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अस्मिता का पुनर्पाठ

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आदमी की निगाह का निर्धारक तत्व है वर्तमान। वह जब भी कोई चीज़,वस्तु,घटना , परंपरा,इतिहास या लिंग को देखता है तो वर्तमान के नज़रिएसे देखता है। सवाल यह है इंटरनेट या सूचना तकनीकी युग में औरत कोकैसे देखें ? इंटरनेट में लिंगबोध या लिंग जैसी कोई चीज़ नहीं होती। लिंगकी पहचान या स्त्री अस्मिता मूलत:प्रेस क्रांति के परिप्रेक्ष्य में निर्मित अवधारणा है। प्रेस क्रांति को ज्यों ज्यों अपदस्थ करते जाएँगे लिंगरहित अवस्था से जुड़ी समस्याओं में गुजरते जाएँगे। सवाल उठता है इंटरनेट युग या ऑनलाइन युगमें अस्मिता कैसेनिर्मित होती है ? हमारा आज भी अधिकांश समाज ग़ैर-इंटरनेट अवस्थामें जी रहा है, वहाँ ठीक से प्रेसक्रांति भी नहीं पहुँची है ऐसे में हमारे समाज में एक औरत में कई औरतों की इमेज और भाव-भंगिमाएँ सहज रूप मेंदेखी जा सकती हैं। मसलन्,जो लड़की इंटरनेट यूज़र है वह अतीत के स्त्रीमूल्यों से बुरी तरह बंधी है। जो पश्चिमी मूल्यों की क़ायल है वह दिमाग़ सेदहेज और संपत्ति के मोह में डूबी हुई है।तमाम क़िस्म के सामाजिकपरवर्जन में डूबी है।इसी तरह जो लड़की सूचना तकनीक का जमकरउपयोग कर रही है उनमें से अधि…