संदेश

April, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हिटलर की पराजय का महाकाव्य

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आज के दिन सोवियत कम्युनिस्टों ,लाल सेना और सोवियत जनता की कुर्बानियों के कारण हिटलर को पराजित करने सफलता मिली। हिटलर और उसकी बर्बर सेना को परास्त करके कम्युनिस्टों ने दुनिया की महान सेवा की । आज के दिन का संदेश है कि कम्युनिस्ट विश्व मानवता के सच्चे सेवक और संरक्षक हैं। बर्लिन आपरेशन के दौरान सोवियत सेनाओं ने शत्रु की 70 इंफेंट्री 12टैंक और 11मोटराइज्ड डिविजनों को नष्ट किया। 16 अप्रैल से 7 मई के बीच शत्रु के 4लाख 80 हजार सैनिकों और अफसरों को युद्धबंदी बनाया और डेढ़ हजार से अधिक टैंकों ,साढ़े 4 हजार विमानों और कोई 11हजार तोपों और मॉर्टरों पर कब्जा किया। सोवियत लोगों को भी फासिस्ट जर्मनी पर इस अंतिम विजय की भारी कीमत चुकानी पड़ी। 18 अप्रैल से 8 मई 1945 के बीच दूसरे बेलोरूसी मोर्चों और पहले उक्रइनी मोर्चे पर 3लाख आदमी हताहत हुए। इसके विपरीत आंग्ल-अमरीकी फौजों ने पश्चिमी यूरोप में 1945 की सारी अवधि में केवल 2लाख 60 हजार आदमी गंवाये थे। लालसेना के बर्लिन आपरेशन का सबसे मुख्य परिणाम था फासिस्ट जर्मनी का बिनाशर्त आत्मसमर्पण और यूरोप से युद्ध का अंत।बर्लिन आपरेशन की सफल परिणति का अर्थ था हिटलरी…

बंगारू लक्ष्मण की सजा से उठे सवाल

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भाजपा के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को सीबीआई की अदालत ने हथियार खरीद फेक सौदे में घूस लेने के आरोप में 4साल के सश्रम कारावास की 28 अप्रैल 2012 को सजा सुनाकर कई महत्वपूर्ण परिवर्तनों के संकेत दिए हैं। पहली बात यह कि इस मामले ने न्याय का आधार बदल दिया है। हथियारों की वास्तविक खरीद में घूसखोरी में आज तक कोई पकड़ा नहीं गया और न किसी को सजा हुई है ,लेकिन हथियार खरीद के फेक मामले में घूसखोरी पकड़ी गयी और सजा भी हो गई।      बोफोर्स में दलाली और घूस दोनों दी गयीं,25साल से ज्यादा समय यह मुकदमा देश-विदेश के अनेक अदालतों में खाक छान चुका है ,और अंत में दोषी लोग अभी तक सीना फुलाए घूम रहे हैं। इसका अर्थ यह है न्यायालयों में सच के लिए न्याय की संभावनाएं घट गयी हैं।      बोफोर्स के मामले में सभी प्रामाणिक सबूत होने के बावजूद दोषी व्यक्ति को सारी दुनिया की पुलिस नहीं पकड़ पायी। यहां तक कि सीबीआई स्वयं यह मामला हार गयी,आयरनी देखिए बंगारू के मामले में सीबीआई अदालत में जजमेंट आता है और बंगारू दोषी पाए जाते हैं।        सवाल उठता है कि बंगारू लक्ष्मण ने यदि सच में किसी हथियार बनाने वाली कंपनी के लिए घूस …

अमेरिकी पूंजी ,अशोक वाजपेयी और आलोचना का अवमूल्यन

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भारत में जब से फोर्ड फाउंडेशन जैसी अमेरिकी संस्थाओं का कला,साहित्य,संस्कृति,सिक्षा आदि में पैसा आना आरंभ हुआ है उसके बाद तेजी से आलोचना और अकादमिक अवमूल्यन आरंभ हुआ है। हिन्दी आलोचना और साहित्य में अमेरिकी हस्तक्षेप कोई नयी चीज नहीं है। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के हिन्दी में आगमन के साथ यह सिलसिला 1951-52 के आसपास से आरंभ होता है।भारत भवन में फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से अशोक वाजपेयी एंड कंपनी का वैभव नई बुलंदियों को प्राप्त करता है।    कांग्रेस का और खासकर स्व.अर्जुनसिंह का अक्षम्य सांस्कृतिक अपराध यह है कि इन लोगों ने भारत के शिक्षा संस्थानों और संस्कृति केन्द्रों के द्वार अमेरिकी संस्थाओं और फाउण्डेशनों के लिए खोल दिए।आज संस्कृति और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की पूंजी का कृषि से लेकर संस्कृति तक व्यापक नेटवर्क फैला हुआ है। खासकर कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर स्पीकमैके जैसी संस्थाओं, अकादमिक फैलोशिप से लेकर लाइब्रेरी तक यह नेटवर्क काम कर रहा है। अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की व्यापक भूमिका को विस्तार देने में स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका रही है। इन सं…

स्त्री संस्कृति का जादुई संसार

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हजारों सालों बाद आज भीऔरत एक पहेली बनी हुई है। उसका शरीर,आचार, विचार, संभोग,जादू-टोना,प्रेम आदि सभी के बारे में पंडितों में भयानक भ्रम बना हुआ है। हमारे भक्ति आंदोलन के विचारकों में एक हैं पुरूषोत्तम अग्रवाल उन्होंने अपनी किताब में कबीर के साहित्य में ‘शाश्वत स्त्रीत्व’ की खोज की है। सच यह है शाश्वत स्त्रीत्व जैसी कोई चीज नहीं होती। वे शाश्वत स्त्री की धारणा के आधार पर पुंसवादी तर्कों का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। इसी तरह हमारे और भी अनेक विद्वान दोस्त हैं जो आए दिन औरतों के धार्मिक व्रत ,उपवास,पूजा-उपासना आदि को लेकर फब्तियां कसते रहते हैं कि औरतें तो स्वभावतः धार्मिक होती हैं,पिछड़ी होती हैं।      ऐतिहासिक तौर पर देखे तो स्त्री उत्पादक शक्ति है। वह कृषि की जनक है। मानव सभ्यता के इतिहास में उसे कृषि उत्पादक के रूप में जाना जाता है। पुरानी मान्यता है कृषि कार्यों की पुरूष के पौरूष पर निर्भरता कम है ईश्वर पर निर्भरता ज्यादा है। कृषि के लिए वेदों में जितने मंत्र हैं उतने किसी अन्य कार्य के लिए नहीं हैं। भारत में जनजातियों के अनेक तीज-त्यौहारों का कृषि जीवन से गहरा संबंध है।     यह एक ऐतिहासि…

विचारधारा का कम्युनिकेशन में अवमूल्यन है फेसबुक

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फेसबुक के 85 करोड़ यूजर हैं और इसने पिछले साल 3.7 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया है। कंपनी का मानना है कि वह आगामी दिनों में बाजार से 5बिलियन डॉलर शेयर बेचकर उठाएगी। इस कंपनी की हैसियत 100 बिलियन से ऊपर आंकी जा रही है। फेसबुक महज एक कंपनी नहीं है वह नए युग की कम्युनिकेशन, सभ्यता-संस्कृति की रचयिता भी है। यह बेवदुनिया की पहली कंपनी है जिसके एक माह में 1 ट्रिलियन पन्ने पढ़े जाते हैं। प्रतिदिन फेसबुक पर 2.7बिलियन लाइक कमेंटस आते हैं। किसी भी कम्युनिकेशन कंपनी को इस तरह सफलता नहीं मिली ,यही वजह है कि फेसबुक परवर्ती पूंजीवाद की संस्कृति निर्माता है। वह महज कंपनी नहीं है। गूगल के सह-संस्थापक सिर्गेयी ब्रीन ने इंटरनेट के भविष्य को लेकर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। इंटरनेट की अभिव्यक्ति की आजादी को अमेरिका और दूसरे देशों में जिस तरह कानूनी बंदिशों में बांधा जा रहा है उससे मुक्त अभिव्यक्ति के इस माध्यम का मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा। फेसबुक पर यदि कोई यूजर कहीं से सामग्री ले रहा है और उसे पुनः प्रस्तुत करता है और अपने स्रोत को नहीं बताता तो इससे नाराज नहीं होना चाहिए। यूजर ने जो लिखा है वह उसके विचारधा…

नव्यउदार पूंजीवाद के नए ढिंढोरची अशोक वाजपेयी

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हिन्दी आलोचना में नव्यउदार पूंजीवादी चारणों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो रह-रहकर अशोक वाजपेयी याद आते हैं। इन जनाव की भजनमंडली में ऐसे 2 दर्जन लेखक हैं। अशोक वाजपेयी की शिक्षा-दीक्षा अव्वल दर्जे की रही है,सरकारी पद भी अव्वल रहे हैं ,उनके पास चमचे भी अव्वलदर्जे के रहे हैं , हिन्दी के अव्वल अखबार में वे नियमित कॉलम भी लिखते हैं। देश के अव्वल कांग्रेसी नेताओं का उन पर वरदहस्त रहा है। पूंजीवादी विनयपत्रिका भी वे अव्वल लिखते हैं।     अशोक वाजपेयी की खूबी है कि वे अपने पूंजीवादी नजरिए से एकदम टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। इन जनाव की खूबी है कि ये हर विषय के ज्ञानी हैं और जब भी जैसे मौका मिलता है सुंदर-असुंदर दोनों किस्म का लिखते हैं। इधर उन्होंने जनसत्ता में अपने कॉलम में मार्क्सवाद पर एक अज्ञान से भरी टिप्पणी लिखी है,जिसे पढ़कर सिर्फ एक ही बात कहने की इच्छा होती है कि इस तरह की बेसिर-पैर की बातें हिन्दी में ही छप सकती हैं और जनसत्ता जैसा अखबार ही छाप सकता है। इस अखबार का संपादकीय स्तर कितना गिर चुका है इससे यह भी पता चलता है।      अशोक वाजपेयी और उनके जैसे लोग और जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठान…

पूंजीवादी अंधविश्वास और प्रौपेगैण्डा का संगम हैं निर्मल बाबा

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निर्मल बाबा के टीवी विज्ञापनों और बेशुमार सालाना आमदनी की लेकर हठात मीडिया ने ध्यान खींचा है। मीडिया में चल रही बहस के दो आयाम हैं, पहला, मीडिया का एक वर्ग निर्मल बाबा के धर्म के धंधे की आलोचना कर रहा है और उन्होंने जो दौलत कमाई है उसके अन्य कामों में इस्तेमाल करने पर आपत्ति कर रहा है।  धर्म के धंधे में आमदनी है,साथ ही धर्म की आय का अन्य कामों में इस्तेमाल होना भी आम बात है।    मीडिया में चल रही बहस का एक दूसरा आयाम है बाबा के चमत्कारों की आलोचना का। बाबा का इन दोनों के संदर्भ में कहना है कि वे वैध ढ़ंग से कमाई कर रहे हैं, वे करदाता है ,उनके यहां दौलत के आय-व्यय को लेकर पारदर्शिता है, और जो कुछ भी वे खरीदते हैं उसका पेमेण्ट चैक से करते हैं।       बाबा का यह भी कहना है उन्होंने कभी चमत्कार की बात नहीं की। उन्होंने  कभी अंधविश्वासों का प्रचार नहीं किया, वे तो मात्र भगवान की कृपा बांट रहे हैं। धर्म की अमीरी -        निर्मल बाबा की अमीरी की झलक लेने के पहले कुछ बातें दौलत के तर्कशास्त्र पर कहना चाहेंगे। लोकतंत्र में सबको धन कमाने का हक है यहां तक कि भगवान को भी धन कमाने का हक है। दौलत कमाना …