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November, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आम्बेडकर ने दूसरी शादी क्यों की ?

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भारत के संविधान की कच्ची रुपरेखा तैयार करने के बाद बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर की तबियत अचानक खराब हो गयी,वे लंबे समय से विश्राम की जरुरत महसूस कर रहे थे लेकिन उनको विश्राम नहीं मिल रहा था।उस समय इलाज के लिए वे बम्बई आए।बुढ़ापे में अपनी देखभाल करने के लिए उनको साथी चाहिए था।जिस अस्पताल में वे इलाज के लिए गए वहां पर कुमारी शारदा कबीर नाम की  महिला काम कर रही थी। उनका व्यवहार और बातचीत आम्बेडकर को पसंद आए और उन्होंने आपसी सहमति से शादी का फैसला ले लिया।

आम्बेडकर को अगस्त1947 से उनको नींद आनी बंद हो गयी थी।एक पत्र में उन्होने लिखा कि उनको 15दिनों से नींद नहीं आ रही।उन पर किसी औषधि का असर नहीं हो रहा। उसी पीड़ा के दौरान उन्होंने सहयोगी के रुप में शारदा कबीर से दूसरी शादी का निर्णय लिय़ा था। अपने मित्र कमलाकांत और भाऊराव गायकवाड को पत्र लिखकर अपने फैसले से अवगत कराया।भाऊराव गायकवाड़ को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा “पहली पत्नी के निधन के उपरान्त पुनःविवाह न करने का मैंने निर्णय किया था। किन्तु अब दूसरा विवाह करने का मैंने निर्णय किया है।जो सुगृहिणी होकर वैद्यकशास्त्र में प्रवीण है,ऐसी पत्नी क…

आम्बेडकर की पत्नी निष्ठा -

आम्बेडकर की पहली शादी के बारे में धनंजय कीर ने लिखा है “शादी के समय भीमराव की आयु सत्रह वर्ष की थी।लड़की की आयु नौ वर्ष की थी।लड़की का ससुराल का नाम रमाबाई रखा गया।लड़की उम्र में छोटी लेकिन स्वभाव से शांत और सुस्वभावी थी।वह गरीब लेकिन सदाचारी घराने की थी।वह अपने पिता की कनिष्ठ लड़की थी। उसके पिता का नाम भिकू धत्रे था।दाभोल के समीप स्थित वनंद गाँव का वह निवासी था। वह दाभोल बंदरगाह में कुली का काम करता था। लड़की के बचपन में ही माँ-बाप चल बसे थे। उसका और उसके भाई-बहनों का पालन-पोषण उनकी चाची और मामा ने किया था।” रमाबाई स्वभाव से सहृदय और कर्तव्यदक्ष थी।वे लंबे समय तक बीमार रहीं और लंबी बीमारी के बाद उनका 27मई1935 को निधन हो गया।      धनंजय कीर ने लिखा है कि पत्नी के स्वास्थ्य में सुधार हो इसलिए बाबासाहब ने काफी प्रयास किए,लेकिन उनको कोई दवा नहीं लगी। “ वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक समय में उन पर भुखमरी,शारीरिक कष्ट,दुःख और दरिद्रता की जो घटनाएं गुजरी थीं,उनका मुकाबला उन्होंने अपने जन्मजात मनोबल से किया”, “जीवन का अधिकतर समय उस साध्वी ने असह्य दरिद्रता ,पति की सुरक्षा के बारे में लगने वाली…

धर्मनिरपेक्षता,धर्म की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र

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संसद में इन दिनों भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर दो दिवसीय बहस हो रही है, इस बहस ने संविधान के सवालों को नए सिरे उठा दिया है।खासकर “धर्मनिरपेक्षता” के सवाल को प्रमुख सवाल बनाकर खड़ा कर दिया है। सत्ताधारी भाजपा को “धर्मनिरपेक्षता” को लेकर पहले से आपत्तियां थीं,लेकिन पहले वे कभी-कभार बोलते थे, लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद वे बार-बार “सेकुलर” शब्द पर आपत्ति कर रहे हैं,उसके खिलाफ घृणा अभियान चलाए हुए हैं, लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने सबसे घटिया ढ़ंग से “धर्मनिरपेक्षता” पर हमला किया।

हाल ही में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भीमराव आम्बेडकर के 125वें जन्मदिन के मौके पर संसद में चल रही बहस में भी “धर्मनिरपेक्षता” को निशाना बनाया, प्रधानमंत्री तो” सेकुलर “ शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करते। यही वह संदर्भ है जिसमें संविधान निर्माण के समय “धर्मनिरपेक्षता” पर चली बहस के कुछ पहलुओं का नए सिरे से मूल्यांकन करना बेहद जरुरी है।संविधान के प्रति प्रतिबद्धता जताने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है “देश में 'सेक्युलर' शब्द का सबसे ज़्यादा दुरु…

वर्चुअल नायक की औसत वाणी

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आज मैं यू-ट्यूब के कारण पीएम नरेन्द्र मोदी का संसद में कल दिया गया भाषण सुन पाया। उदयप्रकाश जैसे प्रखर लेखक की राय उनके भाषण की प्रशंसा में पढ़ चुका था इसलिए और भी उत्सुकता थी कि आखिर मोदी ने ऐसा क्या कहा जिसने उदयप्रकाश जैसे लेखक को प्रभावित कर लिया,मुग्ध कर लिया। पहली बात यह कि पीएम मोदी को अपने भाषण में कांग्रेस और उसके नेताओं की भूमिका का नाम लेकर जिक्र करने से परेशानी हो रही थी,उन्होंने अपनी संघी परंपरा का निर्वाह करते हुए संविधान निर्माण में एक भी बार पंडित नेहरु या कांग्रेस पार्टी का नामोल्लेख तक नहीं किया।

पीएम मोदी के लिए संविधान का असल में क्या अर्थ है यह तो वे ही जानें लेकिन यदि उनके कल के भाषण में जो कहा गया है वह यदि संविधान का अर्थ है तो हम विनम्रतापूर्वक कहना चाहते हैं कि पीएम ने हमें निराश किया है।वे संविधान के मर्म को समझ नहीं पाए हैं,दूसरी बात यह कि जिस व्यक्ति ने भी पीएम का भाषण लिखा था उसे कम से कम अच्छा भाषण लिखना नहीं आता।

पीएम मोदी ने अपने भाषण में “सरलीकरण” और “सामूहिकीकरण” के भाषिक पदबंधों का असल मंतव्य पर पर्दा डालने के लिए कौशलपूर्ण ढ़ंग से इस्ते…

आओ मोदी हम ढोएंगे पालकी

पीएम नरेन्द्र मोदी के कल संसद में दिए भाषण पर लेखक उदयप्रकाश की फेसबुक टिप्पणी पढ़कर बेहद शर्मिंदगी का एहसास हुआ। यह कैसा समय है जिसमें लेखक टुकड़ों में देखता है,भाषिक अंशों में देखता है,राजनीति और विचारधारा के बिना देखता है। निश्चित रुप से यह लेखकों के लिए बहुत संकट की घड़ी है। कल का मोदीजी का भाषण न तो ऐतिहासिक था और बेजोड़ था। उदयप्रकाश के राजनीतिक नजरिए पर फेसबुक पर बहुत बहस होती रही है लेकिन उनकी ताजा फेसबुक टिप्पणी ने एक बात जरुर संप्रेषित कर दी है कि हमारे लेखकों के पास फासिज्म के खिलाफ जंग करने की कोई न तो दीर्घकालिक समझ है और न सही विवेक ही है।

उदयप्रकाश ने क्या कहा पहले वह ध्यान से पढ़ें-

“आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का संसद में संविधान पर दिया गया भाषण किसी ऐतिहासिक अभिलेख की, किसी महत्वपूर्ण राजकीय दस्तावेज़ की तरह महत्वपूर्ण है। इतना लोकतांत्रिक, समावेशी, उदार और विनम्र संभाषण कम से कम इस प्रभावी शैली में मैंने अपने जीवन में नहीं सुना।
बिना किसी पूर्वाग्रह के अपने पूर्ववर्ती राजनेताओं के योगदान को जिस पारदर्शिता के साथ उन्होंने स्वीकार किया, देश क…

आईएसआईएस और उसके सहयोगी राष्ट्र

सामान्य तौर पर मीडिया देखकर यही लगता है आईएस के आतंकियों का स्वायत्त नेटवर्क है और वे सच में पश्चिम के शत्रु हैं,लेकिन पिछले दिन रुस के राष्ट्रपति पुतिन ने आईएस के 40 मददगार देशों की सूची जारी करके साफ कर दिया कि आईएस के पीछे किन ताकतों का हाथ है। इराक में सद्दाम हुसैन के जुल्मों से इराकी जनता को निजात दिलाने और इराक जनसंहारक अस्त्रों के जखीरे को नष्ट करने के बहाने अमेरिका और नाटो संगठन ने इराक पर हमला किया उससे इराक में शांति तो नहीं लौटी,विनाशलीला और आईएस जैसे दानव का जन्म जरुर हुआ। आईएस को निर्मित करने में सऊदीअरब,अमेरिका,कतार,तुर्की,इस्रायल, ब्रिटेन और फ्रांस आदि देशों के नाम पुतिन ने अपनी सूची में प्रमाण सहित पेश किए हैं। आईएस के आतंकियों को तुर्की ,जोर्डन,कतार,इराक और सऊदी अरब से सीधे सैन्य मदद मिल रही है।हथियारों की अबाध सप्लाई का काम अमेरिकी प्रशासन कर रहा है। सीरिया युद्ध में जिस तरह आईएस उलझा हुआ है और नाटो सैन्य संगठन उनकी मदद कर रहा है उस समूची योजना को रुस के सैन्य अभियान ने पूरी तरह पंक्चर कर दिया है, आईएस के जरिए सीरिया के तेल कुओं पर नाटो देशों खासकर तुर्की ने कब्जा जम…

शब्दों के कातिल

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देश बहुत बुरे दौर में दाखिल हो चुका है,हमारे शासक और उनके भक्तगण असहिष्णु हो चुके हैं। उन्हें शब्द अच्छे नहीं लगते,वे खुलेआम कह रहे हैं “सेकुलरिज्म” का दुरुपयोग बंद करो।कल तक वे “सेकुलर” की आत्मा और शरीर पर हमले कर रहे थे,अब वे “धर्मनिरपेक्ष” शब्द के इस्तेमाल को बंद करने की मांग कर रहे हैं।मजेदार बात यह है कि राजनाथ सिंह के बोलते ही उनके फेसबुकगण “पंथ-निरपेक्षता” का नाम लेकर भाषाज्ञान कराने उतर पड़े हैं। इससे एक बात का पता तो चलता है कि “सेकुलरिज्म” को लेकर इनके अंदर किस कदर घृणा भरी हुई है।       समाज में शब्दों की हत्या जब होने लगती है तो समझो सत्ता और समाज असहिष्णु हो गया है।मनुष्य के नाते शब्द हमारे हैं और हम शब्दों के हैं।हमने कभी नहीं कहा कि फलां शब्द का इस्तेमाल न करो। सत्ता के शिखर से पहले किसी ने नहीं कहा कि देश में “सेकुलरिज्म” या “धर्मनिरपेक्ष” पदबंध का इस्तेमाल न करो । सत्ता के कर्ताओं की शब्दविशेष को लेकर घृणा पहलीबार नजर में आई है। यह पहलीबार हुआ है कि सत्ता ने शब्द को ललकारा है,एक ऐसे शब्द को ललकारा है जिसमें 125करोड़ लोगों की आत्मा निवास करती है।पहले यह कभी नहीं हु…

गुरु नानकदेव और उनकी विश्वदृष्टि

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संत गुरु नाननदेव मेरे सबसे प्रिय संत-कवि हैं। उनकी रचनाएं और जीवनशैली देखने के बाद नए किस्म के व्यक्ति और नए किस्म के मूल्यबोध की सृष्टि होती है। नानक उन संतों में हैं जिसने गाना गाकर सब कुछ पा लिया। गाना इतनी तल्लीनता के साथ गाया कि गान ही जीवन का सर्वस्व बन गया। पूरे मन-प्राण से गाने से उनको जो मिला वह अपने आपमें बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसलिए जो भी काम करें प्राण लगाकर करें तो सफलता जरुर मिलती है।प्राण लगाकर एक गीत गा दो सफलता मिलेगी।नाच लो सफलता मिलेगी,कक्षा पढाओ सफलता मिलेगी,भाषण दो तो लोग प्रशंसा करेंगे।

नानक की विश्वदृष्टि का मूलाधार है “जपुजी”,

आदि सचु जुगादि सचु

मंत्र:

इक ओंकार सतिनाम

करता पुरखु निरभउ निरवैर।

अकाल मूरित अजूनी सैभं गुरु प्रसाद।।

जपु:

आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

पउड़ी: 1

सोचे सोचि न होवई जे सोची लख बार।

चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिवतार।

भु.खया भुख न उतरी जे बंना पुरीआं भार।

सहस सियाणपा लख होहि, त इक न चले नालि।

किव सचियारा होइए, किव कूड़ै तुटै पालि।

हुकिम रजाई चलणा 'नानक' लिखिआ नालि।

अर्थात् -आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

'वह आदि …

संघ की राजनीति और फंड -

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आरएसएस और उसके सहयोगी संगठन और उनसे जुड़े साइबर बटुक एक बात में अमेरिकी एजेण्डे पर चल रहे हैं,अमेरिकी एजेण्डा है धर्मनिरपेक्षता को नष्ट करो,धार्मिक फंडामेंटलिज्म को मजबूत करो। इस एजेण्डे को संघियों ने कई दशकों से सचेत रुप से अपनाया हुआ है,वे दिन-रात धर्मनिरपेक्षता को गरियाते रहते हैं,धर्मनिरपेक्ष लेखकों-बुद्धिजीवियों -नेताओं और दलों पर कीचड़ उछालते रहते हैं। इन लोगों ने धर्मनिरपेक्षता को मीडिया उन्माद के जरिए छद्म धर्मनिरपेक्षता करार दे दिया है। वे संविधान वर्णित धर्मनिरपेक्षता को भी नहीं मानते,उसे भी वे हटाने की मुहिम चला रहे हैं। इस काम के लिए वे कारपोरेट फंडिंग के जरिए काम कर रहे हैं।
आरएसएस अकेला ऐसा संगठन है जिसके फंडिंग के स्रोत का पता नहीं है।यह ऐसा संगठन है जो केन्द्र सरकार से लेकर अनेक राज्य सरकारों को नियंत्रित किए है लेकिन फंडिंग का स्रोत नहीं बताता। यही दशा अनेक फंडामेंटलिस्ट संगठनों की भी है वे भी अपनी फंडिंग को उजागर नहीं करते।आरएसएस यदि देशभक्त संगठन है तो अपने फंडिंग के सभी स्रोत उसे उजागर करने चाहिए, उसे बताना चाहिए कि उसके यहां कहां से और किन स्रोतों से पैसा आता है औ…

हाय आमिर! हाय आमिर !!

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कल रात से साइबर बटुक आमिरखान को साइबर जगत से गायब कर देने के जुगत में लगे हैं,कोई कह रहा है उसकी फिल्म मत देखो,कोई कह रहा है उसके गाने मत सुनो,कोई कह रहा है उसका विज्ञापन मत सुनो,कोई कह रहा है उसे यू -ट्यूब से निकालो,कोई कह रहा है उस अखबार का बहिष्कार करो जिसमें उसके बयान छप रहे हैं,कोई कह रहा है वह टीवी चैनल मत देखो जिसमें आमिर का बयान दिखाया जा रहा है,कोई कह रहा है, याहू को कहो कि आमिर खान की ईमेल सुविधाएं काट दी जाएं,कोई कह रहा है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पर दवाब डालो की आमिर की सुरक्षा सुविधा हटा ली जाय।     यह स्नैपडील वाला छोकरा उसकी हिम्मत तो देखो बटुकों की सुन ही नहीं रहा है तो बटुकमस्तान दवाब डाल रहे हैं कि स्नैपडील वाले के यहां कोई नौकरी न करे,कोई मोदीभक्त सामान न खरीदे,जगह-जगह आमिर के पुतले जलाओ,आमिर को औकात का ज्ञान कराओ,असभ्यसंघ ने बटुकों से कहा है कि बटुकगण अपनी साइबर क्षमता,शैक्षणिक योग्यता और सभ्यता का आमिर विरोधी गंदी-गंदी पोस्ट लिखकर परिचय दें।      असभ्यसंघ ने नए रामपत्र में आदेश दिया है कि जो साइबर बटुक कम से कम 1000पोस्ट आमिर के खिलाफ न लिखे उसे साइबर गैंग से निकाल…

जर्मनी से क्यों हो रही है आतंकीसेना में भरती

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आज से एक साल पहले इराक में कुर्द इलाके में जब भाड़े के सैनिक-आतंकी के रुप में एक जर्मन की लाश मिली तो सारी दुनिया का ध्यान आतंकियों की भर्ती क्षमता की ओर गया। हमने कभी इस सवाल पर विचार नहीं किया कि जर्मन देश में मजबूत सरकार,मजबूत राष्ट्रवाद,उदार समाज और बेहतरीन शिक्षा के बावजूद वहां से आतंकी संगठनों के लिए भाड़े के सैनिक कैसे मिल रहे हैं ? सीरिया में आतंकियों के संगठनों में तकरीबन 600जर्मन-मुसलिम भाड़े के सैनिकों के होने का अनुमान जर्मन सरकार ने व्यक्त किया है।

उल्लेखनीय है भाड़े के सैनिकों की एक ऐसे देश से भर्ती हो रही है जिसकी प्रति व्यक्ति आय सारे यूरोप में सबसे ज्यादा है।जर्मन अधिकारियों के अनुसार सीरियाई आतंकियों के लिए काम करते हुए 60जर्मन भाड़े के सैनिक मारे जा चुके हैं और तकरीबन180वापस जर्मनी लौट चुके हैं। जर्मनों की आतंकी भाड़े के सैनिक के रुप में संघर्ष करने की लंबी परंपरा है, एक जमाने में अफगानिस्तान में भी भाड़े के जर्मन सैनिक लड़ने के लिए गए थे। भाड़े के जर्मन आतंकीसैनिकों को चेचेन्या और बोसनिया की भाड़े की सेनाओं में भी लड़ते हुए देखा गया। सवाल यह है अतिविकसित देश जर्मन…

बाली में आतंकी हमला और भाड़े के सैनिकों की परंपरा

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आईएस की भाड़े की फौज को देखकर ऐसा लग रहा है कि यह नया फिनोमिना है। लेकिन सच यह है कि भाड़े की फौज खड़ी करना,आतंकी हमले करना,स्थिर सरकारों को गिराना और उनके स्थान पर कठपुतली सरकारों को बिठाने का धंधा बहुत पहले से सीआईए करता रहा है। मध्यपूर्व में दाखिल होने के पहले अनेक देशों में भाड़े के सैनिकों की भर्ती करके हमला करने,हमला गुटों को हथियार देने,पैसा देने,प्रशिक्षण देने आदि के काम भी सीआईए करता रहा है। मीडिया में आईएस और उसकी भाड़े की सेना का कवरेज कुछ इस तरह आ रहा है कि यह कोई नई बात हो। शीतयुद्ध के दौरान सीआईए ने भाड़े की सेना खड़ी करने के मामले में विशेषज्ञता हासिल कर ली थी और अनेक देशों में जनता के द्वारा चुनी गयी सरकारों को गिराया,उनके खिलाफ भाड़े के सैनिकों के जरिए युद्ध चलाए, उन देशों में अस्थिरता पैदा की ।

शीतयुद्ध की तथाकथित समाप्ति के बाद भाड़े के सैनिकों के जरिए उत्पात मचाने का सिलसिला अफगानिस्तान से सन् 1979 में आरंभ हुआ,उस समय यही कहा गया कि सोवियत सेनाओं की अफगानिस्तान में मौजूदगी का विरोध करने के लिए भाड़े की सेना बनायी जा रही है और उस सेना को खड़ा करने का ठेका फंड…

लोकतंत्र का अनंत और भाषिकचेतना

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लोकतंत्र के बारे में छात्रों से जब भी बात होती है तो यह भाषा सुनने को मिलती है। “मैं तो चुनाव के समय राजनीतिक बहस सुनता हूँ”,”मैं कभी राजनीति में सक्रिय रुप से शामिल नहीं हुआ”,”मैंने कभी सक्रिय रुप से किसी भी मसले पर सार्वजनिक तौर पर पक्ष-विपक्ष में बहस में भाग नहीं लिया ”, “मैं खबरें सुनता हूँ लेकिन उन पर ध्यान नहीं देता,” “अपनी दैनंदिन समस्याओं से ही मुक्ति नहीं मिलती,राजनीति पर कब बात करूँ”, “मैं वोट देता हूँ,लेकिन सक्रिय राजनीति में कभी भाग नहीं लेता,”, “ मैं वोट देता हूँ,थोड़ा बहुत काम कर देता हूँ,इससे ज्यादा मेरी राजनीति में दिलचस्पी नहीं है,”, मैंने मतदान के दिन वोट दिया है लेकिन मेरी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है”, यानी लोकतंत्र में निरपेक्ष या साधुभाव से भाग लेने वालों की यह मनोदशा अपने-आप में बहुत कुछ कह देती है । छात्रों का एक बड़ा वर्ग लोकतंत्र का मतलब वोट देना ही समझता है। यह सीमित लोकतंत्र की समझ है। हम इस तरह की मनोदशा के मित्रों से कहना चाहेंगे कि आप इस सीमा के बाहर निकलें और किसी अंतर्राष्ट्रीय-राष्ट्रीय मसले पर नियमित वाद-विवाद-संवाद जरुर करें। यह काम करने से आप…

शिक्षा और लोकतंत्र की चुनौतियां

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भारत की शिक्षा प्रणाली खासकर स्कूली शिक्षा पर बातें करते समय हमें बहुत ही कठिन सवालों से गुजरना होगा। मुश्किल यह है कि शिक्षा के कठिन सवालों पर देश में हमने लंबे समय से व्यापक स्तर पर कोई बहस ही नहीं चलायी है, समय-समय पर जब कोई नीति घोषित होती है तो उत्सवधर्मी भाव से कुछ सेमीनार,कन्वेंशन,संगोष्ठियां हो जाती हैं, कुछ प्रस्ताव संसद या विधानसभा में पास हो जाते हैं लेकिन गंभीर विस्तृत चर्चा नहीं होती,जनांदोलन नहीं होता। सवाल यह है कि क्या शिक्षा ऐसा विषय है जिस पर कोई बात ही न की जाए ?

हमने आजादी के बाद शिक्षा का जो ढांचा चुना और नीतिगत रास्ता चुना उस समय भी निचले स्तर पर कोई बड़ी बहस नहीं हुई। बाद में 1990-91 में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के साथ नत्थी होकर हमारे शासकों ने जो शिक्षा का मार्ग चुना उस समय भी जनबहस नहीं हुई,इस बात को कहने का मकसद यह है कि हमारा समाज जानता ही नहीं है कि हमारे यहां शिक्षा का क्या हाल है और उसके सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं।

शिक्षा के विकास का नेहरु मॉडल पूरी तरह देश में असफल रहा,देश के हर कोने में और प्रत्येक समुदाय के पास शिक्षा पहुँचाने में…

सोया युवामन और कचड़ा संस्कृति

विगत कई दशकों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का युवाओं के खिलाफ विश्वयुद्ध चल रहा है। अफसोस की बात यह है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले अधिकांश युवा इस युद्ध से अनभिज्ञ हैं।कभी -कभी तो इस युद्ध के औजार के रुप में देश के मुखिया भी भाषण देते नजर आते हैं। मसलन्, अधिकांश युवाओं में श्रम - मूल्य में आ रही गिरावट को लेकर कोई गुस्सा या प्रतिवाद नजर नहीं आता। हम अपने दैनंदिन जीवन में देख रहे हैं कि श्रम का मूल्य लगातार गिरा है। दैनिक और मासिक पगार घटी है,लेकिन युवा चुप हैं। युवाओं में अपराधीकरण बढ़ रहा है लेकिन युवा चुप हैं। बच्चों और युवाओं में वस्तुओं की अनंत भूख जगा दी गयी है लेकिन युवा चुप हैं।सामाजिक स्पेस का निजीकरण कर दिया गया है लेकिन युवा चुप हैं।

अब युवा को टीवी खबरों,सोशलमीडिया,सिनेमा,रियलिटी शो,वीडियो शो आदि में मशगूल कर दिया गया है। वस्तुगत तौर पर देखें तो युवाओं का अधिकांश समय कचरा सांस्कृतिक उत्पादों में गुजरता है और युवाओं का एक बड़ा वर्ग इसको ही पाकर धन्य-धन्य घूम रहा है। इससे युवा एक तरह से बेकार-फालतू माल बन गया है जिसे कभी भी कहीं भी फेंका जा सकता है।युवाओं को…

नवजागरण नहीं वैकल्पिकधारा के नायक हैं राधामोहन गोकुलजी

राधामोहन गोकुलजी के बारे में पढ़ते समय यह महसूस हुआ कि वे नवजागरण के नहीं वैकल्पिक विचारधारा के नायक हैं,पता नहीं क्यों हिंदी के अनेक आलोचक उनको नवजागरण से जोड़ते हैं,जबकि नवजागरण तो बुर्जुआजी की विचारधारा का उत्थान है,यह बुर्जुआजी को नायक बनाने का प्रकल्प है,इसके विपरीत राधामोहन गोकुलजी के लेखन से यह तथ्य साफतौर पर निकलता है कि वे बुर्जुआजी को अपना नायक नहीं मानते,वे बुर्जुआ विचारधारा को अपनी स्वाभाविक विचारधारा नहीं मानते,इसके बावजूद हिंदी के आलोचकों ने उनको नवजागरण के साथ जोड़कर पेश किया है जो कि विचारधारा की दृष्टि से सही नहीं है। असल में हिंदी में एक गलत परंपरा चली आ रही है वह परंपरा है हर बेहतर विचार,लेखक,आंदोलन को येन-केन-प्रकारेण नवजागरण से जोड़ने की। यह नवजागरण के सरलीकरण के गर्भ से निकली समझ है। नवजागरण का प्रकल्प बुर्जुआ प्रकल्प है,यह मजदूरवर्ग का प्रकल्प नहीं है।जो लेखक विचारधारात्मक दृष्टि से बुर्जुआजी के नजरिए से भिन्न क्रांतिकारी नजरिया रखते हैं उन्हें नवजागरण के परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़कर नहीं देखना चाहिए। समग्रता में देखें तो राधामोहन गोकुलजी के विचारों …