा सकता है कि इसके बारे में सब जानते हैं और इसकी परिभाषा देना फुजूल है। वास्तव में रोजमर्रा की भाषा के शब्द और उनसे जो अवधारणाएं व्यक्त की जाती हैं उनके हमेशा एक से अधिक अर्थ हो सकते हैं। जो विद्वान उनका प्रयोग उनके स्वीकृत अर्थ में करते हैं और कोई परिभाषा नहीं देते वे गंभीर गलतफहमी का शिकार हो सकते हैं। उनका अर्थ इतना अनिश्चित होता है कि हर मामले में तर्क तकाजे के अनुरूप बदलता रहता है। जिस वर्ग से उन्हें लिया जाता उसे किसी विश्लेषण द्वारा तैयार नहीं किया जाता। उन्हें भीड़ की भ्रमित धारणाओं के आधार पर तैयार कर लिया जाता है। तथ्य के बहुत भिन्न रूपों को बगैर सोचे-समझे एक श्रेणी में डाल दिया जाता है या एक जैसी वास्तविकताओं को अलग-अलग नाम दे दिए जाते हैं। इस प्रकार यदि हम आम प्रयोग का अनुसरण करेंगे तो हम जिसे जोड़ा जाना चाहिए उसे अलग-अलग कर देंगे और जिसे अलग-अलग किया जाना चाहिए उसे इकट्ठा कर देंगे। हम वस्तुओं की सादृश्यता को लेकर गलती कर बैठेंगे और उनके स्वरूप को नहीं पकड़ पाएंगे। केवल तुलनीय तथ्यों पर विचार करके ही वैज्ञानिक अनुसंधान किया जा सकता है और इसमें अधिक निश्चित सफलता तभी मिल सकती है जब सभी तुलनीय तथ्यों को इकट्ठा कर दिया जाए। लेकिन सत्ताओं की स्वाभाविक सादृश्यताओं को सतही जांच द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता, जैसा कि आम शब्दावली में किया जाता है। इस प्रकार विद्वान आम प्रयोगों के शब्दों के अनुरूप इकट्ठे किए गए तथ्य समूहों को अपने अनुसंधान का विषय नहीं बना सकता। उसे अपने अध्ययन के लिए खुद समूह बनाने चाहिए ताकि उन्हें सदृश्यता और विशेष अर्थ दिया जा सके। तभी वे वैज्ञानिक विचार के काबिल बन सकेंगे। फूलों या फलों की बात करने वाला वनस्पतिज्ञ और मछलियों या कीड़ों की बात करने वाला प्राणिविज्ञानी पूर्व निर्धारित अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग करता है।
हमारा पहला काम आत्महत्या शीर्षक के अंतर्गत अध्ययन के लिए तथ्यों का क्रम निर्धारण होना चाहिए। हमें यह जांच करनी चाहिए कि क्या मृत्यु के विभिन्न रूपों में से कुछ में ऐसी वस्तुपरक सामान्य विशेषताएं हैं जो सभी ईमानदार प्रेक्षकों को नजर आती हैं और इतनी विनिर्दिष्ट हैं कि अन्यत्र नहीं पाई जातीं और सामान्य तौर पर आत्महंतक कहे जाने वाले व्यक्तियों से संबध्द हैं। तभी हम इस शब्द को उसके सामान्यत: प्रयुक्त अर्थ में रख सकते हैं। यदि ऐसे रूप मिलते हैं तो हम इस शीर्षक के अंतर्गत उन सभी तथ्यों को रखेंगे जिनमें ये पृथक विशेषताएं हैं भले ही इस कवायद से इस वर्ग में वे सभी मामले शामिल न हो पाएं जिन्हें सामान्यत: इसमें शामिल किया जाता है या अन्यथा दूसरे वर्ग में रखे जाने वाले मामले इसमें शामिल हो जाएं। महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि औसत बुध्दि किसे आत्महत्या मानती है बल्कि इस तरह के वर्गीकरण को संभव बनाने वाली वस्तुओं की श्रेणी को निर्धारित करना है। यह निर्धारण वस्तुपरक होना चाहिए और वस्तुओं के निश्चित पक्ष के अनुरूप होना चाहिए।
मृत्यु के विभिन्न प्रकारों में कुछ में यह खास विशेषता होती है कि वह खुद शिकार व्यक्ति का ही कृत्य होती है, ऐसे कृत्य का परिणाम जिसका कर्ता पीड़ित व्यक्ति ही होता है। आत्महत्या संबंधी सामान्य विचार में यही विशेषता निश्चित रूप में बुनियादी तत्व है। इस तरह से होने वाले कृत्यों के आंतरिक स्वरूप का कोई महत्व नहीं है। सामान्यत: आत्महत्या को एक सकारात्मक हिंसक कार्रवाई माना जाता है जिसमें शारीरिक ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है लेकिन किसी विशुध्द रूप में नकारात्मक रवैए या मात्र अकारण का भी वही परिणाम हो सकता है। खाना खाने से इनकार उतना ही आत्महत्यात्मक है जितना कि खंजर या गोली से खुद को नष्ट करना। मृत्यु को कृत्य का परिणाम मानने के लिए उसका मृत्यु से ठीक पहले होना जरूरी नहीं है। तत्व के स्वरूप को बदले बगैर कारण-कार्य संबंध अप्रत्यक्ष हो सकता है। जब कोई बागी व्यक्ति शहीद सम्मत विजय की उम्मीद में बहुत बड़ा समझा जाने वाला द्रोह करता है और जल्लाद के हाथों मारा जाता है तो वह बिलकुल वैसे ही अपनी मृत्यु को प्राप्त करता है जैसे कि उसने स्वयं अपने ऊपर आघात किया हो। इस तरह की दो स्वैच्छिक मृत्युओं को अलग वर्गों में डालने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि उनके अंत के भौतिक हालातों में ही अंतर है। इस तरह से हम अपने पहले सूत्र पर पहुंचते हैं :आत्महत्या शब्द किसी भी ऐसी मृत्यु के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है जो खुद शिकार व्यक्ति के सकारात्मक या नकारात्मक कृत्य का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम हो।
लेकिन यह परिभाषा अपूर्ण है। यह दो एकदम अलग प्रकार की मृत्युओं में भेद नहीं करती। किसी भ्रमित व्यक्ति के खिड़की से यह सोचकर बाहर कदम रखने कि वह समतल जमीन पर कदम रख रहा है और गिर कर मर जाने और दूसरे होशोहवास वाले व्यक्ति द्वारा जानबूझकर ऐसा करके मर जाने में अंतर है। मृत्यु के कुछ ऐसे मामले भी हैं जो सीधे-सीधे या दूर-दूर तक कर्ता के कृत्य का परिणाम नहीं हैं। मृत्यु के कारण भीतरी नहीं बल्कि बाहरी हैं।
क्या आत्महत्या उसी समय मानी जाएगी जब मृत्यु में परिणत होने वाला कृत्य शिकार व्यक्ति द्वारा इसी परिणाम के लिए किया गया हो? क्या उसी व्यक्ति को खुद को मारने वाला कहा जाएगा जिसमें ऐसा करने की इच्छा थी और क्या आत्महत्या जानबूझकर स्वयं को मारना है? सबसे पहले तो यह आत्महत्या की ऐसी विशेषता हुई जिसका आसानी से प्रेक्षण और संज्ञान नहीं किया जा सकता, भले ही इसका कितना भी महत्व हो। एजेंट की अभिप्रेरणा का कैसे पता लगाया जाए, जब उसने संकल्प किया तो क्या वह उस समय स्वयं को मारना चाहता था या उसका और कोई उद्देश्य था। मंशा इतनी अंतरंग चीज है कि दूसरा व्यक्ति उसकी लगभग से अधिक व्याख्या नहीं कर सकता। इसका आत्मप्रेक्षण भी नहीं किया जा सकता। कितनी ही बाद हम अपने कृत्यों का सही कारण नहीं समझ पाते। हम क्षुद्र भावनाओं के साथ या अंधे होकर नैमी तौर पर किए गए कृत्यों को बड़े जोश और उच्च इरादों के साथ किए गए कृत्य बताते हैं।
इसके अलावा सामान्य तौर पर भी किसी कृत्य को उसके कर्ता के लक्ष्य द्वारा परिभाषित नहीं किया जा सकता क्योंकि आचरण की समरूप प्रणाली को उसके स्वरूप को बदले बगैर अलग-अलग लक्ष्यों की ओर मोड़ा भी जा सकता है। यदि आत्मनाश की मंशा ही आत्महत्या है तो उन तथ्यों को आत्महत्या नाम नहीं दिया जा सकता जो स्पष्ट अंतरों के बावजूद उन तथ्यों से मेल खाते हैं जिन्हें आत्महत्या कहा जाता है और इस शब्द को निकाल कर ही उनकी अन्यथा व्याख्या की जा सकती है। अपनी रेजिमेंट को बचाने के लिए निश्चित मौत का सामना करने वाला सिपाही मरना नहीं चाहता, लेकिन क्या वह अपनी मृत्यु का वैसा ही कर्ता नहीं है जैसा कि दिवालिएपन से बचने के लिए स्वयं को मारने वाला विनिर्माता या व्यापारी? अपने धर्म के लिए मरने वाले शहीद या अपने बच्चे के लिए कुर्बानी देने वाली मां आदि की भी यही स्थिति है। मृत्यु को अपरिहार्य उद्देश्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम के रूप में स्वीकार किया जाता है या वास्तव में उसे मांगा और चाहा जाता है, दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति अस्तित्व का परित्याग करता है। इसके लिए अपनाए गए विभिन्न तरीके एक ही वर्ग के प्रभेद हैं। उनमें इतनी अधिक अनिवार्य समानताएं हैं कि उन्हें एक सामान्य अभिव्यक्ति में इकट्ठा करना पड़ेगा। वे इस प्रकार स्थापित एक वर्ग के प्रभेद होंगे। सामान्य भाषा में आत्महत्या एक ऐसे व्यक्ति का हताश कृत्य है जो जीना नहीं चाहता। बहरहाल जीवन का परित्याग किया जाता है क्योंकि इसे त्यागने के क्षण में व्यक्ति ऐसा चाहता है। यदि कोई जीव संभवत: सर्वाधिक प्रिय चीज को त्यागना चाहता है तो ऐसे कृत्यों की स्पष्ट रूप में अनिवार्य सामान्य विशेषताएं होनी चाहिए। इस तरह के संकल्पों को कामयाब बनाने वाली अभिप्रेरणाओं में भिन्नताएं गौण भिन्नताएं ही मानी जाएंगी। इस प्रकार यदि
संकल्प जीवन के बलिदान में तब्दील होता है तो वैज्ञानिक तौर पर इसे आत्महत्या ही कहा जाएगा, किस तरह की आत्महत्या यह हम बाद में देखेंगे।
सर्वोच्च परित्याग के इन सभी संभव रूपों की सामान्य विशेषता यह है कि निर्धारक कृत्य जान बूझकर किया जाता है। कृत्य के समय शिकार व्यक्ति अपने आचरण के निश्चित परिणाम के विषय में जानता है भले ही उस कृत्य के पीछे कोई भी कारण रहे हो। इस प्रकार की विशेषता वाले प्राणघातक तथ्य उन सभी तथ्यों से स्पष्ट रूप में भिन्न हैं जिनमें शिकार व्यक्ति अपना अंतकर्ता नहीं है या केवल अनजानकर्ता है। उनमें एक आसानी से पहचाना जा सकने वाला अंतर है। यह पता लगाना असंभव नहीं है कि अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणामों की व्यक्ति को अग्रिम तौर पर जानकारी थी या नहीं। इस प्रकार वे एक निश्चित समरूप समूह हैं जिन्हें अन्य समूह से अलगाया जा सकता है। इसलिए उन्हें एक विशेष शब्द दिया जा सकता है। आत्महत्या उनके लिए उपयुक्त शब्द है; और कोई शब्द गढ़ने की जरूरत नहीं है; क्योंकि इस नाम वाली बहुसंख्यक घटनाओं का ताल्लुक इसी वर्ग से है। अब हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं : मृत्यु के उन सभी मामलों को आत्महत्या कहा जाएगा जिनमें मृत्यु खुद शिकार व्यक्ति के सकारात्मक या नकारात्मक कृत्य का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम होती है और जब व्यक्ति यह जानता हो कि इसका यही परिणाम होगा। आत्महत्या का प्रयास भी इसी प्रकार परिभाषित कृत्य है। इसमें बस मृत्यु नहीं होती।
इस परिभाषा के चलते पशुओं द्वारा आत्महत्या से संबंधित बात हमारे अध्ययन के दायरे से बाहर हो जाती है। पशु-समझ के बारे में अपनी जानकारी के आधार पर हम यह नहीं कह सकते कि उन्हें अपनी मृत्यु के बारे में पूर्व समझ होती है या उन्हें इस कृत्य के साधनों की जानकारी होती है। यह पक्की बात है कि कुछ पशु ऐसे स्थान पर नहीं जाना चाहते जहां पर दूसरे मारे गए हैं। ऐसा लग सकता है कि उन्हें मृत्यु का पूर्व ज्ञान होता है। वास्तव में इस सहज प्रतिक्रिया का कारण रक्त की गंध है। जिन मामलों को पूरी प्रामाणिकता के साथ आत्महत्या बताया गया वहां वास्तव में दूसरी ही बात हो सकती है। यदि कोई चिढ़ा हुआ बिच्छू स्वयं को डंक मार देता है (जो कि निश्चित नहीं है) तो यह संभवत: स्वत:स्फूर्त, अविचारित प्रतिक्रिया है। उसकी चिढ़ से उत्पन्न अभिप्रेरणा ऊर्जा संयोग से और यों ही विसर्जित हो जाती है। जीव इसका शिकार हो जाता है, हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उसे अपने कृत्य परिणाम की पूर्व कल्पना थी। दूसरी ओर यदि कुछ कुत्ते अपने मालिकों को खो देने के बाद खाना खाने से इनकार करते हैं तो यह इस वजह से है कि क्योंकि दु:ख के कारण उनकी भूख मिट गई है। उनकी मृत्यु हो जाती है, लेकिन बगैर किसी पूर्वाभास के। न तो इस मामले में भूखा रहने और ऊपर वाले मामले में जख्म को ज्ञातप्रभाव का माध्यम माना जा सकता है। इसलिए हम आगे केवल मानव आत्महत्या पर ही विचार करेंगे।
लेकिन इस परिभाषा से न केवल गलत संहतियों और स्वेच्छाचारी बहिष्करणों का अंत होता है बल्कि इससे हमें समूचे नैतिक जीवन में आत्महत्या के स्थान के बारे में विचार प्राप्त होता है। इससे पता चलता है कि आत्महत्याएं एक पूरी तरह पृथक समूह, किसी विकराल तत्व का कोई अलग- थलग वर्ग नहीं है, जिसका आचरण के अन्य रूपों के साथ कोई संबंध नहीं है, बल्कि इनका बीच के मामलों की निरंतर शृंखला के द्वारा आचरण के अन्य रूपों के साथ संबंध रहता है। ये आम प्रथाओं का अतिरंजित रूप मात्र है। हमारा कहना है कि आत्महत्या उस समय मानी जाती है जब शिकार व्यक्ति घातक कृत्य को करने के समय उसके सामान्य परिणाम के बारे में निश्चित रूप से जानता है। यह निश्चितता अधिक या कम हो सकती है। उसमें यदि थोड़ा सा संदेह हो जाए तो नया तथ्य सामने आएगा, आत्महत्या नहीं बल्कि उसके नजदीक की कोई चीज, क्योंकि उनमें केवल मात्रा का अंतर है। घातक परिणाम की निश्चितता के बगैर यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के लिए जानबूझकर जोखिम उठाता है और मर भी जाता है तो इसे आत्महत्या नहीं कहेंगे। उसका कृत्य किसी निडर दुस्साहसी के कृत्य से अधिक नहीं है जो मृत्यु से खेलता है और उससे बचना चाहता है या किसी ऐसे विरक्त मनुष्य का कृत्य जिसकी किसी चीज में रुचि नहीं है, जो अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखता और उपेक्षा द्वारा उसे खराब कर देता है। लेकिन कृत्य के ये विभिन्न रूप सच्ची आत्महत्या से मूलभूत रूप में भिन्न नहीं हैं। ये एक जैसी मानसिक अवस्था के परिणाम होते हैं, एजेंट को ज्ञात प्राणघातक जोखिम रहते हैं और इन जोखिमों की संभावना निवारक का काम नहीं करती। अंतर केवल यही है कि इसमें मृत्यु की संभावना कम होती है। इसी प्रकार यदि कोई विद्वान अपने अध्ययन के प्रति अत्यधिक समर्पण के कारण मर जाता है तो यह कहना उचित ही होगा कि उसने खुद को अपनी मेहनत से मार दिया। ये सब तथ्य एक तरह की अविकसित आत्महत्या है। प्रणाली विज्ञानिक रूप से यह पक्की आत्महत्या नहीं है और इसे पूर्ण आत्महत्या नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन साथ ही इसके साथ उसके निकट संबंध की उपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए। आत्महत्या उस समय बिलकुल अलग चीज लगने लगती है जब उसका अटूट संबंध साहस और समर्पण के कृत्यों और विवेकहीनता और स्पष्ट उपेक्षा से जुड़ जाता है। इन संबंधों के स्वरूप को हम आगे देखेंगे।(क्रमशः)

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

जॉर्ज सिंपसन- उसने अपनी जान क्यों ली ? - 4- समापन किश्त

परिवार के बारे में परिकल्पना : आत्महत्या का प्रयास करने वालों या आत्महत्या करने वालों का भावात्मक पैटर्न शैशव और प्रारंभिक बचपन में ही पारिवारिक संबंधों द्वारा निर्धारित हो जाता है। परिवार में समाजीकरण सभी के लिए कुंठा का स्रोत है। इसलिए आत्महत्या सब के लिए संभावित छुटकारा मार्ग है। आत्महत्या से जुड़े बाद के सामाजिक कारकों और प्रारंभिक भावात्मक बनावट के बीच संबंध खोजना जरूरी है।
इसके अलावा आत्महंतकों और आत्महत्या का प्रयास करने वालों के जीवनवृत्तों और उनके परिवार पालन-पोषण स्वरूप जैसे कि प्रजाति समूह, धार्मिक संबध्दता, आय समूह, परिवार आकार, परिवार में व्यक्ति आत्महंतक के स्थान, शिक्षा स्तर के बीच अंत:संबंध स्थापित करना जरूरी है।
आत्महत्या और राष्ट्रीयता : अलग-अलग देश में अलग-अलग आत्महत्या दर होती है। आंशिक रूप में यह अंतर रिकार्ड रखने में या महत्वपूर्ण आंकड़ों की क्वालिटी में अंतर के कारण हो सकता है। जर्मन प्रभाव वाले देशों और जापान में उच्च आत्महत्या दर है। जर्मनीय देशों में यह धर्म की वजह से हो सकता है। यहां लूथरवाद और काल्विनवाद के प्रभाव का विश्लेषण होना चाहिए। ये पाप भावनाओं को व्यक्ति पर डाल देते हैं, कुंठा को व्यापक बना देते हैं और गरीबी, दीनता, ब्रह्मचर्य जैसी बातों की धार्मिक पवित्रता को कोई क्षतिपूरक विश्वास प्रदान नहीं करते। जर्मनीय देशों में कैथोलिकों के बीच आत्महत्या दर अधिक नहीं है।
जापान (और भारत की कुछ आबादी) के मामले में परिवार जीवन और सामाजिक विश्वासों का अन्वेषण किया जाना चाहिए। आत्महत्या के कारण जापानी का मनोवैज्ञानिक विकास हमारे जैसे समाज के मनोवैज्ञानिक विकास की तुलना में पूरी तरह से उलटा है। एक जैसे बुनियादी मनोवैज्ञानिक तंत्रों के बिलकुल उलटे परिणाम कैसे हो सकते हैं? इससे एक बार फिर आचरण की आधारभूत सहजवृत्तियों के पैटर्नों के संबंध और सामाजिक अनुकूलन के जरिए उनके विभिन्न रूप लेने की समस्या पैदा होती है। यहां एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी के लिए सामाजिक व्यवहार के पैटर्न दिए जाने की बात तो छोड़ दें। इस संदर्भ में एक दिलचस्प विचार यह हो सकता है कि यदि आज हम जाापान का लोकतंत्रीकरण करने और यहां के लोगों को पश्चिमी तौर-तरीकों में ढालने का प्रयास करें तो जापानी आत्महत्या दर पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
शहरी जीवन और आत्महत्या : आज जो निष्कर्ष निकाले गए हैं कि शहरी क्षेत्रों में आत्महत्या दरें अधिक हैं उनका शहरी जीवन के मानसिक रूप में बदतर बन जाने के संदर्भ में फिर से अन्वेषण किया जाना चाहिए। यह खोजना अलग बात है कि शहरों में बुनियादी भावात्मक पैटर्नों के बदतर हो जाने और उसके चिरस्थायी बन जाने के कारण शहरी आत्महत्या दर अधिक है और यह कहना अलग बात है कि शहरी जीवन आत्महत्या को बढ़ावा देता है।
आत्महत्या और धार्मिक संबध्दता : आम राय है कि अन्य धार्मिक समूहों के मुकाबले कैथोलिकों में आत्महत्या दर सबसे कम है। अत: यह अन्वेषण जरूरी है कि दबाई गई सहज इच्छाओं की भावात्मक अभिव्यक्ति के लिए कैथोलिकों को अन्यों के मुकाबले कितने अवसर मिलते हैं।

अब सवाल यह पैदा होता है कि फिर कैथोलिक आत्महत्या क्यों करते हैं क्योंकि आत्महत्याएं तो वहां भी होती हैं। इससे गैर कथोलिकों द्वारा आत्महत्या के पक्के कारणों का पता चलेगा। और धर्म परिवर्तित कैथोलिकों में आत्महत्या दर कितनी है, क्या वह अन्य कैथोलिकों और धार्मिक समूहों के मुकाबले कम है या अधिक?
इसके बाद नई समस्या खड़ी होती है कि क्या कैथोलिकों द्वारा आत्महत्याओं की सही सूचना दी जा रही है क्योंकि कैथोलिक चर्चों में आत्महत्या के निषेध से गंभीर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
प्रोटेस्टेंटों में हर जगह कैथोलिकों और अकसर यहूदियों के मुकाबले आत्महत्या दर अधिक है। मोरसेली और दुर्खीम ने इसका कारण यह बताया है कि प्रोटेस्टेंटवाद में वैयक्तिकतावाद पर अधिक बल दिया जाता है और इसमें विचारशील चिंतन और व्यक्ति-चेतना पर बहुत बल दिया जाता है। यदि यह सही है तो सर्वाधिक वैयक्तिकवादी प्रोटेस्टेंट पंथों में आत्महत्या दरें सबसे अधिक होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अमरीका में यूनिटेरियनों में आत्महत्या दर बहुत अधिक और हाई चर्च एपिस्कोपेलियनों में बहुत कम होनी चाहिए। क्या ऐसा है? हमें मालूम नहीं। इसके अलावा मानसिक जीवनवृत्त को धार्मिक संबध्दता से जोड़ने वाले आंकड़े भी हमारे पास नहीं हैं। जिन यूनिटेरियन चर्चों में मानसिक स्वास्थ्य पर बल दिया जाता है और जहां पुरोहित अपने कष्ट पीड़ित सदस्यों की एक सामान्य प्रथा के रूप में मनोविश्लेषक चिकित्सा कराते हैं वहां आत्महत्या दर कम हो सकती है।
उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी सभ्यता की तीन प्रमुख धर्म-धाराओं में यहूदियों में आत्महत्या दर सबसे कम थी लेकिन हाल के आंकड़े (जो नाजियों के अधीन यूरोप में राजनीतिक घटनाक्रम को विशेष रूप में दरशाते हैं) बताते हैं कि उनमें यह दर शेष दो से अधिक हो गई है।
धार्मिक वातावरण को आत्महत्या की मनोविकृति संबंधी व्याख्या से पूरी तरह से संबध्द किया जा सकता है। कैथोलिकों की आत्महत्या से अपेक्षाकृत निरापदता की दुर्खीम की परिकल्पना, जिसकी तत्कालीन निश्चित रूप में संकीर्ण बीमीय और सामाजिक आंकड़ों द्वारा पुष्टि हो जाती है, की गहरी जड़ें मनोविकृति विज्ञान में हो सकती हैं। कैथोलिकवाद द्वारा प्रदान की जाने वाली इस निरापदता का कारण दुर्खीम ने यह बताया है कि वह अपनी सर्वव्यापी भावनाओं और विश्वासों के जरिए व्यक्ति को समूह से जोड़ता है। लेकिन ये सामान्य भावनाएं और विश्वास क्या हैं? कैथोलिक भावनाएं और विश्वास व्यक्ति को पापबोध से मुक्त करते हैं, सभी पापों को प्रायश्चित्तीय बनाते हैं, पिता स्थापन्नों की जटिल, श्रेणीबध्द प्रणाली और मां की सरल हृदय और काव्यमय छवि स्थापित करते हैं।
कम सख्त प्रोटेस्टेंट पंथ शैशवकालीन दमन और कुंठा के लिए कविता, कला और अनुष्ठानों के जरिए उदात्त अभिव्यक्ति का मार्ग उपलब्ध नहीं कराते। पाप की एक जबर्दस्त भावना बनी रहती है जिसका स्वीकारोक्ति द्वारा प्रायश्चित नहीं किया जा सकता। इसके लिए ईश्वर और बड़ों का अकेले ही कोपभाजन बनना पड़ता है। काल्विनवाद और कुछ हद तक लूथरवाद दमनात्मक और वैयक्तिक तरीके से पाप से निपटते हैं। प्रारंभिक प्रोटेस्टेंटवाद में अचेतन को उसके ऊपर ही फेंक दिया जाता है और बाद में पूरी तरह गैर धार्मिक दंड विधान उस पर नियंत्रण रखते हैं।
आत्महत्या और लिंग : सफल आत्महत्याएं स्त्रियों के बजाए पुरुषों में अधिक हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि आत्महत्या के प्रयास पुरुष के मुकाबले स्त्रियों के मामले में अधिक हैं। आंकड़ों की अविश्वसनीयता की बात थोड़ी देर के लिए छोड़ दें तो भी सवाल यह पैदा होता है कि क्या यह स्त्रियों की सामाजिक हैसियत के कारण है या स्त्रियों और पुरुषों के बीच भावनात्मक अंतर के कारण है या दोनों के अंत:संबंध के कारण है, और कैसे और किस हद तक?
आत्महत्या और आयु : ऐसा माना जाता है कि आत्महत्या दर आयु के साथ बढ़ती है। लेकिन क्या यह संभवत: इस कारण नहीं है कि प्रारंभिक कुंठाएं अधेड़ जीवन की असफलताओं के कारण बदतर बन जाती हैं? और अधेड़ उम्र की आत्महत्या दरों और प्रगाढ़ वैवाहिक और पारिवारिक संबंधों में विफलता के बीच क्या ताल्लुक है?
हमारे पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उम्र में वृध्दि के साथ आत्महत्या दर में वृध्दि होती है। यह दर बूढ़ों में विशेष रूप में अधिक है। इस उम्र में कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। सर्वप्रथम, क्या ऐसा है कि जब व्यक्ति बूढ़ा होता है तो आत्महत्या को मृत्यु का कारण मानने में कम अनिच्छा होती है? दूसरे, वृध्दावस्था में अपकर्षक बीमारियां अपने उत्कर्ष पर होती हैं और इसका मन पर जबर्दस्त प्रभाव होता है। तीसरे, क्या हम आत्महत्या को स्वयं को इस ज्ञान के साथ मारना कह सकते हैं कि मृत्यु वैसे भी दूर नहीं है? चौथे, क्या बूढ़ों को विस्मृति में डाल देना उस अवस्था के लिए आमंत्रण है जिसे मनोविश्लेषक मातृ सुलभ विस्मृति कहते हैं; अर्थात अनजन्मे की मीठी नींद की ओर लौटना? ये सवाल और दूसरे सवाल जरा चिकित्सा नामक नई चिकित्सा शाखा के केंद्र में होने चाहिए विशेष रूप से वृध्द कही जाने वाली जनसंख्या के मामले में?
आत्महत्या और आय वर्ग : उच्च आय वर्गों में आत्महत्या दर अपेक्षाकृत अधिक है। धन, जिसे हमारे जैसे समाज में सफलता का मानदंड माना जाता है, प्रतिरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। क्या यह शैशवकाल और किशोरावस्था में अति सुरक्षा के कारण है? और स्वनिर्मित लोगों द्वारा आत्महत्या के विषय में क्या कहा जाए? डबलिन और बनजेल का निष्कर्ष है कि आर्थिक तत्वों और आत्महत्या के बीच कोई सरल कारण-कार्य संबंध नहीं है। तो क्या सभी आर्थिक समूहों में आत्महत्या एक जैसी भावनात्मक समस्याओं का प्रमाण है?
आत्महत्या और युध्द : गोलाबारी युध्द के दौरान आत्महत्या दर गिर जाती है; आंकड़े यही बताते हैं। लेकिन गोलाबारी युध्द के दौरान इसमें शामिल लोगों को चुपचाप आत्महत्या करने का अच्छा अवसर मिल जाता है। साहस दिखने वाली घटना वास्तव में आत्महत्या प्रवृत्ति हो सकती है। बहरहाल जब लगे कि वैसे भी जीवन की उम्मीद नहीं है तो व्यक्ति आत्महत्या की सोच सकता है।
नागरिक जनसंख्या का जहां तक संबंध है मन पर इसके प्रभाव के पूरे सवाल के बारे में अन्वेषण किया जाना शेष है।
आत्महत्या और वैवाहिक दर्जा : वैवाहिक दर्जे और आत्महत्या में पूरा अंत:संबंध माना जाता है। तलाकशुदा पुरुषों में गैर तलाकशुदा पुरुषों के मुकाबले अधिक आत्महत्या दर, तलाकशुदा स्त्रियों में गैर तलाकशुदा स्त्रियों के मुकाबले अधिक लेकिन तलाकशुदा पुरुषों से कम आत्महत्या दर पाई जाती है। फिर से विवाह करने वाले तलाकशुदा लोगों में आत्महत्या दर की क्या स्थिति है?
विधवाओं-विधुरों के समूह में संतानहीनों में आत्महत्या दर अधिक है। लेकिन इस तत्व की व्याख्या के लिए मनोविकृति संबंधी जीवनवृत्तों पर आधारित सामान्यीकरण और विवाह, तलाक या वैधव्य से गढ़े जा चुके भावनात्मक जीवन के साथ वैवाहिक दर्जे के संबंध के विषय में कुछ जानकारी जरूरी है। और फिर से विवाह करने वाली विधवाओं-विधुरों में आत्महत्या दर की क्या स्थिति है? यदि विवाह, विशेष रूप में संतान संपन्न विवाह यदि आत्महत्या से रक्षा करता है तो ऐसे सभी विवाहों में ऐसा क्यों नहीं होता है? क्या आत्महत्या संभावना जीवनसाथी और परिवार के प्रति समर्पण पर विजय पा लेती है? यदि ऐसा है तो आत्महत्या की संभावना इतनी प्रबल कैसे हो जाती है?
आत्महत्या और नीग्रो : हमारे समाज में श्वेत के मुकाबले नीग्रो लोगों में आत्महत्या दर बहुत कम है। (यदि आंकड़े सही हैं तो) नीग्रो दुर्भाग्य और आत्महत्या के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं है। क्या व्यवस्थित दमन और दुर्भाग्य के कारण व्यक्ति मानव अस्तित्व की तंगहाली और त्रासदी के साथ समझौता कर लेता है? जीवन से कोई उम्मीद न रखने के कारण उन्हें, चाहे जितना कम मिले, कभी निराशा नहीं होगी। लेकिन इस मामले में उच्च वर्गीय और सुशिक्षित नीग्रो लोगों और कम आय वाले गरीब नीग्रो लोगों में आत्महत्याओं का गंभीरता से अध्ययन किया जाना चाहिए। क्या जो नीग्रो भौतिक और बौध्दिक तौर पर उच्चवर्गीय श्वेत जीवन-स्तर के नजदीक हैं अन्य नीग्रो लोगों के मुकाबले अधिक आत्महत्या करते हैं?
लेकिन नीग्रो स्त्रियों की दर श्वेत स्त्रियों की दर के नजदीक है जबकि नीग्रो पुरुषों और श्वेत पुरुषों के मामले में ऐसा नहीं है। यहां इन नीग्रो स्त्रियों के निजी जीवन की गहरी जानकारी से मदद मिल सकती है। साथ ही नीग्रो लोगों ने आत्महत्या से संबंध की समस्या के साथ रंग के प्रश्न भी पूरी तरह से जुड़े हुए हैं।
आत्महत्या और रोगनाशक थैरेपी : जिन व्यक्तियों के मामलों में विश्लेषण कक्षों और क्लिनिकों में आत्महत्या प्रवृत्ति अधिक दिखाई दी और जिनके इलाज में सफलता मिली ऐसे व्यक्तियों के बाद के जीवन में आत्महत्या दर क्या रहती है? क्या यह प्रवृत्ति जीवन की ओर मुड़ गई है? किस तरह के जीवन की ओर?
इन परिकल्पनाओं को सामने रखना निश्चित रूप में उनका उत्तर देना नहीं है।
हमारे समाज में मानव व्यक्तित्व के लिए बहुत सम्मान है। इसलिए आत्महत्या से घृणा हमारा बुनियादी मूल्य है। इसके बाद सवाल यह पैदा होता है कि आत्महत्या से लड़ने के लिए क्या किया जाए। मनोविकृति विज्ञान के नजरिए से इसके लिए माता-पिताओं और भावी माता-पिताओं को मानसिक स्वास्थ्य के सिध्दांतों का कड़ा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। नर्सरी स्कूल, ग्रेड स्कूल और हाई स्कूल अध्यापकों को इन नियमों की सघन जानकारी दी जानी चाहिए और 'नए युग' के इन संगठनों में मनोविकृति अभिलेख की व्यापक व्यवस्था की जानी चाहिए। समाज विज्ञान के दृष्टिकोण से जो सामाजिक वातावरण व्यक्तियों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देता है और उसे बदतर बनाता है और स्थायी बनाता है उसका शमन करना जरूरी है।
कुछ समय से व्यावसायिक संगठन समाजवैज्ञानिकों पर जोर दे रहे हैं कि वे उत्तर देने के बजाए अनुसंधान कार्यक्रम चलाएं। यहां आत्महत्या के मामले में अनुसंधान पचास से अधिक वर्षों से चल रहा है और कुछ लोगों का मानना है कि अब उत्तर देने का समय आ गया है। इसका उत्तर यह है कि हमें केवल समस्याओं के चिह्न को बाहर निकालने की चटनी मिली है। मानव विवेकहीनता के जिस वहशी प्रकोप को झेलता आ रहा है उस पर यह चाबी काबू नहीं पा सकती।
जो लोग अनुसंधान के इस क्षेत्र में प्रवेश करना चाहते हैं उन्हें इसकी दिक्कतों के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्हें किसी तुरंत निदान की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। किसी प्रशासनिक युक्ति से आत्महत्याएं कम नहीं होंगी बल्कि दयालुतापूर्ण उपचार से होंगी। दयालुतापूर्ण उपचार जो अविवेकपूर्ण जीवविज्ञान और मनोविज्ञान, जिनकी गहराइयों तक हम हाल ही में पहुंचे हैं और जो इन्हें वास्तविकताएं मानने में संकोच
और पापशंका के कारण पोषित होते हैं, से घिरी मानवता की त्रासदी पर आधारित हो।
विवेकहीनता से लड़ने के लिए विज्ञान के निष्कर्षों और मानव-विवेक को सामाजिक संरचना और इस संरचना में व्यक्ति की क्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। पश्चिम की लंबी विचार परंपरा में दुर्खीम मनोविश्लेषकों के साथ इस बात पर बल देते हैं कि विवेकपूर्ण जीवन के कई शत्रु हैं और इनमें से प्रमुख शत्रु गंभीर प्रमाणों पर आधारित अपनी खोजों को अपने आसपास के सामाजिक संसार पर लागू न करना है। हमारे पास जो प्रमाण है वह उनके पास नहीं था। लेकिन यह तो जन्म और इतिहास का संयोग है। लि सुइसाइड में उनके प्राक्कथन में उनके ही शब्दों का ही प्रयोग करें तो : 'अब तक मिले परिणामों की अपूर्णता से हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं है; ऐसी स्थिति में घुटने नहीं टेकने चाहिए बल्कि नए प्रयास किए जाने चाहिए...इससे वैज्ञानिाक श्रम में निरंतरता बनी रहेगी...निरंतरता जो प्रगति का आधार है।
( एमिल दुर्खीम की किताब- आत्महत्या की भूमिका)

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

जॉर्ज सिंपसन- उसने अपनी जान क्यों ली ? - 3-

     हालांकि मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञान का यह मानना है कि आचरण के उसके व्याख्याकारी सिध्दांतों के बीच ऐसे उपकरण हैं जिनसे आत्महत्या के कारणों का पता लगाया जा सकता है लेकिन अनुभवजन्य आंकड़ों या सत्यापित सिध्दांतों के निष्कर्षों के आधार पर वह कोई भी पक्की कारणवैज्ञानिक अवधारणा तय नहीं करना चाहता। जिलबुर्ग ने लिखा है : '...स्पष्ट है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आत्महत्या की समस्या आज भी अनसुलझी है। न तो सामान्य समझ और न नैदानिक और न मनोविकृति विज्ञान इसका कारण कार्यात्मक या अनुभवात्मक समाधान खोज पाया है।'
1918 में विएना में एक मनोविश्लेषक विचारगोष्ठी में सिगमंड फ्रायड ने चर्चा का सारांश इस प्रकार प्रस्तुत किया : 'इस चर्चा से बहुत मूल्यवान सामग्री मिली है, लेकिन हम किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाए हैं...हमें तब तक कोई मत तय करने से बचना चाहिए जब तक अनुभव इस समस्या का हल नहीं निकाल देता।' इसके बाद से फ्रायड, जिलबुर्ग, अब्राहम, मैनिंगर, ब्रिल और अन्यों सहित विशेषज्ञ और अत्यधिक प्रशिक्षित मनोविश्लेषकों ने आत्महत्या पर काम किया है।
यहां एक प्रणालीवैज्ञानिक बाधा का उल्लेख किया जाना चाहिए। इस समय इस बाधा पर पूरा नियंत्रण पा लेना असंभव है। जब तक आत्महत्या करने वाले व्यक्ति की और लंबी मनोविकृति जांच (पूर्ण और प्रचुर जीवनवृत्त अभिलेख के साथ मनोविश्लेषण या नैदानिक अध्ययन द्वारा) नहीं कर ली जाती तब तक उसकी आत्महत्या की व्याख्या और वर्गीकरण उसके मरने के बाद उसके जीवनवृत्त का फिर से निर्माण मात्र कहा जाएगा। यह बहुत मुश्किल और अधिकांश मामलों में असंभव काम है। बहुत उत्साही मत संग्रहक या रवैया परीक्षक आत्महत्या संबंधी इंटरव्यू नहीं कर सकते और जनसंख्या के प्रतिनिधिक नमूनों का केवल इस पूर्वाभासी आधार पर अन्वेषण नहीं कर सकते कि नमूने में शामिल कुछ लोग आत्महत्या करेंगे।
इस बाधा पर कुछ हद तक मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञानियों ने काबू पाया है जिन्होंने उन मरीजों के रिकार्ड की बात फिर से जांच की जिनका इलाज या जांच चल रही थी और जिन्होंने तब या बाद में आत्महत्या की, या उन मरीजों के रिकार्ड की जिन्होंने आत्महत्या का असफल प्रयास किया या जिन्होंने इलाज के दौरान इसका विचार बनाया। संस्थागत मामलों के निकट से अध्ययन द्वारा जिलबुर्ग ने इस समस्या से स्वयं को जोड़ा। अत: उसके निष्कर्षों को इस बारे में मनोविश्लेषक विकृति विज्ञान के निश्चयात्मक कथन का सूचक माना जा सकता है। उसका निष्कर्ष था कि आत्महत्या उन लोगों ने की जो अवसादक मनोविकृति, तंत्रिका रोग, खंडित मनस्कता से पीड़ित थे। अंतत: उसने यह निष्कर्ष निकाला 'जाहिर तौर पर मनोविकृति विज्ञान में ऐसी कोई नैदानिक हस्ती नहीं है जो आत्महत्या प्रवृत्ति से मुक्त हो।' जिलबुर्ग के अनुसार, 'आत्महत्या एक विकासात्मक स्वरूप की प्रतिक्रिया है जो सभी प्रकार के मानसिक रोगियों और संभवत: तथाकथित सामान्य व्यक्तियों में सभी जगह और आम तौर पर पाई जाती है।' उसका विचार है कि 'आगे मनोविश्लेषक अध्ययनों ... से आंकड़ों का सांख्यिकीय सरणियन किया जा सकेगा और आत्महत्या के चिकित्सीय प्रकार का पता लगाया जा सकेगा और उसका पुष्टीकरण किया जा सकेगा।'
लेकिन मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञान के सिध्दांतों से हमें आत्महत्या से संबंधित रोग हेतु विज्ञानिक नियमों का पता चलता है। इस बारे में एक बुनियादी स्थापना यह है कि आत्महत्या प्रेरणा संबंधी मनोविश्लेषक खोजों को आत्महत्या की सामाजिक स्थितियों से जोड़ना इस विषय पर हमारे ज्ञान में प्रगति का सर्वाधिक फलदायक तरीका है। इस स्थापना से कई उपस्थापनाएं की जा सकती हैं।
इस तरह की स्थापनाओं तक पहुंचने के लिए हमें दार्शनिकों के उपदेशात्मक और अटकलबाजीपूर्ण विचारों से बचना होगा। विलियम जेम्स ने अपने निबंध 'इज लाइफ वर्थ लिडिंग?' में महत्वपूर्ण अस्तित्व की जो बात की है न तो वह और न ही अपने नैतिक प्रबंधों में आत्महत्या को नैतिक नियमों का उल्लंघन बताने वाले इम्मेनुअल कांट के विचार आधुनिक वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुरूप हैं। मानव जीवन में आत्महत्या द्वारा तबाही को कम करने के लिए उसकी सचाई से नफरत करना काफी नहीं। आत्महत्या करने के व्यक्ति के अधिकार की पैरवी करने वाले डेविड ह्यूम और जीवनेच्छा के त्याग के साथ आत्महंता की संगति की बात करने वाले शॉपेनहॉर हमारी वैज्ञानिक जानकारी में वृध्दि नहीं करते हैं। मानवों को आत्महत्या करने का सामाजिक या दार्शनिक अधिकार है, इस घोषणा से हमें यह पता नहीं चलता कि वे आत्महत्या क्यों करते हैं। और जब तक हमें यह पता नहीं चलेगा कि वे ऐसा क्यों करते हैं तब तक चाहे हम जेम्स और कांट की तरह इसकी निंदा करते रहें या ह्यूम और शॉपेनहॉर की तरह उसकी पैरवी करते रहें हम उस पर नियंत्रण नहीं पा सकते।
मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञान के नजरिए से कहा जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति में आत्महत्या की संभावना, खुद को मारने की प्रवृत्ति रहती है जिसकी तीव्रता अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होती है। निश्चित रूप में इस तीव्रता को मनोमितिकों ने कभी नहीं मापा और इसे मापने में दिक्कत स्पष्ट रूप में बहुत ज्यादा है। इस संभावना की तीव्रता की मात्रा यह मत करो, दूध छुड़ाई, यौन शिक्षा, बच्चों में वैमनस्य, माता-पिता द्वारा अस्वीकृति या अतिस्वीकृति और पर-निर्भरता के रूप में पारिवारिक वातावरण के कारण व्यक्ति में भय, चिंता, कुंठा, प्रेम और नफरत द्वारा शैशवकाल और प्रारंभिक बचपन में ही तय हो जाती है। जिन मामलों में मां के अत्यधिक प्रेम, पिता द्वारा तिरस्कार, भाई-बहन द्वारा प्रेरित हीनता के कारण व्यक्ति समाज के रिवाजों और लोकप्रथा के अनुरूप वयस्क जीवन के लिए तैयार नहीं हो पाता, वहां व्यक्ति में आत्महत्या की संभावना अधिक हो सकती है। दूसरे छोर पर ऐसा व्यक्ति है जिसके पालन-पोषण ने बुनियादी मानसिक विन्यास को कार्य गतिविधियों या अन्य गतिविधियों की ओर मोड़ दिया है, वहां व्यक्ति में आत्महत्या की संभावना बहुत कम होती है। लेकिन यह संभावना कितनी भी कम हो वयस्क जीवन की तकलीफें, मुसीबतें और कष्ट उसे इतना बढ़ा सकते हैं कि आत्महत्या एक निश्चित संभावना बन जाती है। आत्महत्या अहं का प्रकटीकरण है हालांकि यह अहं का ही विध्वंस है। यह अहं को पहुंचाई गई पीड़ा है जो अपराध के लिए क्षतिपूर्ति या चिंता से राहत के नाते मुक्ति का एकमात्र रूप हो सकती है, 'आनंद के सिध्दांत से आगे' की बात।
इस प्रकार मनोभाव आचरण की सरल विशेषताएं नहीं हैं जिनकी तत्काल स्थिति के अनुसार व्याख्या की जा सके। इनका व्यक्ति के जीवनवृत्त से ताल्लुक होता है। विषाद, दु:ख या ऐसी ही अन्य कोई अवस्था जिसका वर्णन दुर्खीम ने सामाजिक कारणों के आधार पर आत्महत्या के रूपात्मक वर्गीकरण के समय किया है, आत्महत्या के क्षण की अवस्था नहीं है। व्यक्ति में उनका लंबा इतिहास होता है और उसे आत्महत्या की ओर ले जाने वाला कोई तत्काल उद्दीपक प्रतीत हो सकता है। लेकिन इस तरह के उद्दीपक की परिणति तब तक आत्महत्या में नहीं हो सकती है, जब तक कि इसमें कार्य करने वाला आचरण पैटर्न से ही मौजूद न हो। सभी मानव कुंठा और निग्रह, पापबोध और चिंता की प्रक्रिया से गुजरते हैं। अत: एक निश्चित भावनात्मक दबाव में परिणति आत्महत्या में हो सकती है। कुछ व्यक्ति इस मार्ग को चुनते हैं। इसलिए जो व्यक्ति इस मार्ग को नहीं चुनते हैं उनमें चल रही इस प्रक्रिया की दुर्बलता की तुलना में आत्महंतक लोगों में चल रही प्रक्रिया की सघनता की जांच जरूरी है।
आज मनोविश्लेषकों के बीच सर्वाधिक स्वीकार किया जाने वाला विचार यह है कि आत्महत्या अधिकांशत: 'विस्थापन' है अर्थात जिसने व्यक्ति को बाधित किया है उसे मारने की इच्छा का शिकार वह व्यक्ति स्वयं बन जाता है या तकनीकी रूप में इस बात को इस तरह कहा जा सकता है : आत्महंता इंट्रोजेक्टेड पात्र की हत्या करता है और पात्र को मारने की इच्छा से उत्पन्न पापबोध का प्रायश्चित करता है। अहं की संतुष्टि हो जाती है और पराहं आत्महत्या द्वारा प्रशमित होता है।
आत्महत्या में प्रकट सभी मनोभावों की व्याख्या व्यक्ति के जीवनवृत्त, विशेष रूप में परिवार के जरिए बुनियादी मनोविन्यास के प्रवाह के संदर्भ में की जा सकती है। इस प्रकार दुर्खीम जिसे असंभव समझते थे वह संभव हो सकता है अर्थात आत्महत्याओं को प्रेरणाओं के आधार पर और बकौल उनके रूपात्मक वर्गीकरण किया जा सकता है। आत्महत्या के मनोभाव साइकोजेनिक होते हैं और साथ ही एक पाश्र्विक होते हैं क्योंकि मनोभाव संरचना की आधारशिला शैशव और बचपन में ही रख दी जाती है। ऐसा कहा गया है कि व्यक्ति आचरण को निर्धारित ही नहीं बल्कि अत्यधिक निर्धारित माना जाना चाहिए क्योंकि प्रारंभिक वर्षों के दौरान भावात्मक जीवन की मूल संरचना पर नियंत्रण पाना अपेक्षाकृत कठिन है। यह मान्यता कि आचरण अति निर्धारित है एक ऐसी स्थिति का प्रमाण हो सकती है जहां बुध्दि उसे दूसरी दिशा में ले जा सकती है।
आत्महत्यात्मक आचरण वह आचरण है जिसे दूसरी दिशा में नहीं ले जाया गया है। पुराने मनो वैज्ञानिक जख्मों और कुंठाओं का फिर से उफान जीवन के मौजूदा और भावी अर्पण से भारी पड़ जाता है। लेकिन यह अन्वेषण जरूरी है कि यह उफान किस वजह से आता है। हां, अगर यह तर्क हो कि व्यक्ति के लिए जीवन में चाहे जितना कुछ हो उसकी आत्महत्या की संभावना इतनी प्रबल है कि उसे देर-सबेर कामयाबी मिलेगी ही तो इस तरह के अन्वेषण की जरूरत नहीं है। इस प्रकार मृत्यु संवेग को जीतने के लिए व्यक्ति के संघर्ष को परिवार और क्लास रूप के जरिए शैशवावस्था या बचपन में जीती गई या अंशत: अथवा पूर्णत: हारी गई लड़ाई के रूप में देखा जा सकता है; या जो क्लिनिक अथवा विश्लेषण कक्ष में फिर से लड़ी जाती है जिसकी परिणति एक नए गतिरोध अथवा विजय में होती है।
इस बिंदु पर पहुंचकर मनोविश्लेषक मनोविकृति विज्ञान इस मुद्दे को सामाजिक क्षेत्र में ले जाने में विफल हो जाता है। इस विफलता का बुनियादी कारण मनोविश्लेषण का थैरेपी अर्थात मानसिक बीमारी के इलाज को अधिक महत्व देना है। जाहिर है कि इस तरह की थैरेपी वैयक्तिक होती है जिसमें व्यक्ति को अपनी अवचेतन इच्छाओं और आकांक्षाओं को पहचानना पड़ता है और यह देखना पड़ता है कि वे किस तरह से कुंठित हुईं और किस तरह से उनका दमन हुआ और इसने व्यक्ति को कितना मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचाया। विश्लेषण कक्ष में 'मुक्त साहचर्य' (कई बार यह काम क्लिनिक में भी संभव है जब गहराई से विश्लेषण जरूरी न हो) के जरिए इस पहचान से व्यक्ति को पता चलता है कि वह इस तरह से आचरण क्यों कर रहा है। इससे वह तंत्रिका रोग सघनता के दायरे में अपने आचरण को नए चैनलों में मोड़ पाता है।
इस प्रकार थैरेपी आवश्यक तौर पर वैयक्तिक होती है और व्यक्ति को अपने आचरण के प्रेरणा तत्व को इकट्ठा करके सामने रखना होता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि तंत्रिका रोग में सामाजिक तत्व कारण के रूप में मौजूद नहीं रहता। तथाकथित सामान्य व्यक्ति द्वारा की गई आत्महत्या में हमेशा गंभीर तंत्रिका रोगी तत्व मौजूद रहते हैं और उनका इलाज वैयक्तिक तत्व के रूप में ही किया जाना चाहिए लेकिन उसके कारण व्यक्ति के सामाजिक जीवनवृत्त में गहरे छिपे हो सकते हैं।
सामाजिक अनुसंधान के लिए बुनियादी समस्या व्यक्ति आत्महंतकों और इसके लिए प्रयास करने वालों के जीवनवृत्त को समाजविज्ञानिक चरों के साथ जोड़ना होना चाहिए और यह इस परिकल्पना के साथ कि निश्चित सामाजिक वातावरण आत्महत्या की संभावना को (1) प्रेरित कर सकता है या (2) कायम रख सकता है या (3) उसे बदतर किया जा सकता है। यदि हम आंकड़ों के आधार पर दिखा सकें कि कुछ सामाजिक परिस्थितियां आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास को प्रेरित करती हैं, कायम रखती हैं या बदतर बनाती हैं तो हम इनके घटित होने के बारे में सामान्य नियम बना सकते हैं।
दुर्खीम की दलील थी कि आत्महत्याओं में व्यक्ति व्यवहार के प्रकारों के बारे में निश्चित होकर ही हम सामाजिक तत्व के रूप में आत्महत्या का रोग हेतु विज्ञानिक विश्लेषण नहीं कर सकते। दुर्खीम में मनोविज्ञानिक निष्कर्षों के इस्तेमाल की अथक क्षमता थी और अब हम अच्छी तरह से समझ सकते हैं और उनके काम में इस तरह की मिसाल हैं कि वह अपने समाजविज्ञानिक विश्लेषण की मनोविश्लेषण के साथ संगति बिठाने का प्रयास करते थे।
नीचे आज अनुसंधान के लिए कुछ परिकल्पनाएं दी गई हैं। इन परिकल्पनाओं की आधारभूत बड़ी बुनियादी परिकल्पना यह है कि आत्महत्यात्मक आचरण सहज मनोवैज्ञानिक आवेग और सामाजिक प्रपात का योग है।
आंकड़े एकत्रित करने की समस्या : हमें समरूप नमूने प्राप्त करने की संभावना का पता लगाना चाहिए ताकि एक जैसी सामाजिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की तुलना की जा सके। उनके बीच जो आत्महत्या करते हैं और जो नहीं करते हैं। यहां बहुत पेचीदा प्रणालीविज्ञानिक समस्या उभर कर सामने आती है और वह यह कि भावात्मक स्तर पर सामाजिक पृष्ठभूमि की क्या कोई पहचान है। जब तक हमारे पास सभी का सुलभ, सही और मेहनत के साथ दर्ज किया गया मनोविकृति संबंधी जीवनवृत्त नहीं होगा तब तक हम आत्महत्या के बारे में विश्वसनीय आंकड़े एकत्रित नहीं कर सकते। इसके लिए जीवनकाल के शुरू से ही व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करने वाले अंतरंग पारिवारिक जीवन को रिकार्ड करना जरूरी है।
परिवार के बारे में परिकल्पना : आत्महत्या का प्रयास करने वालों या आत्महत्या करने वालों का भावात्मक पैटर्न शैशव और प्रारंभिक बचपन में ही पारिवारिक संबंधों द्वारा निर्धारित हो जाता है। परिवार में समाजीकरण सभी के लिए कुंठा का स्रोत है। इसलिए आत्महत्या सब के लिए संभावित छुटकारा मार्ग है। आत्महत्या से जुड़े बाद के सामाजिक कारकों और प्रारंभिक भावात्मक बनावट के बीच संबंध खोजना जरूरी है।
इसके अलावा आत्महंतकों और आत्महत्या का प्रयास करने वालों के जीवनवृत्तों और उनके परिवार पालन-पोषण स्वरूप जैसे कि प्रजाति समूह, धार्मिक संबध्दता, आय समूह, परिवार आकार, परिवार में व्यक्ति आत्महंतक के स्थान, शिक्षा स्तर के बीच अंत:संबंध स्थापित करना जरूरी है।(क्रमशः)

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मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...