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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

फेसबुक और नार्सिसिज़्म -

  मैकलुहान के शब्दों में कहें तो मनुष्य तो मशीनजगत का सेक्स ऑर्गन है। डिजिटल मानवाधिकार इससे आगे जाता है और गहराई में ले जाकर मानवीय शिरकत को बढ़ावा देता है। हिन्दी के जो साहित्यकार फेसबुक पर हंगामा मचाए हुए हैं वे गंभीरता से सोचें कि सैंकड़ों की तादाद में जो लाइक आ रहे हैं वे कम्युनिकेशन को गहरा बना रहे या उथला ?
कम्युनिकेशन गहरा बने इसके लिए जरूरी है डिजिटल रूढ़िवाद से बचें। डिजिटल रूढ़िवाद मशीन प्रेम पैदा करता है,तकनीक की खपत बढ़ाता है । लेकिन कम्युनिकेशन में गहराई नहीं पैदा करता। डिजिटलरूढ़िवाद की मुश्किल है कि उसके कान नहीं हैं। वह इकतरफा बोलता रहता है,वह सिर्फ अपनी कही बातें ही सुनता है अन्य की नहीं सुनता। मसलन्, मैंने यह कहा,मैंने यह किया,मैं ऐसा हूँ,मैं यहां हूँ,मैं यह कर रहा हूँ,वह कर रहा हूँ आदि।
हिन्दी के फेसबुकरूढ़िवादी जब फोटो के जरिए अभिव्यक्ति का जश्न मनाते हैं तो वे भूल जाते हैं कि वे वैचारिक तौर पर क्या कर रहे हैं। फेसबुक या किसी भी डिजिटल मीडियम का गहरा संबंध मानवीय क्रियाकलापों और संचार से है। फेसबुक पर लाइक या फोटो लगाने के बहाने हम अपने भाव-भंगिमाओं और गतिविधियों का बतर्ज मैकलहान मशीनीकरण करते हैं,इस क्रम में पेश की गयी हर चीज अपना विलोम बनाती है। हमें मैकलुहान की यह बात याद रखनी चाहिए-
All media work us over completely. They are so persuasive in their personal, political, economic, aesthetic, psychological, moral, ethical, and social consequences that they leave no part of us untouched, unaffected, unaltered. The medium is the massage. Any understanding of social and cultural change is impossible without a knowledge of the way media work as environments .
हिन्दी के बौद्धिकों में एक बड़ा वर्ग है जो अभी मानवाधिकारचेतना को महत्वहीन मानता है। उनमें संयोग से उन लेखकों की संख्या भी अच्छी खासी है जो साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हैं। नया दौर डिजिटल ह्यूमनिज्म का है। वे लोग जो मानवाधिकारों न समझे वे डिजिटल मानवाधिकार को समझेंगे इसमें संदेह है। मेरा इशारा उन लेखकों की ओर है जो हिन्दी में है और फेसबुक पर आएदिन फोटोबाजी करते रहते हैं। लेकिन मानवाधिकारों के प्रति कभी नहीं बोलते। डिजिटल मानवाधिकार विलासिता के लिए नहीं है। फेसबुक पर सिर्फ फोटो लगाना,आत्मगान करना विलासिता है,हिन्दी में इसे फेसबुक रूढ़िवाद कहते हैं।असल में हम ऐसे युग में हैं जहां व्यापार ही हमारी संस्कृति है । यह वह युग है जहां संस्कृति ही हमारा व्यापार है।
फेकबुक कम्युनिकेशन के दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक त्रासदियां सबसे ज्यादा घट रही हैं लेकिन हिन्दी फेसबुक में यह सब नदारत है। अति-कनेक्टविटी वालों का यथार्थजीवन से अलगाव है। दूरसंचार कम्युनिकेशन पर बढ़ती निर्भरता ने सामाजिक जीवन के अर्थपूर्ण संपर्क को तोड़ दिया है। इसके कारण टाइम और स्पेस का शासन भी खत्म हो गया है। अब हम बिना जाने तत्क्षण राय देने लगे हैं,लाइक करने लगे हैं।अनजान लोगों की लाइकलाइन पगलाती रहती है।अनजान का लाइक अब पैमाना है लोकप्रियता का। अब लाइक करने वाला भी लेखक बन गया है ,उसे लेखक के बराबर दर्जा मिल गया है। फलतःलेखक और लाइककर्ता दोनों मित्र हो गए हैं। अब हम लेखक के आन्तरिक और निजी विवरणों में ज्यादा रूचि लेने लगे हैं।
फेसबुक टाइमलाइन की खूबी है कि यूनीफॉर्म,कंटीनुअस और कनेक्टेड है।नार्सिस्ट लोग (फेसबुक पर लिखी उनकी पोस्टों के संदर्भ में) इस तत्व की जानते हुए अनदेखी करते रहे हैं। नार्सिसिज़्म यानी आत्ममुग्धता और अहर्निश असत्य का प्रचार। हिन्दी लेखकों को इससे बचना चाहिए। फेसबुक पर इस बात को लिखना इसलिए जरूरी लगा कि क्योंकि फेसबुक पर यह नार्सिसिज़्म खूब चल रहा है। किसी के भी बारे में अनाप-शनाप लिखने की बाढ़ आई हुई है। इसमें एक पहलू वह भी जिसमें व्यक्ति अपने बारे खूब काल्पनिक बातें लिखता है। इस तरह की काल्पनिक और बे-सिपैर की बातें लिखना नार्सिसिज़्म का वैचारिक धर्म है।
मसलन् किसी के फोटो का दुरूपयोग,विकृतिकरण,कैरीकेचर,पर्सनल हमला करना,किसी को गलत उद्धृत करना, विषयान्तर करके निजी जीवन पर हमला करना, किसी के नाम से असत्य बोलना आदि फेसबुक पर नार्सिसिज़्म की सामान्य प्रवृत्तियां हैं और इसमें हमारे नामी और सुधीजन बाजी मारे हुए हैं। नार्सिसिज़्म वैचारिक एड्स है।
फेसबुक टाइमलाइन में आप मानवीय जीवन के अनंतरूपों को देख सकते हैं। यहां पर विभिन्न किस्म की घटनाओं जैसे निजी अनुभव,निजी राय,जन्मदिन,मृत्यु दिवस,शादी,ब्याह, तलाक, दलीय नीतियां आदि को देख सकते हैं।फेसबुक में अर्थवान और अर्थहीन दोनों ही किस्म की चीजें देखते हैं। फेसबुक एक तरह से तयशुदा संभावित समय और स्थान है जहां पर कम्युनिकेट कर सकते हैं।यहां वातावरण अदृश्य है।इसकी संरचनाएं और बुनियादी नियम पर्वेसिव हैं।सतह पर यह सहज कम्युनिकेशन का मीडियम है। लेकिन यह सीधे व्यक्ति के अन्तर्मन और धमनियों या नसों को प्रभावित करता है। अनेक फेसबुक लेखक इस बुनियादी तथ्य को नहीं समझते और अंट-शंट लिखते रहते हैं। अंटशंट लेखन,आत्मश्लाघा, आत्मप्रशंसा कम्युनिकेशन में पर्वर्जन है।नार्सिज्म है।फेसबुक संवाद का माध्यम है,संवाद के आरंभ होने का अर्थ है प्रौपेगैण्डा का अंत। फेसबुक पर किसी भी विचारधारात्मक सवाल पर विचार विमर्श कम्युनिकेशन में रूपान्तरित हो जाता है। वह प्रौपेगैण्डा नहीं रहता।
भारत का मीडिया इस अर्थ में अ-मानवीय है कि वह रीजन,रेशनेलिटी और जीवन के सारवान सवालों को बुनियादी तौर पर नहीं उठाता। वह मनुष्य और पशु में भेद नहीं जानता। वह विश्वसनीय ज्ञान और सूचना का स्रोत अभी तक नहीं बन पाया है। वहां बार-बार नियंत्रण के विभिन्न रूपों का अभ्यास किया जाता है। वहां मोटे तौर पर विज्ञापनदाता,राजनीतिज्ञ और चोंचलबाजों की गणित और नियंत्रण का ख्याल रखा जाता है। अप्रत्यक्षतौर वे राज्य-कारपोरेट घरानों के भोंपू की तरह काम करते हैं। मानवीय और गैर-मानवीय जीवनशैली के पहलुओं में अंतर करने तमीज अभी तक पैदा नहीं कर पाए हैं।भारत और यूरोप के मीडिया में एक अंतर है। यूरोप में मानवोत्तर दौर की ओर मीडिया प्रयाण कर रहा है ,वहां सारवान मानवीय मसले उठाए जा रहे हैं।मानवीय त्रासदी और मानवाधिकारों के सवालों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारत में इसके उलट अमानवीय ,बोगस,मृत विषयों को व्यापक कवरेज दिया जा रहा है।

सोमवार, 5 सितंबर 2016

शिक्षक के रूप में फेसबुक

       गुरू वह जो सम्प्रेषक बनाए।फेसबुक इस अर्थ में हम सबका गुरू है ,उसने हम सबको कम्युनिकेटर बनाया है।कम्युनिकेशन की कलाओं से लैस किया है। जो लोग फेसबुक पर सक्रिय है उन सबका अप्रत्यक्ष रूप में फेसबुक गुरू है।यह हमारी दिमागी हरकतों का नियंत्रक और नियामक है।

हर मीडियम हमें सिखाता है।लेकिन हम उसे उपकरण से अधिक महत्व नहीं देते।वास्तविकता यह है आधुनिक युग में मीडियम हमारे गुरू हैं। पहले हम शिक्षक से सीखते थे लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद शुरू हुई तकनीकी क्रांति ने मीडियम को शिक्षक और छात्र के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है।हम देखें फिल्म ने एक मीडियम के रूप में समाज को किस तरह सिखाया-पढ़ाया और सजाया-संवारा है।उसी तरह फेसबुक ने लेखन और अभिव्यक्ति के तौर-तरीकों के संबंध में हमारी नए सिरे से शिक्षा की है।

मैंने निजी तौर पर मीडियम के तौर पर फेसबुक से बहुत कुछ सीखा है,रोज कोई न कोई नई चीज हम यहां सीखते हैं।फेसबुक हमारा नया शिक्षक है।फेसबुक की वॉल जब सामने खुली होती है तो हर शिक्षित व्यक्ति लिखने के पहले छह बार सोचता है कि क्या लिखूँॽ लिखते हुए भय और संकोच में रहता है। भय-संकोच में वे लोग भी रहते हैं जो सुंदर-सटीक बोलने के लिए जाने जाते हैं।जिनके पास मेधा की कमी नहीं है।लेकिन फेसबुक पर आते ही उनकी सरस्वती गुम हो जाती है !

अभिव्यक्ति के रूपों में फेसबुक बेहतरीन माध्यम है,इसमें मित्र ही शिक्षक हैं,यूजर या पाठक ही शिक्षक है,जो गलती आप करते हैं,उसे दूसरा तुरंत बताता है,आप दुरूस्त कर लेते हैं।आप ऐसे व्यक्ति के कहे को मान लेते हैं जिसे आपने देखा नहीं,जाना नहीं,अनजाने व्यक्ति की आलोचना मानना,उससे सीखना यह फेसबुक का गुण है।बात करने के कौशल को कैसे विकसित करें,विभिन्न किस्म के लोगों में रहकर किस तरह संप्रेषण करें,यह कला फेसबुक पर रहकर ही सीख सकते हैं।फेसबुक की शिक्षण की कोई किताब नहीं है,वह पुराने किस्म के लेखन और अभिव्यक्ति रूपों का नया संस्करण लेकर आता है,हम यहां सब एकलव्य हैं।मित्रों की मदद से लिखकर सीखते हैं।यहां कोई गुरू नहीं है।शिक्षक नहीं है।



फेसबुक ने पहलीबार यह सिखाया कि मित्र ही गुरू है।सार्वजनिक संप्रेषण सामूहिक कला है। संप्रेषण तब ही सफल होता है जब उसे कोई पढ़े,सुने,गुने।फेसबुक इस मायने में हमें आत्मनिर्भर सम्प्रेषक बनाता है। वह पुराने सभी किस्म के संप्रेषण रूपों से भिन्न पैराडाइम में ले जाता है। यह मनुष्य की आत्मनिर्भर संप्रेषण शक्ति का चरमोत्कर्ष है।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और फेसबुक

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों से मूर्ति औरउत्सव की इमेज वर्षा जिस तरह हो रही है, उसने श्रीकृष्ण को डिजिटल कृष्ण बना दिया है। डिजिटल होने का मतलब आभासी है। आभासी कृष्ण अंतत: जो संदेश देता है - जो डिजिटल है वह अनुपस्थित है। इस तरह की इमेज वर्षा अपील करती है ,जनता को एक्टिव करती है, लेकिन कृष्ण को ज़ीरो बनाती है। कृष्ण का ज़ीरो बन जाना भगवान की डिजिटल त्रासदी है।यह पूँजीवाद की परम विजय की अवस्था है।

श्री कृष्ण को गोपियों में जनप्रिय नायक क्यों बनाया गया ? गोपियों का नायक बनाकर सर्जक असल में किसे चुनौती देता है ?

कृष्ण के साथ गोपियों का संसार सामंतकाल में जुड़ता है। श्रीकृष्ण और गोपियों का प्रेम वस्तुत: सामंती बंदिशें और नियमों का निषेध है।

सवाल यह है इतने ताक़तवर आख्यान को रचने के बाद भी ब्रज के इलाक़े में सामंती मूल्य ध्वस्त क्यों नहीं हुए? आज भी जो जय हो जय हो कर रहे हैं वे सामंती मूल्यों के मोह में क्यों बँधे हैं? यह भक्ति का ग़ैर -यथार्थवादी रूप है।



श्रीकृष्ण कल्पना है ,कल्पना को सत्य बनाने में हमारा समाज महान है।फिर श्रीकृष्ण की कल्पना मनोहर,मनोरंजक और ज्ञान से भरी है।संभवतः खृष्म पहले ऐसे विचारक हैं जो गीता के जरिए विकसित समाज व्यवस्था की परिकल्पना पेश करते हैं।गीता जब लिखी गयी तो उसमें वर्गहीन,आदिम समाज व्यवस्था से आगे बढ़ी हुई नई चातुर्वण्य व्यवस्था की ओर ले जाने का सपना पेश किया गया।यानि आने वाला व्यवस्था के प्रति ऐतिहासिक आकांक्षा व्यक्त की गयी।यह वर्गहीन समाज से वर्गों वाले समाज के रूपान्तरण की दिशा में बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन था।

कृष्ण का चरित्र ग़ैर-परंपरागत है। ग़ैर- परंपरागत चरित्र और आचरण किस तरह सिस्टम में तनाव पैदा कर सकता है , आनंद, प्रेम और युद्ध का नायक बन सकता है यह सीखना चाहिए कृष्ण से।

श्रीकृष्ण पहले विचारकों में हैं जो संसार मिथ्या है ,इस धारणा का खंडन करते हैं,वे कहते है संसार विमुख होकर कोई पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता।निष्काम कर्मयोग उनकी ही देन है,जिसका कालांतर में शासकवर्गों ने जमकर उपयोग किया।लेकिन इस धारणा का प्रगतिशील ताकतों ने नए समाज के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया।

श्रीकृष्ण ऐसा चरित्र है जो भगवान के रूप में कम चरित्र रूप में ज़्यादा लोकप्रिय है।लोकप्रिय कहानियों के ज़रिए सबसे ज्यादा जनप्रिय है।



बुधवार, 20 जुलाई 2016

फेसबुक सूक्तियाँ




नियमित अच्छी चीजों को पढ़ने की आदत होनी चाहिए।नियमित रीडिंग बेहतर इंसान बनाती है।

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मनुष्य के अंदर का खालीपन सिर्फ दो चीजों से भरा जा सकता है ,वह है प्रेम और त्याग ।

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जो धर्म भय पैदा करे वह धर्म नहीं है,धर्म वह है जो अभय दे।

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रामचरित मानस में रचित राम को एक ही चीज पसंद है प्रेम।प्रामाणिक प्रेम प्रसन्नता का जनक है।

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सत्य के लिए आक्रामकता नहीं त्याग और विनम्रता चाहिए।

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सत्य को धैर्य के बिना नहीं पा सकते।वह स्वाभाविक चीज है।

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सद्गुरू सबसे समर्थ वैद्य है।

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श्रद्धा का स्थान फेसबुक नहीं मनुष्य का हृदय है।

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मानव समाज में विचारों का दान श्रेष्ठ दान है।

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अभिभावक के बिना लड़का-लड़की की पहचान होती है,जब पहचान होती है तो फिर हर जगह अभिभावक का नाम क्यों लिखते हो,सीधे नाम लिखो पता लिखो,बंदे के बारे में विवरण लिखो,अभिभावक पिता होगा या माँ,इन दोनों के दबाव से व्यक्ति की पहचान को निकालना चाहिए।व्यक्ति को व्यक्ति की तरह देखो,वंशधर की तरह नहीं।

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ग़ज़ब का फिल्मीगेम है ये फ़िल्म में हीरो -हीरोइन दोनों होते हैं लेकिन खबर बनती है सलमान की फ़िल्म हिट! अमीर की फ़िल्म हिट! कभी अनुष्का का भी नाम ले लिया करो मीडियावालो।हीरोइन के बिना फ़िल्म नहीं बनती फिर प्रचार में हीरो का ही जयगान क्यों ?

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मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर ने व्यंग्य करते हुए कहा "आखिर शादी के लिए जितनी पूछ आईएएस, इंजीनियर, डॉक्टर आदि अन्य

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पेशों के युवकों की है उतनी पूछ वकीलों की क्यों नहीं है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आईएएस, इंजीनियर और चिकित्सक बनना उतना आसान नहीं है लेकिन जो देखो वही वकील बन जाता है। शायद यही कारण है कि शादी के लिए वकीलों की पूछ नहीं होती है।’

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ठठेरेबाजी और नॉनसेंस भाषा को एमटीवी आदि टीवी चैनल ने रियलिटी शो का अनिवार्य अंग बनाकर रद्दी को मुनाफे में बदल दिया है। आज के युवाओं को इस तरह के रियलिटी शो की तू-तड़ाक की भाषा प्रभावित कर रही है।

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मैं गंभीर लोगों से डरता हूं।मुझे गंभीरता नहीं व्यंग्य पसंद है।

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आत्मा,परमात्मा,अन्तर्मन,अंतर्दृष्टि,परमपिता,परम तत्व,परम,अन्तरात्मा आदि पदबंध अप्रासंगिक हो गए हैं।

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मेरे लिए फेसबुक खेल है और खेल में सूरदास के अनुसार- खेलन में को काकों गुसईंया। यानी सब समान हैं।

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किसी भी कला का ज्ञान मनुष्य को बूढा नहीं होने देता।

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धर्म पुरानी जीवन संहिता है,संविधान नई जीवन संहिता है। तय करो किस ओर हो तुम।

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सही ज्ञान वह है जो मनुष्य को सही-गलत की पहचान कराए।

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तर्क में परास्त करना सबसे घटिया चीज है,इससे आनंद नष्ट होता है।सुंदर तर्क वह है जो संवाद में खींचे,संवाद खुला रखे।

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बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी पुनर्जन्म की धारणा में आस्था।

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अंतर्दृष्टि जैसी कोई चीज नहीं होती।

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महाभारत तो कुरूक्षेत्र के बिना लिखा गया।

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पवित्रता सबसे घटिया शब्द है,इसने सबसे ज्यादा पीड़ित किया है।

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मोक्ष का मतलब मरना नहीं है, मोक्ष का मतलब मोह रहित सावधानी से जीना है।

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जो धर्म मातहत भाव का प्रचार करे वह धर्म नहीं अधर्म है।

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जिस तरह दुख की कोई सीमा नहीं होती,उसी तरह सुख की भी कोई सीमा नहीं है।

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विवेकहीन भक्ति और प्रेम अंततःदुख देते हैं।

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भक्ति और प्रेम में विधि निषेध नहीं होते,बल्कि सभी किस्म के विधि निषेधों का अंत हो जाता है।

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दुनिया से विरक्ति पैदा कर दे वह गुरू नहीं बल्कि दुनिया को समझाए वह है गुरू।

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व्यक्ति के विकास के लिए एकांत जरूरी है।

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आधुनिक धार्मिक प्रचारक इन दिनों धर्म-चर्चा कम राजनीतिक और व्यापारिक चर्चाएं ज्यादा करते हैं।इनमें से अधिकांश के साथ कारपोरेट घरानों में से कोई न कोई बंदा काम कर रहा है।धर्म इन सबके कारण अधर्म में रूपान्तरित हो गया है।धर्म यदि धर्म का मार्ग छोड़कर अन्य मार्ग ग्रहण कर ले तो समझो धर्म का अंत हो गया .वह राजनीति बन गया।दिलचस्प बात यह है कि इन नए धर्म प्रचारकों को टीवी बहुत पसंद है,बिना टीवी के इनके विचारों का प्रसार नहीं होता।टीवी से धर्म का प्रचार धर्म को धर्म नहीं रहने देता,बल्कि राजनीतिक बनाता है।

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रविवार, 26 जून 2016

सोशल मीडिया के डिजिटल संस्कार

       फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए।

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढ़ती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो लोग आजादी का मंच समझ रहे हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। फेसबुक का अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों ,जैसे सीआईए,एफबीआई आदि से याराना है,वे सभी फेसबुक यूजरों की नजरदारी कर रहे हैं,अब इसी पैटर्न पर भारत सरकार भी नजरदारी कर रही है। फेसबुक यूजर शालीनता,लोकतांत्रिकबोध और परिपक्व नागरिक की तरह इस माध्यम का इस्तेमाल करें।

हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है।



समग्रता में देखें तो फेसबुक पर हम असहिष्णु समाज बना रहे हैं ?सामान्यतौर पर कम्युनिकेशन सहिष्णु बनाता है,लेकिन फेसबुक ने यूजर के अवचेतन को जगाया है। अवचेतन में पड़ी घृणा,गंदगी, अश्लीलता आदि को अभिव्यक्त करने का सहज मौका दिया है। हमें सोचना चाहिए कि चेतनमन को जगाते हैं या अवचेतन मन को? फिलहाल तो अवचेतन की हवा बह रही है। कम्युनिकेशन के लिए चेतनमन सक्रिय रहे तो सुरक्षा है वरना खतरे ही खतरे हैं।

सोशलमीडिया को लेकर भारत सरकार की सचेतनता का कोई अर्थ नहीं है। असलमें ,सबसे पहले भारत सरकार को पोर्न सामग्री के वितरण पर पाबंदी लगानी चाहिए। पोर्न दिखाना-बेचना अपराध है।इसके सामाजिक दुष्प्रभावों पर सारी दुनिया में बहस हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके विरोधीदल पोर्न के मामले पर चुप हैं।महिला संगठन भी चुप्पी लगाए हुए हैं।इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी को लेकर जारी विवाद के बीच नामी सर्च पोर्टल गूगल ने अपनी पारदर्शिता रिपोर्ट में जनवरी 2011 से लेकर जून 2011 के बीच सरकार की ओर से सामग्री हटाने की सिफारिशें जारी की हैं। गूगल ने बताया है कि इस अवधि में सरकार ने उससे 358 आइटम और 68 कंटेंट हटाने की मांग की थी, जिसमें से कंपनी ने 51 फीसदी मांगों को आंशिक या पूरे तौर पर मान लिया था।

गूगल ने बताया, 'राज्य और स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमसे सामाजिक नेताओं के विरोध में प्रदर्शन, आपत्तिजनक भाषा वाले वीडियो यू ट्यूब से हटाने के लिए कहा था। हमने इनमें से ज्यादातर वीडियो हटाने से मना कर दिया था और महज उन्हीं वीडियो को हटाया था, जिनके कारण समुदायों में रंजिश बढऩे की आशंका थी।

सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार की चिन्ताएं अन्ना आंदोलन के समय सामने आ गयी थीं। मोदी सरकार आने के बाद भी केन्द्र सरकार का पुराना नजरिया बदला नहीं है।यह एक तरह से सोशल मीडिया की संचालक कंपनियों को धमकी है कि 'सावधान रहो अपने दायरे के बाहर मत जाओ।' विचारणीय बात यह है जो केन्द्र सरकार दूरसंचार विभाग को नहीं चला पायी और उसे निजी स्वामित्व में दे दिया। वह सोशलमीडिया को क्या नियंत्रित करेगी ! ये सिर्फ कागजी कानूनी शेरों की बातें हैं ! इसके बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे फेसबुक बंधुओं को शालीन भाषा,सभ्य राजनीति और संस्कृति के नए मानकों को बनाना चाहिए। फेसबुक पर गली-मोहल्लों की भाषा ,खासकर गाली-गलौज की भाषा से बचना चाहिए। अन्ना भक्तमंडली से लेकर भाजपा की वानरटोली तक यह फिनोमिना देखा गया है। इन लोगों के एक धड़े ने फेसबुक पर आएदिन जो गंदगी की है,उसने सोशलमीडिया की साख को बट्टा लगाया है।



फेसबुक पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को 'बेचने' का

आरोप है और इस मुद्दे पर उसे यूरोप में कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ' संडे टेलिग्राफ ' की एक रिपोर्ट के अनुसार , फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपना 'प्राइवेसी सेटिंग' कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों की गतिविधियों की सूचना जमा कर रही है और उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय आयोग 2012 जनवरी में एक नया निर्देश जारी करने वाला है जिसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

दूसरे उद्योगों की तरह भारतीय दूरसंचार के आंकड़े भ्रमित करने वाले हैं। देश में 85 करोड़ से अधिक पंजीकृत मोबाइल नंबर हैं। पर स्पेक्ट्रम आवंटन का ढांचा सेवा प्रदाताओं के लिए इनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। इसमें से एक तिहाई नंबर ऐक्टिव नहीं हैं। बाकी बचे नंबरों में से भी कई उन ग्राहकों के नाम पर पंजीकृत हैं जो ऑफिस या निजी इस्तेमाल के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति ग्राहक औसत राजस्व घटा है। इस कारण से सेवा प्रदाताओं का मुनाफा भी कम हुआ है। हर सर्किल में दर्जनों टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां हैं। इनमें से कुछ ही पैसा बना पाती हैं और नई कंपनियां तो अब तक अपने निवेश का बड़ा हिस्सा तक नहीं वसूल पाई हैं। इस बदहाल अवस्था के बाद तो दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण को यहीं रोकना चाहिए।

सीईए के साथ समझौते और तकनीकी सहमेल के कारण फेसबुक अपने यूजर की प्राइवेसी में हस्तक्षेप और तांक-झांक कर रहा है। फेसबुक अधिकारियों के अनुसार फेसबुक अपने यूज़र के लॉग ऑफ करने के बाद भी इस बात पर नजर रखता है कि उसके यूजर्स कौन सी वेबसाइट विजिट कर रहे हैं।

चीन में इंटरनेट के 50 करोड़ के करीब यूजर हैं और सबसे शक्तिशाली इंटरनेट सेंसरशिप भी है। सर्वसत्तावादी एकतंत्र में यह व्यवस्था बेहद परेशानी खड़ी करने वाली है। नव्य आर्थिक उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के दायरे में आने के बावजूद वहां पर इंटरनेट सेंसरशिप में कोई ढ़ील नहीं आयी है। कायदे से उसे अपने सिस्टम को और उदार बनाना था,लेकिन उन्होंने नहीं किया। चीन पर विश्व जनमत का भी कोई दबाव नहीं है।इसका अर्थ यही है कि लूट की उदारता में चीन हिस्सेदार है,लोकतांत्रिक छूट देने के मामले में चीन आज भी कंजरवेटिव है। चीन का मॉडल है राजनीति में सर्वसत्तावाद,आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट तंत्र,उपभोक्तावाद और सख्त सेंसरशिप।

भारत में फेसबुक और इंटरनेट पर साइबर हैकरों के हमले बढ़ गए हैं। अभी तक भारत फेसबुक संतों की शांत रमणस्थली था लेकिन विगत एक सप्ताह से साइबर अशांति की खबरें आ रही हैं। भारत सरकार के संस्थानों की बेवसाइट हैक करके नकली लोग अन्य देशों की बेवसाइट पर हमले कर रहे हैं। इसी तरह फेसबुक को बाजार में डाउन करने के लिए नए तरीकों से पोर्न सामग्री फेसबुक पर भेजी जा रही है। साइबर हैकरों की इन शैतानियों के प्रति सजगता जरूरी है। इस विषय पर फेसबुक दोस्तों को अपनी वॉल पर लिखना चाहिए।भारत में संचार क्रांति के दुरूपयोगों के प्रति सचेतनता बढ़ रही है। इंटरनेट,फेसबुक,सोशल साइट ,ब्लॉग आदि पर अपमानजनक बातें लिखने वालों के प्रति अब आम यूजर सचेत हो रहा है। इस सचेतनता के कारण ही एक युवक को एक लड़की के प्रति अपमानजनक और अशालीन बातें नेट पर लिखने के लिए अदालत ने 20हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। आप भी आई टी एक्ट के प्रति जागरूक बनें ।

दूसरी ओर सीआईए ने फेसबुक और ट्विटर पर निगरानी तेज कर दी है। वे विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक और अन्य किस्म की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हैं। इसके आधार पर वे अपने रणकौशल को भी बदल रहे हैं ,साथ ही यूजरों का व्यापक प्रोफाइल भी बना रहे हैं। यह यूजरों की निजता का उल्लंघन है ?

इंटरनेट आने के बाद से ऑनलाइन छेडखानी ,उत्पीड़न और अपमान की घटनाओं में इजाफा हुआ है। मसलन् ,आस्ट्रेलिया में 2008 में की गयी रिसर्च में पाया कि 42प्रतिशत युवाओं को ह्रासमेंट का सामना करना पड़ा।एक अन्य सर्वे में 36 फीसद लड़कियों और 32 फीसद लड़कों ने ह्रासमेंट की शिकायत की। ऑनलाइन ह्रासमेंट की घटनाओं से भारत में भी एक बड़ा तबका परेशान है । लेकिन अभी तक ऑनलाइन ह्रासमेंट की सटीक अवधारणा विकसित नहीं हो पायी है ।

फेसबुक के 80 करोड़ यूजर हैं और उसकी विज्ञापनों से इस साल 4.27 बिलियन डालर की आमदनी हुई है जो उसकी सकल आय का 85 फीसदी है। ऐसे में फेसबुक पर मंथली चार्ज लेने की अफवाह उसके प्रतिद्वंद्वी सोशल मीडिया साइट के लोगों ने ही उड़ायी है। फेसबुक पर जो लिखा जाता है उस पर सहज में विश्वास न करें। उसकी अन्य स्रोतों से पुष्टि करें। फेसबुक पर अफवाहें भी चलती हैं।

फेसबुक पर कभी आर्थिक तबाही के घटनाक्रमों पर मित्रलोग बहस क्यों नहीं करते ? क्या भारत में आर्थिक खुशहाली आ गयी है ? क्या मंदी की मार के सवाल सताते हैं ? सवाल यह है फेसबुक को हम भारत की मूल समस्याओं का मंच क्यों नहीं बना पाए हैं ?

फेसबुक पर वर्चुअल कामुक औरतें सक्रिय हैं।ये फेसबुक और चैटिंग के बहाने मोहित करती हैं। वर्चुअल प्रेम में फंसाती हैं और अंतमें गहरी निराशा और हताशा में धकेल देती हैं। आज इनके एक शिकार युवा ने फेसबुक से विदा ले ली। कहने का अर्थ है फेसबुक पर वर्चुअल औरतों से चैटिंग ओर वर्चुअल प्रेम न करें। यह आत्मघाती है।

नए साइबर जमाने के युवाओं में लोकतांत्रिक प्रतिवाद की आकांक्षाएं कम है। यह समाज से विच्छिन्न है और पूरी तरह मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग से सम्बद्ध है। इस युवा की मनोसंरचनाएं उपभोग,अकेलेपन , क्षण में पाने की आकांक्षा और प्रतिहिंसा ने निर्मित की है।

इंटरनेट महान है,फेसबुक महानतम है और लुढ़कता बाजार और आर्थिक मंदी इन सबसे महान है। संचार क्रांति और भूमंडलीकरण जिस स्वर्ग का सपना लेकर आए थे वहां इन दिनों वैचारिक-सांस्कृतिक सन्नाटा पसरा हुआ है। हमारे दोस्त इन सब सवालों पर चुप हैं । क्या ये सवाल बहस के लायक नहीं हैं ॽ

फेसबुक तो स्वर्ग की इन्द्रसभा है इसमें सुख है,आनंद है,विचार हैं,अमरता है,गान,संगीत, नृत्य, चित्र,मित्र सब हैं,इन्द्रसभा की तरह यहां रसोई ,खाना ,महंगाई ,मंदी ,राक्षस ,पति, पत्नी, संतान,समाज आदि की चिन्ता नहीं है। यहां सिर्फ रस , आनंद और अभिव्यक्ति है।यह सुखियों का संसार है।फेसबुक क्षणिक और अधूरी अभिव्यक्ति का माध्यम है।फेसबुक सिरपड़ों का खेल है,यहां अपरिचय के परिचय,बिना दीवार के वॉल,बिना स्याही कागज का लेखन,मुँह देखी मीठी बातें और खोखली प्रशंसाओं की लंबी सूची,सूचनाओं का ढ़ेर, बिना मांगे उपदेश,मजे की बातें,बोरिंग बातें,विज्ञापन और नकली व्यक्तिवाद का खोखला ताण्डव और फेसबुक का अरबों का धंधा।यानी फेसबुक उल्लू है उसकी सवारी लक्ष्मी करती है।फेसबुक में स्वर्ग और नरक भी हैं , स्वर्ग में उत्तर अमेरिका है वहां की 41 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है । नरक में विश्व की बाकी आबादी है जिसमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हैं।अफ्रीका की मात्र 1 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है। ऑनलाइन स्वर्ग है और जो लाइन में है वो नरक में हैं। फेसबुक पर कुछ लोग हैं जो 11बजे के बाद अवतरित होते हैं वे फेसबुक के यक्ष-यक्षिणी हैं।

परवर्ती पूंजीवाद में सबसे बड़े किराए वसूलने वाले कारपोरेट घराने हैं। वे केबल टीवी से लेकर डीटीएच तक,इंटरनेट से टेलीफोन तक,डिस्नी लैंड से लेकर साइंस सिटी तक आम जनता से आनंद और कम्युनिकेशन के बदले किराया वसूलते हैं। यह किराया ही मोनोपोली कैपीटलिज्म के मुनाफे और आनंद का मूल स्रोत है। क्या इसके बाद भी हमें पूंजीवाद से प्यार करना चाहिए ?

पूंजीवाद में कोई भी कम्युनिकेशन फोकट में नहीं होता।दूरसंचार -मीडिया के इजारेदार घरानों की मुनाफाखोरी के बिना नहीं होता। मसलन् फेसबुक,ब्लॉग आदि इंटरनेट कम्युनिकेशन के लिए हम किराया देते हैं। दूरसंचार मुगल इस किराए से अमीर बनते हैं।यह परवर्ती पूंजीवाद का किराए का कम्युनिकेशन है और इसी अर्थ में बुर्जुआ कम्युनिकेशन है।

फेसबुक के मित्र किस विचारधारा के हैं यह जानने का आसान तरीका है कि वे किन विषयों पर वॉल पर लिखते हैं,किन विषयों पर अन्यत्र जाकर पढ़ते हैं और आमतौर पर उनकी किस तरह के राजनीतिक-आर्थिक सवालों में रूचि रखते हैं ? टिप्पणी करते हैं ?सवाल यह है कि क्या फेसबुक विचारधारारहित कम्युनिकेशन है ? फेसबुक पर शिक्षित युवा और अधेड़ आमतौर पर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वो प्रतिगामी भाषिक- सांस्कृतिक मनोदशा की अभिव्यक्ति है। ये,नकली फोटो लगाना, गलत सूचनाएं देना,विभ्रम की बातें करना,अश्लील भाषा या द्वयर्थक भाषा में लिखना,चैट करते हुए किसी भी लिंक को भेज देना आदि। अनेक लोग हैं जो फेसबुक पर लड़की देखी और लगे पीछा करने, ये लोग फेसबुक पर लड़की को पीछा किए बिना क्यों नहीं रह पाते ? पहले दोस्त बनाते हैं फिर चैट में पीछा करते हैं,क्या यह नेट पर स्त्री उत्पीड़न है ?

इंटरनेट पर सत्ता की नजरदारी लगातार बढ़ रही है।लैटिन अमेरिका में इंटरनेट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।प्रतिवादियों पर नजर रखी जा रही है,उन पर नियंत्रण लगाया जा रहा है। पेरू से लेकर बोलविया तक इंटरनेट की नजरदारी हो रही है। ईमेल,फेसबुक,ब्लॉग,ई मूवमेंट आदि पर विभिन्न तरीकों से नजर रखी जा रही है। यह नेट प्राइवेसी का अंत है।

इंटरनेट और कम्प्यूटर का ज्यादा उपयोग स्मृति में संचित करने की दिशा बदल सकता है। आमतौर पर अभी वैज्ञानिक नहीं जानते कि इससे मनुष्य की स्मृति का क्षय हो रहा है या स्मृति समृद्ध हो रही है। लेकिन मन के बाहर जो चीज संग्रहीत करना चाहते हैं उसके लिए इंटरनेट और कम्प्यूटर सुंदर माध्यम और संग्रहशाला है। मनुष्य का दिमाग इस मीडिय़म की संगति में धीरे धीरे बदल रहा है।

यह संचार क्रांति की आजादी के अंत की बेला है। संचार क्रांति ने जिस तरह की स्वतंत्रता और प्राइवेसी का आरंभ में वायदा किया था उसका धीरे धीरे अंत हो रहा है। आम लोगों की प्राइवेसी को नियंत्रित और नियोजित किया जा रहा है। बेहतर है नेट की दुनिया में हम अपने निजी पत्ते न खोलें।

साइबर साँड मात्र शब्दों से ही अपमानित नहीं करते वे इलैक्ट्रोनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे किसी को अपमानित या परेशान करने के लिए गंदे,अश्लील वीडियो फेसबुक की वॉल पर लगा देते हैं।अपमानजनक एमएमएस या ईमेल करते हैं। अपमानजनक या नेगेटिव साइबर टेक्स्ट भेज देते हैं।

साइबर बांस करने के तरीके क्या हैं- पहला तरीका है आघात पहुँचा,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना,सेक्सुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल करना, परेशान करना,मसलन् , बार-बार यह कहना 'बात कीजिए प्लीज' आदि । जो व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कितनी बार दोहराता है अपने व्यवहार को,महिने में एक बार,दो बार ,तीनबार या रोज।इससे आप उसके असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।साइबर साँड मूलतःसामाजिक जीवन में मौजूद दादागिरी का ही साइबर रूप है। साइबर साँड ज्यादातर वे युवा और तरूण हैं जो एडजेस्टमेंट प्रॉब्लम के शिकार हैं। इसे साइबर भाषा में रिस्क ग्रुप में रखा जाता है और ये लोग भिन्न किस्म के व्यवहार की मांग करते हैं।साइबर पंगेबाज को साइबर बैल कहना ज्यादा सही होगा।वे अपनी नेगेटिव हरकत को बार बार दोहराते हैं। मसलन् साइबर बैल चैट में आकर पूछते हैं '' क्या आप मुझे पसंद करते हैं'। 'सेक्स करोगे',या वे कोई व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले वाक्य या शब्द का इस्तेमाल कर बैठते हैं। साइबर स्पेस में किया गया एक नेगेटिव एक्शन दूरगामी असर छोड़ता है। नेगेटिव एक्शन की पुनरावृत्ति तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है।साइबर पंगेबाज कैसे लोग होते हैं ,किस उम्र के होते हैं,उनके पंगा लेने का तरीका क्या वे साइबर कम्युनिकेशन में कैसे परेशान करते हैं। इसे साइबर में 'बांस' करना भी कहते हैं।पश्चिम में इसमें ज्यादातर 10-18साल की उम्र के तरूण आते हैं।भारत में ऐसे लोगों में वयस्कों की संख्या ज्यादा है। इन लोगों का काम है नेट,फेसबुक,ब्लॉग,ईमेल,चाट आदि के जरिए आघात पहुँचाना।ये नेगेटिव एक्शन में ज्यादा रहते हैं।

नेट पर किए गए अनेक अनुसंधान बताते हैं कि जो ज्यादा चैट ,ईमेल और शॉपिंग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण ज्यादा होते हैं।ताइवान के कॉलेज छात्रों में किए अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट की लत का पढ़ाई ,दैनिक रूटीन पर असर होता है। जिनको लत है वे अवसाद में कष्ट पाते हैं।फेसबुक की बढ़ती आदत ने अमेरिकी तरूणों की स्कूली पढ़ाई को प्रभावित किया है।इंटरनेट में उन्हीं यूजरों के साथ दुर्व्यवहार या एब्यूज की घटनाएं देखी गयी हैं जिनमें आमने-सामने बात करने की क्षमता का अभाव होता है अथवा जो अवसाद में रहते हैं।रिसर्च में पाया गया है कि इंटरनेट यूजरों में जो अकेलेपन में नहीं हैं वे भावनात्मक सहयोगी की तलाश में नेट पर आते हैं। ऑनलाइन मित्र यहां ऑफलाइन मित्रों से मिलकर संतोष पाते हैं। इस तरह के यूजर भी हैं जो मनो व्यथाओं के शिकार हैं और अपनी व्यथा का समाधान खोजने आते हैं। इनमें बेचैनी,अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी गयी है।

सन् 1990 के आसपास जब इंटरनेट का चलन तेज हुआ तो उस समय इसे लेकर भय और उत्साह का भाव था।आरंभ के शोध बताते हैं इंटरनेट के उपयोग ने अकेलेपन ,अवसाद और तनाव में वृद्धि की।नेट विशेषज्ञों का मानना है कि संचार की नई तकनीक के कारण हठात कम्युनिकेशन बढ़ जाने का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक असर होता है। इससे लत और अवसाद की जुगलबंदी पैदा होती है।क्या सोशल मीडिया नेटवर्क में गालियों का वही स्थान है जो उसे हमने सामाजिक जीवन में दिया है ? क्या सोशल मीडिया गालियों से ऊर्जा प्राप्त करता है ?गालियां संवादहीनता का संकेत है ।

फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?मनमाने ढ़ंग से अपनी बात कहने का ढ़ंग अभागों का ढ़ंग है।कहते-कहते ऐसा भी कुछ सुनने को मिल जाता है जो पहले कभी नहीं सुना था।कहने के स्रोत में जब ज्वार आता है तब न जाने किस गुफा के भीतर की अनजान सामग्री बहती-बहती आकर घाट पर लग जाती है। क्या आपने ऐसा अनुभव किया है ?



सौंदर्य मनुष्य को संयम की ओर खींचता है,शालीनता का विकास करता है। इसके अलावा हमारी क्षुधा तृप्ति के साथ -साथ सदा उच्चतर सुर जगाता है।फेसबुक ने आम लोगों में खासकर मध्यवर्ग के लोगों में झूठ बोलने,फुसलाने,हां में हां मिलाने या निरर्थक समय खर्च करने की आदत में इजाफा किया है। छद्म या आभासी यथार्थ में जीने की भावना को पुख्ता बनाया है। आदमी का कम्युनिकेशन फास्ट किया है लेकिन संचार ,समाज ,व्यक्ति और वस्तु के बीच में महा-अंतराल पैदा किया है।फेसबुक यूजरों की संख्या 70 करोड़ के करीब हो गई है। आश्चर्यजनक बात है कि अमेरिका में फेसबुक यूजरों की संख्या में 6 मिलियन की गिरावट आई है।इसी तरह कनाडा,रूस,ब्रिटेन,नार्वे में फेसबुक यूजरों की संख्या घटी है। लेकिन विकासशील देशों में बढ़ रही है। क्या अमेरिकी लोग त्रस्त हैं फेसबुक से ?क्या फेसबुक सामाजिक-भावनात्मक अलगाव पैदा कर रहा है ?फेसबुक की खूबी है "जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान",अनजाने लोगों से राजनीतिक-सामाजिक चर्चा तो ठीक है लेकिन इमोशनल बातें करना,व्यक्तिगत जानकारियां देना खतरनाक है।



शनिवार, 14 मई 2016

स्टीरियोटाइप से निकलकर देखो



फेसबुक पर स्टीरियोटाइप लेखन खूब है।जाति ,धर्म,राजनीति और लिंगाधारित स्टीरियोटाइप ने समूचे संचार को घेरा हुआ है,हम उससे भिन्न संचार की कभी चर्चा ही नहीं करते।जो जिस पर लगा है वह उसी पर लगा है।इसने संचार में रूढ़िबद्धता को जन्म दिया है।संप्रेषण के मामले में हमें स्टीरियोटाइप बनाया है। जो मोदी विरोधी हैं वे मोदी विरोध पर ही केन्द्रित हैं,जो साहित्य पर केन्द्रित हैं वे लगातार साहित्य पर लिख रहे हैं,जो दलित केन्द्रित हैं वे हमेशा दलितों के सवालों पर ही लिख रहे हैं,जो मोदी भक्त हैं वे मोदीभक्ति में ही हमेशा डूबे रहते हैं।जो समलैंगिक हैं वे उसी मसले पर चिपके पड़े हैं,जो जेएनयू केन्द्रित हैं वे सिर्फ जेएनयू के मसले पर ही ध्यान लगाए बैठे हैं।कायदे से संप्रेषण में इस तरह के रूढ़िबद्ध दायरे टूटने चाहिए लेकिन हो उल्टा रहा है।रूढ़िबद्धता बढ़ रही है।इससे वैचारिक तौर पर फंडामेंटलिज्म को मदद मिलती है।विकल्प की राजनीति के विकास में बाधाएं पैदा होती हैं। रूढिबद्ध संप्रेषण वस्तुतःनिरर्थक संप्रेषण है,वह विकल्प के रूपों के बारे में सोचने ही नहीं देता।फेसबुक सेलेकर मीडिया तक रूढिबद्धता का फलक इतना व्यापक है कि हम भिन्न चीजों पर सोचना बंद कर देते हैं। प्रचलित रूढिबद्ध विषयों पर लिखकर हम सब जाने- अनजाने सर्जनात्मकता विरोधी संचार करते हैं।एक अवस्था के बाद इसके गर्भ से कु-कम्युनिकेशन जन्म लेता है।

गुरुवार, 12 मई 2016

फेसबुक पापाचार


एक सज्जन हैं और लेखक हैं। लेकिन फेसबुक पर लड़की देखकर लंपट भावबोध में चले जाते हैं।फेसबुक पर उनके कुकर्म देखें ,फेसबुक में कुकर्म भाषा में होता है।जैसे, हलो, कैसी हो,अकेली हो,मैं तो अंधेरे में बैठा हूँ। वगैरह -वगैरह।
अब इन जनाब को कौन समझाए कि जान न पहचान बड़े मियाँ सलाम करके लड़की देखी और पीछे हो लिए।काश,ये जनाब सभ्य हो पाते !
जीवन में कमीनापन पसंद नहीं करते तो फेसबुकलेखन में कमीनापन कैसे मान लें। कमीनेपन की लेखन में कोई जगह नहीं है। कमीनापन असभ्यता है। लेखन का काम है कमीनेपन को नंगा करना, न कि कमीनापन करना।
फेसबुक पर सक्रिय पापबुद्धि का एक और रुप है, हाल ही में जिस दिन समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो मैंने उसदिन कई पोस्ट लगायीं। एक जनाब चैटिंग में आए और लगे बतियाने,बोले अजी सर,अब आपके पास तो कई समलैंगिकों के प्रस्ताव आ जाएंगे। अब आपलोग ही बताएं इस तरह की मनोदशा के लोगों का पागलखाने के अलावा और कहीं इलाज संभव है ?
     फेसबुक पर पापाचार का आलम यह है कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को दुष्टलोग आए दिन सताते हैं। सताने के तरीके जानें - शुरु होतेही कहेंगे, हलो,कैसी हो,इसके बाद नाम-पता-अभिरुचि आदि जानेंगे फिर कहेंगे लेख आदि लिखती हो तो भेजो मैं फलां फलां पत्रिका निकालता हूँ ,मैं फलां प्रकाशक को जानता हूँ, इसके बाद डर्टी भाषा में चले जाते हैं। मैसेज बॉक्स को गंदे संदेशों और फोटो से भर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति को नामर्द कहते हैं।फेसबुक पर लड़की की मित्रता मिलती तो उपहार की तरह है लेकिन यदि उसका लंपटगिरी के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो हमारे देश में बड़े जालिम कानून हैं लंपटो !!
     फेसबुक पापाचार का नया रुप है लड़की को देखकर उन्मत्त हो जाना । उसकी व्यस्तता और खाली समय की खोजबीन करना। गैर जरुरी पर तौर प्रशंसा करना ।यह फेसबुक पर हताश मन की अभिव्यक्ति है।
फेसबुक पर लड़की देखते ही प्रशंसा करना। मुखमंडल या फोटो पर बलिहारी- बलिहारी हो जाना।यह बीमारी है। फेसबुक पर लड़की को सुंदर और वांछनीय मानना अंततःपापाचार है। इसका वास्तव भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है। यह फेसबुक लंपटगिरी है।फेसबुक पर कोई लड़की किसी लड़के से बात करती है तो इसका यह अर्थ नहीं है कि वे प्रेम करते हैं। फेसबुक कम्युनिकेशन प्रेम की नहीं सामान्य कम्युनिकेशन की जगह है। फेसबुक पर अनजान लोगों में ,खासकर लड़की के प्रति घनिष्ठता का प्रदर्शन मात्र कम्युनिकेशन है ,यह न मित्रता है ,और न घनिष्ठता है।
फेसबुक पर लड़कियां स्वतंत्र नहीं होतीं। यहां पर भी उनकी घेराबंदी होती रहती है। स्त्री को मर्दवादी मानसिकता की अभिव्यक्ति के लिए उकसाने का सबसे अच्छा तरीका है औरत को बेबकूफियां करने वाले वाक्य या पोस्ट लिखने दो और धड़ाधड़ लाइक करते जाओ। यह फेसबुक लंपटई का नया देशी मुहावरा है।फेसबुक लंपटता मर्द की अल्पकालिक शाब्दिक तड़प है।
फेसबुक कल्चर स्वस्थ कल्चर बने और इसे फेक होने से यथासंभव बचाएं।यह बडा माध्यम है कम्युनिकेशन का। फेसबुक पर ज्यादा से ज्यादा यथार्थवादी-मानवीय और सरल बनें।तर्क करें और पंगे न करें। नई बातें लिखें ,अपमान न करें। आलोचना लिखें,गाली न दें या हेयभाषा न लिखें। यह नया कम्युनिकेशन है और इसका शास्त्र अभी रचा जाना है।
जिस तरह समाज में मूर्खों की कमी नहीं है ,वैसे ही फेसबुक पर भी मूर्खों की कमी नहीं है,वे बिना बुलाए चले आते हैं। जिस तरह समाज में फंडामेंटलिस्ट और अविववेकवादी हैं, फेसबुक पर भी हैं। फेसबुक को समृद्ध करने का तरीका है मूर्खों और अविवेकवादियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। अविवेकवादी-फंडामेंटलिस्ट किसी भी दल में हो सकते हैं। हम उनको पहचानें और छोडें।
फेसबुक कल्चर है असहमत के साथ बैठना,कम्युनिकेट करना और आलोचना करना। "हेट " ,"निंदा "या "घृणा" से दूर रहना। मोदी हो या फंडामेंटलिस्ट हों या कांग्रेसी हों हम इनको पसंद नहीं करते, फिर भी ये लोग समाज में हैं तो इनकी हरकतों की बार बार आलोचना करते हैं।आलोचना करना लोकतंत्र में जीना है। यह विरोधी को गले लगाना नहीं है।
     फेसबुक शरीफों का वधस्थल है। यहां पर कम्युनिकेशन तो है ही ,वध भी होता है । खासकर यदि कोई व्यक्ति जनप्रिय हो। उसकी समाज में साख हो तो उसका जनता की आलोचना से बचना मुश्किल है ।


मंगलवार, 10 मई 2016

सोशलमीडिया के डिजिटल संस्कार-

                फेसबुक पर अश्लील वीडियो पोस्ट करने,अश्लील गालियां लिखने,औरतों के प्रति अशालीन आचरण करने,गद्दी बातें लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है। कायदे से फेसबुक प्रबंधकों को अश्लील, अपमानजनक भाषा और कामुक सामग्री आदि को निजी पहल करके सेंसर करना चाहिए। अश्लील -कामुक सामग्री और गालियां फेसबुक की आचारसंहिता का उल्लंघन है।सभी यूजरों को अश्लील भाषा और कामुक सामग्री के फेसबुक पर प्रचार-प्रसार का विरोध करना चाहिए.

फोटोग्राफी,डिजिटल तकनीक और विज्ञापनों के दबाब ने हमारे चेहरे-मोहरे सब बदल दिए हैं। खासकर नकली शरीर और नकली शक्ल की जो संस्कृति पैदा हुई है उसने असली चेहरे और असली शरीर के बोध ही खत्म कर दिया है। सवाल यह है कि नकली शक्ल और नकली स्कीन से हमारे नकली विचारों और व्यवहार का संबंध भी बन रहा है क्या ?उल्लेखनीय है भारत के मीडिया और सोशलमीडिया में बेरोजगारी, निरूद्योगीकरण और किसानों की बदहाली पर न्यूनतम कवरेज है । मीडिया से लेकर इंटरनेट तक सैलीब्रिटी चेहरे,फिल्म-टीवी,क्रिकेट आदि का ज्यादा कवरेज है। यह वस्तुतः डिजिटल संस्कृति है।इससे राजनीतिक अचेतनता बढती है।

सोशल नेटवर्क और खासकर फेसबुक को जो लोग आजादी का मंच समझ रहे हैं वे गलतफहमी के शिकार हैं। फेसबुक का अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों ,जैसे सीआईए,एफबीआई आदि से याराना है,वे सभी फेसबुक यूजरों की नजरदारी कर रहे हैं,अब इसी पैटर्न पर भारत सरकार भी नजरदारी कर रही है। फेसबुक यूजर शालीनता,लोकतांत्रिकबोध और परिपक्व नागरिक की तरह इस माध्यम का इस्तेमाल करें।

हमारे समाज में मध्यवर्ग के एक बड़े तबके में फैशन की तरह ग्लोबलाईजेशन का प्रभाव बढ़ा है,सरकार की नीतियों में ग्लोबलाइजेशन का अंधानुकरण चल रहा है,यहां तक कि अब तो वे लोग भी ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में बोलने लगे हैं जो कल तक उसका विरोध करते थे,ऐसे विचारकों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं की तादाद तेजी से बढ़ रही है, वे यह कह रहे हैं कि पूंजीवाद का अब कोई विकल्प नहीं है,ग्लोबलाईजेशन के तर्कों को मानने के अलावा और कोई विकल्प नहीं हैं। यही स्थिति ग्लोबल मीडिया चैनलों की है, उनके उपभोक्ताओं में किसी भी किस्म का प्रतिवाद का स्वर दिखाई नहीं देता बल्कि उल्टे राजनीतिक हल्कों में ज्यादा से ज्यादा चैनल और अखबार समूहों को अपने राजनीतिक रुझान के पक्ष में करने की होड़ चल निकली है।



समग्रता में देखें तो फेसबुक पर हम असहिष्णु समाज बना रहे हैं ?सामान्यतौर पर कम्युनिकेशन सहिष्णु बनाता है,लेकिन फेसबुक ने यूजर के अवचेतन को जगाया है। अवचेतन में पड़ी घृणा,गंदगी, अश्लीलता आदि को अभिव्यक्त करने का सहज मौका दिया है। हमें सोचना चाहिए कि चेतनमन को जगाते हैं या अवचेतन मन को? फिलहाल तो अवचेतन की हवा बह रही है। कम्युनिकेशन के लिए चेतनमन सक्रिय रहे तो सुरक्षा है वरना खतरे ही खतरे हैं।

सोशलमीडिया को लेकर भारत सरकार की सचेतनता का कोई अर्थ नहीं है। असलमें ,सबसे पहले भारत सरकार को पोर्न सामग्री के वितरण पर पाबंदी लगानी चाहिए। पोर्न दिखाना-बेचना अपराध है।इसके सामाजिक दुष्प्रभावों पर सारी दुनिया में बहस हो रही है। लेकिन केन्द्र सरकार और उसके विरोधीदल पोर्न के मामले पर चुप हैं।महिला संगठन भी चुप्पी लगाए हुए हैं।इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री की निगरानी को लेकर जारी विवाद के बीच नामी सर्च पोर्टल गूगल ने अपनी पारदर्शिता रिपोर्ट में जनवरी 2011 से लेकर जून 2011 के बीच सरकार की ओर से सामग्री हटाने की सिफारिशें जारी की हैं। गूगल ने बताया है कि इस अवधि में सरकार ने उससे 358 आइटम और 68 कंटेंट हटाने की मांग की थी, जिसमें से कंपनी ने 51 फीसदी मांगों को आंशिक या पूरे तौर पर मान लिया था।

गूगल ने बताया, 'राज्य और स्थानीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने हमसे सामाजिक नेताओं के विरोध में प्रदर्शन, आपत्तिजनक भाषा वाले वीडियो यू ट्यूब से हटाने के लिए कहा था। हमने इनमें से ज्यादातर वीडियो हटाने से मना कर दिया था और महज उन्हीं वीडियो को हटाया था, जिनके कारण समुदायों में रंजिश बढऩे की आशंका थी।

सोशल मीडिया के नियंत्रण के बारे में केन्द्र सरकार की चिन्ताएं अन्ना आंदोलन के समय सामने आ गयी थीं। मोदी सरकार आने के बाद भी केन्द्र सरकार का पुराना नजरिया बदला नहीं है।यह एक तरह से सोशल मीडिया की संचालक कंपनियों को धमकी है कि 'सावधान रहो अपने दायरे के बाहर मत जाओ।' विचारणीय बात यह है जो केन्द्र सरकार दूरसंचार विभाग को नहीं चला पायी और उसे निजी स्वामित्व में दे दिया। वह सोशलमीडिया को क्या नियंत्रित करेगी ! ये सिर्फ कागजी कानूनी शेरों की बातें हैं ! इसके बावजूद हम यह कहना चाहेंगे कि हमारे फेसबुक बंधुओं को शालीन भाषा,सभ्य राजनीति और संस्कृति के नए मानकों को बनाना चाहिए। फेसबुक पर गली-मोहल्लों की भाषा ,खासकर गाली-गलौज की भाषा से बचना चाहिए। अन्ना भक्तमंडली से लेकर भाजपा की वानरटोली तक यह फिनोमिना देखा गया है। इन लोगों के एक धड़े ने फेसबुक पर आएदिन जो गंदगी की है,उसने सोशलमीडिया की साख को बट्टा लगाया है।



फेसबुक पर यूजर्स की निजी सूचना निकालने और उसे विज्ञापनदाताओं को 'बेचने' का

आरोप है और इस मुद्दे पर उसे यूरोप में कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। ' संडे टेलिग्राफ ' की एक रिपोर्ट के अनुसार , फेसबुक अपने यूजर्स के राजनीतिक विचार, लैंगिक पहचान, धार्मिक आस्थाएं और यहां तक कि उनका अता-पता भी जमा कर रही है। यूरोपीय आयोग इस मुद्दे पर कार्रवाई करने की योजना बना रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लोग चाहे अपना 'प्राइवेसी सेटिंग' कुछ भी रखें, फेसबुक अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर का उपयोग कर सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों की गतिविधियों की सूचना जमा कर रही है और उसे विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध करा रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोपीय आयोग 2012 जनवरी में एक नया निर्देश जारी करने वाला है जिसमें इस तरह के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है।

दूसरे उद्योगों की तरह भारतीय दूरसंचार के आंकड़े भ्रमित करने वाले हैं। देश में 85 करोड़ से अधिक पंजीकृत मोबाइल नंबर हैं। पर स्पेक्ट्रम आवंटन का ढांचा सेवा प्रदाताओं के लिए इनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। इसमें से एक तिहाई नंबर ऐक्टिव नहीं हैं। बाकी बचे नंबरों में से भी कई उन ग्राहकों के नाम पर पंजीकृत हैं जो ऑफिस या निजी इस्तेमाल के लिए अलग-अलग नंबर रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रति ग्राहक औसत राजस्व घटा है। इस कारण से सेवा प्रदाताओं का मुनाफा भी कम हुआ है। हर सर्किल में दर्जनों टेलीकॉम सेवा प्रदाता कंपनियां हैं। इनमें से कुछ ही पैसा बना पाती हैं और नई कंपनियां तो अब तक अपने निवेश का बड़ा हिस्सा तक नहीं वसूल पाई हैं। इस बदहाल अवस्था के बाद तो दूरसंचार क्षेत्र के निजीकरण को यहीं रोकना चाहिए।

सीईए के साथ समझौते और तकनीकी सहमेल के कारण फेसबुक अपने यूजर की प्राइवेसी में हस्तक्षेप और तांक-झांक कर रहा है। फेसबुक अधिकारियों के अनुसार फेसबुक अपने यूज़र के लॉग ऑफ करने के बाद भी इस बात पर नजर रखता है कि उसके यूजर्स कौन सी वेबसाइट विजिट कर रहे हैं।

चीन में इंटरनेट के 50 करोड़ के करीब यूजर हैं और सबसे शक्तिशाली इंटरनेट सेंसरशिप भी है। सर्वसत्तावादी एकतंत्र में यह व्यवस्था बेहद परेशानी खड़ी करने वाली है। नव्य आर्थिक उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के दायरे में आने के बावजूद वहां पर इंटरनेट सेंसरशिप में कोई ढ़ील नहीं आयी है। कायदे से उसे अपने सिस्टम को और उदार बनाना था,लेकिन उन्होंने नहीं किया। चीन पर विश्व जनमत का भी कोई दबाव नहीं है।इसका अर्थ यही है कि लूट की उदारता में चीन हिस्सेदार है,लोकतांत्रिक छूट देने के मामले में चीन आज भी कंजरवेटिव है। चीन का मॉडल है राजनीति में सर्वसत्तावाद,आर्थिक क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कारपोरेट तंत्र,उपभोक्तावाद और सख्त सेंसरशिप।

भारत में फेसबुक और इंटरनेट पर साइबर हैकरों के हमले बढ़ गए हैं। अभी तक भारत फेसबुक संतों की शांत रमणस्थली था लेकिन विगत एक सप्ताह से साइबर अशांति की खबरें आ रही हैं। भारत सरकार के संस्थानों की बेवसाइट हैक करके नकली लोग अन्य देशों की बेवसाइट पर हमले कर रहे हैं। इसी तरह फेसबुक को बाजार में डाउन करने के लिए नए तरीकों से पोर्न सामग्री फेसबुक पर भेजी जा रही है। साइबर हैकरों की इन शैतानियों के प्रति सजगता जरूरी है। इस विषय पर फेसबुक दोस्तों को अपनी वॉल पर लिखना चाहिए।भारत में संचार क्रांति के दुरूपयोगों के प्रति सचेतनता बढ़ रही है। इंटरनेट,फेसबुक,सोशल साइट ,ब्लॉग आदि पर अपमानजनक बातें लिखने वालों के प्रति अब आम यूजर सचेत हो रहा है। इस सचेतनता के कारण ही एक युवक को एक लड़की के प्रति अपमानजनक और अशालीन बातें नेट पर लिखने के लिए अदालत ने 20हजार रूपये का जुर्माना लगाया है। आप भी आई टी एक्ट के प्रति जागरूक बनें ।

दूसरी ओर सीआईए ने फेसबुक और ट्विटर पर निगरानी तेज कर दी है। वे विभिन्न देशों में चल रही राजनीतिक और अन्य किस्म की गतिविधियों पर गहरी नजर रखे हैं। इसके आधार पर वे अपने रणकौशल को भी बदल रहे हैं ,साथ ही यूजरों का व्यापक प्रोफाइल भी बना रहे हैं। यह यूजरों की निजता का उल्लंघन है ?

इंटरनेट आने के बाद से ऑनलाइन छेडखानी ,उत्पीड़न और अपमान की घटनाओं में इजाफा हुआ है। मसलन् ,आस्ट्रेलिया में 2008 में की गयी रिसर्च में पाया कि 42प्रतिशत युवाओं को ह्रासमेंट का सामना करना पड़ा।एक अन्य सर्वे में 36 फीसद लड़कियों और 32 फीसद लड़कों ने ह्रासमेंट की शिकायत की। ऑनलाइन ह्रासमेंट की घटनाओं से भारत में भी एक बड़ा तबका परेशान है । लेकिन अभी तक ऑनलाइन ह्रासमेंट की सटीक अवधारणा विकसित नहीं हो पायी है ।

फेसबुक के 80 करोड़ यूजर हैं और उसकी विज्ञापनों से इस साल 4.27 बिलियन डालर की आमदनी हुई है जो उसकी सकल आय का 85 फीसदी है। ऐसे में फेसबुक पर मंथली चार्ज लेने की अफवाह उसके प्रतिद्वंद्वी सोशल मीडिया साइट के लोगों ने ही उड़ायी है। फेसबुक पर जो लिखा जाता है उस पर सहज में विश्वास न करें। उसकी अन्य स्रोतों से पुष्टि करें। फेसबुक पर अफवाहें भी चलती हैं।

फेसबुक पर कभी आर्थिक तबाही के घटनाक्रमों पर मित्रलोग बहस क्यों नहीं करते ? क्या भारत में आर्थिक खुशहाली आ गयी है ? क्या मंदी की मार के सवाल सताते हैं ? सवाल यह है फेसबुक को हम भारत की मूल समस्याओं का मंच क्यों नहीं बना पाए हैं ?

फेसबुक पर वर्चुअल कामुक औरतें सक्रिय हैं।ये फेसबुक और चैटिंग के बहाने मोहित करती हैं। वर्चुअल प्रेम में फंसाती हैं और अंतमें गहरी निराशा और हताशा में धकेल देती हैं। आज इनके एक शिकार युवा ने फेसबुक से विदा ले ली। कहने का अर्थ है फेसबुक पर वर्चुअल औरतों से चैटिंग ओर वर्चुअल प्रेम न करें। यह आत्मघाती है।

नए साइबर जमाने के युवाओं में लोकतांत्रिक प्रतिवाद की आकांक्षाएं कम है। यह समाज से विच्छिन्न है और पूरी तरह मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग से सम्बद्ध है। इस युवा की मनोसंरचनाएं उपभोग,अकेलेपन , क्षण में पाने की आकांक्षा और प्रतिहिंसा ने निर्मित की है।

इंटरनेट महान है,फेसबुक महानतम है और लुढ़कता बाजार और आर्थिक मंदी इन सबसे महान है। संचार क्रांति और भूमंडलीकरण जिस स्वर्ग का सपना लेकर आए थे वहां इन दिनों वैचारिक-सांस्कृतिक सन्नाटा पसरा हुआ है। हमारे दोस्त इन सब सवालों पर चुप हैं । क्या ये सवाल बहस के लायक नहीं हैं ॽ

फेसबुक तो स्वर्ग की इन्द्रसभा है इसमें सुख है,आनंद है,विचार हैं,अमरता है,गान,संगीत, नृत्य, चित्र,मित्र सब हैं,इन्द्रसभा की तरह यहां रसोई ,खाना ,महंगाई ,मंदी ,राक्षस ,पति, पत्नी, संतान,समाज आदि की चिन्ता नहीं है। यहां सिर्फ रस , आनंद और अभिव्यक्ति है।यह सुखियों का संसार है।फेसबुक क्षणिक और अधूरी अभिव्यक्ति का माध्यम है।फेसबुक सिरपड़ों का खेल है,यहां अपरिचय के परिचय,बिना दीवार के वॉल,बिना स्याही कागज का लेखन,मुँह देखी मीठी बातें और खोखली प्रशंसाओं की लंबी सूची,सूचनाओं का ढ़ेर, बिना मांगे उपदेश,मजे की बातें,बोरिंग बातें,विज्ञापन और नकली व्यक्तिवाद का खोखला ताण्डव और फेसबुक का अरबों का धंधा।यानी फेसबुक उल्लू है उसकी सवारी लक्ष्मी करती है।फेसबुक में स्वर्ग और नरक भी हैं , स्वर्ग में उत्तर अमेरिका है वहां की 41 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है । नरक में विश्व की बाकी आबादी है जिसमें मात्र 10 प्रतिशत लोग ऑनलाइन हैं।अफ्रीका की मात्र 1 प्रतिशत आबादी ऑनलाइन है। ऑनलाइन स्वर्ग है और जो लाइन में है वो नरक में हैं। फेसबुक पर कुछ लोग हैं जो 11बजे के बाद अवतरित होते हैं वे फेसबुक के यक्ष-यक्षिणी हैं।

परवर्ती पूंजीवाद में सबसे बड़े किराए वसूलने वाले कारपोरेट घराने हैं। वे केबल टीवी से लेकर डीटीएच तक,इंटरनेट से टेलीफोन तक,डिस्नी लैंड से लेकर साइंस सिटी तक आम जनता से आनंद और कम्युनिकेशन के बदले किराया वसूलते हैं। यह किराया ही मोनोपोली कैपीटलिज्म के मुनाफे और आनंद का मूल स्रोत है। क्या इसके बाद भी हमें पूंजीवाद से प्यार करना चाहिए ?

पूंजीवाद में कोई भी कम्युनिकेशन फोकट में नहीं होता।दूरसंचार -मीडिया के इजारेदार घरानों की मुनाफाखोरी के बिना नहीं होता। मसलन् फेसबुक,ब्लॉग आदि इंटरनेट कम्युनिकेशन के लिए हम किराया देते हैं। दूरसंचार मुगल इस किराए से अमीर बनते हैं।यह परवर्ती पूंजीवाद का किराए का कम्युनिकेशन है और इसी अर्थ में बुर्जुआ कम्युनिकेशन है।

फेसबुक के मित्र किस विचारधारा के हैं यह जानने का आसान तरीका है कि वे किन विषयों पर वॉल पर लिखते हैं,किन विषयों पर अन्यत्र जाकर पढ़ते हैं और आमतौर पर उनकी किस तरह के राजनीतिक-आर्थिक सवालों में रूचि रखते हैं ? टिप्पणी करते हैं ?सवाल यह है कि क्या फेसबुक विचारधारारहित कम्युनिकेशन है ? फेसबुक पर शिक्षित युवा और अधेड़ आमतौर पर जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वो प्रतिगामी भाषिक- सांस्कृतिक मनोदशा की अभिव्यक्ति है। ये,नकली फोटो लगाना, गलत सूचनाएं देना,विभ्रम की बातें करना,अश्लील भाषा या द्वयर्थक भाषा में लिखना,चैट करते हुए किसी भी लिंक को भेज देना आदि। अनेक लोग हैं जो फेसबुक पर लड़की देखी और लगे पीछा करने, ये लोग फेसबुक पर लड़की को पीछा किए बिना क्यों नहीं रह पाते ? पहले दोस्त बनाते हैं फिर चैट में पीछा करते हैं,क्या यह नेट पर स्त्री उत्पीड़न है ?

इंटरनेट पर सत्ता की नजरदारी लगातार बढ़ रही है।लैटिन अमेरिका में इंटरनेट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।प्रतिवादियों पर नजर रखी जा रही है,उन पर नियंत्रण लगाया जा रहा है। पेरू से लेकर बोलविया तक इंटरनेट की नजरदारी हो रही है। ईमेल,फेसबुक,ब्लॉग,ई मूवमेंट आदि पर विभिन्न तरीकों से नजर रखी जा रही है। यह नेट प्राइवेसी का अंत है।

इंटरनेट और कम्प्यूटर का ज्यादा उपयोग स्मृति में संचित करने की दिशा बदल सकता है। आमतौर पर अभी वैज्ञानिक नहीं जानते कि इससे मनुष्य की स्मृति का क्षय हो रहा है या स्मृति समृद्ध हो रही है। लेकिन मन के बाहर जो चीज संग्रहीत करना चाहते हैं उसके लिए इंटरनेट और कम्प्यूटर सुंदर माध्यम और संग्रहशाला है। मनुष्य का दिमाग इस मीडिय़म की संगति में धीरे धीरे बदल रहा है।

यह संचार क्रांति की आजादी के अंत की बेला है। संचार क्रांति ने जिस तरह की स्वतंत्रता और प्राइवेसी का आरंभ में वायदा किया था उसका धीरे धीरे अंत हो रहा है। आम लोगों की प्राइवेसी को नियंत्रित और नियोजित किया जा रहा है। बेहतर है नेट की दुनिया में हम अपने निजी पत्ते न खोलें।

साइबर साँड मात्र शब्दों से ही अपमानित नहीं करते वे इलैक्ट्रोनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। मसलन वे किसी को अपमानित या परेशान करने के लिए गंदे,अश्लील वीडियो फेसबुक की वॉल पर लगा देते हैं।अपमानजनक एमएमएस या ईमेल करते हैं। अपमानजनक या नेगेटिव साइबर टेक्स्ट भेज देते हैं।

साइबर बांस करने के तरीके क्या हैं- पहला तरीका है आघात पहुँचा,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना,सेक्सुअल लैंग्वेज का इस्तेमाल करना, परेशान करना,मसलन् , बार-बार यह कहना 'बात कीजिए प्लीज' आदि । जो व्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहा है वह कितनी बार दोहराता है अपने व्यवहार को,महिने में एक बार,दो बार ,तीनबार या रोज।इससे आप उसके असंतुलन का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।साइबर साँड मूलतःसामाजिक जीवन में मौजूद दादागिरी का ही साइबर रूप है। साइबर साँड ज्यादातर वे युवा और तरूण हैं जो एडजेस्टमेंट प्रॉब्लम के शिकार हैं। इसे साइबर भाषा में रिस्क ग्रुप में रखा जाता है और ये लोग भिन्न किस्म के व्यवहार की मांग करते हैं।साइबर पंगेबाज को साइबर बैल कहना ज्यादा सही होगा।वे अपनी नेगेटिव हरकत को बार बार दोहराते हैं। मसलन् साइबर बैल चैट में आकर पूछते हैं '' क्या आप मुझे पसंद करते हैं'। 'सेक्स करोगे',या वे कोई व्यक्तिगत आक्षेप करने वाले वाक्य या शब्द का इस्तेमाल कर बैठते हैं। साइबर स्पेस में किया गया एक नेगेटिव एक्शन दूरगामी असर छोड़ता है। नेगेटिव एक्शन की पुनरावृत्ति तुरंत प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है।साइबर पंगेबाज कैसे लोग होते हैं ,किस उम्र के होते हैं,उनके पंगा लेने का तरीका क्या वे साइबर कम्युनिकेशन में कैसे परेशान करते हैं। इसे साइबर में 'बांस' करना भी कहते हैं।पश्चिम में इसमें ज्यादातर 10-18साल की उम्र के तरूण आते हैं।भारत में ऐसे लोगों में वयस्कों की संख्या ज्यादा है। इन लोगों का काम है नेट,फेसबुक,ब्लॉग,ईमेल,चाट आदि के जरिए आघात पहुँचाना।ये नेगेटिव एक्शन में ज्यादा रहते हैं।

नेट पर किए गए अनेक अनुसंधान बताते हैं कि जो ज्यादा चैट ,ईमेल और शॉपिंग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण ज्यादा होते हैं।ताइवान के कॉलेज छात्रों में किए अध्ययन से पता चला है कि इंटरनेट की लत का पढ़ाई ,दैनिक रूटीन पर असर होता है। जिनको लत है वे अवसाद में कष्ट पाते हैं।फेसबुक की बढ़ती आदत ने अमेरिकी तरूणों की स्कूली पढ़ाई को प्रभावित किया है।इंटरनेट में उन्हीं यूजरों के साथ दुर्व्यवहार या एब्यूज की घटनाएं देखी गयी हैं जिनमें आमने-सामने बात करने की क्षमता का अभाव होता है अथवा जो अवसाद में रहते हैं।रिसर्च में पाया गया है कि इंटरनेट यूजरों में जो अकेलेपन में नहीं हैं वे भावनात्मक सहयोगी की तलाश में नेट पर आते हैं। ऑनलाइन मित्र यहां ऑफलाइन मित्रों से मिलकर संतोष पाते हैं। इस तरह के यूजर भी हैं जो मनो व्यथाओं के शिकार हैं और अपनी व्यथा का समाधान खोजने आते हैं। इनमें बेचैनी,अवसाद और आत्मविश्वास की कमी देखी गयी है।

सन् 1990 के आसपास जब इंटरनेट का चलन तेज हुआ तो उस समय इसे लेकर भय और उत्साह का भाव था।आरंभ के शोध बताते हैं इंटरनेट के उपयोग ने अकेलेपन ,अवसाद और तनाव में वृद्धि की।नेट विशेषज्ञों का मानना है कि संचार की नई तकनीक के कारण हठात कम्युनिकेशन बढ़ जाने का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक नकारात्मक असर होता है। इससे लत और अवसाद की जुगलबंदी पैदा होती है।क्या सोशल मीडिया नेटवर्क में गालियों का वही स्थान है जो उसे हमने सामाजिक जीवन में दिया है ? क्या सोशल मीडिया गालियों से ऊर्जा प्राप्त करता है ?गालियां संवादहीनता का संकेत है ।

फेसबुक आने के बाद विरही-विरहिणियों की संख्या बढ़ी है या घटी है ? विरह का प्रसार हुआ है या अवसान हुआ है ?मनमाने ढ़ंग से अपनी बात कहने का ढ़ंग अभागों का ढ़ंग है।कहते-कहते ऐसा भी कुछ सुनने को मिल जाता है जो पहले कभी नहीं सुना था।कहने के स्रोत में जब ज्वार आता है तब न जाने किस गुफा के भीतर की अनजान सामग्री बहती-बहती आकर घाट पर लग जाती है। क्या आपने ऐसा अनुभव किया है ?



सौंदर्य मनुष्य को संयम की ओर खींचता है,शालीनता का विकास करता है। इसके अलावा हमारी क्षुधा तृप्ति के साथ -साथ सदा उच्चतर सुर जगाता है।फेसबुक ने आम लोगों में खासकर मध्यवर्ग के लोगों में झूठ बोलने,फुसलाने,हां में हां मिलाने या निरर्थक समय खर्च करने की आदत में इजाफा किया है। छद्म या आभासी यथार्थ में जीने की भावना को पुख्ता बनाया है। आदमी का कम्युनिकेशन फास्ट किया है लेकिन संचार ,समाज ,व्यक्ति और वस्तु के बीच में महा-अंतराल पैदा किया है।फेसबुक यूजरों की संख्या 70 करोड़ के करीब हो गई है। आश्चर्यजनक बात है कि अमेरिका में फेसबुक यूजरों की संख्या में 6 मिलियन की गिरावट आई है।इसी तरह कनाडा,रूस,ब्रिटेन,नार्वे में फेसबुक यूजरों की संख्या घटी है। लेकिन विकासशील देशों में बढ़ रही है। क्या अमेरिकी लोग त्रस्त हैं फेसबुक से ?क्या फेसबुक सामाजिक-भावनात्मक अलगाव पैदा कर रहा है ?फेसबुक की खूबी है "जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान",अनजाने लोगों से राजनीतिक-सामाजिक चर्चा तो ठीक है लेकिन इमोशनल बातें करना,व्यक्तिगत जानकारियां देना खतरनाक है।







गुरुवार, 5 मई 2016

फेसबुक वॉल को तो कम से कम खुला रहने दो कॉमरेड !

यार इतनी कंजूसी क्यों करते हो,फेसबुक पर क्लिक करने में कंजूसी करोगे तो फिर तुम कभी अभिव्यक्ति के मामले में उदार नहीं बन सकते।ठीक है हम तुम्हारे दल में नहीं हैं,लेकिन पहले तो थे,यह भी सही है कि हम तुम पर भी लिखते हैं,तुम्हारे दल पर भी लिखते हैं,तुमनेे बेइंतहा तकलीफें दी हैं,हमारे खिलाफ तुम्हारे दल के लोगों ने जहरीला प्रचार किया,इसके बावजूद हमने तुमसे हलो बंद नहीं की,तुमसे प्यार करना बंद नहीं किया।तुम इस कदर कमीनापन क्यों करते हो जिससे तुम्हारे दल को क्षति पहुँचे,कमीनेपन का मतलब कम्युनिस्ट होना नहीं है।कृतघ्न व्यक्ति कभी कम्युनिस्ट आंदोलन का भला नहीं कर सकता।तुम यह तो बताओ तुमने कृतघ्नता कहां से सीखी,कम से कम हमने नहीं सिखाया तुमको।कुछ क्षण रूककर सोचो कि कम्युनिस्टों को कैसे उदार बनाएं,किस तरह उनमें कृतज्ञताबोध पैदा करें।उसकी पहली सीढ़ी है कि तुम फेसबुक पर रहते हो तो प्रगतिशीलों के फेसबुक पोस्ट को लाइक करना सीखो, हमेशा दलीय गिरोह में कैद मत रखो अपने को, यह दौर दलीय गिरोहबंदी का नहीं है।यही सब नरक फैलाना है तो फेसबुक एकाउंट बंद करके शांति से बैठो।

फेसबुक पर सक्रिय कम्युनिस्टों से अनुरोध है कि अपनी वॉल को कम्युनिस्ट वॉल न बनाएं,वरना कोई नहीं पढ़ेगा।खुलकर लिखो,कम्युनिस्ट और गैर-कम्युनिस्ट विषयों पर लिखो।सिर्फ पार्टी का प्रचार करने के लिए यदि फेसबुक पर आते हो तो बहुत ही सीमित लक्ष्य लेकर जी रहे हो,उसके लिए फेसबुक पर आने की जरूरत नहीं है,हर समय तुम पार्टी के मेम्बर नहीं हो,यह कैसा मनुष्य बनाया है जो पार्टी के बिना न हंसता है,न बोलता है।

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

फेसबुकिए मोदीभक्तों का कष्ट


     मोदी पर मेरे निरंतर लेखन से मोदीभक्त कष्ट में हैं,कुछ गैर मित्र भी परेशान हैं कि मैं मोदी पर इतना क्यों लिख रहा हूं,लोकतंत्र का तकाज़ा है कि नेताओं का और खासकर नीति निर्माता नेताओं की गतिविधियों और बयानों का रीयल टाइम में मूल्यांकन किया जाय| मीडिया पर मोदी के अनुकूल वातावरण बनाए रखने का अमीरों का भयानक दबाव है, इस दबाव का प्रत्युत्तर एक नागरिक के नाते ठोस राजनीतिक आलोचना-प्रत्यालोचना के जरिए ही दिया जा सकता है,इससे लोकतंत्र मजबूत होगा| 
लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरुरी है कि संघ-भाजपा के नीतिगत प्रयासों को सीधे आलोचना के केन्द्र में लाएं, फेसबुक सशक्त माध्यम है और इस पर चलने वाली बहसों की नीति निर्माता अवहेलना नहीं कर सकते,फेसबुक में चलने वाली बहसें अनेक मसलों पर समाचार टीवी और अन्य माध्यमों को भी प्रभावित करती हैं,फेसबुक लेखन भडुआ लेखन न बने,फेसबुक मीडिया भडुआ मीडिया न बने इसके लिए जरुरी है कि इस पर जमकर देश-विदेश की राजनीति और संस्कृति पर बातें हों|
फेसबुक पर एकवर्ग ऐसे लोगों का है जिनके पास भडुआ मनोदशा है,वे इस माध्यम को भडुआ मीजिसम बनाने में लगे हैं,कुछ के लिए मात्र फोटो स्टूडियो है तो कुछ के लिए भाषा के अश्लील और अशालीन प्रयोगों का मीडियम है,इसी तरह कुछ मात्र पाठक के नाते आते हैं, फेसबुक पर युवाओं का बहुत बडा हिस्सा भी है जिनके पास लोकतांत्रिक संघर्षों का कोई अनुभव नहीं है| ये युवा संघर्ष की भाषा में देश को नहीं देखते,इनके लिए देश का कैरियर और मीठे सपनों के अलावा कोई महत्व नहीं है| स्त्रियों बहुत कम अंश है जो फेसबुक पर लिखता है,कायदे से औरतों की सक्रियता बढनी चाहिए | औरतें जितनी सक्रिय होंगी फेसबुक लेखन उतना ही वैविध्यपूर्ण बनेगा|फेसबुक पर लोकतांत्रिक कम्युनिकेशन की औरतें धुरी बन सकती हैं| उनके सक्रिय होने से इस मीडियम पर तल रही लफंगई कम होगी | औरतें जहां नहीं बोलतीं वहां लफंगे गुलगपाड़ा ज्यादा मचाते हैं|

सोमवार, 19 मई 2014

फेसबुक की चुनौतियां

      हिन्दी में फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवालोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य,अनुवाद,विमर्श आदि आ रहा है। इसमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियां भी हो रही हैं।
फेसबुक एक गंभीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिए,ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक-राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।
फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है ,इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं,यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनंद लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता। बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो।खबरें लिखी जाएं। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े। हिन्दी में फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पासटाइम मीडियम है। वे इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। फेसबुक एक सीमा तक ही पासटाइम मीडियम है । लेकिन यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है।
फेसबुक बेहद शक्तिशाली मीडियम है इसकी समग्र शक्ति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी भी मीडिया की शक्ति का आधुनिकयुग में तब ही विकास हुआ है जब उसका राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी में ब्लॉगिंग से लेकर फेसबुक तक राजनीतिक विषयों पर कम लिखा जा रहा है। ध्यान रहे प्रेस ने जब राजनीति की ओर रूख किया था तब ही उसे पहचान मिली थी। यही बात ब्लॉगिंग और फेसबुक पर भी लागू होती है। जो लोग सिर्फ साहित्य,संस्कृति के सवालों पर लिख रहे हैं या सिर्फ कविता,कहानी आदि सर्जनात्मक साहित्य लिख रहे हैं उनकी सुंदर भूमिका है। लेकिन इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी जब हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉगर और फेसबुक लेखक गंभीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें, किसी न किसी जनांदोलन के साथ जोड़कर लिखें ।खोजी खबरें दें। हिन्दी में अभी जितने भी बड़े ब्लॉगर हैं उनमें से अधिकांश देश ,राज्य और अपने शहर के राजनीतिक हालात पर लिखने से कन्नी काट रहे हैं या उनको राजनीति पर लिखना पसंद नहीं है।
फेसबुक रीयलटाइम मीडियम होने के कारण विकासमूलक और आंदोलनकारी या वैचारिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिए इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ? अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहां ले आया है। इससे जहां एक ओर पुरानी निजता या प्राइवेसी खत्म हुई है। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है।
हमें फेसबुक को शक्तिशाली मीडियम बनाना है तो देश की राजनीति से जोडना होगा। राजनीति से जुडने के बाद ही फेसबुक को हिन्दी में अपनी निजी पहचान मिलेगी और फेसबुक की बतखोरी,गॉसिप और बाजाऱू संस्कृति से आगे जाकर क्या भूमिकाएं हो सकती हैं उनका भी रास्ता खुलेगा।
ब्लॉगिंग,फेसबुक आदि को प्रभावी बनाने के लिए इन माध्यमों का राजनीति से जुड़ना बेहद जरूरी है। कोई भी मीडिया टिप्पणियों, प्रशंसा,निजी मन की बातें,निजी जीवन की दैनंदिन डायरी, पत्रलेखन से बड़ा नहीं बना, इनसे मीडिया को पहचान नहीं मिलती।
आधुनिककाल की धुरी है राजनीति । आधुनिक साहित्य तब आया जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। प्रेस को पहचान तब मिली जब उसने राजनीति से संबंध जोड़ा। कोई भी माध्यम हो या जनमाध्यम हो,संचार हो या जनसंचार हो, साहित्य हो या कलाएं हों वे अपनी आधुनिक पहचान राजनीति से जुड़ने के बाद ही बना पाई हैं। फेसबुक आदि के यूजरों को राजनीति से जुड़ना होगा। इसके बिना यह सामाजिक परिवर्तन का मीडियम नहीं बन सकता।

मंगलवार, 25 जून 2013

फेसबुक विचार वैतरणीः नव्य उदारीकरण के दुष्परिणाम



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डिजिटल क्रांति ने सीडी-डिस्क-कैसेट आदि के क्षेत्र में जो तबाही मचायी है उसके परिणाम आने लगे हैं। वीडियोकॉन समूह के प्लैनेट एम की बिक्री में गिरावट आई है और राजस्व में उसकी हिस्सेदारी कुछ साल पहले के 40 फीसदी से घटकर बमुश्किल एक चौथाई रह गई है। अगले साल तक यह घटकर 10 फीसदी रह जाएगी। रहेजा समूह के क्रॉसवर्ड के साथ भी यही किस्सा है। उसके राजस्व में संगीत की हिस्सेदारी बमुश्किल दो फीसदी रह गई है।(बिजनेस स्टैंडर्ड)
यानी नव्य उदार संगीत अब बेसुरा हो गया है।
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डिजिटल क्रांति ने सीडी और कैसेट उद्योग को बर्बाद कर दिया है। एचएमवी-ईएमआई रिकॉर्ड लेबल के स्वामी संजीव गोयनका के आरपीजी समूह ने अपने संगीत क्षेत्र के खुदरा कारोबार को बंद कर दिया है।
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उलटे विकास मॉडल का आलम यह है कि शहरों में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ नहीं बचे हैं। सवाल यह है कि हमारे विकास मॉडल में फुटपाथ क्यों नहीं आते ?
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पिछले दो साल के दौरान भारत में बेरोजगारी 10.2 फीसदी की दर से बढ़ी है। 1 जनवरी 2012 को देश में बेरोजगारों की संख्या 1.08 करोड़ थी जबकि जनवरी 2010 में यह आंकड़ा 98 लाख था।
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कविता या साहित्यविधाओं का जासूसी एजेंसी से संबंध नहीं होता.नजरिए का संबंध होता है।लक्ष्यों का संबंध होता है। कमलेश के लेखन को खांचे बनाकर नहीं देखना चाहिए। समग्रता में देखना चाहिए। मैं तो इतना ही समझ पाया हूँ कमलेश को खांचों में बांटकर देखा जा रहा है। समग्रता में उनके नजरिए,एक्शन ,सृजन,आचरण,जीवनशैली और विचारधारा सबको मिलाकर देखना चाहिए। महज कवि रूप में देखना उपयोगितावाद है और यह अमेरिकीजीवन दर्शन का मूलाधार है।
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खबर है कि विश्व में अमेरिकी जासूसी को नंगा करने वाला एडवर्ड स्नोवदेन हांगकांग छोड़कर मास्को चला गया है। क्या यह नए शीतयुद्ध का आरंभ है ?
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कमलेश की परायीदृष्टि का आदर्श नमूना है यह वाक्य- "भारत में सभ्यता मृत पड़ी हुई है। भारतवर्ष के पढे-लिखे अपने अज्ञान में ही इतने अभिमानी हो रहे हैं कि उन्हें अपने चारों ओर पड़ी हुई यह लाश दृष्टिगोचर नहीं हो होती। " कमलेश पर हिन्दी में जो लोग माला चढ़ा रहे हैं और उनका भारतज्ञान पर फिदा हैं उनको इन वाक्यों को पढ़ना चाहिए और इसके गंभीर निहितार्थों को समझना चाहिए। कमलेश का भारतप्रेम देखें उनको भारत में सभ्यता मृत नजर आ रही है। बलिहारी अमेरिकीदृष्टि की।यह दृष्टिकोण सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का आदर्श नमूना है जिसमें अपनी भाषा,अपनी सभ्यता,संस्कृति आदि मृत लगती है या हेय लगती है। कहने की जरूरत नहीं है कि सीआईए का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से चोली-दामन का रिश्ता है।
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भारत का सबसे शिक्षित राज्य है केरल और इस राज्य में अपराध समूचे भारत में सर्वोच्च पर है। समूचे भारत में अपराधदर 196.7लोग प्रति एकलाख नागरिकों पर है,,जबकि केरल में 455.8 लोग है जो राष्ट्रीय अपराध दर से भी ऊपर है।
भारत की अपराध राजधानी है कोच्ची,वहां पर अपराधदर प्रति लाखपर 817.9है उसके बाद कोलम का स्थान है,यहां की अपराधदर है 637.3.लोग है .
क्या कारण है केरल जैसा शिक्षित,जागरूक,समाजवादीचेतना संपन्न राज्य अपराधदर में भी सबसे ऊपर चला गया ?
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स्काइप ने अमेरिकी प्रशासन की मदद करने वाला साइबर कार्यक्रम विकसित किया है जिसके तहत स्काइप पर होने वाले कम्युनिकेशन पर अमेरिकी प्रशासन जासूसी कर पाएगा।
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भारत सरकार ने अमेरिका की तर्ज पर ही बिना बताए,अदालत की परमीशन के बिना नागरिकों के फोन सुनने,ईमेल पढ़ने,एसएमएस पढ़ने आदि का पूरा सिस्टम खड़ा कर लिया है और भारत में इंटरनेट से लेकर मोबाइल तक का सारा कम्युनिकेशन सरकार की निगरानी के दायरे में रहेगा। कहां सोए हैं मानवाधिकारों के रखवाले संगठन और राजनीतिकदल ?
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हिन्दी के बुढ़ऊ धार्मिक (पूर्व फर्नाण्डीजपंथी सोशलिस्ट) लेखक कमलेश में अचानक पैदा हुई सीआईएचेतना अवचेतन के गर्भ से पैदा नहीं हुई है,यह सचेत सीआईए प्रचार अभियान का हिस्सा है। यह अकस्मात् नहीं है कि इसे रजा फाउण्डेशन की पत्रिका ने छापा है, रजा फाउण्डेशन के कर्ता हैं अशोक बाजपेयी,जो अमेरिकीपरस्त कलाकर्म के लिए हिन्दी में पहले ही यश कमा चुके हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दी अकेली भाषा है जहां आज भी अमेरिकाविरोधी स्वर प्रमुख है और इस चेतना को प्रभावित करने के लिए कमलेश-उदयन बाजपेयी-अशोक बाजपेयी का यह सामूहिक प्रयास है। इसतरह के हमलों का मुँहतोड़ जबाब देने की जरूरत है।
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कुलदीपजी, रामस्वरूप,वह व्यक्ति है जो भारत-चीन आदि के लिए एक साथ जासूसी करता था और रॉ के लिए जासूसी करता था, मुझे याद है वह जब दिल्ली में गिरफ्तार किया गया तो उसके घर से 1 ट्रकभर कर भारत सरकार की गोपनीय फाइलें निकली थीं और वह सरकारी कर्मचारी को एक बोतल,एक औरत और 2हजार रूपये की घूस देकर भारत सरकार के किसी भी मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेज सीआईए और चीन आदि देशों को मुहैय्या कराता था और यही रामस्वरूप दिल्ली में केजीवी के खिलाफ पोस्टरबाजी संगठित करता था और सीआईए के प्रचार अभिियान संगठित करता था। मैंने अपने जेएनयू एसएफआई अध्यक्ष के नाते कई पर्चे उस जमाने में इस व्यक्ति के नाम जारी किए थे।
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कमलेश का लेखन चंडूखाने की चिन्ताओं की देन है वहां तथ्य और सत्य ढ़ूंढ़ना सही नहीं होगा।आपने सही जगह रेखांकित किया है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस पत्रिका के संपादकको संपादकीय विवेक नहीं है ,उसने तथ्यों की जांच किए बिना इस तरह की सूचनाएं प्रकाशित करके लघु पत्रिकाओं की परंपरा को कलंकित किया है। लगता है अशोक बाजपेयी के मालगोदाम में सिर्फ भूसा ही भरा है।
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अमेरिका में रहने के दुख-4-

अमेरिका में हैं और सत्तासुख चाहते हैं तो ईसाइ फंडामेंटलिज्म और अन्य किस्म के फंडामेंटलिज्म के साथ याराना रखना होगा। खासकर अमेरिका स्थित ईसाइ फंडामेंटलिस्टों के सामने नतमस्तक करके रहना होगा।
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अमेरिका में रहने के दुख-3-

अमेरिकी सिस्टम के नेता हैं तो गरीबों का भाषण में जिक्र न आए,चुनाव में बोल सकते हैं लेकिन बाद में गरीब का नाम लेना भी गुनाह है।मजदूरवर्ग पदबंध तो एकदम प्रतिबंधित है।
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अमेरिका में रहने के दुख-2-

यदि अमेरिका के राष्ट्रपति हैं तो देश को एक बड़ा युद्ध सौगात में देकर जाएं जिससे हथियार बनाने वाली कंपनियां खुश रहें और आपके दल का ख्याल रखें। युद्ध नहीं तो राष्ट्रपति पद नहीं।
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अमेरिका में रहने के दुख-1-

यदि आप मुसलमान हैं और आपका नाम मुस्लिम परंपरा से आता है तो तय है अमेरिकी पुलिस-जासूसी एजेंसियां आप पर 24 घंटे निगरानी रखेंगी।
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अमेरिकी मिथ-6-

अमेरिका के बारे में यह मिथ है कि वह स्वतंत्र नागरिकों का देश है। सच यह है कि अमेरिका के नागरिकजीवन पर सरकारी एजेंसियों की कड़ी नजरदारी है और निजी कम्युनिकेशन में हस्तक्षेप भी है।
अमेरिकी मिथ-5-

यह मिथ है कि अमेरिका तो सुखियों-धनियों और स्वस्थ लोगों का देश है। सच यह है कि अमेरिका में बड़ी तादाद में गरीब हैं,मुसीबत के मारे हुए लोग हैं और बड़ी संख्या में बीमारलोग भी हैं।
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अमेरिकी मिथ-4-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां पर औरतें बड़ी भली होती हैं। सच यह है कि वहां पर औरतों में पुरूषों के ऊपर हमला करने,ब्लिच आंखों में फेंककर हमला करने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
अमेरिकी मिथ-3-

अमेरिका के बारे मे मिथ है कि वहां चोर.उचक्के,मस्तान ,मवाली टाइप लोग नहीं होते। सच यह है कि वहां हर शहर में अपराधियों के संगठित गिरोह सक्रिय हैं।
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अमेरिकी मिथ-2-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि अमेरिका में स्त्रीपीड़क नहीं हैं.सच इसके विपरीत है स्त्रियों के प्रति उत्पीड़न के मामले में अमेरिका अनेक देशों में अग्रणी है।
अमेरिकी मिथ-1-

अमेरिका के बारे में मिथ है कि वहां सबकुछ शांत और सभ्यता के वातावरण में चल रहा है। यह भी मिथ है कि अमेरिकी लोग बड़े भले,शरीफ और सहिष्णु,मिलनसार होते हैं। यह सच है कि अमेरिका में शरीफ,शांत,सहिष्णुओं की संख्या तेजी से घटी है और अब वे अल्पसंख्यक हैं।
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फेसबुक के बिना कितना कष्ट होता है,कोई रहीम से पूछे-

बिन देखें कल नाहिन, यह अखियान ।
पल-पल कटत कलप सों, अहो सुजान ॥
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फेसबुक मित्रता का फंडा-

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो न प्रीति ।
काटे चाटे स्वान के, दुहूं भांति विपरीति ॥
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फेसबुक पर पूर्वाग्रह या मन की गांठें रखकर बातें न करें,गांठें स्पष्ट कम्युनिकेशन बाधित करती हैं-

रहिमन खोजे ऊख में, जहां रसनि की खानि ।
जहां गांठ तहं रस नहीं, यही प्रीति में हानि ॥
-22-
नए आधुनिक समाज में चिंता एक बड़ी समस्या है,इस पर रहीम को पढ़ें-

रहिमन कठिन चितान ते, चिंता को चित चेत ।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत ॥
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फेसबुक और चैटिंग में जो लोग दुख बांटते हैं उनके लिए रहीम का पद-

रहिमन निज मन की विथा, मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलै है लोग सब, बांटि न लैहे कोय ॥
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रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून ।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून ॥ रहीम।।
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टेंशन फ्री रहने नुस्खा-

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।

जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह।।
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समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।

चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।रहीम।।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।

जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय।।रहीम।।
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भरोसो जाहि दूसरो सो करो ।। तुलसीदास।।
सुनि ऊधौ मोहिं नैकू न बिसरत वै ब्रजवासी लोग ।।सूरदास।।

-फेसबुक-ईमेल-एसएमएस से खुश होने वालों के लिए सूरदास का यह पद जरूर पढ़ना चाहिए-

ऊधौ कहा करैं लै पाती ।
जौ लौं मदनगुपाल न देखैं, बिरह जरावत छाती ॥
निमिष निमिष मोहि बिरसत नाहीं, सरद जुहाई राती ।
पीर हमारी जानत नाहीं, तुम हौ स्याम सँघाती ॥
यह पाती लै जाहु मधुपुरी, जहँ वै बसैं सुजाती ।
मन जु हमारे उहाँ लै गए, काम कठिन सर घाती ॥
सूरदास प्रभु कहा चहत हैं, कोटिक बात सुहाती ।
एक बेर मुख बहुरि दिखावहु, रहैं चरन रज-राती ॥
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कमलेश की मुश्किल है वे अंग्रेजी में बौद्धिक होना चाहते हैं,लेकिन वे ठीक से इस भाषा में न तो सोच पाते हैं और न लिख ही पाते हैं। उनको यदि मातृभाषा से प्रेम है तो हिन्दी में लिखें और फिर अपने लिखे को पढ़ें कि वे कैसे दिखते हैं,कम से कम एक लेखक का अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करना असभ्य माना जाता है। कमलेश ने झूठ का लबादा अपने ऊपर डाला हुआ है फलतः वे झूठ के अलावा और कुछ नहीं देख पा रहे हैं।सीआईए की वैचारिकसेवा इस तरह के लोग ज्यादा मुस्तैदी से करते हैं जो झूठ का लबादा ओढे रहते हैं।
-24-
हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 4-

इराक में तथाकथित मानवीय हस्तक्षेप करने के पहले मीडिया में यह प्रौपेगैण्डा किया गया कि इराक के पास जनसंहारक अस्त्र हैं,रासायनिक अस्त्र हैं और जल्द हमला न किया गया तो इराक अमेरिकी शहरों पर हमले कर देगा। बाद में अमेरिकी सेना के इराक में जाने पर कहीं पर भी जनसंहारक अस्त्र नहीं मिले।इससे मीडिया के झूठ पर से पर्दा उठा।
इसबार सीरिया के संदर्भ में यही कहा जा रहा है असद की सत्ता रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है ।इस बहाने अमेरिका हस्तक्षेप करने का बहाना बना रहा है।
असद सरकार के खिलाफ विपक्ष को सैन्यमदद अमेरिका और नाटो देश मदद तुरंत बंद करें।उनका इस तरह का काम सीरिया की संप्रभुता पर हमला है.इससे सीरिया में जन-धन आदि की व्यापक क्षति हुई है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 3-

जानकार लोग कह रहे हैं कि सीरिया में अलकायदा को अमेरिका की ओर से रासायनिक हथियार और अन्य सैन्य सामग्री इफरात में मुहैय्या करायी जा रही है। इससे मध्यपूर्व और दूसरे देशों में अलकायदा की शक्ति और संहारक क्षमता का विकास होगा।भारत उनके निशाने पर आ चुका है लेकिन मनमोहन सरकार को इस मामले में सख्त नजरिया अपनाना चाहिए।वरना भारत के अफगानिस्तान हितों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अलकायदा और तालिबान के साथ पाकस्थित आतंकियों का याराना जगजाहिर है,इसके बाबजूद मनमोहन सरकार ने सीरिया के गृहयुद्ध में अमेरिकी भूमिका की अभी तक जिस तरह अवहेलना की है और हमारे देश का विपक्ष (खासकर वामदल)भी शांत है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 2-

सन् 2003 में बुश प्रशासन ने इराक के खिलाफ युद्ध की घोषणा की तो 10साल बाद ओबामा ने सीरिया में विपक्ष को सैन्य मदद की घोषणा करके बुश प्रशासन की युद्धवादी नीति को दोहराया है। सीरिया के गृहयुद्ध में अब तक 80हजार से ज्यादा निरपराध नागरिक मारे गए हैं। एक तरह से समूचे देश को शरणार्थी बना दिया गया है,सीरिया के पड़ोसी देशों में लाखों सीरियाई शरणार्थी की तरह अमानवीय स्थितियों में जी रहे हैं। इस सबके बावजूद अमेरिका की मनमोहन सरकार खुलकर आलोचना नहीं कर रही,इससे हमारे देश की मध्यपूर्व के देशों में साख गिर रही है।
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हिंसा की संस्कृति का जनक अमेरिका- 1-

अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में सीरिया में विपक्ष को हथियारों और अन्य रूप में मदद करने का फैसला किया है और इससे एकबार फिर से पुष्टि हुई है कि अमेरिका हिंसा का उत्पादक देश है।
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अमेरिका की सारी दुनिया में चल रही जासूसी की हरकतों का पिटारा जिस तरह खुला है उसे लेकर कम से कम भारत के इंटरनेट लेखकों,फेसबुक यूजरों और नागरिकों को मिलकर मोर्चा बनाकर सरकार पर दबाब डालना चाहिए। मनमोहन सरकार ने अमेरिकी नजरदारी को जिस तरह ठंड़े बस्ते के हवाले किया है वह हम सबकी कायरता की निशानी है।
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विशिष्ट पोस्ट

मेरा बचपन- माँ के दुख और हम

         माँ के सुख से ज्यादा मूल्यवान हैं माँ के दुख।मैंने अपनी आँखों से उन दुखों को देखा है,दुखों में उसे तिल-तिलकर गलते हुए देखा है।वे क...