शनिवार, 25 जून 2011

बिदेसिया यानी सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति-कुमार नरेन्द्र सिंह


भोजपुरी साहित्य के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर का बिदेसिया नाटक, सच कहें तो भोजपुरी लोक जीवन का जीवंत दस्तावेज है, भोजपुरियों के दिल की धड़कन है। बिदेसिया महज नाटक की एक किताब भर नहीं है बल्कि भोजपुरिया अस्मिता की पहचान है, सृजनशीलता की प्रतीक है। शहरीकरण और औद्योगीकरण की आंधी में उजड़ते भोजपुरिया परिवार और कोलकाता, असम के चटकलों काम की तलाश में पहुंचे भोजपुरिया मजदूरों की जिंदगी की दारुण दास्तान है बिदेसिया।

नृत्य-नाट्य की बिदेसिया शैली भोजपुरी लोक-संस्कृति की अनोखी उपलब्धि तो है ही, लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के कवित्तमय और कलात्मक सौंदर्य-बोध की विशिष्ट पहचान भी है। वास्तव में बिदेसिया नाटक वैयक्तिक प्रतिभा और संस्कृति के अंतर्मेल की उपज है। यही कारण है कि शायद ही कोई ऐसा खांटी भोजपुरिया मिले जो बिदेसिया के अभाव में भोजपुरी संस्कृति की कल्पना भी कर सके। बिदेसिया शैली की अपार लोकप्रियता का सबसे महत्वपूर्ण कारण इसका परंपरा-स्युत होना ही है। भोजपुरी साहित्य और संस्कृति मूल रूप से मौखिक परंपरा पर आधारित रही है और गेयता इसका स्वभाव रहा है। भोजपुरी के प्रसार में उसकी गेयता, गीतों की बड़ी प्रधानता रही है। आज मॉरीशस, सूरीनाम, ट्रिनिडाड, फिजी, हॉलैंड, साउथ अफ्रीका आदि देशों में अगर भोजपुरी जिंदा है तो बहुत हद तक उसकी गेयता ही है। अमिताभ घोष ने अपनी पुस्तक सी ऑफ दी पॉपीज में इस तथ्य का उल्लेख विस्तार से किया है। वह कहते हैं कि गिरमिटिया मजदूरों में अन्य भाषा भाषियों की भी अच्छी संख्या थी लेकिन जब उनके जहाज उन देशों के समुद्र तटों पर उतरे तो सबकी भाषा भोजपुरी हो चुकी थी। इसका कारण यह है कि भोजपुरी संस्कृति में सामूहिक गान की जबर्दस्त परंपरा रही है। दुनिया के सबसे बड़े कोरस यानी सामूहिक गान की शैली को भोजपुरियों ने ही संजो रखा है - होली और चैता के रूप में। अपने गीतों की बदौलत भोजपुरी अन्य भाषाओं की रानी बन बैठी। ऐसे में यह अन्यथा नहीं कि ठाकुर जी के नाटकों मे परंपरा और गेयता का साहचर्य देखने को मिलता है। यही कारण है कि भिखारी ठाकुर के नाटकों के पात्र बहुधा गीतों के माध्यम से ही अपने मनोभावों का इजहार करते हैं।

भोजपुरी अगर लोक परंपरा से विमुख नहीं हुई तो इसका कारण ऐतिहासिक है। अपनी तमाम लोकप्रियता और भाषा के रूप में अपनी उपादेयता साबित कर चुकने के बावजूद अवधि, ब्रज और मैथिली की तरह भोजपुरी को हिंदी क्षेत्र की सांस्कृतिक को वहन कर सकने वाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी। इसका एक कारण तो यह है कि इतिहास के किसी दौर में उसे राजाश्रय प्राप्त नहीं हो सका और दूसरा कि भोजपुरी जनता की सांस्कृतिक चेतना भी कई ऐतिहासिक और अनैतिहासिक कारणों से विकसित नहीं हुई। राष्ट्र की मुख्य धारा में भरपूर सहयोग करते रहने के बावजूद भोजपुरी के विकास के प्रति सरकारी रवैया नकारात्मक ही रहा।

इस सम्यक उपेक्षा का एक संतोषजनक परिणाम भी निकला और वह यह कि भोजपुरी भाषा और संस्कृति लोकधारा की सहजता से विमुख नहीं हो पाई। भावपथ की यह सरसता ही शैली के स्तर पर गेयता को जन्म देती है। लोक चेतना के प्रतिनिधि कलाकार भिखारी ठाकुर को यह समझने में कोई भूल नहीं हुई कि सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा और उसका विकास चिर- परिचित परंपरा के स्वीकार में ही निहित है। परंपरा से भिखारी ठाकुर का आत्यंतिक जुड़ाव ही उन्हें विविध शैलियों के प्रयोग के लिए उकसाता रहा। यह आकस्मिक नहीं था उनकी रचनाओं में सोरठी, कजरी, झूमर, पूर्वी तथा आल्हा छंद का अनुकरण मिलता है, नाटक के गीतों में वे पारंपरिक तर्जों को ही तरजीह देते हैं। परंतु अनुकरण तो अनुकरण ही है। कलाकार के जीवन में यही वह बिंदु है जहां उसकी समस्त आंतरिक संभावनाएं किसी अज्ञात बल से एकजुट होकर सर्वथा नवीन का निर्माण करती है। कहना न होगा कि बिदेसिया इसी सर्वथा नवीन की शोध-प्रक्रिया की अन्यतम उपलब्धि है। अन्यथा न होगा, अगर कहें कि बिदेसिया भिखारी ठाकुर के समग्र नाट्य-चिंतन की परमाभिव्यक्ति है।

भिखारी ठाकुर ने बिदेसिया शैली का प्रयोग सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए किया था। यह सामूहिक त्रासदी औद्योगीकरण के कोख से पैदा हुई थी जिससने पुरुबियों का सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर के रख दिया। इतिहास गवाह है कि भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना के साथ ही भोजपुरी क्षेत्रों के मजदूरों का पलायन कोलकाता, असम ही नहीं वरन फिजी, मॉरीशस, ट्रिनिडॉड, सुरीनाम आदि अन्य उपनिवेशों में हुआ। अंग्रेजी शासन की सबसे गहरी मार भोजपुरियों को ही सहनी पड़ी थी। 1857 की क्रांति में भोजपुरियों ने जगदीशपर के जमींदार बाबू कुंअर सिंह की अगुआई में अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। देश के अंदर भोजपुरियों ने कोलकाता को ही अपना आशियाना बनाया। सबसे ज्यादा भोजपुरिया वहीं पहुंचे।

भोजपुरी प्रदेशों के लिए कोलकाता महज एक शहर का नाम नहीं है बल्कि बिरह का एक ऐसा सैलाब है जिसमें हजारों-हजार आंखों का काजल बह चुका है। इन प्रदेशों के नौजवान रोजगार और खुशी की तलाश में कोलकाता और असम के चटकलों में शरण पाते थे। बहुधा वे लौटकर नहीं आते थे क्योंकि लौटने लायक उनकी स्थिति ही नहीं बन पाती थी और अगर लौटते भी थे तो खुशहाली के बदले तंगहाली लेकर। अकारण नहीं कि भोजपुरी प्रदेशों की औरतों के लिए कोलकाता किसी सौत से कम नहीं था। उत्तर प्रदेश औऱ बिहार के गांवों की औरतों में आज भी यह अंधविश्वास व्याप्त है कि बंगाल औऱ असम की औरतें उनके मर्दों को जादू से तोता और भेड़ा बनाकर रख लेती हैं। भिखारी ठाकुर की निम्नलिखित पंक्तियों में इस विश्वास की ललिताभिव्यक्ति देखते ही बनती है--------------

मोर पिया मत जा हो पुरुबवा

पुरुब देश में टोना बेस बा, पानी बड़ा कमजोर

मोर मत जा हो पुरुबवा।

इसी तरह एक और गीत में एक नारी अपने पति को पुरुब में नौकरी करने जाने नहीं देना चाहती। जब पति कहता है कि वह पुरुब में नौकरी करने जाएगा औऱ वहां से वह उसके लिए साड़ी और सिकड़ी (गले का चेन)ले आएगा तो सुनिए कि उसकी पत्नी क्या कहती है –

अगिया लागहू पिया तोहरी नोकरिया, बजर पड़हूं

पिया साड़ी ओ सिकड़िया, बजर पड़हूं। (आपकी नौकरी में आग लगे और साड़ी तथा सिकड़ी को वजर पड़े।)

औद्योगीकरण की आंधी में उड़कर पुरुष के प्रदेश जाने पर नारियों को ही ज्यादा पीड़ा होती थी। अकारण नहीं कि भोजपुरी गीतों में औद्योगीकरण के खिलाफ भी आक्रोश दिखाई देता है। दिलचस्प है कि नारियों ने ही औद्योगीकरण की मुखालफत सबसे ज्यादा की है। देखिए एक बानगी –

कलवा के पानी पी के भइलन पियवा करिया

कल में डाढ़ा लागो ना.....अर्थात नलके का पानी पीकर मेरे पिया काले हो गए हैं इसलिए यह कल (पुरब के लोग नलके के पानी को कल का पानी ही कहते हैं।) ही नष्ट हो जाए। अगर कहा जाए कि औद्योगीकरण के खिलाफ पहला स्वर नारियों का ही उभरा तो कोई गलत नहीं होगा।

भिखारी ठाकुर ने इन हालात को अपनी लेखनी से स्वर दिया और इसका दस्तावेज बना बिदेसिया। भिखारी ठाकुर ने अपने प्रातिनिधिक नाटक बिदेसिया में नाटक की नायिका प्यारी सुंदरी के माध्यम से उन तमाम विरहिणी नारियों की मनोदशा का वर्णन किया है जिनके कंत रोजी-रोटी की तलाश में पुरुब में कमाने गए हैं। इसके साथ ही ठाकुर जी ने अन्य पात्रों के संवाद के माध्यम से उन नारियों के और परिवेश के प्रति समाज के नजरिए को भी उकेरा है।

प्यारी सुंदरी का पति गवना करा के उसे अपने घर ले आता है और स्वयं एक दिन चुपके से नौकरी की तलाश में कलकत्ता (अब कोलकाता) चला जाता है। वहां के चटकल में उसे नौकरी मिल जाती है। कोलकाता में रहते हुए उसकी मुलाकात एक औरत से होती है। धीरे-धीरे यह मुलाकात मोहब्बत में बदल जाती है और दोनों पति-पत्नी बनकर रहने लगते हैं। प्यारी का पति प्यारी को एकदम भुल जाता है। अब यही औरत उसकी जिंदगी है। प्यारी का पति तो उसे भूल जाता है लेकिन प्यारी अपने पति को कैसे भूल जाए। उसका तो सबकुछ उसका पति ही है। अनेक प्रलोभनों को ठुकरा कर वह अपने पति 12 बरसों तक इंतजार करती है लेकिन उसका पित नहीं लौटता है। प्यारी की स्थिति है कि क्या करें, कहां जाए। वह परेशान है कि अपने मन की व्यथा अपने पति तक वह पहुंचाए कैसे। अपने पति का पता-ठिकाना भी तो नहीं जानती वह। तिल-तिल जलना ही उसकी नियती बन गई है। विरहिणी नारी प्यारी की मनोव्यथा का क्या ही मार्मिक चित्रण भिखारी ठाकुर ने किया है-----

अमवा मोजरी गइले, लगले टिकोरवा

दिन पर दिन पियरात रे बिदेसिया।

एक दिन बही जइहें जुलुमा बेयरिया

डार-पात जइहें भहराई रे बिदेसिया।

(आम में मंजर लग चुके हैं और अब तो टिकोले भी लग चुके हैं। डर है कि एक दिन जुल्मी बयार बह जाएगी और डार-पात सहित पेड़ गिर जाएगा।)

एक बिरहिणी नारी की मनोदशा का इतना शुक्ष्म चित्रांकन बिरले कवियों, लेखकों ने किया है। पति-पत्नी के संबंधों में फिसलन की आशंका का इतना लालित्यपूर्ण बयान अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। बहरहाल, प्यारी सुंदरी के इस मनोभाव का एहसास उसके पित बिदेसिया को हो तब न। छह महीने के लिए ही तो कहकर गया था बिदेसिया परंतु 12 वर्ष बाद भी नहीं लौटा। इसी मनदशा में प्यारी की मुलाकात बटोही से होती है। मालूम हो कि बटोही की भूमिका भिखारी ठाकुर स्वयं करते थे। जब प्यारी को जानकारी होती है कि बटोही कोलकाता जो रहा है तो वह उससे मुलाकात करती है और अर्ज करती है कि वह उसका संदेशा उसके पति बिदेसिया तक पहुंचा दे। बटोही प्यारी से उसके पति का नाम -पता पूछता है परंतु प्यारी अपने पति का नाम बताने के बदले उसकी पहचान बताती है और पता तो वह जानती ही नहीं। वह बटोही से कहती है -----

हमरो बलमू जी के बड़े-बड़े अंखिया

चोखे-चोखे हउवे नैनाकोर रे बटोहिया।

ओठवा त हवे जइसे कतरल पनवां

नकवा सुगनवा के ठोर रे बिदेसिया।

बटोही कोलकाता पहुंचता है और प्यारी के बताए पहचान का आदमी ढूंढ़ने में जुट जाता है। अंत में वह बिदेसिया को ढूढ़ने में सफल हो जाता है। जब बटोही देखता है कि बिदेसिया किसी और औरत के साथ रह रहा है तो वह उसे काफी फटकार लगाता है और समझा-बुझाकर तथा प्यारी की व्यथा कथा बयान कर उसकी गलती का एहसास कराता है। अंत में बिदेसिया बटोही की बात मानकर अपने गांव वापस लौटने की तैयार करने लगता है, जो उसकी दूसरी पत्नी को नागवार गुजरता है और वह बिदेसिया पर दबाव डालती है कि वह उसे छोड़कर न जाए लेकिन बिदेसिया नहीं मानता है और अपने घर अपनी पत्नी प्यारी सुंदरी के पास वापस लौट आता है। कथा यहीं समाप्त नहीं होती, वह आगे बढ़ती है। होता यह है कि कोलकाता वाली बिदेसिया की उप पत्नी बिदेसिया को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते उसके गांव पहुंच जाती है। कहानी कई नाटकीय परिस्थितियों से गुजरता है और हुए दोनों पत्नियों द्वारा बिदेसिया को स्वीकार कर लिए जाने के साथ खत्म हो जाता है। सभी खुशीपूर्वक एक साथ रहने लगते हैं।

बिदेसिया नाटक की कथा-वस्तु देखकर तुरंत ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भिखारी ठाकुर भोजपुरिया क्षेत्रीय परंपरा से गहरे स्तर पर जुड़े हैं। नाटक के एक दृष्य में जब बटोही प्यारी सुंदरी से उसके पति का नाम पूछता है तो प्यारी अपने पति का नाम नहीं बताकर उसकी पहचान बताती है। ऐसा नहीं है कि प्यारी अपने पति का नाम नहीं जानती परंतु यदि ठाकुर जी प्यारी के मुंह से उसके पति का नाम कहवाते तो यह क्षेत्रीय परंपरा से अलग होता। कहने की आवश्यकता नहीं कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिलाएं अपने पति नाम लेने शर्माती हैं। जाहिर है कि ऐसे में नाटक का दृष्य लोगों की आंखों में खटकता और तब संभव है कि इसका असर नाटक की लोकप्रियता पर भी होता।

सही मायने में बिदेसिया लोक-नाट्य परंपरा का वायवीय विकास है। नौटंकी की तरह बिदेसिया में भी पात्रों का कथन-उपकथन मूल रूप से काव्य रूप में ही बयान होता है। दरअसल. संपूर्ण भोजपुरी साहित्य ही काव्य में है। भिखारी ठाकुर इसी परंपरा को और समृद्ध कर आगे बढ़ाने का काम करते हैं। संस्कृत नाट्य परंपरा की तर्ज पर बिदेसिया में मंगलाचरण का प्रावधान है, वैसे ठाकुर जी के सभी नाटकों में मंगलाचरण का प्रयोग है। सूत्रधार की आवश्यक उपस्थिति भी संस्कृत की रंगमंच परंपरा का ही विस्तार है। बिदेसिया नाटक में सूत्रधार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि नाटक के कथा-प्रवाह में वह उत्प्रेरक का काम करता है।

बिदेसिया नाटक में पात्रों के विशिष्टीकरण का अभाव होता है। क्षण भर पहले बिदेसिया, बटोहिया की भूमिका निभाने वाला दूसरे ही क्षण मंत पर ढोलक या खंजड़ी बजाते नजर आता है। इसी तरह चरित्र के अनुरूप पात्रों का नामकरण बिदेसिया नाटक की अपनी मौलिक विशेषता है। भिखारी ठाकुर के अन्य नाटकों में भी ऐसा ही देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए पात्रों बिदेसिया, बटोहिया आदि नाम उनके गुण-कर्म के अनुसार ही दिए गए हैं। वैसे उनके नाटकों में पात्रों का नामकरण वर्गीय स्थिति के अनुसार भी किए गए हैं।

बिदेसिया नाटक को बहुधा हम सांसारिक लीला के रूप में देखते हैं, देखते हैं कि इस नाटक में तत्कालीन भोजपुरिया समाज का उत्स उभरता है। लेकिन सामाजिक पक्ष के अलावा बिदेसिया का आध्यात्मिक पक्ष भी है। जीव और माया के बीच स्थित आध्यात्मिक संबंधों को दर्शाने का प्रयास भी बिदेसिया में दिखाई देता है। भिखारी ठाकुर ने स्वयं इसके आध्यात्मिक पक्ष का स्पष्ट उल्लेख किया है। भिखारी ठाकुर कहते हैं – बिदेसिया जीव का प्रतीक है जो दुनिया में उद्देश्य हासिल करने के लिए भटक रहा है और यह उद्देश्य है ईश्वर से एकाकार हो जाना। बिदेसिया की दूसरी पत्नी जिसे भिखारी ठाकुर ने पतुरिया कहा है, माया की प्रतीक है। जीव यानी बिदेसिया उसमें उलझकर अपना उद्देश्य भूल जाता है। बटोरी धर्म या संत का प्रतीक है जो बिदेसिया को उसका उद्देश्य बताकर सीधी राह पर लाता है। और प्यारी....प्यारी सुंदरी तो स्वयं ईश्वर की प्रतीक है।

भिखारी ठाकुर ने अपने बिदेसिया नाटक में जीव, ईश्वर और माया का एक अनोखा रुपक तैयार किया है। भारतीय वांग्मय में यूं तो ईश्वर की कल्पना अर्द्धनारीश्वर के रूप में जरूर की गई है लेकिन जीव और माया के संबंध में किसी भी संत, कवि ने ईश्वर की कल्पना नारी रूप में नहीं की है। वैसे भी बिदेसिया नाटक का मूल स्वर त्रासदी और करुणा है औऱ कहने की आवश्यकता नहीं कि इनकी प्रतिमूर्ति नारी ही हो सकती है। नाटक के जरिये ठाकुर जी ने परदेश में रहने वालों को घर लौटने की सलाह भी दी है।

इतनी समृद्ध और रचनात्मक शैली के बावजूद अब बिदेसिया नाटक अपना वजूद खोता जा रहा है। आनन-फानन में 15-20 हजार लोगों की भीड़ जुटा लेना जिस नाटक का अनिवार्य गुण रहा हो, जो नाटक दर्शकों को घंटों बैठकर देखने को मजबूर करने की हैसियत रखता हो, वह आज लोगों से दूर होता जा रहा है। कहने का अर्थ कि बिदेसिया नाटक की लोकप्रियता कम होती जा रही है। इसकी लोकप्रियता में कमी आने का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि भिखारी ठाकुर की मृत्यु के बाद उनकी मंडली के अन्य सदस्यों में न तो उतनी प्रतिभा थी और न उत्साह वे नाटक को समीचीन बनाए रखते। समय के साथ बिदेसिया में आवश्यक परिवर्तन नहीं किया जा सका। जब तक भिखारी ठाकुर जिंदा थे, अफने नाटकों में आवश्यक परिवर्तन कर उसे प्रासंगिक बनाए ऱखते थे, अपने नाटकों को सुधारने, संवारने का काम करते रहे थे। उनके नहीं रहने के बाद सार्थक परिवर्तन की यह प्रक्रिया बंद हो गई, लिहाजा दूसरे जगहों की बात कौन करे, स्वयं भोजपुरी प्रदेशों में भी बिदेसिया की न तो पहले वाली ठाठ बची और न मांग। ले-देकर शादी-व्याह के अवसरों पर नाच तक सिमट कर रह गया है बिदेसिया।

बहरहाल, पिछले कतिपय वर्षों में रंगकर्मियों का ध्यान बिदेसिया शैली की तरफ गया आकृष्ट हुआ है। सतीश आनंद और संजय उपाध्याय जैसे रंगकर्मी बहु उत्साह से इस शैली के विकास और प्रचार के लिए काम कर रहे हैं। सतीश आनंद ने बिदेसिया शैली पर आधारित अमली नाटक का मंचन न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में भी किया और हर जगह वाहवाही लूटी। संजय उपाध्याय तो मूल बिदेसिया का ही मंचन करते हैं। यह अलग बात है कि प्रयोग के नाम पर वह कई बार बिदेसिया की भोंडी प्रस्तुती करते हैं लेकिन इसे बाजारवाद के दबाव के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। सच तो यह है कि हाल के वर्षों में बिहार की लगभग सभी नाटक-मंडलियों ने बिदेसिया या उसकी शैली पर आधारित नाटक का मंचन किया है।

हिंदुस्तान के सारे रंगकर्मी मुक्त कंठ से बिदेसिया की प्रशंसा कर चुके हैं। महापंडित राहुल सांकृत्यायन बिदेसिया नाटक एक बड़े प्रशंसको में थे। बिदेसिया नाटक को देखकर ही उन्होंने भिखारी ठाकुर को एक अनगढ़ हीरा कहा था। वह मानते थे कि भिखारी ठाकुर की कृतियों का अगर सही आकलन नहीं हो सका तो इसके लिए पढ़ुआ (पढ़े-लिखे) लोग ही जिम्मेदार हैं। यदि भिखारी ठाकुर को पढ़े-लिखों का सहयोग मिला होता तो उनकी प्रतिभा में और भी निखार आता। भोजपुरी भाषा में बिदेसिया नाम की एक फिल्म भी बन चुकी है। यह अलग बात है कि फिल्म का कथानक नाटक से बिलकुल अलग है। यदि फिल्म में भिखारी ठाकुर की उपस्थिति औऱ उनके द्वारा गाए गए एक गीत को छोड़ दिया जाए तो फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे बिदेसिया नाटक से जोड़कर देखा जाए। इसके बावजूद इतना तो मानना ही पड़ेगा कि फिल्म का निर्माण नाटक की लोकप्रियता से ही उत्प्रेरित था औऱ उसी लोकप्रियता को भुनाने का प्रयास भी था।

संक्षेप में कहें तो बिदेसिया शब्द नहीं, यथार्थ है, एक ऐसा यथार्थ जिसमें माटी की गंध है, फूलों की महक है और जीवन की आलोचना है। श्रृंगार औऱ वियोग की चादर पर करुणा का रंग बिखेरने तथा सामूहिक त्रासदी की कलात्मक अभिव्यक्ति का नाम है बिदेसिया।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर , समग्र, संतृ प्तिदायक !
    क्या विदेशिया फिल्म इसी कथानक से अनुप्राणित थी या कम से कम नाम ?

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  2. सुधारें:शुक्ष्म=सूक्ष्म

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